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Jan Gan Man: Nashik Kumbh पर Justice Prasanna Varale के बयान पर मचा बवाल, आखिर सिर्फ Hindu आयोजनों पर ही क्यों उठाये जाते हैं प्रश्न?

सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति प्रसन्न वराले के एक बयान के बाद देश में एक नई बहस शुरू हो गई है। महाराष्ट्र में मराठी माध्यम के स्कूलों की खराब होती स्थिति पर चिंता जताते हुए उन्होंने नासिक कुंभ मेले के लिए प्रस्तावित बजट के एक छोटे से हिस्से का उदाहरण दिया, जिसके बाद इस मुद्दे पर अलग-अलग तर्क सामने आने लगे। उनके बयान के समर्थक इसे राज्य सरकार की प्राथमिकताओं और शिक्षा व्यवस्था की उपेक्षा पर उठाया गया जरूरी सवाल बता रहे हैं, जबकि विरोधियों का तर्क है कि स्कूलों और कुंभ जैसे विशाल आयोजन को एक-दूसरे के मुकाबले खड़ा करना ही गलत है, क्योंकि सरकार की जिम्मेदारी दोनों क्षेत्रों की जरूरतों को पूरा करना है। सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है, जिसने सिर्फ कुंभ और स्कूलों के खर्च का सवाल ही नहीं उठाया, बल्कि यह बड़ा प्रश्न भी खड़ा कर दिया है कि क्या विकास, शिक्षा, बुनियादी ढांचे और सदियों पुरानी सांस्कृतिक-धार्मिक परंपराओं को वास्तव में एक-दूसरे का प्रतिद्वंद्वी मानना चाहिए, या फिर भारत जैसे देश को विकास और विरासत, दोनों को साथ लेकर चलने की नीति अपनानी चाहिए। वैसे सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति प्रसन्न वराले द्वारा महाराष्ट्र में मराठी माध्यम के स्कूलों की बदहाल स्थिति पर जताई गई चिंता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि महज लगभग 32 करोड़ रुपये की कमी के कारण 100 से 150 स्कूल बंद होने की कगार पर पहुंच रहे हैं, तो यह निश्चित रूप से राज्य सरकार की शिक्षा नीति और वित्तीय प्रबंधन पर गंभीर सवाल है। लेकिन इस चिंता के साथ नासिक कुंभ मेले के विशाल बजट की तुलना कर यह कहना कि उसके मात्र 0.1 प्रतिशत खर्च से स्कूलों को बचाया जा सकता था, बहस को एक ऐसे द्वंद्व में बदल देता है, जहां सवाल राज्य सरकार की विफलता से हटकर स्कूल बनाम कुंभ बन जाता है। इसे भी पढ़ें: Maharashtra Govt का बड़ा प्रशासनिक फेरबदल: irregular Deputation नियुक्तियां रद्द, 10 सितंबर तक वापसी का Order जबकि असल सवाल यह है कि आखिर महाराष्ट्र सरकार को स्कूलों और कुंभ में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर क्यों माना जाए? सवाल यह भी उठता है कि क्या लाखों करोड़ रुपये के बजट वाला राज्य इतनी क्षमता नहीं रखता कि वह एक ओर मराठी माध्यम के स्कूलों को बचाए और दूसरी ओर करोड़ों श्रद्धालुओं की संभावित भीड़ वाले विशाल आयोजन के लिए सड़क, पानी, स्वच्छता, चिकित्सा और सुरक्षा जैसी व्यवस्थाएं भी करे? समस्या कुंभ पर खर्च नहीं है; समस्या यह है कि यदि 32 करोड़ रुपये के अभाव में स्कूल बंद हो रहे हैं, तो राज्य सरकार से पूछा जाना चाहिए कि उसने शिक्षा व्यवस्था को उस स्थिति तक पहुंचने ही क्यों दिया। यहां सवाल यह भी उठता है कि महाराष्ट्र में ऑटो रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए सामान्य मराठी ज्ञान अनिवार्य करने पर तुली महाराष्ट्र सरकार को क्या राज्य में मराठी स्कूलों की बदहाल स्थिति नजर नहीं आ रही? देखा जाये तो नासिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ कुंभ के लिए प्रस्तावित हजारों करोड़ रुपये की योजना को केवल “धार्मिक खर्च” कह देना पूरी तस्वीर को नजरअंदाज करना है। कुंभ जैसे विशाल आयोजन के लिए सड़कें, परिवहन, पेयजल, शौचालय, अस्पताल, आपातकालीन सेवाएं, सुरक्षा और भीड़ नियंत्रण जैसी बुनियादी सुविधाओं का विकास करना पड़ता है। इनमें से कई सुविधाएं केवल आयोजन के दिनों तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि बाद में भी उस क्षेत्र और वहां रहने वाले स्थानीय लोगों के काम आती हैं। बेहतर सड़कें, परिवहन व्यवस्था, स्वच्छता और अन्य नागरिक सुविधाएं क्षेत्र के समग्र विकास को गति देती हैं और स्थानीय व्यापार व रोजगार को भी लाभ पहुंचाती हैं। इसलिए ऐसे खर्च को केवल धार्मिक आयोजन पर खर्च किया गया पैसा मानना सही नहीं होगा; यह बड़े जनसमूह की व्यवस्था के साथ-साथ उस पूरे क्षेत्र के बुनियादी विकास में निवेश भी है। देखा जाये तो कुंभ जैसे आयोजन को केवल एक धार्मिक मेले के रूप में देखना भारत की उस जीवंत सांस्कृतिक परंपरा को बहुत सीमित कर देना होगा, जो सदियों से आस्था, ज्ञान, सामाजिक मेल-मिलाप और सामूहिक स्मृति को एक साथ जोड़ती आई है। यूनेस्को ने भी 2017 में कुंभ मेले को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल करते हुए इसे आध्यात्मिकता, खगोलीय परंपराओं, अनुष्ठानों, सामाजिक-सांस्कृतिक रीति-रिवाजों और गुरु-शिष्य परंपरा से जुड़ी अत्यंत समृद्ध विरासत माना है। नासिक-त्र्यंबकेश्वर का सिंहस्थ कुंभ इस परंपरा में विशेष स्थान रखता है। यह पवित्र गोदावरी के तट पर आयोजित होता है। साथ ही त्र्यंबकेश्वर 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक और गोदावरी नदी के उद्गम क्षेत्र के रूप में विशेष धार्मिक महत्व रखता है। यहां कुंभ की अपनी विशिष्ट परंपरा भी है, जिसमें वैष्णव अखाड़े नासिक में और शैव-संन्यासी तथा उदासीन अखाड़े त्र्यंबकेश्वर में स्नान करते हैं। विकास और विरासत को साथ लेकर आगे बढ़ रहे भारत के लिए ऐसी सदियों पुरानी परंपराओं को जीवित रखना केवल आस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक निरंतरता और सामाजिक स्मृति को सुरक्षित रखने का दायित्व भी है। आधुनिक सड़कें, अस्पताल, स्कूल और तकनीक जितने जरूरी हैं, उतना ही जरूरी यह भी है कि विकास की दौड़ में समाज अपनी उन परंपराओं से कट न जाए जिन्होंने पीढ़ियों को जोड़े रखा है। आखिर एक आत्मविश्वासी और विकसित राष्ट्र वह नहीं होता जो आधुनिकता के नाम पर अपनी विरासत को बोझ समझने लगे, बल्कि वह होता है जो विकास और विरासत, दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ने की क्षमता रखता हो। हालांकि यह बात भी सही है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में खर्च की समीक्षा आवश्यक है। कुंभ के नाम पर यदि कोई परियोजना अनावश्यक रूप से महंगी बनाई जा रही है, भ्रष्टाचार हो रहा है, काम में देरी है या जनता के पैसे का दुरुपयोग हो रहा है, तो उस पर कठोर सवाल उठने चाहिए। लेकिन यदि स्कूलों को उपेक्षित किया जाता है, तो इसका समाधान कुंभ को खलनायक बनाना नहीं हो सकता। वैसे विडंबना यह भी है कि ऐसी बहसों में अक्सर हिंदू धार्मिक आयोजनों को ही अस्पताल, स्कूल और कल्याणकारी योजनाओं के सामने खड़ा कर दिया जाता है। इसलिए सवाल यह भी उठता है कि क्या इसी तरह की तीखी तुलना किसी दूसरे धर्म के आयोजन या उससे जुड़े बड़े सार्वजनिक खर्च के समय भी की जाती है? यदि सार्वजनिक धन के उपयोग पर सवाल उठाना है, तो उसका पैमाना सभी पर समान होना चाहिए। किसी एक परंपरा को लगातार “अनुत्पादक खर्च” और बाकी को स्वतः सामाजिक रूप से स्वीकार्य मान लेना संतुलित सार्वजनिक नीति नहीं, बल्कि चयनात्मक दृष्टिकोण है। साथ ही कुंभ को केवल धार्मिक चश्मे से देखना भी अधूरा दृष्टिकोण है। यह विशाल सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक गतिविधि का केंद्र बनता है। इसका प्रभाव केवल घाटों और पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं रहता। होटल, परिवहन, छोटे दुकानदार, खाद्य विक्रेता, हस्तशिल्प, अस्थायी रोजगार और स्थानीय व्यापार, सभी इससे प्रभावित होते हैं। प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ 2025 को ही उदाहरण स्वरूप लें तो इससे उत्तर प्रदेश को लाखों करोड़ रुपए का लाभ हुआ। इसलिए बहस को “कुंभ पर खर्च क्यों” तक सीमित करने की बजाय एक अधिक रचनात्मक प्रश्न पूछा जा सकता है कि कुंभ और ऐसे विशाल आयोजनों से उत्पन्न आर्थिक गतिविधि और सरकारी आय का एक निश्चित हिस्सा शिक्षा, स्कूलों के आधुनिकीकरण या किसी विशेष सामाजिक क्षेत्र में क्यों न लगाया जाए? यदि किसी आयोजन से पर्यटन, व्यापार, कर और स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ होता है, तो उसकी आय का सुनियोजित उपयोग शिक्षा और सामाजिक विकास के लिए किया जा सकता है। यह “कुंभ हटाओ, स्कूल बचाओ” जैसी नकारात्मक राजनीति से कहीं अधिक व्यावहारिक और दूरदर्शी सोच होगी। बहरहाल, वास्तव में भारत को मंदिर भी चाहिए, अस्पताल भी; कुंभ की परंपरा भी चाहिए और आधुनिक स्कूल भी। किसी समाज को अपनी सभ्यता और अपनी सार्वजनिक संस्थाओं में से एक को चुनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। यह तर्क कि हर धार्मिक आयोजन के सामने एक अस्पताल या स्कूल खड़ा कर दिया जाए, अपने आप में गलत द्वंद्व पैदा करता है। इसलिए बहस का निष्कर्ष बिल्कुल स्पष्ट है कि शिक्षा पर खर्च बढ़ना चाहिए, स्कूल बचने चाहिए, अनावश्यक खर्च पर लगाम लगनी चाहिए और कुंभ जैसे विशाल आयोजनों में पारदर्शिता तथा दक्षता सुनिश्चित होनी चाहिए। लेकिन हिंदू आस्था, परंपरा और सामाजिक-सांस्कृतिक आयोजनों को हर बार विकास के विरोधी खेमे में खड़ा कर देना न तो निष्पक्ष सार्वजनिक विमर्श है और न ही समाधान। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 25 Aug 2026 3:52 pm

Basti News: पिता की हत्या के बाद नासिक भागने वाली थी युवती

The girl was about to flee to Nashik after killing her father.

अमर उजाला 24 Aug 2026 1:25 am