भारत ने एफएटीएफ का किया समर्थन, टेरर फंडिंग रोकने वाली संस्था पर पाक के हमलों को किया खारिज
भारत ने अंतरराष्ट्रीय आतंक-वित्तपोषण निगरानी संस्था पर पाकिस्तान द्वारा किए गए हमलों का बचाव करते हुए कहा है कि ये आलोचनाएं “जांच के डर” से प्रेरित हैं।
पड़ोसी देश पाकिस्तान की ओर से अफगानिस्तान की सीमा के भीतर किए गए औचक हमले के बाद दक्षिण एशिया में भू-राजनीतिक (Geopolitical) तनाव चरम पर पहुंच गया है। बिना किसी ठोस उकसावे के किए गए इस सैन्य एक्शन के बाद पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के निशाने पर आ गया है और हर तरफ उसकी इस आक्रामक नीति की थू-थू हो रही है। इस नाजुक मोड़ पर भारत ने एक बार फिर अपनी मजबूत कूटनीति का परिचय देते हुए अपने पुराने और भरोसेमंद दोस्त अफगानिस्तान के प्रति अटूट समर्थन जताया है। नई दिल्ली की ओर से आए इस रणनीतिक रुख ने अंतरराष्ट्रीय गलियारों में हलचल तेज कर दी है।हवाई और जमीनी हमले के बाद पाकिस्तान की चौतरफा घेराबंदी शुरूस्थानीय और अंतरराष्ट्रीय खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तानी सेना द्वारा सीमा पार किए गए हवाई और जमीनी हमलों में बड़े पैमाने पर नुकसान की खबरें हैं। पाकिस्तान ने इस कार्रवाई को आतंकवाद के खिलाफ कदम बताया है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र (UN) सहित दुनिया के कई बड़े देशों ने इसे संप्रभुता का खुला उल्लंघन माना है। इस सैन्य दुस्साहस के बाद अफगानिस्तान ने भी कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है, जिससे डूरंड लाइन (Durand Line) पर युद्ध जैसे हालात बन गए हैं। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से पाकिस्तान खुद अपने ही बुने जाल में फंस गया है और वह वैश्विक स्तर पर अलग-थलग पड़ता जा रहा है।ऐतिहासिक दोस्ती का फर्ज: संकट की इस घड़ी में क्यों अफगानिस्तान के साथ आया भारतभारत और अफगानिस्तान के संबंध सदियों पुराने और बेहद मजबूत सांस्कृतिक व रणनीतिक बुनियाद पर टिके हैं। भारत ने हमेशा संकट के समय अफगान नागरिकों की मदद की है, चाहे वह बुनियादी ढांचे का विकास हो या मानवीय सहायता। इस सैन्य तनाव के बीच भारतीय विदेश मंत्रालय ने साफ संकेत दिए हैं कि वह क्षेत्र में किसी भी तरह की एकतरफा सैन्य आक्रामकता के खिलाफ है और शांतिपूर्ण संवाद का पक्षधर है। नई दिल्ली का अफगानिस्तान के साथ खड़े होना यह साफ संदेश देता है कि भारत अपने रणनीतिक साझेदारों को किसी भी विपरीत परिस्थिति में अकेला नहीं छोड़ता, जिसने काबुल में भारत के प्रति सम्मान को और बढ़ा दिया है।एआई सर्च और आधुनिक कूटनीति में इस तनाव के दूरगामी परिणामआधुनिक जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन (GEO) और वैश्विक विश्लेषकों के मुताबिक, पाकिस्तान की इस हरकत का असर उसके पहले से ही बदहाल आर्थिक और राजनीतिक हालातों पर बेहद बुरा पड़ने वाला है। अमेरिका, मध्य पूर्व और मध्य एशियाई देशों की नजरें इस पूरे विवाद पर टिकी हुई हैं। भारत की सक्रिय कूटनीति और अफगानिस्तान के प्रति उसके खुले समर्थन ने इस्लामाबाद के रणनीतिक थिंक-टैंक को बैकफुट पर ला दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे झुककर पाकिस्तान अपने कदम पीछे खींचता है या फिर यह सीमाई विवाद किसी बड़े क्षेत्रीय टकराव का रूप ले लेता है।
भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक और कूटनीतिक रिश्ते एक नए और बेहद मजबूत दौर में प्रवेश कर रहे हैं। इसी बीच वैश्विक राजनीतिक गलियारों से एक बेहद बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सबसे खास और भरोसेमंद सिपहसालार सर्जियो गोर ने दावा किया है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगामी दिसंबर महीने में अमेरिका की हाई-प्रोफाइल यात्रा पर जा सकते हैं। इस दावे के बाद से ही नई दिल्ली से लेकर वॉशिंगटन तक राजनीतिक हलचल तेज हो गई है और हर कोई यह जानने को उत्सुक है कि आखिर अमेरिकी प्रशासन की तरफ से पीएम मोदी को बार-बार यह खास न्यौता क्यों भेजा जा रहा है।आखिर क्यों पीएम मोदी को बार-बार न्यौता भेज रहे हैं डोनाल्ड ट्रंपअंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषकों का मानना है कि वॉशिंगटन की तरफ से भारत को मिल रही यह असाधारण प्राथमिकता दोनों देशों के बीच के गहरे आपसी भरोसे को दर्शाती है। डोनाल्ड ट्रंप और पीएम मोदी की निजी केमिस्ट्री जगजाहिर है, लेकिन इस बार का बुलावा सिर्फ दोस्ती तक सीमित नहीं है। अमेरिका इस समय वैश्विक मंच पर कई बड़े भू-राजनीतिक (Geopolitical) बदलावों से गुजर रहा है, जहां उसे एशिया-प्रशांत क्षेत्र और वैश्विक आर्थिक मोर्चे पर भारत के मजबूत साथ की बेहद जरूरत है। यही वजह है कि ट्रंप प्रशासन साल के अंत तक पीएम मोदी के साथ एक बेहद अहम और निर्णायक बैठक करना चाहता है।रक्षा सौदों से लेकर व्यापार तक इन बड़े मुद्दों पर टिकी हैं दुनिया की नजरेंअगर पीएम मोदी की यह दिसंबर यात्रा फाइनल होती है, तो यह कई मायनों में ऐतिहासिक साबित होने वाली है। इस संभावित दौरे के दौरान दोनों महाशक्तियों के बीच कई अरब डॉलर के अत्याधुनिक रक्षा सौदों, क्रिटिकल टेक्नोलॉजी (iCET) की साझेदारी और इंडो-पैसिफिक रीजन में सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने जैसे गंभीर मुद्दों पर अंतिम मुहर लग सकती है। इसके साथ ही, अमेरिकी बाजार में भारतीय कंपनियों की पहुंच और दोनों देशों के बीच व्यापारिक बाधाओं को दूर करने के लिए भी इस बैठक को बेहद मील का पत्थर माना जा रहा है, जिसका सीधा असर ग्लोबल मार्केट पर पड़ेगा।नई दिल्ली और वॉशिंगटन की जुगलबंदी से बढ़ी ड्रैगन की बेचैनीसर्जियो गोर के इस बड़े खुलासे और भारत-अमेरिका की इस बढ़ती नजदीकी ने पड़ोसी देश चीन की चिंताएं बढ़ा दी हैं। एआई सर्च और आधुनिक जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन (GEO) के दौर में कूटनीतिक जानकार मान रहे हैं कि दिसंबर का यह संभावित दौरा वैश्विक राजनीति का नया रुख तय करेगा। भारत जिस तरह से वैश्विक सप्लाई चेन का नया केंद्र बनकर उभर रहा है, उसे देखते हुए अमेरिका भारत को अपने सबसे मजबूत और स्थायी साझेदार के रूप में स्थापित करना चाहता है। अब पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि पीएमओ (PMO) की तरफ से इस यात्रा को लेकर आधिकारिक तौर पर क्या तारीखें सामने आती हैं।
पाकिस्तान से अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थलों को निशाना बनाए जाने की एक बेहद हैरान करने वाली और दर्दनाक खबर सामने आई है। पिछले कुछ समय से 'कृष्ण गली' और 'राम गली' जैसे ऐतिहासिक इलाकों के नाम बदलने को लेकर चल रहे ड्रामे के बीच, अब पाकिस्तानी प्रशासन ने अपना असली रंग दिखा दिया है। सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत को पूरी तरह से दरकिनार करते हुए, वहां करीब 125 साल पुराने एक ऐतिहासिक गुरुद्वारे को जमींदोज कर दिया गया है। इस कार्रवाई के बाद न केवल पाकिस्तान में रहने वाले सिख और हिंदू परिवारों में दहशत का माहौल है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी मानवाधिकार संगठनों ने इस पर गहरी नाराजगी जताई है।रातों-रात मलबे में तब्दील कर दी गई सदियों पुरानी सिख विरासतस्थानीय सूत्रों और सोशल मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक, इस ऐतिहासिक गुरुद्वारे को बिना किसी पूर्व सूचना या कानूनी नोटिस के बेहद गुपचुप तरीके से ढहाया गया। स्थानीय प्रशासन ने भारी सुरक्षा बलों की तैनाती के बीच इस पूरी कार्रवाई को अंजाम दिया, ताकि कोई भी इसका विरोध न कर सके। विभाजन से पहले के बने इस गुरुद्वारे से न केवल सिख समुदाय की धार्मिक भावनाएं जुड़ी थीं, बल्कि यह उस इलाके की ऐतिहासिक पहचान का एक बेहद अहम हिस्सा था। इस प्राचीन ढांचे को मलबे में तब्दील किए जाने की तस्वीरों और वीडियो ने दुनिया भर के सिख और अल्पसंख्यक समुदायों को झकझोर कर रख दिया है।नाम बदलने के विवाद की आड़ में रची गई बड़ी साजिशविशेषज्ञों का मानना है कि पिछले कुछ दिनों से कृष्ण गली और राम गली के नाम बदलने को लेकर जो विवाद खड़ा किया गया था, वह असल में इस ऐतिहासिक ढांचे को हटाने की एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा था। पाकिस्तान में अक्सर अल्पसंख्यकों के प्राचीन और ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों को भू-माफियाओं और स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत से निशाना बनाया जाता रहा है। इस बार भी विकास और अतिक्रमण हटाने के नाम पर इस पूरी कार्रवाई को अंजाम दिया गया है, जिसने पाकिस्तान के धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के दावों की पूरी तरह से पोल खोलकर रख दी है।अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान को घेरने की तैयारी तेजइस क्रूर और दमनकारी कदम के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की चौतरफा थू-थू हो रही है। भारत सहित दुनिया भर के विभिन्न मानवाधिकार और सिख संगठनों ने संयुक्त राष्ट्र (UN) और वैश्विक कूटनीतिक मंचों से पाकिस्तान के इस कदम पर सख्त कार्रवाई करने की मांग की है। विशेषज्ञों के अनुसार, प्राचीन और धार्मिक विरासतों को इस तरह नष्ट करना अंतरराष्ट्रीय नियमों का खुला उल्लंघन है। इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि पड़ोसी देश में अल्पसंख्यकों के धार्मिक और नागरिक अधिकार कितने असुरक्षित और गंभीर खतरे में हैं।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के केंद्र में इन दिनों अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा शह और मात का खेल है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को सोशल मीडिया पर एक सनसनीखेज दावा किया कि ईरान ने अमेरिकी अधिकारियों के साथ बैठक का अनुरोध किया है। ट्रंप के इस बयान ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है, लेकिन दूसरी ओर से मिला जवाब इसे एक बड़ी कूटनीतिक गुत्थी बना रहा है। ईरानी अधिकारियों ने ऐसी किसी भी बैठक की योजना से साफ इनकार कर दिया है, जिससे साफ हो गया है कि दोनों देशों के बीच तनाव अभी भी अपने चरम पर है।दोहा वार्ता पर ट्रंप बनाम ईरान: सच क्या है?ट्रंप ने दावा किया था कि ईरान के साथ बातचीत मंगलवार को कतर के दोहा में आयोजित होगी। वहीं, ईरान के वरिष्ठ वार्ताकार काजिम गरीबाबादी ने इसे सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि तकनीकी स्तर पर बातचीत की कोई पुष्टि नहीं हुई है, हालांकि कतर के साथ अन्य मामलों पर संवाद जारी है। विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप का यह दावा घरेलू राजनीति से भी प्रेरित हो सकता है, जहां वे यह दिखाना चाहते हैं कि उनका 'मैक्सिमम प्रेशर' काम कर रहा है और ईरान बातचीत के लिए मजबूर है।6 अरब डॉलर की संपत्ति और पेजेश्कियान का दांवईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने हाल ही में जब्त की गई 6 अरब डॉलर की ईरानी संपत्ति के कतर के माध्यम से जारी होने का जिक्र किया है। यह कदम ईरानी जनता को अंतरिम समझौते के लिए राजी करने की एक कोशिश मानी जा रही है। दिलचस्प यह है कि अमेरिकी अधिकारी लगातार यह दोहरा रहे हैं कि ईरान की किसी भी संपत्ति से रोक अभी नहीं हटाई गई है। होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव के बीच यह वित्तीय मुद्दा दोनों देशों के बीच समझौते की मुख्य कड़ी बना हुआ है।होर्मुज जलडमरूमध्य: दुनिया के लिए क्यों खतरनाक है यह तनाव?होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल गलियारा है, जहां से वैश्विक व्यापार का करीब 20% तेल और गैस गुजरती है। हाल के दिनों में वहां जहाजों पर हुए हमलों और अमेरिकी सैन्य प्रतिक्रिया ने क्षेत्र को युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया है। यदि ईरान और अमेरिका के बीच वार्ता विफल रहती है, तो वैश्विक ऊर्जा संकट गहरा सकता है और तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं। ट्रंप के लिए यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वे अमेरिकी नागरिकों को यह भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि अमेरिका में महंगाई घट रही है, लेकिन होर्मुज का तनाव उनके इस दावे को सीधे चुनौती दे रहा है।
यूरोप में प्रलयकारी गर्मी: सड़कें और ट्रैफिक लाइटें पिघलीं, हाईवे टूटे, 1300 से ज्यादा लोगों की मौत
यूरोप इस समय एक अभूतपूर्व और जानलेवा लू (Heatwave) की चपेट में है, जिसने पूरे महाद्वीप को दहका दिया है। तापमान रिकॉर्ड स्तर पर पहुँचने के कारण स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि वहां का बुनियादी ढांचा (Infrastructure) जवाब देने लगा है। बर्लिन से लेकर इटली तक, सड़कों के डामर पिघल रहे हैं और ट्रैफिक लाइटें प्लास्टिक की तरह पिघलकर झुक रही हैं। लू के कारण अब तक 1300 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जिसने यूरोपीय देशों की चिंता बढ़ा दी है।जर्मनी में हाईवे टूटे, थम गए परिवहन के पहिएजर्मनी में गर्मी का असर सबसे ज्यादा परिवहन नेटवर्क पर पड़ा है। बर्लिन को पश्चिमी जर्मनी से जोड़ने वाला A2 मोटरवे भीषण गर्मी के कारण टूटकर बिखर गया, जिससे कई इंटरचेंज बंद करने पड़े। ब्रैंडनबर्ग के जीसार में हाईवे की हालत इतनी खराब हो गई है कि वहां गाड़ियों का चलना असुरक्षित हो गया है। इसके अलावा, लीपजिग शहर में तापमान इतना अधिक हो गया कि सड़क की डामर सतह पिघलने लगी, जिसके चलते ट्राम सेवाओं को बीच में ही रोकना पड़ा। बर्लिन की सड़कों पर तापमान कम करने के लिए पुलिस को वाटर कैनन का सहारा लेना पड़ रहा है।फ्रांस-इटली में पिघल रही ट्रैफिक लाइटेंफ्रांस और इटली में भी स्थिति विकट है। सोशल मीडिया पर इटली और जर्मनी के कई ऐसे वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिनमें चौराहों पर लगी ट्रैफिक लाइटें तेज धूप और उमस की वजह से पिघलती हुई दिखाई दे रही हैं। ट्रेनें देरी से चल रही हैं और बड़े पैमाने पर बिजली कटौती हो रही है। गर्मी से राहत पाने के लिए जलाशयों की ओर रुख कर रहे लोगों के साथ हादसे भी बढ़ गए हैं। फ्रांस में 18 जून से अब तक डूबने के 74 मामले सामने आए हैं, जबकि पोलैंड में एक ही दिन में 17 लोगों की जान चली गई।युद्धग्रस्त यूक्रेन और डेनमार्क पर दोहरी मारविचित्र बात यह है कि बिजली ग्रिडों के लिए प्रसिद्ध डेनमार्क में भी मांग आपूर्ति से कहीं ज्यादा हो गई है, जिससे वहां के ऊर्जा मंत्रालय को ग्रिड विस्तार पर सोचना पड़ रहा है। उधर, रूस के साथ युद्ध झेल रहे यूक्रेन के लिए यह भीषण गर्मी दोहरी मुसीबत बनकर आई है। इवानो-फ्रैंकिवस्क से लेकर फ्रंटलाइन पर स्थित जापोरीझझिया तक बिजली की खपत पर पाबंदियां लगा दी गई हैं। बिजली कंपनी 'यास्नो' के सीईओ सर्गी कोवलेंको के अनुसार, युद्ध से जर्जर हो चुके बिजली ग्रिडों के लिए यह गर्मी एक बड़ी परीक्षा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यूरोपीय देशों का बुनियादी ढांचा इतनी भीषण गर्मी सहने के लिए नहीं बनाया गया था, और अब यह जलवायु परिवर्तन के खतरों को बयां कर रहा है।
शी चिनफिंग ने लुकाशेंको से भेंट की
चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने सोमवार सुबह राजधानी पेइचिंग में बेलारूस के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर लुकाशेंको से मुलाकात की।
स्विट्जरलैंड, फ्रांस, जर्मनी… ये नाम सुनते ही दिमाग में एक तस्वीर बनती है। उस तस्वीर में अकसर साफ-सुथरी सड़कें, बर्फीले पहाड़ और मौसम का लुत्फ उठाते लोग होते हैं। लेकिन इस वक्त हकीकत कुछ और है। यूरोप के ये देश रिकॉर्ड गर्मी में जल रहे हैं। सड़कें पिघल रहीं, पटरियां उखड़ रहीं। पिछले 7 दिनों में हीटवेव ने 1300 से ज्यादा लोगों की जान ले ली। गर्मी से बचने को लोग नदियों-तालाबों में कूद रहे, जिससे फ्रांस में 55 लोग डूब गए। आखिर यूरोप में ऐसा क्यों हो रहा और ये गर्मी भारत से अलग कैसे है, आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: यूरोप के देशों में कैसी गर्मी पड़ रही है? जवाबः पहले 3 तस्वीरों में हीटवेव का मंजर… यूरोप की कुल आबादी करीब 74 करोड़ है। इनमें से 19 करोड़ लोग 35 डिग्री से ज्यादा तापमान झेल रहे हैं। देखिए यूरोप के शहरों में गर्मी का हाल… सवाल-2: भारत में इतना तापमान सामान्य गर्मी माना जाता है, फिर यूरोप में हाहाकार क्यों? जवाबः यूरोप दुनिया के ठंडे रिहायशी महाद्वीप में से एक हैं। यहां पूरा सिस्टम ठंड के हिसाब से बना है, न कि जानलेवा गर्मी के लिए। यूरोप का मौजूदा ढांचा इतनी गर्मी झेलने के लिए तैयार नहीं है… 1. पुराने घर गर्मी अंदर सोख लेते हैं 2. एयर कंडीशनर की कमी 3. ज्यादा बुजुर्ग आबादी एनर्जी एंड क्लाइमेट पॉलिसी एक्सपर्ट सिद्धांत सिंह बताते हैं कि भारत की तुलना में यूरोप में सूरज की रोशनी ज्यादा देर तक रहती है। इससे गर्मी की तीव्रता बढ़ जाती है। इस वक्त यूरोप में 16 घंटे सूरज रहता है, जबकि भारत में 12-13 घंटे। यूरोप की मौजूदा गर्मी ज्यादा सूखी है और हवाएं भी नहीं चल रही। लोगों को ऐसी गर्मी की आदत भी नहीं है। इसलिए लोग ज्यादा घुटन महसूस कर रहे हैं। सवाल-3: यूरोप में इस रिकॉर्ड गर्मी की वजह क्या है? जवाबः 3 बड़ी वजहें हैं… 1. ओमेगा ब्लॉक से रुकी मौसमी हवाएं 2. हीट डोम से यूरोप में गर्मी का गुबार बना 3. ग्लोबल वॉर्मिंग से हालात और ज्यादा खराब सवाल-4: इस गर्मी से यूरोप को कब तक राहत मिलेगी? जवाब: मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक हीट डोम धीरे-धीरे पश्चिम यूरोप से पूर्व की तरफ खिसकेगा। अंटार्कटिक की तरफ से सर्द हवाएं आएंगी, जो राहत देंगी। फ्रांस के पश्चिमी हिस्से में इस हफ्ते से राहत मिलनी शुरू होगी। बाकी हिस्सों में 1 जुलाई तक मौसम गर्म ही रहेगा। जर्मनी, इटली और ब्रिटेन में भी 30 जून तक तापमान कम होगा। हालांकि यह राहत कुछ दिनों की ही रहेगी। मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक जुलाई में यूरोप के ऊपर एक और हीट डोम एक्टिव हो सकता है। इसका असर पश्चिम और मध्य यूरोप में रहेगा। स्पेन, पुर्तगाल, फ्रांस, जर्मनी, दक्षिण इंग्लैंड, उत्तर इटली में 6 से 9 दिन ज्यादा गर्मी और हीटवेव पड़ेगी। 7 से 10 जुलाई के बीच यह हीट डोम एक्टिव हो सकता है। यह अभी की गर्मी से ज्यादा खतरनाक हो सकता है। पहली हीटवेव ने मिट्टी को सुखा दिया है। सड़कों और इमारतों को गर्म कर दिया है। शहरों में नमी वैसे ही कम हो गई है। ऐसे में लगातार दूसरी हीटवेव शहरों को और ज्यादा गर्म करेगी। अमेरिका की क्लाइमेट इम्पैक्ट कंपनी के मुताबिक अगस्त तक यूरोप में गर्म मौसम बना रहेगा। उस पर इस साल एल-नीनो की वजह से यूरोप में सूखा पड़ने की भी आशंका है। -------- ये खबर भी पढ़िए… आज का एक्सप्लेनर: 194 साल के ‘जोनाथन’ की कहानी, पीएम मोदी के दौरे से सुर्खियों में; 39 अमेरिकी राष्ट्रपति देख चुका, 140 साल छोटी गर्लफ्रेंड पीएम मोदी 27 जून को सेशेल्स दौरे पर गए। दर्जनों खबरें चलीं- ‘मोदी यहां दुनिया के सबसे बुजुर्ग जानवर जोनाथन से मिलेंगे।’ पीएम मोदी कछुओं से मिले भी, लेकिन उनमें जोनाथन नहीं था। दरअसल, जोनाथन सेशेल्स में है ही नहीं। वो तो 7 हजार किमी दूर एक ब्रिटिश टापू सेंट हेलेना में है। पूरी खबर पढ़िए…
वैश्विक राजनीति के मंच पर भारत का मान लगातार बढ़ रहा है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अब तक दुनिया के 34 देश अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाज चुके हैं. लेकिन देश के भीतर अक्सर घरेलू राजनीति में प्रधानमंत्री पद की गरिमा और मर्यादा को तार-तार करने वाले बयान सामने आते रहते हैं. इस बीच, भारत के संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्षी नेताओं के इस आचरण को लेकर ब्रिटेन (UK) के वेस्टमिंस्टर संसदीय मॉडल का एक ऐसा उदाहरण पेश किया है, जिसने देश के राजनीतिक गलियारों और सोशल मीडिया पर एक नई कानूनी बहस छेड़ दी है. किरेन रिजिजू ने ब्रिटिश संसद का एक वीडियो साझा करते हुए सवाल उठाया है कि क्या भारत को भी पीएम पद की संवैधानिक मर्यादा बनाए रखने के लिए अंग्रेजों के कड़े नियमों को अपनाना चाहिए?ब्रिटिश संसद में क्या हुआ था? जानिए पाकिस्तानी मूल की सांसद के सस्पेंशन की इनसाइड स्टोरीयह पूरा मामला इसी साल अप्रैल महीने का है, जब ब्रिटेन की संसद (House of Commons) में अमेरिका के राजदूत के रूप में पीटर मैंडेलसन की नियुक्ति को लेकर गरमागरम बहस चल रही थी. इसी दौरान लेबर पार्टी की सांसद और पाकिस्तानी मूल की ब्रिटिश नागरिक जारा सुल्ताना (Zarah Sultana) ने तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर पर तीखा व्यक्तिगत हमला बोल दिया. उन्होंने पीएम कीर स्टार्मर को 'बेयर-फेस्ड लायर' यानी सीधे तौर पर 'निर्लज्ज झूठा' कह दिया. जारा सुल्ताना ने सदन में कहा था कि प्रधानमंत्री पीटर मैंडेलसन का बचाव इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वे उनके निजी हितों के लिए काम करते हैं और ऐसा करके प्रधानमंत्री पूरे देश को धोखा दे रहे हैं.जैसे ही जारा सुल्ताना के मुंह से 'झूठा' शब्द निकला, ब्रिटिश संसद के स्पीकर सर लिंडसे हॉयल ने तुरंत दखल दिया. उन्होंने जारा सुल्ताना को आदेश दिया कि वे अपने इस असंसदीय शब्द को तुरंत वापस लें और मर्यादा में रहें. लेकिन जब जारा सुल्ताना ने अपना बयान वापस लेने से साफ इनकार कर दिया, तो स्पीकर ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा—'बैठ जाओ और तुरंत सदन से बाहर जाओ.' नियमों की अवहेलना करने पर जारा सुल्ताना को तत्काल प्रभाव से 5 दिनों के लिए संसद से निलंबित (Suspend) कर दिया गया. इसी दिन रिफॉर्म यूके के एक अन्य सांसद ली एंडरसन को भी प्रधानमंत्री को 'झूठा' कहने के कारण सदन से बाहर का रास्ता दिखाया गया था.आखिर क्यों ब्रिटेन में पीएम के अपमान पर तुरंत होती है जेल और सस्पेंशन जैसी कार्रवाई?ब्रिटेन का वेस्टमिंस्टर मॉडल अपनी संसदीय परंपराओं और भाषा की शुचिता के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है. वहां की रूलबुक के अनुसार, संसद के भीतर कुछ खास शब्दों के इस्तेमाल पर पूरी तरह से कानूनी पाबंदी है. ब्रिटिश संसदीय नियमों के तहत:प्रतिबंधित शब्द: सदन के अंदर किसी भी सदस्य को 'लायर' (झूठा) या 'डिसऑनेस्ट' (बेईमान) कहना पूरी तरह वर्जित है.नीतियों बनाम व्यक्तिगत टिप्पणी: कोई भी सांसद सरकार की नीतियों, फैसलों और बजट की कितनी भी कड़ी आलोचना कर सकता है, लेकिन वह देश के प्रधानमंत्री पर किसी भी प्रकार की व्यक्तिगत या अमर्यादित टिप्पणी नहीं कर सकता.स्पीकर के असीमित अधिकार: यदि कोई सांसद इन नियमों को तोड़ता है, तो स्पीकर के पास उसे बिना किसी देरी के तुरंत सदन से निष्कासित करने का पूर्ण अधिकार होता है.भारत के नियम क्या कहते हैं और यहाँ कार्रवाई क्यों नहीं होती?ब्रिटेन के इस कड़े एक्शन की तुलना अगर भारतीय संसद से की जाए, तो तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आती है. भारत में भी लोकसभा और राज्यसभा की रूलबुक के नियम 380 और 381 के तहत सदन में असंसदीय भाषा (Unparliamentary Language) के इस्तेमाल पर पूरी तरह प्रतिबंध है. इसके अलावा नियम 222 के तहत विशेषाधिकार हनन (Breach of Privilege) की कार्रवाई का भी प्रावधान है. भारत में राहुल गांधी से लेकर मल्लिकार्जुन खरगे और अधीर रंजन चौधरी जैसे कई बड़े नेता समय-समय पर प्रधानमंत्री के खिलाफ 'चोर' या 'कायर' जैसे शब्दों का प्रयोग कर चुके हैं.लेकिन भारत में राजनीतिक और दलीय दबाव के कारण अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल होने पर सदन में सिर्फ भारी हंगामा और नारेबाजी होती है, मगर सांसदों के खिलाफ वैसी त्वरित और कड़ी निलंबन की कार्रवाई देखने को नहीं मिलती जैसी ब्रिटेन में हुई. भारतीय संसद में ज्यादा से ज्यादा यह होता है कि स्पीकर के आदेश पर उन विवादित शब्दों को सदन की आधिकारिक कार्यवाही के रिकॉर्ड (Expunged from Records) से हटा दिया जाता है, लेकिन अपराधी सांसद पर कोई बड़ा एक्शन नहीं हो पाता. यही वजह है कि संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू अब भारत में एक ऐसा मजबूत स्वदेशी संसदीय ढांचा बनाने की वकालत कर रहे हैं, जो प्रधानमंत्री के संवैधानिक पद की गरिमा की रक्षा करे और नेताओं को जनता के प्रति अधिक जिम्मेदार बनाए.
बलोचिस्तान में पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी ISI के खिलाफ बलोच नागरिकों का गुस्सा एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है. बलोच विद्रोह और आजादी की आवाज को दबाने के लिए पाकिस्तानी सेना द्वारा निर्दयता के साथ किए जा रहे अपहरण, जबरन गुमशुदगी (Enforced Disappearances) और 'किल एंड डंप' नीति के खिलाफ प्रमुख बलोच मानवाधिकार कार्यकर्ता सम्मी दीन बलोच (Sammi Deen Baloch) ने एक दिल दहला देने वाला खुला पत्र लिखा है.अपने इस पत्र के जरिए उन्होंने सीधे तौर पर पाकिस्तान सरकार और सेना से अपने लापता पिता को लेकर कड़े सवाल पूछे हैं. सम्मी दीन बलोच ने अपनी भावुक और रोंगटे खड़े कर देने वाली अपील में लिखा है, अगर मेरे अब्बा जिंदा हैं तो उन्हें वापस लौटा दो और अगर आपने उन्हें मार दिया है, तो हमें और तड़पाने के बजाय उनका डेथ सर्टिफिकेट दे दो. इस खुले पत्र ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान में हो रहे मानवाधिकारों के हनन और बलोच नरसंहार को बेनकाब कर दिया है.17 साल का अंतहीन इंतजार: डॉ. दीन मोहम्मद बलोच की गुमशुदगी की दर्दनाक कहानीबलोच एक्टिविस्ट सम्मी दीन बलोच ने अपने पिता डॉ. दीन मोहम्मद बलोच के जबरन अपहरण और लापता होने की 17वीं बरसी पर रविवार (28 जून 2026) को यह खुला पत्र जारी किया. अपनी मार्मिक अपील में सम्मी दीन ने लिखा कि पिछले दो दशकों से चल रही इस अनिश्चितता के बाद अब उनके परिवार को यह जानने का पूरा कानूनी और मानवीय हक है कि उनके पिता किस हाल में हैं.पेशा से सरकारी चिकित्सक डॉ. दीन मोहम्मद बलोच को 28 जून 2009 की रात बलोचिस्तान के खुजदार जिले से पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों और सेना के अधिकारियों ने जबरन हिरासत में लिया था. उस काली रात के बाद से आज तक, यानी पिछले 17 सालों में डॉ. दीन मोहम्मद का कोई अता-पता नहीं है. उनका परिवार आज भी उनकी सुरक्षित वापसी की आस में जी रहा है.'याचिकाएं, लाठियां और आंसू गैस ही मेरी विरासत बन गईं'अपने पिता के लापता होने के गहरे दुख और दर्द को बयां करते हुए सम्मी दीन बताती हैं कि वह अपने पिता के जीवित या मृत होने के सच से अनजान रहते हुए ही बड़ी हुईं. उन्होंने अपने पत्र में लिखा, बचपन में मुझे सिर्फ गुमशुदगी दी गई. जब भी मैंने स्कूल या समाज में अपने पिता के बारे में पूछा, तो मुझे सिर्फ इनकार, दुत्कार और अपमान मिला. मेरे पिता को यह जालिम राज्य उठा ले गया और उनका अंतहीन इंतजार करने की सजा मुझे आजीवन कारावास की तरह दे दी गई.उन्होंने आगे लिखा, दुनिया के बाकी बच्चे अपने पिता की उंगली थामकर और उनकी खूबसूरत यादों के साथ बड़े होते हैं. लेकिन मुझे बचपन से ही अदालतों की याचिकाएं, पुलिस की लाठियां, आंसू गैस के गोले और हाथों में पिता के पोस्टर्स लेकर सड़कों पर घूमने की विरासत मिली है. मेरे अब्बा कोई सरकारी फाइल या कोई कोरी अफवाह नहीं थे. वे डॉ. दीन मोहम्मद थे—एक डॉक्टर, एक जिम्मेदार पति और एक बेहद प्यारे पिता, जिन्हें हमसे हमेशा के लिए छीन लिया गया.अंतरराष्ट्रीय मंच पर गूंजी आवाज: जर्मनी के संगठन ने पाकिस्तान को घेरासम्मी दीन बलोच आज बलोचिस्तान में पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों के खिलाफ लड़ने वाली प्रमुख संस्था 'वॉयस फॉर बलोच मिसिंग पर्सन्स' (VBMP) की महासचिव हैं. वह बलोचिस्तान में जबरन गायब किए गए हजारों युवाओं और नागरिकों के इंसाफ की लड़ाई का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय चेहरा बन चुकी हैं. उनके इस शांतिपूर्ण आंदोलन और अदालतों में दायर की जा रही याचिकाओं से बौखलाई पाकिस्तानी सेना और पुलिस कई बार उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज चुकी है और उन पर हिंसक हमले भी करवा चुकी है.सम्मी दीन के इस खुले पत्र के बाद अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने भी पाकिस्तान सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. जर्मनी के डबलिन में स्थित प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन 'फ्रंट लाइन डिफेंडर्स' (Front Line Defenders) ने सम्मी दीन बलोच के प्रति अपना पूर्ण समर्थन दोहराया है. संगठन ने पाकिस्तानी हुक्मरानों से मांग की है कि वे डॉ. दीन मोहम्मद बलोच के ठिकाने का तुरंत और आधिकारिक तौर पर खुलासा करें और बलोचिस्तान में चल रहे जबरन गुमशुदगी के सभी मामलों की स्वतंत्र निष्पक्ष जांच कराएं.पाकिस्तानी सेना का ढिठाई भरा रुख: आरोपों को सिरे से किया खारिजहमेशा की तरह, इस बार भी पाकिस्तानी सरकार और उसकी सेना ने राजनीतिक उत्पीड़न और बलोच नागरिकों को गायब करने के इन गंभीर आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है. पाकिस्तानी सेना का दावा है कि बलोच कार्यकर्ताओं के खिलाफ की जा रही कार्रवाई पूरी तरह से देश के कानून के दायरे में है.सेना ने ढिठाई से बयान जारी करते हुए कहा कि आम नागरिकों को गायब करने की उनकी कोई आधिकारिक नीति नहीं है. पाकिस्तानी अधिकारियों का दावा है कि जो लोग लापता बताए जा रहे हैं, उनमें से अधिकांश लोग या तो प्रतिबंधित उग्रवादी और आतंकवादी संगठनों में शामिल हो गए हैं, या वे कानून से बचने के लिए भूमिगत (Underground) हो गए हैं या फिर अपनी मर्जी से देश छोड़कर विदेश चले गए हैं. लेकिन बलोच मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि सेना का यह बयान सिर्फ उनके खूनी गुनाहों को छिपाने का एक भद्दा बहाना है.
27 जून 2026 की दोपहर को राजस्थान के उदयपुर रनवे पर इंडिगो (IndiGo) के एयरबस A320 विमान ने जब अपने कदम रखे, तो खिड़की से बाहर खूबसूरत अरावली की पहाड़ियों को देख रहे यात्रियों को सब कुछ बिल्कुल सामान्य लगा. लेकिन बैकस्टेज भारतीय उड्डयन और विज्ञान के इतिहास में एक बहुत बड़ा कीर्तिमान रचा जा चुका था. इस विशाल पैसेंजर जेट को रनवे पर मौजूद पारंपरिक ग्राउंड रेडियो सिग्नल की मदद से नहीं, बल्कि भारत के ऊपर हजारों किलोमीटर दूर अंतरिक्ष में चौबीसों घंटे तैनात स्वदेशी सैटेलाइट्स की मदद से सुरक्षित उतारा गया था.डायरेक्टरेट जनरल ऑफ सिविल एविऐशन (DGCA) की कड़ी निगरानी और गाइडलाइंस के तहत, भारत के अपने स्वदेशी सैटेलाइट आधारित नेविगेशन सिस्टम 'गगन' (GAGAN) का इस्तेमाल करके कॉमर्शियल लैंडिंग करने वाला यह देश का पहला बड़ा पैसेंजर जेट बन गया है. आइए एक एक्सपर्ट रिपोर्टर की नजर से इस पूरी तकनीक को आसान भाषा में समझते हैं कि यह कैसे काम करती है और भारत के लिए यह ऐतिहासिक मील का पत्थर क्यों बेहद खास है.क्या है 'गगन' (GAGAN) सिस्टम और अंतरिक्ष से कैसे मिलती है पायलट को मदद?गगन (GAGAN) का पूरा नाम 'जीपीएस एडेड जियो ऑगमेंटेड नेविगेशन' (GPS Aided GEO Augmented Navigation) है. इस बेहद आधुनिक और जटिल सिस्टम को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और भारतीय विमानन प्राधिकरण (AAI) ने सालों की रिसर्च के बाद संयुक्त रूप से मिलकर तैयार किया है. गगन का शक्तिशाली सिग्नल अंतरिक्ष में मौजूद इसरो के GSAT-8 और GSAT-10 कम्युनिकेशन सैटेलाइट्स के जरिए सीधे विमानों के कॉकपिट तक पहुंचता है.इसे आप बेहद आसान शब्दों में एक ऐसे 'सुपर क्लास टीचर' या 'गाइड' की तरह समझ सकते हैं जो आसमान में बैठकर अमेरिकी जीपीएस (GPS) के काम को हर सेकंड चेक करता है. जीपीएस के सिग्नलों में आने वाली मामूली से मामूली खराबी या दूरी की गलतियों को तुरंत सुधारकर यह पायलट के रिसीवर तक बिल्कुल सटीक और एरर-फ्री जानकारी पहुंचाता है. जब कोई विमान घने कोहरे या खराब मौसम में लैंड कर रहा होता है, तो गगन उसे रनवे का बिल्कुल सुई की नोंक जैसा सटीक रास्ता दिखाता है.पारंपरिक रेडियो नेटवर्क बनाम गगन: छोटे शहरों के हवाई अड्डों के लिए वरदानआमतौर पर दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर विमानों को सुरक्षित उतारने के लिए जमीन पर आधारित 'इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम' (ILS) यानी ग्राउंड रेडियो बीम नेटवर्क का इस्तेमाल किया जाता है. यह सिस्टम जमीन से अदृश्य तरंगें (रेडियो सिग्नल) भेजकर पायलट को सीधा आने और रनवे पर टचडाउन करने का रास्ता बताता है. लेकिन यह पारंपरिक ग्राउंड सिस्टम बेहद महंगा होता है और हर छोटे या पहाड़ी इलाकों के रीजनल एयरपोर्ट (जैसे शिमला, कुल्लू या पूर्वोत्तर के राज्य) पर इसे लगाना और मेंटेन करना मुमकिन नहीं है.इसके विपरीत, गगन सिस्टम के लिए जमीन पर किसी करोड़ो रुपये के महंगे तामझाम या टावरों की बिल्कुल जरूरत नहीं होती. यह सीधे अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट्स की मदद से पायलट को बाएं-दाएं (Horizontal) और ऊपर-नीचे (Vertical) दोनों तरह की सटीक गाइडेंस दे देता है, जिससे छोटे शहरों के एयरपोर्ट्स पर भी बड़े विमानों की नाइट लैंडिंग और खराब मौसम में लैंडिंग बेहद आसान हो जाएगी.GAGAN और NavIC में क्या अंतर है? अक्सर लोग हो जाते हैं कंफ्यूजअक्सर लोग गगन (GAGAN) और नाविक (NavIC) को एक ही समझ लेते हैं, लेकिन विज्ञान के नजरिए से ये दोनों एक-दूसरे से बिल्कुल अलग और अलग उद्देश्यों के लिए काम करते हैं. नाविक (Navigation with Indian Constellation) भारत का एक पूरी तरह स्वतंत्र और स्वदेशी पोजीशनिंग नेटवर्क है, जो खुद रास्ता ढूंढता है—ठीक वैसे ही जैसे अमेरिका का GPS या रूस का ग्लोनास काम करता है.वहीं दूसरी तरफ, गगन खुद कोई नया नेविगेशन नेटवर्क नहीं है और न ही नया रास्ता बनाता है. गगन का मुख्य काम केवल और केवल जीपीएस (GPS) से मिलने वाले सिग्नलों की बारीकी से जांच करना, उनकी तकनीकी कमियों को दूर करना और नागरिक उड्डयन (Civil Aviation) की सुरक्षा के लिए उन्हें ज्यादा से ज्यादा विश्वसनीय और अचूक बनाना है.70 टन के हवाई जहाज के लिए जीपीएस की कमियों को कैसे दूर करता है गगन?हमारे स्मार्टफोन में मौजूद सामान्य जीपीएस कुछ मीटर (5 से 10 मीटर) तक की चूक या एरर कर सकता है, जो सड़क पर गाड़ी चलाने या कोई रेस्टोरेंट ढूंढने के लिए तो ठीक है; लेकिन 70 टन के भारी-भरकम हवाई जहाज को जीरो विजिबिलिटी और घने बादलों के बीच से रनवे पर उतारने के लिए यह बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं है. भारत के ऊपर मौजूद पृथ्वी की ऊपरी वायुमंडलीय परत (Ionosphere) के कारण जीपीएस के सिग्नल अक्सर सुस्त पड़ जाते हैं या मुड़ जाते हैं, जिससे गलत लोकेशन दिखने का खतरा रहता है.इसे पूरी तरह फिक्स करने के लिए इसरो ने भारतभर में 15 अत्यधिक संवेदनशील ग्राउंड रेफरेंस स्टेशन (INRES) बनाए हैं, जिनकी भौगोलिक लोकेशन सेंटीमीटर तक फिक्स है. ये स्टेशन जीपीएस की त्रुटि को रियल-टाइम में पकड़ते हैं, इंडियन मास्टर कंट्रोल सेंटर (INMCC) उसे ठीक करने का गणितीय फॉर्मूला बनाता है और सैटेलाइट्स के जरिए तुरंत प्लेन के रिसीवर को भेज देता है. सबसे खास बात यह है कि अगर किसी तकनीकी खराबी के कारण सिग्नल पर भरोसा नहीं किया जा सकता, तो यह सिस्टम पायलट को महज 6 सेकंड के भीतर वॉर्निंग अलर्ट (Time-to-Alert) भी दे देता है.अमेरिका-यूरोप के क्लब में शामिल हुआ भारत: क्यों दुनिया का सबसे एडवांस सिस्टम है 'गगन'?उदयपुर की इस ऐतिहासिक सफल लैंडिंग के साथ ही भारत दुनिया के उन चुनिंदा और गिने-चुने देशों के एलीट क्लब में शामिल हो गया है, जिसके पास अपना खुद का सैटेलाइट आधारित ऑगमेंटेशन सिस्टम (SBAS) मौजूद है. वर्तमान में अमेरिका इसके लिए WAAS (Wide Area Augmentation System) का इस्तेमाल करता है, यूरोप के पास अपना EGNOS है और जापान MSAS तकनीक का उपयोग करता है.लेकिन इन सबके बीच भारत का गगन सिस्टम इसलिए दुनिया में सबसे अनोखा और एडवांस माना जा रहा है क्योंकि यह भूमध्यरेखीय (Equatorial Zone) क्षेत्र के बेहद कठिन, अशांत और तेजी से बदलते आसमान में भी सौ फीसदी सटीक काम करने वाला दुनिया का इकलौता प्रमाणित सिस्टम बन गया है. गगन के आने से भारतीय नागरिक उड्डयन सेक्टर में सुरक्षा के मायने पूरी तरह बदल गए हैं.
Russia Fuel Crisis 2026 : पूरी दुनिया के भू-राजनीतिक (Geopolitical) परिदृश्य में एक ऐसा अप्रत्याशित और चौंकाने वाला फेरबदल हुआ है, जिसने अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों को भी हैरान कर दिया है. वैश्विक ऊर्जा बाजार का 'सिकंदर' और महाशक्ति कहलाने वाला रूस, जिसके पास 80 अरब बैरल से अधिक कच्चे तेल (Crude Oil) का असीमित भंडार है, आज खुद अपने ही देश में एक अभूतपूर्व और गंभीर तेल संकट (Fuel Crisis) से जूझ रहा है. रूस के बड़े-बड़े शहरों में पेट्रोल पंपों के बाहर गाड़ियों की किलोमीटर लंबी लाइनें और ईंधन की राशनिंग (सप्लाई पर सीमा) देखी जा रही है. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया है कि उनका देश इस समय इतिहास के सबसे बुरे गैसोलीन (पेट्रोल) संकट का सामना कर रहा है और उन्होंने इस विकट परिस्थिति से उबरने के लिए भारत और कजाकिस्तान जैसे मित्र देशों से आपातकालीन मदद की गुहार लगाई है.यूक्रेन के 'ड्रोन हंटर्स' ने तोड़ी रूस की कमर: रिफाइनिंग क्षमता 25% तक ठपयह संकट कच्चे तेल की कमी के कारण नहीं, बल्कि उसे इस्तेमाल के योग्य (रिफाइन) बनाने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर के तबाह होने से पैदा हुआ है. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने एक इंटरव्यू में माना कि यूक्रेन के साथ पिछले चार साल से चल रहे भीषण युद्ध के दौरान रूसी तेल और गैस रिफाइनरियों पर लगातार किए गए एडवांस ड्रोन हमलों ने देश को गहरी चोट दी है.अकेले मई और जून 2026 में यूक्रेन ने रूस की 20 से अधिक मुख्य रिफाइनरियों को निशाना बनाकर उन्हें मलबे में तब्दील कर दिया है, जिसमें विशाल मॉस्को रिफाइनरी भी शामिल है. इन सटीक और घातक हमलों के चलते रूस की तेल प्रसंस्करण (Crude Processing) क्षमता पिछले दो दशकों के सबसे निचले स्तर पर गिर गई है और देश का कुल पेट्रोल उत्पादन 25 प्रतिशत तक घट गया है. मॉस्को का गैसोलीन रिजर्व घटकर बेहद खतरनाक स्तर (सिर्फ 1.7 मिलियन मीट्रिक टन) पर आ चुका है, जिसे देखते हुए रूस ने पहले ही घरेलू बाजार को संभालने के लिए पेट्रोल-डीजल के निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है.कजाकिस्तान के सामने बड़ी धर्मसंकट: 'हां' कहें तो यूक्रेन का डर, 'ना' कहें तो पुतिन का दबावइस गहरे ऊर्जा संकट से निपटने के लिए क्रेमलिन (रूस) ने अपने पड़ोसी देश कजाकिस्तान से तत्काल 50,000 टन AI-92 ग्रेड पेट्रोल की मांग की है. हालांकि, रूस की इस मांग ने कजाकिस्तान की सरकार को एक बेहद जटिल कूटनीतिक और आर्थिक धर्मसंकट (Matrix of Pressure) में डाल दिया है.कजाकिस्तान को सबसे बड़ा डर यह है कि अगर वह खुलेआम रूस को ईंधन की सप्लाई करता है, तो यूक्रेन के खतरनाक लॉन्ग-रेंज ड्रोन उसकी अपनी रिफाइनरियों को भी निशाना बनाना शुरू कर देंगे. दूसरी ओर, कजाकिस्तान के कच्चे तेल के निर्यात का एक बहुत बड़ा हिस्सा रूसी पाइपलाइनों और बंदरगाहों के माध्यम से ही वैश्विक बाजारों तक पहुंचता है. ऐसे में कजाकिस्तान के ऊर्जा मंत्रालय के लिए रूस की इस मांग पर 'हां' या 'ना' कहना सांप-छछूंदर की गति जैसा हो गया है. वहीं, कजाकिस्तान खुद भी जुलाई में एविएशन फ्यूल (हवाई ईंधन) की कमी का सामना कर रहा है, इसलिए वह रूस के सामने ईंधन के बदले ईंधन (Barter) की शर्त रखने पर विचार कर रहा है.भारत बना ग्लोबल रिफाइनिंग का 'पावरहाउस': पुतिन ने पेट्रोल के लिए खोला खजानाइस पूरे संकट में वैश्विक राजनीति का पासा पूरी तरह पलट चुका है. जो रूस अब तक भारत को भारी डिस्काउंट पर कच्चा तेल बेच रहा था, वही रूस अब भारत से रिफाइंड पेट्रोल (गैसोलीन) खरीदने के लिए मजबूर हो गया है. भारत और रूस के बीच ऊर्जा संबंध साल 2026 में एक नए ऐतिहासिक शिखर पर पहुंच गए हैं. जून 2026 में भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल का आयात बढ़कर रिकॉर्ड 2.66 मिलियन बैरल प्रति दिन हो गया है. भारत इस कच्चे तेल को अपनी अत्याधुनिक रिफाइनरियों (जैसे रिलायंस, नायरा एनर्जी, IOCL) में प्रोसेस करता है और इसे पेट्रोल-डीजल में बदलता है.अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स (रॉयटर्स और RBC) के अनुसार, रूसी रिफाइनरियों के तबाह होने के बाद वहां रोजाना करीब 25,000 टन पेट्रोल की भारी किल्लत हो रही है. रूस की घरेलू मांग रोजाना 1,11,000 टन है, जबकि उसकी बची हुई रिफाइनरियां सिर्फ 85,000 टन ही बना पा रही हैं. इस भारी गैप को भरने के लिए रूस ने भारत से बड़े पैमाने पर समुद्री रास्तों (Seaborne Imports) के जरिए पेट्रोल आयात करने के लिए अपने टैक्स कोड (Tax Code) में संशोधन किया है. इसके तहत विदेशी पेट्रोल खरीदने वाली रूसी तेल कंपनियों को सरकार भारी बजट सब्सिडी देगी.इथेनॉल ब्लेंडिंग का पेंच: क्या भारतीय पेट्रोल अपनाएगा रूस?भारत से बड़े पैमाने पर पेट्रोल आयात करने के सामने एक तकनीकी पेंच भी फंसा हुआ है. दरअसल, भारत ग्लोबल वार्मिंग को कम करने के लिए अपने पेट्रोल में 20 फीसदी इथेनॉल (Ethanol Blend) मिलाता है, जो कि रूस के सामान्य राष्ट्रीय मानक (Standard) से दोगुना है. रूस में अधिकतम 10 फीसदी इथेनॉल मिश्रित ईंधन की ही अनुमति है. हालांकि, मौजूदा संकट और पेट्रोल पंपों पर मची हाहाकार को देखते हुए रूसी स्टेट ड्यूमा (संसद) ने नियमों में ढील देने और भारतीय ईंधन को तुरंत स्वीकार करने की हरी झंडी दे दी है. यह पूरी स्थिति साबित करती है कि भारत आज दुनिया के लिए रिफाइनिंग का सबसे बड़ा और अनिवार्य पावरहाउस बन चुका है.
शेख हसीना ने किया बांग्लादेश लौटने का ऐलान
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने मौत की सजा के बावजूद इस साल देश लौटने का ऐलान किया है. वह करीब दो साल से भारत में रह रही हैं.
एशियाई महाद्वीप के इस हिस्से में कुदरत का भयंकर कहर देखने को मिला है। भारत के पड़ोसी देश चीन में आधी रात को उस वक्त भारी हड़कंप मच गया, जब लोग अपने घरों में गहरी नींद सो रहे थे। अचानक आए बेहद शक्तिशाली भूकंप के झटकों से धरती बुरी तरह कांप उठी और बहुमंजिला इमारतें ताश के पत्तों की तरह हिलने लगीं। भूकंप का यह झटका इतना जोरदार था कि लोग डर के मारे अपने मासूम बच्चों के साथ घरों से बाहर निकलकर सड़कों और खुले मैदानों की तरफ भागने लगे। स्थानीय समयानुसार देर रात आए इस जलजले ने चीन के कई रिहायशी इलाकों को हिलाकर रख दिया है, जिसके बाद प्रभावित प्रांतों में आपातकाल (Emergency Services) लागू कर दिया गया है।रिक्टर स्केल पर कितनी थी भूकंप की तीव्रता और कहां था इसका केंद्र?सीस्मोलॉजी विभाग (भूकंप विज्ञान केंद्र) से मिली शुरुआती जानकारी के अनुसार, चीन के सुदूर और पहाड़ी क्षेत्र में आए इस भूकंप की तीव्रता रिक्टर स्केल पर बेहद खतरनाक श्रेणी में मापी गई है। जमीन के अंदर कम गहराई पर इसका केंद्र (Epicenter) होने के कारण झटके बहुत ज्यादा महसूस किए गए और इसकी गूंज आसपास के कई किलोमीटर के दायरे तक फैल गई। भूकंपीय लहरों के चलते केंद्र के नजदीक स्थित कई पुराने मकानों और सरकारी इमारतों में दरारें आने की खबरें हैं। चीनी सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग (China Earthquake Networks Center) ने तुरंत राहत और बचाव कार्य शुरू करने के निर्देश जारी कर दिए हैं।भारत के सीमावर्ती इलाकों में भी अलर्ट? भौगोलिक दृष्टि से क्यों बढ़ा खतराचूंकि यह भूकंप भारत के पड़ोसी देश चीन के सीमाई और पहाड़ी हिस्से में आया है, इसलिए भौगोलिक रूप से बेहद संवेदनशील माने जाने वाले भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख व जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों में भी भूवैज्ञानिक हलचल पर पैनी नजर रखी जा रही है। हिमालयन फॉल्ट लाइन (Himalayan Fault Line) पर लगातार बढ़ रहे इस दबाव के कारण टेक्टोनिक प्लेट्स में मची उथल-पुथल से भारतीय मौसम विभाग और भूकंप विशेषज्ञों की चिंताएं बढ़ गई हैं। हालांकि, भारतीय सीमा के भीतर अभी तक किसी भी तरह के नुकसान की कोई खबर सामने नहीं आई है, लेकिन स्थानीय प्रशासन को पूरी तरह सतर्क रहने को कहा गया है।तबाही और नुकसान का आकलन जारी: रात के अंधेरे में रेस्क्यू ऑपरेशन शुरूआधी रात को आए इस भयंकर भूकंप के बाद प्रभावित शहरों की बिजली और संचार व्यवस्था पूरी तरह से ठप हो गई है, जिससे रेस्क्यू ऑपरेशन चलाने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। मलबे में दबे लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए चीनी सेना और स्थानीय आपदा राहत बलों (NDRF जैसी टीमों) को तैनात किया गया है। आने वाले कुछ घंटों में हल्के झटके (Aftershocks) आने की आशंका को देखते हुए प्रशासन ने लोगों से पक्के और जर्जर मकानों के अंदर न जाने की अपील की है। पूरी दुनिया की नजरें इस वक्त चीन से आने वाली पल-पल की तस्वीरों और आधिकारिक बयानों पर टिकी हुई हैं।
मिडल ईस्ट और दक्षिण एशिया के इस हिस्से में तनाव अब अपने सबसे खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच सीमाई इलाकों में लंबे समय से जारी तनातनी ने बीती रात एक बेहद खौफनाक रूप अख्तियार कर लिया। पाकिस्तानी वायुसेना और सुरक्षाबलों ने अफगानिस्तान के सीमावर्ती इलाकों में आधी रात को अचानक चौतरफा हवाई हमले (Air Strikes) शुरू कर दिए। इस भीषण बमबारी में महिलाओं और बच्चों समेत कम से कम 35 बेकसूर लोगों की दर्दनाक मौत हो गई है, जबकि दर्जनों लोग गंभीर रूप से घायल बताए जा रहे हैं। स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, दोनों देशों के बीच बढ़ा यह सैन्य गतिरोध पिछले एक महीने के भीतर चौथा बड़ा हमला है, जिसने पूरे क्षेत्र को बारूद के ढेर पर ला खड़ा किया है।रात के अंधेरे में पाकिस्तानी लड़ाकू विमानों का कहर: आखिर क्यों हुआ यह हमला?प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, जब लोग अपने घरों में सो रहे थे, तभी पाकिस्तानी लड़ाकू विमानों ने अफगानिस्तान के खोस्त और कुनार प्रांतों के रिहायशी इलाकों को निशाना बनाकर मिसाइलें दागनी शुरू कर दीं। पाकिस्तान सरकार और सैन्य कमांडरों का दावा है कि यह हमला सीमा पार से सक्रिय प्रतिबंधित आतंकी संगठनों (TTP - तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान) के सुरक्षित ठिकानों को तबाह करने के लिए किया गया था। हालांकि, अफगान अधिकारियों और स्थानीय नागरिकों ने इस दावे को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा है कि मारे गए सभी लोग आम नागरिक थे, जिनका किसी भी उग्रवादी गुट से कोई लेना-देना नहीं था।काबुल और इस्लामाबाद में भारी तनाव: अफगान सीमा पर अलर्ट जारीइस भीषण खूनखराबे के बाद अफगानिस्तान की कार्यवाहक तालिबान सरकार ने कड़ा रुख अपना लिया है। काबुल से जारी एक आधिकारिक बयान में पाकिस्तान को इस कायरतापूर्ण हरकत के गंभीर परिणाम भुगतने की सीधी चेतावनी दी गई है। सीमावर्ती इलाकों जैसे डूरंड लाइन (Durand Line) के आसपास अफगान सेना की टुकड़ियों को भारी हथियारों के साथ हाई अलर्ट पर रख दिया गया है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों परमाणु और सैन्य ताकत संपन्न पड़ोसियों के बीच लगातार होते ये हमले किसी बड़े क्षेत्रीय युद्ध की चिंगारी बन सकते हैं, जिससे दक्षिण एशिया की सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाएगी।भारत और वैश्विक समुदाय की नजर: क्या संयुक्त राष्ट्र करेगा हस्तक्षेप?एक महीने के भीतर चौथे बड़े हमले ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिज्ञों को भी चिंता में डाल दिया है। भारत समेत दुनिया भर की खुफिया एजेंसियां और विदेश मंत्रालय इस नाजुक स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र (UN) और वैश्विक मानवाधिकार संगठनों से इस मामले में तुरंत दखल देने और दोनों देशों को बातचीत की मेज पर लाने की मांग की जा रही है। अगर यह सीमाई विवाद जल्द नहीं थमा, तो शरणार्थियों का एक नया संकट खड़ा हो सकता है, जिसका सीधा असर भारत और आसपास के पड़ोसी देशों की आंतरिक सुरक्षा और भौगोलिक स्थिरता पर पड़ना लाजिमी है।
मिडल ईस्ट (Middle East) से इस वक्त बेहद चौंकाने वाली और डराने वाली खबर सामने आ रही है। पूरी दुनिया को लग रहा था कि अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चल रहा विवाद अब एक शांति समझौते (MoU) के जरिए सुलझने की कगार पर है, लेकिन ऐन वक्त पर सिर्फ एक सिंगल लाइन ने पूरे खेल को पूरी तरह से बिगाड़ कर रख दिया है। इस शांति समझौते के मसौदे में शामिल 'आर्टिकल-5' (Article 5 of MoU) अब दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री व्यापारिक मार्ग— स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) में युद्ध की नई चिंगारी भड़काने की सबसे बड़ी वजह बन चुका है। इसके चलते अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था में एक बार फिर भारी हड़कंप मच गया है।क्या है समझौता ज्ञापन (MoU) का वो रहस्यमयी आर्टिकल-5?अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों और शीर्ष राजनयिकों के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम और आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने के लिए जो खुफिया बातचीत चल रही थी, उसकी बुनियाद इस 'आर्टिकल-5' पर आकर टिक गई थी। इस आर्टिकल में साफ तौर पर लिखा था कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय तेल टैंकरों और मालवाहक जहाजों की सुरक्षा की जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ ईरानी नौसेना की होगी, जबकि पश्चिमी देशों की सेनाओं को वहां से तुरंत हटना होगा। अमेरिका ने इस लाइन को अपने और अपने मित्र देशों के हितों के खिलाफ मानते हुए इस पर हस्ताक्षर करने से साफ मना कर दिया, जिसके बाद शांति की उम्मीदें पल भर में स्वाहा हो गईं।होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) क्यों बन गया है बारूद का ढेर?भौगोलिक और आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण लाइफलाइन है। दुनिया के कुल कच्चे तेल (Crude Oil) का लगभग 20 से 30 प्रतिशत हिस्सा इसी संकरे समुद्री रास्ते से होकर भारत, चीन, जापान और यूरोपीय देशों तक पहुंचता है। समझौते की यह लाइन लीक होते ही इस पूरे समुद्री इलाके में दोनों देशों की नौसेनाएं (US Navy and Iranian Navy) पूरी तरह से आमने-सामने आ गई हैं। ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य के पास अपनी मिसाइल डिफेंस प्रणालियों को तैनात करना शुरू कर दिया है, जिसके चलते इस पूरे क्षेत्र में युद्ध के बादल मंडराने लगे हैं।भारत और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इस कूटनीतिक विफलता का क्या होगा असर?इस एक लाइन की वजह से बिगड़ी बात का सीधा खामियाजा भारत समेत पूरी दुनिया को भुगतना पड़ सकता है। यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण जहाजों की आवाजाही थोड़ी देर के लिए भी प्रभावित होती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अचानक आसमान छू सकती हैं। भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा इसी रूट से आयात करता है, जिससे घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने और महंगाई अनियंत्रित होने का खतरा बढ़ गया है। दुनिया भर की खुफिया एजेंसियां अब इस बात पर नजर गड़ाए हुए हैं कि क्या अमेरिका और ईरान बातचीत की मेज पर वापस लौटेंगे या यह विवाद किसी बड़े युद्ध में तब्दील हो जाएगा।
ईरान पर भरोसा नहीं: अमेरिकी सीनेटर टिलिस का बड़ा बयान
अमेरिकी रिपब्लिकन सीनेटर थॉम टिलिस ने रविवार को कहा कि उन्हें इस बात पर संदेह है कि ईरान अमेरिका के साथ हुए युद्धविराम समझौते का पालन करेगा
हैती और सीरिया के नागरिकों का टीपीएस खत्म करने के ट्रंप के फैसले से रिपब्लिकन पार्टी में मतभेद
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा हैती और सीरिया के हजारों प्रवासियों का टेम्परेरी प्रोटेक्टेड स्टेटस (टीपीएस) समाप्त करने के फैसले को लेकर रिपब्लिकन पार्टी में मतभेद उभरकर सामने आए हैं
'पवित्र रक्त' और मां के अतीत का विरोधाभास उत्तर कोरिया की सत्ता 'माउंट पेक्टू रक्तसमूह' (Mount Paektu Bloodline) के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसे देश पर शासन करने के लिए सबसे शुद्ध और वीर माना जाता है। लेकिन किम जोंग उन की मां, को योंग-ही का इतिहास इस सरकारी दावे के बिल्कुल उलट है। रिपोर्ट्स के अनुसार, को योंग-ही का जन्म 1952 में जापान के ओसाका में हुआ था। उनका परिवार एक पुनर्वास कार्यक्रम के तहत उत्तर कोरिया आया था, लेकिन उस समय वहां के समाज में जापान से आए लोगों को हेय दृष्टि से देखा जाता था। यही कारण है कि किम जोंग उन की मां की सामाजिक पृष्ठभूमि को उनके 'पवित्र' परिवारिक इतिहास के लिए एक बड़ी बाधा माना जाता है, जिसे प्योंगयांग का प्रोपेगेंडा हमेशा छिपाने की कोशिश करता है।डांस, खूबसूरती और प्रेम कहानी का सफर को योंग-ही एक प्रतिभाशाली डांसर थीं और सरकारी आर्ट ट्रूप से जुड़ी हुई थीं। उनकी खूबसूरती और नृत्य ने तत्कालीन तानाशाह किम जोंग इल को अपनी ओर आकर्षित किया। उस समय किम जोंग इल पहले से ही विवाहित थे, लेकिन को योंग-ही के साथ उनके संबंधों ने एक नया मोड़ लिया। चूंकि उनकी शादी आधिकारिक नहीं थी, इसलिए को योंग-ही और उनके बच्चे राजधानी प्योंगयांग से दूर वोनसान शहर में रहने लगे। 2004 में स्तन कैंसर से उनकी मौत के बाद भी उत्तर कोरियाई मीडिया ने इसे कोई तवज्जो नहीं दी, क्योंकि उनका जापानी जन्म किम परिवार की 'शुद्धता' की छवि को कमजोर कर सकता था।सत्ता का खेल: कैसे बनीं किंगमेकर? किम जोंग उन के सत्ता तक पहुँचने के पीछे उनकी मां को योंग-ही का सबसे बड़ा हाथ माना जाता है। तानाशाह बनने की दौड़ में कई नाम थे—किम जोंग इल के बड़े बेटे किम जोंग नम, जो सुधारों की वकालत के कारण पिता का भरोसा खो चुके थे और बाद में जिनकी मलेशिया में हत्या कर दी गई; और दूसरे भाई किम जोंग चुल, जो कथित रूप से निजी जीवन में व्यस्त थे। विशेषज्ञ मानते हैं कि को योंग-ही ने ही पर्दे के पीछे से यह सुनिश्चित किया कि उनका बेटा किम जोंग उन ही अगला उत्तराधिकारी बने। अन्य दावेदारों के बाहर होने के बाद, मां की इस राजनीतिक बिसात ने किम जोंग उन को दुनिया के सबसे रहस्यमय और क्रूर तानाशाह की कुर्सी तक पहुँचा दिया। आज भी को योंग-ही का नाम उत्तर कोरिया की आधिकारिक गाथाओं में एक बड़ा 'ब्लैकआउट' है, क्योंकि उनका सच शासन की नींव पर उठने वाले सवालों को जन्म देता है।
पुतिन का बड़ा कबूलनामा: रूस के सामने खड़ी हैं बड़ी चुनौतियां यूक्रेन के साथ जारी युद्ध और पश्चिमी देशों के कड़े आर्थिक प्रतिबंधों के बीच रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि रूस फिलहाल एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है। सत्तारूढ़ 'यूनाइटेड रूस पार्टी' के सम्मेलन को संबोधित करते हुए पुतिन ने कहा कि इन कठिनाइयों ने देश को कमजोर नहीं, बल्कि पहले से कहीं अधिक मजबूत और अनुभवी बनाया है। उनका यह बयान तब आया है जब रूसी क्षेत्रों पर ड्रोन और मिसाइल हमलों में तेजी देखी जा रही है, जिससे बुनियादी ढांचों को काफी नुकसान पहुँचा है।हमलों का जवाब देने की दो-टूक तैयारी पुतिन ने देशवासियों को आश्वस्त करते हुए कहा कि सरकार वर्तमान में उत्पन्न हर समस्या से पूरी तरह वाकिफ है और उन्हें सुलझाने के लिए ठोस रणनीतियां अपनाई जा रही हैं। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि रूस अपनी सीमाओं की अखंडता और नागरिकों की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं करेगा। बुनियादी ढांचा सुविधाओं पर हो रहे हमलों का जिक्र करते हुए राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि रूस की सुरक्षा एजेंसियां और सशस्त्र बल हर तरह के खतरों से निपटने के लिए पूरी तरह मुस्तैद हैं। उन्होंने देश की संप्रभुता को अटूट बताते हुए कहा कि रूस किसी भी बाहरी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है।विकास और सुरक्षा का 'पुतिन फॉर्मूला' सितंबर में होने वाले संसदीय चुनावों से पहले पुतिन का यह संदेश पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए एक बड़ी लामबंदी का हिस्सा माना जा रहा है। अपने भाषण में उन्होंने न केवल सैन्य और रक्षा क्षमताओं पर ध्यान केंद्रित किया, बल्कि आर्थिक स्थिरता और सामाजिक सुरक्षा को भी प्राथमिकता दी। पुतिन ने जोर देकर कहा कि वैश्विक स्तर पर डाले जा रहे दबावों के बावजूद रूस अपनी स्वतंत्र नीतियों पर अडिग है और विकास के पथ पर आगे बढ़ रहा है। यह सम्मेलन स्पष्ट करता है कि आगामी चुनावों में पुतिन की पार्टी जनता के बीच 'विकास, सुरक्षा और स्थिरता' के तीन स्तंभों के साथ अपने वोट बैंक को और मजबूत करना चाहती है।
गैस के लिए ईरान की ओर ताक रहा पाकिस्तान: क्या अमेरिका से मिली छूट के बाद खत्म होगा ऊर्जा संकट
ऊर्जा संकट की मार: बेहाल है पाकिस्तान का पंजाब पाकिस्तान इन दिनों एक गंभीर ऊर्जा संकट के दौर से गुजर रहा है। अर्थशास्त्री महमूद रसूल के अनुसार, देश के अधिकांश हिस्सों, विशेषकर पंजाब प्रांत में गैस की भीषण कमी है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि उपभोक्ताओं को दिन भर में केवल कुछ घंटों के लिए ही गैस मिल पा रही है, जिससे घरेलू और औद्योगिक कामकाज पूरी तरह ठप पड़ गया है। आम जनता इस महंगाई और आपूर्ति की कमी से त्रस्त है, जिसके चलते सरकार पर दबाव बढ़ता जा रहा है।ईरान-अमेरिका शांति समझौता: पाकिस्तान के लिए नई उम्मीद पाकिस्तान की नजरें अब ईरान के साथ होने वाले संभावित ऊर्जा सौदों पर टिकी हैं। अमेरिका द्वारा ईरान पर लगे प्रतिबंधों में दी गई अस्थायी (60 दिन की) ढील ने पाकिस्तान को एक उम्मीद की किरण दिखाई है। चूँकि अमेरिका ने ईरान को विशिष्ट शर्तों के साथ तेल और गैस निर्यात की छूट दी है, इसलिए पाकिस्तान अब इस कूटनीतिक अवसर का फायदा उठाने की फिराक में है। पेट्रोलियम मंत्री अली परवेज मलिक ने स्पष्ट किया है कि खाड़ी क्षेत्र में शांति बहाल होने से वैश्विक स्तर पर पेट्रोलियम कीमतों में आई गिरावट का लाभ सीधे जनता तक पहुँचाने की कोशिश की जा रही है।कीमतों में राहत की उम्मीद और सरकार की चुनौती पिछले दिनों जब अमेरिका-ईरान के बीच संघर्ष चरम पर था, तब पाकिस्तान में पेट्रोल की कीमतें रिकॉर्ड 414 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई थीं। वर्तमान में यह 300 रुपये प्रति लीटर पर है, लेकिन जनता अभी भी और राहत की उम्मीद लगाए बैठी है। पेट्रोलियम मंत्री ने दावा किया है कि सरकार अंतरराष्ट्रीय समझौतों और नियमों के दायरे में रहकर ईरान से सस्ते तेल और गैस आयात के विकल्पों को तलाश रही है। हालांकि, यह छूट अस्थायी है और अमेरिका-ईरान वार्ताओं के भविष्य पर निर्भर करेगी। अब देखने वाली बात यह होगी कि शाहबाज शरीफ सरकार इस अल्पकालिक अवसर का लाभ उठाकर आम जनता को महंगाई से कितनी राहत दिला पाती है।
महरंग बलोच को उम्रकैद पर उठा विवाद, रिपोर्ट में पाकिस्तान की मानवाधिकार स्थिति पर सवाल
बलोच अधिकार कार्यकर्ता महरंग बलोच को सुनाई गई उम्रकैद की सजा पाकिस्तान सरकार और बलोच अधिकार आंदोलन के बीच बढ़ती दूरी को दर्शाती है
चल रहे फीफा वर्ल्ड कप के 18 दिन हो चुके हैं। 48 टीमों के 72 मैच में 215 गोल हो चुके हैं। ईनाम की रकम है 8 हजार करोड़ रुपए। पर ये फुटबॉल बला है क्या जो इंसानी हाथों से ज्यादा कदमों को तरजीह देता है। कब पैदा हुआ, क्यों पैदा हुआ, कायदे-कानून कैसे और किसने बनाए, साथ में कुछ खास किस्से। 4 चैप्टर और 14 ग्राफिक्स में यही बातें हैं… ----------- **** ग्राफिक्स: द्रगचंद्र भुर्जी, अंकलेश विश्वकर्मा और अंकुर बंसल ---------- यह खबर भी पढ़िए… क्या IPL का डाउनफॉल शुरू:टीवी दर्शक 26% घटे, विदेशी खिलाड़ी आधा सीजन ही खेल रहे; टॉप एक्सपर्ट्स ने बताईं वजहें और समाधान इस साल IPL के फर्स्ट हाफ में टीवी व्यूअरशिप 26% गिरी है। स्पॉन्सर 65 से 45 रह गए हैं। ईडन गार्डन जैसे स्टेडियम भी कुछ मैचों में आधे ही भर पाए। कई विदेशी खिलाड़ियों ने भी आधे सीजन बाद टीम को जॉइन किया। पूरी खबर पढ़िए…
कतर में बनी सहमति: अमेरिका-ईरान अब नहीं करेंगे हमले
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के पास हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े सैन्य तनाव के बाद अब दोनों देशों ने हमले रोकने पर सहमति जताई है
22 से 26 जून 2026 तक बांग्लादेशी पीएम तारिक रहमान चीन में थे। इसी दौरान बांग्लादेश ने अपने मोंगला पोर्ट का प्रोजेक्ट भारत से छीनकर चीन को दे दिया। यानी हमारे तट से महज 80 किमी दूर मोंगला पोर्ट पर चीन बैठेगा। भारत की ‘चिकन नेक’ से 100 किमी दूर तीस्ता नदी को भी चीन मैनेज करेगा। आखिर चीन इन इलाकों में क्या करने वाला है और ये भारत की सुरक्षा के लिए कितना बड़ा खतरा; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: बांग्लादेश ने भारत से मोंगला प्रोजेक्ट छीनकर चीन को क्यों दिया? जवाब: 2015 में बांग्लादेश ने भारत से दो इकॉनमिक जोन बनाने के लिए समझौता किया था। इनमें एक मोंगला पोर्ट और दूसरा चटगांव का इलाका था। बांग्लादेशी अखबार द बिजनेस स्टैंडर्ड के मुताबिक, मोंगला प्रोजेक्ट की शुरुआत में भारत के पैसे से मोंगला पोर्ट से खुलना के बीच एक नई रेलवे लाइन बनी। 2018 में भारत सरकार ने मोंगला प्रोजेक्ट का थका हीरानंदानी ग्रुप को दिया। मार्च 2022 में बांग्लादेश इकॉनोमिक जोन अथॉरिटी यानी BEZA और हीरानंदानी ग्रुप की कंपनी एविटा कंस्ट्रक्शंस प्राइवेट लिमिटेड के साथ समझौता किया। हालांकि अगस्त 2024 में बांग्लादेश में शेख हसीना का तख्तापलट होने के चलते ये प्रोजेक्ट रुक गया। शेख हसीना भारत आ गईं। शेख हसीना तब भारत आ गई थीं और बांग्लादेश के अंतरिम राष्ट्रपति बने मुहम्मद यूनुस के दौर में इस प्रोजेक्ट पर बात आगे नहीं बढ़ी। हसीना के बाद एंटी इंडियन मानी जाने वाली खालिदा जिया की पार्टी BNP सत्ता में आई और फरवरी 2026 में उनके बेटे तारिक रहमान पीएम बने। BEZA के मुताबिक, भारतीय कंपनी तय शर्त के मुताबिक दो साल के भीतर काम शुरू नहीं कर पाई। इसी बीच जून 2025 में बांग्लादेश में तैनात चीनी दूतावास के ऑफिसर्स ने मोंगला पोर्ट पर एक चीनी इकॉनमिक जोन बनाने का प्रस्ताव दिया था। इसके बाद अक्टूबर 2025 में बांग्लादेश सरकार ने भारत के साथ प्रोजेक्ट रद्द कर दिया। 25 जून 2026 को तारिक रहमान के चीन दौरे के बीच BEZA और चीन की सरकारी कंपनी चाइना सिविल इंजीनियरिंग कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन (CCECC) के बीच पोर्ट के डेवेलपमेंट के अलावा आसपास की 110 एकड़ जमीन पर इकनोमिक जोन बनाने का समझौता हुआ है। इसके अलावा 25 मार्च 2025 को मोंगला पोर्ट अथॉरिटी (MPA) और CCECC के बीच मोंगला पोर्ट के डेवेलपमेंट के लिए 370 मिलियन डॉलर के एक अलग प्रोजेक्ट पर भी समझौता हुआ था। हालांकि इस पर अब तक काम नहीं शुरू हुआ है। सवाल-2: अब चीन मोंगला पोर्ट पर क्या करने जा रहा है? जवाब: चीन मोंगला पोर्ट पर 2 काम करेगा... 1. पोर्ट का डेवेलपमेंट 2. पोर्ट के पास इकॉनोमिक जोन 26 जून को बांग्लादेश-चीन के जॉइंट स्टेटमेंट में 2 और प्रोजेक्ट चीन को देने की बात कही गई है। इसमें लिखा है कि दोनों देश चटगांव में चीन के इकॉनोमिक एंड इंडस्ट्रियल जोन को डेवेलपमेंट करेंगे। साथ ही चीन तीस्ता नदी के प्रबंधन में हर संभव मदद करेगा। सवाल-3: ये प्रोजेक्ट चीन को मिलना भारत के लिए चिंता की बात क्यों?जवाब: भारत के लिए 4 बड़ी दिक्कतें हैं... 1. चीन के मुकाबले में कूटनीतिक हार 2. बंगाल की खाड़ी में भारत के लिए नया खतरा 3. तीस्ता नदी प्रोजेक्ट से 'चिकन नेक' पर खतरा 4. भारत की बिजनेस कनेक्टिविटी को नुकसान सवाल-4: चीन के बढ़ते दबदबे से कैसे निपटेगा भारत?जवाब: हिंद महासागर को भारत का 'आंगन' कहा जाता है, लेकिन यहां चीन अपनी ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल’ कही जाने वाली स्ट्रैटजी के तहत बंदरगाह, हवाई पट्टी और नेवल बेस बना रहा है। चीनी कंपनियां हिंद महासागर में 17 बंदरगाहों में से 13 का डेवेलपमेंट कर रही हैं, जबकि बाकी प्रोजेक्ट्स में उनकी हिस्सेदारी हैं। हिंद महासागर में चीन की हरकतें भारत के लिए बड़ी चुनौती हैं। इसके जवाब में भारत भी उल्टा जाल बुन रहा है। भारत की स्ट्रैटजी का नाम है- ‘नेकलेस ऑफ डायमंड’। हालांकि ये भारत सरकार का कोई घोषित प्रोजेक्ट या डॉक्ट्रिन नहीं है। ‘नेकलेस ऑफ डायमंड’ के तहत 4 बड़े काम हो रहे हैं… ---- ये खबर भी पढ़ें… भास्कर एक्सप्लेनर- शेख हसीना भारत से कहां जाएंगी:बांग्लादेश की सत्ता अब कौन संभालेगा; 8 सवालों में आगे की कहानी पड़ोसी देश बांग्लादेश की कहानी हर गुजरते घंटे के साथ बदल रही है। करीब 2 महीने से चल रहे आरक्षण विरोधी आंदोलन हिंसक होने के बाद प्रधानमंत्री शेख हसीना को बांग्लादेश छोड़ना पड़ा है। वो सेना के हेलिकॉप्टर से पहले अगरतला पहुंचीं और वहां से C-130J मिलिट्री विमान से गाजियाबाद के हिंडन मिलिट्री एयरबेस पर लैंड हुईं। पूरी खबर पढ़ें…
फ्रांस में बड़ा विमान हादसा: पैराशूट प्रशिक्षण विमान क्रैश, 11 लोगों की दर्दनाक मौत
फ्रांस के उत्तर-पूर्वी शहर टॉम्बलेन में रविवार को एक नागरिक विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें सवार 11 लोगों की मौत हो गई। स्थानीय अधिकारियों ने इसकी पुष्टि की है। वहीं सऊदी अरब में भी एक हेलिकॉप्टर हादसे की खबर है। इसमें 14 लोगों की मौत हो गई है।
कौन हैं डॉ. महरंग बलोच और क्यों बनीं 'बलूचिस्तान की शेरनी'? बलूचिस्तान की आवाज बनकर उभरीं डॉ. महरंग बलोच को पाकिस्तान की एक आतंकवाद-रोधी अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई है। 33 वर्षीय महरंग का संघर्ष तब शुरू हुआ था, जब वे महज 16 साल की थीं और उनके पिता अब्दुल गफ्फार लैंगोव लापता हो गए थे। बाद में उनके पिता का शव बरामद हुआ, जो प्रताड़ना के गहरे निशान लिए हुए था। इस घटना ने एक साधारण डॉक्टर को बलूचिस्तान के सबसे बड़े मानवाधिकार आंदोलन का चेहरा बना दिया। उन्हें अब 'बलूचिस्तान की शेरनी' के नाम से जाना जाता है, जो जबरन गायब किए गए (Enforced Disappearances) हजारों लोगों के हक के लिए आवाज उठाती रही हैं।उम्रकैद के पीछे का विवाद: क्या है आरोप? अदालत ने महरंग और उनके सहयोगी सिबगतुल्लाह शाह को 2024 में ग्वादर में हुए एक विरोध प्रदर्शन के दौरान एक पैरामिलिट्री सैनिक की मौत के मामले में दोषी ठहराया है। उन पर आतंकवाद, देशद्रोह और हत्या जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। हालांकि, महरंग का परिवार और उनके समर्थक इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हैं। उनका कहना है कि यह बलूचिस्तान में असहमति की आवाज को दबाने और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित करने की एक सोची-समझी साजिश है। महरंग की कानूनी टीम ने घोषणा की है कि वे इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती देंगे।लापता लोगों का दर्द और पाकिस्तान का 'सौतेला' रुख बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा और प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध प्रांत है, लेकिन लंबे समय से उपेक्षा और हिंसा का दंश झेल रहा है। मानवाधिकार समूहों का आरोप है कि पिछले दो दशकों में हजारों बलूच लोग सुरक्षा बलों द्वारा बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के हिरासत में ले लिए गए। सरकार इन दावों को खारिज करती है और लापता लोगों को उग्रवादी गुटों से जोड़ने की कोशिश करती है। बलूच कार्यकर्ताओं का मानना है कि 'जबरन गायब करना' इस्लामाबाद की वह रणनीति है, जिसका उद्देश्य विद्रोह को कुचलना और स्वतंत्र बलूचिस्तान की मांग को कमजोर करना है।अदम्य साहस: धमकियों और पाबंदियों के बावजूद जारी संघर्ष महरंग बलोच का एक्टिविज्म केवल बयानों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने 2023 के अंत में सैकड़ों महिलाओं के साथ 1,600 किलोमीटर की लंबी पदयात्रा (Long March) का नेतृत्व किया ताकि लापता लोगों के ठिकाने का पता चल सके। जान से मारने की धमकियों और बार-बार गिरफ्तारी के बावजूद वे पीछे नहीं हटीं। मार्च 2025 में क्वेटा में विरोध प्रदर्शन के दौरान उनकी गिरफ्तारी हुई थी। अब उम्रकैद की यह सजा उनके दशकों पुराने संघर्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। महरंग का परिवार और मानवाधिकार संगठन इस मुकदमे को निष्पक्ष मानने से इनकार कर रहे हैं और इसे असहमति को कुचलने का माध्यम बता रहे हैं।
विनाशकारी भूकंप: मातम के बीच प्रशासनिक संवेदनहीनता वेनेजुएला इन दिनों 7.2 और 7.5 तीव्रता के विनाशकारी भूकंप के कारण भीषण त्रासदी झेल रहा है। ला गुआइरा राज्य इस आपदा का केंद्र बना हुआ है, जहां मलबे के नीचे दबे शवों की दुर्गंध ने पूरे इलाके को नरक बना दिया है। अब तक 1,430 मौतें और 3,200 घायलों की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 50,000 लोग अभी भी लापता हैं। लेकिन सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि जहां हजारों परिवार अपने प्रियजनों को खोकर बिलख रहे हैं, वहां राहत कार्य के लिए पहुंचे सरकारी कर्मचारी आपदा का 'लुत्फ' उठाते नजर आए। ध्वस्त इमारतों के सामने खड़े होकर अधिकारियों द्वारा ली जा रही सेल्फी ने पूरी दुनिया में वेनेजुएला सरकार के खिलाफ आक्रोश पैदा कर दिया है।राहत कार्यों में ढिलाई और 'पास' का नया ड्रामा संकट के इस दौर में सरकार की ओर से जो सहायता मिलनी चाहिए थी, उसके बजाय प्रशासन ने बाधाएं खड़ी कर दी हैं। सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में आम लोगों का प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया गया है। स्वयंसेवकों, जो अपने स्तर पर लोगों की जान बचाने के लिए मलबे हटा रहे थे, उन्हें भी 'सुरक्षित प्रवेश पास' लेने के लिए मजबूर किया गया है। स्थानीय लोगों का गुस्सा तब सातवें आसमान पर पहुंच गया जब उन्होंने अधिकारियों को मदद छोड़कर तस्वीरें खिंचवाने में व्यस्त देखा। पीड़ितों का कहना है कि प्रशासन न केवल मदद करने में विफल रहा, बल्कि बचाव कार्य में जुटने वालों के लिए भी मुश्किलें पैदा कर रहा है।सड़ती लाशें और अपनों की तलाश में जुड़ा हर हाथ भीषण गर्मी के कारण मलबे में दबे शवों के तेजी से सड़ने से स्वास्थ्य संबंधी खतरा भी बढ़ गया है। ला गुआइरा में हालात इतने भयावह हैं कि लोग मास्क पहनने को मजबूर हैं। दिल दहला देने वाली कहानियों के बीच, पीड़ितों का दर्द साफ झलकता है कि उन्होंने अपने परिजनों को खुद मलबे से बाहर निकाला है, जबकि सरकारी मदद नदारद रही। कैराबलेडा में अपनों को तलाश रही माइलेडी रोमेरो जैसी कई मांएं हैं जिनकी आंखों में आंसू और जुबां पर एक ही सवाल है—कल रात तक मलबे के नीचे से लोगों की चिल्लाने की आवाजें आ रही थीं, लेकिन प्रशासन ने बचाने की कोशिश तक नहीं की। आखिर वे किस बात का इंतजार कर रहे हैं? फिलहाल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 21 देशों की राहत टीमें जुटी हुई हैं, लेकिन स्थानीय प्रशासन की उदासीनता इस आपदा को और भी दर्दनाक बना रही है।
रिकॉर्ड तोड़ गर्मी से फ्रांस में हाहाकार पश्चिमी यूरोप इन दिनों भीषण गर्मी की चपेट में है, जिसका सबसे बुरा असर फ्रांस पर पड़ा है। पब्लिक हेल्थ फ्रांस के ताजा आंकड़ों के अनुसार, रिकॉर्ड तोड़ हीटवेव के कारण देश में लगभग 1,000 अतिरिक्त मौतें दर्ज की गई हैं। यह गर्मी न केवल इंसानी सहनशक्ति की परीक्षा ले रही है, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए भी बड़ी चुनौती बन गई है। एजेंसी ने स्पष्ट किया है कि ये आंकड़े अभी शुरुआती हैं और जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी, यह संख्या और अधिक बढ़ सकती है।बुजुर्गों और अकेले रहने वालों के लिए बनी काल इस हीटवेव की सबसे दुखद बात यह है कि इसका 85 प्रतिशत शिकार 65 वर्ष या उससे अधिक आयु के बुजुर्ग हुए हैं। सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, पेरिस और उसके आसपास के 'इले-डी-फ्रांस' (le-de-France) इलाके में घरों के अंदर मरने वालों की संख्या में चिंताजनक बढ़ोतरी देखी गई है। स्वास्थ्य अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि जो बुजुर्ग अकेले रहते हैं, वे गर्मी का मुकाबला करने में सबसे ज्यादा कमजोर साबित हो रहे हैं। यह स्थिति समाज में अकेलेपन की समस्या और हीटवेव के दौरान बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत को रेखांकित करती है।रेड अलर्ट और राहत की उम्मीद फ्रांस के कई इलाकों में पिछले कई दिनों से तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया था, जिसके चलते प्रशासन को 'रेड अलर्ट' जारी करना पड़ा। हालांकि, रविवार को तापमान में थोड़ी गिरावट दर्ज की गई है, जिससे आम जनता को भीषण गर्मी से हल्की राहत मिली है। सरकार ने नागरिकों से अपील की है कि वे अकेले रहने वाले पड़ोसियों, विशेषकर बुजुर्गों का ध्यान रखें और हीटवेव के दौरान सावधानी बरतें। फिलहाल फ्रांस का स्वास्थ्य विभाग प्रभावित इलाकों में स्थिति पर कड़ी नजर रखे हुए है ताकि मौतों के इन बढ़ते आंकड़ों को नियंत्रित किया जा सके।
अमेरिका ने छत्तीसगढ़ की कंपनी और उसके CEO पर लगाया प्रतिबंध, जानें क्या है मामला
अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि इन संस्थाओं और व्यक्तियों ने सूडानी सशस्त्र बलों (SAF) और रैपिड सपोर्ट फोर्सेज (RSF) को हथियार, विस्फोटक सामग्री और अन्य सहायता उपलब्ध कराई, जिससे देश में जारी संघर्ष और अधिक गंभीर हो गया।
ईरान का पलटवार: कुवैत और बहरीन पर मिसाइल-ड्रोन हमला
इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) की नौसेना और एयरोस्पेस फोर्स ने अमेरिका के हमलों के जवाब में कुवैत और बहरीन में मिसाइल और ड्रोन ऑपरेशन शुरू किए
होर्मुज़ जलडमरूमध्य में धमाका: अमेरिका ने ईरान के 10 सैन्य ठिकाने उड़ाए
अमेरिका की सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम ) ने कहा कि अमेरिका की सेना ने शनिवार रात होर्मुज़ जलडमरूमध्य और उसके आस-पास ईरान के 10 सैन्य ठिकानों पर हमला किया
ट्रंप का संभावित भारत दौरा: रिश्ते सुधारने का सुनहरा मौका!
अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो के इस बयान के बाद कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अगले साल की शुरुआत में भारत आ सकते हैं
ख्वाजा आसिफ के 'असली कश्मीरी नहीं' वाले बयान पर बवाल, मानवाधिकार परिषद ने जताई नाराजगी
पाकिस्तान के मानवाधिकार परिषद (एचआरसी) ने पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के उस बयान की कड़ी आलोचना की
भास्कर सीरीज ‘स्पाई फाइल्स’ में आप पढ़ रहे हैं जासूस सहमत की कहानी। पार्ट-1 में आपने पढ़ा कि कश्मीर के कपड़ा कारोबारी हिदायत खान भारत की खुफिया एजेंसी RAW के जासूस थे। पाकिस्तानी सेना के अफसरों में उनकी गहरी पैठ थी। उन्हें कैंसर हो गया। मौत से पहले उन्होंने RAW के कहने पर बेटी सहमत की शादी पाकिस्तानी सेना के कैप्टन इकबाल से करवा दी। सहमत के ससुर सईद पाक सेना में ब्रिगेडियर और जेठ महबूब मेजर थे। सहमत ने परिवार का इतना दिल जीत लिया कि ब्रिगेडियर सईद सेना के मामलों में भी उसकी सलाह लेने लगे। सहमत ने चालाकी से ब्रिगेडियर के बॉस लेफ्टिनेंट जनरल अमीर खान को भी अपने प्रभाव में ले लिया। इस तरह RAW को पाक सेना की गोपनीय खबरें मिलने लगीं। पार्ट-2 में आगे की कहानी… सहमत को पाकिस्तान में रहते हुए दो साल बीत गए थे। अभी तक कोई बड़ी जानकारी उसके हाथ नहीं लगी थी। वो समझ गई कि उसे कुछ बड़ा करना होगा। एक रोज उसने ससुर सईद से बताया कि वो स्कूल में संगीत सिखाना चाहती है। सईद नाराज हो गए। उन्होंने कहा- ‘हमारे घर की औरतें नौकरी नहीं करतीं। तुम्हें किसी चीज की कमी है क्या?’ सहमत धीरे से बोली- ‘किसी चीज की कमी नहीं है, पर खाली वक्त नहीं कटता। घर में बैठे-बैठे परेशान हो गई हूं।’ तभी इकबाल वहां आ गया। उसने कहा- 'सहमत ठीक कह रही है अब्बू। संगीत में इसकी दिलचस्पी है। स्कूल के बहाने इसका मन भी लगने लगेगा।' कुछ देर सोचने के बाद ब्रिगेडियर ने कहा- ‘जैसा तुम लोगों को ठीक लगे करो, पर खानदान का नाम खराब नहीं होना चाहिए।’ सहमत ने मुस्कुराते हुए कहा- 'जी अब्बू।' कुछ दिनों बाद सहमत ने एक स्कूल में संगीत सिखाना शुरू कर दिया। यह कोई आम स्कूल नहीं था, यहां पाकिस्तान के रईसों और सेना के आला अफसरों के बच्चे पढ़ते थे। जल्द ही सहमत की खोजी नजरों ने अपना शिकार ढूंढ निकाला- ‘अनवर खान।’ अनवर, पाकिस्तानी सेना के ताकतवर अफसर, लेफ्टिनेंट जनरल इम्तियाज खान का पोता था। संगीत में उसकी दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन सहमत ने उसे म्यूजिक क्लास का ग्रुप लीडर बना दिया। खास तौर पर ट्रेनिंग की व्यवस्था की। हर दिन अलग से उसे घंटों रियाज कराती। धीरे-धीरे संगीत में अनवर की दिलचस्पी बढ़ने लगी। कुछ महीने बाद स्कूल का एनुअल फंक्शन होना तय हुआ। सहमत ने लेफ्टिनेंट जनरल इम्तियाज खान और उनकी बेगम को इनवाइट किया। दोनों शामिल भी हुए। अनवर की परफॉर्मेंस देखकर ऑडिटोरियम की अगली कतार में बैठे लेफ्टिनेंट जनरल इम्तियाज और उनकी बेगम बेहद खुश हुए। पोते की परफॉर्मेंस के पीछे उन्हें एक ही चेहरा नजर आ रहा था- लेडी टीचर सहमत। इस शाम ने सहमत के लिए जनरल इम्तियाज के आलीशान बंगले के दरवाजे खोल दिए। धीरे-धीरे वह जनरल के परिवार की इतनी करीबी बन गई कि उनका उठना-बैठना और पारिवारिक मशविरे सहमत के बिना अधूरे होने लगे। इसका फायदा सहमत के पाकिस्तानी परिवार को भी मिला। ब्रिगेडियर सईद पाकिस्तान की ताकतवर खुफिया एजेंसी ISI के डिप्टी चीफ बन गए। यानी अब सहमत, ससुर के बहाने ISI की देहरी तक पहुंच चुकी थी। सहमत की बायोग्राफी लिखने वाले पूर्व नेवी अफसर हरिंदर सिक्का बताते हैं- ‘एक शाम हवेली के स्टडी रूम में सन्नाटा पसरा था। सहमत, ब्रिगेडियर की फाइलें पलट रही थी। अचानक उसके माथे पर पसीने की बूंदें तैरने लगीं। एक पन्ने पर लिखा था- पाकिस्तानी पनडुब्बियां बंगाल की खाड़ी की तरफ कूच करने वाली हैं। INS विक्रांत को तबाह करना है। भारत के सबसे बड़े युद्धपोत INS विक्रांत की तस्वीरें वहां चस्पा थीं, जिसमें उसके क्रू मेंबर्स की तादाद से लेकर हथियारों की तैनाती तक का पूरा ब्योरा था। इत्तेफाक से उस वक्त सहमत की जेठानी मुनीरा मायके गई हुई थी। शौहर कैप्टन इकबाल और जेठ मेजर महबूब अपने कामों में मशरूफ थे। सहमत ने उस फाइल को कपड़ों में छुपाया और दबे पांव अपने वॉशरूम में चली गई।' अचानक... 'थाप! थाप! थाप!' वॉशरूम का दरवाजा जोर-जोर से बजा। बाहर नौकर अब्दुल खड़ा था, जो बुरी तरह किवाड़ पीट रहा था। सहमत घबरा गई। कुछ सेकेंड तक उसने अपनी सांसें रोकीं, खुद को संभाला और फिर रोबीली आवाज में चिल्लाई, ‘बाहर इंतजार करो अब्दुल, मैं आ ही रही हूं!’ अब्दुल बाहर चला गया। अब सहमत ने वॉशरूम में लगे खुफिया ट्रांसमीटर से RAW को मैसेज भेजा। फिर दबे पांव अपने कमरे में पहुंची। खुद को संभाला और चुपचाप स्टडी रूम जाकर अनगिनत फाइलों में उस सीक्रेट कागज को वापस रखा और बाहर निकल गई। गलियारे में ससुर ब्रिगेडियर सईद बदहवास से खड़े थे। ‘तुम कहां थी सहमत? मैं कब से एक फाइल ढूंढ रहा हूं…’ ‘अब्बू जान, परेशान मत होइए। आप कमरे में चलकर आराम कीजिए, मैं अभी ढूंढकर लाती हूं।’ सहमत जानती थी कि ब्रिगेडियर का ब्लड प्रेशर किस फाइल के लिए बढ़ा हुआ था। चंद मिनटों बाद, सहमत वही फाइल हाथ में लिए ब्रिगेडियर के सामने खड़ी थी। सईद ने बिना कुछ कहे फाइल ली और तेज कदमों से दफ्तर की तरफ चल पड़ा। ब्रिगेडियर के जाते ही सहमत अपने कमरे में लौटी। वॉशरूम का दरवाजा खुला हुआ था। मैसेज भेजने वाली खुफिया मशीन उखाड़ दी गई थी। ‘अब्दुल सब देख चुका है!’ मन में बुदबुदाते हुए सहमत उल्टे पैर बाहर की तरफ भागी। उसने देखा कि रसोई के पिछले रास्ते से एक जानी-पहचानी परछाई हवेली के गेट की तरफ जा रही थी। वह अब्दुल ही था। हवेली के दरवाजे पर सेना का राशन सप्लाई ट्रक खड़ा था, जिसका ड्राइवर कहीं आसपास गया हुआ था। सहमत बिजली की फुर्ती से ड्राइविंग सीट पर बैठी, चाबी घुमाई और एक्सीलेटर पर पैर रख दिया। कुछ ही दूरी पर उसे अब्दुल भागता हुआ मिल गया। वह ब्रिगेडियर सईद के दफ्तर की तरफ जा रहा था। सेना का ट्रक आता देख अब्दुल ने दोनों हाथ हवा में लहराए- ‘रोको! रोको!’ सहमत ने ब्रेक की जगह एक्सीलेटर को पूरी ताकत से दबा दिया। पलक झपकते ही... ट्रक के भारी-भरकम टायर अब्दुल को रौंदते हुए आगे निकल गए। सड़क किनारे ट्रक को छोड़ सहमत नीचे उतरी। एक घर के बाहर तार पर टंगे बुर्के को उसने झपटकर पहना और लगभग दौड़ती हुई हवेली पहुंची। सबसे पहले वॉशरूम का रूख किया। वहां मौजूद हर सबूत को मिटाया। उधर, लहूलुहान अब्दुल को किसी ने अस्पताल पहुंचा दिया था। खबर मिलते ही सहमत का जेठ, मेजर महबूब भी अस्पताल पहुंच गया। अब्दुल, महबूब को देखकर कुछ बोलना चाह रहा था, लेकिन हलक से सिर्फ घड़घड़ाहट की आवाज निकल रही थी। उसने भारी मशक्कत के साथ कंबल के नीचे से अपना हाथ बाहर निकाला और मेजर की हथेली पर मेटल के दो टुकड़े रख दिए। महबूब ने अब्दुल का चेहरा थामकर चीखते हुए पूछा, ‘बताओ अब्दुल! क्या हुआ है? किसने किया यह?’ उसने बस इतना ही कहा- ‘हहहह... मत... मत…’ और उसकी आंखें हमेशा के लिए बंद हो गईं। रात को मेजर महबूब घर लौटा, तो उसके चेहरे पर गहरा तनाव था। उसने परिवार को अब्दुल की मौत की खबर दी और जेब से मेटल के वे दो टुकड़े निकालकर मेज पर रख दिए। दूर कोने में खड़ी सहमत का दिल तेजी से धड़क रहा था। वह समझ चुकी थी कि महबूब शातिर फौजी अफसर है। वह इन दो टुकड़ों के पीछे छिपे राज को ढूंढने के लिए जमीन-आसमान एक कर देगा। सहमत को अब बहुत जल्द, कुछ और बड़ा करना था। एक रोज सहमत ने बुर्का पहना और कार में बैठकर नजदीक की एक मस्जिद के लिए निकल पड़ी। मस्जिद के बाहर चिलचिलाती धूप के बीच एक फटेहाल महिला छाते बेच रही थी। सहमत को देखते ही वह मिन्नतें करने लगी, ‘मेम साहब, खुदा के लिए एक छतरी खरीद लो। बच्चे सुबह से भूखे हैं, कुछ पैसे आ जाएंगे तो उनके निवाले का इंतजाम हो जाएगा।’ ड्राइवर चिढ़ गया, लेकिन सहमत ने सौ के दो नोट पर्स से निकाले और छाता ले लिया। घर लौटकर सहमत ने कमरे का दरवाजा बंद किया। छतरी के हैंडल को आहिस्ता से घुमाया। हैंडल से कांच की एक छोटी शीशी बाहर निकली। उस पर हाथ से लिखी एक पर्ची चिपकी थी- ‘इसके पीछे लगे बटन को दबाकर आप एक खास केमिकल की कुछ बूंदें सीधे इंसान के जिस्म में उतार सकती हैं। शिकार को दर्द का एहसास भी नहीं होगा और कुछ ही घंटों के भीतर वह दम तोड़ देगा।’ कुछ देर बाद सहमत ने उस छतरी को अपने पर्स में छिपाया और बाजार जाने का बहाना बनाकर पाकिस्तान सेना के 'ब्यूरो ऑफ इंस्पेक्शन' की तरफ निकल पड़ी। इसी दफ्तर में उसका जेठ महबूब काम करता था। वहां पहुंचने के बाद वो पहली मंजिल के एक कोने में खड़ी हो गई। करीब 20 मिनट तक इंतजार किया। नीचे एक फौजी गाड़ी आकर रुकी। गहरे हरे रंग की वर्दी पहने एक अफसर कार से निकला। सहमत ने पहचान लिया- ‘वो मेजर महबूब है।’ वो तेजी से सीढ़ियां चढ़ता हुआ ऊपर आ रहा था। तभी सहमत लड़खड़ाकर गिर पड़ी। ‘ओह! संभालिए…’ महबूब उसे बचाने के लिए तेजी से आगे बढ़ा। दोनों एक पल के लिए टकराए और उसी पल बुर्के के भीतर से सहमत ने छतरी का बटन दबा दिया। छतरी की नोक से वो केमिकल महबूब के शरीर में चला गया। सहमत संभलकर खड़ी हुई, उसने शुक्रिया कहा और आगे बढ़ गई। उसने पलटकर देखा कि मेजर सीढ़ियां चढ़ते हुए हल्के-हल्के अपनी बांह सहला रहा था। सहमत मन ही मन मुस्कुराई- ‘काम हो गया।’ कुछ ही घंटों बाद, ब्यूरो ऑफ इंस्पेक्शन के दफ्तर में तहलका मच गया। मेजर महबूब अपनी छाती थामकर फर्श पर गिर पड़ा था। उसे आनन-फानन में मिलिट्री अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने पूरी कोशिश की पर महबूब को बचा नहीं पाए। मौत की वजह हार्ट अटैक बताई गई। सहमत के घर में मातम पसर गया। हर कोई बिलख रहा था, लेकिन महबूब की बेवा मुनीरा की आंखों में एक गहरा शक तैर रहा था। पहले वफादार नौकर अब्दुल का कत्ल, उसका मरते-मरते महबूब के हाथ में मेटल के टुकड़े सौंपना और फिर महबूब का इस तरह अचानक दुनिया से चले जाना... मुनीरा समझ चुकी थी कि इन दोनों मौतों के पीछे कोई तो कड़ी है। इधर, ब्रिगेडियर की जिंदगी दो पाटों के बीच पिस रही थी। एक तरफ परिवार में हुई दो मौतों का मातम था, तो दूसरी तरफ जंग की तैयारियां। इसी आपाधापी के बीच, उन्हें प्रधानमंत्री से एक जरूरी मुलाकात करनी थी, जिसके लिए 'टॉप सीक्रेट' फाइलें तैयार की गई थीं। हमेशा की तरह, सहमत ने ब्रिगेडियर का ब्रीफकेस तैयार किया और मौका पाकर फाइलों के पन्ने भी याद कर ली। उन पन्नों में जंग की रणनीतियों के साथ-साथ दिल्ली में बैठे ISI के एजेंटों की फेहरिस्त थी। सहमत को यह पैगाम हर हाल में सरहद पार पहुंचाना था। सख्त पहरे के बीच बाहर निकलने के लिए सहमत ने जेठानी मुनीरा को अपने साथ मस्जिद चलने के लिए राजी कर लिया। जैसे ही दोनों मस्जिद पहुंचीं, सहमत बोल पड़ी, ‘आप यहीं मेरा इंतजार कीजिए, मैं मेजर साहब की मजार के लिए कुछ ताजे फूल लेकर आती हूं।’ सहमत ने एक बड़ी टोकरी फूलों का ऑर्डर दिया और नजरें बचाकर पास ही के एक फोन बूथ की तरफ भागी। फोन खराब था। आसपास कोई दूसरा बूथ नजर नहीं आ रहा था। अब उसकी नजर पान की दुकान पर पड़ी। सहमत ने पान वाले के फोन का इस्तेमाल किया और हांफती हुई आवाज में पूरा खुफिया मैसेज बता दिया। जब सहमत घर लौटी, तो हवेली के बाहर फौज की गाड़ियां खड़ी थीं। अंदर दो ISI के अफसर खड़े थे। कमरे की मेज पर खून से सने मेटल के वे टुकड़े रखे थे, जिन्हें देखकर सहमत के भीतर सिहरन दौड़ गई। ISI ने उस फूलवाले और पान वाले को धर-दबोचा था। अगले कई दिनों तक हवेली में ISI के अफसरों का आना-जाना लगा रहा। एक दोपहर, तंग आकर सहमत ने कड़े लहजे में अफसरों से कह दिया, ‘सईद साहब इस वक्त आराम कर रहे हैं। आप लोग या तो यहीं इंतजार कीजिए, या फिर बाद में तशरीफ लाइए।’ अफसरों ने एक-दूसरे को देखा और सहमत के हाथ में एक सीलबंद लिफाफा थमाते हुए कहा, ‘ठीक है बेगम साहिबा, यह फाइल ब्रिगेडियर साहब को दे दीजिएगा।’ जैसे ही अफसर बाहर गए, सहमत ने उस लिफाफे को खोला। लिखा था- ‘हवेली की सुरक्षा में बहुत बड़ी सेंध लगी है। हिंदुस्तान को खुफिया खबरें भेजी जा रही हैं। गद्दार घर के भीतर ही है।’ अपनी घबराहट छुपाने के लिए सहमत वॉशरूम चली गई। थोड़ी देर बाद जैसे ही उसने दरवाजा खोला सामने खड़े शख्स को देखकर वह ठिठक गई। उसका शौहर, कैप्टन इकबाल खड़ा था। उसने सहमत को घूरते हुए कहा, ‘क्या मैं तुम्हारे वॉशरूम का इस्तेमाल कर सकता हूं?’ सहमत समझ गई कि इकबाल को उस खुफिया ट्रांसमीटर का अंदाजा हो चुका है। उसने बस सिर हिलाया और एक तरफ हट गई। इकबाल अंदर दाखिल हुआ। सहमत ने मेज पर रखे इकबाल के बटुए को जल्दी से उठाकर देखा। करारे नोटों के बीच एक छोटा सा कागज रखा था। सहमत ने उसे पढ़ा और वापस रख दिया। 5 मिनट बाद इकबाल ने दरवाजा खोला, तो देखा सहमत एक चमचमाती हुई रिवॉल्वर लेकर खड़ी थी। उंगली ट्रिगर पर कसी हुई थी और निशाने पर इकबाल। सहमत ने सख्त लहजे में कहा- ‘इकबाल, मैं इस चौखट पर तुम्हारी सेज सजाने और तुम्हारी बीवी बनकर जिंदगी गुजारने नहीं आई हूं। मैं अपने मुल्क हिंदुस्तान के लिए आई हूं। कान खोलकर सुन लो, मेरे इस रास्ते में जो भी रोड़ा बनेगा, उसे कुचल दूंगी… फिर चाहे वो शख्स तुम ही क्यों न हो।’ इकबाल ने वॉशरूम में जो कुछ देखा और सहमत के मुंह से उसके कानों ने जो कुछ सुना…वह किसी सदमे से कम नहीं था। उसके दिल में अभी भी सहमत थी। उसने सहमत की तरफ बेबसी से देखते हुए कहा- ‘ये सब छोड़ दो, पकड़ी जाओगी। ISI वाले मुनीरा को पूछताछ के लिए ले गए हैं और अब्बा हुजूर को भी हेडक्वार्टर ना छोड़ने को कहा गया है।’ सहमत मुस्कुराती रही…हंसते हुए इकबाल से बोली- ‘मियां बहुत भोले हो आप… जो लड़की अपना मुल्क छोड़कर यहां तक आई है, उसे डराकर आप रोक लोगे? बेहतर होगा मैं जैसा कह रही हूं करो, इसी में आपका और परिवार का भला है। मुझे आपके खानदान से कोई दुश्मनी नहीं है।’ उसने पास पड़ी एक कुर्सी पर इकबाल को बैठाया और रस्सी से बांध दिया। काफी देर इकबाल छटपटाता रहा। फिर सहमत ने उसकी हथकड़ी खोली और धमकाते हुए कहा- ‘तुम हर पल मेरे निशाने पर हो। जरा भी चालाकी की, तो समझो तुम्हारे साथ तुम्हारा खानदान भी खत्म।’ अगले दिन छावनी के मेन गेट पर फौज के झंडे वाली एक चमचमाती कार आकर रुकी। गार्ड जैसे ही तलाशी और पहचान पत्र के लिए आगे बढ़ा, कार की पिछली खिड़की का शीशा सरसराता हुआ नीचे उतरा। अंदर से कड़क आवाज गूंजी- ‘मैं जीओसी बशीर हूं, जनरल सईद की हवेली के लिए कौन सा रास्ता जाता है?’ घबराए गार्ड ने बिना कोई सवाल किए हवेली की तरफ इशारा कर दिया- ‘जनाब, सीधे हाथ पर।’ गाड़ी आगे बढ़ गई। हवेली के बैठकखाने में कुछ देर इंतजार करने के बाद, जनरल बशीर के भेष में आए उस शख्स का सामना मेजर इकबाल से हुआ। जनरल ने कहा, ‘मेजर, तुम्हारी बेगम साहिबा इस शहर के सबसे बेहतरीन और ऊंचे रसूख वाले स्कूल में संगीत सिखाती हैं, उनकी बड़ी तारीफ सुनी है। मैंने सोचा क्यों न उनसे मिल लिया जाए।’ इकबाल ने कुछ नहीं कहा। उसी वक्त सहमत हॉल में दाखिल हुई। उसने अपने काले पर्स में एक लोडेड रिवॉल्वर छुपा रखी थी। औपचारिक बातचीत के बीच, जनरल ने जेब से मुड़ा हुआ कागज निकाला और सहमत की तरफ बढ़ाते हुए कहा, ‘बेगम साहिबा, इस खत में आपके परिवार के लिए ताजीयत (शोक संदेश) है।’ सहमत ने खत खोला। ऊपर सांत्वना के शब्द थे, लेकिन लाइनों के बीच छुपा असली संदेश था- 'ठीक तीन घंटे बाद, पुरानी वादियों के पास।' सहमत ने खत वापस जनरल को सौंपा और खुदाहाफिज कहकर अंदर चली गई। जनरल ने भी मेजर इकबाल से विदा लिया। उसी रोज रात करीब 8 बजे। स्थानीय पठानी लिबास में RAW का वो अफसर रावलपिंडी के एक मशहूर रेस्तरां के कोने वाली मेज पर बैठा चाय की चुस्कियां ले रहा था। तय वक्त पर, रेस्तरां के बाहर बुर्के में लिपटी एक औरत दाखिल हुई। उसके पीछे बेहद डरा और सहमा हुआ मेजर इकबाल चल रहा था। इसी बीच RAW अधिकारी को भनक लग गई कि बाहर गाड़ियों के पीछे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI के शार्पशूटर मुस्तैद हैं। उनकी उंगलियां ट्रिगर पर थीं और सीधा निशाना बुर्के वाली औरत और इकबाल पर। RAW अधिकारी के माथे पर पसीना छलक आया। 'सहमत पकड़ी जा चुकी है! अगर ISI ने उसे जिंदा दबोच लिया, तो टॉर्चर सेल में वह टूट सकती है। भारत का पूरा नेटवर्क, दर्जनों स्लीपर सेल और सालों की मेहनत तबाह हो जाएगी।' यहीं सोचते हुए उसने भारी मन से अपना दाहिना हाथ जैकेट की अंदरूनी जेब में डाला और एक छोटे से इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमीटर का बटन तीन बार दबाया। 'सूंss...!' सन्नाटे को चीरता हुआ एक जहरीला तीर बुर्के वाली औरत की गर्दन में जा धंसा। वह वहीं फर्श पर ढह गई। पाकिस्तानी एजेंट कुछ समझ पाते, रेस्तरां के पिछले हिस्से में एक जोरदार धमाका हुआ। चारों तरफ चीख-पुकार मच गई। भगदड़ का फायदा उठाकर RAW अधिकारी और उसके साथी वहां से फरार हो गए। वे शहर से दूर एक सुरक्षित और बंद कमरे में पहुंचे। सब खामोश थे। RAW अधिकारी अपनी हथेलियों में सिर छुपाए बैठा था। उसकी आत्मा कचोट रही थी-’भारत लौटकर वह सहमत की बूढ़ी मां को क्या जवाब देगा? कैसे कहेगा कि उसने देश को बचाने के लिए अपनी ही सबसे बेहतरीन एजेंट की जान ले ली?’ 'ट्रीन-ट्रीन...' अचानक सन्नाटे को चीरती हुई दरवाजे की घंटी बजी। कमरे में मौजूद एजेंटों के बदन में बिजली दौड़ गई। अधिकारी ने अपनी रिवॉल्वर का सेफ्टी कैच हटाते हुए बेहद सख्त लहजे में हुक्म दिया, कोई भी जिंदा हाथ नहीं आएगा। जितने दुश्मनों को मार सकते हो मारो, या खुद को गोली मार लो।’ घंटी दोबारा बजी। अधिकारी दरवाजे की तरफ बढ़ा और 'पीप-होल' से बाहर झांका। अब उसकी उंगलियां ढीली पड़ गईं और भारी पिस्तौल फर्श पर जा गिरी। उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। उसने कांपते हाथों से दरवाजे की कुंडी खोली। बाहर सहमत जिंदा सलामत खड़ी थी। कमरे में मौजूद हर शख्स मानो काठ का हो गया। किसी को अपनी आंखों पर यकीन नहीं हो रहा था। अधिकारी ने हैरान होकर पूछा- ‘जिंदा कैसे बच निकली?’ सहमत के चेहरे पर एक मुस्कान उभर आई। ‘रेस्तरां में इकबाल के साथ मैं नहीं थी। मैंने मुनीरा को अपनी जगह बुर्का पहनाकर इकबाल के साथ भेज दिया था।’ सहमत का मिशन अब मुकम्मल हो चुका था। RAW की टीम सहमत को गोपनीय तरीके से सरहद पार कराकर वापस भारत ले आई। अपनी सरजमीं पर कदम रखते ही सहमत को महसूस हुआ कि वह सिर्फ यादें लेकर नहीं लौटी है। मेडिकल चेकअप में पता चला कि उसके पेट में मेजर इकबाल का बच्चा पल रहा है। कुछ महीने बाद सहमत ने एक बेटे को जन्म दिया। आगे चलकर उस बच्चे ने इंडियन आर्मी की वर्दी पहनी और देश की हिफाजत की कसम खाई। सहमत के बेटे ने ही अपनी मां की कहानी लेखक हरिंदर सिंह सिक्का को बताई थी। हरिंदर सिक्का का दावा है कि वे सहमत से मिले हैं और कई बार पाकिस्तान भी गए हैं। 8 साल की रिसर्च के बाद उन्होंने ‘सहमत कॉलिंग’ किताब लिखी है।
कराची में धमाका: सिंध रेंजर्स के तीन जवान शहीद
पाकिस्तान के कराची शहर में एक बड़े धमाके के बाद दहशत मच गई। रिपोर्ट के अनुसार, यह आतंकी हमला बताया जा रहा है
बांग्लादेश ने पलटा पासा, मोंगला पोर्ट चीन को सौंपा, कोलकाता और हल्दिया पर मंडराया बड़ा खतरा!
पड़ोसी देश बांग्लादेश से एक ऐसी बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है, जिसने भारतीय सुरक्षा एजेंसियों और रणनीतिक विशेषज्ञों की नींद उड़ा दी है। भू-राजनीतिक मोर्चे पर भारत को एक बड़ा झटका देते हुए बांग्लादेश ने अपने रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण 'मोंगला पोर्ट' (Mongla Port) के एक बड़े हिस्से का मैनेजमेंट और टर्मिनल ऑपरेशन भारत के बजाय चीन को सौंप दिया है। इस कदम के बाद भारत के पूर्वी समुद्री तट, विशेष रूप से पश्चिम बंगाल के कोलकाता और हल्दिया बंदरगाहों की सुरक्षा को लेकर बेहद गंभीर और चिंताजनक सवाल खड़े हो गए हैं। चीन की भारतीय उपमहाद्वीप में बढ़ती यह मौजूदगी भारत के लिए एक नए चक्रव्यूह जैसी साबित हो सकती है।भारत के हाथ से कैसे निकला मोंगला पोर्ट का नियंत्रणलंबे समय से भारत यह उम्मीद कर रहा था कि मोंगला बंदरगाह के विकास और संचालन की जिम्मेदारी उसे मिलेगी, क्योंकि भारत और बांग्लादेश के बीच कनेक्टिविटी को मजबूत करने के लिए यह पोर्ट बेहद जरूरी था। भारतीय कंपनियां इस रेस में आगे मानी जा रही थीं। लेकिन हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों और बीजिंग के भारी-भरकम आर्थिक प्रभाव के चलते बांग्लादेश ने यह प्रोजेक्ट चीन की कम्युनिस्ट सरकार के नियंत्रण वाली कंपनी को सौंप दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन ने अपनी पुरानी 'डेट-ट्रैप डिप्लोमेसी' (कर्ज के जाल की नीति) और भारी निवेश का लालच देकर बांग्लादेश को अपनी तरफ झुका लिया है, जिसके परिणाम अब सतह पर दिखने लगे हैं।कोलकाता और हल्दिया पोर्ट के लिए क्यों बढ़ गया है बड़ा खतरामोंगला पोर्ट की भौगोलिक स्थिति को देखें तो यह भारत के पश्चिम बंगाल में स्थित कोलकाता पोर्ट और हल्दिया डॉक कॉम्प्लेक्स के बेहद करीब है। चीन को इस पोर्ट का नियंत्रण मिलने का सीधा मतलब है कि अब चीनी ड्रैगन की सीधी पहुंच भारतीय समुद्री सीमा और सुंदरबन के संवेदनशील इलाकों के बिल्कुल मुहाने तक हो गई है। सुरक्षा विश्लेषकों के मुताबिक, इस पोर्ट की आड़ में चीन अब भारतीय नौसेना (Indian Navy) की गतिविधियों, कोलकाता-हल्दिया पोर्ट के व्यापारिक रूट और बंगाल की खाड़ी में भारत के मिसाइल टेस्टिंग जोन पर बेहद आसानी से नजर रख सकेगा। यह स्थिति भारत की संप्रभुता और समुद्री सुरक्षा के लिए एक परमानेंट सिरदर्द बन सकती है।'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' नीति के तहत भारत को घेरने की चीनी चालचीन पिछले कई सालों से भारत को चारों तरफ से समुद्र में घेरने की 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' (String of Pearls) रणनीति पर काम कर रहा है। पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट, श्रीलंका के हम्बनटोटा पोर्ट और म्यांमार के क्याुकफ्यू पोर्ट के बाद अब बांग्लादेश का मोंगला पोर्ट भी इसी कड़ी का हिस्सा बनता दिख रहा है। हालांकि, बांग्लादेश इसे महज एक व्यापारिक समझौता बता रहा है, लेकिन इतिहास गवाह है कि चीन जहां भी कमर्शियल पोर्ट बनाता है, वहां धीरे-धीरे उसकी नौसेना और युद्धपोत डेरा डाल लेते हैं। नई दिल्ली के गलियारों में अब इस बात को लेकर गहन मंथन शुरू हो गया है कि कैसे चीन के इस नए आक्रामक कदम का मुकाबला किया जाए और अपनी पूर्वी समुद्री सीमा को सुरक्षित रखा जाए।
शोएब अख्तर के बड़े भाई के जनाजे में शामिल हुआ लश्कर आतंकी सैफुल्लाह कसूरी, भारत को दे चुका है धमकी
इस्लामाबाद में पाकिस्तान के पूर्व तेज गेंदबाज शोएब अख्तर के बड़े भाई शाहिद अख्तर के जनाजे पर विवाद खड़ा हो गया है। अंतिम संस्कार में पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के उपप्रमुख सैफुल्लाह कसूरी समेत संगठन के कई वरिष्ठ सदस्यों की मौजूदगी सामने आने के बाद यह मामला चर्चा में आ गया है।
एम्स्टर्डम/इंटरनेशनल डेस्क: यूरोपीय देश नीदरलैंड में एक बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक मामला सामने आया है। वहां पहली बार 12 साल से कम उम्र के एक लाइलाज और गंभीर बीमारी से पीड़ित बच्चे को कानूनी तौर पर इच्छामृत्यु (Euthanasia) दी गई है। साल 2024 में देश के इच्छामृत्यु कानून में किए गए बड़े बदलाव के बाद यह अपनी तरह का पहला मामला है। नए नियमों के तहत अब 1 से 12 साल की उम्र के उन बच्चों को भी इच्छामृत्यु देने का प्रावधान है, जो किसी ऐसी लाइलाज बीमारी से जूझ रहे हों जहां दर्द असहनीय हो चुका हो और मेडिकल साइंस में उनके ठीक होने की कोई उम्मीद न बची हो।संसद में हुआ खुलासा, सरकारी वकील करेंगे पूरे मामले की कानूनी जांचनीदरलैंड की स्वास्थ्य मंत्री सोफी हरमंस ने संसद में सरकार की सालाना रिपोर्ट पेश करते हुए इस बात की आधिकारिक पुष्टि की। उन्होंने बताया कि इस बच्चे ने इच्छामृत्यु के जरिए दुनिया को अलविदा कह दिया है। हालांकि, गोपनीयता और संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए सरकार ने बच्चे की सही उम्र, पहचान, लिंग या उसकी बीमारी के बारे में कोई भी जानकारी सार्वजनिक नहीं की है। स्वास्थ्य मंत्री ने यह भी साफ किया कि देश के नियमों के मुताबिक अब इस पूरे मामले की स्क्रूटनी (जांच) सरकारी वकीलों द्वारा की जाएगी। वे यह सुनिश्चित करेंगे कि प्रक्रिया को अंजाम देने वाले डॉक्टर ने कानून में लिखी सभी सख्त गाइडलाइंस का पूरी तरह पालन किया है या नहीं।सिर्फ 'जीने का मन न होना' आधार नहीं, 2024 में इसी शर्त पर बदला था कानूननीदरलैंड सरकार ने साल 2024 में अपने दशकों पुराने कानून में संशोधन किया था, जिसके बाद 1 से 12 साल तक के मासूम बच्चों को भी कुछ बेहद विशेष और गंभीर परिस्थितियों में इच्छामृत्यु का अधिकार मिल गया। हालांकि, सरकार ने अपने नियमों में पूरी कड़ाई रखी है। कानून के मुताबिक, इच्छामृत्यु केवल और केवल बेहद गंभीर व अंतिम चरण की मेडिकल कंडीशन (Medical Condition) के आधार पर ही दी जा सकती है। कोई व्यक्ति या किशोर सिर्फ यह महसूस करके कि 'उसका जीवन पूरा हो चुका है' या 'अब उसका जीने का मन नहीं है', इस कानून के तहत अनुमति नहीं पा सकता।डॉक्टरों के लिए तय हैं बेहद कड़े नियम; माता-पिता की सहमति अनिवार्यनीदरलैंड में किसी भी मरीज को इच्छामृत्यु देने से पहले मेडिकल टीम और डॉक्टरों को एक बेहद लंबी और जटिल कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है:डॉक्टरों को अकाट्य रूप से प्रमाणित करना होता है कि मरीज का शारीरिक या मानसिक दर्द पूरी तरह असहनीय है।यह साबित होना जरूरी है कि बीमारी लाइलाज है और भविष्य में सुधार की जीरो संभावना है।मरीज और उसके परिवार को बीमारी के हर पहलू की पूरी तकनीकी जानकारी दी जा चुकी हो।यह पूरी तरह स्पष्ट हो कि दर्द से राहत देने वाला कोई भी दूसरा इलाज या थेरेपी अब बची नहीं है।इसके अलावा, मुख्य डॉक्टर को किसी दूसरे स्वतंत्र मेडिकल एक्सपर्ट (Independent Doctor) की लिखित राय लेनी होती है।12 साल से कम उम्र के बच्चों के मामलों में उनके माता-पिता या कानूनी अभिभावकों (Parents or Guardians) की लिखित सहमति होना सबसे अनिवार्य शर्त है। जब यह कानून पास हुआ था, तब सरकार ने अनुमान लगाया था कि देश में हर साल ऐसे केवल 5 से 10 मामले ही सामने आ सकते हैं।पहले क्या थे नियम और उल्लंघन पर कितनी है सजा?नीदरलैंड में साल 2024 से पहले तक केवल 1 साल से कम उम्र के गंभीर रूप से बीमार शिशुओं और 12 साल से अधिक उम्र के किशोरों/वयस्कों के लिए ही इच्छामृत्यु की कानूनी अनुमति थी। 1 से 12 साल के बीच की उम्र के बच्चों के लिए ऐसा कोई अधिकार नहीं था; उन्हें केवल दर्द कम करने वाली 'पैलिएटिव केयर' दी जाती थी या प्राकृतिक मौत का इंतजार करना पड़ता था।वर्तमान नियमों के अनुसार, 12 से 15 साल के बच्चों के लिए इच्छामृत्यु में माता-पिता की मंजूरी जरूरी होती है। वहीं, 16 और 17 साल के किशोर इस पर खुद स्वतंत्र फैसला ले सकते हैं, हालांकि प्रक्रिया में उनके पैरेंट्स को शामिल करना जरूरी होता है। यदि कोई भी डॉक्टर इन कड़े नियमों के बाहर जाकर या बिना उचित मंजूरी के किसी को इच्छामृत्यु देता है, तो देश के कानून के तहत उसे 12 साल तक की जेल और भारी जुर्माने की सजा हो सकती है।यूथेनेशिया को वैध बनाने वाला दुनिया का सबसे पहला देश है नीदरलैंडवैश्विक स्तर पर देखा जाए तो नीदरलैंड साल 2002 में इच्छामृत्यु (Euthanasia) को कानूनी मान्यता देने वाला दुनिया का सबसे पहला देश बना था। यहां होने वाले हर एक केस की समीक्षा एक विशेष मेडिकल जांच समिति करती है। नीदरलैंड के बाद पड़ोसी देश बेल्जियम ने भी साल 2014 में एक बड़ा कदम उठाते हुए बिना किसी उम्र सीमा के, सभी उम्र के बच्चों के लिए इच्छामृत्यु को कानूनी मंजूरी दे दी थी। इस संवेदनशील मुद्दे पर दुनिया भर के चिकित्सा और कानूनी विशेषज्ञों के बीच आज भी एक बड़ी बहस जारी है।
मुजफ्फराबाद/इंटरनेशनल डेस्क: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में भड़की विद्रोह की आग अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुकी है। पाकिस्तानी हुकूमत के जुल्म और सौतेले व्यवहार के खिलाफ PoK की आवाम ने अब आर-पार की जंग छेड़ दी है। हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि आंदोलन को कुचलने और स्थानीय लोगों की आवाज दबाने के लिए इस्लामाबाद सरकार ने कई इलाकों में खाद्यान्न (राशन), डीजल-पेट्रोल और अन्य बेहद जरूरी चीजों की सप्लाई रोक दी है। प्रदर्शनकारियों का गंभीर आरोप है कि शहबाज शरीफ सरकार इस कड़कड़ाती किल्लत के जरिए आम नागरिकों पर मानसिक और शारीरिक दबाव बना रही है ताकि आंदोलन को अंदर से कमजोर किया जा सके।सड़कों पर उतरे हजारों लोग; सस्ती बिजली और सब्सिडी की मांगPoK के इतिहास में यह अब तक का सबसे बड़ा जन-आंदोलन बनता जा रहा है, जहां हजारों की संख्या में महिलाएं, युवा और बुजुर्ग सड़कों पर डेरा डाले हुए हैं। प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांगों में भारत की तर्ज पर सस्ती बिजली देना, आटे-दाल जैसे बुनियादी खाद्यान्न पर सरकारी सब्सिडी बहाल करना, अस्पतालों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, बुनियादी राजनीतिक अधिकार और भ्रष्ट प्रशासनिक ढांचे में बड़े सुधार शामिल हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि उनकी जायज मांगों को सुनने और उनका हक देने के बजाय पाकिस्तान सरकार ने पूरे क्षेत्र को सेना और अर्धसैनिक बलों के हवाले कर दिया है। कई इलाकों में इंटरनेट सेवाओं को पूरी तरह ब्लॉक कर दिया गया है ताकि PoK में हो रहे जुल्म की तस्वीरें दुनिया के सामने न आ सकें।सरकारी कर्मचारियों पर गिरी गाज, रिटायर्ड फौजियों को पेंशन रोकने की धमकीआंदोलन को दबाने के लिए पाकिस्तानी प्रशासन अब बेहद क्रूर और दमनकारी नीतियों पर उतर आया है। विरोध प्रदर्शनों का समर्थन करने और उनमें शामिल होने के आरोप में अब तक 128 सरकारी कर्मचारियों को नौकरी से बर्खास्त (टर्मिनेट) किया जा चुका है। यही नहीं, आंदोलन के शीर्ष नेताओं ने खुलासा किया है कि PoK के रहने वाले जिन पूर्व सैनिकों (रिटायर्ड फौजियों) ने इस प्रदर्शन में हिस्सा लिया या जनता का साथ दिया, उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनियां दी जा रही हैं। प्रशासन द्वारा उनके परिवारों की पेंशन तक रोकने की धमकी दी जा रही है, जिससे लोगों में गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया है।हिंसक झड़पों में दर्जनों मौतें, जेलों में ठूंसे जा रहे कश्मीरी एक्टिविस्टपाकिस्तानी सुरक्षा बलों और पुलिस की बर्बरता के कारण पूरे क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हिंसा भड़क उठी है। हिंसक कार्रवाई और अंधाधुंध गोलीबारी के दौरान अब तक दर्जनों स्थानीय लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि सैकड़ों लोग गंभीर रूप से घायल हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, प्रदर्शन के अगुआकारों और समर्थकों को जबरन हिरासत में लेकर जेलों में ठूंसा जा रहा है और उन पर देशद्रोह जैसी गंभीर धाराओं में मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं। दूसरी तरफ, पाकिस्तानी प्रशासन अपनी सफाई में दावा कर रहा है कि वे सिर्फ उन लोगों के खिलाफ एक्शन ले रहे हैं जो 'गैर-कानूनी' गतिविधियों और तोड़फोड़ में शामिल हैं।ठप पड़ा कारोबार, भुखमरी की कगार पर PoK की जनतासरकार द्वारा जानबूझकर पैदा की गई आवश्यक वस्तुओं की इस भारी किल्लत ने स्थानीय समुदायों का जीना मुहाल कर दिया है। PoK के प्रमुख बाजारों में व्यापार पूरी तरह ठप हो चुका है, गाड़ियों और एम्बुलेंस के लिए ईंधन खत्म हो रहा है, और सबसे बड़ी मार दैनिक मजदूरी करने वाले गरीब परिवारों पर पड़ी है जिनके सामने अब दो वक्त की रोटी का संकट खड़ा हो गया है। इस अमानवीय नाकाबंदी के बावजूद PoK की जनता पीछे हटने को तैयार नहीं है। प्रदर्शनकारियों ने साफ कर दिया है कि जब तक पाकिस्तान सरकार घुटने नहीं टेकती और उनकी मांगें पूरी नहीं करती, तब तक यह आंदोलन और तेज होता जाएगा।
गुवाहाटी/नेशनल डेस्क: राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने भारत के खिलाफ साजिश रचने वाले प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन जमात-उल-मुजाहिद्दीन बांग्लादेश (JMB) के मॉड्यूल पर एक और बड़ा प्रहार किया है। एनआईए ने गुवाहाटी की विशेष अदालत में जेएमबी से जुड़े 11 कथित आतंकवादियों के खिलाफ एक व्यापक चार्जशीट (आरोप पत्र) दाखिल की है। इन सभी आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS 2023) और यूए(पी) एक्ट 1967 (UAPA) की विभिन्न गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।'इमाम महमूदर कफीला' विंग के जरिए रची जा रही थी खूनी साजिशएनआईए की जांच में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि इन सभी 11 आरोपियों ने जमात-उल-मुजाहिद्दीन की एक सीक्रेट विंग 'इमाम महमूदर कफीला' (IMK) में सक्रिय भूमिका निभाई थी। ये आरोपी देश के भीतर गुप्त बैठकें आयोजित करने, युवाओं को मजहबी तौर पर गुमराह करने (रेडिकलाइज करने), चरमपंथी साहित्य बांटने और सोशल मीडिया व डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए भारत-विरोधी जहरीला प्रचार फैलाने में जुटे थे। जांच एजेंसी के मुताबिक, इनका मुख्य मकसद पूर्वोत्तर के राज्यों (असम, त्रिपुरा आदि) में अशांति फैलाना और उत्तर प्रदेश, बिहार व झारखंड जैसे घनी आबादी वाले राज्यों में बड़े आतंकी हमलों को अंजाम देना था।लोकतंत्र को खत्म कर शरिया शासन लाना है जेएमबी का मकसदजमात-उल-मुजाहिद्दीन बांग्लादेश (JMB) एक बेहद कट्टरपंथी संगठन है, जो पूरी तरह से सलाफी विचारधारा से प्रभावित है। इसका मुख्य उद्देश्य बांग्लादेश और उसके आसपास के क्षेत्रों में लोकतांत्रिक तथा धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था को जड़ से उखाड़कर शरीयत आधारित इस्लामी शासन स्थापित करना है। इसकी स्थापना कुख्यात आतंकियों शेख अब्दुर रहमान और सिद्दीकुल इस्लाम ने की थी। आतंकी गलियारों में सिद्दीकुल इस्लाम को 'बांग्ला भाई' के नाम से भी जाना जाता था। जेएमबी ने अपनी स्थापना के बाद से ही गैर-सरकारी संगठनों और आम नागरिकों को निशाना बनाना शुरू कर दिया था, जिसके चलते फरवरी 2005 में बांग्लादेश सरकार ने इस पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया था।आधे घंटे में 500 बम धमाके: जब दहल उठा था पूरा बांग्लादेशप्रतिबंध के ठीक छह महीने बाद, इस संगठन ने जो किया उसने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया। 17 अगस्त 2005 को जेएमबी ने एक अन्य कट्टरपंथी संगठन 'हरकत-उल-जिहाद अल-इस्लामी' की मदद से बांग्लादेश के 64 में से 63 जिलों में एक साथ सिलसिलेवार बम धमाके किए। महज 30 मिनट के भीतर पूरे देश में 500 से अधिक बम फोड़े गए थे। इन धमाकों का मुख्य मकसद देश के जजों, वकीलों और न्यायिक प्रणाली को खत्म कर वहां जबरन शरिया कानून लागू करना था। बाद में साल 2006 में सिद्दीकुल इस्लाम उर्फ बांग्ला भाई को पुलिस ने धरदबोचा और कानूनी प्रक्रिया के बाद 2007 में उसे फांसी पर लटका दिया गया।सिद्दीकुल इस्लाम ने 2005 में की थी भारत में एंट्री, बंगाल से फैला जालबांग्लादेश में तबाही मचाने के दौरान ही जेएमबी ने भारत में पैर पसारने शुरू कर दिए थे। साल 2005 में सिद्दीकुल इस्लाम ने भारत में प्रवेश किया और 'हाटकाटा नसीरुल्लाह' (एक खूंखार आईईडी बम विशेषज्ञ) के साथ मिलकर पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में जेएमबी की पहली भारतीय यूनिट (65वीं यूनिट) खड़ी की। इसके बाद यह नेटवर्क नदिया, बीरभूम और बर्दवान जैसे सीमावर्ती जिलों में तेजी से फैल गया।इस भारतीय नेटवर्क का सबसे बड़ा पर्दाफाश साल 2014 में हुआ, जब पश्चिम बंगाल के बर्दवान (खगरागढ़) में एक घर के भीतर अचानक बम बनाते समय धमाका हो गया, जिसमें दो आतंकवादियों की मौत हो गई थी। एनआईए की जांच से साफ हुआ कि जेएमबी ने बंगाल के रास्ते असम, बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश तक अपने स्लीपर सेल और मॉड्यूल का एक बड़ा जाल बिछा लिया था।आईएसआईएस (ISIS) से जुड़ाव और ढाका कैफे अटैक का 'नियो-जेएमबी' कनेक्शनअंतरराष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों की रिपोर्ट्स के मुताबिक, जेएमबी का संबंध लश्कर-ए-तैयबा, अल-कायदा और सिमी (SIMI) जैसे वैश्विक आतंकी संगठनों से रहा है। हाल के वर्षों में इस संगठन के भीतर एक नया धड़ा पैदा हुआ, जिसे 'नियो-जेएमबी' (Neo-JMB) कहा जाता है। यह धड़ा कुख्यात वैश्विक आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (ISIS) की विचारधारा पर चलता है। यह गुट 'लोन-वोल्फ' हमलों (अकेले दम पर हमला करना) और आत्मघाती हमलों के लिए कुख्यात है। साल 2016 में बांग्लादेश के ढाका में स्थित 'होली आर्टिसन कैफे' पर जो भीषण आतंकी हमला हुआ था, जिसमें कई विदेशी नागरिकों की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी, उसे इसी नियो-जेएमबी गुट ने अंजाम दिया था।डकैती, तस्करी और हवाला: जानिए कहां से आता है टेरर फंड?एनआईए की जांच के अनुसार, जेएमबी भारत और बांग्लादेश में अपनी आतंकी गतिविधियों को चलाने के लिए मुख्य रूप से अवैध रास्तों से फंडिंग जुटाता है। इसके फंड के प्रमुख स्रोतों में शामिल हैं:सीमावर्ती इलाकों में डकैती, लूटपाट और जबरन उगाही।भारत-बांग्लादेश सीमा पर हथियारों, नशीले पदार्थों और मवेशियों की तस्करी।जाली भारतीय मुद्रा (फेक करेंसी) का धंधा।खाड़ी देशों और विदेशों में बैठे समर्थकों के जरिए हवाला नेटवर्क से मिलने वाली गुप्त वित्तीय मदद।भारत में पूरी तरह प्रतिबंधित है जेएमबी, सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट पर2014 के बर्दवान ब्लास्ट और 2018 में बिहार के बोधगया में हुए बम धमाकों में जेएमबी का सीधा हाथ सामने आने के बाद, भारत सरकार ने 23 मई 2019 को यूएपीए (UAPA) के तहत जमात-उल-मुजाहिद्दीन बांग्लादेश और इसके सभी स्वरूपों (नियो-जेएमबी सहित) को पूरी तरह से बैन और आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया था। वर्तमान में एनआईए, उत्तर प्रदेश एटीएस (ATS), और विभिन्न राज्यों की एसटीएफ (STF) इसके बचे-खुचे स्लीपर सेल्स, ऑनलाइन हैंडलर्स और फंडिंग नेटवर्क को नेस्तनाबूद करने के लिए लगातार धरपकड़ अभियान चला रही हैं। गुवाहाटी कोर्ट में दाखिल यह नई चार्जशीट इसी कड़े प्रहार का हिस्सा है।
ट्रंप ने दोहराया ईरानी सेना के कमजोर होने का दावा, कहा- अब कोई ईरान का लीडर बनना नहीं चाहता
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फेथ एंड फ्रीडम कोएलिशन' के 'रोड टू मेजॉरिटी' कॉन्फ्रेंस में ईरानी सेना के कमजोर होने के अपने दावे को फिर को दोहराया।
भारत आ सकते हैं डोनाल्ड ट्रंप व्यापार, रक्षा और AI सहयोग पर हो सकती है बड़ी बातचीत
मीडिया से बातचीत के दौरान अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने कहा कि ट्रम्प प्रशासन अगले वर्ष की शुरुआत में राष्ट्रपति ट्रम्प के भारत दौरे की तैयारियों पर काम कर रहा है।
क्या मेहरंग बलोच की सजा, बलोचिस्तान में अहिंसक आंदोलनों के प्रति भरोसा खत्म कर देगी?
डॉक्टर से एक्टिविस्ट बनीं मेहरंग बलोच को पाकिस्तान की अदालत ने आजीवन कैद की सजा दी है. क्या यह सजा, अहिंसक आंदोलनों पर भरोसा खत्म कर देगी
इजरायल-लेबनान शांति की दिशा में अहम पहल, वाशिंगटन में फ्रेमवर्क समझौते पर हस्ताक्षर
कई दिनों तक चली बातचीत के बाद यह फ्रेमवर्क तैयार किया गया। वाशिंगटन स्थित अमेरिकी विदेश मंत्रालय में आयोजित कार्यक्रम में अमेरिका में लेबनान की राजदूत नाडा हमादेह मोवाद और उनके इजरायली समकक्ष येचियल लिटर ने अमेरिकी प्रतिनिधियों की मौजूदगी में इस त्रिपक्षीय दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए।
पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में शांति स्थापित करने की तमाम वैश्विक कोशिशों और हाल ही में हुए सीजफायर समझौते को एक बहुत बड़ा और जानलेवा झटका लगा है। वाशिंगटन और तेहरान के बीच युद्ध को पूरी तरह खत्म करने के लिए अभी बातचीत का दौर चल ही रहा था कि अमेरिकी फाइटर जेट्स ने ईरान के कई अहम सैन्य ठिकानों पर भीषण बमबारी (Airstrike) कर पूरे क्षेत्र को दहला दिया।इस अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के बाद ईरान आगबबूला हो उठा है। ईरानी संसद के राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग के प्रमुख इब्राहिम अजीजी ने शनिवार को अमेरिका को बेहद सख्त और सीधे लहजे में चेतावनी दी है कि इस दुस्साहस के बाद वाशिंगटन को सिर्फ 'पीछे हटना और पछताना' पड़ेगा। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर तीखा हमला बोलते हुए साफ कहा कि अब अमेरिका का यह 'ब्लेम गेम' यानी खुद हमला करके दूसरों पर दोष मढ़ने का खेल बिल्कुल नहीं चलेगा। आइए जानते हैं कि शांति समझौते के बीच अचानक भड़के इस महाविवाद की असल वजह क्या है।क्यों भड़का विवाद? जानिए अमेरिकी सेना के ताबड़तोड़ हवाई हमलों की वजहयह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के लड़ाकू विमानों ने शुक्रवार को ईरान के भीतर मौजूद मिसाइल और ड्रोन स्टोरेज लोकेशन्स के साथ-साथ उनकी तटीय रडार साइटों पर ताबड़तोड़ मिसाइलें बरसा दीं। व्हाइट हाउस और अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने इस कार्रवाई को पूरी तरह जायज ठहराते हुए साफ किया कि यह हमला ईरान द्वारा अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग में एक कमर्शियल जहाज पर किए गए कायरतापूर्ण हमले का सीधा और कड़ा जवाब है।अमेरिकी सेना द्वारा जारी आधिकारिक टाइमलाइन के मुताबिक, बीते 25 जून को ईरान ने ओमान के तट के पास जलडमरूमध्य से गुजर रहे सिंगापुर के झंडे वाले एक विशाल मालवाहक जहाज 'एम/वी एवर लवली' (M/V Ever Lovely) पर वन-वे सुसाइड अटैक ड्रोन से हमला किया था। यह हमला रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य के पास हुआ था, जो पूरी दुनिया के कुल ऊर्जा और कच्चे तेल के व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा (20%) संभालता है। अमेरिका ने इसी अंतरराष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा के उल्लंघन को आधार बनाकर ईरान के खिलाफ यह बड़ा सैन्य एक्शन लिया है।ईरान का पलटवार: 'अमेरिका ने बातचीत के बीच में पीठ पर छुरा घोंपा'अमेरिकी बमबारी से भड़के ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के पूर्व शीर्ष कमांडर और वर्तमान सांसद इब्राहिम अजीजी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर अमेरिका को आड़े हाथों लेते हुए एक लंबी पोस्ट लिखी। अजीजी ने कहा, 'सफेदपोश अमेरिका ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उसकी कथनी और करनी में कितना फर्क है। उसने शांति वार्ता के बीच में ही हमारे देश पर हमला करके पीठ पर छुरा घोंपा है। नाकाम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया को दिखा दिया है कि वे किसी भी अंतरराष्ट्रीय कानून, बातचीत या सीजफायर के सिद्धांतों को नहीं मानते हैं।'अजीजी ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि सीजफायर का यह लापरवाह उल्लंघन अमेरिका के लिए आत्मघाती साबित होगा। ईरानी सांसद के इस तीखे बयान के ठीक कुछ घंटों बाद IRGC के मुख्यालय से भी एक बड़ा और डराने वाला ऐलान कर दिया गया। ईरानी सेना ने कहा कि उसने देश के दक्षिणी हिस्से पर हुए अमेरिकी हमलों के प्रतिशोध में पूरे मिडिल ईस्ट क्षेत्र में फैले अमेरिकी सैन्य ठिकानों और उनके दूतावासों को सीधे अपने मिसाइल निशाने पर लेना शुरू कर दिया है।'हिंसा का जवाब सिर्फ हिंसा' - अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस की दोटूकईरानी धमकियों के बीच अमेरिका ने भी झुकने से साफ इनकार कर दिया है। अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस (JD Vance) ने ईरान को आड़े हाथों लेते हुए 'X' पर दोटूक शब्दों में चेतावनी दी। वेंस ने लिखा, 'ईरान ने खुद टेबल पर बैठकर सीजफायर समझौते पर दस्तखत किए थे और हमारी सेना ने उस समझौते का पूरा सम्मान किया। अगर ईरानी प्रशासन को एमओयू (MOU) के नियमों या उसे लागू करने के तरीके को लेकर कोई भी आपत्ति या असहमति थी, तो वे राजनयिक चैनलों के जरिए बात कर सकते थे। लेकिन उन्होंने हथियारों का रास्ता चुना, और याद रहे कि हमारे देश के खिलाफ की गई हिंसा का जवाब हमेशा दोगुनी हिंसा से ही दिया जाएगा।' इसके साथ ही वेंस ने ईरान से आखिरी अपील करते हुए कहा कि वे आगे की तबाही को रोकने के लिए तुरंत हिंसा रोककर बातचीत की मेज पर आएं।नाजुक मोड़ पर शांति वार्ता: क्या तीसरे विश्व युद्ध की ओर बढ़ रही दुनिया?यह पूरा सैन्य टकराव एक ऐसे नाजुक और ऐतिहासिक मोड़ पर हुआ है जब दोनों देशों के बीच दशकों पुराने तनाव को खत्म करने के लिए पर्दे के पीछे से बड़ी डिप्लोमैटिक बातचीत चल रही थी। पिछले हफ्ते ही दोनों पक्षों के बीच एक अस्थाई सीजफायर का औपचारिक ऐलान हुआ था, जिसके तहत एक व्यापक फ्रेमवर्क को अंतिम रूप देने के लिए दोनों देशों को 60 दिनों का समय दिया गया था। लेकिन इन ताजा हवाई हमलों और पलटवार के बाद दुनिया भर के शेयर बाजारों और कच्चे तेल की कीमतों में भारी उथल-पुथल शुरू हो गई है। शांति की सभी उम्मीदों को गहरा झटका लगा है और मिडिल ईस्ट एक बार फिर भयंकर क्षेत्रीय युद्ध (Regional War) की आग में झुलसने की कगार पर आ खड़ा हुआ है।
वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने बताया कि भारत-यूके फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) का पूरा फायदा कारोबारियों तक पहुंचाने के लिए पूरे देश में 1,000 सलाहकार नियुक्त किए जाएंगे
वैश्विक महाशक्ति अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए ऐतिहासिक युद्धविराम (सीजफायर) पर एक बार फिर से युद्ध और संकट के काले बादल मंडराने लगे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने ईरान पर दुनिया के सबसे संवेदनशील और व्यस्त समुद्री व्यापारिक मार्ग 'स्ट्रैट ऑफ होर्मुज' (होर्मुज जलडमरूमध्य) से गुजर रहे कारोबारी जहाजों पर घातक आत्मघाती ड्रोन से हमला करने का बेहद गंभीर आरोप लगाया है।अमेरिकी राष्ट्रपति ने आज आधिकारिक तौर पर जानकारी दी कि ईरान ने दोनों देशों के बीच हुए समझौते की धज्जियां उड़ाते हुए सीजफायर तोड़ दिया है। ट्रंप के मुताबिक, ईरानी सेना ने होर्मुज से गुजर रहे एक बड़े मालवाहक जहाज पर ड्रोन से हमला किया, जिसके बाद जवाबी कार्रवाई में अमेरिकी सेना ने भी तगड़ा पलटवार किया और ईरान के तीन घातक ड्रोनों को हवा में ही नेस्तनाबूद कर दिया। राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान की इस सैन्य कार्रवाई को एक बेहद 'मूर्खतापूर्ण कृत्य' करार दिया है।डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा दावा: ट्रुथ सोशल पर दी हमले की पूरी जानकारीअमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस पूरी अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम की जानकारी अपने आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' (Truth Social) पर एक पोस्ट के जरिए साझा की। ट्रंप ने दावा किया कि ईरान ने इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील समुद्री मार्ग से गुजर रहे अंतरराष्ट्रीय जहाजों को निशाना बनाने के लिए कम से कम चार सुसाइड (आत्मघाती) ड्रोन भेजे थे, जो दोनों देशों के बीच पिछले सप्ताह ही हुए युद्धविराम समझौते का खुला और सीधे तौर पर उल्लंघन है।ट्रंप का यह संगीन आरोप और अमेरिकी सेना का पलटवार ऐसे समय में सामने आया है, जब दोनों परमाणु संपन्न देशों के बीच वैश्विक मध्यस्थता के बाद तनाव कम करने की गंभीर कोशिशें की गई थीं। लेकिन इस ताजा हमले के बाद खाड़ी क्षेत्र (Gulf Region) में हालात एक बार फिर नियंत्रण से बाहर और बेहद विस्फोटक होते दिख रहे हैं।एक मालवाहक जहाज से टकराया ड्रोन, अमेरिकी सेना ने हवा में ही मार गिराए 3 विमानराष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आधिकारिक बयान के मुताबिक, ईरान द्वारा दागे गए चार ड्रोनों में से एक ड्रोन वहां से गुजर रहे एक बड़े मालवाहक जहाज के ऊपरी हिस्से (Deck) से जाकर टकरा गया। इस जबरदस्त धमाके के कारण जहाज को काफी भौतिक नुकसान पहुंचा है, लेकिन गनीमत यह रही कि भारी नुकसान के बावजूद वह जहाज समुद्र में डूबने से बच गया और अपना आगे का सफर जारी रखने में सफल रहा।ट्रंप ने बताया कि जैसे ही इस हमले की भनक अमेरिकी नौसेना के कमांडरों को लगी, अमेरिकी वायुसेना और युद्धपोतों ने त्वरित एक्शन लेते हुए बाकी बचे तीन ड्रोनों को उनके निशाने पर पहुंचने से ठीक पहले हवा में ही मार गिराया। हालांकि, सुरक्षा और रणनीतिक कारणों का हवाला देते हुए ट्रंप ने फिलहाल उस मालवाहक जहाज के नाम और उसके देश का खुलासा सार्वजनिक नहीं किया है जिस पर यह हमला हुआ था। साथ ही, इस हमले में जहाज पर सवार किसी क्रू मेंबर के घायल होने या हताहत होने की भी कोई अतिरिक्त जानकारी अभी सामने नहीं आई है।सिंगापुर के झंडे वाले जहाज पर हुआ हमला, सीजफायर को लगा बड़ा झटकामीडिया और रक्षा गलियारों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच हुए सीजफायर के बाद यह पहली और सबसे बड़ी सैन्य चुनौती तब सामने आई, जब गुरुवार को सिंगापुर के झंडे वाले एक विशाल मालवाहक जहाज पर होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरते समय यह कथित ड्रोन अटैक हुआ। इस हिंसक घटना को दोनों देशों के बीच शांति स्थापित करने और दुनिया के सबसे बड़े तेल और कमोडिटी सप्लाई रूट पर सामान्य आवाजाही बहाल करने के उद्देश्य से किए गए समझौते के लिए एक बहुत बड़ा और जानलेवा झटका माना जा रहा है।अमेरिकी खुफिया और रक्षा अधिकारियों ने दावा किया है कि इस खौफनाक हमले के पीछे सीधे तौर पर ईरान की एलीट मिलिट्री विंग 'इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स' (IRGC) का हाथ है। बताया जा रहा है कि यह घटना ईरान के उस आधिकारिक सैन्य बयान के ठीक कुछ घंटों बाद हुई, जिसमें तेहरान ने चेतावनी दी थी कि बिना उनकी मंजूरी या अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन कर समुद्री मार्गों का इस्तेमाल करने वाले किसी भी जहाज के खिलाफ वे सख्त सैन्य कार्रवाई करेंगे। इस घटना के बाद कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में भी अचानक उछाल आने की आशंका बढ़ गई है।
ईरान की हथियार क्षमताएं क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने में मददगार : इस्माइल बाघेई
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाघेई ने क्षेत्रीय सुरक्षा और आत्मरक्षा के मुद्दे पर देश का रुख स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि ईरान की सैन्य क्षमताएं सुरक्षा और स्थिरता बनाए रखने के लिए हैं
अलास्का वार्ता पर टकराव – रूस और अमेरिका आमने-सामने
रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने कहा कि अमेरिका यूक्रेन संघर्ष को खत्म करने में आखिर क्या भूमिका निभाना चाहता है, इस बारे में साफ तस्वीर सामने आनी चाहिए। उन्होंने यह बात अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के एंकरेज शिखर सम्मेलन को लेकर दिए गए बयान के बाद कही।

