'ना फांसी की चिंता, ना जेल का डर': शेख हसीना ने किया स्वदेश लौटने का बड़ा ऐलान, बताई तारीख
बांग्लादेश की बेदखल हो चुकी पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने एक बड़ा और चौंकाने वाला बयान देते हुए ऐलान किया है कि वे गिरफ्तारी, जेल की सलाखों या मौत की सजा जैसी तमाम डरावनी आशंकाओं के बावजूद इसी साल दिसंबर तक बांग्लादेश लौटने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध हैं। पिछले साल अगस्त 2024 में राजनीतिक उथल-पुथल के बाद देश छोड़कर भारत की राजधानी नई दिल्ली में शरण लेने वाली शेख हसीना ने साफ कर दिया है कि स्वदेश लौटने पर उनके साथ जो भी होगा, वे उसका सामना करने से पीछे नहीं हटेंगी। प्रतिष्ठित न्यूज एजेंसी एएफपी को ईमेल के जरिए दिए गए अपने एक विस्तृत जवाब में शेख हसीना ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उन्हें अच्छी तरह पता है कि उनकी जान को खतरा है, उन्हें मारा जा सकता है, गिरफ्तार किया जा सकता है या जेल में डाला जा सकता है, लेकिन इसके बावजूद वे वापस लौटना चाहती हैं क्योंकि उनके देश के आम लोग उन्हें पुकार रहे हैं।अदालत की मौत की सजा और अपनों की धरती पर अंतिम सांस की इच्छाइससे पहले रॉयटर्स को दिए गए एक इंटरव्यू में भी शेख हसीना ने इस बात को दोहराया था कि वे और उनके सभी राजनीतिक सहयोगी अपना निर्वासन समाप्त करके बहुत जल्द बांग्लादेश लौटेंगे और वहां की अदालतों के सामने कानूनी प्रक्रिया का सामना करेंगे। उन्होंने भावुक होते हुए कहा था कि उनकी अपनी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर लगातार भीषण अत्याचार और उत्पीड़न किया जा रहा है, और यदि उनकी किस्मत में मौत भी लिखी है, तो वे चाहती हैं कि वह उनकी अपनी मातृभूमि की सरजमीं पर आए, जहां उनके माता-पिता को दफनाया गया है और जहां उनका खून बहा था। गौरतलब है कि बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण यानी आईसीटी द्वारा शेख हसीना को उनकी गैर-मौजूदगी में ही मौत की सजा सुनाई जा चुकी है, जो उन्हें साल 2024 में छात्रों के ऐतिहासिक और देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों से सख्ती से निपटने के उनके तौर-तरीकों के चलते दी गई थी।साल 2024 के छात्र आंदोलन और सत्ता परिवर्तन की पूरी कहानीयह पूरा राजनीतिक संकट साल 2024 की गर्मियों में तब शुरू हुआ था जब सरकारी नौकरियों में चली आ रही विवादास्पद कोटा प्रणाली के खिलाफ छात्रों ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों की शुरुआत की थी। हालांकि, सुरक्षा बलों और प्रशासन द्वारा अपनाई गई कड़ी कार्रवाई के बाद यह छात्र आंदोलन तेजी से एक राष्ट्रव्यापी सरकार विरोधी जन-आंदोलन में तब्दील हो गया, जिसमें महीनों तक चले संघर्ष के दौरान हजारों लोग घायल हुए और कई लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। विरोध प्रदर्शनों के पूरी तरह उग्र होने और बेकाबू हालात के बाद अगस्त 2024 में शेख हसीना को आखिरकार अपने प्रधानमंत्री पद से अचानक इस्तीफा देना पड़ा था और देश छोड़कर भारत आना पड़ा था। इस सत्ता परिवर्तन के तुरंत बाद बांग्लादेश की नई व्यवस्था के तहत अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण ने उनके और उनके कई पूर्व सहयोगियों पर मानवता के खिलाफ अपराधों के गंभीर मामले दर्ज किए, जबकि उनकी पार्टी अवामी लीग की राजनीतिक गतिविधियों पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया।तारिक रहमान का नया शासन और बांग्लादेश की बदलती राजनीतिक सियासतबांग्लादेश की इस बड़ी राजनीतिक उठापटक के बीच हाल ही में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी बीएनपी के प्रमुख तारिक रहमान ने देश के नए प्रधानमंत्री के रूप में आधिकारिक तौर पर शपथ ले ली है, जिसके साथ वे दशकों के लंबे अंतराल के बाद बांग्लादेश के पहले निर्वाचित पुरुष प्रधानमंत्री बन गए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बांग्लादेश की सियासत लंबे समय तक शेख हसीना और तारिक रहमान की माता तथा पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बीच की आपसी प्रतिद्वंद्विता के इर्द-गिर्द घूमती रही है, जिसे देश के लोग अक्सर बेगमों की जंग के रूप में याद किया करते थे। अब ऐसे में शेख हसीना के दिसंबर तक वतन लौटने के इस सनसनीखेज ऐलान ने एक बार फिर दक्षिण एशिया की राजनीति में खलबली मचा दी है और सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि बांग्लादेश की नई सरकार और न्यायपालिका इस पर क्या रुख अपनाती है।
रूस से लगातार कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों पर बड़ा और शिकंजा कसने के लिए अमेरिकी संसद ने एक बेहद सख्त प्रतिबंध विधेयक को प्रक्रियागत वोटिंग के जरिए पास कर दिया है। अमेरिकी सीनेटर रोजर विकर ने इस दौरान बिना किसी लाग-लपेट के खुलकर कहा है कि इस नए और कड़े कानून का मुख्य निशाना भारत और चीन जैसे देश हैं, जो लगातार मॉस्को से ऊर्जा संसाधन खरीदकर उसकी सैन्य ताकत और रूस-यूक्रेन युद्ध को आर्थिक रूप से समर्थन दे रहे हैं। इस प्रस्तावित बिल के प्रावधानों के मुताबिक यदि यह पूरी तरह से कानून बनता है, तो रूस से व्यापार करने या ऊर्जा खरीदने वाले देशों के उत्पादों पर अमेरिका में भारी-भरकम 100 प्रतिशत तक का आयात शुल्क यानी टैरिफ लगाया जा सकता है, जिसका सबसे सीधा और गहरा प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था और वैश्विक व्यापार पर पड़ना तय माना जा रहा है।सीनेट में भारी बहुमत से मिला समर्थन और राजनीतिक पृष्ठभूमिदक्षिण कैरोलिना के दिवंगत अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम की स्मृति में लाए गए इस महत्वपूर्ण 'लिंडसे ओ ग्राहम सेंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट 2026' पर अमेरिकी सीनेट के भीतर भारी बहुमत के साथ 86-12 के अंतर से क्लोजर मोशन पास कर दिया गया है। दिलचस्प बात यह है कि यह मतदान ठीक उसी दिन संपन्न हुआ जब यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात करने के लिए वाशिंगटन पहुंचे थे और उन्होंने दिवंगत सीनेटर ग्राहम के अंतिम संस्कार में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी। इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम के बीच अमेरिकी सीनेटरों का यह आक्रामक रुख यह साफ संकेत दे रहा है कि वाशिंगटन अब मास्को के साथ ऊर्जा व्यापार करने वाले देशों पर कड़े प्रतिबंध लगाने के लिए पूरी तरह से मानसिक रूप से तैयार हो रहा है।मित्र देशों को नहीं, बल्कि चीन और भारत को है टार्गेटएक विशेष प्रेस ब्रीफिंग के दौरान जब अमेरिकी सीनेटर रोजर विकर से इस बिल के अंतरराष्ट्रीय प्रभावों के बारे में सवाल पूछा गया, तो उन्होंने दो टूक शब्दों में बयान देते हुए कहा कि इस कानून का मसौदा बहुत ही करीने से डिजाइन किया गया है ताकि अमेरिका के पारंपरिक सहयोगी देशों पर इसका कोई नकारात्मक असर न पड़े, बल्कि इसका पूरा वार सीधे तौर पर चीन और भारत पर पड़े। सीनेटर विकर ने भारत और चीन की नीतियों पर तीखा हमला बोलते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस पूरे मामले में यही देश मुख्य कसूरवार हैं क्योंकि वे भारी मात्रा में रूस का तेल और गैस खरीद रहे हैं जिससे रूसी युद्ध मशीन को लगातार ईंधन मिल रहा है और वे वैश्विक मंच पर अमेरिकी हितों के अनुकूल काम नहीं कर रहे हैं।भारत का रणनीतिक रुख और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर मंडराता खतराभारत सरकार की ओर से इस मामले पर पहले ही बेहद स्पष्ट और मजबूत रुख अपनाया गया है, जिसमें नई दिल्ली ने बार-बार यह दोहराया है कि रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदना देश के राष्ट्रीय हितों और घरेलू बाजार में ईंधन की कीमतों को नियंत्रण में रखने के लिए बेहद आवश्यक है। रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका इस 100 प्रतिशत टैरिफ वाले प्रावधान को कानून का रूप देता है, तो इससे न सिर्फ द्विपक्षीय व्यापारिक रिश्तों में भारी तनाव पैदा होगा बल्कि पहले से ही दबाव झेल रहा वैश्विक ऊर्जा बाजार और अधिक अस्थिर हो जाएगा।
पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर यानी PoK में विधानसभा चुनावों के माहौल के बीच हालात बेहद तनावपूर्ण और खूनी हो चुके हैं। चुनाव प्रक्रिया के दौरान पिछले 48 घंटों में पाकिस्तानी सेना और सुरक्षा बलों की हिंसक कार्रवाई में कम से कम 30 आम नागरिकों और प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई है। जम्मू-कश्मीर संयुक्त आवामी एक्शन कमेटी यानी JAAC के अनुसार, इस खूनी संघर्ष में सोमवार को 25 और मंगलवार को 5 लोगों की जान चली गई है। यह चुनाव पूरी तरह से भारी राजनीतिक अशांति, हथियारों के बल पर की गई कार्रवाई, बड़े पैमाने पर धांधली और संपूर्ण इंटरनेट ब्लैकआउट के बीच संपन्न हुए हैं। मानवाधिकार संगठनों और स्थानीय लोगों का साफ तौर पर आरोप है कि पाकिस्तानी सेना ने विरोध प्रदर्शनों को कुचलने के लिए सीधे तौर पर अंधाधुंध गोलियां चलाई हैं और इस क्षेत्र को आतंक के साए में धकेल दिया है।एमनेस्टी इंटरनेशनल की कड़ी निंदा और स्वतंत्र जांच की मांगइस भीषण मानवाधिकार उल्लंघन और हिंसक घटनाओं के बाद पूरी दुनिया में पाकिस्तानी प्रशासन के खिलाफ तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। एमनेस्टी साउथ एशिया की एक्टिंग डायरेक्टर इसाबेल लैसी ने एक तीखा बयान जारी करते हुए कहा है कि पीओके में सुरक्षा बलों द्वारा प्रदर्शनकारियों पर की गई यह कार्रवाई पाकिस्तान की उस पुरानी और गैर-कानूनी हिंसा की परंपरा का हिस्सा है, जिसके तहत वह हर आवाज को दबाना चाहता है। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने मांग की है कि सुरक्षा बलों द्वारा किए गए इस बल प्रयोग की तुरंत, पूरी तरह से स्वतंत्र और पारदर्शी जांच कराई जानी चाहिए। संगठन ने इस बात पर भी गहरी चिंता जताई है कि पिछले 5 जून से पूरे क्षेत्र में इंटरनेट और मोबाइल सेवाएं पूरी तरह से ठप हैं, जिससे जमीनी हकीकत दुनिया के सामने आने से रोकी जा रही है। एमनेस्टी ने पाकिस्तान सरकार से तत्काल सभी संचार माध्यमों को बहाल करने और स्वतंत्र मीडिया तथा पर्यवेक्षकों को इलाके में प्रवेश की अनुमति देने की मांग की है।क्या है पूरा आंदोलन और क्यों भड़का है इस्लामाबाद का गुस्सायह पूरा विवाद और जनआंदोलन मूल रूप से जम्मू-कश्मीर संयुक्त आवामी एक्शन कमेटी यानी JAAC के नेतृत्व में शुरू हुआ था। इस आंदोलन की शुरुआत पीओके विधानसभा में उन शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों को समाप्त करने की मांग के साथ हुई थी, जो साल 1947 के विभाजन के बाद पाकिस्तान की मुख्य भूमि में जाकर बस गए थे। समय के साथ यह मांग पाकिस्तानी शासन के खिलाफ इस इलाके में पिछले कई दशकों का सबसे बड़ा जन-विद्रोह बन गया, जिसमें इस्लामाबाद के अवैध नियंत्रण और पाकिस्तानी सेना के दमनकारी रवैये का जमकर विरोध किया जा रहा है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि पाकिस्तानी अधिकारियों ने JAAC पर आतंकवाद विरोधी कानूनों का हवाला देते हुए प्रतिबंध तक लगा दिया है। हिंसा का यह दौर केवल पिछले दो दिनों तक सीमित नहीं है, बल्कि जून की शुरुआत से अब तक इस पूरे आंदोलन में कुल 40 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है, जिनमें प्रदर्शनकारी और सुरक्षाकर्मी दोनों शामिल हैं।चुनाव के बीच JAAC संस्थापक के भाई की हत्या और विदेशों में प्रदर्शनपाकिस्तानी सेना की इस क्रूर कार्रवाई का दायरा आम नागरिकों से लेकर आंदोलन के प्रमुख नेताओं के परिवारों तक फैल चुका है। समाचार एजेंसी एएनआई की रिपोर्ट के अनुसार, JAAC कोर टीम के सदस्य इम्तियाज असलम ने खुलासा किया है कि इस दमनकारी कार्रवाई के दौरान आंदोलन के संस्थापक उमर नजीर कश्मीरी के छोटे भाई उस्मान नजीर को भी मौत के घाट उतार दिया गया है। इस अमानवीय हत्या और पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों के विरोध में विदेशों में भी गुस्सा फूट पड़ा है। यूनाइटेड किंगडम के ब्रैडफोर्ड शहर में स्थित पाकिस्तानी कॉन्सुलेट के बाहर बड़ी संख्या में JAAC समर्थकों और प्रवासी कश्मीरी समुदाय के लोगों ने जोरदार प्रदर्शन किया तथा पाकिस्तान के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। JAAC के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, जून महीने की शुरुआत से लेकर अब तक पाकिस्तानी सेना और सुरक्षा बलों ने इस क्षेत्र में कम से कम 67 लोगों को अपनी गोलियों का शिकार बनाया है, जिससे पीओके के भीतर और बाहर भारी आक्रोश का माहौल है।
पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया के रक्षा समीकरणों में एक बेहद चौंकाने वाला मोड़ सामने आ रहा है। आर्थिक बदहाली और भारी कर्ज के जाल में फंसे पाकिस्तान ने अपनी रणनीतिक स्थिति का फायदा उठाते हुए खाड़ी देशों के साथ सैन्य गठजोड़ बढ़ाना शुरू कर दिया है। सऊदी अरब के साथ हालिया रक्षा समझौतों के ठीक बाद, अब पाकिस्तान ने कुवैत के साथ एक बड़ी और महत्वपूर्ण डिफेंस डील पर मुहर लगा दी है। इस नए घटनाक्रम के बाद अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विश्लेषकों और भारतीय रक्षा गलियारों में यह बहस छिड़ गई है कि क्या खाड़ी देशों का यह बदला हुआ रुख नई दिल्ली के लिए किसी रणनीतिक चुनौती का संकेत है।कुवैत और पाकिस्तान के बीच क्या है यह नया सैन्य समझौतापाकिस्तान और कुवैत के बीच हुए इस नए रक्षा समझौते के तहत मुख्य रूप से सैन्य प्रशिक्षण, संयुक्त युद्धाभ्यास, खुफिया जानकारी साझा करने और तकनीकी सहयोग को शामिल किया गया है। रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान की सेना कुवैती सशस्त्र बलों को आधुनिक युद्ध कौशल और आतंकवाद विरोधी अभियानों के लिए ट्रेनिंग देगी। इसके बदले में कुवैत से पाकिस्तान को मोटी रकम और वित्तीय मदद मिलने की उम्मीद है, जिसकी उसकी डूबती अर्थव्यवस्था को इस वक्त सख्त जरूरत है। विश्लेषक इसे पाकिस्तान की 'मिलिट्री डिप्लोमेसी' का हिस्सा मान रहे हैं, जिसके जरिए वह तेल समृद्ध देशों से नकद डॉलर जुटाने की कोशिश में है।सऊदी अरब के साथ पहले ही हो चुका है बड़ा गठजोड़कुवैत से पहले पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ अपनी रक्षा साझेदारी को एक नए स्तर पर पहुंचाया था। सऊदी अरब में पाकिस्तानी सैनिकों की तैनाती और वहां की रॉयल सऊदी लैंड फोर्सेस को ट्रेनिंग देने के बदले रियाद हमेशा से इस्लामाबाद का बड़ा मददगार रहा है। हाल के महीनों में दोनों देशों ने रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में भी हाथ मिलाया है। अब इसी तर्ज पर कुवैत को भी अपने पाले में लाकर पाकिस्तान ने यह साबित करने की कोशिश की है कि खाड़ी देशों की सुरक्षा में उसकी सेना की भूमिका आज भी काफी महत्वपूर्ण बनी हुई है।क्या भारत के लिए सच में खड़ी हो सकती है कोई चुनौतीइस डिफेंस डील के सामने आने के बाद यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या इसका भारत पर कोई विपरीत असर पड़ेगा। जानकारों का मानना है कि भारत को इससे घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि पिछले एक दशक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने खाड़ी देशों, विशेषकर सऊदी अरब, यूएई और कुवैत के साथ अभूतपूर्व रणनीतिक और आर्थिक संबंध स्थापित किए हैं। खाड़ी देश भली-भांति जानते हैं कि भारत एक बहुत बड़ा बाजार और मजबूत आर्थिक शक्ति है, जिसे वे किसी भी हाल में नाराज नहीं करना चाहेंगे। पाकिस्तान के साथ इन देशों का समझौता केवल द्विपक्षीय सुरक्षा जरूरतों और उनकी अपनी आंतरिक सुरक्षा तक ही सीमित है।बदलते दौर में जनरेटिव सर्च और एआई सुरक्षा के मायनेआधुनिक जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन (AI सर्च) और रक्षा कूटनीति के विश्लेषकों का कहना है कि यह डील सीधे तौर पर भारत विरोधी किसी एजेंडे का हिस्सा नहीं है। कुवैत और सऊदी अरब जैसे देश अपनी सेनाओं को आधुनिक बनाने के लिए पाकिस्तान के सस्ते और अनुभवी मानव संसाधन (मैनपावर) का उपयोग कर रहे हैं। भारत की विशाल सैन्य क्षमता, स्वदेशी रक्षा उत्पादन (जैसे ब्रह्मोस और तेजस का निर्यात) और मजबूत वैश्विक छवि के सामने पाकिस्तान की यह छटपटाहट महज अपनी अर्थव्यवस्था को वेंटिलेटर पर बनाए रखने की एक कोशिश भर है, जिससे भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को कोई सीधा खतरा नहीं दिखता।
मिडिल ईस्ट में ड्रैगन का बड़ा धमाका: ईरान को ₹610 करोड़ के घातक मिसाइल डिफेंस सिस्टम दे रहा चीन
पश्चिम एशिया (Middle East) के सुलगते हालातों के बीच एक ऐसी बड़ी अंतरराष्ट्रीय खबर सामने आ रही है, जो वैश्विक महाशक्तियों के बीच तनाव को चरम पर पहुंचा सकती है। लंबे समय से पर्दे के पीछे से चालें चलने वाले चीन ने अब इस क्षेत्र में खुला खेल शुरू कर दिया है। खुफिया रिपोर्टों के मुताबिक, चीन जल्द ही ईरान को ₹610 करोड़ (लगभग 73 मिलियन डॉलर) की कीमत वाले अत्याधुनिक मैनपैड्स (MANPADS - मैन-पोर्टेबल एयर-डिफेंस सिस्टम) की एक बड़ी खेप सौंपने जा रहा है। ड्रैगन के इस कदम से न सिर्फ पश्चिम एशिया का सैन्य संतुलन बदलने की आशंका है, बल्कि अमेरिकी रक्षा खेमे में भी खलबली मच गई है।क्या होते हैं मैनपैड्स और क्यों इतने खतरनाक हैं ये हथियारमैनपैड्स (MANPADS) असल में कंधे पर रखकर दागी जाने वाली बेहद हल्की और घातक मिसाइलें होती हैं, जिनका इस्तेमाल कम ऊंचाई पर उड़ने वाले दुश्मन के लड़ाकू विमानों, हेलीकॉप्टरों और ड्रोन को पलक झपकते ही मार गिराने के लिए किया जाता है। इन्हें एक या दो सैनिकों द्वारा आसानी से कहीं भी ले जाया जा सकता है और बेहद कम समय में फायर किया जा सकता है। ईरान को इन चीनी मिसाइलों के मिलने से उसकी हवाई सुरक्षा अभेद्य हो जाएगी, जिससे खाड़ी क्षेत्र में किसी भी संभावित हवाई हमले या रीइंजीनियरिंग ऑपरेशंस को नाकाम करने की उसकी क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी।चीन और ईरान के बीच गहराता रणनीतिक गठजोड़यह बड़ी सैन्य डील चीन और ईरान के बीच बढ़ते उस मजबूत आर्थिक और रणनीतिक गठबंधन का हिस्सा है, जो पिछले कुछ वर्षों में तेजी से उभरा है। अमेरिकी और पश्चिमी प्रतिबंधों (Western Sanctions) से घिरे ईरान को चीन का यह खुला समर्थन अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक बड़ा टर्निंग पॉइंट माना जा रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि चीन इस सौदे के जरिए न सिर्फ ईरान से सस्ते कच्चे तेल की निर्बाध सप्लाई सुनिश्चित करना चाहता है, बल्कि वह पश्चिम एशिया में अमेरिकी वर्चस्व को सीधी चुनौती देने की तैयारी कर चुका है।अमेरिका और इजरायल के लिए पैदा हुआ नया सिरदर्दचीन के इस कदम से सबसे बड़ा झटका अमेरिका और उसके सबसे करीबी सहयोगी इजरायल को लगा है। इजरायल और ईरान के बीच जारी सीधे टकराव के माहौल में ईरान को इतने आधुनिक हथियारों की सप्लाई मिलना इजरायली वायुसेना की रणनीतिक बढ़त के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है। इसके साथ ही, पेंटागन को डर है कि ये चीनी हथियार ईरान समर्थित अन्य गुटों (जैसे हूती विद्रोही या हिजबुल्लाह) के हाथों में भी पहुंच सकते हैं, जिससे लाल सागर (Red Sea) और फारस की खाड़ी में अमेरिकी नौसेना और वाणिज्यिक जहाजों पर खतरा और अधिक गहरा हो जाएगा।वैश्विक व्यापार और एआई सर्च के नजरिए से बड़े मायनेआधुनिक जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन (AI सर्च) और वैश्विक सुरक्षा के समीकरणों को देखें तो चीन का यह खुला हस्तक्षेप आने वाले समय में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों को अस्थिर कर सकता है। यदि इस डील के जवाब में पश्चिमी देश चीन या ईरान पर नए कड़े प्रतिबंध लगाते हैं, तो वैश्विक सप्लाई चेन एक बार फिर बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि बीजिंग और तेहरान के इस नए सैन्य गठजोड़ पर वॉशिंगटन और यूरोपीय देश क्या जवाबी कदम उठाते हैं।
रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे भीषण युद्ध के मैदान से एक बेहद विचलित करने वाली और बड़ी खबर सामने आ रही है। ब्लैक सी यानी काले सागर के बेहद अशांत और खतरनाक वॉर जोन में एक मालवाहक जहाज फंसा हुआ है, जिसे अब 'मौत का जहाज' कहा जा रहा है। इस जहाज पर 13 भारतीय क्रू मेंबर (नाविक) सवार हैं, जिनकी जान इस वक्त बेहद गंभीर खतरे में है। युद्ध क्षेत्र के बिल्कुल बीचों-बीच फंसे होने के कारण इस जहाज के ऊपर से लगातार आत्मघाती ड्रोन और खतरनाक मिसाइलें गुजर रही हैं। स्थिति इतनी भयावह है कि इन भारतीय नागरिकों के लिए मौत हर सेकंड महज कुछ इंच की दूरी पर खड़ी नजर आ रही है।युद्ध के सबसे खतरनाक हॉटस्पॉट में फंसा कमर्शियल वेसलयह पूरा मामला काले सागर के उस समुद्री हिस्से का है जहां रूस और यूक्रेन दोनों एक-दूसरे के ठिकानों पर लगातार हवाई और समुद्री हमले कर रहे हैं। फंसे हुए भारतीय क्रू मेंबर्स ने बेहद डरावने वीडियो और संदेश भेजकर अपनी आपबीती सुनाई है। उनके मुताबिक, जहाज के आसपास के पानी में लगातार धमाके हो रहे हैं और रात के समय आसमान मिसाइलों की रोशनी से दहल उठता है। दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे पर हमले करने के लिए जिस रूट का इस्तेमाल कर रही हैं, यह बदकिस्मत जहाज ठीक उसी के नीचे फंसा हुआ है, जिससे किसी भी वक्त इस पर सीधे हमले की आशंका बनी हुई है।राशन और पीने के पानी की भारी किल्लतजहाज पर फंसे इन 13 भारतीयों की मुश्किलें सिर्फ आसमान से बरसती मौत तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि जहाज के भीतर के हालात भी बद से बदतर हो चुके हैं। पिछले कई दिनों से युद्ध क्षेत्र में फंसे होने के कारण जहाज पर मौजूद खाने-पीने का राशन लगभग खत्म होने की कगार पर है। पीने के साफ पानी की भारी किल्लत हो गई है और बिजली सप्लाई भी रुक-रुक कर आ रही है। मानसिक तनाव और मौत के साए में जीने के कारण कई क्रू मेंबर्स की तबीयत भी बिगड़ने लगी है, लेकिन इस हाई-रिस्क वॉर ज़ोन में किसी भी तरह की मेडिकल मदद का पहुंचना फिलहाल नामुमकिन बना हुआ है।भारत सरकार और डिप्लोमैटिक चैनल्स हुए एक्टिवइस बेहद संवेदनशील और गंभीर मामले की जानकारी मिलते ही नई दिल्ली में विदेश मंत्रालय (MEA) पूरी तरह एक्शन मोड में आ गया है। भारतीय राजनयिक लगातार रूस और यूक्रेन दोनों देशों के दूतावासों और स्थानीय अधिकारियों से संपर्क साध रहे हैं ताकि एक सुरक्षित समुद्री कॉरिडोर (Safe Maritime Corridor) बनाकर इन 13 निर्दोष भारतीयों को वहां से सकुशल निकाला जा सके। हालांकि, युद्ध क्षेत्र में लगातार जारी बमबारी और माइनफील्ड्स (समुद्री बारूदी सुरंगों) की मौजूदगी के कारण रेस्क्यू ऑपरेशन चलाना बेहद जटिल और चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है।परिजनों की बढ़ी धड़कनें, वतन वापसी के लिए लगाई गुहारइधर भारत में फंसे हुए क्रू मेंबर्स के परिवारों का रो-रोकर बुरा हाल है। मुंबई, केरल और तमिलनाडु समेत देश के विभिन्न हिस्सों के रहने वाले इन नाविकों के परिजनों ने भारत सरकार और प्रधानमंत्री कार्यालय से हाथ जोड़कर भावुक अपील की है कि उनके बच्चों को जल्द से जल्द सुरक्षित वापस लाया जाए। सोशल मीडिया पर भी इन नाविकों को बचाने के लिए मुहिम तेज हो गई है। सुरक्षा विश्लेषकों का कहना है कि जब तक दोनों देशों की तरफ से सीजफायर या किसी विशेष रेस्क्यू विंडो की मंजूरी नहीं मिलती, तब तक इन भारतीयों के लिए हर एक पल भारी रहने वाला है।
Russia-Ukraine War: यूक्रेन के पास फंसे 13 भारतीय नाविक, IMO ने सुरक्षा पर जताई गहरी चिंता
यूक्रेन स्थित भारतीय दूतावास ने बुधवार को कहा कि चोर्नोमोर्स्क बंदरगाह पर फंसे मालवाहक जहाज एमवी आमिर1 सवार भारतीय नाविकों की स्थिति पर लगातार नजर रखे हुए है और इस मामले को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है।
भारत-चीन समेत 5 देशों पर अमेरिका लगाएगा 100% टैरिफ! सीनेट से पास हुआ बिल
वॉशिंगटन: यूक्रेन युद्ध को लेकर रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की दिशा में अमेरिकी सीनेट ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। सीनेट ने एक नया प्रतिबंध विधेयक पारित किया है, जिसमें रूस से बड़े पैमाने पर तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर कड़े व्यापारिक उपाय लागू करने का प्रावधान किया गया है। इस प्रस्तावित कानून के तहत भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान जैसे देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जा सकता है। विधेयक का उद्देश्य रूस की ऊर्जा आय पर असर डालना और उसे यूक्रेन में सैन्य कार्रवाई रोकने के लिए आर्थिक रूप से मजबूर करना बताया गया है। भारी बहुमत से पारित हुआ विधेयक अमेरिकी सीनेट में इस विधेयक को व्यापक समर्थन मिला। मतदान के दौरान 86 सीनेटरों ने इसके पक्ष में जबकि 12 सदस्यों ने विरोध में मतदान किया। मतदान ऐसे समय हुआ, जब यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की अमेरिका के कैपिटल हिल पहुंचे हुए थे। माना जा रहा है कि इस दौरान यूक्रेन को लेकर अमेरिकी समर्थन और रूस पर बढ़ते दबाव का संदेश भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय तक पहुंचाया गया। क्या है विधेयक का उद्देश्य? इस कानून का मुख्य उद्देश्य रूस की अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव बनाना है। प्रस्ताव में रूसी अधिकारियों पर नए प्रतिबंध लगाने के साथ-साथ उन देशों पर भी आर्थिक कार्रवाई का प्रावधान है, जो रूस से ऊर्जा आयात जारी रखे हुए हैं। अमेरिकी नीति निर्माताओं का मानना है कि रूस की ऊर्जा बिक्री उसकी आय का प्रमुख स्रोत है और इसी के जरिए वह युद्ध का खर्च वहन कर रहा है। इसलिए रूस के ऊर्जा कारोबार को सीमित करना इस रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है। भारत समेत पांच देशों पर बढ़ सकता है दबाव विधेयक में भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान का उल्लेख उन देशों के रूप में किया गया है, जो रूसी तेल और गैस का आयात करते हैं। यदि यह कानून अंतिम रूप से लागू होता है, तो इन देशों से अमेरिका आने वाले उत्पादों पर 100 प्रतिशत तक आयात शुल्क लगाया जा सकता है। इसका उद्देश्य इन देशों को रूस पर ऊर्जा निर्भरता कम करने के लिए प्रेरित करना बताया गया है। ऊर्जा संकट के बीच बढ़ी रूस पर निर्भरता पश्चिम एशिया में जारी तनाव और समुद्री व्यापार मार्गों में बाधाओं के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार पहले से दबाव में है। ऐसे हालात में कई देशों ने वैकल्पिक स्रोतों के रूप में रूस से कच्चे तेल और गैस की खरीद बढ़ाई है। भारत भी अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए रूसी कच्चे तेल का आयात बढ़ाने वाले प्रमुख देशों में शामिल रहा है। यही वजह है कि प्रस्तावित अमेरिकी विधेयक का असर भारत सहित कई अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है। छूट का भी रखा गया है प्रावधान अमेरिकी सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने पहले संकेत दिया था कि यदि कोई देश रूस से सीमित मात्रा में गैस खरीदता है और उसका आयात रूस के कुल गैस निर्यात का 15 प्रतिशत से कम है, तो उसे इस कानून के कुछ प्रावधानों से राहत मिल सकती है। हालांकि अंतिम नियम और पात्रता का निर्धारण कानून लागू होने के बाद ही स्पष्ट होगा। फिलहाल क्या हैं मौजूदा टैरिफ? वर्तमान में भारत पर अमेरिका का 10 प्रतिशत टैरिफ लागू है। चीन पर औसतन 12.5 प्रतिशत शुल्क लागू है, जबकि कुछ चीनी उत्पादों पर 7.5 प्रतिशत से 25 प्रतिशत तक अतिरिक्त शुल्क भी प्रभावी हैं। स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान जैसे देशों पर भी 10 से 12.5 प्रतिशत के बीच अमेरिकी आयात शुल्क लागू है। नया विधेयक लागू होने की स्थिति में इन देशों पर टैरिफ बढ़कर 100 प्रतिशत तक पहुंच सकता है।
वाशिंगटन से आ रही दो बड़ी खबरों ने भारतीय अर्थव्यवस्था, आईटी उद्योग, छात्रों और रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञों की नींद उड़ा दी है। अमेरिकी संसद (कांग्रेस) में उठाए गए दो नए विधायी कदमों के कारण भारत-अमेरिका संबंधों में एक नया तनाव देखने को मिल सकता है। एक तरफ जहां अमेरिकी सीनेट में H-1B वीजा प्रक्रिया को बेहद कड़ा करने वाला बिल पेश किया गया है, वहीं दूसरी तरफ रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर शिकंजा कसने के लिए भारी बहुमत से 'रूस प्रतिबंध विधेयक' पास हुआ है। यदि ये दोनों प्रस्ताव कानून की शक्ल लेते हैं, तो इसका सीधा असर भारत के आईटी पेशेवरों, अमेरिका में पढ़ाई कर रहे छात्रों, देश के निर्यात और ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ेगा।1. 'एंड H-1B एब्यूज एक्ट': 3 साल की रोक और 1 लाख डॉलर फीस का प्रस्तावअमेरिकी सीनेट में रिपब्लिकन सीनेटर टिम शीही द्वारा 'End H-1B Abuse Act' नाम से एक नया विधेयक पेश किया गया है। इस बिल में अमेरिका में विदेशी कुशल कर्मचारियों को दिए जाने वाले H-1B वीजा नियमों में कई सख्त बदलावों की सिफारिश की गई है।H-1B वीजा बिल से भारतीय पेशेवरों और छात्रों पर असर:नए वीजा पर 3 साल का बैन: बिल में अगले तीन वर्षों के लिए नए H-1B वीजा जारी करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव है। इससे अमेरिका जाकर काम करने का सपना देखने वाले हजारों भारतीय डॉक्टरों, इंजीनियरों और आईटी विशेषज्ञों को बड़ा झटका लग सकता है।1 लाख डॉलर का भारी शुल्क: हर H-1B वीजा आवेदन पर 1,00,000 डॉलर का अनिवार्य शुल्क लगाने का प्रावधान है। इतनी अधिक लागत के कारण भारतीय आईटी दिग्गज (जैसे TCS, Infosys, Wipro) और अमेरिकी कंपनियां भारत से प्रतिभाओं को अमेरिका बुलाने से बचेंगी।OPT व्यवस्था समाप्त करने का प्रस्ताव: अमेरिकी विश्वविद्यालयों से शिक्षा पूरी करने के बाद वहां काम का अनुभव प्राप्त करने के लिए मिलने वाली 'ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग' (OPT) सुविधा को खत्म करने की बात कही गई है, जिससे भारतीय छात्रों के लिए पढ़ाई के बाद वहां नौकरी पाना लगभग असंभव हो जाएगा।आश्रितों (Dependents) पर रोक: H-1B वीजा धारकों के जीवनसाथी और बच्चों के अमेरिका आने पर रोक लगाने का प्रस्ताव है, जिससे पेशेवर अपने परिवार को साथ नहीं ले जा सकेंगे।2. 'रूस प्रतिबंध विधेयक': भारतीय सामानों पर 100% टैरिफ का खतराअमेरिकी सीनेट में 86-12 के भारी बहुमत से पारित हुआ 'रूस प्रतिबंध विधेयक' भारत के लिए दूसरी बड़ी चिंता का विषय है। इस कानून का मुख्य उद्देश्य रूस से कच्चा तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर आर्थिक दबाव बनाना है। चीन के बाद भारत, रूस से कच्चा तेल आयात करने वाला दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है।इस कानून का भारत के व्यापार और अर्थ व्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ेगा?भारतीय निर्यात पर 100% तक टैरिफ: इस विधेयक के तहत अमेरिका, रूस से ऊर्जा संसाधन खरीदने वाले देशों से आने वाले सामान पर 100% तक का शुल्क (टैरिफ) लगा सकता है। इससे अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पाद बेहद महंगे हो जाएंगे और देश के निर्यात को भारी नुकसान होगा।रिफाइनरियों पर वित्तीय संकट: जून 2026 में भारत का रूसी तेल आयात 34% बढ़ा था। IOC, BPCL और रिलायंस जैसी भारतीय रिफाइनरियों के लिए रूस से व्यापार जारी रखना अमेरिकी वित्तीय प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग बाधाओं के कारण मुश्किल हो सकता है।पेट्रोल-डीजल के दाम और महंगाई बढ़ने की आशंका: मध्य पूर्व में जारी तनाव के कारण खाड़ी देशों से तेल की आपूर्ति पहले ही प्रभावित है। ऐसे में यदि अमेरिकी दबाव में भारत को रूस से मिलने वाला सस्ता कच्चा तेल बंद करना पड़ता है, तो देश में ईंधन की कीमतें और आम महंगाई तेजी से बढ़ सकती हैं।द्विपक्षीय संबंध और भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता के सामने चुनौतीयह पहला मौका नहीं है जब व्यापारिक मुद्दों पर दोनों देशों के बीच तनाव देखा जा रहा है। इससे पहले अगस्त 2025 में जब अमेरिका ने भारतीय सामानों पर 25% का अतिरिक्त टैरिफ लगाया था, तब दोनों देशों के बीच व्यापार वार्ता पूरी तरह रुक गई थी। अब 100% टैरिफ का खतरा दोनों देशों के कूटनीतिक और रणनीतिक रिश्तों को और अधिक संवेदनशील मोड़ पर ला सकता है। भारत हमेशा अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं और विदेश नीति के फैसले स्वतंत्र रूप से लेता आया है, लेकिन अमेरिकी संसद के ये कदम भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता को सीधी चुनौती देते नजर आ रहे हैं।वर्तमान स्थिति: क्या ये फैसले तुरंत लागू हो गए हैं?राहत की बात यह है कि ये दोनों प्रस्ताव अभी पूरी तरह कानून नहीं बने हैं:H-1B वीजा से जुड़ा बिल फिलहाल अमेरिकी सीनेट में केवल पेश किया गया है।रूस प्रतिबंध विधेयक सीनेट से पास होकर विधायी प्रक्रिया के अगले चरण में है।इन दोनों प्रस्तावों को अंतिम रूप से कानून बनने के लिए अमेरिकी प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) से मंजूरी मिलना और अमेरिकी राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होना अनिवार्य है। इसलिए, जब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक H-1B वीजा और भारत का अंतरराष्ट्रीय तेल व्यापार मौजूदा नियमों के तहत ही जारी रहेगा।(डिस्क्लेमर: यह समाचार रिपोर्ट अमेरिकी संसद (सीनेट) में पेश किए गए विधेयकों, विधायी दस्तावेजों और अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक आंकड़ों के विश्लेषण पर आधारित है।)
इराक में अमेरिका-सऊदी के एयरस्ट्राइक, ईरान की मिसाइल जवाबी कार्रवाई; पश्चिम एशिया में बढ़ा तनाव
अमेरिकी सेना ने ईरान समर्थित मिलिशिया के ठिकानों को बनाया निशाना, ईरान ने आरोपों से किया इनकार; जॉर्डन स्थित अमेरिकी बेस और सऊदी ऊर्जा प्रतिष्ठानों की सुरक्षा बढ़ी
मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में शांति की कोशिशों के बीच एक बार फिर सैन्य टकराव खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। अमेरिकी सेना के सेंट्रल कमांड (CENTCOM) और सऊदी अरब की सेना ने एक संयुक्त अभियान चलाकर पूर्वी इराक में स्थित ईरान समर्थित मिलिशिया के कई ठिकानों पर सटीक हवाई हमले किए हैं। यह सैन्य कार्रवाई पिछले 72 घंटों के दौरान अमेरिकी ठिकानों और सऊदी अरब के ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हुए 30 से अधिक ड्रोन हमलों के जवाब में की गई है।दूसरी ओर, इस एयरस्ट्राइक के ठीक बाद ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) से गुजर रहे 3 अंतरराष्ट्रीय तेल टैंकरों को जब्त कर आगे बढ़ने से रोक दिया है, जिससे वैश्विक कच्चे तेल के व्यापार पर सीधा संकट मंडराने लगा है।जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य बेस पर हमला नाकाममिडिल ईस्ट में बिगड़ते हालात के बीच एक और बड़ा घटनाक्रम तब सामने आया जब अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच ईरान को लेकर हुई एक उच्चस्तरीय बैठक के तुरंत बाद जॉर्डन स्थित अमेरिकी सैन्य बेस को निशाना बनाकर मिसाइलें दागी गईं।एयर डिफेंस की सफलता: CENTCOM के मुताबिक, जॉर्डन में तैनात अमेरिकी एयर डिफेंस सिस्टम ने समय रहते सभी मिसाइलों को हवा में ही इंटरसेप्ट कर नष्ट कर दिया।कोई नुकसान नहीं: हमले की इस कोशिश में अमेरिकी सैनिकों या बुनियादी ढांचे को कोई नुकसान नहीं पहुंचा है।व्हाइट हाउस अलर्ट: इस हमले की तात्कालिक जानकारी राष्ट्रपति ट्रम्प और अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के शीर्ष अधिकारियों को दे दी गई है।स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में ईरान की बड़ी कार्रवाईवैश्विक ईंधन आपूर्ति के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण जलमार्ग 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' में ईरान की ओर से की गई कार्रवाई ने वैश्विक शिपिंग कंपनियों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। ईरान के सरकारी टेलीविजन के अनुसार, IRGC ने दावा किया है कि तीन तेल टैंकरों ने पहले दी गई चेतावनियों का उल्लंघन किया था, जिसके बाद उन्हें बलपूर्वक रोक दिया गया।घटनाक्रम (Event)स्थान (Location)मुख्य विवरण (Details)संयुक्त एयरस्ट्राइकपूर्वी इराकअमेरिका व सऊदी अरब द्वारा हथियारों और सैन्य लॉजिस्टिक्स डिपो पर हमलामिसाइल हमलाजॉर्डन (US बेस)ईरान समर्थित समूहों द्वारा दागी गई मिसाइलें हवा में ध्वस्ततेल टैंकर जब्तीस्ट्रेट ऑफ होर्मुजIRGC ने चेतावनी उल्लंघन का हवाला देकर 3 टैंकरों को रोकाशिपिंग कंपनियों ने बदले रूट, नौसैनिक बेड़े मुस्तैदखाड़ी क्षेत्र में बढ़ते सैन्य टकराव को देखते हुए कई प्रमुख अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों ने अलर्ट जारी कर दिया है।मार्ग में बदलाव: कंपनियों ने जोखिम वाले समुद्री रास्तों के बजाय लंबे और सुरक्षित विकल्पों की समीक्षा शुरू कर दी है।सुरक्षा में इजाफा: कमर्शियल जहाजों पर अतिरिक्त निजी सुरक्षा गार्ड्स की तैनाती की जा रही है और बीमा (Insurance) कवर की समीक्षा की जा रही है।अमेरिकी नौसैनिक मौजूदगी: फिलहाल क्षेत्र में अमेरिका के 20 से ज्यादा युद्धपोत और नौसैनिक जहाज गश्त कर रहे हैं, जो ईरान के आसपास समुद्री नाकेबंदी अभियानों में शामिल हैं।CENTCOM ने कड़ा संदेश देते हुए कहा है कि फरवरी से अप्रैल 2026 के दौरान इराक में अमेरिकी ठिकानों पर 600 से ज्यादा हमलों के प्रयासों में ईरान समर्थित समूहों का हाथ रहा है। यदि ये समूह अपनी भड़काऊ गतिविधियां बंद नहीं करते हैं, तो अमेरिका और उसके सहयोगी देश आगे भी कठोर सैन्य कदम उठाने से पीछे नहीं हटेंगे।
व्हाइट हाउस में डिप्लोमैटिक ड्रामा: ट्रंप से मिले जेलेंस्की और नेतन्याहू
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ अलग-अलग बैठकें कीं
ओवल ऑफिस में ट्रंप और जेलेंस्की की बैठक, पैट्रियट सिस्टम और कूटनीति पर हुई बातचीत
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने मंगलवार को ओवल ऑफिस में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात की। जेलेंस्की ने बताया कि इस दौरान यूक्रेन की सुरक्षा, शांति की कोशिशों और आगे की कूटनीतिक बातचीत को लेकर कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की
यूक्रेन बंदरगाह पर फंसे भारतीय: ड्रोन और मिसाइल हमलों का खतरा
यूक्रेन के चोर्नोमोर्स्क बंदरगाह पर खड़े मालवाहक जहाज एमवी अमीर-1 पर सवार 13 भारतीय नाविकों सहित कुल 15 सदस्य लगातार ड्रोन और मिसाइल हमलों के बीच फंसे हुए हैं
जापान में भूकंप पीड़ितों के प्रति विदेश मंत्री ने जताई संवेदना, मदद और एकजुटता का दिया भरोसा
विदेश मंत्री (ईएएम) एस. जयशंकर ने जापान के कुमामोटो प्रांत में आए भूकंप की खबर पर चिंता जताई।
जापान के कुमामोटो प्रांत के काशिमा टाउन में एक बड़े शॉपिंग सेंटर में विस्फोट हुआ। इस घटना में कई लोग फंस गए और कई घायल हो गए। जापान के सरकारी प्रसारक एनएचके ने यह जानकारी दी।
अमेरिका से मुआवजा लेने वाले जहाजों को होर्मुज से निकलने की अनुमति नहीं : ईरान
ईरान की सरकारी प्रसारक आईआरआईबी के मुताबिक, ईरान के मुख्य सैन्य कमान, खात्म अल-अंबिया सेंट्रल हेडक्वार्टर्स ने कहा कि जो भी देश या कंपनी ईरान की फ्रीज की गई संपत्तियों से मुआवजा स्वीकार करेगी
Hong Kong, July 28, 2026:The R|Elan™ Circular Design Challenge (RCDC) – India’s leading platform for circular innovation in fashion and textiles, presented by Reliance Industries Ltd.’s R|Elan™, the United Nations in India and Lakm Fashion Week – announced its distinguished APAC Jury, which convened to evaluate this year’s cohort of pioneering circular design innovations. Bringing ... Read more
शी चिनफिंग ने स्लोवाकिया के राष्ट्रपति से बातचीत की
चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने पेइचिंग के जन वृहद भवन में चीनी की यात्रा पर आए स्लोवाकिया के राष्ट्रपति पीटर पेलेग्रिनी से बातचीत की।
भारत के बिहार राज्य की सीमा से सटे नेपाल के कोशी प्रांत स्थित सुनसरी जिले में अचानक उपजे सांप्रदायिक तनाव के बाद हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं। जिले के देवानगंज ग्रामीण नगरपालिका-3 के कप्तानगंज इलाके में दो समुदायों के बीच शुरू हुआ आपसी विवाद देखते ही देखते हिंसक झड़प में बदल गया। स्थिति पर काबू पाने और भीड़ को तितर-बितर करने के लिए सुरक्षा बलों को कार्रवाई करनी पड़ी, जिसमें गोली लगने से एक 24 वर्षीय युवक की मौत हो गई, जबकि पुलिसकर्मियों समेत एक दर्जन से अधिक लोग घायल हो गए। घटना के बाद से पूरे इलाके में तनाव है और प्रशासन ने एहतियात के तौर पर जिले के पांच प्रमुख बाजार क्षेत्रों में अनिश्चितकालीन कर्फ्यू लागू कर दिया है।लाउडस्पीकर और धार्मिक झंडों को लेकर शुरू हुआ था विवादप्राप्त जानकारी के अनुसार, हिंसा की शुरुआत देवानगंज-3 के कप्तानगंज बाजार इलाके से हुई। रविवार देर रात वहां दो अलग-अलग धार्मिक समूहों के लोग अपने-अपने कार्यक्रमों में शामिल थे। एक तरफ तीर्थयात्रा जुलूस के दौरान डीजे और लाउडस्पीकर का तेज आवाज में इस्तेमाल किया जा रहा था, जिस पर दूसरे पक्ष ने आपत्ति जताई। इसके अलावा क्षेत्र में लगे बिजली के खंभों पर धार्मिक झंडे हटाने और लगाने को लेकर भी कहासुनी शुरू हुई। मामूली बहस से शुरू हुआ यह विवाद जल्द ही पत्थरबाजी, आगजनी और तोड़फोड़ में बदल गया। उग्र भीड़ ने कई दुकानों, वाहनों और संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया, जिससे अफरा-तफरी मच गई।पुलिस कार्रवाई में युवक की मौत, दर्जनों घायलउपद्रवियों को नियंत्रित करने के लिए मौके पर पहुंची पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल (APF) ने पहले आंसू गैस के गोले छोड़े और चेतावनी के तौर पर हवाई फायरिंग की। हालांकि, जब स्थिति और बिगड़ने लगी तो सुरक्षा बलों को सीधी गोलीबारी करनी पड़ी। इस दौरान कप्तानगंज निवासी 24 वर्षीय ओम प्रकाश मेहता को गोली लगी और उनकी मौत हो गई। इस हिंसक झड़प और पुलिस कार्रवाई के दौरान थाना प्रभारी (इंस्पेक्टर) समेत करीब 10 से अधिक सुरक्षाकर्मी और कई स्थानीय लोग घायल हुए हैं, जिन्हें इलाज के लिए नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया गया है।इन 5 प्रमुख इलाकों में लागू हैं कड़े प्रतिबंधतनावपूर्ण स्थिति को देखते हुए जिला प्रशासन अधिकारी ईश्वरी प्रसाद अर्याल ने धारा 6(क) के तहत निषेधाज्ञा और अनिश्चितकालीन कर्फ्यू का आदेश जारी किया। वर्तमान में सुनसरी के निम्नलिखित क्षेत्रों में यह पाबंदियां प्रभावी हैं:हरिनगरा बाजारभुटाहा बाजारकप्तानगंज बाजारघुस्की बाजारदेवानगंज बाजारकर्फ्यू के तहत 4 या उससे अधिक लोगों के एक जगह इकट्ठा होने, किसी भी तरह की रैली, जुलूस, विरोध-प्रदर्शन या सार्वजनिक सभा आयोजित करने पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है। इसके अलावा धार्मिक, सामाजिक व सांस्कृतिक आयोजनों में डीजे (DJ) और लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। सुनसरी में हुई हिंसा के बाद पड़ोसी जिले मोरंग में भी एहतियात के तौर पर डीजे साउंड सिस्टम पर बैन लगा दिया गया है।राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया और निष्पक्ष जांच की मांगप्रशासनिक स्तर पर शांति बहाली के प्रयास जारी हैं। जिला अधिकारी ने राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों और नागरिक समाज के सदस्यों के साथ बैठक कर सौहार्द्र बनाने की अपील की है। वहीं, नेपाल की सत्तारूढ़ राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) के अध्यक्ष रवि लामिछाने ने इस पूरी घटना पर दुख व्यक्त करते हुए मामले की निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। उन्होंने कहा कि घटना के दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए, मृतक के परिजनों को उचित मुआवजा दिया जाए और सभी घायलों का मुफ्त इलाज सुनिश्चित किया जाए। भारत-नेपाल सीमा से सटे इलाकों में सुरक्षा बलों द्वारा गश्त बढ़ा दी गई है ताकि किसी भी तरह की अफवाह या अप्रिय घटना को रोका जा सके।
ट्रंप से मिलेंगे जेलेंस्की और नेतन्याहू, यूक्रेन युद्ध और ईरान संकट पर होगी अहम बातचीत
यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ऐसे समय ट्रंप से मुलाकात कर रहे हैं, जब रूस की ओर से यूक्रेन के कई इलाकों में लगातार मिसाइल और ड्रोन हमले किए जा रहे हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, जेलेंस्की इस बैठक में अमेरिका से पैट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम और उसके उत्पादन में सहयोग की मांग कर सकते हैं।
करीब एक सप्ताहभर लगातार गतिरोध के बाद मंगलवार को लोकसभा में आखिरकार नीट पेपर लीक और लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 पर चर्चा शुरू हुई। हालांकि चर्चा के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखे आरोप-प्रत्यारोप, तंज और नोकझोंक का दौर चलता रहा। सुबह 11 बजे लोकसभा की कार्यवाही शुरू होते ही विपक्षी सांसदों ने आंदोलनकारी छात्रों पर कथित पुलिस कार्रवाई का मुद्दा उठाया। नारेबाजी के कारण सदन की कार्यवाही पहले दोपहर 2 बजे तक स्थगित करनी पड़ी। इससे पहले सरकार और विपक्ष के बीच चर्चा की अवधि को लेकर सहमति बनी। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि पहले छह घंटे की चर्चा तय हुई थी, फिर इसे 8 घंटे किया गया और यदि विपक्ष चाहे तो सरकार 10 घंटे तक चर्चा कराने को भी तैयार है। जितेंद्र सिंह ने बताया क्यों जरूरी है नया कानून दोपहर 2 बजे सदन की कार्यवाही शुरू होते ही प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह ने लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 पर चर्चा की शुरुआत की। उन्होंने कहा कि 2024 के कानून को और प्रभावी बनाने के लिए संशोधन लाया गया है ताकि संगठित परीक्षा माफिया पर तेजी से कार्रवाई हो सके। गौरव गोगोई ने पूछा- दो साल पहले वाला कानून क्यों फेल हुआ? सरकार की दलीलों का जवाब देते हुए कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने कहा कि 2024 में भी सरकार ने इसी तरह दावा किया था कि अब पेपर लीक नहीं होगा, लेकिन 2026 में फिर नीट परीक्षा लीक हो गई। उन्होंने कहा कि यदि पिछला कानून प्रभावी था तो नया संशोधन लाने की जरूरत क्यों पड़ी। गोगोई ने कहा कि 2024 के मामले में गिरफ्तार अधिकांश आरोपियों को जमानत मिल चुकी है और जिस व्यक्ति को मास्टरमाइंड बताया गया, वह लंबे समय तक फरार रहा। उन्होंने सरकार से पूछा कि राधाकृष्णन समिति की सिफारिशों का क्या हुआ और एनटीए की जवाबदेही तय क्यों नहीं की गई। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि शिक्षा व्यवस्था सुधारने के बजाय सरकार युवाओं की चिंताओं को हल्के में ले रही है। साथ ही पूर्व शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के संसद पहुंचने पर भाजपा सांसदों द्वारा किए गए स्वागत पर भी उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि उनका स्वागत ऐसे किया गया, जैसे वे ‘पाकिस्तान से युद्ध जीतकर लौटे हों।’ बांसुरी स्वराज ने कहा- यह बिल समय की जरूरत भाजपा सांसद बांसुरी स्वराज ने संशोधन विधेयक का समर्थन करते हुए कहा कि परीक्षा माफिया अब संगठित अपराध का रूप ले चुका है और मौजूदा कानून को अधिक कठोर बनाने की आवश्यकता थी। उन्होंने कहा कि संशोधन जांच एजेंसियों के अधिकार स्पष्ट करता है, जांच और ट्रायल को समयबद्ध बनाता है तथा परीक्षा प्रणाली में विश्वास बहाल करेगा। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल की सराहना करते हुए कहा कि सरकार ने समय रहते कानून को और मजबूत किया है। अखिलेश यादव का तंज- झुकती है सरकार... झुकाने वाला चाहिए समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि छात्रों के आंदोलन ने सरकार को झुकने पर मजबूर किया। उन्होंने कहा, सरकार झुकती है सरकार... झुकाने वाला चाहिए। उन्होंने दावा किया कि करोड़ों युवाओं के दबाव के कारण ही धर्मेंद्र प्रधान को पद छोड़ना पड़ा। अखिलेश ने सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि 2024 में भी ऐसा ही कानून लाया गया था, लेकिन उसके बावजूद पेपर लीक नहीं रुके। उन्होंने तंज करते हुए कहा, ‘जो लोग चढ़ावा नहीं बचा सके, वे पेपर लीक कैसे बचाएंगे?’ उन्होंने आरोप लगाया कि अनेक परीक्षाएं रद्द करनी पड़ीं और छात्रों को न्याय के लिए अदालतों का दरवाजा खटखटाना पड़ा। अभिषेक बनर्जी बोले- कानून बदलने से भरोसा नहीं लौटेगा तृणमूल कांग्रेस सांसद अभिषेक बनर्जी ने कहा कि निष्पक्ष परीक्षा हर छात्र का अधिकार है। उन्होंने आरोप लगाया कि जब भी व्यवस्था विफल होती है तो सरकार नई समिति या नया कानून लेकर आ जाती है, लेकिन जवाबदेही तय नहीं करती। उनके भाषण के दौरान सत्ता पक्ष के सांसदों ने आपत्ति जताई, जिससे सदन में कुछ देर के लिए फिर शोर-शराबा हुआ। प्रियंका गांधी ने पूछा- पैलेट गन चलाने का आदेश किसने दिया? चर्चा के दौरान कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने छात्रों पर हुई कथित पुलिस कार्रवाई का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि घायल छात्रा की मां ने उनसे पूछा कि उसकी बेटी पर यह अत्याचार क्यों हुआ। प्रियंका ने सरकार से सवाल किया, ‘देश के युवाओं पर पैलेट गन चलाने का आदेश किसने दिया? बच्चों पर लाठियां किसके आदेश पर चलाई गईं?’ उन्होंने कहा कि यह सवाल सिर्फ कांग्रेस नहीं बल्कि देश के छात्र, अभिभावक और शिक्षक पूछ रहे हैं। प्रियंका ने नए शिक्षा मंत्री की नियुक्ति पर टिप्पणी करते हुए बिलकिस बानो मामले का जिक्र किया। इस पर भाजपा सांसदों ने कड़ा विरोध किया और उनसे माफी मांगने की मांग की। संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने कहा कि किसी मंत्री पर इस तरह की व्यक्तिगत टिप्पणी उचित नहीं है और वरिष्ठ सांसद होने के नाते प्रियंका गांधी को जिम्मेदारी के साथ बोलना चाहिए। इसके बाद सदन में कुछ समय तक तीखी नोकझोंक होती रही। प्रियंका ने कहा प्रधानमंत्री कैमरे का नहीं, दिल का एंगल बदलें, तभी छात्रों की समस्या का समाधान होगा। राज्यसभा में भी हंगामा उधर, राज्यसभा की कार्यवाही भी सुबह 11 बजे शुरू हुई। शून्यकाल के दौरान विपक्षी सांसदों ने छात्रों पर पुलिस कार्रवाई और गृहमंत्री के बयान की मांग को लेकर हंगामा किया। लगातार शोर-शराबे के कारण सभापति सीपी राधाकृष्णन ने सदन की कार्यवाही पहले दोपहर 2 बजे तक स्थगित कर दी। दोबारा कार्यवाही शुरू होने पर उपसभापति हरिवंश ने सदन चलाने की कोशिश की, लेकिन हंगामा जारी रहने पर कार्यवाही अगले दिन सुबह 11 बजे तक के लिए स्थगित कर दी गई। वीडियो देखने के लिए ऊपर थंबनेल पर क्लिक करें…
साल 2026 के शुरुआती 7 महीने वैश्विक स्तर पर युद्ध, आर्थिक अनिश्चितता, महंगाई और राजनीतिक हलचलों से भरे रहे हैं। अब साल के बाकी बचे 5 महीनों में देश और दुनिया की स्थिति कैसी रहेगी, इस पर शनि की उल्टी यानी वक्री चाल का बड़ा असर पड़ने वाला है। देश के जाने-माने ज्योतिषाचार्य डॉ. अजय भाम्बी के अनुसार, शनि 11 दिसंबर 2026 तक वक्री अवस्था में ही रहेंगे। इसका सीधा अर्थ यह है कि इस साल के अंत तक जारी वैश्विक व राष्ट्रीय समस्याओं का कोई स्थाई हल निकलता नहीं दिख रहा है, और स्थितियों में सकारात्मक बदलाव या राहत साल 2027 की शुरुआत से ही संभव हो सकेगी।वैश्विक युद्ध और ट्रंप की शांति वार्ता: चर्चाएं तो होंगी, लेकिन नतीजे रहेंगे बेअसरअंतरराष्ट्रीय पटल की बात करें तो मध्य पूर्व में ईरान का अमेरिका व इजरायल के साथ जारी तनाव और यूरोप में जारी रूस-यूक्रेन युद्ध पर इस दौरान बातचीत के कई दौर चलेंगे, लेकिन किसी ठोस नतीजे पर पहुंचना लगभग नामुमकिन रहेगा। ज्योतिषाचार्य डॉ. अजय भाम्बी के अनुसार, शनि की वक्री चाल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को युद्ध रोकने और कूटनीतिक समझौतों पर विचार करने के लिए मजबूर जरूर कर सकती है, परंतु इन वार्ताओं का कोई निर्णायक निष्कर्ष 2026 में नहीं निकलेगा। वहीं यूरोपीय देश ठंड बढ़ने के कारण रूस-यूक्रेन युद्ध को रोकने का प्रयास करेंगे, लेकिन वहां भी सफलता की संभावना कम है। यानी साल 2026 में भारत समेत पूरी दुनिया को युद्धों के सामाजिक और आर्थिक दुष्प्रभाव झेलते रहने पड़ेंगे।छात्र आंदोलन केवल थमा है: 2026 के अंत या 2027 की शुरुआत में फिर भड़क सकती है चिंगारीहाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए जिस उग्र छात्र आंदोलन ने शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देने पर मजबूर किया, वह मामला भले ही इस वक्त शांत होता दिख रहा हो, लेकिन ज्योतिषीय गणनाओं के मुताबिक यह शांति केवल कुछ समय की है। वक्री शनि के प्रभाव के कारण अगले 4-5 महीनों तक छात्र शांत रहकर सरकार के कदमों का जायजा लेंगे। इस दौरान सरकार डैमेज कंट्रोल करने की पूरी कोशिश करेगी और इसमें काफी हद तक सफल भी रहेगी। हालांकि, यह आंदोलन समाप्त नहीं हुआ है बल्कि केवल 'पॉज' हुआ है। साल 2026 के अंत या 2027 की शुरुआत में युवा वर्ग एक बार फिर सड़कों पर उतर सकता है।सोने-चांदी की कीमतों में फिर आएगा उछाल, कच्चे तेल का संकट भी बना रहेगाआर्थिक क्षेत्र और कमोडिटी बाजार पर भी वक्री शनि की चाल का व्यापक प्रभाव देखने को मिलेगा। साल 2026 की शुरुआत में रिकॉर्ड ऊंचाई छूने के बाद सोने और चांदी के दामों में जो गिरावट आई थी, वह अब फिर से तेजी में बदल सकती है। तुलनात्मक रूप से चांदी के मुकाबले सोने की कीमतों में बढ़ोतरी होने की अधिक संभावना है। इसके अलावा, जारी युद्धों के कारण कच्चे तेल और गैस की उपलब्धता का मुद्दा बना रहेगा। हालांकि, पहले की तरह ईंधन की बहुत भारी किल्लत नहीं होगी, लेकिन इस ऊर्जा संकट के पूरी तरह समाप्त होने की उम्मीद भी अभी नहीं की जा सकती।
देशभर के पेट्रोल पंपों पर बेचे जा रहे 20 प्रतिशत इथेनॉल मिले (E20) पेट्रोल को लेकर जारी विवाद अब कानूनी लड़ाई में बदल गया है। गाड़ियों में आ रही तकनीकी खराबी और माइलेज घटने की शिकायतों के बीच सोशल मीडिया पर कई एआई-जनरेटेड (AI) और डीपफेक वीडियो वायरल हो रहे थे, जिनमें केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी और उनके परिवार को इस नीति से आर्थिक लाभ मिलने का दावा किया जा रहा था। इन भ्रामक और मानहानिकारक दावों पर कड़ा रुख अपनाते हुए गडकरी ने बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।बॉम्बे हाईकोर्ट ने दी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ कार्रवाई की मंजूरीमामले की गंभीरता को देखते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अभय आहूजा ने नितिन गडकरी को मेटा (Meta), गूगल (Google), एक्स (X) और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ दीवानी मुकदमा (Civil Suit) दायर करने की इजाजत दे दी है। याचिका में मांग की गई है कि अदालत सोशल मीडिया कंपनियों को निर्देश दे कि वे केंद्रीय मंत्री और उनके परिवार के खिलाफ बनाए गए सभी फर्जी, मनगढ़ंत और एआई-जनरेटेड वीडियो को तुरंत हटाए। गडकरी के वकील ने कोर्ट को बताया कि इंटरनेट पर बड़े पैमाने पर उनके व्यक्तित्व अधिकारों (Personality Rights) का हनन किया जा रहा है।'E20 नीति पेट्रोलियम मंत्रालय की, सड़क परिवहन मंत्रालय का इससे संबंध नहीं'हाईकोर्ट में दाखिल याचिका और नागपुर स्थित उनके कार्यालय द्वारा जारी बयान में स्थिति पूरी तरह स्पष्ट की गई है। गडकरी ने बताया कि इथेनॉल ब्लेंडिंग (E20) प्रोग्राम पूरी तरह से 'केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय' के अधिकार क्षेत्र में आता है, न कि उनके सड़क परिवहन मंत्रालय के अंतर्गत। उन्होंने साफ किया कि इथेनॉल ब्लेंडिंग को चरणबद्ध तरीके से लागू करने का फैसला पूरी केंद्रीय कैबिनेट का सामूहिक निर्णय था। इस पूरी नीति या इसके कार्यान्वयन से उनका या उनके परिवार का कोई व्यक्तिगत या वित्तीय लेना-देना नहीं है।स्वस्थ बहस का स्वागत, लेकिन चरित्र हनन बर्दाश्त नहींकेंद्रीय मंत्री की कानूनी टीम ने कोर्ट के समक्ष यह बात दोहराई कि इस याचिका का मकसद जनता को किसी नीति पर निष्पक्ष चर्चा, आलोचना या बहस करने से रोकना बिल्कुल नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में नीतिगत समीक्षा का हर नागरिक को हक है, लेकिन एआई तकनीक का गलत इस्तेमाल करके फर्जी तथ्य गढ़ना और किसी की छवि को धूमिल करना कानूनी रूप से अपराध है। कोर्ट इस मामले में जल्द ही अगली सुनवाई कर आपत्तिजनक कंटेंट को ब्लॉक करने के आदेश जारी कर सकता है।
छुट्टियों में होटल समझकर महिला ने 'जेल' के पेज पर ठोका मैसेज, फिर जेल स्टाफ का जवाब पढ़कर उड़ गए होश
छुट्टियों के दौरान किसी खूबसूरत हिल स्टेशन पर जाना और ऑनलाइन कमरा तलाशना बेहद आम बात है, लेकिन जरा सोचिए कि आप जिस जगह को लग्जरी रिसॉर्ट या होमस्टे समझकर बुकिंग की बात कर रहे हों, वह असल में कोई होटल नहीं बल्कि 'महिला जेल' निकले! ऐसा ही एक बेहद अतरंगी और मजेदार वाकया फिलीपींस के मशहूर टूरिस्ट डेस्टिनेशन बगुइओ (Baguio) शहर में सामने आया है। यहां एक महिला पर्यटक वीकेंड की छुट्टियां बिताने की प्लानिंग कर रही थी। इंटरनेट पर ठहरने की सस्ती और बेहतर जगह खोजते-खोजते उसकी नजर 'बगुइओ सिटी जेल फीमेल डॉरमेट्री' (Baguio City Jail Female Dormitory) के सोशल मीडिया पेज पर पड़ी। नाम में 'डॉरमेट्री' शब्द देखकर महिला को लगा कि यह कोई हॉस्टल या बैकपैकर्स होमस्टे है। फिर क्या था, उसने बिना सोचे-समझे सीधे पेज के इनबॉक्स में मैसेज दाग दिया— नमस्ते! क्या आने वाले वीकेंड के लिए आपके पास कोई कमरा खाली है?जेल स्टाफ का कूल रिप्लाई: 'मैडम! यहां कमरे नहीं, सीधे सलाखें मिलती हैं'जैसे ही यह मैसेज आधिकारिक पेज के इनबॉक्स में पहुंचा, स्क्रीन की दूसरी तरफ मौजूद जेल के कर्मचारियों का सिर चकरा गया। हालांकि, स्टाफ ने बिना किसी गुस्से के बेहद शालीन और चुटीले अंदाज में पर्यटक की यह बहुत बड़ी गफलत दूर कर दी। जेल प्रशासन की तरफ से जवाब आया— मैडम, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद! लेकिन आपकी जानकारी के लिए बता दें कि यह रुकने के लिए कोई होटल, होमस्टे या रिसॉर्ट नहीं है... यह महिलाओं की जेल (Female Jail) है! यह रिप्लाई पढ़ते ही उस महिला पर्यटक के पैर तले जमीन खिसक गई। उसे अपनी भारी गलती का अहसास हुआ और उसने तुरंत जेल कर्मचारियों से अपनी इस गफलत के लिए माफी मांगी।जेल प्रशासन ने शेयर की चैट, सोशल मीडिया पर आ गई मीम्स और चुटकुलों की बाढ़इस पूरे मजेदार वाकये को छिपाने के बजाय ब्यूरो ऑफ जेल मैनेजमेंट एंड पेनोलॉजी (BJMP) ने उस पर्यटक की सहमति से इस चैट का स्क्रीनशॉट अपने आधिकारिक फेसबुक पेज पर शेयर कर दिया। पोस्ट के साथ उन्होंने एक हल्का-फुल्का कैप्शन लिखा कि 'हमारा मुख्य काम कैदियों का पुनर्वास और सुधार करना है, पर्यटकों को छुट्टियां बिताना नहीं! हालांकि, हम यह भरोसा दिला सकते हैं कि हमारी जेलें किसी भी होटल की तरह ही साफ-सुथरी और पूरी तरह सुरक्षित हैं।' जैसे ही यह चैट वायरल हुई, सोशल मीडिया यूजर्स ने कमेंट सेक्शन में मीम्स की झड़ी लगा दी। एक यूजर ने लिखा कि 'अरे वाह! यहां तो फ्री यूनिफॉर्म के साथ तीनों समय का मुफ्त खाना भी मिलेगा।' वहीं दूसरे ने चुटकी ली कि 'होटल वाले भले रिप्लाई न दें, लेकिन जेल स्टाफ ने तुरंत सर्विस दी।' तीसरे यूजर ने लिखा कि '24 घंटे सिक्योरिटी और फ्री खाना, ऐसी जगह तो 5-स्टार होटल में भी नहीं मिलती!'क्यों हुई यह गफलत? जानिए बगुइओ शहर के इस चर्चित पते का पूरा सचआपको बता दें कि यह बहुचर्चित महिला जेल बगुइओ शहर के मुख्य इलाके में पुलिस हेडक्वार्टर और सिटी हॉल के ठीक सामने अबानाओ रोड (Abanao Road) पर स्थित है। चूंकि इसका नाम 'डॉरमेट्री' पर खत्म होता है, इसलिए बाहर से आने वाले पर्यटकों को अक्सर इसके नाम से भ्रम हो जाता है। हालांकि, पर्यटक की इस मासूम सी भूल और उस पर जेल अधिकारियों के हाजिरजवाबी वाले रिप्लाई ने इस मामले को फिलीपींस का सबसे बड़ा वायरल टॉपिक बना दिया है।
दक्षिणी जापान में मंगलवार दोपहर को प्रकृति का भीषण रूप देखने को मिला, जब पूरे क्यूशू (Kyushu) क्षेत्र में एक साथ शक्तिशाली और बेहद तेज भूकंप के झटके महसूस किए गए। रिक्टर स्केल पर 7.1 की विनाशकारी तीव्रता वाले इस भूकंप का केंद्र क्यूशू द्वीप का कुमामोटो (Kumamoto) प्रीफेक्चर और उसके आसपास का इलाका रहा। अचानक आई इस कुदरती आफत से कुछ ही पलों के लिए अफरा-तफरी का माहौल बन गया। इमारतों में तेज कंपन के तुरंत बाद जापानी मौसम विज्ञान एजेंसी (JMA) ने मुस्तैदी दिखाते हुए तटीय इलाकों के लिए आपातकालीन सुनामी अलर्ट जारी कर दिया है।जापानी तीव्रता पैमाने पर खतरे का सबसे उच्चतम स्तर 'शिंदो 7' दर्जजापान के अपने सीस्मोलॉजिकल पैमाने, जिसे 'शिंदो स्केल' (Shindo Scale) कहा जाता है, उस पर इस भूकंप की तीव्रता को सबसे खतरनाक यानी 'लेवल 7' पर मापा गया है। जापानी पैमानों में शिंदो 7 को तबाही का चरम स्तर माना जाता है, जिसमें जमीन इतनी तेजी से हिलती है कि मजबूत से मजबूत इमारतों के गिरने, सड़कों के फटने और बुनियादी ढांचे को बड़ा नुकसान पहुंचने का खतरा बहुत अधिक बढ़ जाता है। इस तीव्र झटके ने कुमामोटो और आसपास के जिलों की जीवनशैली को पूरी तरह थाम दिया है।अरियाके और यात्सुशिरो तटीय क्षेत्रों में सुनामी का अलर्ट: नागरिकों के लिए 3 बड़े निर्देशभूकंप के कुछ ही मिनटों के भीतर मौसम एजेंसी ने अरियाके समुद्र (Ariake Sea) और यात्सुशिरो समुद्र (Yatsushiro Sea) से लगे तटीय इलाकों के लिए 1 मीटर (लगभग 3 फीट) तक ऊंची खतरनाक सुनामी लहरें उठने की आशंका जताई है। स्थिति की गंभीरता और मानवीय जीवन की सुरक्षा को देखते हुए स्थानीय प्रशासन ने तटीय निवासियों के लिए तत्काल 3 सूत्री आपातकालीन निर्देश जारी किए हैं:तटीय इलाकों से दूरी: समुद्र तटों, तटीय सड़कों और नदियों के मुहाने के आसपास मौजूद लोग बिना एक पल गंवाए तुरंत वहां से दूर हट जाएं।ऊंचे स्थानों पर शरण: निचले और मैदानी इलाकों में रहने वाले नागरिक तुरंत सुरक्षित व ऊंचाई पर स्थित शरण स्थलों की ओर प्रस्थान करें।सावधानी बरतें: जब तक मौसम एजेंसी की ओर से आधिकारिक रूप से चेतावनी वापस न ले ली जाए, तब तक समुद्र या पानी के स्रोतों के पास जाने की भूल बिल्कुल न करें।हाई अलर्ट पर राहत और बचाव एजेंसियां: आफ्टरशॉक्स का बढ़ा खतराकुमामोटो प्रीफेक्चर समेत पूरे क्यूशू क्षेत्र में आपदा प्रबंधन, दमकल विभाग और आपातकालीन राहत टीमों को हाई अलर्ट मोड पर तैनात कर दिया गया है। प्रांतीय अधिकारी और पुलिस बल प्रभावित इलाकों में जान-माल के नुकसान और प्रभावित ढांचों का तेजी से आकलन कर रहे हैं। इसके साथ ही, विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि मुख्य भूकंप के बाद अगले कुछ घंटों या दिनों में तेज आफ्टरशॉक्स (भूकंप के बाद के झटके) आ सकते हैं। इसी आशंका को देखते हुए स्थानीय प्रशासन ने सभी नागरिकों से पूरी तरह सतर्क, सुरक्षित और शांत रहने की अपील की है।
वाटरफोर्ड टाउनशिप जाते समय राष्ट्रपति विमान 'एयर फोर्स वन' में संवाददाताओं से बात करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा खुलासा किया है। ट्रंप ने दावा किया कि तेहरान की ओर से सीधी अपील और शांति वार्ता की पेशकश के बाद अमेरिका ने ईरान पर जारी अपनी सैन्य कार्रवाई को फिलहाल रोक दिया है। ट्रंप के मुताबिक, ईरान ने अमेरिकी प्रशासन से संपर्क कर कहा कि 'कृपया रुकिए, आइए मिलकर बात करते हैं।' राष्ट्रपति ने इसे दोनों देशों के बीच तनाव कम करने का एक बड़ा कूटनीतिक मौका बताया है। हालांकि, उन्होंने सख्त लहजे में चेतावनी भी दी कि अगर बातचीत किसी सहमति पर नहीं पहुंचती है, तो अमेरिका फिर से उसी आक्रामक स्थिति में लौट आएगा और हमले दोबारा शुरू कर दिए जाएंगे।2 हफ्तों की भारी बमबारी के बाद शुरू हुआ बातचीत का दौरगौरतलब है कि बीते 2 हफ्तों से ईरान के प्रमुख सैन्य ठिकानों और बुनियादी ढांचों पर अमेरिका की ओर से भीषण हवाई हमले किए जा रहे थे, जिससे वहां भारी नुकसान हुआ है। अब हमले रोकने के बाद ट्रंप प्रशासन आगे की रणनीति का आकलन कर रहा है। ट्रंप का कहना है कि दोनों देश इस समय सीधे तौर पर और मध्यस्थों के जरिए बातचीत की टेबल पर हैं। उन्होंने दावा किया कि ईरान की ओर से मुलाकात की गुहार केवल इसलिए आई है क्योंकि अमेरिकी सैन्य अभियानों ने उन्हें भारी नुकसान पहुंचाया है। ट्रंप के अनुसार, अगर युद्ध में अमेरिकी सेना का प्रदर्शन कमजोर रहता, तो तेहरान कभी भी मुलाकात का अनुरोध नहीं करता।पैट्रियट मिसाइलों की कमी पर बाइडन पर साधा निशाना, कहा- 'हथियारों का उत्पादन जारी'पत्रकारों द्वारा अमेरिकी सेना के पास मिसाइल इंटरसेप्टर और गोला-बारूद के घटते भंडार को लेकर पूछे गए सवाल पर ट्रंप ने स्पष्ट किया कि देश के पास अपनी सुरक्षा के लिए पर्याप्त संसाधन मौजूद हैं। इसके साथ ही उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन के कार्यकाल की आलोचना करते हुए कहा कि यूक्रेन को बड़े पैमाने पर हथियार भेजने के कारण अमेरिकी रक्षा भंडार प्रभावित हुआ था। हालांकि, ट्रंप ने भरोसा जताया कि अब अमेरिका में पैट्रियट (Patriot) मिसाइलों और मध्यम दूरी के रक्षा हथियारों का निर्माण युद्ध स्तर पर किया जा रहा है और देश में हथियारों की कोई कमी नहीं होने दी जाएगी।जेडी वेंस और सेंटकॉम की सलाह पर रुके हमले? पर्दे के पीछे का सचहालांकि ट्रंप बातचीत की पहल का श्रेय अपनी सैन्य ताकत को दे रहे हैं, लेकिन अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों में कुछ अंदरूनी रणनीतिक कारण भी सामने आए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के अध्यक्ष जनरल डैन केन ने राष्ट्रपति के साथ बैठक में गोला-बारूद के कम होते स्टॉक और युद्ध के विस्तार पर चिंता व्यक्त की थी। इसके अलावा, अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के प्रमुख एडमिरल ब्रैड कूपर ने भी व्हाइट हाउस को सलाह दी थी कि होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के आसपास बीते दो हफ्तों से चल रहा बमबारी अभियान अपनी प्रभावशीलता की सीमा तक पहुंच चुका है। कई सैन्य कमांडरों और सिविल थिंक टैंकों की इसी रणनीतिक सलाह के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने हमलों को रोकने का आदेश जारी किया।
इन दिनों सोशल मीडिया पर भारत की यात्रा करने वाले या यहां रहने वाले विदेशी कंटेंट क्रिएटर्स के अनुभव काफी पसंद किए जा रहे हैं। इसी सिलसिले में भारत में रह रहीं अमेरिकी नागरिक मेसी गोंसाल्वेज (Macy Gonsalvez) का एक नया वीडियो सोशल मीडिया पर खूब धूम मचा रहा है। मेसी ने अपने इंस्टाग्राम हैंडल से एक रील शेयर करते हुए भारत की ऐसी 5 मुख्य बातों का जिक्र किया है, जो उनके अमेरिकी लाइफस्टाइल से बिल्कुल अलग थीं और जिन्हें देखकर वह पूरी तरह हैरान रह गईं।प्रेग्नेंसी में बच्चे का जेंडर रिवील बैन: कानून देखकर रह गईं हैरानमेसी ने अपनी लिस्ट में सबसे ऊपर भारत के एक सख्त कानून का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि अमेरिका में बच्चे के जन्म से पहले उसका लिंग (Gender) पता करना और 'जेंडर रिवील पार्टी' रखना एक बेहद सामान्य बात है। लेकिन भारत में गर्भावस्था के दौरान भ्रूण का लिंग जांचना पूरी तरह गैरकानूनी है। मेसी के मुताबिक, शुरुआत में जब उन्हें इस नियम के बारे में पता चला तो वे चौंक गईं, क्योंकि अमेरिका की तुलना में यह कानून और सामाजिक व्यवस्था उनके लिए बिल्कुल नई थी।'रात 9:30 बजे सोने की आदत और यहां 9 बजे बनता है प्लान'अमेरिका और भारत की दिनचर्या में बड़ा अंतर बताते हुए मेसी ने भारत की लेट-नाइट लाइफस्टाइल पर बात की। उन्होंने कहा कि अमेरिका में लोग शाम को जल्दी डिनर करके टाइम से सो जाते हैं, लेकिन भारत में रात की शुरुआत ही देर से होती है। भारत में अगर दोस्तों या परिचितों से मिलने का प्लान बनता है, तो वह अमूमन रात 8:30 या 9:00 बजे के बाद ही तय होता है। मेसी ने मुस्कुराते हुए बताया कि वे खुद अमेरिका में रात 9:30 बजे तक सो जाया करती थीं, इसलिए भारत का यह देर रात तक जगने वाला कल्चर उनके लिए एक बड़ा शॉक रहा।'नहाने से 15 मिनट पहले गीजर ऑन करो'भारतीय घरों में इस्तेमाल होने वाले वाटर हीटर यानी गीजर के तरीके ने मेसी को सबसे ज्यादा मुस्कुराने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने मजाकिया अंदाज में बताया कि भारत में गर्म पानी से नहाने के लिए कम से कम 10 से 15 मिनट पहले गीजर का स्विच ऑन करना पड़ता है और फिर इंतजार करना होता है। जबकि अमेरिका में नल या शावर चालू करते ही तुरंत गर्म पानी आने लगता है। भारतीय घरों की इस आदत को उन्होंने काफी फनी और अनोखा अनुभव बताया।10 मिनट की सुपरफास्ट डिलीवरी ने जीता दिलजहां कुछ बातों ने उन्हें हैरान किया, वहीं भारत की क्विक-कॉमर्स यानी 10-15 मिनट की इंस्टेंट डिलीवरी सर्विस ने उनका दिल जीत लिया। मेसी ने भारत के ऑनलाइन डिलीवरी इकोसिस्टम की जमकर तारीफ करते हुए कहा कि यहां ग्रॉसरी से लेकर तैयार खाना तक महज कुछ मिनटों में दरवाजे पर पहुंच जाता है। अमेरिका जैसे देश में इतनी तेज डिलीवरी सेवा की कल्पना करना भी मुश्किल है, इसलिए यह सुविधा उन्हें बेहद पसंद आई।सस्ती मेड और कुक सर्विस: दादी को लग जाएगा झटका!लिस्ट के पांचवें और आखिरी पॉइंट में मेसी ने भारत में मिलने वाली घरेलू मदद (Household Help) का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि अमेरिका की तुलना में भारत में खाना बनाने वाले कुक और सफाई के लिए मेड रखना काफी आसान और पॉकेट-फ्रेंडली है। यहां ज्यादातर मध्यवर्गीय और कामकाजी परिवारों में पार्ट-टाइम या फुल-टाइम मेड रखना आम बात है। इसी बात पर हंसी मजाक करते हुए मेसी ने कैप्शन में लिखा कि अगर उनकी दादी को पता चलेगा कि यहां घर के कामों के लिए मेड और कुक इतने कम बजट में मिल जाते हैं, तो उन्हें सचमुच हार्ट अटैक आ जाएगा!
दुनिया की सबसे महत्वाकांक्षी पर्यावरणीय परियोजनाओं में शामिल अफ्रीका का 'ग्रेट GREEN WALL' (ग्रेट ग्रीन वॉल) अभियान इस समय पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है। लगभग 8,000 किलोमीटर लंबी यह ऐतिहासिक पहल पश्चिमी अफ्रीका के सेनेगल के अटलांटिक तट से शुरू होकर पूर्वी अफ्रीका के जिबूती तक फैली हुई है। इस पूरी योजना का मुख्य मकसद सिर्फ पेड़ लगाना भर नहीं है, बल्कि उन इलाकों को दोबारा से हरा-भरा और जीवंत बनाना है जो दशकों से भीषण सूखे, रेगिस्तान के बढ़ते फैलाव और जलवायु परिवर्तन की तगड़ी मार झेल रहे हैं। अफ्रीकी संघ (African Union) ने इस दूरदर्शी परियोजना की शुरुआत साल 2007 में की थी।शुरुआत में सिर्फ पेड़ लगाने का था प्लान, फिर यूं बदली पूरी रणनीतिशुरुआती दिनों में वैज्ञानिकों और योजनाकारों की सोच सहारा रेगिस्तान की दक्षिणी सीमा पर पेड़ों की एक सीधी, लंबी और चौड़ी पट्टी तैयार करने की थी, ताकि रेगिस्तानी हवाओं और रेत को आगे बढ़ने से रोका जा सके। हालांकि, जैसे-जैसे समय बीता, पर्यावरण विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों ने अध्ययन में पाया कि केवल पेड़ों की कतारें खड़ी कर देने से इस गंभीर संकट का स्थायी हल संभव नहीं है। इसके बाद परियोजना की रणनीति में बुनियादी बदलाव किया गया। अब इसका मुख्य फोकस पूरे पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) को नए सिरे से पुनर्जीवित करने पर है। इसके तहत जंगलों, प्राकृतिक घास के मैदानों, कृषि योग्य जमीनों, आर्द्रभूमि (वेटलैंड्स) और स्थानीय प्रजाति की वनस्पतियों को फिर से पनपाया जा रहा है।आखिर साहेल क्षेत्र को क्यों पड़ी इस विशाल हरित दीवार की जरूरत?अफ्रीका का साहेल (Sahel) क्षेत्र कई दशकों से लगातार बड़े पर्यावरणीय संकट से जूझता रहा है। यहां रेगिस्तान का दायरा बढ़ता गया, लंबे समय तक अकाल और सूखे की स्थिति बनी रही, मिट्टी की उपजाऊ क्षमता घटती गई और जलवायु परिवर्तन के असर से बारिश का समय व चक्र पूरी तरह अनिश्चित हो गया। साहेल की एक बड़ी आबादी पूरी तरह से पारंपरिक खेती और पशुपालन पर निर्भर है। जमीन की उर्वरता घटने और बारिश न होने से फसलों का उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ, जिससे क्षेत्र में भोजन का गंभीर संकट खड़ा हो गया और लोगों की कमाई के साधन छिन गए। यही वजह है कि इस अभियान के माध्यम से मिट्टी की सेहत सुधारने, जमीन में नमी व पानी रोकने की क्षमता बढ़ाने और खेती को दोबारा मुनाफेदार बनाने की कोशिश की जा रही है।सिर्फ पेड़ों की कतार नहीं, स्थानीय जरूरतों के हिसाब से तैयार हुई रणनीतिनाम में भले ही 'ग्रीन वॉल' यानी हरी दीवार जुड़ा हो, लेकिन यह कोई सीधी या एकसार पेड़ों की पट्टी नहीं है। असल में यह स्थानीय इलाकों की जरूरत के मुताबिक ढाली गई सैकड़ों छोटी-बड़ी पुनर्स्थापन परियोजनाओं का एक व्यवस्थित समूह है। जहां जिस चीज की जरूरत है, वहां वैसा काम किया जा रहा है—कहीं स्थानीय किस्म के पेड़ रोपे जा रहे हैं, तो कहीं खुद-ब-खुद उगने वाली प्राकृतिक वनस्पतियों को सुरक्षित किया जा रहा है। कई क्षेत्रों में मिट्टी के कटाव को रोकने, वर्षा जल संचयन (रेनवाटर हार्वेस्टिंग) को बढ़ावा देने, घास के मैदानों को हरा-भरा करने और टिकाऊ खेती के नए तरीकों को अपनाने पर जोर दिया जा रहा है। इस तरह हर इलाके की भौगोलिक स्थिति और जलवायु के अनुसार अलग रणनीति अपनाई गई है।वर्ष 2030 तक क्या हासिल करने का है महालक्ष्य?ग्रेट ग्रीन वॉल परियोजना के तहत साल 2030 तक के लिए कुछ बेहद ठोस और बड़े लक्ष्य तय किए गए हैं:लगभग 10 करोड़ हेक्टेयर खराब और बंजर हो चुकी भूमि को फिर से उपजाऊ बनाना।वायुमंडल से करीब 25 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड को प्राकृतिक रूप से अवशोषित करना।अफ्रीका में लगभग 1 करोड़ नए हरित रोजगार (Green Jobs) के अवसर पैदा करना।साहेल क्षेत्र में रहने वाले करोड़ों लोगों के भोजन की सुरक्षा और आजीविका के साधनों को मजबूत करना।इस विशाल महाअभियान में 20 से भी अधिक अफ्रीकी देश एक साथ मिलकर काम कर रहे हैं। इसके साथ ही कई प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संगठन, वैश्विक विकास बैंक और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी संस्थाएं भी इसमें वित्तीय और तकनीकी सहयोग दे रही हैं।अब तक कितना हुआ काम और क्या हैं जमीनी चुनौतियां?यह सच है कि परियोजना अभी अपने अंतिम लक्ष्य तक नहीं पहुंची है, लेकिन कई भागीदार देशों में इसके शानदार परिणाम देखने को मिले हैं। सेनेगल में अब तक लाखों पेड़ लगाए जा चुके हैं और वहां की बड़े पैमाने पर बंजर हो चुकी जमीन दोबारा हरी-भरी हो गई है। इथियोपिया ने भी अपने स्तर पर बड़े पैमाने पर भूमि सुधार कार्यक्रम चलाए हैं। वहीं नाइजीरिया और नाइजर जैसे देशों में टिकाऊ भूमि प्रबंधन के जरिए सकारात्मक बदलाव आए हैं।हालिया सरकारी और पर्यावरण आकलनों के मुताबिक, अब तक लगभग 3 करोड़ हेक्टेयर भूमि को सफलतापूर्वक पुनर्जीवित किया जा चुका है। हालांकि, पर्यावरण विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि 2030 तक के सभी लक्ष्यों को शत-प्रतिशत हासिल करने के लिए और अधिक अंतरराष्ट्रीय निवेश, क्षेत्रीय देशों के बीच बेहतर आपसी तालमेल और सुरक्षा चुनौतियों से प्रभावित क्षेत्रों में शांति व्यवस्था की सख्त आवश्यकता होगी।प्रकृति के साथ-साथ आम जनता के लिए भी वरदान बनी परियोजनाबंजर जमीन और हरियाली का यह पुनर्जीवन केवल प्रकृति के बचाव तक सीमित नहीं है। एक स्वस्थ और मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र मिट्टी के बहाव को रोकता है, जमीनी जल स्तर (ग्राउंडवाटर) को सुधारता है और हवा से घातक कार्बन सोखता है। इसके साथ ही, स्थानीय कीटों, पक्षियों और अन्य वन्यजीवों के लिए एक बेहतर सुरक्षित प्राकृतिक आवास तैयार होता है। दूसरी ओर, स्थानीय किसानों और पशुपालकों को फसलों का बेहतर पैदावार, मवेशियों के लिए पर्याप्त चारा और नियमित आय की गारंटी मिलती है। भीषण सूखे जैसी विपरीत परिस्थितियों में भी ऐसी संवारी गई जमीन ज्यादा समय तक टिकी रहती है।पूरी दुनिया के लिए क्यों बेहद खास है यह अफ्रीकी मॉडल?आज के समय में ग्रेट ग्रीन वॉल को दुनिया की सबसे बड़ी पारिस्थितिकी तंत्र पुनर्स्थापना (Ecosystem Restoration) परियोजनाओं में गिना जाता है। इसकी महत्ता केवल अफ्रीका महाद्वीप तक सीमित नहीं है, क्योंकि जमीन का बंजर होना और ग्लोबल वार्मिंग जैसी चुनौतियां पूरी दुनिया की साझी समस्या हैं। अगर यह मॉडल पूरी तरह सफल रहता है, तो दुनिया के अन्य शुष्क (Arid) और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों के लिए भी यह एक बेहतरीन मिसाल साबित होगा। यह परियोजना साबित करती है कि पर्यावरण की रक्षा और आर्थिक विकास एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।इंसानों और प्रकृति को जोड़ने वाली उम्मीद की एक अनोखी दीवारइतिहास गवाह है कि दुनिया में अधिकांश दीवारें इंसानों को आपस में बांटने और सीमाएं खींचने के लिए बनाई गईं, लेकिन अफ्रीका की यह 'ग्रेट ग्रीन वॉल' इंसानों और प्रकृति को दोबारा एक-दूसरे से जोड़ने की अनूठी कोशिश है। इस विशाल अभियान की असली सफलता सिर्फ इस बात से नहीं मापी जाएगी कि कितने पौधे रोपे गए, बल्कि इससे आंकी जाएगी कि कितनी बंजर जमीन फिर से अनाज उगाने लायक बनी, कितने परिवारों का जीवन स्तर सुधरा, जैव विविधता में कितना सुधार आया और जलवायु परिवर्तन के झटकों का सामना करने में स्थानीय समुदाय कितने सक्षम बने। यही वजह है कि यह हरित दीवार केवल आज का अभियान नहीं, बल्कि आने वाले भविष्य के सामाजिक और आर्थिक बदलाव की एक मजबूत बुनियाद है।
वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर जारी तनाव के बीच चीन ने एक बार फिर भारतीय सीमा के बेहद नजदीक अपनी सैन्य ताकत का आक्रामक प्रदर्शन किया है। खुफिया रिपोर्टों के मुताबिक, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी एयरफोर्स (PLAAF) ने सीमा के पास स्थित रणनीतिक एयरबेस पर अपने 11 सबसे आधुनिक जे-20 (J-20) स्टील्थ फाइटर जेट तैनात कर दिए हैं। चीन के इस कदम से सीमा पर सुरक्षा एजेंसियां हाई अलर्ट पर हैं। पांचवीं पीढ़ी के इन लड़ाकू विमानों की फॉरवर्ड लोकेशन पर मौजूदगी को सीधे तौर पर भारत के खिलाफ मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक दबाव बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।ड्रैगन का सबसे घातक हथियार: क्यों बेहद खतरनाक है J-20?चेंगदू J-20 'माइटी ड्रैगन' चीन का सबसे एडवांस्ड और शक्तिशाली फाइटर जेट है। यह एक पांचवीं पीढ़ी का (5th Generation) ट्विन-इंजन विमान है, जिसे विशेष रूप से रडार की नजरों से बचकर हमला करने (Stealth Technology) के लिए डिजाइन किया गया है। लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों से लैस यह विमान बेहद कम समय में भारतीय हवाई क्षेत्र के करीब ऑपरेशन्स को अंजाम दे सकता है। चीन का दावा है कि यह अमेरिकी F-22 और F-35 को टक्कर देता है। लद्दाख और तिब्बत के ऊंचाई वाले इलाकों में इन विमानों की तैनाती भारतीय डिफेंस ग्रिड के लिए एक गंभीर चुनौती पेश करती है।भारतीय वायुसेना के लिए कितनी बड़ी चुनौती और क्या है जवाब?J-20 की इस ताजा तैनाती के बाद यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भारत का राफेल (Rafale) इसका मुकाबला कर सकता है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि राफेल भले ही 4.5 पीढ़ी का विमान है, लेकिन उसके कॉम्बैट प्रूवन रिकॉर्ड, उल्का (Meteor) और स्कैल्प (SCALP) जैसी मिसाइलें और बेहतरीन एवियोनिक्स इसे J-20 के खिलाफ बेहद घातक बनाते हैं। इसके अलावा, भारत ने सीमा पर अपने सबसे भरोसेमंद सुखोई-30 MKI और मिराज-2000 को भी अलर्ट मोड पर रखा है। साथ ही, लद्दाख सेक्टर में तैनात आकाश और S-400 जैसी एडवांस्ड एयर डिफेंस मिसाइल प्रणालियां चीनी विमानों पर चौबीसों घंटे पैनी नजर रख रही हैं।रणनीतिक एयरबेसों पर बढ़ी हलचल: क्या युद्ध की तैयारी में है चीन?तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र (TAR) और झिंजियांग में स्थित चीनी एयरबेस जैसे होतान, काशगर और गार्गुनसा की सैटेलाइट तस्वीरों से साफ है कि चीन वहां बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे का विस्तार कर रहा है। J-20 जैसे भारी स्टील्थ जेट्स के संचालन के लिए रनवे को लंबा किया गया है और मजबूत शेल्टर बनाए गए हैं। हालांकि भारतीय सेना और वायुसेना स्थिति पर पूरी तरह नियंत्रण बनाए हुए हैं, लेकिन सीमा के इतने करीब चीन के सबसे प्रीमियम फाइटर जेट्स की एक साथ मौजूदगी यह साफ करती है कि ड्रैगन आने वाले समय में सीमा विवाद को ठंडे बस्ते में डालने के मूड में बिल्कुल नहीं है।
ईरान का सिखाया खेल: हूती विद्रोहियों ने लाल सागर में दबोची सऊदी की गर्दन, अब भुगतेगी पूरी दुनिया
लाल सागर के रणनीतिक जलमार्ग पर इस समय एक ऐसा खतरनाक भू-राजनीतिक खेल खेला जा रहा है, जिसने वैश्विक अर्थव्यवस्था की नींव हिला दी है। यमन के हूती विद्रोही इस समय लाल सागर में ठीक वही रणनीति अपना रहे हैं, जो उन्हें ईरान द्वारा सिखाई गई है। इस चक्रव्यूह में सऊदी अरब की गर्दन इस कदर फंस चुकी है कि इसका सीधा असर न सिर्फ खाड़ी देशों पर, बल्कि पूरी दुनिया के व्यापार और सप्लाई चेन पर पड़ना तय माना जा रहा है।ग्लोबल चोकप्वाइंट पर हूतियों का बड़ा दांवलाल सागर सिर्फ एक जलमार्ग नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यापार की जीवन रेखा है। हूती विद्रोहियों ने ड्रोन और मिसाइल तकनीक के दम पर इस महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते (चोकप्वाइंट) को पूरी तरह से अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश शुरू कर दी है। जानकारों का मानना है कि हूतियों का यह कदम सीधे तौर पर सऊदी अरब के आर्थिक हितों पर चोट करने के लिए उठाया गया है। सऊदी अरब अपनी तेल अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखने के लिए इस मार्ग पर अत्यधिक निर्भर है, और अब यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन चुका है।तेहरान की सीक्रेट स्क्रिप्ट और यमन के लड़ाकेइस पूरे घटनाक्रम के पीछे ईरान का हाथ होने के दावों को बल मिल रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान ने सालों तक हूतियों को हथियारों, खुफिया इनपुट और रणनीतिक ट्रेनिंग से लैस किया है। फारस की खाड़ी में जिस तरह ईरान अक्सर दबाव बनाता है, ठीक उसी तर्ज पर हूती अब लाल सागर में सऊदी अरब और उसके पश्चिमी सहयोगियों को चुनौती दे रहे हैं। यह एक किस्म का प्रॉक्सी वॉर है, जहां मोहरे हूती हैं, लेकिन चालें तेहरान से चली जा रही हैं।कैसे भुगतेगी पूरी दुनिया इस जंग का हर्जानाअगर लाल सागर का यह संकट लंबा खिंचता है, तो इसका खामियाजा हर आम और खास इंसान को भुगतना पड़ेगा। इस रूट से गुजरने वाले कमर्शियल जहाजों को अब लंबा रास्ता तय करके अफ्रीका के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। इससे जहाजों का किराया, बीमा की लागत और ईंधन का खर्च कई गुना बढ़ गया है। नतीजा यह होगा कि आने वाले दिनों में कच्चा तेल, गैस, अनाज और इलेक्ट्रॉनिक्स सामान समेत हर चीज महंगी हो जाएगी, जिससे वैश्विक महंगाई का एक नया दौर शुरू हो सकता है।
PoK में भड़की चिंगारी: रावलकोट में सेना की अंधाधुंध फायरिंग, 17 प्रदर्शनकारियों की मौत
पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (PoK) से इस वक्त एक बेहद परेशान करने वाली और बड़ी खबर सामने आ रही है। रावलकोट में अपनी जायज मांगों को लेकर सड़कों पर उतरे स्थानीय कश्मीरियों पर पाकिस्तानी फौज काल बनकर टूट पड़ी है। इलाके में तनाव इस कदर बढ़ गया है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे नागरिकों पर सेना ने सीधे गोलियां बरसा दीं। स्थानीय सूत्रों और चश्मदीदों के मुताबिक, इस अंधाधुंध फायरिंग में अब तक कम से कम 17 प्रदर्शनकारियों की दर्दनाक मौत हो चुकी है, जबकि दर्जनों लोग गंभीर रूप से घायल हैं।हक की मांग पर बरसीं गोलियां: रावलकोट में बिछ गईं लाशेंमिली जानकारी के अनुसार, रावलकोट और उसके आसपास के इलाकों में लोग बुनियादी सुविधाओं, महंगाई और मानवाधिकारों के हनन के खिलाफ शांतिपूर्ण मार्च निकाल रहे थे। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पाकिस्तानी हुकूमत और वहां की सेना उनका लगातार शोषण कर रही है। देखते ही देखते इस प्रदर्शन को दबाने के लिए पाकिस्तानी फौज ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं। बिना किसी चेतावनी के प्रदर्शनकारियों पर सीधे राइफलों से गोलियां चलाई गईं, जिससे रावलकोट की सड़कें कश्मीरियों के खून से लाल हो गईं।मानवाधिकारों की धज्जियां: PoK में हालात बेकाबूइस खूनी झड़प के बाद पूरे रावलकोट और आस-पास के जिलों में कर्फ्यू जैसा माहौल है। चश्मदीदों का कहना है कि अस्पताल घायलों से पटे पड़े हैं और मरने वालों का आंकड़ा अभी और बढ़ सकता है। स्थानीय नेताओं ने पाकिस्तानी सेना की इस हरकत को 'नरसंहार' करार दिया है। सोशल मीडिया पर आ रही अपुष्ट तस्वीरों और वीडियो में रावलकोट की सड़कों पर अफरा-तफरी और खौफ का मंजर साफ देखा जा सकता है। इंटरनेट सेवाओं को भी प्रभावित किया गया है ताकि सच दुनिया के सामने न आ सके।अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की चुप्पी पर उठे सवालइस दर्दनाक घटना के बाद PoK के नागरिकों में पाकिस्तानी हुकूमत के खिलाफ भयंकर गुस्सा है। स्थानीय एक्टिविस्ट्स का कहना है कि जब भी कश्मीरी अपने अधिकारों की बात करते हैं, तो पाकिस्तानी फौज इसी तरह 'जल्लाद' बनकर उनका दमन करती है। अब देखना यह है कि इस गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन और बर्बरता पर वैश्विक संगठन और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार एजेंसियां क्या कदम उठाती हैं। फिलहाल रावलकोट में स्थिति अत्यंत तनावपूर्ण और नाजुक बनी हुई है।
अमेरिका और ईरान के बीच सीधी सैन्य भिड़ंत भले ही अस्थाई तौर पर रुक गई हो, लेकिन मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) के धरातल पर ईरान ने एक ऐसा बारूद का ढेर बिछा दिया है जो आने वाले कई वर्षों तक शांत होता नहीं दिख रहा है। अमेरिका को अरब क्षेत्र से बाहर निकालने और पड़ोसी देशों को अपने आगे झुकाने के लिए ईरान ने अपने शक्तिशाली 'प्रॉक्सी नेटवर्क्स' को पूरी तरह से एक्टिव कर दिया है। ट्रंप प्रशासन द्वारा बमबारी रोकने के बाद भी ईरान ने इस लड़ाई को अनिश्चित काल तक खींचने का मन बना लिया है। यमन के हूती विद्रोहियों से लेकर इराक के उग्रवादी गुटों तक, ईरान के सहयोगियों ने पूरे अरब इलाके को रणनीतिक संकट की आग में झोंक दिया है।अरामको रिफाइनरी पर ड्रोन हमला और अत्याधुनिक 'अकिन्की' ड्रोन को गिराने का दावाईरान की इस आक्रामक रणनीति का सबसे खतरनाक असर अमेरिका के प्रमुख सहयोगी देश सऊदी अरब पर देखने को मिला है। हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब की आर्थिक रीढ़ मानी जाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी तेल रिफाइनरी—'सऊदी अरामको' (Saudi Aramco)—पर आत्मघाती ड्रोन से भीषण प्रहार किया है। इस हमले के बाद रिफाइनरी के स्टोरेज टैंक एरिया और मुख्य पाइपलाइन सेक्शन के ऊपर धुएं का विशाल गुबार उड़ता देखा गया। हालांकि रिफाइनरी का मुख्य यूटिलिटी जोन सुरक्षित है, लेकिन पाइपलाइनों को पहुंचे नुकसान और मरम्मत के दौरान बने खतरे के कारण तेल का उत्पादन और प्रोसेसिंग लंबे समय तक ठप रहने की आशंका है। इसके साथ ही, हूतियों ने अल-जौफ प्रांत के आसमान में उड़ रहे सऊदी अरब के सबसे आधुनिक 'बेराकटार अकिन्की' (Bayraktar Akinci) ड्रोन को मार गिराने का बड़ा दावा करके सुरक्षा एजेंसियों में सनसनी फैला दी है।होर्मुज और बाब अल-मंदाब में बिछाया सी-माइंस का जाल, जहाजों की आवाजाही पर ब्रेकईरान ने केवल जमीनी ठिकानों को ही निशाना नहीं बनाया है, बल्कि वैश्विक तेल व्यापार के दो सबसे प्रमुख समुद्री रास्तों पर अपना पूर्ण वर्चस्व कायम कर लिया है। पहला गेटवे 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) है, जहां ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने इनबाउंड और आउटबाउंड दोनों शिपिंग लेन में भारी संख्या में 'सी-माइंस' (समुद्री सुरंगे) बिछा दी हैं, जिससे अमेरिकी नौसेना की नाकाबंदी के बावजूद यह पूरा समुद्री रास्ता ठप हो गया है।दूसरी तरफ, लाल सागर (Red Sea) के मुहाने पर स्थित 'बाब अल-मंदाब जलडमरूमध्य' पर हूती विद्रोहियों का कब्जा हो चुका है। हूतियों ने इस रास्ते से गुजरने वाले कमर्शियल जहाजों पर लगातार हमले करके और सऊदी अरब की तेल पाइपलाइन को ब्लॉक करके लाल सागर में अपना खौफ कायम कर दिया है।थम गया वैश्विक व्यापार: 11 जहाजों पर सिमटा ट्रैफिक, भीषण आर्थिक संकट की आहटईरानी लड़ाकों के इस दोहरे रणनीतिक चक्रव्यूह का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) पर पड़ा है। आंकड़ों के मुताबिक, बाब अल-मंदाब जलडमरूमध्य से गुजरने वाले कार्गो जहाजों की संख्या गिरकर अपने ऐतिहासिक निचले स्तर पर आ गई है। रविवार को इस बेहद व्यस्त मार्ग से महज 11 मालवाहक जहाज ही गुजर सके, जो दिखाता है कि हूतियों की नाकेबंदी किस हद तक प्रभावी हो चुकी है। वैश्विक बंदरगाहों को खाली कराने और सऊदी अर्थव्यवस्था को सीधे चोट पहुंचाने की इस ईरानी रणनीति ने पूरी दुनिया को एक भयंकर ऊर्जा संकट और आर्थिक तबाही की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बात करते हुए अमेरिका और ईरान के बीच जारी जंग पर अहम बयान दिया है। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका इस समय ईरान के साथ अच्छी कूटनीतिक बातचीत कर रहा है और उन्हें पूरी उम्मीद है कि इस गंभीर विवाद का हल कूटनीति के जरिए निकल सकता है। हालांकि, इसके साथ ही उन्होंने सख्त चेतावनी देते हुए कहा कि अगर यह बातचीत नाकाम साबित होती है, तो ईरान पर सैन्य हमले फिर से शुरू कर दिए जाएंगे। ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिकी बलों द्वारा किए जा रहे भीषण हमलों के कारण ही तेहरान अब बातचीत की मेज पर आने को मजबूर हुआ है। उन्होंने कहा कि अगर कूटनीति काम नहीं करती है, तो अमेरिका वही कदम उठाएगा जो वह दो दिन पहले तक उठा रहा था।ट्रंप का यह बयान वाशिंगटन द्वारा ईरान पर चलाए जा रहे दो हफ्ते लंबे भारी बमबारी अभियान को अचानक रोके जाने के दो दिन बाद आया है। हालांकि, इस बेहद नाजुक शांति के बीच मध्य पूर्व में तनाव कम होता नहीं दिख रहा है। सऊदी अरब, जॉर्डन और इराक में हाल ही में हुए ड्रोन हमलों और यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब के तेल बुनियादी ढांचे पर किए गए हमलों के दावों ने एक बार फिर इस क्षेत्र में अनिश्चितता और खतरे को बढ़ा दिया है।'सीधी बातचीत हमारे डीएनए में नहीं', ईरान ने अमेरिकी दावों को किया खारिजदूसरी ओर, ईरान ने अमेरिका के साथ किसी भी तरह की सीधी बातचीत के दावों को साफ तौर पर खारिज कर दिया है। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने वाशिंगटन के बयानों को मनगढ़ंत करार देते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस तरह अमेरिका से सीधी गुफ्तगू करना उनके 'डीएनए' में शामिल नहीं है। हालांकि, बघाई ने यह स्वीकार किया कि मध्यस्थ देशों के जरिए दोनों देशों के बीच अप्रत्यक्ष संदेशों का आदान-प्रदान अभी भी जारी है। इसके साथ ही तेहरान ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल समुद्री मार्ग 'होर्मुज स्ट्रेट' पर अपने पूर्ण नियंत्रण और संप्रभुता का दावा भी दोहराया है।ब्रेंट क्रूड 9% गिरा, गोला-बारूद की कमी की रिपोर्ट पर बोले डोनाल्ड ट्रंपअमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक रास्ते की उम्मीदों से वैश्विक बाजार पर तत्काल असर देखने को मिला और कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट दर्ज की गई। पिछले सप्ताह $100 प्रति बैरल का आंकड़ा पार करने वाला ब्रेंट क्रूड करीब 9% गिरकर $88 प्रति बैरल के आसपास आ गया। मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया था कि अमेरिकी सैन्य कमांडरों ने निशाना बनाने योग्य ठिकानों की कमी और अपने गोला-बारूद (इंटरसेप्टर मिसाइलों) के घटते स्टॉक को लेकर चिंता जताई थी, जिसके बाद ट्रंप ने बमबारी रोकने का फैसला किया।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इन मीडिया रिपोर्टों और दावों को सिरे से खारिज कर दिया। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका के पास हथियारों और गोला-बारूद का कोई अभाव नहीं है और वह अपने सैन्य भंडारों को बहुत तेजी से फिर से भर रहा है। हालांकि, सैन्य अभियानों के रुकने के बावजूद क्षेत्र में अनिश्चितता बनी हुई है, क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य से वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित है और इस रणनीतिक समुद्री मार्ग पर भविष्य के नियंत्रण को लेकर वाशिंगटन और तेहरान के बीच कड़ा गतिरोध कायम है।
अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य संघर्ष के बीच यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की के एक सनसनीखेज दावे से अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल मच गई है। जेलेंस्की ने दावा किया है कि रूस मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में अमेरिकी ठिकानों और संपत्तियों को निशाना बनाने के लिए ईरान को सैटेलाइट सर्विलांस (उपग्रह निगरानी) का डेटा देकर मदद पहुंचा रहा है। इस गंभीर दावे पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की प्रतिक्रिया सामने आई है। ट्रंप ने स्पष्ट किया है कि वे इस बात की जांच करेंगे कि इस दावे में कितनी सच्चाई है और वे इस मुद्दे पर सीधे रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से बात करेंगे।हालांकि, ट्रंप ने यह भी कहा कि अगर रूस ने ईरान की किसी भी तरह मदद की भी है, तो उसका युद्ध के मैदान पर कोई खास असर नहीं पड़ा है। वेनेजुएला का उदाहरण देते हुए ट्रंप ने कहा कि रूस ने वेनेजुएला को भी बड़ी संख्या में सैन्य उपकरण दिए थे और वहां के पास रूस निर्मित सारे हथियार थे, लेकिन उसका नतीजा सभी के सामने है। ट्रंप के अनुसार, अमेरिका ने ईरान को इस युद्ध में बुरी तरह पछाड़ा है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में ईरान के पास न तो कोई मजबूत सेना बची है, न एयर फोर्स और न ही नेवी। ट्रंप ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि रूस बड़े पैमाने पर ऐसी कोई मदद कर रहा है और अगर ऐसा हुआ भी है, तो उसका कोई असर नहीं दिखा है।वाशिंगटन में आज मिलेंगे ट्रंप और नेतन्याहू, परमाणु कार्यक्रम को खत्म करने पर होगी चर्चाइस कूटनीतिक हलचल के बीच इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू आज वाशिंगटन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से एक महत्वपूर्ण मुलाकात करने जा रहे हैं। यह बैठक ऐसे मोड़ पर हो रही है जब अमेरिका ने लगातार दूसरे दिन ईरान पर अपने हवाई हमले रोके रखे हैं, और जवाब में तेहरान ने भी अपनी ओर से सैन्य कार्रवाइयों को फिलहाल थामने की बात कही है। इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने स्पष्ट किया है कि वे ट्रंप के उन तमाम प्रयासों का पूरी तरह से समर्थन करते हैं, जिनका उद्देश्य ईरान को रणनीतिक रूप से कमजोर करना और उसके परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह समाप्त करना है।नेतन्याहू ने कहा कि यदि बिना किसी बड़े और लंबे सैन्य संघर्ष के ईरान के परमाणु खतरे को खत्म करने का लक्ष्य हासिल हो जाता है, तो इसमें कोई बुराई नहीं है। उन्होंने संकेत दिया कि वे ट्रंप के सामने कोई नई शर्त या जानकारी रखने के बजाय अपने करीबी सहयोगी ट्रंप की भावी योजनाओं को सुनेंगे और समझेंगे, क्योंकि अंतिम फैसला अमेरिकी नेतृत्व का ही होगा। हालांकि, नेतन्याहू ने तेहरान को सख्त चेतावनी भी दी कि अगर उसने प्रत्यक्ष रूप से या अपने सहयोगी गुटों के जरिए इजराइल पर दोबारा हमला करने की हिमाकत की, तो यह उसकी सबसे बड़ी भूल साबित होगी।ओमान की मध्यस्थता और सीजफायर की कोशिशें, अमेरिका ने मिसाइलों की कमी से किया इनकारवर्तमान में दोनों देशों को एक अंतरिम युद्धविराम (Interim Ceasefire) समझौते के तहत वार्ता की मेज पर लाने के कूटनीतिक प्रयास तेज हो गए हैं। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका के राजदूत माइक वाल्ट्ज ने जानकारी दी कि राष्ट्रपति ट्रंप कूटनीति को थोड़ा और समय देना चाहते हैं। उन्होंने बताया कि पिछले कुछ हफ्तों से, और विशेष रूप से बीते कुछ दिनों में, ओमान की मध्यस्थता के जरिए अमेरिका, ईरान और अन्य वार्ताकारों के बीच शीर्ष स्तर से लेकर तकनीकी स्तर तक लगातार बातचीत जारी है।माइक वाल्ट्ज ने उन आशंकाओं और मीडिया रिपोर्टों को सिरे से खारिज कर दिया जिनमें कहा जा रहा था कि ईरानी हमलों से बचाव के लिए इस्तेमाल होने वाली अमेरिकी इंटरसेप्टर मिसाइलों का स्टॉक खत्म हो रहा है। हालांकि, स्वतंत्र रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और ईरान दोनों ही पक्षों के लिए इतने बड़े पैमाने पर लंबे समय तक सैन्य अभियानों को जारी रखना व्यावहारिक रूप से काफी कठिन होगा।अयातुल्ला खामेनेई की मौत और लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ सैन्य अभियानगौरतलब है कि ट्रंप और नेतन्याहू की इससे पिछली आधिकारिक मुलाकात फरवरी में हुई थी, जिसके कुछ ही हफ्तों बाद ईरान के खिलाफ व्यापक सैन्य अभियान शुरू हो गया था। इस भीषण युद्ध के दौरान ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई समेत कई शीर्ष ईरानी नेता और सैन्य कमांडर मारे गए थे। युद्ध की शुरुआत के तुरंत बाद ईरान समर्थित संगठन हिजबुल्लाह ने भी इजराइल पर हमले शुरू कर दिए थे, जिसके जवाब में इजराइली रक्षा बलों ने दक्षिणी लेबनान में जोरदार हवाई हमले और जमीनी कार्रवाई की थी। वर्तमान में अमेरिका, लेबनान और इजराइल के बीच प्रत्यक्ष वार्ता का समर्थन कर रहा है, ताकि सीमा पर तनाव कम किया जा सके और हिजबुल्लाह को पूरी तरह निरस्त्र करने का रास्ता निकाला जा सके।
हम में से ज्यादातर लोग अपने दिन की शुरुआत दांतों की सफाई और ओरल हाइजीन के लिए टूथपेस्ट से करते हैं। टूथपेस्ट कंपनियां भी कैविटी से सुरक्षा और दांतों के मोती जैसे चमकने के बड़े-बड़े दावे करती हैं। लेकिन हाल ही में बांग्लादेश से सामने आई एक चौंकाने वाली वैज्ञानिक अध्ययन रिपोर्ट ने करोड़ों लोगों की सेहत को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं। एनवायरनमेंट एंड सोशल डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन (ESDO) द्वारा किए गए एक व्यापक अध्ययन के अनुसार, बाजार में बिकने वाले ज्यादातर टूथपेस्ट सैंपल में माइक्रोप्लास्टिक (प्लास्टिक के अति-सूक्ष्म कण) पाए गए हैं।34 में से 26 सैंपल में पाए गए प्लास्टिक के खतरनाक कणESDO द्वारा यह अध्ययन जुलाई 2025 से जून 2026 के बीच किया गया। इस जांच में बांग्लादेश, भारत, थाईलैंड और वियतनाम में निर्मित 19 प्रमुख ब्रांडों के कुल 34 टूथपेस्ट सैंपल शामिल किए गए थे। जहांगीरनगर विश्वविद्यालय की Laboratory of Environmental Health and Ecotoxicology में हुई वैज्ञानिक जांच में पाया गया कि 34 में से 26 सैंपल (लगभग 76.5 फीसदी) में माइक्रोप्लास्टिक मौजूद थे।स्थानीय बनाम विदेशी ब्रांड: बांग्लादेश में बने 25 स्थानीय उत्पादों में से 22 में माइक्रोप्लास्टिक मिले।अन्य देशों के सैंपल: भारत से शामिल 5 में से 1, थाईलैंड के 2 में से 1 और वियतनाम के दोनों सैंपल में माइक्रोप्लास्टिक की पुष्टि हुई है।बच्चों के टूथपेस्ट भी असुरक्षित: चिंता की बात यह है कि बच्चों के लिए खास तौर पर बनाए गए 6 में से 4 टूथपेस्ट सैंपल में भी प्लास्टिक के कण पाए गए। इनमें Kodomo Ultra Shield Formula Strawberry, Meril Baby Strawberry, Meril Baby Orange और Pepsodent Kids Orange शामिल हैं।किस टूथपेस्ट में मिले सबसे ज्यादा माइक्रोप्लास्टिक कण?शोधकर्ताओं का स्पष्ट कहना है कि किसी भी ओरल केयर प्रोडक्ट या टूथपेस्ट में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा शून्य (Zero) होनी चाहिए। अध्ययन में प्रति 100 ग्राम टूथपेस्ट में 20 से लेकर 320 तक माइक्रोप्लास्टिक के कण पाए गए:टूथपेस्ट ब्रांडमाइक्रोप्लास्टिक कण (प्रति 100 ग्राम)मेडिप्लस फ्लोराइड जेल (Mediplus Fluoride Gel)320 कण (सबसे ज्यादा)क्लोजअप रेड हॉट / मेंथॉल फ्रेश (Closeup Red Hot / Menthol Fresh)160 कणकोडोमो अल्ट्रा शील्ड फॉर्मूला (Kodomo Ultra Shield)140 कणसिग्नल ग्रीन टी (Signal Green Tea)120 कणपेप्सोडेंट एडवांस साल्ट / हिमालया कंप्लीट केयर100-100 कणसेंसोडाइन फ्रेश मिंट (Sensodyne Fresh Mint)80 कणहालांकि, राहत की बात यह है कि जांच किए गए 8 सैंपल पूरी तरह माइक्रोप्लास्टिक-मुक्त पाए गए, जिनमें जेनफ्रेश (Genfresh), पैराशूट जस्ट फॉर बेबी मैंगो (Parachute Just for Baby Mango) और क्लोजअप रेड-हॉट जिंक फ्रेश टेक्नोलॉजी शामिल हैं।क्या होता है माइक्रोप्लास्टिक और सेहत को कितना बड़ा खतरा?माइक्रोप्लास्टिक क्या हैं?माइक्रोप्लास्टिक 5 मिलीमीटर से भी छोटे प्लास्टिक के टुकड़े होते हैं, जो औद्योगिक कचरे, सिंथेटिक कपड़ों और सौंदर्य प्रसाधनों में इस्तेमाल होने वाले माइक्रोबीड्स से बनते हैं।शरीर और अंगों पर गंभीर असर:ब्रशिंग के दौरान ये सूक्ष्म कण आसानी से मुंह के जरिए या निगलने से शरीर के भीतर प्रवेश कर जाते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, शरीर में माइक्रोप्लास्टिक जमा होने से:पाचन और श्वसन तंत्र: पाचन क्रिया और फेफड़ों के काम करने की क्षमता प्रभावित होती है।हार्ट और नर्वस सिस्टम: हृदय प्रणाली और तंत्रिका तंत्र (Nervous System) में गंभीर सूजन आ सकती है।हार्मोनल असंतुलन: यह शरीर के एंडोक्राइन सिस्टम को नुकसान पहुंचाकर हार्मोनल गड़बड़ी, प्रजनन क्षमता (Fertility) में कमी और भ्रूण के विकास में रुकावट पैदा कर सकता है।
पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू और कश्मीर (PoJK) में स्थिति बेहद तनावपूर्ण और बेकाबू हो गई है। सोमवार को रावलाकोट में अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे नागरिकों पर पाकिस्तानी सेना ने अंधाधुंध गोलियां चला दीं। इस दर्दनाक घटना में कम से कम 5 लोगों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि 30 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हो गए हैं। घायलों में से कई की हालत नाजुक बनी हुई है, जिससे मौतों का आंकड़ा बढ़ने की आशंका है।यह खूनी गोलीबारी तब हुई जब हजारों की संख्या में नागरिक जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के बैनर तले मुजफ्फराबाद की ओर मार्च करने की तैयारी कर रहे थे।52 दिनों से जारी आंदोलन और JAAC का अल्टीमेटमPoJK में पिछले 52 दिनों से लगातार विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं। स्थानीय नागरिक और JAAC के कार्यकर्ता गिरफ्तार किए गए एक्टिविस्ट्स की रिहाई, प्रदर्शनकारियों पर दर्ज झूठे मुकदमों की वापसी और क्षेत्र के आर्थिक-सामाजिक अधिकारों की बहाली की मांग कर रहे हैं।गतिरोध को खत्म करने के लिए JAAC और स्थानीय प्रशासन के बीच बातचीत चल रही थी। JAAC ने आधिकारिक नोटिफिकेशन जारी करने के लिए 27 जुलाई की दोपहर 1:00 बजे तक की डेडलाइन दी थी। मांगें न माने जाने पर जैसे ही हजारों लोगों ने रावलाकोट से मुजफ्फराबाद की ओर मार्च शुरू किया, पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने उन पर बल प्रयोग करते हुए सीधी फायरिंग कर दी।धांधली के आरोप और चुनाव पर पड़ा गहरा असरयह भयानक हिंसा ऐसे समय में हुई है जब PoJK के मीरपुर डिवीजन के 13 निर्वाचन क्षेत्रों में पहले चरण का मतदान चल रहा था। एक तरफ लोग अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर हैं, वहीं दूसरी तरफ कोटली समेत कई इलाकों से चुनाव में भारी धांधली और बूथ कैप्चरिंग के आरोप सामने आए हैं।लगातार जारी हड़ताल, रैलियों पर पाबंदी और सेना की बर्बरता के कारण राजनीतिक दलों का चुनाव प्रचार पूरी तरह ठप हो गया है। आम जनता में इस चुनावी प्रक्रिया को लेकर भारी असंतोष और बेरुखी देखी जा रही है।रावलाकोट और सुधनोती में चुनाव 10 अगस्त तक टलेरावलाकोट में हुए इस खूनी नरसंहार और लगातार बढ़ते जनसैलाब को देखते हुए प्रशासन पूरी तरह बैकफुट पर आ गया है। बिगड़ते हालात और सुरक्षा चिंताओं का हवाला देते हुए सुधनोती और रावलाकोट जिलों में प्रस्तावित विधानसभा चुनावों को 10 अगस्त तक के लिए स्थगित कर दिया गया है।इस घटना के बाद से पूरे PoJK में पाकिस्तानी हुकूमत और सेना के खिलाफ गुस्सा चरम पर है और जगह-जगह विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं।
संसद में मानसून सत्र के दूसरे सप्ताह की शुरुआत सोमवार को भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के तीखे टकराव के साथ हुई। लोकसभा और राज्यसभा दोनों में आंदोलनकारी छात्रों पर कथित पुलिस कार्रवाई को लेकर विपक्ष ने जोरदार हंगामा किया, जिसके कारण दोनों सदनों की कार्यवाही बार-बार स्थगित करनी पड़ी। गौरतलब है कि जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी का प्रदर्शन खत्म हो चुका है, लेकिन छात्रों के साथ मारपीट का मुद्दा संसद में गरमाया हुआ है। सुबह 11 बजे लोकसभा की कार्यवाही शुरू हुई। सरकार ने लोकसभा में लोक परीक्षाएं (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 भी पेश किया। प्रश्नकाल शुरू होते ही विपक्षी सांसदों ने आंदोलनकारी छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के मुद्दे पर नारेबाजी शुरू कर दी। लगातार शोर-शराबे के बीच लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सदन की कार्यवाही दोपहर 12 बजे तक स्थगित कर दी। दोपहर 12 बजे सदन की कार्यवाही दोबारा शुरू हुई। पीठासीन अध्यक्ष दिलीप सैकिया ने आवश्यक दस्तावेज सदन पटल पर रखने की प्रक्रिया पूरी कराई। करीब 12 बजकर 4 मिनट पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला फिर आसन पर आए। इस दौरान विपक्षी सांसद वेल में नारेबाजी कर रहे थे। इस बीच प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह ने लोक परीक्षाएं (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 पेश किया। स्पीकर ओम बिरला ने विपक्ष से कहा कि सरकार इस विषय पर चर्चा के लिए तैयार है और सदन की कार्यवाही चलने दें, लेकिन हंगामा नहीं थमा। इसके बाद सदन को दोपहर 2 बजे तक स्थगित कर दिया गया। दोपहर 2 बजे कार्यवाही फिर शुरू हुई, लेकिन विपक्ष का विरोध जारी रहा। करीब 2 बजकर 4 मिनट पर संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने कहा कि सरकार ने इस विधेयक पर चर्चा के लिए समय तय कर दिया है, फिर भी विपक्ष नारेबाजी कर सदन क्यों नहीं चलने दे रहा है। हंगामा जारी रहने पर लोकसभा की कार्यवाही शाम 5 बजे तक के लिए स्थगित कर दी गई। वहीं, राज्यसभा की कार्यवाही भी सुबह 11 बजे शुरू हुई। सभापति सीपी राधाकृष्णन ने आवश्यक दस्तावेज सदन के पटल पर रखवाने की प्रक्रिया पूरी कराई। सुबह 11 बजकर 4 मिनट पर नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे बोलने के लिए खड़े हुए। उस समय कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी भी सदन में मौजूद थीं। सभापति ने उन्हें नियमों का हवाला देते हुए रोकने की कोशिश की, लेकिन खरगे ने ऊंची आवाज में विरोध दर्ज कराते हुए कहा- ‘जिस तरह छात्रों को पीटा गया, घसीटा गया और उनके साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया गया, ऐसा भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ।’ खरगे के बयान के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोक-झोंक शुरू हो गई। हंगामे के चलते सभापति ने राज्यसभा की कार्यवाही दोपहर 2 बजे तक टाल दी। दोपहर 2 बजे कार्यवाही दोबारा शुरू हुई। इस बार उपसभापति हरिवंश आसन पर थे। सरकार ने राष्ट्र गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026 पर चर्चा शुरू कराई और सदस्यों को अपनी बात रखने का अवसर दिया। हालांकि, विपक्ष लगातार छात्रों पर पुलिस कार्रवाई का मुद्दा उठाने की कोशिश करता रहा। पीठ की ओर से सदस्यों को केवल लिस्टेड विषयों की कार्यवाही तक सीमित रहने के लिए कहा गया, जिसके बाद फिर हंगामा शुरू हो गया। लगातार रुकावट के कारण राज्यसभा की कार्यवाही पहले दोपहर 3 बजे तक और फिर दोबारा शुरू होने के महज एक मिनट बाद शाम 5 बजकर 15 मिनट तक के लिए स्थगित कर दी गई। क्या है लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 केंद्र सरकार ने 27 जुलाई 2026 को लोकसभा में लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 पेश किया। यह 2024 में लागू लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम को और प्रभावी बनाने के मकसद से लाया गया है। प्रस्तावित संशोधन का मकसद भर्ती और अन्य सार्वजनिक परीक्षाओं में पेपर लीक, संगठित नकल, परीक्षा माफिया और तकनीक के जरिए होने वाली धांधली पर अधिक सख्ती से रोक लगाना है। इसमें दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का प्रावधान किया गया है। वीडियो देखने के लिए ऊपर थंबनेल पर क्लिक करें…
पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) के रणक्षेत्र से इस वक्त की सबसे बड़ी और संवेदनशील भू-राजनीतिक खबर सामने आ रही है। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील समुद्री व्यापारिक मार्ग 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' को बंद करने की धमकी देने वाले ईरान के कड़े तेवर अब पूरी तरह ढीले पड़ते नजर आ रहे हैं। वैश्विक कच्चे तेल की सप्लाई चेन को बंधक बनाकर दुनिया को डराने की कोशिश कर रहा तेहरान खुद अपने ही बुने चक्रव्यूह में बुरी तरह फंस गया है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और वैश्विक ताकतों की सख्त सैन्य घेराबंदी के बाद अब ईरान कूटनीतिक मोर्चे पर बैकफुट पर आ गया है और दुनिया भर में अलग-थलग पड़ने के बाद उसकी छटपटाहट साफ देखी जा सकती है।क्या है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और क्यों इस पर अड़ा था ईरान?भौगोलिक और रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी को आपस में जोड़ता है। दुनिया का करीब 20 प्रतिशत कच्चा तेल इसी संकरे समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है। ईरान लंबे समय से इस रास्ते पर अपना नियंत्रण होने का दावा करता रहा है और जब भी उस पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ता है, वह इसे बंद करने की धमकी देने लगता है। इस बार भी ईरान ने अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन करते हुए इस रूट को ब्लॉक करने की कोशिश की थी, ताकि भारत, चीन और यूरोपीय देशों समेत पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को घुटनों पर लाया जा सके।वैश्विक ताकतों की जवाबी कार्रवाई से कैसे पस्त हुआ तेहरान?ईरान की इस आक्रामक रणनीति का मुकाबला करने के लिए इस बार अमेरिका, ब्रिटेन और उनके सहयोगी देशों ने बिना कोई वक्त गंवाए एक साझा नौसैनिक टास्क फोर्स को ओमान की खाड़ी में तैनात कर दिया। अंतरराष्ट्रीय नौसेना की इस भारी मौजूदगी और अत्याधुनिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम की तैनाती ने ईरान की नौसैनिक घेराबंदी को पूरी तरह नाकाम कर दिया। इसके साथ ही, ईरान पर लगे नए आर्थिक और तकनीकी प्रतिबंधों ने उसकी घरेलू अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है। अपनी ही धमकियों के जाल में घिरने और चौतरफा मार झेलने के बाद अब ईरानी प्रशासन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर राहत की गुहार लगाता हुआ दिख रहा है।भारतीय बाजार और कच्चे तेल की कीमतों पर क्या होगा इसका असर?स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव कम होने और ईरान के बैकफुट पर आने की खबर से भारतीय तेल कंपनियों और घरेलू बाजार ने बड़ी राहत की सांस ली है। भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा इसी रूट के जरिए आयात करता है। रक्षा और बाजार विश्लेषकों का मानना है कि यदि ईरान इस रास्ते को बंद करने में कामयाब हो जाता, तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती थीं, जिससे भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान छूने लगते। ईरान के शांत होने से अब सप्लाई चेन सुचारू रूप से चलने की उम्मीद जगी है, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता लौटेगी।
हिज्बुल्लाह का साथ देना ईरान की रणनीतिक नीति का हिस्सा: मोजतबा खामेनेई
ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह सैयद मोजतबा हुसैनी खामेनेई ने हिज्बुल्लाह के महासचिव शेख नईम कासिम को लिखे एक पत्र में कहा कि हिज्बुल्लाह के लिए ईरान का समर्थन एक 'रणनीतिक जिम्मेदारी' है।
जर्मनी की राजधानी बर्लिन में आयोजित 'बर्लिन प्राइड' परेड के दौरान एक भीषण और जानलेवा हमला हुआ, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। शनिवार रात प्राइड के समापन संगीत कार्यक्रम के पास एक तेज रफ्तार सफेद रंग की वैन अचानक भीड़ में जा घुसी, जिससे एक महिला की दर्दनाक मौत हो गई और 29 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। वैन से टक्कर मारने के बाद आरोपी ने धारदार हथियार से भी कई लोगों पर ताबड़तोड़ हमले किए। इस सनसनीखेज घटना के बाद करीब 24 घंटे तक चले बड़े पैमाने पर तलाशी अभियान के बाद, रविवार को शहर के बाहरी इलाके में पुलिस के साथ हुई मुठभेड़ में मुख्य संदिग्ध मारा गया।इस्लामिक स्टेट (IS) से जुड़े तार और लेबनीज मूल का हमलावरअधिकारियों ने खुलासा किया है कि बर्लिन प्राइड हमले का मुख्य संदिग्ध अब्दुल बल्लूट था, जो लेबनानी मूल का जर्मन नागरिक था। जांच में यह बात सामने आई है कि यह संदिग्ध पहले भी इस्लामिक स्टेट (आईएस) आतंकवादी समूह में शामिल होने की कोशिश कर चुका था। घटना के तुरंत बाद जर्मन अभियोजकों ने उसका 'वॉन्टेड' नोटिस जारी किया था और जनता के लिए चेतावनी जारी की थी कि आरोपी अत्यधिक खतरनाक और हथियारबंद है, इसलिए उसके करीब न जाएं। जर्मनी के गृह मंत्री अलेक्जेंडर डोब्रिंट ने इस पूरे घटनाक्रम को एक सुनियोजित 'इस्लामी आतंकी हमला' करार दिया है। उन्होंने बताया कि संदिग्ध पहले भी कई आपराधिक मामलों में शामिल रहा है और राजधानी में सक्रिय कट्टरपंथी व इस्लामी चरमपंथी समूहों के संपर्क में होने के कारण सुरक्षा एजेंसियों की रडार पर था।टियरगार्टन पार्क के पास मचा कोहराम, चांसलर और मेयर ने की घटना की निंदायह खूनी खेल शनिवार रात करीब 10 बजे टियरगार्टन पार्क के पास हुआ, जो उस मार्ग के नजदीक है जहां से कुछ समय पहले ही यूरोप के सबसे बड़े LGBTQ+ आयोजनों में शुमार 'क्रिस्टोफर स्ट्रीट डे' यानी बर्लिन प्राइड मार्च गुजरा था। बेकाबू वैन कई लोगों को कुचलते हुए अंत में एक पेड़ से जा टकराई। इस दर्दनाक हादसे के बाद पुलिस ने तुरंत सोशल मीडिया के जरिए घटनास्थल को खाली करने की अपील की ताकि राहत और बचाव कार्य तेजी से चलाए जा सकें। बर्लिन के मेयर काई वेगनर ने इस घटना को जर्मनी के स्वतंत्र और उदार समाज पर सीधा हमला बताया है। वहीं, जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने नागरिकों से अपील की है कि वे ऐसे समय में संयम बनाए रखें और समाज में डर व आपसी फूट पैदा करने वाली ताकतों के खिलाफ एकजुट रहें।
पश्चिम एशिया में सुलग रहे महासंग्राम के बीच ईरान की तरफ से एक बेहद कड़ा और बड़ा बयान सामने आया है। ईरान के सर्वोच्च नेता (सुप्रीम लीडर) मोजतबा खामेनेई ने लेबनान के सक्रिय संगठन हिजबुल्लाह की खुलकर सराहना की है और उसे इजरायल के खिलाफ मोर्चे पर डटी हुई एक मजबूत चट्टान करार दिया है। मोजतबा खामेनेई ने साफ शब्दों में अमेरिका और इजरायल को चेतावनी देते हुए कहा है कि जब तक लेबनान के खिलाफ इजरायली हमले पूरी तरह नहीं रुकते, तब तक क्षेत्र में किसी भी प्रकार का युद्धविराम समझौता मुमकिन नहीं है। खामेनेई का यह बयान ऐसे वक्त में आया है जब वैश्विक कूटनीति के स्तर पर लेबनान में शांति स्थापित करने और हिजबुल्लाह के भविष्य को लेकर बैठकों का दौर जारी है।एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस और हिजबुल्लाह की रीढ़ बना ईरानअंतरराष्ट्रीय राजनीति के जानकारों के मुताबिक, हिजबुल्लाह ईरान के 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' (प्रतिरोध की धुरी) का सबसे मजबूत और अहम हिस्सा है। यह ईरान समर्थित उन सशस्त्र समूहों का नेटवर्क है, जिसे पश्चिम एशिया में अमेरिका और इजरायल के प्रभाव को चुनौती देने के लिए तैयार किया गया है। ईरान की तरफ से इन संगठनों को भारी मात्रा में आर्थिक मदद, आधुनिक हथियार और रणनीतिक ट्रेनिंग दी जाती है। लेबनान के हिजबुल्लाह के अलावा यमन के हुती विद्रोही और इराक के कई लड़ाका समूह इसी नेटवर्क का हिस्सा हैं, जो ईरान के साए में पश्चिम एशिया की भू-राजनीति को सीधे तौर पर प्रभावित कर रहे हैं।'अब सिर्फ जिहाद और प्रतिरोध ही बचा है रास्ता'हिजबुल्लाह प्रमुख शेख नइम कासिम द्वारा भेजे गए वफादारी पत्र का जवाब देते हुए ईरानी सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक के बाद एक कई संदेश साझा किए। उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात में इजरायल के खिलाफ मुकाबले के लिए 'जिहाद और प्रतिरोध' के अलावा और कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है। खामेनेई ने हिजबुल्लाह के दिवंगत पूर्व प्रमुख सैयद हसन नसरल्लाह और जंग में मारे गए अन्य कमांडरों को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि इन बहादुर लड़ाकों के बलिदान ने ही इस संगठन को एक छोटे से पौधे से बदलकर आज एक विशाल पेड़ के रूप में खड़ा किया है। उन्होंने दक्षिणी लेबनान की आम जनता के धैर्य और साहस की भी जमकर प्रशंसा की।अमेरिका और ट्रंप प्रशासन के सामने रखी गई ईरान की कड़ी शर्तमोजतबा खामेनेई की यह आक्रामक टिप्पणी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ औन के बीच हुई हाई-प्रोफाइल मुलाकात के तुरंत बाद आई है। व्हाइट हाउस में हुई इस बैठक के दौरान लेबनानी क्षेत्र से इजरायली सेना की पूर्ण वापसी, हिजबुल्लाह को हथियार मुक्त करने और लेबनानी सेना को अमेरिकी मदद देने जैसे गंभीर मुद्दों पर चर्चा हुई थी। इसके जवाब में ईरान ने साफ कर दिया है कि अमेरिका के साथ किसी भी संभावित समझौते की सबसे बड़ी शर्त लेबनान पर इजरायली हमलों पर तत्काल रोक लगाना होगी। ईरान के इस रुख से साफ है कि पश्चिम एशिया का यह संकट आने वाले दिनों में और अधिक गहरा सकता है, जिससे वैश्विक राजनीति में हलचल तेज हो गई है।
बलूचिस्तान में जबरन गुमशुदगियों पर मानवाधिकार विभाग सख्त, पाकिस्तान से जवाब मांगा
एक प्रमुख मानवाधिकार संगठन ने चार बलूच लोगों के जबरन गायब किए जाने की निंदा की। संगठन ने आरोप लगाया कि ये लोग पाकिस्तानी सुरक्षा बलों और खुफिया एजेंसियों की कार्रवाई के बाद लापता हुए।
ईरान की सख्त चेतावनी, अमेरिकी सैन्य अभियानों में सहयोग करने वाले ठिकाने होंगे निशाने पर
ईरान के खिलाफ युद्ध में अमेरिका की मदद में शामिल होने वाले देशों को ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) ने चेतावनी दी
रूस ने सुपरमार्केट पर ड्रोन हमला कर आम नागरिकों को बनाया निशाना, बच्चे समेत दो की मौत: जेलेंस्की
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने आरोप लगाया कि रूस लगातार आम नागरिकों को निशाना बनाकर खुद को जीता हुआ महसूस करता है। उन्होंने इन हमलों को जानबूझकर किया गया आतंक करार दिया।
ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की को ईरानी व्यापारिक जहाज पर हमले का दोषी ठहराते हुए जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी।
दिल्ली का जंतर-मंतर। सुरक्षाकर्मियों से एक लड़की कहती है- पुलिस अंकल, पुलिस अंकल वास्तेगुना हुइंया! इसके बाद वहां मौजूद पूरा ग्रुप जोर-जोर से हंसने लगता है। पुलिस भी ठिठक जाती है कि ये कोई गाली थी या देशविरोधी नारा? आखिर इस पर एक्शन क्या ले? ये वायरल रील जंतर-मंतर समेत देशभर में फैले जेन-जी आंदोलन का लिटमस टेस्ट है। ‘वास्तेगुना हुइंया’ की तरह ये आंदोलन भी मोदी सरकार की समझ से परे था। न ‘हिंदू-मुस्लिम’ चला, न एंटी-नेशनल एंगल। न विदेशी फंडिंग के आरोप कारगर हुए, न ही कोई ऐसा चेहरा, जिसे दबाने से आंदोलन खत्म हो जाए। आखिरकार धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना ही पड़ा। अनोखा क्यों था ये जेन-जी आंदोलन और इन पर क्यों नहीं चला कोई तिकड़म; मंडे मेगा स्टोरी में पूरी कहानी… आखिर जेन-जी आंदोलन के सामने सरकार को क्यों झुकना पड़ा… **** ग्राफिक्स: द्रगचंद्र भुर्जी ---------------------------- ये खबर भी पढ़िए… बिना संबंध बनाए भी बच्चे पैदा कर लेती है कॉकरोच:सिर कटने पर भी कैसे जिंदा रहते हैं, डायनासोर से भी सीनियर; कॉकरोच के किस्से कॉकरोच जनता पार्टी की वेबसाइट, X अकाउंट और इंस्टाग्राम अकाउंट सभी हैक और डाउन हो गए, तो फाउंडर अभिजीत दीपके ने लिखा- ‘कॉकरोच कभी मरते नहीं।’बात सच भी है। कॉकरोच इस दुनिया में डायनासोर से भी पहले आए। सिर कट जाए, हफ्तों खाना न मिले फिर भी जिंदा रहते हैं। बिना नर के भी बच्चा पैदा कर सकते हैं। पूरी खबर पढ़िए…
रामजन्मभूमि पर नवंबर 2019 में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले से दो रास्ते निकले थे। विवादित 2.77 एकड़ जमीन रामलला को मिली और बाबरी की जगह नई मस्जिद के लिए अयोध्या से 25 किलोमीटर दूर धन्नीपुर में 5 एकड़ जमीन दी गई। राम मंदिर का निर्माण लगभग पूरा हो गया है। धन्नीपुर में मस्जिद की ईंट तक नहीं रखी गई। मस्जिद के लिए मिली जमीन पर घास उग आई है, चारों ओर तारबंदी है और बच्चे क्रिकेट खेल रहे हैं। यहां मस्जिद के साथ अस्पताल और म्यूजियम बनना था। 300 करोड़ रुपए की जरूरत थी, लेकिन सिर्फ डेढ़ करोड़ रुपए चंदा मिल पाया। जरूरी सरकारी मंजूरियां न मिलने से काम शुरू ही नहीं हो पाया। अब ट्रस्ट छोटी मस्जिद बनाने की तैयारी में है। धन्नीपुर के लोग मस्जिद बनने की उम्मीद छोड़ चुके हैं। वे कहते हैं- अल्लाह की मर्जी होगी, तो बन जाएगी। जमीन पर सिर्फ बोर्ड, कब्जा न हो जाए इसलिए तारबंदी अयोध्या-लखनऊ हाईवे छोड़ते ही धन्नीपुर गांव की सड़क शुरू होती है। कुछ मिनट बाद बाईं तरफ लोहे की फेंसिंग से घिरी मस्जिद की जमीन दिखती है। अंदर कोई मशीन नहीं, कोई मजदूर नहीं। सिर्फ खाली मैदान। करीब तीन हजार की आबादी वाले धन्नीपुर में 60% मुस्लिम आबादी है। ज्यादातर लोग मस्जिद पर बात करने से बचते हैं। महिलाएं तो बिल्कुल नहीं बोलतीं। मस्जिद की जमीन से सटी चाय की दुकान पर कुछ लोग अखबार पढ़ रहे थे। मस्जिद के बारे में पूछने पर एक-दूसरे को देखने लगे। एक बुजुर्ग मुस्कुराते हुए बोले, ‘हम खेती-किसानी वाले लोग हैं। यहां जानवर चराने आते हैं। मस्जिद कब बनेगी, कौन बनाएगा, ये तो लखनऊ और दिल्ली वाले जानें।’ नाम पूछने पर बुजुर्ग ने जवाब दिया- रहने दीजिए, हम इस मसले से दूर ही रहना चाहते हैं। खाली पड़ी जमीन के ठीक सामने माजिद खान का घर है। वे बात करने के लिए तैयार हो गए। बोले, ‘सुप्रीम कोर्ट के फैसले से धन्नीपुर के लोग खुश थे। न्यूज से पता चला कि मस्जिद के साथ मेडिकल कॉलेज और अस्पताल भी बनेगा।' 'गांव के आसपास 30 किमी तक अच्छा अस्पताल नहीं है। सीरियस केस में इलाज के लिए 150 किमी दूर लखनऊ जाना पड़ता है। मस्जिद बन जाती तो गांव में इलाज मिलता। बच्चे पढ़ पाते और काम मिलता, लेकिन कुछ नहीं हुआ।’ आखिर सात साल में मस्जिद क्यों नहीं बन पाई पहली वजह: फंड नहीं है नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर फैसला सुनाते हुए सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को अयोध्या में नई मस्जिद बनाने का आदेश दिया था। अयोध्या की विवादित 2.77 एकड़ जमीन हिंदू पक्ष को मिली। मस्जिद बनाने के लिए अयोध्या से 25 किमी दूर जमीन धन्नीपुर गांव में दी गई। 3 अगस्त, 2020 को फैजाबाद DM अनुज कुमार झा ने जमीन वक्फ बोर्ड को सौंप दी। मस्जिद बनाने के लिए इंडो-इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन बनाया गया। अगस्त 2021 में फाउंडेशन ने लोगों से मदद की अपील की। बैंक अकाउंट की डिटेल पब्लिक की। नवंबर, 2022 तक ट्रस्ट को देशभर से करीब 40 लाख रुपए डोनेशन मिला। इंडो-इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन के चेयरमैन जुफर अहमद फारूकी कहते हैं, ‘5 साल में हम बमुश्किल 1.5 करोड़ रुपए ही जुटा पाए हैं। इतने में बड़ी मस्जिद बना पाना मुमकिन नहीं है। हमने सोचा है कि पब्लिक के पास न जाकर अपने लोगों से 5 करोड़ रुपए जुटाएं और कम से कम छोटी मस्जिद का काम शुरू कर दें।’ पेशे से जर्नलिस्ट अरशद खान मस्जिद के काम से शुरुआत से जुड़े हैं। वे कहते हैं, ‘पहले लोगों में मस्जिद को लेकर जोश था। 21 हजार रुपए का पहला चंदा लखनऊ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रोहित श्रीवास्तव ने दिया। फैजाबाद के DM रहे अनुज कुमार झा ने जमीन दिलवाने में मदद की। इसके बाद जैसे-जैसे वक्त बीता, काम रुक गया।’ हमने पहला दान देने वाले लखनऊ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रोहित श्रीवास्तव से बात की। वे मस्जिद न बनने से नाराज हैं। कहते हैं, ‘अफसोस होता है कि मैंने जिस चीज के लिए चंदा दिया, उस पर आज तक काम शुरू नहीं हो पाया। मैं अयोध्या में राम मंदिर के दर्शन के लिए जाता हूं, तो धन्नीपुर गांव जरूर जाता हूं। हर बार मुझे वहां खाली जमीन ही नजर आती है।’ दूसरी वजह: लोगों का जुड़ाव नहींधन्नीपुर की शाहगदा शाह मजार पर 'मोहम्मद-बिन-अब्दुल्लाह' मस्जिद की फोटो वाले पोस्टर चिपकाए गए थे। इनमें अंग्रेजी में लिखा गया- A MASTERPIECE IN MAKING यानी एक नायाब मस्जिद तैयार हो रही है। धन्नीपुर के लोग खुश थे कि गांव में देश की सबसे चर्चित मस्जिद बनेगी। धीरे-धीरे वक्त बीतता गया, लेकिन काम शुरू नहीं हो पाया। मजार पर चिपके पोस्टर हटा दिए गए। इंडो-इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन के चेयरमैन जुफर अहमद फारूकी कहते हैं, 'अफसोस है कि अयोध्या में बनने वाली मस्जिद अब वैसी नहीं बन पाएगी, जैसा हमने सोचा था। फैजाबाद और अयोध्या के लोगों, खासकर मुस्लिम समुदाय ने भी इसमें इंट्रेस्ट नहीं दिखाया।’ जर्नलिस्ट अरशद खान बताते हैं, ‘नई इबादतगाह अयोध्या से दूर है। इसलिए मुसलमान खुद को इससे कनेक्ट नहीं कर पाए। अगर इसके लिए अयोध्या में जमीन मिलती तो सूरत कुछ और होती।' 'सुप्रीम कोर्ट के फैसले में भी साफ कहा गया था कि मस्जिद की जमीन अयोध्या के मुख्य स्थान पर होगी। (MOSQUE WILL BE CONSTRUCTED AT PROMINENT PLACE OF AYODHYA) हमें शहर से 25 किलोमीटर दूर जमीन मिली। वहां जाने का रास्ता बहुत संकरा है। इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है। लोग इतनी दूर क्यों नमाज पढ़ने जाएंगे।’ तीसरी वजह: अयोध्या डेवलपमेंट अथॉरिटी की मंजूरी नहींअरशद खान आगे कहते हैं, ‘ट्रस्ट बना, तब टीम अच्छी थी। अतहर हुसैन सेक्रेटरी थे। लखनऊ के सीनियर एडवोकेट इमरान अहमद शिबली मेंबर थे। मैं था, राशिद मोहम्मद साहब थे। हम लोगों ने मस्जिद बनवाने के लिए बहुत मेहनत की। नया नक्शा बनाया। उस वक्त अयोध्या जिला प्रशासन ने काफी सपोर्ट किया। हमें मस्जिद के लिए जरूरी NOC नहीं मिली।’ ‘ट्रस्ट के चेयरमैन जुफर अहमद फारुकी ने बताया था कि मुंबई के बड़े बिजनेसमैन हाजी अराफात शेख धन्नीपुर आएंगे और मस्जिद-अस्पताल का काम शुरू होगा। हाजी साहब ने बताया कि मस्जिद बनने से पहले मक्का-मदीना से ईंटें आएंगी, लेकिन जमीन पर कुछ नहीं हुआ। हमने चेयरमैन से भी कॉन्टैक्ट किया, लेकिन उनका फोन नहीं उठता। वे कई साल से आउट ऑफ कॉन्टैक्ट हैं। हमने अयोध्या डेवलपमेंट अथॉरिटी में नक्शा जमा किया था, वो भी निरस्त हो गया।’ नक्शा क्यों रिजेक्ट हो गया, इस पर हमने ट्रस्ट और अयोध्या डेवलपमेंट अथॉरिटी में बात की। पता चला कि इसके पीछे सियासी रुकावट नहीं, बल्कि कागजी पेचीदगियां हैं। कोई संस्था नॉर्मल बिल्डिंग के बजाय बड़ा पब्लिक कॉम्प्लेक्स बनाती है, तो इसके लिए नियम बहुत सख्त हो जाते हैं। इसकी प्रोसेस को तीन पॉइंट्स में समझिए… 1. लैंड यूज के कागजों में बार-बार बदलाव किसी भी बड़े निर्माण के लिए लोकल डेवलपमेंट अथॉरिटी (इस मामले में ADA) से ऑनलाइन और ऑफलाइन मंजूरी लेनी होती है। सबसे पहले जमीन का लैंड यूज देखा जाता है। इससे पता चलता है कि जमीन किस काम के लिए है। खेती की जमीन पर कॉमर्शियल या संस्थागत निर्माण नहीं हो सकता। सरकार ने कृषि भूमि दी, तो पहले उसका लैंड यूज बदलकर उसे संस्थागत करना पड़ा। इससे प्रोजेक्ट बनने में देरी हुई। 2. अथॉरिटी की तरफ से NOC न मिलना नक्शा पास होने से पहले PWD, प्रदूषण नियंत्रण विभाग, अग्निशमन विभाग, सिंचाई, नगर निगम जैसे विभागों से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट लेना होता है। अब तक मस्जिद कमेटी को इन विभागों से NOC नहीं मिली है। अयोध्या डेवलपमेंट अथॉरिटी के सेक्रेटरी आरके मिश्रा बताते हैं कि किसी भी बड़े निर्माण से पहले जमीन के मालिक को अलग-अलग विभाग की NOC लेनी पड़ती है। इसमें ये होता है कि बिल्डिंग कितनी ऊंची होगी। फायर सिस्टम कैसा होगा। इंफ्रास्ट्रक्टर कैसा है। ये सब मानक के हिसाब से होता है, तो अथॉरिटी NOC देती है। मस्जिद कमेटी ने NOC क्लीयर करने के लिए भी एप्लीकेशन नहीं दी है।' 3. ले-आउट और डेवलपमेंट चार्ज का पेमेंट न होना NOC मिलने के बाद अथॉरिटी के इंजीनियर नक्शे की जांच करते हैं कि सड़क कितनी चौड़ी है, भूकंप झेलने की क्षमता क्या है। इसके बाद डेवलपमेंट चार्ज जमा करना पड़ता है और नक्शा पास हो जाता है। ADA के मुताबिक, मस्जिद कमेटी को अभी 1.22 करोड़ रुपए डेवलपमेंट चार्ज जमा करना है। सभी जरूरी डॉक्यूमेंट पूरे होने पर ही कंस्ट्रक्शन शुरू हो सकेगा। 23 जून, 2021 को मस्जिद ट्रस्ट ने नक्शे की मंजूरी के लिए आवेदन किया था। बाद में नक्शा वापस ले लिया। 2023 में नक्शे में छोटी मस्जिद के साथ कुछ बदलाव कर फिर से अप्लाई किया। सितंबर 2025 तक ट्रस्ट ने NOC नहीं ली और जरूरी डॉक्यूमेंट पोर्टल पर अपलोड नहीं करवाए। इससे उनकी एप्लिकेशन रिजेक्ट हो गई है। हमने मस्जिद कमेटी के जनरल सेक्रेटरी अतहर हुसैन से पूछा कि 2024 के बाद नक्शे के लिए क्यों अप्लाई नहीं किया गया? उन्होंने जवाब दिया- प्रोजेक्ट के हिसाब से जितने फंड की उम्मीद की थी, उसे जुटा नहीं पाए। यही वजह है कि हम नए नक्शे पर आगे बढ़ने से पहले फंड इकट्ठा कर लेना चाहते हैं। छोटी मस्जिद बनाने लायक रकम जुट जाएगी तो हमारे चैयरमैन नक्शे के लिए एप्लीकेशन फाइल करेंगे। बाबरी केस के पक्षकार बोले- ट्रस्ट ही नहीं चाहता कि मस्जिद बने राम जन्मभूमि मंदिर के गेट नंबर 11 के सामने बाबरी मस्जिद का केस लड़ने वाले इकबाल अंसारी का घर है। मस्जिद का काम बार-बार अटकने पर इकबाल कहते हैं, ‘देखिए, मस्जिद की जमीन सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को मिली है। उसके चेयरमैन ने अपना प्राइवेट ट्रस्ट बनाया है।’ इकबाल अंसारी के अलावा जर्नलिस्ट अरशद खान ने भी ट्रस्ट पर सवाल उठाए थे। इसके जवाब में मस्जिद कमेटी के जनरल सेक्रेटरी अतहर हुसैन कहते हैं, ‘इकबाल अंसारी इस प्रोजेक्ट पर क्या सोचते हैं और क्या कह रहे हैं, इस पर कोई कमेंट नहीं करना है। अरशद खान हमारी टीम के सबसे पुराने सदस्यों में से एक रहे हैं। उन्होंने शुरुआती दौर में फंड कलेक्शन से लेकर मस्जिद में म्यूजियम बनाने का प्लान तैयार किया।’ ‘ये सच है कि वक्त बीतने के साथ हमारी टीम के सामने कई रुकावटें आईं, इससे सदस्यों के बीच बातचीत भी कम हो गई। मैं आपको यकीन दिलाता हूं कि हम जल्द ही नए प्लान के साथ जमीन पर उतरने वाले हैं।’ ……………. ये खबर भी पढ़ें… 10 मंदिर उड़ाने की धमकी, कौन है खालिस्तान नेशनल आर्मी ‘तुम्हारे हिंदू मंदिर निशाने पर हैं। दिल्ली और हरियाणा के लोगों, तुमने 6 जून, 1984 को भिंडरांवाले की मौत पर मिठाइयां बांटी थीं। अब हम इसका बदला तुम्हारे मंदिरों में ब्लास्ट करके लेंगे। इसलिए अपने बच्चों को बचाओ और 5-6 जून को कोई सफर न करो।’ 4 जून की सुबह 9:54 बजे पंचकूला के मेयर श्यामलाल बंसल को धमकी भरा ये ई-मेल मिला। इसमें दिल्ली-हरियाणा के 6 बड़े मंदिरों में ब्लास्ट करने की धमकी थी। पढ़िए पूरी खबर…
सेनेगल के राष्ट्रपति फेय ने बनाई नई राजनीतिक पार्टी
सेनेगल के राष्ट्रपति बसिरू डियोमाये फेय ने डकार में आयोजित एक स्थापना सभा में अपनी नई राजनीतिक पार्टी 'किराए, लेस पैट्रियट्स रिपब्लिकन्स' की आधिकारिक शुरुआत की।
होर्मुज स्ट्रेट में तेल टैंकर धमाके से बढ़ा तनाव, नौसैनिक सुरंग से टकराने का दावा
होर्मुज स्ट्रेट में एक तेल टैंकर के फटने का मामला सामने आया। स्थानीय मीडिया की खबरों के मुताबिक टैंकर नौसैनिक बारूदी सुरंग से टकराने के बाद फट गया
भारत से पड़ोसी देश नेपाल जाने वाले पर्यटकों, व्यापारियों और आम लोगों के लिए एक बेहद राहत भरी खबर सामने आई है। करीब एक दशक से चले आ रहे एक अहम प्रतिबंध को नेपाल सरकार ने अब खत्म कर दिया है। नेपाल राष्ट्र बैंक (NRB) ने नए नियमों के तहत भारतीय यात्रियों और नेपाली नागरिकों को 200 रुपये और नए डिजाइन वाले 500 रुपये के भारतीय नोट नेपाल लाने और ले जाने की आधिकारिक मंजूरी दे दी है। साल 2016 की नोटबंदी के बाद से लागू सख्त नियमों में इसे एक बहुत बड़ा और सकारात्मक बदलाव माना जा रहा है।नए नियमों के तहत कितनी नकदी ले जा सकेंगे यात्री?नेपाल राष्ट्र बैंक द्वारा जारी दिशानिर्देशों के अनुसार, भले ही बड़े नोटों के इस्तेमाल की छूट दे दी गई है, लेकिन अधिकतम नकदी की सीमा में कोई बदलाव नहीं हुआ है। भारत और नेपाल के नागरिक पहले की तरह ही अधिकतम 25,000 रुपये तक की भारतीय मुद्रा अपने साथ ले जा सकते हैं। इस 25,000 रुपये की सीमा में अब 200 रुपये और नए डिजाइन वाले 500 रुपये के नोट शामिल किए जा सकेंगे। हालांकि, यह छूट केवल 9 नवंबर 2016 (नोटबंदी) के बाद जारी किए गए नए नोटों पर ही लागू होगी। नोटबंदी से पहले वाले पुराने 500 और 1,000 रुपये के नोट नेपाल में अब भी पूरी तरह से प्रतिबंधित हैं।2016 की नोटबंदी के बाद क्यों लगा था यह प्रतिबंध?वर्ष 2016 में भारत में हुई नोटबंदी के बाद सुरक्षा और प्रामाणिकता के मद्देनजर नेपाल ने 100 रुपये से बड़े सभी भारतीय नोटों के इस्तेमाल और देश में प्रवेश पर रोक लगा दी थी। हालांकि भारत ने बाद में 200 और 500 रुपये के नए नोट जारी कर दिए थे, लेकिन नेपाल ने लंबे समय तक पुराने प्रतिबंध को ही जारी रखा। इस वजह से नेपाल यात्रा के दौरान व्यावहारिक रूप से लोग केवल 100 रुपये के नोट ही ले जा पाते थे, जिससे भारी नकदी ले जाने में काफी दिक्कत होती थी। अब इस फैसले के बाद नकद भुगतान और सीमा पार छोटे-मोटे लेनदेन बहुत आसान हो जाएंगे।इन लोगों को मिलेगा सीधा फायदा और तीसरे देश का नियमइस फैसले से नेपाल जाने वाले भारतीय पर्यटकों, भारत आने-जाने वाले नेपाली नागरिकों और सीमावर्ती क्षेत्रों में व्यापार करने वाले कारोबारियों को सबसे बड़ा लाभ मिलेगा। हालांकि, नेपाल राष्ट्र बैंक ने यह साफ कर दिया है कि किसी भी नेपाली नागरिक को भारत के अलावा किसी तीसरे देश के रास्ते भारतीय मुद्रा नेपाल लाने या नेपाल से किसी तीसरे देश ले जाने की अनुमति नहीं होगी। इसके अलावा, बिना कस्टम डिक्लेरेशन के अधिकतम 5,000 अमेरिकी डॉलर के बराबर विदेशी मुद्रा ले जाने का नियम पहले की तरह ही लागू रहेगा।
भारत ही नहीं, पड़ोसी देश पाकिस्तान में भी इस साल मानसून भारी आफत बनकर बरसा है। उत्तरी और उत्तर-पूर्वी पहाड़ी इलाकों में लगातार हो रही मूसलाधार बारिश ने आम जनजीवन को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है। पाकिस्तान आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के आंकड़ों के मुताबिक, मानसून सीजन की शुरुआत से लेकर अब तक बारिश, भूस्खलन और बाढ़ की घटनाओं में कम से कम 97 लोगों की जान जा चुकी है, जबकि सैकड़ों लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं।खैबर पख्तूनख्वा में मकान ढहने से 35 लोगों की मौतपाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के एबटाबाद, बुनेर, कोहिस्तान और मानसेहरा जैसे पहाड़ी जिलों में मूसलाधार बारिश ने सबसे ज्यादा तबाही मचाई है। लगातार बारिश के चलते कई मकान ढह गए और मलबे में दबने से करीब 35 लोगों की जान चली गई। पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन के कारण रास्ते बंद हो गए हैं, जिससे राहत और बचाव कार्यों में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।इस्लामाबाद, लाहौर और सियालकोट में जलभराव से हाहाकारराजधानी इस्लामाबाद में सालभर होने वाली 1,300 मिलीमीटर बारिश का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा इसी मानसून सीजन में दर्ज होता है। भारी बारिश के चलते इस्लामाबाद की सड़कें और सार्वजनिक इंफ्रास्ट्रक्चर जलमग्न हो चुके हैं। वहीं पंजाब प्रांत के लाहौर और सियालकोट जैसे बड़े शहरों में भी सड़कें नदियों जैसी नजर आ रही हैं। रिहायशी इलाकों में पानी भर जाने से हजारों लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
पाकिस्तान की सरकार भले ही भारत के खिलाफ कितना भी प्रोपेगेंडा चलाए और पाबंदियां लगाए, लेकिन वहां की आवाम और बड़े अधिकारियों पर भारतीय संस्कृति का गहरा असर है। हाल ही में पाकिस्तान की एक सीनियर महिला पुलिस अधिकारी, डॉ. अनूश मसूद चौधरी का वीडियो सोशल मीडिया पर काफी सुर्खियां बटोर रहा है। वह लगातार पंजाबी और हरियाणवी गानों पर रील्स बनाकर इंटरनेट पर छा गई हैं। इसे देखकर साफ लगता है कि सरहद पार भी भारतीय संगीत का जादू वहां के सिस्टम के सिर चढ़कर बोल रहा है।कौन हैं पाकिस्तान की 'लेडी सिंघम' डॉ. अनूश मसूद?मूल रूप से पेशावर की रहने वाली डॉ. अनूश मसूद चौधरी वर्तमान में पाकिस्तान की पंजाब एलीट पुलिस में डिप्टी डायरेक्टर के पद पर कार्यरत हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, खासकर फेसबुक पर उनके ढाई लाख से ज्यादा फॉलोअर्स हैं। दिलचस्प बात यह है कि अनूश अपनी सख्त पुलिसिंग के साथ-साथ अब हरियाणवी गानों पर अपने शानदार अंदाज और 'टोरे' के लिए चर्चा का मुख्य केंद्र बन गई हैं।MBBS में गोल्ड मेडल से लेकर पुलिस सर्विस तक का सफरडॉ. अनूश का करियर बेहद प्रेरणादायक रहा है। एक वायरल वीडियो में वह खुद बताती हैं कि उन्होंने मेडिसिन (MBBS) की पढ़ाई की है और उसमें गोल्ड मेडल हासिल किया।2011: सिविल सेवा (CSS) परीक्षा पास करके अपनी पहली पसंद के तौर पर पाकिस्तान पुलिस सर्विस को चुना।2014: वह खैबर पख्तूनख्वा (KPK) में तैनात होने वाली पहली महिला एएसपी (ASP) बनीं।2018: अपनी काबिलियत के दम पर उन्हें लाहौर की पहली महिला एसएसपी (इन्वेस्टिगेशन) बनने का गौरव प्राप्त हुआ।2020: बेहतरीन कार्यशैली के लिए उन्हें 'इंटरनेशनल वूमेन ऑफ करेज अवॉर्ड' से भी नवाजा जा चुका है।पाकिस्तानी हुक्मरानों की पाबंदियों पर भारी भारतीय संस्कृतिएक तरफ पाकिस्तान सरकार कट्टरपंथी एजेंडे के तहत भारतीय फिल्मों और कंटेंट पर प्रतिबंध लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ती है। हाल ही में जब ब्लॉकबस्टर फिल्म 'धुरंधर' में पाकिस्तान की आतंकी साजिशों का पर्दाफाश हुआ, तो अपनी पोल खुलने के डर से उन्होंने फिल्म को ही बैन कर दिया। लेकिन दूसरी तरफ, डॉ. अनूश जैसे शीर्ष अधिकारी यह साबित कर रहे हैं कि कला और संगीत की कोई सरहद नहीं होती। पाकिस्तान की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था के बीच उनकी अपनी लेडी अफसर का भारतीय गानों पर थिरकना इंटरनेट यूजर्स को काफी पसंद आ रहा है।
ईरान पर अमेरिकी हमलों पर लगी रोक: कूटनीतिक बातचीत और मिसाइल भंडार की कमी के चलते ट्रंप ने थामे कदम
मिडिल ईस्ट में तनाव के बीच अमेरिका ने ईरान पर अपने लगातार हमले फिलहाल रोक दिए हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस आदेश के पीछे कूटनीतिक प्रयासों को बढ़ावा देना, अमेरिकी मिसाइल डिफेंस सिस्टम के घटते भंडार और युद्ध के और अधिक फैलने का डर मुख्य वजहें बताई जा रही हैं। ओमान की मध्यस्थता से तेहरान और वाशिंगटन के बीच बातचीत की संभावनाएं मजबूत हुई हैं, जिसके चलते ओमान का प्रतिनिधिमंडल भी तेहरान पहुंचा है। हालांकि, अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी अभी भी जारी है और पेंटागन ने स्पष्ट किया है कि यदि बातचीत विफल होती है, तो सैन्य विकल्प दोबारा खोले जा सकते हैं।क्यों रोके गए ईरान पर अमेरिकी हमलेअमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले 13 दिनों की भारी बमबारी के बाद ट्रंप प्रशासन ने नए हमलों पर अस्थायी विराम लगाया है। सीमित सैन्य अभियानों की अपनी एक सीमा तय होने और बड़े पैमाने पर युद्ध छिड़ने के खतरे को भांपते हुए यह कदम उठाया गया है। व्हाइट हाउस का मानना है कि इस समय सैन्य कार्रवाई के साथ-साथ कूटनीतिक समझौते की कोशिश करना अधिक समझदारी होगी, हालांकि ईरान के रुख को देखते हुए सेना को पूरी तरह सतर्क रहने के निर्देश दिए गए हैं।पैट्रियट मिसाइलों का घटता भंडार बना बड़ी चिंताइस सैन्य विराम के पीछे एक बड़ा कारण अमेरिकी रक्षा विभाग यानी पेंटागन के पास हथियारों की कमी भी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले कुछ महीनों में अमेरिकी सेना 1200 से ज्यादा पैट्रियट इंटरसेप्टर मिसाइलों का इस्तेमाल कर चुकी है। सैन्य अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि ईरान के खिलाफ बड़े स्तर पर अभियान जारी रखा गया, तो एयर डिफेंस सिस्टम और मिसाइलों के स्टॉक पर भारी दबाव पड़ सकता है। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और शीर्ष सैन्य अधिकारियों ने भी क्षेत्र में व्यापक युद्ध की आशंका जताते हुए सावधानी बरतने की सलाह दी थी।स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और कूटनीति पर टिकी निगाहेंमौजूदा संघर्ष का मुख्य केंद्र दुनिया के सबसे अहम तेल मार्ग 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' की आवाजाही को फिर से शुरू करना है। ओमान की पहल पर चल रही बातचीत के जरिए इस जलमार्ग को सुरक्षित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि, लाल सागर और खाड़ी क्षेत्र में हूती विद्रोहियों की गतिविधियों और क्षेत्रीय मोर्चों पर तनाव अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। अमेरिका और ईरान के बीच यह विराम एक स्थायी शांति समझौता लाएगा या यह केवल अगली बड़ी सैन्य कार्रवाई से पहले का ठहराव है, यह आने वाले दिनों की कूटनीतिक बैठकों पर निर्भर करेगा।
6 जून 2026, अभिजीत दिपके पहली बार लंदन से पहली बार दिल्ली एयरपोर्ट उतरे और सीधे जंतर-मंतर प्रोटेस्ट साइट पहुंचे। 20 जून को दोबारा प्रोटेस्ट पर बैठे, तो 36 दिन प्रोटेस्ट के बाद 25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेकर उठे। जंतर-मंतर से जाते-जाते कॉकरोच पार्टी ने प्रोटेस्टर्स से कहा- ‘जल्दी दोबारा मिलेंगे।’ सवाल है कि आखिर कॉकरोच जनता पार्टी आगे करने क्या वाली है, फ्यूचर के कौन से 3 सिनैरियो, जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में... इसके संकेत क्या हैं कॉकरोच जनता पार्टी की शुरुआत में फाउंडर अभिजीत दिपके ने कहा था कि उनका राजनीति में उतरने का कोई इरादा नहीं है। वे किसी राजनीतिक दल के साथ भी नहीं आएंगे। हालांकि जंतर-मंतर पर 36 दिनों के प्रोटेस्ट के बाद 25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से कई संकेत मिले कि कॉकरोच पार्टी राजनीति में उतर सकती है… ताकत क्या है चैलेंज क्या है इसके संकेत क्या हैं आशुतोष रांका ने जंतर-मंतर पर कहा कि ये प्रोटेस्ट यहीं खत्म होता है, लेकिन उसके साथ एक और बात कही- ‘हम जल्दी मिलेंगे।’ CJP के फाउंडर अभिजीत दिपके ने भी कहा, 'हम ऐसे ही नहीं जाएंगे। कॉकरोच हैं, एक बार घुसते हैं, तो निकलते नहीं। लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। अगला फेज एजुकेशन रिफॉर्म्स को लेकर होगा।’ जब धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की घोषणा हुई, तो केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह के साथ मौजूद सौरव दास ने कहा था, ‘हमने सरकार को एजुकेशन रिफॉर्म का जो चार्टर दिया है, उस पर अगले 4 हफ्ते में चर्चा होगी।’ CJP का कहना है कि सरकार पर पेपर लीक के खिलाफ सख्त कानून, परीक्षाओं को लेकर पारदर्शिता और जवाबदेही तय करने के लिए दबाव बनाए रखेंगे। अब हमारी जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि ये वादे पूरे हों। यानी फिलहाल CJP इन मुद्दों को लेकर आगे अपनी कोशिशें जारी रखेगी। कॉकरोच जनता पार्टी दिल्ली के बाद देश के दूसरे शहरों में लोकल मुद्दों को लेकर भी एक्टिव हो सकती है… ताकत क्या है चैलेंज क्या है इसके संकेत क्या हैं आशुतोष रांका ने संकेत दिया है कि एक प्रेशर ग्रुप की तरह काम करना भी एक विकल्प है। उन्होंने कहा, ‘ये जरूरी नहीं कि आप पॉलिटिकल पार्टी बनकर 5 साल में वोट मांगने जाओ। सिविल सोसाइटी, प्रेशर ग्रुप और मूवमेंट भी लोकतंत्र का हिस्सा हैं। हमारे लिए अभी मुद्दा जरूरी है और जवाबदेही तय करना लक्ष्य है। ये मुद्दा हमें जिस तरफ ले जाएगा, हम वहां जाएंगे।’ पूरे प्रोटेस्ट में मुख्य विपक्षी नेता राहुल गांधी ने छात्रों के मुद्दों पर सरकार को तो घेरा, लेकिन CJP से एक दूरी भी बनाए रखी, इससे भी कॉकरोच जनता पार्टी की भूमिका मजबूत हुई है… ताकत क्या है चैलेंज क्या है कांग्रेस कवर करने वाले आदेश रावल कहते हैं, एक प्रोटेस्ट से कॉकरोच जनता पार्टी विपक्ष की भूमिका में नहीं खड़ी हो सकती। सरकार पर प्रेशर तब बढ़ा, जब 20 जुलाई के ‘पुलिस एक्शन’ के बाद कांग्रेस इस पर तेजी से एक्टिव हुई। इसके बाद पीएम मोदी 5 बार झुके। पेपर लीक पर फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का फैसला, NTA के ऑफिसर्स को बर्खास्त करना हो, इंस्टाग्राम पर वीडियो डालना हो या आखिर में धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा। ---------- ये खबर भी पढ़िए… इन 5 वजहों से घबराई सरकार, तब हुआ धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा; नहीं झुकते तो क्या हो जाता, आखिरकार आंदोलन खत्म शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने आखिरकार इस्तीफा दे ही दिया। जंतर-मंतर पर 35 दिन से कॉकरोच जनता पार्टी का अनशन, पीएम आवास के बाहर राहुल गांधी का धरना, संसद में रोज गूंजता हंगामा और देश-दुनिया के कई शहरों में हो रहे प्रदर्शन से सरकार दबाव में थी। पूरी खबर पढ़िए…
अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के चेयरमैन जनरल डैन केन ने ईरान में युद्ध बढ़ने को लेकर चिंता जताई। अमेरिकी मीडिया के अनुसार, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार (स्थानीय समय) को व्हाइट हाउस मीटिंग के दौरान इस संभावना पर विचार किया। इसके साथ ही अमेरिका ने ईरान पर जारी हमलों को रोक दिया।
पाकिस्तान: सिंध में नए प्रांत की मांग लेकर सड़क पर उतरा सियासी दल, भेदभाव का लगाया आरोप
पाकिस्तान की मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट-पाकिस्तान (एमक्यूएम-पी) ने सिंध समेत देश में नए प्रांतों के गठन की मांग को लेकर अपना अभियान तेज कर दिया है। शनिवार को पार्टी अध्यक्ष खालिद मकबूल सिद्दीकी ने हैदराबाद में रैली का नेतृत्व किया, जबकि वरिष्ठ नेता और संघीय स्वास्थ्य मंत्री मुस्तफा कमाल ने कराची में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर प्रशासनिक आधार पर नए प्रांत बनाए जाने की मांग दोहराई। हैदराबाद में हजारों की तादाद में लोग जुटे।
खाड़ी देशों में फिर मंडराया युद्ध का खतरा, हूती विद्रोहियों ने सऊदी के तेल ठिकानों पर बोला हमला
मध्य पूर्व यानी खाड़ी के देशों में एक बार फिर से तनाव अपने चरम पर पहुंच गया है, जिससे पूरे इलाके में बड़े पैमाने पर युद्ध छिड़ने का खतरा मंडराने लगा है। शनिवार को घटी दो बड़ी और अहम घटनाओं ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। एक तरफ जहां ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के बेहद अहम तेल ठिकानों को निशाना बनाया है, वहीं दूसरी तरफ कैस्पियन सागर में एक ईरानी कमर्शियल जहाज पर हुए हमले को लेकर ईरान और यूक्रेन आमने-सामने आ गए हैं। इस स्थिति के चलते वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर भी गंभीर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।सऊदी अरब के तेल ठिकानों पर हूती विद्रोहियों का बड़ा हमलाशनिवार को यमन के ईरान समर्थित हूती गुट ने सऊदी अरब की धरती पर स्थित दो प्रमुख तेल ठिकानों पर ताबड़तोड़ हमले किए। हूती संगठन के प्रवक्ता की ओर से जारी किए गए बयानों के अनुसार, सऊदी अरब के जिजान और यानबू शहरों में स्थित अरामको कंपनी की रिफाइनरियों और तेल भंडारण केंद्रों को इस हमले में खासतौर पर निशाना बनाया गया। सोशल मीडिया और सामने आए वीडियो फुटेज में जिजान रिफाइनरी से आसमान में काले धुएं का भारी गुबार उठता हुआ साफ तौर पर देखा गया।ग्रीक सुरक्षा से जुड़े सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, यानबू शहर की तरफ दागी गई दो खतरनाक बैलिस्टिक मिसाइलों को अमेरिकी पैट्रियट डिफेंस सिस्टम की मदद से हवा में ही सफलतापूर्वक नष्ट कर दिया गया। आपको बता दें कि यानबू सऊदी अरब का लाल सागर के तट पर स्थित सबसे महत्वपूर्ण तेल बंदरगाह है। मौजूदा समय में जब होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है, तब सऊदी अरब के लिए तेल निर्यात करने का यह सबसे मुख्य और सुरक्षित रास्ता माना जाता है। इसके अलावा, जिजान रिफाइनरी की कुल क्षमता प्रतिदिन चार लाख बैरल तेल के उत्पादन की है, ऐसे में इस पर हुआ यह हमला आर्थिक और रणनीतिक दोनों लिहाज से बहुत बड़ा झटका है।यमन में फिर से सुलग उठा गृह युद्ध का संकटहूती विद्रोहियों के इन हमलों के तुरंत बाद सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन ने भी आक्रामक रुख अपनाते हुए कड़ा जवाब दिया है। गठबंधन सेना ने यमन के मारिब, अल-जौफ और होदेदाह इलाकों में स्थित हूती विद्रोहियों के कई प्रमुख ठिकानों पर भीषण बमबारी की है। यमन के स्थानीय अधिकारियों का कहना है कि इस सैन्य कार्रवाई के बाद दोनों ही पक्षों ने एक बार फिर से युद्ध के मोर्चों पर भारी संख्या में सेना जुटाना शुरू कर दिया है।गौरतलब है कि साल 2022 से काफी हद तक थमा हुआ यमन का गृह युद्ध इस महीने एक बार फिर से भड़कता हुआ नजर आ रहा है। हूती विद्रोहियों ने पिछले ही हफ्ते सऊदी अरब की नौसैनिक नाकेबंदी की आधिकारिक घोषणा की थी और इसके ठीक बाद गुरुवार को लाल सागर के रास्ते से गुजर रहे सऊदी अरब के दो तेल टैंकरों पर भी हमला कर दिया था। इन लगातार बढ़ती घटनाओं से इस बात की पूरी आशंका जताई जा रही है कि यमन का यह पुराना संघर्ष एक बार फिर से बड़े युद्ध का रूप ले सकता है।ईरान और यूक्रेन के बीच बढ़ा तनाव, कैस्पियन सागर में जहाज पर हमलासऊदी अरब पर हुए हमलों के साथ-साथ खाड़ी क्षेत्र में एक और बड़े भू-राजनीतिक विवाद ने जन्म ले लिया है। ईरान के विदेश मंत्रालय ने यूक्रेन पर कैस्पियन सागर के भीतर एक ईरानी कमर्शियल जहाज को टारगेट करने और उस पर हमला करने का गंभीर आरोप लगाया है। ईरानी मंत्रालय के आधिकारिक बयान के मुताबिक, इस खतरनाक हमले के दौरान हुए जोरदार विस्फोट में जहाज पर सवार एक नाविक की दर्दनाक मौत हो गई, जबकि एक अन्य सदस्य गंभीर रूप से घायल हो गया है।इस घटना के विरोध में ईरान ने तेहरान स्थित यूक्रेन के शीर्ष राजनयिक को तलब किया और इस पूरी कार्रवाई को एक खुला दुश्मनी भरा और आपराधिक कृत्य करार दिया। दूसरी ओर, इस विवाद को हवा तब और मिल गई जब यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर जेलेंस्की ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कैस्पियन सागर में हुए लंबी दूरी के हमलों की खुली तारीफ की थी। राष्ट्रपति जेलेंस्की ने अपने बयान में यह भी आरोप लगाया था कि रूस मध्य पूर्व क्षेत्र से जुड़ी सामरिक और सैटेलाइट की खुफिया जानकारियां लगातार ईरान के साथ साझा कर रहा है।अमेरिका की सक्रियता और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर मंडराता खतराइस पूरे घटनाक्रम के बीच अमेरिकी सेना भी खाड़ी के समंदर में पूरी तरह से सक्रिय हो गई है। हाल ही में अमेरिकी नौसेना ने ओमान की खाड़ी में एक ऐसे संदिग्ध जहाज को रोका है, जिसने हूती विद्रोहियों द्वारा घोषित की गई नाकेबंदी को तोड़ने का दुस्साहस किया था। अंतरराष्ट्रीय रक्षा और ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य के बाद लाल सागर का यह व्यापारिक और नौवहन मार्ग भी इसी तरह बाधित होता रहा, तो आने वाले दिनों में इसका सीधा और बहुत बुरा असर पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति तथा कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ेगा।
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में इस समय हालात बेहद विस्फोटक और बेकाबू हो चुके हैं। महंगाई, बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी और रोजमर्रा की जरूरी चीजों के लिए त्राहि-त्राहि कर रही स्थानीय जनता का गुस्सा आखिरकार सड़कों पर फूट पड़ा है। PoK के इतिहास में यह अब तक का सबसे बड़ा और उग्र जनआंदोलन माना जा रहा है, जहां आम कश्मीरी रोटी और दाल जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए भी संघर्ष करने को मजबूर हैं। आम जनता का आरोप है कि इस्लामाबाद में बैठी शहबाज शरीफ सरकार और सेना के शीर्ष कमांडर इस मानवीय संकट से पूरी तरह आंखें मूंदे हुए हैं और जनता की चीख-पुकार उन तक नहीं पहुंच रही है।महंगाई और बदहाली से त्रस्त कश्मीरी जनता का फूटा आक्रोशPoK के विभिन्न शहरों और कस्बों में पिछले कुछ दिनों से लगातार बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। हालात इतने तनावपूर्ण हो गए हैं कि बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक सड़कों पर उतरकर सरकार के खिलाफ नारेबाजी कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उन्हें भारी भरकम टैक्स, आसमान छूती महंगाई और बिजली-पानी की भारी किल्लत के बीच जीने के लिए मजबूर किया जा रहा है। खाने-पीने की मूलभूत चीजों के दाम इतने बढ़ चुके हैं कि आम आदमी की थाली से दाल और रोटी तक गायब होने की कगार पर आ गई है, जिससे स्थानीय नागरिकों में पाकिस्तान के शासन के प्रति भारी नफरत पैदा हो गई है।शहबाज-मुनीर की बेरुखी और कुप्रबंधन पर उठे बड़े सवालस्थानीय लोगों और राजनीतिक विश्लेषकों का साफ तौर पर कहना है कि पाकिस्तान की शहबाज शरीफ सरकार और सेना प्रमुख असीम मुनीर इस गंभीर संकट पर पूरी तरह संवेदनहीन बने हुए हैं। जनता के बुनियादी अधिकारों और कल्याण की अनदेखी कर केवल अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने वाले हुक्मरानों को इस जनआंदोलन की गूंज सुनाई नहीं दे रही है। क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन पाकिस्तान द्वारा बेर्हमी से किए जाने के बावजूद यहां के स्थानीय नागरिकों को बुनियादी सुविधाएं तक मयस्सर नहीं हैं, जिसके कारण पाकिस्तान के खिलाफ यह बगावत अब एक बड़े जनसैलाब का रूप ले चुकी है।अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उजागर हुआ पाकिस्तान का असली चेहराPoK में चल रहे इस अभूतपूर्व आंदोलन ने एक बार फिर पाकिस्तान के कुशासन और मानवाधिकारों के हनन की पोल खोलकर रख दी है। जबरन कब्जाए गए इस क्षेत्र में दशकों से हो रहे आर्थिक शोषण और भेदभाव के खिलाफ जनता का यह खुला विद्रोह पाकिस्तान की नींव हिला रहा है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर के फर्जी आंसू बहाने वाले पाकिस्तानी हुक्मरा अब अपने ही घर में सुलग रही इस आग को बुझाने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहे हैं, और आने वाले दिनों में यह संकट पाकिस्तान की सत्ता के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बन सकता है।
दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में शुमार लाल सागर (Red Sea) क्षेत्र में चल रहे भयंकर तनाव और संघर्ष के बीच भारत की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर एक बड़ी राहत भरी खबर सामने आई है। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक उथल-पुथल और हमलों के बावजूद देश में एलपीजी, क्रूड ऑयल और अन्य जरूरी ईंधन की आपूर्ति पूरी तरह से सुरक्षित बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्ग बाधित होने के बावजूद भारत की मजबूत कूटनीतिक रणनीतियों और डाइवर्सिफाइड सप्लाई चेन के कारण घरेलू बाजार में ऊर्जा संकट की कोई आशंका नहीं है।लाल सागर संकट और वैश्विक समुद्री मार्गों की चुनौतीमध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और हूती विद्रोहियों के हमलों के चलते लाल सागर के रास्ते होने वाला वैश्विक व्यापार भारी संकट के दौर से गुजर रहा है। इस मार्ग पर सुरक्षा जोखिम बढ़ने के कारण जहाजों को लंबे और महंगे वैकल्पिक रूट यानी अफ्रीका के गुड होप के रास्ते से गुजरना पड़ रहा है, जिससे माल भाड़े और शिपिंग लागत में भारी बढ़ोतरी हुई है। इसके बावजूद भारत ने अपने ऊर्जा आयात और व्यापारिक हितों को सुरक्षित रखने के लिए बेहद प्रभावी कदम उठाए हैं, जिससे देश के भीतर आवश्यक वस्तुओं और ईंधन की कीमतों या उपलब्धता पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ा है।ऊर्जा सुरक्षा और वैकल्पिक स्रोतों से मजबूत स्थितिभारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए विभिन्न देशों से तेल और गैस आयात के विकल्पों को पहले ही मजबूत कर लिया है। खाड़ी देशों के अलावा रूस और अन्य अंतरराष्ट्रीय बाजारों से लगातार हो रही तेल आपूर्ति ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि देश के रिफाइनरियों और रसोईघरों तक ऊर्जा की निर्बाध सप्लाई पहुंचती रहे। भारत सरकार की सक्रिय नीतियों और समय पर उठाए गए कदमों के कारण वैश्विक स्तर पर मची उथल-पुथल का घरेलू उपभोक्ताओं पर न्यूनतम असर देखने को मिल रहा है।आम जनता पर नहीं पड़ेगा महंगाई और ईंधन संकट का बोझविशेषज्ञों का मानना है कि भारत की मजबूत आर्थिक स्थिति और रणनीतिक भंडारों की वजह से लाल सागर का यह संकट देश की विकास यात्रा को नहीं रोक पाएगा। रसोई गैस के सिलेंडरों से लेकर पेट्रोल-डीजल की आपूर्ति तक हर मोर्चे पर स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है। सरकार और तेल विपणन कंपनियां यह सुनिश्चित कर रही हैं कि आम नागरिकों को किसी भी तरह की कठिनाई का सामना न करना पड़े और देश की अर्थव्यवस्था रफ्तार पकड़ती रहे।
तनाव का नया केंद्र सऊदी अरब और ईरान समर्थित हाउती विद्रोही बन गए हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, हाउती लड़ाकों ने लाल सागर क्षेत्र में सऊदी अरब के दो तेल टैंकरों को निशाना बनाने के बाद जिजान और यानबू स्थित अरामको की तेल रिफाइनरियों पर बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन से हमला किया।
मध्य पूर्व में लगातार बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान को दी गई नई चेतावनियों ने वैश्विक कूटनीति में हलचल तेज कर दी है। अगर अमेरिका और ईरान के बीच जारी ओमान डिप्लोमैटिक चैनल वार्ता किसी नतीजे पर नहीं पहुंचती है, तो अमेरिकी सेना ईरान के परमाणु कार्यक्रमों के बचे हुए ढांचों को पूरी तरह ध्वस्त कर सकती है।अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन केवल ईरान के चर्चित 'पिकैक्स माउंटेन' (Pickaxe Mountain) तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अमेरिकी सेना की न्यूक्लियर टारगेट लिस्ट में ईरान के 5 बेहद संवेदनशील और गुप्त ठिकाने शामिल हैं।डोनाल्ड ट्रंप की 'न्यूक्लियर टारगेट लिस्ट' में शामिल 5 प्रमुख ठिकानेपिकैक्स माउंटेन (नतांज के पास): नतांज के पास ठोस ग्रेनाइट की पहाड़ियों के 300 से 450 फीट नीचे स्थित यह बेहद सुरक्षित अंडरग्राउंड साइट है। इजराइली खुफिया एजेंसियों का मानना है कि ईरान ने पिछले साल हजारों आधुनिक सेंट्रीफ्यूज यहां छिपाए थे। यह जगह अमेरिका के सबसे बड़े बंकर-बस्टर बमों की पहुंच से भी काफी गहरी है, इसलिए अमेरिकी रणनीति इसके मुख्य द्वारों और सुरंगों को सील कर इसे निष्क्रिय करने की होगी।तालेघन 2 (पारचिन कॉम्प्लेक्स): ईरान के पारचिन सैन्य परिसर में स्थित 'तालेघन 2' वह जगह है, जहां ईरान परमाणु विस्फोट से जुड़े हाई-एक्सप्लोसिव परीक्षणों का काम फिर से शुरू कर रहा है। खुफिया रिपोर्टों के मुताबिक, पिछले हमलों के बाद भी यहां एक मुख्य टेस्ट चैंबर पूरी तरह सुरक्षित बच गया है।फोर्डो (Fordow) की सपोर्ट साइट: फोर्डो की जमीन पर स्थित सपोर्ट फैसिलिटी में ऐसे खास सेंट्रीफ्यूज और आइसोटोप मौजूद हैं, जिन्हें जरूरत पड़ने पर यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) के लिए फिर से तुरंत इस्तेमाल में लाया जा सकता है।इस्फहान की सील की गई सुरंगें: इस्फहान स्थित परमाणु केंद्र की सील की गई गुप्त सुरंगों में भारी वाहनों की संदिग्ध गतिविधियां देखी गई हैं, जिससे अंदेशा है कि ईरान यहां नए सिरे से परमाणु उपकरणों को इकट्ठा कर रहा है।नतांज की बची हुई इमारतें: पूर्व में हुए हमलों के बावजूद नतांज परिसर की कई बची हुई इमारतें और रिसर्च फैसिलिटी अभी भी अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (Pentagon) के निशाने पर बनी हुई हैं।ईरान के पास समय कम: विशेषज्ञों की चेतावनीपरमाणु मामलों के पूर्व अंतरराष्ट्रीय निरीक्षक डेविड अलब्राइट के अनुसार, हालांकि ईरान की अधिकांश प्राथमिक परमाणु साइटों को पहले ही नुकसान पहुंचाया जा चुका है, लेकिन जिस तरह से ईरान दोबारा निर्माण कर रहा है और नए इंटेलिजेंस इनपुट्स सामने आ रहे हैं, वे अमेरिका को फिर से हमलों के लिए मजबूर कर सकते हैं। विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि जैसे-जैसे समय बीत रहा है, अपने परमाणु कार्यक्रम को जीवित रखने के लिए ईरान के लिए पिकैक्स पहाड़ की उपयोगिता और अधिक महत्वपूर्ण होती जा रही है।ओमान वार्ता पर टिकी हैं दुनिया की नजरेंअमेरिका ने ईरान के कोर न्यूक्लियर टियर पर सीधे हमलों से परहेज किया है, लेकिन ओमान के माध्यम से अमेरिका और ईरान के बीच बैकचैनल बातचीत जारी है। यदि यह कूटनीतिक प्रयास नाकाम होता है, तो तेहरान को अच्छे से पता है कि युद्ध के अगले चरण में उसकी कौन-कौन सी साइट्स अमेरिकी मिसाइलों और बमवर्षकों के सीधे निशाने पर होंगी।

