श्रीलंका में बुजुर्गों के केयर सेंटर में लगी भीषण आग, 12 लोगों की मौत और कई घायल
श्रीलंका में बुजुर्गों के केयर सेंटर में भीषण आग लगने की घटना सामने आई है, जिसमें जानमाल का बेहद नुकसान हुआ। स्थानीय पुलिस ने गुरुवार को बताया कि श्रीलंका के पश्चिमी प्रांत में बुधवार देर शाम एक बुजुर्गों के केयर सेंटर में लगी आग में 12 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है।
इजरायल और लेबनान के बीच अमेरिका की मध्यस्थता में युद्धविराम पर बनी सहमति
इजरायल और लेबनान ने वॉशिंगटन में दो दिनों तक चली अमेरिका की मध्यस्थता वाली बातचीत के बाद युद्धविराम लागू करने पर सहमति जताई है। दोनों देशों ने आगे भी सीधे बातचीत जारी रखने और सुरक्षा व्यवस्था को आगे बढ़ाने का वादा किया है, ताकि दक्षिणी लेबनान में किसी भी गैर-सरकारी सशस्त्र समूह की वापसी रोकी जा सके।
6 मई की शाम। बंगाल चुनाव हारने के बाद ममता बनर्जी ने घर पर TMC विधायकों की बैठक बुलाई। इसमें अभिषेक बनर्जी की चुनावी भूमिका की तारीफ करते हुए खड़े होकर तालियां बजाने को कहा। कुछ विधायक खड़े हुए। कुछ चुपचाप बैठे रहे। बैठे रहने वालों में एक थे ऋतब्रत बनर्जी। ठीक 29 दिन बाद वही ऋतब्रत बंगाल विधानसभा के नेता विपक्ष बन चुके हैं। उन्होंने 58 बागी विधायकों को साथ लेकर असली TMC का दावा किया है। आखिर ये सब हुआ कैसे, कौन हैं ऋतब्रत बनर्जी और क्या TMC को बीजेपी खत्म कर देगी; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: TMC में 58 बागी विधायकों का अलग धड़ा कैसे बन गया? जवाबः 4 मई को पश्चिम बंगाल में चुनाव के नतीजे आए। 41% वोट शेयर के बावजूद TMC सिर्फ 80 सीटें जीत पाई। बीजेपी को 207 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत मिला। 6 मई की मीटिंग का किस्सा हमने ऊपर सुनाया। पश्चिम बंगाल की सीनियर पत्रकार शिखा मुखर्जी बताती हैं कि ममता उस बैठक में भतीजे अभिषेक की तारीफ कर रही थीं, जबकि ऋतब्रत बनर्जी, संदीपन साहा और कुणाल घोष जैसे नेता अभिषेक बनर्जी और I-PAC को हार का जिम्मेदार ठहरा रहे थे। IPAC ने ही टीएमसी के चुनावी प्रचार का जिम्मा संभाला था। टीएमसी में बगावत का असली खेल शुरू हुआ 22 मई से। पश्चिम बंगाल के सीनियर पत्रकार प्रभाकर मणि तिवारी बताते हैं, ‘22 मई को ऋतब्रत राज्यसभा की कुछ औपचारिकताओं के सिलसिले में दिल्ली गए थे। इसी दिन CM शुभेंदु अधिकारी भी दिल्ली स्थित बंग भवन में मौजूद थे। लंच पर दोनों नेताओं की मुलाकात हुई।’ बंगाल लौटने के बाद ऋतब्रत ने अभिषेक बनर्जी से असंतुष्ट नेताओं को एकजुट करना शुरू किया। ऋतब्रत की कोशिश तब सफल हुई, जब ममता की 31 मई की बैठक में 80 में से 20 विधायक ही पहुंचे। 1 जून की रात कोलकाता के एक हॉस्टल में ऋतब्रत की TMC विधायकों के साथ बैठक की खबरें सामने आईं, तो बगावत की अटकलों पर मुहर लग गई। 1 जून को ममता ने ऋतब्रत और संदीपन साहा को पार्टी विरोधी गतिविधियों में लिप्त होने की वजह से TMC से बाहर कर दिया। 4 जून की सुबह ममता ने TMC का पूरा संगठन भंग करने का ऐलान किया। शाम तक खबर आ गई ऋतब्रत ने विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बसु को 58 बागी विधायकों के समर्थन वाला पत्र सौंपा है। उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया और विधानसभा में विपक्ष के नेता के कमरे की चाबी ऋतब्रत को सौंप दी। शिखा मुखर्जी बताती हैं कि ऋतब्रत मुस्लिम विधायकों के समर्थन के बिना पार्टी नहीं तोड़ सकते थे, क्योंकि 80 में से 34 विधायक मुस्लिम थे। इसीलिए नेता विपक्ष बनने के बाद ऋतब्रत ने 4 डिप्टी लीडर चुने हैं, जिनमें से दो मुस्लिम हैं- सबीना यास्मीन और जावेद अहमद खान। वहीं अख्रुज्जमान को चीफ व्हिप बनाया गया है।’ ममता ने विधानसभा स्पीकर रथींद्र दास की भूमिका पर सवाल उठाया है। उन्होंने कहा, 'जिस नेता को 2 दिन पहले पार्टी से निकाला गया, उसे स्पीकर विपक्ष का नेता कैसे चुन सकते हैं? ऋतब्रत के पास पार्टी का लेटरहेड भी नहीं था, उन्होंने कोरे कागज पर रिजॉल्यूशन लिखकर स्पीकर को भेजा, फिर भी स्पीकर ने उसे स्वीकार कैसे कर लिया?' सवाल-2: ममता की जमीन खिसकाने वाले ऋतब्रत बनर्जी कौन हैं? जवाबः 47 साल के ऋतब्रत बनर्जी कोलकाता के रहने वाले हैं। 1990 के दशक में उन्होंने वामपंथी स्टूडेंट पॉलिटिक्स से शुरूआत की। वो CPI (M) की स्टूडेंट विंग स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया यानी SFI के जनरल सेक्रेटरी बने। ऋतब्रत करीब 8 साल तक SFI से जुड़े रहे। बेबाक भाषणों की बदौलत उनकी छवि युवा वामपंथी नेता के तौर पर मजबूत हुई। कहा जाता है कि वो CPI(M) के महासचिव रहे दिवंगत सीताराम येचुरी के भी करीबी थे। 2011 में विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए ममता बनर्जी ने कोलकाता दक्षिण लोकसभा सीट खाली कर दी। उपचुनाव में CPI (M) ने ऋतब्रत को उम्मीदवार बनाया, लेकिन वो चुनाव हार गए। 2014 में CPI (M) ने सिर्फ 35 साल के ऋतब्रत को राज्यसभा सांसद बना दिया। उन्हें एपल की स्मार्टवॉच और मोंटब्लैंक पेन जैसी महंगी चीजों का इस्तेमाल करते देखा गया। कहा जाता है कि ‘लग्जरी लाइफस्टाइल’ के चलते CPI (M) के टॉप लीडर्स से उनके मतभेद हो गए थे। 2017 में एक इंटरव्यू में ऋतब्रत ने कहा कि उनकी लड़ाई प्रकाश करात, वृंदा करात जैसे लीडर्स से है। इस बयान के कुछ ही दिन बाद CPI(M) ने उन्हें पहले सस्पेंड किया और फिर पार्टी विरोधी गतिविधियों का आरोप लगाते हुए बाहर का रास्ता दिखा दिया। इसी साल ऋतब्रत के साथ एक और विवाद हुआ। एक महिला ने उन पर शादी का झूठा वादा करके बलात्कार का आरोप लगाया। ऋतब्रत ने महिला पर उन्हें ब्लैकमेल करके पैसा उगाही की कोशिश करने का आरोप लगाया। 2018 में ऋतब्रत TMC में शामिल हो गए। उन्हें TMC की ‘ट्राइबल वेलफेयर कमेटी’ का संयोजक बनाया गया। जल्द ही वे TMC की मजदूर शाखा कही जाने वाली ‘इंडियन नेशनल तृणमूल ट्रेड यूनियन कांग्रेस’ यानी INTTUC के स्टेट प्रेसिडेंट बन गए। 2024 में TMC से राज्यसभा सांसद जवाहर सरकार ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर ममता सरकार का विरोध करते हुए इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद TMC ने ऋतब्रत को उनकी जगह राज्यसभा भेज दिया। तब अभिषेक बनर्जी ने तारीफ करते हुए कहा था, 'ऋतब्रत ने संगठन को मजबूत करने और पूरे राज्य में ट्रेड यूनियन वर्कर्स के हक के लिए काम किया है। भले थोड़ा समय मिले, लेकिन आखिर समर्पण और कड़ी मेहनत का फल जरूर मिलता है।’ 2 अप्रैल 2026 को ऋतब्रत का राज्यसभा क्रायकाल खत्म हुआ। इसके बाद TMC ने उन्हें उलुबेरिया पूर्व विधानसभा सीट से टिकट दिया। प्रभाकर मणि तिवारी बताते हैं कि ऋतब्रत में बड़े नेताओं के करीब बने रहने की खूबी है। वे CPI(M) की सरकार में पूर्व सीएम बुद्धदेव भट्टाचार्या के करीब रहे, जिसकी बदौलत उन्हें 2011 में विधानसभा का टिकट मिला और चुनाव हारने के बावजूद पार्टी ने 2014 में उन्हें राज्यसभा भेज दिया। इसके बाद TMC में रहते हुए वे शुभेंदु के करीब आए, जिसका फायदा उन्हें अब जाकर मिलता हुआ दिख रहा है। सवाल-3: क्या ऋतब्रत 60 विधायकों के साथ TMC हथिया लेंगे? जवाबः बंगाल विधानसभा में विपक्ष का नेता बनने के बाद ऋतब्रत ने कहा, ‘हम विधानसभा में TMC का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। TMC की टिकट पर जीते 60 विधायक एकजुट हैं। 2 लोग फिलहाल राज्य से बाहर हैं। ममता बनर्जी से अनुरोध करते हैं कि वे हमारी सलाहकार बनें और हमारा मार्गदर्शन करें। हम एक रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाएंगे। सदन में मजबूती से बीजेपी का सामना करेंगे।’ ऋतब्रत ने रथींद्र दास को बागी नेताओं की सहमति वाला जो पत्र भेजा, वो TMC के लेटरपैड के बजाय सफेद कागज पर लिखा गया था। इसमें ममता बनर्जी को ही TMC का नेता बताया गया, जबकि ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता। यानी ऋतब्रत खुले तौर पर दो संकेत दे रहे हैं। पहला- ममता बनर्जी कॉम्प्रोमाइज करके TMC की प्रतीकात्मक नेता बनी रह सकती हैं, दूसरा- वो बागी विधायकों के साथ बीजेपी में शामिल नहीं होंगे। TMC के एक सीनियर सांसद ने दावा किया, 'जल्द ही TMC के सांसदों में भी फूट पड़ सकती है। यह TMC के ताबूत में आखिरी कील साबित होगी। एकनाथ शिंदे और अजीत पवार की तरह, बागी TMC सांसदों को भी चुनाव निशान और पार्टी के नाम का अधिकार मिल जाएगा।' दरअसल, अगर किसी पार्टी के कुल विधायकों में से दो-तिहाई या उससे ज्यादा विधायक अलग गुट बना लें और पार्टी के नेता के बजाय किसी और को लीडर मान लें, तो ऐसी स्थिति में दल-बदल कानून के तहत उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। उल्टा पार्टी के चुनाव निशान पर भी इसी गुट का दावा मजबूत माना जाता है। कई जानकारों का मानना है कि फिलहाल बीजेपी नहीं चाहती कि TMC पूरी तरह टूट जाए या उसके बागी धड़े का उनमें विलय हो जाए। सवाल-4: क्या वाकई बीजेपी नहीं चाहती बंगाल में TMC बिखर जाए? जवाबः भाजपा सांसद सौमित्र खान ने दावा किया था कि TMC के लगभग 50 विधायक और 20 सांसद हमारे संपर्क में हैं। अगर आलाकमान चाहे, तो आज ही TMC का अस्तित्व खत्म हो जाएगा। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई बागी विधायकों ने बीजेपी से संपर्क भी किया था, लेकिन बीजेपी ने उनके लिए दरवाजा नहीं खोला, क्योंकि उसे सरकार बनाने के लिए संख्याबल की जरूरत नहीं है। पॉलिटिकल एनालिस्ट और पत्रकार सायंतन घोष X पर लिखते हैं… प्रभाकर मणि तिवारी बताते हैं, ‘ऋतब्रत के इस सकारात्मक विरोध वाले बयान और शुभेंदु से उनकी पुरानी नजदीकियों से राजनीतिक हलकों में यही चर्चा है कि ऋतब्रत का गुट BJP की बी-टीम बनकर रह जाएगा।’ पश्चिम बंगाल के सीनियर पत्रकार स्निग्धेंदु भट्टाचार्य बताते हैं, '2024 में भाजपा ने ओडिशा में चुनाव जीतने के बावजूद विपक्षी पार्टी बीजू जनता दल का अस्तित्व बनाए रखने में मदद की थी, ताकि राज्य में कांग्रेस फिर से एक्टिव न हो सके। पश्चिम बंगाल में भी ऐसी ही स्थिति बन सकती है।' सवाल-5: क्या TMC के बिखरने से वाकई लेफ्ट-कांग्रेस का फायदा होगा? जवाबः 2026 के बंगाल चुनाव में कांगेस 2 और CPI(M) सिर्फ 1 सीट जीती है। हालांकि दोनों का वोट शेयर मिलाकर करीब 7.5% है। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि TMC के कमजोर होने से बंगाल में कांग्रेस और लेफ्ट की भूमिका बढ़ सकती है… हालांकि प्रसून आचार्य जोर देते हैं कि ममता के लिए पार्टी की अंदरूनी कलह बड़ी चुनौती जरूर है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि अचानक उनका प्रभाव खत्म हो जाएगा और वोटबैंक लेफ्ट या कांग्रेस में शिफ्ट हो जाएगा। *****रिसर्च सहयोग - प्रथमेश व्यास----------------------------------------------------------- बंगाल से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… क्या TMC बिखरने वाली है, 4 संकेत; बंगाल में एकबार सत्ता जाने के बाद पार्टियां कभी वापसी क्यों नहीं कर पातीं बंगाल में आजादी के बाद से ही एक ट्रेंड है। जो पार्टी सत्ता से एकबार बेदखल हुई, वो कभी लौट नहीं सकी। सिर्फ कांग्रेस एक अपवाद है। 2026 का बंगाल चुनाव हारने के बाद TMC भी सबसे मुश्किल दौर में है। पढ़ें पूरी खबर…
दिल्ली के दरियागंज–चांदनी चौक में सूटकेस और नकदी से चलने वाला हवाला अब डिजिटल हो चुका है। यहां बैठे ऑपरेटर क्रिप्टो करेंसी के जरिए हवाला चला रहे हैं। इस नेटवर्क से जुड़े ऑपरेटर्स ने कैमरे पर दावा किया कि दुबई, थाईलैंड, कंबोडिया, हांगकांग समेत कई देशों में मिनटों में पेमेंट पहुंचाई जा सकती है। पर्दाफाश करने के लिए रिपोर्टर ने ब्रोकर बनकर दो माफियाओं से मुलाकात की। ‘10 हजार USDT से शुरू करो, फिर करोड़ों तक ले जाओ’ लोकेशन: दरियागंज, पुरानी दिल्लीकिससे मुलाकात: सलमान और शाहिद (डिजिटल हवाला एजेंट) क्रिप्टोकरेंसी के जरिए हवाला करने वाले माफियाओं तक पहुंचने के दौरान हमारी पहली मुलाकात साद से हुई। वो दरियागंज की एक पुरानी इमारत के सामने मिला। हमें पांचवी मंजिल पर बने ऑफिस में ले गया। हमने खुद को ब्रोकर बताते हुए कहा कि दुबई में हमारे क्लाइंट की बेटिंग कंपनी चलती है। भारत में सट्टे से आने वाला पैसा क्रिप्टो के जरिए विदेश भेजना और जरूरत पड़ने पर वापस लाना है। हमने कहा कि हमें नकद के बदले USDT (यह एक क्रिप्टोकरेंसी है) चाहिए और बाद में उसी USDT के जरिए दूसरे देशों में नकद भी चाहिए। इसके बाद हवाला ऑपरेटर सलमान ने पूरा सिस्टम समझाया। सवाल: बेटिंग ऐप का काम है। USDT के जरिए काम करना चाहते हैं? जवाब : हो जाएगा। सवाल: सिस्टम क्या रहेगा? जवाब : पैसा एडवांस देना होगा। जितना USDT चाहिए मिल जाएगा। हाथों-हाथ ट्रांसफर होगा। पहले 10 हजार USDT से शुरू करो, फिर करोड़ों तक ले जाओ। सवाल: काम कहां से शुरू होगा? जवाब : दिल्ली से शुरुआत करो। बाद में दुबई या दूसरी कंट्री में भी पेमेंट कलेक्ट करवा देंगे। ऑफिस दुबई में भी है। सवाल: USDT को नकद कैसे करेंगे? जवाब : अंदर करना हो या बाहर निकालना हो, सब हमारे जरिए होगा। क्रिप्टो को नकद, नकद को क्रिप्टो, हवाला सब हो जाएगा। दुबई, अमेरिका, कनाडा, जर्मनी जहां बोलोगे वहां पेमेंट मिल जाएगी। सवाल: हमें नकद और USDT दोनों चाहिए। जवाब : हो जाएगा। सवाल: ऑफिस में कोई रिस्क तो नहीं ? जवाब : यहां कुछ रखा नहीं जाता। इनकम टैक्स भी आ जाए तो कुछ नहीं मिलेगा। सवाल: बायनेंस (क्रिप्टोकरेंसी एक्सचेंज प्लेटफॉर्म) से काम करते हो? KYC की जरूरत पड़ती है? जवाब : बायनेंस से करते हैं। ट्रेडिंग में बैंक अकाउंट की जरूरत नहीं पड़ती। आप सीधे USDT इस्तेमाल कर सकते हो। सवाल: पैसा अलग-अलग शहरों में भी मिल जाएगा? जवाब : जहां बोलोगे वहां मिल जाएगा। सवाल: आपका कमीशन कितना है? जवाब : मार्केट रेट पर 50 पैसे प्रति डॉलर। आज USDT का रेट 97 रुपए है, हम 97.50 में देंगे। 10 हजार डॉलर पर करीब 50 हजार कमीशन होगा। सवाल: अगर हमें वॉलेट चलाना नहीं आता तो? जवाब : अपना वॉलेट बनाने की जरूरत नहीं है। हमारा वॉलेट इस्तेमाल कर लो। USDT हमारे वॉलेट में रहेगा, जब जहां नकद चाहिए होगा वहां भिजवा देंगे। सवाल: कौन सा वॉलेट सिक्योर है? जवाब : बायनेंस ठीक है। सवाल: नया अकाउंट भी बनवा देंगे? जवाब : हां, दोनों सिस्टम करा देंगे। सवाल: काम का समय क्या रहता है? जवाब : दोपहर 2 बजे से रात 10 बजे तक। ज्यादातर हवाला दुबई से होता है, इसलिए बाजार उसी हिसाब से चलता है। दूसरी मुलाकात लोकेशन: पूर्वी दिल्ली, गाजीपुर पेपर मार्केटकिससे मुलाकात: हर्ष सिंघल, डिजिटल हवाला नेटवर्क ऑपरेटर अगली मुलाकात अमन से हुई। अमन के संपर्क में डिजिटल हवाला नेटवर्क से जुड़े कई एजेंट थे। अमन ने बताया कि वह हर्ष सिंघल नाम के एक शख्स को जानता है, जो दुबई में बैठे बड़े सट्टेबाजों के पैसों को क्रिप्टो करेंसी में बदलकर डिजिटल हवाला नेटवर्क के जरिए पहुंचाता है। उसके मुताबिक हर्ष दिल्ली का बड़ा डिजिटल हवाला एजेंट है। शुरुआत में हर्ष सीधे मिलने को तैयार नहीं था। कई दिनों तक अमन हम पर नजर रखता रहा कि कहीं हम किसी एजेंसी से जुड़े तो नहीं हैं। भरोसा होने के बाद वह हमें गाजीपुर पेपर मार्केट इलाके में हर्ष सिंघल से मिलवाने ले गया। एक गोदाम के बाहर इंतजार के दौरान नई मर्सिडीज कार आकर रुकी। अमन हमें कार के अंदर ले गया और सिंघल से मिलवाया। रिपोर्टर और सिंघल के बीच हुई बातचीत ‘एक दिन में 10 लाख, 20 लाख, 50 लाख तक भेज सकते हैं…’ सवाल: आप क्या काम करते हैं? जवाब : मैं USDT का काम करता हूं। दुबई में अपने लोग हैं, पूरा सेटअप है। सवाल: अकाउंट का भी इंतजाम हो जाएगा? जवाब : अकाउंट के चक्कर में मत पड़ना। सबसे ज्यादा रिस्क वहीं है। अकाउंट में कई बार स्कैम का पैसा आ जाता है और खाते फ्रीज हो जाते हैं। हम नकद में काम करते हैं। सवाल: सिस्टम कैसे चलेगा? जवाब : नकद लाओ, हाथों-हाथ USDT ट्रांसफर। शुरुआत 10 हजार से करो या लाखों से, कोई दिक्कत नहीं। एक दिन में 10 लाख, 20 लाख, 50 लाख तक करवा सकते हैं। सवाल: आज का रेट क्या है? जवाब: आज 99.50 का रेट है। सवाल: अगर दिल्ली में USDT दी और दुबई में नकद चाहिए तो? जवाब: वहां दिरहम मिल जाएगा। टोकन देंगे और पेमेंट हो जाएगी। सवाल: भारत में भी कहीं पैसा मिल जाएगा? जवाब : जहां नेटवर्क होगा वहां दिलवा देंगे। सवाल: किन देशों तक नेटवर्क है? जवाब: अमेरिका, ब्रिटेन, हांगकांग, दुबई, थाईलैंड जहां बोलोगे, जिस करेंसी में बोलोगे, वहां पैसा पहुंच जाएगा। पूर्वी दिल्ली के गाजीपुर में हर्ष का गोदाम है, जबकि गाजियाबाद के वसुंधरा इलाके में उसका ऑफिस है। दावा है कि यहीं से क्रिकेट सट्टेबाजी से लेकर डिजिटल हवाला तक का नेटवर्क ऑपरेट होता है। हर्ष ने बताया कि पहले बैंक अकाउंट के जरिए लेन-देन होता था, लेकिन साइबर फ्रॉड से जुड़े पैसे आने के चलते कई खाते फ्रीज हो गए। इसी वजह से उसने बैंकिंग सिस्टम से दूरी बना ली और अब सिर्फ नकद में काम करता है। बातचीत के दौरान हर्ष लगातार हमारी कहानी की तस्दीक करता रहा। उसने दुबई में अपने संपर्कों को फोन कर हमारे बताए बेटिंग नेटवर्क की जानकारी मिलाई, ताकि यह तय कर सके कि हम सच बोल रहे हैं या नहीं। इसके बाद हमने उससे पूछा कि वह किस वॉलेट के जरिए क्रिप्टो का इस्तेमाल करता है। सवाल: बायनेंस से काम करते हो? जवाब : नहीं, हम सीधे काम करते हैं। बायनेंस की जरूरत नहीं पड़ती। सवाल: फिर वॉलेट कौन सा इस्तेमाल करते हो? जवाब : ट्रोनलिंक। सवाल: अगर शुरुआत 50 लाख से करें तो? जवाब : कोई दिक्कत नहीं। म्यूल अकाउंट, शेल कंपनी और USDT : हवाला का नया रास्ता सलमान, शाहिद और हर्ष सिंघल जैसे एजेंट डिजिटली चल रहे हवाला कारोबार की सिर्फ बानगी हैं। ED की कार्रवाई से पता चलता है कि, म्यूल अकाउंट, शेल कंपनियां और USDT हवाला का नया रास्ता बन चुके हैं। ED ने फरवरी 2026 में कहा कि उसने साइबर अपराध से जुड़े 234 प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग यानी PMLA मामलों में 34 हजार 855 करोड़ की अपराध से जोड़ी गई रकम की पहचान की है। इसमें अवैध सट्टेबाजी, क्रिप्टो घोटाले, फर्जी ट्रेडिंग ऐप, डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड, इंस्टेंट लोन ऐप स्कैम शामिल हैं। ED के मुताबिक इन पैसों की मनी लॉन्ड्रिंग मोटेतौर पर म्यूल अकाउंट्स, शेल कंपनियों, क्रिप्टोकरेंसी और हवाला ऑपरेटरों के जरिए की गई। एजेंसी ने यह भी कहा कि धोखाधड़ी नेटवर्क पहले शेल कंपनियों और पेमेंट गेटवे के जरिए पैसा इकट्ठा करते हैं, फिर उसे क्रिप्टो खासकर USDT जैसे स्टेबलकॉइन में बदलकर हवाला चैनलों और फर्जी विदेशी रेमिटेंस के जरिए बाहर भेजते हैं। अब तक ऐसे मामलों में 12 हजार 229 करोड़ रुपए की संपत्ति अटैच की जा चुकी है और 1,000 से ज्यादा म्यूल अकाउंट्स की पहचान हुई है। भास्कर की दरियागंज से लेकर गाजीपुर तक हुई इस पड़ताल से पता चला कि, पहले जहां कोड वर्ड, पर्चियों और नकदी के जरिए पैसा एक देश से दूसरे देश पहुंचता था, वहीं अब उसी खेल में USDT का इस्तेमाल हो रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले हवाला का पैसा बैग और नकदी के जरिए घूमता था, अब वही रकम डिजिटल वॉलेट के जरिए सरहद पार पहुंचाई जा रही है। ‘क्रिप्टो को दुनिया में कहीं भी आसानी से भेजा जा सकता है…’ दिल्ली पुलिस के DCP विनीत कुमार कहते हैं कि, ‘साइबर फ्रॉड या गैरकानूनी तरीके से जुटाए गए पैसों के मामलों में रकम पहले हवाला ऑपरेटर्स के पास जाती है। इसके बाद हवाला ऑपरेटर्स नकद को क्रिप्टो में बदलते हैं।’ ‘इंटरनेट पर कई ऐसे प्लेटफॉर्म मौजूद हैं, जहां नकद देकर क्रिप्टो खरीदी जा सकती है। एक बार क्रिप्टो आपके पास आ जाए तो उसे दुनिया में कहीं भी आसानी से भेजा जा सकता है। कई जगहों पर क्रिप्टो से प्रॉपर्टी तक खरीदी जा रही है।’ ‘कई ऐसे वॉलेट हैं, जिनमें बैंक KYC की जरूरत नहीं होती। ट्रस्ट वॉलेट जैसे प्लेटफॉर्म माफियाओं के बीच काफी लोकप्रिय हैं। हालांकि ऐसे कई और वॉलेट भी हैं, जिनमें बिना KYC के ट्रांसफर संभव है।’ ‘सरकार चाहती है कि, लोग ऐसे क्रिप्टो प्लेटफॉर्म इस्तेमाल करें जहां यूजर की पहचान दर्ज हो KYC यानी ‘नो योअर कस्टमर’ हो। बिना KYC वाले वॉलेट्स को बंद किए बिना इस नेटवर्क पर पूरी तरह रोक लगाना मुश्किल है।’ अब हवाला करना आसान हो गया, ट्रैक करना मुश्किल वहीं, सायबर एक्सपर्ट पवन दुग्गल कहते हैं कि,’ भारत सरकार ने क्रिप्टोकरेंसी को लेकर स्पष्ट कानून नहीं बनाया है। फिलहाल सरकार ने सिर्फ इतना तय किया है कि क्रिप्टो खरीदने या बेचने पर 30 प्रतिशत टैक्स देना होगा। इसके बावजूद क्रिप्टो को कानूनी मुद्रा या कानूनी संपत्ति का पूरा दर्जा नहीं मिला है।’ ‘क्रिप्टो के बाद हवाला पहले से कई गुना आसान हो गया है और उन्हें ट्रैक करना मुश्किल। साइबर अपराधियों और हवाला एजेंट्स के लिए क्रिप्टो एक तरह का ‘सेफ हेवन’ बन चुका है।’ ‘जांच एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि ज्यादातर क्रिप्टो प्लेटफॉर्म और सर्विस प्रोवाइडर्स भारत के बाहर मौजूद हैं। ऐसे में भारतीय एजेंसियों को जानकारी हासिल करने में मुश्किल आती है और इलेक्ट्रॉनिक सबूतों की पूरी चेन जोड़ना चैलेंजिंग हो जाता है।’ क्रिप्टोकरेंसी से जुड़े हवाला के तीन मामले केस स्टडी 1 : 5.24 करोड़ का साइबर फ्रॉड, हवाला और क्रिप्टो नेटवर्क का खुलासा 26 नवंबर 2025 को दिल्ली पुलिस की IFSO यूनिट को सूचना मिली कि द्वारका के एक होटल में कुछ लोग साइबर फ्रॉड से जुड़े पैसों को ट्रांसफर कर रहे हैं। पुलिस ने होटल पर छापा मारा। यहां से सुल्तान सलीम शेख, सैयद अहमद चौधरी, तुषार मालिया और सतीश कुमार नाम के चार लोगों को गिरफ्तार किया गया। पूछताछ में पुलिस को एक ऐसे बैंक अकाउंट का पता चला, जिसमें सिर्फ 6 दिनों के भीतर 10,423 ट्रांजैक्शन हुए थे और करीब 5.24 करोड़ रुपए का लेनदेन हुआ था। पुलिस जांच में सामने आया कि हवाला चैनलों के जरिए इस रकम की मनी लॉन्ड्रिंग की जाती थी। कैश के बदले क्रिप्टोकरेंसी ट्रांजैक्शन किए जाते थे। हवाला ऑपरेटर्स को नकद रकम दी जाती थी और बदले में क्रिप्टोकरेंसी के जरिए रकम को आगे ट्रांसफर किया जाता था। केस स्टडी 2 : महादेव ऐप और क्रिप्टो हवाला नेटवर्क 21 अक्टूबर 2023 को ईडी ने महादेव बेटिंग ऐप मामले में सौरभ चंद्राकर और रवि उप्पल समेत 14 लोगों को आरोपी बनाया था। ईडी के मुताबिक बेटिंग से आने वाला पैसा सीधे मास्टरमाइंड तक नहीं पहुंचाया जाता था। पहले रकम को कई फर्जी, किराये और म्यूल बैंक अकाउंट्स में घुमाया जाता था। इसके बाद हवाला ऑपरेटर्स रकम को नकदी में बदलते थे। जांच एजेंसियों के अनुसार बाद में पैसे का एक हिस्सा USDT और दूसरी क्रिप्टोकरेंसी में बदला जाता था। फिर अलग-अलग क्रिप्टो वॉलेट्स के जरिए रकम को विदेशों तक पहुंचाया जाता था। ईडी ने बैंक रिकॉर्ड, मोबाइल डेटा, चैट्स, केवाईसी डिटेल्स, आईपी लॉग्स और ब्लॉकचेन ट्रांजैक्शन ट्रेल के जरिए पूरे नेटवर्क को ट्रैक किया। एजेंसी का दावा है कि यह नेटवर्क हजारों करोड़ रुपए के अवैध लेनदेन से जुड़ा था और इसके तार दुबई समेत कई विदेशी लोकेशनों तक फैले हुए थे। केस स्टडी 3 : जम्मू-कश्मीर में ‘क्रिप्टो हवाला’ का अलर्ट इसी साल जनवरी में सुरक्षा एजेंसियों ने जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी और आतंकी नेटवर्क को दोबारा एक्टिव करने की कोशिशों को लेकर बड़ा अलर्ट जारी किया था। जांच एजेंसियों के मुताबिक अब पारंपरिक हवाला और कैश कुरियर सिस्टम की जगह ‘क्रिप्टो हवाला’ का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। विदेशी हैंडलर्स अब क्रिप्टोकरेंसी, प्राइवेट वॉलेट्स और पीयर-टू-पीयर ट्रांजैक्शन के जरिए बिना बैंकिंग सिस्टम का इस्तेमाल किए पैसे जम्मू-कश्मीर तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। सुरक्षा एजेंसियों को यह भी पता चला कि कई स्थानीय संपर्कों को बिना KYC वाले क्रिप्टो वॉलेट बनाने और VPN के जरिए डिजिटल पहचान छुपाने के लिए कहा गया था, ताकि विदेशों से ट्रांसफर हुए क्रिप्टो को कई डिजिटल लेयर्स में घुमाकर भारत में नकद में बदला जा सके। …………………………………………….. आप ये एक्सक्लूसिव रिपोर्ट भी पढ़ सकते हैं NEET पेपर लीक करने वाले सवाल रट लाए थे:न किताबें बाहर आईं, न अंदर डिवाइस जाने दी; फिर भी हुए लीक ‘नीट पेपर लीक ने हमारा भरोसा तोड़ा है। सालों से जो लोग हमारे साथ काम कर रहे थे, उन्होंने ही पेपर लीक कर दिए। लीक किस-किस ने किया, कैसे किया ये जांच के बाद पता चल जाएगा। लेकिन ऐसा लग रहा है कि, सवाल रटकर लीक किए गए हैं।’ पूरी खबर पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें…।
डॉलर के मुकाबले भारत का रुपया एशिया में सबसे तेजी से गिर रहा है। पिछले 5 महीने में 6% से ज्यादा टूटा। जबकि इसी दौरान पाकिस्तानी रुपया 0.5% और चीनी युआन तो 3% मजबूत हो गया। नीचे बाकी देशों का हाल देखिए- आगे बढ़ने से पहले डॉलर और रुपए का रिश्ता समझ लेते हैं- दुनिया में एक बाजार है- फॉरेक्स मार्केट, यानी रोकड़ मंडी। ये मंडी किसी एक बिल्डिंग में नहीं होती। ये डिजिटली चलती है, जिसमें दुनियाभर के बैंक, इन्वेस्टमेंट फर्म, एक्सपोर्ट-इंपोर्ट कंपनियां करेंसी खरीदती-बेचती हैं। इकोनॉमिक्स का सबसे बुनियादी उसूल है- जिसकी मांग ज्यादा, उसकी कीमत ज्यादा। दुनिया का 88% कारोबार डॉलर में होता है। तो सभी देश डॉलर रखना ही चाहेंगे। इसी के चलते सभी देशों के पास जितनी भी विदेशी करेंसी है, उसमें करीब 57% तो डॉलर ही है। इसीलिए रोकड़ मंडी में भी डॉलर को ग्लोबल करेंसी मान लिया गया है। अब इसी के आधार पर बाकी देशों की करेंसी नापी-जोखी जाती है। फिलहाल रोकड़ मंडी में डॉलर की मांग बहुत ज्यादा है। भारत में भी डॉलर जितना आ रहा है, उससे ज्यादा खर्च हो रहा है। इसलिए रुपया तेजी से गिर रहा है। इस वक्त १ डॉलर ९५ रुपए के आस-पास ट्रेड कर रहा है। ये तो हुई सिंपल परिभाषा। अब जानिए वो फैक्टर जिनकी वजह से रुपया इतना तेजी से टूटा… 1. कच्चे तेल का दाम बढ़ा, ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़े 2. विदेशी निवेशकों ने भारत से अंधाधुंध डॉलर निकाले 3. रुपया टूटने की अटकलबाजी से रुपया और टूटा 4. भारतीय अर्थव्यवस्था पर भरोसे की कमी इसके अलावा ‘डॉलर इंडेक्स’ में भी तेजी आई है। डॉलर इंडेक्स 6 बड़ी करेंसी- यूरो, जापानी येन, ब्रिटिश पाउंड, कनाडाई डॉलर, स्वीडिश क्रोना और स्विस फ्रैंक के मुकाबले अमेरिकी डॉलर की स्थिति दिखाता है। ईरान जंग शुरू होने के बाद ये 97.6 से 99 तक पहुंच गया। बीच में 100 के पार भी गया। इसका मतलब है कि पूरी दुनिया में डॉलर की डिमांड बढ़ी है, जिसके चलते डॉलर मजबूत हो रहा है। ऐसे में सवाल उठता है- जब चीन-पाकिस्तान की करेंसी मजबूत हुई, फिर भारत से कहां चूक रही? 2004 से 2014 के बीच, यानी 10 साल में डॉलर के मुकाबले रुपए 45 से गिरकर 59 तक पहुंचा, यानी 31.1% गिरा। औसतन हर साल करीब 3% की गिरावट। वहीं 2014 के बाद, यानी पिछले पिछले 12 सालों में रुपया 61% टूटा। यानी हर साल औसतन 5% गिरा। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि भारत सरकार से मोटे तौर पर 3 चूक हो रही है… 1. नई तकनीक में निवेश नहीं, तो कमाई कहां से होगी? 2. तकनीक नहीं, तो ज्यादा सामान कैसे बनेगा? 3. ज्यादा सामान नहीं बनेगा, तो बेचेंगे क्या? गिरते रुपए को रोकने के लिए फिलहाल RBI क्या कर रहा? क्या जल्द ही रूपया 100 का आंकड़ा छू सकता है? ---------- भारतीय अर्थव्यवस्था से जुड़ी भी खबर पढ़िए… पीएम की 1 साल तक सोना न खरीदने की अपील: सरकार खुद अपनी तिजोरियों में लगातार सोना क्यों भर रही; पीछे की पूरी कहानी पीएम मोदी ने 10 मई को लोगों से सोना न खरीदने की अपील की। उन्होंने कहा- हमें यह तय करना होगा कि सालभर तक घर में कोई कार्यक्रम हो, हम सोने के गहने नहीं खरीदेंगे। आखिर सरकार क्यों चाहती है कि आप सोना मत खरीदिए। पूरी खबर पढ़िए…
साल 1975। लाल बिहारी 20 साल के थे। शादी के 10 साल बाद अभी-अभी गंवना हुआ था और पत्नी घर आई थी। मां ने कहा- गांव की जमीन गिरवी रखकर बैंक से कुछ लोन ले लो। अपना काम-धंधा शुरू करो, वर्ना आगे बाल-बच्चों को कैसे पालोगे? लाल बिहारी बैंक पहुंचे, लेकिन मैनेजर ने जमीन के कागज मांग लिए। कागज लेने के लिए वह अपने चाचा के पास गए। चाचा भड़क उठे। बोले- जाओ, श्मशान में अपने बाप की राख से निकाल लो। परेशान लाल बिहारी गांव के एक आदमी की सलाह पर तहसील पहुंचे। तहसीलदार ने खतौनी निकाली, उस पर नजर दौड़ाई और फिर उनकी तरफ देखकर कहा- तुम तो मर चुके हो! लाल बिहारी रोते हुए उसके पैरों में गिर पड़े। बोले- साहब, मैं तो आपके सामने खड़ा हूं। तहसीलदार का जवाब था- सामने खड़े हो, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में तुम मर चुके हो और तुम्हारे हिस्से की जमीन तुम्हारे चाचा के बेटे के नाम दर्ज है। लाल बिहारी यह कहानी सुनाते हुए रो पड़े। ब्लैकबोर्ड सीरीज में मैं नीरज झा ऐसे लोगों की कहानी लाया हूं, जिन्हें सरकारी कागजों में मार दिया गया, लेकिन खुद को जिंदा साबित करने के लिए वे लड़ाई लड़ रहे हैं। इससे पहले, यूपी के आजमगढ़ जिले के मुबारकपुर चौराहे पर एक दुकानदार से मैंने पूछा- ‘मुझे लाल बिहारी से मिलना है, उनके घर का पता बता सकते हैं?’ दुकानदार मुझे कुछ देर देखता रहा, फिर बोला, ‘अरे! आप ‘मृतक बिहारी’ का घर पूछ रहे हैं? मैंने कहां- हां, वही जिन्हें कागजों में मरा घोषित कर दिया गया है। दुकानदार ने कहा- 'ऐसा कीजिए, यहां से पूरब की ओर सड़क पर आगे बढ़िए, फिर बाएं मुड़ जाइएगा। कुछ दूर जाकर किसी से भी पूछ लीजिएगा। और हां, उन्हें ‘मृतक बिहारी’ कहकर पूछेंगे तभी कोई बता पाएगा। लोग ‘लाल बिहारी’ नाम से नहीं जानते।' अब मृतक बिहारी से मिलने चल पड़ा। रास्ते में सोच रहा था कि आखिर जिस व्यक्ति से मिलने जा रहा हूं, वह तो 70 साल का जिंदा आदमी है, लोग उसे ‘मृतक’ क्यों कह रहे हैं? पैदल चलते हुए करीब 20 मिनट बाद लाल बिहारी के घर पहुंचा। वो अपने बरामदे में बैठे मिले। पूछने पर सारी कहानी सुनाने लगे- 'उस जमाने में जल्दी शादी हो जाती थी। 10 साल की उम्र में मेरी शादी हो गई थी, लेकिन पत्नी 18 साल की हुई, तब मेरा गंवना हुआ और वह घर आई। खर्च बढ़ गया तो अपना काम-धंधा शुरू करने के लिए बैंक से लोन लेने गया, जिसके बाद तहसीलदार ने खतौनी निकालकर बताया था कि- मैं मर चुका हूं। उस दिन घर पहुंचकर मां को बताया कि मुझे जमीन के कागजों में मरा बता दिया गया है। इससे दुखी मां ने एक हफ्ते तक चूल्हा नहीं जलाया। जब लोगों को ये बता पता चली तो वे मुझे मृतक बिहारी कहकर बुलाने लगे। सुनकर बुरा लगता है, लेकिन क्या कर सकता हूं? आप खुद तय कर लीजिए आप जिंदा आदमी से बात कर रहे हैं, या किसी मुर्दे से? लोग मुझे भूत-प्रेत, कंकाल तक कहते हैं। रास्ता चलते लोग मेरा मजाक उड़ाते हैं- देखो-देखो, मरा आदमी जा रहा है। सच में जब मरूंगा, तब पता नहीं क्या कहेंगे?', लाल बिहारी काफी गुस्से और टीस में ये बातें जल्दी-जल्दी बताते हैं। मेरी नजर उनके बरामदे में रखी दर्जनों फाइलों पर पड़ी। ऐसा लग रहा है जैसे किसी वकील के घर बैठा हूं। वह बताते हैं, ‘ये सभी फाइलें मेरे केस से जुड़ी हैं। मैं अंगूठाछाप हूं। पढ़ने का मौका नहीं मिला, लेकिन अपने दोस्तों की मदद से थोड़ा लिखना-पढ़ना सीख गया हूं।' वह मुस्कुराकर कहते हैं- 'गांव में एक आदमी की मौत हो गई है। उसके अंतिम संस्कार में जाना है। जरा सोचिए, एक मुर्दा आदमी मुर्दे को मिट्टी देने जाएगा?' वह बताते हैं- यह मेरी नानी का घर है। मेरा असली घर यहां से 80 किलोमीटर दूर खलीलाबाद में है। 1955 की बात है। करीब 8-9 महीने का था। अचानक पिता की मौत हो गई। विधवा मां की कोई देख-भाल करने वाला नहीं था। बहुत गरीब परिवार था। मां मुझे लेकर यहां आ गईं। थोड़ा बड़ा हुआ, तो मां ने बताया- पिता की मौत के बाद सभी मेरी उन्हें ‘कुलच्छनी’ ‘मनहूस’ कहकर ताने मारते थे। कहते थे- देखो, इसके कैसे करम हैं। आते ही पति को खा गई। मुझे भी कहते थे- कैसा अभागा बेटा पैदा हुआ। जन्म लेते ही बाप को मार दिया। वह बताती थीं कि हमारी हालत इतनी खराब थी कि एक रोटी में दिनभर गुजारा होता था। घर में दूध नहीं था, तो मां मुझे अरारोट घोलकर पिला देती थीं। यहां पास में कुछ बुनकर कपड़े बनाते थे। जब 7-8 साल का हुआ, तो मां ने मुझे उनके पास काम सीखने भेज दिया। वह जमीदारों के खेतों में काम करती थीं। धीरे-धीरे मैंने बुनाई का काम सीख लिया। 10 साल का हुआ तो शादी हो गई और 8 साल बाद, यानी 18 साल का हुआ तो मेरा गंवना हुआ। पत्नी घर आई। अब काम की जरूरत पड़ने लगी। बैंक से लोन लेने गया तो जमीन का कागज मांगा गया। वहां से तहसील पहुंचा था, जहां पता चला कि मुझे कागजों में मरा घोषित कर दिया गया है। समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं? सोचा, अदालत का रुख करूं, लेकिन मेरे एक जानने वाले ने बताया- तुम कोर्ट में चक्कर लगाते मर जाओगे, कुछ साबित नहीं होगा। ऐसा करो, अपने नाम के आगे मृतक लिखकर प्रशासन को चिट्ठियां भेजना शुरू करो। लाल बिहारी बताते हैं- उसके बाद मैंने अधिकारियों को कई चिट्ठियां लिखीं। अपने नाम के आगे मृतक लिखता, लेकिन कुछ नहीं हुआ। इस बातचीत के दौरान ही उनकी पत्नी करमी देवी भी पास में आकर बैठ जाती हैं। वह बताते हैं- 'बहुत परेशान था। समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं। एक दिन घर पर बैठा था। मन में ख्याल आया कि क्यों न किसी का कत्ल कर दूं या कोई बड़ा अपराध कर दूं, ताकि पुलिस मुझे गिरफ्तार करके जेल में डाल दे। जेल से जब मेरी कोर्ट में पेशी हो तो वहां कह दूं- हुजूर, मैं तो मर चुका हूं। जिंदा होता, तब न कोई अपराध करता?' अब तक कई बार थाने जाकर पुलिस से शिकायत कर चुका था कि- मैं जिंदा हूं, लेकिन मुझे कागज में मरा घोषित किय गया है। पुलिस कोई मदद नहीं कर रही थी। एक दिन मैंने योजना बनाई कि क्यों न चाचा के बेटे यानी अपने भाई का अपहरण कर लूं। उस वक्त वह 8 साल का था। शाम का वक्त था। वह घर के पास खेल रहा था। मैंने उसे उठा लिया और अपने घर में लाकर बंद कर दिया। एक कमरे में उसे हफ्तेभर बंद रखा। चाचा ने थाने में अपहरण केस दर्ज कराया, लेकिन पुलिस ने जान-बूझकर कोई खोजबीन नहीं की। पुलिस चाचा से कह रही थी की तुम्हारे भतीजे ने ही यह काम किया होगा। परेशान मत हो, बेटा वापस लौट आएगा। पुलिस जानती थी कि कागज में जिंदा होने के लिए मैंने ही ये सब किया है। आखिरकार, पुलिस ने भाई को नहीं खोजा। एक हफ्ते बाद मैंने उसे चाचा को सौंप दिया। सोचा अब क्या करूं। गांव में प्रधानी का चुनाव था। मैंने तय किया कि चुनाव लड़ूंगा, क्या पता मुझे सरकारी कागज में जिंदा कर दिया जाए। चुनाव में पर्चा छपवाया। जगह-जगह लगवाए, लेकिन फिर भी मुझे कागज में जिंदा नहीं किया गया। इस तरह छोटे-मोटे 5-6 चुनाव लड़ा। 1986 की बात है। मैंने एक विधायक की मदद ली। उनके साथ लखनऊ में विधानसभा के अंदर गया। वहां अपने नाम के पर्चे फेंके। बड़ी उम्मीद थी की शायद मेरे ऊपर अब एक्शन लिया जाएगा और कागज में जिंदा हो जाऊंगा, लेकिन उस पर भी कोई एक्शन नहीं हुआ। फिर नाउम्मीदी हाथ लगी। उसके बाद 1988 में देश के प्रधानमंत्री रहे वीपी सिंह लोकसभा चुनाव के लिए इलाहाबाद से चुनावी मैदान में उतरे। मैंने सोचा क्यों न उनके खिलाफ उतर जाऊं। मैं भी उनके खिलाफ इलाहाबाद से मैदान में उतर गया। इस बार उम्मीद थी कि मेरी चर्चा होगी और अधिकारी मुझे कागज में जिंदा कर देंगे। उस चुनाव में खर्च के लिए जो कुछ मेरे पास था सब बिक गया, लेकिन मुझे कागजों में जिंदा नहीं किया गया। आखिरकार, वह दिन आया जब पहली बार प्रशासन पर दबाव बना। 1994 की बात है। मेरी पत्नी ने विधवा पेंशन के लिए आवेदन किया। अधिकारी जांच-पड़ताल के लिए मेरे घर आए। उन्होंने पत्नी से कहा- तुम विधवा कहां हो? सिंदूर लगाती हो। चूड़ी पहनती हो। तुम्हारा पति जिंदा हैं, फिर किस बात की विधवा पेंशन? उस पर पत्नी ने कहा- जब मेरे पति सरकारी कागज में मर चुके हैं, तो मैं तो विधवा ही हुई न? लाला बिहारी बताते हैं कि- अब चूंकि पैसा देने की बात थी, तो अधिकारियों ने पहली बार मेरी एक-एक चीज खंगाली। जांच करते-करते एक साल बीत गया। 1995 में आजमगढ़ प्रशासन ने पहली बार मुझे कागजों में जिंदा कर दिया। मेरे गांव की जमीन, जो मेरे चाचा के बेटों के नाम पर थी, वह भी मेरे नाम कराकर दी। इस तरह खुद को जिंदा साबित करने में 18 साल लग गए। बात यहीं खत्म करके लाल बिहारी एक मय्यत यानी शोक में शामिल होने निकल जाते हैं। जाते-जाते कहते हैं- उत्तर प्रदेश के कई जिलों में मेरे जैसे दर्जनों केस हैं। एक मामला तो जहानागंज के भुजहीं गांव में संजाफी देवी का है। अब वह चले जाते हैं। बातचीत से पहले ही उन्होंने अपनी संस्था ‘मृतक संघ’ के बारे में बताया था। इसके जरिए वह जान-बूझकर मृत घोषित किए गए लोगों की लड़ाई लड़ रहे हैं। उनके मुताबिक यूपी में 40 हजार से ज्यादा ऐसे मामले हैं, जिनमें जमीन हड़पने के लिए जिंदा लोगों को ‘मुर्दा’ बता दिया गया है। चाचा ने कागजों में मारा, 6 साल बाद रजिस्टर में हुईं जिंदा अब मैं यहां से 35 किलोमीटर दूर जहानागंज के भुजहीं गांव निकल पड़ा। गांव पहुंचते ही कुछ कच्चे-पक्के मकान नजर आए। चौराहे पर डॉक्टर अंबेडकर की मूर्ति लगी हुई है। बसावट इतनी घनी है कि संजाफी देवी के घर जाने के लिए पैदल ही कच्चे रास्ते से दो घरों के बीच होकर जाना पड़ा। एक घर के बाहर 65 साल की संजाफी देवी खाट पर एक झोले में ढेर सारे कागज लिए मेरा इंतजार कर रही थीं। मुझे देखते ही फफक-फफककर रोने लगीं। वह यहां अपने मायके में रहती हैं। रोते हुए अपना घर-दुआर सब दिखाने लगीं। बोलीं- ‘ये सब आपको कोई मुर्दा औरत दिखा रही है क्या? सरकार कागज मुझे मरा बता दिया गया है। ये सारा खिलवाड़ मेरे चाचा ने किया है। जमीन के लिए मुझे जिंदा होते हुए भी कागजों में मार दिया।' वह आगे बताती हैं- हम चार भाई-बहन थे, लेकिन मैं ही इकलौती जिंदा बची। बाकी सभी बचपन में ही बीमारी से मर गए। 1986 की बात है। मेरी शादी हुई थी। कुछ महीने बाद पिता जी गुजर गए। फिर 2002 में मां भी चल बसीं। मुझे आज भी याद है- एक तरफ दरवाजे पर मां की लाश पड़ी थी। मेरे एक चाचा और उनके बेटे अर्थी तैयार कर रहे थे। वहीं, दूसरी तरफ मेरे बाकी चार चाचा पंचायत बुलाकर जमीन का हिस्सा बांटने में जुटे थे। मैंने कहा- पहले मां का अंतिम संस्कार हो जाने दीजिए, फिर जमीन बांट लेंगे। उस वक्त मेरी मां के नाम ढाई एकड़ जमीन थी। मां के अंतिम संस्कार के कुछ दिन बाद जब मैं अपने खेत में गई, तो मेरे चाचा और उनके बच्चे कहने लगे- ‘अरे बुढ़िया, तुम्हारा अब यहां कुछ नहीं बचा। यहां से चली जा।’ उसके बाद रोते हुए मैं तहसील पहुंची। कागज निकलवाए, तो पता चला कि चाचा ने मुझे रजिस्टर में मृत बताकर सारी जमीन हड़प ली है। उस दिन मेरा कलेजा फट गया। जब मेरा बेटा बड़ा हुआ, तो 2005 में कोर्ट में मुकदमा दायर किया। करीब 6 साल तक कोर्ट में लड़ाई लड़ने के बाद मुझे 2011 में रजिस्टर में जिंदा किया गया। 'लेकिन आज भी जमीन चाचा के नाम ही है। लाखों रुपए कचहरी में फूंक दिए, कुछ नहीं मिला। केवल रजिस्टर में जिंदा की गई।’, यह कहते हुए संजाफी देवी फिर से रोने लगीं। जिंदा साबित करते हुए मर गईं, अब बेटी केस लड़ रही संजाफी से बात करते हुए अब रात हो चुकी है। अगली सुबह मऊ जिले के चांदमारी गांव जाना है, जहां जमीन हड़पने के लिए परिवार के लोगों ने कागज में एक विधवा की फर्जी शादी करा दी, फिर उसे मृत घोषित कर दिया। अब वह मर चुकी हैं। उनकी बेटी मुकदमा लड़ रही है। अगले दिन सुबह मऊ के चांदमारी गांव पहुंचा। वहां 55 साल के ओम प्रकाश मिले। वह बताते हैं- ‘मेरी सास धीराजी देवी खुद को जिंदा साबित करते-करते 2019 में मर गईं। अब उनकी जगह उनकी बेटी, यानी मेरी पत्नी मुकदमा लड़ रही हैं। 20 साल हो गए मुकदमा लड़ते-लड़ते, लेकिन कुछ नहीं मिला। जो कुछ अपने पास था, वह भी बिक गया। 1974 की बात है। मेरे ससुर शंकर ठाकुर पश्चिम बंगाल के वर्धमान में एक कोल कंपनी में नौकरी करते थे। वहां बिजली गिरने से उनकी मौत हो गई। उनकी जगह पर मेरी सास को नौकरी मिली। 1995 में सास रिटायर होकर गांव आईं। उन्होंने पट्टीदारों से जब जमीन-जायदाद के बारे में पूछा, तो वे कहने लगे- कैसी जमीन? तुम्हारा यहां कुछ नहीं है। उस दिन उनके साथ मार-पीट की गई और भगा दिया गया। उसके बाद वह अपने मायके जाकर रहने लगीं। करीब 10 साल बाद वह दोबारा अपने ससुराल गईं। फिर से अपनी जमीन मांगी। इस बार पट्टीदारों ने उनका हाथ तोड़ दिया। उस दिन वह तहसील पहुंचीं। खतौनी निकलवाई, तो पता चला कि उन्हें कागज में मरा घोषित कर दिया गया है। कागज में लिखा था- पति शंकर की मौत के बाद धीराजी देवी ने दूसरी शादी कर ली, जहां उनकी भी मौत हो चुकी है। उनका कोई वारिस नहीं है। उसके बाद मेरी सास की सास रामदेई देवी ने पूरी संपत्ति दूसरे बेटे रामू ठाकुर के नाम कर दी थी। 2005 में हमने इसके खिलाफ मुकदमा दायर किया। 5 साल से ज्यादा लड़ाई के बाद 2011 में कोर्ट ने माना कि धीराजी देवी जिंदा हैं। रजिस्टर में उन्हें गलती से मरा घोषित कर दिया गया है। लेकिन कोर्ट ने जमीन नहीं दिलवाई। इन 20 सालों में जो जमीन थी वह भी मुकदमा लड़ने में बिक गई, यह बताते हुए ओम प्रकाश रोने लगे। वह रोते हुए घर में गए और मेरे सामने कागजों से भरा एक थैला लाकर पलट दिया। बोले- ‘ये कागज देखिए। मन करता है जहर खा लूं, लेकिन बेटे-पत्नी का मुंह देखकर शांत हो जाता हूं। पानी-पूरी का ठेला लगाकर जो कमाता हूं, उसे मुकदमा लड़ने में खर्च कर रहा हूं। उनके बगल में बैठीं ओम प्रकाश की पत्नी मंशा देवी गुस्से में कहती हैं, ‘जिसके पास पैसा है, उसके पास सब है। कोर्ट, कचहरी, वकील। हम तो बर्बाद हो गए। आखिर कोर्ट को समझना चाहिए कि उसके सामने क्या कोई मुर्दा मुकदमा लड़ने आ रहा? कागज में मेरी मां को 2005 में मृत बताया गया, जबकि उनकी मौत 2019 में हुई। क्या बंगाल में कोल की नौकरी कोई मुर्दा कर रहा था?’ इस तरह बेबस और परेशान चेहरों के बारे में सोचते हुए मैं वापस दिल्ली लौट आया। ------------------------------------ 1- ब्लैकबोर्ड-'तुम ईसाई बन गए, बाप की लाश नाले में बहाओ':22 दिन तक सड़ती रही लाश, सरपंच बोला- अंतिम संस्कार किया तो बीवी-बच्चों के बारे में सोच लेना 7 जनवरी 2025। सुबह के 10 बजे थे। पापा की किडनी फेल होने की वजह से मौत हो गई थी। देखते ही मां रो-रोकर बेहाल हो गई। शव बरामदे में रखते ही चीख-पुकार मच गई। सभी रिश्तेदार घर पहुंचने लगे। सभी कहने लगे- अंतिम संस्कार की तैयारी करो। जब तक लाश दरवाजे पर रहेगी, सब रोते रहेंगे। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- ब्लैकबोर्ड-पत्नी के घरवालों ने नंगा करके पीटा, नस काटकर सुसाइड:पत्नी ने कॉलर पकड़कर मांगे 20 लाख तो फांसी लगाई; तंग पतियों की स्याह कहानियां ‘20 जनवरी 2025 की बात है। शाम के 4 बजे थे। मैं अपने दोनों पोतों को स्कूल से लेकर घर लौट रही थी। रास्ते में मेरा छोटा बेटा नितिन बाइक से आ रहा था। उसने कहा- मम्मी, बाइक पर बैठ जाओ। फिर हम उसके साथ घर आए। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने बताया कि हमारे देश पर कई बैलिस्टिक मिसाइलें और ड्रोन दागे गए। अभी भी अलग-अलग इलाकों में एयर-रेड अलर्ट भी एक्टिव हैं। खुफिया जानकारी है कि आज रात भी एक और बड़ा हमला हो सकता है। हम हवाई खतरों का सामना कर रहे हैं।
कुवैत एयरपोर्ट हमले में भारतीय नागरिक की मौत, भारतीय दूतावास ने जताया गहरा दुख
कुवैत में मौजूद भारतीय दूतावास ने कुवैत इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर हुए हमले में मारे गए शख्स की पहचान भारतीय नागरिक के तौर पर की है। कुवैत ने बुधवार ईरान की ओर से हुए बैलिस्टिक और ड्रोन अटैक की जानकारी दी थी।
बात अक्टूबर 1999 की है। कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 224 में 132 सीटें जीतीं। एसएम कृष्णा मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले थे। कृष्णा के करीबी थे 37 साल के डीके शिवकुमार। इतने करीबी कि नए मंत्रिमंडल की लिस्ट भी दोनों ने साथ मिलकर तैयार की। लेकिन एक रात पहले कांग्रेस हाईकमान से मिली फाइनल लिस्ट में डीके का ही नाम नहीं था। डीके निराश और बेचैन हो गए। उन्होंने रात में ही अपने ज्योतिषी राजगुरु बेल्लूर शंकरनारायण द्वारकानाथ से सलाह मांगी। ज्योतिषी ने कहा- 'जब तक तुम खुद दरवाजा नहीं खोलोगे और मंत्री पद की मांग नहीं करोगे, यह नहीं मिलेगा।' डीके को बात लग गई। लेकिन संभावित मंत्रियों की लिस्ट राज्यपाल को भेजी जा चुकी थी। डीके आधी रात ही एसएम कृष्णा के घर जा पहुंचे। पता चला कि कृष्णा सो रहे हैं, लेकिन डीके ने उन्हें जगाकर कहा- 'आप मेरे बिना मुख्यमंत्री पद की शपथ नहीं ले सकते।' अगले दिन, यानी 11 अक्टूबर 1999 को जब एसएम कृष्णा ने शपथ ली, तब डीके भी मंत्रिमंडल का हिस्सा थे। बाद में डीके ने खुद ये किस्सा सुनाते हुए कहा- 'ज्योतिषी द्वारकानाथ ने मुझसे कहा था कि सत्ता छीननी पड़ती है और मैंने उनकी सलाह मानी।' 27 साल बाद आज 'डोड्डालाहल्ली केम्पेगौड़ा शिवकुमार' उर्फ डीके शिवकुमार ने सिद्धारमैया को हटाकर कर्नाटक के 18वें मुख्यमंत्री की शपथ ली है। आज के एक्सप्लेनर में डीके शिवकुमार की पूरी कहानी… साउथ बेंगलुरु जिले में अर्कावती नदी के किनारे बसा है कनकपुरा शहर। यहीं के वोक्कालिगा किसान परिवार में 15 मई 1962 को डीके पैदा हुए। कोई राजनीतिक बैकग्राउंड नहीं था, लेकिन राजनीति में शुरुआत से ही दिलचस्पी थी। 18 साल की उम्र में डीके कांग्रेस की स्टू़डेंट विंग NSUI से जुड़ गए। जल्द ही NSUI के बेंगलुरु जिला अध्यक्ष बन गए। बेंगलुरु के राम नारायण चेल्लाराम कॉलेज में पढ़ने पहुंचे, तो इंडियन यूथ कांग्रेस जॉइन कर ली। साल 1979 डीके की जिंदगी में टर्निंग पॉइंट बना। कर्नाटक के पहले मुख्यमंत्री देवराज उर्स की इंदिरा गांधी से अनबन हो गई थी। देवराज ने पार्टी तोड़ी। NSUI और यूथ कांग्रेस में भी फूट पड़ी। कांग्रेस लीडरशिप ने कैडर बचाने का जिम्मा डीके को सौंपा। उन्हें यूथ कांग्रेस का स्टेट जनरल सेक्रेटरी बना दिया गया। डीके ने इतनी जिम्मेदारी से काम किया कि कांग्रेस में उनकी पैठ बनती गई। फिर साल आया 1985। कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होने वाले थे। कांग्रेस राज्य में अपनी खोई जमीन वापस चाहती थी। वहीं, जेपी आंदोलन और इमरजेंसी से निकली जनता पार्टी दूसरी बार सत्ता में आना चाहती थी। जनता पार्टी में नंबर-2 की हैसियत रखने वाले एचडी देवगौड़ा ने दो सीटों से पर्चा भरा- हासन जिले की होलेनरसीपुर और बेंगलुरु की साथनूर। देवगौड़ा राज्य के रसूखदार वोक्कालिगा समुदाय से आते थे। उन्हें 'मण्णिन मगा' यानी धरती पुत्र कहा जाता था। कांग्रेस ने देवगौड़ा के खिलाफ साथनूर सीट से वोक्कालिगा समुदाय के ही 23 साल के डीके शिवकुमार को टिकट दिया। डीके ने चुनाव लड़ने के लिए बेंगलुरु के पास की पुश्तैनी जमीन बेच दी। कड़ा मुकाबला हुआ। 4 बार के विधायक और दो बार नेता प्रतिपक्ष रहे देवगौड़ा सिर्फ 15 हजार वोटों से जीत पाए। डीके हारकर भी टॉप लीडरशिप के करीबी बन गए। देवगौड़ा से हार के बावजूद डीके 4 साल तक साथनूर सीट पर डटे रहे। जिसका फायदा 1989 में मिला। डीके ने जनता पार्टी के यूके स्वामी को 13 हजार वोटों से हराया। इस साल कांग्रेस ने 224 में से 178 सीटें जीतकर सरकार बनाई। फिर अक्टूबर 1990 में कांग्रेस के एस बंगारप्पा सीएम बने और 29 साल के डीके मंत्री। वे तब सबसे कम उम्र के मंत्री थे। डीके को झटका तब लगा, जब 1994 के चुनाव में उन्हें कांग्रेस से टिकट ही नहीं मिला। वजह थी- पार्टी में गुटबाजी और जातीय समीकरण। हालांकि डीके निर्दलीय चुनाव जीते। कांग्रेस के बी रमेश तीसरे नंबर पर रहे। कांग्रेस आलाकमान समझ गया कि डीके को साथ रखने में ही पार्टी का फायदा है। 1995 के आखिर में डीके की कांग्रेस में वापसी हो गई। 1999 में उन्हें फिर मंत्री बनाया गया। डीके ने साथनूर से लगातार 4 विधानसभा चुनाव जीते। 2008 के परिसीमन में साथनूर सीट कनकपुरा में शामिल हो गई। इसके बाद डीके ने कनकपुरा से चुनाव लड़ा और लगातार 4 बार जीते। सभी 8 चुनावों में डीके को हमेशा 45% से ज्यादा वोट मिले हैं। 1985 के चुनाव से ही डीके और देवगौड़ा परिवार की राजनीतिक अदावत रही है। 1999 के चुनाव में साथनूर सीट पर डीके के सामने देवगौड़ा के बेटे एचडी कुमारस्वामी खड़े हुए। डीके ने 14 हजार वोटों से हराया। हालांकि 2002 में कनकपुरा लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में वो देवगौड़ा से हार गए। 2004 के लोकसभा चुनाव हुए। कनकपुरा से देवगौड़ा ने पर्चा भरा। डीके ने सियासी गणित लगाया और 37 साल की पत्रकार तेजस्विनी गौड़ा को टिकट दिलवा दिया। तेजस्विनी का नाम नॉमिनेशन की आखिरी तारीख को ही तय हुआ था। तेजस्विनी ने देवगौड़ा को 1.16 लाख वोटों से हरा दिया। ये चौंकाने वाली बात इसलिए थी, क्योंकि तेजस्विनी का यह पहला चुनाव था। जबकि देवगौड़ा 6 दशकों से राजनीति कर रहे थे और प्रधानमंत्री रह चुके थे। इस जीत से डीके की साख इतनी मजबूत हुई कि समर्थक उन्हें 'कनकपुरदा बंदे' यानी कनकपुरा की चट्टान बुलाने लगे। राजनीति में शिवकुमार का कद और बिजनेस तेजी से बढ़ा। किताब 'डीके शिवकुमार: कांग्रेस क्राइसिस मैनेजर, कर्नाटक किंगमेकर' लिखने वाले सीनियर जर्नलिस्ट रशीद किदवई बताते हैं, 'जब भी कांग्रेस आलाकमान को फंड या क्राइसिस मैनेजमेंट की जरूरत पड़ी, उन्हें डीके की याद आई। डीके कई बार कांग्रेस के संकटमोचक साबित हुए।’ किस्सा-1: महाराष्ट्र सरकार बचाने के लिए 40 विधायक बेंगलुरू ले गए जून 2002 की बात है। महाराष्ट्र में कांग्रेस की अगुवाई वाले डेमोक्रेटिक फ्रंट की सरकार थी। कांग्रेस के विलासराव देशमुख 30 महीने से मुख्यमंत्री थे। अचानक 9 विधायकों ने कह दिया कि वे देशमुख सरकार को समर्थन नहीं देंगे। बीजेपी की अगुआई वाला विपक्ष देशमुख के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लेकर आ गया। कांग्रेस को और विधायक टूटने का डर था। कांग्रेस आलाकमान ने संकट में डीके को जिम्मेदारी सौंपी। डीके ने रातोंरात महाराष्ट्र कांग्रेस के 40 विधायकों बेंगलुरू शिफ्ट किया। एक हफ्ते तक उन्हें कड़ी सुरक्षा में अपने ईगलटन रिसोर्ट में रखा। टूट नहीं हो सकी और फ्लोर टेस्ट में देशमुख की कुर्सी बच गई। किस्सा-2: गुजरात के राज्यसभा चुनाव के लिए 44 विधायक एयरलिफ्ट किए 2017 में डीके ने गुजरात में भी ऐसा ही किया। राज्यसभा चुनाव हो रहे थे। सोनिया गांधी के करीबी और राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल गुजरात से राज्यसभा चुनाव लड़ रहे थे। कांग्रेस को डर था कि उनके विधायक क्रॉस वोटिंग कर सकते हैं। इससे अहमद पटेल हार जाते। आलाकमान ने फिर डीके को याद किया। रातोंरात डीके ने गुजरात कांग्रेस के 44 विधायकों को अहमदाबाद से एयरलिफ्ट किया। उन्हें बेंगलुरू के ईगलटन रिसॉर्ट में ठहराया। कोई गड़बड़ी न हो इसके लिए डीके खुद रिसॉर्ट में ठहरे। 2 अगस्त की सुबह इनकम टैक्स अधिकारियों ने डीके शिवकुमार और उनके भाई डीके सुरेश के दिल्ली और बेंगलुरू में मौजूद करीब 60 ठिकानों पर छापे मारे। एक टीम ईगलटन रिसॉर्ट भी पहुंची। जब अधिकारी डीके के कमरे में घुसे तो वे उस वक्त सोकर उठे ही थे। डीके ने कहा, ‘आप अपनी जांच कीजिए। लेकिन मैं अपने मेहमानों को छोड़कर कहीं नहीं जाउंगा।’ उन्होंने ये सुनिश्चित किया कि कोई भी अधिकारी गुजरात के विधायकों के कमरे में न जाए। 8 अगस्त 2017 को वोटिंग हुई। डीके खुद सभी विधायकों को लेकर कड़ी सुरक्षा में अहमदाबाद पहुंचे। नतीजा आया तो अहमद पटेल चुनाव जीत गए। उन्होंने जीत का क्रेडिट डीके को दिया। कहा जाने लगा कि डीके ने ऐसा करके बीजेपी के ‘चाणक्य’ अमित शाह को सीधी चुनौती दी। रशीद किदवई बताते हैं, ‘2017 में डीके पर बीजेपी जॉइन करने का एक अनकहा दबाव था। फिर भी उन्होंने कांग्रेस की वफादारी चुनी।’ किस्सा-3: कर्नाटक में सरकार बनाने के लिए कांग्रेस-JDS गठजोड़ किया 2018 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में 104 विधायकों के साथ बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन बहुमत से 11 कम। राज्यपाल ने बीजेपी के बीएस येदियुरप्पा को सीएम पद की शपथ दिला दी। कांग्रेस के पास 79 और देवगौड़ा की JDS के पास 37 सीटें थीं। बीजेपी को सत्ता से बाहर रखने के लिए दोनों ने गठबंधन कर लिया और बहुमत जुटाया। लेकिन विधायक टूटने का डर था। डीके फिर संकटमोचक बने। उन्होंने कांग्रेस के 43 विधायकों को बेंगलुरू के एक रिसॉर्ट में जमा किया। सभी के मोबाइल फोन ले लिए और उन पर नजर रखी। असंतुष्ट विधायकों को संभाला और सुनिश्चित किया कि गठबधंन में किसी भी तरह की फूट न पड़े। नतीजतन येदियुरप्पा बहुमत साबित नहीं कर पाए। एचडी कुमारस्वामी के नेतृत्व में कांग्रेस-JDS गठजोड़ की सरकार बनी। डीके शिवकुमार का माइनिंग, रियल एस्टेट, एजुकेशन और ट्रांसपोर्ट का कारोबार है। 2018 के चुनावी हलफनामे में 860 करोड़ रुपए की संपत्ति घोषित है। तब वे देश के सबसे रईस विधायकों में शुमार थे। डीके पर टैक्स चोरी और मनी लॉन्ड्रिंग के कई आरोप हैं। ऐसे ही एक मामले में ED ने उनसे लगातार 4 दिन तक पूछताछ की और 3 सितंबर 2019 को गणेश चतुर्थी के दिन गिरफ्तार कर लिया। डीके भावुक हो गए। लोगों ने उस कद्दावर नेता की आंख में आंसू देखे, जो कभी सीधे अमित शाह से भिड़ गया था। शिवकुमार के एक नजदीकी ने कहा था, 'यह कोई राजनीतिक नाटक नहीं था। वोक्कालिगा समुदाय के लोग गणेश चतुर्थी से बहुत गहराई से जुड़े हैं। डीके के साथ जैसा बर्ताव किया गया, इस क्षेत्र के समुदाय पर इसका प्रभाव पड़ना तय है।’ करीब 50 दिन तक डीके को दिल्ली की तिहाड़ जेल में रखा गया। इस दौरान सोनिया गांधी उनसे मिलने जेल पहुंची। 13 मई 2023 को जब कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजे आए तो डीके ने कहा, ‘मैं भूल नहीं सकता कि श्रीमती सोनिया गांधी मुझसे जेल में मिलने आई थीं। बीजेपी के लोगों ने मुझे जेल में डाल दिया था। तब मैंने पद पर रहने के बदले जेल में रहना चुना। सोनिया, राहुल से वादा किया था कि कर्नाटक जीतकर दिलाऊंगा। आज वादा पूरा हुआ।’ कांग्रेस को लंबे वक्त से कवर करने वाले सीनियर जर्नलिस्ट आदेश रावल ने हाल में सोशल मीडिया X पर एक पोस्ट लिखा- ‘डीके आर्थिक अपराध के आरोप में जेल गए थे। उन्हें आर्थिक अपराध वाले बाकी कैदियों के साथ रखा गया। उनमें से कई लोगों की डीके से दोस्ती हो गई। ज्यादातर गरीब लोग थे और बहुत छोटे आरोपों में जेल में बंद थे। जैसे- पत्नी को गुजारा भत्ता न दे पाना और जमीन के झगड़े। बाद में डीके को जमानत मिल गई। बाहर आकर उन्होंने जेल की दोस्ती निभाई। भारी भरकम वकीलों की एक फौज खड़ी करके जेल के दोस्तों की जमानत करवाई। उनमें से एक उनके दिल्ली वाले घर पर काम करता था, जो आजकल अपने जमीन के मसले को सुलझाने गांव गया हुआ है। दूसरे को बेंगलुरू के अपने मॉल में नौकरी पर रखा। ऐसे ही कई और लोगों को सलाखों के पीछे से निकालकर काम दिलवाया।’ जुलाई 2020 में कांग्रेस आलाकमान ने डीके को कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया। उनकी मेहनत और इलेक्शन मैनेजमेंट की बदौलत कांग्रेस 135 सीटें जीतीं। डीके ने सीएम की कुर्सी पर दावा ठोका। उन्हें सिद्धारमैया से चुनौती मिली। बंद कमरे में 5 दिन मैराथन बैठकें हुईं। आखिरकार 19 मई 2023 को तय हुआ कि सिद्धा सीएम और डीके डिप्टी सीएम बनेंगे। सिद्धारमैया का अनुभव और सामाजिक समीकरण भारी पड़ा। वरिष्ठ पत्रकार आदेश रावल बताते हैं, ‘कांग्रेस आलाकमान की उस मीटिंग में तय किया गया कि सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार ढाई-ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री बनेंगे। तब डीके चाहते थे कि इस फैसले का ऐलान किया जाए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।' 20 नवंबर 2025 को जब सिद्धा के कार्यकाल के ढाई साल पूरे हुए, तब भी लामबंदियां और बयानबाजियां शुरू हुईं। डीके और उनके समर्थक ‘सीक्रेट डील’ को पूरा करने का दबाव बना रहे थे, जबकि सिद्धा इससे इनकार कर रहे थे। आलाकमान ने दोनों नेताओं को समझाया और मामला ठंडे बस्ते में चला गया। डीके के सीएम बनने की भविष्यवाणी करने वाले ज्योतिषी द्वारकानाथ ने हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा, ‘सत्ता की खींचतान में डीके डिप्रेशन में थे। इतना ज्यादा कि वे रोने लगते थे।’ 20 मई 2026 को सिद्धा के 3 साल पूरे हुए। बदलाव की चर्चा फिर से शुरू हुई। कांग्रेस आलाकमान ने सीएम सिद्धा और डिप्टी सीएम डीके दिल्ली तलब किया। दोनों से कहा गया- आप 26 मई की सुबह 11 बजे तक दिल्ली के इंदिरा भवन (कांग्रेस मुख्यालय) पहुंचे। करीब 6 घंटे तक बातचीत चली। राहुल ने सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा से भी बातचीत की। रिपोर्ट्स के मुताबिक, सोनिया और प्रियंका चाहती थीं कि कर्नाटक में सीएम परिवर्तन हो। अलाकमान ने तय किया कि डीके सीएम बनेंगे और सिद्धारमैया की केंद्र में भूमिका बढ़ेगी। 28 मई को सिद्धारमैया ने इस्तीफा दे दिया। 30 मई को डीके विधायक दल के नेता चुने गए और 3 जून को कर्नाटक के 18वें सीएम के रूप में शपथ ली। 1413.7 करोड़ रुपए की संपत्ति के साथ डीके आज देश के सबसे रईस मुख्यमंत्री हैं। उनके ज्योतिषी की वो लाइन एक बार फिर सही साबित हुई कि सत्ता छीननी पड़ती है। --------------- कर्नाटक से जुड़ी भी खबर पढ़िए… कर्नाटक में सीएम बदलने के पीछे की कहानी; कांग्रेस का मास्टरस्ट्रोक या बीजेपी के भाग्य खुले, दांव पर हैं 62% अहिंदा वोटर्स कर्नाटक में कांग्रेस ने कार्यकाल के बीच सीएम बदल दिया। 77 साल के सिद्धारमैया की जगह 64 साल के डीके शिवकुमार ले रहे हैं। कहा जा रहा है कि ये फैसला एक सीक्रेट डील के तहत हुआ। लेकिन बीजेपी को दो तैयार मुद्दे मिल गए- ओबीसी नेता की अनदेखी और दागदार छवि वाले नेता को कुर्सी। पूरी खबर पढ़िए…
ईरान ने कुवैत और बहरीन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बनाया निशाना, अमेरिका का केश्म आइलैंड पर पलटवार
ईरान की विशिष्ट सैन्य शाखा 'इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स' (IRGC) ने आधिकारिक बयान जारी कर इस बात की पुष्टि की है कि उसने कुवैत और बहरीन में अमेरिकी ठिकानों पर बड़ा हमला किया है।
चीन-रूस की खुफिया गतिविधियों का केंद्र क्यूबा अमेरिका के लिए बढ़ता खतरा: मार्को रुबियो
अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने क्यूबा को 'विफल देश' और अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बढ़ता हुआ खतरा बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि क्यूबा में चीन और रूस की खुफिया गतिविधियां चल रही हैं और वह पूरे लैटिन अमेरिका में अमेरिका-विरोधी गतिविधियों को समर्थन देता है।
इजरायल-लेबनान के बीच वार्ता का नया दौर शुरू, संघर्षविराम पर बनी सहमति की उम्मीद
इजरायल और लेबनान के बीच तनाव कम करने के उद्देश्य से वॉशिंगटन में प्रत्यक्ष वार्ता का नया दौर शुरू हो गया है
इटली: दो पाकिस्तानी नागरिकों ने चार प्रवासियों को जलाया जिंदा,आरोपी गिरफ्तार
रोम। इटली के कैलाब्रिया क्षेत्र के अमेन्दोलारा कस्बे में चार प्रवासियों की हत्या के मामले में दो पाकिस्तानी नागरिकों को गिरफ्तार किया गया है। स्थानीय मीडिया की मंगलवार की रिपोर्ट के अनुसार, तीन अफगान नागरिकों समेत चार प्रवासियों को जिंदा जला दिया गया था। आग लगने की घटना में जिंदा बचे एक व्यक्ति ने एक स्थानीय पत्रकार को बताया कि जब उन्होंने पैसे देने से मना किया तो पाकिस्तानी लोगों ने उनकी कार में पेट्रोल फेंककर आग लगा दी। जिंदा बचे व्यक्ति ने कहा, मैंने वह खौफनाक मंजर देखा और मैं किसी चमत्कार से जिंदा हूं। एडनक्रोनोस न्यूज एजेंसी ने बताया कि सोमवार को अमेंडोलारा में मजदूरों की हत्या में अकेला जिंदा बचा हुआ युवक एक अफगान नागरिक है, जो विलापियाना में पीड़ितों के साथ रहता था। जिंदा बचे शख्स ने पत्रकार फ्रांसेस्को सल्वाटोर से कहा, मुझे लगा कि मैं मर जाऊंगा। उसने दावा किया कि पीड़ितों में से तीन अफगान नागरिक थे। गिरफ्तार किए गए दो आरोपियों ने परिवहन के लिए पैसे मांगे थे, लेकिन पीड़ितों द्वारा भुगतान से इनकार करने पर उन्होंने वारदात को अंजाम दिया। उसने बताया कि उस समय दोनों ने पहले कार में पेट्रोल डाला और फिर लाइटर से आग लगा दी, जिससे चारों माइग्रेंट्स जिंदा जल गए। वह खिड़की तोड़कर भागने में कामयाब रहा। उस आदमी ने यह भी कहा कि पाकिस्तानियों ने उसे और दूसरों को चाकू और बंदूक से धमकाकर काम पर लगवाया और पैसे नहीं दिए। ला मिलानो न्यूज के मुताबिक कोसेन्जा प्रांत के अमेंडोलारा में सोमवार को आयोनियन स्टेट रोड 106 के किनारे गैस स्टेशन के पास खड़ी मिनीवैन के अंदर चार जली हुई लाशें मिली थीं। पुलिस को गाड़ी में आग लगने की जानकारी दी गई, जिसके बाद फायरफाइटर्स मौके पर पहुंचे और ये लाशें मिलीं। दोनों आरोपियों को विलापियाना से पकड़कर कोसेन्जा पुलिस हेडक्वार्टर ले जाया गया। यहां फ्लाइंग स्क्वाड के अधिकारी उनसे पूछताछ कर रहे हैं।
भारत के विदेश मंत्रालय ने इस बात पर जोर दिया कि भारत और बांग्लादेश के बीच साझी नदियों से जुड़े मुद्दों को सुलझाने के लिए एक द्विपक्षीय सिस्टम है
तारीख- 1 मई, जगह- पंजाब के नवांशहर का पोजेवाल इलाका। गरीबदासी संप्रदाय के सद्गुरू ब्रह्मानंद भूरीवाले का 24वां निर्वाण दिवस। केसरिया पगड़ी बांधे हरियाणा के CM नायब सिंह सैनी ने मंच से पहले संत के लिए कुछ लाइनें बोलीं। फिर पंजाबी में कहा, 'पंजाब का विकास तभी होगा, जब यहां नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में डबल इंजन सरकार बनेगी।’ पंजाब में सैनी का ये कार्यक्रम विधानसभा चुनाव के लिए BJP के ‘पंजाब प्लान’ की झलक है। सोर्स बताते हैं कि पिछले 6-7 महीनों में सैनी पंजाब में 45 से ज्यादा दौरे और 65 से ज्यादा कार्यक्रम कर चुके हैं। अगले महीने उनके 4 दौरे पहले से तय हैं। पिछले साल उन्होंने पंजाब के करीब 20-22 दौरे किए थे। इनके जरिए राज्य की 33% OBC आबादी पर नजर है। पंजाब में BJP 117 विधानसभा सीटों में से 40 सीटें टागरेट कर रही है। पंजाब में नायब सिंह सैनी सबसे पहले क्यों एक्टिव? पटियाला ग्रामीण (उत्तर) के BJP अध्यक्ष जसपाल सिंह गगरोली कहते हैं, 'पंजाब और हरियाणा की संस्कृति से लेकर जमीन पर मौजूद सीमाएं आपस में घुली-मिली हैं। नायब सिंह सैनी अंबाला से हैं, लेकिन धराप्रवाह पंजाबी बोलते हैं। CM बनने से पहले करीब 3 साल पंजाब में OBC मोर्चा के प्रभारी रहे हैं। वो BJP संगठन में एक-एक कार्यकर्ता को नाम से जानते हैं। चुनाव में उनकी भूमिका नहीं होगी, तो किसकी होगी?' अमृतसर ग्रामीण के BJP अध्यक्ष अमरपाल सिंह बोनी कहते हैं, 'वे संगठन में मजबूती से जमे हैं, इसलिए पंजाब के लिए उनसे मजबूत और जमीनी किरदार कोई नहीं। हरियाणा में किए सैनी के कामों की चर्चा तुरंत पंजाब पहुंच जाती है। व्यापारी बिरादरी उनसे बहुत खुश है, क्योंकि उन्होंने बिजनेस के लिए सिस्टम पहले से आसान किया है।' नायब सिर्फ पुलिया, वोट ट्रांसफर होना मुश्किल पॉलिटिकल एक्सपर्ट प्रो. राजिंदर पाल सिंह कहते हैं, ‘नायब सिंह पंजाब में पुलिया की तरह काम कर सकते हैं, लेकिन वोट ट्रांसफर होना मुश्किल हैं। वो पगड़ी बांध लें, पंजाबी बोल लें, लेकिन उनका व्यक्तित्व इतना प्रभावी नहीं कि वोट ट्रांसफर करा सके। वो अलोकप्रिय भी नहीं हैं, इसलिए पार्टी उनके जरिए पंजाब टटोलने की कोशिश कर रही है।’ ’चुनाव के 8-10 महीने पहले नायब की लॉन्चिंग बुरी भी नहीं, वैसे भी पंजाब में OBC वोट बैंक अब तक किसी भी पार्टी ने एक्सप्लोर नहीं किया है। BJP अब सैनी को आगे करके इसे एक्सप्लोर कर रही है। वैसे चुनाव से 2-3 महीने पहले ही पॉलिटिकल सिनैरियो साफ होता है, इसलिए ये वोटर कितना एकजुट होगा, अभी कहना जल्दबाजी है।’ वहीं पॉलिटिकल एक्सपर्ट बलजीत पाल कहते हैं, ‘पंजाब में नायब की पकड़ मजबूत है। वो यहां 2-3 साल OBC मोर्चा के प्रभारी रहे हैं, इसलिए उनके असर को कम करके देखना ठीक नहीं।‘ पंजाब में BJP का सिख जाट बनाम गैर सिख मॉडल प्रो. राजिंदर पाल कहते हैं, ‘हरियाणा विधानसभा चुनाव 2024 के जाट बनाम गैर-जाट मॉडल को BJP पंजाब में भी इस्तेमाल कर रही है। यहां सिख जाट करीब 25% है, जो जमींदार या बड़े किसान हैं। BJP इनके बजाय गैर जाट वर्ग पर फोकस कर रही है।‘ ‘BJP यहां OBC और दलितों को मिलाकर सिख जाट बनाम गैर जाट का फॉर्मूला तैयार कर रही है। OBC वाला प्रयोग नया है और कारगर साबित हो सकता है। हालांकि OBC को एकजुट करने के लिए कुछ बड़ा करना होगा, जिसकी झलक अब तक नहीं दिखी है।‘ पंजाब में CM योगी और सुवेंदु का बंगाल मॉडल कितना कारगर पटियाला ग्रामीण के BJP अध्यक्ष जसपाल बताते हैं, 'लॉ एंड ऑर्डर ठीक करने के लिए यहां योगी बाबा का बुलडोजर मॉडल ही चलेगा। पंजाब में लोग योगी आदित्यनाथ जैसे CM की डिमांड करते हैं।' अमृतसर ग्रामीण के BJP अध्यक्ष अमृतपाल सिंह बोनी भी यही बात दोहराते हैं। दिल्ली BJP में सूत्र बताते हैं, 'नायब के अलावा शाह-योगी की रैलियों की भी डिमांड आई है। बंगाल में सुवेंदु अधिकारी जैसे काम कर रहे हैं, चुनाव करीब आने पर वो भी पंजाब में नजर आएंगे।' हालांकि प्रो. राजिंदर का कहना है कि पंजाब में हिंदू-मुस्लिम नहीं कर सकते, इसलिए यहां ना बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा है और ना रोहिंग्या का। सुवेंदु बंगाल में चेहरा हैं, पंजाब में नहीं। कोई बाहरी पंजाब नहीं जिता सकता।‘ पंजाब में दलित वोटर के लिए BJP का रोडमैप… इस्लाम की जगह मौत कुबूल करने वाले संत का किस्सा गूंजेगा BJP सोर्सेज बताते हैं, ‘दलित संतों की लिस्ट तैयार हो रही है। इनके जरिए 33% दलित आबादी टारगेट की जाएगी। इसमें सबसे बड़ा नाम गुरु गोबिंद सिंह के शिष्य तेगबहादुर और औरंगजेब की सेना के बीच से गुरु तेगबहादुर का सिर निकालकर लाने वाले संत जैता सिंह का है।‘ सबसे ज्यादा कन्वर्जन वाले इलाकों में दलित संतों के बड़े कार्यक्रम कराए जाएंगे। जैता सिंह के कार्यक्रम से इन दलित संतों को याद करने की शुरुआत होगी। पंजाब में 56 अमृतधारी सिख संत हैं, जिसमें से 37 दलित हैं, जिन्हें BJP टारगेट कर रही है। दलित वर्ग को साधने के लिए यहां BJP से ज्यादा काम RSS कर रही है। दिल्ली BJP एक्टिव, लेकिन पंजाब में कार्यकर्ता खफा बंगाल जैसे नतीजों के लिए कई नायक चाहिए, राघव पर भरोसा डुबोएगा राघव को BJP में लाने और भरोसा जताने से पंजाब में कार्यकर्ताओं का एक धड़ा नाराज है। वे नायब सिंह के एक्टिव होने को अच्छा बताते हैं, लेकिन गुस्सा भी जताते हैं। नाम न छापने की शर्त पर वे इसकी 4 वजहें बताते हैं। 1. नायब का आना पॉजिटिव है, लेकिन पार्टी के बड़े लीडर्स के दौरे होने चाहिए। सभी सीटों पर चुनाव लड़ने के ऐलान से कुछ नहीं होगा। 2. हमारे पास कोई CM फेस नहीं है। केजरीवाल के सामने एक चेहरा चाहिए, तभी फायदा होगा। बंगाल तभी जीते, जब लड़ाई सुवेंदु अधिकारी बनाम ममता बनर्जी हुई। 3. राघव चड्ढा और उनके साथियों को शामिल करने का फैसला ऊपर से ले लिया गया। क्या पंजाब में उनकी जमीनी पकड़ है, क्या वो क्राउड पुलर हैं, कम से कम कार्यकर्ताओं से पूछना चाहिए था। 4. पंजाब को लूटने वालों में एक नाम राघव चड्ढा का भी है। अगर उन्हें CM फेस बनाया गया, तो ये पार्टी की सबसे बड़ी भूल होगी। BJP के लिए पंजाब जीतने के दो ही रास्ते 1. अकाली दल के असंतुष्ट धड़े से गठजोड़प्रो. राजिंदर पाल कहते हैं, ‘BJP ने अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा भले कर दी, लेकिन अमित शाह अकाली दल के असंतुष्ट नेताओं से चुपचाप मिल रहे हैं। 2025 में अकाली दल औपचारिक रूप से बंट चुका है। वे नए बने अकाली दल के अध्यक्ष ज्ञानी हरप्रीत सिंह से मेलजोल बढ़ा रहे हैं। मुमकिन है कि वो चुनाव से 2-3 महीने पहले गठबंधन कर लें। 2. AAP और भगवंत मान को तोड़ ले BJPपंजाब में AAP से 7 लोग पहले टूट चुके हैं। अगर और लोग टूटकर BJP के साथ जाते हैं, तो बड़ा फायदा मिल सकता है। वैसे भी पार्टी में भगवंत मान की जो स्थिति है, वो सब जानते हैं। वो नाम के CM हैं। सरकार केजरीवाल और सिसोदिया ही चला रहे हैं। पंजाब में मान के बराबर कोई लोकप्रिय चेहरा नहीं है। AAP बोली- लोकल चुनाव में कैंडिडेट नहीं मिले, विधानसभा कैसे लड़ेगीपंजाब में आम आदमी पार्टी के स्पोक्सपर्सन नील गर्ग कहते हैं, ‘BJP की तैयारियों का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि पंजाब में 29 मई को 1977 वार्ड में लोकल चुनाव हुए। इसमें BJP को 616 सीटों पर तो कैंडिडेट नहीं मिले। जिन वार्ड में पार्टी ने चुनाव लड़ा, उनमें से 1142 कैंडिडेट की जमानत जब्त हो गई। पंजाब में जमीन पर BJP की यही सच्चाई है।‘ ‘ये पार्टी सिर्फ ED, CBI और बाकी एजेंसियों के दम पर चुनाव प्रभावित करना जानती है। रही बात नायब सिंह की, तो पहले वो अपना घर संभाल लें, जहां जनता ने उन्हें चुनकर मुख्यमंत्री बनाया है। हरियाणा में लॉ एंड ऑर्डर बिगड़ा हुआ है। किसान और रोजगार सबकी हालत खराब है।‘ ……………….पंजाब की ये स्टोरी भी पढ़ें… पंजाब में क्या 38% दलित दिलाएंगे BJP को जीत पंजाब में विधानसभा चुनाव को करीब एक साल बाकी है, लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने ‘पंजाब विजय प्लान’ लॉक कर लिया है। गृह मंत्री अमित शाह भी साफ कर चुके हैं कि BJP पंजाब की सभी 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ेगी। पढ़िए पूरी खबर…
ईरान पर नेतन्याहू का वार: “हमारे अस्तित्व के लिए खतरा नहीं बनेगा”
इजरायल की मोसाद इंटेलिजेंस एजेंसी के नए डायरेक्टर के तौर पर रोमन गॉफमैन ने मंगलवार को शपथ ली
एआई से निवेश तक, भारत करेगा 25 नेपाली स्टार्टअप्स को वैश्विक मंच पर आगे बढ़ाने में मदद
काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास ने भारत-नेपाल स्टार्टअप पार्टनरशिप नेटवर्क (इन-स्पैन) कार्यक्रम के दूसरे चरण की शुरुआत की घोषणा की है। इस पहल का उद्देश्य नेपाली स्टार्टअप उद्यमियों को भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम के साथ सीखने, सहयोग करने और नए अवसर हासिल करने का मंच उपलब्ध कराना है।
बंगाल में आजादी के बाद से ही एक ट्रेंड है। जो पार्टी सत्ता से एकबार बेदखल हुई, वो कभी लौट नहीं सकी। सिर्फ कांग्रेस एक अपवाद है। 2026 का बंगाल चुनाव हारने के बाद TMC भी सबसे मुश्किल दौर में है। क्या ममता बनर्जी TMC को संकट से निकालकर वापसी कर पाएंगी या उनके हाथ से पार्टी फिसल जाएगी; समझेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: ममता की TMC पर कितना बड़ा संकट है? जवाबः TMC पर आए संकट को 4 संकेतों से समझिए… 1. TMC के सांसद, नेता और सभासदों तक के इस्तीफे 2. दावा- भाजपा के संपर्क में TMC के 75% सांसद-विधायक 3. 80 में सिर्फ 20 विधायक ही ममता की मीटिंग में पहुंचे 4. TMC के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर लगातार हमले सवाल-2: पार्टी को बचाने के लिए ममता बनर्जी क्या कर रहीं? जवाबः ममता बनर्जी दो तरह की स्ट्रैटेजी पर काम कर रही हैं, पहली- मजबूत और जुझारू दिखो, दूसरी- पॉलिटिकली रिलेवेंट बने रहो। चुनाव में हार के बाद पहली बार किसी सीएम ने इस्तीफा देने से मना कर दिया। जानकार बताते हैं कि ममता ने ‘मैं नहीं झुकूंगी’ वाला संदेश देने और कार्यकर्ताओं को एकजुट करने के लिए ऐसा किया। चुनाव बाद TMC कार्यकर्ताओं के साथ हो रही हिंसा और 30 मई को अभिषेक बनर्जी पर हुए हमले को भी ममता ने आक्रामक तरीके से उठाया। TMC इन घटनाओं के विरोध में पूरे राज्य में पॉलिटिकल कैंपेन खड़ा करने की कोशिश कर रही है। ममता ने 2 जून को कोलकाता के धर्मतला बस स्टैंड के पास प्रोटेस्ट किया। ममता ने एक मेगाफोन से भीड़ को संबोधित करते हुए कहा, ‘हमें मंच बनाने या माइक्रोफोन इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं दी गई। लेकिन मैं लड़ूंगी या मर जाऊंगी।’ ममता ने कहा, ‘बंगाल में पुलिस वाले TMC नेताओं को धमका रहे हैं। इस मुश्किल समय में मैं उन्हें अकेला नहीं छोड़ूंगी।’ ममता कई मुद्दों पर INDIA ब्लॉक से अलग लीक पर चलती दिखती थीं। हालांकि चुनाव हारने के बाद उनका नया रुख दिखा। वह नेशनल लेवल पर विपक्ष की राजनीति में TMC की हिस्सेदारी और प्रभाव को कमजोर नहीं होने देना चाहतीं। चुनाव हारते ही 5 मई को ममता ने कहा, ‘मेरा टारगेट बहुत क्लियर है। मैं INDIA टीम को मजबूत करूंगी... सोनिया जी, राहुल, अरविंद केजरीवाल, हेमंत सोरेन…सभी ने मुझे फोन किया। सभी INDIA गठबंधन के सहयोगी मेरे साथ हैं। आने वाले दिनों में हमारी एकजुटता और मजबूत होगी।’ सवाल-3: ममता की कोशिशों के बावजूद क्या वाकई TMC बिखर सकती है? जवाबः पश्चिम बंगाल को करीब से समझने वाले एक्सपर्ट्स के बीच राय बंटी हुई है। पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक प्रभाकर मणि तिवारी का मानना है कि TMC बिखर जाएगी। वो कहते हैं, ‘ममता 2011 में सत्ता में आईं, तो धीरे-धीरे उन्होंने भी CPM को खत्म कर दिया था। बीजेपी भी बंगाल में विपक्ष को खत्म करना चाहती है। बीजेपी की कोशिश रहेगी कि TMC के आधे से ज्यादा विधायक अलग हो जाएं, जिससे उपचुनाव भी न कराना पड़े। हालांकि अगले 2-3 महीने तक TMC में किसी बड़ी टूट की आशंका नहीं है।’ वहीं, वरिष्ठ पत्रकार शिखा मुखर्जी मानती हैं कि TMC में कोई बड़ा विभाजन होता नहीं दिख रहा। वो कहती हैं, ‘इसका कोई साफ संकेत नहीं है कि बीजेपी TMC नेताओं को बीजेपी में शामिल होने के लिए उकसा रही है।’ बंगाल बीजेपी के बड़े नेताओं के बयानों से भी लगता है कि बीजेपी बागियों को खुला न्योता नहीं देना चाहती… हालांकि जीत के बाद 5 मई को सुवेंदु अधिकारी ने कहा कि ममता का राजनीतिक निर्वासन शुरू हो गया है। बंगाल में TMC के कई सांसद और कार्यकर्ता उनके साथ जुड़ेंगे। शिखा मुखर्जी कहती हैं कि बीजेपी फिर भी TMC को कमजोर करने के लिए कुछ विधायकों को अपने पाले में जरूर ले सकती है। सवाल-4: क्या बंगाल की सत्ता में टीएमसी वापसी कर पाएगी? जवाबः 1977 तक बंगाल में कांग्रेस 25 साल शासन में रही। हालांकि, बीच में 1967 से 1972 तक यूनाइटेड फ्रंट भी सत्ता में आई। फिर 34 साल लेफ्ट फ्रंट की सरकार चली। 2011 में सीएम बनीं ममता 2026 तक काबिज रहीं। यानी बंगाल में जो आता है, सालों तक छा जाता है। अब बीजेपी सत्ता में है। 4 वजहों से TMC की भी सत्ता में वापसी मुश्किल लगती है… 1. कैडर बेस नई पार्टी में शिफ्ट हो जाता है 2. दिल्ली बनाम बंगाल का नैरेटिव खत्म 3. ममता की जगह सुवेंदु का ‘पर्सनैलिटी कल्ट’ 4. वोटबैंक की सटीक चुनावी इंजीनियरिंग ***** रिसर्च सहयोग - प्रथमेश व्यास-----------------------------------------------------------पश्चिम बंगाल से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें…बंगाल में गाय की कुर्बानी पर रोक, हिंदू क्यों नाराज:बोले- दीदी से परेशान होकर सरकार बदली, BJP ने 2500 करोड़ का धंधा बिगाड़ा पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर में रहने वाले सुखदेव मंडल खेती-किसानी करते हैं। इसी से परिवार का खर्च चलता है। इस साल बेटी की शादी करनी है, इसलिए सालभर पहले बैंक से लोन लेकर मवेशी खरीदे। उम्मीद थी कि बकरीद पर बिक जाएंगे और शादी-ब्याह का खर्च निकल जाएगा, लेकिन बंगाल सरकार के एक फैसले ने उनकी उम्मीद तोड़ दी। पढ़ें पूरी खबर…
अमेरिका से एक बार फिर गोलीबारी की दहला देने वाली खबर आई। आयोवा के मस्कटाइन में अलग-अलग जगहों पर फायरिंग के बाद संदिग्ध बंदूकधारी समेत सात लोग मृत पाए गए।
यूक्रेन पर रूस के मिसाइल और ड्रोन हमले में कम से कम 13 लोगों की मौत हो गयी है। इनमें से नौ लोग निप्रो में और चार राजधानी कीव में मारे गये।
जापान: क्यूशू की ओर बढ़ रहा 'जांगमी' तूफान, ओकिनावा में दस से ज्यादा लोग घायल, सैकड़ों फ्लाइट कैंसिल
ओकिनावा के पास भयंकर तबाही मचाने के बाद भीषण तूफान 'जांगमी' मंगलवार को जापान के दक्षिण-पश्चिमी द्वीप क्यूशू की ओर उत्तर दिशा में बढ़ रहा है। यह जानकारी जापान की मौसम एजेंसी ने दी।
ट्रंप के बेरूत पर हमला रुकवाने के दावे पर क्या कहती है अमेरिकी मीडिया?
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने उनकी सीधी अपील के बाद बेरूत में होने वाला एक सैन्य अभियान रोक दिया
ट्रंप ने लगाया ईरान पर बातचीत को लंबा खींचने का आरोप, कहा- वार्ता बंद होने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि उन्हें इस बात की कोई खास चिंता नहीं है कि ईरान अमेरिका के साथ चल रही बातचीत रोक सकता है। उनका कहना था कि ईरान ने बातचीत में बहुत ज्यादा समय लिया है और उसे परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना ही ट्रंप प्रशासन की सबसे बड़ी प्राथमिकता है।
इटली के दक्षिणी कैलाब्रिया क्षेत्र के तट पर 6.1 तीव्रता का भूकंप आया
इटली के दक्षिणी कैलाब्रिया क्षेत्र के तट के पास 6.1 तीव्रता का भूकंप आया। अधिकारियों के अनुसार, भूकंप का केंद्र समुद्र में था और इसकी गहराई काफी अधिक होने के कारण बड़े नुकसान की आशंका कम रही।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप बोले, ईरान से बातचीत जारी, इजरायल नहीं करेगा हिज्बुल्लाह पर हमला
ईरानी मीडिया ने दावा किया कि सीजफायर को लेकर अमेरिका के साथ बातचीत रोक दी गई है। ईरानी मीडिया की ओर से किए गए दावे के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ऐलान किया है कि ईरान के साथ बातचीत जारी है।
सुबह का वक्त, हल्की धुंध, घने जंगल में अजीब सी आवाजें आ रही हैं। 5 घंटे तक पैदल चलने के बाद चट्टानों पर कुछ लोग नजर आते हैं। नजदीक पहुंचे तो देखा चट्टानों में छोटी-बड़ी काली गुफाएं हैं। हमें देखते ही उनमें से कुछ छिप-छिपकर गुफाओं में जाने लगे। थोड़ी देर बाद डरे-सहमे कुछ लोग हमारे करीब आए। मैंने कैमरा निकाला तो वो अजीब हाव-भाव दिखाने लगे। मेरे साथी बोले- ये आपको नुकसान नहीं पहुंचाएंगे। इस बीच, उन्हीं में से एक बुजुर्ग आगे आया और कैमरे की ओर इशारा करते हुए अपनी भाषा में बोला- इसे दूर करो, ये हमारी शक्ति खींच लेगा। मैंने तुरंत कैमरा हटा लिया। ये बात मुझे मेरे साथी ने समझाई। अपने साथी के जरिए बुजुर्ग से पूछा– आप लोग गुफाओं में क्यों रहते हैं? बुजुर्ग हमें अपनी गुफा के पास ले गया। एक ओर इशारा करते हुए कहा- यहां हमारे बुजुर्ग सोए हैं। हम उन्हें छोड़कर नहीं जाते। ये हमारी गुफाओं के रक्षक हैं। हम अपने परिवार के लोगों को भी यहीं दफनाते हैं। ये किस्सा है चोलानाइकन जनजाति का, जो 21वीं सदी में भी घने जंगलों के बीच गुफाओं में रहती है। इनसे मिलने पहुंचे थे पर्यावरणविद केए शाहजी। दैनिक भास्कर की सीरीज ‘हम लोग’ में मैं मनीषा भल्ला इस बार लाई हूं इसी चोलानाइकन जनजाति की कहानी। चोलानाइकन जनजाति के करीब 250 लोग ही बचे हैं, जो केरलम के मलप्पुरम जिले के नीलांबूर के जंगलों में बसे हैं। जब मैं इनसे मिलने जंगल पहुंची तो रोक दिया गया। केरलम सरकार ने हाल ही में चोलानाइकन लोगों से जंगल में जाकर मिलने पर सख्त पाबंदी लगा दी है। केए शाहजी वो आखिरी शख्स हैं, जो इनकी गुफाओं तक पहुंचे हैं। शाहजी ने चोलानाइकन की गुफाएं और उनके रहन-सहन को करीब से देखा है। मेरी शाहजी से मुलाकात नीलांबूर जंगलों के मुहाने पर हुई। वहीं उन्होंने ये पूरी कहानी सुनाई। यह जंगल वायनाड के करीब है। मैंने प्रशासन से चोलानाइकन की गुफाओं तक जाने की मंजूरी मांगी, लेकिन अफसर नहीं माने। लगातार प्रयास करने के बाद वन विभाग के अफसरों ने सिर्फ दो चोलानाइकन परिवारों से मिलने की मंजूरी दी। ये दो परिवार जंगल के मुहाने पर रहते हैं। इन्हें सरकार ने कच्चे घर भी बनाकर दिए हैं। बाकी 20-25 परिवार जंगल में ही गुफाओं में रहते हैं। इजाजत मिलते ही मैं अपने साथी राम कुमार और बालकृष्णन के साथ वायनाड से नीलांबूर के जंगलों की ओर निकल पड़ी। रास्ते में बालकृष्णन बताते हैं कि चोलानाइकन बाहरी लोगों से डरते हैं, जल्द बातचीत के लिए तैयार नहीं होते। ये पहाड़ों को देवता मानते हैं। गर्मियों के मौसम में नदियों के किनारे झोपड़ी बनाते हैं। मानसून और ठंड में वापस गुफाओं में लौट जाते हैं। ये जंगल से आमतौर पर बाहर नहीं आते। फिर ये दो परिवार यहां क्यों रहते हैं? कभी-कभी कुछ सामान वगैरह लेने के लिए चोलानाइकन जंगल से बाहर आते हैं। थोड़े दिन इन कच्चे घरों में रहते हैं। प्रशासन इनकी निगरानी करता है, ताकि कोई इन्हें परेशान न करे। बाद में जंगल के बीचोबीच अपनी गुफाओं में लौट जाते हैं। नीलांबूर के आगे करीब 20 किलोमीटर के बाद सड़क खत्म हो जाती है। आगे का सफर यहां से पैदल ही तय करना होगा। हम तीनों पथरीले रास्तों से होते हुए तो जंगल के मुहाने पर पहुंचे। यहां चारों ओर पक्षियों की आवाज आ रही है। अचानक दो कच्चे घर दिखाई देते हैं। तभी बालकृष्णन कहते हैं- चोलानाइकन के दो परिवार वहीं रह रहे हैं। हम उन घरों की ओर बढ़े, तो कुत्ते भौंककर स्वागत करते हैं। घरों के करीब पहुंचते ही एक आदमी दिखता है। बालकृष्णन बताते हैं– ये मुरगन है। इस बीच, मुरगन अपने काम में लगा रहा, हमें देखा तक नहीं। वह जमीन पर बैठे-बैठे कटहल को फोड़कर उसके बीजों को खा रहा है। बालकृष्णन ने उसी की भाषा में पूछा- यह कहां से लाए हो? वह बताता है- जंगल से एक आदमी लेकर आया था। अभी वो और फल लेने जंगल गया है। इस दौरान, जब मैं इस बातचीत का वीडियो बना रही थी, तो मुरगन कुछ कहते-कहते रुक गया। बालकृष्णन के थोड़ा समझाने के बाद मुरगन मान गया। वह बताता है- गर्मी से एक महीने पहले जंगल से कटहल लाते हैं। इसे उबालते हैं। इसके बाद, इसमें शहद और मिर्च डालकर छोटे–छोटे गोले बनाकर खाते हैं। बालकृष्णन बताते हैं- 'इनके पास हर बीमारी का इलाज जंगल में ही है। ये हर तरह की जड़ी–बूटी पहचानते हैं। बालकृष्णन, मुरगन से पूछता है कि तुम्हारे यहां शादी कैसे होती है?' वो बताता है- ‘जब लड़की को लड़का पसंद कर लेता है, तो हमारे मुखिया और गांव के बुजुर्ग एक जगह सभी को बुलाते हैं। वहां वे तुलसी की दो माला बनाकर दोनों को देते हैं। लड़का, लड़की एक दूसरे को माला पहनाते हैं। इसके बाद, दोनों साथ रहने लगते हैं। उन्हें अलग से एक गुफा भी दे दी जाती है। किसी तरह का कोई भोज या लेन-देन नहीं होता।’ इतने में एक महिला आती हैं। दुबली-पतली, घुंघराले बालों वाली। बालकृष्णन ने नाम पूछा, तो बोली- बिंदु। मुझे देखते ही वह गुफा के दूसरी ओर चली जाती है और वहां कुछ सुखाने लगती है। बालकृष्णन पास में जाकर पूछते हैं- यह क्या कर रही हो? वो बताती है- ये काली मिर्च है, इसे सुखा रही हूं। जंगली शहद और काली मिर्च बेचकर थोड़ा बहुत पैसा मिल जाता है। इस दौरान मैं उनके घर में झांकती हूं, तो मुरगन–बिंदु मुझे गौर से देखते हैं। घर की दीवारें गंदी थीं और चारों तरफ धूल ही धूल है। नीचे दाल–चावल बिखरे पड़े हैं। शायद एक–दो दिन पहले उन्हें किसी ने राशन किट दी थी। जंगल से लाई गई सब्जियां हैं और नींबू भी रखे हैं। रसोई में सिर्फ 2–3 एल्युमिनियम के बर्तन दिखाई दिए। न मसाला, न नमक, न तेल। मुरगन, बालकृष्ण को बताता है कि हम जंगलों से कुछ भी तोड़कर सीधे ही खा लेते हैं, पकाते नहीं हैं। आग में मछली भून लेते हैं या चावल उबालकर कांजी बनाते हैं। तभी, मेरे साथी राम कुमार ने मुझे आवाज दी। मैं बाहर निकली, तो उन्होंने मुझे घर के पास से ही एक हल्दी की गांठ निकालकर दी। कहा– 'इसकी खुशबू लेकर देखिए।' मैंने सूंघी तो, वाकई हल्दी की ऐसी खुशबू मैंने पहले कभी महसूस नहीं की थी। राम कुमार ने बताया– दुनिया में आपको इससे ज्यादा शुद्ध हल्दी कहीं नहीं मिलेगी। चोलानाइकन इसे खाते हैं। घाव होने पर शरीर पर लगाते हैं। इसके बाद राम कुमार ने एक पेड़ से पत्ता तोड़कर दिया। कहा- ये तेजपत्ता है। उसकी खुशबू भी लाजवाब थी। मैंने पूछा- जंगल में हर समय फल-फूल नहीं होते, ऐसे में ये क्या खाते हैं? बालकृष्णन बताते हैं– चोलानाइकन जंगल से शहद इकट्ठा करते हैं। बांस के लंबे खोखले डंडों में भरकर इसे हल्की आंच पर गर्म करते हैं। इसके बाद इसे मिट्टी में दबा देते हैं। जब जंगल में खाने के लिए कुछ नहीं मिलता, तब ये लोग इस शहद को बाहर निकालकर उसमें पानी मिलाते हैं और पके चावल से खाते हैं। क्या, इनके नाम भी खास होते हैं? बालकृष्णन बताते हैं– ‘हर चोलानाइकन की गुफा का एक नाम होता है, इसलिए गुफा के नाम से ही परिवार पहचाने जाते हैं। ये लोग भले ही संख्या में कम हैं, लेकिन अपने मुखिया की हर बात मानते हैं।’ ‘कौन सा परिवार किस गुफा में रहेगा, कब जंगल में नई जगह जाना है या शहद का बंटवारा कैसे होगा, ये सब मुखिया ही तय करता है।’ चोलानाइकन छोटे–छोटे कबीलों में जंगलों में अलग-अलग जगह रहते हैं। हर कबीले का एक मुखिया होता है। कबीले आपस में बहुत मेल-जोल नहीं रखते। क्या चोलानाइकन कोई उत्सव भी मनाते हैं? दैवओट्टू, इनका एक पारंपरिक उत्सव है। यह आमतौर पर अप्रैल में होता है। इस उत्सव के लिए हर परिवार शहद एकत्रित करता है। फिर शहद का एक हिस्सा पर्वत और पुरखों को अर्पित करते हैं। क्या आपको पता है, चोलानाइकन तारों को देखकर मौसम का हाल बता देते हैं। मैंने पूछा- कैसे? वो बताते हैं- ये लोग तारों की स्थिति और उनकी चमक के आधार पर मानसून के आने का अनुमान लगा लेते हैं। साथ ही, अपनी गुफा बदल लेते हैं। भारी बारिश से बचने के लिए ये लोग पहाड़ों पर बनी गुफाओं में चले जाते हैं। मौत के बाद मिट्टी से दूरी… लाश को पत्तों–बेलों से ढंकते हैं बालकृष्णन बताते हैं कि चोलनाइकन समुदाय में अंतिम संस्कार अनूठे तरीके से होता है। मौैत के बाद वे एक गहरा गड्ढा खोदते हैं। लाश को बेलों और पत्तों में लपेटकर उसमें रखते हैं। ऊपर से मिट्टी नहीं डालते, बल्कि गड्ढे को सूखी लकड़ियों और पत्तों से ढंक देते हैं। वे इस बात का विशेष ध्यान रखते हैं कि मिट्टी का एक भी कण शव को न छू पाए। ऐसा क्यों? चोलनाइकन के लिए मिट्टी 'संसार का भार' है। शव को मिट्टी से दूर रखने के पीछे उनकी गहरी आस्था है। उनका मानना है कि ऐसा करने से मृतक की आत्मा बिना किसी सांसारिक बंधन में उलझे, जंगल की हवाओं और पेड़ों की चेतना में विलीन हो जाती है। अब शाम होने वाली है। हम वापस वायनाड की ओर निकल पड़ते हैं। अगले दिन, वायनाड में पर्यावरणविद केए शाहजी के घर पहुंची। शाहजी बताते हैं- बारिश के दिन थे। जब मैं पहली बार चोलानाइकन लोगों की गुफा के पास पहुंचा, तो लगा जैसे किसी दूसरी सदी में आ गया हूं। मैंने चोलानाइकन के बीच रात गुजारी है। रात में हाथियों की चिंघाड़ पूरे जंगल में गूंज रही थी। गुफाओं के पास तक भी कुछ हाथी आ गए थे, लेकिन चोलानाइकन पर इसका कोई फर्क नहीं पड़ा। वो रात मैंने करवटें बदल–बदल कर गुजारी। चोलानाइकन की खासियत बताता हूं। वे पक्षियों की चहचहाहट, हवा का रुख और पेड़ों की पत्तियों के हिलने के तरीके से बता सकते हैं कि बारिश कब होगी या जंगल में खतरा कितना करीब है। ‘वे कौन सी भाषा बोलते हैं?’ चोलानाइकन अपनी भाषा को 'चोलानाइक्कन' कहते हैं। इस भाषा में मलयालम के अलावा तमिल और कन्नड़ के भी कुछ शब्द मिलते हैं। शाहजी से मिलकर मैं वायनाड के स्थानीय पत्रकार दीपक कुमार के घर पहुंची। दीपक भी चोलानाइकन और उनकी गुफाओं को करीब से देख चुके हैं। कुछ बताने से पहले वो मुझे चोलानाइकन की तस्वीरें दिखाते हैं। इसके बाद वे कहते हैं- ये लोग अपने पूर्वजों की तरह गुफाओं में ही रहना पसंद करते हैं। सरकार ने जंगल में इनके लिए घर बनाकर दिए हैं, लेकिन वह अधूरे हैं। वे बताते हैं– चोलानाइकन समुदाय की एक महिला को गर्भवती होने पर वायनाड के सरकारी अस्पताल में भर्ती करवाया गया, लेकिन वह रात में ही वहां से चली गई। अफरा–तफरी मच गई। आखिर, वह जंगल में अपने लोगों के बीच मिली। ऐसे और भी किस्से हैं। लेकिन सबसे बड़ा संकट यह है कि यदि इस जनजाति को नहीं संभाला गया तो ये ‘केवमैन’ जंगलों में ही खत्म हो जाएंगे। --------------------------------------- 1- ‘-10C में मौत, लेकिन हम करते हैं नंगे बदन तपस्या’:ध्यान में ही थम जाती हैं हमारी सांसें, मरने के 15 दिन बाद अंतिम संस्कार हिमालय। 3,600 मीटर की ऊंचाई पर यहां पारा -10 डिग्री सेल्सियस तक लुढ़क चुका है। हवा में ऑक्सीजन इतनी कम है कि हर सांस एक जद्दोजहद है। लेकिन इन बर्फीली हवाओं के बीच, सामने जो कुछ दिख रहा है, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है। यहां नजर आ रही छोटी-छोटी गुफाओं और पत्थरों पर कुछ लोग नंगे बदन आंखें बंद किए बैठे हैं। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- मुर्गी का कलेजा चीरकर कहा, ये चोर नहीं है:ससुराल पहुंचते ही बलि देती है दुल्हन, कटे सिर को मंदिर मानते हैं गालो सुबह के 7 बजे हैं। अरुणाचल प्रदेश की एक पहाड़ी बस्ती में हूं। यहं एक घर पर लोगों की भीड़ जमा है। उन्हीं के बीच एक लड़का परेशान खड़ा है। थोड़ी देर में घर से एक बुजुर्ग बाहर आते हैं। काले कपड़े में, बाघ की खाल का जैकेट पहने। कंधे पर धनुष, पीठ पर तीरों से भरा तरकश लिए और सिर पर टोपी लगाए। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें
28 मई 2026, 77 साल के सिद्धारमैया ने कर्नाटक के CM पद से इस्तीफा दिया, अब 64 साल के डीके शिवकुमार 3 जून को राज्य के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेंगे। ये फैसला अचानक नहीं लिया गया। 4 मई को दिल्ली में राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और केसी वेणुगोपाल के साथ सिद्धारमैया की बैठक हुई। इसमें उन्हें नेतृत्व परिवर्तन के लिए कहा गया। सिद्धारमैया ने 48 घंटे का वक्त मांगा और वादा पूरा करते हुए इस्तीफा दे दिया। CM पद छोड़ने के लिए आखिर कैसे माने सिद्धारमैया? कर्नाटक के सीनियर जर्नलिस्ट गौतम शंकर कहते हैं, ‘कांग्रेस सत्ता परिवर्तन को भले सहजता से पेश कर रही, लेकिन सिद्धारमैया का करियर देखने के बाद मैं कह सकता हूं कि इतनी आसानी से पद छोड़ देना, उनके स्वभाव के विपरीत है। उन्होंने 1996 में जेएच पटेल और 2004 में धर्म सिंह को कर्नाटक का CM बनाए जाने को खुली चुनौती दी थी। इसी अड़ियल रुख के कारण 2005 में पूर्व PM देवगौड़ा ने उन्हें JDS से निकाल दिया था।’ इस बार क्या बदला? गौतम जवाब में कहते हैं, ‘अहिंदा गुट के कुछ नेताओं से जानकारी मिली है कि सिद्धारमैया ने 4 प्रमुख मांगें रखीं।’ 1. तीन डिप्टी CM का पद। 2. कैबिनेट में वफादारों के लिए अहम विभाग। 3. MLC बेटे यतींद्र को कैबिनेट में जगह और बड़ी जिम्मेदारी। 4. कांग्रेस का नया प्रदेश अध्यक्ष चुनने में उनकी सलाह जरूरी। इसकी ज्यादा संभावना है कि सतीश जारकीहोली को नया अध्यक्ष बनाया जाए।वे एक शक्तिशाली ST नेता हैं और खुद को अगले अहिंदा नेता के रूप में भी स्थापित कर रहे हैं। गौतम आगे कहते हैं, ‘सीट छोड़ने के बाद सिद्धारमैया सबसे पहले बेटे यतींद्र के साथ दिल्ली गए। 29 मई को उन्होंने बेटे की मुलाकात सोनिया गांधी और राहुल गांधी से कराई। इससे लगभग तय है कि अबकी यतींद्र को कैबिनेट में शामिल किया जाए।’ कर्नाटक की पॉलिटिक्स पर करीब से नजर रख रहे पॉलिटिकल एनालिस्ट केए शाजी कहते हैं, ‘पार्टी के भरोसेमंद सूत्रों से पता चला है कि सिद्धारमैया बेटे यतींद्र के लिए डिप्टी CM का पद या फिर पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग, उद्योग और जल संसाधन विभाग और मेडिकल एजुकेशन जैसे विभाग चाहते हैं।‘ सिद्धारमैया गुट खुश नहीं, लेकिन फैसला माना सिद्धारमैया के करीबी माने जाने वाले विधायक अशोक एम.पट्टन बताते हैं, ‘ये पहले से तय था कि हाईकमान से जो भी निर्देश होगा, दोनों नेता (सिद्धारमैया और शिवकुमार) मानेंगे। अब जब डीके शिवकुमार अगले मुख्यमंत्री होंगे, तो सभी उनके साथ हैं।‘ ‘पिछड़ा वर्ग, दलित और अल्पसंख्यक समुदाय से आने वाले विधायकों ने आलाकमान तक संदेश पहुंचाया है कि अगर हमारे (अहिंदा) इतने बड़े नेता को पद से हटाया जा रहा है, तो भविष्य में भी इस वर्ग के हितों और प्रतिनिधित्व का पूरा ख्याल रखा जाना चाहिए।‘ केरल चुनाव की वजह से टाली गई CM बदलने की कवायद कर्नाटक में 2023 के विधानसभा चुनाव में सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार मुख्यमंत्री पद के दावेदार बनकर उभरे। इसे देखते हुए फॉर्मूला निकाला गया कि दोनों ढाई-ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री बनेंगे। नवंबर 2025 में सिद्धारमैया के ढाई साल पूरे हो गए, लेकिन वो तब भी CM बने रहने पर अड़े रहे। कर्नाटक कांग्रेस से जुड़े सोर्स के मुताबिक, तय फॉर्मूले के हिसाब से दिसंबर 2025 से शिवकुमार को CM पद संभालना था, लेकिन राहुल गांधी समेत पार्टी के सभी सीनियर लीडर केरल में चुनावों की तैयारियों में व्यस्त थे, इसलिए तब ये बदलाव नहीं हो सका। नए CM के लिए क्या चैलेंज…वोक्कालिगा को एक रखना डीके के सामने चुनौती कांग्रेस सोर्सेज के मुताबिक, नई सरकार में 4 डिप्टी CM और 6 मंत्रियों को शपथ दिलाई जा सकती है। शिवकुमार प्रभावशाली वोक्कालिगा कम्युनिटी से हैं। राज्य में इनकी हिस्सेदारी करीब 15% है। CM बनते शिवकुमार का सबसे बड़ा टारगेट पूरे वोक्कालिगा वोटबैंक को कांग्रेस के पक्ष में करना होगा। ऐसे में BJP की सहयोगी पार्टी JD(S) के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री कुमारस्वामी के लिए वोक्कालिगा वोटरों का समर्थन हासिल कर पाना मुश्किल हो सकता है। BJP की भी टेंशन बढ़ीBJP के एक सोर्स बताते हैं कि शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद JD(S) के अंदर टूट-फूट की आशंका भी बढ़ जाएगी। सोर्स के मुताबिक, शिवकुमार ये तय करेंगे कि JD(S) के नेताओं और कार्यकर्ताओं का एक हिस्सा कांग्रेस में आए। JD(S) के लिए अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को एकजुट बनाए रखना बड़ी चुनौती होगी। इसके अलावा राज्य की सबसे बड़ी कम्युनिटी लिंगायत को साधना भी चुनौती है। ये BJP के सपोर्टर रहे हैं। पार्टी लीडर और कर्नाटक के पूर्व CM बीएस येदियुरप्पा की बढ़ती उम्र के चलते पार्टी का इन पर कंट्रोल कम हो रहा है। ऐसे में BJP के नेतृत्व वाली NDA अगले चुनाव में सिर्फ एंटी-इनकंबेंसी के भरोसे नहीं रह सकती। उसे कांग्रेस को चुनौती देने के लिए नई रणनीति और मुद्दे तलाशने होंगे। डीके का कर्नाटक के लिए रोडमैप शिवकुमार की पहचान मनी और पावर के दम पर काम करने वाले लीडर की रही है। अब CM बनकर उन्हें अपनी प्रशासनिक क्षमता साबित करनी है। सीनियर जर्नलिस्ट गौतम शंकर के मुताबिक, CM बनने के बाद शिवकुमार को सबसे पहले ये तय करना होगा कि राज्य कर्ज में न डूबे और टैक्सपेयर्स पर ज्यादा बोझ न बढ़े। उपमुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने कई मेगा इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट शुरू किए थे, लेकिन सभी फंड की कमी से जूझ रहे हैं। इनमें बेंगलुरु में 40 किलोमीटर की टनल परियोजना शामिल है, जिसे 40,000 करोड़ से ज्यादा की लागत से शहर को जाम मुक्त करने के लिए बनाया जाना है। इस प्रोजेक्ट से लोगों को काफी उम्मीदें हैं, लिहाजा इसपर काम जल्द पूरा करना चाहिए। गौतम कहते हैं, ‘राज्य के सिंचाई मंत्री के रूप में डीके ने कावेरी नदी पर मेकेदातु संतुलन जलाशय और पेयजल परियोजना के लिए केंद्र से मंजूरी लेने में कड़ी मेहनत की है। इसकी लागत करीब 14,000 करोड़ है। वे CM बनते ही ये प्रोजेक्ट शुरू करेंगे। इसके अलावा परिवहन और लॉ एंड ऑर्डर कंट्रोल की दिशा में सरकार बड़े फैसले ले सकती है।’ ………………….. ये खबर भी पढ़ें… 5 दिन मीटिंग, प्रियंका एक्टिव, तब सतीशन बने केरलम CM 10 दिन की माथापच्ची के बाद आखिर कांग्रेस ने केरलम का CM तय कर लिया। राज्य में पार्टी के सबसे बड़े लीडर वीडी सतीशन नए CM होंगे। राहुल के भरोसेमंद केसी वेणुगोपाल और सबसे अनुभवी रमेश चेन्नीथला भी दावेदार थे। पढ़िए पूरी खबर…
पीएम बालेन शाह ने रविवार को दावा किया- नेपाल ने भी कई जगहों पर भारत की जमीन पर कब्जा किया है। मामले ने तूल पकड़ा, तो नेपाल के विदेश मंत्रालय को सफाई देनी पड़ी। क्या वाकई नेपाल ने भारत की जमीन कब्जा की है और बालेन का दावा उनका ही नुकसान कैसे कर सकता है; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: बालेन शाह ने क्या दावे किए, जिसपर हंगामा मच गया? जवाबः नेपाल में जेन-जी आंदोलन के बाद मार्च 2026 में चुनाव हुए। पुरानी पार्टियां और नेता बुरी तरह हार गए। बालेन शाह की अगुवाई में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को दो-तिहाई बहुमत मिला। 35 साल के बालेन शाह नेपाल के सबसे युवा प्रधानमंत्री बने। पीएम बनने के 65 दिन बाद 31 मई को बालेन संसद में पहला भाषण देने पहुंचे थे। इसी दौरान कुछ सांसदों ने उनसे भारत-नेपाल सीमा विवाद पर सवाल पूछा। जवाब में बालेन ने 2 बड़ी बातें कहीं… इन बयानों के बाद नेपाल की संसद में हंगामा मचा। विपक्षी दलों ने उनसे सबूत मांगे। बयान को संसद की कार्रवाई से हटाने की मांग की गई। प्रधानमंत्री को माफी मांगने के लिए कहा जाने लगा। नेपाल के पूर्व उप प्रधानमंत्री कमल थापा ने X पर लिखा ‘उन्हें जनता को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि वह कौन-सी जगह है और उसके क्या सबूत हैं। उन्हें तुरंत उस गलती को सुधारना चाहिए और सम्मानपूर्वक वह जमीन भारत को वापस कर देनी चाहिए।’ विपक्षी पार्टी नेपाली कांग्रेस के नेता वासना थापा ने कहा, ‘हमें जल्द सूचित किया जाना चाहिए था कि किस भूमि पर अतिक्रमण हुआ है। यह एक गंभीर और आपत्तिजनक मुद्दा है। इस बयान को संसद के रिकॉर्ड से भी हटाना चाहिए।’ हालांकि नेपाल में पत्रकारों और राजनयिकों के एक धड़े ने पीएम बालेन की साफगोई और सीमा विवाद को इतनी मजबूती से उठाने की तारीफ भी की है। सवाल-2: क्या वाकई नेपाल ने भारत की जमीन पर कब्जा कर रखा है? जवाबः नेपाल के विदेश मंत्रालय ने पीएम के बयान पर खुद स्पष्टीकरण जारी किया। लिखा- ‘प्रधानमंत्री भारत के इलाकों पर कब्जे की नहीं, 'क्रॉस-बॉर्डर ऑक्यूपेशन' की बात कर रहे थे।’ क्रॉस-बॉर्डर ऑक्यूपेशन यानी एक देश की जमीन को दूसरे देश के नागरिक खेती-बाड़ी, रहने के लिए और दूसरे कामों में इस्तेमाल करते हैं। दरअसल, भारत और नेपाल के बीच करीब 1,751 किमी लंबी सीमा है। इसमें पहाड़ी इलाके, नदियां और समतल जमीन है। ज्यादातर ओपेन बॉर्डर है, यानी दोनों देशों के बीच में कोई फेंसिंग नहीं है। जिन इलाकों में जमीन समतल है, वहां दोनों तरफ कुछ जमीन ‘नो-मेंस लैंड’ रखी जाती है। बॉर्डर पिलर के दोनों तरफ 10-10 गज की पट्टी होती है, इसलिए इसे दसगजा भी कहते हैं। इस जमीन पर दोनों देशों के नागरिकों को स्थायी निर्माण, मकान, दुकान या खेती करने की अनुमति नहीं होती। बिहार के सीमावर्ती इलाकों से भास्कर रिपोर्टर बताते हैं कि सीमा के कई इलाकों में 500 मीटर तक कोई पिलर नहीं है। यहां लोग अपना कब्जा बढ़ा लेते हैं। दोनों तरफ के किसान अपनी जमीन के साथ नो-मेंस लैंड की जमीन पर भी खेत जोतकर बुआई कर लेते हैं। कई जगहों पर लोगों ने टीन शेड लगाकर भैंसें और बकरियां भी बांधी हुई हैं। भारत की सशस्त्र सीमा बल और नेपाल सशस्त्र पुलिस मिलकर इस क्षेत्र में कब्जे हटाने के अभियान चलाते रहते हैं। इसके अलावा भी पिछले सालों में क्रॉस बॉर्डर अतिक्रमण की कुछ रिपोर्ट मिलती हैं… सवाल-3: बालेन शाह का दावा उनका ही नुकसान कैसे करेगा? जवाबः उनके दावे से 3 मुश्किलें पैदा होंगी… 1. नेपाल की कूटनीतिक स्थिति कमजोर होगी 2. ब्रिटेन शामिल हुआ, तो मामला और उलझ जाएगा 3. बालेन शाह की विश्वसनीयता पर सवाल उठे सवाल-4: भारत के लिए इस बयान के मायने क्या हैं? जवाबः बालेन शाह के ताजा बयान पर फिलहाल भारत ने कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। हालांकि पिछले दिनों सीमा विवाद के सवाल पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि नेपाल के ये क्षेत्रीय दावे न तो सही हैं और न ही किसी ऐतिहासिक तथ्य या सबूत पर आधारित हैं। पीएम बनने के बाद पिछले 65 दिनों में बालेन शाह ने कई ऐसे काम किए, जिससे भारत के डिप्लोमैटिक गलियारों में हलचल है… भारतीय राजदूत को विशेष दर्जा नहीं दिया: परंपरा के मुताबिक, नेपाल में नए पीएम भारतीय राजदूत से अलग से शिष्टाचार मुलाकात करते हैं। बालेन शाह ने भारतीय राजदूत से अलग से मिलने के बजाय सभी देशों के राजदूतों से सामूहिक मुलाकात की। इससे यह संदेश गया कि उनकी सरकार भारत को कोई विशेष तरजीह नहीं देना चाहती। मानसरोवर यात्रा पर आपत्ति जताई: 4 जुलाई से मानसरोवर यात्रा शुरू होनी है। इसके लिए श्रद्धालु भारत से लिपुलेख पास होते हुए चीन के तिब्बत जाते हैं। नेपाली विदेश मंत्रालय ने इस पर आपत्ति जताई है और कहा है कि लिपुलेख उनका इलाका है। उन्होंने भारत और चीन को भी चिट्ठी लिखकर अपना स्टैंड साफ किया है। भारतीय विदेश सचिव से नहीं मिले: मई 2026 में भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री नेपाल जाकर बालेन शाह को भारत आने का आधिकारिक न्योता देने वाले थे। लेकिन, बालेन ने उन्हें मुलाकात का समय नहीं दिया और दौरा रद्द हो गया। पीएम बनने के बाद भारत नहीं आए: ये परंपरा रही है कि पद संभलाने के बाद नेपाली प्रधानमंत्री भारत का दौरा करते हैं। लेकिन बालेन ने कार्यभार संभालते ही यह घोषणा कर दी कि वे कार्यकाल के पहले साल किसी भी देश के आधिकारिक दौरे पर नहीं जाएंगे। राजन कुमार के मुताबिक, नेपाल के विदेश मंत्रालय ने पीएम बालेन शाह के बयान पर सफाई दे दी है। इसलिए भारत अभी इस पर कड़ा रुख नहीं अपनाएगा। भारत-नेपाल का सीमा विवाद उतना जटिल भी नहीं है, क्योंकि दोनों देशों के बीच खुली सीमा है। इस बीच बालेन शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के अध्यक्ष रबी लामिछाने 5 दिन के भारत दौरे पर आए हैं। वे बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन से मुलाकात करेंगे। इस दौरान हुई बातचीत से नेपाल की नई सरकार का रुख और साफ हो सकता है। सवाल-5: भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद क्या है? जवाबः भारत के पांच राज्यों से नेपाल की सीमा लगती है- उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और सिक्किम। इनमें उत्तराखंड में भारत-नेपाल सीमा की लंबाई 173 किलोमीटर है। उत्तराखंड की सीमा चीन से भी लगती है। इसी सीमा से जुड़े तीन इलाके- लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी विवाद की वजह हैं। नेपाल इन्हें अपना हिस्सा बताता है, जबकि भारत इस दावे को खारिज करता आया है। ये पूरा इलाका लगभग 338 वर्ग किलोमीटर में फैला है। यानी रायपुर शहर जितना बड़ा। भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद करीब 210 साल पुराना है… उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में मौजूद कालापानी भारत के लिए रणनीतिक तौर पर बेहद जरूरी है। मानसरोवर जाने वाले तीर्थयात्री इसी इलाके के लिपुलेख दर्रे से होकर गुजरते हैं। यहां से चीनी सेना पर नजर रखना आसान है। इसीलिए चीन इसे लेकर नेपाल को उकसाता रहता है। 1962 के युद्ध के बाद लिपुलेख दर्रा बंद भी हुआ। हालांकि 2015 में हुए भारत-चीन समझौते के बाद इसे दोबारा खोला गया। मई 2020 में भारत ने कैलाश मानसरोवर यात्रा को आसान बनाने के लिए पिथौरागढ़ से लेकर लिपुलेख दर्रे तक 80 किमी की सड़क बनाई, जिस पर नेपाल ने नाराजगी जताई थी। 15 मई 2020 को तत्कालीन थल सेना अध्यक्ष एम.एम नरवणे ने कहा था कि नेपाल ऐसा किसी और के बहकावे में कर रहा है। नरवणे का इशारा चीन की ओर था। इसके बाद जून 2020 में नेपाल की संसद ने एक नया नक्शा मंजूर किया था, जिसमें इन इलाकों को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया था। इस पर भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा था कि नेपाल का दावा ऐतिहासिक तथ्यों और सबूतों पर आधारित नहीं है और इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। ---------- पुरी खबर पढ़िए… 15 दिन में सैलरी, अफसरों के बच्चे सरकारी स्कूल में: पीएम बालेन शाह के 30 दिनों की कहानी; नेपाल को बदलेंगे या तानाशाह बनेंगे 27 मार्च 2026 को 35 साल के बालेन शाह ने नेपाल के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। पीएम बनते ही पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को गिरफ्तार करवा दिया गया। सरकारी दफ्तरों से नेताओं की तस्वीरें उतरवा दी गईं। छात्र राजनीति पर रोक लगा दी गई। अब अफसरों के बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ना होगा, जबकि कर्मचारियों को हर 15 दिन में सैलरी मिलेगी। पूरी खबर पढ़िए…
दुबई बेस्ड भारतीय बैंकर श्रद्धा गुप्ता ने विश्व की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई की
भारतीय पर्वतारोही श्रद्धा गुप्ता ने सफलतापूर्वक माउंट एवरेस्ट (8,849 मीटर) पर चढ़ाई पूरी कर ली है, जो पृथ्वी का सबसे ऊंची चोटी है। उन्होंने पर्वतारोहण की सबसे चुनौतीपूर्ण उपलब्धियों में से एक को हासिल किया है। यह चढ़ाई उन्होंने एलीट एक्सपेडिशन्स के साथ की, जिसकी स्थापना रिकॉर्ड तोड़ने वाले पर्वतारोही निर्मल पुरजा ने की थी।
भारतीय मूल के एक 26 वर्षीय पायलट की शादी के कुछ ही घंटों बाद हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मौत हो गई, जबकि उनकी पत्नी गंभीर रूप से घायल हो गईं और कई घंटों तक मलबे में फंसी रहीं। यह घटना न केवल परिवार के लिए, बल्कि शादी समारोह में शामिल सैकड़ों मेहमानों के लिए भी अविश्वसनीय सदमे जैसी रही।
ईरान इंटरनेशनल और कुछ अन्य विदेशी मीडिया संस्थानों की रिपोर्टों में कहा गया कि राष्ट्रपति पेजेशकियान ने एक पत्र के माध्यम से सर्वोच्च नेता को अपना इस्तीफा भेजा है। रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि उन्होंने लिखा है कि हाल के महीनों में सरकार की भूमिका कमजोर हुई है।
इटली में इबोला का संदिग्ध मामला, कांगो से लौटे मरीज को आइसोलेशन में रखा गया
इटली के स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा है कि कैग्लियारी में इबोला के एक संदिग्ध मामले की जांच चल रही है। स्थानीय मीडिया के अनुसार, यह मरीज हाल ही में कांगो से लौटा था और इस समय सार्डिनिया की राजधानी में मौजूद है।

