हैती और सीरिया के नागरिकों का टीपीएस खत्म करने के ट्रंप के फैसले से रिपब्लिकन पार्टी में मतभेद
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा हैती और सीरिया के हजारों प्रवासियों का टेम्परेरी प्रोटेक्टेड स्टेटस (टीपीएस) समाप्त करने के फैसले को लेकर रिपब्लिकन पार्टी में मतभेद उभरकर सामने आए हैं
'पवित्र रक्त' और मां के अतीत का विरोधाभास उत्तर कोरिया की सत्ता 'माउंट पेक्टू रक्तसमूह' (Mount Paektu Bloodline) के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसे देश पर शासन करने के लिए सबसे शुद्ध और वीर माना जाता है। लेकिन किम जोंग उन की मां, को योंग-ही का इतिहास इस सरकारी दावे के बिल्कुल उलट है। रिपोर्ट्स के अनुसार, को योंग-ही का जन्म 1952 में जापान के ओसाका में हुआ था। उनका परिवार एक पुनर्वास कार्यक्रम के तहत उत्तर कोरिया आया था, लेकिन उस समय वहां के समाज में जापान से आए लोगों को हेय दृष्टि से देखा जाता था। यही कारण है कि किम जोंग उन की मां की सामाजिक पृष्ठभूमि को उनके 'पवित्र' परिवारिक इतिहास के लिए एक बड़ी बाधा माना जाता है, जिसे प्योंगयांग का प्रोपेगेंडा हमेशा छिपाने की कोशिश करता है।डांस, खूबसूरती और प्रेम कहानी का सफर को योंग-ही एक प्रतिभाशाली डांसर थीं और सरकारी आर्ट ट्रूप से जुड़ी हुई थीं। उनकी खूबसूरती और नृत्य ने तत्कालीन तानाशाह किम जोंग इल को अपनी ओर आकर्षित किया। उस समय किम जोंग इल पहले से ही विवाहित थे, लेकिन को योंग-ही के साथ उनके संबंधों ने एक नया मोड़ लिया। चूंकि उनकी शादी आधिकारिक नहीं थी, इसलिए को योंग-ही और उनके बच्चे राजधानी प्योंगयांग से दूर वोनसान शहर में रहने लगे। 2004 में स्तन कैंसर से उनकी मौत के बाद भी उत्तर कोरियाई मीडिया ने इसे कोई तवज्जो नहीं दी, क्योंकि उनका जापानी जन्म किम परिवार की 'शुद्धता' की छवि को कमजोर कर सकता था।सत्ता का खेल: कैसे बनीं किंगमेकर? किम जोंग उन के सत्ता तक पहुँचने के पीछे उनकी मां को योंग-ही का सबसे बड़ा हाथ माना जाता है। तानाशाह बनने की दौड़ में कई नाम थे—किम जोंग इल के बड़े बेटे किम जोंग नम, जो सुधारों की वकालत के कारण पिता का भरोसा खो चुके थे और बाद में जिनकी मलेशिया में हत्या कर दी गई; और दूसरे भाई किम जोंग चुल, जो कथित रूप से निजी जीवन में व्यस्त थे। विशेषज्ञ मानते हैं कि को योंग-ही ने ही पर्दे के पीछे से यह सुनिश्चित किया कि उनका बेटा किम जोंग उन ही अगला उत्तराधिकारी बने। अन्य दावेदारों के बाहर होने के बाद, मां की इस राजनीतिक बिसात ने किम जोंग उन को दुनिया के सबसे रहस्यमय और क्रूर तानाशाह की कुर्सी तक पहुँचा दिया। आज भी को योंग-ही का नाम उत्तर कोरिया की आधिकारिक गाथाओं में एक बड़ा 'ब्लैकआउट' है, क्योंकि उनका सच शासन की नींव पर उठने वाले सवालों को जन्म देता है।
पुतिन का बड़ा कबूलनामा: रूस के सामने खड़ी हैं बड़ी चुनौतियां यूक्रेन के साथ जारी युद्ध और पश्चिमी देशों के कड़े आर्थिक प्रतिबंधों के बीच रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि रूस फिलहाल एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है। सत्तारूढ़ 'यूनाइटेड रूस पार्टी' के सम्मेलन को संबोधित करते हुए पुतिन ने कहा कि इन कठिनाइयों ने देश को कमजोर नहीं, बल्कि पहले से कहीं अधिक मजबूत और अनुभवी बनाया है। उनका यह बयान तब आया है जब रूसी क्षेत्रों पर ड्रोन और मिसाइल हमलों में तेजी देखी जा रही है, जिससे बुनियादी ढांचों को काफी नुकसान पहुँचा है।हमलों का जवाब देने की दो-टूक तैयारी पुतिन ने देशवासियों को आश्वस्त करते हुए कहा कि सरकार वर्तमान में उत्पन्न हर समस्या से पूरी तरह वाकिफ है और उन्हें सुलझाने के लिए ठोस रणनीतियां अपनाई जा रही हैं। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि रूस अपनी सीमाओं की अखंडता और नागरिकों की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं करेगा। बुनियादी ढांचा सुविधाओं पर हो रहे हमलों का जिक्र करते हुए राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि रूस की सुरक्षा एजेंसियां और सशस्त्र बल हर तरह के खतरों से निपटने के लिए पूरी तरह मुस्तैद हैं। उन्होंने देश की संप्रभुता को अटूट बताते हुए कहा कि रूस किसी भी बाहरी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है।विकास और सुरक्षा का 'पुतिन फॉर्मूला' सितंबर में होने वाले संसदीय चुनावों से पहले पुतिन का यह संदेश पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए एक बड़ी लामबंदी का हिस्सा माना जा रहा है। अपने भाषण में उन्होंने न केवल सैन्य और रक्षा क्षमताओं पर ध्यान केंद्रित किया, बल्कि आर्थिक स्थिरता और सामाजिक सुरक्षा को भी प्राथमिकता दी। पुतिन ने जोर देकर कहा कि वैश्विक स्तर पर डाले जा रहे दबावों के बावजूद रूस अपनी स्वतंत्र नीतियों पर अडिग है और विकास के पथ पर आगे बढ़ रहा है। यह सम्मेलन स्पष्ट करता है कि आगामी चुनावों में पुतिन की पार्टी जनता के बीच 'विकास, सुरक्षा और स्थिरता' के तीन स्तंभों के साथ अपने वोट बैंक को और मजबूत करना चाहती है।
गैस के लिए ईरान की ओर ताक रहा पाकिस्तान: क्या अमेरिका से मिली छूट के बाद खत्म होगा ऊर्जा संकट
ऊर्जा संकट की मार: बेहाल है पाकिस्तान का पंजाब पाकिस्तान इन दिनों एक गंभीर ऊर्जा संकट के दौर से गुजर रहा है। अर्थशास्त्री महमूद रसूल के अनुसार, देश के अधिकांश हिस्सों, विशेषकर पंजाब प्रांत में गैस की भीषण कमी है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि उपभोक्ताओं को दिन भर में केवल कुछ घंटों के लिए ही गैस मिल पा रही है, जिससे घरेलू और औद्योगिक कामकाज पूरी तरह ठप पड़ गया है। आम जनता इस महंगाई और आपूर्ति की कमी से त्रस्त है, जिसके चलते सरकार पर दबाव बढ़ता जा रहा है।ईरान-अमेरिका शांति समझौता: पाकिस्तान के लिए नई उम्मीद पाकिस्तान की नजरें अब ईरान के साथ होने वाले संभावित ऊर्जा सौदों पर टिकी हैं। अमेरिका द्वारा ईरान पर लगे प्रतिबंधों में दी गई अस्थायी (60 दिन की) ढील ने पाकिस्तान को एक उम्मीद की किरण दिखाई है। चूँकि अमेरिका ने ईरान को विशिष्ट शर्तों के साथ तेल और गैस निर्यात की छूट दी है, इसलिए पाकिस्तान अब इस कूटनीतिक अवसर का फायदा उठाने की फिराक में है। पेट्रोलियम मंत्री अली परवेज मलिक ने स्पष्ट किया है कि खाड़ी क्षेत्र में शांति बहाल होने से वैश्विक स्तर पर पेट्रोलियम कीमतों में आई गिरावट का लाभ सीधे जनता तक पहुँचाने की कोशिश की जा रही है।कीमतों में राहत की उम्मीद और सरकार की चुनौती पिछले दिनों जब अमेरिका-ईरान के बीच संघर्ष चरम पर था, तब पाकिस्तान में पेट्रोल की कीमतें रिकॉर्ड 414 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई थीं। वर्तमान में यह 300 रुपये प्रति लीटर पर है, लेकिन जनता अभी भी और राहत की उम्मीद लगाए बैठी है। पेट्रोलियम मंत्री ने दावा किया है कि सरकार अंतरराष्ट्रीय समझौतों और नियमों के दायरे में रहकर ईरान से सस्ते तेल और गैस आयात के विकल्पों को तलाश रही है। हालांकि, यह छूट अस्थायी है और अमेरिका-ईरान वार्ताओं के भविष्य पर निर्भर करेगी। अब देखने वाली बात यह होगी कि शाहबाज शरीफ सरकार इस अल्पकालिक अवसर का लाभ उठाकर आम जनता को महंगाई से कितनी राहत दिला पाती है।
महरंग बलोच को उम्रकैद पर उठा विवाद, रिपोर्ट में पाकिस्तान की मानवाधिकार स्थिति पर सवाल
बलोच अधिकार कार्यकर्ता महरंग बलोच को सुनाई गई उम्रकैद की सजा पाकिस्तान सरकार और बलोच अधिकार आंदोलन के बीच बढ़ती दूरी को दर्शाती है
धर्मेंद्र प्रधान और हरदीप सिंह पुरी की मोदी कैबिनेट से छुट्टी हो सकती है। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण का मंत्रालय बदले जाने और RBI के पूर्व गवर्नर शक्तिकांत दास को नया वित्तमंत्री बनाए जाने की सुगबुगाहट है। सूत्रों के मुताबिक, मोदी मंत्रिमंडल में ये बड़ा फेरबदल अगले कुछ हफ्ते में हो सकता है। 1. धर्मेंद्र प्रधान, शिक्षा मंत्री ये हैं कौनः संघ और विद्यार्थी परिषद के बैकग्राउंड वाले धर्मेंद्र प्रधान 2 बार राज्यसभा सांसद रह चुके हैं। अभी ओडिशा के संबलपुर से लोकसभा सांसद और पिछले 12 साल से मोदी सरकार में मंत्री। जुलाई 2021 से शिक्षा मंत्री हैं। क्यों हटाए जा सकते हैं: धर्मेंद्र प्रधान के शिक्षामंत्री रहते 5 बड़ी लापरवाहियां हुईं- 2026 में NEET पेपर लीक, CBSE बोर्ड की कॉपी चेकिंग में गड़बड़ी, UGC इक्विटी गाइडलाइन्स, 2024 में UGC-NET पेपर लीक और 2020 में आई नई शिक्षा नीति के लागू होने में देरी। इसके चलते केंद्र सरकार बार-बार बैकफुट पर दिखी। 2. हरदीप सिंह पुरी, पेट्रोलियम मंत्री ये हैं कौनः 1974 बैच के रिटायर्ड IFS अफसर हरदीप सिंह पुरी 2014 में बीजेपी से जुड़े। 2 बार राज्यसभा सांसद बने। सितंबर 2017 से केंद्रीय मंत्री हैं। अभी इनके पास पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय है। क्यों हटाए जा सकते हैं: सेक्स स्कैंडल 'एपस्टीन फाइल्स' में पुरी का नाम जुड़ा। फरवरी में कांग्रेस ने दावा किया कि 2014-17 के बीच पुरी ने जेफरी एपस्टीन से 62 ईमेल एक्सचेंज किए और 14 मीटिंग्स कीं। उन्हें हटाने की एक वजह उनकी उम्र भी हो सकती है। 74 साल के पुरी पिछले 9 साल से मंत्री हैं। 3. रवनीत सिंह बिट्टू, रेल राज्यमंत्री ये हैं कौनः पंजाब के पूर्व सीएम बेअंत सिंह के पोते रवनीत सिंह बिट्टू कांग्रेस में 3 बार लोकसभा सांसद बने। मार्च 2024 में बीजेपी से जुड़े। फिर राज्यमंत्री बने। अगस्त 2024 में राजस्थान से राज्यसभा पहुंचे। क्यों हटाए जा सकते हैं: 3 जून को बिट्टू ने अगले साल होने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव में उतरने की इच्छा जाहिर की। उन्होंने कहा, 'मैंने लोकसभा और राज्यसभा में 17 साल पूरे कर लिए हैं। मैंने अपना सामान पैक कर लिया है और पंजाब जाने के लिए पूरी तरह तैयार हूं।' 4 जून को बीजेपी ने राज्यसभा के लिए 11 उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की। इसमें बिट्टू का नाम नहीं था। 21 जून 2026 को उनका राज्यसभा कार्यकाल खत्म हो गया। बिट्टू बीजेपी को पंजाब की सत्ता तक पहुंचने में मदद कर सकते हैं। लुधियाना की किसी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ सकते हैं। 4. पंकज चौधरी, वित्त राज्यमंत्री ये हैं कौनः उत्तर प्रदेश की महाराजगंज सीट से 7 बार के लोकसभा सांसद पंकज चौधरी जुलाई 2021 से वित्त राज्यमंत्री हैं। दिसंबर 2025 में बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। क्यों हटाए जा सकते हैं: बीजेपी की इंटरनल पॉलिसी ‘एक व्यक्ति, एक पद’ के चलते चौधरी को मोदी कैबिनेट से मुक्त किया जा सकता है, ताकि 2027 यूपी विधानसभा और 2029 लोकसभा चुनाव के लिए उनका पूरा फोकस संगठन और इलेक्शन मैनेजमेंट पर रहे। 5. हर्ष मल्होत्रा, सहकारिता राज्यमंत्री ये हैं कौनः 2015-16 में पूर्वी दिल्ली नगर निगम के महापौर बने। 2024 में पूर्वी दिल्ली से सांसद और मोदी कैबिनेट में राज्यमंत्री बने। मई 2026 में दिल्ली बीजेपी के अध्यक्ष बने। क्यों हटाए जा सकते हैंः बीजेपी की 'एक व्यक्ति, एक पद' की नीति के तहत 62 साल के मल्होत्रा को कैबिनेट से हटाया जा सकता है। 6. जॉर्ज कुरियन, अल्पसंख्यक मामलों के राज्य मंत्री ये हैं कौनः सुप्रीम कोर्ट में वकील रहे। जून 2024 में मोदी सरकार में राज्य मंत्री बने। अल्पसंख्यक कार्य और मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय का जिम्मा संभाला। अगस्त 2024 में मध्यप्रदेश से राज्यसभा पहुंचे। क्यों इस्तीफा दिया: 23 जून को मोदी कैबिनेट के इकलौते ईसाई मंत्री कुरियन ने इस्तीफा दे दिया। इसकी एक वजह अप्रैल-मई में हुआ केरलम विधानसभा चुनाव भी है। बीजेपी को उम्मीद से कमतर नतीजे मिले। 65 साल के कुरियन ने भी चुनाव लड़ा, लेकिन ‘कंजिराप्पल्ली’ सीट पर वे तीसरे नंबर पर रहे। 1. शक्तिकांत दास ये हैं कौनः तमिलनाडु कैडर के 1980 बैच के रिटायर्ड IAS अफसर शक्तिकांत दास पीएम मोदी के प्रधान सचिव-2 हैं। आर्थिक मामलों के सचिव, राजस्व सचिव, 15वें वित्त आयोग के सदस्य, G20 शेरपा और 2018 से 2024 तक RBI के गवर्नर रह चुके हैं। एंट्री क्यों हो सकती है: मोदी सरकार के बड़े आर्थिक फैसले- नोटबंदी और GST लागू करने में दास की अहम भूमिका रही। बतौर RBI गवर्नर 3 बार कार्यकाल विस्तार मिलना उन पर मोदी सरकार के भरोसे का सबूत है। इस दौरान दास ने भारतीय अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाए रखा, डिजिटल पेमेंट्स को बढ़ावा दिया और बैंकिंग रेगुलेशन मजबूत किया। सरकार को उम्मीद है कि प्रशासनिक और आर्थिक समझ रखने वाले दास वित्तीय स्थिति को मजबूत करेंगे। 2. अनुराग ठाकुर ये हैं कौनः हिमाचल प्रदेश के पूर्व सीएम प्रेम कुमार धूमल के बेटे हैं। BCCI के अध्यक्ष रहे। हमीरपुर लोकसभा सीट से लगातार 5वीं बार सांसद बने। एंट्री क्यों हो सकती है: मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में अनुराग राज्यमंत्री और कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं। तब बतौर सूचना एवं प्रसारण मंत्री उनका रिपोर्ट कार्ड अच्छा था। अगले साल हिमाचल में विधानसभा चुनाव है। बीजेपी चाहती है कि अनुराग के बूते युवा वोटर्स को लामबंद करके मौजूदा कांग्रेस सरकार हटाए और सत्ता में आए। 3. वीडी शर्मा ये हैं कौनः मध्यप्रदेश से आने वाले वीडी शर्मा पुराने स्वयंसेवक माने जाते हैं। 3 दशकों तक RSS और ABVP में काम किया। 2013 में बीजेपी में एक्टिव हुए। 2020 से 2025 तक बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष रहे। अभी खजुराहो से लगातार दूसरी बार सांसद हैं। एंट्री क्यों हो सकती है: मध्यप्रदेश के ज्यादातर राष्ट्रीय नेताओं को राज्य की राजनीति तक सीमित कर दिया गया है। जैसे- नरेंद्र सिंह तोमर, कैलाश विजयवर्गीय, प्रह्लाद सिंह पटेल। 55 साल के वीडी शर्मा को केंद्र में मंत्री पद देकर बीजेपी मध्यप्रदेश से अगली पीढ़ी के राष्ट्रीय नेता तैयार करना चाहती है। पार्टी में वीडी की छवि मजबूत संगठनकारी नेता की है। उनके अध्यक्ष रहते बीजेपी ने 2024 में मध्यप्रदेश की सभी 29 लोकसभा सीटें जीतीं। 4. तरुण चुग ये हैं कौनः पंजाब के अमृतसर से आते हैं। RSS का बैकग्राउंड है। 2 बार विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं, लेकिन जीते नहीं। 2018 से वे बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव हैं। एंट्री क्यों हो सकती है: हाल ही में हुए राज्यसभा चुनाव में बीजेपी ने पंजाब के कोटे से चुग को मध्यप्रदेश से उतारा और वे जीते भी। चुग को रवनीत सिंह बिट्टू की जगह राज्यसभा सीट मिली और अब मंत्री पद भी मिल सकता है। 5. राघव चड्ढा ये हैं कौनः चार्टर्ड अकाउंटेंट से नेता बने। अरविंद केजरीवाल के करीबी रहे। 2020 में दिल्ली के राजेंद्र नगर से विधायक और दिल्ली जल बोर्ड के उपाध्यक्ष बने। 2022 में पंजाब से राज्यसभा पहुंचे। एंट्री क्यों हो सकती है: अप्रैल में राघव ने AAP के 6 अन्य राज्यसभा सांसदों के साथ बीजेपी जॉइन कर ली। बीजेपी की कोशिश है- अगले साल पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनाव में राघव के बूते AAP को हराना। दरअसल, पंजाब के पिछले विधानसभा चुनाव में राघव ने AAP के लिए ग्राउंड वर्किंग और इलेक्शन मैनेजमेंट किया था। उन्हें AAP की अंदरूनी बातें पता हैं। राघव बीजेपी के लिए पंजाब में एग्रेसिव कैम्पेन कर सकते हैं। शहरी इलाकों और जेन-G वोटर्स में बीजेपी के लिए पैठ बना सकते हैं। 6. श्रीकांत शिंदे ये हैं कौनः महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे के बेटे हैं। कल्याण सीट से लगातार तीसरी बार सांसद। एंट्री क्यों हो सकती है: शिवसेना (उद्धव गुट) के 6 लोकसभा सांसदों तोड़ने के लिए हुए ‘ऑपरेशन टाइगर’ में श्रीकांत ने अहम भूमिका निभाई। इनाम के तौर पर मंत्री पद मिल सकता है। 7. संजय दीना पाटिल ये हैं कौनः NCP से राजनीति शुरू की। मुंबई की भांडुप से विधायक रहे। 2009 में उत्तर-पूर्वी मुंबई से लोकसभा सांसद बने। 2022 में शिवसेना (उद्धव) से जुड़े और 2024 में दोबारा लोकसभा सांसद बने। एंट्री क्यों हो सकती है: ‘ऑपरेशन टाइगर’ के चलते पाटिल शिवसेना (शिंदे) में आए हैं। बागी होने के इनाम के तौर पर संजय को भी मंत्री पद मिल सकता है। इसके पीछे स्ट्रैटजी है- शिवसेना (उद्धव) को और कमजोर करना, बीजेपी वाले ‘महायुति गठबंधन’ को मजबूत करना। 8. काकोली घोष दस्तीदार ये हैं कौनः डॉक्टर से नेता बनीं काकोली पश्चिम बंगाल की बारासात सीट से लगातार चौथी बार सांसद हैं। TMC की संस्थापक सदस्य और पूर्व सीएम ममता बनर्जी की करीबी रहीं। एंट्री क्यों हो सकती है: काकोली नेतृत्व में 20 TMC सांसद बागी हो गए। बाद में NCPI से जुड़े और बीजेपी को सपोर्ट दिया। इस टूट के इनाम के तौर पर काकोली को मंत्री बनाया जा सकता है। 9. अरुण गोविल ये हैं कौनः 'रामायण' सीरियल में भगवान राम का किरदार निभाने वाले अरुण गोविल। 2021 में वे बीजेपी से जुड़े। 2024 में उत्तर प्रदेश की मेरठ लोकसभा सीट से सांसद बने। एंट्री क्यों हो सकती है: अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव हैं। सोशल इंजीनियरिंग के तहत गोविल को मंत्री बनाया जा सकता है। गोविल पश्चिमी यूपी के वैश्य समाज से आते हैं। उनके बूते बीजेपी हिंदुत्व और सांस्कृतिक मुद्दे को भुना सकती है। 1. निर्मला सीतारमण, वित्त मंत्री ये हैं कौनः कर्नाटक से आने वाली निर्मला सीतारमण 2014 से राज्यसभा सांसद हैं। 2017 में वे रक्षा मंत्री बनीं। 2019 से वित्त और कॉर्पोरेट मामलों की मंत्री हैं। मंत्रालय क्यों बदल सकता है: सरकार और भारत की माली हालात कुछ महीनों से ठीक नहीं है। महंगाई पिछले 16 महीने के ऊंचे स्तर पर 3.9% पर पहुंच गई है। जबकि पीएम मोदी का लक्ष्य है- भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी और ग्लोबल मैन्युफेक्चरिंग हब बनाना। सरकार को लग रहा है कि किसी टेक्नोक्रेट को वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी दी जाए। ऐसे में निर्मला की जगह RBI गवर्नर रहे शक्तिकांत दास को लाया जा सकता है। निर्मला को शिक्षा मंत्रालय मिल सकता है। 2. ज्योतिरादित्य सिंधिया, पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्री ये हैं कौनः मध्यप्रदेश के कद्दावर नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया 2020 में कांग्रेस से बीजेपी में आए। जुलाई 2021 में मोदी सरकार में मंत्री बने। नागरिक उड्डयन और दूरसंचार जैसे मंत्रालय संभाले। अभी उनके पास पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास और संचार मंत्रालय का जिम्मा है। मंत्रालय क्यों बदल सकता है: सिंधिया 'हाई-परफॉर्मिंग' और डिलीवर करने वाले नेता माने जाते हैं। उनकी क्षमता और प्रभाव को देखते हुए उन्हें प्रमोट करने की तैयारी है। उन्हें रेल, वाणिज्य, उद्योग जैसा कोई अहम मंत्रालय मिल सकता है। 3. प्रह्लाद जोशी, नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री ये हैं कौनः कर्नाटक बीजेपी के अध्यक्ष रहे प्रहलाद जोशी धारवाड़ से लगातार 5वीं बार सांसद हैं। मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में संसदीय कार्य, कोयला और खनन मंत्री रहे। अभी वे नवीकरणीय ऊर्जा और उपभोक्ता मामलों के मंत्री हैं। मंत्रालय क्यों बदल सकता है: जोशी के सांगठनिक और संसदीय अनुभव के मद्देनजर उन्हें किसी बड़े या ज्यादा राजनीतिक प्रभाव वाले मंत्रालय का जिम्मा मिल सकता है। 2028 में जोशी के गृह राज्य कर्नाटक में विधानसभा चुनाव हैं, जहां बीजेपी को उम्मीदें हैं। 2014 से केंद्र में काबिज बीजेपी की मोदी सरकार में अब तक 4 बड़े फेरबदल हो चुके हैं। मोदी कैबिनेट में हुए फेरबदल में कुछ ट्रेंड नजर आते हैं… 1. परफॉर्मेंस नहीं तो छुट्टी तय कॉर्पोरेट कंपनियों की तरह मोदी सरकार में भी अगर कोई मंत्री उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता या उसके मंत्रालय से जुड़ा कोई विवाद खड़ा हुआ, तो बिना किसी हिचकिचाहट के उसकी छुट्टी कर दी जाती है। #MeToo मामले में घिरे विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर ने 2018 में इस्तीफा दिया था। 2021 में कोरोना महामारी के मिस-मैनेजमेंट के बाद तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन को हटाया गया था। बतौर आईटी मिनिस्टर रविशंकर प्रसाद, शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक और पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को अच्छा प्रदर्शन न होने के कारण कैबिनेट से बाहर कर दिया गया था। 2. नौकरशाहों और एक्सपर्ट्स पर भरोसा मोदी सरकार में सिर्फ पारंपरिक नेता ही मंत्री नहीं बनते, बल्कि जटिल और अहम मंत्रालयों का जिम्मा पूर्व IAS, IFS अफसर या डोमेन एक्सपर्ट्स (टेक्नोक्रेट्स) को देने का चलन भी है। जैसे- पूर्व विदेश सचिव एस. जयशंकर को विदेश मंत्री बनाना, पूर्व IAS अफसर अश्विनी वैष्णव को रेल और आईटी मंत्रालय सौंपना, पूर्व IAS अफसर अर्जुन राम मेघवाल और रिटायर्ड IFS अफसर हरदीप सिंह पुरी को केंद्रीय मंत्री बनाना। 3. चुनावी राज्यों की इंजीनियरिंग मोदी सरकार में ये पैटर्न रहा है कि हर कैबिनेट फेरबदल में अगले विधानसभा चुनावों की सोशल और इलेक्टोरल इंजीनियरिंग को सेट किया जाता है। जुलाई 2021 में मोदी कैबिनेट का सबसे बड़ा फेरबदल हुआ। तब उत्तर प्रदेश के पंकज चौधरी, अजय मिश्रा टेनी, अनुप्रिया सिंह पटेल, एसपी सिंह बघेल, भानु प्रताप सिंह वर्मा, कौशल किशोर; गुजरात के महेंद्र मुंजापारा, दर्शना जरदोश, देवूसिंह चौहान जैसे नेताओं को मंत्री बनाया गया था। इसके पीछे 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव थे। 4. ‘एक व्यक्ति, एक पद’ की पॉलिसी बीजेपी बार-बार ये बात दोहराती है कि वे ‘एक व्यक्ति, एक पद’ की नीति अपनाती है। यानी कोई नेता सरकार और संगठन दोनों में एक साथ बड़े पद नहीं पा सकता। जैसे- 2014 में राजनाथ सिंह गृहमंत्री बने, तो 2 महीने बाद बीजेपी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। 2019 में जब अमित शाह गृहमंत्री बने, तो अगले ही महीने जगत प्रकाश नड्डा को कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया गया और 8 महीने बाद शाह ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। जनवरी 2026 में जब नितिन नबीन पार्टी अध्यक्ष बने, तो उन्हें बिहार सरकार में मंत्री पद छोड़ना पड़ा। --------------------- ये भी खबर पढ़िए… मोदी सरकार को क्यों चाहिए 362 सांसद; TMC के 20, शिवसेना UBT के 6 सांसद टूटे; बाकी 44 कहां से जुटाएंगे 14 जून को TMC के 28 में से 20 लोकसभा सांसदों ने गुमनाम सी पार्टी NCPI में विलय कर लिया। आज शिवसेना (उद्धव गुट) के 9 से 6 लोकसभा सांसदों ने भी बगावत कर दी। इससे पहले 24 अप्रैल को आम आदमी पार्टी के 10 में से 7 राज्यसभा सांसदों ने भी बगावत कर दी थी। ये सभी बागी BJP या NDA में शामिल हुए हैं। पूरी खबर पढ़िए…
कतर में बनी सहमति: अमेरिका-ईरान अब नहीं करेंगे हमले
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के पास हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े सैन्य तनाव के बाद अब दोनों देशों ने हमले रोकने पर सहमति जताई है
22 से 26 जून 2026 तक बांग्लादेशी पीएम तारिक रहमान चीन में थे। इसी दौरान बांग्लादेश ने अपने मोंगला पोर्ट का प्रोजेक्ट भारत से छीनकर चीन को दे दिया। यानी हमारे तट से महज 80 किमी दूर मोंगला पोर्ट पर चीन बैठेगा। भारत की ‘चिकन नेक’ से 100 किमी दूर तीस्ता नदी को भी चीन मैनेज करेगा। आखिर चीन इन इलाकों में क्या करने वाला है और ये भारत की सुरक्षा के लिए कितना बड़ा खतरा; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: बांग्लादेश ने भारत से मोंगला प्रोजेक्ट छीनकर चीन को क्यों दिया? जवाब: 2015 में बांग्लादेश ने भारत से दो इकॉनमिक जोन बनाने के लिए समझौता किया था। इनमें एक मोंगला पोर्ट और दूसरा चटगांव का इलाका था। बांग्लादेशी अखबार द बिजनेस स्टैंडर्ड के मुताबिक, मोंगला प्रोजेक्ट की शुरुआत में भारत के पैसे से मोंगला पोर्ट से खुलना के बीच एक नई रेलवे लाइन बनी। 2018 में भारत सरकार ने मोंगला प्रोजेक्ट का थका हीरानंदानी ग्रुप को दिया। मार्च 2022 में बांग्लादेश इकॉनोमिक जोन अथॉरिटी यानी BEZA और हीरानंदानी ग्रुप की कंपनी एविटा कंस्ट्रक्शंस प्राइवेट लिमिटेड के साथ समझौता किया। हालांकि अगस्त 2024 में बांग्लादेश में शेख हसीना का तख्तापलट होने के चलते ये प्रोजेक्ट रुक गया। शेख हसीना भारत आ गईं। शेख हसीना तब भारत आ गई थीं और बांग्लादेश के अंतरिम राष्ट्रपति बने मुहम्मद यूनुस के दौर में इस प्रोजेक्ट पर बात आगे नहीं बढ़ी। हसीना के बाद एंटी इंडियन मानी जाने वाली खालिदा जिया की पार्टी BNP सत्ता में आई और फरवरी 2026 में उनके बेटे तारिक रहमान पीएम बने। BEZA के मुताबिक, भारतीय कंपनी तय शर्त के मुताबिक दो साल के भीतर काम शुरू नहीं कर पाई। इसी बीच जून 2025 में बांग्लादेश में तैनात चीनी दूतावास के ऑफिसर्स ने मोंगला पोर्ट पर एक चीनी इकॉनमिक जोन बनाने का प्रस्ताव दिया था। इसके बाद अक्टूबर 2025 में बांग्लादेश सरकार ने भारत के साथ प्रोजेक्ट रद्द कर दिया। 25 जून 2026 को तारिक रहमान के चीन दौरे के बीच BEZA और चीन की सरकारी कंपनी चाइना सिविल इंजीनियरिंग कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन (CCECC) के बीच पोर्ट के डेवेलपमेंट के अलावा आसपास की 110 एकड़ जमीन पर इकनोमिक जोन बनाने का समझौता हुआ है। इसके अलावा 25 मार्च 2025 को मोंगला पोर्ट अथॉरिटी (MPA) और CCECC के बीच मोंगला पोर्ट के डेवेलपमेंट के लिए 370 मिलियन डॉलर के एक अलग प्रोजेक्ट पर भी समझौता हुआ था। हालांकि इस पर अब तक काम नहीं शुरू हुआ है। सवाल-2: अब चीन मोंगला पोर्ट पर क्या करने जा रहा है? जवाब: चीन मोंगला पोर्ट पर 2 काम करेगा... 1. पोर्ट का डेवेलपमेंट 2. पोर्ट के पास इकॉनोमिक जोन 26 जून को बांग्लादेश-चीन के जॉइंट स्टेटमेंट में 2 और प्रोजेक्ट चीन को देने की बात कही गई है। इसमें लिखा है कि दोनों देश चटगांव में चीन के इकॉनोमिक एंड इंडस्ट्रियल जोन को डेवेलपमेंट करेंगे। साथ ही चीन तीस्ता नदी के प्रबंधन में हर संभव मदद करेगा। सवाल-3: ये प्रोजेक्ट चीन को मिलना भारत के लिए चिंता की बात क्यों?जवाब: भारत के लिए 4 बड़ी दिक्कतें हैं... 1. चीन के मुकाबले में कूटनीतिक हार 2. बंगाल की खाड़ी में भारत के लिए नया खतरा 3. तीस्ता नदी प्रोजेक्ट से 'चिकन नेक' पर खतरा 4. भारत की बिजनेस कनेक्टिविटी को नुकसान सवाल-4: चीन के बढ़ते दबदबे से कैसे निपटेगा भारत?जवाब: हिंद महासागर को भारत का 'आंगन' कहा जाता है, लेकिन यहां चीन अपनी ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल’ कही जाने वाली स्ट्रैटजी के तहत बंदरगाह, हवाई पट्टी और नेवल बेस बना रहा है। चीनी कंपनियां हिंद महासागर में 17 बंदरगाहों में से 13 का डेवेलपमेंट कर रही हैं, जबकि बाकी प्रोजेक्ट्स में उनकी हिस्सेदारी हैं। हिंद महासागर में चीन की हरकतें भारत के लिए बड़ी चुनौती हैं। इसके जवाब में भारत भी उल्टा जाल बुन रहा है। भारत की स्ट्रैटजी का नाम है- ‘नेकलेस ऑफ डायमंड’। हालांकि ये भारत सरकार का कोई घोषित प्रोजेक्ट या डॉक्ट्रिन नहीं है। ‘नेकलेस ऑफ डायमंड’ के तहत 4 बड़े काम हो रहे हैं… ---- ये खबर भी पढ़ें… भास्कर एक्सप्लेनर- शेख हसीना भारत से कहां जाएंगी:बांग्लादेश की सत्ता अब कौन संभालेगा; 8 सवालों में आगे की कहानी पड़ोसी देश बांग्लादेश की कहानी हर गुजरते घंटे के साथ बदल रही है। करीब 2 महीने से चल रहे आरक्षण विरोधी आंदोलन हिंसक होने के बाद प्रधानमंत्री शेख हसीना को बांग्लादेश छोड़ना पड़ा है। वो सेना के हेलिकॉप्टर से पहले अगरतला पहुंचीं और वहां से C-130J मिलिट्री विमान से गाजियाबाद के हिंडन मिलिट्री एयरबेस पर लैंड हुईं। पूरी खबर पढ़ें…
फ्रांस में बड़ा विमान हादसा: पैराशूट प्रशिक्षण विमान क्रैश, 11 लोगों की दर्दनाक मौत
फ्रांस के उत्तर-पूर्वी शहर टॉम्बलेन में रविवार को एक नागरिक विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें सवार 11 लोगों की मौत हो गई। स्थानीय अधिकारियों ने इसकी पुष्टि की है। वहीं सऊदी अरब में भी एक हेलिकॉप्टर हादसे की खबर है। इसमें 14 लोगों की मौत हो गई है।
कौन हैं डॉ. महरंग बलोच और क्यों बनीं 'बलूचिस्तान की शेरनी'? बलूचिस्तान की आवाज बनकर उभरीं डॉ. महरंग बलोच को पाकिस्तान की एक आतंकवाद-रोधी अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई है। 33 वर्षीय महरंग का संघर्ष तब शुरू हुआ था, जब वे महज 16 साल की थीं और उनके पिता अब्दुल गफ्फार लैंगोव लापता हो गए थे। बाद में उनके पिता का शव बरामद हुआ, जो प्रताड़ना के गहरे निशान लिए हुए था। इस घटना ने एक साधारण डॉक्टर को बलूचिस्तान के सबसे बड़े मानवाधिकार आंदोलन का चेहरा बना दिया। उन्हें अब 'बलूचिस्तान की शेरनी' के नाम से जाना जाता है, जो जबरन गायब किए गए (Enforced Disappearances) हजारों लोगों के हक के लिए आवाज उठाती रही हैं।उम्रकैद के पीछे का विवाद: क्या है आरोप? अदालत ने महरंग और उनके सहयोगी सिबगतुल्लाह शाह को 2024 में ग्वादर में हुए एक विरोध प्रदर्शन के दौरान एक पैरामिलिट्री सैनिक की मौत के मामले में दोषी ठहराया है। उन पर आतंकवाद, देशद्रोह और हत्या जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। हालांकि, महरंग का परिवार और उनके समर्थक इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हैं। उनका कहना है कि यह बलूचिस्तान में असहमति की आवाज को दबाने और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित करने की एक सोची-समझी साजिश है। महरंग की कानूनी टीम ने घोषणा की है कि वे इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती देंगे।लापता लोगों का दर्द और पाकिस्तान का 'सौतेला' रुख बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा और प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध प्रांत है, लेकिन लंबे समय से उपेक्षा और हिंसा का दंश झेल रहा है। मानवाधिकार समूहों का आरोप है कि पिछले दो दशकों में हजारों बलूच लोग सुरक्षा बलों द्वारा बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के हिरासत में ले लिए गए। सरकार इन दावों को खारिज करती है और लापता लोगों को उग्रवादी गुटों से जोड़ने की कोशिश करती है। बलूच कार्यकर्ताओं का मानना है कि 'जबरन गायब करना' इस्लामाबाद की वह रणनीति है, जिसका उद्देश्य विद्रोह को कुचलना और स्वतंत्र बलूचिस्तान की मांग को कमजोर करना है।अदम्य साहस: धमकियों और पाबंदियों के बावजूद जारी संघर्ष महरंग बलोच का एक्टिविज्म केवल बयानों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने 2023 के अंत में सैकड़ों महिलाओं के साथ 1,600 किलोमीटर की लंबी पदयात्रा (Long March) का नेतृत्व किया ताकि लापता लोगों के ठिकाने का पता चल सके। जान से मारने की धमकियों और बार-बार गिरफ्तारी के बावजूद वे पीछे नहीं हटीं। मार्च 2025 में क्वेटा में विरोध प्रदर्शन के दौरान उनकी गिरफ्तारी हुई थी। अब उम्रकैद की यह सजा उनके दशकों पुराने संघर्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। महरंग का परिवार और मानवाधिकार संगठन इस मुकदमे को निष्पक्ष मानने से इनकार कर रहे हैं और इसे असहमति को कुचलने का माध्यम बता रहे हैं।
विनाशकारी भूकंप: मातम के बीच प्रशासनिक संवेदनहीनता वेनेजुएला इन दिनों 7.2 और 7.5 तीव्रता के विनाशकारी भूकंप के कारण भीषण त्रासदी झेल रहा है। ला गुआइरा राज्य इस आपदा का केंद्र बना हुआ है, जहां मलबे के नीचे दबे शवों की दुर्गंध ने पूरे इलाके को नरक बना दिया है। अब तक 1,430 मौतें और 3,200 घायलों की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 50,000 लोग अभी भी लापता हैं। लेकिन सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि जहां हजारों परिवार अपने प्रियजनों को खोकर बिलख रहे हैं, वहां राहत कार्य के लिए पहुंचे सरकारी कर्मचारी आपदा का 'लुत्फ' उठाते नजर आए। ध्वस्त इमारतों के सामने खड़े होकर अधिकारियों द्वारा ली जा रही सेल्फी ने पूरी दुनिया में वेनेजुएला सरकार के खिलाफ आक्रोश पैदा कर दिया है।राहत कार्यों में ढिलाई और 'पास' का नया ड्रामा संकट के इस दौर में सरकार की ओर से जो सहायता मिलनी चाहिए थी, उसके बजाय प्रशासन ने बाधाएं खड़ी कर दी हैं। सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में आम लोगों का प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया गया है। स्वयंसेवकों, जो अपने स्तर पर लोगों की जान बचाने के लिए मलबे हटा रहे थे, उन्हें भी 'सुरक्षित प्रवेश पास' लेने के लिए मजबूर किया गया है। स्थानीय लोगों का गुस्सा तब सातवें आसमान पर पहुंच गया जब उन्होंने अधिकारियों को मदद छोड़कर तस्वीरें खिंचवाने में व्यस्त देखा। पीड़ितों का कहना है कि प्रशासन न केवल मदद करने में विफल रहा, बल्कि बचाव कार्य में जुटने वालों के लिए भी मुश्किलें पैदा कर रहा है।सड़ती लाशें और अपनों की तलाश में जुड़ा हर हाथ भीषण गर्मी के कारण मलबे में दबे शवों के तेजी से सड़ने से स्वास्थ्य संबंधी खतरा भी बढ़ गया है। ला गुआइरा में हालात इतने भयावह हैं कि लोग मास्क पहनने को मजबूर हैं। दिल दहला देने वाली कहानियों के बीच, पीड़ितों का दर्द साफ झलकता है कि उन्होंने अपने परिजनों को खुद मलबे से बाहर निकाला है, जबकि सरकारी मदद नदारद रही। कैराबलेडा में अपनों को तलाश रही माइलेडी रोमेरो जैसी कई मांएं हैं जिनकी आंखों में आंसू और जुबां पर एक ही सवाल है—कल रात तक मलबे के नीचे से लोगों की चिल्लाने की आवाजें आ रही थीं, लेकिन प्रशासन ने बचाने की कोशिश तक नहीं की। आखिर वे किस बात का इंतजार कर रहे हैं? फिलहाल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 21 देशों की राहत टीमें जुटी हुई हैं, लेकिन स्थानीय प्रशासन की उदासीनता इस आपदा को और भी दर्दनाक बना रही है।
रिकॉर्ड तोड़ गर्मी से फ्रांस में हाहाकार पश्चिमी यूरोप इन दिनों भीषण गर्मी की चपेट में है, जिसका सबसे बुरा असर फ्रांस पर पड़ा है। पब्लिक हेल्थ फ्रांस के ताजा आंकड़ों के अनुसार, रिकॉर्ड तोड़ हीटवेव के कारण देश में लगभग 1,000 अतिरिक्त मौतें दर्ज की गई हैं। यह गर्मी न केवल इंसानी सहनशक्ति की परीक्षा ले रही है, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए भी बड़ी चुनौती बन गई है। एजेंसी ने स्पष्ट किया है कि ये आंकड़े अभी शुरुआती हैं और जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी, यह संख्या और अधिक बढ़ सकती है।बुजुर्गों और अकेले रहने वालों के लिए बनी काल इस हीटवेव की सबसे दुखद बात यह है कि इसका 85 प्रतिशत शिकार 65 वर्ष या उससे अधिक आयु के बुजुर्ग हुए हैं। सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, पेरिस और उसके आसपास के 'इले-डी-फ्रांस' (le-de-France) इलाके में घरों के अंदर मरने वालों की संख्या में चिंताजनक बढ़ोतरी देखी गई है। स्वास्थ्य अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि जो बुजुर्ग अकेले रहते हैं, वे गर्मी का मुकाबला करने में सबसे ज्यादा कमजोर साबित हो रहे हैं। यह स्थिति समाज में अकेलेपन की समस्या और हीटवेव के दौरान बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत को रेखांकित करती है।रेड अलर्ट और राहत की उम्मीद फ्रांस के कई इलाकों में पिछले कई दिनों से तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया था, जिसके चलते प्रशासन को 'रेड अलर्ट' जारी करना पड़ा। हालांकि, रविवार को तापमान में थोड़ी गिरावट दर्ज की गई है, जिससे आम जनता को भीषण गर्मी से हल्की राहत मिली है। सरकार ने नागरिकों से अपील की है कि वे अकेले रहने वाले पड़ोसियों, विशेषकर बुजुर्गों का ध्यान रखें और हीटवेव के दौरान सावधानी बरतें। फिलहाल फ्रांस का स्वास्थ्य विभाग प्रभावित इलाकों में स्थिति पर कड़ी नजर रखे हुए है ताकि मौतों के इन बढ़ते आंकड़ों को नियंत्रित किया जा सके।
अमेरिका ने छत्तीसगढ़ की कंपनी और उसके CEO पर लगाया प्रतिबंध, जानें क्या है मामला
अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि इन संस्थाओं और व्यक्तियों ने सूडानी सशस्त्र बलों (SAF) और रैपिड सपोर्ट फोर्सेज (RSF) को हथियार, विस्फोटक सामग्री और अन्य सहायता उपलब्ध कराई, जिससे देश में जारी संघर्ष और अधिक गंभीर हो गया।
ईरान और अमेरिका में फिर शुरू हुआ तनाव, ताजा हमलों के बीच राष्ट्रपति ट्रंप ने दी चेतावनी
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि अमेरिका ने ईरानी सैन्य ठिकानों पर नए एयर स्ट्राइक किए हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने तेहरान पर होर्मुज स्ट्रेट के पास एक कमर्शियल तेल टैंकर पर हमला करके सीजफायर समझौते को फिर से तोड़ने का आरोप लगाया है
होर्मुज़ जलडमरूमध्य में धमाका: अमेरिका ने ईरान के 10 सैन्य ठिकाने उड़ाए
अमेरिका की सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम ) ने कहा कि अमेरिका की सेना ने शनिवार रात होर्मुज़ जलडमरूमध्य और उसके आस-पास ईरान के 10 सैन्य ठिकानों पर हमला किया
ट्रंप का संभावित भारत दौरा: रिश्ते सुधारने का सुनहरा मौका!
अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो के इस बयान के बाद कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अगले साल की शुरुआत में भारत आ सकते हैं
ख्वाजा आसिफ के 'असली कश्मीरी नहीं' वाले बयान पर बवाल, मानवाधिकार परिषद ने जताई नाराजगी
पाकिस्तान के मानवाधिकार परिषद (एचआरसी) ने पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के उस बयान की कड़ी आलोचना की
भास्कर सीरीज ‘स्पाई फाइल्स’ में आप पढ़ रहे हैं जासूस सहमत की कहानी। पार्ट-1 में आपने पढ़ा कि कश्मीर के कपड़ा कारोबारी हिदायत खान भारत की खुफिया एजेंसी RAW के जासूस थे। पाकिस्तानी सेना के अफसरों में उनकी गहरी पैठ थी। उन्हें कैंसर हो गया। मौत से पहले उन्होंने RAW के कहने पर बेटी सहमत की शादी पाकिस्तानी सेना के कैप्टन इकबाल से करवा दी। सहमत के ससुर सईद पाक सेना में ब्रिगेडियर और जेठ महबूब मेजर थे। सहमत ने परिवार का इतना दिल जीत लिया कि ब्रिगेडियर सईद सेना के मामलों में भी उसकी सलाह लेने लगे। सहमत ने चालाकी से ब्रिगेडियर के बॉस लेफ्टिनेंट जनरल अमीर खान को भी अपने प्रभाव में ले लिया। इस तरह RAW को पाक सेना की गोपनीय खबरें मिलने लगीं। पार्ट-2 में आगे की कहानी… सहमत को पाकिस्तान में रहते हुए दो साल बीत गए थे। अभी तक कोई बड़ी जानकारी उसके हाथ नहीं लगी थी। वो समझ गई कि उसे कुछ बड़ा करना होगा। एक रोज उसने ससुर सईद से बताया कि वो स्कूल में संगीत सिखाना चाहती है। सईद नाराज हो गए। उन्होंने कहा- ‘हमारे घर की औरतें नौकरी नहीं करतीं। तुम्हें किसी चीज की कमी है क्या?’ सहमत धीरे से बोली- ‘किसी चीज की कमी नहीं है, पर खाली वक्त नहीं कटता। घर में बैठे-बैठे परेशान हो गई हूं।’ तभी इकबाल वहां आ गया। उसने कहा- 'सहमत ठीक कह रही है अब्बू। संगीत में इसकी दिलचस्पी है। स्कूल के बहाने इसका मन भी लगने लगेगा।' कुछ देर सोचने के बाद ब्रिगेडियर ने कहा- ‘जैसा तुम लोगों को ठीक लगे करो, पर खानदान का नाम खराब नहीं होना चाहिए।’ सहमत ने मुस्कुराते हुए कहा- 'जी अब्बू।' कुछ दिनों बाद सहमत ने एक स्कूल में संगीत सिखाना शुरू कर दिया। यह कोई आम स्कूल नहीं था, यहां पाकिस्तान के रईसों और सेना के आला अफसरों के बच्चे पढ़ते थे। जल्द ही सहमत की खोजी नजरों ने अपना शिकार ढूंढ निकाला- ‘अनवर खान।’ अनवर, पाकिस्तानी सेना के ताकतवर अफसर, लेफ्टिनेंट जनरल इम्तियाज खान का पोता था। संगीत में उसकी दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन सहमत ने उसे म्यूजिक क्लास का ग्रुप लीडर बना दिया। खास तौर पर ट्रेनिंग की व्यवस्था की। हर दिन अलग से उसे घंटों रियाज कराती। धीरे-धीरे संगीत में अनवर की दिलचस्पी बढ़ने लगी। कुछ महीने बाद स्कूल का एनुअल फंक्शन होना तय हुआ। सहमत ने लेफ्टिनेंट जनरल इम्तियाज खान और उनकी बेगम को इनवाइट किया। दोनों शामिल भी हुए। अनवर की परफॉर्मेंस देखकर ऑडिटोरियम की अगली कतार में बैठे लेफ्टिनेंट जनरल इम्तियाज और उनकी बेगम बेहद खुश हुए। पोते की परफॉर्मेंस के पीछे उन्हें एक ही चेहरा नजर आ रहा था- लेडी टीचर सहमत। इस शाम ने सहमत के लिए जनरल इम्तियाज के आलीशान बंगले के दरवाजे खोल दिए। धीरे-धीरे वह जनरल के परिवार की इतनी करीबी बन गई कि उनका उठना-बैठना और पारिवारिक मशविरे सहमत के बिना अधूरे होने लगे। इसका फायदा सहमत के पाकिस्तानी परिवार को भी मिला। ब्रिगेडियर सईद पाकिस्तान की ताकतवर खुफिया एजेंसी ISI के डिप्टी चीफ बन गए। यानी अब सहमत, ससुर के बहाने ISI की देहरी तक पहुंच चुकी थी। सहमत की बायोग्राफी लिखने वाले पूर्व नेवी अफसर हरिंदर सिक्का बताते हैं- ‘एक शाम हवेली के स्टडी रूम में सन्नाटा पसरा था। सहमत, ब्रिगेडियर की फाइलें पलट रही थी। अचानक उसके माथे पर पसीने की बूंदें तैरने लगीं। एक पन्ने पर लिखा था- पाकिस्तानी पनडुब्बियां बंगाल की खाड़ी की तरफ कूच करने वाली हैं। INS विक्रांत को तबाह करना है। भारत के सबसे बड़े युद्धपोत INS विक्रांत की तस्वीरें वहां चस्पा थीं, जिसमें उसके क्रू मेंबर्स की तादाद से लेकर हथियारों की तैनाती तक का पूरा ब्योरा था। इत्तेफाक से उस वक्त सहमत की जेठानी मुनीरा मायके गई हुई थी। शौहर कैप्टन इकबाल और जेठ मेजर महबूब अपने कामों में मशरूफ थे। सहमत ने उस फाइल को कपड़ों में छुपाया और दबे पांव अपने वॉशरूम में चली गई।' अचानक... 'थाप! थाप! थाप!' वॉशरूम का दरवाजा जोर-जोर से बजा। बाहर नौकर अब्दुल खड़ा था, जो बुरी तरह किवाड़ पीट रहा था। सहमत घबरा गई। कुछ सेकेंड तक उसने अपनी सांसें रोकीं, खुद को संभाला और फिर रोबीली आवाज में चिल्लाई, ‘बाहर इंतजार करो अब्दुल, मैं आ ही रही हूं!’ अब्दुल बाहर चला गया। अब सहमत ने वॉशरूम में लगे खुफिया ट्रांसमीटर से RAW को मैसेज भेजा। फिर दबे पांव अपने कमरे में पहुंची। खुद को संभाला और चुपचाप स्टडी रूम जाकर अनगिनत फाइलों में उस सीक्रेट कागज को वापस रखा और बाहर निकल गई। गलियारे में ससुर ब्रिगेडियर सईद बदहवास से खड़े थे। ‘तुम कहां थी सहमत? मैं कब से एक फाइल ढूंढ रहा हूं…’ ‘अब्बू जान, परेशान मत होइए। आप कमरे में चलकर आराम कीजिए, मैं अभी ढूंढकर लाती हूं।’ सहमत जानती थी कि ब्रिगेडियर का ब्लड प्रेशर किस फाइल के लिए बढ़ा हुआ था। चंद मिनटों बाद, सहमत वही फाइल हाथ में लिए ब्रिगेडियर के सामने खड़ी थी। सईद ने बिना कुछ कहे फाइल ली और तेज कदमों से दफ्तर की तरफ चल पड़ा। ब्रिगेडियर के जाते ही सहमत अपने कमरे में लौटी। वॉशरूम का दरवाजा खुला हुआ था। मैसेज भेजने वाली खुफिया मशीन उखाड़ दी गई थी। ‘अब्दुल सब देख चुका है!’ मन में बुदबुदाते हुए सहमत उल्टे पैर बाहर की तरफ भागी। उसने देखा कि रसोई के पिछले रास्ते से एक जानी-पहचानी परछाई हवेली के गेट की तरफ जा रही थी। वह अब्दुल ही था। हवेली के दरवाजे पर सेना का राशन सप्लाई ट्रक खड़ा था, जिसका ड्राइवर कहीं आसपास गया हुआ था। सहमत बिजली की फुर्ती से ड्राइविंग सीट पर बैठी, चाबी घुमाई और एक्सीलेटर पर पैर रख दिया। कुछ ही दूरी पर उसे अब्दुल भागता हुआ मिल गया। वह ब्रिगेडियर सईद के दफ्तर की तरफ जा रहा था। सेना का ट्रक आता देख अब्दुल ने दोनों हाथ हवा में लहराए- ‘रोको! रोको!’ सहमत ने ब्रेक की जगह एक्सीलेटर को पूरी ताकत से दबा दिया। पलक झपकते ही... ट्रक के भारी-भरकम टायर अब्दुल को रौंदते हुए आगे निकल गए। सड़क किनारे ट्रक को छोड़ सहमत नीचे उतरी। एक घर के बाहर तार पर टंगे बुर्के को उसने झपटकर पहना और लगभग दौड़ती हुई हवेली पहुंची। सबसे पहले वॉशरूम का रूख किया। वहां मौजूद हर सबूत को मिटाया। उधर, लहूलुहान अब्दुल को किसी ने अस्पताल पहुंचा दिया था। खबर मिलते ही सहमत का जेठ, मेजर महबूब भी अस्पताल पहुंच गया। अब्दुल, महबूब को देखकर कुछ बोलना चाह रहा था, लेकिन हलक से सिर्फ घड़घड़ाहट की आवाज निकल रही थी। उसने भारी मशक्कत के साथ कंबल के नीचे से अपना हाथ बाहर निकाला और मेजर की हथेली पर मेटल के दो टुकड़े रख दिए। महबूब ने अब्दुल का चेहरा थामकर चीखते हुए पूछा, ‘बताओ अब्दुल! क्या हुआ है? किसने किया यह?’ उसने बस इतना ही कहा- ‘हहहह... मत... मत…’ और उसकी आंखें हमेशा के लिए बंद हो गईं। रात को मेजर महबूब घर लौटा, तो उसके चेहरे पर गहरा तनाव था। उसने परिवार को अब्दुल की मौत की खबर दी और जेब से मेटल के वे दो टुकड़े निकालकर मेज पर रख दिए। दूर कोने में खड़ी सहमत का दिल तेजी से धड़क रहा था। वह समझ चुकी थी कि महबूब शातिर फौजी अफसर है। वह इन दो टुकड़ों के पीछे छिपे राज को ढूंढने के लिए जमीन-आसमान एक कर देगा। सहमत को अब बहुत जल्द, कुछ और बड़ा करना था। एक रोज सहमत ने बुर्का पहना और कार में बैठकर नजदीक की एक मस्जिद के लिए निकल पड़ी। मस्जिद के बाहर चिलचिलाती धूप के बीच एक फटेहाल महिला छाते बेच रही थी। सहमत को देखते ही वह मिन्नतें करने लगी, ‘मेम साहब, खुदा के लिए एक छतरी खरीद लो। बच्चे सुबह से भूखे हैं, कुछ पैसे आ जाएंगे तो उनके निवाले का इंतजाम हो जाएगा।’ ड्राइवर चिढ़ गया, लेकिन सहमत ने सौ के दो नोट पर्स से निकाले और छाता ले लिया। घर लौटकर सहमत ने कमरे का दरवाजा बंद किया। छतरी के हैंडल को आहिस्ता से घुमाया। हैंडल से कांच की एक छोटी शीशी बाहर निकली। उस पर हाथ से लिखी एक पर्ची चिपकी थी- ‘इसके पीछे लगे बटन को दबाकर आप एक खास केमिकल की कुछ बूंदें सीधे इंसान के जिस्म में उतार सकती हैं। शिकार को दर्द का एहसास भी नहीं होगा और कुछ ही घंटों के भीतर वह दम तोड़ देगा।’ कुछ देर बाद सहमत ने उस छतरी को अपने पर्स में छिपाया और बाजार जाने का बहाना बनाकर पाकिस्तान सेना के 'ब्यूरो ऑफ इंस्पेक्शन' की तरफ निकल पड़ी। इसी दफ्तर में उसका जेठ महबूब काम करता था। वहां पहुंचने के बाद वो पहली मंजिल के एक कोने में खड़ी हो गई। करीब 20 मिनट तक इंतजार किया। नीचे एक फौजी गाड़ी आकर रुकी। गहरे हरे रंग की वर्दी पहने एक अफसर कार से निकला। सहमत ने पहचान लिया- ‘वो मेजर महबूब है।’ वो तेजी से सीढ़ियां चढ़ता हुआ ऊपर आ रहा था। तभी सहमत लड़खड़ाकर गिर पड़ी। ‘ओह! संभालिए…’ महबूब उसे बचाने के लिए तेजी से आगे बढ़ा। दोनों एक पल के लिए टकराए और उसी पल बुर्के के भीतर से सहमत ने छतरी का बटन दबा दिया। छतरी की नोक से वो केमिकल महबूब के शरीर में चला गया। सहमत संभलकर खड़ी हुई, उसने शुक्रिया कहा और आगे बढ़ गई। उसने पलटकर देखा कि मेजर सीढ़ियां चढ़ते हुए हल्के-हल्के अपनी बांह सहला रहा था। सहमत मन ही मन मुस्कुराई- ‘काम हो गया।’ कुछ ही घंटों बाद, ब्यूरो ऑफ इंस्पेक्शन के दफ्तर में तहलका मच गया। मेजर महबूब अपनी छाती थामकर फर्श पर गिर पड़ा था। उसे आनन-फानन में मिलिट्री अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने पूरी कोशिश की पर महबूब को बचा नहीं पाए। मौत की वजह हार्ट अटैक बताई गई। सहमत के घर में मातम पसर गया। हर कोई बिलख रहा था, लेकिन महबूब की बेवा मुनीरा की आंखों में एक गहरा शक तैर रहा था। पहले वफादार नौकर अब्दुल का कत्ल, उसका मरते-मरते महबूब के हाथ में मेटल के टुकड़े सौंपना और फिर महबूब का इस तरह अचानक दुनिया से चले जाना... मुनीरा समझ चुकी थी कि इन दोनों मौतों के पीछे कोई तो कड़ी है। इधर, ब्रिगेडियर की जिंदगी दो पाटों के बीच पिस रही थी। एक तरफ परिवार में हुई दो मौतों का मातम था, तो दूसरी तरफ जंग की तैयारियां। इसी आपाधापी के बीच, उन्हें प्रधानमंत्री से एक जरूरी मुलाकात करनी थी, जिसके लिए 'टॉप सीक्रेट' फाइलें तैयार की गई थीं। हमेशा की तरह, सहमत ने ब्रिगेडियर का ब्रीफकेस तैयार किया और मौका पाकर फाइलों के पन्ने भी याद कर ली। उन पन्नों में जंग की रणनीतियों के साथ-साथ दिल्ली में बैठे ISI के एजेंटों की फेहरिस्त थी। सहमत को यह पैगाम हर हाल में सरहद पार पहुंचाना था। सख्त पहरे के बीच बाहर निकलने के लिए सहमत ने जेठानी मुनीरा को अपने साथ मस्जिद चलने के लिए राजी कर लिया। जैसे ही दोनों मस्जिद पहुंचीं, सहमत बोल पड़ी, ‘आप यहीं मेरा इंतजार कीजिए, मैं मेजर साहब की मजार के लिए कुछ ताजे फूल लेकर आती हूं।’ सहमत ने एक बड़ी टोकरी फूलों का ऑर्डर दिया और नजरें बचाकर पास ही के एक फोन बूथ की तरफ भागी। फोन खराब था। आसपास कोई दूसरा बूथ नजर नहीं आ रहा था। अब उसकी नजर पान की दुकान पर पड़ी। सहमत ने पान वाले के फोन का इस्तेमाल किया और हांफती हुई आवाज में पूरा खुफिया मैसेज बता दिया। जब सहमत घर लौटी, तो हवेली के बाहर फौज की गाड़ियां खड़ी थीं। अंदर दो ISI के अफसर खड़े थे। कमरे की मेज पर खून से सने मेटल के वे टुकड़े रखे थे, जिन्हें देखकर सहमत के भीतर सिहरन दौड़ गई। ISI ने उस फूलवाले और पान वाले को धर-दबोचा था। अगले कई दिनों तक हवेली में ISI के अफसरों का आना-जाना लगा रहा। एक दोपहर, तंग आकर सहमत ने कड़े लहजे में अफसरों से कह दिया, ‘सईद साहब इस वक्त आराम कर रहे हैं। आप लोग या तो यहीं इंतजार कीजिए, या फिर बाद में तशरीफ लाइए।’ अफसरों ने एक-दूसरे को देखा और सहमत के हाथ में एक सीलबंद लिफाफा थमाते हुए कहा, ‘ठीक है बेगम साहिबा, यह फाइल ब्रिगेडियर साहब को दे दीजिएगा।’ जैसे ही अफसर बाहर गए, सहमत ने उस लिफाफे को खोला। लिखा था- ‘हवेली की सुरक्षा में बहुत बड़ी सेंध लगी है। हिंदुस्तान को खुफिया खबरें भेजी जा रही हैं। गद्दार घर के भीतर ही है।’ अपनी घबराहट छुपाने के लिए सहमत वॉशरूम चली गई। थोड़ी देर बाद जैसे ही उसने दरवाजा खोला सामने खड़े शख्स को देखकर वह ठिठक गई। उसका शौहर, कैप्टन इकबाल खड़ा था। उसने सहमत को घूरते हुए कहा, ‘क्या मैं तुम्हारे वॉशरूम का इस्तेमाल कर सकता हूं?’ सहमत समझ गई कि इकबाल को उस खुफिया ट्रांसमीटर का अंदाजा हो चुका है। उसने बस सिर हिलाया और एक तरफ हट गई। इकबाल अंदर दाखिल हुआ। सहमत ने मेज पर रखे इकबाल के बटुए को जल्दी से उठाकर देखा। करारे नोटों के बीच एक छोटा सा कागज रखा था। सहमत ने उसे पढ़ा और वापस रख दिया। 5 मिनट बाद इकबाल ने दरवाजा खोला, तो देखा सहमत एक चमचमाती हुई रिवॉल्वर लेकर खड़ी थी। उंगली ट्रिगर पर कसी हुई थी और निशाने पर इकबाल। सहमत ने सख्त लहजे में कहा- ‘इकबाल, मैं इस चौखट पर तुम्हारी सेज सजाने और तुम्हारी बीवी बनकर जिंदगी गुजारने नहीं आई हूं। मैं अपने मुल्क हिंदुस्तान के लिए आई हूं। कान खोलकर सुन लो, मेरे इस रास्ते में जो भी रोड़ा बनेगा, उसे कुचल दूंगी… फिर चाहे वो शख्स तुम ही क्यों न हो।’ इकबाल ने वॉशरूम में जो कुछ देखा और सहमत के मुंह से उसके कानों ने जो कुछ सुना…वह किसी सदमे से कम नहीं था। उसके दिल में अभी भी सहमत थी। उसने सहमत की तरफ बेबसी से देखते हुए कहा- ‘ये सब छोड़ दो, पकड़ी जाओगी। ISI वाले मुनीरा को पूछताछ के लिए ले गए हैं और अब्बा हुजूर को भी हेडक्वार्टर ना छोड़ने को कहा गया है।’ सहमत मुस्कुराती रही…हंसते हुए इकबाल से बोली- ‘मियां बहुत भोले हो आप… जो लड़की अपना मुल्क छोड़कर यहां तक आई है, उसे डराकर आप रोक लोगे? बेहतर होगा मैं जैसा कह रही हूं करो, इसी में आपका और परिवार का भला है। मुझे आपके खानदान से कोई दुश्मनी नहीं है।’ उसने पास पड़ी एक कुर्सी पर इकबाल को बैठाया और रस्सी से बांध दिया। काफी देर इकबाल छटपटाता रहा। फिर सहमत ने उसकी हथकड़ी खोली और धमकाते हुए कहा- ‘तुम हर पल मेरे निशाने पर हो। जरा भी चालाकी की, तो समझो तुम्हारे साथ तुम्हारा खानदान भी खत्म।’ अगले दिन छावनी के मेन गेट पर फौज के झंडे वाली एक चमचमाती कार आकर रुकी। गार्ड जैसे ही तलाशी और पहचान पत्र के लिए आगे बढ़ा, कार की पिछली खिड़की का शीशा सरसराता हुआ नीचे उतरा। अंदर से कड़क आवाज गूंजी- ‘मैं जीओसी बशीर हूं, जनरल सईद की हवेली के लिए कौन सा रास्ता जाता है?’ घबराए गार्ड ने बिना कोई सवाल किए हवेली की तरफ इशारा कर दिया- ‘जनाब, सीधे हाथ पर।’ गाड़ी आगे बढ़ गई। हवेली के बैठकखाने में कुछ देर इंतजार करने के बाद, जनरल बशीर के भेष में आए उस शख्स का सामना मेजर इकबाल से हुआ। जनरल ने कहा, ‘मेजर, तुम्हारी बेगम साहिबा इस शहर के सबसे बेहतरीन और ऊंचे रसूख वाले स्कूल में संगीत सिखाती हैं, उनकी बड़ी तारीफ सुनी है। मैंने सोचा क्यों न उनसे मिल लिया जाए।’ इकबाल ने कुछ नहीं कहा। उसी वक्त सहमत हॉल में दाखिल हुई। उसने अपने काले पर्स में एक लोडेड रिवॉल्वर छुपा रखी थी। औपचारिक बातचीत के बीच, जनरल ने जेब से मुड़ा हुआ कागज निकाला और सहमत की तरफ बढ़ाते हुए कहा, ‘बेगम साहिबा, इस खत में आपके परिवार के लिए ताजीयत (शोक संदेश) है।’ सहमत ने खत खोला। ऊपर सांत्वना के शब्द थे, लेकिन लाइनों के बीच छुपा असली संदेश था- 'ठीक तीन घंटे बाद, पुरानी वादियों के पास।' सहमत ने खत वापस जनरल को सौंपा और खुदाहाफिज कहकर अंदर चली गई। जनरल ने भी मेजर इकबाल से विदा लिया। उसी रोज रात करीब 8 बजे। स्थानीय पठानी लिबास में RAW का वो अफसर रावलपिंडी के एक मशहूर रेस्तरां के कोने वाली मेज पर बैठा चाय की चुस्कियां ले रहा था। तय वक्त पर, रेस्तरां के बाहर बुर्के में लिपटी एक औरत दाखिल हुई। उसके पीछे बेहद डरा और सहमा हुआ मेजर इकबाल चल रहा था। इसी बीच RAW अधिकारी को भनक लग गई कि बाहर गाड़ियों के पीछे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI के शार्पशूटर मुस्तैद हैं। उनकी उंगलियां ट्रिगर पर थीं और सीधा निशाना बुर्के वाली औरत और इकबाल पर। RAW अधिकारी के माथे पर पसीना छलक आया। 'सहमत पकड़ी जा चुकी है! अगर ISI ने उसे जिंदा दबोच लिया, तो टॉर्चर सेल में वह टूट सकती है। भारत का पूरा नेटवर्क, दर्जनों स्लीपर सेल और सालों की मेहनत तबाह हो जाएगी।' यहीं सोचते हुए उसने भारी मन से अपना दाहिना हाथ जैकेट की अंदरूनी जेब में डाला और एक छोटे से इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमीटर का बटन तीन बार दबाया। 'सूंss...!' सन्नाटे को चीरता हुआ एक जहरीला तीर बुर्के वाली औरत की गर्दन में जा धंसा। वह वहीं फर्श पर ढह गई। पाकिस्तानी एजेंट कुछ समझ पाते, रेस्तरां के पिछले हिस्से में एक जोरदार धमाका हुआ। चारों तरफ चीख-पुकार मच गई। भगदड़ का फायदा उठाकर RAW अधिकारी और उसके साथी वहां से फरार हो गए। वे शहर से दूर एक सुरक्षित और बंद कमरे में पहुंचे। सब खामोश थे। RAW अधिकारी अपनी हथेलियों में सिर छुपाए बैठा था। उसकी आत्मा कचोट रही थी-’भारत लौटकर वह सहमत की बूढ़ी मां को क्या जवाब देगा? कैसे कहेगा कि उसने देश को बचाने के लिए अपनी ही सबसे बेहतरीन एजेंट की जान ले ली?’ 'ट्रीन-ट्रीन...' अचानक सन्नाटे को चीरती हुई दरवाजे की घंटी बजी। कमरे में मौजूद एजेंटों के बदन में बिजली दौड़ गई। अधिकारी ने अपनी रिवॉल्वर का सेफ्टी कैच हटाते हुए बेहद सख्त लहजे में हुक्म दिया, कोई भी जिंदा हाथ नहीं आएगा। जितने दुश्मनों को मार सकते हो मारो, या खुद को गोली मार लो।’ घंटी दोबारा बजी। अधिकारी दरवाजे की तरफ बढ़ा और 'पीप-होल' से बाहर झांका। अब उसकी उंगलियां ढीली पड़ गईं और भारी पिस्तौल फर्श पर जा गिरी। उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। उसने कांपते हाथों से दरवाजे की कुंडी खोली। बाहर सहमत जिंदा सलामत खड़ी थी। कमरे में मौजूद हर शख्स मानो काठ का हो गया। किसी को अपनी आंखों पर यकीन नहीं हो रहा था। अधिकारी ने हैरान होकर पूछा- ‘जिंदा कैसे बच निकली?’ सहमत के चेहरे पर एक मुस्कान उभर आई। ‘रेस्तरां में इकबाल के साथ मैं नहीं थी। मैंने मुनीरा को अपनी जगह बुर्का पहनाकर इकबाल के साथ भेज दिया था।’ सहमत का मिशन अब मुकम्मल हो चुका था। RAW की टीम सहमत को गोपनीय तरीके से सरहद पार कराकर वापस भारत ले आई। अपनी सरजमीं पर कदम रखते ही सहमत को महसूस हुआ कि वह सिर्फ यादें लेकर नहीं लौटी है। मेडिकल चेकअप में पता चला कि उसके पेट में मेजर इकबाल का बच्चा पल रहा है। कुछ महीने बाद सहमत ने एक बेटे को जन्म दिया। आगे चलकर उस बच्चे ने इंडियन आर्मी की वर्दी पहनी और देश की हिफाजत की कसम खाई। सहमत के बेटे ने ही अपनी मां की कहानी लेखक हरिंदर सिंह सिक्का को बताई थी। हरिंदर सिक्का का दावा है कि वे सहमत से मिले हैं और कई बार पाकिस्तान भी गए हैं। 8 साल की रिसर्च के बाद उन्होंने ‘सहमत कॉलिंग’ किताब लिखी है।
कराची में धमाका: सिंध रेंजर्स के तीन जवान शहीद
पाकिस्तान के कराची शहर में एक बड़े धमाके के बाद दहशत मच गई। रिपोर्ट के अनुसार, यह आतंकी हमला बताया जा रहा है
बांग्लादेश ने पलटा पासा, मोंगला पोर्ट चीन को सौंपा, कोलकाता और हल्दिया पर मंडराया बड़ा खतरा!
पड़ोसी देश बांग्लादेश से एक ऐसी बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है, जिसने भारतीय सुरक्षा एजेंसियों और रणनीतिक विशेषज्ञों की नींद उड़ा दी है। भू-राजनीतिक मोर्चे पर भारत को एक बड़ा झटका देते हुए बांग्लादेश ने अपने रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण 'मोंगला पोर्ट' (Mongla Port) के एक बड़े हिस्से का मैनेजमेंट और टर्मिनल ऑपरेशन भारत के बजाय चीन को सौंप दिया है। इस कदम के बाद भारत के पूर्वी समुद्री तट, विशेष रूप से पश्चिम बंगाल के कोलकाता और हल्दिया बंदरगाहों की सुरक्षा को लेकर बेहद गंभीर और चिंताजनक सवाल खड़े हो गए हैं। चीन की भारतीय उपमहाद्वीप में बढ़ती यह मौजूदगी भारत के लिए एक नए चक्रव्यूह जैसी साबित हो सकती है।भारत के हाथ से कैसे निकला मोंगला पोर्ट का नियंत्रणलंबे समय से भारत यह उम्मीद कर रहा था कि मोंगला बंदरगाह के विकास और संचालन की जिम्मेदारी उसे मिलेगी, क्योंकि भारत और बांग्लादेश के बीच कनेक्टिविटी को मजबूत करने के लिए यह पोर्ट बेहद जरूरी था। भारतीय कंपनियां इस रेस में आगे मानी जा रही थीं। लेकिन हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों और बीजिंग के भारी-भरकम आर्थिक प्रभाव के चलते बांग्लादेश ने यह प्रोजेक्ट चीन की कम्युनिस्ट सरकार के नियंत्रण वाली कंपनी को सौंप दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन ने अपनी पुरानी 'डेट-ट्रैप डिप्लोमेसी' (कर्ज के जाल की नीति) और भारी निवेश का लालच देकर बांग्लादेश को अपनी तरफ झुका लिया है, जिसके परिणाम अब सतह पर दिखने लगे हैं।कोलकाता और हल्दिया पोर्ट के लिए क्यों बढ़ गया है बड़ा खतरामोंगला पोर्ट की भौगोलिक स्थिति को देखें तो यह भारत के पश्चिम बंगाल में स्थित कोलकाता पोर्ट और हल्दिया डॉक कॉम्प्लेक्स के बेहद करीब है। चीन को इस पोर्ट का नियंत्रण मिलने का सीधा मतलब है कि अब चीनी ड्रैगन की सीधी पहुंच भारतीय समुद्री सीमा और सुंदरबन के संवेदनशील इलाकों के बिल्कुल मुहाने तक हो गई है। सुरक्षा विश्लेषकों के मुताबिक, इस पोर्ट की आड़ में चीन अब भारतीय नौसेना (Indian Navy) की गतिविधियों, कोलकाता-हल्दिया पोर्ट के व्यापारिक रूट और बंगाल की खाड़ी में भारत के मिसाइल टेस्टिंग जोन पर बेहद आसानी से नजर रख सकेगा। यह स्थिति भारत की संप्रभुता और समुद्री सुरक्षा के लिए एक परमानेंट सिरदर्द बन सकती है।'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' नीति के तहत भारत को घेरने की चीनी चालचीन पिछले कई सालों से भारत को चारों तरफ से समुद्र में घेरने की 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' (String of Pearls) रणनीति पर काम कर रहा है। पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट, श्रीलंका के हम्बनटोटा पोर्ट और म्यांमार के क्याुकफ्यू पोर्ट के बाद अब बांग्लादेश का मोंगला पोर्ट भी इसी कड़ी का हिस्सा बनता दिख रहा है। हालांकि, बांग्लादेश इसे महज एक व्यापारिक समझौता बता रहा है, लेकिन इतिहास गवाह है कि चीन जहां भी कमर्शियल पोर्ट बनाता है, वहां धीरे-धीरे उसकी नौसेना और युद्धपोत डेरा डाल लेते हैं। नई दिल्ली के गलियारों में अब इस बात को लेकर गहन मंथन शुरू हो गया है कि कैसे चीन के इस नए आक्रामक कदम का मुकाबला किया जाए और अपनी पूर्वी समुद्री सीमा को सुरक्षित रखा जाए।
शोएब अख्तर के बड़े भाई के जनाजे में शामिल हुआ लश्कर आतंकी सैफुल्लाह कसूरी, भारत को दे चुका है धमकी
इस्लामाबाद में पाकिस्तान के पूर्व तेज गेंदबाज शोएब अख्तर के बड़े भाई शाहिद अख्तर के जनाजे पर विवाद खड़ा हो गया है। अंतिम संस्कार में पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के उपप्रमुख सैफुल्लाह कसूरी समेत संगठन के कई वरिष्ठ सदस्यों की मौजूदगी सामने आने के बाद यह मामला चर्चा में आ गया है।
पीएम मोदी 27 जून को सेशेल्स दौरे पर गए। दर्जनों खबरें चलीं- ‘मोदी यहां दुनिया के सबसे बुजुर्ग जानवर जोनाथन से मिलेंगे।’ पीएम मोदी कछुओं से मिले भी, लेकिन उनमें जोनाथन नहीं था। दरअसल, जोनाथन सेशेल्स में है ही नहीं। वो तो 7 हजार किमी दूर एक ब्रिटिश टापू सेंट हेलेना में है। पीएम मोदी से मुलाकात हो, या ना हो, लेकिन इस बुजुर्ग कछुए की कहानी बेहद रोचक है; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: कौन है जोनाथन, जिसका नाम गिनीज बुक में दर्ज?जवाब: जोनाथन जमीन पर रहने वाले विशालकाय कछुओं की प्रजाति का सबसे उम्रदराज कछुआ है। इन्हें ‘सेशेल्स जाइंट टॉर्टोइस’ कहते हैं। सेशेल्स 151 द्वीपों का देश है। 1832 ईस्वी में यहीं जोनाथन का जन्म हुआ। हालांकि पिछले 144 सालों से जोनाथन दक्षिण अटलांटिक महासागर के द्वीप सेंट हेलेना में रहता है। 1882 में जोनाथन को अन्य 3 बड़े कछुओं के साथ सेशेल्स से सेंट हेलेना भेजा गया। तब सेशेल्स ब्रिटिश उपनिवेश मॉरिशस का हिस्सा हुआ करता था। उस वक्त गवर्नर थे विलियम ग्रे-विल्सन। तब से अब तक सेंट हेलेना के 31 गवर्नर बदल चुके हैं। सेंट हेलेना आज भी ब्रिटेन के नियंत्रण वाला एक विदेशी इलाका है। यहां के गवर्नर के घर को ‘प्लांटेशन हाउस’ कहते हैं। जोनाथन इसी घर के लॉन में रहता है। लोग उसे प्यार से ‘जोनो’ कहते हैं। सेंट हेलेना की सरकार उसकी देखभाल का जिम्मा उठाती है। उसे राष्ट्रीय प्रतीक का दर्जा मिला है। 5 पेंस के सिक्के पर जोनाथन की तस्वीर छपी है। 2022 से पहले तक सबसे उम्रदराज कछुए का खिताब तुई-मलिला नाम के कछुए के पास था, जो 1777 से 1965 तक यानी 188 साल जीवित रहा। इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर, यानी IUCN के मुताबिक, जोनाथन की प्रजाति यानी 'सेशेल्स जाइंट टॉर्टोइस' के कुल 37 कछुओं की जानकारी है। ये सेशेल्स के ही अलग-अलग द्वीपों पर रहते हैं। सेशेल्स पार्क्स एंड गार्डंस अथॉरिटी की वेबसाइट के मुताबिक, यहां के ‘नेशनल बोटैनिकल गार्डन’ में जोनाथन की तरह ही कुछ बड़े सेशेल्स कछुए मौजूद हैं। विजिटर्स इन्हें देख सकते हैं। सेशेल्स कछुओं में करीब 27 नर कछुओं पर एक मादा कछुए का अनुपात है। इसीलिए ये प्रजाति अति दुर्लभ है। हालांकि ये कछुए औसतन 150 साल या उससे ज्यादा भी जीवित रह सकते हैं। सवाल-2: क्या वाकई जोनाथन 194 साल का है?जवाब: ये तस्वीर देखिए… 1886 की इस तस्वीर है, जिसमें जोनाथन पूरी तरह वयस्क हो चुका है। 2008 में ब्रिटिश अखबार ‘द इंडिपेंडेंट’ में ये तस्वीर छपी, तो चर्चा छिड़ी कि ये द्वीप पर मौजूद 150 साल से ज्यादा उम्र का कछुआ है। फिर 2015 में सेंट हेलेना के जानवरों के डॉक्टर जो हॉलिन्स ने कहा, 'हमारे पास रिकॉर्ड है कि उसे 1882 में पूरी तरह डेवेलप कंडीशन में यहां लाया गया था। ये उम्र कम से कम 50 साल की होती है और इसी आधार पर हमारा अनुमान है कि उसकी पैदाइश 1832 और अभी उसकी आयु 183 साल (यानी 2026 में 194 साल) है।' गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने भी कहा, ‘जोनाथन जब सेशेल्स से सेंट हेलेना पहुंचा, तो पूरी तरह एडल्ट हो चुका था। पूरी संभावना है कि जोनाथन की उम्र हमारे इस अनुमान से भी ज्यादा है।' हालांकि जोनाथन की उम्र को लेकर एक बड़ा दावा और है… दरअसल, 1903 से 1911 तक ईस्ट इंडिया कंपनी की तरफ से सेंट हेलेना के गवर्नर रहे हेनरी लियोनेल गैलवे ने 1941 में रॉयल अफ्रीकन सोसाइटी के जर्नल में एक आर्टिकल लिखा था। उन्होंने दावा किया था- ‘1776 में एक समुद्री जहाज के कप्तान ने तब के गवर्नर को दो कछुए गिफ्ट किए थे। मैंने जब 1911 में द्वीप छोड़ा, तो दोनों ठीक थे। फिर एक की कुछ साल बाद मौत हो गई। दूसरा अभी भी जीवित है।’ अभी सेंट हेलेना पर जोनाथन के साथ 3 कछुए और हैं, लेकिन ये सभी उससे बहुत छोटे हैं। यानी अगर गैलवे के मुताबिक 1776 में आया दूसरा जीवित कछुआ जोनाथन ही है, तो फिर जोनाथन की उम्र कम से कम 250 साल है। 1815 में वाटरलू की हार के बाद नेपोलियन बोनापार्ट को यहीं कैद किया गया था। कहा जाता है कि तब नेपोलियन, जोनाथन से मिला था। हालांकि इस किस्से की पुष्टि नहीं होती। सवाल-3: अभी जोनाथन किस हाल में है, उसकी देखरेख कैसे होती है?जवाब: लाइव साइंस मैगजीन के मुताबिक, 2009 में जोनाथन की तबीयत काफी बिगड़ गई थी। वो दुबला हो गया था और उसका मुंह कमजोर हो गया था। वह खुद से खाना नहीं खा पा रहा था। जोनाथन का ध्यान रखने वाले डॉक्टर जो हॉलिन्स के मुताबिक, ‘मैंने तब उसे सप्ताह में एक बार फल, सब्जियां खिलाना शुरू किया। धीरे-धीरे उसकी चोंच दोबारा फिर से तेज, घातक और घास वगैरह चरने लायक हो गई थी। मुझे समझ आया कि पोषण की कमी के चलते जोनाथन में मिनरल्स और विटामिन वगैरह की कमी थी।’ 2015 में हॉलिन्स ने बताया था, ‘जोनाथन बिल्कुल ठीक है! मैं उसे रोज अपने हाथों से खाना खिला रहा हूं। उसे खूब भूख लगती है। मोतियाबिंद के चलते वह अंधा है। उसकी सूंघने की शक्ति भी चली गई है, इसलिए वह खाने का पता नहीं लगा सकता। हालांकि वह अभी भी सुन सकता है और वो मेरी आवाज सुनकर खाने के लिए हवा में मुंह चलाने लगता है। मैं खाना रख देता हूं और वह काटकर खा लेता है।’ जो हॉलिन्स ने ये भी बताया था कि जोनाथन की यौन इच्छा प्रबल है। वो अपनी 55 साल की पार्टरन एम्मा के साथ संभोग करने की कोशिश करता है। उन दोनों के साथ फ्रेडरिक नाम का एक और कछुआ रहता है। 1991 में जब फ्रेडरिक को सेंट हेलेना लाया गया, तब उसे मादा समझकर ‘फ्रेडरिका’ नाम रखा गया था। हालांकि 25 साल से ज्यादा समय तक जोनाथन के साथ रहने पर भी दोनों के बच्चा नहीं हुई। जांच की गई, तब पता चला कि फ्रेडरिक एक नर कछुआ है। सवाल-4: कछुए इतनी लंबी उम्र तक जिंदा कैसे रहते हैं?जवाब: कछुओं के वयस्क होने के साथ ही उनके शरीर का बाहरी खोल बेहद मजबूत हो जाता है। जंगल के शिकारी जानवरों के लिए इसे तोड़ पाना लगभग मुश्किल होता है। इससे कछुओं की मृत्यु दर बेहद कम हो जाती है। साइंस इनसाइट्स ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक, शिकार के चलते कम मृत्यु देर की वजह से कछुओं पर ज्यादा प्रजनन का दबाव नहीं रहता। वे धीमी रफ्तार से बढ़ते हैं और संभोग के लिए देर से यानी करीब 30 साल की उम्र में तैयार होते हैं। इसीलिए कछुए तेजी से न जीते हैं और न तेजी से मरते हैं और उनमें उम्र बढ़ने से रोकने का एक पूरा तंत्र तैयार हो जाता है। इस तंत्र की 3 खासियत हैं… 1. कम एनर्जी की जरूरत, बाहरी धूप से काम चल जाता है 2. एनर्जी प्रोसेस कम होने से हानिकारक तत्व कम बनते हैं 3. कछुओं में एंटी-एजिंग और एंटी-कैंसर जीन ये खबर भी पढ़ें… मंडे मेगा स्टोरी: बिना संबंध बनाए भी बच्चे पैदा कर लेती है कॉकरोच:सिर कटने पर भी कैसे जिंदा रहते हैं, डायनासोर से भी सीनियर; कॉकरोच के किस्से कॉकरोच जनता पार्टी की वेबसाइट, X अकाउंट और इंस्टाग्राम अकाउंट सभी हैक और डाउन हो गए, तो फाउंडर अभिजीत दीपके ने लिखा- ‘कॉकरोच कभी मरते नहीं।’ बात सच भी है। कॉकरोच इस दुनिया में डायनासोर से भी पहले आए। सिर कट जाए, हफ्तों खाना न मिले फिर भी जिंदा रहते हैं। बिना नर के भी बच्चा पैदा कर सकते हैं। पूरी खबर पढ़ें…
मुजफ्फराबाद/इंटरनेशनल डेस्क: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में भड़की विद्रोह की आग अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुकी है। पाकिस्तानी हुकूमत के जुल्म और सौतेले व्यवहार के खिलाफ PoK की आवाम ने अब आर-पार की जंग छेड़ दी है। हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि आंदोलन को कुचलने और स्थानीय लोगों की आवाज दबाने के लिए इस्लामाबाद सरकार ने कई इलाकों में खाद्यान्न (राशन), डीजल-पेट्रोल और अन्य बेहद जरूरी चीजों की सप्लाई रोक दी है। प्रदर्शनकारियों का गंभीर आरोप है कि शहबाज शरीफ सरकार इस कड़कड़ाती किल्लत के जरिए आम नागरिकों पर मानसिक और शारीरिक दबाव बना रही है ताकि आंदोलन को अंदर से कमजोर किया जा सके।सड़कों पर उतरे हजारों लोग; सस्ती बिजली और सब्सिडी की मांगPoK के इतिहास में यह अब तक का सबसे बड़ा जन-आंदोलन बनता जा रहा है, जहां हजारों की संख्या में महिलाएं, युवा और बुजुर्ग सड़कों पर डेरा डाले हुए हैं। प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांगों में भारत की तर्ज पर सस्ती बिजली देना, आटे-दाल जैसे बुनियादी खाद्यान्न पर सरकारी सब्सिडी बहाल करना, अस्पतालों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, बुनियादी राजनीतिक अधिकार और भ्रष्ट प्रशासनिक ढांचे में बड़े सुधार शामिल हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि उनकी जायज मांगों को सुनने और उनका हक देने के बजाय पाकिस्तान सरकार ने पूरे क्षेत्र को सेना और अर्धसैनिक बलों के हवाले कर दिया है। कई इलाकों में इंटरनेट सेवाओं को पूरी तरह ब्लॉक कर दिया गया है ताकि PoK में हो रहे जुल्म की तस्वीरें दुनिया के सामने न आ सकें।सरकारी कर्मचारियों पर गिरी गाज, रिटायर्ड फौजियों को पेंशन रोकने की धमकीआंदोलन को दबाने के लिए पाकिस्तानी प्रशासन अब बेहद क्रूर और दमनकारी नीतियों पर उतर आया है। विरोध प्रदर्शनों का समर्थन करने और उनमें शामिल होने के आरोप में अब तक 128 सरकारी कर्मचारियों को नौकरी से बर्खास्त (टर्मिनेट) किया जा चुका है। यही नहीं, आंदोलन के शीर्ष नेताओं ने खुलासा किया है कि PoK के रहने वाले जिन पूर्व सैनिकों (रिटायर्ड फौजियों) ने इस प्रदर्शन में हिस्सा लिया या जनता का साथ दिया, उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनियां दी जा रही हैं। प्रशासन द्वारा उनके परिवारों की पेंशन तक रोकने की धमकी दी जा रही है, जिससे लोगों में गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया है।हिंसक झड़पों में दर्जनों मौतें, जेलों में ठूंसे जा रहे कश्मीरी एक्टिविस्टपाकिस्तानी सुरक्षा बलों और पुलिस की बर्बरता के कारण पूरे क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हिंसा भड़क उठी है। हिंसक कार्रवाई और अंधाधुंध गोलीबारी के दौरान अब तक दर्जनों स्थानीय लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि सैकड़ों लोग गंभीर रूप से घायल हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, प्रदर्शन के अगुआकारों और समर्थकों को जबरन हिरासत में लेकर जेलों में ठूंसा जा रहा है और उन पर देशद्रोह जैसी गंभीर धाराओं में मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं। दूसरी तरफ, पाकिस्तानी प्रशासन अपनी सफाई में दावा कर रहा है कि वे सिर्फ उन लोगों के खिलाफ एक्शन ले रहे हैं जो 'गैर-कानूनी' गतिविधियों और तोड़फोड़ में शामिल हैं।ठप पड़ा कारोबार, भुखमरी की कगार पर PoK की जनतासरकार द्वारा जानबूझकर पैदा की गई आवश्यक वस्तुओं की इस भारी किल्लत ने स्थानीय समुदायों का जीना मुहाल कर दिया है। PoK के प्रमुख बाजारों में व्यापार पूरी तरह ठप हो चुका है, गाड़ियों और एम्बुलेंस के लिए ईंधन खत्म हो रहा है, और सबसे बड़ी मार दैनिक मजदूरी करने वाले गरीब परिवारों पर पड़ी है जिनके सामने अब दो वक्त की रोटी का संकट खड़ा हो गया है। इस अमानवीय नाकाबंदी के बावजूद PoK की जनता पीछे हटने को तैयार नहीं है। प्रदर्शनकारियों ने साफ कर दिया है कि जब तक पाकिस्तान सरकार घुटने नहीं टेकती और उनकी मांगें पूरी नहीं करती, तब तक यह आंदोलन और तेज होता जाएगा।
गुवाहाटी/नेशनल डेस्क: राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने भारत के खिलाफ साजिश रचने वाले प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन जमात-उल-मुजाहिद्दीन बांग्लादेश (JMB) के मॉड्यूल पर एक और बड़ा प्रहार किया है। एनआईए ने गुवाहाटी की विशेष अदालत में जेएमबी से जुड़े 11 कथित आतंकवादियों के खिलाफ एक व्यापक चार्जशीट (आरोप पत्र) दाखिल की है। इन सभी आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS 2023) और यूए(पी) एक्ट 1967 (UAPA) की विभिन्न गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।'इमाम महमूदर कफीला' विंग के जरिए रची जा रही थी खूनी साजिशएनआईए की जांच में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि इन सभी 11 आरोपियों ने जमात-उल-मुजाहिद्दीन की एक सीक्रेट विंग 'इमाम महमूदर कफीला' (IMK) में सक्रिय भूमिका निभाई थी। ये आरोपी देश के भीतर गुप्त बैठकें आयोजित करने, युवाओं को मजहबी तौर पर गुमराह करने (रेडिकलाइज करने), चरमपंथी साहित्य बांटने और सोशल मीडिया व डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए भारत-विरोधी जहरीला प्रचार फैलाने में जुटे थे। जांच एजेंसी के मुताबिक, इनका मुख्य मकसद पूर्वोत्तर के राज्यों (असम, त्रिपुरा आदि) में अशांति फैलाना और उत्तर प्रदेश, बिहार व झारखंड जैसे घनी आबादी वाले राज्यों में बड़े आतंकी हमलों को अंजाम देना था।लोकतंत्र को खत्म कर शरिया शासन लाना है जेएमबी का मकसदजमात-उल-मुजाहिद्दीन बांग्लादेश (JMB) एक बेहद कट्टरपंथी संगठन है, जो पूरी तरह से सलाफी विचारधारा से प्रभावित है। इसका मुख्य उद्देश्य बांग्लादेश और उसके आसपास के क्षेत्रों में लोकतांत्रिक तथा धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था को जड़ से उखाड़कर शरीयत आधारित इस्लामी शासन स्थापित करना है। इसकी स्थापना कुख्यात आतंकियों शेख अब्दुर रहमान और सिद्दीकुल इस्लाम ने की थी। आतंकी गलियारों में सिद्दीकुल इस्लाम को 'बांग्ला भाई' के नाम से भी जाना जाता था। जेएमबी ने अपनी स्थापना के बाद से ही गैर-सरकारी संगठनों और आम नागरिकों को निशाना बनाना शुरू कर दिया था, जिसके चलते फरवरी 2005 में बांग्लादेश सरकार ने इस पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया था।आधे घंटे में 500 बम धमाके: जब दहल उठा था पूरा बांग्लादेशप्रतिबंध के ठीक छह महीने बाद, इस संगठन ने जो किया उसने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया। 17 अगस्त 2005 को जेएमबी ने एक अन्य कट्टरपंथी संगठन 'हरकत-उल-जिहाद अल-इस्लामी' की मदद से बांग्लादेश के 64 में से 63 जिलों में एक साथ सिलसिलेवार बम धमाके किए। महज 30 मिनट के भीतर पूरे देश में 500 से अधिक बम फोड़े गए थे। इन धमाकों का मुख्य मकसद देश के जजों, वकीलों और न्यायिक प्रणाली को खत्म कर वहां जबरन शरिया कानून लागू करना था। बाद में साल 2006 में सिद्दीकुल इस्लाम उर्फ बांग्ला भाई को पुलिस ने धरदबोचा और कानूनी प्रक्रिया के बाद 2007 में उसे फांसी पर लटका दिया गया।सिद्दीकुल इस्लाम ने 2005 में की थी भारत में एंट्री, बंगाल से फैला जालबांग्लादेश में तबाही मचाने के दौरान ही जेएमबी ने भारत में पैर पसारने शुरू कर दिए थे। साल 2005 में सिद्दीकुल इस्लाम ने भारत में प्रवेश किया और 'हाटकाटा नसीरुल्लाह' (एक खूंखार आईईडी बम विशेषज्ञ) के साथ मिलकर पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में जेएमबी की पहली भारतीय यूनिट (65वीं यूनिट) खड़ी की। इसके बाद यह नेटवर्क नदिया, बीरभूम और बर्दवान जैसे सीमावर्ती जिलों में तेजी से फैल गया।इस भारतीय नेटवर्क का सबसे बड़ा पर्दाफाश साल 2014 में हुआ, जब पश्चिम बंगाल के बर्दवान (खगरागढ़) में एक घर के भीतर अचानक बम बनाते समय धमाका हो गया, जिसमें दो आतंकवादियों की मौत हो गई थी। एनआईए की जांच से साफ हुआ कि जेएमबी ने बंगाल के रास्ते असम, बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश तक अपने स्लीपर सेल और मॉड्यूल का एक बड़ा जाल बिछा लिया था।आईएसआईएस (ISIS) से जुड़ाव और ढाका कैफे अटैक का 'नियो-जेएमबी' कनेक्शनअंतरराष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों की रिपोर्ट्स के मुताबिक, जेएमबी का संबंध लश्कर-ए-तैयबा, अल-कायदा और सिमी (SIMI) जैसे वैश्विक आतंकी संगठनों से रहा है। हाल के वर्षों में इस संगठन के भीतर एक नया धड़ा पैदा हुआ, जिसे 'नियो-जेएमबी' (Neo-JMB) कहा जाता है। यह धड़ा कुख्यात वैश्विक आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (ISIS) की विचारधारा पर चलता है। यह गुट 'लोन-वोल्फ' हमलों (अकेले दम पर हमला करना) और आत्मघाती हमलों के लिए कुख्यात है। साल 2016 में बांग्लादेश के ढाका में स्थित 'होली आर्टिसन कैफे' पर जो भीषण आतंकी हमला हुआ था, जिसमें कई विदेशी नागरिकों की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी, उसे इसी नियो-जेएमबी गुट ने अंजाम दिया था।डकैती, तस्करी और हवाला: जानिए कहां से आता है टेरर फंड?एनआईए की जांच के अनुसार, जेएमबी भारत और बांग्लादेश में अपनी आतंकी गतिविधियों को चलाने के लिए मुख्य रूप से अवैध रास्तों से फंडिंग जुटाता है। इसके फंड के प्रमुख स्रोतों में शामिल हैं:सीमावर्ती इलाकों में डकैती, लूटपाट और जबरन उगाही।भारत-बांग्लादेश सीमा पर हथियारों, नशीले पदार्थों और मवेशियों की तस्करी।जाली भारतीय मुद्रा (फेक करेंसी) का धंधा।खाड़ी देशों और विदेशों में बैठे समर्थकों के जरिए हवाला नेटवर्क से मिलने वाली गुप्त वित्तीय मदद।भारत में पूरी तरह प्रतिबंधित है जेएमबी, सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट पर2014 के बर्दवान ब्लास्ट और 2018 में बिहार के बोधगया में हुए बम धमाकों में जेएमबी का सीधा हाथ सामने आने के बाद, भारत सरकार ने 23 मई 2019 को यूएपीए (UAPA) के तहत जमात-उल-मुजाहिद्दीन बांग्लादेश और इसके सभी स्वरूपों (नियो-जेएमबी सहित) को पूरी तरह से बैन और आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया था। वर्तमान में एनआईए, उत्तर प्रदेश एटीएस (ATS), और विभिन्न राज्यों की एसटीएफ (STF) इसके बचे-खुचे स्लीपर सेल्स, ऑनलाइन हैंडलर्स और फंडिंग नेटवर्क को नेस्तनाबूद करने के लिए लगातार धरपकड़ अभियान चला रही हैं। गुवाहाटी कोर्ट में दाखिल यह नई चार्जशीट इसी कड़े प्रहार का हिस्सा है।
ट्रंप ने दोहराया ईरानी सेना के कमजोर होने का दावा, कहा- अब कोई ईरान का लीडर बनना नहीं चाहता
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फेथ एंड फ्रीडम कोएलिशन' के 'रोड टू मेजॉरिटी' कॉन्फ्रेंस में ईरानी सेना के कमजोर होने के अपने दावे को फिर को दोहराया।
भारत आ सकते हैं डोनाल्ड ट्रंप व्यापार, रक्षा और AI सहयोग पर हो सकती है बड़ी बातचीत
मीडिया से बातचीत के दौरान अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने कहा कि ट्रम्प प्रशासन अगले वर्ष की शुरुआत में राष्ट्रपति ट्रम्प के भारत दौरे की तैयारियों पर काम कर रहा है।
क्या मेहरंग बलोच की सजा, बलोचिस्तान में अहिंसक आंदोलनों के प्रति भरोसा खत्म कर देगी?
डॉक्टर से एक्टिविस्ट बनीं मेहरंग बलोच को पाकिस्तान की अदालत ने आजीवन कैद की सजा दी है. क्या यह सजा, अहिंसक आंदोलनों पर भरोसा खत्म कर देगी
इजरायल-लेबनान शांति की दिशा में अहम पहल, वाशिंगटन में फ्रेमवर्क समझौते पर हस्ताक्षर
कई दिनों तक चली बातचीत के बाद यह फ्रेमवर्क तैयार किया गया। वाशिंगटन स्थित अमेरिकी विदेश मंत्रालय में आयोजित कार्यक्रम में अमेरिका में लेबनान की राजदूत नाडा हमादेह मोवाद और उनके इजरायली समकक्ष येचियल लिटर ने अमेरिकी प्रतिनिधियों की मौजूदगी में इस त्रिपक्षीय दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए।
पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में शांति स्थापित करने की तमाम वैश्विक कोशिशों और हाल ही में हुए सीजफायर समझौते को एक बहुत बड़ा और जानलेवा झटका लगा है। वाशिंगटन और तेहरान के बीच युद्ध को पूरी तरह खत्म करने के लिए अभी बातचीत का दौर चल ही रहा था कि अमेरिकी फाइटर जेट्स ने ईरान के कई अहम सैन्य ठिकानों पर भीषण बमबारी (Airstrike) कर पूरे क्षेत्र को दहला दिया।इस अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के बाद ईरान आगबबूला हो उठा है। ईरानी संसद के राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग के प्रमुख इब्राहिम अजीजी ने शनिवार को अमेरिका को बेहद सख्त और सीधे लहजे में चेतावनी दी है कि इस दुस्साहस के बाद वाशिंगटन को सिर्फ 'पीछे हटना और पछताना' पड़ेगा। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर तीखा हमला बोलते हुए साफ कहा कि अब अमेरिका का यह 'ब्लेम गेम' यानी खुद हमला करके दूसरों पर दोष मढ़ने का खेल बिल्कुल नहीं चलेगा। आइए जानते हैं कि शांति समझौते के बीच अचानक भड़के इस महाविवाद की असल वजह क्या है।क्यों भड़का विवाद? जानिए अमेरिकी सेना के ताबड़तोड़ हवाई हमलों की वजहयह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के लड़ाकू विमानों ने शुक्रवार को ईरान के भीतर मौजूद मिसाइल और ड्रोन स्टोरेज लोकेशन्स के साथ-साथ उनकी तटीय रडार साइटों पर ताबड़तोड़ मिसाइलें बरसा दीं। व्हाइट हाउस और अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने इस कार्रवाई को पूरी तरह जायज ठहराते हुए साफ किया कि यह हमला ईरान द्वारा अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग में एक कमर्शियल जहाज पर किए गए कायरतापूर्ण हमले का सीधा और कड़ा जवाब है।अमेरिकी सेना द्वारा जारी आधिकारिक टाइमलाइन के मुताबिक, बीते 25 जून को ईरान ने ओमान के तट के पास जलडमरूमध्य से गुजर रहे सिंगापुर के झंडे वाले एक विशाल मालवाहक जहाज 'एम/वी एवर लवली' (M/V Ever Lovely) पर वन-वे सुसाइड अटैक ड्रोन से हमला किया था। यह हमला रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य के पास हुआ था, जो पूरी दुनिया के कुल ऊर्जा और कच्चे तेल के व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा (20%) संभालता है। अमेरिका ने इसी अंतरराष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा के उल्लंघन को आधार बनाकर ईरान के खिलाफ यह बड़ा सैन्य एक्शन लिया है।ईरान का पलटवार: 'अमेरिका ने बातचीत के बीच में पीठ पर छुरा घोंपा'अमेरिकी बमबारी से भड़के ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के पूर्व शीर्ष कमांडर और वर्तमान सांसद इब्राहिम अजीजी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर अमेरिका को आड़े हाथों लेते हुए एक लंबी पोस्ट लिखी। अजीजी ने कहा, 'सफेदपोश अमेरिका ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उसकी कथनी और करनी में कितना फर्क है। उसने शांति वार्ता के बीच में ही हमारे देश पर हमला करके पीठ पर छुरा घोंपा है। नाकाम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया को दिखा दिया है कि वे किसी भी अंतरराष्ट्रीय कानून, बातचीत या सीजफायर के सिद्धांतों को नहीं मानते हैं।'अजीजी ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि सीजफायर का यह लापरवाह उल्लंघन अमेरिका के लिए आत्मघाती साबित होगा। ईरानी सांसद के इस तीखे बयान के ठीक कुछ घंटों बाद IRGC के मुख्यालय से भी एक बड़ा और डराने वाला ऐलान कर दिया गया। ईरानी सेना ने कहा कि उसने देश के दक्षिणी हिस्से पर हुए अमेरिकी हमलों के प्रतिशोध में पूरे मिडिल ईस्ट क्षेत्र में फैले अमेरिकी सैन्य ठिकानों और उनके दूतावासों को सीधे अपने मिसाइल निशाने पर लेना शुरू कर दिया है।'हिंसा का जवाब सिर्फ हिंसा' - अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस की दोटूकईरानी धमकियों के बीच अमेरिका ने भी झुकने से साफ इनकार कर दिया है। अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस (JD Vance) ने ईरान को आड़े हाथों लेते हुए 'X' पर दोटूक शब्दों में चेतावनी दी। वेंस ने लिखा, 'ईरान ने खुद टेबल पर बैठकर सीजफायर समझौते पर दस्तखत किए थे और हमारी सेना ने उस समझौते का पूरा सम्मान किया। अगर ईरानी प्रशासन को एमओयू (MOU) के नियमों या उसे लागू करने के तरीके को लेकर कोई भी आपत्ति या असहमति थी, तो वे राजनयिक चैनलों के जरिए बात कर सकते थे। लेकिन उन्होंने हथियारों का रास्ता चुना, और याद रहे कि हमारे देश के खिलाफ की गई हिंसा का जवाब हमेशा दोगुनी हिंसा से ही दिया जाएगा।' इसके साथ ही वेंस ने ईरान से आखिरी अपील करते हुए कहा कि वे आगे की तबाही को रोकने के लिए तुरंत हिंसा रोककर बातचीत की मेज पर आएं।नाजुक मोड़ पर शांति वार्ता: क्या तीसरे विश्व युद्ध की ओर बढ़ रही दुनिया?यह पूरा सैन्य टकराव एक ऐसे नाजुक और ऐतिहासिक मोड़ पर हुआ है जब दोनों देशों के बीच दशकों पुराने तनाव को खत्म करने के लिए पर्दे के पीछे से बड़ी डिप्लोमैटिक बातचीत चल रही थी। पिछले हफ्ते ही दोनों पक्षों के बीच एक अस्थाई सीजफायर का औपचारिक ऐलान हुआ था, जिसके तहत एक व्यापक फ्रेमवर्क को अंतिम रूप देने के लिए दोनों देशों को 60 दिनों का समय दिया गया था। लेकिन इन ताजा हवाई हमलों और पलटवार के बाद दुनिया भर के शेयर बाजारों और कच्चे तेल की कीमतों में भारी उथल-पुथल शुरू हो गई है। शांति की सभी उम्मीदों को गहरा झटका लगा है और मिडिल ईस्ट एक बार फिर भयंकर क्षेत्रीय युद्ध (Regional War) की आग में झुलसने की कगार पर आ खड़ा हुआ है।
मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) के अशांत मोर्चे से इस वक्त की सबसे सनसनीखेज और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को हिला देने वाली खबर सामने आ रही है। लंबे समय से जारी भीषण सैन्य टकराव के बीच अमेरिका की मध्यस्थता में इजरायल और लेबनान के बीच एक बेहद महत्वपूर्ण और चौंकाने वाले समझौते पर सहमति बनी है। लेकिन इस डील के सार्वजनिक होते ही लेबनान का सबसे शक्तिशाली अर्धसैनिक संगठन हिजबुल्लाह पूरी तरह आगबबूला हो गया है। हिजबुल्लाह के शीर्ष नेतृत्व ने इस अमेरिकी समझौते को पूरी तरह खारिज करते हुए बेहद आक्रामक अंदाज में खुली चेतावनी दी है कि यदि इस डील को जबरन थोपा गया, तो लेबनान में भयानक 'गृहयुद्ध' (Civil War) छिड़ जाएगा।अमेरिकी मध्यस्थता में हुआ सीक्रेट समझौता और हिजबुल्लाह की नाराजगीवाशिंगटन और यरूशलेम से आ रही रणनीतिक रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी राजनयिकों ने पर्दे के पीछे रहकर इजरायल और लेबनान की सरकार के बीच सीमा विवाद और सुरक्षा गारंटी को लेकर एक कड़ा ड्राफ्ट तैयार कराया था। इस डील का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों की सीमाओं पर जारी गोलाबारी को स्थायी रूप से रोकना और विस्थापित नागरिकों को उनके घरों तक वापस लाना है। हालांकि, हिजबुल्लाह का आरोप है कि लेबनान सरकार ने अमेरिकी दबाव में आकर देश की संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों से समझौता किया है, जो उन्हें किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं है।'गृहयुद्ध छिड़ जाएगा' – हिजबुल्लाह की लेबनान सरकार को खुली धमकीहिजबुल्लाह के प्रमुख ने एक विशेष संबोधन में लेबनान प्रशासन को सीधे शब्दों में आगाह किया है कि वे इजरायल या अमेरिका के किसी भी एजेंडे को देश की धरती पर लागू नहीं होने देंगे। हिजबुल्लाह ने कहा कि इस डील के जरिए उनके हथियारों को सरेंडर कराने और दक्षिण लेबनान से उनकी मौजूदगी को खत्म करने की साजिश रची जा रही है। अगर सरकार ने इस समझौते को आगे बढ़ाया, तो देश के भीतर विभिन्न गुटों और लेबनानी सेना के बीच सीधे टकराव की स्थिति बन जाएगी, जिससे पूरे देश में गृहयुद्ध की भयावह आग लग सकती है।बेरूत से लेकर यरूशलेम तक सैन्य अलर्ट और सुरक्षा रणनीति में बदलावइस खुली धमकी के बाद लेबनान की राजधानी बेरूत, इजरायल की उत्तरी सीमा और पूरे भूमध्यसागरीय क्षेत्र (Mediterranean Region) में स्थानीय सुरक्षा तंत्र को हाई अलर्ट पर डाल दिया गया है। इजरायली सेना (IDF) ने किसी भी संभावित रॉकेट हमले या घुसपैठ का मुकाबला करने के लिए अपनी सीमाओं पर पेट्रोलिंग और एयर डिफेंस सिस्टम 'आयरन डोम' को पूरी तरह सक्रिय कर दिया है। वहीं, लेबनान के स्थानीय नागरिक इस नई सैन्य और राजनीतिक खींचतान के बाद भारी दहशत में हैं और देश में एक बार फिर पुराने काले दौर के लौटने की आशंका से डरे हुए हैं।वैश्विक कूटनीति, एआई सर्च और अंतरराष्ट्रीय बाजार पर असरइस नए संकट ने वैश्विक कूटनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। आधुनिक जनरेटिव इंजन और वैश्विक थिंक टैंक इस बात का गहन विश्लेषण कर रहे हैं कि क्या अमेरिका द्वारा कराई गई यह पीस डील वाकई शांति लाएगी या फिर यह एक और बड़े विनाशकारी युद्ध की वजह बन जाएगी। अगर लेबनान के भीतर गृहयुद्ध जैसी स्थिति बनती है, तो इसका सीधा असर पूरे खाड़ी क्षेत्र की स्थिरता पर पड़ेगा, जिससे वैश्विक तेल बाजारों, व्यापारिक मार्गों और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा समीकरणों में भारी उथल-पुथल मचनी तय मानी जा रही है।
वैश्विक महाशक्ति अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए ऐतिहासिक युद्धविराम (सीजफायर) पर एक बार फिर से युद्ध और संकट के काले बादल मंडराने लगे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने ईरान पर दुनिया के सबसे संवेदनशील और व्यस्त समुद्री व्यापारिक मार्ग 'स्ट्रैट ऑफ होर्मुज' (होर्मुज जलडमरूमध्य) से गुजर रहे कारोबारी जहाजों पर घातक आत्मघाती ड्रोन से हमला करने का बेहद गंभीर आरोप लगाया है।अमेरिकी राष्ट्रपति ने आज आधिकारिक तौर पर जानकारी दी कि ईरान ने दोनों देशों के बीच हुए समझौते की धज्जियां उड़ाते हुए सीजफायर तोड़ दिया है। ट्रंप के मुताबिक, ईरानी सेना ने होर्मुज से गुजर रहे एक बड़े मालवाहक जहाज पर ड्रोन से हमला किया, जिसके बाद जवाबी कार्रवाई में अमेरिकी सेना ने भी तगड़ा पलटवार किया और ईरान के तीन घातक ड्रोनों को हवा में ही नेस्तनाबूद कर दिया। राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान की इस सैन्य कार्रवाई को एक बेहद 'मूर्खतापूर्ण कृत्य' करार दिया है।डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा दावा: ट्रुथ सोशल पर दी हमले की पूरी जानकारीअमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस पूरी अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम की जानकारी अपने आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' (Truth Social) पर एक पोस्ट के जरिए साझा की। ट्रंप ने दावा किया कि ईरान ने इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील समुद्री मार्ग से गुजर रहे अंतरराष्ट्रीय जहाजों को निशाना बनाने के लिए कम से कम चार सुसाइड (आत्मघाती) ड्रोन भेजे थे, जो दोनों देशों के बीच पिछले सप्ताह ही हुए युद्धविराम समझौते का खुला और सीधे तौर पर उल्लंघन है।ट्रंप का यह संगीन आरोप और अमेरिकी सेना का पलटवार ऐसे समय में सामने आया है, जब दोनों परमाणु संपन्न देशों के बीच वैश्विक मध्यस्थता के बाद तनाव कम करने की गंभीर कोशिशें की गई थीं। लेकिन इस ताजा हमले के बाद खाड़ी क्षेत्र (Gulf Region) में हालात एक बार फिर नियंत्रण से बाहर और बेहद विस्फोटक होते दिख रहे हैं।एक मालवाहक जहाज से टकराया ड्रोन, अमेरिकी सेना ने हवा में ही मार गिराए 3 विमानराष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आधिकारिक बयान के मुताबिक, ईरान द्वारा दागे गए चार ड्रोनों में से एक ड्रोन वहां से गुजर रहे एक बड़े मालवाहक जहाज के ऊपरी हिस्से (Deck) से जाकर टकरा गया। इस जबरदस्त धमाके के कारण जहाज को काफी भौतिक नुकसान पहुंचा है, लेकिन गनीमत यह रही कि भारी नुकसान के बावजूद वह जहाज समुद्र में डूबने से बच गया और अपना आगे का सफर जारी रखने में सफल रहा।ट्रंप ने बताया कि जैसे ही इस हमले की भनक अमेरिकी नौसेना के कमांडरों को लगी, अमेरिकी वायुसेना और युद्धपोतों ने त्वरित एक्शन लेते हुए बाकी बचे तीन ड्रोनों को उनके निशाने पर पहुंचने से ठीक पहले हवा में ही मार गिराया। हालांकि, सुरक्षा और रणनीतिक कारणों का हवाला देते हुए ट्रंप ने फिलहाल उस मालवाहक जहाज के नाम और उसके देश का खुलासा सार्वजनिक नहीं किया है जिस पर यह हमला हुआ था। साथ ही, इस हमले में जहाज पर सवार किसी क्रू मेंबर के घायल होने या हताहत होने की भी कोई अतिरिक्त जानकारी अभी सामने नहीं आई है।सिंगापुर के झंडे वाले जहाज पर हुआ हमला, सीजफायर को लगा बड़ा झटकामीडिया और रक्षा गलियारों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच हुए सीजफायर के बाद यह पहली और सबसे बड़ी सैन्य चुनौती तब सामने आई, जब गुरुवार को सिंगापुर के झंडे वाले एक विशाल मालवाहक जहाज पर होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरते समय यह कथित ड्रोन अटैक हुआ। इस हिंसक घटना को दोनों देशों के बीच शांति स्थापित करने और दुनिया के सबसे बड़े तेल और कमोडिटी सप्लाई रूट पर सामान्य आवाजाही बहाल करने के उद्देश्य से किए गए समझौते के लिए एक बहुत बड़ा और जानलेवा झटका माना जा रहा है।अमेरिकी खुफिया और रक्षा अधिकारियों ने दावा किया है कि इस खौफनाक हमले के पीछे सीधे तौर पर ईरान की एलीट मिलिट्री विंग 'इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स' (IRGC) का हाथ है। बताया जा रहा है कि यह घटना ईरान के उस आधिकारिक सैन्य बयान के ठीक कुछ घंटों बाद हुई, जिसमें तेहरान ने चेतावनी दी थी कि बिना उनकी मंजूरी या अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन कर समुद्री मार्गों का इस्तेमाल करने वाले किसी भी जहाज के खिलाफ वे सख्त सैन्य कार्रवाई करेंगे। इस घटना के बाद कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में भी अचानक उछाल आने की आशंका बढ़ गई है।
ईरान की हथियार क्षमताएं क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने में मददगार : इस्माइल बाघेई
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाघेई ने क्षेत्रीय सुरक्षा और आत्मरक्षा के मुद्दे पर देश का रुख स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि ईरान की सैन्य क्षमताएं सुरक्षा और स्थिरता बनाए रखने के लिए हैं
अलास्का वार्ता पर टकराव – रूस और अमेरिका आमने-सामने
रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने कहा कि अमेरिका यूक्रेन संघर्ष को खत्म करने में आखिर क्या भूमिका निभाना चाहता है, इस बारे में साफ तस्वीर सामने आनी चाहिए। उन्होंने यह बात अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के एंकरेज शिखर सम्मेलन को लेकर दिए गए बयान के बाद कही।
दैनिक भास्कर की नई सीरीज ‘स्पाई फाइल्स’ में आज कहानी उस लड़की की, जिसने जासूसी के लिए पाकिस्तानी आर्मी अफसर से शादी की, फिर पति का कत्ल कर दिया… नवंबर 1971, दोपहर का वक्त। दिल्ली के लोधी रोड पर भारत की खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग यानी RAW का दफ्तर। बाहर सर्दियों की हल्की धूप थी, लेकिन अंदर का माहौल किसी सुलगते ज्वालामुखी सा था। अचानक वहां लगे एक खुफिया ट्रांसमीटर पर अजीब सी गड़गड़ाहट हुई। अफसरों की उंगलियां तेजी से डिकोडर पर दौड़ने लगीं। जैसे ही आखिरी शब्द डिकोड हुआ, कमरे में मौजूद अफसर हैरान रह गए। मैसेज था- ‘पाकिस्तान, INS विक्रांत को डुबाने की साजिश रच रहा है। उसकी सबसे खतरनाक पनडुब्बियां बंगाल की खाड़ी की तरफ निकलने वाली हैं।’ INS विक्रांत, भारतीय नेवी का वो तैरता हुआ विमान वाहक पोत है, जिसपर 30 लड़ाकू विमान और करीब 1600 सैनिक तैनात हो सकते हैं। 1943 में इसे ब्रिटिश रॉयल नेवी के लिए तैयार किया गया था, जिसे 1957 में भारत ने खरीद लिया। इसी INS विक्रांत के बूते भारत ने पश्चिमी पाकिस्तान से पूर्वी पाकिस्तान जाने वाले समुद्री रास्ते की नाकेबंदी कर रखी थी। पाकिस्तान छटपटा रहा था। वह किसी भी कीमत पर विक्रांत को डुबाना चाहता था, ताकि वो पूर्वी पाकिस्तान तक आसानी से रसद और सैनिक भेज सके। 8 नवंबर 1971, दिल्ली से करीब एक हजार किलोमीटर दूर कराची का एक आलीशान गोल्फ कोर्स। पाकिस्तान नेवी के सबसे काबिल पनडुब्बी कमांडर, जफर खान, शॉट लगाने ही वाले थे कि एक रनर हांफता हुआ आया। ‘सर, हेडक्वार्टर से बुलावा आया है। फौरन चलिए।’ हेडक्वार्टर पहुंचते ही कमांडर जफर के सामने नक्शा फैला दिया गया। एक एडमिरल ऑफिसर ने कहा- ‘INS विक्रांत को तबाह करना है। सबकी छुट्टियां कैंसिल। 10 दिन के भीतर कूच कर जाओ।’ 14 नवंबर को कमांडर जफर पाकिस्तान की सबसे घातक पनडुब्बी PNS गाजी को लेकर कराची से निकले। 18 नवंबर को श्रीलंका में डीजल भरवाया। 20 नवंबर को वे चेन्नई के तट की तरफ बढ़ने ही वाले थे कि कराची से नया संदेश आ गया- ‘अब विक्रांत मद्रास में नहीं है।’ इसी दौरान, विशाखापट्टनम के बाजारों में अजीब हलचल शुरू हो गई। अचानक भारी मात्रा में राशन, टनों मांस और सब्जियां खरीदी जाने लगीं। ‘इतनी बड़ी रसद तो INS विक्रांत के लिए ही मांगा जा सकता है।’ पाकिस्तानी जासूसों के कान खड़े हो गए। उन्होंने फौरन कराची मैसेज भेजा- ‘विक्रांत विशाखापट्टनम में है।’ अब पाकिस्तान से कमांडर जफर को नया हुक्म मिला- ‘फौरन रुख बदलो, विक्रांत विशाखापट्टनम में है।’ 1 दिसंबर 1971, घड़ी में रात के 11 बजकर 45 मिनट हुए थे। पाकिस्तानी पनडुब्बी गाजी विशाखापट्टनम बंदरगाह के मुहाने पर आकर गहरे समंदर में छुप गई। कमांडर ने तय किया कि जब तक उन्हें विक्रांत नजर नहीं आता, वो सतह पर नहीं आएंगे। 48 घंटे बीत गए। गाजी में डीजल से बैटरियां चार्ज की जा रही थीं, जिसकी वजह से खतरनाक हाइड्रोजन गैस रिलीज हो रही थी। पनडुब्बी के अंदर हाइड्रोजन जमा होता जा रहा था। मेडिकल अफसर गुहार लगा रहे थे कि हाइड्रोजन बाहर निकालने के लिए सतह पर जाना होगा, पर जफर के सिर पर मिशन का भूत सवार था। उन्होंने चीखते हुए कहा, ‘गाजी जैसी विशाल पनडुब्बी दिन के उजाले में ऊपर आई, तो हिंदुस्तानी हमें जिंदा चबा जाएंगे।’ वक्त गुजरता गया। फिर आई 3 दिसंबर 1971 की रात। करीब 12 बजे ऑल इंडिया रेडियो पर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की आवाज गूंजी- ‘पाकिस्तान ने भारत पर हमला कर दिया है।’ उनका भाषण चल ही रहा था कि 12 बजकर 15 मिनट पर विशाखापट्टनम समंदर में जोरदार धमाका हुआ। आस-पास के मकानों की खिड़कियों के शीशे चकनाचूर हो गए। लोग सहम गए कि पाकिस्तान ने बमबारी कर दी है। लेकिन, अगली सुबह पता चला कि PNS गाजी खुद ही विस्फोट होकर तबाह हो गई है। मछुआरों को उसका मलबा मिला था। इस तरह भारत ने ना सिर्फ INS विक्रांत को बचाया बल्कि पाकिस्तानी नेवी के कई ठिकानों को तबाह कर दिया। पश्चिमी पाकिस्तान से पूर्वी पाकिस्तान के समुद्री रास्ते पर भारत की नाकेबंदी के आगे पाक की एक न चली। 16 दिसंबर 1971, 90 हजार सैनिकों के साथ पाकिस्तान ने भारत के आगे सरेंडर कर दिया। पाकिस्तान के दो टुकड़े हुए और दुनिया के नक्शे पर एक नया देश जन्मा- 'बांग्लादेश।' यह सबकुछ हुआ उस खुफिया मैसेज की बदौलत जिसे कश्मीर की एक लड़की सहमत ने जानपर खेलकर पाकिस्तान से भेजा था। सहमत ने जासूसी के लिए पाकिस्तानी फौजी से शादी की थी। आज कहानी उसी सहमत की… कश्मीर के रहने वाले हिदायत खान और पंजाब की रहने वाली सिख परिवार की तेज ने प्रेम विवाह किया। परिवार से बगावत करके। दो साल बाद उनको बेटी हुई। नाम रखा- सहमत। हिदायत बिजनेसमैन थे। उनका कपड़ों का कारोबार पाकिस्तान तक फैला था। उन दिनों पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर में आना-जाना, कारोबार और शादी-ब्याह आम था। हिदायत कश्मीरी पश्मीना शॉल भी बेचते थे, जो रईस फौजियों की पहली पसंद थी। लिहाजा फौज में हिदायत की ठीक-ठाक पैठ बन गई थी। बड़े अफसरों तक गुपचुप शराब पहुंचाना और उनके साथ उठना-बैठना, हिदायत की इसी पैठ का हिस्सा था। उधर, 1965 की जंग में मात खाने के बाद पाकिस्तान भारत से बदला लेने की योजना बना रहा था। RAW को भनक लग चुकी थी। उसे सरहद पार ऐसे शख्स की तलाश थी, जो पाकिस्तानी फौज की गतिविधियों से आगाह कर सके। RAW की नजर जाकर टिकी- हिदायत खान पर। RAW के अफसर पहले से उनके काम पर नजर रखे हुए थे। एक शाम RAW के कुछ अफसर हिदायत के घर पहुंचे। हिदायत से देश की सुरक्षा का वास्ता देकर मदद मांगी। शुरुआत में हिदायत हिचकिचाए, पर बाद में हामी भर दी। उन्हें ट्रेनिंग दी गई। जल्द ही, हिदायत ने लाहौर, इस्लामाबाद और मुल्तान में अपना जाल बिछा दिया। RAW को सटीक और अहम इनपुट्स मिलने लगे। पत्नी तेज भी इस खतरनाक मिशन में शौहर के साथ खड़ी रहीं। सब कुछ ठीक चल रहा था, फिर एक रोज पता चला कि हिदायत को कैंसर हो गया है। परिवार के साथ-साथ RAW के लिए भी यह बहुत बड़ा सेटबैक था। पूर्व नेवी ऑफिसर हरिंदर सिंह सिक्का अपनी किताब ‘कॉलिंग सहमत’ में लिखते हैं- 'एक रोज RAW के कुछ अफसर हिदायत के घर पहुंचे। कमरे में तेज भी मौजूद थीं। एक अफसर ने हिदायत के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ‘अमेरिका में एक बड़े डॉक्टर से बात की है। तुम वहां जाओ और इलाज कराओ।’ हिदायत ने थकी हुई मुस्कान के साथ सिर हिलाया, ‘मेरा बचना मुश्किल है साहब... अब हमें कोई ऐसा भरोसेमंद इंसान चाहिए, जो मेरी जगह ले सके।’ थोड़ी देर बाद… हिदायत ने आंखें घुमाईं। भारी, कांपती हुई आवाज में तेज की तरफ देखा। ‘हमारी सहमत इस काम के लिए कैसी रहेगी?’ हिदायत के मुंह से अपनी जवान बेटी का नाम सुनते ही तेज सिसकने लगीं। RAW के अफसर बुत बने यह सब देख रहे थे। हिदायत ने तेज के बहते आंसूओं को देखा, लेकिन इरादा नहीं बदला। उन्होंने जोर देकर कहा- 'सहमत मेरा खून है। पाकिस्तान के लोग आसानी से मान लेंगे कि हिदायत की तबीयत बिगड़ने के बाद बेटी कारोबार संभाल रही है। किसी को शक भी नहीं होगा।’ तेज इस फैसले के खिलाफ थी... लेकिन हिदायत की आखिरी इच्छा के सामने, अपना विरोध जता नहीं पाई। इधर, सहमत दिल्ली में अपनी दुनिया में मगन थी। कॉलेज के एक नाटक में उसने मीराबाई का रोल किया था। उसका किरदार सबकी जुबान पर था। अभिनव नाम के एक लड़के को वो पसंद करने लगी थी। दोनों प्यार का इजहार भी कर चुके थे। उस रोज सहमत का आखिरी पेपर था। वह हॉल से निकली ही थी कि एक आदमी उसके पास आया और सीलबंद लिफाफा देकर चला गया। सहमत ने मुस्कुराकर सोचा- ‘अभिनव ने कोई हरकत की होगी, मगर जैसे ही उसकी निगाह लिफाफे पर लिखे भेजने वाले के पते पर गई, वह घबरा गई। कांपते हाथों से उसने लिफाफा खोला। अंदर हवाई जहाज का टिकट था और एक पर्ची, जिस पर लिखा था- ‘जल्द श्रीनगर पहुंचो।’ दिल में एक अनजाना खौफ लिए वह उसी वक्त रवाना हो गई। जब वो श्रीनगर पहुंची, तो मालूम हुआ कि पिता बीमार हैं। बचने की उम्मीद ना के बराबर है। सहमत गुमसुम एक कुर्सी पर सिर झुकाए बैठी थी। अचानक मां की आवाज गूंजी- ‘तुम्हें पाकिस्तान जाना है।’ सहमत का खून जम गया। वह हकलाते हुए बोली, ‘पाकिस्तान… पाकिस्तान क्यों, अम्मी?’ तेज ने आगे बढ़कर सहमत के कांपते हुए कांधे पर हाथ रखा। धीरे से कहा- ‘तुम्हारे पापा पाकिस्तान में बिजनेस के साथ-साथ देश के लिए भी काम करते थे। खुफिया जानकारियां RAW को भेजते थे। अब उनका काम तुम्हें संभालना होगा।' 'पापा का इतना खतरनाक काम मैं कैसे संभाल सकती हूं?' सहमत ने झिककते हुए मां से पूछा। तेज ने समझाते हुए कहा- ‘RAW वाले तुम्हें ट्रेनिंग दे देंगे।’ सहमत खामोश रही। उसके दिल के अंदर एक तरफ अभिनव का चेहरा था, तो दूसरी तरफ पिता का गिरता हुआ साया। उसने लंबी सांस भरी और हिम्मत जुटाकर कहा- ‘मां… मुझे दिल्ली में एक लड़के से मोहब्बत हो गई है। हम एक-दूसरे को जुबान दे चुके हैं। मैं इस तरह पाकिस्तान नहीं जा सकती।’ सहमत को लगा कि मां का दिल पसीज जाएगा, पर तेज का जवाब सुनकर वो बेजुबान सी पड़ गई। तेज ने कहा- ‘बेटा, तुम्हारे बाप ने देश के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया… और तुम इश्क-मोहब्बत के फेर में पड़ी हो। मोहब्बत ही करनी है, तो इस पाक मिट्टी से करो, मुल्क से करो।’ हरिंदर सिंह सिक्का लिखते हैं- ‘सहमत के लिए एक साथ पिता और प्यार, दोनों को खोना किसी सदमे से कम नहीं था, पर वो मां के फैसले का विरोध नहीं कर पाई। वह आखिरी बार अभिनव से मिली। यह जानते हुए भी कि वो जिस मिशन पर जा रही है, उसकी सीक्रेसी ही सबकुछ है, उसने अभिनव को सब बता दिया। एक महीने बाद हिदायत की मौत हो गई। अगला महीना सहमत ने दिल्ली के लाल किले में बिताया। जहां हर रोज उसे 12 घंटे ट्रेनिंग दी जाती थी। ट्रेनिंग पूरी होने के बाद उसकी शादी पाकिस्तान के लाइट इनफेंट्री में कैप्टन इकबाल से कर दी गई। दरअसल, रावलपिंडी के रहने वाले कैप्टन इकबाल के पिता ब्रिगेडियर सईद बंटवारे से पहले हिदायत के क्लासमेट रह चुके थे। दोनों दोस्त थे। ब्रिगेडियर सईद भी इस शादी से खुश थे। उनकी नजर हिदायत की बनाई संपत्ति पर थी, जिसकी इकलौती वारिस सहमत थी।’ वक्त गुजरता गया। अपने कामों से सहमत सईद परिवार पर अपनी छाप छोड़ रही थी। एक बार कराची बंदरगाह पर किसी इंपोर्टर का माल जब्त हो गया। उस पर इतना जुर्माना लगा कि व्यापारी ने उसे लेने से मना कर दिया। सहमत ने कुछ खरीदारों के साथ मिलकर सारा माल खरीद लिया। इस सौदे से सईद के परिवार को मोटा मुनाफा हुआ। इसके बाद ब्रिगेडियर अहम मसलों पर सहमत की सलाह लेने लगे। धीरे-धीरे इन मसलों में पाकिस्तानी सेना के मामले भी शामिल हो गए, लेकिन ब्रिगेडियर का नौकर अब्दुल, शुरुआत से ही सहमत पर शक करता था। उस पर नजर भी रखता था। सहमत अपनी चाल चलना शुरू कर चुकी थी। अब उसे तलाश थी एक ऐसे महफूज ठिकाने की, जहां वो खुफिया ट्रांसमीटर लगा सके। ट्रांसमीटर पर मोर्स कोड के जरिए मैसेज भेजे जाते हैं, जो बीप से चलते हैं। तभी सहमत की नजर ब्रिगेडियर के कमरे में रखे दो बड़े फोटो फ्रेम पर पड़ी। उसने फ्रेम में ट्रांसमीटर सेट कर दिया और वॉशरूम से उसे कंट्रोल करने लगी। उसने वॉशरूम को ऑपरेशन रूम जैसा बना दिया था। वहां से खुफिया जानकारी भेजने के साथ वो इमरजेंसी कॉल भी कर सकती थी। एक रोज की बात है। सूरज ढलने को था। स्टडी रूम में ब्रिगेडियर सईद परेशान हाल में कुर्सी पर बैठे थे। माथे की लकीरें उनकी अंदरूनी घबराहट को साफ बयां कर रही थीं। तभी सहमत चाय की प्याली लेकर कमरे में पहुंची, तो ससुर के चेहरे पर छाई बेबसी को भांप गई। सहमत ने आहिस्ता से प्याली मेज पर रखते हुए पूछा, ‘अब्बू जान, सब खैरियत तो है? आप काफी परेशान लग रहे हैं।’ ‘क्या बताऊं बेटी... यूनिट का एनुअल इंस्पेक्शन सिर पर है। इस बार खुद जनरल कमांडिंग ऑफिसर, यानी जीओसी लेफ्टिनेंट जनरल अमीर खान मुआयना करने आ रहे हैं। बेहद सख्त और क्रूर मिजाज के अफसर हैं। जरा सी चूक हुई कि पूरा करियर तबाह।’ सहमत ने ढांढस बंधाते हुए बड़े भरोसे से कहा, ‘मायूस मत होइए अब्बू जान, मैं कुछ करती हूं। सब ठीक हो जाएगा।’ अगली सुबह, सहमत ने काले रंग का बुर्का ओढ़ा और घर से यह कहकर निकली कि वह नमाज के लिए जामा मस्जिद जा रही है, लेकिन उसकी मंजिल हवेली की नजरों से दूर शहर के एक कोने में बना टेलीफोन बूथ था। सड़क पर नजरें दौड़ाते हुए वह बूथ के भीतर दाखिल हुई, रिसीवर उठाया और दिल्ली का एक खुफिया नंबर घुमा दिया- ‘मुझे जीओसी लेफ्टिनेंट जनरल अमीर खान का पूरा ब्योरा चाहिए। परिवार, शौक, कमजोरियां... मुझे सबकुछ जानना है। कल ठीक इसी वक्त दूसरे बूथ से फोन करूंगी।’ अगले दिन, सहमत एक दूसरे इलाके के टेलीफोन बूथ पर पहुंची। उसने जैसे ही संपर्क साधा, सरहद पार बैठे उसके हैंडलर ने पूरी फाइल तैयार रखी थी। RAW की सीक्रेट फाइलों को खंगालने के बाद जो कड़ियां जोड़ी गई थीं, उनमें जनरल अमीर खान की एक दिलचस्प कमजोरी सामने आई। हैंडलर ने कोड वर्ड में बताया- ‘जनरल खान मछलियों के दीवाने हैं।’ सहमत ने रिसीवर क्रेडल पर रखा और बुर्के के भीतर ही मुस्कुरा दी। अगले दिन सहमत पति के दफ्तर पहुंची। कैप्टन इकबाल ने देखा कि वो दीवार पर लगे नक्शे पर लाल स्याही से घेरे बना रही है। उसने चिल्लाते हुए कहा- इस नक्शे को क्यों बिगाड़ रही हो। अब्बा हुजूर को पता चला, तो नाराज होंगे।’ सहमत बोली- ‘अब्बा हुजूर से ही मिलने आई हूं। आप मुझे वहां ले चलोगे?’ इकबाल कुछ बोल पाता, उससे पहले ही सहमत दफ्तर से निकलकर गाड़ी में बैठ गई। ड्राइवर से कहा- 'मुझे ब्रिगेडियर सईद साहब के दफ्तर ले चलो।' ‘अब्बा हुजूर क्या मैं अंदर आ सकती हूं…’ दरवाजे पर खड़ी सहमत को देखकर ब्रिगेडियर चौंक गए। उन्होंने उसे अंदर बुलाया। सहमत, ब्रिगेडियर को एक दीवार की तरफ ले गई, जिस पर सेना का नक्शा टंगा था। उसने उंगली से इशारा किया कि इंस्पेक्शन यहां से शुरू होगा और यहां खत्म होगा। अगले आधे घंटे तक ब्रिगेडियर उसकी बातों को चुपचाप सुनते रहे। फिर सोचने लगे कि सहमत ठीक ही कह रही है। ऐसा ही करना चाहिए। इंस्पेक्शन वाले दिन ब्रिगेडियर ने जीओसी से कहा- ‘सर हमने ड्रिल में बदलाव किया है। अफसरों के साथ टी ब्रेक झील के पास होगा।’ ‘ ऐसा क्यों किया?’ जीओसी ने गुस्से से पूछा.... ‘सर, इस झील में मछलियां भरी पड़ी हैं। आप खाली वक्त मछली पकड़ने में बिता सकते हैं।’ ब्रिगेडियर ने जवाब दिया। तय दिन पर ड्रिल शुरू हुई। जनरल अमीर खान की नजरें जवानों की परेड से ज्यादा उस झील पर टिकी थीं। जैसे ही उन्होंने पानी में तैरती रंग-बिरंगी मछलियों का झुंड देखा, किसी बच्चे की तरह चहक उठे। उन्होंने तुरंत ब्रिगेडियर सईद की तरफ मुड़कर कहा, ‘सईद साहब! अब कोई इंस्पेक्शन-विंस्पेक्शन नहीं होगा। बस, कुछ जिंदा मछलियां मेरे घर भिजवा दीजिए और बाकी का इंतजाम आज रात के डिनर के लिए रखिए!’ रात ढलते ही जनरल के सम्मान में एक शानदार दावत रखी गई। पूरे डिनर की कमान सहमत ने अपने हाथों में ले रखी थी। उसने शेफ से लेकर परोसने वाले तक, हर चीज पर खुद नजर रखी। मेज पर सजी हर डिश में जनरल की पसंद का ख्याल रखा। स्टार्टर से लेकर मेन कोर्स तक, हर एक निवाले में मछली का लाजवाब जायका था कि जनरल अमीर खान उंगलियां चाटने पर मजबूर हो गए। सहमत की मेहमाननवाजी ने जनरल का दिल जीत लिया था। डिनर के बाद, जनरल अमीर खान सहमत के पास आए। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, ‘माशाल्लाह! तुम्हारी इस आवाभगत ने दिल खुश कर दिया। तुम्हारे परिवार को एक शानदार इनाम मिलना चाहिए।’ सहमत की धड़कनें तेज हो गईं। वह चाहती थी कि उसका कोई अपना, जनरल के बेहद करीब पहुंच जाए, ताकि सेना की सीक्रेट फाइलों तक पहुंच आसान हो सके, लेकिन एक मंझी हुई खिलाड़ी की तरह उसने चेहरे पर कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई और खामोश रही। जनरल ने दोबारा पूछा, ‘संकोच मत करो। जो भी दिल में है, साफ-साफ कह दो। भरोसा रखो, मैं तुम्हें मायूस नहीं करूंगा।’ सहमत ने पलकें झुकाईं, आवाज को बेहद धीमा और संजीदा किया, और बस दो लफ्ज कहे- ‘कैप्टन इकबाल।’ कैप्टन इकबाल यानी सहमत के शौहर। जनरल अमीर खान ने गर्मजोशी से सहमत का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा, ‘बस इतनी सी बात? समझो काम हो गया।’ कैप्टन इकबाल का प्रमोशन हो गया। अब जनरल के दफ्तर की हर हरकत, हर फाइल और हर हलचल अनजाने में ही सही, कैप्टन इकबाल के जरिए सहमत के बेडरूम तक पहुंचने लगी। ***** पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI को भनक लग चुकी थी कि गद्दार ब्रिगेडियर सईद की हवेली में ही है। सहमत जान गई थी कि उसका राज कभी भी खुल सकता है। नौकर अब्दुल को वो रास्ते से हटा चुकी थी। एक रोज उसका सामना शौहर इकबाल से हुआ। इकबाल कुछ कह पाता उससे पहले ही सहमत ने रिवॉल्वर की नोक उसके माथे पर टिका दी। पूरी कहानी कल यानी रविवार को पढ़िए 'जासूस सहमत' पार्ट-2…
ईरान की चेतावनी : होर्मुज में नए समुद्री मार्ग बिना तालमेल के सुरक्षित नहीं
होर्मुज स्ट्रेट को लेकर ईरान ने साफ कर दिया है कि इस क्षेत्र में सुरक्षित समुद्री आवाजाही के लिए उसके साथ सीधा तालमेल जरूरी है। सुरक्षा को नजरअंदाज करके बनाए गए किसी भी वैकल्पिक रास्ते को वह स्वीकार नहीं करेगा।
वियना में भारतीय राजदूत शंभू कुमारन ने की ऑस्ट्रियाई सांसदों के साथ द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा
भारत के ऑस्ट्रिया में राजदूत शंभू एस. कुमारन ने ऑस्ट्रियाई संसद के इंडिया फ्रेंडशिप ग्रुप के सदस्यों से मुलाकात की और दोनों देशों के बीच बढ़ते संबंधों पर चर्चा की।
ट्रंप का यूरोप को अल्टीमेटम – डिजिटल टैक्स लगाया तो लगेगा 100% टैरिफ
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी दी। ट्रंप की यह चेतावनी उन संभावनाओं पर जारी की गई
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के महानिदेशक राफेल ग्रॉसी ने कहा कि परमाणु निगरानी संस्था ने ईरानी अधिकारियों के साथ परमाणु निरीक्षण को लेकर शुरुआती बातचीत की है।
वेनेजुएला में बुधवार शाम आए दो शक्तिशाली भूकंपों में मरने वालों की संख्या बढ़कर 235 हो गई है। स्वास्थ्य मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार, मृतकों की संख्या पहले बताए गए 32 से बढ़कर 235 हो गई है।
ताइवान पर अमेरिका का दोहराया भरोसा, हथियार पैकेज समीक्षा में
अमेरिका की ट्रंप सरकार ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि ताइवान को लेकर उसकी लंबे समय से चली आ रही नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है
भूकंप से तबाह वेनेजुएला को IMF का भरोसा
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने वेनेजुएला में आए विनाशकारी भूकंप से प्रभावित लोगों के प्रति दुख और संवेदना जताई
जापान में भारत की राजदूत नगमा मलिक की सीनेट अध्यक्ष से मुलाकात, द्विपक्षीय संबंधों पर हुई चर्चा
भारत की जापान में राजदूत नगमा मलिक ने नेशनल डाइट भवन में सीनेट प्रेसिडेंट सेकिगुची मसाकाजू से शिष्टाचार मुलाकात की। इस वार्ता के दौरान दोनों देशों के बीच संबंधों को और आगे बढ़ाने के तरीकों पर विचार-विमर्श किया गया।
तीस्ता नदी जल प्रबंधन को लेकर एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने भारत की सुरक्षा चिंताओं को फिर से हवा दे दी है। चीन और बांग्लादेश ने आधिकारिक रूप से तीस्ता नदी सहित अन्य प्रमुख जल परियोजनाओं के प्रबंधन में आपसी सहयोग को और अधिक गहराई देने पर सहमति जताई है। यह समझौता तब हुआ जब बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की बीजिंग में चीन के जल संसाधन मंत्री ली गुओयिंग के साथ उच्च-स्तरीय मुलाकात हुई। इस साझेदारी के बाद अब चीन की मौजूदगी भारत के बेहद संवेदनशील 'सिलीगुड़ी कॉरिडोर' (चिकन नेक) के करीब और अधिक सघन होने की आशंका जताई जा रही है।चीन का 'तीस्ता प्लान' और सुरक्षा समीकरणचीन पिछले काफी समय से 'तीस्ता नदी व्यापक प्रबंधन और बहाली परियोजना' (Teesta River Comprehensive Management and Restoration Project) में भारी निवेश करने की इच्छा जाहिर कर रहा है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजना केवल जल प्रबंधन तक सीमित नहीं है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जो भारत की मुख्य भूमि को उत्तर-पूर्वी राज्यों से जोड़ने वाली एकमात्र कड़ी है, उसके इतने करीब चीन का तकनीकी और बुनियादी ढांचा विकसित होना भारत के लिए रणनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। बीजिंग की इस रुचि को अक्सर 'डेब्ट ट्रैप' और सैन्य विस्तार के प्रयासों के रूप में देखा जाता है।बांग्लादेश को तकनीक और ट्रेनिंग का वादामुलाकात के दौरान, बांग्लादेशी प्रधानमंत्री ने जल संसाधन प्रबंधन, नदी के कटाव को रोकने, सिंचाई तंत्र को मजबूत करने और जल परिवहन को बढ़ावा देने के लिए चीन से तकनीकी और आर्थिक सहायता की मांग की। चीन ने न केवल इन परियोजनाओं में पूरा सहयोग देने का आश्वासन दिया है, बल्कि बांग्लादेशी अधिकारियों को अपने यहां जल प्रबंधन का विशेष प्रशिक्षण देने के लिए भी आमंत्रित किया है। 2005 के द्विपक्षीय समझौतों की नींव पर खड़ी यह नई साझेदारी चीन के लिए दक्षिण एशिया में अपनी पैठ बढ़ाने का एक बड़ा जरिया बन गई है। भारत के लिए अब यह कूटनीतिक और भू-राजनीतिक स्तर पर एक बड़ी परीक्षा होगी कि वह अपने पड़ोसी के साथ इस संवेदनशील मुद्दे को कैसे संभालता है।
इटली की प्रधानमंत्री जार्जिया मेलोनी का भारत के प्रति लगाव किसी से छिपा नहीं है। हाल ही में उनकी नई पुस्तक 'जार्जिया विजन' (Giorgia Vision) बाजार में आई है, जिसमें मेलोनी ने साल 2023 की अपनी भारत यात्रा के दौरान के ऐसे पलों का जिक्र किया है, जो किसी फिल्म के दृश्य जैसे लगते हैं। मेलोनी ने बताया कि जब वह भारत पहुंचीं, तो नई दिल्ली की सड़कों पर उनके स्वागत में लगे पोस्टरों की बाढ़ देखकर न केवल वह, बल्कि उनका प्रतिनिधिमंडल भी दंग रह गया था।दिल्ली की सड़कों पर लगे पोस्टरों ने बदला मूडअपनी पुस्तक में मेलोनी ने याद करते हुए लिखा कि जैसे ही वह दिल्ली की सड़कों से गुजरीं, उन्होंने हर तरफ अपनी तस्वीरों वाले 'वेलकम' पोस्टर देखे। वापसी के समय भी, उन पोस्टरों को 'यात्रा के लिए धन्यवाद' में बदल दिया गया था। इस दृश्य को देखकर इटली के उपप्रधानमंत्री एंतोनियो तजानी ने मजाकिया लहजे में टिप्पणी की, मेलोनी, अगर आप दिल्ली की किसी भी सीट से चुनाव लड़तीं, तो आपको कम से कम 10 लाख वोट तो मिल ही जाते! यह टिप्पणी उस समय उनके साथ मौजूद पूरे दल के लिए हंसी का सबब बन गई थी।'मेलोडी' जोड़ी और कूटनीति का नया अंदाजजार्जिया मेलोनी 2023 में दो बार भारत आईं—पहली बार रायसीना डायलॉग के लिए और दूसरी बार जी20 शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी केमिस्ट्री ने न केवल राजनीतिक गलियारों में, बल्कि सोशल मीडिया पर भी खूब चर्चा बटोरी। इंटरनेट की दुनिया में लोगों ने इस जोड़ी को प्यार से 'मेलोडी' (Meloni + Modi) नाम दिया था। पुस्तक के अध्याय 'हेड हेल्ड हाई अमंग द वर्ल्ड ग्रेट्स' में मेलोनी ने इस बात पर जोर दिया है कि कूटनीति केवल औपचारिक बैठकों और कागजी समझौतों तक सीमित नहीं है, बल्कि नेताओं के बीच के व्यक्तिगत रिश्ते ही विश्व मंच पर सबसे बड़े बदलाव लाते हैं।सिगरेट वाला वो यादगार लम्हाअपनी किताब में मेलोनी ने सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि अन्य वैश्विक नेताओं के साथ बिताए अपने अनौपचारिक पलों को भी साझा किया है। उन्होंने ट्यूनीशिया के राष्ट्रपति कैस सईद के साथ अपनी मुलाकात का जिक्र करते हुए एक दिलचस्प वाकया बताया। जब दो घंटे की लंबी बातचीत के बाद माहौल थोड़ा सहज हुआ, तो उन्होंने सईद से पूछा कि क्या वह सिगरेट पी सकती हैं? मेलोनी के इस सवाल ने माहौल को पूरी तरह बदल दिया और सईद ने भी अपनी सिगरेट निकाली। यह पल उनकी पुस्तक में एक ऐसे मानवीय रिश्ते के रूप में दर्ज है जो औपचारिक सीमाओं को तोड़ देता है। अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस द्वारा लिखित भूमिका वाली यह पुस्तक अब दुनिया भर में चर्चा का विषय बनी हुई है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए ईरान के साथ चल रहा तनाव अब केवल बाहरी मोर्चे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह उनकी अपनी रिपब्लिकन पार्टी के भीतर एक बड़े राजनीतिक संकट के रूप में उभर रहा है। बुधवार को बंद कमरे में हुई एक बैठक के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप और रिपब्लिकन सीनेटर बिल कैसिडी के बीच हुई तीखी बहस ने पार्टी के भीतर की दरार को सार्वजनिक कर दिया है। इस टकराव का मुख्य केंद्र ट्रंप प्रशासन द्वारा ईरान युद्ध के खर्च के लिए कांग्रेस से मांगी गई 70 अरब डॉलर की भारी-भरकम राशि और तेहरान के साथ हुई हालिया रूपरेखा समझौते की शर्तें हैं।समझौते पर छिड़ा घमासान: क्या सच छिपाया जा रहा है?सीनेटर बिल कैसिडी ने ट्रंप प्रशासन पर तीखे हमले करते हुए ईरान के साथ हुए उस हालिया समझौते पर स्पष्टीकरण मांगा है, जिसमें तेहरान को वित्तीय प्रोत्साहन देने की बात कही गई है। कैसिडी का स्पष्ट मानना है कि यह समझौता उन लक्ष्यों से काफी पीछे है जो युद्ध शुरू होने के समय प्रशासन ने जनता के सामने रखे थे। उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में दो टूक कहा कि अमेरिकी नागरिकों को सच्चाई जानने का पूरा अधिकार है और फिलहाल जमीनी हालात उन दावों से मेल नहीं खाते जो सरकार द्वारा किए जा रहे हैं। नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के मद्देनजर, यह घरेलू असंतोष ट्रंप के लिए एक बड़ी राजनीतिक चुनौती बनता जा रहा है।सीनेट में देर रात तक चली रस्साकशीट्रंप के साथ बैठक के तुरंत बाद, सीनेट में रिपब्लिकन नेतृत्व ने युद्ध को समाप्त करने से जुड़े 'युद्धाधिकार प्रस्ताव' को रोकने के लिए एक बड़ा दांव खेला। देर रात हुए मतदान में 50 मतों के साथ इस प्रस्ताव को आगे बढ़ने से रोक दिया गया, जबकि 47 सीनेटरों ने इसके समर्थन में वोट डाला। हालांकि, ट्रंप प्रशासन के इस प्रयास के बावजूद उनकी अपनी पार्टी की सीनेटर सुसान कोलिन्स और लिसा मर्कोव्स्की जैसे प्रमुख चेहरों ने डेमोक्रेट सांसदों के साथ खड़े होकर ट्रंप की नीतियों पर सवाल उठाए हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया पर इस मतदान को ईरान के लिए एक कड़ा संदेश करार दिया है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह स्पष्ट है कि ईरान युद्ध के मुद्दे पर व्हाइट हाउस को अपने ही घर में कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की वैश्विक लोकप्रियता में भारी गिरावट दर्ज की गई है। प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा जारी एक ताजा सर्वे के नतीजे यह बताते हैं कि दुनिया भर में उनकी नीतियों और उनके नेतृत्व शैली पर भरोसा करने वालों की संख्या बहुत कम हो गई है। सर्वे के आंकड़ों के अनुसार, करीब 76% लोगों ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि उन्हें वैश्विक मामलों को संभालने में ट्रंप के नेतृत्व पर कोई भरोसा नहीं है। यह रिपोर्ट ट्रंप प्रशासन के लिए एक बड़ा कूटनीतिक संकेत है, जो यह दर्शाता है कि उनकी 'अमेरिका फर्स्ट' नीति का असर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी छवि पर पड़ा है।सर्वे में सामने आए चौंकाने वाले आंकड़ेयह व्यापक सर्वे 36 देशों के 42,000 से अधिक लोगों के बीच किया गया, जिसमें ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग में बड़ी कमी देखी गई है। केवल 23% प्रतिभागियों ने ही वैश्विक मामलों के समाधान में ट्रंप पर अपना विश्वास जताया। सर्वे में शामिल 24 देशों में से 16 देशों में ट्रंप के प्रति भरोसा पिछले साल की तुलना में काफी कम हुआ है। खास बात यह है कि किसी भी प्रमुख देश में उनकी लोकप्रियता में बढ़ोतरी दर्ज नहीं की गई है। यूरोप के प्रमुख देशों जैसे जर्मनी, फ्रांस और ग्रीस में भी ट्रंप की रेटिंग अपने निचले स्तर पर पहुंच गई है, जो ट्रांस-अटलांटिक संबंधों में तनाव की ओर इशारा करती है।भारत में ट्रंप का प्रभाव और टैरिफ नीति की असफलताभारत की बात करें तो यहां तस्वीर थोड़ी अलग है, लेकिन गिरावट यहां भी साफ नजर आ रही है। सर्वे में 39% भारतीय प्रतिभागियों ने ट्रंप के नेतृत्व पर भरोसा जताया है, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा 51% था। इसी सर्वे में वैश्विक मामलों पर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के प्रति विश्वास जताने वाले भारतीयों की संख्या 51% रही। ट्रंप प्रशासन की 'टैरिफ नीति' वैश्विक स्तर पर सबसे ज्यादा अलोकप्रिय रही। सर्वे के अनुसार, महज 18% वैश्विक आबादी ने ही इस नीति का समर्थन किया। ब्रिटेन, कनाडा, जापान और जर्मनी जैसे विकसित देशों में तो इस नीति को समर्थन देने वालों का आंकड़ा 20% से भी काफी नीचे रहा। केवल केन्या एक ऐसा देश बनकर उभरा जहां ट्रंप की टैरिफ नीति को बहुसंख्यक लोगों (55%) का समर्थन मिला।
उइगर मुद्दे पर ट्रंप की चुप्पी, शी जिनपिंग संग बैठक बेनतीजा
हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके चीनी समकक्ष शी जिनपिंग के बीच हुई बैठक ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया है
सिर्फ शेयर ही क्यों? गोल्ड और डेट का ये कॉम्बो बनाएगा आपको अमीर
आज के दौर में जब शेयर मार्केट कभी रॉकेट बन जाता है तो कभी अचानक धड़ाम से नीचे गिर जाता है, ऐसे में अपने पूरे पैसे को सिर्फ एक ही जगह लगाना समझदारी नहीं है। समझदार निवेशक अब एक नया और सुरक्षित रास्ता चुन रहे हैं, जिसे Multi-Asset Investing कहा जाता है। अगर आप भी अपने निवेश पर बिना बड़ा जोखिम लिए बंपर रिटर्न कमाना चाहते हैं, तो यह स्मार्ट पोर्टफोलियो स्ट्रेटेजी आपके बहुत काम आने वाली है।क्या है मल्टी-एसेट इन्वेस्टिंग का असली गेम?मल्टी-एसेट इन्वेस्टिंग का सीधा सा मतलब है अपने पैसे को किसी एक टोकरी में रखने के बजाय अलग-अलग एसेट क्लास जैसे—इक्विटी (शेयर), डेट (फिक्स्ड इनकम/बॉन्ड्स) और गोल्ड (सोना) में बांट देना। जब शेयर मार्केट में गिरावट आती है, तो अक्सर सोना चमकने लगता है, और डेट फंड्स आपके पोर्टफोलियो को स्थिरता देते हैं। यह कॉम्बिनेशन आपके नुकसान के रिस्क को लगभग ना के बराबर कर देता है और लंबी अवधि में तगड़ा मुनाफा कमा कर देता है।इक्विटी, डेट और गोल्ड का परफेक्ट कॉम्बिनेशन कैसे बनाएं?एक आइडियल और स्मार्ट पोर्टफोलियो बनाने के लिए आपको अपनी उम्र और रिस्क लेने की क्षमता के हिसाब से एसेट्स का चुनाव करना चाहिए। एसेट एलोकेशन के इस नियम को आप आसानी से समझ सकते हैं:इक्विटी (शेयर बाजार): अपने पोर्टफोलियो का 50 से 60 फीसदी हिस्सा अच्छे शेयर्स या म्यूचुअल फंड्स में लगाएं, जो आपको लंबी अवधि में वेल्थ क्रिएशन (तगड़ा रिटर्न) करके देगा।डेट फंड्स (सुरक्षित निवेश): पोर्टफोलियो का 20 से 30 प्रतिशत हिस्सा डेट या सरकारी बॉन्ड्स में रखें। यह मार्केट के उतार-चढ़ाव के समय आपके पैसों को सुरक्षा देगा और रेगुलर इनकम का जरिया बनेगा।गोल्ड (सोना): कम से कम 10 से 15 फीसदी निवेश सोने (Digital Gold या SGB) में जरूर करें। संकट के समय सोना हमेशा सबसे बेहतरीन ढाल साबित होता है।रीबैलेंसिंग है सबसे जरूरी कदममल्टी-एसेट पोर्टफोलियो बनाने के बाद उसे भूलना नहीं है। साल में कम से कम एक बार अपने पोर्टफोलियो की समीक्षा यानी 'रीबैलेंसिंग' जरूर करें। उदाहरण के लिए, अगर शेयर मार्केट बहुत ज्यादा बढ़ गया है और आपके पोर्टफोलियो में इक्विटी का हिस्सा तय सीमा से ज्यादा हो गया है, तो मुनाफे का कुछ हिस्सा निकालकर उसे गोल्ड या डेट में शिफ्ट कर दें। यही स्मार्ट इन्वेस्टिंग का सबसे बड़ा सीक्रेट है।
24 जून की शाम 6 बजकर 4 मिनट। वेनेजुएला की धरती अचानक जोर से कांप उठी। ये रिक्टर स्केल पर 7.2 तीव्रता का भूकंप था। लोग संभलते, तब तक महज 38 सेकेंड बाद 7.5 तीव्रता का एक और भूकंप आ गया। ये Earthquake Doublet यानी जुड़वा भूकंप था। 26 मिनट बाद 15 हजार किमी दूर जापान में भी 6.9 तीव्रता का भूकंप आया। आखिर वेनेजुएला में क्यों आया ‘जुड़वा भूकंप’, क्या धरती के नीचे कोई चेन रिएक्शन चल रही और आगे क्या होगा; आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: ‘जुड़वा भूकंप’ क्या है और ये ज्यादा घातक क्यों होता है?जवाबः पहले जानिए कि भूकंप क्या है… अब बात Earthquake Doublet यानी जुड़वा भूकंप की… कभी-कभी एक ही फॉल्ट लाइन पर दो बार प्लेटों के टूटने से एनर्जी निकलती है और दोनों बार बड़े भूकंप आते हैं। इनका एपिसेंटर यानी उद्गम केंद्र एक-दूसरे के बहुत करीब होता है। किसी बड़े भूकंप के बाद एनर्जी की छोटी-छोटी लहरें उठना, यानी आफ्टरशॉक सामान्य है, लेकिन जुड़वा भूकंप कम देखने को मिलते हैं। क्योंकि एक बार एक फॉल्ट लाइन से एनर्जी रिलीज होने के बाद वहां दबाव कम हो जाता है। दोबारा उसी फॉल्ट लाइन से इतनी तेज एनर्जी नहीं निकलती। जुड़वा भूकंपों के बीच कुछ सेकेंड से लेकर कई सालों का अंतर हो सकता है। वेनेजुएला में ये महज 38 सेकेंड के भीतर आ गया। जुड़वा भूकंपों की रिक्टर स्केल पर तीव्रता लगभग बराबर होती है। आमतौर पर दोनों भूकंपों के बीच 0.2 से 0.5 पॉइंट्स का अंतर होता है। भूकंप वैज्ञानिक जूडिथ हबर्ड और काइल ब्रैडली कहते हैं कि 7.5 तीव्रता का भूकंप 7.2 तीव्रता के भूकंप की तुलना में लगभग तीन गुना ज्यादा एनर्जी रिलीज करता है। सवाल-2: वेनेजुएला में जुड़वा भूकंप क्यों आया? जवाबः वेनेजुएला के नीचे की बनावट समझिए... 25 जून को जो दोहरा भूकंप आया, उसका सेंटर ठीक उसी जगह था जहां वेनेजुएला की तीन बड़ी फॉल्ट लाइनें- ओका-अनकोन, एल पिलार और बोकोनो फॉल्ट आपस में मिलती हैं। भूकंप वैज्ञानिक जूडिथ हबर्ड और काइल ब्रैडली के मुताबिक, पहला भूकंप 7.2 तीव्रता का था। इसका झटका पूरी तरह खत्म होने में ही कई सेकेंड लग गए। इस दौरान फॉल्ट लाइन के साथ-साथ दरार दो डायरेक्शन में फैलती चली गई। पहले भूकंप की एनर्जी ने आसपास की चट्टानों में दबाव को फैलाया, जिससे फॉल्ट सिस्टम का एक और हिस्सा टूट गया और महज 38 सेकेंड बाद 7.5 तीव्रता का दूसरा भूकंप आ गया। दोनों वैज्ञानिकों का कहना है कि इन दो भूकंपों को एक ही बड़े भूकंप के दो 'पल्स' यानी झटकों की तरह भी देखा जा सकता है, जिनकी कुल एनर्जी मिलाकर करीब 7.6 तीव्रता के एक भूकंप के बराबर थी। सवाल-3: क्या वेनेजुएला में ये सदी का सबसे ताकतवर भूकंप है? जवाबः हां। अमेरिकी भूगर्भ सर्वेक्षण संस्था USGS के मुताबिक, 1900 के बाद से वेनेजुएला में आया यह सबसे ताकतवर भूकंप है। 29 अक्टूबर 1900 की सुबह वेनेजुएला के तट के पास 7.7 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया गया था। चूंकि उस दौर में आधुनिक उपकरण मौजूद नहीं थे, इसलिए यह तीव्रता नुकसान और असर की रिपोर्टों के आधार पर आंकी गई है। USGS की इम्पैक्ट रिपोर्ट के अनुसार, तब 21 लोगों की मौत हुई, 50 घायल हुए और पूरे शहर में गिरजाघर, विश्वविद्यालय, मीनारें और घर समेत ३०० इमारतें ढह गईं। 126 साल बाद आया भूकंप रिक्टर स्केल पर भले कुछ कम (7.2 और 7.5) लगे, लेकिन जान और माल का कई गुना ज्यादा नुकसान होने की आशंका है। सवाल-4: इस बार वेनेजुएला भूकंप में कितनी मौतों की आशंका है? जवाबः अमेरिकी भूगर्भ सर्वेक्षण यानी USGS का शुरुआती अनुमान है कि वेनेजुएला में 10 हजार से 1 लाख मौतों हो सकती हैं। हालांकि यह कोई पक्का आंकड़ा नहीं है। सूचनाओं के आधार पर ये अपडेट होता रहेगा। इस अनुमान के लिए USGS ने PAGER नाम के एक खास सिस्टम का इस्तेमाल किया। यह सिस्टम कई चीजें देखता है- भूकंप की तीव्रता, भूकंप के केंद्र की गहराई, उस इलाके की आबादी और पहले आ चुके ऐसे ही भूकंपों से तुलना करके यह अनुमान तैयार करता है। वेनेजुएला की ही तरह 6 फरवरी 2023 को तुर्किए में सीरियाई सीमा के पास जुड़वा भूकंप आया था। पहला सुबह करीब 4:17 बजे और फिर दूसरा भूकंप पहले एपिसेंटर से करीब 100 किमी दूर करीब 9 घंटे बाद आया। इसमें 60 हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे। अगस्त 2021 में दक्षिण अटलांटिक महासागर के साउथ सैंडविच आइलैंड में भी जुड़वा भूकंप आया था। तब 7.5 तीव्रता के भूकंप के करीब ढाई मिनट बाद 8.1 तीव्रता का दूसरा भूकंप आया था। हालांकि वो आबादी वाला इलाका नहीं था, इसलिए जान-माल का नुकसान कम हुआ। सवाल-5: क्या जापान में आए भूकंप का वेनेजुएला से कोई कनेक्शन है?जवाबः वेनेजुएला के तुरंत बाद करीब 15 हजार किमी दूर जापान में आए भूकंप का कोई सीधा संबंध नहीं है। इंडोनेशियन डिजास्टर एक्सपर्ट्स एसोसिएशन के मेंबर डॉ. डारियोनो के मुताबिक, धरती के भीतर रोजाना हजारों भूकंप आते हैं, जिनमें से कुछ ही महसूस होते हैं। खास बात ये है कि हर भूकंप का स्रोत अलग और दूर होता है। कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी की रिसर्च एसोसिएट और भूकंपविज्ञानी डॉ. लूसी जोन्स मानती हैं कि वेनेजुएला और जापान में आए भूकंपों के पीछे कोई 'चेन रिएक्शन' या एक-दूसरे को ट्रिगर करने वाली वजह नहीं है। ऐसा न होने के दो और फैक्टर जानिए… सवाल-6: वेनेजुएला में आगे क्या हो सकता है? जवाबः वेनेजुएला में लगातार 2 भूकंप आने के बाद 20 से ज्यादा आफ्टरशॉक्स दर्ज किए गए हैं। USGS ने आशंका जताई है कि वेनेजुएला में २५ जून की शाम ६.३० बजे तक 4 या उससे ज्यादा तीव्रता के करीब 26 भूकंप आ सकते हैं। इनमें से कम से कम एक की तीव्रता 5 या उससे ज्यादा होने की 89% संभावना है। भूकंपविज्ञान के 'ओमोरी लॉ' के मुताबिक, शुरुआती 24 से 48 घंटों में आफ्टरशॉक्स की संख्या और उनकी तीव्रता सबसे ज्यादा होती हैं। हां, एक आशंका है। लगातार 2 बड़े भूकंप झेलने के बाद जमीन के नीचे की टेक्टोनिक प्लेटों को पूरी तरह शांत और सेट होने में हफ्तों से लेकर कई महीनों तक का समय लग सकता है। अगर इस दौरान 5 तीव्रता के अफ्टरशॉक्स आए, तो वेनेजुएला को और ज्यादा तबाही झेलनी पड़ सकती है। क्योंकि वहां की इमारतें, इंफ्रास्ट्रक्चर पहले से ही कमजोर हो चुके हैं।------------- भूकंप से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए… वेनेजुएला में 39 सेकेंड में भूकंप के 2 बड़े झटके: 60 सेकेंड तक शहर हिलता रहा, अब तक 164 की मौत, 971 घायल वेनेजुएला में 39 सेकेंड में दो ताकतवर भूकंप से तबाही मच गई है। दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला में बुधवार शाम 6.04 बजे 7.2 और 6.05 बजे 7.5 तीव्रता के दो झटके आए। उस समय भारत में गुरुवार तड़के 3.34 और 3.35 बजे थे। भूकंप के बाद 60 सेकेंड तक शहर हिलता रहा। पूरी खबर पढ़िए…
विदेश यात्रा पड़ी भारी तो छिन सकता है स्थायी निवास, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
अगर आप अमेरिका में ग्रीन कार्ड होल्डर हैं और आप पर किसी भी तरह का आपराधिक मामला लंबित है, तो अब आपकी अंतरराष्ट्रीय यात्रा आपको भारी मुसीबत में डाल सकती है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ने ग्रीन कार्ड धारकों के लिए इमिग्रेशन के नियमों को बेहद सख्त बना दिया है। 'ब्लांच बनाम लाउ' (Blanch v. Lau) मामले में आए 6-3 के बहुमत के इस फैसले के बाद, सीमा अधिकारी अब लौटने वाले ग्रीन कार्ड धारकों को 'देश में प्रवेश चाहने वाले व्यक्ति' (Applicant for Admission) के रूप में मान सकते हैं, बजाय उन्हें स्वचालित रूप से प्रवेश देने के।क्या है फैसला और क्यों है यह खतरनाक?इस फैसले ने कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन (CBP) अधिकारियों को व्यापक अधिकार दे दिए हैं। अब अधिकारी केवल किसी लंबित आपराधिक आरोप या संदेह के आधार पर ही किसी ग्रीन कार्ड धारक को रोक सकते हैं, उनका ग्रीन कार्ड जब्त कर सकते हैं और उन पर निष्कासन (Deportation) की कार्यवाही शुरू कर सकते हैं। इमिग्रेशन विशेषज्ञों के अनुसार, इसका मतलब यह है कि आपको अमेरिका में प्रवेश करने के लिए अब वह अधिकार नहीं मिलेगा, जो पहले एक स्थायी निवासी को मिलता था। अब आप पर यह साबित करने का बोझ होगा कि आप अमेरिका में रहने के योग्य हैं।दुकान से चोरी जैसा छोटा अपराध भी बन सकता है 'मुसीबत'न्यूयॉर्क के जाने-माने इमिग्रेशन वकील साइरस डी. मेहता ने चेतावनी दी है कि अब आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे किसी भी व्यक्ति के लिए विदेश यात्रा करना जोखिम भरा है। यहां तक कि दुकान से चोरी (Shop-lifting) जैसे मामूली अपराधों के आरोप भी आपकी स्थायी नागरिकता और रोजगार के अधिकारों को खतरे में डाल सकते हैं। मेहता का स्पष्ट कहना है कि जब तक आपका केस पूरी तरह से सुलझ न जाए और आप दोषमुक्त न हो जाएं, तब तक अंतरराष्ट्रीय यात्रा से बचना ही सबसे सुरक्षित विकल्प है।साबित करना होगा खुद को 'निर्दोष'सिएटल की वकील कृपा उपाध्याय ने इस फैसले को इमिग्रेशन के दृष्टिकोण से 'गेम-चेंजर' बताया है। पहले के नियमों में सरकार को आरोपी के खिलाफ आरोप साबित करने होते थे, लेकिन अब स्थिति उलट गई है। यदि आपको सीमा पर हिरासत में लिया जाता है, तो 'निर्दोष साबित करने का बोझ' (Burden of Proof) अब आप पर होगा। यह स्थिति संवैधानिक सुरक्षा को कमजोर करती है और आपको लंबी कानूनी लड़ाई या हिरासत का सामना करना पड़ सकता है।यात्रा से पहले इमिग्रेशन वकील से सलाह लेंरेखा शर्मा-क्रॉफर्ड जैसे विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला 'निर्दोष होने की धारणा' को खत्म करता है। यदि आपके खिलाफ कोई भी पुरानी गिरफ्तारी, दोषसिद्धि या अनसुलझा आपराधिक मामला लंबित है, तो एयरपोर्ट जाने से पहले एक बार इमिग्रेशन वकील से कानूनी परामर्श जरूर लें। अमेरिका से बाहर निकलने से पहले यह जान लेना आवश्यक है कि आपकी यात्रा के दौरान आपकी वापसी की राह सुरक्षित है या नहीं। यह फैसला उन हजारों लोगों के लिए एक बड़ा सबक है जो अपनी पिछली गलतियों या लंबित मामलों को नजरअंदाज करके विदेश यात्रा करते हैं।
वेनेजुएला के इतिहास में 24 जून 2026 की रात एक ऐसे काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गई है, जिसने इस देश को दशकों पीछे धकेल दिया है। रात करीब 10 बजे यारकुय प्रांत की राजधानी सैन फेलिपे के पास रिक्टर स्केल पर 7.2 तीव्रता का पहला शक्तिशाली भूकंप आया। इस भयानक झटके से लोग संभल भी नहीं पाए थे कि महज 40 सेकंड बाद युमारे शहर के पास 7.5 तीव्रता का दूसरा और उससे भी अधिक विनाशकारी भूकंप आया।इन दोनों लगातार आए भूकंपों का केंद्र राजधानी कराकस से लगभग 284 से 293 किलोमीटर पश्चिम में था। इन झटकों ने पूरे वेनेजुएला को मलबे के ढेर में तब्दील कर दिया है। राजधानी कराकस में कई गगनचुंबी इमारतें और एक प्रमुख बैंक की बिल्डिंग ताश के पत्तों की तरह ढह गई। देश के मुख्य सिमोन बोलिवर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को भारी नुकसान पहुंचा है, जिसके कारण सभी उड़ानें रद्द करनी पड़ी हैं। इसके अलावा ट्रुजिल्लो, काराबोबो, अरागुआ, मिरांडा और ला गुएरा जैसे राज्यों से भी बड़े पैमाने पर तबाही की खबरें आ रही हैं।अमेरिकी जियोलॉजिकल सर्वे (USGS) की शुरुआती और डरावनी चेतावनी के मुताबिक, इस आपदा में 10 हजार से लेकर 1 लाख लोगों की मौत होने की आशंका जताई गई है। लेकिन वेनेजुएला के लिए सिर्फ इंसानी जानों का नुकसान ही एकमात्र संकट नहीं है। सालों से गंभीर आर्थिक तंगहाली झेल रहे इस देश के लिए यह भूकंप एक ऐसा 'तीसरा झटका' है, जिससे बाहर निकलने में देश को कई दशक लग सकते हैं।दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार, फिर भी कंगाल है देशवेनेजुएला का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि इसके पास 303 अरब बैरल तेल का रिजर्व है, जो दुनिया में सबसे बड़ा है और अमेरिका के कुल तेल भंडार से करीब पांच गुना अधिक है। इसके बावजूद गलत नीतियों और प्रतिबंधों के कारण देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह वेंटिलेटर पर है।GDP में ऐतिहासिक गिरावट: साल 2013 से 2025 के बीच वेनेजुएला की जीडीपी (GDP) में लगभग 80% की ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई, जो सोवियत संघ के विघटन के समय आए संकट से भी बदतर है।उत्पादन ठप: जो देश 1998 में हर दिन 35 लाख बैरल तेल निकालता था, उसका उत्पादन 2020 तक गिरकर महज 3.92 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया था।रिकॉर्ड तोड़ महंगाई: साल 2025 में वेनेजुएला में महंगाई दर (Inflation Rate) 475% के पार पहुंच गई, जो दुनिया में सबसे ज्यादा थी। यहां आम आदमी की औसत मासिक आय केवल 100 से 300 डॉलर के बीच है। संयुक्त राष्ट्र (UN) के अनुसार, साल 2025 तक देश की एक-तिहाई आबादी (लगभग 80 लाख लोग) पूरी तरह से मानवीय सहायता पर निर्भर हो चुकी थी।राजनीतिक बदलाव से लौटी थी उम्मीदें, पर किस्मत को कुछ और मंजूर थाइसी साल जनवरी 2026 में वेनेजुएला में एक बहुत बड़ा राजनीतिक यू-टर्न आया था। 3 जनवरी को अमेरिकी सेना द्वारा पूर्व राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को गिरफ्तार किए जाने के बाद, देश की कमान उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज को कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में सौंपी गई। रोड्रिगेज ने कड़े आर्थिक सुधार लागू किए, सरकारी तेल कंपनी PDVSA के एकाधिकार को खत्म किया और विदेशी निवेश के दरवाजे खोल दिए।अमेरिका की शेवरॉन (Chevron), स्पेन की रेप्सोल (Repsol) और इटली की एनी (Eni) जैसी वैश्विक कंपनियों के साथ नए तेल समझौते किए गए, जिससे देश का तेल उत्पादन दोबारा बढ़कर 10 लाख बैरल प्रतिदिन के पार पहुंच गया था। अर्थशास्त्रियों को पूरी उम्मीद थी कि साल 2026 में वेनेजुएला 12.1% की शानदार जीडीपी ग्रोथ दर्ज करेगा। लेकिन इस भीषण भूकंप ने इन सभी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।100 अरब डॉलर के नुकसान की आशंका: अर्थव्यवस्था के बराबर है तबाहीUSGS की PAGER (प्रॉम्प्ट असेसमेंट ऑफ ग्लोबल अर्थक्वेक्स फॉर रिस्पांस) सिस्टम के शुरुआती अनुमानों के अनुसार, इस भूकंप से वेनेजुएला को 10 अरब डॉलर से लेकर 100 अरब डॉलर से भी ज्यादा का आर्थिक नुकसान हो सकता है, जिसकी संभावना 39% तक है। यह विनाशकारी राशि वेनेजुएला की कुल वर्तमान अर्थव्यवस्था के आकार के बराबर है।सबसे बड़ी चुनौती यह है कि देश के पास पुनर्निर्माण (Reconstruction) के लिए फूटी कौड़ी भी नहीं है। वेनेजुएला पहले से ही 170 अरब डॉलर के भारी-भरकम विदेशी कर्ज के नीचे दबा हुआ है। इसके अलावा, तेल की बिक्री से मिलने वाला अधिकांश राजस्व कानूनी दांव-पेच के कारण अमेरिका की निगरानी वाले एस्क्रो खातों में जमा होता है, ताकि कर्जदाता उसे जब्त न कर सकें। ऐसे में कार्यवाहक सरकार के पास राहत कार्यों के लिए वित्तीय संसाधन बेहद सीमित हैं।विशेषज्ञों की बड़ी चिंता: तेल रिफाइनरियों और गैस लाइनों में आग का खतराकैलटेक की प्रसिद्ध भूकंप वैज्ञानिक डॉ. लूसी जोन्स के अनुसार, ऐसे बड़े भूकंपों के बाद केवल इमारतों का गिरना ही एकमात्र खतरा नहीं होता। असली तबाही तब शुरू होती है जब जमीन के नीचे बिछी मुख्य गैस पाइपलाइनें और बिजली के ग्रिड टूट जाते हैं, जिससे पूरे शहर में भीषण आग लग जाती है।चूंकि भूकंप के कारण पानी की सप्लाई लाइनें भी टूट जाती हैं, इसलिए दमकल विभागों के लिए इस आग पर काबू पाना असंभव हो जाता है। इसके अलावा, वेनेजुएला का हेल्थ सिस्टम (अस्पताल और दवाएं) पहले से ही बदहाल है, जिससे हजारों घायलों का इलाज करना एक बड़ी चुनौती होगी। यदि इस आपदा में देश की तेल रिफाइनरियों और ऑयल इन्फ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचता है, तो देश की आय का मुख्य स्रोत (जो कुल राजस्व का 50-60% और जीडीपी का 20% है) पूरी तरह ठप हो जाएगा।अंतिम निष्कर्ष: सामान्य होने में लग जाएंगे 10 से 15 सालआर्थिक और आपदा प्रबंधन विशेषज्ञ इस संकट की तुलना साल 2010 में हैती में आए 7.0 तीव्रता के भूकंप से कर रहे हैं, जिसके 16 साल बीत जाने के बाद भी हैती आज तक पूरी तरह उबर नहीं पाया है।विशेषज्ञों का मानना है कि इस भूकंप के कारण वेनेजुएला की जीडीपी को सीधे 2% से 20% तक का सीधा झटका लगेगा। जब तक वैश्विक समुदाय आगे आकर वेनेजुएला का कर्ज माफ या पुनर्गठित (Debt Restructuring) नहीं करता, बड़े पैमाने पर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सहायता नहीं मिलती और देश में राजनीतिक स्थिरता नहीं रहती, तब तक वेनेजुएला को इस महा-संकट से पूरी तरह उबरने और पटरी पर लौटने में कम से कम 10 साल या उससे भी अधिक का समय लग सकता है।
नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (नाटो) के महासचिव मार्क रूटे ने ईरान के खिलाफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीति और कार्रवाई का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि अमेरिका के कदम ने ईरान को परमाणु हथियार क्षमता हासिल करने से रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। साथ ही, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रंप नाटो और ट्रांस-अटलांटिक गठबंधन के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।
जापान में 6.9 तीव्रता का भूकंप, वेनेजुएला में दोहरे झटकों से बढ़ी तबाही की आशंका
जापान और वेनेजुएला के कुछ हिस्से गुरुवार सुबह भूकंप के तेज झटकों से दहल गए। जापान के उत्तर-पूर्वी हिस्से में गुरुवार सुबह 6.9 तीव्रता का जबरदस्त भूकंप महसूस किया गया, जबकि वेनेजुएला में कुछ मिनटों के भीतर दो बड़े भूकंप आए।
वेनेजुएला में एक के बाद एक दो शक्तिशाली भूकंप आए, जिससे राजधानी काराकस में तेज झटके महसूस किए गए। वेनेजुएला में लगातार आए दो भूकंप ने भारी तबाही मचाई है। अधिकारियों ने पुष्टि की है कि कई लोगों की जानें गई हैं, लेकिन उन्होंने मरने वालों की आधिकारिक संख्या जारी नहीं की है। संयुक्त राज्य भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने अनुमान लगाया है कि जिस तीव्रता से भूकंप आया है, उसमें हजारों की संख्या में मौत का आंकड़ा सामने आ सकता है।
दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला (Venezuela) से प्रकृति के एक बेहद दुर्लभ और खौफनाक रूप की खबर सामने आ रही है। वेनेजुएला में बुधवार को 'डबलट अर्थक्वेक' (Doublet Earthquake) जैसी एक अत्यंत दुर्लभ और जटिल भूकंपीय घटना दर्ज की गई है। इस घटना में एक ही भौगोलिक क्षेत्र के भीतर कुछ ही सेकंड के अंतराल पर एक के बाद एक दो विनाशकारी और शक्तिशाली भूकंप आए, जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया।यूनाइटेड स्टेट्स जियोलॉजिकल सर्वे (USGS) के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस दोहरे संकट के चलते वेनेजुएला की राजधानी काराकास (Caracas) सहित कई प्रमुख शहरों में बहुमंजिला इमारतें ताश के पत्तों की तरह हिलने लगीं। भूकंप के इन भीषण झटकों के कारण घबराए हुए लाखों लोग अपनी जान बचाने के लिए घरों और दफ्तरों से निकलकर सड़कों की तरफ भागने लगे।महज 39 सेकंड का फासला और दो महा-विनाशकारी झटकेयूएसजीएस (USGS) की सीस्मिक रिपोर्ट के मुताबिक, वेनेजुएला में आए इस दोहरे भूकंप की टाइमलाइन और तीव्रता बेहद हैरान करने वाली थी:पहला झटका (फोरशॉक): यह भूकंप रिक्टर स्केल पर 7.2 की भीषण तीव्रता का था, जो अंतरराष्ट्रीय समयानुसार 2204 GMT पर आया। इसका मुख्य केंद्र वेनेजुएला के प्रसिद्ध तटीय शहर मोरॉन (Morn) से लगभग 21 किलोमीटर पश्चिम में ज़मीन के भीतर था।दूसरा झटका (मेनशॉक): पहले झटके के ठीक 39 सेकंड बाद, पहले केंद्र से महज 45 किलोमीटर की दूरी पर 7.5 तीव्रता का दूसरा और पहले से भी कहीं अधिक शक्तिशाली मुख्य भूकंप आया।अमेरिकी भूवैज्ञानिकों ने इस पूरी श्रृंखला को डबलट (Doublet) के रूप में वर्गीकृत किया है, जहां 7.5 तीव्रता वाले मुख्य विनाशकारी झटके से एक मिनट से भी कम समय पहले 7.2 तीव्रता का एक अत्यंत शक्तिशाली शुरुआती झटका आया था।गैस सप्लाई बंद; गृह मंत्री बोले- बड़ा हादसा टालने के लिए उठाए कड़े कदमहालांकि राहत की बात यह है कि आपदा प्रबंधन और स्थानीय अधिकारियों ने तुरंत किसी भी नागरिक की मौत की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है, लेकिन कई इलाकों में बुनियादी ढांचे और इमारतों को व्यापक नुकसान पहुंचा है।वेनेजुएला के गृह मंत्री डियोसडाडो कैबेलो ने स्थिति की समीक्षा करने के बाद मीडिया को बताया, देश के कई राज्यों में इमारतें और रिहायशी ढांचे गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हुए हैं। भूकंप के कारण कई जगहों पर अंडरग्राउंड यूटिलिटी लाइन्स प्रभावित हुई हैं। हम नहीं चाहते कि भूकंप के बाद शहरों में गैस रिसाव से जुड़ा कोई दूसरा बड़ा और जानलेवा हादसा हो। उन्होंने जानकारी दी कि एहतियात और सुरक्षा के तौर पर प्रभावित वाले सभी रिहायशी और कमर्शियल इलाकों की मुख्य गैस सप्लाई को तुरंत काट (ब्लाक) दिया गया है।विज्ञान की नज़र से समझें: क्या होता है यह 'डबलट भूकंप'?आम तौर पर जब कोई बड़ा भूकंप आता है, तो उसके बाद छोटे-छोटे झटके आते हैं जिन्हें हम 'आफ्टरशॉक' (Aftershocks) कहते हैं। लेकिन 'डबलट भूकंप' इससे पूरी तरह अलग और कहीं अधिक खतरनाक होता है। भूकंप विज्ञान (Seismology) के अनुसार:समान तीव्रता के दो मुख्य झटके: जब एक ही इलाके या एक ही फॉल्ट सिस्टम के भीतर बेहद कम समय के अंतराल पर दो बड़े भूकंप आते हैं, जिनकी तीव्रता (Magnitude) लगभग एक जैसी या बराबर होती है, तो उसे 'डबलट भूकंप' कहा जाता है।आधुनिक परिभाषा: शुरुआत में वैज्ञानिक केवल उन भूकंपों को डबलट मानते थे जिनकी उत्पत्ति बिल्कुल एक ही पॉइंट (Focus) से होती थी और जिनसे निकलने वाली भूकंपीय तरंगें (Seismic Waves) ग्राफ पर हूबहू एक जैसी दिखती थीं। लेकिन आज, आधुनिक विज्ञान में लगभग एक जैसी क्षमता वाले दो या उससे अधिक मुख्य झटकों के कम समय के अंतराल पर आने को 'डबलट' कहा जाता है।आफ्टरशॉक बनाम डबलट: क्यों यह घटना है ज्यादा खतरनाक?विशेषताआफ्टरशॉक (Aftershocks)डबलट भूकंप (Doublet Earthquake)तीव्रता (Magnitude)मुख्य भूकंप की तुलना में हमेशा बहुत कमजोर और छोटे होते हैं।दोनों या तीनों झटके लगभग समान रूप से शक्तिशाली (जैसे 7.2 और 7.5) होते हैं।समय का अंतरालमुख्य झटके के बाद दिनों, हफ्तों या महीनों तक आ सकते हैं।ये झटके एक-दूसरे के कुछ सेकंड, मिनट या कुछ घंटों के भीतर ही आ जाते हैं।नुकसान की क्षमताकमजोर हो चुकी इमारतों को गिरा सकते हैं, लेकिन क्षमता सीमित होती है।पहले झटके से हिली हुई इमारतें दूसरे समान शक्तिशाली झटके को झेल नहीं पातीं और पूरी तरह जमींदोज हो जाती हैं।वेनेजुएला में आई यह भूकंपीय श्रृंखला 'डबलट' का सबसे सटीक और जीवंत उदाहरण है। यहाँ 7.2 तीव्रता वाले शुरुआती झटके ने पहले जमीन को हिलाया और इससे पहले कि ऊर्जा शांत हो पाती, ठीक 39 सेकंड बाद आए 7.5 तीव्रता के मुख्य झटके ने तबाही को दोगुना कर दिया। भौगोलिक रूप से वेनेजुएला कैरेबियन और साउथ अमेरिकन टेक्टोनिक प्लेटों के जोड़ पर बसा है, जिससे यहाँ इस प्रकार के दुर्लभ फॉल्ट मूवमेंट देखने को मिलते हैं।
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