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ईरान के पास मिसाइलों के अंडरग्राउंड शहर:जखीरे में और कौन-से हथियार मौजूद, मिडिल-ईस्ट में कितने दिन आग बरसा सकता है

सुप्रीम लीडर खामेनेई की हत्या के बाद ईरान की इस्लामिक सत्ता अब अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही है। अमेरिका-इजराइल के घातक हमलों के बीच उसने पूरी ताकत से पलटवार किया है। ईरान ने सिर्फ इजराइल नहीं, पूरे मिडिल ईस्ट में मिसाइलों और ड्रोन्स की बौछार कर दी है। ईरान के राष्ट्रपति का कहना है कि खामेनेई की हत्या का बदला लेना देश का फर्ज और अधिकार है। ईरान के जखीरे में कौन-से हथियार हैं और वो ये लड़ाई कितने दिन खींच सकता है; जानेंगे भास्कर एक्सप्लेनर में... कितने दिन मुकाबला कर पाएगा ईरान? 28 फरवरी को अमेरिका-इजराइल के साझा हमले के बाद, ईरान ने इजराइल और मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया… टोगा के मुताबिक ईरान के हथियार कम हो रहे हैं लेकिन अभी यह खत्म होने से दूर है। वह आने वाले कुछ दिनों तक हमले जारी रख सकता है। ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी में मिडिल ईस्टर्न स्टडीज के प्रोफेसर अमीन सैकल के मुताबिक, ‘ईरान कुछ दिनों में हार नहीं मानेगा, क्योंकि अब लड़ाई सत्ता में रहने की है। उन्होंने खुद को लंबी लड़ाई के लिए तैयार किया है। उनके पास शॉर्ट और लॉन्ग रेंज की मिसाइलें और हजारों ड्रोन्स हैं। ’ हालांकि कुछ एक्सपर्ट मानते हैं कि ईरान अगर इतनी ही तेजी से हमले करता रहा तो उसके हथियार कुछ ही दिनों में खत्म हो जाएंगे। लंबे समय तक युद्ध जारी रखने के लिए उसे हथियार इस्तेमाल करने की स्पीड कम करने होगी। *** रिसर्च सहयोग: ब्रज पांडे ----------- ये खबर भी पढ़िए… नेतन्याहू की लड़ाई में क्यों कूदे ट्रम्प:ईरान की तबाही से अमेरिका नहीं, इजराइल को असली फायदा; सऊदी कैसे खेल कर रहा अमेरिका और ईरान में दोबारा न्यूक्लियर डील पर बात हो रही थी, डील लगभग होने ही वाली थी। इजराइल और सऊदी अरब ने ट्रम्प को दोबारा ईरान पर हमले के लिए मना लिया। जानकारों मानते हैं कि एकबार फिर ट्रम्प, नेतन्याहू की जंग लड़ रहे हैं। पूरी खबर पढ़िए…

दैनिक भास्कर 2 Mar 2026 6:07 pm

ईरान ने किया परमाणु ठिकानों पर अमेरिका-इस्राइल के हमले का दावा, IAEA ने कहा- कोई सबूत नहीं

IAEA में ईरान के राजदूत ने रविवार को दावा किया कि अमेरिका और इजरायल ने नतांज (Natanz) परमाणु सुविधा पर हमला किया है। नतांज ईरान के परमाणु कार्यक्रम का प्रमुख केंद्र माना जाता है, जहां यूरेनियम संवर्धन से जुड़ी गतिविधियां होती रही हैं।

देशबन्धु 2 Mar 2026 3:44 pm

ईरान पर हमले को उचित ठहराने के लिए ट्रंप के दावे, जानें तथ्यों की कसौटी पर कितने सही?

ट्रंप का दावा था कि ईरान न केवल अतीत के आतंकी हमलों में शामिल रहा है, बल्कि उसने परमाणु कार्यक्रम और लंबी दूरी की मिसाइलों के जरिए अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए बड़ा खतरा पैदा किया है।

देशबन्धु 2 Mar 2026 12:47 pm

अमेरिका और खाड़ी देशों ने ईरान के मिसाइल हमलों की निंदा की

इजरायल और अमेरिका की ओर से किए गए हमले के बाद ईरान ने मिडिल ईस्ट में कई देशों पर हमले कर दिए। ईरान की तरफ से किए गए इस हमले की अमेरिका और छह खाड़ी देशों ने कड़ी आलोचना की है

देशबन्धु 2 Mar 2026 10:52 am

ओमान से ढाका पहुंचे शख्स ने बताए वहां के हालात, अधिकांश उड़ानें रद्द

ओमान से बांग्लादेश की राजधानी ढाका पहुंचे शख्स ने खाड़ी क्षेत्र की मौजूदा स्थिति को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है

देशबन्धु 2 Mar 2026 10:43 am

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिका को दी बिना समझौते जवाब की चेतावनी

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिका के हवाई हमलों की कड़ी निंदा की। इन हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मौत हो गई

देशबन्धु 2 Mar 2026 8:52 am

ईरान समेत 7 देशों पर हमले, आधी दुनिया पर नजर:ट्रम्प की 'सनक' एक सोची-समझी स्ट्रैटजी; क्या ऐसे ही तबाह होती हैं सुपर पावर्स

डोनाल्ड ट्रम्प को राष्ट्रपति पद की शपथ लिए 13 महीने हुए हैं। इस दौरान ट्रम्प ने 7 देशों पर सैन्य हमले किए, ईरान के सुप्रीम लीडर को मार गिराया, वेनेजुएला के राष्ट्रपति को तो घर से उठवा लिया, दर्जनों देशों पर अनाप-शनाप टैरिफ लगाए और राष्ट्राध्यक्षों को बेइज्जत किया। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि ट्रम्प क्या कर रहे हैं, सवाल यह है कि क्यों कर रहे हैं? क्या यह सब उनकी सनक है, या अमेरिका की गिरती इकोनॉमी और बदलते वर्ल्ड ऑर्डर में ताकत बचाने की एक सोची-समझी रणनीति; मंडे मेगा स्टोरी में पूरी कहानी… अमेरिका ने उपनिवेश नहीं बनाए। उसने डॉलर का इस्तेमाल किया। ऐसी व्यवस्था बनाई की दुनिया के देश अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर का इस्तेमाल करेंगे। इसके बूते अमेरिका सुपरपावर बना। अब युद्धों, फिजूल खर्चों, पॉपुलिस्ट फैसलों का शिकार होकर अमेरिका भी स्पेन और ब्रिटेन वाली गलती कर रहा है। ***** ग्राफिक्स: दृगचंद्र भुर्जी और अजीत सिंह -------- ईरान हमले से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए… ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई मारे गए: 11 साल की उम्र में मौलवी, संविधान बदलकर 'रहबर' बने; क्यों मारना चाहता था इजराइल ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो चुकी है। अमेरिका-इजराइल ने 28 फरवरी की स्ट्राइक में उन्हें मार गिराया। खामेनेई खुलकर इजराइल के अस्तित्व को मिटाने की बात करते थे। नेतन्याहू मानते हैं कि खामेनेई की हत्या के बाद क्षेत्र में स्थिरता आ जाएगी। पूरी खबर पढ़िए…

दैनिक भास्कर 2 Mar 2026 5:22 am

नेतन्याहू की लड़ाई में क्यों कूदे ट्रम्प:ईरान की तबाही से अमेरिका नहीं, इजराइल को असली फायदा; सऊदी कैसे खेल कर रहा

जून 2025- अमेरिका-ईरान में न्यूक्लियर डील पर बातचीत चल रही थी। ऐन मौके पर इजराइल ने ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को अपने लिए खतरा बताते हुए उस पर हमला कर दिया। अमेरिका भी इसमें शामिल हो गया। जबकि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को ईरान के न्यूक्लियर हथियार बनाने के कोई सबूत नहीं मिले थे। फरवरी 2026- अमेरिका और ईरान में दोबारा न्यूक्लियर डील पर बात हो रही थी, डील लगभग होने ही वाली थी। इजराइल और सऊदी अरब ने ट्रम्प को दोबारा ईरान पर हमले के लिए मना लिया। जानकारों मानते हैं कि एकबार फिर ट्रम्प, नेतन्याहू की जंग लड़ रहे हैं। आखिर, नेतन्याहू ने ट्रम्प को ईरान के खिलाफ जंग में कैसे घसीटा, खामेनेई को मारने से इजराइल को क्या फायदा, भास्कर एक्सप्लेनर में पूरी कहानी… सवाल-1: नेतन्याहू ने ट्रम्प को ईरान पर हमले के लिए कैसे तैयार किया?जवाब: नेतन्याहू करीब 2 दशक से यह कहते आ रहे हैं कि ईरान न्यूक्लियर हथियार बनाने की कगार पर है, जो इजराइल के लिए खतरनाक है। बीते साल 4 फरवरी 2025 को इजराइली पीएम नेतन्याहू, ट्रम्प से मिलने अमेरिका पहुंचे थे। इसी मुलाकात के बाद ईरान पर इतने बड़े हमले की पृष्ठभूमि तैयार हुई… अमेरिकी हमलों में ईरान के न्यूक्लियर ठिकानों को काफी नुकसान पहुंचा। वह न्यूक्लियर हथियार बनाने के लिए जरूरी यूरेनियम जुटाने के टारगेट से भी काफी साल पीछे चला गया था। इसके बाद ईरान और अमेरिका में दोबारा न्यूक्लियर डील पर बात शुरू हुई, लेकिन इस बार नेतन्याहू ने ईरान की मिसाइल्स के खतरे का जिक्र भी शुरू कर दिया। सवाल-2: जब ईरान के न्यूक्लियर ठिकाने तबाह, तो ट्रम्प ने दोबारा हमला क्यों किया?जवाब: जून में अमेरिकी हमलों के बाद कुछ रिपोर्ट्स में कहा जाने लगा कि ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। अक्टूबर 2025 में नेतन्याहू ने ईरान से एक और खतरा बताया। उन्होंने कहा, 'लोगों को इस पर भरोसा नहीं होता, लेकिन ईरान 8 हजार किमी रेंज वाली इंटर-कॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल्स डेवेलप कर रहा है। ईरान किसी भी अमेरिकी शहर को निशाना बना सकता है।' इसके बाद ट्रम्प भी यही दावा दोहराने लगे। जबकि ईरान ने इससे लगातार इनकार किया। वह अमेरिका के साथ न्यूक्लियर डील और अपने मिसाइल प्रोग्राम को लेकर भी बातचीत कर रहा था। फरवरी की शुरुआत में ट्रम्प प्रशासन ने ईरान के साथ संघर्ष से पीछे हटकर कूटनीतिक बातचीत से रास्ता निकालने के संकेत दिए थे। दोनों देशों के के बीच डील पर दोबारा बातचीत शुरू हुई। विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर ईरान के न्यूक्लियर और मिसाइल प्रोग्राम को लेकर ईरानी नेताओं से बातचीत कर रहे थे। ओमान इसकी मध्यस्थता कर रहा था। जेनेवा में 26 फरवरी को डील पर तीसरे दौर की बात हुई। 28 फरवरी को मध्यस्थता कर रहे ओमान के विदेश मंत्री बदर अलबुसैदी ने कहा, 'मुझे लगता है शांति समझौता हमारी पहुंच में है। हमने समझौते की तरफ काफी प्रगति की है। ईरान ने न्यूक्लियर बम के लिए जरूरी सामग्री त्यागने पर प्रतिबद्धता जताई है। उनके पास इसका कोई स्टोरेज नहीं है। अगर आप संवर्धित मटेरियल यानी यूरेनियम स्टोर नहीं कर सकते, तो बम भी नहीं बना सकते।' अलबुसैदी ने ये भी कहा, 'मीडिया ने इस तथ्य को काफी हद तक नजरअंदाज किया है। मैं एक मध्यस्थ के नजरिए से इसे साफ करना चाहता हूं।' अगले हफ्ते वियना में डील की तकनीकी शर्तों पर बाकी बातचीत होनी थी। इसके पहले ही इजराइल और अमेरिका ने ईरान पर हमला कर दिया। ये दूसरी बार है, जब डील पर निर्णायक बातचीत से ऐन पहले ईरान पर हमला बोल दिया गया। अमेरिकी अखबार वाशिंगटन पोस्ट के मुताबिक, मामले से परिचित 4 लोगों ने बताया कि इजराइल और सऊदी अरब हफ्तों से ईरान पर अमेरिका के हमले की पैरवी कर रहे थे। रिपोर्ट के मुताबिक, 'सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान यानी MBS सार्वजानिक तौर पर तो मामले के कूटनीतिक समाधान की बात कह रहे थे, लेकिन पिछले महीने उन्होंने ट्रम्प को कई निजी कॉल किए और ईरान पर हमले की वकालत की। नेतनयाहू ने भी ईरान पर अमेरिका से हमला करवाने का अपना लंबे समय से चला आ रहा अभियान जारी रखा।' MBS ने अमेरिकी ऑफिसर्स से बातचीत में कहा कि अगर अमेरिका ने अभी कार्रवाई नहीं की, तो ईरान और भी खतरनाक बनकर उभरेगा। MBS के भाई और सऊदी के डिफेंस मिनिस्टर खालिद बिन सलमान ने भी जनवरी में अमेरिकी ऑफिसर्स के साथ सीक्रेट मीटिंग्स में कहा कि हमला न करने से नुकसान होगा। नेतन्याहू और MBS की इन कोशिशों के बीच 19 फरवरी को ट्रम्प ने कहा कि 10 दिन के अंदर या तो डील होगी या ईरान इसका अंजाम भुगतेगा। जबकि इससे पहले ट्रम्प खुद कह चुके थे कि जून में हुए हमलों में ईरानी न्यूक्लियर प्रोग्राम पूरी तरह खत्म हो गया था। बीते शुक्रवार को ट्रम्प अपने मार-ए-लागो रिसॉर्ट में थे। वहां मौजूद लोगों ने बताया कि ट्रम्प थके लग रहे थे। फिर वो ईरान पर हमले की घोषणा वाला वीडियो रिकॉर्ड करने अपने प्राइवेट रूम में चले गए। शनिवार को ट्रम्प ने ईरान पर बड़े हमले का आदेश दे दिया। सवाल-3: तो क्या ईरान के खिलाफ नेतन्याहू की निजी लड़ाई है?जवाब: शुरुआत से ही अमेरिकी जनता और अमेरिका के ज्यादातर सांसद ईरान पर अमेरिकी हमले के खिलाफ रहे हैं। मैरीलैंड यूनिवर्सिटी के हालिया सर्वे में केवल 21% अमेरिकियों ने कहा कि वे ईरान के साथ युद्ध के पक्ष में हैं। अमेरिकी सांसद रशीदा तलैब कहती हैं, ‘ट्रम्प अमेरिकी राजनीति के एलीट क्लास के लोगों और इजराइली रंगभेदी सरकार की हिंसक कल्पनाओं के आधार पर काम कर रहे हैं, और उन ज्यादातर अमेरिकियों की अनदेखी कर रहे हैं जो साफ तौर पर कहते हैं कि अब और युद्ध नहीं चाहिए।’ ट्रम्प ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से 'अमेरिका फर्स्ट' पॉलिसी की बात कही है, जिसमें पुराने दौर की तरह अमेरिका को युद्धों में घसीटने के बजाय तरक्की पर फोकस है। वहीं इजराइल और नेतन्याहू के पास इस जंग के पीछे दो बड़े ऑब्जेक्टिव थे.. 1. अमेरिका और ईरान के बीच डील रोकना 2. मिडिल ईस्ट में सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी ईरान को कमजोर करना सवाल-4: इस जंग से इजराइल को ज्यादा फायदा या अमेरिका को?जवाब: अगर ईरान से अमेरिका के संबंध बेहतर हो जाते, तो इजराइल को मिडिल ईस्ट में एक मजबूत टक्कर मिल सकती थी। अभी तक इजराइल, अमेरिका से सबसे ज्यादा आर्थिक और सैन्य सहायता पाने वाला देश है। वहीं खामेनेई के बाद ईरान में नई सत्ता आने से अमेरिका को भी फयदे हैं। मिडिल ईस्ट में कतर, इराक, सीरिया, जॉर्डन, कुवैत और सऊदी अरब जैसे देशों में अमेरिका ने अपने मिलिट्री बेस बनाए हुए हैं। ईरान के कब्जे वाले लाल सागर के रूट्स के जरिए अमेरिका का तेल और बाकी चीजों का ट्रेड भी चलता है। ईरान अकेला ऐसा देश है, जहां अमेरिका का कोई बेस नहीं है। अगर ईरान में अमेरिका के मन मुताबिक सरकार आती है, तो पूरे मिडिल ईस्ट पर उसका कंट्रोल हो जाएगा। सवाल-5: इस जंग में सऊदी जैसे अरब देशों ने ईरान का साथ क्यों नहीं दिया?जवाब: मिडिल ईस्ट के मुस्लिम देशों में सुन्नी-शिया बाइनरी है। सऊदी अरब और ईरान के बीच इन देशों की लीडरशिप को लेकर वर्चस्व की पुरानी लड़ाई है। इसके अलावा सऊदी अरब, कतर, UAE जैसे सुन्नी बहुल अरब देशों से अमेरिका के सैन्य, आर्थिक और कूटनीतिक रिश्ते हैं। ईरान के कमजोर पड़ते ही इन देशों के अमेरिका से संबंध और बेहतर होंगे। वहीं इस इलाके में ईरान के अलावा इराक, लेबनान और सीरिया ऐसे देश हैं, जो शिया बाहुल्य हैं। हालांकि ये देश खुद बेहद कमजोर हैं और अंदरूनी सत्ता संघर्ष से जूझ रहे हैं। ईरान, जिन हूती और हिजबुल्लाह जैसे संगठनों को मदद करता रहा है, वो अलग-अलग समय पर बाकी इस्लामिक देशों के लिए खतरा बने रहे हैं। एक और वजह ये भी है कि दुनिया के सभी इस्लामिक देशों में सिर्फ पाकिस्तान के पास न्यूक्लियर हथियार हैं। मिडिल ईस्ट के अरब देशों को अमेरिका ने सुरक्षा गारंटी दे रखी है, इसके बदले में उन्होंने न्यूक्लियर हथियार न रखने का वादा किया है। ऐसे में ये देश ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को खुद के लिए भी एक खतरे की तरह देखते हैं। सवाल-6: क्या सुप्रीम लीडर खामेनेई को मार देने से ईरान-अमेरिका का मकसद पूरा हो जाएगा?जवाब: एक्सपर्ट्स का मानना है कि खामेनेई की हत्या करने से भी अमेरिका और इजराइल के लिए ईरान में सत्ता परिवर्तन करना आसान नहीं है... ---- ये खबर भी पढ़ें… खामेनेई से खुन्नस या ट्रम्प को जंग में घसीटना:नेतन्याहू का असली मकसद क्या; ईरान में परमाणु बम बनाने के सबूत नहीं, फिर क्यों हमला किया 5 फरवरी 2003 को अमेरिका के विदेश मंत्री कोलिन पॉवेल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक शीशी लहराने लगे। दावा किया कि इराक के शासक सद्दाम हुसैन के पास ऐसे रासायनिक हथियार हैं, जिनसे सामूहिक विनाश हो जाएगा। ऐसा माहौल बनाया गया कि इराक पर हमला जरूरी लगने लगा। पूरी खबर पढ़ें…

दैनिक भास्कर 2 Mar 2026 5:22 am

‘ईरान का हर बच्चा खामेनेई का बदला लेगा’:खून का बदला खून के नारे, इजराइली राजदूत बोले- हमले के बाद जयशंकर को बताया

इजराइल और अमेरिका के हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद राजधानी तेहरान में ‘खून का बदला खून’ के नारे लग रहे हैं। तीसरे बड़े शहर इस्फहान में अमेरिका-इजराइल के विरोध में उतरे लोगों से सड़कें भरी हैं। जाजन और यसुज शहर में भी लोग गुस्से में हैं। कोम शहर की जमकरान मस्जिद पर लाल झंडा लहरा रहा है, जिसका मतलब है बदला। हमले के बाद से ही ईरान में इंटरनेट पूरी तरह काम नहीं कर रहा है। कम्युनिकेशन ठप है। सरकारी न्यूज चैनल से ही कोई जानकारी मिल रही है। दैनिक भास्कर ने ईरान के लोगों से बात की। उन्होंने हमें फोटो और वीडियो भेजे हैं, जिनसे वहां के हालात का पता चलता है। खामेनेई की मौत के बाद कराज शहर में लोग जश्न मनाते भी दिखे। इसका एक वीडियो सामने आया है। हमने इजराइल के हालात पर भारत में इजराइली राजदूत रुवेन अजार से भी बात की। ‘खामेनेई फरिश्ता थे, उनके लिए शहादत देंगे’हमने तेहरान में रहने वाले एक सरकारी मुलाजिम महमूद से बात की। महमूद बदला हुआ नाम है, क्योंकि उन्होंने पहचान उजागर न करने की गुजारिश की थी। महमूद कहते हैं, ‘सुप्रीम लीडर की शहादत के बाद हमने ईरान में ऐसे नजारे देखे हैं, जो आज तक नहीं देखे।' 'अमेरिका जैसे ताकतवर मुल्क के साथ जंग के बीच खामेनेई को आखिरी सलामी देने के लिए आए लोगों से सड़कें भर गईं। ईरान का हर बच्चा बदला लेने के लिए तैयार है।’ अमेरिका और इजराइल के फाइटर जेट्स ने तेहरान में खामेनेई के ऑफिस कॉम्प्लेक्स पर 30 मिसाइलें दागी थीं। इस हमले में उनकी बेटी-दामाद, बहू और पोती समेत कॉम्प्लेक्स में मौजूद 40 कमांडर मारे गए है। हमले के वक्त खामेनेई कमांडरों के साथ मीटिंग कर रहे थे। ‘तेहरान पर अब भी बरस रहीं मिसाइलें’भारतीय मूल के अहमद अब्बास 15 साल से तेहरान में रह रहे हैं। हमारी बात होने से आधा घंटा पहले ही अहमद के घर के पास धमाके हुए थे। उनके मुताबिक, लोगों से कहा गया है कि आसपास धमाका होते ही घर से तुरंत बाहर निकलें और खुली जगह पर चले जाएं। दिन में कई दफा ऐसा करना पड़ता है। अहमद बताते हैं, ‘वेस्टर्न और नॉर्दर्न तेहरान में लगातार हमले हो रहे हैं। आसपास के इलाकों से बहुत से लोग काम के लिए तेहरान आते हैं। अब सभी घर लौट गए हैं। तेहरान में आम दिनों के मुकाबले कम भीड़ है।’ खामेनेई की मौत के बाद निकले जुलूस में अहमद भी शरीक हुए थे। इस पर अहमद बताते हैं, ‘जुलूस में शरीक हुए लोगों में एक जज्बा साफ दिखा कि जंग को सही नतीजे तक पहुंचाना जरूरी है। बेशक अमेरिका सामने है। इजराइल की तो बहुत बड़ी हैसियत नहीं है। उन्हें इस हिमाकत का जवाब देना होगा।’ ‘ईरान पर 28 फरवरी की सुबह हमला हुआ। हमने नहीं सोचा था कि ये सब इतनी जल्दी होगा। मुझे लग रहा है कि खामेनेई की शहादत से ईरान एक हो रहा है। ईरान के लोग खामेनेई के सपोर्ट में शहादत देने के नारे लगा रहे हैं। जंग में मजबूती से लड़ने के लिए खुद को दिमागी तौर पर तैयार कर रहे हैं।’ ‘पहले हमें बताया गया कि सुप्रीम लीडर और उनके करीबी लोग ठीक हैं। देर रात टीवी से पता चला वे शहीद हो गए हैं। इसके बाद से ईरान में अटैक से भी बड़ी लहर उठी है।’ ‘खामेनेई की मौत की खबर देर रात दी, ताकि लोग बाहर न निकलें’खामेनेई की मौत की खबर ईरान के लोगों को रात करीब 3 बजे दी गई। ऐसा इसलिए किया, ताकि लोग तुरंत सड़कों पर न निकलें और उन्हें सदमा न लगे। इसके बावजूद खबर मिलते ही लोग सड़कों पर निकल आए। रोने-बिलखने लगे। अहमद बताते हैं, ‘ईरान में लोगों का सुप्रीम लीडर से जज्बाती लगाव है। उनका विरोध करने वाले भी हैं, लेकिन ऐसे लोग बहुत कम हैं। लोगों के दिलों में खामेनेई के लिए बहुत इज्जत है। ईरान छोड़िए भारत और पाकिस्तान जैसे मुल्कों में भी उनके चाहने वाले बड़ी तादाद में हैं।’ ईरान अमेरिका के सहयोगी देशों से घिरा है, क्या उसे विदेशी मदद मिल रही है? अहमद जवाब देते हैं, कई मुल्क ईरान के साथ खड़े हैं। इराक से सपोर्ट मिला है। लेबनान किसी भी वक्त जंग में शामिल हो सकता है। यमन में भी हमारे पास ताकतें हैं, जो इस जंग में शामिल होंगी।’ ईरान की तरफ से बड़े मिसाइल हमले की तैयारीअहमद कहते हैं, ‘लोग चाहते हैं कि ईरान इतना जबरदस्त हमला करे कि दुश्मन झुकने के लिए मजबूर हो जाएं। जवाब ऐसा हो कि अगली बार हमला करने के पहले कोई भी हजार बार सोचे।’ हमने इस पर एक ईरानी अधिकारी से बात की। उनकी पहचान उजागर नहीं की जा सकती। अधिकारी ने बताया कि ईरान की सबसे बड़ी ताकत बैलेस्टिक मिसाइल हैं। हमारे पास मिसाइलों का जखीरा है। हम बड़े अटैक की तैयारी कर रहे हैं। इससे दुश्मन को चौंका देंगे। हमला कब होगा, ये वक्त बताएगा। फिलहाल हमारा टारगेट साफ है- अमेरिकी मिलिट्री बेस और इजराइल। बदला पूरा होने तक हम इन पर हमले करते रहेंगे। इजराइली राजदूत बोले- हमले के बाद भारत को बताया थाइजराइल ने सबसे पहले ईरान पर हमले किए थे। बाद में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हमले में शामिल होने की पुष्टि की। ये इजराइल का ईरान पर एक साल में दूसरा हमला है। इस बार हमला भारतीय प्रधानमंत्री मोदी के दौरे के ठीक बाद हुआ है। क्या PM मोदी या भारतीय विदेश मंत्रालय को हमले के बारे में बताया गया था, इजराइल में जंग को लेकर क्या माहौल है? हमने ये सवाल भारत में इजराइल के राजदूत रुवेन अजार से पूछे। सवाल: ईरान पर हमले का आखिरी मकसद क्या है?जवाब: सबसे पहले हम सामने दिख रहे खतरे ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को खत्म करना चाहते हैं। ईरान दशकों से मिलिट्री न्यूक्लियर प्रोग्राम चलाने की कोशिश कर रहा है। इसके अलावा बैलेस्टिक मिसाइल की ताकत बढ़ाने के लिए काम कर रहा है, ताकि इजराइल को खत्म कर सके। ईरान पूरे रीजन में अपने प्रॉक्सी ग्रुप को फंड, हथियार और टेक्नोलॉजी दे रहा है। ईरान 2027 तक इजराइल को खत्म करना की बात करता था। जून में हमने उस पर हमले किए थे। ईरान ने अब सहयोग करने से इनकार किया, तो हमने फिर से ऑपरेशन शुरू किया है। सवाल: अगर ईरान में सरकार बदलती है, तो ये कैसी सरकार होगी?जवाब: हमें नहीं पता कि ईरान में सत्ता बदलेगी या नहीं, लेकिन हम चाहते हैं कि ये जरूर हो। कुछ हफ्ते पहले ही मौजूदा सरकार ने अपने हजारों नागरिकों को मार दिया था। सवाल: ईरान पर हमला PM मोदी के इजराइल दौरे के ठीक बाद हुए हैं। क्या उन्हें हमले के बारे में बताया गया था?जवाब: भारत हमारी स्थिति अच्छी तरह जानता है। PM मोदी इजराइल में थे, तब हमें नहीं पता था कि ऑपरेशन होने वाला है। इसकी मंजूरी 28 फरवरी की सुबह दी गई। तब तक PM मोदी दौरा पूरा करके लौट चुके थे। इजराइल के विदेश मंत्री ने भारतीय विदेश मंत्री जयशंकर को फोन करके बात की थी। सवाल: विदेश मंत्री जयशंकर ने क्या कहा?जवाब: भारत ने अपनी स्थिति पर खुलकर बात की। भारत बातचीत और स्थिरता चाहता है। हमने कई साल ईरान से डिप्लोमेसी के तहत बातचीत की कोशिश की है। अमेरिका ने महसूस किया कि ईरान डिप्लोमेसी के जरिए वक्त बिता रहा है और शर्तें मानने के लिए तैयार नहीं है। सवाल: इस वक्त इजराइल में कैसा माहौल है?जवाब: इजराइल खुद को सुरक्षित रखना चाहता है। इजराइल पर बैलेस्टिक मिसाइल और ड्रोन से लगातार हमले हो रहे हैं। कई लोग खामेनेई की मौत पर खुशी मना रहे हैं, क्योंकि ईरान का सुप्रीम लीडर इजराइल पर हमले के ऑर्डर देता था, इजराइल के लोगों को मारता था, अब वो नहीं है। हमने ईरान में भी जश्न की फोटो देखी हैं। मुझे लगता है कि ईरान के लोग इस मौके के जरिए सत्ता बदलेंगे। ईरान का जवाबी हमला, अमेरिका के तीन सैनिकों की मौतइजराइल और अमेरिका ने ईरान की राजधानी तेहरान समेत 10 बड़े शहरों को निशाना बनाया। हमलों से अब तक 200 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। एक स्कूल पर मिसाइल गिरने से 148 लड़कियों की मौत हो गई। इसके जवाब में ईरान ने अमेरिका के सहयोगी 9 देशों पर हमले किए हैं। पेंटागन ने 1 मार्च को बताया कि ईरान पर हमले के दौरान तीन अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई है। 5 सैनिक घायल हैं। 28 फरवरी को शुरू हुई जंग के बाद पहली बार अमेरिकी सैनिकों के मरने की रिपोर्ट आई है। उधर, ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड ने दावा किया कि सेना ने अमेरिका के एयरक्राफ्ट कैरियर USS अब्राहम लिंकन पर चार बैलिस्टिक मिसाइलें दागी हैं। हालांकि, अमेरिका ने इस दावे को खारिज कर दिया। एक अमेरिकी अधिकारी ने अल जजीरा से कहा कि ईरानी मिसाइल विमानवाहक पोत तक नहीं पहुंची। जहाज को कोई नुकसान नहीं हुआ है। इस बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने स्टेट टीवी पर वीडियो मैसेज जारी किया है। उन्होंने सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत पर दुख जताया। साथ ही कहा कि अंतरिम लीडरशिप काउंसिल ने काम शुरू कर दिया है। पेजेश्कियान भी तीन सदस्यों वाली अंतरिम समिति में हैं। ईरान के पूर्व राष्ट्रपति अहमदीनेजाद की मौतईरान की लेबर न्यूज एजेंसी ने पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद की मौत का दावा किया है। उनकी मौत एक मार्च को एयरस्ट्राइक में हुई। एजेंसी ने दावा किया कि इजराइल-अमेरिका की संयुक्त एयरस्ट्राइक में तेहरान के उत्तर-पूर्वी इलाके नारनाक में उनके घर को निशाना बनाया गया। अहमदीनेजाद 2005 से 2013 तक ईरान के राष्ट्रपति रहे थे। ईरान के हमलों से UAE में 3 की मौत, एक भारतीय भी घायलसंयुक्त अरब अमीरात (UAE) में ईरान के हमलों में तीन लोगों की मौत हो गई है। इनमें पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश के नागरिक हैं। एक भारतीय समेत 58 लोग घायल भी हैं। ईरान ने UAE की ओर 165 बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं, जिनमें से 152 को एयर डिफेंस सिस्टम ने खत्म कर दिया और 13 समुद्र में गिरीं। इसके अलावा 541 ड्रोन लॉन्च किए गए, जिनमें से 506 इंटरसेप्ट किए गए, जबकि 35 देश की सीमा के भीतर गिरे। ………………..ईरान जंग पर ये खबर भी पढ़ेंट्रम्प बोले- ईरान के 48 नेता एक झटके में खत्म, 9 जहाज डुबोए इजराइल और अमेरिका ने ईरान पर लगातार दूसरे दिन हमला किया। हमले में ईरानी इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के हेडक्वार्टर को निशाना बनाया गया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि इन हमलों में 48 ईरानी नेता मारे गए हैं। अमेरिका ने ईरान के 9 जहाज डुबो दिए हैं। पढ़ें पूरी खबर...

दैनिक भास्कर 2 Mar 2026 5:19 am

सरकार गिराने वाले Gen Z लीडर चुनाव से गायब:बोले- हम भारत विरोधी नहीं, जरूरत पड़ी तो फिर आंदोलन करेंगे

‘अगर चुनाव बाद देश को फिर से बदलाव की जरूरत पड़ी, तो हम किसी भी वक्त, किसी भी जगह फिर आंदोलन के लिए तैयार हैं। कुछ लोग एंटी-इंडिया प्रचार की कोशिश करते हैं, लेकिन हम असल Gen Z लीडर भारत को लेकर कोई नेगेटिव सेंटिमेंट नहीं रखते हैं।‘ नेपाल में हुए Gen Z प्रोटेस्ट के बड़े चेहरों में से एक टंका धामी आने वाले चुनाव को लेकर उत्साहित हैं। वे मानते हैं कि प्रोटेस्ट ने चुनाव में पॉलिटिकल पार्टियों की प्राथमिकताएं बदल दी हैं। हालांकि एक और Gen Z लीडर तनुजा पांडे की राय इससे अलग है। वे कहती हैं, ‘सियासी दलों ने हमारे आंदोलन का जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल किया और फिर नजरअंदाज कर दिया।‘ नेपाल में बीते साल 8-9 सितंबर को Gen Z प्रोटेस्ट हुए। इसके बाद अब पहली बार 5 मार्च को चुनाव हो रहे हैं। इस चुनाव में Gen Z आंदोलन से निकले लीडर्स कहां हैं? भारत को लेकर नेपाल का Gen Z क्या सोचता है और नई सरकार से उनकी क्या उम्मीदे हैं। ये जानने के लिए हमने काठमांडू में Gen Z प्रोटेस्ट के बड़े लीडर्स और आम लोगों से बात की। सड़कों से लेकर रैलियों तक Gen Z का जिक्रसितंबर से नेपाल में सुशीला कार्की के नेतृत्व में अंतरिम सरकार चल रही है। चुनाव भले चरम पर हैं लेकिन काठमांडू की सड़कें भारत की तरह बैनर पोस्टर से पटी नजर नहीं आतीं। सड़क किनारे चुनावी सभाएं जरूर होती दिख जाती हैं। Gen Z प्रोटेस्ट के वक्त संसद, सुप्रीम कोर्ट से लेकर कई सरकारी भवनों में आगजनी की गई थी। दीवारों पर उनके निशान अब भी हैं। नुक्कड़ों से लेकर चुनावी सभाओं में एक जिक्र बार-बार आता है, वो है Gen Z का। इससे समझ आता है कि Gen Z प्रोटेस्ट के बाद हो रहे पहले चुनाव पर किन मुद्दों का असर रहने वाला है। हमने Gen Z लीडर टंका (पंकज) धामी से इसे और समझने की कोशिश की। टंका फिलहाल नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी में सेंट्रल कमेटी मेंबर के तौर पर एक्टिव हैं। हमने पूछा कि इस चुनाव में Gen Z प्रोटेस्ट के बड़े चेहरे कहां हैं? इस पर वे बताते हैं, 'प्रोटेस्ट के दौरान जो साथी जुड़े थे, वे अब अलग-अलग पॉलिटिकल पार्टियों में हैं। जिनसे उनके विचार मिलते हैं, वे उनके साथ जुड़ गए।' 'प्रोटेस्ट के जरिए हमने देश की सियासी सोच बदलने की कोशिश की थी। बदलाव एक दिन में नहीं आता, उसके लिए समय और सियासी समझ दोनों चाहिए। हम किसी को राजनीति से दूर नहीं रखना चाहते। हर व्यक्ति को राजनीति में हिस्सा लेने का अधिकार है। इसलिए हमने तय किया कि हममें से कुछ लोग नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के साथ मिलकर काम करेंगे।’ टंका धामी दावा करते हैं कि अब सभी पार्टियां करप्शन और युवाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर ज्यादा सजग दिख रही हैं। वे युवाओं का नजरिया समझने की कोशिश कर रही हैं। बालेन शाह के सपोर्ट में नहीं Gen Z लीडर्सटंका धामी नई सरकार से उम्मीद करते हैं कि वे युवाओं को नेतृत्व में शामिल करे और करप्शन खत्म करे। वे कहते हैं, 'अगर जमीनी हकीकत देखी जाए तो नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी को समर्थन मिल रहा है। हमें उम्मीद है कि हमारे नेता देश को आगे बढ़ाने की पहल करेंगे। जहां तक बालेन शाह और राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी का सवाल है, हमें उनके एजेंडे और डेवलपमेंट के प्लान पर संदेह है। देश को आगे कैसे बढ़ाया जाएगा, हमें इसका क्लियर रोपमैप चाहिए, जो उनके पास नजर नहीं आता।' टंका धामी Gen Z के बीच भारत विरोधी सेंटीमेंट के दावों को गलत बताते हैं। वे कहते हैं, 'भारत के साथ हमारा सनातन काल से गहरा रिश्ता रहा है। हम चाहते हैं कि भारत, नेपाल के विकास और तरक्की में सहयोग करे। कुछ लोग एंटी-इंडिया प्रचार की कोशिश करते हैं, लेकिन हम भारत को लेकर कोई ऐसा सेंटीमेंट नहीं रखते। हम दोनों देशों के बीच मजबूत रिश्ते चाहते हैं।‘ Gen Z को एक बार फिर कम टिकट मिले हमने टंका धामी की तरह ही Gen Z प्रोटेस्ट के बड़े चेहरों में से एक तनुजा पांडे से भी बात की। वे फिलहाल किसी पार्टी से नहीं जुड़ी हैं। तनुजा कहती हैं कि आंदोलन से जुड़े बहुत कम लीडर्स इस बार चुनाव लड़ रहे हैं। हालांकि वे प्रोटेस्ट से निकले लोगों की राजनीति में हिस्सेदारी देखना चाहती हैं। तनुजा आरोप लगाते हुए कहती हैं, ‘नई पीढ़ी को राजनीति में उसका हिस्सा नहीं मिला है। पॉलिटिकल पार्टियों ने जरूरत पड़ने पर हमारे आंदोलन का इस्तेमाल किया और फिर नजरअंदाज कर दिया, जो बेहद निराशाजनक है।‘ ‘संसाधनों के लिहाज से नेपाल में चुनाव लड़ना आसान नहीं है। हमारा इरादा कभी राजनीतिक पार्टी जॉइन करना नहीं था, बल्कि मौजूदा पार्टियों में सुधार लाना था। आज उन्हीं पार्टियों के भीतर युवा कार्यकर्ता अपने नेताओं से जवाब मांग रहे हैं।’ चुनावों को कैसे देख रहे Gen Z लीडर्स?चुनाव को लेकर तनुजा कहती हैं, ‘नेपाल इस समय ट्रांजीशन फेज में है। चुनाव में सिर्फ चंद दिन बाकी हैं और देश में मिली-जुली भावना है। कुछ लोग राजनीति में आई नई ताकतों से उम्मीद कर रहे हैं। जबकि कुछ पुरानी लीडरशिप की वापसी से डर रहे हैं।‘ वे सभी दलों पर आरोप लगाती हुए कहती हैं, ‘किसी भी पॉलिटिकल पार्टी ने 8 और 9 सितंबर की घटनाओं की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने की स्पष्ट मांग नहीं की है। हमें चुनाव चाहिए क्योंकि लोकतंत्र में इसका कोई विकल्प नहीं है लेकिन कई सवालों के जवाब हमें अब तक नहीं मिले हैं। ये जाने बिना वोटिंग करना दुविधा भरा है कि 8 और 9 सितंबर को क्या हुआ, किसने हमारे दोस्तों की हत्या की और किसने आगजनी।’ क्या Gen Z आंदोलन के मुद्दे चुनाव में दिख रहे? इस पर तनुजा कहती हैं, ’Gen Z के उठाए मुद्दे पार्टियों के चुनावी घोषणापत्रों में जरूर हैं लेकिन उनके इरादों में नहीं हैं।’ हालांकि वे ये भी मानती हैं कि करप्शन एक गंभीर मुद्दा है, जो सिस्टम का हिस्सा बन चुका है। इसलिए इसे खत्म करने में वक्त लगेगा। वे आगे कहती हैं, ’अभी जो संकेत दिख रहे हैं, वे बहुत उत्साह नहीं देते। क्योंकि कई पुराने करप्ट लोग फिर चुनाव लड़ रहे हैं। अगर वे संसद में लौटे तो लोकतंत्र के नाते हमें नतीजे स्वीकारने होंगे, लेकिन जिन ताकतों के खिलाफ हमने आंदोलन किया, उन्हें फिर स्वीकार करना हमारे लिए मुश्किल होगा।’ Gen Z भारत विरोधी नहीं, चीन से भी दोस्ती जरूरीइस चुनाव को तनुजा विदेश नीति के लिहाज से भी जरूरी मानती हैं। वे कहती हैं, ‘नेपाल जियोपॉलिटिक्स के लिहाज से अहम है। उसमें भारत और चीन जैसे पड़ोसियों की दिलचस्पी स्वाभाविक है। ये हमारी लीडरशिप पर निर्भर करता है कि वो इसे देश हित में कैसे इस्तेमाल करती है।’ हाल के दिनों में सामने आए कुछ नेताओं के भारत विरोधी बयानों को तनुजा गलत बताती हैं। वे कहती हैं, ‘हमारी विदेश नीति गुटनिरपेक्षता पर आधारित है और हमें उसी पर कायम रहना चाहिए। अल्ट्रा-नेशनलिज्म हमें कहीं नहीं ले जाएगा। नेताओं को पड़ोसियों के बारे में भड़काऊ बातें करने के बजाय उनसे बातचीत करनी चाहिए। हम भारत और चीन दोनों से अच्छे रिश्ते चाहते हैं।’ आंदोलन के वक्त बालेन शाह हीरो, अब सपोर्ट क्यों नहीं?Gen Z प्रोटेस्ट के वक्त बालेन शाह का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में रहा था। रैपर से राजनेता बने बालेन की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को Gen Z का फेवरेट माना जा रहा था। हालांकि तनुजा इससे इत्तेफाक नहीं रखतीं। वे मानती हैं कि बालेन शाह वादे करते हैं, लेकिन काम में कच्चे हैं। वे बालेन को Gen Z के सपोर्ट करने के दावे को गलत बताती हैं। Gen Z के क्या मुद्दे, किसका सपोर्ट कर रहे? 24 साल की मोनिका स्टूडेंट हैं। वे चाहती हैं कि अब देश में एक स्थिर सरकार बने। करप्शन रुके और सबको रोजगार मिले। वे बालेन शाह का समर्थन करती हैं। मोनिका कहती हैं, ‘जो प्रोटेस्ट हुआ था, उसका असर इस चुनाव में जरूर दिखेगा। ये चुनाव बदलाव के लिए ही हो रहा है और हमें उम्मीद है कि अब बदलाव होगा। हमें बालेन शाह जैसा नया लीडर चाहिए। हम चाहते हैं कि लोग घंटी (बालेन शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी का चुनाव चिन्ह) को वोट दें।‘ 25 साल की स्टूडेंट दीपा खड़का भी करप्शन को बड़ा मुद्दा मानती हैं। वे कहती हैं, ‘प्रोटेस्ट के बाद हमें उम्मीद है कि हालात पहले से बेहतर होंगे। जो कुछ हुआ, वो करप्शन की वजह से हुआ इसलिए अब इसका अंत होना चाहिए। हमें उसी बदलाव की उम्मीद है।‘ पहली बार वोट डालने जा रहे Gen Z क्या बोले? 5 मार्च को होने वाले चुनाव में 8 लाख नए वोटर भी हैं। इन फर्स्ट टाइम Gen Z वोटर्स पर सभी पार्टियों की नजर है। इनमें से एक 21 साल के अपशन चंद महेंद्रनगर के कंचनपुर में रहते हैं। वे काठमांडू में रहकर पढ़ाई कर रहे हैं। अपशन मानते हैं कि आने वाला चुनाव काफी क्रांतिकारी साबित हो सकता है। करप्शन और बेरोजगारी जैसे मुद्दों के सवाल पर अपशन हताशा जताते हैं। वे कहते हैं, ‘मुझे नहीं लगता कि अचानक कोई बड़ा बदलाव दिखेगा, क्योंकि करप्शन नीचे से लेकर ऊपर तक है। अगर सरकार बदलती है और युवाओं को लीडरशिप का मौका मिलता है, तो उम्मीद है कि एक-दो साल में कुछ बदलाव दिखे।‘ बेरोजगारी के मुद्दे पर वे आगे कहते हैं, ‘स्थिति गंभीर है। नेपाल एक अंडर-डेवलपिंग देश है। यहां 30% से ज्यादा युवा नौकरी के लिए विदेश जा रहे हैं। मुझे उम्मीद है कि नई सरकार नई नीतियां लाएगी और जॉब के मौके बढ़ाने के लिए काम करेगी। हालांकि तुरंत बदलाव मुश्किल है, इसमें वक्त लगेगा।‘ चुनाव में अपशन नए चेहरों को सपोर्ट करने की बात करते हैं। वे मानते हैं कि देश की बागडोर अब नए और युवा लीडर्स के हाथ में होनी चाहिए। सिर्फ प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति ही नहीं, बल्कि लोकल लेवल से उभरने वाले युवा लीडर्स भी देश के डेवलपमेंट में बड़ा रोल अदा कर सकते हैं। Gen Z बदलाव के लिए कुछ भी करने को तैयार अपशन की तरह ही 21 साल के पिसभत्ता भी फर्स्ट टाइम वोटर हैं। वे काठमांडू यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रहे हैं। पिसभत्ता प्रोटेस्ट को याद कर दुखी हो जाते हैं। वे बताते हैं, ‘मैं प्रोटेस्ट के दिन एग्जाम देने गया था। एग्जाम खत्म होने पर खबर मिली कि इसमें कई लोग मारे गए। सुनकर बहुत बुरा लगा। ऐसा लगा कि करप्शन के खिलाफ आवाज उठाने वाले युवाओं को इसकी कीमत जान देकर चुकानी पड़ी।‘ पिसभत्ता मानते हैं कि प्रोटेस्ट का चुनाव पर असर जरूर पड़ेगा। पहले बहुत लोग बार-बार एक ही पार्टी को वोट देते थे, लेकिन अब वो वोट देने पहले एक बार जरूर सोचेंगे और शायद दूसरी पार्टी को भी मौका देंगे। आने वाले चुनावों से पिसभत्ता को बड़े बदलाव की उम्मीद है। वे कहते हैं, ‘एक युवा के तौर पर मेरी उम्मीद है कि देश में बेहतर डेवलपमेंट हो, करप्शन खत्म हो और सरकार में बदलाव आए। पहले एक ही पार्टी की सरकार बार-बार आती रही इसलिए उस तरह का बदलाव नहीं दिखा और करप्शन बना रहा। अबकी बदलाव होना चाहिए, इसलिए मैं नई सरकार का समर्थन कर रहा हूं।‘ ‘दोबारा प्रोटेस्ट करने की जरूरत पड़ी तो हम उसके लिए भी तैयार हैं। युवाओं में ऊर्जा की कमी नहीं है, बदलाव और रिफॉर्म के लिए हम सब कुछ करेंगे।‘…………………..ये खबर भी पढ़ें… नेपाल में पत्नी की मौत, पति ने मांगे 100 करोड़ 8 सितंबर 2025, नेपाल में सरकार के खिलाफ जेन जी प्रोटेस्ट शुरू हुआ। अगले ही दिन प्रोटेस्ट हिंसक हो गया। सरकारी इमारतें, होटल और दुकानें प्रदर्शनकारियों के निशाने पर आ गए। राजधानी काठमांडू में होटल हयात रीजेंसी को भी निशाना बनाया गया। चारों तरफ गोलियों की आवाज और आग की लपटें थीं। इसी होटल में भारत के गाजियाबाद से आए रामबीर सिंह गोला और उनकी पत्नी राजेश देवी रुके थे। पढ़िए पूरी खबर…

दैनिक भास्कर 2 Mar 2026 5:19 am

होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने से 10 प्रतिशत महंगा हुआ कच्चा तेल, जानें क्‍या होगा भारत पर असर

रविवार को ओवर-द-काउंटर (ओटीसी) कारोबार में ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 10 प्रतिशत उछलकर लगभग 80 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। चूंकि रविवार को वायदा बाजार बंद रहता है, इसलिए यह तेजी मुख्य रूप से ओटीसी सौदों में दर्ज की गई।

देशबन्धु 2 Mar 2026 3:03 am

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच भारतीय दूतावासों की एडवाइजरी, नागरिकों से अतिरिक्त सतर्कता की अपील

विभिन्न देशों में स्थित भारतीय दूतावासों ने अपने नागरिकों के लिए एडवाइजरी जारी की है। संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), सऊदी अरब, कतर, फलस्तीन, जॉर्डन और बहरीन में भारतीय मिशनों ने लोगों से अतिरिक्त सावधानी बरतने और स्थानीय प्रशासन के निर्देशों का पालन करने की अपील की है।

देशबन्धु 1 Mar 2026 3:23 pm

सुप्रीम लीडर खामेनेई की मौत, ईरान में 40 दिनों के शोक की घोषणा

सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो गई है। ईरान के सरकारी मीडिया ने भी खामेनेई की मौत की पुष्टि कर दी है।

देशबन्धु 1 Mar 2026 1:47 pm

VIDEO: पाकिस्तान में खामेनेई की मौत पर बवाल, कराची में अमेरिकी कांसुलेट के गेट तोड़े, फायरिंग में 8 की मौत

स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, गुस्साए प्रदर्शनकारियों ने अमेरिकी कांसुलेट के मुख्य गेट को तोड़ने की कोशिश की और परिसर में घुसने का प्रयास किया। भीड़ ने पथराव किया, टायर जलाए और कुछ स्थानों पर आगजनी की घटनाएं भी हुईं।

देशबन्धु 1 Mar 2026 1:43 pm

शराब घोटाले से रिहाई, अब क्या करेंगे केजरीवाल:पंजाब-गुजरात-गोवा पर नजर, AAP मजबूत हुई तो BJP को फायदा

दिल्ली में BJP सरकार का एक साल पूरा होने पर आम आदमी पार्टी ने कैंपेन शुरू किया है। इसका नारा है- एक साल, दिल्ली बेहाल, याद आ रहे केजरीवाल। एक मार्च को जंतर-मंतर पर पार्टी BJP के खिलाफ रैली करने वाली थी। इससे दो दिन पहले 27 फरवरी को AAP संयोजक अरविंद केजरीवाल, पूर्व डिप्टी CM मनीष सिसोदिया समेत 23 आरोपियों को शराब घोटाले से डिस्चार्ज यानी आरोप तय होने से पहले आरोपमुक्त कर दिया गया। कोर्ट के फैसले के बाद जंतर-मंतर पर होने वाली रैली शक्ति प्रदर्शन की तरह हो गई है। पहले ये सिर्फ दिल्ली तक सीमित थी, अब इसमें देशभर से नेता आ रहे हैं। शराब घोटाले के आरोप की वजह से अरविंद केजरीवाल की ईमानदार वाली छवि पर गहरा दाग लगा और पार्टी विधानसभा चुनाव हार गई थी। ऐसे में तीन सवाल हैं- 1. कोर्ट के फैसले से क्या केजरीवाल की वापसी हो पाएगी?2. दिल्ली में हार के बाद सभी सीनियर लीडर पंजाब शिफ्ट हो गए थे, क्या वे दिल्ली लौटेंगे?3. पंजाब के अलावा दिल्ली और गुजरात में पार्टी का आगे का प्लान क्या होगा? पार्टी नेताओं का कहना है कि अब अरविंद केजरीवाल नेशनल पॉलिटिक्स में अपनी मौजूदगी बढ़ाएंगे। अगले साल पंजाब के अलावा उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में गुजरात में पार्टी के 5 और गोवा में 2 विधायक चुने गए थे। एक साल से चुनाव की तैयारी करा रहे केजरीवालआम आदमी पार्टी के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज कोर्ट के फैसले को अरविंद केजरीवाल की ईमानदारी पर मुहर बताते हैं। भविष्य की योजनाओं के बारे में वे कहते हैं, ‘मुझे लगता है कि अरविंद केजरीवाल की छवि को बड़ा बूस्ट मिला है। पार्टी को एक नई जिंदगी मिली है। 1 मार्च को हम बड़ी रैली कर रहे हैं। गुजरात, गोवा, पंजाब और दिल्ली से हमारे नेता आ रहे हैं। इस रैली में अरविंद जी पार्टी को नई दिशा देंगे।’ आने वाले विधानसभा चुनावों पर सौरभ कहते हैं कि पिछले एक साल से अरविंद केजरीवाल बहुत माइक्रो लेवल पर गुजरात, गोवा और पंजाब में चुनाव की तैयारियां करा रहे थे।’ दिल्ली में चुनावी हार और पार्टी की इमेज बिगड़ने पर सौरभ कहते हैं, ‘अरविंद केजरीवाल ने पूरी जिंदगी सिर्फ ईमानदारी कमाई है। इसलिए BJP ने इसी पर चोट की। झूठे केस और इमेज खराब करने की कोशिश के बावजूद हमारा सिर्फ 10% वोट ही खिसका। ये फैसला आने से पहले ही लोगों को एहसास हो गया था कि गड़बड़ हो गई है। एक साल से रेखा गुप्ता की सरकार सिर्फ झूठ बोल रही है। लोगों को शर्मिंदगी हो रही है।’ पंजाब, गुजरात और गोवा पर फोकस, संजय सिंह यूपी संभालेंगेलिकर पॉलिसी केस में नाम आने के बाद केजरीवाल ने मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया था। हालांकि, उन्हें मुख्यमंत्री रहते ही 177 दिन जेल में रहना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने शर्त रखी थी कि केजरीवाल CM ऑफिस नहीं जाएंगे और न ही किसी फाइल पर साइन करेंगे। यानी मुख्यमंत्री रहते हुए भी उनके पास पावर नहीं थी। केजरीवाल के इस्तीफे के बाद आतिशी मुख्यमंत्री बनी थीं। तब दिल्ली विधानसभा का सिर्फ 5 महीने का कार्यकाल बचा था। चुनाव में आम आदमी पार्टी बुरी तरह हार गई। 70 सीटों वाली विधानसभा में पार्टी सिर्फ 22 सीटें जीत पाई। वोट शेयर भी 10% घटकर 43% रह गया। पार्टी को हरियाणा में उम्मीद थी। उसने 88 सीटों पर कैंडिडेट उतारे, लेकिन सभी हार गए। कोर्ट के फैसले के बाद अरविंद केजरीवाल ने कहा कि पिछले कुछ साल से BJP शराब घोटाला-शराब घोटाला कर रही थी। हमारे ऊपर आरोप लगा रही थी। कोर्ट ने सारे आरोप खारिज कर दिए। बुराड़ी से आम आदमी पार्टी के विधायक संजीव झा कहते हैं, ‘पार्टी इस मुद्दे को देशभर में लेकर जाएगी। हमारे कार्यकर्ता, अलग-अलग राज्यों के नेता लोगों को बताएंगे कि किस तरह प्रधानमंत्री देश की जनतांत्रिक इकाई को खत्म कर रहे हैं।’ आगे की योजनाओं पर वे कहते हैं, ‘दिल्ली के लोग केजरीवाल को मिस कर रहे हैं। कोर्ट के फैसले ने कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा दिया है। लोगों के बीच फैलाया गया भ्रम खत्म हो गया है। पार्टी के टॉप लीडर आने वाले दिनों में आगे की योजनाओं पर मीटिंग करेंगे। पंजाब, गुजरात और गोवा पर हम ज्यादा मेहनत कर रहे हैं। इसके अलावा उत्तर प्रदेश में भी संजय सिंह के नेतृत्व में तैयारी चल रही है।’ अरविंद केजरीवाल की रिहाई से BJP को फायदासीनियर जर्नलिस्ट नीरजा चौधरी कहती हैं, ‘अब अरविंद केजरीवाल की छवि पर पॉजिटिव असर होगा। उन्हें लोगों की सहानुभूति मिलेगी। केजरीवाल की छवि ही उनकी राजनीतिक पूंजी थी। AAP के बारे में कहा जाता था कि वह दूसरी पार्टियों से अलग है।’ ‘देश के इतिहास में पहली बार किसी मुख्यमंत्री को जेल जाना पड़ा था। इससे पार्टी की इमेज और कैडर को धक्का लगा था। चुनाव के बाद या उससे पहले भी केजरीवाल पूरी तरह चुप थे। करप्शन के आरोप ने उनकी इमेज पर असर डाला था, अब फिर से उनकी इमेज बहाल होगी।’ नीरजा मानती हैं कि इस फैसले से चुनावों पर भी फर्क पड़ेगा। वे कहती हैं, ‘पंजाब, गुजरात और गोवा जैसे राज्यों में पार्टी का उभार होगा। गुजरात में अगर पार्टी मजबूत होती है, तो कांग्रेस को नुकसान होगा। इससे आखिरकार BJP को फायदा होगा।’ नीरजा आगे कहती हैं, ‘हो सकता है कि केजरीवाल पश्चिम बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी के लिए प्रचार करने जाएं। उनके संबंध अच्छे हैं। केजरीवाल INDIA ब्लॉक में लौटेंगे या नहीं, इस पर कुछ नहीं कहा जा सकता। आने वाले समय में अगर कांग्रेस के बिना रीजनल पार्टियां कोई फ्रंट बनाती हैं, तो केजरीवाल की उसमें मजबूत जगह हो सकती है।’ आम आदमी पार्टी को लंबे वक्त से कवर कर रहे जर्नलिस्ट शरद शर्मा कहते हैं कि पार्टी के इतिहास में लिकर पॉलिसी केस सबसे बड़ा कलंक था। इस फैसले से पार्टी का मनोबल जरूर बढ़ेगा। हालांकि, ऐसा नहीं है कि सिर्फ इसी एक वजह से पंजाब या दूसरी जगहों पर पार्टी के लिए सब सही हो जाएगा। ‘पंजाब में आम आदमी पार्टी गवर्नेंस किस तरह दे रही है, ये देखना जरूरी है। गुजरात और गोवा में भी पार्टी ताकत लगा रही है, लेकिन ग्राउंड पर जब तक आप उसे नहीं उतारते, तब तक सब सिर्फ मीडिया की चर्चा बनकर रह जाता है। दिल्ली में भले चर्चा ज्यादा हो, लेकिन अभी यहां चुनाव नहीं हैं।’ शरद कहते हैं कि इस केस का दिल्ली चुनाव में असर तो पड़ा था, लेकिन उसके साथ दूसरे कई मुद्दे भी थे। पंजाब अलग तरह का राज्य है। अगर अरविंद केजरीवाल इस केस में दोषी साबित हो जाते तो पंजाब के लोग ये नहीं कहते कि AAP को वोट नहीं देंगे। वहां अभी AAP की सरकार है। बेशक वहां भी पार्टी का मनोबल बढ़ेगा, लेकिन इसके साथ आपको गवर्नेंस भी देनी पड़ेगी। ‘कोई भी पार्टी 4 साल सरकार में रहती है तो उपलब्धियों के साथ समस्याएं भी रहती हैं। पंजाब में लॉ एंड ऑर्डर की समस्या है। पार्टी ने कहा था कि ड्रग्स की समस्या खत्म कर देगी, लेकिन ये अब भी है। आखिरी साल में पार्टी क्या करेगी, इस पर भी बहुत कुछ निर्भर करेगा।’ मुश्किल अब भी बाकीED हाईकोर्ट में सबूत दे, तो बदल सकता है फैसलाशराब घोटाला केस में दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को डिस्चार्ज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि केजरीवाल और सिसोदिया को इस केस में शामिल करने के लिए जांच एजेंसी के पास कोई सबूत नहीं हैं। हालांकि इसी केस के आधार पर ED ने केजरीवाल और सिसोदिया पर मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज किया था। सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील आशीष पांडे कहते हैं कि इस केस में कोर्ट ने साफ कहा कि चार्जशीट में केस को ट्रायल पर भेजने लायक सबूत नहीं हैं। ED दो तरीकों से केस दर्ज करती है, एक खुद से और दूसरा पहले से चल रहे मामले में। शराब घोटाले वाला मामला दूसरा वाला ही है।’ क्या ये केस पलट सकता है? आशीष जवाब देते हैं, ‘डिस्चार्ज होने पर केस की फिर से जांच हो सकती है। फिर से पूरी प्रक्रिया दोहराई जा सकती है। अगर भविष्य में एजेंसी कोई सबूत पेश करती है और चार्जशीट दाखिल करती है, तो केस दोबारा चल सकता है। 90% से ज्यादा केस में सेशंस कोर्ट जांच एजेंसियों की चार्जशीट मंजूर कर लेता है। फिर ट्रायल के बाद फैसला होता है।’ ‘इस केस में ऐसा नहीं हुआ है। कानून कहता है कि अगर डिस्चार्ज का ऑर्डर होता है, तो स्टे नहीं लगाया जाना चाहिए, जब तक कि कुछ अपवाद ना हो। कोई व्यक्ति ट्रायल के बाद बरी होता है, तो उस केस का फिर से ट्रायल नहीं हो सकता। डिस्चार्ज किए जाने के बाद जांच एजेंसी के पास ये ताकत है कि वह फिर मामले की जांच करे, फिर से गिरफ्तारी करे, सबूत जुटाए और चार्जशीट फाइल करे।’

दैनिक भास्कर 1 Mar 2026 7:43 am

संडे जज्बात-दलित पुजारी हूं, बिना मंत्रों वाला:ऊंची जाति के लोग पूजा नहीं कराते, उन्होंने अलग मंदिर बना लिया; बड़े मंदिर अब भी ब्राह्मण चला रहे

सुबह के करीब 6 बजे होंगे। नीलगिरि की पहाड़ियों पर हल्की धुंध थी। मैं खेत से लौटा ही था- हाथों में अभी खेत की मिट्टी लगी थी- कि मंदिर की घंटी की आवाज आई। कोई परिवार इंतजार कर रहा था। परिवार बोला, ‘रवि अन्ना, जरा पूजा कर दीजिए… बेटे का इंटरव्यू है आज’। मैंने तुरंत स्नान किया। धोती संभाली, मंदिर के भीतर गया। वार्सिती अम्मन, मीनाक्षी अम्मन और मधुरई वीरन के सामने दीया जलाया। मंत्र मुझे नहीं आते- यह बात गांव का हर आदमी जानता है। फिर जैसा कि हमेशा करता हूं, दीया घुमाया, धूप जलाई, आंखें बंद कीं। धीरे से कहा, ‘अम्मा, इनका भला करना।’ कुछ दिन बाद वही परिवार मिठाई लेकर आया। बोला- ‘अन्ना, नौकरी लग गई।’ मैं 50 साल का दलित पुजारी रवि हूं। तमिलनाडु के पहाड़ी जिले नीलगिरि की ककंजी कॉलोनी का रहने वाला। हमारे गांव में करीब 200 परिवार हैं। यहीं पैदा हुआ, यहीं पला-बढ़ा। पिता भी यहीं रहे, दादा भी, और उनके भी पिता। कह सकते हैं कि हमारी कई पीढ़ियां इसी मिट्टी में मिली हुई हैं। सच कहूं तो मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि एक दिन अपने ही गांव के मंदिर में पुजारी बनूंगा। न मैं कभी स्कूल गया, न संस्कृत पढ़ी, न कोई मंत्र आता है। पूजा-पाठ की तो हमारे घर में दूर-दूर तक कोई रवायत नहीं थी। लेकिन जब भी किसी मंदिर के सामने से गुजरता, मन में छोटी-सी इच्छा जरूर पलती थी- काश, कभी मैं भी भगवान के सामने खड़ा होकर किसी के लिए आशीर्वाद मांगता। बस इतनी-सी इच्छा। कोई बड़ा सपना नहीं, कोई महत्वाकांक्षा नहीं। सिर्फ मन की एक साध थी। फिर समय बदला। सरकार ने मंदिरों में दलित पुजारियों की नियुक्ति का नियम लागू किया। जिस दिन यह खबर आई, हमारे गांव में कई दिनों तक बैठकें चलीं। चर्चा हुई, मतभेद हुए। कुछ लोग मेरे पुजारी बनने के खिलाफ थे, लेकिन अंत में एकमत हुए और मेरा नाम तय किया। लोगों का कहना था - ‘रवि जो मांगता है, भगवान सुन लेते हैं।' वह सीधा आदमी है। सबका हाल-चाल पूछता है। किसी के दुख-सुख में पीछे नहीं हटता। गांव के मंदिर के लिए सबसे सही आदमी है। मैंने साफ कहा था- ‘मुझे मंत्र नहीं आते।’ गांव वालों ने जवाब दिया- ‘हमें मंत्र नहीं, मन चाहिए।’ बस, उसी दिन से मैं इस मंदिर का पुजारी बन गया। सरकार मुझे इसके लिए 20 हजार रुपए महीने की तनख्वाह देती है। इस मंदिर में तीन देवी-देवता विराजते हैं- वार्सिती अम्मन, मीनाक्षी अम्मन और मधुरई वीरन। मेरी पूजा करने की विधि बहुत सीधी-सादी है। मैं धूप जलाता हूं, दीया-बाती करता हूं। फिर भगवान के सामने खड़ा होकर धीरे-धीरे दीया घुमाता हूं। आंखें बंद करता हूं और मन ही मन कहता हूं- ‘इनका भला करना।’ बस इतना ही। एक बार गांव का एक परिवार मेरे पास आया। सालों से उनके घर बच्चा नहीं हो रहा था। चेहरे पर चिंता साफ थी। उन्होंने कहा, ‘रवि अन्ना, हमारे लिए प्रार्थना कर दो।’ मैंने हमेशा की तरह दीया जलाया, धूप दिखाई, और भगवान से कहा- ‘अम्मा, इनके घर भी किलकारी गूंजे।’ कुछ महीनों बाद वही परिवार खुशखबरी लेकर आया। उनके घर बच्चा हुआ था। वे मिठाई लेकर आए, मेरे पैरों को छूने लगे। मैं थोड़ा संकोच में पड़ गया। मैंने कहा- ‘यह सब भगवान की कृपा है।’ अब आप ही बताइए, इसमें मंत्रों का क्या काम था? सच कहूं तो जब भी मैं किसी के लिए पूजा करता हूं, पूरे मन से करता हूं। मुझे लगता है भगवान मन की भाषा समझते हैं। मैं इतना ही जानता हूं कि मैं जो भी कहता हूं, सच्चे दिल से। शायद उसी सच्चाई की आवाज ऊपर तक पहुंचती होगी। इस मंदिर में हम पूरे महीने में सिर्फ एक दिन सामूहिक पूजा करते हैं। पोंगल, दीवाली, पूर्णमा, तमिल नया साल सब यहीं मनाते हैं। मंदिर में तीन बार सालाना त्यौहार होता है। उस दिन अन्नदान किया जाता है। सालाना त्यौहार पर गांव के जो लोग बाहर रहते हैं, देश-विदेश कहीं भी। उन्हें गांव आना होता है। सालाना हर परिवार से दो से तीन हजार रुपए लिए जाते हैं। इसके अलावा काफी लोग इस मंदिर में खास तरह की पूजा भी करवाते हैं। इन मौको पर गांव के लोगों के सगे-संबंधी और उनके दोस्त भी आ सकते हैं। दरअसल, इस तरह सरकार द्वारा चलाए जा रहे मंदिरों में कोई भी जा सकता है। हालांकि, दलितों के अलावा यहां दूसरे जाति, समुदाय के लोग नहीं आते। इसके अलावा गांवों में कुछ प्राइवेट मंदिर भी हैं, जहां लोग जाते हैं। पहले इन मंदिरों की पूरी व्यवस्था ब्राह्मणों के हाथ में थी। हम जैसे लोगों के लिए मंदिर के भीतर की जगह कुछ अलग-सी लगती थी, लेकिन वहां तक पहुंचने का हमें अधिकार नहीं था। यही परंपरा चली आ रही थी। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। राज्य में मेरी तरह दलित पुजारियों की नियुक्तियां हुई हैं। लेकिन यह बदलाव सभी को रास नहीं आया। ऊंची जाति के लोगों को आज भी अच्छा नहीं लगता कि कोई दलित पूजा कराए। उन्होंने मंदिर आना बंद कर दिया और अपना अलग मंदिर बनवा लिया। अब तमिलनाडु में जगह-जगह लोगों के अपने मंदिर दिखाई देते हैं। लेकिन, मुझे इससे फर्क नहीं पड़ता। वे अपने तरीके से पूजा करते हैं, हम अपने। हां, एक बात साफ हो गई है। अब हमें कोई किसी भी मंदिर में जाने या पूजा-पाठ करने से नहीं रोक सकता। यह फर्क मैं अपनी आंखों से देख रहा हूं। कुछ बड़े मंदिर जहां ब्राह्मणों के साथ दलित पुजारी बनाए गए हैं, वहां उनके साथ अब भी भेदभाव किया जाता है। उन्हें बड़े विधि-विधान नहीं करने दिए जाते। मानसिक उत्पीड़न किया जाता है। कहा जाता है कि उनमें पूरी योग्यता नहीं है। उन्हें मंत्र ठीक से नहीं आते। अपने मेंदिर मैं ही अकेला हूं, तो मुझे यह सब नहीं झेलना पड़ता। पिछड़े समाज के लोग पहले भी हमारे साथ थे, अब तो हमारी और इज्जत करने लगे हैं। मेरी प्रार्थना से उनका काम हो जाए, तो वे हमें पैसे, कपड़े और मिठाइयां देकर जाते हैं। लेकिन ब्राह्मण और ऊंची जाति के लोग अब भी हमसे दूरी बनाकर रखते हैं। दरअसल, तमिलनाडु के बड़े मंदिरों में आज भी पुजारी ब्राह्मण ही हैं। जब कभी मैं उन मंदिरों में जाता हूं- भीड़ के बीच खड़े होकर, सिर झुकाकर दर्शन करता हूं- तो साफ दिखता है कि वहां की पूरी व्यवस्था अब भी उन्हीं के हाथों में है। गर्भगृह के भीतर कौन जाएगा, पूजा कौन कराएगा, सब वही तय करते हैं। लेकिन वहां दलितों के पुजारी बनने की बात… अभी दूर की चीज है। फिर भी कहूं तो, जितना हुआ है, वह भी कम नहीं है। पहले जहां मंदिरों प्रवेश तक करने नहीं दिया जाता था, आज छोटे मंदिरों में ही सही हम पूजा करा रहे हैं। सरकार ने कम-से-कम शुरुआत तो की है। मंदिरों में पूरी बराबरी भले ही नहीं मिली है, लेकिन बहुत हद तक न्याय हुआ है। बाकी जो रह गया है, शायद वह आने वाले समय हो जाएगा। यहां सरकारी नीति की बात करूं तो कागज पर तो साफ लिखा है- किसी भी जाति का व्यक्ति पुजारी बन सकता है। नियम के हिसाब से हमारी नियुक्ति बड़े मंदिरों में भी होनी चाहिए। लेकिन अगर अचानक बड़े मंदिरों में हमारी नियुक्ति कर दी जाए, तो शायद राज्य में हंगामा खड़ा हो जाएगा। विरोध-प्रदर्शन हो सकते हैं। सुनते हैं कि ब्राह्मण, सरकार की इस व्यवस्था के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में भी जा चुके हैं। हालांकि, मुझे इस बारे में ज्यादा नहीं मालूम। सुप्रीम कोर्ट में मामला होने की वजह से राज्य में अभी बहुत सारे पद खाली हैं। बहुत सारे मंदिरों में दलितों की नियुक्ति होना बाकी है। लेकिन सोचता हूं- चलो, शुरुआत तो हुई। सच बताऊं, जब अपने ही गांव के मंदिर में दीया जलाता हूं, तो मन गदगद हो जाता है। लगता है जो कभी असंभव था, वह आज सामने हो रहा है। और फिर मन में एक उम्मीद भी पलती है- शायद आने वाले सालों में तस्वीर और बदलेगी। हमारी अगली पीढ़ी बिना किसी डर या विरोध के बड़े मंदिरों में पूजा कराएगी। हालांकि, अभी सरकार ने एक और अच्छा काम कर दिया है। कोई भी किसी भी जाति का हो, अगर वह पुजारी बनना चाहता है तो वह बाकायदा 3 साल की पढ़ाई करके बन सकता है। मैं जानता हूं कि तमिलनाडु के सिवा बाकी राज्यों में ऐसा नहीं है। वहां कोई दलित पुजारी नहीं है। बल्कि वहां तो दलितों के मंदिर जाने पर भी पाबंदी है। इसलिए कहूंगा कि तमिलनाडु इस मामले में एक मॉडल है। तमिलनाडु के मॉडल को फॉलो किया जाए तो वहां के समाज में भी काफी अच्छा हो सकता है। लोग खुश रहेंगे। (दलित पुजारी रवि ने अपने जज्बात भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से साझा किए हैं) ------------------------------------------------ 1- संडे जज्बात-दोस्त की प्रेमिका प्रेग्नेंट हुई, रेप केस मुझपर चला:पंचायत ने 6 लाख में सौदा किया, 5 साल जेल में रहा, अब बाइज्जत बरी बिहार के दरभंगा जिले का रहने वाला मैं मुकेश कुशवाहा। मुझ पर 17 साल की लड़की के रेप और पॉक्सो एक्ट के तहत मुकदमा चला। वो लड़की मेरे दोस्त की प्रेमिका थी। दोस्त ने उसे प्रेग्नेंट किया था, लेकिन मुकदमा मुझ पर चला। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- संडे जज्बात-पुलिस ने मेरे प्राइवेट पार्ट पर ईंट बांधी:सिर कुर्सी में बांधकर उल्टा टांगा, मैं वकील बनकर केस खुद लड़ा- 12 साल बाद जीता 18 साल की उम्र में पुलिस ने मुझे हत्या के मामले में आरोपी बना दिया। मैंने अपने केस की खुद पैरवी की और 12 साल बाद बाइज्जत बरी हुआ। अपना केस लड़ने के लिए लॉ किया और अब मैं एडवोकेट अमित चौधरी हूं। मेरठ बार एसोसिएशन का सदस्य भी हूं। मेरी जिंदगी पर जल्द ही एक फिल्म बन रही है, जो नेटफ्लिक्स पर रिलीज होगी। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें

दैनिक भास्कर 1 Mar 2026 5:43 am

86 साल के लकवाग्रस्त खामेनेई की कहानी:एक मौलवी कैसे बना ईरान का सुप्रीम लीडर; अमेरिका-इजराइल उनकी जान के पीछे क्यों पड़े

अमेरिका और इजराइल के निशाने पर अब ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम नहीं, बल्कि ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और इजराइली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू भी ईरान में तख्तापलट चाहते हैं। इसी के चलते शनिवार को ईरान पर हुए हमले के बाद खामेनेई को तेहरान से निकालकर किसी सुरक्षित जगह ले जाया गया। रिपोर्ट्स हैं कि ट्रम्प के सामने खामेनेई और उनके उत्तराधिकारियों को मारने का प्लान पेश किया गया है, जिस पर फैसला लेना बाकी है। नेतन्याहू भी मानते हैं कि खामेनेई की हत्या के बाद क्षेत्र में स्थिरता आ जाएगी। आखिर क्या है अयातुल्ला अली खामेनेई की कहानी, कैसे बने ईरान के सुप्रीम लीडर और अमेरिका-इजराइल उनके पीछे क्यों पड़े; जानेंगे भास्कर एक्सप्लेनर में… ईरान में मॉडलिंग के दौर में पैदा हुए, 11 साल की उम्र में ‘मौलवी’ बने 19 अप्रैल 1939। ईरान का सबसे बड़ा धार्मिक शहर मशहद। एक मौलवी सैयद जावेद खामेनेई के घर आयतुल्लाह सैयद अली खामेनेई का जन्म हुआ। वे 8 भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर थे। 4 साल की उम्र में खामेनेई को मकतब भेजा गया, जहां उन्होंने कुरान, अरबी और इस्लामी तालीम हासिल की। आयतुल्लाह अली खामेनेई अपनी किताब 'सेल नम्बर 14: द ऑटोबायोग्राफी ऑफ अयातुल्लाह खामेनेई' में लिखते हैं, '1950 के दशक में मेरा दाखिला मशहद के एक नए इस्लामी स्कूल में हुआ। मुझे क्लास में सबसे आगे की सीट पर बैठाया जाता था। मैं मैथ्स और इंग्लिश में अच्छा था और ब्लैकबोर्ड पर लिखे हर सवाल का जवाब सुलझा देता था। एक बार स्कूल में प्रोग्राम हुआ, जिसमें मैंने कुरान की आयतें पढ़कर सुनाईं। मेरी जमकर तारीफ हुई और फिर मैंने अपने पिता की तरह मौलवी बनने की राह चुनी।' इसके बाद वो ईरान के कोम शहर में गए, जहां उन्होंने अयातुल्लाह रूहोल्लाह खोमैनी से तालीम ली और 11 साल की कम उम्र में ही मौलवी बन गए। खामेनेई उस दौर के ईरान में बड़े हो रहे थे जब शाह मोहम्मद रजा पहलवी का शासन था। शाह पंथनिरपेक्ष और पश्चिमी विचारों को बढ़ावा देने वाले राजा माने जाते थे। उस दौर के ईरान में मॉडलिंग, फिल्में, नाइट क्लब पार्टीज और वेस्टर्न कपड़े पहने का चलन था। खामेनेई बचपन में मौलवियों की पोशाक पहनकर अपने हमउम्र बच्चों के साथ सड़कों पर खेलते, तो लोग उनका मजाक उड़ाया करते थे। मोहर्रम में फिल्म दिखाने के विरोध से शुरू की राजनीति, खोमैनी के फॉलोअर बने 'सेल नम्बर 14' में खामेनेई लिखते हैं, '1950 के दशक में ईरान में पश्चिमी कल्चर अपने चरम पर था। उन दिनों मॉर्डनाइजेशन की हवा चल रही थी। हालांकि, मुहर्रम के महीने में और खासतौर से पहले 10 दिनों के लिए सभी सिनेमाघरों और फिल्मों पर रोक लगा दी जाती थी। लेकिन 1955 में सब बदल गया। शहर के गवर्नर ने मुहर्रम के 1 से 12 दिनों के बंद पर पाबंदी हटाने का आदेश जारी किया। इस फैसले का हम लोगों ने विरोध किया। यही फैसला हमारे अंदर चिंगारी बनकर भड़का।' खामेनेई ने किताब में आगे लिखा, ‘मैं, मेरे दोस्त और कुछ लोग इकट्ठा हुए और एक लेटर तैयार किया, जिसमें इस्लामिक गुरुओं से अच्छाई के रास्ते पर चलने और बुराई से बचने का आदेश लिखवाया। हमारे प्रिंटिग मशीन नहीं थी, इसलिए हमने हाथ से लिखकर कई सारी कॉपियां बनाईं। हर एक कॉपी 4 पेज की थी और इसे नकल करने में 2 घंटे लगते थे। यह मेरा राजनीति में पहला कदम था।’ 1960 के दशक में खामेनेई पर ईरान के धर्मगुरु रुहोल्ला खोमैनी का गहरा असर हुआ। खोमैनी ईरान के शासक की नीतियों और 1963 में 'व्हाइट रिवोल्यूशन' के खिलाफ खड़े हो गए थे, जिसके तहत ईरान को पश्चिमी देशों की तरह डेवलप करना था। खोमैनी को लगता था कि यह इस्लाम और ईरानी संस्कृति के खिलाफ है। इस्लाम और राजनीति को अलग नहीं किया जा सकता और देश में विलायत-ए-फकीह यानी इस्लामी धर्मगुरुओं का शासन लाने की बात कही। खामेनेई इससे बहुत प्रभावित हुए। 1962-63 में खोमैनी ने शाह के खिलाफ खुलकर विरोध शुरू कर दिया। खामेनेई ने खोमैनी की बात को मशहद समेत कई शहरों में फैलाने में मदद की। 1963 में खामेनेई ने मशहद की एक मस्जिद में कहा, 'शाह का शासन इस्लाम और लोगों के खिलाफ है। हमें अपने धर्म और देश की हिफाजत करनी होगी।' खामेनेई को गिरफ्तार कर लिया, लेकिन इससे वे युवाओं और शाह के खिलाफ आंदोलनों में मशहूर हो गए। 1970 का दशक आते-आते खामेनेई राजनीति में माहिर हो गए। उनके गुरु खोमैनी को देश से निकाल दिया गया, तो खामेनेई ही उनके भाषण लोगों तक फैलाते रहे। खामेनेई ने एक सभा में खोमैनी का सीक्रेट टेप चलाया, जिसमें खोमैनी ने कहा, ‘शाह का शासन एक गैर-इस्लामी तानाशाही है और इसे उखाड़ फेंकना हर मुसलमान का फर्ज है।’ 1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति आई और शाह की सरकार गिर गई। इस्लामी सत्ता आई, तो खामेनेई सरकार में शामिल हो गए फरवरी 1979... ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद खोमैनी पेरिस से वापस ईरान आए। नई सरकार बनाई और अपने करीबी लोगों को बड़े पदों पर नियुक्त किया। खामेनेई को क्रांतिकारी परिषद यानी रिवोल्यूशनरी काउंसिल में शामिल कर लिया। यह परिषद नई सरकार का आधार थी और प्रशासन को बेहतर करने का काम करती थी। उस समय सांसद और बाद में ईरान के राष्ट्रपति बने हसन रूहानी ने संसद में खामेनेई को उप रक्षामंत्री बनाने का प्रस्ताव देते हुए कहा था, 'हमें ऐसे इंसान की जरूरत है जो इस्लामी क्रांति के लिए आगे बढ़ता रहे और सैन्य मामलों में खोमैनी के नजरिए को बुलंद करे। सैयद अली खामेनेई इस जिम्मेदारी के लिए सबसे बेहतर हैं।' खामेनेई को उप रक्षामंत्री नियुक्त किया गया। उन्होंने इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर यानी IRGC का गठन करने में बड़ी भूमिका निभाई। IRGC आगे चलकर ईरान की सबसे ताकतवर फौज बनी। IRGC को बनाने का मकसद ऐसी सेना खड़ी करना था जो देश के लिए धार्मिक, राजनीतिक और आर्थिक मोर्चों पर लड़ सके। जो इस्लामिक राष्ट्र ईरान को न सिर्फ बाहरी खतरों, बल्कि देश के अंदर के मामलों को भी सुलझा सके। टेप रिकॉर्डर से खामेनेई की हत्या को कोशिश, दायां हाथ और कान गंवाया 1980 का दशक। ईरान और इराक के बीच जंग छिड़ी हुई थी। तेहरान की जुमा की नमाज के इमाम अयातुल्ला अली खामेनेई जंग के अग्रिम मोर्चे का मुआयना कर लौटे थे। शनिवार, 27 जून 1981 को खामेनेई अपने तय कार्यक्रम के तहत तेहरान की अबुजार मस्जिद गए। इसके बाद वे लोगों के सवालों के जवाब देने लगे। उनके सामने रखी टेबल पर कागजों का पुलिंदा जमा था, जिन पर सवाल लिखे हुए थे। इस बीच एक शख्स ने टेबल पर एक टेप रिकॉर्डर रख दिया। खामेनेई ने जवाब देना शुरू किया। एक मिनट के भीतर ही टेप रिकॉर्डर से सीटी की आवाज आने लगी और तेज ब्लास्ट हुआ। खामेनेई लहूलुहान हो गए। टेप रिकॉर्डर के अंदर लिखा था- 'इस्लामिक रिपब्लिक को फोरकान समूह का एक उपहार।' फोरकान समूह एक ईरानी उग्रवादी विपक्षी संगठन था, जो शिया इस्लामवादी विचारधारा को मानता था। इस समूह को सद्दाम हुसैन का समर्थन मिला हुआ था। सद्दाम ईरान में खोमैनी की सत्ता पलटना चाहता था और IRGC के मुखिया खामेनेई बीच में थे। खामेनेई की दाईं बांह, वोकल कॉर्ड्स और फेफड़े को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ। इलाज के लिए उन्हें दक्षिणी तेहरान के बहारलू हॉस्पिटल में एडमिट किया गया। कई महीनों बाद वे ठीक हुए, लेकिन दाएं हाथ में हमेशा के लिए लकवा मार गया और एक कान से सुनाई देना बंद हो गया। इस हमले को लेकर एक बार खामेनेई ने कहा था, ‘अगर मेरा दिमाग और जीभ काम करे तो मुझे हाथ की जरूरत नहीं पड़ेगी। मेरे लिए मेरा दिमाग और जीभ काफी है।’ बम धमाके में राष्ट्रपति राजाई की मौत हुई, खामेनेई तीसरे राष्ट्रपति बने 30 अगस्त 1981, दोपहर का समय। तेहरान में प्रधानमंत्री कार्यालय में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की एक बैठक चल रही थी। इसमें राष्ट्रपति मोहम्मद अली राजाई और प्रधानमंत्री मोहम्मद जवाद बहरोन भी शामिल थे। तभी MEK का सीक्रेट एजेंट मसूद कश्मीरी कमरे में दाखिल हुआ। khamenei.ir के मुताबिक, कश्मीरी ने कमरे में एक ब्रीफकेस रख दिया, जिसमें बम छिपा हुआ था। कुछ ही देर बाद कमरे में धमाका हुआ और वहां मौजूद सभी लोग मारे गए। राजाई और बहोरन की फौरन मौत हो गई, जिसके बाद सरकार में मुश्किलें बढ़ गईं। एरवंड अब्राहमियन की किताब 'खामेनेईनिज्म: एसे ऑन द इस्लामिक रिपब्लिक' के मुताबिक, देशभर में नए राष्ट्रपति की मांग जोर पकड़ने लगी। खामेनेई इस समय तक IRP के बड़े नेताओं में शामिल हो गए थे। इस वजह से खोमैनी और IRP के नेताओं ने नए राष्ट्रपति के लिए खामेनेई का नाम आगे किया। अकबर हाशमी राफसंजानी ने खामेनेई का नाम बढ़ाते हुए कहा, ‘सैयद अली खामेनेई ने क्रांति के लिए अपनी जान जोखिम में डाली है। वे खोमैनी के भरोसेमंद आदमी हैं और इस मुश्किल वक्त में देश की कमान संभाल सकते हैं।’ इस पर खोमैनी ने कहा, ‘हमें ऐसे नेताओं की जरूरत है जो इस्लामिक रिपब्लिक ईरान की हिफाजत करें। खामेनेई ने बार-बार यह साबित किया है।’ 2 अक्टूबर 1981 को देशभर में राष्ट्रपति के चुनाव हुए और 13 अक्टूबर को नतीजा आया। खामेनेई 95% वोटों से राष्ट्रपति पद का चुनाव जीते और ईरान के तीसरे राष्ट्रपति बने। शपथ लेते हुए खामेनेई ने कहा, ‘मैं इस्लामी क्रांति की हिफाजत और जनता की सेवा के लिए अपनी जान भी दे दूंगा।’ खामेनेई को ‘रहबर’ बनाने के लिए बदला संविधान 1985 में रहबर अयातुल्ला रुहोल्लाह खोमैनी ने हुसैन अली मोंतजरी को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था। लेकिन किसी बात से नाराज होकर फैसला वापस ले लिया। इसी बीच 3 जून 1989 को खोमैनी का निधन हो गया। अगली सुबह 'असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स' की मीटिंग शुरू हुई। तिजोरी में रखा सीलबंद वसीयतनामा लाया गया। राष्ट्रपति खामेनेई ने करीब 2 घंटे में 35 पन्नों की वसीयत पढ़ी। इसके बाद अगले रहबर को लेकर चर्चा शुरू हुई। प्रस्ताव रखा गया कि 'शूरे-ए-रहबरी' यानी एक नेतृत्व परिषद बनाए या 'रहबरी-ए-फरदी' यानी एक व्यक्ति को पूरी कमान सौंपी जाए। नेतृत्व परिषद के लिए तीन ग्रुप बने, जिनमें से 2 के अध्यक्ष खामेनेई और एक के अध्यक्ष रफसंजानी थे। वोटिंग हुई तो 45 वोट 'एक व्यक्ति' पक्ष में और 23 खिलाफ आए। जब तय हो गया कि एक व्यक्ति को ही ईरान की कमान सौंपनी चाहिए तो ग्रैंड अयातुल्ला मोहम्मद-रजा गोलपायगानी और अली खामेनेई ने नॉमिनेशन किया। वोटिंग में खामेनेई को 60 वोट मिले, जबकि गोलपायगानी को महज 14 वोट मिले। यानी खामेनेई अगले रहबर चुन लिए गए। रहबर बनने के लिए जरूरी था कि व्यक्ति मरजा या अयातुल्ला हो। इस मियाद को खत्म करने के लिए ईरानी संविधान में संशोधन किया गया। 6 अगस्त 1989 को फिर से असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स की मीटिंग हुई और खामेनेई को 64 में से 60 वोट मिले। खामेनेई के पक्ष में वोट देने वाले इमामी काशानी ने एक इंटरव्यू में कहा था, ‘खामेनेई को चुनने के अलावा हमारे पास कोई अन्य विकल्प नहीं था। खामेनेई खुद सुप्रीम लीडर नहीं बनना चाहते थे, लेकिन रफसंजानी और मैं ये जानते थे कि हमें जल्द ही फैसला करना होगा, क्योंकि सद्दाम हुसैन की सेना ईरान के बॉर्डर पर थी।’ अमेरिकी थिंक टैंक 'कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस' के सीनियर फेलो करीम सादजादपुर के मुताबिक, इतिहास की इस दुर्घटना ने एक कमजोर राष्ट्रपति को शुरुआत में कमजोर सुप्रीम लीडर से सदी के पांच सबसे शक्तिशाली ईरानियों में से एक बना दिया। फ्लोरिडा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल रिलेशंस के एसोसिएट प्रोफेसर एरिक लोब के मुताबिक, '1989 में ईरानी संविधान में संशोधन किया गया ताकि खामेनेई जैसे निचली श्रेणी के मौलवी को यह पद मिल सके। खोमैनी का उत्तराधिकारी बनने के बाद खामेनेई को रातों-रात एक महान अयातुल्ला बना दिया गया। खामेनेई भले ही लंबे समय से वफादार और सत्ता के अंदरूनी व्यक्ति थे, लेकिन उनमें खोमैनी जैसा करिश्मा और धार्मिक ताकत नहीं थी।’ देश में विरोधियों को कुचलने से लेकर पत्रकारों को प्रताड़ित करने, कट्टरपंथ को बढ़ावा देने और महिलाओं की आजादी को खत्म करने की वजह से खामेनेई पर अकसर सवाल उठते हैं। खामेनेई की जान के पीछे क्यों पड़े हैं इजराइल-अमेरिका? पिछले साल जून में अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर हमला किया। तब हल्ला हुआ कि ईरान में सत्ता परिवर्तन होना चाहिए। फिर 2025 के आखिर में ईरान में आंदोलन हुए, जिनमें भी खामेनेई को हटाने की मांग हुई। अमेरिका-इजराइल ने इसे सपोर्ट किया, लेकिन ईरानी सत्ता ने आंदोलन को कुचल दिया। अब फिर से ईरान पर हमले हुए हैं। ट्रम्प और नेतन्याहू ने ईरान में सत्ता परिवर्तन की बात कही है। दोनों नेताओं ने कहा है कि अब ईरानी लोगों को आगे आकर अपने देश और भाग्य की बागडोर संभालनी चाहिए। दोनों नेताओं के टारगेट पर खामेनेई हैं। दरअसल, ईरान के हर जरूरी मुद्दे या विदेश नीतियों पर आखिरी फैसला सुप्रीम लीडर यानी खामेनेई ही लेते हैं। इजराइल का मानना है कि न्यूक्लियर प्रोग्राम और IRGC के खात्मे के लिए खामेनेई की हत्या जरूरी है। इसके साथ वहां सत्ता परिवर्तन भी होगा। जून 2025 में ट्रम्प ने भी धमकी देते हुए कहा था कि खामेनेई एक आसान निशाना है। हम उसे मारने वाले नहीं हैं, कम से कम अभी तो नहीं। रिपोर्ट्स हैं कि खामेनेई के बाद सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सेक्रेटरी अली लारीजानी ईरान की सत्ता संभाल सकते हैं। खामेनेई ने हाल ही में लारीजानी की शक्तियां बढ़ाईं, ताकि वे जंग जैसे हालातों में ईरान स्थिति में वे सरकार चला सकें। हालांकि खामेनेई के निधन के बाद नए रहबर का चुनाव इतना आसान नहीं है। मीडिया रिपोर्ट्स हैं कि ईरान में सैन्य, राजनीतिक और धार्मिक लीडरशिप के बीच पावर टसल हो सकता है। वहीं तख्तापलट हुआ तो इस्लामिक क्रांति के बाद देश छोड़कर भागे ईरान के पूर्व शाह के बेटे रजा पहलवी अपने पिता की गद्दी पर दावा कर सकते हैं। वे अभी अमेरिका में हैं। ट्रम्प के चुनाव जीतने के बाद रजा पहलवी ने कहा था कि ईरान में लोकतांत्रिक सत्ता वापस आनी चाहिए, जो पश्चिमी देशों के साथ समृद्ध होगा, इजराइल के साथ शांतिपूर्ण रिश्ते रखेगा और अपने पड़ोसियों से दोस्ती करेगा। दरअसल, इजराइल और ईरान की रंजिश की कई बड़ी वजहें हैं… अमेरिकी थिंकटैंक मिडिल-ईस्ट इंस्टीट्यूट में ईरान प्रोग्राम के डायरेक्टर एलेक्स वतांका का कहना है, 'खामेनेई जितने जिद्दी हैं, उतने ही सतर्क भी हैं। यही वजह है कि वह इतने लंबे समय से सत्ता के केंद्र में बने हुए हैं।' ----------- ईरान से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए… जब ईरान ने 53 अमेरिकियों को बंधक बनाया: छुड़ाने गए 8 कमांडोज की लाश लौटी, 444 दिनों तक अमेरिका कैसे गिड़गिड़ाता रहा 46 साल पहले 4 नवंबर 1979 को ईरान के अमेरिकी दूतावास पर हमला हुआ। भीड़ ने दूतावास पर कब्जा कर लिया और अमेरिकी अधिकारियों और लोगों को बंधक बना लिया। यहीं से शुरू हुई इतिहास की सबसे बड़ी 'होस्टेज क्राइसिस'। पूरी खबर पढ़िए…

दैनिक भास्कर 1 Mar 2026 5:42 am

‘ईरान को मिटाना जरूरी, लंबी जंग के लिए तैयार’:इजराइल में खतरे के अलार्म, भारतीय बोले- मिसाइलों की आदत हो गई, ईरान में स्टूडेंट फंसे

इजराइल के तेल अवीव में रहने वाले ईटान टाइगर एक्टिविस्ट हैं। 28 फरवरी की सुबह उनकी नींद सायरन की तेज आवाज के साथ खुली। वे उठे और सेफ हाउस की तरफ भागे। सेफ हाउस में पहुंचकर मोबाइल चेक किया। पता चला कि इजराइल और अमेरिका ने ईरान पर हमला कर दिया है। ईटान समझ गए कि ये सायरन ईरान के जवाबी हमले से बचने के लिए है। इजराइल की तरह ही ईरान में भी जंग का डर है। कुम शहर में रहने वाले मोहम्मद हुसैन बताते हैं कि देश की इंटेलिजेंस एजेंसी ने कहा है जंग लंबी चलने वाली है। इसके लिए तैयार रहना है। स्कूल-कॉलेज बंद हैं। लोगों से कहा गया है कि आर्मी पर भरोसा रखें। हमला करने वालों को जवाब दिया जाएगा। 28 फरवरी को इजराइल और अमेरिका ने ईरान के 10 शहरों पर एयरस्ट्राइक की है। जवाब में ईरान ने करीब 400 मिसाइलें दागीं। उसने इजराइल के अलावा कतर, कुवैत, जॉर्डन, बहरीन, सऊदी अरब और UAE में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया। साथ ही UAE के सबसे ज्यादा आबादी वाले शहर दुबई पर भी हमला किया। दैनिक भास्कर ने दोनों देशों के लोगों से बात कर वहां के हालात जाने। जगह: तेल अवीव, इजराइलइजराइल पर ईरानी हमले के बाद तेल अवीव में लोग बंकरों में रह रहे हैं। ईटान टाइगर बताते हैं कि होम कमांड से हमें कुछ-कुछ देर में अलर्ट मिल रहे हैं। हालांकि, यहां हालात ठीक हैं। अब तक मिसाइल गिरने या नुकसान की जानकारी नहीं मिली है। ईटान आगे कहते हैं, ‘अमेरिका और इजराइल मिलकर सबसे बड़े दुश्मन ईरान को खत्म करने के लिए लड़ रहे हैं। ईरान सिर्फ इजराइल के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए खतरनाक है। उसकी बैलेस्टिक मिसाइल 4 हजार किमी तक जा सकती हैं। अब ईरान यूरोपीय देशों तक हमला कर सकते हैं। अक्टूबर 2023 के बाद से हम लगातार जंग के साए में जी रहे हैं। हमास के बाद हिजबुल्ला से लड़ाई लड़ी है।’ ईटान हमले की तारीख चुनने के पीछे की वजह बताते हैं। कहते हैं कि यहूदी बहुत पुराना धर्म है। हमारी परंपराएं भी पुरानी हैं। हमारे यहां दो दिन बाद पूरिम फेस्टिवल मनाया जाने वाला है। ये खुशी का त्योहार है, जो बाइबिल की एस्तेर की कहानी पर आधारित है। इसके मुताबिक, फारस (ईरान) में यहूदियों को खत्म करने की साजिश रची गई थी। रानी एस्तेर और उनके चाचा मोर्दकै की वजह से यह साजिश नाकाम हो गई और यहूदी समुदाय बच गया। इसी खुशी में पूरिम फेस्टिवल मनाया जाता है। इजराइल में रह रहे भारतीय बोले- हमें भी जंग की आदत हो गईविकास यादव उत्तर प्रदेश के जौनपुर के रहने वाले हैं। तेल अवीव के पास लोद सिटी में एक कंस्ट्रक्शन साइट पर इलेक्ट्रिशियन का काम करते हैं। इजराइल में रहते हुए करीब 2 साल हो गए। 28 फरवरी की सुबह विकास की नींद अलार्म से नहीं बल्कि सायरन से खुली। पूरे तेल अवीव में अलर्ट अलार्म बज रहे थे। इमरजेंसी अलार्म बजते ही लोगों को बमों से बचाने वाले सेफ हाउस में जाना होता है। इजराइल के वक्त के मुताबिक, सुबह करीब 8.30 बजे इजराइल ने ईरान पर हमला किया। इसके साथ ही तेल अवीव में अलार्म बजने लगे। अलार्म सुनते ही विकास ने सेफ हाउस की तरफ दौड़ लगा दी। अलार्म बजने और सेफ हाउस तक पहुंचने के लिए कुछ मिनट का ही वक्त होता है। इतने वक्त में ही सेफ हाउस में जाना होता है। विकास कहते हैं कि सुबह से शाम तक कई बार यही ड्रिल करनी पड़ी। पूरा दिन सेफ हाउस में पहुंचने और लौटने में बीत गया।’ ‘ईरान का पिछला हमला ज्यादा खतरनाक था’इजराइल में करीब 30 हजार भारतीय कंस्ट्रक्शन का काम करते हैं। गाजा पर हमले के बाद से फिलिस्तीन के मजदूरों का इजराइल में आना बंद हो गया। इस वजह से इजराइल ने बड़े पैमाने पर भारतीयों को काम देना शुरू किया। विकास कहते हैं कि मेरे इजराइल आने के बाद ईरान के साथ संघर्ष हुआ था। तब ज्यादा बड़ा हमला हुआ था। एक दिन में 300 मिसाइल तक आती थीं। इस बार ईरान का अटैक उतना मजबूत नहीं लग रहा है। इस बार ईरान का टारगेट सिर्फ इजराइल नहीं है, बल्कि कई सारे ठिकाने है। ये भी इसकी बड़ी वजह हो सकती है। इजराइल का आयरन डोम इतना मजबूत है कि मिसाइलों को हवा में ही खत्म कर देता है। हम लोग पूरी तरह सुरक्षित हैं। इजराइल में रहने का अनुभव साझा करते हुए विकास कहते हैं कि इजराइली लोग दिमागी तौर पर बहुत मजबूत होते हैं। ये ऐसे हालात में रहने के आदी हो गए हैं। उन्हें जंग की स्थिति में खुद को बचाने की आदत हो चुकी है। इजराइल में रहने वाले भारतीय अभी सुरक्षित हैं। हम यहां ठीक हैं, अभी सरकार से वापस बुलाने की मांग नहीं करना चाहते। विकास आगे कहते हैं, ‘मैंने गाजा में हमास से, लेबनान में हिजबुल्ला से, यमन में हूती से और ईरान से जंग देख ली है। इजराइल में रहते हुए मैं इन सबका आदी हो गया हूं। आगे क्या होगा, मुझे भी नहीं पता, लेकिन यही कह सकता हूं कि अभी तो डर नहीं लग रहा है।’ जगह: कुम, ईरानमोहम्मद हुसैन सूरतवाला ईरान की अल मुस्तफा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। वे बताते हैं, ‘भारत और ईरान के ऐतिहासिक रिश्ते रहे हैं। बड़ी तादाद में भारतीय ईरान जाते हैं। भारतीय स्टूडेंट मेडिकल, इस्लामिक स्टडीज के लिए पढ़ाई करने और बाद में नौकरी करने के लिए जाते हैं। ईरान के तेहरान, कुम, इस्फेहान और अराक जैसे शहरों में हिंदुस्तानी स्टूडेंट्स की अच्छी-खासी तादाद है। ईरान और भारत के बीच ट्रेड की वजह से लोगों का आना-जाना होता है।’ ‘जून में इजराइल के साथ जंग हुई थी। तब भी भारतीयों के इलाकों में हमले या नुकसान की खबर नहीं आई थी। इस बार भी किसी भी भारतीय के हताहत होने की खबर नहीं है।’ मोहम्मद हुसैन बताते हैं, ‘हमें पता चला है कि इस रीजन में आने वाले अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया जाएगा। ये हमला चौंकाने वाला नहीं है, बल्कि अब ये युद्ध की तरह होगा। हमला करने वाले सभी सहयोगियों को भी सबक सिखाने के लिए ईरान तैयार है। इसीलिए कतर, कुवैत, सऊदी अरब, यूएई में अमेरिकी ठिकानों पर हमला किया है। इससे ईरान का नुकसान होगा, इसमें भी कोई दो राय नहीं है।’ ईरान में फंसे स्टूडेंट बोले- हमें बचा लो ईरान यूनिट स्टूडेंट्स एसोसिएशन के कोऑर्डिनेटर फैजान अहमद बताते हैं कि तेहरान और ईरान के दूसरे हिस्सों में हालात खराब हो गए हैं। ईरान में ज्यादातर भारतीय स्टूडेंट MBBS की पढ़ाई करते हैं। हमारे पास उनके पेरेंट्स के फोन आ रहे हैं। वे घबराए हुए हैं। भारत सरकार ने 23 फरवरी को एडवाइजरी जारी कर ईरान में मौजूद भारतीय नागरिकों को देश लौटने की सलाह दी थी। स्टूडेंट्स के लिए यह आसान नहीं था। 5 मार्च को दो बड़े एग्जाम ओलंपियाड और प्री-इंटर्नशिप टेस्ट होने हैं। ये दोनों एग्जाम हेल्थ और एजुकेशन मिनिस्ट्री करवाती हैं। एसोसिएशन ने विदेश मंत्रालय और विदेश मंत्री एस. जयशंकर को लेटर लिखकर संबंधित अधिकारियों से बात करने और छात्रों के लिए कोई समाधान निकालने की अपील की थी। मौजूदा हालात को देखते हुए एसोसिएशन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी लेटर लिखा है। उसमें गुजारिश की है कि स्टूडेंट्स की सुरक्षा को ध्यान में रखा जाए और हालात बिगड़ते हैं तो उन्हें सुरक्षित भारत वापस लाने के लिए जरूरी कदम उठाए जाएं। ईरान का मिसाइल प्रोग्राम रोकने के लिए हमलाईरान और अमेरिका के बीच चल रही परमाणु समझौते की बातचीत में बैलिस्टिक मिसाइल प्रोजेक्ट सबसे बड़ा विवाद का मुद्दा बन गया है। ईरान इस पर समझौता करने को तैयार नहीं है और इसे अपनी रेड लाइन मानता है। उसका कहना है कि यह उसकी सुरक्षा के लिए जरूरी है। जून 2025 में इजराइल और अमेरिका ने ईरान के परमाणु साइट पर हमला किया, तब मिसाइलों ने ही हमें बचाया था। ईरानी अधिकारियों ने बार-बार कहा है कि मिसाइल कार्यक्रम पर कोई बात नहीं होगी। इसे छोड़ना मतलब खुद को कमजोर करना होगा। ईरान कहता है कि बातचीत सिर्फ परमाणु कार्यक्रम तक सीमित रहेगी, मिसाइल या रीजनल ग्रुप पर नहीं। इसके बाद अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान पर हमले की धमकी दी थी। ट्रम्प के मुताबिक, अमेरिकी सेना ईरान की मिसाइलों को तबाह करने और उसके मिसाइल प्रोग्राम को खत्म करने की कोशिश कर रही है। 28 फरवरी को ईरान पर हमला कर दिया गया। इजराइल डिफेंस फोर्सेज ने दावा किया है कि उसने अपने इतिहास का सबसे बड़ा एयर ऑपरेशन चलाया। करीब 200 लड़ाकू विमानों ने ईरान के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। इन विमानों ने एक साथ करीब 500 ठिकानों पर हमला किया।जवाब में ईरान ने भी 9 देशों में अमेरिका के ठिकानों पर हमला किया। ………………………ये खबर भी पढ़ें ईरान पर हमले में 85 स्कूली छात्राओं की मौत, रक्षामंत्री के मारे जाने की खबर ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमले में पहले दिन 200 से ज्यादा लोगों की मौत हुई है। दक्षिणी ईरान के एक स्कूल पर मिसाइल गिरने से 85 छात्राओं की मौत हो गई, जबकि 45 घायल हैं। न्यूज एजेंसी रॉयटर्स ने सूत्रों के हवाले से दावा किया है कि इजराइली हमले मे ईरानी रक्षामंत्री अमीर नासिरजादेह और रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) के कमांडर मोहम्मद पाकपोर की मौत हो गई। पढ़ें पूरी खबर...

दैनिक भास्कर 1 Mar 2026 5:37 am

ईरान-इस्राइल तनाव के बीच नेतन्याहू ने किया सर्वोच्च नेता खामेनेई के मारे जाने का दावा, तेहरान ने किया खंडन

अपने संबोधन में नेतन्याहू ने कहा कि यह कार्रवाई इस्राइल की सुरक्षा को मजबूत करने और संभावित खतरों को रोकने के उद्देश्य से की गई। उन्होंने क्षेत्रीय सुरक्षा हालात, इस्राइल की सैन्य रणनीति और ईरान के खिलाफ उठाए जा रहे कदमों पर विस्तार से बात की।

देशबन्धु 1 Mar 2026 3:12 am

इजरायल का ईरान पर बड़ा हमला, तेहरान में धमाके और आसमान में धुएं का गुबार

मध्य एशिया में तनाव के बीच इजरायल ने एक बार फिर ईरान पर हमला कर दिया है। इजरायल के रक्षा मंत्री ने कहा कि पूरे देश में आपातकाल घोषित कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि ईरान की राजधानी तेहरान में धुएं का गुबार उठता देखा गया है।

देशबन्धु 28 Feb 2026 12:55 pm

अमेरिका और ईरान के बीच जिनेवा वार्ता बेनतीजा, ईरान परमाणु कार्यक्रम पर गतिरोध कायम, ट्रंप नाखुश

मध्यस्थता कर रहे ओमान ने बातचीत को “सकारात्मक” बताया है, लेकिन दोनों देशों के बीच मौजूदा मतभेद दूर होने के स्पष्ट संकेत फिलहाल नहीं दिख रहे हैं। ऐसे में क्षेत्रीय तनाव बरकरार है और संभावित सैन्य टकराव की आशंकाएं पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं।

देशबन्धु 28 Feb 2026 8:16 am

क्या टूटेगी दिल्ली की 114 साल पुरानी कदीमी मस्जिद:सेंट्रल विस्टा के नक्शे से गायब, सरकार ने कहा था- कोई मस्जिद नहीं हटेगी

दिल्ली में संसद भवन से करीब डेढ़ किमी दूर कदीमी मस्जिद है। करीब 114 साल पुरानी छोटी सी ये मस्जिद कृषि भवन के कैंपस में है। वक्फ की प्रॉपर्टी के तौर पर रजिस्टर्ड है। हाई सिक्योरिटी एरिया होने की वजह से आम लोग इसमें नहीं जा सकते, यहां ज्यादातर सरकारी कर्मचारी नमाज पढ़ते हैं। मस्जिद राष्ट्रपति भवन से इंडिया गेट तक 3 किमी एरिया के रिडेवलपमेंट वाले सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट में आ रही है, इसलिए इसके हटाए जाने की आशंका है। सरकार ने इसके सुरक्षित रहने का भरोसा दिया है। फिर भी वक्फ बोर्ड से जुड़े लोगों को यकीन नहीं है, क्योंकि पहले भी सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के लिए तीन मजारें और एक मस्जिद तोड़ी जा चुकी है। सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के निर्माण पथ पर आने वाली 6 मस्जिदों की हिफाजत के लिए सबसे पहले हाई कोर्ट जाने वाले एडवोकेट मशरूर खान से हमने पूछा कि क्या मस्जिदें सुरक्षित हैं? उन्होंने जवाब दिया, 'नहीं। इसीलिए तो कदीमी मस्जिद के बारे हमने खबरें पढ़ीं तो एक बार फिर कोर्ट के दिए भरोसे और भारत सरकार से लगाई उम्मीद डगमगाने लगी। हम इस मस्जिद से जुड़े कागजात इकट्ठे कर रहे हैं, ताकि अगर इसे गिराने की कोशिश की जाए, तो दावा ठोक सकें।' 1912 में लुटियन के बनाए नक्शे में कदीमी मस्जिद का जिक्रवक्फ बोर्ड में इन दिनों यही बातें हो रही हैं कि कहीं 6, मौलाना आजाद रोड (पुराना उपराष्ट्रपति भवन) पर बनी मस्जिद की तरह चुपचाप एक और मस्जिद ढहाने की तैयारी तो नहीं हो रही। वक्फ बोर्ड की तरफ से पैरवी कर रहे एडवोकेट मशरूर बताते हैं कि अब तक हमारे पास कोई आधिकारिक सूचना नहीं आई है। छन-छनकर बोर्ड के पास आ रही खबरों से शक तो हो ही रहा है। मशरूर कहते हैं, 'कृषि भवन 1957 में बना था। कदीमी मस्जिद उससे बहुत पहले से है। 1912 में जब ब्रिटिश आर्किटेक्ट लुटियन एडवर्ड दिल्ली को नए सिरे से डिजाइन कर रहे थे, उस वक्त के नक्शे में भी ये मस्जिद है। इसे उस वक्त बनाया नहीं गया, क्योंकि ये पहले से मौजूद थी। इसलिए इसे बिना छेड़े दिल्ली को डिजाइन किया गया।’ ‘ये मस्जिद सिर्फ इस्लामिक ढांचा नहीं, हैरिटेज प्रॉपर्टी है। ब्रिटिश सरकार ने लुटियंस दिल्ली बनाई, तब भी इसे नहीं गिराया। पहली बार भारत सरकार बनी, तब भी ये इमारत सुरक्षित रही। इससे अगर छेड़छाड़ होगी, तो हम कोर्ट जाएंगे।' एडवोकेट मशरूर 1912 में एडविन लुटियन का बनाया नक्शा दिखाते हैं। इसमें दो सर्किल जरिए कहते हैं, 'बड़े सर्किल में सुनहरी मस्जिद है। इसे भी तोड़ा जाना था, लेकिन हमने इसे बचा लिया। हमें सही वक्त पर उसे गिराए जाने की सूचना मिल गई थी। हम कोर्ट चले गए और कोर्ट ने हमारे पक्ष में फैसला दिया। दूसरे छोटे सर्किल में कदीमी मस्जिद है। ये नक्शा सबूत है कि ये दोनों मस्जिदें 1912 से पहले की हैं।' ‘सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट की शुरुआत में पिटीशन डाली’एडवोकेट मशरूर कहते हैं, ‘1911 में ब्रिटिश सरकार ने दिल्ली को राजधानी बनाने का फैसला लिया, तो 1911 में सरकारी इमारतें और संसद भवन बनाने के लिए जमीनें खरीदीं। फिर एडवर्ड लुटियन ने पूरी दिल्ली डिजाइन की। उस वक्त कदीमी मस्जिद के अलावा बाकी 5 मस्जिदें भी मौजूद थीं। अभी जहां कृषि भवन है, उसके पास तब रायसीना गांव हुआ करता था। शायद इस मस्जिद में गांव के लोग आते होंगे।’ ‘सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट शुरू हुआ, तब हमने 2021-22 में हाईकोर्ट में पहले ही पिटीशन डाल दी थी, ताकि रिडेवलपमेंट प्रोजेक्ट के नक्शे में आने वाली इन 6 मस्जिदों को सुरक्षित कर सकें। कोर्ट ने सरकार से पूछा तो सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जवाब दिया कि फिलहाल इन्हें ध्वस्त करने की योजना नहीं है। कोर्ट ने भी हमें भरोसा दिया कि मस्जिदें सुरक्षित रहेंगी। अगर आपको इस प्रोजेक्ट के दौरान कुछ आशंका लगे, तो आप वक्फ कोर्ट जा सकते हैं।’ ‘कोर्ट के भरोसे के बाद भी एक मस्जिद चुपचाप हटा दी गई। अब महसूस होता है कि सरकारी वकील के जवाब में जो फिलहाल शब्द था, शायद वही भ्रमित करने वाला था।’ सरकारी वकील ने आपको भ्रमित किया? एडवोकेट मशरूर कहते हैं, ‘हां। उपराष्ट्रपति भवन की मस्जिद हटा दी गई, इससे तो यही लगता है। न कोई सूचना, न कॉन्टैक्ट किया गया। सरकारी वकील का जवाब टालमटोल वाला था। कोई इतनी बड़ी योजना का डिजाइन बनाता है, तो सब कुछ पहले ही तय हो जाता है। इसका मतलब है कि ये तय था कि उपराष्ट्रपति भवन की मस्जिद को गिराया जाएगा।’ ‘इतनी बड़ी योजनाओं में रोज फेरबदल नहीं होता, मतलब हमें बरगलाया गया। अब इसी तरह से कृषि भवन के परिसर में बनी मस्जिद को लेकर भी स्पष्टता नहीं है। हमें जो अलग-अलग सोर्सेज से सूचना मिल रही है कि कृषि भवन और शास्त्री भवन को गिराया जाना है। टेंडर जारी कर दिया गया है। इस टेंडर के लिए जो नक्शा है, उसमें मस्जिद नहीं है।’ ‘हमने सुनहरी बाग मस्जिद बचा ली, क्योंकि इसमें ट्रांसपेरेंसी बरती गई। नई दिल्ली म्युनिसिपल कॉरपोरेशन ने 2023 में सूचना जारी कि इस मस्जिद की वजह से ट्रैफिक बहुत होता है। इसलिए इसे हटाने की योजना हैं। हमने तुरंत एतराज जताया और कोर्ट गए। हमने उसके हेरिटेज प्रॉपर्टी और वक्फ प्रॉपर्टी होने के सारे सबूत दिखाए। हमारा पक्ष सही था, कोर्ट ने इसे माना। आदेश दिया और मस्जिद बच गई। कम से कम इस मस्जिद को चुपचाप नहीं गिराया गया। प्रोसेस को फॉलो किया गया।' सुनहरी बाग मस्जिद को NDMC ने दिया था नोटिसकरीब 174 साल पुरानी सुनहरी बाग मस्जिद 125 वर्गमीटर जगह में बनी है। मस्जिद एक गोलचक्कर पर है, जहां मौलाना आजाद मार्ग, मोतीलाल नेहरू मार्ग, सुनहरी बाग मार्ग और रफी मार्ग मिलते हैं। मस्जिद के एक तरफ उद्योग भवन मेट्रो स्टेशन का गेट और गवर्नमेंट ऑफिस हैं। सुनहरी बाग मस्जिद ऐतिहासिक स्मारक ग्रेड-3 लिस्ट में है और वक्फ बोर्ड की प्रॉपर्टी है। ट्रैफिक पुलिस ने दिल्ली नगर निगम, यानी NDMC को एक रिपोर्ट भेजी है कि विदेशियों, VIP और अधिकारियों का इस गोलचक्कर से आना-जाना होता है। सुनहरी मस्जिद की वजह से उन्हें जाम में फंसना पड़ रहा है। इसके बाद NDMC ने नोटिस जारी कर पूछा था कि क्या सुनहरी मस्जिद को हटाकर ट्रैफिक में सुधार किया जा सकता है। एक मस्जिद ही नहीं, तीन मजारें भी हटाई गईंएडवोकेट मशरूर कहते हैं, 'उद्योग भवन के गोलचक्कर में तीन मजारें थीं। ये कब बनीं, ये तो नहीं पता। ये लुटियन दिल्ली में हैं। आजादी के बाद तो किसी ने नहीं बनाई होंगी। जाहिर है ये लुटियन दिल्ली बनने से पहले की होंगी। लुटियन दिल्ली बनाते वक्त इन्हें भी ब्रिटिश गवर्नमेंट ने सुरक्षित रखा। भारत सरकार ने भी इन्हें नहीं छेड़ा। अब अचानक उन्हें हटा दिया गया।' वे आगे कहते हैं कि CPWD ने अब तक नहीं बताया कि कदीमी मस्जिद के बारे में क्या सोचा जा रहा है। इसीलिए चिंता ज्यादा हो रही है। ऐसे ही चुपचाप उपराष्ट्रपति भवन की मस्जिद गिरा दी गई थी। इसीलिए हमने सोचा है कि सारे सबूत जुटाने के बाद हम खुद विभाग से संपर्क साधेंगे। जरूरत हुई तो कोर्ट जाएंगे। कदीमी मस्जिद के हेरिटेज प्रॉपर्टी होने के सबूत 1. 1912 का नक्शा 2. वक्फ बोर्ड का रिकॉर्ड 3. इतिहास की किताबों में कदीमी मस्जिद का जिक्र 4. गजट नोटिफिकेशन गजट नोटिफिकेशन सरकारी डॉक्यूमेंट होता है, जो वक्फ की प्रॉपर्टी के सर्वे के बाद बनता है। ये डॉक्यूमेंट 1970 का है। इसमें ये मस्जिद मौजूद है। ‘उपराष्ट्रपति भवन की मस्जिद को भी यूं ही नहीं जाने देंगे, कोर्ट जाएंगे’एडवोकेट मशरूर आगे कहते हैं, ‘नियम है कि जो प्रॉपर्टी एक बार वक्फ की घोषित हो जाती है, वो हमेशा वक्फ की ही रहती है। नए कानून के हिसाब से भी देखें, तो सरकार ऐसे ही कोई वक्फ प्रॉपर्टी न कब्जे में ले सकती और न गिरा सकती है। कम से कम पब्लिक इंटरेस्ट से जुड़ा कोई कारण तो देना पड़ेगा।' 'वैसे तो वक्फ की जमीन अल्लाह की होती है। सरकार को कुछ जरूरी कंस्ट्रक्शन करना है और उसे वो जमीन चाहिए, तो स्टेकहोल्डर से बात करनी होगी। उसे एतराज जताने का समय देना होता है। 6 मौलाना आजाद रोड यानी उपराष्ट्रपति के आवास पर बनी मस्जिद के गिराने जाने का कारण हम सरकार से पूछेंगे। वाजिब जवाब नहीं मिला तो कोर्ट जाएंगे।' मस्जिद 2024 में गिराई गई थी, फिर इतनी देर क्यों हो रही है? जवाब मिला, ‘क्योंकि हमें कागज इकट्ठा करने में वक्त लगा। दूसरी बात वक्फ बोर्ड के पास पिछले दो साल से सिर्फ एक सेक्शन ऑफिसर है। यहां कम से कम तीन अधिकारी होते हैं। अभी 13-14 फरवरी को एक अधिकारी और दिया गया है।’ ‘हमने उपराष्ट्रपति भवन वाली मस्जिद के लिए RTI डाली है। पूछा है कि आखिर मस्जिद क्यों गिरानी पड़ी। इसका पब्लिक इंटरेस्ट क्या है।' कोर्ट जाने के लिए आपके पास कुछ तो आधार होना चाहिए। हम उस मस्जिद पर भी सवाल करेंगे। पहले डिपार्टमेंट से पूछ लें, फिर उसी जवाब को आधार बनाकर, अपने ऐतिहासिक दस्तावेजों के साथ कोर्ट जाएंगे। नई बिल्डिंग के नक्शे में मस्जिद का जिक्र नहींCPWD ने कृषि भवन और शास्त्री भवन के रीडेवलपमेंट के लिए टेंडर जारी किया है। इसके तहत मौजूदा बिल्डिंग की जगह कॉमन सेंट्रल सेक्रेटेरिएट बिल्डिंग्स 4 और 5 बनना है। इस प्रोजेक्ट पर करीब तीन हजार करोड़ रुपए खर्च होने हैं। नए प्लान में कृषि भवन परिसर में बनी कदीमी मस्जिद शामिल नहीं है। हमने इस बारे में 25 फरवरी को हाउसिंग एंड अर्बन अफेयर्स में डिप्टी डायरेक्टर सुशील कुमार को सवाल भेजे थे। उन्होंने जवाब दिया कि मिनिस्ट्री में संबंधित अधिकारियों को सवाल भेज दिए गए हैं। हालांकि उधर से जवाब नहीं आया। हमने हाउसिंग एंड अर्बन अफेयर्स के डायरेक्टर श्यामलाल पुनिया को फोन किए, लेकिन रिसीव नहीं हुआ। हालांकि, CPWD के सोर्स ने बताया है कि नक्शे में मस्जिद का जिक्र नहीं है। ……………………ये खबर भी पढ़ें64 लाख बांग्लादेशियों का दावा, सबसे बड़ा डिटेंशन सेंटर खाली असम में मार्च-अप्रैल में चुनाव हैं। बांग्लादेशी घुसपैठिए मुद्दा हैं। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा दावा कर चुके हैं कि असम की मुस्लिम आबादी में करीब 36% बांग्लादेशी हैं। हालांकि असम का मटिया डिटेंशन सेंटर खाली पड़ा है। हिमंता सरकार इसे होल्डिंग सेंटर कहती है। ऊंची-ऊंची दीवारों और लोहे के भारी-भरकम गेट वाला डिटेंशन सेंटर गुवाहाटी से करीब 120 किमी दूर गोलपाड़ा जिले में है। इसमें कैद 133 विदेशी ‘घुसपैठियों’ में सिर्फ 11 बांग्लादेशी हैं। पढ़ें पूरी खबर...

दैनिक भास्कर 28 Feb 2026 5:18 am

चीन की संसद से नौ वरिष्ठ सैन्य अधिकारी बाहर, शी जिनपिंग के कदम को मिली मंजूरी

2024 के दौरान भी शी जिनपिंग की अध्यक्षता वाले शक्तिशाली केंद्रीय सैन्य आयोग (सीएमसी) से कई शीर्ष अधिकारियों को बाहर किया गया था। यह आयोग चीन की सशस्त्र सेनाओं का सर्वोच्च निर्णयकारी निकाय है और सीधे राष्ट्रपति शी के नेतृत्व में काम करता है।

देशबन्धु 27 Feb 2026 12:26 pm

हिलेरी क्लिंटन का साफ इनकार: एपस्टीन से कभी मुलाकात नहीं

अमेरिका की पूर्व विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने प्रतिनिधि सभा की 'निगरानी एवं सरकारी सुधार समिति' के समक्ष बयान दिया

देशबन्धु 27 Feb 2026 10:10 am

ट्रंप प्रशासन विदेशी स्टूडेंट्स के लिए ओपीटी वर्क रूट की फिर से करेगा समीक्षा

अमेरिका में पढ़ाई कर रहे हजारों विदेशी छात्रों पर असर डालने वाला एक बड़ा कदम उठाया गया है

देशबन्धु 27 Feb 2026 9:58 am

व्हाइट हाउस में सरप्राइज मीटिंग – मेयर ममदानी और ट्रंप आमने-सामने

न्यूयॉर्क शहर के मेयर जोहरान ममदानी ने व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ मुलाकात की

देशबन्धु 27 Feb 2026 9:35 am

पाकिस्तानी हमलों का अफगान पलटवार – 15 चौकियां कब्जे में

सीमा पर बढ़ा तनाव, अफगानिस्तान ने किया बड़ा दावा रात के अंधेरे में ऑपरेशन, पाक सैनिकों पर भारी पड़ा अफगान हमला यूएन रिपोर्ट: पाक एयर स्ट्राइक में 13 नागरिकों की मौत डूरंड लाइन पर अफगान रणनीतिक बढ़त, हालात संवेदनशील काबुल। अफगानिस्तान ने गुरुवार रात को दावा किया है कि वह हाल में हुए पाकिस्तानी हवाई हमलों के जवाब में पाकिस्तान के खिलाफ जवाबी कार्रवाई कर रहा है। अफगान अधिकारियों के अनुसार, सीमा क्षेत्र में की गई कार्रवाई के दौरान अब तक दुश्मन की 15 चौकियों पर कब्जा कर लिया गया है। इस्लामिक अमीरात ऑफ अफगानिस्तान के उप प्रवक्ता हमदुल्ला फितरत ने सोशल मीडिया पर जारी बयान में कहा कि कार्रवाई के दौरान कई पाकिस्तानी सैनिक मारे गए हैं, जबकि कुछ को जिंदा भी पकड़ लिया गया है। प्रवक्ता के अनुसार, दुश्मन के खिलाफ अभियान लगातार जारी है और सीमा क्षेत्र में रणनीतिक बढ़त हासिल की जा रही है। उन्होंने कहा कि दुश्मन की कुल 15 पोस्ट पर कब्जा कर लिया गया है तथा कई सैनिक हताहत हुए हैं। अफगान पक्ष ने यह भी बताया कि डूरंड लाइन पर तैनात अत्याधुनिक लेजर उपकरणों से लैस इकाइयों ने भी ऑपरेशन शुरू कर दिया है। बयान में कहा गया है कि रात के अंधेरे का फायदा उठाते हुए दुश्मन की हर गतिविधि को निशाना बनाया जाएगा। हालांकि, पाकिस्तान की ओर से इन दावों पर अभी तक आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव को देखते हुए क्षेत्र में हालात संवेदनशील बने हुए हैं। बता दें कि अफगानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन (यूएनएएमए) ने पुष्टि की थी कि पाकिस्तानी सैन्य बलों द्वारा अफगानिस्तान के नंगरहार और पक्तिका प्रांतों में किए गए हवाई हमलों में 13 नागरिकों की मौत हुई थी। इनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे। स्थानीय मीडिया ने यूएनएएमए के हवाले से मंगलवार को ये खबर प्रकाशित की थी। अफगानिस्तान की प्रमुख न्यूज एजेंसी खामा प्रेस ने यूएनएएमए की एक रिपोर्ट के हवाले से खुलासा किया था कि हालिया हवाई हमलों में 13 अफगान नागरिक मारे गए हैं, जबकि सात घायल हो गए थे। ये हमले नंगरहार के बेहसूद और खोगियानी जिलों में 21-22 फरवरी की दरमियानी रात किए गए थे। पक्तिका के बरमल में एक स्कूल और मस्जिद को निशाना बनाया गया था, जबकि ओर्गुन जिले में एक घर पर एयर स्ट्राइक की गई थी।

देशबन्धु 27 Feb 2026 7:04 am

फिर आतंकी खतरा, कश्मीर-दिल्ली में रेकी, निशाने पर VIP:15-20 किलो RDX का अलर्ट, बांग्लादेश के रास्ते आया स्लीपर सेल, टारगेट कौन

भारत में आतंकी बड़ा हमला करने की फिराक में हैं। कश्मीर से लेकर दिल्ली तक कई धार्मिक स्थल निशाने पर हैं। VIP स्पॉट और सेना भी टारगेट लिस्ट में हैं। फरवरी में महज 20 दिन के अंदर सुरक्षा एजेंसियों को इसके इनपुट मिले हैं। ये सीक्रेट इंटेलिजेंस रिपोर्ट दैनिक भास्कर को भी मिली है। इसके मुताबिक, 10 फरवरी को होने वाला बड़ा हमला टाला जा चुका है, लेकिन खतरा अब भी बरकरार है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद से आतंकी एक्टिविटीज बढ़ी हैं। आतंकियों का नेटवर्क पाकिस्तानी कैंपों और बांग्लादेश रूट से ऑपरेट हो रहा है। आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा कश्मीर और दिल्ली के आसपास हमले की तैयारी में है। आतंकियों के पास 15-20 किलो RDX और IED होने के इनपुट हैं। 5 आतंकी पाकिस्तान से भारत में घुस चुके हैं। कुछ स्लीपर सेल बांग्लादेश लिंक से ऑपरेट कर रहे हैं। पूरा मामला आखिर क्या है, खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट में क्या इनपुट हैं, पाकिस्तान से घुसपैठ करने वाले आतंकी कौन हैं, ऑपरेशन सिंदूर के बाद आतंकियों को लेकर बनाई खुफिया एजेंसियों की लिस्ट में क्या है। पढ़िए ये रिपोर्ट… फरवरी में 3 बड़े इंटेलिजेंस अलर्ट पहला: 8 फरवरी को जम्मू-कश्मीर में खुफिया एजेंसियों को इनपुट मिला, जो लश्कर-ए-तैयबा की धमकी से जुड़ा था। इसके मुताबिक, लश्कर के आतंकी IED ब्लास्ट की तैयारी में हैं। ये ब्लास्ट कश्मीर के नरबल से पट्टन या कुंजेर से नरबल के रास्ते में हो सकता है। इस धमाके के लिए आतंकी 15 से 20 किलो RDX का इस्तेमाल कर सकते हैं। ये हमला सेना के काफिले पर भी हो सकता है। दूसरा: 18 फरवरी के इनपुट के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर में जैश-ए-मोहम्मद ने ओवरग्राउंड नेटवर्क एक्टिव कर दिया है। इसके लोगों ने हाल में जम्मू से कश्मीर को जोड़ने वाली काजीगुंड टनल की रेकी की है। इसमें 10 आतंकियों के दो अलग-अलग ग्रुप साजिश रच रहे हैं। आतंकी फिरदौस अहमद भट्ट रिमोट IED के जरिए सुरक्षा बलों को टारगेट कर रहा है। सुरक्षा बलों के वाहनों को भी निशाना बनाया जा सकता है। तीसरा: 8 से 20 फरवरी के बीच अलग-अलग इनपुट मिले। इसमें से एक इनपुट लश्कर-ए-तैयबा के बारे में है। इसके मुताबिक, आतंकी भारत के बड़े शहरों को निशाना बना सकते हैं। दिल्ली में चांदनी चौक के आसपास के मंदिर निशाने पर हैं। पुरानी दिल्ली भी टारगेट पर है। पाकिस्तान के इस्लामाबाद की एक मस्जिद पर 6 फरवरी को हुए हमले के बाद भारत में अटैक की साजिश है। जम्मू-कश्मीर को जोड़ने वाली काजीगुंड टनल, भीड़भाड़ वाली जगहों पर अलर्टखुफिया एजेंसियों को मिले अलर्ट में दो ज्यादा संवेदनशील हैं। पहला, जम्मू से कश्मीर के बीच काजीगुंड टनल की रेकी और दूसरा 15-20 किलो RDX के जरिए किसी हाइवे या सुरक्षा बलों को निशाना बनाने की साजिश। दैनिक भास्कर ने इस पर सुरक्षा एजेंसियों में अपने सोर्स से बात की। वे बताते हैं कि काजीगुंड टनल की रेकी करना बहुत खतरनाक है। ये सुरक्षा के लिहाज से काफी संवेदनशील है, लेकिन हम अलर्ट हैं। पूरे जम्मू-कश्मीर में आतंकियों के खिलाफ बड़े ऑपरेशन चलाए जा रहे हैं। जैश और लश्कर से जुड़े आतंकी मारे जा चुके हैं। कई एक्टिव आतंकियों की लिस्ट भी तैयार है। जम्मू में कठुआ के रास्ते 5 पाकिस्तानी आतंकी घुसेइसी महीने 5 पाकिस्तानी आतंकियों के भारतीय सीमा में घुसपैठ की इंटेलिजेंस रिपोर्ट मिली है। सोर्स ने बताया कि ट्रेंड पाकिस्तानी आतंकियों ने जम्मू के कठुआ में हीरानगर के रास्ते घुसपैठ की है। आशंका है कि जैश-ए-मोहम्मद के कैंप में ट्रेनिंग लेने वाले ये आतंकी आर्मी कैंप या सेना के वाहनों पर आत्मघाती हमला भी कर सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसे 2015 में दिनानगर पुलिस स्टेशन पर हमला हुआ था। जम्मू-कश्मीर में पांचों संदिग्ध आतंकियों की फोटो जारी कर दी गई है। पोस्टर लगाकर लोगों से जानकारी मांगी गई है। सुरक्षा एजेंसियों की तरफ से हेल्पलाइन नंबर भी जारी किए गए हैं। सोर्स ने बताया कि इन आतंकियों की घुसपैठ और काजीगुंड टनल को लेकर मिले अलर्ट में काफी बातें एक जैसी हैं। असल में वो अलर्ट भी जैश से जुड़े ओवरग्राउंड वर्कर की तरफ से रेकी करने को लेकर था। अब जैश के आतंकी घुसपैठ कर आए हैं। ऐसे में सुरक्षा एजेंसियों की इन पर नजर है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद आतंकियों की दूसरी लिस्ट तैयार पिछले साल पहलगाम हमले के बाद भारतीय सेना ने ऑपरेशन सिंदूर चलाया। इसके साथ ही पाकिस्तान और जम्मू-कश्मीर के लोकल आतंकियों की एक लिस्ट तैयार की गई थी। 17 आतंकियों की लिस्ट में से ज्यादातर आतंकी एनकाउंटर में मारे जा चुके हैं। आतंकियों की पहचान कर अब दूसरी लिस्ट तैयार की गई है। इसमें पहलगाम हमले के बाद चर्चा में आए अनंतनाग के आतंकी आदिल अहमद ठोकर का नाम था। इस नई लिस्ट में भी उसका नाम है। अभी उसके पाकिस्तान में होने का शक है। नई लिस्ट में दो अलग-अलग कैटेगिरी में 25 आतंकियों के नाम हैं। इसमें एक्टिव और इनएक्टिव आतंकियों की कैटेगिरी भी है। इनमें 5 आतंकियों को सेना ने एनकाउंटर में मार दिया है। बाकी 20 पर सुरक्षा बलों की नजर है। इनमें 4 इनएक्टिव हो चुके हैं, बाकी 16 की लिस्ट दैनिक भास्कर के पास भी है। इनमें फिरदौस अहमद भट्ट का नाम शामिल है, जिसे लेकर हाल में अलर्ट मिला है। इसके बाद से काजीगुंड टनल भी टारगेट पर है। इसके अलावा नसीर अहमद वानी, आदिल रहमान, जाकिर अहमद, मुबाशिर अहमद डार, जुबैर अहमद, हारुन रशीद, आसिफ अहमद, आबिद कयूम, आबिद रमजान, सज्जाद अहमद वानी, जमील, मोहम्मद उमर मीर, बिलाल अहमद मीर और हाशिर रफीक पारे हैं। बांग्लादेश नेटवर्क से दिल्ली और दूसरे शहरों में हमले की तैयारी में आतंकीफरवरी की शुरुआत में ही खुफिया एजेंसियों को दिल्ली और आसपास के इलाके में आतंकी साजिश का अलर्ट मिला था। 7-8 फरवरी को दिल्ली के जनपथ मेट्रो स्टेशन के आसपास कुछ पोस्टर लगे मिले। ये पोस्टर पाकिस्तान के सपोर्ट में थे। इसमें भारत के खिलाफ भड़काने वाली बातें लिखीं थीं। पोस्टर में कश्मीर की आजादी का जिक्र था। आतंकी बुरहान वानी की तारीफ भी थी। 22 फरवरी को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने इस पोस्टर वाले नेटवर्क का खुलासा किया। कुल 8 आरोपी गिरफ्तार किए गए। इसमें पुलिस ने कोलकाता और तमिलनाडु मॉड्यूल का खुलासा किया। कोलकाता मॉड्यूल में उमर फारूक और रबीउल इस्लाम को अरेस्ट किया। इनमें उमर, पश्चिम बंगाल और इस्लाम, बांग्लादेश का रहने वाला है। तमिलनाडु मॉड्यूल में मोहम्मद मिजानुर रहमान, शफायत हुसैन, जाहिदुल इस्लाम, मोहम्मद लिटन, मोहम्मद उज्जल और उमर को अरेस्ट किया गया। ये सभी बांग्लादेशी हैं। इनका मुख्य हैंडलर शब्बीर अहमद लोन उर्फ राजा है। ये श्रीनगर का रहने वाला है। पाकिस्तान में लश्कर के कैंप में ट्रेनिंग ले चुका है। शब्बीर को 27 जुलाई 2007 को दिल्ली के चांदनी चौक में एक रेस्तरां के पास से गिरफ्तार किया गया था। उसके रूम से विस्फोटक, हैंड ग्रेनेड और हथियार मिले थे। वो एक पॉलिटिकल किलिंग के लिए दिल्ली आया था। यहां सजा काटने के बाद 2018 में जेल से बाहर आया और बांग्लादेश चला गया। ऑपरेशन सिंदूर के बाद शांत आतंकी फिर एक्टिवआतंकियों का हैंडलर शब्बीर अभी बांग्लादेश से ऑपरेट कर रहा है। वह कई साल तक एक्टिव नहीं था और गुमनाम स्लीपर सेल की तरह काम करता रहा। ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तानी नेटवर्क ने इसे फिर एक्टिव किया। तब इसने कोलकाता और तमिलनाडु नेटवर्क को एक्टिव किया। इसी शब्बीर अहमद के कहने पर दिल्ली और कोलकाता में पाकिस्तान के समर्थन में पोस्टर लगाए गए थे। शब्बीर को लेकर दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल के ACP प्रमोद कुशवाह बताते हैं, ‘जनपथ मेट्रो स्टेशन के पास पाकिस्तान के सपोर्ट में पोस्टर लगाए जाने के बाद जांच शुरू हुई। हमें पता चला कि इसमें उमर फारुक और इस्लाम की भूमिका है। इन्होंने कोलकाता में सेफ हाइडआउट बनाया था। पाकिस्तान में दोनों एडवांस्ड ट्रेनिंग लेने के बाद भारत में टारगेट किलिंग करने आए थे।‘ ‘शब्बीर लश्कर का पुराना आतंकी है और उसी ने पोस्टर लगवाए थे। इनका नेटवर्क कोलकाता और तमिलनाडु में एक्टिव है। शब्बीर आत्मघाती हमले का भी मास्टरमाइंड है। अभी ये लश्कर के लिए भारत में खतरनाक स्लीपर सेल तैयार कर रहा है। अब तक कुल 8 लोगों को अरेस्ट किया है। इन लोगों ने दिल्ली और इससे सटे शहरों की रेकी की थी।‘ दिल्ली पुलिस में हमारे सोर्स ने बताया कि इन आतंकियों ने खासकर धार्मिक स्थलों की रेकी की है। उसके वीडियो भी बांग्लादेश में मौजूद आतंकी शब्बीर अहमद को भेजे हैं। सोर्स का दावा है कि दिल्ली के चांदनी चौक के पास के मंदिर के साथ लोटस टेंपल और इस्कॉन टेंपल की भी रेकी की गई है। इसके अलावा अयोध्या, रामेश्वरम और कांचीपुरम में भी रेकी की है। पहले कश्मीरी पंडितों को मारने की धमकी, फिर नई पोस्ट सामने आईदैनिक भास्कर ने हाल ही में कश्मीरी पंडितों को मिली धमकी को लेकर स्टोरी की थी। हमने बताया था कि 3 फरवरी को लश्कर के प्रॉक्सी संगठन फाल्कन स्क्वॉड ने कश्मीरी पंडितों को धमकी दी है। अब उसी फॉल्कन स्क्वॉड के फिर धमकी वाले पोस्टर सामने आए हैं। इसमें कश्मीरी पंडितों की सुरक्षा के दावे करने वाले जम्मू-कश्मीर के नामी राजनेताओं को मारने की धमकी दी गई है। आतंकियों ने पोस्टर में राजनेता की फोटो के आगे रेड कलर से क्रॉस किया है। इसे लेकर अब कश्मीरी पंडितों से जुड़े संगठन भी अलर्ट हैं। एक कश्मीरी पंडित ने बताया कि हमारी सिक्योरिटी को लेकर सुरक्षा एजेंसियां चाक-चौबंद हैं लेकिन जिस तरह से खुलेआम धमकियां मिल रही हैं। उसे देखते हुए जल्द बड़ा ऑपरेशन चलाने की जरूरत है। जम्मू-कश्मीर में जैश का ‘इजरायल ग्रुप‘ एक्टिवजम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में हाल ही में मारे गए आतंकी सैफुल्लाह के वीडियो सामने आए हैं। ये आतंकी जैश-ए-मोहम्मद से जुड़ा था। इसने 'इजरायल ग्रुप' नाम से एक ग्रुप बनाया था। इसे लेकर जम्मू जोन के IG भीम सेन तुती ने बताया कि पिछले डेढ़ साल में इजरायल ग्रुप के 7 आतंकियों को मार गिराया गया है। ये सभी 7 आतंकी अप्रैल 2024 में घुसपैठ कर जम्मू-कश्मीर पहुंचे थे। इसके बाद सेना से इनका 17 अलग-अलग मौकों पर एनकाउंटर हुआ लेकिन पिछले 18 महीनों में सभी सात आतंकियों को मार गिराया गया। ये हार्डकोर आतंकी ग्रुप था। इसका मकसद सेना और आम लोगों को टारगेट करना था। …………………..ये खबर भी पढ़ें… घाटी में कौन बना रहा कश्मीरी पंडितों की ‘डेथ लिस्ट’ कश्मीर में पहलगाम के पास मट्टन में कश्मीरी पंडितों की बस्ती है। आबादी करीब 300 की है। यहां की गलियों में दिन के 4 बजते ही सन्नाटा पसर जाता है। मट्टन में रहने वाले रमेश कौल (बदला हुआ नाम) अब अनजान नंबरों से आने वाले फोन नहीं उठाते। वजह पूछने पर बताते हैं, ‘कश्मीरी पंडितों को जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं। पढ़िए पूरी खबर…

दैनिक भास्कर 27 Feb 2026 5:12 am

अफगानिस्तान ने पाकिस्तान पर किया भीषण हमला, 17 पाकिस्तानी चौकियों पर किया कब्जा, 40 सैनिक मारे

अफगानिस्तान के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, जवाबी हमले सीमा से लगे पांच प्रांतों में चलाए गए। मंत्रालय का कहना है कि पाकिस्तानी सेना की 17 चौकियों पर कब्जा कर लिया गया है और 40 सैनिक मारे गए हैं। इनमें से 13 शव अफगानिस्तान ले जाए जाने का भी दावा किया गया है।

देशबन्धु 27 Feb 2026 2:56 am