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त्वचा सम्बन्धी समस्याओं को खत्म करता है नमक

इन समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए नमक के कुछ घरेलू घरेलू उपाय बताने जा रहे हैं, जिसका इस्तेमाल करते हुए आप अपनी त्वचा को इस मौसम में सुरक्षित रख सकती.....

खास खबर 19 May 2022 10:52 am

इन 5 तरीकों से बढ़ती गर्मी में रखें अपनी आंखों को सुरक्षित

कुछ ऐसे उपाय बताने जा रहे हैं जिनका उपयोग करके वे अपनी आँखों को इस भीषण गर्मी में संक्रमित होने से बचा सकते हैं......

खास खबर 19 May 2022 9:47 am

विश्व उच्च रक्तचाप दिवस 2022: इन 5 फलों के सेवन से नियंत्रित रहता है रक्तचाप (ब्लडप्रेशर)

हर साल 17 मई को विश्व उच्च रक्तचाप दिवस मनाया जाता है। उच्च रक्तचाप दुनिया भर में 30 प्रतिशत से अधिक वयस्क आबादी को प्रभावित करता है, जो दुनिया में एक अरब से अधिक लोगों को प्रभावित करता है....

खास खबर 17 May 2022 11:59 am

जोश के नए चैलेंज ‘रियल है‘ में भाग लेने वालों को मिल सकता है आइफा अवॉर्ड्स में जाने का मौका

डेलीहंट के पॉपुलर वीडियो ऐप जोश ने दर्शकों के लिए दिलों में एक अलग जगह बनाई है। यह ऐप कई तरह की भाषाओं में वायरल कंटेंट और बेहतरीन वीडियोज पेश करता है। यह ऐप जोश समय-समय पर तरह-तरह के चैलेंजेस व

बोल्डस्की हिंदी 12 May 2022 6:19 pm

दीर्घकालिक रिश्तों के लिए जरूरी है इन गुणों का होना

किसी भी रिश्ते को दीर्घकाल तक कायम रखने के लिए यह आवश्यक है कि हम यह जानें कि हमारे अंदर ऐसे कौन से गुण हैं जो हमारे साथी को हमारे साथ जीवन बिताने पर विवश कर दें। अपना आत्म विश्लेषण कर मैंने पाया कि मेरे.....

खास खबर 12 May 2022 6:06 pm

लगातार पोर्न देखने वालों को करना पड़ता है इन बीमारियों से सामना

ज्यादातर युवा पोर्न फिल्मों को देखना पसंद करते हैं या यूं कह सकते हैं कि वो इन फिल्मों के शौकीन है लेकिन उनको पोर्न फिल्म के नुकसान के बारे में शायद ही पता है.....

खास खबर 11 May 2022 12:49 pm

UPSC Civil Services Admit Card 2022: यूपीएससी सिविल सेवा प्रीलिम्स परीक्षा के एडमिट कार्ड हुए जारी, ये रहा डायरेक्ट लिंक

UPSC Civil Services Prelims Admit Card 2022: संघ लोक सेवा आयोग ने 10 मई 2022 को सिविल सेवा प्रीलिम्स एडमिट कार्ड 2022 जारी कर दिए है।

हरि भूमि 10 May 2022 2:00 pm

शरीर को तरोताजा रखता है नींबू पानी, बढ़ती है इम्यूनिटी, तनाव से मिलती है मुक्ति

नींबू पानी में कई प्रकार के पोषक तत्व होते हैं, जो शरीर को स्वस्थ रखते हैं। वहीं सुबह खाली पेट इसको पीने से वजन कम करने में बहुत सहायता मिलती है। साथ ही साथ पेट की समस्याओं से भी छुटकारा मिल जाता है.....

खास खबर 6 May 2022 11:17 am

Jyotish Shastra: भूलकर भी मुफ्त में न लें ये चीजें वरना झेलना पड़ सकता है घोर आर्थिक संकट

Jyotish Shastra: ज्योतिष शास्त्र की काल गणना के अनुसार, मनुष्य के जीवन पर ग्रहों का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। लोगों को मुफ्त में मिलने वाली चीजों में ज्यादा रूचि होती है। मुफ्त में मिलने पर उनको प्रसन्नता भी होती है। लेकिन ज्योतिष शास्त्र की मानें तो मुफ्त में मिलने वाली चीजें कभी भी आपके ग्रहों के साथ मेल नहीं खाती हैं और आपके ऊपर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं।

हरि भूमि 6 May 2022 9:59 am

#RealHai: सिद्धार्थ मल्होत्रा और हंसिका मोटवानी बने जोश ऐप के नए कैंपेन का हिस्सा

डेलीहंट का पॉपुलर ऐप जोश अपने यूजर्स को केवल नई-नई जानकारी ही प्रदान नहीं करता है, बल्कि यह किसी ना किसी रूप में उन्हें एंटरटेन करने की भी कोशिश करता है। इसी क्रम में, हाल ही में ऐप द्वारा एक नया

बोल्डस्की हिंदी 5 May 2022 4:15 pm

प्यार. . . इसे शर्मिंदा होने से बचाएँ, तोड़े नहीं रिश्ते को मजबूत बनाएँ

पारिवारिक रिश्तों में घटी एक घटना ने प्रेम. . . प्यार. . . इश्क. . . मोहब्बत जैसे शब्दों से विश्वास ही खत्म कर दिया। बचपन से लेकर बुढ़ापे तक इस शब्द को सुनते, पढ़ते और सिनेमा में देखते हुए ऐसा लगता रहा जैसे इस शब्द के बिना.....

खास खबर 5 May 2022 12:17 pm

Mother's Day 2022: पहली बार सेलिब्रेट करने वाले हैं यह दिन तो ऐसे बनाएं इसे यादगार

कहते हैं मां शब्द में पूरी दुनिया बसी होती है। बच्चे को जन्म देते समय एक मां को असहनीय पीड़ा से गुजरना पड़ता है। इसके अलावा पूरे नौ महीने वह कई तरह के उतार चढ़ाव झेलती है। मां और बच्चे का

बोल्डस्की हिंदी 4 May 2022 5:52 pm

क्यों मनाई जाती है ईद, इस त्योहार से जुड़ी जानिए कुछ खास बातें

क्यों मनाई जाती है ईद, इस त्योहार से जुड़ी जानिए कुछ खास बातें

लाइफस्टाइल नामा 4 May 2022 9:30 am

चमत्कार भगवान भोलेनाथ के नंदी पी रहे पानी ,भक्तों का लगा तांता

चमत्कार भगवान भोलेनाथ के नंदी पी रहे पानी ,भक्तों का लगा तांता

लाइफस्टाइल नामा 3 May 2022 1:30 pm

बेहतरीन रमजान (ईद) मेहंदी डिजाइन

मेहंदी किसी भी समारोह का एक अभिन्न अंग है। शादी हो या रमजान, ईद हो या कोई और फंक्शन के लिए तैयार होना जरूरी है। मेहंदी के रंग के बिना त्योहार बेरंग.....

खास खबर 3 May 2022 12:03 pm

अक्षय तृतीया पर दान से होती है अक्षय लाभ की प्राप्ति

हिन्दू धर्म में अक्षय तृतीया का विशेष महत्व है। इस दिन शुभ मुहूर्त के कारण सभी प्रकार के महत्वपूर्ण कार्य किए जाते हैं, तो आइए हम आपको अक्षय तृतीया के महत्व के बारे में बताते हैं। इस दिन विष्णु जी जी खास पूजा से देवता होते हैं प्रसन्न बैसाख महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया को अक्षय तृतीया मनाया जाता है। इसे अक्खा तीज भी कहा जाता है। अक्षय तृतीया का दिन बहुत पवित्र होता है इसलिए इस दिन विष्णु भगवान की उपासना करें। सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और भगवान विष्णु को पंचामृत से स्नान कराएं। उसके बाद जौ, सत्तू या चने की दाल को भोग स्वरूप अर्पित कर भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। पितरों की शांति हेतु भी अक्षय तृतीया का दिन बहुत खास होता है इसलिए इस दिन गरीबों को भी दान दें और भूखों को भोजन कराएं। अक्षय तृतीया के दिन दान से अक्षय लाभ की प्राप्ति होती है। साथ ही इस दिन शिव-पार्वती की पूजा का भी विधान है। इसे भी पढ़ें: कब है परशुराम जयंती? जानें शुभ मुहूर्त, महत्व और पूजन विधि अक्षय तृतीया के दिन मिला था द्रौपदी को अक्षय पात्र महाभारत में जब पांडवों को 13 साल का वनवास मिला था तो एक दिन दुर्वासा ऋषि उनकी कुटिया में आए। उस समय पांडव घर पर नहीं थे और द्रौपदी ने घर में मौजूद सामान से ऋषि का सत्कार किया। इससे दुर्वासा ऋषि बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने द्रौपदी को अक्षय पात्र प्रदान किया। साथ ही दुर्वासा ऋषि ने कहा कि अक्षय तृतीया के दिन जो भी भक्त विष्णु भगवान की पूजा कर गरीबों को दान देगा उसे अक्षय फल प्राप्त होगा। धूमधाम से मनाया जाता है अक्षय तृतीया का त्यौहार अक्षय तृतीया पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है। बुंदेलखंड में अक्षय तृतीया एक दिन का त्यौहार न होकर कई दिनों तक मनाया जाता है। यहां इस उत्सव को अक्षय तृतीया से पूर्णिमा तक बहुत धूमधाम से लोग मनाते हैं। साथ ही कुंवारी कन्याएं अपने भाई, पिता और बुजुर्ग लोगों को शगुन बांटती हैं और गीत गाती हैं। वहीं राजस्थान में भी इस दिन वर्षा के लिए शगुन निकाला जाता है और लड़कियां घूम-घूम कर गीत गाती हैं। लड़कियां गीत गाकर खुशी मनाती हैं तो लड़के पतंग उड़ाते हैं। मालवा में अक्षय तृतीया के दिन नए घड़े के ऊपर खरबूजा और आम के पत्ते रखकर पूजा की जाती है। पंडितों का मानना है कि इस दिन खेती का काम शुरू करना समृद्धि का परिचायक होता है। इसे भी पढ़ें: सुख-समृद्धि के लिए अक्षय तृतीया पर दान करें ये चीज़ें, नोट कर लें खरीददारी के लिए शुभ मुहूर्त और महत्व अक्षय तृतीया से जुड़े विशेष तथ्य शास्त्रों के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन ही सतयुग और त्रेतायुग की शुरुआत हुई थी। भगवान परशुराम भी अक्षय तृतीया के दिन धरती पर अवतार लिए थे। मां गंगा का भी धरती पर इसी दिन आगमन हुआ था। अक्षय तृतीया की पवित्र तिथि के दिन महर्षि व्यास ने महाभारत लिखना प्रारम्भ किया था। इसी दिन बदरीनाथ धाम के कपाट खुलते हैं और वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में श्री विग्रह के चरणों के दर्शन होते हैं। अक्षय तृतीया पर इन कामों से रहें दूर अक्षय तृतीया के दिन किए गए कर्मों का फल अक्षुण होता है इसलिए इस दिन कभी भी किसी प्रकार का अत्याचार न करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन किए गए किसी भी कार्य का फल अगले कई जन्मों तक हमारा पीछा करता रहता है। इसलिए इस दिन सावधानी बरतें तथा किसी प्रकार का वाद-विवाद न करें। साथ ही व्रत रखने वाले व्यक्ति कभी भी सेंधा नमक का खाने में इस्तेमाल न करें। घर में इन कामों को करने से मिलता है विशेष लाभ अक्षय तृतीया के दिन घर में सेंधा नमक रखना विशेष फलदायी होता है इसलिए घर में सेंधा नमक जरूर रखें। पंडितों के अनुसार घर में पीली सरसों रखने से लक्ष्मी माता की कृपा सदैव बनी रहती है। इसलिए इस पवित्र दिन पीलीं सरसो भी रखें। ऐसा करने से न केवल आपकी आर्थिक परेशानियां दूर होगी बल्कि लक्ष्मी जी का आर्शीवाद भी प्राप्त होगा। इन कामों का फल होता है उत्तम अक्षय तृतीया के दिन सोना खरीदने का विशेष महत्व होता है। अगर आप किसी कारण से सोना नहीं खरीद पाते हैं घर में मिट्टी का दिया जलाएं। शास्त्रों में अक्षय तृतीया के दिन मिट्टी के दिए जलाना सोना खरीदने के समान माना गया है। - प्रज्ञा पाण्डेय

प्रभासाक्षी 2 May 2022 5:33 pm

लू कॉमोरबिडिटी वाले व्यक्तियों, बच्चों को ज्यादा करती है प्रभावित

राष्ट्रीय राजधानी सहित देश के कई हिस्से इन दिनों भीषण गर्मी की चपेट में हैं, जिससे लू और अन्य...

खास खबर 1 May 2022 10:39 am

पारंपरिक परिधान के लिए 6 साधारण गजरा केशविन्यास (हेयर स्टाइल)

गजरा केशविन्यास (हेयर स्टाइल) के कुछ ऐसे लुक पर चर्चा कर रहे हैं जिन्हें आजमा कर वे किसी का भी ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करने में कामयाब हो सकती हैं.....

खास खबर 30 Apr 2022 12:25 pm

एफ- 1 कार से मिलते-जुलते थ्री व्‍हीलर में दूध बेचने वाले का वीडियो हुआ वायरल, आनंद महिंद्रा ने भी की तारीफ

जब बात जुगाड़ तकनीक की आती है, तो भारत में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, आए दिन भारतीयों के जुगाड़ टेक्निक की वीडियो सोशल मीडिया में देखने को मिलते रहते हैं। ऐसा ही एक इनोवेशन इंटरनेट पर वायरल हो रहा

बोल्डस्की हिंदी 29 Apr 2022 7:53 pm

1000 सालों बाद बनने जा रहा है अद्भुत संयोग, बिना टेलिस्कोप के भी देखा जा सकेगा ग्रह परेड का दुर्लभ नज़ारा

खगोलीय घटनाएं हर व्यक्ति की दिलचस्पी का कारण बनती हैं। सूर्य ग्रहण, चन्द्र ग्रहण, आसमान में कोई ग्रह दिख जाना जैसी घटनाओं का लोग बेसब्री से इंतज़ार करते हैं। इस वर्ष के अप्रैल के अंतिम दिनों में भी ऐसा होने जा

बोल्डस्की हिंदी 29 Apr 2022 4:17 pm

Solar Eclipse 2022: 'काले चांद' की गिरफ्त में आ जाएंगे सूर्यदेव, होगा आंशिक सूर्य ग्रहण

जल्द ही एक बहुत बड़ी खगोलीय घटा होने वाली है। साल 2022 का पहला सूर्य ग्रहण लगने वाला है। 30 अप्रैल को दुनियाभर में आंशिक सूर्यग्रहण लगेगा। इस ग्रहण को कई मायनों में ख़ास बताया जा रहा है। खगोल वैज्ञानिक साल

बोल्डस्की हिंदी 28 Apr 2022 4:27 pm

Bihar news: अंधेरे में पिस्टल चलाने की ट्रेनिंग, Video Viral होते ही SP ने बड़ी कार्रवाई के दिए निर्देश, देखें वीडियो

बिहार के गोपालगंज जिले के भवानीगंज गांव का एक वीडियो तेजी के साथ सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। जिसमें एक युवक पिस्टल से फायरिंग करता हुआ नजर आ रहा है।

हरि भूमि 28 Apr 2022 9:59 am

सुख-समृद्धि के लिए अक्षय तृतीया पर दान करें ये चीज़ें, नोट कर लें खरीददारी के लिए शुभ मुहूर्त और महत्व

हिंदू धर्म में अक्षय तृतीया पर्व का विशेष महत्व है। हिंदी पंचांग के अनुसार हर वर्ष वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया कहा जाता है। इस बार अक्षय तृतीया 3 मई को है। इस दिन भगवान विष्णु लक्ष्मी की पूजा की जाती है। मान्यताओं के अनुसार इस दिन सोना-चांदी खरीदना शुभ होता है।अक्षय तृतीया पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने से जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है। माना जाता है कि अक्षय तृतीया के दिन भगवान विष्णु के छठे अवतार, भगवान परशुराम का जन्म हुआ था इसीलिए इस दिन भगवान परशुराम जयंती भी मनाई जाती है। आइए जानते हैं अक्षय तृतीया 2022 का शुभ मुहूर्त और इसका महत्व - इसे भी पढ़ें: Surya Grahan 2022: साल के पहले सूर्य ग्रहण से पहले जान लें ये जरुरी बातें, गर्भवती महिलाऐं भूलकर भी न करें ये काम अक्षय तृतीया तिथि और शुभ मुहूर्त अक्षय तृतीया तिथि आरंभ: - 3 मई 2022, सुबह 05 बजकर 19 मिनट तृतीया तिथि समाप्त: - 04 मई 2022, सुबह 07 बजकर 33 मिनट अक्षय तृतीया पूजा मुहूर्त: - सुबह 05 बजकर 39 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 18 मिनट तक अक्षय तृतीया का महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन त्रेतायुग प्रारंभ हुआ था। इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने से जीवन के सभी पाप नष्ट होते हैं। धार्मिक दृष्टि से अक्षय तृतीया को बेहद महत्वपूर्ण तिथि शुभ माना जाता है। ‌ज्योतिषशास्त्र के अनुसार अक्षय तृतीया पर अबूझ मुहूर्त का योग बनता है। माना जाता है कि अक्षय तृतीया पर कोई भी शुभ कार्य करने के लिए शुभ मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती है। मान्यताओं के अनुसार अक्षय तृतीया पर दान-पुण्य करने से अक्षय फल मिलता है। इस दिन सोने-चांदी की वस्तुएं खरीदने से भविष्य में अधिक धन की प्राप्ति हो सकती है। अक्षय तृतीया पर भगवान परशुराम की पूजा करना भी बेहद शुभ माना जाता है। इसे भी पढ़ें: Gyan Ganga: लक्ष्मीजी ने क्या सोचकर वरमाला भगवान विष्णु को पहनाई? अक्षय तृतीया के दिन इन चीजों का करें दान इस दिन ठंडी चीजें जैसे- जल से भरे घड़े, कुल्हड़, पंखे, छाता, चावल, खरबूजा, ककड़ी, चीनी, सत्तू आदि का दान करना बहुत उत्तम माना जाता है। यदि इस शुभ दिन आप अपने भाग्योदय के लिए कुछ खरीदना चाहते हैं तो खरीदें ये चीजें जैसे- सोना, चांदी, मिट्टी के पात्र, रेशमी वस्त्र, साड़ी, चावल, हल्दी, फूल का पौधा और शंख। - प्रिया मिश्रा

प्रभासाक्षी 27 Apr 2022 12:44 pm

अपने साथी को दें रोज एक प्यार की झप्पी, मुस्कुराती रहेगी जिन्दगी

प्यार भरी जप्पी हर तनाव को दूर करती है। यह हमारे अकेलेपन और अवसाद, रोग की चिन्ताओं से दूरी बना देती है। प्यार का इजहार किसी भी तरह किया जा सकता है लेकिन अपने साथी को अहसास दिलाने के लिए सिर्फ और सिर्फ हग.....

खास खबर 25 Apr 2022 12:22 pm

कॉलेज स्टूडेंट के लिए 10 स्मार्ट हेयर स्टाइल

यहां दी गई स्टाइल गाइड उन सभी को मिश्रित करती है और आपको स्मार्ट बना सकती है। आप उन्हें निश्चित रूप से पसंद करेंगे, चाहे वह एक साधारण लुक हो या ट्रेंडिंग सैलून स्टाइल या नए जमाने का प्रसिद्ध.....

खास खबर 23 Apr 2022 11:01 am

अपनी राशि अनुसार बनाए सैक्सुअल लाइफ

पति-पत्नी के मध्य प्यार तभी परवान चढ़ता है जब वे एक दूसरे को सेक्स के मार्फत पूरी तरह सेे सन्तुष्ट कर पाते हैं। स्वस्थ रहने के लिए पौष्टिक आहार के साथ-साथ खुशहाल सेक्सुअल जिन्दगी का होना भी बहुत....

खास खबर 22 Apr 2022 1:17 pm

Happy Earth Day 2022: जानें पृथ्वी दिवस पर मशहूर हस्तियों के बेशक़ीमती विचार

मनुष्य प्रकृति का हिस्सा है। मगर अपनी सुख-सुविधाओं को पूरा करने की चाह में उसका दखल काफी बढ़ गया है जिसका असर सीधे तौर पर पर्यावरण और पृथ्वी पर देखने को मिल रहा है। पृथ्वी सभी का ख्याल रखती है चाहे

बोल्डस्की हिंदी 21 Apr 2022 7:17 pm

Earth Day 2022: जानें नष्ट होती पृथ्वी को बचाने की ये मुहिम कैसे हुई शुरू

हम जिस घर में रहते हैं वहां की देखभाल हम अच्छी तरह करते हैं। इसी प्रकार पृथ्वी भी हम सभी का घर है, फिर इसके प्रति इतनी लापरवाही क्यों की जाती है। पेड़ों और जगंलो की तेजी से हो रही कटाई,

बोल्डस्की हिंदी 21 Apr 2022 5:06 pm

जानें कौन हैं लेफ्टिनेंट जनरल मनोज पांडे जो संभालेंगे आर्मी चीफ पद की जिम्मेदारी

लेफ्टिनेंट जनरल मनोज पांडे को भारतीय सेना का अध्यक्ष चयनित किया गया है। 29वें सेना अध्यक्ष मनोज पांडे नागपुर से आते हैं और वे एम.एम. नरवाने की जगह आर्मी चीफ़ का पद संभालेंगे। वे कोर्प्स ऑफ़ इंजीनियर के पहले ऐसे कमांडर

बोल्डस्की हिंदी 19 Apr 2022 3:33 pm

क्या आपने कभी बनाई है अंडों वाली मैगी, एक बार जरूर बनाएं

आज हम आपको अंडे वाली मैगी बनाना सिखाते हैं। यह मैगी स्वादिष्ट होने के साथ ही हेल्दी भी है । आप घर पर इसे एक बार जरूर बनाना चाहेंगी.....

खास खबर 19 Apr 2022 2:54 pm

बैसाखी पर विशेषः नाचो-गाओ, खुशियां मनाओ आई बैसाखी रे

भारत एक कृषि प्रधान देश है और हमारे यहां बैसाखी पर्व का संबंध फसलों के पकने के बाद उसकी कटाई से जोड़कर देखा जाता रहा है। इस पर्व को फसलों के पकने के प्रतीक के रूप में भी जाना जाता है। इसे विशेष तौर पर से पंजाब का प्रमुख त्यौहार माना जाता है। वैसे देशभर में बैसाखी को बड़ी धूमधाम एवं हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। सिख समुदाय बैसाखी से ही नए साल की शुरूआत मानते हैं। इस दिन एक-दूसरे को बधाईयां दी जाती हैं। पंजाब में किसान तब अपने खेतों को फसलों से लहलहाते देखता है तो इस दिन खुशी से झूम उठता है। खुशी के इसी आलम में शुरू होता है गिद्दा और भांगड़ा का मनोहारी दौर। पंजाब में ढ़ोल-नगाड़ों की धुन पर पारम्परिक पोशाक में युवक-युवतियां नाचते-गाते और जश्न मनाते हैं तथा सभी गुरूद्वारों को फूलों तथा रंग-बिरंगी रोशनियों से सजाया जाता है। उत्तर भारत में और विशेषतः पंजाब तथा हरियाणा में गिद्दा और भांगड़ा की धूम के साथ मनाए जाने वाले बैसाखी पर्व के प्रति भले ही काफी जोश देखने को मिलता है लेकिन वास्तव में यह त्यौहार विभिन्न धर्म एवं मौसम के अनुसार देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। पर्व की खूब धूम रहती है। पश्चिम बंगाल में इसे ‘नबा वर्ष’ के नाम से मनाया जाता है तो केरल में ‘विशू’ नाम से तथा असम में यह ‘बीहू’ के नाम से मनाया जाता है। बंगाल में ‘पोइला बैसाखी’ भी कहा जाता है और वे अपने नए साल की शुरुआत मानते हैं। हिन्दू धर्म की पौराणिक मान्यताओं के अनुसार हजारों साल पहले इसी दिन मां गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ था। इसीलिए इस दिन गंगा आरती करने तथा पवित्र नदियों में स्नान करने की भी परम्परा रही है। इसे भी पढ़ें: कब है हनुमान जयंती? जानिए शुभ मुहूर्त और पूजन विधि, इस मंत्र से करें बजरंगबली को प्रसन्न बैसाखी को सूर्य वर्ष का प्रथम दिन माना गया है क्योंकि इसी दिन सूर्य अपनी पहली राशि मेष में प्रविष्ट होता है और इसीलिए इस दिन को ‘मेष संक्रांति’ भी कहा जाता है। यह मान्यता रही है कि सूर्य के मेष राशि में प्रवेश करने के साथ ही सूर्य अपनी कक्षा के उच्चतम बिन्दुओं पर पहुंच जाता है और सूर्य के तेज के कारण शीत की अवधि खत्म हो जाती है। इस प्रकार सूर्य के मेष राशि में आने पर पृथ्वी पर नवजीवन का संचार होने लगता है। इस तरह बैसाखी खुशियों का त्यौहार है। बैसाखी का पवित्र दिन हमें गुरू गोबिन्द सिंह जैसे महापुरूषों के महान् आदर्शों एवं संदेशों को अपनाने तथा उनके पद्चिन्हों पर चलने के लिए प्रेरित करता है और हमें यह संदेश भी देता है कि हमें अपने राष्ट्र में शांति, सद्भावना एवं भाईचारे के नए युग का शुभारंभ करने की दिशा में सार्थक पहल करनी चाहिए। - योगेश कुमार गोयल (लेखक 32 वर्षों से साहित्य एवं पत्रकारिता में निरन्तर सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार हैं)

प्रभासाक्षी 14 Apr 2022 8:16 am

रामनवमी पर जानिये मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के पूजन की विधि और व्रत कथा

रामनवमी का पर्व चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को मनाया जाता है। भगवान श्रीराम के जन्मदिवस के इस त्योहार पर देशभर में बड़ा हर्षोल्लास देखने को मिलता है। इस साल तो कोरोना के हालात ठीक होने के चलते श्रद्धालुओं में रामनवमी को लेकर बड़ा उत्साह देखने को मिल रहा है। देशभर के मंदिरों में इस दिन श्रीराम जन्मोत्सव पर कई कार्यक्रम रखे गये हैं। अब तो अयोध्या में भी रामनवमी की धूम देखने लायक होती है। एक तो अयोध्या में श्रीराम के भव्य मंदिर का निर्माण कार्य प्रगति पर है, रामलला की मूर्ति टैंट से निकाल कर अस्थायी मंदिर में स्थापित की जा चुकी है। दूसरा अयोध्या की साज-सज्जा पर राज्य की सरकार विशेष दिलचस्पी लेती है जिससे अयोध्या नगरी अब सभी पर्वों पर जगमगाती रहती है। इसे भी पढ़ें: सामाजिक समरसता का समुच्चय है भगवान श्रीराम का जीवन मान्यता है कि भगवान श्रीराम का जन्म मध्याह्न काल में हुआ था। इसीलिए इस दिन तीसरे प्रहर तक व्रत रखा जाता है और दोपहर में मनाया जाता है राम महोत्सव। इस दिन व्रत रखकर भगवान श्रीराम और रामचरितमानस की पूजा करनी चाहिए। इस दिन जो श्रद्धालु दिनभर उपवास रखकर भगवान श्रीराम की पूजा करते हैं तथा अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार दान−पुण्य करते हैं वह अनेक जन्मों के पापों को भस्म करने में समर्थ होते हैं। रामनवमी के दिन पुण्य सलिला सरयू नदी में स्नान करके लोग पुण्य लाभ कमाते हैं। भगवान श्रीराम के जन्म स्थान अयोध्या में इस त्यौहार की विशेष धूम रहती है। अयोध्या का चैत्र रामनवमी मेला काफी प्रसिद्ध है जिसमें देश भर से लाखों श्रद्धालु जुटते हैं। इस दिन देश भर के मंदिरों से रथ यात्राएं और भगवान श्रीराम, उनकी पत्नी सीता, भाई लक्ष्मण व भक्त हनुमान की झांकियां भी निकाली जाती हैं। भगवान श्रीराम का व्यक्तित्व भगवान श्रीराम की मातृ−पितृ भक्ति बड़ी महान थी। वह अपने पिता राजा दशरथ के एक वचन का पालन करने 14 वर्ष तक वनवास काटने चले गए और माता कैकयी का भी उतना ही सम्मान किया। भातृ प्रेम के लिए तो श्रीराम का नाम सबसे पहले लिया जाता है। उन्होंने अपने भाइयों को अपने बेटों से बढ़ कर प्यार दिया। इनके इसी भातृ प्रेम की वजह से उनके भाई उन पर मर मिटने को तैयार रहते थे। श्रीराम ने रावण का और अन्य असुरों का संहार कर धरती पर शांति भी कायम की। भगवान श्रीराम महान पत्नी व्रता भी थे। उन्होंने वनवास से लौटने के बाद माता सीता के साथ न रह कर भी कभी राजसी ठाठ में जीवन नहीं बिताया तथा न ही कभी उनके सिवा किसी अन्य की कल्पना की। भगवान श्रीराम अपने सेवकों तथा अनुयायियों का भी सदैव ध्यान रखते हैं। वह अपने सेवक हनुमानजी एवं अंगद के लिए हमेशा प्रस्तुत रहते थे। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम को सर्वगुण संपन्न माना जाता है। इसे भी पढ़ें: प्रभु श्रीराम हैं सुशासन एवं लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रेरक रामनवमी पर ऐसे करें पूजन इस दिन व्रत रखने वालों को चाहिए कि वह प्रातः जल्दी उठ कर नित्यकर्म से निवृत्त होकर भगवान श्रीराम की मूर्ति को शुद्ध पवित्र ताजे जल से स्नान कराकर नये वस्त्राभूषणों से सज्जित करें और फिर धूप दीप, आरती, पुष्प, पीला चंदन आदि अर्पित करते हुए भगवान की पूजा करें। रामायण में वर्णित श्रीराम जन्म कथा का श्रद्धा भक्ति पूर्वक पाठ और श्रवण तो इस दिन किया ही जाता है, अनेक भक्त रामायण का अखण्ड पाठ भी करते हैं। भगवान श्रीराम को दूध, दही, घी, शहद, चीनी मिलाकर बनाया गया पंचामृत तथा भोग अर्पित किया जाता है। भगवान श्रीराम का भजन, पूजन, कीर्तन आदि करने के बाद प्रसाद को पंचामृत सहित श्रद्धालुओं में वितरित करने के बाद व्रत खोलने का विधान है। रामनवमी के दिन मंदिर में अथवा मकान पर ध्वजा, पताका, तोरण और बंदनवार आदि से सजाने का विशेष विधान है। रामनवमी व्रत कथा राम, सीता और लक्ष्मण वन में जा रहे थे। सीता जी और लक्ष्मण को थका हुआ देखकर राम जी ने थोड़ा रुक कर आराम करने का विचार किया और एक बुढ़िया के घर गए। बुढ़िया सूत कात रही थी। बुढ़िया ने उनकी आवभगत की और बैठाया, स्नान-ध्यान करवाकर भोजन करवाया। राम जी ने कहा- बुढ़िया माई, पहले मेरा हंस मोती चुगाओ, तो मैं भी करूं। बुढ़िया बेचारी के पास मोती कहां से आतो जोकि सूत कात कर गुजारा करती थी। अतिथि को ना कहना भी वह ठीक नहीं समझती थीं। दुविधा में पड़ गईं। अत: दिल को मजबूत कर राजा के पास पहुंच गईं और अंजली मोती देने के लिये विनती करने लगीं। राजा अचम्भे में पड़ा कि इसके पास खाने को दाने नहीं हैं और मोती उधार मांग रही है। इस स्थिति में बुढ़िया से मोती वापस प्राप्त होने का तो सवाल ही नहीं उठता। आखिर राजा ने अपने नौकरों से कहकर बुढ़िया को मोती दिला दिये। इसे भी पढ़ें: सत्य, न्याय एवं सदाचार के प्रतीक हैं भगवान श्रीराम बुढ़िया मोती लेकर घर आई, हंस को मोती चुगाए और मेहमानों की आवभगत की। रात को आराम कर सवेरे राम जी, सीता जी और लक्ष्मण जी जाने लगे। राम जी ने जाते हुए उसके पानी रखने की जगह पर मोतियों का एक पेड़ लगा दिया। दिन बीतते गये और पेड़ बड़ा हुआ, पेड़ बढ़ने लगा, पर बुढ़िया को कु़छ पता नहीं चला। मोती के पेड़ से पास-पड़ोस के लोग चुग-चुगकर मोती ले जाने लगे। एक दिन जब बुढ़िया उसके नीचे बैठी सूत कात रही थी। तो उसकी गोद में एक मोती आकर गिरा। बुढ़िया को तब ज्ञात हुआ। उसने जल्दी से मोती बांधे और अपने कपड़े में बांधकर वह किले की ओर ले चली़। उसने मोती की पोटली राजा के सामने रख दी। इतने सारे मोती देख राजा अचम्भे में पड़ गया। उसके पूछने पर बुढ़िया ने राजा को सारी बात बता दी। राजा के मन में लालच आ गया। वह बुढ़िया से मोती का पेड़ मांगने लगा। बुढ़िया ने कहा कि आस-पास के सभी लोग ले जाते हैं। आप भी चाहे तो ले लें। मुझे क्या करना है। राजा ने तुरन्त पेड़ मंगवाया और अपने दरबार में लगवा दिया। पर रामजी की मर्जी, मोतियों की जगह कांटे हो गये और लोगों के कपड़े उन कांटों से खराब होने लगे। एक दिन रानी की ऐड़ी में एक कांटा चुभ गया और पीड़ा करने लगा। राजा ने पेड़ उठवा कर बुढ़िया के घर वापस भिजवा दिया। पेड़ पर पहले की तरह से मोती लगने लगे। बुढ़िया आराम से रहती और खूब मोती बांटती। - शुभा दुबे

प्रभासाक्षी 9 Apr 2022 5:38 pm

Navratri Day 9: महानवमी के दिन इस विधि से करें माँ सिद्धिदात्री की पूजा, इन मंत्रों से करें देवी को प्रसन्न

नवरात्रि में महानवमी के दिन माता सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। माता सिद्धिदात्री को देवी दुर्गा का नौंवा स्वरूप माना जाता है। माना जाता है कि सभी देवी-देवताओं को माता सिद्धिदात्री से ही सिद्धिओं की प्राप्ति हुई है। पुराणों के अनुसार, ब्रह्माण्ड की रचना करने के लिए देवी पार्वती ने भगवान शिव को शक्ति दी, जिसके कारण माता पार्वती का नाम सिद्धिदात्री पड़ा। माता सिद्धिदात्री से ही भगवान शिव का अर्धनारीश्वर रूप पूर्ण होता है। देवी दुर्गा के इस स्वरुप की पूजा के साथ ही नवरात्रि का समापन होता है। माता सिद्धिदात्री कमल पर विराजमान हैं। उनकी चार भुजाएं हैं, माता अपने एक दाएं हाथ में गदा और दूसरे दाएं हाथ में च्रक धारण करती हैं। वहीं, माता अपने एक बाएं हाथ में कमल का पुष्प और दूसरे बाएं हाथ में शंख धारण करती हैं। इसे भी पढ़ें: सामाजिक समरसता का समुच्चय है भगवान श्रीराम का जीवन माता सिद्धिदात्री की पूजा विधि सबसे पहले पूजा की चौकी पर माता की मूर्ति स्थापित करें। इसके बाद माता की मूर्ति के सामने दीपक जलाएं और माता के मंत्र का उच्चारण करें। मंत्र के उच्चारण के बाद माता की आरती करें। आरती के बाद माता को नवाह्न प्रसाद, नवरस युक्त भोजन, नौ प्रकार के पुष्प और नौ प्रकार के फलों का भोग लगाएं। अगर आपने दुर्गा अष्टमी के दिन कन्या पूजन नहीं किया है तो नवमी के दिन विधिपूर्वक पूजन करें। सिद्ध गन्धर्व यक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि । सेव्यमाना सदा भूयाात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी ।। ध्यान वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्। कमलस्थितां चतुर्भुजा सिद्धीदात्री यशस्वनीम् ।। स्वर्णावर्णा निर्वाणचक्रस्थितां नवम् दुर्गा त्रिनेत्राम्। शख, चक्र, गदा, पदम, धरां सिद्धीदात्री भजेम् ।। पटाम्बर, परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्। मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम् ।। प्रफुल्ल वदना पल्लवाधरां कातं कपोला पीनपयोधराम्। कमनीयां लावण्यां श्रीणकटि निम्ननाभि नितम्बनीम् ।। इसे भी पढ़ें: सत्य, न्याय एवं सदाचार के प्रतीक हैं भगवान श्रीराम स्तोत्र पाठ कंचनाभा शखचक्रगदापद्मधरा मुकुटोज्वलो। स्मेरमुखी शिवपत्नी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते ।। पटाम्बर परिधानां नानालंकारं भूषिता। नलिस्थितां नलनार्क्षी सिद्धीदात्री नमोअस्तुते ।। परमानंदमयी देवी परब्रह्म परमात्मा। परमशक्ति, परमभक्ति, सिद्धिदात्री नमोअस्तुते ।। विश्वकर्ती, विश्वभती, विश्वहर्ती, विश्वप्रीता। विश्व वार्चिता विश्वातीता सिद्धिदात्री नमोअस्तुते ।। भुक्तिमुक्तिकारिणी भक्तकष्टनिवारिणी। भव सागर तारिणी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते ।। धर्मार्थकाम प्रदायिनी महामोह विनाशिनी। मोक्षदायिनी सिद्धीदायिनी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते ।। - प्रिया मिश्रा

प्रभासाक्षी 9 Apr 2022 5:18 pm

प्रभु श्रीराम हैं सुशासन एवं लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रेरक

हिन्दु धर्म शास्त्रों के अनुसार त्रेतायुग में रावण के अत्याचारों को समाप्त करने तथा धर्म की पुनःर्स्थापना के लिये भगवान विष्णु ने मृत्यु लोक में श्रीराम के रूप में अवतार लिया था। श्रीरामचन्द्रजी का जन्म चैत्र शुक्ल की नवमी के दिन पुनर्वसु नक्षत्र तथा कर्क लग्न में रानी कौशल्या की कोख से, राजा दशरथ के घर में हुआ था। रामनवमी का त्यौहार इस वर्ष 10 अप्रैल 2022 को मनाया जायेगा। इस पर्व के साथ ही माँ दुर्गा के नवरात्रों का समापन भी होता है। हिन्दू धर्म में रामनवमी के दिन पूजा अर्चना की जाती है। रामनवमी का सनातन धर्म में विशेष धार्मिक और पारंपरिक महत्व है जो हिंदू धर्म के लोगों के द्वारा पूरी भक्ति, आस्था एवं उत्साह के साथ मनाया जाता है। भगवान विष्णु के अवतार श्रीराम का धरती पर अवतार लेने का एकमात्र उद्देश्य अधर्म का नाश कर धर्म की पुनः स्थापना करना था जिससे सामान्य मानव शांति, प्रेम एवं सुख के साथ अपना जीवन व्यतीत कर सके, साथ ही भगवान की भक्ति कर सके। उन्हें किसी प्रकार का दुःख या कष्ट न सहना पड़ें। इसे भी पढ़ें: सत्य, न्याय एवं सदाचार के प्रतीक हैं भगवान श्रीराम भगवान श्रीराम अविनाशी परमात्मा हैं जो सबके सृजनहार व पालनहार हैं। दरअसल श्रीराम के लोकनायक चरित्र ने जाति, धर्म और संप्रदाय की संकीर्ण सीमाओं को लांघ कर जन-जन को अनुप्राणित किया। भारत में ही नहीं, दुनिया में श्रीराम अत्यंत पूज्यनीय हैं और आदर्श पुरुष हैं। थाईलैंड, इंडोनेशिया आदि कई देशों में भी श्रीराम आदर्श के रूप में पूजे जाते हैं। श्रीराम केवल भारतवासियों या केवल हिन्दुओं के मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं हैं, बल्कि बहुत से देशों, जातियों के भी मर्यादा पुरुष हैं जो भारतीय नहीं। रामायण में जो मानवीय मूल्य दृष्टि सामने आई, वह देशकाल की सीमाओं से ऊपर उठ गई। वह उन तत्वों को प्रतिष्ठित करती है, जिन्हें वह केवल पढ़े-लिखे लोगों की चीज न रहकर लोक मानस का अंग बन गई। इंडोनेशिया जैसे मुस्लिम राष्ट्र में नागरिक रामलीला का मंचन करते हैं तो क्या वे अपने धर्म से भ्रष्ट हो जाते हैं? इस मुस्लिम देश में रामलीलाओं का मंचन भारत से कहीं बेहतर और शास्त्रीय कलात्मकता, उच्च धार्मिक आस्था के साथ किया जाता है। ऐसा इसलिये संभव हुआ है कि श्रीराम मानवीय आत्मा की विजय के प्रतीक महापुरुष हैं, जिन्होंने धर्म एवं सत्य की स्थापना करने के लिये अधर्म एवं अत्याचार को ललकारा। इस तरह वे अंधेरों में उजालों, असत्य पर सत्य, बुराई पर अच्छाई के प्रतीक बने। सचमुच श्रीराम न केवल भारत के लिये बल्कि दुनिया के प्रेरक है, पालनहार है। भारत के जन-जन के लिये वे एक संबल हैं, एक समाधान हैं, एक आश्वासन हैं निष्कंटक जीवन का, अंधेरों में उजालों का। भारत की संस्कृति एवं विशाल आबादी के साथ दर्जनभर देशों के लोगों में यह नाम चेतन-अचेतन अवस्था में समाया हुआ है। यह भारत जिसे आर्यावर्त भी कहा गया है, उसके ज्ञात इतिहास के श्रीराम प्रथम पुरुष एवं राष्ट्रपुरुष हैं, जिन्होंने सम्पूर्ण राष्ट्र को उत्तर से दक्षिण, पश्चिम से पूर्व तक जोड़ा था। दीन-दुखियों और सदाचारियों की दुराचारियों एवं राक्षसों से रक्षा की थी। सबल आपराधिक एवं अन्यायी ताकतों का दमन किया। सर्वाेच्च लोकनायक के रूप में उन्होंने जन-जन की आवाज को सुना और राजतंत्र एवं लोकतंत्र में जन-गण की आवाज को सर्वाेच्चता प्रदान की। श्रीराम ने ऋषि-मुनियों के स्वाभिमान एवं आध्यात्मिक स्वाधीनता की रक्षा कर उनके जीवन, साधनाक्रम एवं भविष्य को स्वावलम्बन एवं आत्म-सम्मान के प्रकाश से आलोकित किया। इस मायने में श्रीराम राष्ट्र की एकता के सूत्रधार एवं लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रेरक है, इसीलिये श्रीराम मन्दिर लोकतंत्र का भी पवित्र तीर्थ होगा। कबीरजी आदि भक्त कवियों ने श्रीराम गुणगान करते हुए कहा है कि आदि श्रीराम वह अविनाशी परमात्मा है जो सब का सृजनहार व पालनहार है। जिसके एक इशारे पर धरती और आकाश काम करते हैं जिसकी स्तुति में तैंतीस कोटि देवी-देवता नतमस्तक रहते हैं। जो पूर्ण मोक्षदायक व स्वयंभू है। ‘एक राम दशरथ का बेटा, एक राम घट घट में बैठा, एक राम का सकल उजियारा, एक राम जगत से न्यारा’।। श्रीराम ने मर्यादा के पालन के लिए राज्य, मित्र, माता-पिता, यहां तक कि पत्नी का भी साथ छोड़ा। इनका परिवार, आदर्श भारतीय परिवार का प्रतिनिधित्व करता है। श्रीराम रघुकुल में जन्मे थे, जिसकी परम्परा प्रान जाहुं बरु बचनु न जाई की थी। श्रीराम हमारी अनंत मर्यादाओं के प्रतीक पुरुष हैं इसलिए उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम के नाम से पुकारा जाता है। हमारी संस्कृति में ऐसा कोई दूसरा चरित्र नहीं है जो श्रीराम के समान मर्यादित, धीर-वीर, न्यायप्रिय और प्रशांत हो। वाल्मीकि के श्रीराम लौकिक जीवन की मर्यादाओं का निर्वाह करने वाले वीर पुरुष हैं। उन्होंने लंका के अत्याचारी राजा रावण का वध किया और लोक धर्म की पुनःस्थापना की। लेकिन वे नील गगन में दैदीप्यमान सूर्य के समान दाहक शक्ति से संपन्न, महासमुद्र की तरह गंभीर तथा पृथ्वी की तरह क्षमाशील भी हैं। वे दुराचारियों, यज्ञ विध्वंसक राक्षसों, अत्याचारियों का नाश कर लौकिक मर्यादाओं की स्थापना करके आदर्श समाज की संरचना के लिए ही जन्म लेते हैं। आज ऐसे ही स्वस्थ समाज निर्माण की जरूरत है। इसे भी पढ़ें: एक हजार साल पुराना है भंवरो की देवी जीण माता का मंदिर श्रीराम हमारे कण-कण में समाये हैं, हमारी जीवनशैली का अभिन्न अंग हैं। सुबह बिस्तर से उठते ही राम। बाहर निकलते ही राम-राम, दिन भर राम नाम की अटूट श्रृंखला। फिर शाम को राम का नाम और जीवन की अंतिम यात्रा भी ‘राम नाम सत्य है’ के साथ। आखिर इसका रहस्य क्या है? घर में राम, मंदिर में राम, सुख में राम, दुख में राम। शायद यही देख कर अल्लामा इकबाल को लिखना पड़ा- ‘है राम के वजूद पर हिन्दोस्तां को नाज, अहले वतन समझते हैं, उनको इमामे हिंद।’ श्रीराम का जो विराट व्यक्तित्व भारतीय जनमानस पर अंकित है, उतने विराट व्यक्तित्व का नायक अब तक के इतिहास में कोई दूसरा नहीं हुआ। श्रीराम के जैसा दूसरा कोई पुत्र नहीं। उनके जैसा सम्पूर्ण आदर्श वाला पति, राजा, स्वामी कोई भी दूसरा नाम नहीं। श्रीराम किसी धर्म का हिस्सा नहीं, बल्कि मानवीय चरित्र का प्रेरणादायी प्रतीक है। श्रीराम सुख-दुख, पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म, शुभ-अशुभ, कर्तव्य-अकर्तव्य, ज्ञान-विज्ञान, योग-भोग, स्थूल-सूक्ष्म, जड़-चेतन, माया-ब्रह्म, लौकिक-पारलौकिक आदि का सर्वत्र समन्वय करते हुए दिखाई देते हैं। इसलिए वे मर्यादा पुरुषोत्तम तो हैं ही, लोकनायक एवं मानव चेतना के आदि पुरुष भी हैं। भारत के विभिन्न धार्मिक संप्रदायों और मत-मतांतरों के प्रवर्त्तक संतों ने श्रीराम की अलग-अलग कल्पना की है। इनमें हर एक के श्रीराम अलग-अलग हैं, लेकिन सभी के श्रीराम मर्यादा के प्रतिमूर्ति एवं आदर्श शासन-व्यवस्था की ऊंच रोशनी की मीनार है। श्रीराम का सम्पूर्ण जीवन विलक्षणताओं एवं विशेषताओं से ओतप्रोत है, प्रेरणादायी है। उन्हें अपने जीवन की खुशियों से बढक़र लोक जीवन की चिंता थी, तभी उन्होंने अनेक तरह के त्याग के उदाहरण प्रस्तुत किये। राजा के इन्हीं आदर्शों के कारण ही भारत में रामराज्य की आज तक कल्पना की जाती रही है। श्रीराम के बिना भारतीय समाज की कल्पना संभव नहीं है। अब श्रीराम मन्दिर के रूप में एक शक्ति एवं सिद्धि स्थल बन रहा है, जो रामराज्य के सुदीर्घ काल के सपने को आकार देने का सशक्त एवं सकारात्मक वातावरण भी बनेगा। श्रीराम मंदिर जीवनमूल्यों की महक एवं प्रयोगशाला के रूप में उभरेगा। क्योंकि श्रीराम का चरित्र ही ऐसा है जिससे न केवल भारत बल्कि दुनिया में शांति, अहिंसा, अयुद्ध, साम्प्रदायिक सौहार्द एवं अमन का साम्राज्य स्थापित होगा। यूक्रेन एवं रूस के बीच चल रहा युद्ध एवं इस परिप्रेक्ष्य में विश्वयुद्ध की संभावनाओं को देखते हुए श्रीराम के जीवन आदर्शों को विश्व व्यापी बनाने की अपेक्षा है, ताकि दुनिया शांति एवं चैन से जी सके। - ललित गर्ग

प्रभासाक्षी 9 Apr 2022 12:22 pm

Navratri Day 5: स्कंदमाता को प्रसन्न करने के लिए पढ़ें ये मंत्र, जानें पूजन विधि

नवरात्रि के पाँचवें दिन स्कंदमाता की पूजा की जाती है। स्कंदमाता को देवी जगदम्बा का स्वरूप माना जाता है। स्कंद यानि कार्तिकेय की माता होने के कारण इन्हे स्कंदमाता के नाम से जाना जाता है। धार्मिक पुराणों के अनुसार, कार्तिकेय को जन्म देने के बाद देवी पार्वती का नाम स्कंदमाता पड़ा। यह भी कहा जाता है कि आदिशक्ति जगदम्बा ने बाणासुर के अत्याचार से संसार को मुक्त कराने के लिए अपने तेज से एक बालक को जन्म दिया। 6 मुख वाले सनतकुमार को ही स्कंद कहा जाता है। पुराणों के अनुसार देवताओं और असुरों के बीच युद्ध में कार्तिकेय यानी स्कन्द कुमार देवताओं के सेनापति बने थे और देवताओं को विजय दिलाई थी। इसे भी पढ़ें: नवरात्रि में भूलकर भी न करें इन चीज़ों का सेवन वरना नाराज़ हो जाएंगी माता रानी स्कंदमाता सिंह पर सवार हैं और उनकी गोद में सनतकुमार हैं। स्कंदमाता की चार भुजाएं हैं, जिनमें से दो हाथों में माता कमल पुष्प धारण करती हैं। माता अपने दाएं हाथ से सनतकुमार को पकड़ी रहती हैं और दूसरे दाएं हाथ को अभय मुद्रा में रखती हैं। स्कंदमाता कमल पर विराजमान होती हैं, इसलिए उनको पद्मासना देवी भी कहा जाता है। स्कंदमाता की पूजा विधि नवरात्रि के पाँचवे दिन सबसे पहले पूजा स्थल पर माता की मूर्ति या तस्वीर को स्थापित करें। इसके बाद चौकी पर चांदी, तांबे या मिट्टी के घड़े में जल भरकर उस पर कलश रखें। इसके बाद माता को धूप, दीप, नैवेद्य, फल आदि अर्पित करें। माता को लाल रंग के पुष्प भी जरूर अर्पित करें। इसके बाद माता के मंत्र का जाप करें और माता की आरती करें।आरती के बाद माता को केले का भोग लगाएं। अब घर के सभी लोगों को प्रसाद बांटें। इसे भी पढ़ें: नवरात्रि में माता रानी का आशीर्वाद पाने के लिए पढ़ें ये स्तोत्र, श्रीदुर्गा सप्तशती के पाठ के बराबर मिलेगा फल माता का मंत्र सिंहासनगता नित्यं पद्माञ्चित करद्वया। शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी ।। ध्यान मंत्र वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्। सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा स्कन्दमाता यशस्वनीम् ।। धवलवर्णा विशुध्द चक्रस्थितों पंचम दुर्गा त्रिनेत्रम्। अभय पद्म युग्म करां दक्षिण उरू पुत्रधराम् भजेम् ।। पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानांलकार भूषिताम्। मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल धारिणीम् ।। प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वांधरा कांत कपोला पीन पयोधराम्। कमनीया लावण्या चारू त्रिवली नितम्बनीम् ।। स्तोत्र पाठ नमामि स्कन्दमाता स्कन्दधारिणीम्। समग्रतत्वसागररमपारपार गहराम् ।। शिवाप्रभा समुज्वलां स्फुच्छशागशेखराम्। ललाटरत्नभास्करां जगत्प्रीन्तिभास्कराम् ।। महेन्द्रकश्यपार्चिता सनंतकुमाररसस्तुताम्। सुरासुरेन्द्रवन्दिता यथार्थनिर्मलादभुताम् ।। अतर्क्यरोचिरूविजां विकार दोषवर्जिताम्। मुमुक्षुभिर्विचिन्तता विशेषतत्वमुचिताम् ।। नानालंकार भूषितां मृगेन्द्रवाहनाग्रजाम्। सुशुध्दतत्वतोषणां त्रिवेन्दमारभुषताम् ।। सुधार्मिकौपकारिणी सुरेन्द्रकौरिघातिनीम्। शुभां पुष्पमालिनी सुकर्णकल्पशाखिनीम् ।। तमोन्धकारयामिनी शिवस्वभाव कामिनीम्। सहस्त्र्सूर्यराजिका धनज्ज्योगकारिकाम् ।। सुशुध्द काल कन्दला सुभडवृन्दमजुल्लाम्। प्रजायिनी प्रजावति नमामि मातरं सतीम् ।। स्वकर्मकारिणी गति हरिप्रयाच पार्वतीम्। अनन्तशक्ति कान्तिदां यशोअर्थभुक्तिमुक्तिदाम् ।। पुनःपुनर्जगद्वितां नमाम्यहं सुरार्चिताम्। जयेश्वरि त्रिलोचने प्रसीद देवीपाहिमाम् ।। - प्रिया मिश्रा

प्रभासाक्षी 5 Apr 2022 5:35 pm

हांसी नगर परिषद का एक और कारनामा ! रिकवरी के आदेशों के बावजूद ठेकेदार को कर डाली बकाया पेमेंट

नियमानुसार नगर परिषद प्रशासन को चाहिए था कि वह एक करोड़ 70 लाख रुपए ठेकेदार मुकेश बंसल के खाते में डेबिट कर उसे ब्लैक लिस्ट करते। लेकिन मिलीभगत के चलते नगर परिषद प्रशासन ने ठेकेदार मुकेश बंसल का 30 मार्च को बकाया पेमेंट का चैक जारी कर दिया।

हरि भूमि 5 Apr 2022 10:00 am

नवरात्रि के चौथे दिन ऐसे करें कूष्मांडा माता को प्रसन्न, जानें पूजन विधि और मंत्र

नवरात्रि के चौथे दिन कुष्मांडा माता की पूजा की जाती है। कुष्मांडा माता को देवी दुर्गा का चौथा स्वरूप माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कुष्मांडा माता का यह रूप देवी पार्वती के विवाह से लेकर कार्तिकेय की प्राप्ति के बीच का है। देवी भागवत पुराण के अनुसार, कुष्मांडा माता ने अपने अंदर से ब्राह्मण की रचना की, जिसकी वजह से माता के इस स्वरूप का नाम कुष्मांडा पड़ा। कुष्मांडा माता को ही आदिशक्ति और आदिस्वरूपा माना गया है। कहा जाता है कि माता कुष्मांडा, सूर्यमंडल के भीतर के लोक में निवास करती हैं। इसे भी पढ़ें: नवरात्रि के तीसरे दिन इस विधि से करें माता चंद्रघणटा की पूजा, ऐसे करें माँ को प्रसन्न कूष्मांडा माता की आठ भुजाएं हैं, जिनमें कमण्डल, धनुष, बाण, कमल पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा और सभी सिद्धियों को देने वाली जपमाला है और इन चीजों के साथ ही माता के एक हाथ में कलश भी है। आठ भुजाएं होने के कारण इन्हें अष्टभुजा भी कहा जाता है। माता के इस स्वरूप की पूजा करने से अनेक रोगों से मुक्ति मिलती है। नवरात्रि के चौथे दिन पूजा कैसे करें नवरात्रि के चौथे दिन सुबह जल्दी उठकर कुष्मांडा माता की पूजा करें। माता की पूजा करने के लिए सबसे पहले हाथ में फूल ले और माता के मंत्र का जाप करें। पूजा में मां को लाल रंग का पुष्प, गुड़हल या गुलाब, सिंदूर, धूप, गंध, भोग चढ़ाए। सफेद कुम्हड़े( पेठे का फल) की बलि माता को अर्पित करें, इसके बाद माता को मालपुए, दही और हलवे का भोग लगाएं। सुरासम्पूर्ण कलशं रुधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे।। ध्यान वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्। सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम् ।। भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्। कमण्डलु, चाप, बाण, पदमसुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम् ।। पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्। मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल, मण्डिताम् ।। प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कांत कपोलां तुंग कुचाम्। कोमलांगी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम् ।। इसे भी पढ़ें: नवरात्रि में माता रानी का आशीर्वाद पाने के लिए पढ़ें ये स्तोत्र, श्रीदुर्गा सप्तशती के पाठ के बराबर मिलेगा फल स्तोत्र पाठ दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दरिद्रादि विनाशनीम्। जयंदा धनदा कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम् ।। जगतमाता जगतकत्री जगदाधार रूपणीम्। चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम् ।। त्रैलोक्यसुन्दरी त्वंहिदुःख शोक निवारिणीम्। परमानन्दमयी, कूष्माण्डे प्रणमाभ्यहम् ।। - प्रिया मिश्रा

प्रभासाक्षी 4 Apr 2022 5:02 pm

Navratri Day 2: नवरात्रि का दूसरा दिन, जानें माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि और मंत्र

नवरात्रि के दूसरे दिन माता ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। माता ब्रम्ह्चारिणी को माँ जगदम्बा का दूसरा स्वरुप माना जाता है। मान्यताओं के अनुसार, माता ब्रह्मचारिणी ने ही ब्राह्मण की रचना की थी, जिसकी वजह से उनका नाम ब्रह्मचारिणी पड़ा। इसके अलावा ऐसा भी कहा जाता है कि भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए माता पार्वती ने कठिन तपस्या की थी। उनकी इस तपस्या के कारण माता को ब्रह्मचारिणी नाम मिला। ब्रह्मचारिणी दो शब्दों को जोड़कर बना है- ब्रम्हा - जिसका मतलब है तपस्या और चारिणी - जिसका मतलब है आचरण करना। ऐसा कहा जाता है कि माता ब्रह्मचारिणी के रूप में ब्रम्हा जी की शक्ति समाई हुई है। इसके अलावा, जो व्यक्ति भक्ति भाव से ब्रह्मचारिणी माता की पूजा करते हैं उन्हें सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति नवरात्रि के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की श्रद्धापूर्वक पूजा करता है, उसे किसी प्रकार का भय नहीं सताता। ब्रह्मचारिणी माता हिमालय और मैना की पुत्री हैं। इन्होंने देवर्षि नारद जी के कहने पर भगवान शंकर की ऐसी कठोर तपस्या की जिससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने इन्हें मनोवांछित वरदान दिया। जिसके फलस्वरूप यह देवी भगवान भोलेनाथ की वामिनी अर्थात पत्‍‌नी बनीं। इसे भी पढ़ें: नवरात्रि में माँ दुर्गा के इन नौ स्वरूपों के पूजन से मिलता है वांछित फल ब्रह्मचारिणी माता की पूजा विधि मां दुर्गा के दूसरे रूप ब्रह्मचारिणी माता की पूजा करने के लिए सुबह सबसे पहले नहाकर साफ-सुथरे कपड़े पहनें। इसके बाद ब्रह्मचारिणी की पूजा के लिए उनकी मूर्ति या तस्वीर को पूजा के स्थान पर स्थापित करें। माता ब्रह्मचारिणी को गुड़हल और कमल के फूल बेहद पसंद है इसलिए उनकी पूजा में इन्हीं फूलों को इस्तेमाल किया जाता है। माता को भोग में चीनी, मिश्री और पंचामृत का भोग लगया जाता है। इसके बाद मां ब्रह्मचारिणी की कहानी पढ़ें और इस मंत्र का 108 बार जप करें- दधाना कर पद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू। देवी प्रसीदतु मई ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा ।। इसे भी पढ़ें: नवरात्रि में इन मंत्रों के साथ पूर्ण विधि-विधान से करें पूजन, सचमुच किस्मत के बंद दरवाजे खुल जाएंगे ध्यान मंत्र वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्घकृत शेखराम्। जपमाला कमण्डलु धरा ब्रह्मचारिणी शुभाम् ।। गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम। धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालंकार भूषिताम् ।। परम वंदना पल्लवराधरां कांत कपोला पीन। पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम् ।। स्तोत्र पाठ तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्। ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम् ।। शंकरप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी। शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणीप्रणमाम्यहम् ।। - प्रिया मिश्रा

प्रभासाक्षी 2 Apr 2022 5:58 pm

चैत्र नवरात्रि में अलग-अलग प्रसाद से माता होगी प्रसन्न

नवरात्रि का पर्व देवी शक्ति मां दुर्गा की उपासना का उत्सव है। नवरात्रि के नौ दिनों में देवी शक्ति के नौ अलग-अलग रूप की पूजा-आराधना की जाती है। एक वर्ष में चार बार नवरात्र आते हैं चैत्र, आषाढ़, माघ और शारदीय नवरात्र। इनमें चैत्र और अश्विन यानि शारदीय नवरात्रि को ही मुख्य माना गया है। इसके अलावा आषाढ़ और माघ गुप्त नवरात्रि होती है। पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि इस साल चैत्र नवरात्रि 2 अप्रैल से शुरू हो रहे हैं और जिनका समापन 10 अप्रैल को होगा। शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा की आराधना के लिए नवरात्रा सर्वोत्तम समय माना जाता है। भगवान राम ने नवरात्र में मां भगवती की आराधना से देवी को प्रसन्न कर विजयादशमी के दिन रावण का संहार किया था। ऐसे में माता के भक्त पूरे 9 दिनों तक माता की पूजा-अर्चना करके मां को प्रसन्न करना चाहते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं इन नौ दिनों में हर दिन माता को अलग-अलग चीजों का भोग लगाने का विधान बताया गया है। नवरात्र की 9 देवियां अलग-अलग 9 शक्तियों का प्रतीक मानी जाती हैं। अगर आप भी इन नौ दिनों में माता को प्रसन्न करके अपनी हर मुराद झट से पूरी कर लेना चाहते हैं तो नवरात्रि में हर दिन के हिसाब से माता को लगाएं उनकी पसंद का भोग। इसे भी पढ़ें: महाशक्ति की आराधना का पर्व है नवरात्रि आइए विश्वविख्यात भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास से जानते हैं किस दिन किस माता को लगाया जाता है किस चीज का भोग। पहला दिन- मां शैलपुत्री नवरात्र के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा होती है। मां शैलपुत्री को आरोग्य की देवी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यदि कोई व्यक्ति नवरात्रि के पहले दिन गाय के शुद्ध देसी घी का भोग माता को लगाता है तो मां शैलपुत्री की कृपा से व्यक्ति को निरोग और खुश रहने का वरदान मिलता है। दूसरा दिन- मां ब्रह्मचारिणी जो लोग मां ब्रह्मचारिणी से अपने लिए दीर्घायु का वरदान चाहते हैं उन्हें नवरात्र के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी को शक्कर का भोग लगाना चाहिए। मां ब्रह्मचारिणी को शक्कर का भोग लगाने से माना जाता है कि व्यक्ति को अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता। तीसरा दिन- मां चंद्रघंटा नवरात्र के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा को दूध और दूध से बनी चीज़ों का भोग लगाया जाता है। ऐसा करने से व्यक्ति के जीवन के हर दुख समाप्त जाते हैं। चौथा दिन- मां कूष्मांडा नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा की जाती है। मां कूष्मांडा को मालपुए का भोग लगाने की परंपरा है। ऐसा भी कहा जाता है कि इस दिन ब्राह्मणों को मालपुए खिलाने चाहिए। ऐसा करने से बुद्धि का विकास होता है और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है। इसे भी पढ़ें: चैत्र नवरात्रि में घोड़े पर सवार होकर आएंगी मां दुर्गा पांचवां दिन- मां स्कंदमाता नवरात्र के पांचवे दिन स्कंदमाता की पूजा होती है। नवरात्र के पांचवें दिन मां स्कंदमाता को केले का भोग लगाया जाता है। स्कंदमाता की पूजा करने से आजीवन आरोग्य रहने का वरदान मिलता है। छठां दिन- मां कात्यायनी नवरात्र के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा होती है। मां कात्यायनी को शहद का भोग लगाने से आकर्षण का आशीर्वाद मिलता है। सातवां दिन- मां कालरात्रि नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजी की जाती है। इस दिन माता को गुड़ का भोग लगाया जाता है। माना जाता है कि गुड़ का भोग लगाने से आकस्मिक संकट से रक्षा होती है। इसे भी पढ़ें: Chaitra Navratri 2022: नवरात्रि में इन राशि वालों पर बरसेगी माता रानी की कृपा, दूर हो जाएंगे सभी कष्ट आठवां दिन- मां महागौरी नवरात्रि के आठवें दिन महागौरी की पूजा की जाती है। इस दिन लोग कन्या पूजन भी करते हैं। इस दिन महागौरी की पूजा करते समय माता को नारियल का भोग लगाया जाता है। माना जाता है कि ऐसा करने से संतान से जुड़ी समस्याएं दूर होती हैं। नौवां दिन- मां सिद्धिदात्री नवरात्र के नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा होती है। इस दिन माता को तिल का भोग लगाते हैं। जिन लोगों को आकस्मिक मृत्यु का भय होता है वो मां सिद्धिदात्री की पूजा करते हैं। - डा. अनीष व्यास भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक

प्रभासाक्षी 31 Mar 2022 1:01 pm

50 साल बाद खत्म हुआ असम-मेघालय के बीच चला आ रहा विवाद, अमित शाह ने निभाई अहम भूमिका, जानें कैसे

गृह मंत्री अमित शाह ने असम मेघालय विवाद को लेकर कहा कि मुझे खुशी है कि दोनों राज्यों के बीच 50 साल से ज्यादा वक्त से चले आ रहे विवाद के 12 में से 6 बिंदुओं पर समझौता हो गया है।

हरि भूमि 29 Mar 2022 6:00 pm

मकान किराए पर देने से पहले जान लें ये बात, वरना लेने के देने पड़ सकते हैं

मकान मालिक द्वारा पुलिस वेरिफिकेशन करवाने से मकान मालिक भी सुरक्षित रहेंगे और पुलिस को भी बहुत सारे अपराधी किस्म के आरोपियों को सलाखों के पीछे भेजने में मदद मिलेगी ।

हरि भूमि 25 Mar 2022 10:00 am

स्वच्छता की देवी शीतला माता की होती है शीतलाष्टमी पर पूजा

हिन्दू धर्म के विविध पर्व-त्योहारों को मनाने के पीछे वैज्ञानिक सोच व तत्व-दर्शन निहित है। होली के एक सप्ताह बाद मनाये जाने वाले शीतलाष्टमी त्योहार पर शीतला माता का पूजन कर व्रत रखा जाता है। मान्यता है कि माता के पूजन से चेचक, खसरा जैसे संक्रामक रोगों का मुक्ति मिलती है। चूंकि ऋतु-परिवर्तन के दौरान इस समय संक्रामक रोगों के प्रकोप की काफी आशंका रहती है। इसलिए इन रोगों से बचाव के लिए श्रद्धालु शीतलाष्टमी के दिन माता का विधिपूर्वक पूजन करते हैं जिससे शरीर स्वस्थ बना रहे। इसे भी पढ़ें: जानें क्या है रांधा पुआ और शीतलाष्टमी पर्व की पौराणिक मान्यता शीतला माता एक प्रसिद्ध हिन्दू देवी हैं। इनका प्राचीनकाल से ही बहुत अधिक माहात्म्य रहा है। शीतला-मंदिरों में प्रायः माता शीतला को गर्दभ पर ही आसीन दिखाया गया है। शीतला माता के संग ज्वरासुर- ज्वर का दैत्य, ओलै चंडी बीबी - हैजे की देवी, चैंसठ रोग, घेंटुकर्ण- त्वचा-रोग के देवता एवं रक्तवती-रक्त संक्रमण की देवी होते हैं। इनके कलश में दाल के दानों के रूप में विषाणु या शीतल स्वास्थ्यवर्धक एवं रोगाणु नाशक जल होता है। सामान्य तौर पर शीतला माता का पूजन चैत्र कृष्ण पक्ष की अष्टमी को किया जाता है। भगवती शीतला की पूजा का विधान भी विशिष्ट है। शीतलाष्टमी के एक दिन पूर्व उन्हें भोग लगाने के लिए बासी खाना यानी बसौड़ा तैयार किया जाता है। अष्टमी के दिन बासी पदार्थ ही देवी को नैवेद्य के रूप में अर्पित करते हैं और भक्तों के बीच प्रसाद के रूप में इसे वितरित करते हैं। उत्तर भारत में शीतलाष्टमी का त्योहार बसौड़ा नाम से भी प्रचलित है। मान्यता है कि इस दिन के बाद से बासी खाना नहीं खाना चाहिए। यह ऋतु का अंतिम दिन होता है जब बासी खाना खा सकते हैं। इस व्रत में रसोई की दीवार पर हाथ की पांच अंगुली घी से लगाई जाती है। इस पर रोली और चावल लगाकर देवी माता के गीत गाये जाते हैं। इसके साथ, शीतला स्तोत्र तथा कहानी सुनी जाती है। रात में जोत जलाई जाती है। एक थाली में बासी भोजन रखकर परिवार के सारे सदस्यों का हाथ लगवाकर शीतला माता के मंदिर में चढ़ाते हैं। इनकी उपासना से स्वच्छता और पर्यावरण को सुरक्षित रखने की प्रेरणा मिलती है। शीतला माता की महत्ता के विषय में स्कंद पुराण में विस्तृत वर्णन मिलता है। इसमें उल्लेख है कि शीतला देवी का वाहन गर्दभ है। ये हाथों में कलश, सूप, मार्जन (झाड़ू) और नीम के पत्ते धारण किये हैं। इनका प्रतीकात्मक महत्व है। आशय यह है कि चेचक का रोगी व्यग्रता में वस्त्र उतार देता है। सूप से रोगी को हवा की जाती है। झाड़ू से चेचक के फोड़े फट जाते हैं। नीम की पत्तियां फोड़ों को सड़ने नहीं देतीं। रोगी को ठंडा जल अच्छा लगता है, अतः कलश का महत्व है। गर्दभ की लीद के लेपन से चेचक के दाग मिट जाते हैं। स्कंद पुराण में शीतला माता की अर्चना का स्तोत्र है शीतलाष्टक। माना जाता है कि इस स्तोत्र की रचना भगवान शंकर ने की थी। यह स्तोत्र शीतला देवी की महिमा का गान कर उनकी उपासना के लिए भक्तों को प्रेरित करता है। वन्देहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम। मार्जनीकलशोपेतां शूर्पालड्कृतमस्तकाम।। अर्थात गर्दभ पर विराजमान दिगम्बरा, हाथ में झाड़ू तथा कलश धारण करने वाली, सूप से अलंकृत मस्तकवाली भगवती शीतला की मैं वंदना करता हूं। शीतला माता के इस वंदना मंत्र से स्पष्ट है कि ये स्वच्छता की अधिष्ठात्री देवी हैं। हाथ में मार्जनी (झाड़ू) होने का अर्थ है कि हम लोगों को भी सफाई के प्रति जागरूक होना चाहिए। कलश से तात्पर्य है कि स्वच्छता रहने पर ही स्वास्थ्य रूपी समृद्धि आती है। मान्यता के अनुसार, इस व्रत को रखने से शीतला देवी प्रसन्न होती हैं और व्रती के कुल में चेचक, खसरा, दाह, ज्वर, पीतज्वर, दुर्गधयुक्त फोड़े और नेत्रों के रोग आदि दूर हो जाते हैं। माता के रोगी के लिए यह व्रत बहुत मददगार है। आमतौर पर, शीतला रोग के आक्रमण के समय रोगी दाह (जलन) से निरंतर पीड़ित रहता है। उसे शीतलता की बहुत जरूरत होती है। गर्दभ पिंडी (गधे की लीद) की गंध से फोड़ों का दर्द कम हो जाता है। नीम के पत्तों से फोड़े सड़ते नहीं है और जलघट भी उसके पास रखना अनिवार्य है। इससे शीतलता मिलती है। इसे भी पढ़ें: Sheetala Ashtami 2022: कब है शीतला अष्टमी या बसौड़ा? जानें शुभ मुहूर्त, महत्त्व और पूजन विधि लोक किंवदंतियों के अनुसार बसौड़ा की पूजा माता शीतला को प्रसन्न करने के लिए की जाती है। कहते हैं कि एक बार किसी गांव में गांववासी शीतला माता की पूजा-अर्चना कर रहे थे तो मां को गांववासियों ने गरिष्ठ भोजन प्रसादस्वरूप चढ़ा दिया। शीतलता की प्रतिमूर्ति मां भवानी का गर्म भोजन से मुंह जल गया तो वे नाराज हो गईं और उन्होंने कोपदृष्टि से संपूर्ण गांव में आग लगा दी। बस केवल एक बुढिया का घर सुरक्षित बचा हुआ था। गांव वालों ने जाकर उस बुढिया से घर न जलने के बारे में पूछा तो बुढिया ने मां शीतला को गरिष्ठ भोजन खिलाने वाली बात कही और कहा कि उन्होंने रात को ही भोजन बनाकर मां को भोग में ठंडा-बासी भोजन खिलाया। जिससे मां ने प्रसन्न होकर बुढिया का घर जलने से बचा लिया। बुढिया की बात सुनकर गांव वालों ने शीतलामाता से क्षमा मांगी और रंगपंचमी के बाद आने वाली सप्तमी के दिन उन्हें बासी भोजन खिलाकर मां का बसौड़ा पूजन किया। संसार में दो प्रकार के प्राणी होते है। पहला सौर शक्ति प्रधान और दूसरा चान्द्र शक्ति प्रधान। सौर शक्ति के बारे में कहा जाता है कि सौर शक्ति जीव बहुत चंचल, चुलबुले, तत्काल बिगड़ उठने वाले और असहनशील होते हैं जबकि चान्द्र शक्ति प्रधान व्यक्ति इसके विपरीत होते है। चान्द्र शक्ति प्रधान जीवों में प्रमुख गधा ही माता शीतला का वाहन हो सकता है। यहां गधा संकेत देता है कि चामुण्डा के आक्रमण के समय रोग का अधिक प्रहार सहन करते हुए रोगी को कभी अधीर नहीं होना चाहिए। इसके अतिरिक्त शीतला रोग में गर्दभी का दूध, गधा लोटने के स्थान की मिट्टी और गधों के संपर्क का वातावरण उपयुक्त समझा जाता है। कहते हैं कि कुम्हार को चामुण्डा का भय नहीं होता है। वहीं ऊंट वाले को कभी पेट का रोग नहीं होता। चामुण्डा शववाहना के अनुसार चामुण्डा का वाहन शव होता है। इसका तात्पर्य यह है कि चामुण्डा से आक्रान्त रोगी को शव की भांति निश्चेष्ट होकर उचित समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए। - रमेश सर्राफ धमोरा (लेखक राजस्थान सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं। इनके लेख देश के कई समाचार पत्रों में प्रकाशित होते रहते हैं।)

प्रभासाक्षी 24 Mar 2022 5:31 pm

जानें क्या है रांधा पुआ और शीतलाष्टमी पर्व की पौराणिक मान्यता

होली के बाद सातवें और आठवें दिन देवी शीतला माता की पूजा की परंपरा है। इन्हें शीतला सप्तमी या शीतलाष्टमी कहा जाता है। शीतला माता का जिक्र स्कंद पुराण में मिलता है। पौराणिक मान्यता है कि इनकी पूजा और व्रत करने से चेचक के साथ ही अन्य तरह की बीमारियां और संक्रमण नहीं होता है। पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि चैत्र कृष्ण अष्टमी तिथि 24 मार्च को मध्यरात्रि 12:10 मिनट पर शुरू होगी, जो 25 मार्च को रात 10:04 मिनट तक रहेगी। ऐसे में 25 मार्च को लोकपर्व बास्योड़ा मनाया जाएगा। इस वर्ष शीतला माता के पूजन का पर्व शीतलाष्टमी सुस्थिर योग, मकर राशि में त्रिग्रही योग में मनेगी। इस दिन शीतला माता की पूजा-अर्चना करने के साथ महिलाएं व्रत भी रखेंगी। इसके एक दिन पहले 24 मार्च को रांधा पुआ होगा, जिसमें घर-घर महिलाएं शीतलाष्टमी (बास्योड़ा) के लिए भोजन पकवान बनाएगी। शीतलाष्टमी के दिन सुबह शीतला माता को ठंडे पकवानों का भोग लगाया जाएगा। इसके बाद लोग ठंडे पकवान ही खाएंगे। बास्योड़ा पर शीलता माता को ठंडा भोजन अर्पित कर चेचक आदि बीमारियों से परिवार को बचाने की प्रार्थना की जाएगी। ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि बच्चों को बीमारियों से दूर रखने के लिए और उनकी खुशहाली के लिए इस त्योहार को मनाने की परंपरा बरसों से चली आ रही है। कुछ स्थानों पर शीतला अष्टमी को बासौड़ा भी कहा जाता है। इस दिन माता शीतला की बासी भोजन का भोग लगाने की परंपरा है और स्वयं भी प्रसाद के रूप में बासी भोजन ही करना होता है। नाम के अनुसार ही शीतला माता को शीतल चीजें पसंद हैं। मां शीतला का उल्लेख सर्वप्रथम स्कन्दपुराण में मिलता है। इनका स्वरूप अत्यंत शीतल है और कष्ट-रोग हरने वाली हैं। गधा इनकी सवारी है और हाथों में कलश, सूप, झाड़ू और नीम के पत्ते हैं। मुख्य रूप से इनकी उपासना गर्मी के मौसम में की जाती है। इसे भी पढ़ें: Sheetala Ashtami 2022: कब है शीतला अष्टमी या बसौड़ा? जानें शुभ मुहूर्त, महत्त्व और पूजन विधि भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि स्कन्द पुराण में माता शीतला की अर्चना का स्तोत्र 'शीतलाष्टक' के रूप में प्राप्त होता है। ऐसा माना जाता है कि- इस स्तोत्र की रचना स्वयं भगवान शंकर ने की थी। शास्त्रों में भगवती शीतला की वंदना के लिए यह मंत्र बताया गया है। मंत्र है- वन्देऽहंशीतलांदेवीं रासभस्थांदिगम्बराम्।। मार्जनीकलशोपेतां सूर्पालंकृतमस्तकाम्।। भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि अगर आप अपने घर की सुख-समृद्धि बनाये रखना चाहते हैं तो आपको स्नान आदि के बाद शीतला माता के इस मंत्र का 51 बार जप करना चाहिए। मंत्र इस प्रकार है- ऊँ ह्रीं श्रीं शीतलायै नमः। आज के दिन ऐसा करने से आपके घर की सुख-समृद्धि बनी रहेगी। साथ ही आपके परिवार के सदस्यों की सेहत भी अच्छी रहेगी। भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक अनीष व्यास ने बताया कि अगर आप भय और रोग आदि से छुटकारा पाना चाहते हैं तो आपको देवी शीतला के इस मंत्र का 21 बार जप करना चाहिए। मंत्र है- वन्देSहं शीतलां देवीं सर्वरोग भयापहम्। यामासाद्य निवर्तेत विस्फोटक भयं महत्।। भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि अगर आप अच्छे स्वास्थ्य की कामना रखते हैं। साथ ही लंबी आयु का वरदान पाना चाहते हैं, तो आपको शीतलाष्टक स्त्रोत में दी गई इन पंक्तियों का जाप करना चाहिए। पंक्तियां इस प्रकार हैं- मृणाल तन्तु सदृशीं नाभि हृन्मध्य संस्थिताम्। यस्त्वां संचिन्त येद्देवि तस्य मृत्युर्न जायते।। भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि ऐसी प्राचीन मान्यता है कि जिस घर की महिलाएं शुद्ध मन से इस व्रत को करती है, उस परिवार को शीतला देवी धन-धान्य से पूर्ण कर प्राकृतिक विपदाओं से दूर रखती हैं। मां शीतला का पर्व किसी न किसी रूप में देश के हर कोने में मनाया जाता है। शीतला सप्तमी और अष्टमी कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि कुछ जगह शीतला माता की पूजा चैत्र महीने के कृष्णपक्ष की सप्तमी को और कुछ जगह अष्टमी पर होती है। इस बार ये तिथियां 24 और 25 मार्च को रहेंगी। सप्तमी तिथि के स्वामी सूर्य और अष्टमी के देवता शिव होते हैं। दोनों ही उग्र देव होने से इन दोनों तिथियों में शीतला माता की पूजा की जा सकती है। निर्णय सिंधु ग्रंथ के मुताबिक इस व्रत में सूर्योदय व्यापिनी तिथि ली जाती है। इसलिए सप्तमी की पूजा और व्रत गुरुवार को किया जाना चाहिए। वहीं, शीतलाष्टमी शुक्रवार को मनाई जाएगी। इसे भी पढ़ें: हथेली पर बन रहा है यह निशान तो बेहद लकी हैं आप, 40 साल की उम्र के बाद बन जाएंगे अमीर ठंडा खाने की परंपरा भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि शीतला माता का ही व्रत ऐसा है जिसमें शीतल यानी ठंडा भोजन करते हैं। इस व्रत पर एक दिन पहले बनाया हुआ भोजन करने की परंपरा है। इसलिए इस व्रत को बसौड़ा या बसियौरा भी कहते हैं। माना जाता है कि ऋतुओं के बदलने पर खान-पान में बदलाव करना चाहिए है। इसलिए ठंडा खाना खाने की परंपरा बनाई गई है। धर्म ग्रंथों के मुताबिक शीतला माता की पूजा और इस व्रत में ठंडा खाने से संक्रमण और अन्य बीमारियां नहीं होती। पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान व मध्य प्रदेश के कुछ समुदाय के लोग इस त्योहार को बासौड़ा कहते हैं। जो कि बासी भोजन के नाम से लिया गया है। इस त्योहार को मनाने के लिए लोग सप्तमी की रात को बासी भोजन तैयार कर लेते हैं और अगले दिन देवी को भोग लगाने के बाद ही स्वयं ग्रहण करते हैं। कहीं पर हलवा पूरी का भोग तैयार किया जाता है तो कुछ स्थानों पर गुलगुले बनाए जाते हैं। कुछ स्थानों पर गन्ने के रस की बनी खीर का भोग भी शीतला माता को लगाया जाता है। इस खीर को भी सप्तमी की रात को ही बना लिया जाता है। बीमारियों से बचने के लिए व्रत माना जाता है कि देवी शीतला चेचक और खसरा जैसी बीमारियों को नियंत्रित करती हैं और लोग उन बीमारियों को दूर करने के लिए उनकी पूजा करते हैं। सुख-समृद्धि के लिए व्रत भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि हिन्दू धर्म के अनुसार सप्तमी और अष्टमी तिथि पर महिलाएं अपने परिवार और बच्चों की सलामती के लिए और घर में सुख, शांति के लिए बासौड़ा बनाकर माता शीतला को पूजती है। माता शीतला को बासौड़ा में कढ़ी-चावल, चने की दाल, हलवा, बिना नमक की पूड़ी चढ़ावे के एक दिन पहले ही रात में बना लेते हैं। अगले दिन ये बासी प्रसाद देवी को चढ़ाया जाता है। पूजा के बाद महिलाएं अपने परिवार के साथ प्रसाद ग्रहण करती हैं। पौराणिक कथा विख्यात भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि एक बार की बात है, प्रताप नगर में गांववासी शीतला माता की पूजा-अर्चना कर रहे थे और पूजा के दौरान गांव वालों ने गर्म नैवेद्य माता शीतला को चढ़ाया। जिससे देवी का मुंह जल गया। जिससे गांव में आग लग गई। लेकिन एक बुढ़िया का घर बचा गया था। गांव वालों ने बुढ़िया से घर न जलने की वजह पूछी तो बताया कि उसने माता शीतला को ठंडा प्रसाद खिलाया था और कहा कि मैंने रात को ही प्रसाद बनाकर ठंडा बासी प्रसाद माता को खिलाया। जिससे देवी ने प्रसन्न होकर मेरे घर को जलने से बचा लिया। बुढ़िया की बात सुनकर गांव वालों ने अगले पक्ष में सप्तमी/अष्टमी के दिन उन्हें बासी प्रसाद खिलाकर माता शीतला का बसौड़ा पूजन किया। शुभ मुहूर्त चैत्र कृष्ण अष्टमी तिथि 24 मार्च को मध्यरात्रि 12:10 मिनट पर शुरू होगी, जो 25 मार्च को रात 10:04 मिनट तक रहेगी। - डा. अनीष व्यास भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक

प्रभासाक्षी 23 Mar 2022 4:15 pm

Sheetala Ashtami 2022: कब है शीतला अष्टमी या बसौड़ा? जानें शुभ मुहूर्त, महत्त्व और पूजन विधि

हिंदू धर्म में ऐसे बहुत से व्रत-त्यौहार हैं जिन्हें माताएँ अपनी संतान की लंबी आयु और खुशहाल जीवन के लिए रखती हैं। शीतला अष्टमी भी ऐसा ही एक पर्व है। इस दिन माँ दुर्गा के एक स्वरुप शीतला माता की पूजा की जाती है। इस दिन माताएं अपने बच्चों को बीमारियों से दूर रखने के लिए और उनकी खुशहाली के लिए व्रत-पूजन करती हैं। शीतला अष्टमी का पर्व होली के कुछ दिन बाद मनाया जाता है। शीतला अष्टमी को बसौड़ा के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन शीतला माता को बासी भोजन का भोग लगाया जाता है। इस दिन माता को भोग लगाने के बाद बासी भोजन को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। इस बार शीतला अष्टमी का पर्व 25 मार्च 2022 (शुक्रवार) को पड़ रहा है। इसे भी पढ़ें: इस एक मंत्र के जाप से दूर हो जाएंगी विवाह की सारी दिक्क्तें, मिलेगा मनचाहा जीवनसाथी क्या है व्रत का महत्व? धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, शीतला माता आरोग्य प्रदान करने वाली देवी मानी जाती हैं। स्कंद पुराण में उन्हें चेचक, खसरा और हैजा जैसी संक्रामक बीमारियों से बचाने वाली देवी बताया गया है। मान्यता है कि इस दिन जो महिलाऐं शीतला माता का व्रत श्रद्धापूर्वक रखती हैं, उनके घर में धन-धान्य की कोई कमी नहीं रहती। शीतला माता की कृपा से उनके परिवार और बच्चे निरोगी रहते हैं। शीतला अष्टमी 2022 शुभ मुहूर्त चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि प्रारंभ - 24 मार्च 2022 को रात 12 बजकर 09 मिनट चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि समापन - 25 मार्च 2022 को रात 10 बजकर 04 मिनट इसे भी पढ़ें: हथेली पर बन रहा है यह निशान तो बेहद लकी हैं आप, 40 साल की उम्र के बाद बन जाएंगे अमीर कैसे करें मां शीतला का व्रत? इस दिन सुबह स्नान करने के बाद साफ वस्त्र धारण करें और मन में व्रत का संकल्प करें। माता को हल्दी का तिलक लगाएं और घर पर भी हल्दी से स्वस्तिक बनाएं। इसके बाद शीतला माता को एक दिन पहले बनाए हुए (बासी) खाना, मेवे, मिठाई, पूआ, पूरी आदि का भोग लगाएं। भोग लगाने के बाद शीतला स्तोत्र का पाठ करें और शीतला अष्टमी की कथा सुनें। माता को जल्द अर्पित करें और इसी जल से आँखें धोएं। माता को अर्पित किया हुआ भोग खुद प्रसाद के रूप में ग्रहण करें। - प्रिया मिश्रा

प्रभासाक्षी 23 Mar 2022 12:42 pm

Health Tips: पैरों में आ गई है सूजन तो इन घरेलू नुस्खों से दूर करें अपने परेशानी

Health Tips: अक्सर एक जगह पर घंटों बैठे- बैठे या फिर खड़े हुए लोगों के पैरों या टखनों में सूजन आ जाती है। लोगों में ये समस्या आम होती जा रही जिसमें उन्हें किसी प्रकार का कोई दर्द महसूस नहीं होता है। यहां हम आपको इस समस्या से निबटने के कुछ घरेलू उपाय बताएंगे...

हरि भूमि 14 Mar 2022 2:00 pm

हिंदू धर्म में रंगभरी एकादशी का है विशेष महत्व

रंगभरी या आमलकी एकादशी हिन्दूओं का प्रमुख त्यौहार है। इस एकादशी को भक्त विशेष रूप से मनाते हैं। हिन्दू धर्म में अत्यन्त शुभ माने जाने वाली रंगभरी एकादशी के महत्व तथा पूजा विधि के बारे में बताते हैं। जानें रंगभरी एकादशी के बारे में हिन्दू धर्म में रंगभरी एकादशी का विशेष महत्व है। यह एकादशी फाल्गुन मास की अंतिम एकादशी होती है। फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी को रंगभरी एकादशी का व्रत किया जाता है। इस दिन भगवान शिव के साथ श्री विष्णु और आंवले के वृक्ष की पूजा होती है। इस एकादशी का नाम आमलकी एकादशी इसलिए पड़ा क्योंकि वास्तव में आंवले का एक नाम 'आमलकी' भी है और इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा के कारण ही इस एकादशी को आमलकी एकादशी के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा इसे रंगभरनी एकादशी के नाम भी जाना जाता है। साथ ही हिन्दू धर्म में इसे सबसे ज्यादा शुभ भी माना जाता है। इसे भी पढ़ें: आमलकी एकादशी 2022: इस दिन की जाती है आंवले के वृक्ष की पूजा, जानें शुभ मुहूर्त और पूजन विधि आमलकी एकादशी के दिन ऐसे करें पूजा हिन्दू धर्म में आमलकी का विशेष महत्व होता है। इसलिए इस एकादशी के विशेष पूजा करें। जो इस दिन व्रत रखता उसे दशमी के दिन से ही सभी नियमों का पालन करना चाहिए। इसके लिए एक दिन पहले रात को भगवान विष्णु का ध्यान करके सोएं। दूसरे दिन सुबह जल्दी सभी कामों से निवृत्त होकर पूजा-स्थल पर भगवान विष्णु की प्रतिमा या फिर मूर्ति को रखें। इसके बाद प्रतिमा के सामने हाथ में तिल, कुश, सिक्का और जल लेकर संकल्प करें कि मैं भगवान विष्णु की प्रसन्नता एवं मोक्ष की कामना से आमलकी एकादशी का व्रत रखता हूं। मेरा यह व्रत सफलतापूर्वक पूरा हो इसके लिए ईश्वर मुझे अपनी शरण में रखें। इसके बाद इस मंत्र का जाप करें। आमलकी एकादशी या रंगभरी एकादशी से जुड़ी पौराणिक कथा आमलकी एकादशी का हिन्दू धर्म में विशेष महत्व है। हमारे शास्त्रों में आमलकी एकादशी के बारे में पौराणिक कथा प्रचलित है। इस कथा के अनुसार भगवान विष्णु की नाभि से उत्पन्न होने के बाद ब्रह्मा जी के मन में जिज्ञासा हुई कि वह कौन हैं ? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए ब्रह्मा जी परब्रह्म की तपस्या करने लगे। इस तरह ब्रह्म जी की तपस्या से प्रश्न होकर भगवान विष्णु प्रकट हुए। भगवान विष्णु को सामने देखकर ब्रह्मा जी खुशी से रोने लगे। इस तरह रोने से इनके आंसू भगवान विष्णु के चरणों पर गिरने लगे। ब्रह्मा जी की यह भक्ति भावना देखकर भगवान विष्णु प्रसन्न हुए तथा ब्रह्मा जी के आंसुओं से आमकली यानी आंवले का वृक्ष उत्पन्न हुआ। भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी से कहा कि आपके आंसुओं से उत्पन्न आंवले का वृक्ष और फल मुझे अति प्रिय रहेगा। जो भी आमकली एकादशी के दिन आंवले के वृक्ष की पूजा करेगा उसके सारे पाप समाप्त हो जाएंगे और व्यक्ति को मोक्ष मिलेगा। इसे भी पढ़ें: आर्थिक तंगी से छुटकारा पाना है तो होली के दिन करें ये सरल उपाय, हो जाएंगे मालामाल रंगभरी एकादशी के दिन होती है शिव जी की पूजा भगवान श्री हरि विष्णु के साथ-साथ आंवले के पेड़ की भी पूजा की जाती है। रंगभरी एकादशी के दिन काशी विश्वनाथ की नगरी वाराणसी में भगवान शंकर समेत शिव परिवार की पूजा की जाती है। मान्यता है कि बाबा विश्वनाथ माता पार्वती के साथ नगर भ्रामण करते हैं और पूरी नगरी में गुलाल से होली खेली जाती है। कहा जाता है कि विश्वनाथ माता गौरा का गौना कराकर पहली बार काशी आए थे, तब उनका स्वागत रंग, गुलाल से किया गया था। इस वजह से हर साल काशी में रंगभरी एकादशी के दिन बाबा विश्वसाथ और माता गौरा का धूमधाम से गौना किया जाता है। आमलकी एकादशी का महत्व आमलकी एकादशी का विशेष धार्मिक महत्व है। इस दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा की जाती है। एकादशी व्रत की महिमा का वर्णन महाभारत में मिलता है। आमलकी एकादशी जीवन में आंवला के महत्व को बताता है। यह एकादशी न केवल आंवले का महत्व बताती है बल्कि हमें पर्यावरण के प्रति सचेत रहने के लिए भी कहती है। इसलिए आंवले को आदि वृक्ष भी कहा गया है। शास्त्रों के अनुसार आंवला के वृक्ष में भगवान विष्णु निवास करते हैं। आमलकी एकादशी को रंगभरी एकादशी भी कहा जाता है। आमलकी एकादशी के दिन घर में लगाएं आंवले का पौधा आमलकी एकादशी पर मंदिर के समीप या घर में आंवले का पौधा लगाने से विष्णु भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है। लेकिन घर में यदि आंवला का पौधा लगाना है तो दिशा का खास ख्याल रखना चाहिए। वास्तु शास्त्र के अनुसार आंवले का पौधा घर में उत्तर या पूर्व दिशा में लगाना शुभ माना गया है। पंडितों का मानना है कि आंवले को घर में लगाने से नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और दांपत्य जीवन में मधुरता बनी रहती है। साथ ही परिवार के सभी सदस्यों में प्रेम बना रहता है और धन आदि की समस्या भी दूर होती है। - प्रज्ञा पाण्डेय

प्रभासाक्षी 14 Mar 2022 1:36 pm

PAK vs AUS: फील्डिंग के दौरान इस पाक खिलाड़ी की फटी पैंट, वायरल हुआ-Video

पाकिस्तान-ऑस्ट्रेलिया (PAK vs AUS) के बीच टेस्ट सीरीज का पहला मुकाबला पाकिस्तान के रावलपिंडी क्रिकेट स्टेडियम में जारी है।

हरि भूमि 8 Mar 2022 11:00 am

Video Viral: सरेंडर कर फूट-फूट कर रो पड़ा रूसी सैनिक, यूक्रेनियन लोगों ने पिलाई चाय फिर कराई मां से बात

दरअसल सोशल मीडिया पर एक असत्यापित वीडियो वायरल हो रहा है। जिसे लगभग 1 लाख से ज्यादा बार देखा जा चुका है। इस वीडियो में एक रूसी सैनिक को आत्मसमर्पण करने के बाद आंसू बहाते हुए देखा जा सकता है।

हरि भूमि 4 Mar 2022 10:59 am

रियलिटी शो में दूसरी बार शादी करेंगी मोनालिसा, दुल्हन के गेटअप में छाईं भोजपुरी क्वीन

रियलिटी शो में शादी करने का अपना एक अलग ही मजा है और इस कड़ी में भोजपुरी क्वीन मोनालिसा (Monalisa) एक बार फिर शादी के खूबसूरत पलों को रियलिटी शो पर एन्जॉय करती नजर आएंगी। भोजपुरी सुपर एक्ट्रेस अपने पति विक्रांत सिंह (Vikrant Singh Rajput) संग स्टार प्लस के शो 'स्मार्ट जोड़ी' (Smart Jodi) में नजर आ रही हैं। इस शो में टीवी और फिल्म इंडस्ट्री से रियल लाइफ के कपल शिरकत कर रहे हैं।

हरि भूमि 2 Mar 2022 3:00 pm

महाशिवरात्रि पर्वः परम कल्याणकारी हैं भगवान शिव

महाशिवरात्रि का पावन पर्व फाल्गुन मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है। ईशान संहिता के अनुसार ज्योर्तिलिंग का प्रादुर्भाव होने से यह पर्व महाशिवरात्रि के नाम से लोकप्रिय हुआ। यह शिव और पार्वती के विवाह के रूप में हर घर में मनाया जाता है। इस पवित्र दिन पूरा भारत शिवभक्ति में तल्लीन हो जाता है और भगवान शिव के चरणों में अपने आप को अर्पित कर पुण्य अर्जित करना चाहता है। इसे भी पढ़ें: विश्व में शांति एवं सहजीवन के प्रेरक हैं भगवान शिव महाशिवरात्रि का पर्व उत्तर में काश्मीर लेकर दक्षिण के आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना के सभी मंदिरों में भव्य रूप से मनाया जाता है। उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर सहित देश के विभिन्न प्रान्तों में स्थित समस्त द्वादश ज्योतिर्लिंगों में शिव भक्तों की महा भीड़ उमड़ती है। भारत के गाँव गाँव और गली गली में भगवान शिव के छोटे-बड़े मंदिर विद्यमान हैं और ऐसा ही मनोरम दृष्य प्रत्येक शिवाले का रहता है। भारत के पड़ोसी देशों बांग्लादेश और नेपाल के शिव मंदिरों में भी यह पर्व मनाया जाता है। नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर में यह पर्व व्यापक रूप में मनाया जाता है तथा भक्तों की अपार भीड़ उमड़ती है। शिवरात्रि व्रत व भगवान शिव की महिमा का वर्णन शिव पुराण में मिलता है। भगवान शिव की महिमा वेदों में भी कही गयी है। उपनिषदों में भी शिव जी की महिमा का वर्णन मिलता है। रूद्रहृदय, दक्षिणामूर्ति, नीलरूद्रोपनिषद आदि उपनिषदों में शिवजी की महिमा का वर्णन मिलता है। भगवान शिव ने अपने श्रीमुख से शिवरात्रि व्रत की महिमा का वर्णन स्वयं ब्रहमा, विष्णु और पार्वती जी को किया है। निष्काम तथा सकाम भाव से सभी व्यक्तियों के लिए यह महान व्रत परम हितकारक माना गया है। महादेव जी थोड़ा सा जल और बेलपत्र पाकर भी संतुष्ट हो जाते हैं। वे सभी के कल्याण स्वरूप हैं। इसलिए सभी को शिवजी की पूजा करनी चाहिये। शिवजी सभी को सौभाग्य प्रदान करने वाले हैं भगवान शिव कार्य और करण से परे हैं। ये निर्गुंण, निराकार, निर्बाध, निर्विकल्प निरीह, निरंजन, निष्काम, निराधार तथा सदा नित्यमुक्त हैं। भगवान शिव पंचाक्षर और षडाक्षर मंत्र हैं तथा केवल ऊँ नमः शिवाय कहने मात्र से ही वे प्रसन्न हो जाते हैं। भगवान शिव सर्वोपरि देव हैं। सम्पूर्ण सृष्टि के स्वामी हैं। सम्पूर्ण विश्व शिवकृपा से ही पाश मुक्त हो सकता है। भगवान श्री शिव की उपासना के बिना साधक अभीष्ट लाभ नहीं प्राप्त कर सकता। शिवोपासना के द्वारा ही परम तत्व शिवत्त्व की प्राप्ति संभव है। जब से सृष्टि की रचना हुई हैं तब से भगवान शिव की आराधना व उनकी महिमा की गाथाओं से भण्डार भरे पड़े हैं। स्वयं भगवान श्रीराम व श्रीकृष्ण ने भी अपने कार्यों की बाधारहित सिद्धि के लिये उनकी साधना की और शिव जी के शरणागत हुए। भगवान श्रीराम ने लंका विजय के पूर्व भगवान शिव की आराधना की। भगवान शिव के भक्तों व उनकी आराधना की कहानियां हमारे पुराणों व धर्मग्रथों में भरी पड़ी है। जो भी व्यक्ति चाहे वह कैसा भी हो या फिर किसी भी दृष्टि से उसने भगवान शिव की आराधना की हो भगवान शिव ने आराधना से प्रसन्न होकर सभी को आशीर्वाद दिया। यदि किसी ने उनके आशीर्वाद का गलत उपयोग किया तो उन्होनें उसका उसी रूप में निराकरण भी किया। सभी कहानियों का सार यही है कि भगवान शिव अपने भक्तों की पुकार अवश्य सुनते हैं। भगवान शिव ने देवराज इंद्र पर कृपादृष्टि डाली तो उन्होंने अग्निदेव, देवगुरू, बृहस्पति और मार्कण्डेय पर भी कृपादृष्टि डाली। इसे भी पढ़ें: महाशिवरात्रि 2022 को बन रहा है यह दुर्लभ महासंयोग, 20 साल बाद ही आएगा अब ऐसा शुभ मुहूर्त हिंदी कवियों ने भी भगवान शिव की स्तुति व महिमा का गुणगान किया है। हिंदी के आदि कवि चंदवरदाई ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ पृथ्वीराज रासो के प्रथम खंड आदिकथा में भगवान शिव की वंदना की है। महान कवि विद्यापति ने भी अपने पदों में भगवान शिव का ही ध्यान रखा है। महान कवि सूरदास ने भी शिवभक्ति प्रकट की है। भगवान शिव की महिमा का वर्णन गोस्वामी तुलसीदास ने भी किया है। सिख धर्म के अंतिम गुरू गोविंद सिंह महाराज द्वारा लिखित दशम ग्रन्थ साहिब में भी शिवोपासना का विशेष वर्णन मिलता है। भगवान शिव परम कल्याणकारी है। जगदगुरू हैं। वे सर्वोपरि तथा सम्पूर्ण सृष्टि के स्वामी हैं। उन्हांने इस समस्त संसार व सांसारिक घटनाओं का निर्माण किया है। सांसारिक विषय भोगों से मनुष्य बंधा है तथा शिवकृपा से ही वह पापमुक्त हो सकता है। भगवान शिव जब प्रसन्न होते हैं तो साधक को अपनी दिव्य शक्ति प्रदान करते हैं जिससे अविद्या के अंधकार का नाश हो जाता है और साधक को अपने इष्ट की प्राप्ति होती है। इसका तात्पर्य यह है कि जब तक मनुष्य शिव जी को प्रसन्न करके उनकी कृपा का पात्र नहीं बन जाता तब तक उसे ईश्वरीय साक्षात्कार नहीं हो सकता। इसे भी पढ़ें: महाशिवरात्रि पर बन रहा है यह बेहद खास संयोग, इन 4 राशि वालों की हो जाएगी बल्ले-बल्ले अतः कहा जा सकता है कि ज्ञान और भक्ति इन तीनों के परमार्थ तथा सभी विद्याओं, शास्त्रों, कलाओं और ज्ञान-विज्ञान के प्रवर्तक आशुतोष भगवान शिव की आराधना के बिना साधक अभीष्ट लाभ नहीं प्राप्त कर सकता। शिवोपासना के द्वारा ही परम तत्व अथव शिवतत्व की प्राप्ति संभव है। भगवान शिव अपने भक्त की आराधना से भी प्रसन्न होकर उसका तत्क्षण परम कल्याणकर देते हैं इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को शिव पूजन और व्रत करना चाहिये। परात्पर सचिचदानंद परमेश्वर शिव एक है। वे विश्वातीत भी हैं और विश्वमय भी। वे गुणातीत और गुणमय भी हैं। भगवान शिव में ही विश्व का विकास संभव है। भगवान शिव शुद्ध, सनातन, विज्ञानानन्दघन, परब्रम्ह हैं उनकी आराधना परम लाभ के लिए ही या उनका पुनीत प्रेम प्राप्त करने के लिए ही करनी चाहिये। सांसारिक हानि-लाभ प्रारब्ध होते हैं इनके लिए चिंता करने की बात नहीं । शिव जी की शरण लेने से कर्म शुभ और निष्काम हो जायेंगे। अत: किसी भी प्रकार के कर्मों की पूर्णता के लिये न तो चिंता करनी चाहिये और नहीं भगवान से उनके नाशार्थ प्रार्थना ही करनी चाहिये। “ऊँ नमः शिवाय” या फिर अपनी जिहवा पर शिव मात्र का स्मरण करने से व्यक्ति सांसारिक चिंताओं से मुक्त हो सकता है। अतः परम कल्याणकारी सृष्टिकर्ता व पूरे विश्व के नीति नियंतक भगवान शिव की आराधना तन, मन, धन से एकाग्रचित होकर करनी चाहिये। - मृत्युंजय दीक्षित

प्रभासाक्षी 28 Feb 2022 6:12 pm

Health Tips: कोरोना रिकवरी के बाद स्वास्थ्य का रखें पूरा ध्यान, हेल्दी रहने के लिए अपनाएं ये टिप्स

Health Tips: हालांकि अब कोरोना संक्रमण की रफ्तार बहुत धीमी हो गई है। नए आने वाले केसेस की संख्या काफी कम हो गई है और इससे संक्रमित अधिकांश रोगी तेजी से रिकवर भी हो रहे हैं। लेकिन कोरोना रिकवरी के बाद भी किसी तरह की लापरवाही खतरनाक हो सकती है। ऐसे में यह जानना बहुत जरूरी है कि रिकवरी के बाद अपनी हेल्थ की प्रॉपर केयर कैसे की जानी चाहिए?

हरि भूमि 27 Feb 2022 2:59 pm

Mahashivratri 2022: कब है महाशिवरात्रि? जानें शुभ मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व

हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। इस बार महाशिवरात्रि 1 मार्च 2022 (मंगलवार) को मनाई जाएगी। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान शिव की उपासना करने से भोलेनाथ की कृपा प्राप्त होती है। यह दिन शिव भक्तों के लिए बहुत ख़ास होता है। मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान शिव की विधि-विधान से व्रत-पूजन करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। महाशिवरात्रि 2022 शुभ मुहूर्त चतुर्दशी तिथ‍ि प्रारंभ - 01 मार्च 2022 को सुबह 03 बजाकर 16 मिनट से चतुर्दशी तिथ‍ि का समापन : 02 मार्च 2022 को सुबह 01 बजे रात्र‍ि प्रहर पूजा : शाम 06:21 से रात्र‍ि 09:27 बजे तक महाशिवरात्रि का महत्व धार्मिक ग्रंथों के अनुसार महाशिवरात्रि को माता पार्वती और भगवान शिव का विवाह हुआ था। ऐसा माना जाता है कि शिव-पार्वती के मिलन के उपलक्ष्य में मनाए जाने वाले इस पर्व पर विधि-विधान से पूजा और व्रत करने से वैवाहिक जीवन की सभी समस्याओं का निदान होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार महाशिवरात्रि का व्रत रखने से कुंवारी कन्या को मनचाहे वर की भी प्राप्ति होती है। ऐसा माना जाता है कि यदि किसी कन्या के विवाह में बाधा आ रही हो तो महाशिवरात्रि का व्रत करने से जल्द विवाह होता है। इस व्रत को करने से मनुष्य के सभी पाप समाप्त होते हैं। महाशिवरात्रि पूजन विधि महाशिवरात्रि के दिन प्रातः जल्दी उठकर स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और भगवान शिव का ध्यान करके व्रत का संकल्प करें। इस दिन शिवलिंग का पवित्र जल या दूध से अभिषेक अवश्य करें। भगवान शिव का चंदन से तिलक करें। इसके बाद शिवलिंग पर बेलपत्र, आक के फूल, धतूरे के फूल, धतूरा, मांग आदि चीजें अर्पित करें। इसके बाद भगवान शिव की आरती करें। पूजा के बाद शिवपुराण, महामृत्युंजय मंत्र या शिव जी के पंचाक्षरी मंत्र का जाप करें। महाशिवरात्रि को रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। पूजा के बाद पारण मुहूर्त में महाशिवरात्रि के व्रत का पारण करें। - प्रिया मिश्रा

प्रभासाक्षी 26 Feb 2022 2:36 pm

जानिए भारत की ऐसी अजीबो गरीब परंपराएं, जहां आदमी मारते है एक दुसरे को तो कहीं सिर पर फोडा जाता नारीयल

जानिए भारत की ऐसी अजीबो गरीब परंपराएं, जहां आदमी मारते है एक दुसरे को तो कहीं सिर पर फोडा जाता नारीयल

लाइफस्टाइल नामा 24 Feb 2022 6:45 pm

टी-1233 नाम बाघ ने केरवा व वीरपुर के जंगलों में बनाया अपना नया ठिकाना

यह बाघिन टी-123 की संतान है। इसका जन्म वर्ष 2020 में केरवा के जंगल में हुआ था। वजन 175 किलो के करीब है। उम्र 25 माह हो चुकी है।

हरि भूमि 22 Feb 2022 6:59 pm

मध्यप्रदेश भाजपा में की गईं तीन नई नियुक्तियां, जानिए सांसद गजेंद्र पटेल क्यों हुए उपाध्यक्ष पद से मुक्त

मध्यप्रदेश भाजपा में मंगलवार को प्रदेश पदाधिकारी के पदों पर पांच नई नियुक्तियां की गई हैं, जबकि एक प्रदेश उपाध्यक्ष को पद मुक्त किया गया है। भाजपा के प्रदेश महामंत्री एवं प्रदेश कार्यालय प्रभारी भगवान दास सबनानी द्वारा प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा के निर्देश पर जारी किए गए नियुक्ति पत्र के अनुसार प्रदेश उपाध्यक्ष के पद पर तीन नियुक्तियां की गई हैं।

हरि भूमि 22 Feb 2022 3:00 pm

चलती ट्रेन से आरकेएमपी-भोपाल स्टेशन के बीच रेलवे ट्रैक पर फेंक रहे कचरा

इस संबंध में कुछ जागरूक लोगों ने रेलवे अधिकारियों से शिकायत की है। जिसके बाद भोपाल रेल मंडल ने इस संबंध में जांच के बाद कार्रवाई करने की बात कहीं है।

हरि भूमि 21 Feb 2022 6:59 pm

UP Election 2022 Voting Phase 3 Live Updates: यूपी में तीसरे चरण का चुनाव शुरू, करहल सीट पर अखिलेश और जसवंतनगर से शिवपाल यादव की इज्जत दांव पर

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के तीसरे चरण के लिए सभी राजनीतिक दलों ने लोगों से आह्वान किया है कि ज्यादा से ज्यादा संख्या में पहुंचकर मतदान अवश्य करें। पीएम नरेंद्र मोदी ने भी 'पहले मतदान-फिर जलपान' का संदेश दिया है।

हरि भूमि 20 Feb 2022 7:00 am

जम्मू कश्मीर: श्रीनगर में आतंकियों ने सुरक्षाबलों पर फेंका ग्रेनेड, दो दुकानों को नुकसान

श्रीगर (Srinagar) इलाके में शुक्रवार को आतंकवादियों ने सुरक्षाबलों (Security Forces) को निशाना बनाया। इस दौरान स्थानीय दुकानों को नुकसान पहुंचा है।

हरि भूमि 18 Feb 2022 3:00 pm

सुषमा स्वराज को जानते थे सब 'सुपरमॉम' के नाम से, सुनती थी ट्विटर पर हर किसी की बात और करती थी मदद, जानें इनके बारे में सबकुछ

सुषमा स्वराज को जानते थे सब 'सुपरमॉम' के नाम से, सुनती थी ट्विटर पर हर किसी की बात और करती थी मदद, जानें इनके बारे में सबकुछ

लाइफस्टाइल नामा 16 Feb 2022 10:25 am

उत्तर भारत के कई राज्यों में और बढ़ सकती है ठंड, मौसम विभाग ने जारी किया अलर्ट

उत्तर भारत समेत दिल्ली एनसीआर (Delhi NCR) में एक बार फिर मौसम का मिजाज बदलने लगा है। उत्तर भारत (North India) के कई हिस्सों में पहाड़ों पर बर्फबारी (snowfall) और बारिश (rain) के कारण राजधानी समेत कई राज्यों के तापमान में आज गिरावट आएगी।

हरि भूमि 10 Feb 2022 10:59 am

शादी से इंकार करना नाबालिक बच्ची को पड़ा मंहगा,मां बेटी को जिंदा आग के हवाले किया

शादी से इंकार करना नाबालिक बच्ची को पड़ा मंहगा,मां बेटी को जिंदा आग के हवाले किया

लाइफस्टाइल नामा 7 Feb 2022 10:40 am

बसंत पंचमी के दिन देवी सरस्वती की पूजा से होती है इच्छाएं पूरी

आज बसंत पंचमी है, इस दिन देवी सरस्वती की पूजा होती है। इस दिन ज्ञान की देवी सरस्वती की पूजा से ज्ञान प्राप्त होता है, तो आइए हम आपको सरस्वती पूजा से जुड़ी पूजा विधि के बारे में बताते हैं। इसे भी पढ़ें: सरस्वती पूजा का पर्व है बसन्त पंचमी जानें बसंत पंचमी के बारे में हिंदू धर्म के अनुसार, बसंत पंचमी का पर्व माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाते हैं। इस बार बसंत पंचमी का त्योहार 5 फरवरी 2022, शनिवार को मनाया जाएगा। इस दिन मां सरस्वती की पूजा-अर्चना की जाती है। पंडितों के अनुसार, बसंत पंचमी के दिन ज्ञान की देवी मां सरस्वती की पूजा करने से बुद्धि व विद्या का आशीर्वाद प्राप्त होता है। बसंत पंचमी 2022 शुभ मुहूर्त माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि, शनिवार 5 फरवरी को सुबह 03 बजकर 47 मिनट से प्रारंभ होगी,जो कि अगले दिन 6 फरवरी, रविवार को सुबह 03 बजकर 46 मिनट पर समाप्त होगी। बसंत पंचमी की पूजा सूर्योदय के बाद और पूर्वाह्न से पहले की जाती है। बसंत पंचमी के दिन ये करें और ये न करें 1. इस दिन किसी से झगड़ा नहीं करना चाहिए। 2. किसी से अपशब्द नहीं बोलना चाहिए। 3. मांस और मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए। 4. ब्रह्मचर्य का पालन जरूर करें। 5. इस दिन बिना नहाए भोजन न करें। 6. कोशिश करें रंग-बिरंगे कपड़े न पहनकर पीले कपड़े पहने। 7. बंसत पंचमी के दिन पितृ-तर्पण भी करना चाहिए। 8. इस शुभ दिन पेड़-पौधों को न काटें। 9. दिन की शुरूआत हथेली देखकर करना चाहिए। उसके बाद हथेली देखकर सरस्वती मां का ध्यान करना चाहिए। इसे भी पढ़ें: Basant Panchami 2022: पढ़ाई से जी चुराता है बच्चा तो बसंत पंचमी के दिन करें ये आसान उपाय सरस्वती पूजा के दिन क्यों पहने जाते हैं पीले कपड़े पंडितों का मानना है कि वसंत पंचमी के दिन पीले कपड़े पहनना शुभ होता है। इस दिन पीले कपड़े पहनना प्रकृति के साथ एक हो जाना या उसमें मिल जाने का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि हम प्रकृति से अलग नहीं है। जैसी प्रकृति ठीक वैसे ही मनुष्य भी हैं। आध्यात्म के दृष्टिकोण से पीला रंग प्राथमिकता को भी दर्शाता है। ऐसा माना जाता है कि जब ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई थी तब तीन ही प्रकाश की आभा थी लाल, पीली और नीली। इनमें से पीली आभा सबसे पहले दिखाई दी थी। इन्हीं कारणों से वसंत पंचमी को पीले कपड़े पहने जाते हैं। इस दिन पीला रंग खुशनुमा और नएपन को महसूस कराता है। वहीं पीला रंग सकारात्मकता का प्रतीक है और शरीर से जड़ता को दूर करता है। पंडितों का मानना है कि इस दिन से वसंत ऋतु की शुरुआत होती है और इस मौसम में हर जगह पीला ही दिखाई देता है। पीला रंग हमारे स्नायु तंत्र को संतुलित और मस्तिष्क को सक्रिय रखता है। इस तरह यह ज्ञान का रंग बन जाता है। यही कारण है कि ज्ञान की देवी सरस्वती के विशेष दिन पर पीले वस्त्र पहने जाते हैं। पीले रंग का है खास महत्व मांगलिक कार्य में पीला रंग प्रमुख होता है। यह भगवान विष्णु के वस्त्रों का रंग है। पूजा-पाठ में पीला रंग शुभ माना जाता है। केसरिया या पीला रंग सूर्यदेव, मंगल और बृहस्पति जैसे ग्रहों का कारक है और उन्हें बलवान बनाता है। इससे राशियों पर भी प्रभाव पड़ता है। पीला रंग खुशी का प्रतीक है। मांगलिक कार्यों में हल्दी का इस्तेमाल किया जाता है जो कि पीले रंग की होती है. वहीं धार्मिक कार्यों में पीले रंग के वस्त्र धारण किए जाते हैं जो कि शुभ होता है। यही कारण है कि वसंत पंचमी पर पीले रंग के कपड़े जरूर पहनने चाहिए। इसे भी पढ़ें: बसंत पंचमी पर माँ सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए पढ़ें यह मंत्र, जानें तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजन विधि ऐसे करें पूजा बसंत पंचमी का दिन बहुत खास होता है इसलिए इस दिन देवी सरस्वती की पूजा करनी चाहिए। मां सरस्वती की पूजा से पहले इस दिन नहा-धोकर सबसे पहले पीले वस्त्र धारण कर लें। उसके बाद देवी की मूर्ति अथव चित्र स्थापित करें और फिर सबसे पहले कलश की पूजा करें। इसके बाद नवग्रहों की पूजा करें और फिर मां सरस्वती की उपासना करें। इसके बाद पूजा के दौरान उन्हें विधिवत आचमन और स्नान कराएं। फिर देवी को श्रंगार की वस्तुएं चढ़ाएं। बसंत पंचमी के दिन देवी मां को सफेद वस्त्र अर्पित करें। साथ ही, खीर अथवा दूध से बने प्रसाद का भोग मां सरस्वती को लगाएं। क्यों की जाती है मां सरस्वती की पूजा हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, ज्ञान देवी मां सरस्वती शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ही ब्रह्माजी के मुख से प्रकट हुई थीं। इसलिए बसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती की पूजा की जाती है। सरस्वती मां को ज्ञान की देवी कहा जाता है। इसलिए इस दिन पूरे विधि विधान से मां सरस्वती की पूजा करने से वो प्रसन्न होती हैं और भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूरी करती हैं। - प्रज्ञा पाण्डेय

प्रभासाक्षी 4 Feb 2022 5:10 pm

सरस्वती पूजा का पर्व है बसन्त पंचमी

बसन्त उत्तर भारत तथा समीपवर्ती देशों की छह ऋतुओं में से एक ऋतु है। जो फरवरी मार्च और अप्रैल के मध्य इस क्षेत्र में अपना सौंदर्य बिखेरती है। माना गया है कि माघ महीने की शुक्ल पंचमी से बसन्त ऋतु का आरंभ होता है। फाल्गुन और चैत्र मास बसन्त ऋतु के माने गए हैं। फाल्गुन वर्ष का अंतिम मास है और चैत्र पहला। इस प्रकार हिंदू पंचांग के वर्ष का अंत और प्रारंभ बसन्त में ही होता है। इस ऋतु के आने पर सर्दी कम हो जाती है। मौसम सुहावना हो जाता है। पेड़ों में नए पत्ते आने लगते हैं। खेत सरसों के फूलों से भरे पीले दिखाई देते हैं। अतः राग रंग और उत्सव मनाने के लिए यह ऋतु सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। बसन्त पंचमी का दिन सरस्वती जी की साधना को अर्पित ज्ञान का त्योहार है। इस दिन पूरे देश में विद्या की देवी माँ सरस्वती की बड़े उल्लास के साथ पूजा की जाती है। इस दिन स्त्रियां पीले वस्त्र धारण करती हैं। शास्त्रों में भगवती सरस्वती की आराधना व्यक्तिगत रूप में करने का विधान है। किंतु आजकल सार्वजनिक पूजा-पाण्डालों में देवी सरस्वती की मूर्ति स्थापित कर पूजा करने का रिवाज चल पड़ा है। इसे भी पढ़ें: Basant Panchami 2022: पढ़ाई से जी चुराता है बच्चा तो बसंत पंचमी के दिन करें ये आसान उपाय बसन्त पंचमी के पर्व से ही बसंत ऋतु का आगमन होता है। शांत, ठंडी, मंद वायु, कटु शीत का स्थान ले लेती है तथा सब को नवप्राण व उत्साह से स्पर्श करती है। बसन्त ऋतु तथा पंचमी का अर्थ है शुक्ल पक्ष का पांचवां दिन। अंग्रेजी कलेंडर के अनुसार यह पर्व जनवरी-फरवरी तथा हिन्दू तिथि के अनुसार माघ के महीने में मनाया जाता है। भारत में पतझड़ ऋतु के बाद बसन्त ऋतु का आगमन होता है। हर तरफ रंग-बिरंगें फूल खिले दिखाई देते हैं। इस समय गेहूं की बालियां भी पक कर लहराने लगती हैं। जिन्हें देखकर किसान हर्षित होते हैं। चारों ओर सुहाना मौसम मन को प्रसन्नता से भर देता है। इसीलिये वसन्त ऋतु को सभी ऋतुओं का राजा अर्थात ऋतुराज कहा गया है। इस दिन भगवान विष्णु, कामदेव तथा रति की पूजा की जाती है। इस दिन ब्रह्माण्ड के रचयिता ब्रह्मा जी ने सरस्वती जी की रचना की थी। इसलिए इस दिन देवी सरस्वती की पूजा भी की जाती है। बसन्त पंचमी का दिन भारतीय मौसम विज्ञान के अनुसार समशीतोष्ण वातावरण के प्रारंभ होने का संकेत है। मकर सक्रांति पर सूर्य के उत्तरायण प्रस्थान के बाद शरद ऋतु की समाप्ति होती है। हालांकि विश्व में बदलते मौसम ने मौसम चक्र को बिगाड़ दिया है। पर सूर्य के अनुसार होने वाले परिवर्तनों का उस पर कोई प्रभाव नहीं है। हमारी संस्कृति के अनुसार पर्वों का विभाजन मौसम के अनुसार ही होता है। इन पर्वो पर मन में उत्पन्न होने वाला उत्साह स्वप्रेरित होता है। सर्दी के बाद गर्मी और उसके बाद बरसात फिर सर्दी का बदलता क्रम देह में बदलाव के साथ ही प्रसन्नता प्रदान करता है। ग्रंथों के अनुसार देवी सरस्वती विद्या, बुद्धि और ज्ञान की देवी हैं। अमित तेजस्विनी व अनंत गुणशालिनी देवी सरस्वती की पूजा-आराधना के लिए माघमास की पंचमी तिथि निर्धारित की गयी है। बसन्त पंचमी को इनका आविर्भाव दिवस माना जाता है। ऋग्वेद में सरस्वती देवी के असीम प्रभाव व महिमा का वर्णन है। मां सरस्वती विद्या व ज्ञान की अधिष्ठात्री हैं। कहते हैं जिनकी जिव्हा पर सरस्वती देवी का वास होता है। वे अत्यंत ही विद्वान व कुशाग्र बुद्धि होते हैं। इसे भी पढ़ें: बसंत पंचमी पर माँ सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए पढ़ें यह मंत्र, जानें तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजन विधि सभी शुभ कार्यों के लिए बसन्त पंचमी के दिन अत्यंत शुभ मुहूर्त माना गया है। बसन्त पंचमी को अत्यंत शुभ मुहूर्त मानने के पीछे अनेक कारण हैं। यह पर्व अधिकतर माघ मास में ही पड़ता है। माघ मास का भी धार्मिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष महत्व है। इस माह में पवित्र तीर्थों में स्नान करने का विशेष महत्व बताया गया है। दूसरे इस समय सूर्यदेव भी उत्तरायण होते हैं। इसलिए प्राचीन काल से बसन्त पंचमी के दिन देवी सरस्वती की पूजा की जाती है अथवा कह सकते हैं कि इस दिन को सरस्वती के जन्म दिवस के रुप में मनाया जाता है। चूंकि बसन्त पंचमी का पर्व इतने शुभ समय में पड़ता है। अतः इस पर्व का स्वतः ही आध्यात्मिक, धार्मिक, वैदिक आदि सभी दृष्टियों से अति विशिष्ट महत्व परिलक्षित होता है। प्राचीन कथाओं के अनुसार ब्रह्मा जी ने विष्णु जी के कहने पर सृष्टि की रचना की थी। एक दिन वह अपनी बनाई हुई सृष्टि को देखने के लिए धरती पर भ्रमण करने के लिए आए। ब्रह्मा जी को अपनी बनाई सृष्टि में कुछ कमी का अहसास हो रहा था। लेकिन वह समझ नहीं पा रहे थे कि किस बात की कमी है। उन्हें पशु-पक्षी, मनुष्य तथा पेड़-पौधे सभी चुप दिखाई दे रहे थे। तब उन्हें आभास हुआ कि क्या कमी है। वह सोचने लगे कि एसा क्या किया जाए कि सभी बोले और खुशी में झूमे। ऐसा विचार करते हुए ब्रह्मा जी ने अपने कमण्डल से जल लेकर कमल पुष्पों तथा धरती पर छिडका। जल छिडकने के बाद श्वेत वस्त्र धारण किए हुए एक देवी प्रकट हुई। इस देवी के चार हाथ थे। एक हाथ में वीणा, दूसरे हाथ में कमल, तीसरे हाथ में माला तथा चतुर्थ हाथ में पुस्तक थी। ब्रह्मा जी ने देवी को वरदान दिया कि तुम सभी प्राणियों के कण्ठ में निवास करोगी। सभी के अंदर चेतना भरोगी, जिस भी प्राणी में तुम्हारा वास होगा वह अपनी विद्वता के बल पर समाज में पूज्यनीय होगा। ब्रह्मा जी ने कहा कि तुम्हें संसार में देवी सरस्वती के नाम से जाना जाएगा। ब्रह्मा जी ने देवी सरस्वती को वरदान देते हुए कहा कि तुम्हारे द्वारा समाज का कल्याण होगा इसलिए समाज में रहने वाले लोग तुम्हारा पूजन करेगें। कडकड़ाती ठंड के बाद बसंत ऋतु में प्रकृति की छटा देखते ही बनती है। पलाश के लाल फूल, आम के पेड़ों पर आए बौर, हरियाली और गुलाबी ठंड मौसम को सुहाना बना देती है। यह ऋतु सेहत की दृष्टि से भी बहुत अच्छी मानी जाती है। मनुष्यों के साथ पशु-पक्षियों में नई चेतना का संचार होता है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान का विशेष महत्व है। देश के कई स्थानो पर पवित्र नदियों के तट और तीर्थ स्थानों पर बसंत मेला भी लगता है। राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र में तो बसंत पंचमी के दिन से ही लोग समूह में एकत्रित होकर रात में चंग ढफ बजाकर धमाल गाकर होली के पर्व का शुभारम्भ करते है। बसन्त पंचमी के दिन विद्यालयों में भी देवी सरस्वती की आराधना की जाती है। भारत के पूर्वी प्रांतों में घरों में भी विद्या की देवी सरस्वती की मूर्ति की स्थापना की जाती है और वसन्त पंचमी के दिन उनकी पूजा की जाती है। उसके बाद अगले दिन मूर्ति को नदी में विसर्जित कर दिया जाता है। देवी सरस्वती को ज्ञान, कला, बुद्धि, गायन-वादन की अधिष्ठात्री माना जाता है। इसलिए इस दिन विद्यार्थी, लेखक और कलाकार देवी सरस्वती की उपासना करते हैं। विद्यार्थी अपनी किताबें, लेखक अपनी कलम और कलाकार अपने संगीत उपकरणो और बाकी चीजें मां सरस्वती के सामने रखकर पूजा करते हैं। रमेश सर्राफ धमोरा (लेखक अधिस्वीकृत स्वतंत्र पत्रकार हैं। इनके लेख देश के कई समाचार पत्रों में प्रकाशित होते रहते हैं।)

प्रभासाक्षी 4 Feb 2022 10:50 am

तोरण की रस्म में दो लड़कियों ने पार किए 4 लाख रुपए

तोरण की रस्म में दो लड़कियों ने पार किए 4 लाख रुपए

लाइफस्टाइल नामा 3 Feb 2022 10:40 pm

अनुराग ठाकुर ने एजुकेशन बजट पर दिया बड़ा बयान, बोले- इससे अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी

केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर (Union Minister Anurag Thakur) ने बजट को लेकर कहा कि इस बजट में सरकार ने बच्चों के लिए 200 शैक्षिक टीवी चैनल शुरू करने की घोषणा की है।

हरि भूमि 2 Feb 2022 2:59 pm

क्या आपको पता है जीबी रोड के अलावा भी ये हैं भारत की सबसे बदनाम गलियां, जानिए इन जगहों के बारे में

क्या आपको पता है जीबी रोड के अलावा भी ये हैं भारत की सबसे बदनाम गलियां, जानिए इन जगहों के बारे में

लाइफस्टाइल नामा 2 Feb 2022 2:45 pm

भिवानी में कार सवारों ने युवक को मारी गोली

घायल की पहचान सुमित के रूप में हुई है। गोली की आवाज सुनकर इलाके में सनसनी फैल गई। थोड़ी देर बाद स्थानीय लोग मौके पर जुटे और उसे अस्पताल में भर्ती कराया है

हरि भूमि 1 Feb 2022 2:59 pm

Mauni Amavasya 2022 : आखिर क्यों खास तरह के शुभ संयोग बन रहे हैं इस बार?

माघ माह की अमावस्या को मौनी अमावस्या कहते हैं। यदि यह अमावस्या सोमवार के दिन हो तो इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। खास बात यह है कि इस बार मौनी अमावस्या 31 जनवरी सोमवार को ही पड़ रही है जिससे इस दिन बेहद शुभ संयोग बन रहे हैं। इस बार श्रवण नक्षत्र होने से महोदया योग और सर्वार्थ सिद्धि योग बन रहा है। बताया जा रहा है कि पवित्र गंगा में स्नान करके यदि विधि-विधान से पूजन किया जाये तो निश्चित ही मनोकामनाएं पूर्ण होंगी। कोरोना महामारी को देखते हुए यदि आप गंगा स्नान के लिए नहीं जा पा रहे हैं तो घर पर ही गंगा जल को नहाने के पानी में मिला सकते हैं और उसके पास सच्चे मन से पूजा-अर्चना करें और पंडितों तथा जरूरतमंदों को दान दें। इसे भी पढ़ें: मौनी अमावस्या पर कर लें ये सरल उपाय, मिलेगी पितृदोष से मुक्ति और जीवन में बनी रहेगी सुख-शान्ति प्रयाग में दिखती है अलग ही छटा वैसे तो पूरे माघ माह में अनेक लोग प्रयाग में संगम तट पर कुटिया बनाकर रहते हैं तथा नित्य त्रिवेणी स्नान करते हैं लेकिन मौनी अमावस्या के दिन गंगा स्नान का महत्व और बढ़ जाता है क्योंकि मान्यता है कि इस दिन गंगा नदी का जल अमृत के समान हो जाता है जिसमें स्नान करने से सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है। कहा जाता है इस दिन मौन रहकर गंगा स्नान करना चाहिए। मौनी अमवस्या के दिन दान का तो विशेष महत्व है ही इस दिन पितरों का तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान आदि कर्म भी किए जाते हैं। मौनी अमावस्या कथा कांचीपुरी में देवस्वामी नामक एक ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी का नाम धनवती था। उनके सात बेटे तथा एक बेटी थी। बेटी का नाम गुणवती था। ब्राह्मण ने सातों पुत्रों का विवाह करके बेटी के लिए वर की खोज में सबसे बड़े पुत्र को भेजा। उसी दौरान पंडित ने पुत्री की जन्मकुंडली देखी और कहा सप्तपदी होते होते यह कन्या विधवा हो जाएगी। तब ब्राह्मण ने पूछा पुत्री के इस वैधव्य दोष का निवारण कैसे होगा? इस प्रश्न के उत्तर में पंडित ने बताया कि सोमा का पूजन करने से वैधव्य दोष दूर होगा। फिर सोमा का परिचय देते हुए उसने बताया कि वह एक धोबिन है। उसका निवास स्थान सिंहल द्वीप है। जैसे भी हो सोमा को प्रसन्न करो तथा गुणवती के विवाह से पूर्व उसे यहां बुला लो। तब देवस्वामी का सबसे छोटा लड़का बहन को अपने साथ लेकर सिंहल द्वीप जाने के लिए सागर तट पर चला गया। सागर पार करने की चिंता में दोनों भाई बहन एक पेड़ की छाया में बैठ गये। इसे भी पढ़ें: कब है मौनी अमावस्या? जानें तिथि, शुभ मुहूर्त और नियम उस पेड़ पर एक गिद्ध परिवार रहता था। उस समय घोंसले में सिर्फ गिद्ध के बच्चे थे जो दोनों भाई बहन के क्रियाकलापों को देख रहे थे। सायंकाल के समय उन बच्चों की मां आई तो उन्होंने भोजन नहीं किया। वे मां से बोले कि नीचे दो प्राणी सुबह से भूखे प्यासे बैठे हैं जब तक वे कुछ नहीं खा लेते तब तक हम भी कुछ नहीं खाएंगे। तब दया से भरकर गिद्ध माता उनके पास गईं और बोलीं कि मैंने आपकी इच्छाओं को जान लिया है। यहां जो भी फल कंदमूल मिलेगा मैं ले आती हूं आप भोजन कर लीजिए। मैं प्रातःकाल आपको सागर पार कराकर सिंहल द्वीप की सीमा के पास पहुंचा दूंगी। वे गिद्ध माता की सहायता से सोमा के यहां जा पहुंचे और उसकी सेवा में लग गये। वे नित्य प्रातः उठकर सोमा का घर झाड़ कर लीप देते थे। एक दिन सोमा ने अपनी बहुओं से पूछा कि हमारे घर को कौन बुहारता है, कौन लीपता पोतता है? सबने कहा कि हमारे सिवा और कौन इस काम को करने आएगा? मगर सोमा को उनकी बातों पर विश्वास नहीं हुआ। एक दिन उसने यह रहस्य जानना चाहा। वह सारी रात जागी और सब कुछ प्रत्यक्ष देख लिया। ब्राह्मण पुत्र पुत्री द्वारा घर के लीपने की बात को जानकर उसे बड़ा दुख हुआ। सोमा का बहन भाई से वार्तालाप हुआ। भाई ने सोमा को बहन संबंधी सारी बात बता दी। सोमा ने उनकी श्रम साधना तथा सेवा से प्रसन्न होकर उचित समय पर उनके घर पहुंचने और कन्या के वैधव्य दोष निवारण का आश्वासन दिया। मगर भाई ने उससे तुरंत ही अपने साथ चलने का आग्रह किया। तब सोमा उनके साथ ही चल दी। चलते समय सोमा ने बहुओं से कहा कि मेरी अनुपस्थिति में यदि किसी का देहान्त हो जाए तो उसके शरीर को नष्ट मत करना। मेरा इंतजार करना। फिर क्षण भर में सोमा भाई बहन के साथ कांचीपुरी पहुंच गई। दूसरे दिन गुणवती के विवाह का कार्यक्रम तय हो गया। सप्तपदी होते ही उसका पति मर गया। सोमा ने अपने संचित पुण्यों का फल गुणवती को प्रदान कर दिया तो तुरंत ही उसका पति जीवित हो उठा। सोमा उन्हें आशीष देकर अपने घर चली गई। उधर गुणवती को पुण्य फल देने से सोमा के पुत्र, जमाता तथा पति की मृत्यु हो गई। सोमा ने पुण्य फल संचित करने के लिए अश्वत्थ वृक्ष की छाया में विष्णुजी का पूजन करके 108 परिक्रमाएं कीं। इसके पूर्ण होने पर उसे परिवार के मृतक जन जीवित हो उठे। -शुभा दुबे

प्रभासाक्षी 31 Jan 2022 6:47 pm

अचानक एक आदमी आता है और बोलता है...

funny jokes suddenly a man comes and speaks hindi jokes

हरि भूमि 29 Jan 2022 10:59 am

RSMSSB Patwari Results 2021: राजस्थान पटवारी परीक्षा का रिजल्ट हुआ घोषित, यहां से करें चेक

RSMSSB Patwari Results 2021: राजस्थान अधीनस्थ और मंत्रिस्तरीय कर्मचारी चयन बोर्ड (RSMSSB) ने मंगलवार 25 जनवरी 2022 को पटवारी रिजल्ट 2021 ऑनलाइन घोषित कर दिया है।

हरि भूमि 26 Jan 2022 2:59 pm

बसंत पंचमी पर माँ सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए पढ़ें यह मंत्र, जानें तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजन विधि

हिंदू धर्म में बसंत पंचमी पर्व का विशेष महत्व है। हिंदी पंचांग के अनुसार हर वर्ष माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को बसंत पंचमी के रूप में मनाया जाता है। इस बार बसंत पंचमी 05 फरवरी 2022 को मनाई जाएगी। बसंत पंचमी के दिन विद्या और कला की देवी मां सरस्वती की पूजा की जाती है। शास्त्रों के अनुसार बसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती का जन्म हुआ था। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन मां सरस्वती की विधि-विधान से पूजा करने से विद्या और बृद्धि का वरदान मिलता है। बसंत पंचमी से वसंतोत्सव की शुरुआत हो जाती है। ये वसंतोत्सव होली तक चलता है । इसे भी पढ़ें: कब है समस्त पापों से मुक्ति दिलाने वाली पापहारिणी एकादशी, जानें तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजन विधि बसंत पंचमी 2022 शुभ मुहूर्त बसंत पंचमी आरंभ - 05 फरवरी प्रातः 3 बजकर 48 मिनट से शुरू पंचमी तिथि समाप्त- 06 फरवरी प्रातः 3 बजकर 46 मिनट तक बसंत पंचमी पूजन विधि बसंत पंचमी के दिन सुबह जल्दी उठकर नहाएं और पीले या सफेद वस्त्र पहनें। अब उत्तम वेदी पर वस्त्र बिछाकर अक्षत (चावल) से अष्टदल कमल बनाएं और मंगल कलश स्थापित करें। अब मां सरस्वती की प्रतिमा को सामने रखें। इसके पास ही भगवान गणेश व नवग्रह स्थापित करें। अब देवी सरस्वती की प्रतिमा पर जल चढ़ाएं। इसके बाद देवी को चंदन, अक्षत, केसर, कुमकुम, इत्र, सफेद फूल और अन्य पूजन सामग्री चढ़ाएं। अब फूलों से मां सरस्वती का श्रृंगार करें और उन्हें सफेद वस्त्र चढ़ाएं। आप माँ सरस्वती को प्रसाद के रुप में खीर या दूध से बनी मिठाइयां चढ़ाएं। माँ सरस्वती की पूजा करने के बाद गरीब बच्चों में कलम व पुस्तकों का दान करें। इसे भी पढ़ें: कब है मौनी अमावस्या? जानें तिथि, शुभ मुहूर्त और नियम बसंत पंचमी पर क्या करें बसंत पंचमी के दिन नया काम करना बहुत शुभ फलदायक होता है। इस दिन नींव पूजन, गृह प्रवेश, वाहन खरीदना, व्यापार प्रारंभ और मांगलिक कार्य किए जाते हैं। मां सरस्वती को ज्ञान, गायन- वादन और बुद्धि की देवी माना जाता है। इस दिन संगीत से जुड़े कलाकारों को अपने वाद्य यंत्रों पर तिलक लगा कर मां सरस्वती की पूजा अवश्य करनी चाहिए। बसंत पंचमी के दिन बच्चों को पुस्तक और विद्या से जुड़ी वस्तुएं दान करनी चाहिए। इस दिन बच्चों का अन्नप्राशन करवाना शुभ माना जाता है। इस दिन पीले या सफेद वस्त्र पहनने चाहिए। बसंत पंचमी के दिन पितृ तर्पण भी किया जाना चाहिए। बसंत पंचमी के दिन ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। देवी सरस्वती मंत्र ॐ श्री सरस्वती शुक्लवर्णां सस्मितां सुमनोहराम्।। कोटिचंद्रप्रभामुष्टपुष्टश्रीयुक्तविग्रहाम्। वह्निशुद्धां शुकाधानां वीणापुस्तकमधारिणीम्।। रत्नसारेन्द्रनिर्माणनवभूषणभूषिताम्। सुपूजितां सुरगणैब्रह्मविष्णुशिवादिभि:।।वन्दे भक्तया वन्दिता च ।। - प्रिया मिश्रा

प्रभासाक्षी 26 Jan 2022 9:15 am

कब है समस्त पापों से मुक्ति दिलाने वाली पापहारिणी एकादशी, जानें तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजन विधि

हिन्दू धर्म में एकादशी व्रत को सर्वश्रेठ माना जाता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार हर माह की शुक्ल व कृष्ण पक्ष की ग्याहरवीं तिथि को एकादशी व्रत रखा जाता है। इस प्रकार से एक वर्ष में कुल 24 एकादशी होती हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार माघ माह की कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को षटतिला एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस दिन भगवान श्री विष्णु की पूजा की जाती है और उन्हें तिल का भोग लगाया जाता है। षटतिला एकादशी को पापहारिणी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस बार षटतिला एकादशी 28 जनवरी (शुक्रवार) को है।मान्यता है कि इस दिन व्रत-पूजन करने से समस्त पापों का नाश होता है और मनुष्य को सभी सुखों की प्राप्ति होती है। इस दिन तिल को पानी में डालकर स्नान करने और तिल का दान करने का विशेष महत्व है। इसे भी पढ़ें: कब है मौनी अमावस्या? जानें तिथि, शुभ मुहूर्त और नियम षटतिला एकादशी 2022 शुभ मुहूर्त षटतिला एकादशी 28 जनवरी को दोपहर 2 बजकर 16 मिनट से शुरू होगी। एकादशी तिथि का समापन 28 जनवरी की रात 11:05 पर होगा। ऐसे में षटतिला एकादशी का व्रत 28 जनवरी को रखा जाएगा और व्रत का पारण 29 जनवरी को किया जाएगा। इस दिन अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 13 मिनट से दोपहर 12 बजकर 56 मिनट तक रहेगा। षटतिला एकादशी का महत्व मान्यताओं के अनुसार षटतिला एकादशी के दिन व्रत करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है और घर में सुख शांति का वास होता है। जो व्यक्ति इस दिन व्रत करता है उसे हजारों सालों की तपस्या और स्वर्ण दान के बराबर फल मिलता है। षटतिला एकादशी का व्रत करने से मनुष्य को सभी सुखों की प्राप्ति होती है और उसे मोक्ष मिलता है। इसे भी पढ़ें: सबसे ज़्यादा लकी होते हैं इन 3 राशियों के लोग, कमाते है खूब दौलत-शौहरत षटतिला एकादशी पूजन विधि षटतिला एकादशी के दिन सूर्योदय से पहले उठकर पानी में तेल डालकर स्नान करें और साफ वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान विष्णु का अभिषेक करें और उन्हें चंदन, पुष्प, अक्षत, रोली, नैवेद्य आदि अर्पित करें। षटतिला एकादशी व्रत कथा पढ़ें और भगवान विष्णु की आरती करें। इस दिन भगवान विष्णु को तिल से बने पकवान का भोग लगाएं। षटतिला एकादशी के दिन तिल का दान करें और तिल मिला हुआ पानी पिएं। अगले दिन पारण कर लें। प्रिया मिश्रा

प्रभासाक्षी 24 Jan 2022 5:25 pm

राजनाथ सिंह एनसीसी कैडेट्स से बोले- ब्रह्मांड की संपूर्ण शक्ति आपके भीतर है, इन गुणों को अपने अंदर विकसित करें

NCC अब तक आपके अंदर ऐसी qualities पैदा कर चुकी है, जो आपको एक complete person बनाने में सहायक होती हैं। इसने आपके अंदर एक लीडर, एक सैनिक, एक artist, एक musician, और इन सबसे ऊपर एक अच्छे इंसान के गुण पैदा किए हैं, जो मैं अपनी आँखों से साफ़ देख सकता हूं।

हरि भूमि 22 Jan 2022 2:59 pm

Uttarakhand Election 2022: कांग्रेस में शामिल हुए उत्तराखंड भाजपा से निष्कासित मंत्री हरक सिंह रावत, पार्टी के सामने रखी एक शर्त

उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव (Uttarkhand Assembly Election 2022) से पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) के पूर्व नेता हरक सिंह रावत (Harak Singh Rawat) शुक्रवार को कांग्रेस में शामिल हो गए। उनके साथ उनकी बहू अनुकृति गुसाई रावत ने भी कांग्रेस का दामन थाम लिया।

हरि भूमि 21 Jan 2022 7:00 pm

सभी मनोकामनाएं पूरी करने आ गया है सकट चौथ व्रत, जानिये इसका महत्व, पूजन विधि और व्रत कथा

सकट चौथ का पर्व माघ माह की कृष्ण चतुर्थी को मनाया जाता है। इस दिन संकट हरण गणपति गणेशजी का पूजन होता है। यह व्रत संकटों तथा दुखों को दूर करने वाला है। मान्यता है कि इस दिन व्रत करने से श्रद्धालुओं की सभी इच्छाएं व मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। वक्रतुण्डी चतुर्थी, माही चौथ अथवा तिलकुटा चौथ इसी पर्व के अन्य नाम हैं। इस दिन संकट हरण गणेशजी तथा चंद्रमा का पूजन किया जाता है। सकट चौथ के दिन सभी महिलाएं सुख सौभाग्य और सर्वत्र कल्याण की इच्छा से प्रेरित होकर विशेष रूप से इस दिन व्रत करती हैं। पद्म पुराण के अनुसार यह व्रत स्वयं भगवान गणेश ने मां पार्वती को बताया था। इस व्रत की विशेषता है कि घर का कोई भी सदस्य इस व्रत को कर सकता है। इसे भी पढ़ें: इस कथा को पढ़े या सुने बिना अधूरा रह जाएगा सकट चौथ व्रत, पढ़ें साहूकारनी और सकट देवता की कथा सकट चौथ व्रत पूजन विधि इस दिन व्रत रहने के बाद सायंकाल चंद्र दर्शन होने पर दूध का अर्ध्य देकर चंद्रमा की विधिवत पूजा की जाती है। इस दिन गौरी गणेश की स्थापना कर उनका पूजन किया जाता है तथा इस मूर्ति को वर्ष भर घर में रखा जाता है। सकट चौथ के दिन नैवेद्य सामग्री, तिल, ईख, गंजी, भांटा, अमरूद, गुड़, घी से चंद्रमा व गणेश का भोग लगाया जाता है। यह नैवेद्य रात्रिभर डलिया इत्यादि से ढक कर यथावत रख दिया जाता है जिसे पहार कहते हैं। पुत्रवती माताएं पुत्र तथा पति के सुख समृद्धि के लिए व्रत रहती हैं। सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस ढके हुए पहार को पुत्र ही खोलता है। उत्तर भारत में कई जगह इस दिन स्त्रियां निर्जल व्रत रखकर शाम को फलाहार लेती हैं और दूसरे दिन सुबह सकट माता पर चढ़ाए गए पकवानों को प्रसाद रूप में ग्रहण करती हैं। इस दिन तिल को भूनकर गुड़ के साथ कूट लिया जाता है और तिलकुट का पहाड़ बनाया जाता है। कहीं कहीं तिलकुट का बकरा भी बनाया जाता है। उसकी पूजा करके घर का कोई बच्चा तिलकूट बकरे की गर्दन काटता है। फिर सबको उसका प्रसाद दिया जाता है। पूजा के बाद सब लोग कथा सुनते हैं। सकट चौथ व्रत कथा किसी नगर में एक कुम्हार रहता था। एक बार जब उसने बर्तन बनाकर आंवां लगाया तो आंवां नहीं पका। परेशान होकर वह राजा के पास गया और बोला कि महाराज न जाने क्या कारण है कि आंवां पक ही नहीं रहा है। राजा ने राजपंडित को बुलाकर कारण पूछा। राजपंडित ने कहा, ''हर बार आंवां लगाते समय एक बच्चे की बलि देने से आंवां पक जाएगा।'' राजा का आदेश हो गया। बलि आरम्भ हुई। जिस परिवार की बारी होती, वह अपने बच्चों में से एक बच्चा बलि के लिए भेज देता। इस तरह कुछ दिनों बाद एक बुढ़िया के लड़के की बारी आई। बुढ़िया के एक ही बेटा था तथा उसके जीवन का सहारा था, पर राजाज्ञा कुछ नहीं देखती। दुखी बुढ़िया सोचने लगी, ''मेरा एक ही बेटा है, वह भी सकट के दिन मुझ से जुदा हो जाएगा।'' तभी उसको एक उपाय सूझा। उसने लड़के को सकट की सुपारी तथा दूब का बीड़ा देकर कहा, ''भगवान का नाम लेकर आंवां में बैठ जाना। सकट माता तेरी रक्षा करेंगी।'' इसे भी पढ़ें: इस बार सकट चौथ बन रहा है यह शुभ योग, जानें गणेश जी की पूजा का शुभ मुहूर्त और विधि सकट के दिन बालक आंवां में बिठा दिया गया और बुढ़िया सकट माता के सामने बैठकर पूजा प्रार्थना करने लगी। पहले तो आंवां पकने में कई दिन लग जाते थे, पर इस बार सकट माता की कृपा से एक ही रात में आंवां पक गया। सवेरे कुम्हार ने देखा तो हैरान रह गया। आंवां पक गया था और बुढ़िया का बेटा जीवित व सुरक्षित था। सकट माता की कृपा से नगर के अन्य बालक भी जी उठे। यह देख नगरवासियों ने माता सकट की महिमा स्वीकार कर ली। तब से आज तक सकट माता की पूजा और व्रत का विधान चला आ रहा है। सकट चौथ व्रत से जुड़ी एक और कथा एक बार विपदापन्न देवता लोग भगवान शंकर के पास गये। उस समय भगवान शिव के सम्मुख स्वामी कार्तिकेय तथा गणेश विराजमान थे। शिव जी ने दोनों बालकों से पूछा− तुम में से कौन ऐसा वीर है, जो देवताओं का कष्ट निवारण करे?'' तब कार्तिकेय ने अपने को देवताओं का सेनापति प्रमाणित करते हुए देव रक्षा योग्य तथा सर्वोच्च देव पद मिलने का अधिकारी सिद्ध किया। यह बात सुनकर शिवजी ने गणेश की इच्छा जाननी चाही। तब गणेश जी ने विनम्र भाव से कहा कि पिता आपकी आज्ञा हो तो मैं बिना सेनापति बने ही सब संकट दूर कर सकता हूं। बड़ा देवता बनाएं या ना बनाएं इसका मुझे लोभ लिप्सा नहीं। यह सुनकर विहंसत हुए शिव ने दोनों लड़कों को पृथ्वी की परिक्रमा करने को कहा तथा यह शर्त रखी कि जो सबसे पहले पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करके आ जाएगा, वही वीर तथा सर्वश्रेष्ठ देवता घोषित किया जायेगा। यह सुनते ही स्वामी कार्तिकेय बड़े गर्व से अपने वाहन मोर पर चढ़कर पृथ्वी परिक्रमा करने चल दिये। गणेश जी ने समझा कि चूहे के बल पर तो पूरे पृथ्वी का चक्कर लगाना अत्यन्त कठिन है इसीलिए उन्होंने एक युक्ति सोची। वे सात बार अपने माता पिता की परिक्रमा करके बैठ गये। रास्ते में कार्तिकेय को पूरे पृथ्वी मण्डल में उनके आगे चूहे का पद चिन्ह दिखाई दिया। परिक्रमा करके लौटने पर निर्णय की बारी आई। कार्तिकेय जी गणेश पर कीचड़ उछालने लगे तथा अपनी शाबासी से पूरे भूमंडल का एकमात्र पर्यटक बताया। इस पर गणेश जी ने शिव से कहा कि माता-पिता में ही समस्त तीर्थ निहित हैं इसीलिए मैंने आपकी सात बार परिक्रमाएं की हैं। गणेश जी की इस बात को सुनकर समस्त देवता तथा कार्तिकेय ने सिर झुका दिया। तब शंकर जी ने उन्मुक्त कंठ से गणेश की प्रशंसा की तथा आशीर्वाद दिया कि त्रिलोक में सर्वप्रथम तुम्हारी पूजा होगी। तब गणेश जी ने पिता की आज्ञानुसार जाकर देवताओं का संकट दूर किया। यह शुभ समाचार जानकर भगवान शंकर ने अपने चंद्रमा को यह बताया कि चौथ के दिन यही तुम्हारे मस्तक का ताज बनकर पूरे विश्व को शीतलता प्रदान करेगा जो स्त्री पुरुष इस तिथि पर तुम्हारा पूजन तथा चंद्र अर्ध्य दान देगा उसका त्रिविध ताप (दैहिक, दैविक, भौतिक) दूर होगा और ऐश्वर्य, पुत्र, सौभाग्य को प्राप्त करेगा। -शुभा दुबे

प्रभासाक्षी 20 Jan 2022 5:42 pm

आरम्भ हो चुका है पवित्र माघ माह, इस महीने पड़ेंगे ये प्रमुख व्रत और त्यौहार, देखें पूरी लिस्ट

हिंदू पंचांग के अनुसार साल का 11वां महीना 'माघ माह' प्रारंभ हो चुका है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार माघ महीने की शुरूआत 18 जनवरी 2022 यानी आज से हो गई है। पंचांग के अनुसार 16 फरवरी को माघ पूर्णिमा के साथ ही इस महीने का समापन होगा। हिंदू धर्म में माघ माह को बहुत ही पवित्र माना गया है। माघ के महीने में कई धार्मिक पर्व आते हैं। इस महीने में स्नान दान और पूजा पाठ का विशेष महत्व है। इसे भी पढ़ें: इस बार सकट चौथ बन रहा है यह शुभ योग, जानें गणेश जी की पूजा का शुभ मुहूर्त और विधि माघ माह में पूजा-पाठ का विशेष महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माघ के महीने में भगवान विष्णु की पूजा करना अत्यंत शुभकारी माना गया है। इस महीने में पूजा पाठ करने से भगवान प्रसन्न होते हैं और सुख-सौभाग्य, धन-संतान और मोक्ष प्रदान करते हैं। कहा जाता है कि माघ मास में ही युधिष्ठिर ने महाभारत युद्ध में वीरगति प्राप्त हुए अपने संबंधियों को सद्गति दिलाने के लिए कल्पवास किया था। यही वजह है कि माघ के महीने में कल्पवास किया जाता है। इसे भी पढ़ें: मंगल कर रहे हैं धनु राशि में प्रवेश, इन 4 राशि वालों की होगी बल्ले-बल्ले, हों जाएंगे मालमाल माघ माह में पड़ने वाले पर्व संकष्टी चतुर्थी - 21 जनवरी 2022 षटतिला एकादशी - 28 जनवरी 2022 मौनी अमावस्या - 1 फरवरी 2022 बसंत पंचमी - 5 फरवरी 2022 जया एकादशी -12 फरवरी 2022 माघी पूर्णिमा - 16 फरवरी 2022 - प्रिया मिश्रा

प्रभासाक्षी 19 Jan 2022 6:06 pm

Republic Day Parade 2022: इस बार का गणतंत्र दिवस होगा अनोखा, ये 5 चीजें बढ़ाएंगी परेड की शोभा

Republic Day Parade 2022: देश में हर साल की तरह 26 जनवरी 2022 (26 January) को भी भारत अपना 73वां गणतंत्र दिवस (73th Republic Day) मनाएगा। यह पूरा कार्यक्रम कोविड19 प्रोटोकॉल के तहत दिल्ली के राजपथ पर ही आयोजित होगा।

हरि भूमि 19 Jan 2022 3:00 pm