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Delhi Amritsar Katra Expressway: वैष्णो देवी 6 घंटे और स्वर्ण मंदिर 4 घंटे दूर! ₹39,000 करोड़ का मेगा कॉरिडोर तैयार

उत्तर भारत में सड़क कनेक्टिविटी के इतिहास में एक नया मील का पत्थर साबित होने जा रहा दिल्ली-अमृतसर-कटरा एक्सप्रेसवे अब तेजी से धरातल पर उतर रहा है। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी भारतमाला परियोजना के तहत लगभग 39,000 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से तैयार हो रहा यह 670 किलोमीटर लंबा नियंत्रित-पहुंच (Access-Controlled) ग्रीनफील्ड कॉरिडोर उत्तर भारत के सफर की पूरी तस्वीर बदलने के लिए तैयार है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली को धार्मिक पर्यटन के दो सबसे बड़े केंद्रों—माता वैष्णो देवी (कटरा) और श्री हरमंदिर साहिब (अमृतसर)—से जोड़ने वाला यह एक्सप्रेसवे न केवल समय की भारी बचत करेगा बल्कि राष्ट्रीय राजमार्ग-44 (पुराने जीटी रोड) पर लगने वाले भीषण जाम से भी मुसाफिरों को हमेशा के लिए राहत दिलाएगा।दिल्ली से कटरा 6 घंटे और अमृतसर केवल 4 घंटे: सफर का नया दौरवर्तमान समय में दिल्ली से कटरा जाने के लिए यात्रियों को पुराने रूट (लगभग 727 किलोमीटर) से 12 से 14 घंटे तक का लंबा और थकाऊ सफर तय करना पड़ता है। इसी तरह दिल्ली से अमृतसर की दूरी तय करने में लगभग 8 घंटे लग जाते हैं। नए दिल्ली-अमृतसर-कटरा एक्सप्रेसवे के पूरी तरह चालू होने के बाद दिल्ली से कटरा की दूरी घटकर लगभग 588 किलोमीटर रह जाएगी और यह सफर महज 6 से 7 घंटे में पूरा हो सकेगा। वहीं दिल्ली से अमृतसर का 405 किलोमीटर का फासला केवल 4 घंटे में तय किया जा सकेगा। 120 किलोमीटर प्रति घंटे की डिजाइन स्पीड वाले इस हाई-स्पीड कॉरिडोर से लाखों श्रद्धालुओं और पर्यटकों का समय आधा हो जाएगा।रूट मैप और राज्यों का नेटवर्क: हरियाणा, पंजाब और जम्मू-कश्मीर का संगमयह मेगा एक्सप्रेसवे दिल्ली के पास बहादुरगढ़ बॉर्डर और कुंडली-मानेसर-पलवल (KMP) एक्सप्रेसवे के पास निलोठी गांव से शुरू होता है। यह कॉरिडोर तीन राज्यों हरियाणा, पंजाब और जम्मू-कश्मीर के प्रमुख जिलों को आपस में जोड़ता है:हरियाणा: यह खंड लगभग 135 किमी लंबा है, जो झज्जर, रोहतक, सोनीपत, जींद, करनाल, कैथल और अंबाला से होकर गुजरता है।पंजाब: पंजाब में यह पटियाला, संगरूर, लुधियाना, जालंधर, कपूरथला, तरनतारन, अमृतसर और गुरदासपुर को कवर करता है। नकोदर के पास यह मुख्य मार्ग दो हिस्सों में बंटता है।अमृतसर स्पर (NE-5A): नकोदर से 99 किलोमीटर लंबा एक अलग ग्रीनफील्ड स्पर सीधे अमृतसर के श्री गुरु रामदास जी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे तक जाता है।जम्मू और कश्मीर (NE-5): मुख्य मार्ग गुरदासपुर और पठानकोट से आगे बढ़ते हुए कठुआ, सांबा, जम्मू रिंग रोड होते हुए त्रिकुटा पर्वत की तलहटी में बसे कटरा तक पहुंचता है।आधुनिक इंजीनियरिंग, ब्यास नदी पर केबल-स्टेड ब्रिज और हाई-टेक सुविधाएंयह 4-लेन का एक्सप्रेसवे है, जिसे भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए 8-लेन तक विस्तार योग्य डिजाइन किया गया है। जम्मू-कश्मीर और पंजाब के बॉर्डर क्षेत्र में शिवालिक की पहाड़ियों के बीच यह परियोजना इंजीनियरिंग का एक अनूठा उदाहरण पेश करती है। परियोजना के सबसे प्रमुख आकर्षणों में ब्यास नदी पर बनने वाला करीब 1,300 मीटर लंबा भव्य केबल-स्टेड ब्रिज (Cable-Stayed Bridge) और शिवालिक रेंज में बनाई जा रही अत्याधुनिक सुरंगे शामिल हैं। यात्रियों की सुरक्षा और सहूलियत के लिए पूरे रूट पर वे-साइड एमिनिटीज (Wayside Amenities), ट्रॉमा सेंटर, एंबुलेंस, फायर ब्रिगेड स्टेशन, हाई-टेक ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम, ट्रक ले-बाय और जीपीएस-आधारित ऑटोमैटिक टोल प्लाजा की व्यवस्था की जा रही है।व्यापार, लॉजिस्टिक्स और धार्मिक पर्यटन को मिलेगा अभूतपूर्व बढ़ावाभारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) द्वारा विकसित किया जा रहा यह कॉरिडोर केवल आवागमन का साधन नहीं बल्कि उत्तर भारत का आर्थिक गलियारा बनेगा। पंजाब के औद्योगिक हब जैसे लुधियाना और जालंधर सीधे दिल्ली एनसीआर के बाजारों और बंदरगाहों से तेजी से जुड़ सकेंगे। कृषि उत्पादों, होजरी और मैन्युफैक्चरिंग गुड्स की ढुलाई तेज होने से लॉजिस्टिक्स लागत में भारी गिरावट आएगी। इसके साथ ही वैष्णो देवी, स्वर्ण मंदिर, तरनतारन साहिब और गोइंदवाल साहिब जैसे विश्व प्रसिद्ध तीर्थस्थलों की यात्रा बेहद सुगम हो जाने से होटल, टूरिज्म, ट्रांसपोर्ट और स्थानीय रोजगार को जबरदस्त गति मिलेगी।चरणबद्ध तरीके से खुल रहा कॉरिडोर: जानिए कब तक पूरा होगा पूरा प्रोजेक्टपरियोजना को दो मुख्य चरणों और 21 पैकेजों में विभाजित कर तैयार किया जा रहा है। हरियाणा के भीतर 135 किमी का हिस्सा काफी हद तक पूरा होकर संचालन स्थिति में पहुंच चुका है, जबकि पंजाब और जम्मू-कश्मीर के पैकेजों पर निर्माण कार्य तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है। भूमि अधिग्रहण और पहाड़ी भौगोलिक चुनौतियों के समाधान के साथ ही राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण इस समूचे 670 किलोमीटर लंबे एक्सप्रेसवे को पूरी तरह से जनता के लिए समर्पित करने के लक्ष्य की ओर अग्रसर है। इसके पूरी तरह शुरू होते ही दिल्ली से माता के दरबार कटरा तक का सड़क सफर किसी हवाई यात्रा की रफ्तार और आराम जैसा अनुभव देगा।

न्यूज़ इंडिया लाइव 27 Sep 2026 9:00 pm

मध्य प्रदेश के युवाओं के लिए खुशखबरी! इस साल 1 लाख पदों पर होंगी सरकारी भर्तियां, जानिए सरकार का पूरा प्लान

अगर आप सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे हैं तो आपके लिए अच्छी खबर है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने शनिवार को कहा कि राज्य सरकार इस साल बड़ी संख्या में सरकारी भर्तियां करने की तैयारी में है। सरकार की योजना करीब एक लाख युवाओं को सरकारी नौकरी देने की है। मुख्यमंत्री ने कहा कि ये कदम राज्य के युवाओं को रोजगार के बेहतर अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में उठाया जा रहा है।85 हजार से ज्यादा सरकारी पदों पर होगी भर्तीइंदौर में हिंदू इकोनॉमिक फोरम के एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री मोहन यादव ने बताया कि पिछले ढाई साल में राज्य के अलग-अलग विभागों में 85 हजार से ज्यादा सरकारी पदों पर भर्ती की गई है। उन्होंने कहा कि सरकार रोजगार के अवसर बढ़ाने पर लगातार काम कर रही है और इसी क्रम में इस साल करीब एक लाख और सरकारी पदों पर युवाओं की भर्ती की जाएगी।मुख्यमंत्री ने निवेशकों से की अपीलमुख्यमंत्री मोहन यादव ने निवेशकों से मध्य प्रदेश में उद्योग लगाने की अपील की। उन्होंने कहा कि राज्य में कारोबार के लिए अनुकूल माहौल है और बिजली की लागत भी कम है। सरकार के पास करीब एक लाख एकड़ का लैंड बैंक है। उन्होंने बताया कि ऊर्जा, खनन और फूड प्रोसेसिंग जैसे क्षेत्रों में निवेश की अच्छी संभावनाएं हैं। मुख्यमंत्री ने बताया कि पिछले ढाई साल में मध्य प्रदेश सरकार ने निवेशकों के साथ करीब 35 लाख करोड़ रुपये के समझौते किए हैं। ये समझौते ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट और अन्य कार्यक्रमों के दौरान हुए। उन्होंने कहा कि इनमें से करीब 33 प्रतिशत निवेश प्रस्तावों को जमीन पर उतारने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।सीएम ने क्या कहामुख्यमंत्री मोहन यादव ने बताया कि मध्य प्रदेश सरकार राज्य से अंतरराष्ट्रीय हवाई सेवाएं बढ़ाने के लिए एयरलाइंस को आर्थिक सहायता दे रही है। इसी नीति के तहत जुलाई में इंदौर से अबू धाबी के लिए सीधी उड़ान शुरू की गई। वहीं, अगले महीने भोपाल से शारजाह के लिए भी फ्लाइट शुरू करने की तैयारी है। कार्यक्रम के दौरान मोहन यादव ने ‘हिंदुत्व’ को देश की संस्कृति, जीवनशैली और मूल्यों से जुड़ी अवधारणा बताया। उन्होंने कहा कि यह लोगों को एक-दूसरे से जोड़ने की भावना को दर्शाता है। अपने विरोधियों पर टिप्पणी करते हुए यादव ने कहा कि ‘हिंदुत्व’ शब्द से कुछ लोगों को परेशानी होती है।Delhi-Amritsar-Katra Expressway: दिल्ली से कटरा सिर्फ 6 घंटे और अमृतसर 4 घंटे में! 680 KM का ये एक्सप्रेसवे बदल देगा सफर का अंदाज, ₹39,000 करोड़ से बन रहा मेगा कॉरिडोर

ज़ी न्यूज़ 27 Sep 2026 2:44 pm

Delhi-Amritsar-Katra Expressway: दिल्ली से कटरा सिर्फ 6 घंटे और अमृतसर 4 घंटे में! 680 KM का ये एक्सप्रेसवे बदल देगा सफर का अंदाज, ₹39,000 करोड़ से बन रहा मेगा कॉरिडोर

Delhi-Amritsar-Katra Expressway:देश की राजधानी दिल्ली से जम्मू-कश्मीर तक हाई-स्पीड कनेक्टिविटी का नया रास्ता तैयार हो रहा है। चार लेन के एक्सेस-कंट्रोल्ड दिल्ली-अमृतसर-कटरा एक्सप्रेसवे से सफर का समय करीब आधा करने का लक्ष्य है। यह कॉरिडोर धार्मिक पर्यटन के साथ-साथ कारोबार, लॉजिस्टिक्स और माल ढुलाई को भी नई रफ्तार देगा। इसी कड़ी में दिल्ली-अमृतसर-कटरा एक्सप्रेसवे उत्तर भारत के सबसे महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स साबित होने वाला है। करीब 680 किलोमीटर लंबे इस एक्सेस-कंट्रोल्ड ग्रीनफील्ड कॉरिडोर का मकसद दिल्ली को हरियाणा, पंजाब और जम्मू-कश्मीर से तेज सड़क कनेक्टिविटी देना है।न्यूज 18 के मुताबिक, प्रोजेक्ट की शुरुआती आधिकारिक जानकारी में इसकी लंबाई 669 किलोमीटर और लागत करीब ₹37,524 करोड़ बताई गई थी। जबकि NHAI के बाद के दस्तावेजों में इसकी लंबाई करीब 680 किलोमीटर बताई जा रही है। 2022 के NHAI दस्तावेज में लागत करीब ₹39,500 करोड़ बताई गई थी। इसलिए अलग-अलग स्रोतों में आंकड़ों में थोड़ा अंतर दिखाई देता है।दिल्ली से कटरा का सफर 14 घंटे से घटकर करीब 6 घंटेइस एक्सप्रेसवे की सबसे बड़ी खासियत इसका संभावित ट्रैवल टाइम सेविंग है। NHAI के प्रोजेक्ट लक्ष्य के मुताबिक, एक्सप्रेसवे पूरी तरह तैयार और संबंधित कनेक्टिविटी चालू होने के बाद दिल्ली से कटरा की यात्रा करीब 14 घंटे से घटकर लगभग 6 घंटे रह सकती है। इसी तरह दिल्ली से अमृतसर जाने में लगने वाला समय करीब 8 घंटे से घटकर लगभग 4 घंटे होने का लक्ष्य है। यानी लंबी दूरी की सड़क यात्रा में समय की बड़ी बचत हो सकती है।हालांकि, ये आंकड़े प्रोजेक्ट के पूरे कॉरिडोर के चालू होने पर अनुमानित यात्रा समय हैं। अभी पूरे दिल्ली-कटरा कॉरिडोर पर लगातार बिना रुकावट यात्रा संभव नहीं है, क्योंकि कुछ हिस्सों पर निर्माण और पैकेज स्तर का काम जारी है।चार राज्यों/क्षेत्रों को जोड़ेगा हाई-स्पीड कॉरिडोरदिल्ली-अमृतसर-कटरा एक्सप्रेसवे का रूट दिल्ली से शुरू होकर हरियाणा, पंजाब और जम्मू-कश्मीर तक जाता है। यह कई महत्वपूर्ण शहरों और आर्थिक केंद्रों को बेहतर सड़क नेटवर्क से जोड़ने के लिए तैयार किया जा रहा है। सरकारीप्रोजेक्ट डॉक्यूमेंट्समें दिल्ली, रोहतक, सोनीपत, संगरूर, पटियाला, जालंधर, लुधियाना, मोहाली, कपूरथला और जम्मू जैसे प्रमुख आर्थिक केंद्रों से कनेक्टिविटी का उल्लेख है। इसके अलावा यह कई औद्योगिक और कृषि क्षेत्रों को भी राष्ट्रीय राजधानी से जोड़ने में मदद करेगा।NH-44 पर ट्रैफिक का दबाव होगा कमदिल्ली से पंजाब और जम्मू-कश्मीर जाने वाले यातायात का बड़ा हिस्सा मौजूदानेशनल हाईवे नेटवर्क पर निर्भर करता है। नया एक्सप्रेसवे लंबी दूरी के ट्रैफिक के लिए वैकल्पिक हाई-स्पीड कॉरिडोर उपलब्ध कराएगा। एक्सेस-कंट्रोल्ड डिजाइन का मतलब है कि रास्ते मेंअवैध एंट्री औरएग्जिटको सीमित किया जाएगा। इससे लंबी दूरी के वाहनों की गति और ट्रैफिक मैनेजमेंट बेहतर रखने में मदद मिल सकती है।धार्मिक पर्यटन को भी मिलेगी बड़ी रफ्तार इस एक्सप्रेसवे को सिर्फ सड़क परियोजना नहीं, बल्कि 'कॉमर्स और आस्था' को जोड़ने वाला कॉरिडोर भी माना जा रहा है। एक तरफ दिल्ली है, जहां बड़ी संख्या में धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल हैं। दूसरी तरफ पंजाब का अमृतसर, जहां स्वर्ण मंदिर देश-दुनिया से आने वाले श्रद्धालुओं का प्रमुख केंद्र है। इसके आगे कटरा, जो माता वैष्णो देवी यात्रा का प्रमुख बेस कैंप है। NHAI ने भी इस एक्सप्रेसवे को उत्तर भारत में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने वाली परियोजना के तौर पर रेखांकित किया है। इसके जरिए वैष्णो देवी, स्वर्ण मंदिर और पंजाब-जम्मू-कश्मीर के अन्य धार्मिक स्थलों तक सड़क पहुंच आसान होने की उम्मीद है। सिर्फ यात्रियों को नहीं, कारोबार को भी होगा फायदा इस कॉरिडोर का असर पर्यटन तक सीमित रहने की उम्मीद नहीं है। दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और जम्मू-कश्मीर कृषि, उद्योग और व्यापार के लिहाज से महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं। तेज सड़क कनेक्टिविटी से फल, सब्जियां, कृषि उत्पाद, कपड़ा, ऊनी उत्पाद और अन्य सामान तेजी से बड़े बाजारों तक पहुंचाए जा सकते हैं। इससे ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स की लागत तथा यात्रा समय में कमी आने की संभावना है। सरकारी परियोजना दस्तावेजों में सोनीपत, रोहतक, लुधियाना, जालंधर, कपूरथला, अमृतसर और जम्मू समेत कई आर्थिक केंद्रों तथा फूड, टेक्सटाइल और अन्य क्लस्टर्स से कनेक्टिविटी को परियोजना की प्रमुख विशेषताओं में शामिल किया गया है। जुलाई 2026 में कई हिस्सों का उद्घाटन इस परियोजना की दिशा में एक बड़ा कदम 17 जुलाई 2026 को हुआ, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली-अमृतसर-कटरा एक्सप्रेसवे के हरियाणा और पंजाब के कुछ तैयार हिस्सों को राष्ट्र को समर्पित किया। DD India की रिपोर्ट के अनुसार, उस अवसर पर हरियाणा में एक्सप्रेसवे के 157.92 किलोमीटर के पैकेज 1 से 5 को करीब ₹9,680 करोड़ की लागत से तैयार किए जाने के बाद समर्पित किया गया। इसके अलावा पंजाब में करीब 30.9 किलोमीटर के पैकेज-6 का भी उद्घाटन किया गया। 2026 में कई पैकेजों के पूरा होने के बावजूद पूरा कॉरिडोर अभी एक साथ चालू नहीं हुआ है। पंजाब और जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों में निर्माण कार्य जारी है। जम्मू-कश्मीर के करीब 143 किलोमीटर हिस्से को अगस्त 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य बताया गया है। एक्सप्रेसवे मेंहाईटेक ट्रैफिक सिस्टम प्रोजेक्ट में आधुनिक सड़क सुरक्षा व्यवस्था और इंटेलिजेंट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम (ITMS/ATMS) जैसीटेक्नोलॉजी के इस्तेमाल का लक्ष्य है। ऐसे सिस्टम में ट्रैफिक मॉनिटरिंग, कैमरा आधारित निगरानी, वाहन पहचान और दुर्घटना/घटना पर तेजी से प्रतिक्रिया जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय राजमार्गों और एक्सप्रेसवे पर एडवांस्ड ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम को चरणबद्ध तरीके से लागू करने की योजना बताई है। गांवों और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी फायदा एक्सप्रेसवे का फायदा केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहेगा। इसके आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में भी आर्थिक गतिविधियां बढ़ने की संभावना है। बेहतर कनेक्टिविटी से वेयरहाउस, लॉजिस्टिक्स, होटल, ढाबे, परिवहन, स्थानीय बाजार और पर्यटन सेवाओं को बढ़ावा मिल सकता है। धार्मिक पर्यटन बढ़ने पर अमृतसर, पंजाब और जम्मू-कश्मीर के कई इलाकों में स्थानीय कारोबार को भी फायदा मिलने की उम्मीद है।

ज़ी न्यूज़ 27 Sep 2026 1:50 pm

Neem Karoli Baba Death Anniversary: जानिए Lakshman Narayan Sharma के Neem Karoli Baba बनने का सफर

नीम करौली बाबा का नाम सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी बड़ी श्रद्धा के साथ लिया जाता है। आज ही के दिन यानी की 11 सितंबर को नीम करौली बाबा का निधन हो गया था। बाबा को एक दिव्य पुरुष, महान योगीराज और हनुमान जी का भक्त माना जाता है। वहीं नीम करौली बाबा के अनुयायी मानते हैं कि वह स्वयं हनुमान जी के अवतार थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर बाबा नीम करौली के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में... जन्म और परिवार उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के अकबरपुर गांव में करीब 1900 के आसपास नीम करौली बाबा का जन्म हुआ था। इनका असली नाम लक्ष्मी नारायण शर्मा था। महज 11 साल की उम्र में लक्ष्मी नारायण शर्मा की शादी राम बेटी से हो गई थी। लेकिन इसके बाद भी उनका मन सांसारिक जीवन में नहीं लगा और आगे जाकर उन्होंने आध्यात्मिक मार्ग अपना लिया। इसे भी पढ़ें: Guru Ramdas Death Anniversary: 30 रागों में रचे 638 शब्द, सिखों के चौथे गुरु ने कैसे रखा Amritsar का आधार कब प्राप्त हुआ ज्ञान मान्यता है कि नीम करौली बाबा को महज 17 साल की उम्र में ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। उन्होंने साधु जीवन अपनाने के लिए घर छोड़ दिया था। लेकिन पिता और परिवार के आग्रह पर वह वापस वैवाहिक जीवन में लौट आए थे। गांव के निर्विरोध प्रधान रहे बाबा बताया जाता है कि वह अपने गांव में करीब 40 सालों तक निर्विरोध ग्राम प्रधान रहे थे। साधारण जीवन जीने के बाद वह आध्यात्मिक गुरु के रूप में प्रसिद्ध होते चले गए। धीरे-धीरे देश के अलग-अलग हिस्सों में उनकी लोकप्रियता फैलती चली गई और उनके अनुयायियों की संख्या बढ़ती चली गई। ऐसे पड़ा 'नीम करौली' नाम लक्ष्मी नारायण शर्मा के नाम से जुड़ी सबसे चर्चित कहानियों में एक नीब करौरी गांव की घटना है। माना जाता है कि एक बार बाबा ट्रेन में सवार होकर जा रहे थे, लेकिन उन्होंने टिकट नहीं लिया था, जिस कारण उनको ट्रेन से उतार दिया गया था। जिसके बाद ट्रेन आगे नहीं बढ़ी। जब बाबा को वापस ट्रेन में बैठाया गया, तो ट्रेन चल पड़ी। इसी घटना के बाद उनका नाम नीब करौरी बाबा के रूप में जाना जाने लगा। कैंची धाम बाबा नीम करौली का सबसे प्रसिद्ध आश्रम कैंची धाम है। साल 1964 में नैनीताल जिले के भवाली के पास क्षिप्रा नदी के किनारे नीम करौली बाबा ने कैंची धाम की स्थापना की थी। देश-विदेश में कैंची धाम बाबा के भक्तों के लिए प्रमुख आस्था का केंद्र बन चुका है। हर साल 15 जून को कैंची धाम स्थापना दिवस मनाया जाता है। बाबा के दरबार पहुंची जानी-मानी हस्तियां कैंची धाम की प्रसिद्धि सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं है। बल्कि देश दुनिया की कई जानी मानी हस्तियां भी उनसे प्रभावित रहीं। मेटा के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग, एप्पल के सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स, और भारतीय क्रिकेटर विराट कोहली का नाम बाबा नीम करौली और कैंची धाम से जुड़ी चर्चाओं में आता है। मृत्यु वहीं 11 सितंबर 1973 को नीम करौली बाबा वृंदावन में ब्रह्मलीन हुए थे। आज भारत समेत कई देशों में बाबा नीम करौली के आश्रम और मंदिर हैं।

प्रभासाक्षी 11 Sep 2026 1:04 pm

Vinoba Bhave Birth Anniversary: काशी से Wardha तक, जानिए कैसे विनायक भावे बने भूदान आंदोलन के Saint Vinoba

आज ही के दिन यानी की 11 सितंबर को विनोबा भावे का जन्म हुआ था। विनोबा भावे महात्मा गांधी की विरासत को आगे ले जाने का काम करते दिखाई दिए। वह एक स्वतंत्रता सेनानी होने के अलावा प्रसिद्ध गांधीवादी समाज सुधारक नेता भी थे। विनोबा भावे को भूदान आंदोलन से पूरी दुनिया में बड़ी पहचान मिली थी। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर विनोबा भावे के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में... जन्म और परिवार महाराष्ट्र के कोंकण इलाके के गागोदा गांव में 11 सितंबर 1895 को विनोबा भावे का जन्म हुआ था। इनका असली नाम विनायक नरहरि भावे था। यह ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखते थे। इनकी मां रुकमणी बाई एक विदूषी महिला थीं। वहीं विनोबा भावे पर अपनी मां का गहरा प्रभाव था। विनोबा को अपनी मां से ही ईश्वर के प्रति आस्था और आध्यात्म के प्रति झुकाव मिला था। वहीं पिता से विज्ञान, गणित और अलग विलक्षण सोच और तार्किता मिली थी। आध्यात्मिक यात्रा विनोबा भावे परीक्षा देने के लिए मुंबई जाने वाली रेलगाड़ी में तो बैठे, लेकिन उनका मन वैराग्य में रमा हुआ था। ऐसे में वह बीच में ही दूसरी गाड़ी में बैठकर आध्यात्मिक यात्रा पर हिमालय की ओर निकल पड़े। वह ज्ञान की तलाश में बहुत भटके। वह काशी में भी लंबे समय तक रहे। वहीं समाचार पत्रों में महात्मा गांधी के बारे में पढ़कर उनको ऐसा लगा कि गांधीजी उनके लिए मार्गदर्शक हो सकते हैं। उस दौरान महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से लौटे थे। उन्होंने महात्मा गांधी को पत्र लिखा और जवाब में आमंत्रण मिलने पर वह फौरन अहमदाबाद रवाना हो लिए। इसे भी पढ़ें: Guru Ramdas Death Anniversary: 30 रागों में रचे 638 शब्द, सिखों के चौथे गुरु ने कैसे रखा Amritsar का आधार गांधीजी से मुलाकात महात्मा गांधी और विनोबा भावे की पहली मुलाकात 07 जून 1916 में हुई थी। दोनों ही पहली मुलाकात के बाद एक-दूसरे के मुरीद हो गए। इसके बाद विनोबा भावे ने खुद को महात्मा गांधी के आश्रम के लिए समर्पित कर दिया। जब गांधीजी को लगा कि वह अहमदाबाद या कहीं और कितना भी बड़ा आश्रम बना लें। देशभर में अहिंसक सैनिक तैयार नहीं हो सकेंगे। ऐसे में उन्होंने विनोबा भावे को वर्धा भेजा, जहां पर महाराष्ट्र धर्म नाम से मराठी में प्रकाशित होने वाली उनकी पत्रिका काफी लोकप्रिय हुई थी। संत और आचार्य के रूप में जाने गए विनोबा भावे देश की आजादी तक विनोबा भावे संत और आचार्य के रूप में पहचान मिली थी। महात्मा गांधी के निधन के बाद उन्होंने गांधीजी की विरासत को कायम रखा। लेकिन वह अपने स्वभाव के मुताबिक इसको आध्यात्मिक रूप से ही आगे बढ़ाते रहे। साल 1951 में महाराष्ट्र में भूदान आंदोलन ने विनोबा भावे को दुनियाभर में मशहूर कर दिया था। यह एक स्वैच्छिक सुधार आंदोलन था, जिसमें रचनात्मक कार्यों और विचारों के प्रयोग से सामाजिक स्तर पर बदलाव की कोशिश की गई। उन्होंने सर्वोदय समाज की स्थापना की और आजादी के बाद अपना जीवन वर्धा के ब्रह्म विद्या मंदिर आश्रम में गुजारा। मृत्यु वहीं 15 नवंबर 1982 को अन्न जल त्याग कर विनोबा भाने ने समाधि मरण को अपना लिया।

प्रभासाक्षी 11 Sep 2026 12:48 pm

Mother Teresa Death Anniversary: मदर टेरेसा का कोलकाता की झुग्गियों से लेकर Nobel Prize तक का ऐतिहासिक सफर

आज ही के दिन यानी की 05 सितंबर को मदर टेरेसा का निधन हो गया था। उन्होंने अपना पूरी जीवन दीन-दुखियों की सेवा में लगा दिया था। वह बीमार, अनाथ, गरीब, असहाय लोगों की मदद और सेवा किया करती थीं। वह 19 साल की उम्र में भारत आ गई थीं। वह पहले शिक्षिका बनीं और फिर बाद में गरीबों और असहायों की सेवा और मदद करने लगीं। वहीं सेवा कार्यों के लिए उनको नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा गया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर मदर टेरेसा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में... जन्म और परिवार यूगोस्लाविया में 26 अगस्त 1910 को मदर टेरेसा का जन्म हुआ था। इनका असली नाम नाम एग्नेस गोंझा बोयाजिजू था। वहीं 18 साल की उम्र में वह दीक्षा लेकर सिस्टर टेरेसा बनी थीं। इसे भी पढ़ें: Guru Ramdas Death Anniversary: 30 रागों में रचे 638 शब्द, सिखों के चौथे गुरु ने कैसे रखा Amritsar का आधार जब भारत आईं मदर टेरेसा साल 1929 में मदर टेरेसा भारत आईं और अध्यापन का कार्य करने लगी। वहीं कोलकाला में पढ़ाने के दौरान उन्होंने लोगों की गरीबी को देखा और कच्ची बस्तियों में जाकर सेवा कार्य करने लगीं। वहीं सेवा कार्य के लिए मदर टेरेसा ने 07 अक्तूबर 1950 को मिशनरीज ऑफ चैरिटी की स्थापना की। इसके जरिए वह लंबे समय तक बीमार, गरीब और अनाथ लोगों की सेवा में जुटी रहीं। वहीं साल 1948 में मदर टेरेसा ने स्वेच्छा से भारत की नागरिकता ग्रहण की। उन्होंने अपनी मिशनरीज के जरिए उस दौरान समाज से बहिष्कृत समझे जाने वाले तपेदिक और कुष्ठ रोगियों की सेवा की। नोबेल शांति पुरस्कार मदर टेरेसा के सेवा कार्यों को देखते हुए साल 1979 में उनको नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। लेकिन उन्होंने प्राइज मनी लेने से इंकार कर दिया और इसको भारत के गरीब लोगों में दान करने के लिए कहा। साल 1980 में भारत सरकार द्वारा मदर टेरेसा को सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किया। इसके अलावा रोमन कैथोलिक चर्च ने भी उनको कलकत्ता की संत टेरेसा के नाम से नवाजा। मृत्यु वहीं 05 सितंबर 1997 को दिल का दौरा पड़ने से मदर टेरेसा निधन हो गया था।

प्रभासाक्षी 5 Sep 2026 11:36 am