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Amritsar News: केंद्रीय जेल में बंद हवालाती गौरव की संदिग्ध हालत में मौत, जांच शुरू

Gaurav, an undertrial prisoner lodged in the central jail, dies under suspicious circumstances; investigation launched

अमर उजाला 22 Sep 2026 1:43 am

Amritsar News: विदेशों से लौटे युवाओं के भविष्य पर भाकियू लक्खोवाल चिंतित

BKU Lakhowal concerned about the future of youths returning from abroad

अमर उजाला 22 Sep 2026 1:43 am

Amritsar News: श्री गुरु नानक देव जी के विवाह पर्व पर भारी संख्या में संगत हुई नतमस्तक

A large number of devotees paid their obeisance on the occasion of the wedding anniversary of Sri Guru Nanak Dev Ji

अमर उजाला 19 Sep 2026 1:43 am

Neem Karoli Baba Death Anniversary: जानिए Lakshman Narayan Sharma के Neem Karoli Baba बनने का सफर

नीम करौली बाबा का नाम सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी बड़ी श्रद्धा के साथ लिया जाता है। आज ही के दिन यानी की 11 सितंबर को नीम करौली बाबा का निधन हो गया था। बाबा को एक दिव्य पुरुष, महान योगीराज और हनुमान जी का भक्त माना जाता है। वहीं नीम करौली बाबा के अनुयायी मानते हैं कि वह स्वयं हनुमान जी के अवतार थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर बाबा नीम करौली के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में... जन्म और परिवार उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के अकबरपुर गांव में करीब 1900 के आसपास नीम करौली बाबा का जन्म हुआ था। इनका असली नाम लक्ष्मी नारायण शर्मा था। महज 11 साल की उम्र में लक्ष्मी नारायण शर्मा की शादी राम बेटी से हो गई थी। लेकिन इसके बाद भी उनका मन सांसारिक जीवन में नहीं लगा और आगे जाकर उन्होंने आध्यात्मिक मार्ग अपना लिया। इसे भी पढ़ें: Guru Ramdas Death Anniversary: 30 रागों में रचे 638 शब्द, सिखों के चौथे गुरु ने कैसे रखा Amritsar का आधार कब प्राप्त हुआ ज्ञान मान्यता है कि नीम करौली बाबा को महज 17 साल की उम्र में ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। उन्होंने साधु जीवन अपनाने के लिए घर छोड़ दिया था। लेकिन पिता और परिवार के आग्रह पर वह वापस वैवाहिक जीवन में लौट आए थे। गांव के निर्विरोध प्रधान रहे बाबा बताया जाता है कि वह अपने गांव में करीब 40 सालों तक निर्विरोध ग्राम प्रधान रहे थे। साधारण जीवन जीने के बाद वह आध्यात्मिक गुरु के रूप में प्रसिद्ध होते चले गए। धीरे-धीरे देश के अलग-अलग हिस्सों में उनकी लोकप्रियता फैलती चली गई और उनके अनुयायियों की संख्या बढ़ती चली गई। ऐसे पड़ा 'नीम करौली' नाम लक्ष्मी नारायण शर्मा के नाम से जुड़ी सबसे चर्चित कहानियों में एक नीब करौरी गांव की घटना है। माना जाता है कि एक बार बाबा ट्रेन में सवार होकर जा रहे थे, लेकिन उन्होंने टिकट नहीं लिया था, जिस कारण उनको ट्रेन से उतार दिया गया था। जिसके बाद ट्रेन आगे नहीं बढ़ी। जब बाबा को वापस ट्रेन में बैठाया गया, तो ट्रेन चल पड़ी। इसी घटना के बाद उनका नाम नीब करौरी बाबा के रूप में जाना जाने लगा। कैंची धाम बाबा नीम करौली का सबसे प्रसिद्ध आश्रम कैंची धाम है। साल 1964 में नैनीताल जिले के भवाली के पास क्षिप्रा नदी के किनारे नीम करौली बाबा ने कैंची धाम की स्थापना की थी। देश-विदेश में कैंची धाम बाबा के भक्तों के लिए प्रमुख आस्था का केंद्र बन चुका है। हर साल 15 जून को कैंची धाम स्थापना दिवस मनाया जाता है। बाबा के दरबार पहुंची जानी-मानी हस्तियां कैंची धाम की प्रसिद्धि सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं है। बल्कि देश दुनिया की कई जानी मानी हस्तियां भी उनसे प्रभावित रहीं। मेटा के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग, एप्पल के सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स, और भारतीय क्रिकेटर विराट कोहली का नाम बाबा नीम करौली और कैंची धाम से जुड़ी चर्चाओं में आता है। मृत्यु वहीं 11 सितंबर 1973 को नीम करौली बाबा वृंदावन में ब्रह्मलीन हुए थे। आज भारत समेत कई देशों में बाबा नीम करौली के आश्रम और मंदिर हैं।

प्रभासाक्षी 11 Sep 2026 1:04 pm

Mother Teresa Death Anniversary: मदर टेरेसा का कोलकाता की झुग्गियों से लेकर Nobel Prize तक का ऐतिहासिक सफर

आज ही के दिन यानी की 05 सितंबर को मदर टेरेसा का निधन हो गया था। उन्होंने अपना पूरी जीवन दीन-दुखियों की सेवा में लगा दिया था। वह बीमार, अनाथ, गरीब, असहाय लोगों की मदद और सेवा किया करती थीं। वह 19 साल की उम्र में भारत आ गई थीं। वह पहले शिक्षिका बनीं और फिर बाद में गरीबों और असहायों की सेवा और मदद करने लगीं। वहीं सेवा कार्यों के लिए उनको नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा गया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर मदर टेरेसा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में... जन्म और परिवार यूगोस्लाविया में 26 अगस्त 1910 को मदर टेरेसा का जन्म हुआ था। इनका असली नाम नाम एग्नेस गोंझा बोयाजिजू था। वहीं 18 साल की उम्र में वह दीक्षा लेकर सिस्टर टेरेसा बनी थीं। इसे भी पढ़ें: Guru Ramdas Death Anniversary: 30 रागों में रचे 638 शब्द, सिखों के चौथे गुरु ने कैसे रखा Amritsar का आधार जब भारत आईं मदर टेरेसा साल 1929 में मदर टेरेसा भारत आईं और अध्यापन का कार्य करने लगी। वहीं कोलकाला में पढ़ाने के दौरान उन्होंने लोगों की गरीबी को देखा और कच्ची बस्तियों में जाकर सेवा कार्य करने लगीं। वहीं सेवा कार्य के लिए मदर टेरेसा ने 07 अक्तूबर 1950 को मिशनरीज ऑफ चैरिटी की स्थापना की। इसके जरिए वह लंबे समय तक बीमार, गरीब और अनाथ लोगों की सेवा में जुटी रहीं। वहीं साल 1948 में मदर टेरेसा ने स्वेच्छा से भारत की नागरिकता ग्रहण की। उन्होंने अपनी मिशनरीज के जरिए उस दौरान समाज से बहिष्कृत समझे जाने वाले तपेदिक और कुष्ठ रोगियों की सेवा की। नोबेल शांति पुरस्कार मदर टेरेसा के सेवा कार्यों को देखते हुए साल 1979 में उनको नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। लेकिन उन्होंने प्राइज मनी लेने से इंकार कर दिया और इसको भारत के गरीब लोगों में दान करने के लिए कहा। साल 1980 में भारत सरकार द्वारा मदर टेरेसा को सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किया। इसके अलावा रोमन कैथोलिक चर्च ने भी उनको कलकत्ता की संत टेरेसा के नाम से नवाजा। मृत्यु वहीं 05 सितंबर 1997 को दिल का दौरा पड़ने से मदर टेरेसा निधन हो गया था।

प्रभासाक्षी 5 Sep 2026 11:36 am

Guru Ramdas Death Anniversary: 30 रागों में रचे 638 शब्द, सिखों के चौथे गुरु ने कैसे रखा Amritsar का आधार

सिख धर्म के चौथे गुरु, गुरु रामदास का का 01 सितंबर को निधन हो गया था। वह सिख धर्म के चौथे गुरु थे। उन्होंने चार उपमाओं की रचना करके सिख धर्म को अधिक मजबूत करने का कार्य किया था। गुरु रामदास जी सात वर्षों तक सिखों के गुरु रहे थे। वह 01 सितंबर 1574 को सिखों के चौथे गुरु बने थे। इसके अलावा गुरु रामदास ने अमृतसर शहर बसाया था। इस शहर को पहले रामदासपुर के नाम से जाना जाता था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी पर गुरु रामदास के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में जन्म और परिवार चूना मंडी में 24 सितंबर 1534 को गुरु रामदास का जन्म हुआ था। यह जगह वर्तमान समय में पाकिस्तान के लाहौर में है। इनके पिता का नाम हरिदास मल सोढी और मां का नाम अनूप देवी था। इनका असली नाम जेठा जी था। जब उनको गुरु पद मिला, तो उनको रामदास नाम मिला। इनके माता-पिता की मृत्यु बचपन में ही हो गई थी। जिसके बाद इनका पालन-पोषण नानी ने किया था। इसे भी पढ़ें: Bal Gangadhar Tilak Death Anniversary: पत्रकारिता के जरिए ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिलाने वाले Bal Gangadhar Tilak तीसरे सिख गुरु से मिले जब जेठाजी अपनी नानी के पास रहते थे, तो वह पहली बार सिखों के तीसरे नानक, गुरु अमर दास से मिले थे। इस मुलाकात के दौरान वह इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने नानक अमरदास के पास रहकर उनकी सेवा का विचार बना लिया। वहीं गुरु अमरदास ने अपनी छोटी बेटी का विवाह रामदास से कराया था। इसी दौरान जब गुरु अमरदास को यह एहसास हुआ कि उनको अब सिखों के अगले गुरु का चयन करना चाहिए, तो उन्होंने गुरु रामदास की परीक्षा ली। इस परीक्षा में गुरु रामदास सफल हुए। गुरु गद्दी पर बैठे रामदास जिसके बाद गुरु अमरदास ने बाबा बूढ़ा जी से रामदास का तिलक कराया और गुरुगद्दी सौंपी। इसके बाद गुरु अमरदास ने जेठा जी को संगत से परिचित कराते हुए बताया कि यह सिखों के चौथे गुरु, गुरु रामदास हैं। अमृतसर शहर बसाया गुरु गद्दी पर बैठने के बाद रामदास ने सिख संगत की भलाई के लिए अनेकों कार्य किए थे। उन्होंने चक रामदास पुर नामक नगर बसाया। जिसको आज के समय में हम सभी अमृतसर शहर के नाम से जानते हैं। इसके अलावा उन्होंने नगर के बीचोबीच एक बड़े जल सरोवर का निर्माण कराया था। गुरु रामदास ने 'आनंद कारज' यानी की सिखों के विवाह में पढ़े जाने वाले फेरों की रचना की। गुरु रामदास ने बताया कि अब से आनंद कारज की मर्यादा के तहत ही सिख विवाह किए जाएंगे। गुरु रामदास ने अपने पूरे जीवनकाल में 30 राहों में 638 शब्द लिखे। जिनमें 246 पौउड़ी, 136 श्लोक, 31 अष्टपदी और 8 वारां है। इन सभी को गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल किया गया। मृत्यु वहीं 01 सितंबर 1581 को पंजाब के गोइंदवाल साहिब में सिखों के चौथे गुरु, गुरु रामदास का निधन हो गया।

प्रभासाक्षी 1 Sep 2026 6:59 pm