इराक में IS से जुड़े 7 फ्रांसीसी नागरिकों को सजा, 6 को उम्रकैद
इराक की एक कोर्ट ने इस्लामिक स्टेट (IS) से संबंध और आतंकवाद के मामलों में दोषी पाए गए 7 फ्रांसीसी नागरिकों को सजा सुनाई है. इनमें छह को उम्रकैद और एक को 15 साल जेल की सजा दी गई है. ये सातों उन 47 फ्रांसीसी नागरिकों में शामिल थे, जिन्हें पहले सीरिया में हिरासत में रखा गया था और पिछले साल मुकदमे के लिए इराक लाया गया था.
यूरोप में यूपी के ‘योगी मॉडल’ पर अमल के अंतरराष्ट्रीय निहितार्थ
यूरोप में कानून-व्यवस्था, हिंसक प्रदर्शनों, संगठित अपराध और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने की घटनाओं के संदर्भ में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की शासन-शैली पर चर्चा एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक और नीतिगत विषय है। लेकिन इसका विश्लेषण करते समय एक बुनियादी सवाल समझना आवश्यक है कि क्या यूरोप को यूपी के 'योगी मॉडल' की सख्ती अपनाने की जरूरत है, या उसे उस मॉडल के कुछ चुनिंदा प्रशासनिक उपायों से सीख लेनी चाहिए? यहां पर यह बुनियादी सवाल इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि वर्ष 2017 के बाद अमेरिका-यूरोप ने योगी मॉडल की आलोचना की थी! लिहाजा, इस प्रश्न का उत्तर यूरोप की राजनीतिक व्यवस्था, मानवाधिकार संबंधी प्रतिबद्धताओं और उत्तर प्रदेश में अपनाई गई नीतियों के वास्तविक परिणामों को साथ रखकर ही दिया जा सकता है। लेकिन जब 'इस्लामिक अतिवादी' स्थानीय असंतुष्ट लोगों के साथ मिलकर यूरोप का इस्लामीकरण पर उतारू हों और ईरान का परोक्ष बरदहस्त उन्हें प्राप्त हो तो अमेरिका के बाद यूरोपीय विवशता समझी जा सकती है। इसे भी पढ़ें: Yogi Model ने Italy में मचाई धूम, दंगाइयों-उपद्रवियों से UP Style में निबटेंगी PM Giorgia Meloni सबसे पहला सवाल यह है की ‘योगी मॉडल’ से हमारा आपका क्या आशय है? तो माकूल जवाब यही होगा कि राजनीतिक विमर्श में ‘योगी मॉडल’ का प्रयोग मुख्यतः उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था को प्राथमिकता देने, अपराधियों के विरुद्ध पुलिस कार्रवाई, संगठित अपराध पर नियंत्रण, प्रशासनिक सख्ती और अवैध अतिक्रमण के विरुद्ध कार्रवाई जैसी नीतियों के लिए किया जाता है। हालाँकि, इन सभी उपायों को एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं है। अपराध की जाँच, दोषसिद्धि, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना और संपत्ति संबंधी विवादों का निपटारा अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएँ हैं। चूंकि यूपी में बेलगाम अल्पसंख्यक अपराधियों, सत्ता संरक्षित बाहुबलियों, इनसे जुड़े मनबढ़ युवाओं और शातिर अपराधियों के इशारे पर अपराध कर रहे बहुसंख्यक अपराधियों को नियंत्रित करने में यूपी के योगी मॉडल ने आशातीत सफलता प्राप्त की है, इसलिए चारो तरफ से जल रहे फ्रांस, इटली जैसे यूरोपीय देशों के पास कोई दूसरा चारा भी नहीं है। सर्वप्रथम इटली की प्रमुख और मोदी की मित्र जॉर्जिया मेलोनी ने यूपी के योगी मॉडल पर अमल करने की घोषणा की, तत्पश्चात मोदी के दूसरे मित्र फ्रांस के प्रमुख मैक्रो ने जब यूपी के योगी मॉडल की अच्छी नीतियों पर अमल करना शुरू किया तो अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार 'गैंग' सक्रिय हो गया और यूरोपीय देशों को उस नकारा लोकतंत्र की दुहाई देने लगा, जहां के बेलगाम लोग 'जुल्मी पूंजीवादी अड्डों' को फूंकने के बजाय अपने देश के सार्वजनिक जगहों, नागरिक सुविधाओं और ठिकानों को ही फूंक रहे हैं! यूरोप में इस मॉडल की चर्चा के तीन संभावित कारण हैं:- एक, कानून का प्रभावी प्रवर्तन: हिंसा, लूटपाट और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वालों के विरुद्ध त्वरित एवं निष्पक्ष कार्रवाई करना। दो, प्रशासनिक जवाबदेही: पुलिस और स्थानीय प्रशासन की तैयारी, समन्वय तथा निर्णय लेने की क्षमता में सुधार करना। तीन, राज्य की विश्वसनीयता: नागरिकों को यह भरोसा दिलाना कि शांतिपूर्ण जीवन, सार्वजनिक परिवहन और व्यापारिक गतिविधियों की सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन किसी मॉडल का प्रभाव उसके नाम या राजनीतिक लोकप्रियता से नहीं, बल्कि उसके परिणामों और कानूनी प्रक्रियाओं के पालन से मापा जाना चाहिए। दूसरा प्रासंगिक सवाल यह है कि यूरोप के लिए इसके क्या अंतरराष्ट्रीय निहितार्थ हो सकते हैं? एक, कानून-व्यवस्था की बहस में बदलाव: यदि यूरोपीय देश उत्तर प्रदेश की तरह अपराधियों के विरुद्ध कार्रवाई की गति, पुलिस-प्रशासन के समन्वय और सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा पर अधिक ध्यान देते हैं, तो उनकी आंतरिक सुरक्षा नीतियों में बदलाव आ सकता है। इससे भारत के प्रशासनिक अनुभवों में अंतरराष्ट्रीय रुचि बढ़ सकती है। दो, भारत की सॉफ्ट पावर और नीतिगत प्रतिष्ठा: भारत के किसी राज्य की प्रशासनिक नीति पर यूरोप में गंभीर चर्चा होना भारतीय संघीय व्यवस्था के अनुभवों को आंतरिक सुरक्षा नीतियों में बदलाव आ सकता है। इससे भारत के प्रशासनिक अनुभवों में अंतरराष्ट्रीय रुचि बढ़ सकती है। तीन, मानवाधिकार और कानून के शासन पर बहस: यूरोप में पुलिस कार्रवाई के साथ नागरिक स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण प्रदर्शन और न्यायिक समीक्षा का विशेष महत्त्व है। यूरोप की परिषद ने 23 अक्टूबर 2026 के आसपास जारी अपने हालिया वक्तव्य में भी शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और हिंसा करने वाले व्यक्तियों के बीच अंतर करने तथा पुलिस बल के कानूनी और आनुपातिक इस्तेमाल पर जोर दिया है। चार, भारत-यूरोप संबंधों में नई चर्चा: यदि यूरोपीय सरकारें भारतीय राज्यों के पुलिस प्रशिक्षण, डिजिटल निगरानी के कानूनी ढाँचे या प्रशासनिक समन्वय जैसे क्षेत्रों में उपयोगी अनुभव पाती हैं, तो तकनीकी सहयोग और नीतिगत संवाद के अवसर बन सकते हैं। अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिज्ञ बताते हैं कि इसे अभी एक संभावित दिशा समझना चाहिए, न कि यूरोप द्वारा योगी मॉडल स्वीकार कर लेने का प्रमाण! तीसरा अहम सवाल है कि क्या यूरोप में ‘बुलडोजर नीति’ भी अपनाई जा सकती है? तो जवाब होगा कि यहीं पर इस बहस का सबसे संवेदनशील पक्ष सामने आता है। उत्तर प्रदेश में अवैध निर्माणों के विरुद्ध कार्रवाई को लेकर ‘बुलडोजर मॉडल’ राजनीतिक विमर्श का प्रमुख हिस्सा रहा है। लेकिन अवैध निर्माण हटाना और किसी आपराधिक मामले में आरोपी व्यक्ति को दंडित करने के लिए उसकी संपत्ति गिराना, दोनों अलग बातें हैं। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 13 नवंबर 2024 को स्पष्ट किया कि केवल किसी आपराधिक मामले में आरोपी होने के आधार पर, कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना, किसी की संपत्ति गिराना असंवैधानिक है। न्यायालय ने नोटिस, सुनवाई और न्यायिक समीक्षा से जुड़े निर्देश भी दिए। लिहाजा, यूरोप में भी ऐसी किसी नीति को लागू करने के लिए स्थानीय कानून, संपत्ति अधिकार, निष्पक्ष सुनवाई और आनुपातिक कार्रवाई के मानकों का पालन आवश्यक होगा। इसलिए यूरोप के लिए संभावित सीख यह नहीं कि वह बिना कानूनी प्रक्रिया के कठोर दंडात्मक कार्रवाई अपनाए, बल्कि यह कि अवैध गतिविधियों पर कार्रवाई प्रभावी, प्रमाण-आधारित और न्यायिक समीक्षा के अधीन हो। चौथा महत्वपूर्ण सवाल है कि योगी मॉडल बनाम यूरोपीय व्यवस्था की तुलनात्मक दृष्टि क्या है? इसे हमलोग विषय दर विषय, उससे संबंधित उत्तर प्रदेश के मॉडल से जुड़ी बहस और यूरोपीय व्यवस्था की प्रमुख कसौटी के आधार पर निम्नलिखित तरीके से समझ सकते हैं:- एक, अपराध नियंत्रण- पुलिस कार्रवाई और अपराधियों पर दबाव - प्रभावी जाँच, अभियोजन और निष्पक्ष सुनवाई। दो, हिंसक भीड़- सार्वजनिक व्यवस्था बहाल करना- हिंसक व्यक्तियों पर कार्रवाई, शांतिपूर्ण प्रदर्शन की सुरक्षा। तीन, संपत्ति संबंधी कार्रवाई- अवैध निर्माण और अतिक्रमण हटाना, कानून के अनुसार नोटिस, सुनवाई और अपील। चार, पुलिस की जवाबदेही- प्रशासनिक अनुशासन और कार्रवाई- आनुपातिक बल प्रयोग, स्वतंत्र जाँच और जवाबदेही। पांच, शासन की विश्वसनीयता- नागरिक सुरक्षा और कानून का प्रवर्तन- सुरक्षा के साथ मौलिक अधिकारों का संरक्षण। यूरोप की परिषद के मानवाधिकार मानकों में पुलिस कार्रवाई के लिए आवश्यकता, आनुपातिकता और जवाबदेही पर जोर दिया जाता है। ये मानक हिंसक घटनाओं से निपटने के साथ-साथ शांतिपूर्ण सभा के अधिकार की रक्षा भी करते हैं। जहां तक अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर इसके संभावित प्रभाव की बात है तो इससे भारत की प्रशासनिक छवि मज़बूत होगी। यदि उत्तर प्रदेश की किसी नीति से अपराध नियंत्रण या पुलिस-प्रशासन के समन्वय में मापने योग्य सुधार सिद्ध होता है, तो भारत अपने अनुभवों को अंतरराष्ट्रीय नीति-चर्चाओं में प्रस्तुत कर सकता है। इससे भारतीय राज्यों के प्रशासनिक प्रयोगों पर शोध और संवाद को बढ़ावा मिल सकता है। चूंकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा और सफल लोकतंत्र है, इसलिए भारत की बातों को अनसुनी करना अन्य देशों के लिए घातक भी हो सकता है। जहां तक यूरोप में राजनीतिक ध्रुवीकरण की बात है तो कठोर कानून-व्यवस्था की नीतियों को कुछ राजनीतिक समूह सार्वजनिक सुरक्षा के लिए आवश्यक मान सकते हैं, जबकि दूसरे समूह उनके दुरुपयोग और नागरिक स्वतंत्रताओं पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर सवाल उठा सकते हैं। इसका वास्तविक प्रभाव देश, सरकार और लागू नीति के अनुसार अलग होगा। जहां तक लोकतांत्रिक शासन की परीक्षा की बात है तो किसी सरकार की क्षमता केवल हिंसा रोकने से नहीं, बल्कि निर्दोष नागरिकों की सुरक्षा, निष्पक्ष न्याय और प्रशासनिक गलतियों को सुधारने की व्यवस्था से भी मापी जाती है। यह कसौटी भारत और यूरोप, दोनों पर लागू होती है। अब प्रासंगिक सवाल है कि आख़िर यूरोप को वास्तव में किन किन पहलुओं से सीखने पर विचार करना चाहिए? तो जवाब होगा कि यूरोपीय देशों के लिए उपयोगी नीति-चर्चा पाँच बिंदुओं पर केंद्रित हो सकती है:- एक, हिंसक घटनाओं के दौरान पुलिस, अभियोजन पक्ष और स्थानीय प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना। दो, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने तथा संगठित अपराध के मामलों में साक्ष्य-आधारित जाँच और समयबद्ध न्यायिक प्रक्रिया का अनुपालन करना। तीन, हिंसक व्यक्तियों और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के बीच स्पष्ट अंतर करना और हिंसक व्यक्तियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई करना। चार, पुलिस कार्रवाई की स्वतंत्र समीक्षा और गलत कार्रवाई के लिए अधिकारियों की जवाबदेही तय करना। पांच, अपराध की रोकथाम के साथ उन सामाजिक परिस्थितियों पर भी ध्यान देना जो बार-बार हिंसा को जन्म देती हैं। फ्रांस के न्याय मंत्रालय ने जून-जुलाई 2023 की शहरी हिंसा के बाद गिरफ्तार और दोषसिद्ध व्यक्तियों की पृष्ठभूमि तथा घटनाओं के कारणों का विश्लेषण कराया था। यह उदाहरण बताता है कि हिंसक घटनाओं से निपटने के लिए केवल तत्काल पुलिस कार्रवाई नहीं, बल्कि बाद का संस्थागत विश्लेषण भी महत्त्वपूर्ण है। कोरा सवाल है कि क्या योगी मॉडल यूरोप के लिए नया प्रशासनिक विकल्प बन सकता है? तो जवाब होगा कि इस प्रश्न पर गंभीर अंतरराष्ट्रीय चर्चा संभव है, क्योंकि यूरोप ने उत्तर प्रदेश के योगी मॉडल को अपना लिया है। मुख्य बात यह है कि कठोर शासन और प्रभावी शासन एक ही चीज नहीं हैं। प्रभावी शासन वह है जो हिंसा और अपराध पर नियंत्रण रखे, नागरिकों को सुरक्षित बनाए, कानून का निष्पक्ष पालन करे और प्रशासन को भी कानून के प्रति जवाबदेह रखे। यदि उत्तर प्रदेश की किसी विशिष्ट नीति के सकारात्मक परिणाम स्वतंत्र आँकड़ों से प्रमाणित होते हैं, तो यूरोपीय देश उसकी उपयोगिता पर विचार कर सकते हैं। लेकिन नीतियों को उनके नाम या राजनीतिक छवि के आधार पर नहीं, बल्कि प्रमाण, लागत, परिणाम और मानवाधिकारों पर उनके प्रभाव के आधार पर परखना चाहिए। यही वह दृष्टिकोण है जिसके तहत ‘योगी मॉडल’ पर बहस भारत की आंतरिक राजनीति से आगे बढ़कर कानून-व्यवस्था, लोकतंत्र और अंतरराष्ट्रीय प्रशासनिक सहयोग के व्यापक प्रश्नों तक पहुँच सकती है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
सैफ अली खान का फ्रांस में पारिवारिक अवकाश, करीना और बेटों के साथ साझा कीं खास तस्वीरें
सैफ अली खान ने फ्रांस के नुई-सेंट-जॉर्ज से करीना कपूर खान, तैमूर और जेह के साथ छुट्टियों की तस्वीरें साझा कीं। बरगंडी के खूबसूरत नजारों, वाइनरी और पुस्तकालय की झलक के साथ उनके मजाकिया कैप्शन ने भी ध्यान खींचा।
बोन इंटरनेशनल, जिसकी शुरुआत 1963 में अनेजा परिवार ने की थी, भारत की एक प्रमुख शिशु उत्पाद निर्माता कंपनी है। यह कंपनी 60 से अधिक वर्षों से बेबी फीडिंग बोतलें और अन्य शिशु देखभाल उत्पाद 30 से अधिक देशों में निर्यात कर रही है।
फ्रांस में करीना-सैफ का फैमिली वेकेशन, तैमूर-जेह संग देखें खूबसूरत तस्वीरें
करीना कपूर और सैफ अली खान इन दिनों फ्रांस में छुट्टियां मना रहे हैं। सैफ ने वेकेशन की कुछ तस्वीरें शेयर की हैं, जिनमें परिवार का मस्ती भरा अंदाज और कैजुअल लुक देखने को मिल रहा है।
फ्रांस में चंडीगढ़ के विरासत फर्नीचर की नीलामी हुई। 25 अक्टूबर को सात लाॅट 1.68 करोड़ रुपये में बिके। हेरिटेज प्रोटेक्शन सेल ने प्रशासन से एफआईआर दर्ज करने और बिके फर्नीचर की डिलीवरी रोकने की मांग की है।
भारत और European Union के बीच Investment Protection Agreement पर वार्ता जारी: Piyush Goyal
(राजेश राय)द हेग, 27 अक्टूबर वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच निवेश संरक्षण समझौते (आईपीए) के लिए बातचीत जारी है। उन्होंने साथ ही कहा कि यूरोपीय संघ के साथ भौगोलिक संकेतक (जीआई) समझौते के लिए कुछ कानूनी बदलाव जरूरी हैं, जिन्हें मंत्रालय संसद में पेश करने जा रहा है। गोयल ने यहां संवाददाताओं से कहा, ‘‘द्विपक्षीय निवेश समझौते यानी आईपीए पर बातचीत जारी है और जीआई समझौते के लिए हमें कुछ कानूनी बदलाव करने होंगे।’’भारत और 27 देशों वाले यूरोपीय संघ ने 27 जनवरी को मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर बातचीत पूरी होने की घोषणा की थी। इसे ‘‘सभी समझौतों में सबसे बड़ा समझौता’’ बताया जा रहा है। यूरोपीय संघ पहले से ही भारत में प्रमुख निवेशकों में शामिल है। भारत में करीब 6,000 यूरोपीय कंपनियां मौजूद हैं। भौगोलिक संकेतक (जीआई) मुख्य रूप से किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र से उत्पन्न कृषि, प्राकृतिक या विनिर्मित उत्पादों (हस्तशिल्प एवं औद्योगिक वस्तुओं) को दिया जाता है। निवेश संरक्षण समझौता किसी दूसरे देश में कंपनियों और निवेशकों द्वारा किए गए निवेश की सुरक्षा के लिए एक ढांचा उपलब्ध कराता है। इसका उद्देश्य निष्पक्ष एवं गैर-भेदभावपूर्ण व्यवहार सुनिश्चित करना, निवेशकों को गैरकानूनी तरीके से संपत्ति के अधिग्रहण से बचाना और निवेश से जुड़े विवादों के समाधान के लिए तंत्र उपलब्ध कराना है। ऐसे समझौतों से निवेशकों का भरोसा बढ़ाने, नीतिगत जोखिम कम करने और मेजबान देश के नियामकीय ढांचे में अधिक निश्चितता तथा पारदर्शिता उपलब्ध कराकर सीमा पार निवेश को प्रोत्साहन देने में मदद मिलती है। इसी तरह, भारत और यूरोपीय संघ के बीच जीआई समझौते से दोनों पक्षों के बाजारों में क्षेत्र-विशेष के उत्पादों को संरक्षण मिलेगा। इससे उनके नामों की नकल और दुरुपयोग रोकने में मदद मिलेगी। इससे दार्जिलिंग चाय, बासमती चावल और भारतीय हस्तशिल्प जैसे उत्पादों को संरक्षण मिलेगा जबकि ‘फेटा चीज’ जैसे यूरोपीय उत्पादों की भी सुरक्षा होगी। गोयल ने कहा कि ये समझौते मुक्त व्यापार समझौते के लागू होने के बाद प्रभावी होंगे। मुक्त व्यापार समझौते पर दिसंबर में हस्ताक्षर होने की संभावना है और यह अगले साल मार्च या अप्रैल में लागू हो सकता है। उन्होंने कहा कि भारत की युवा और प्रतिभाशाली आबादी, बढ़ता मध्यम वर्ग, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था एवं आधुनिक प्रौद्योगिकी को तेजी से अपनाने की प्रवृत्ति उसे निवेश के लिए आकर्षक गंतव्य बनाती है। मंत्री ने कहा कि वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 76 प्रतिशत हिस्से वाली अर्थव्यवस्थाओं में तरजीही पहुंच मिलने से भारत के व्यापार के अवसरों में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।
अमेरिका ने जताई चिंता, यूरोपीय विमान निर्माता एयरबस को मिले निवेश ऋण
वाशिंगटन, अमेरिका ने यूरोपीय विमान निर्माता एयरबस को दिए गए रिकॉर्ड स्तर के निवेश ऋण पर चिंता जताई है। अमेरिका का कहना है कि इस कदम से अमेरिका और यूरोप के बीच व्यापार संबंधों में नई अनिश्चितता पैदा हो गई है और विमान सब्सिडी विवाद पर बने पुराने समझौते के भविष्य को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।
मेरठ: सेंट फ्रांसिस वर्ल्ड स्कूल में अमर उजाला अपराजिता कार्यक्रम, साइबर एक्सपर्ट ने छात्राओं को साइबर अपराधों के प्रति किया जागरूक
फ्रांस में शिक्षा व्यवस्था और बढ़ते जीवन खर्च के खिलाफ छात्रों के हिंसक प्रदर्शनों के बाद सरकार ने विश्वविद्यालयों में दाखिले की प्रक्रिया बदलने का फैसला किया है। सरकार 2027 में मौजूदा ऑनलाइन प्रवेश प्रणाली में बड़े बदलाव करेगी और 2028
यूरोपीय विमान निर्माता एयरबस को मिले निवेश ऋण पर अमेरिका ने जताई चिंता
वाशिंगटन, 27 अक्टूबर . अमेरिका ने यूरोपीय विमान निर्माता एयरबस को दिए गए रिकॉर्ड स्तर के निवेश ऋण पर चिंता जताई है. अमेरिका का कहना है कि इस…
फ अली खान अपने फैंस को फिल्मों से दूर अपने परिवार के साथ वेकेशन पर हैं. उनकी हालिया तस्वीरें फ्रांस में बिताए गए उनके फैमिली टाइम की है. हाल ही में उन्होंने ने अपनी छुट्टियों की कुछ झलकियां शेयर की हैं.
नीदरलैंड से दो बड़े संकेतः अमेरिका से डील करीब, कार्बन कर पर अड़ा यूरोप;व्यापार समझौतों पर गोयल क्या बोले?
रूस-यूक्रेन युद्ध: मेलानिया ट्रंप की पहल पर ओलेश्की में स्थानीय संघर्षविराम लागू, 2000 लोगों तक पहुंचेगी मदद russia-ukraine-localised-ceasefire-oleshky-melania-trump-humanitarian-aid
यूरोप में कारोबार पर नियमों का भारी बोझ, Piyush Goyal ने The Hague में जताई चिंता
(राजेश राय)हेग, 26 अक्टूबर वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने सोमवार को यूरोप द्वारा व्यवसायों पर बढ़ते नियामकीय बोझ को लेकर चिंता जताई, जबकि नीदरलैंड के व्यापार मंत्री सोर्ड सोर्ड्समा ने कहा कि यूरोपीय संघ (ईयू) की कार्बन सीमा समायोजन प्रणाली (सीबीएएम) एक जरूरी उपाय है। गोयल ने कहा कि यूरोप व्यवसायों पर विनियामक बोझ बढ़ा रहा है, जबकि उद्योग जगत को सरल प्रक्रियाओं और कार्यप्रणाली की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि भारत नियमों को सरल बनाकर कंपनियों के लिए बड़े अवसर पैदा कर रहा है। उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा, दुर्भाग्य से, आपको इस मामले में हमसे एक-दो सबक सीखने की जरूरत है। वाणिज्य मंत्री ने आगे कहा, ‘‘चूंकि यूरोप व्यवसायों पर विनियामक बोझ बढ़ा रहा है, मैं आपको बता दूं कि जब भी मैं यह बात कहता हूं, तो मैं आपके देशों की कंपनियों का चहेता बन जाता हूं... ऐसे कई अवसर आए हैं जब मैंने यूरोपीय आयोग के स्तर पर और कई यूरोपीय देशों में भारी विनियामक अतिरिक्त बोझ के बारे में बात की है।’’मंत्री यहां भारत-नीदरलैंड व्यवसायी मंच को संबोधित कर रहे थे। वह दो दिन की आधिकारिक यात्रा पर यहां आए हैं। नीदरलैंड यूरोपीय संघ (ईयू) का एक महत्वपूर्ण सदस्य है, जिसके साथ भारत ने एक मुक्त व्यापार समझौते को अंतिम रूप दिया है। इसके दिसंबर में हस्ताक्षरित होने और अगले साल मार्च-अप्रैल तक लागू होने की उम्मीद है। गोयल ने कहा, दुनिया अधिक स्वतंत्रता चाहती है... कारोबारी दुनिया कम अनुपालन, सरल प्रक्रियाओं, सरल कार्यप्रणाली और कम कागजी कार्रवाई चाहती है। उन्होंने आगे कहा कि भारत में सरकार हमेशा कारोबार सुगमता को बढ़ावा देने के लिए उद्योग जगत से सुझाव मांगती है। भारत ने कई मौकों पर सीबीएएम और वनों की कटाई जैसे कई यूरोपीय संघ के नियमों पर चिंता जताई है। इस मौके पर नीदरलैंड के व्यापार मंत्री सोर्ड सोर्ड्समा ने कहा कि उन्हें सीबीएएम के किसी भी नए समझौते की उम्मीद नहीं है, और उन्होंने इसे एक आवश्यक उपाय बताया। उन्होंने हालांकि कहा कि नीदरलैंड छोटे और मझोले उद्यमों (एमएमई) को नियमों को समझने और अनुपालन को आसान बनाने में मदद कर रहा है। यह पूछे जाने पर कि क्या यूरोपीय संघ (ईयू) सीबीएएम पर पुनर्विचार करेगा क्योंकि इससे आयात महंगा हो जाएगा, उन्होंने संवाददाताओं से कहा, मुझे नहीं लगता कि सीबीएएम पर कोई नया समझौता होगा क्योंकि हम इसे यह सुनिश्चित करने के लिए एक जरूरी उपाय के रूप में देखते हैं कि हम उन लक्ष्यों पर टिके रहें जिन पर पूरी दुनिया ने सहमति जताई है, यानी पेरिस जलवायु समझौते के लक्ष्य। उन्होंने पत्रकारों से कहा, हम मानते हैं कि न केवल हमें बल्कि पूरी दुनिया को इन लक्ष्यों का पालन करना चाहिए। ईयू का सीबीएएम लोहा और इस्पात, एल्युमीनियम, सीमेंट, उर्वरक, बिजली और हाइड्रोजन सहित कुछ कार्बन-सघन वस्तुओं के आयात पर कार्बन कर लगाने के लिए तैयार किया गया है। भारतीय वाणिज्य मंत्री ने 22-27 अक्टूबर तक अपने छह दिवसीय दौरे के दौरान जर्मनी और नीदरलैंड का दौरा किया। वह 100 सदस्यीय व्यावसायिक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे थे।
एयर फ्रांस ने मध्य पूर्व की उड़ानें कीं निलंबित, सुरक्षा बनी वजह
सुरक्षा स्थिति और हवाई क्षेत्र की पाबंदियों के कारण एयरलाइन ने परिचालन रोका है। कंपनी हालात की निगरानी के बाद सेवाएं बहाल करेगी।
पीयूष गोयल ने कहा कि किसी दूसरे देश में रहने वाले समुदाय का सम्मान इस बात से भी तय होता है कि वहां के लोग उसे किस नजर से देखते हैं। भारतीय समुदाय को दूसरे देशों में काफी पसंद किया जाता है और उसका स्वागत किया जाता है।
यूरोप: कई शहरों में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें
फ्रांस, इटली, स्पेन और अल्बानिया समेत यूरोप के कई देशों में बड़ी संख्या में युवा सड़कों पर उतरे हुए हैं.
फ्रांस, इटली, बेल्जियम और अल्बानिया में भड़का प्रदर्शन, जगह-जगह हिंसा
यूरोप की सड़कों पर एक बार फिर विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं. महंगाई, बढ़ती असमानता और सरकार की नीतियों के खिलाफ फ्रांस, इटली, बेल्जियम और अल्बानिया तक लोग सड़कों पर उतर आए हैं. कई शहरों में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच जोरदार झड़प हुई. कहीं आंसू गैस और वाटर कैनन का इस्तेमाल हुआ, तो कहीं आगजनी और पथराव की तस्वीरें सामने आई.
यूरोप में महंगाई और आवास संकट से भड़का गुस्सा, फ्रांस से पुर्तगाल तक सड़कों पर उतरे लाखों लोग
फ्रांस की राजधानी पेरिस से लेकर अल्बानिया के तिराना, इटली के शहरों, स्पेन के मैड्रिड और पुर्तगाल के लिस्बन तक विरोध-प्रदर्शन उग्र होते जा रहे हैं। कई जगह प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं, आंसू गैस छोड़ी गई और गिरफ्तारियां की गईं।
Freddy Francis: सोशल मीडिया पर वायरल इन्फ्लुएंसर फ्रेडी फ्रांसिस ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की केरल इकाई से अलग होने का ऐलान किया है। उन्होंने रविवार (25 अक्टूबर) को जारी बयान मेंऐलान किया कि अब वह संगठन से किसी भी आधिकारिक भूमिका में जुड़े नहीं रहेंगे। फ्रांसिस ने अपने फैसले के पीछे संगठन की फंड जुटाने की प्रक्रिया, कुछ राजनीतिक बयानों और कई फैसलों को लेकर गंभीर मतभेदों का हवाला दिया है।फ्रांसिस के इस फैसले से संगठन की केरल इकाई में हलचल पैदा हो गई है। उन्होंने कहा कि वह संगठन के कुछ फैसलों का समर्थन नहीं कर सकते और न ही भविष्य में उसकी गतिविधियों की जिम्मेदारी लेना चाहते हैं। उनके अनुसार, कुछ फैसले केरल की धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी सामाजिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं।फंडिंग और राजनीतिक बयानों पर जताई असहमतिफ्रेडी फ्रांसिस ने अपने बयान में अभिजीत दीपके की अगुवाई वाली CJP की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि फंड जुटाने के तरीकों, कुछ अपरिपक्व राजनीतिक बयानों और कुछ फैसलों को लेकर उनकी गंभीर असहमति है। उन्होंने कहा कि जिन गतिविधियों और फैसलों से वह सहमत नहीं हैं, उनका समर्थन करना उनके लिए संभव नहीं है। इसी वजह से उन्होंने संगठन से अपनी आधिकारिक भूमिका समाप्त करने का निर्णय लिया।फ्रांसिस ने अपने बयान में कहा कि वह संगठन के ऐसे फैसलों, बयानों या भविष्य की गतिविधियों का समर्थन नहीं कर सकते, जिनसे उनके विचारों और सिद्धांतों के विपरीत परिस्थितियां पैदा हों। हालांकि, उनके बयान में फंड जुटाने के किन तरीकों पर आपत्ति थी और किन राजनीतिक बयानों को लेकर मतभेद पैदा हुए, इसकाडिटेल्स नहीं दिया गया है।संगठन के साथियों को दिया धन्यवादपार्टी से अलग होने का फैसला लेने के बावजूद फ्रांसिस ने संगठन के साथ काम करने वाले लोगों के योगदान को स्वीकार किया। उन्होंने उन समर्थकों और सहयोगियों का आभार जताया, जो बाढ़, प्रदर्शनों और अन्य पहलों के दौरान टीम के साथ खड़े रहे। फ्रांसिस के अनुसार, संगठन के सदस्यों ने मिलकर जो काम किया, उसने आंदोलन को मौजूदा स्वरूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।उन्होंने अपने बयान में कहा कि टीम के रूप में किए गए सामूहिक प्रयासों और इसमें योगदान देने वाले लोगों पर उन्हें गर्व है। उनकी यह टिप्पणी दिखाती है कि संगठन से अलग होने के बावजूद वह अपने साथियों के योगदान को पूरी तरह खारिज नहीं कर रहे हैं।'संगठन छोड़ रहा हूं, अपने सिद्धांत नहीं'फ्रेडी फ्रांसिस ने स्पष्ट किया कि CJP की केरल इकाई से अलग होने का अर्थ यह नहीं है कि उन्होंने अपने व्यक्तिगत सिद्धांतों को छोड़ दिया है। उन्होंने लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। साथ ही भारतीय नागरिकों को संविधान से मिले अधिकारों और स्वतंत्रताओं की रक्षा के लिए खड़े रहने की बात कही। फ्रांसिस ने कहा कि संगठन से दूरी बनाने का उनका फैसला उनके मूल्यों से दूरी बनाने का फैसला नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भविष्य में भी वह इन सिद्धांतों के लिए अपनी आवाज उठाते रहेंगे।कौन हैं फ्रेडी फ्रांसिस?फ्रेडी वी. फ्रांसिस केरल के रहने वाले सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर और राजनीतिक मुद्दों पर अपनी राय रखने वाले इन्फ्लुएंसर हैं। केरल की स्थानीय मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, वह केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियों के आलोचक रहे हैं। वह कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की केरल इकाई और उसके युवा आंदोलन को शुरुआती दौर में आगे बढ़ाने वालों में शामिल थे। फ्रेडी फ्रांसिस उन शुरुआती लोगों में शामिल थे, जिन्होंने केरल में Cockroach Janata Party और उसके युवा आंदोलन को खड़ा करने में भूमिका निभाई थी।रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर में पार्टी की केरल इकाई ने अपनी संगठित गतिविधियों का विस्तार करना शुरू किया था। संगठन से जुड़े समन्वयकों ने राज्य के सभी जिलों में अपनी मौजूदगी स्थापित करने और स्थानीय सामाजिक एवं राजनीतिक मुद्दों पर काम करने की योजना की घोषणा की थी। ऐसे समय में फ्रांसिस का संगठन से अलग होना उसके लिए एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा सकता है।धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग वाले प्रदर्शनों में भी थे सक्रिय'केरल कौमुदी' की रिपोर्ट के अनुसार, फ्रेडी फ्रांसिस उन प्रदर्शनों में भी सक्रिय रूप से शामिल थे, जिनके चलते पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर आंदोलन हुआ था। इससे केरल में संगठन की राजनीतिक गतिविधियों और आंदोलनों में उनकी भागीदारी का पता चलता है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में इन प्रदर्शनों के पूरे घटनाक्रम और फ्रांसिस की व्यक्तिगत भूमिका का विस्तृत विवरण नहीं दिया गया है।
बढ़ती महंगाई और शिक्षा तंत्र की लचर हालत को लेकर फ्रांस में शुरू हुआ आंदोलन अब बेहद हिंसक रूप अख्तियार कर चुका है। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने अब तक 1,300 से अधिक लोगों को हिरासत में ले लिया है।
छात्रों के प्रदर्शन के बाद कैसे जल उठा फ्रांस, आम बजट भी बन गया बड़ी वजह
फ्रांस में स्कूलों के छात्रों का प्रदर्शन देशव्यापी हो गया और लाखों लोग सड़कों पर उतर आए। इसके पीछे महंगाई और सरकार का बजट भी है। सरकार ने लगातार चौथे साल सरकारी कर्मचारियों के वेतन को ना बढ़ाने का फैसला किया है।
Basmati Export: पेरिस व्यापार मेले में यूरोपीय खरीदारों ने दिखाई दिलचस्पी, निर्यात 60 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचने की उम्मीद; पश्चिमी यूपी के किसानों को फायदा
लिमिटेड की नई इकाई का उद्घाटन रविवार को राजातालाब के खोचवां में रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया। इस यूनिट की स्थापना पर करीब 150 करोड़ रूपये का निवेश किया गया है।
'भारतीय तोड़फोड़ नहीं करते, जैसा यूरोप में हो रहा', पीयूष गोयल का बड़ा बयान
केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने जर्मनी और नीदरलैंड के दौरे के दौरान यूरोप में भारतीय समुदाय के सम्मान और सुरक्षा पर जोर दिया है. उन्होंने कहा कि भारतीय आमतौर पर शांतिप्रिय होते हैं और समाज में अशांति नहीं फैलाते.
सड़कों पर उतरा यूरोप: पेरिस से तिराना तक लाखों का उग्र प्रदर्शन, 1300 से अधिक गिरफ्तार
यूरोप के प्रमुख देश इस समय गंभीर आर्थिक और सामाजिक असंतोष की आग में झुलस रहे हैं। रहने के लिए महंगे होते मकान, आसमान छूती महंगाई, बुनियादी जीवन-यापन की भारी लागत और जनविरोधी सरकारी नीतियों के खिलाफ आम नागरिकों का धैर्य पूरी तरह जवाब दे चुका है। फ्रांस की राजधानी पेरिस की ऐतिहासिक सड़कों से लेकर अल्बानिया के तिराना, इटली के औद्योगिक शहरों, स्पेन के मैड्रिड और पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन तक असंतोष का ऐसा ज्वार उठा है जिसने महाद्वीप की सरकारों की नींद उड़ा दी है। विभिन्न शहरों में विरोध मार्च हिंसक टकराव में तब्दील हो चुके हैं, जहां पुलिस द्वारा भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले दागे जा रहे हैं, रबर की गोलियां चलाई जा रही हैं और बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां की जा रही हैं। आंदोलनकारियों में समाज का हर वर्ग शामिल दिखाई दे रहा है, जिसमें कहीं मुख्य मुद्दा आवास का संकट और पेंशन कटौती है, तो कहीं अत्यधिक महंगी होती उच्च शिक्षा, विवादास्पद सरकारी ढांचागत परियोजनाएं और सख्त सुरक्षा नीतियां विरोध के केंद्र में हैं।फ्रांस में 1300 से अधिक गिरफ्तारियां, पेरिस में ड्रोन और हेलिकॉप्टरों से निगरानीफ्रांस में आंदोलन का स्वरूप सबसे उग्र और व्यापक नजर आ रहा है। सप्ताहांत में हुए विरोध प्रदर्शनों में गृह मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार लगभग 4.10 लाख नागरिकों ने भागीदारी की, जबकि आंदोलन की अगुवाई कर रही प्रसिद्ध सीजीटी यूनियन ने दावा किया है कि सड़कों पर उतरने वालों की वास्तविक तादाद आठ लाख से भी ज्यादा थी। अकेले राजधानी पेरिस में करीब ढाई लाख लोग व्यवस्था के खिलाफ आवाज बुलंद करने पहुंचे। कानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर सुरक्षा बलों द्वारा किए गए कथित अत्यधिक बल प्रयोग ने आग में घी का काम किया है। देशभर से पुलिस ने करीब 1314 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया, जिनमें से अकेले पेरिस शहर से 65 लोगों की गिरफ्तारी हुई। पेरिस, ल्योन, लिले और मार्सिले जैसे प्रमुख नगरों में स्थिति इतनी विकट हो गई कि भीड़ पर नजर रखने के लिए पुलिस को आसमान में हेलिकॉप्टरों और आधुनिक ड्रोनों की मदद लेनी पड़ी।झड़पों के दौरान 53 पुलिस अधिकारी गंभीर रूप से जख्मी हुए हैं, जबकि 75 विभिन्न स्थानों पर आगजनी और 24 दुकानों में लूटपाट की घटनाएं दर्ज की गईं। इसी बीच सूचना के मोर्चे पर भी भारी चूक देखने को मिली, जहां फ्रांस के दो प्रमुख समाचार चैनलों, सीन्यूज और फ्रांसइंफो ने अल्बानिया में हुए विरोध प्रदर्शनों के दृश्यों को फ्रांस का बताकर प्रसारित कर दिया, जिसके बाद उन्हें सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पड़ी। आंदोलनकारियों के तेवर नरम पड़ने के बजाय और तीखे होते दिख रहे हैं। प्रमुख मजदूर संगठनों और 2018 के ऐतिहासिक 'येलो वेस्ट' आंदोलन से जुड़े समूहों ने आगामी 31 अक्टूबर और 5 नवंबर को फिर से देशव्यापी हड़ताल और बड़े प्रदर्शनों का खुला आह्वान किया है। येलो वेस्ट संगठन ने ऐलान किया है कि अगले शनिवार को पेरिस के टाउन हॉल और नेशनल असेंबली भवन के ठीक बाहर अनिश्चितकालीन धरना दिया जाएगा। उनका कहना है कि प्राथमिक विद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालयों तक और खेतों से लेकर कारखानों तक, हर कार्यस्थल पर सरकार के प्रति असंतोष चरम सीमा पर पहुंच चुका है। उधर, पुलिस यूनियनों ने भी हाथ खड़े करते हुए सरकार को चेतावनी दी है कि उनके पास इतने सुरक्षाकर्मी शेष नहीं हैं कि पूरे देश में लगातार लंबे समय तक आपात तैनाती बनाए रखी जा सके।अल्बानिया में बातचीत की कुर्सियां फूंकीं, इटली में ऐतिहासिक कोलोसियम में घुसने की कोशिशअल्बानिया की राजधानी तिराना में हालात तब बेकाबू हो गए जब प्रधानमंत्री एडी रामा ने विरोध प्रदर्शनों को दबाने के लिए सख्त प्रशासनिक उपायों और उपद्रवियों पर पांच लाख लेक यानी लगभग 6188 डॉलर का भारी-भरकम जुर्माना लगाने की घोषणा की। इस दंडात्मक फरमान से भड़के लोग मूसलाधार बारिश के बावजूद सड़कों पर उतर आए और शिक्षा मंत्रालय से होते हुए सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर कूच करने लगे। आक्रोशित भीड़ ने शांति वार्ता के लिए प्रशासनिक स्तर पर सजाकर रखी गई कुर्सियों को खुलेआम आग के हवाले कर दिया। इससे एक दिन पहले पुलिस ने भीड़ पर काबू पाने के लिए रबर की गोलियां और आंसू गैस के गोले दागे थे। कई सरकारी भवनों पर पत्थर और पटाखे फेंके गए, जिसमें 300 से अधिक पुलिसकर्मी और आम नागरिक घायल हो चुके हैं।इटली के प्रमुख शहरों मिलान, रोम, ट्यूरिन, नेपल्स, बोलोग्ना और फ्लोरेंस में भी जन आक्रोश सड़कों पर फूटा। यहां उग्र प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षा बलों पर शीशे की बोतलों, पत्थरों और पटाखों से सीधे प्रहार किए। राजधानी रोम में तनाव उस वक्त चरम पर पहुंच गया जब प्रदर्शनकारियों के एक बड़े जत्थे ने ऐतिहासिक स्मारक कोलोसियम के सुरक्षा घेरे को तोड़कर भीतर प्रवेश करने का प्रयास किया। आठ बड़े शहरों में व्यापक अभियान चलाकर 9 लोगों को गिरफ्तार किया गया और 110 नाबालिगों सहित कुल 371 लोगों को हिरासत में लिया गया। इस तनावपूर्ण माहौल के बीच इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने प्रशासनिक अधिकारियों और सुरक्षाबलों का आभार जताते हुए देश में हर हाल में कानून व्यवस्था बहाल रखने की प्रतिबद्धता दोहराई है।स्पेन-पुर्तगाल में आवास संकट और डोनाल्ड ट्रंप का अप्रवासियों पर तीखा हमलास्पेन की राजधानी मैड्रिड में पेंशनर्स और युवाओं का संयुक्त मोर्चा सड़कों पर डटा हुआ है। प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग है कि बढ़ती महंगाई की दर के अनुपात में पेंशन राशि में तत्काल इजाफा किया जाए, न्यूनतम पेंशन स्लैब में व्यापक सुधार हो और पेंशन प्रणाली के किसी भी प्रकार के निजीकरण पर पूर्ण वैधानिक रोक लगे। शहर के प्रसिद्ध प्यूर्टा डेल सोल चौराहे पर लगाया गया विरोध शिविर इस आंदोलन की धुरी बन चुका है, जहां लोग बेतहाशा बढ़ते घर के किरायों के खिलाफ अनवरत धरना दे रहे हैं। पड़ोसी देश पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन में भी किराए की दरों को नियंत्रित करने और मकान मालिकों द्वारा किराएदारों को बेदखल करने के नियमों को कड़ा करने की मांग को लेकर तंबू गाड़े गए थे। हालांकि, पुलिस ने रविवार तड़के कार्रवाई करते हुए इन शिविरों को जबरन उखाड़ फेंका, जिसके चलते पुलिस और जनता के बीच तीखी हाथापाई हुई।यूरोप के इस अभूतपूर्व संकट पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस और समूचे यूरोप में भड़की इस हिंसा का ठीकरा वहां की आव्रजन नीतियों पर फोड़ा है। अमेरिका के जॉर्जिया में एक सार्वजनिक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए ट्रंप ने कहा कि फ्रांस आज इसलिए जल रहा है क्योंकि उसने अपनी सीमाएं ऐसे लोगों के लिए खोल दीं जो उसकी संस्कृति, परंपरा, ऐतिहासिक इमारतों और कला का सम्मान नहीं करते। ट्रंप ने सख्त लहजे में कहा कि जब आप ऐसे तत्वों को पनाह देते हैं जो आपके देश से नफरत करते हैं, तो उसका यही हश्र होता है। हालांकि, फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों पहले भी ट्रंप के इस प्रकार के बयानों को पूरी तरह खारिज करते रहे हैं, लेकिन यूरोप के वर्तमान हालात निश्चित रूप से नीति-निर्माताओं के सामने एक गहरा राजनीतिक और सामाजिक संकट बनकर खड़े हो गए हैं।
वैचारिक संकेत: यूरोप में हिंसा से जामिया के आंदोलन तक... बयानों के संदर्भ बेशक अलग, संकेतों को समझना जरूरी
बर्लिन से हेग तक... 31 अक्तूबर को अग्निपरीक्षा: यूरोप में दहशत का माहौल, फ्रांस से बेल्जियम तक एक जैसे मंजर
फ्रांस से इटली तक... एक बार फिर सुलगा यूरोप, देखें विशेष
यूरोप की सड़कों पर एक बार फिर विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं... महंगाई, बढ़ती असमानता और सरकार की नीतियों के खिलाफ फ्रांस, इटली, बेल्जियम और अल्बानिया तक लोग सड़कों पर उतर आए हैं... कई शहरों में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच जोरदार झड़प हुई... कहीं आंसू गैस और वाटर कैनन का इस्तेमाल हुआ, तो कहीं आगजनी और पथराव की तस्वीरें सामने आई..
फ्रांस: विरोध प्रदर्शन के बीच पुलिस हिरासत में 1000 लोग
पेरिस, 25 अक्टूबर . Saturday को फ्रांस के विभिन्न शहरों में लाखों लोग सड़कों पर उतरे. इनमें से एक हजार को Police ने हिरासत में लिया. यह विरोध…
फ्रांस में विरोध प्रदर्शन, पुलिस बोली- कुछ नकाबपोशों ने हंगामा मचाया
फ्रांस में विरोध प्रदर्शन, पुलिस बोली- कुछ नकाबपोशों ने हंगामा मचाया
फ्रांस में सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरे लाखों लोग, 1,000 से ज्यादा गिरफ्तार
फ्रांस में कई मुद्दों को लेकर सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन तेज हो गया है. देश भर में करीब 4,10,000 लोग सड़कों पर उतरे. पेरिस में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तीखी झड़प हुई, जिसके बाद स्थिति को नियंत्रित करने के लिए आंसू गैस और वॉटर कैनन का इस्तेमाल किया गया. पुलिस ने 1,000 से अधिक लोगों को गिरफ्तार कर लिया है.
कहीं आग है, कहीं धुआं-धुआं, फ्रांस को यह क्या हुआ? पेरिस में क्यों सड़कों पर उतरे लाखों लोग
फ्रांस में बढ़ती महंगाई और शिक्षा को लेकर प्रदर्शन जारी हैं। पहले छात्र संगठनों ने प्रदर्शन को आगे बढ़ाया अब ट्रेड यूनियन और अन्य संगठन मैदान में हैं। प्रदर्शनकारी लगातार सरकार के सामने अपनी मांगों को रख रहे हैं।
यूरोप के कई प्रमुख राष्ट्रों में सप्ताहांत के दौरान व्यापक जनआक्रोश देखने को मिला। जीवन-यापन के बढ़ते खर्च, आवास की किल्लत, घटती पेंशन, शिक्षा प्रणाली की बदहाली और प्रशासनिक भ्रष्टाचार जैसे ज्वलंत मुद्दों को लेकर नागरिकों ने विशाल रैलियां निकालीं।
फ्रांस जल रहा है क्योंकि…डोनाल्ड ट्रंप ने बताई चौंकाने वाली वजह, अमेरिका का हवाला क्यों
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार को फ्रांस में चल रहे प्रोटेस्ट को लेकर बड़ा दावा किया। ट्रंप ने यह बात खारिज कर दी कि शिक्षा के मुद्दे को लेकर फ्रांस में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।
प्रदर्शन : फ्रांस में कई जगह भड़की हिंसा
नई दिल्ली, यूरोप के कई देश फ्रांस, इटली, स्पेन और अल्बानिया प्रदर्शन की आग में झुलस रहे हैं। लोग बढ़ती मकान की कीमतों और महंगे जीवनयापन के खर्चों को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं। फ्रांस में बढ़ती महंगाई और स्कूलों की खराब होती स्थिति के खिलाफ शनिवार शाम लोग हिंसक हो गए। स्पेन के बार्सिलोना शहर में भी प्रदर्शनकारियों ने लूटपाट कर सरकारी सपत्ति को नुकसान पहुंचाया।
New Delhi, 25 अक्टूबर . यूरोप के कई देश फ्रांस, इटली, स्पेन और अल्बानिया प्रदर्शन की आग में झुलस रहे हैं. लोग बढ़ती मकान की कीमतों और महंगे…
फ्रांस से अल्बानिया तक प्रदर्शनकारियों-पुलिस के बीच जोरदार झड़प, देखें बवाल
यूरोप के कई देशों में इन दिनों हालात बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं. फ्रांस, इटली और बेल्जियम समेत कई यूरोपीय देशों में बढ़ती महंगाई, असमानता और सरकारी नीतियों के खिलाफ सड़कों पर उग्र प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं. फ्रांस की राजधानी पेरिस में करीब 1.25 लाख से अधिक लोग सड़कों पर उतर आए और सरकार के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया. देश भर में लगभग 4 लाख से अधिक लोगों ने इन प्रदर्शनों में भाग लिया. पेरिस में प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस के गोले दागे और वाटर कैनन का इस्तेमाल किया.
फ्रांस में महंगाई और पेंशन को लेकर सड़कों पर लाखों लोग
24 अक्टूबर को फ्रांस में महंगाई, बेरोजगारी, वेतन, पेंशन और स्कूलों की फंडिंग जैसे मुद्दों को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुआ। राजधानी पेरिस समेत कई शहरों में हजारों लोग सड़कों पर उतरे।
यूरोप को हथियार देने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश बना भारत
भारत यूरोप का तीसरा सबसे बड़ा हथियार निर्यातक बन गया है. पिछले वित्त वर्ष में 38,424 करोड़ रुपये के रक्षा सामानों यूरोप में एक्सपोर्ट किए गए. यूक्रेन युद्ध के बाद गोला-बारूद की मांग बढ़ी. मेक इन इंडिया से उत्पादन बढ़ा. अब 80 से ज्यादा देशों को निर्यात हो रहा है.
'फ्रांस में शिक्षा के लिए नहीं हो रहा प्रदर्शन': ट्रंप का दावा, कहा- देश से नफरत करने वालों के लिए खोली सीमा donald-trump-on-france-protests-immigration-policy-border-open-hate-country
यूरोपीय देशों में आंदोलन: कई जगह भिड़े पुलिस, उग्र प्रदर्शनकारी; फ्रांस,इटली, स्पेन से ब्रसेल्स तक कैसा मंजर?
फ्रांस में फिर भड़का जनआक्रोश, सड़कों पर उतरे 4 लाख लोग, करीब 1,000 हिरासत में!
हालांकि मजदूर यूनियनों का दावा है कि प्रदर्शनकारियों की वास्तविक संख्या सरकार के आंकड़ों से कहीं ज्यादा थी। मार्च के दौरान कई इलाकों में हिंसा भड़कने के बाद दंगा नियंत्रण पुलिस को पानी की बौछारें, स्टन ग्रेनेड और आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े।
रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म होने की उम्मीद! ट्रंप बोले-जंग के बाद दोनों के साथ करेंगे बिजनेस
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध खत्म होने के बाद दोनों देशों के साथ कारोबार करने की इच्छा जताई है। उन्होंने कहा है कि दोनों देशों के बीच लड़ाई खत्म होने के बाद वॉशिंगटन दोनों देशों के साथ बिज़नेस करेगा।
एक्सप्लेनर: एक महीने से सुलग रहा फ्रांस, पानी-एसी और चूहे के नाम पर शुरू हुए आंदोलन में अब तक क्या-क्या हुआ?
पीयूष गोयल बोले: पर्यावरण बचाने में यूरोप आगे;बाजार से आगे भारत, जर्मन कंपनियां अब बनाएंगी कारखाना-प्रयोगशाला
फ्रांस प्रोटेस्ट: मुश्किल में राष्ट्रपति मैक्रों, सड़कों पर लाखों प्रदर्शनकारी, पेरिस ठप
फ्रांस की राजधानी पेरिस समेत तमाम शहरों में एक बार फिर प्रदर्शन जोरों पर है। पेरिस में लाखों प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति मैक्रों के सामने शक्ति प्रदर्शन किया। फ्रांस सरकार ने इससे निपटने के लिए 70 हजार से ज्यादा सैनिकों की तैनाती की है।
फ्रांस प्रोटेस्ट: 70000 पुलिसकर्मी तैनात, हथियार जब्त और 135 गिरफ्तार - Jagran
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Arab Spring 2.0: फ्रांस, इटली, पोलैंड, ग्रीस, सर्बिया...सब जगह युवा क्यों कर रहे हंगामा?
यूरोप की जो दुनिया को तरक्की, ताकत और लोकतंत्र का पाठ पढ़ाता है। आज उसी यूरोप की सड़कों पर गुस्सा उबल रहा है। फ्रांस से सर्बिया, इटली से स्पेन समेत यूरोप के कई देशों तक महंगाई, बेरोजगारी और मकानों के आसमान छूते किराए से युवा परेशान है। सड़कों पर प्रदर्शन, पुलिस से टकराव और अब विरोध का कैलेंडर। ऐसे में सवाल है क्या यूरोप में 2010 जैसी अरब स्प्रिंग की आहट सुनाई देने लगी है? फ्रांस से जो हिंसा शुरू हुई, जो प्रोटेस्ट शुरू हुआ वो धीरे-धीरे यूरोप के और भी कई देशों में फैल चुका है। कहीं युवा भ्रष्टाचार के खिलाफ सड़कों पर उतरे हैं, तो कहीं महंगाई और बेरोजगारी ने सरकारों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। कई जगहों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें हो रही हैं, जबकि कुछ देशों में छात्र आंदोलन इस मुकाम पर पहुंच चुके हैं जहां वे चुनावी राजनीति को प्रभावित कर रहे हैं। इसे भी पढ़ें: भारत तो बड़ा खिलाड़ी निकला, यूरोप को दनादन कर रहा गोला-बारूद सप्लाई! आखिर यूरोप से लेकर एशिया तक इतना असंतोष क्यों है? यूरोप से लेकर एशिया तक युवा सड़कों पर हैं और सरकारों के प्रति जनता का आक्रोश साफ देखा जा सकता है। फ्रांस से लेकर सर्बिया और इटली से लेकर इंडोनेशिया तक, कई देशों में छात्र आंदोलनों ने जोर पकड़ लिया है। युवा भ्रष्टाचार, महंगाई और बदहाल शिक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दों पर सरकारों से जवाब मांग रहे हैं। फ्रांस में छात्र प्रदर्शनों के बीच एक नारा काफी चर्चा का विषय बन गया है—बिस्मिल्लाह से ले तेनब्रे (Bismillah se le tenbre), जिसका अर्थ निकाला गया ईश्वर के नाम पर, यह अंधकार है। दावा किया जाता है कि यह वाक्यांश सोशल मीडिया पर एक मैसेज के स्क्रीनशॉट से निकला। हालांकि, फ्रेंच भाषा में यह कोई व्याकरण के अनुसार सही वाक्य नहीं है, फिर भी अपनी अजीबोगरीब बनावट और शब्दों के अनूठे मेल के कारण यह लोगों की जुबान पर चढ़ गया। ठीक इसी तरह भारत में भी जुलाई के छात्र आंदोलनों के दौरान एक स्लैंग वास्ते गुनाह्या वायरल हुआ था, जिसका अपना कोई खास मतलब नहीं था। न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, फ्रांस का यह नारा सबसे पहले स्नैपचैट पर सामने आया। वहां एक शख्स ने छात्र प्रदर्शनकारियों के प्राइवेट चैट ग्रुप में शामिल होने के लिए अलग-अलग प्रोफाइल बनाकर लोगों को संदेश भेजे थे। उस मैसेज में उसने लिखा था बिस्मिल्लाह से ले तेनब्रे, और उसके आगे लिखा था हम सब कुछ तोड़ देंगे। कुछ यूजर्स को इस मैसेज की भाषा अजीब और मजाकिया लगी, जिसके बाद उन्होंने इसके स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर शेयर कर दिए। धीरे-धीरे यह जुमला वायरल होकर प्रदर्शनकारियों के पोस्टरों तक पहुंच गया। इसे भी पढ़ें: उछल-उछल कर भारत को फंसा रही थी ये महिला, लगा तगड़ा करंट! दूसरी तरफ, इटली में विरोध-प्रदर्शनों की स्थिति और भी गंभीर नजर आ रही है। बोलोग्ना में नकाबपोश प्रदर्शनकारियों, वामपंथी कार्यकर्ताओं और पुलिस के बीच हिंसक झड़पों की खबरें हैं, जहां बैरिकेड्स जलाने और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं दर्ज की गई हैं। वहीं, ईंधन की बढ़ती कीमतों को लेकर ट्रक ड्राइवरों की राष्ट्रव्यापी हड़ताल ने आर्थिक संकट की आशंका बढ़ा दी है। दक्षिणी इटली के कई इलाकों के पेट्रोल पंपों पर ईंधन की भारी किल्लत हो गई है, सुपरमार्केट में ताजे फल-सब्जियों और खाद्यान्न की सप्लाई ठप पड़ने लगी है, और कैप्री तथा इस्चिया जैसे द्वीपों की फेरी सेवाएं बाधित होने का खतरा मंडरा रहा है। ऐसे हालात में सरकार से तुरंत हस्तक्षेप की मांग की जा रही है। पोलैंड में भी बड़े पैमाने पर लोग विधायी सुधारों की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क और देश की संसद प्रजनन अधिकारों से जुड़े अपने वादों को पूरा करें। इस आंदोलन का मुख्य केंद्र सरकारी जवाबदेही और अधूरे चुनावी वादों को लागू कराना है। इसे भी पढ़ें: उछल-उछल कर भारत को फंसा रही थी ये महिला, लगा तगड़ा करंट! ग्रीस में भी एक बेहतर शिक्षा प्रणाली की मांग को लेकर हजारों छात्र और शिक्षक लामबंद हैं। एथेंस में करीब 10,000 लोगों ने मार्च निकाला। प्रदर्शनकारी मांग कर रहे हैं कि शिक्षा क्षेत्र के लिए बजट बढ़ाया जाए, स्कूलों की हालत सुधारी जाए, शिक्षकों का वेतन बढ़ाया जाए और युवाओं को किफायती आवास की सुविधा मिले। यानी यहां आंदोलन की मांगें शिक्षा की गुणवत्ता से लेकर लगातार बढ़ती जीवन-यापन लागत (महंगाई) तक फैली हुई हैं। इन सब के बीच, यूरोप की सबसे बड़ी राजनीतिक हलचल सर्बिया से सामने आ रही है। यहां छात्र आंदोलन अब केवल सड़कों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि चुनावी राजनीति में अपनी ताकत दिखाने की तैयारी कर रहा है। 25 अक्टूबर के चुनावों से पहले हजारों समर्थक राजधानी बेलग्रेड की ओर मार्च करते देखे गए हैं। इस आंदोलन की शुरुआत नवंबर 2024 में नोवी साद रेलवे स्टेशन की छत गिरने और उसमें 16 लोगों की मौत के बाद हुई थी। छात्रों ने इस हादसे के जिम्मेदार लोगों पर कड़ी कार्रवाई और निर्माण कार्यों में फैले भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की मांग की थी। उनका आरोप है कि भ्रष्टाचार ने निर्माण की गुणवत्ता और जवाबदेही को पूरी तरह खत्म कर दिया है। धीरे-धीरे इस आंदोलन को आम नागरिकों, किसानों, शिक्षकों और अन्य वर्गों का व्यापक समर्थन मिलने लगा। अब यह आंदोलन चुनावी मैदान में उतर चुका है, जहां स्टूडेंट्स विन नाम से 250 उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं; इनमें विश्वविद्यालय के प्रोफेसर, कलाकार, किसान और यहां तक कि एक लोकप्रिय रैपर भी शामिल हैं।
फ्रांस में महंगाई के खिलाफ फिर सड़कों पर उतरेंगे लोग, 70 हजार सुरक्षाकर्मी तैनात; फुटेज में देंखे 2,700 से ज्यादा गिरफ्तारियां
फ्रांस में Shamonda Virus का पहला इंसानी केस मिला, WHO ने की पुष्टि
हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने फ्रांस में शमोंडा वायरस के पहले इंसानी मामले की पुष्टि की है। फ्रांस के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, संक्रमित व्यक्ति की उम्र 60 साल से ज्यादा थी और उनका इम्यून सिस्टम भी काफ कमजोर था। लेकिन इनका इलाज के दौरान मौत हो गई। वैसे यह वायरस पहले सिर्फ जानवरों में ही पाया गया था और अब आमतौर पर मवेशियों, भेड़ों, बकरियों और घोड़ों को प्रभावित करता है। आइए आपको बताते हैं वायरस क्या है और इंसानों में इसके लक्षण को कैसे करता है। क्या है शमोंडा वायरस? असल में शमोंडा वायरस पहली बार 1960 के दशक में नाइजीरिया के मवेशियों में पाया गया था। इसके बाद से अफ्रीका और एशिया के कुछ हिस्सों में इसके छोटे-मोटे मामले दर्ज किए गए हैं। बता दें कि, यह वायरस श्मालेनबर्ग वायरस परिवार से आता है, जो पशुओं में प्रजनन से संबंधित समस्याएं पैदा होती हैं। इंसानों में शमोंडा वायरस के लक्षण वैसे इंसानों में इस वायरस के संक्रमण का ये पहला मामला पाया गया है। इसलिए इंसानों में इसके लक्षण कैसे हो सकते हैं, इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। लेकिन इंसानों में इसके संक्रमण की वजह मिज, मक्खी जैसे एक छोटे कीड़े को माना जा रहा है। ये कीड़ा संक्रमित पशुओं के काटने के बाद वायरस का कैरियर बन जाता है और इंसानों में ये वायरस फैल सकता है। हालांकि, इसका अभी तक कोई प्रमाण मिला नहीं है कि शमोंडा वायरस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैल सकता है। वहीं, संक्रमित पशुओं के छूने, उनकी देखभाल करने या उनके पास रहने से भी ये वायरस नहीं फैलता। वायरस के बारे जांच जारी वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक, संक्रमित व्यक्ति उस क्षेत्र में पाएं जाते हैं, जहां पशुओं में शमोंडा वायरस फैल रहा था और वहां क्यूलिकोइड्स प्रजाति की मिज मक्खियां मौजूद थीं। वैसे संक्रमण के कारण और इनके खतरों को बेहतर तरीके से जानने के लिए अभी भी इस वायरस पर रिसर्च जारी है।
भारत तो बड़ा खिलाड़ी निकला, यूरोप को दनादन कर रहा गोला-बारूद सप्लाई!
भारत के डिफेंस सेक्रेटरी का यह बयान काफी चर्चा में है, जहां वह बता रहे हैं कि भारत यूरोप को हथियार गोला बारूद एक्सपोर्ट करने वाला तीसरा सबसे बड़ा एक्सपोर्टर बन गया है। वही भारत जो अपनी सैन्य जरूरतों के लिए कभी दुनिया भर की ओर टकटकी लगाकर देखता था वो भारत आज यूरोप का तीसरा सबसे बड़ा हथियार निर्यातक बन चुका है और इसका ऐलान भी खुद भारत के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने किया है। केपीएमजी अग्रसर भारत मंच के कार्यक्रम को संबोधित करते हुए रक्षा सचिव ने यह बड़ा ऐलान किया और बताया कि यूरोपीय देशों में चल रहे रीआर्म यूरोप अभियान और भारत के मजबूत होते घरेलू डिफेंस इकोसिस्टम के दम पर भारत अचानक से यूरोप को सैन्य साजो सामान और हथियार सप्लाई करने वाला तीसरा सबसे बड़ा खिलाड़ी बन चुका है। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने मौजूदा वैश्विक हालात और भारत की छलांग को समझाते हुए कहा कि दुर्भाग्यवश दुनिया के विभिन्न हिस्सों में संघर्ष और भू राजनीतिक अनिश्चितता के कारण हथियारों की होड़ बढ़ रही है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से सक्रिय संघर्षों की संख्या आज अपने उच्चतम स्तर पर है। ऐसे में हथियारों का व्यापार बढ़ना स्वाभाविक है। भारत परंपरागत रूप से बड़ी मात्रा में पारंपरिक गोला बारूद और तोपों के 155 मि.मी. गोले निर्यात करता रहा है। अचानक भारत यूरोप को हथियार निर्यात करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश बन गया है और इसकी मुख्य वजह है आर्टिलरी शेल्स यानी कि तोप के गोलों की जबरदस्त मान। इसे भी पढ़ें: CEC ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग पर Tripura में 30 अक्टूबर को INDIA गठबंधन की रैली रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह बताते हैं कि भारत का कुल रक्षा निर्यात ₹38,424 करोड़ यानी कि लगभग 3.6 बिलियन यूरो के ऐतिहासिक रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है। आज भारत दुनिया के 80 से अधिक देशों को अपने डिफेंस प्लेटफॉर्म्स और हथियार बेच रहा है। रक्षा सचिव इस बात पर जोर देकर बताते हैं कि यह बदलाव रातोंरात नहीं आया है। पिछले 10 सालों में भारत का रक्षा ढांचा 16 सरकारी कंपनियों से निकलकर एक विशाल प्राइवेट और स्टार्टअप हब में बदल चुका है। आज देश में 840 से अधिक लाइसेंस कंपनियां और 17,000 से अधिक एमएसएमईस और स्टार्टअप्स काम कर रही हैं। इसके साथ ही भारत अपने सालाना 20 से 25 बिलियन डॉलर के रक्षा बजट का 75% हिस्सा घरेलू उद्योग मेक इन इंडिया आईडीीडीएम यानी कि इंडियन डिज़ डेवलप्ड एंड मैन्युफैक्चरर्ड पर खर्च कर रहा है। जिससे भारत को तकनीकी संप्रभुता मिल रही है। रूस पर निर्भरता घटाने के बाद भारत फ्रांस, ग्रीस, साइपस जैसे यूरोपीय देशों के साथ जॉइंट वेंचर स्थापित कर रहा है। इसे भी पढ़ें: Amit Shah ने Delhi Police मुख्यालय में की उच्च स्तरीय बैठक, LG और CM रहे मौजूद यूरोप के रक्षा बाजार में गहरी पैड बनाने की योजना भी भारत की है। साफ है कि विश्व शांति की पैरवी करता हुआ भारत आज आत्मनिर्भर रक्षा निर्माण के दम पर उन ताकतों को हथियार बेच रहा है जो कभी भारत को रक्षा सामग्री बेचने में शर्तें लगाया करते थे। मेक इन इंडिया से मेक फॉर द वर्ल्ड का यह सफर भारत के उभरते महाशक्ति की बड़ी गवाही है। हालांकि रक्षा सचिव ने यह भी कहा कि जैसे ही विश्व स्तर पर संघर्षों की संख्या कम होगी, रक्षा निर्यात वापस से अपने सामान्य ग्रोथ रेट पर वापस आ जाएगा। लेकिन यूरोप को हथियार बेचने में तीसरे नंबर का देश बनना भारत के लिए बड़ी कामयाबी है।
फ्रांस : दस मिलियन बैरल गैस ऑयल जारी करने का आदेश दिया
पेरिस, फ्रांस में हिंसा और प्रदर्शन के बाद प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने शनिवार को लोगों को राहत पहुंचाने वाला एक आदेश जारी किया। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर किए गए एक पोस्ट में पीएम सेबेस्टियन ने बताया कि दस मिलियन बैरल गैस ऑयल जारी करने की अनुमति देने वाला आदेश अब जारी कर दिया गया है। उम्मीद है कि इससे गैस ऑयल की कीमत में कुछ कमी आएगी।
आखिर क्यों धधक रहा है फ्रांस और अन्य यूरोपीय देश? पुलिस प्रशासन के सामने क्या हैं चुनौतियाँ?
यूरोप में हिंसक विरोध-प्रदर्शनों, दंगों, आगजनी और पुलिस के साथ टकराव को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर नहीं समझा जा सकता। चूंकि इसके पीछे आर्थिक असंतोष, सामाजिक विभाजन, आव्रजन और एकीकरण की बहस, राजनीतिक ध्रुवीकरण, युवाओं में भविष्य को लेकर चिंता तथा पुलिस और नागरिकों के बीच विश्वास का संकट जैसे कई कारक हो सकते हैं। लेकिन एक बुनियादी अंतर समझना जरूरी है, वह यह कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतांत्रिक अधिकार है, जबकि आगजनी, लूटपाट, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान और लोगों पर हमले अपराध हैं। किसी प्रदर्शन में हिंसा होने का अर्थ यह नहीं कि उसमें शामिल हर व्यक्ति हिंसक है या पूरा समुदाय उसके लिए जिम्मेदार है। शायद इसी भ्रम में देश के देश जल रहे हैं और पुलिस तत्काल बहुत कुछ कर नहीं पाती। इससे आत्ताइयों के हौसले बुलंद हैं और लोकतांत्रिक सोच अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रही है। इसे भी पढ़ें: Vishwakhabram : France में Macron के खिलाफ विद्रोह जैसे हालात, पूरे यूरोप में फैल सकती है जनाक्रोश की आग! भले ही फ्रांस और अन्य यूरोपीय देशों की परिस्थितियाँ भी एक जैसी नहीं हैं। इसलिए यह देखना आवश्यक है कि अशांति किन कारणों से भड़कती है, पुलिस की कार्रवाई कहाँ कठिन हो जाती है और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करते हुए हिंसा रोकने के लिए कौन-से उपाय प्रभावी हो सकते हैं। # सवाल है कि अक्टूबर 2026 में फ्रांस में वास्तव में क्या हो रहा है? तो जवाब होगा कि फ्रांस में सितंबर के अंत से शुरू हुआ छात्र आंदोलन अक्टूबर में व्यापक अशांति में बदल गया। प्रारंभिक असंतोष स्कूलों की खराब सुविधाओं, शिक्षकों की कमी और शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी शिकायतों को लेकर था। बाद में महँगाई, जीवन-यापन की बढ़ती लागत और सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति जैसे मुद्दे भी आंदोलन से जुड़ गए। आखिर पेरिस सहित कई शहरों में लूटपाट, तोड़फोड़ और पुलिस से टकराव हुए। सरकार को बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी तैनात करने पड़े और कुछ क्षेत्रों में रात्रिकालीन कर्फ्यू प्रतिबंध लगाए गए। फ्रांसीसी अधिकारियों ने सुरक्षा व्यवस्था की तैयारियों और हिंसा के पूर्वानुमान में कमियों को भी स्वीकार किया। इसी समय इटली में भी जीवन-यापन की लागत, कम वेतन और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़ी शिकायतों के बीच प्रदर्शन हिंसक हुए। स्पेन और पुर्तगाल में आवास की समस्या को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए हैं। हालांकि, इन सभी घटनाओं के कारण और उनका स्वरूप अलग-अलग हैं। # सवाल है कि आखिर यूरोप में असंतोष बार-बार क्यों भड़कता है? तो इसके कुछ कारण हैं जो निम्नलिखित हैं:- पहला, महँगाई, आवास और आर्थिक असुरक्षा: जब किराया, ऊर्जा, परिवहन और रोजमर्रा के खर्च बढ़ते हैं, लेकिन आय और रोजगार के अवसर उसी गति से नहीं बढ़ते, तो लोगों में व्यवस्था के प्रति नाराजगी बढ़ सकती है। युवाओं के लिए अच्छी शिक्षा, रोजगार और स्वतंत्र जीवन की संभावनाएँ सीमित महसूस होना इस असंतोष को और बढ़ा सकता है। दूसरा, सार्वजनिक सेवाओं पर दबाव: स्कूलों में शिक्षकों की कमी, जर्जर सुविधाएँ और स्थानीय सेवाओं की कमजोर स्थिति नागरिकों को यह महसूस करा सकती है कि उनकी समस्याओं को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं मिल रही। फ्रांस के हालिया आंदोलन में शिक्षा से जुड़ी शिकायतें शुरुआती मुद्दों में शामिल थीं। तीसरा, सामाजिक अलगाव और अवसरों में असमानता: कुछ शहरी और वंचित इलाकों में रोजगार, शिक्षा और सामाजिक उन्नति के अवसरों की कमी असंतोष को गहरा सकती है। यदि नागरिकों को लगता है कि संस्थाएँ उनकी बात नहीं सुनतीं या उनके साथ भेदभाव होता है, तो राज्य पर भरोसा कमजोर पड़ सकता है। लेकिन इसे हर उपद्रव का एकमात्र कारण मानना उचित नहीं होगा। चौथा, राजनीतिक ध्रुवीकरण और आंदोलन का हिंसक हो जाना: किसी जायज मांग के साथ बड़ी संख्या में लोग शांतिपूर्वक जुट सकते हैं, लेकिन कुछ समूह उसी भीड़ का इस्तेमाल तोड़फोड़, लूटपाट या पुलिस को उकसाने के लिए कर सकते हैं। सोशल मीडिया पर तेजी से फैलने वाली तस्वीरें और संदेश भी तनाव बढ़ा सकते हैं। आंदोलन की मांगों और हिंसा करने वाले व्यक्तियों की जिम्मेदारी को अलग-अलग समझना जरूरी है। पाँचवाँ, आव्रजन और राष्ट्रीय पहचान पर विवाद: यूरोप के अनेक देशों में आव्रजन, शरणार्थियों के एकीकरण, राष्ट्रीय पहचान और सार्वजनिक संसाधनों के वितरण पर राजनीतिक बहस चलती रही है। ये विवाद ध्रुवीकरण बढ़ा सकते हैं, लेकिन फ्रांस की अक्टूबर 2026 की हिंसा के लिए किसी विशेष धार्मिक या प्रवासी समुदाय को जिम्मेदार ठहराने के पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि आर्थिक असंतोष हिंसा की पृष्ठभूमि तैयार कर सकता है, लेकिन वह हिंसा को उचित नहीं ठहराता। इसी प्रकार, किसी अपराधी की पहचान या पृष्ठभूमि के आधार पर पूरे समुदाय को दोषी ठहराना भी तथ्यपरक समाधान नहीं है। # सवाल है कि उत्पाती और हिंसक भीड़ पर नियंत्रण में पुलिस क्यों पिछड़ जाती है? तो जवाब होगा कि यह इस पूरे संकट का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू है। अक्टूबर 2026 की फ्रांसीसी घटनाओं में पुलिस की विफलता के कुछ ठोस कारण सामने आए हैं। इन्हें केवल पुलिस की कमजोरी या इच्छाशक्ति की कमी कह देना अधूरा विश्लेषण होगा। एक, खुफिया आकलन और तैयारी में चूक: फ्रांस में 17 अक्टूबर के प्रदर्शनों के लिए भीड़ का अनुमान वास्तविक संख्या से काफी कम रहा। आंतरिक मंत्रालय के शुरुआती अनुमान लगभग 60,000–110,000 प्रदर्शनकारियों के थे, जबकि बाद में संशोधित अनुमान 200,000 तक पहुँचे और मंत्रालय ने वास्तविक उपस्थिति लगभग 550,000 बताई। यह सरकारी अनुमान है, स्वतंत्र रूप से सत्यापित अंतिम गणना नहीं। इतनी बड़ी भीड़ के बीच हिंसा करने वाले छोटे समूहों की पहचान और सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा कठिन हो जाती है। दो, पुलिस बल की तैनाती और संसाधनों का असंतुलन: यदि कई शहरों में एक साथ हिंसा फैलती है, तो पुलिस को लोगों की सुरक्षा, दुकानों की रक्षा, यातायात नियंत्रण और हिंसक घटनाओं पर कार्रवाई जैसे अनेक काम करने पड़ते हैं। फ्रांस की हालिया घटनाओं में पुलिसकर्मियों की संख्या और तैनाती के समय को लेकर भी सवाल उठे। तीन, शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी और हिंसा करने वाले एक ही भीड़ में:पुलिस के सामने यह कठिन चुनौती रहती है कि हिंसा करने वालों पर कार्रवाई करते हुए शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और आसपास के आम नागरिकों को नुकसान से कैसे बचाया जाए। जल्दबाजी में की गई कार्रवाई तनाव बढ़ा सकती है, जबकि देर करने पर तोड़फोड़ और लूटपाट का दायरा बढ़ सकता है। चार, पुलिस की कठोर कार्रवाई के कानूनी और सामाजिक परिणाम: फ्रांस में प्रदर्शन के दौरान बल प्रयोग की आवश्यकता, उसकी आनुपातिकता और कुछ पुलिसकर्मियों के आचरण को लेकर जाँच चलती रही है। अक्टूबर में छात्र प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में पुलिस के कथित अनुचित आचरण की 18 आंतरिक जाँचें शुरू होने की खबर आई। इसका अर्थ यह नहीं कि हर पुलिस कार्रवाई गलत थी। लेकिन बल का अनुचित प्रयोग नागरिकों का भरोसा घटा सकता है और तनाव बढ़ा सकता है। पांच, पुलिस थकान, समन्वय और बदलती परिस्थितियाँ: लगातार कई दिनों तक आंदोलन चलने पर पुलिसकर्मियों की उपलब्धता, स्थानीय इकाइयों और विशेष प्रशिक्षित बलों के बीच समन्वय तथा बदलती परिस्थितियों के अनुसार रणनीति बदलने की क्षमता महत्त्वपूर्ण हो जाती है। फ्रांस की घटनाओं में इन पहलुओं पर भी सवाल उठे हैं। # सवाल है कि क्या पुलिस को और अधिक कठोर बना देना ही समाधान है? तो जवाब होगा कि नहीं, सवाल केवल कठोरता का नहीं बल्कि समय पर कार्रवाई, निश्चित जवाबदेही, कानून का समान अनुपालन और सही रणनीति का है। यूरोप की परिषद की संसदीय सभा की 2025 की रिपोर्ट में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच संवाद, मध्यस्थता, विशेष प्रशिक्षण, नागरिकों के भरोसे और बल के सीमित व आनुपातिक उपयोग पर जोर दिया गया था। रिपोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि कुछ आंदोलनों में संगठित हिंसक समूह शांतिपूर्ण विरोध को बिगाड़ सकते हैं। पुलिस प्रशासन को तीन परिस्थितियों में अंतर करना चाहिए: एक, उपयुक्त प्रशासनिक दृष्टिकोण: शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा, संवाद और प्रदर्शन के अधिकार की रक्षा। दो, तनावपूर्ण भीड़, हिंसा का जोखिम: प्रशिक्षित बल, समन्वय, स्पष्ट चेतावनी और तनाव कम करने के उपाय। तीन, आगजनी, लूटपाट या लोगों पर हमला: त्वरित एवं लक्षित कानूनी कार्रवाई, साक्ष्य जुटाना और दोषियों की जवाबदेही। लिहाजा लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस को न तो हिंसा के सामने निष्क्रिय रहना चाहिए, न ही पूरी भीड़ को अपराधी मान लेना चाहिए। # आखिर हिंसक भीड़ से निपटने का ठोस और दीर्घकालिक इलाज क्या है? पहला, बेहतर पूर्वानुमान और खुफिया समन्वय: बड़े प्रदर्शनों के संभावित आकार, संवेदनशील स्थानों और हिंसा के जोखिम का समय रहते आकलन किया जाए। वैध प्रदर्शन और हिंसा की तैयारी में अंतर रखा जाए; केवल राजनीतिक विचारों के आधार पर लोगों को संदिग्ध न माना जाए। दूसरा, प्रशिक्षित पुलिस और स्पष्ट कमान: भीड़ प्रबंधन के लिए विशेष प्रशिक्षण, एकीकृत कमान, पर्याप्त संसाधन और नागरिकों को सुरक्षित रखने की स्पष्ट जिम्मेदारी हो। बल का प्रयोग कानून के अनुसार आवश्यक और आनुपातिक होना चाहिए। तीसरा, अपराधियों की पहचान और शीघ्र न्याय: जहाँ कानूनी रूप से अनुमत हो, वहाँ उपलब्ध वीडियो, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और अन्य विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय की जाए। गिरफ्तारी, अभियोजन और न्यायिक प्रक्रिया कानून के अनुरूप हो; निर्दोष लोगों को सामूहिक दंड न दिया जाए। चौथा, पुलिस की जवाबदेही भी सुनिश्चित हो: कार्रवाई की स्वतंत्र समीक्षा, शिकायतों की निष्पक्ष जाँच और गलत आचरण पर उचित दंड आवश्यक हैं। इससे पुलिस का अधिकार कमजोर नहीं, बल्कि उसकी वैधता और नागरिकों का विश्वास मजबूत होता है। पाँचवाँ, सामाजिक असंतोष के मूल कारणों पर काम: शिक्षा, रोजगार, आवास, सार्वजनिक सेवाओं और भेदभाव से जुड़ी शिकायतों को गंभीरता से सुना जाए। केवल पुलिस बल बढ़ाकर उन समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता जो लगातार नई अशांति को जन्म देती हैं। # आखिर भारत के लिए इसमें क्या सबक निहित है? फ्रांस का अनुभव भारत के लिए भी प्रासंगिक है, क्योंकि भारत में भी बड़े जनसमूह, राजनीतिक रैलियाँ, धार्मिक आयोजन, छात्र आंदोलन और स्थानीय विरोध-प्रदर्शन पुलिस प्रशासन के सामने अलग-अलग चुनौतियाँ पैदा कर सकते हैं। भारत के संदर्भ में पाँच सबक महत्त्वपूर्ण हैं: एक, कानून का समान पालन: राजनीतिक समर्थन, विरोध या सामाजिक पहचान के आधार पर कार्रवाई का मानक नहीं बदलना चाहिए। दो, भीड़ से पहले तैयारी: आयोजकों, स्थानीय प्रशासन, आपातकालीन सेवाओं और पुलिस के बीच समन्वय हो। तीन, हिंसा पर लक्षित कार्रवाई: शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और हिंसा करने वालों को अलग-अलग देखा जाए। चार, डिजिटल साक्ष्य और जवाबदेही: अफवाहों की जाँच हो, साक्ष्य सुरक्षित रखे जाएँ और गलत सूचना फैलाने वालों पर भी कानून के अनुसार कार्रवाई हो। पांच, नागरिक विश्वास: पुलिस की निष्पक्षता, पारदर्शिता और शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई को प्राथमिकता मिले। इन उपायों का उद्देश्य केवल भीड़ को तितर-बितर करना नहीं, बल्कि हिंसा को रोकना और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है। # वस्तुत: समस्या पुलिस की ताकत से बड़ी है: फ्रांस की अक्टूबर 2026 की घटनाएँ दिखाती हैं कि बड़े पैमाने की अशांति में खुफिया आकलन की चूक, अपर्याप्त या असंतुलित तैनाती, पुलिस थकान और आंदोलन के भीतर हिंसक समूहों की मौजूदगी मिलकर गंभीर संकट पैदा कर सकते हैं। दूसरी ओर, बल का अनुचित प्रयोग और सामाजिक शिकायतों की उपेक्षा भी संस्थाओं के प्रति अविश्वास बढ़ा सकती है। लोकतांत्रिक राज्य की असली परीक्षा यह है कि वह शांतिपूर्ण विरोध की रक्षा करे, हिंसक अपराधों को रोके और दोनों काम कानून की मर्यादा में रहते हुए करे। केवल दमन से असंतोष समाप्त नहीं होता और केवल संवाद से तत्काल हिंसा नहीं रुकती। प्रभावी व्यवस्था को दोनों की जरूरत है—अपराध पर निष्पक्ष कानूनी कार्रवाई और असंतोष के कारणों का गंभीर समाधान। यही दृष्टिकोण पुलिस प्रशासन को प्रभावी तथा लोकतंत्र को अधिक सुरक्षित बना सकता है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
फ्रांस में हिंसा की आशंका, 70 हजार सुरक्षाकर्मी तैनात; भारतीय नागरिकों के लिए एडवाइजरी जारी
फ्रांस में संभावित हिंसक प्रदर्शनों को देखते हुए भारत के विदेश मंत्रालय ने अपने नागरिकों को सतर्क रहने की सलाह दी है। भारतीय नागरिकों से भीड़भाड़ वाले इलाकों और प्रदर्शन स्थलों से दूर रहने तथा बाहर निकलने से पहले स्थानीय परिस्थितियों की जानकारी लेने को कहा गया है।
Kangra News: फ्रांस में हिमाचल का प्रतिनिधित्व करेंगी सीमा
भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) की पालमपुर शाखा की वरिष्ठ अभिकर्ता सीमा चौधरी का चयन फ्रांस में आयोजित होने वाले शैक्षिक सेमिनार के लिए हुआ है।
मुख्यमंत्री भगवंत मान को लाहौर में विश्व पंजाबी सम्मेलन में शामिल होने का न्योता मिला है, जिस पर उन्होंने केंद्र द्वारा विदेश यात्राओं पर रोक का जिक्र किया।
आखिर क्यों धधक रहा है फ्रांस और अन्य यूरोपीय देश? पुलिस प्रशासन के सामने क्या हैं चुनौतियाँ?
धधक रहा है फ्रांस और अन्य यूरोपीय देश The post आखिर क्यों धधक रहा है फ्रांस और अन्य यूरोपीय देश? पुलिस प्रशासन के सामने क्या हैं चुनौतियाँ? appeared first on प्रवक्ता.कॉम - Pravakta.Com .
लखनऊ: स्नातक एमएलसी चुनाव का मतदान शुरू, तेलीबाग के सेंट फ्रांसिस मिशन स्कूल बना केंद्र
लखनऊ: स्नातक एमएलसी चुनाव का मतदान शुरू, तेलीबाग के सेंट फ्रांसिस मिशन स्कूल बना केंद्र
फ्रांस से आए सैलानियों ने विद्यार्थियों से की सार्थक चर्चा व साझा किए अनुभव
फ्रांस से आए विदेशी सैलानी केविन और उनके परिवार के सदस्यों ने स्कूली बच्चों से रूबरू होकर संवाद किया। द नारायण स्कूल में विद्यार्थियों द्वारा विदेशी मेहमानों का स्वागत किया गया। इसके बाद विदेशी मेहमानों ने विद्यालय के छात्र छात्राओं से संवाद किया और अपने अनुभव साझा किए। बच्चों को फ्रांस की संस्कृति, सामाजिक परंपराओं, जीवनशैली और शिक्षा प्रणाली को करीब से जानने का अवसर मिला। विद्यालय प्रबंधन ने कहा कि वास्तविक शिक्षा केवल कक्षाओं की चारदीवारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दुनिया भर की संस्कृतियों को जोड़ने का सशक्त माध्यम है। इस तरह के प्रेरणादायक संवाद से बच्चों में विविधता को अपनाने, विभिन्न परंपराओं का सम्मान करने और जागरूक वैश्विक नागरिक बनने की भावना विकसित होती है। विद्यालय परिवार ने केविन और उनके परिवार का आभार व्यक्त किया।
मप्र सरकार के नए हाईटेक हेलीकॉप्टर की डिलीवरी नवंबर माह के आखिर तक होने की संभावना है। फ्रांस की एयरबस कंपनी से खरीदे जा रहे एसीएच160 हेलीकॉप्टर को लेकर विमानन विभाग ने तैयारियां शुरू कर दी हैं। हालांकि, डिलीवरी की तारीख अभी तय नहीं हुई है। विमानन विभाग के सूत्रों के मुताबिक हेलीकॉप्टर फ्रांस से उड़कर सीधे भारत नहीं आएगा। इसकी दूरी अधिक होने के कारण कंपनी इसे अलग-अलग पुर्जों के रूप में समुद्री मार्ग से मुंबई पोर्ट तक पहुंचाएगी। वहां से पुर्जों को भारत में मौजूद एयरबस की किसी फाइनल असेंबली लाइन भेजा जाएगा। इनमें वडोदरा, बेंगलुरू या नोएडा को चुना जा सकता है, जहां हेलीकॉप्टर को असेंबल किया जाएगा। इसके बाद तैयार हेलीकॉप्टर को उड़ाकर भोपाल लाया जाएगा। डिलीवरी से पहले कंपनी इसका फ्लाइट टेस्ट करेगी, ताकि सुरक्षा मानकों और तकनीकी प्रदर्शन की जांच की जा सके। नए हेलीकॉप्टर के लिए दो पायलट फ्रांस में प्रशिक्षण ले चुके हैं। राज्य सरकार ने आदर्श राय और संजय श्रीवास्तव को फ्रांस में एसीएच160 उड़ाने का प्रशिक्षण दिलाया है। दोनों पायलट सरकार की ओर से हेलीकॉप्टर की डिलीवरी स्वीकार करने की प्रक्रिया में शामिल होंगे। 9 सीटर होगा... नए हेलीकॉप्टर में 2 क्रू मेंबर के अलावा 9 यात्री बैठेंगे। टेकऑफ भार क्षमता 6050 किलो और स्लिंग लोड 1600 किलो होगा। 2011 में खरीदे ईसी155 बी1 में 6 यात्री और 2 क्रू मेंबर बैठते हैं। इसकी टेकऑफ भार क्षमता 4920 किलो है। मूल कीमत करीब 125 करोड़, लेकिन टैक्स और इंटीरियर के कारण 225 होगी लागत... एयरबस एसीएच 160, एयरबस एच160 हेलीकॉप्टर का कॉर्पोरेट और प्राइवेट कैटेगरी की फ्लीट है। इसमें दो इंजन हैं और इसे वीआईपी यात्राओं के लिए विशेष इंटीरियर के साथ तैयार किया जा सकता है। मप्र सरकार ने मुख्यमंत्री की सरकारी यात्राओं और राज्य में वीवीआईपी दौरे से जुड़ी जरूरतों के अनुसार इसका इंटीरियर डिजाइन कराया है। सरकार से अनुबंध के मुताबिक हेलीकॉप्टर की मूल कीमत करीब 125 करोड़ रुपए है। लेकिन इस पर करीब 35 प्रतिशत टैक्स (आईजीएसटी, आयात शुल्क, डीजीसीए शुल्क आदि) चुकाना पड़ेगा, जो करीब 78.75 करोड़ रुपए बैठता है। इसके अलावा करीब 20 करोड़ रुपए इसके कस्टमाइजेशन, इंटीरियर पर खर्च होने का अनुमान है। इस तरह इसकी कुल लागत 225 करोड़ पहुंच सकती है।
फ्रांसीसी बहुराष्ट्रीय कंपनी रॉकेट ने उत्तर प्रदेश में मक्का आधारित उद्योगों में निवेश की सहमति दी है, जबकि एडेइस ने भी औद्योगिक परियोजनाओं में रुचि दिखाई है। यह निवेश योगी सरकार की अनुकूल नीतियों और कृषि उत्पादों की उपलब्धता से आकर्षित होकर हुआ है, जिससे कृषि और रोजगार को बढ़ावा मिलेगा।
फ्रांस में विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा और लूटपाट पर दिल्ली के छात्र नेताओं ने चिंता जताई है। उन्होंने शांतिपूर्ण प्रदर्शन और अराजकता के बीच अंतर बताते हुए ऐसी गतिविधियों को अनुचित ठहराया है।
विचार: बड़े संकट की ओर बढ़ता यूरोप
यूरोप की समस्या केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरे आर्थिक और राजनीतिक कारण भी हैं।
जागरण संपादकीय: संकट में यूरोप
यूरोप और पश्चिम के अन्य देश जिन समस्याओं से घिरे हैं, उनके लिए वही अधिक जिम्मेदार हैं। ये देश हिंसक प्रदर्शनों को इसलिए नियंत्रित नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि लोगों की जायज चिंताओं के बहाने अराजकता फैलाने वालों को कुछ ऐसी शक्तियां भड़काने में लगी हुई हैं, जो अपने संकीर्ण हितों की पूर्ति करना चाहती हैं। इनमें इस्लामिस्टों और कम्युनिस्टों के गठजोड़ की भूमिका कहीं अधिक दिखाई दे रही है।
France Protest Update News: मॉल लूटे, गाड़ियां फूंकी... फ्रांस में बेकाबू हुई हिंसा| Emmanuel Macron
France Protest Update News: फ्रांस में बढ़ती महंगाई और जीवन-यापन की बढ़ती लागत के खिलाफ प्रदर्शन ने कई जगह हिंसक रूप ले लिया। पेरिस समेत कई शहरों में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प हुई। आगजनी, तोड़फोड़ और लूटपाट की घटनाओं से हालात बिगड़ गए।
फ्रांस की हिंसा पर बोलीं कंगना रनौत, रिजीम चेंज पर भी दिया बयान
विपक्ष की ओर से सत्ता परिवर्तन को लेकर दिए गए बयानों पर बीजेपी सांसद कंगना रनौत ने कहा, 'इस तरह की ओछी हरकतें देश को लगातार यह याद दिलाती हैं कि एक मजबूत नेतृत्व की कितनी जरूरत है.'
फ्रांस में कुछ ठीक नहीं हो रहा: बढ़ता कर्ज, नाराज युवा और राजनीतिक संकट ने बढ़ाई मुश्किलें
फ्रांस में कुछ ठीक नहीं हो रहा: बढ़ता कर्ज, नाराज युवा और राजनीतिक संकट ने बढ़ाई मुश्किलें
फ्रांस में सैकड़ों सुपरमार्केट्स के रेफ्रिजरेशन सिस्टम पर सोमवार को बड़ा साइबरअटैक हुआ। इससे 480 से ज्यादा दुकानों के फ्रिज और फ्रीजर का तापमान 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। फ्रांसीसी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हैकरों ने कई स्टोर्स के रेफ्रिजरेशन सिस्टम को डीफ्रॉस्टिंग मोड में डाल दिया। इससे ताजा और फ्रोजन खाना खराब हो गया। कई स्टोर्स में आग भी लग गई। फ्रांस की बड़ी रिटेल कंपनियों ने इसे अब तक का ऐसा पहला और बेहद गंभीर हमला बताया। प्रधानमंत्री ने जांच के आदेश दिए फ्रांस के प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नू ने नेशनल साइबरसिक्योरिटी एजेंसी ANSSI को जांच के आदेश दिए हैं। फ्रांस दूसरे यूरोपीय देशों के साथ मिलकर यह भी जांच कर रहा है कि वहां और कंपनियां प्रभावित हुई हैं या नहीं। पेरिस प्रॉसिक्यूटर ऑफिस ने इसे बड़े स्तर का हमला बताया। ऑफिस के मुताबिक, पूरे फ्रांस में कई बड़े फूड रिटेलर्स के इंटरनेट से जुड़े फ्रिजों को निशाना बनाया गया। आखिर इन फ्रिजों का तापमान कैसे बढ़ाया गया? सुपरमार्केट में फ्रिज और फ्रीजर को आमतौर पर कंट्रोल पैनल से चलाया जाता है। ये पैनल पूरे स्टोर के ठंडक वाले सिस्टम को कंट्रोल करते हैं। इंटरनेट से जुड़े होने के कारण मेंटेनेंस करने वाली कंपनियां दूर बैठकर भी इनकी सेटिंग बदल सकती हैं। अगर कोई हैकर इस सिस्टम तक पहुंचने में कामयाब हो जाए, तो वह फ्रिज और फ्रीजर की सेटिंग बदल सकता है। ऐसा करने के लिए हैकर सिस्टम की सुरक्षा में मौजूद किसी कमजोरी का फायदा उठाता है। इस तरह वह फ्रिज और फ्रीजर की ठंडक कम कर सकता है या डीफ्रॉस्टिंग शुरू कर सकता है। डीफ्रॉस्टिंग वह प्रक्रिया है, जिसमें फ्रिज या फ्रीजर में जमी बर्फ पिघलाई जाती है। डेनमार्क की कंपनी के फ्रिज कंट्रोलिंग सॉफ्टवेयर में खराबी प्रधानमंत्री कार्यालय के एक अधिकारी के मुताबिक, फ्रांस की साइबर सिक्योरिटी एजेंसी ने डेनमार्क की कंपनी डैनफॉस के सॉफ्टवेयर में एक कमजोरी की पहचान की है। इसी कंपनी के बनाए सिस्टम से सुपरमार्केट के फ्रिज और फ्रीजर कंट्रोल होते हैं। डैनफॉस ने कहा कि उसे फ्रांस में फ्रिज और फ्रीजर के सिस्टम से जुड़ी कुछ घटनाओं की जानकारी है। कंपनी के मुताबिक, इनमें सॉफ्टवेयर का पुराना वर्जन इस्तेमाल हो रहा था। कंपनी ने बताया कि वह ग्राहकों को लंबे समय से सॉफ्टवेयर अपडेट रखने और पुराने उपकरण बदलने की सलाह देती रही है। इससे पहले 9 अगस्त को साइबर सिक्योरिटी कंपनी क्लैरोटी ने डैनफॉस के सिस्टम में मौजूद कुछ कमजोरियों पर एक रिपोर्ट जारी की थी। इसमें बताया गया था कि इन कमजोरियों का फायदा उठाकर हमलावर बिना सही पहचान जांच के सिस्टम तक पहुंच सकते हैं। फ्रांस के रिटेल कारोबार से जुड़े संगठन FCD ने डैनफॉस से इस मामले में पूरी जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की है। रिटेल कंपनियां बोलीं- कई करोड़ यूरो का नुकसान अभी तक पूरे रिटेल सेक्टर को हुए नुकसान का कुल आंकड़ा सामने नहीं आया है। हालांकि, फ्रांस की रिटेल कंपनी इंटरमार्शे के CEO थिएरी कोटियार ने कहा कि इस हमले से देशभर में एक ही दिन में कई करोड़ यूरो का नुकसान हो सकता है। इंटरमार्शे ने AFP को बताया कि प्रभावित स्टोर को खराब हुए सभी ताजा और फ्रोजन प्रोडक्ट फेंकने पड़ेंगे। वहीं, दूसरी कंपनी कोऑपरेटिव यू के CEO डोमिनिक शेल्शर ने कहा कि रविवार रात से ही कंपनी के रेफ्रिजरेशन सिस्टम में दिक्कतें आ रही थीं। उन्होंने बताया कि ताजा सामान को सुरक्षित रखने और लोगों तक खाने-पीने की चीजें पहुंचाने वाले सिस्टम को निशाना बनाना बेहद गंभीर है। उन्होंने इसे अस्वीकार्य बताया और कहा कि ऐसा हमला पहले कभी नहीं हुआ। ------------------------- ये खबर भी पढ़ें… इजराइल ने इंडोनेशियाई पालयट के कारण विमान उतरने नहीं दिया: फ्लाइट वापस लौटी; फ्लाईदुबई हादसे के बाद 11 देशों के पायलट पर रोक लगाई इथियोपियन एयरलाइंस के एक कार्गो विमान को इजराइल में उतरने की मंजूरी नहीं मिली। इथियोपिया की राजधानी अदीस अबाबा से आए इस विमान को बीच रास्ते से वापस लौटना पड़ा। इजराइल ने यह फैसला पायलट के इंडोनेशियाई नागरिक होने के कारण लिया। पूरी खबर पढ़ें…
फ्रांस के स्टूडेंट्स प्रोटेस्ट में ट्रंप का बड़ा दावा
फ्रांस में स्कूल और यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स प्रोटेस्ट अब देश की राजनीति और अमेरिका तक पहुंच गया है. शुरुआत शिक्षकों, नर्स और स्टाफ की कमी को लेकर हुई, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे बड़े पैमाने पर प्रवासन और इस्लाम से जोड़ दिया. वहीं फ्रांसीसी अधिकारियों और छात्र संगठनों के मुताबिक आंदोलन की शुरुआती मांगें स्कूलों की सुविधाओं और कर्मचारियों से जुड़ी हैं. सोशल मीडिया पर पुराने वीडियो और भ्रामक दावों ने भी विवाद बढ़ाया है.
फ्रांस में छात्र प्रदर्शन: अबतक 5 हजार गिरफ्तार, इनमें 87% नाबालिग
फ्रांस में शिक्षा व्यवस्था की बदहाली के खिलाफ छात्रों का गुस्सा सड़कों पर है. इस आंदोलन में गिरफ्तार किए गए 5,000 से ज्यादा लोगों में 87 प्रतिशत नाबालिग हैं. स्कूलों में शिक्षकों की कमी, खराब इमारतों और बुनियादी सुविधाओं की कमी से छात्र परेशान हैं. प्रदर्शन के दौरान हिंसा और पुलिस कार्रवाई ने सरकार के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है.
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फिजिक्स का नोबेल पुरस्कार 2026 प्रोफेसर फ्रांसिस हाल्जेन को अंटार्कटिका में आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी की स्थापना और ब्रह्मांडीय न्यूट्रिनो की खोज के लिए दिया गया है।
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श्वेता तिवारी के लिए यूरोपियन विदेशी दूल्हा ढूंढेंगी मल्लिका, बनाया प्लान
‘द ट्रेटर्स 2’ में श्वेता तिवारी की लव लाइफ पर मल्लिका शेरावत ने मजेदार बात कही. मल्लिका बोलीं कि वह श्वेता के लिए एक अच्छा यूरोपियन लड़का ढूंढेंगी.
जलवायु परिवर्तन का संकट झेलने लगा यूरोप
यूरोप में जो लोग समझते थे कि जलवायु परिवर्तन भविष्य की पीढ़ियों के लिए समस्या है उन्हें इस बार की गर्मियों ने सच्चाई बता दी है. जलवायु परिवर्तन के महंगे और जीवन बदलने वाले आर्थिक नतीजे यूरोप को अपनी चपेट में ले चुके हैं
यूरोप में भीषण गर्मी का कहर... इटली में रेड अलर्ट, ऑस्ट्रिया में तापमान का टूटा रिकॉर्ड
यूरोप में भीषण गर्मी और लू ने कई देशों के तापमान रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. इटली सरकार ने 27 प्रमुख शहरों को रेड अलर्ट पर रखा है. ऑस्ट्रिया में तापमान 41.2 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है, जो अब तक का सबसे ज्यादा तापमान है. इस गर्मी और सूखे का असर बिजली उत्पादन, परिवहन और पर्यटन पर भी पड़ा है. पर्यावरणविद ग्लोबल वार्मिंग को इस स्थिति का मुख्य कारण मानते हैं.
'यूरोप के दरवाजे' में घुस रहे 57 अफ्रीकियों को स्पेन ने क्यों मारा?
स्पेन की पुलिस बॉर्डर पर अलर्ट खड़ी है. पुलिस की गोलियों से अंदर घुसने की कोशिश कर रहे कई प्रवासियों की मौत हो चुकी है. 'यूरोप का दरवाजा' कहा जाने वाला स्यूटा शहर में प्रवासियों की बाढ़ ने इस शहर में कानून-व्यवस्था का संकट खड़ा कर दिया है.
फ्रांस में पहली बार दिखा आग का बादल आखिर है क्या?
अभूतपूर्व जंगल की आग से जूझते फ्रांस में पहली बार फायर क्लाउड यानी आग के बादल बनते देखा गया है. आखिर आग के बादल होते क्या हैं और इनका क्या असर होता है. फ्रांस में इसे देखने के बाद क्यों चिंता बढ़ रही है
60 की उम्र में मिलिंद सोमन ने रचा इतिहास, यूरोप से अफ्रीका तक तैरकर पार किया स्ट्रेट ऑफ जिब्राल्टर
अभिनेता और फिटनेस आइकन मिलिंद सोमन ने एक बार फिर अपनी अद्भुत सहनशक्ति और फिटनेस का परिचय दिया है। 60 साल की उम्र में मिलिंद सोमन ने स्ट्रेट ऑफ जिब्राल्टर को तैरकर पार करने का एक कठिन और साहसी कारनामा कर दिखाया है। मिलिंद ने यूरोप और अफ्रीका के बीच ...
फ्रांस के मशहूर अभिनेता एलेन डेलन का निधन, 88 वर्ष की उम्र में ली अंतिम सांस
Alain Delon passes away: 'द लेपर्ड' और 'रोक्को एंड हिज ब्रदर्स' जैसी सुपर हिट फिल्मों में अभिनय का जौहर दिखाने वाले फ्रांस के मशहूर अभिनेता एलेन डेलन का निधन हो गया है। एलेन डेलन ने 88 वर्ष की उम्र में आखिरी सांस ली। अभिनेता के पारिवारिक सूत्रों ने ...
इटली से फ्रांस तक समंदर के बीच होगा Anant-Radhika का दूसराप्री वेडिंग फंक्शन, जानिए मेहमानों से लेकरड्रेस कोड तक सबकुछ
Heeramandi के बाद अब Cannes में अपनी 'गजगामिनी चाल' दिखाएंगी Aditi Rao Haidari,फ्रांस के लिए रवाना हुईबिब्बोजान
यूरोप से लेकर Sri Lanka तक इन देशो में शूट हुई है Surya और Bobby Deol की फिल्म Kanguva, बजट उड़ा देगा होश

