हरदा में पहली फीडर रेटेड इंटरनेशनल रैपिड शतरंज प्रतियोगिता 24 जनवरी 2026 को हरदा डिग्री कॉलेज परिसर में संपन्न हुई। इस अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में भारत, फ्रांस और श्रीलंका सहित 350 से अधिक खिलाड़ियों ने भाग लिया। इसका आयोजन कलेक्टर हरदा सिद्धार्थ जैन के संरक्षण में किया गया। प्रतियोगिता पूरी तरह अनुशासित, सुव्यवस्थित और फीडर के अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप आयोजित की गई। कुल 9 राउंड में खेले गए इस टूर्नामेंट में खिलाड़ियों ने अपनी रणनीति, एकाग्रता और खेल कौशल का प्रदर्शन किया। मैचों का लाइव स्क्रीन पर प्रसारण भी किया गया, जिससे दर्शक हर चाल का आनंद ले सके। इंटरनेशनल मास्टर (IM) एंटोनी बौर्नेल (फ्रांस) और वूमेन इंटरनेशनल मास्टर (WIM) सचिनी रणसिंघे (श्रीलंका) की सहभागिता ने इस प्रतियोगिता को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। भारत के ख्यातिप्राप्त खिलाड़ी डीके.शर्मा, अक्षत खंपारिया, एसके. लशर्मा, कैंडिडेट मास्टर (CM) प्रखर बजाज सहित कई राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों ने भी इसमें हिस्सा लिया। IM एंटोनी बौर्नेल ने प्रथम स्थान प्राप्त कियामुख्य वर्ग में IM एंटोनी बौर्नेल (फ्रांस) ने प्रथम स्थान प्राप्त किया, जबकि अनादकट कार्तव्या (गुजरात) दूसरे और CM प्रखर बजाज (मध्यप्रदेश) तीसरे स्थान पर रहे। 2000 से कम रेटिंग वर्ग में वेदांत भारद्वाज, रवि पलसुले और पांडेय अभिषेक विजेता रहे। 1700 से कम रेटिंग वर्ग में हरि, गुप्ता आरके. और धुरिया मुकेश ने जीत हासिल की। अनरेटेड वर्ग में साकिब शेख, आदर्श चक्रवर्ती और अनव अग्रवाल ने शीर्ष स्थान प्राप्त किया। वरिष्ठ वर्ग (S-60) में FM राठौर एस.के., चतुर्वेदी नरेंद्रनाथ और गुप्ता आर. के. विजेता रहे। महिला वर्ग में तुर्किया दिव्यांशी, सिद्धि यादव और WIM सचिनी रणसिंघे ने पुरस्कार जीते। हरदा जिला वर्ग में सिद्धार्थ जैन, काजी सद्दाम पठान और यश पचोरी ने बाजी मारी। मध्यप्रदेश वर्ग में सूरज चौधरी, युवराज जायसवाल और सुनील जैन विजेता बने। अंडर-13 वर्ग में शिवांश यादव, तुर्किया यश और आर्यन सोलंकी ने जीत दर्ज की। अंडर-11 वर्ग में अयचित रिद्धेश, गुप्ता कबीर और देवांश पटेल ने, जबकि अंडर-9 वर्ग में राघव सिंह, तुर्किया दिव्यांशी और सिद्धि यादव ने पुरस्कार जीते। अंडर-7 वर्ग में माहिर साहू और निर्वाण जैन विजेता रहे। राष्ट्रीय बालिका दिवस के अवसर पर बालिकाओं को विशेष पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया, जिसकी अभिभावकों और अतिथियों ने सराहना की। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) इस कार्यक्रम का मुख्य प्रायोजक रहा। खिलाड़ियों के लिए उत्कृष्ट भोजन, ठहरने की व्यवस्था, तकनीकी सुविधा और लाइव डिस्प्ले की व्यवस्था की गई थी। अभिभावकों और अतिथियों ने कहा कि ऐसे आयोजन बच्चों की एकाग्रता, अनुशासन और बहुमुखी प्रतिभा को निखारते हैं। यह प्रतियोगिता हरदा के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि साबित हुई है।
India-EU Trade Deal: भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील अटकी हुई है, लेकिन ट्रेड वॉर के बीच भारत सबसे बड़ी डील साइन करने जा रहा है. भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच 'मदर ऑफ ऑल डील' होने जा रही है. इस डील के साथ ही भारत और यूरोपीय देशों के बीच कारोबार आसान और तेज हो जाएगा.
EU On Trump Tariff: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप रट लगाए बैठे थे कि उन्हें ग्रीनलैंड किसी भी कीमत पर चाहिए. कभी टैरिफ तो कभी धमकी देकर वो ग्रीनलैंड हासिल कपना चाहते थे, लेकिन दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान उन्होंने ग्रीनलैंड पर अचानक यूटर्न ले लिया.
Albania News: ईरान में काफी संख्या में लोग सड़कों पर हैं, इसी बीच अल्बानिया की राजधानी तिराना में हजारों लोग सरकार के खिलाफ प्रदर्शन में सड़कों पर उतर आए हैं. यहां पर प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हिंसक झड़प भी हुई.
यूरोपीय काउंसिल की अध्यक्ष उर्सुला वॉन पहुंची भारत, गणतंत्र दिवस समारोह में होंगी मुख्य अतिथि
यूरोपीय काउंसिल (ईसी) की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन भारत पहुंच चुकी हैं। भारत में केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद ने ईसी अध्यक्ष का स्वागत किया। ईयू नेताओं के इस दौरे को बेहद खास दृष्टिकोण से देखा जा रहा है
2014 में जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे रिपब्लिक डे के चीफ गेस्ट बने। उसी साल भारत-जापान ने मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट के लिए समझौता किया। 2015 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा मुख्य अतिथि बने। अमेरिका ने भारत को 'मेजर डिफेंस पार्टनर' घोषित किया। 2016 में फ्रेंच राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद चीफ गेस्ट बने। उनके दौरे में ही भारत-फ्रांस ने 36 राफेल फाइटर जेट्स का एग्रीमेंट साइन किया। रिपब्लिक डे के चीफ गेस्ट आमतौर पर उन्हीं देशों से होते हैं, जहां भारत तवज्जो देना चाहता है। 77वें गणतंत्र दिवस परेड के लिए भारत ने यूरोपीय यूनियन के टॉप-2 लीडर्स को चीफ गेस्ट बनाया है- उर्सुला वॉन और एंतोनियो कोस्टो। आखिर भारत ने यूरोपीय यूनियन के लीडर्स को न्योता क्यों दिया, कैसे चुने जाते हैं रिपब्लिक डे के चीफ गेस्ट और इससे भारत क्या हासिल करता है, जानेंगे भास्कर एक्सप्लेनर में… सवाल-1: यूरोपीय यूनियन के नेताओं को भारत ने रिपब्लिक डे का चीफ गेस्ट क्यों बनाया? जवाब: यूरोपीय यूनियन किसी एक देश की तरह नहीं, बल्कि 27 देशों के ब्लॉक की तरह काम करता है। भारत ने इसके टॉप-2 लीडर्स को बुलाकर पूरे यूरोप को एक साथ साधने की कोशिश की है। दरअसल, उर्सुला वॉन डेर लेयेन यूरोपीय कमीशन की अध्यक्ष है। यह EU की एग्जिक्यूटिव विंग है, जो ट्रेड डील और रूल्स को लागू करती है। वहीं एंतोनियो लुइस सैंटोस दा कोस्टा यूरोपीय काउंसिल के अध्यक्ष हैं। यह सभी 27 देशों के राष्ट्राध्यक्षों का रिप्रेजेंटेशन करते हैं और स्ट्रैटजिक डायरेक्शन तय करते हैं। यूरोपियन यूनियन के नेताओं को चीफ गेस्ट बनाने के पीछे भारत के 3 मकसद हो सकते हैं… 1. फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) से बनेगा 200 करोड़ ग्राहकों का मार्केट 2. अमेरिका-चीन की खींचतान में 'बफर स्ट्रैटजी' 3. IMEC के लिए EU का साथ जरूरी सवाल-2: गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि बुलाने की परंपरा कब और क्यों शुरू हुई? जवाब: पहले गणतंत्र दिवस 26 जनवरी 1950 को ही मुख्य अतिथि बुलाने की परंपरा शुरू हुई। उस दिन की परेड दिल्ली के इरविन स्टेडियम (अब मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम) में हुई थी। तब इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो चीफ गेस्ट थे। इंडोनेशिया को पहले चीफ गेस्ट के तौर पर चुनना भी एक सिंबोलिज्म था। क्योंकि दोनों देश हाल ही में आजाद हुए थे और औपनिवेशिक शासन के लिए खिलाफ लड़े थे। दरअसल, 17 अगस्त 1945 को इंडोनेशिया ने आजादी का ऐलान किया था, जिसे 1949 में मान्यता मिली थी। चीफ गेस्ट बुलाने की परंपरा भारत की सॉफ्ट और स्ट्रैटजिक डिप्लोमेसी का हिस्सा है… सवाल-3: आखिर कैसे चुने जाते हैं रिपब्लिक डे के चीफ गेस्ट, प्रोसेस क्या है? जवाब: गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि को चुनना एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें डिप्लोमेसी, ट्रेड, स्ट्रैटजी और मिलिट्री फायदे का बारीकी से एनालिसिस किया जाता है। ये प्रोसेस करीब 6 महीने पहले ही शुरू कर दी जाती है। भले ही 26 जनवरी का कार्यक्रम रक्षा मंत्रालय की जिम्मे है, लेकिन मुख्य अतिथि चुनने का काम विदेश मंत्रालय करता है। मेहमान के नाम चुनने से लेकर उनके कर्तव्य पथ तक पहुंचने का स्टेप बाय स्टेप प्रोसेस… स्टेप-1: विदेश मंत्रालय में शुरुआती चर्चा विदेश मंत्रालय उन देशों की लिस्ट बनाता है, जिनके साथ भारत अपने रिश्तों को और मजबूत करना चाहता है। इसके इन 3 सवालों का जवाब ढूंढा जाता है और उनका एनालिसिस किया जाता है… स्टेप-2: प्रधानमंत्री की मंजूरी विदेश मंत्रालय अपनी सिफारिशों की फाइल प्रधानमंत्री कार्यालय यानी PMO को भेजता है। पीएम और उनके सलाहकार तय करते हैं कि मौजूदा वैश्विक माहौल में किस नेता को बुलाना सबसे सही रहेगा। स्टेप-3: नेता का शेड्यूल पता करना स्टेप-4: राष्ट्रपति के सिग्नेचर के साथ न्योता भेजना PMO से मंजूरी मिलने और मेहमान का शेड्यूल चेक करने के बाद औपचारिक निमंत्रण भारत के राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है, जिस पर वे सिग्नेचर करती हैं। क्योंकि गणतंत्र दिवस का समारोह भारत के राष्ट्रपति आयोजित करते हैं। इसके बाद न्योता मेहमान देश को भेज दिया जाता है। स्टेप-5: सिक्योरिटी और प्रोटोकॉल व्यवस्था यह पूरी प्रोसेस गोपनीय रहती है, जब तक इसका आधिकारिक ऐलान न हो जाए। इसका मकसद फॉरेन रिलेशंस को मजबूत करना और ग्लोबल लेवल पर भारत की पॉजिशन को उभारना है। पूर्व IFS अधिकारी और 1999 से 2002 तक प्रोटोकॉल चीफ रहे मनबीर सिंह के मुताबिक, चीफ गेस्ट की दौरे में पूरा फोकस होता है कि वे प्रसन्न और संतुष्ट हों। उनकी यात्रा आराम से और बिना किसी दिक्कत के साथ हो। कई मेहमानों और उनके राजदूतों ने भारत के सामारोह और प्रोटोकॉल की जमकर तारीफ कर चुके हैं। सवाल-4: क्या यह सिर्फ सम्मान देने का तरीका है या कोई डिप्लोमैटिक मैसेज? जवाब: गणतंत्र दिवस में बतौर मुख्य अतिथि न्योता मिलना किसी देश के लिए प्रोटोकॉल के लिहाज से सर्वोच्च सम्मान की बात है। उन्हें राष्ट्रपति भवन में ऑफिशियल गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाता है। फिर शाम में भारत के राष्ट्रपति उनके लिए स्वागत समारोह आयोजित करते हैं। मेहमान महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि देने राजघाट भी जाते हैं। उनके लिए भारत के प्रधानमंत्री एक लंच भी रखते हैं, जिसमें सरकारी और गैर-सरकारी VIP मौजूद रहते हैं। पूर्व IFS अधिकारी मनबीर सिंह के मुताबिक, चीफ गेस्ट का दौरा सिंबोलिक अहमियत रखता है। उन्हें भारत के गौरव और खुशी का हिस्सा बनाया जाता है। ये दोनों देशों के बीच मजबूत दोस्ती और बढ़ती साझेदारी की झलक दिखाती है। सम्मान से कहीं ज्यादा ये डिप्लोमैटिक स्ट्रेंथ नुमाइश होती है। चीफ गेस्ट के सिलेक्शन प्रोसेस में भी ये दिखाई देता है। फॉरेन पॉलिसी एक्सपर्ट विनय कौरा के का मानना है कि भारत ऐसे सिंबॉलिक काम से अपनी डिप्लोमैटिक और स्ट्रैटजिक पैठ को मजबूत करता है। इसके जरिए भारत दुनियाभर में अपने रणनीतिक इरादे और विदेश नीति को व्यक्त करता है। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि मेहमान-नवाजी के जरिए भारत बताता है कि उसके लिए कौन अहम है? साथ ही अपनी सॉफ्ट पावर और डिफेंस कैपेबिलिटी की ताल ठोकता है। मेहमान देश के साथ डील्स और पार्टनरशिप भी करता है। सवाल-5: क्या पाकिस्तान और चीन को कभी बतौर चीफ गेस्ट इनवाइट किया गया? जवाब: हां। भारत ने पाकिस्तान और चीन को उस दौर में न्योता दिया, जब वह ‘पड़ोसी पहले’ और ‘शांति के साथ रहने’ की नीति पर चल रहा था… रिश्ते सुधारने के लिए पाकिस्तान को 2 बार न्योता 'हिंदी-चीनी भाई-भाई' के दौर में चीन को बुलाया तब के पीएम पं. नेहरू का मानना था कि ऐसे न्योते और सम्मान से पड़ोसियों के साथ तनाव कम किया जा सकता है। साथ ही वे एशियाई एकजुटता का नेतृत्व कर रहे थे। इसमें चीन और पाकिस्तान को साथ रखना बेहद जरूरी था। सवाल-6: किस देश को सबसे ज्यादा बार और सबसे कम बार न्योता दिया गया? जवाब: 2025 तक 47 देशों के 70 से ज्यादा नेताओं ने गणतंत्र दिवस के मेहमान के तौर पर शिरकत की है। भारत ने चीफ गेस्ट के लिए हमेशा अपने उन सहयोगियों को तरजीह दी है, जो डिफेंस, एनर्जी और स्ट्रैटजिक तौर से सबसे करीब रहे हैं। इसी के मद्देनजर भारत ने सबसे ज्यादा 6 बार फ्रांस को न्योता दिया। 1976, 1980, 1998, 2008, 2016 और 2024 के गणतंत्र दिवस में फ्रांस के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित किया गया। 5 बार ब्रिटेन, 4-4 बार भूटान, इंडोनेशिया और रूस के नेता चीफ गेस्ट बने। वहीं दुनिया के कई ताकतवर और अहम देश ऐसे हैं, जिन्हें भारत ने सिर्फ एक बार ही न्योता दिया। इसमें चीन (1958), ऑस्ट्रेलिया (1979), ईरान (2003), सऊदी अरब (2006), साउथ कोरिया (2010) और अमेरिका (2015) शामिल हैं। सवाल-7: क्या कभी ऐसा हुआ कि जब कोई मेहमान ही नहीं आए? जवाब: हां। 5 बार ऐसा हुआ है, जब गणतंत्र दिवस की परेड में राजपथ (अब कर्तव्य पथ) पर मुख्य अतिथि की कुर्सी खाली रही। इनमें से 3 मौके शुरुआती साल के थे, जबकि दो मौके कोविड के दौरान के थे। शुरुआती 3 साल नहीं बुलाए चीफ गेस्ट कोरोना महामारी में 2 साल कोई मुख्य अतिथि नहीं ****** गणतंत्र दिवस से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए... गणतंत्र दिवस की थीम वंदेमातरम्, परेड में निकलेंगी 30 झांकियां: सेना की नई भैरव बटालियन भी शामिल होगी भारत के 77वां गणतंत्र दिवस की परेड की थीम वंदेमातरम् पर रखी गई है। परेड के दौरान कर्तव्य पथ पर 30 झांकियां निकलेंगी, जो 'स्वतंत्रता का मंत्र-वंदे मातरम, समृद्धि का मंत्र-आत्मनिर्भर भारत' थीम पर होंगी। पूरी खबर पढ़िए...
हिटलर के बाद सबसे ताकतवर सेना बना रहा जर्मनी, यूरोप में अंदरखाने क्या पक रहा है?
Germany:जर्मनी के मिलिट्री प्लान का विश्लेषण आपको बताएगा कि आज के जर्मनी को हिटलर जैसी फौज क्यों याद आ रही है. आपको ये भी पता चलेगा कि जिस अमेरिका ने हिटलर का अंत किया था वही अमेरिका इस हिटलर जैसी सेना के प्लान की वजह क्यों बना है.
PM Modi pushed reforms India growth: Report-अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ वॉर से जब पूरी दुनिया दबाव में है, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हालात को मौके में ऐसे बदला कि अब पूरी दुनिया में इसकी चर्चा हो रही है. The Economist की रिपोर्ट के मुताबिक, मोदी ने विदेशी दबाव के बीच आर्थिक सुधार किए, भारत की ग्रोथ बनाए रखी और अब यूरोपीय नेता भी भारत के मॉडल को ध्यान से देख रहे हैं. जानें पूरी रिपोर्ट.
Donald Trump: रूस-यूक्रेन के बीच हो रही जंग को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बड़ा बयान दिया है. ट्रंप ने कहा है कि पुतिन और जेलेंस्की डील चाहते हैं लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध की स्थिति काफी जटिल है.
रूस-यूक्रेन युद्ध पर ट्रंप का बयान: पुतिन-जेलेंस्की समझौते को तैयार
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि यूक्रेन और रूस के बीच समझौता न हो पाने की वजह वही पुरानी समस्याएं हैं
ग्रीनलैंड की सबसे मशहूर इंफ्लूएंसर हैं क्युपानुक ओलसेन। वो अपने 5 लाख फॉलोअर्स को बर्फ पर सूखती मछलियां, पारंपरिक सूप और 24 घंटे लंबी बर्फीली रातों की कहानियां सुनाती रही हैं, लेकिन पिछले कुछ दिनों से उनकी टाइमलाइन बदल गई है। अब उसमें एक नया विषय घुस आया है- डोनाल्ड ट्रम्प। थोड़ा पीछे चलते हैं। तारीख- 4 मार्च 2025। वॉशिंगटन डीसी की एक शाम। अमेरिकी कांग्रेस का संयुक्त सत्र चल रहा था। ट्रम्प मंच पर खड़े बोल रहे थे। उन्होंने अचानक कहा कि अमेरिका को हर हाल में ग्रीनलैंड लेना पड़ेगा। बात इतनी बेहिचक थी कि संसद में बैठे सांसद हंस पड़े, लेकिन ट्रम्प मजाक नहीं कर रहे थे। 14 जनवरी 2026, उन्होंने डेनमार्क और ग्रीनलैंड के विदेश मंत्री से साफ कह दिया- ग्रीनलैंड नेशनल सिक्योरिटी का मसला है। उस पर पूरी तरह अमेरिकी अधिकार चाहिए। फिर उन्होंने चेतावनी की तरह वेनेजुएला का नाम लिया, जिसके राष्ट्रपति मादुरो को उन्होंने उठवा लिया था। मतलब साफ था कि जरूरत पड़ी तो ताकत का इस्तेमाल करने में हिचक नहीं होगी। ट्रम्प के इन बयानों ने यूरोप के डिफेंस हेडक्वार्टर्स में भी हलचल मचा दी। डेनमार्क ने ग्रीनलैंड में अतिरिक्त सैनिक तैनात किए। जर्मनी, स्वीडन, फ्रांस, नॉर्वे, नीदरलैंड और फिनलैंड ने भी अमेरिका के खिलाफ एकजुटता दिखाई। कनाडा के पीएम मार्क कार्नी ने धमकी भरे लहजे में कह दिया- 'दोस्तों, अब तख्तियां उतार देने का समय आ गया है।' नाटो के 76 साल के इतिहास में यह दृश्य कभी नहीं देखा गया था। एक ऐसा सैन्य गठबंधन, जो इस वादे पर खड़ा था कि ‘एक पर हमला, सब पर हमला’। अब उसके सदस्य एक-दूसरे पर हमलावर हैं। नाटो का जन्म द्वितीय विश्व युद्ध के मलबे से उपजी एक कड़वी मजबूरी थी। 3.65 करोड़ लोगों की मौत के बाद यूरोप एक कब्रिस्तान बन चुका था। सोवियत रूस के राष्ट्रपति जोसेफ स्टालिन को इस तबाही में एक अवसर नजर आया। उनका मानना था कि पूंजीवादी व्यवस्था यूरोप को इस हाल तक लाई है और अब सिर्फ कम्युनिस्ट विचारधारा ही इस डूबते महाद्वीप को बचा सकती है। 1948-49 के बीच सोवियत संघ ने दो बड़े कदम उठाए। पहला- फरवरी 1948 में चेकोस्लोवाकिया की लोकतांत्रिक सरकार को गिराकर सोवियत समर्थक कम्युनिस्टों के हाथों में सत्ता सौंप दी गई। दूसरा कदम और भी ज्यादा डरावना था। 24 जून 1948 की शाम, सोवियत संघ ने पश्चिमी बर्लिन की नाकेबंदी शुरू कर दी। रेल लाइनों पर ताले लग गए, सड़कें बंद हो गईं, जलमार्ग सूख गए। पश्चिमी बर्लिन भूख और अंधेरे में डूब गया था। इसी बीच वॉशिंगटन में बैठे अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने एक ऐसा फैसला लिया, जो इतिहास बन गया- बर्लिन एयरलिफ्ट। अमेरिकी विमान महीनों तक आसमान के रास्ते बर्लिन में खाना, दवाइयां और ईंधन पहुंचाते रहे। यह केवल राहत अभियान नहीं था, यह सोवियत दबाव के खिलाफ खुली चुनौती थी। यूरोप समझ चुका था कि सोवियत संघ एक-एक करके देशों को झुकाने की कोशिश कर रहा है। और यह भी साफ था कि बिना सामूहिक सुरक्षा के वह टिक नहीं पाएगा। इसी मजबूरी में 4 अप्रैल 1949 को वॉशिंगटन में 12 देशों ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए और नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन यानी NATO का जन्म हुआ। तस्वीर ये रही... इस दौरान मौजूद ब्रिटिश जनरल और नाटो के पहले महासचिव लॉर्ड इस्मे ने इसके मकसद को एक ही वाक्य में समेट दिया- ‘रूसियों को बाहर रखना, अमेरिकियों को अंदर रखना और जर्मनों को दबाकर रखना।’ इसे ‘इस्मे डॉक्ट्रिन’ के नाम से जाना जाता है। इस पूरे समझौते की आत्मा थी नाटो का आर्टिकल 5। इसके तहत एक सदस्य पर हमला, सभी पर हमला माना जाएगा। नाटो के जन्म के महज पांच महीने बाद, 29 अगस्त 1949 की सुबह, कजाखस्तान के सेमिपालातिंस्क मैदान में जमीन कांप उठी। एक जबरदस्त धमाका हुआ- सोवियत संघ ने अपना पहला परमाणु परीक्षण कर दिया था। इसी के साथ परमाणु हथियारों पर अमेरिका का एकाधिकार खत्म हो गया। नाटो की आत्मा माने जाने वाले अनुच्छेद-5 को लेकर अमेरिका कभी पूरी तरह आश्वस्त नहीं था। जब यह अनुच्छेद लिखा जा रहा था, तब अमेरिकी सीनेट के भीतर एक गहरी बेचैनी थी। सीनेटरों को डर था कि कहीं यह समझौता अमेरिका को ऐसे युद्ध में न धकेल दे, जहां से लौटने का कोई रास्ता न बचे। इसलिए अनुच्छेद-5 की भाषा जानबूझकर धुंधली रखी गई। उसमें साफ लिखा गया कि हर देश ‘वही कार्रवाई करेगा, जिसे वह आवश्यक समझे।’ इस धुंधलेपन की असली तस्वीर 1949 के एक छोटे, लेकिन बेहद अहम किस्से में दिखती है। समझौते पर बातचीत के दौरान अमेरिकी विदेश उप-सचिव रॉबर्ट लवेट से सीधा सवाल पूछा गया- अगर लंदन पर हमला होता है, तो क्या उसे वॉशिंगटन पर हमला माना जाएगा? लवेट ने बिना हिचक जवाब दिया- ’नहीं, सर।’ यह जवाब नाटो की उस कमजोरी को उजागर करता है, जिसे बाद में ‘पवित्र गठबंधन’ जैसे शब्दों से ढक दिया गया। आज डोनाल्ड ट्रम्प इसी अंतर्विरोध और कमजोरी का राजनीतिक फायदा उठाते नजर आते हैं। 1950 के दशक की शुरुआत में नाटो ने खुद को एक संगठित मिलिट्री मशीन में बदलना शुरू किया। 19 दिसंबर 1950 को अमेरिका के राष्ट्रपति ड्वाइट डी. आइजनहावर को नाटो का पहला सुप्रीम कमांडर नियुक्त किया गया, लेकिन आइजनहावर इस भूमिका से उत्साहित नहीं थे। 1951 की सर्दियों में आइजनहावर ने अपने सलाहकारों को चेतावनी दी- ‘हम अपनी सेनाओं के साथ दूर-दराज की सीमाओं की रखवाली करने वाला आधुनिक रोम नहीं बन सकते।’ विडंबना यह है कि अगले 76 वर्षों में अमेरिका धीरे-धीरे पूरी दुनिया की पुलिसिंग में उलझता चला गया। शीत युद्ध की असली रीढ़ परमाणु हथियार थे। 1950 और 1960 के दशक में यूरोप हर रात इसी डर में जीता था कि कहीं कोई बटन न दब जाए। ‘म्युचुअल एश्योर्ड डिस्ट्रक्शन’ यानी MAD का सिद्धांत यही कहता था- अगर तुम मारोगे, तो हम भी मरेंगे, और तुम्हें भी साथ ले जाएंगे। नाटो परमाणु बम के साए से बचने के लिए और ज्यादा परमाणु बम जमा करता चला गया। MAD नीति के तहत नाटो ने हजारों परमाणु हथियार रखने का लक्ष्य तय किया था। रणनीति साफ थी- इतनी क्षमता होना कि सोवियत संघ की लगभग 30% आबादी और 70% औद्योगिक ढांचे को नष्ट किया जा सके। यह सुरक्षा की भाषा नहीं थी, यह विनाश के संतुलन की भाषा थी। 7 मार्च 1966 को फ्रांस के राष्ट्रपति चार्ल्स डी गॉल ने नाटो से बाहर निकलने की घोषणा कर दी थी। डी गॉल का सवाल सीधा था- अगर सोवियत मिसाइलें पेरिस की ओर बढ़ें, तो क्या अमेरिका न्यूयॉर्क को दांव पर लगाकर फ्रांस को बचाएगा? उन्हें इस पर जरा भी भरोसा नहीं था। डी गॉल ने अमेरिकी सैनिकों को फ्रांस छोड़ने का आदेश दे दिया। कहा जाता है कि उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन बी. जॉनसन ने व्यंग्य में पूछा था- ‘क्या हमें फ्रांस में दफन अपने सैनिकों की कब्रें भी साथ ले जानी होंगी?’ यह तंज नाटो के भीतर मौजूद गहरी भावनात्मक और रणनीतिक दरारों को उजागर करता है। कई दशकों की दूरी के बाद, साल 2009 में फ्रांस दोबारा नाटो की इंटिग्रेटेड मिलिट्री स्ट्रक्चर का हिस्सा बना, लेकिन डी गॉल का सवाल आज भी हवा में तैर रहा है- सुरक्षा के वादे पर कितना भरोसा किया जा सकता है? 26 दिसंबर 1991 की एक बर्फीली शाम, मॉस्को के क्रेमलिन में इतिहास ने चुपचाप करवट बदली। जिस किले से दशकों तक दुनिया की किस्मत तय होती रही थी, वहां से सोवियत संघ का लाल झंडा हमेशा के लिए उतार लिया गया। 40 साल से चला आ रहा शीत युद्ध, जिसमें देशों को मोहरे बनाकर खेला गया, आखिरकार खत्म हो गया। ऐसा लगा मानो नाटो का काम पूरा हो चुका हो। लेकिन नाटो इतिहास का हिस्सा बनने के बजाय और फैलने लगा। यही वह दौर था, जिसे बाद में ‘मिशन क्रीप’ कहा गया, यानी रेंगते हुए रूस के आंगन तक पहुंचने का अभियान। ये एक कसम के टूटने जैसा था। दरअसल, 9 फरवरी 1990 की दोपहर, अमेरिकी विदेश मंत्री जेम्स बेकर सोवियत राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचेव से मिलने पहुंचे। बातचीत का मुद्दा था- जर्मनी से सोवियत सेनाओं की वापसी। बदले में एक वादा किया- अगर रूस जर्मनी खाली कर देता है, तो नाटो रूस की सीमा की ओर एक इंच भी आगे नहीं बढ़ेगा। यह वादा कभी कागज पर नहीं उतरा, लेकिन रूस की सामूहिक याद्दाश्त में यह एक टूटी हुई कसम बनकर रह गया। जब 1999 से 2004 के बीच नाटो पूर्वी यूरोप तक फैलता चला गया, तो मॉस्को में इसे एक ऐतिहासिक विश्वासघात के रूप में देखा गया। प्रसिद्ध अमेरिकी रणनीतिकार जॉर्ज केनन ने 1997 में ही चेतावनी दी थी कि नाटो का यह विस्तार अमेरिका की सबसे घातक रणनीतिक भूल साबित होगा। उनकी चेतावनी उस समय अनसुनी कर दी गई। 7 मई 2000 को जब व्लादिमीर पुतिन सत्ता में आए, तब तक पोलैंड, हंगरी और चेक गणराज्य नाटो में शामिल हो चुके थे। इसके बावजूद पुतिन शुरुआती वर्षों में पश्चिम से टकराव से बचते रहे। उन्होंने यहां तक कहा कि रूस नाटो की सदस्यता की संभावना से इनकार नहीं करता, लेकिन नाटो रूस को बराबरी का भागीदार मानने को तैयार नहीं था- उसे सिर्फ एक थर्ड रेट पावर समझा गया। साल 2004 में नाटो ने एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया समेत सात पूर्व सोवियत गणराज्यों को अपने साथ जोड़ लिया। यह केवल विस्तार नहीं था- यह रूस की दहलीज तक सीधी दस्तक थी। पुतिन ने इसे रणनीतिक घेराबंदी के रूप में देखा। 10 फरवरी 2007 की शाम, म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में पुतिन का संयम टूट गया था। मंच से उन्होंने नाटो देशों से तीखे शब्दों में पूछा- ‘उन वादों का क्या हुआ कि नाटो एक इंच भी आगे नहीं बढ़ेगा? आखिर रूस के करीब आप अपने आप को किसके खिलाफ फैला रहे हैं?’ यहीं से सहयोग की बची-खुची उम्मीद भी खुली दुश्मनी में बदलने लगी थी। 2008 के बुखारेस्ट शिखर सम्मेलन शुरू होने से पहले ही अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने ऐलान कर दिया कि जॉर्जिया और यूक्रेन भी ‘नाटो के सदस्य बनेंगे।’ पुतिन के लिए यह बयान ऐसा था, मानो उनके आंगन में अमेरिकी मिसाइलें लगाने की घोषणा कर दी गई हो। राजनीति विज्ञान में इसे ‘सुरक्षा दुविधा’ कहा जाता है- जहां नाटो का हर ‘रक्षात्मक’ कदम रूस को सीधा ‘आक्रामक’ दिखाई देता है। यही सोच 2008 के जॉर्जिया युद्ध और आगे चलकर यूक्रेन संकट की बुनियाद बनी। पुतिन अपनी नाराजगी पहले ही उजागर कर चुके थे। साल 2011 में, लीबिया के शासक मुअम्मर गद्दाफी को सत्ता से हटाने के लिए नाटो ने हवाई हमले किए। रूस ने इसे केवल एक अमानवीय हस्तक्षेप नहीं माना, बल्कि अपने रणनीतिक हितों, खासतौर पर तेल और गैस व्यापार पर सीधा हमला समझा। अविश्वास और गहराता चला गया। फिर 2014 आया। यूक्रेन में पश्चिम समर्थक सरकार के सत्ता में आते ही पुतिन ने क्रीमिया का विलय रूस में कर लिया। यहीं से नाटो और रूस के बीच ‘छद्म युद्ध’ की शुरुआत मानी जाती है। अमेरिका और नाटो के देश यूक्रेन को हथियार देने लगे और रूस युद्ध के मौके तलाशने लगा। साल 2017। राष्ट्रपति बनते ही डोनाल्ड ट्रम्प ने नाटो सहयोगियों को साफ शब्दों में सुना दिया- अपने हिस्से का पैसा खर्च करो, नहीं तो सुरक्षा भूल जाओ। उनके लिए नाटो कोई विचारधारा नहीं था, बल्कि एक कारोबारी सौदा था। इसी सोच ने नाटो की सबसे बड़ी कमजोरी उजागर कर दी- भरोसा। यूरोप ने पहली बार गंभीरता से सोचना शुरू किया कि मुश्किल समय में अमेरिका पर भरोसा किया जा सकता है क्या? नवंबर 2019 में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने एक ऐसी बात कही, जिसने पूरी अटलांटिक दुनिया को झकझोर दिया- ‘नाटो ब्रेन-डेड है।’ असल में अमेरिका ने नाटो सहयोगियों से सलाह किए बिना ही सीरिया से अपनी सेना वापस बुला ली थी। दरअसल, वो यह बता रहे थे कि अगर गठबंधन में संवाद और भरोसा मर जाए, तो शरीर जीवित तो दिख सकता है, पर वो कुछ कर नहीं सकता। 29 अगस्त 1949 के सोवियत परमाणु परीक्षण से लेकर ग्रीनलैंड पर ट्रम्प के बयानों तक, नाटो एक ही सवाल से जूझता रहा है- सुरक्षा भरोसे से आती है या ताकत से? ट्रम्प के दौर में इस सवाल ने और भी डरावना रूप ले लिया। उन्होंने नाटो की सबसे कीमती पूंजी भरोसे को धीरे-धीरे छीलना शुरू कर दिया। इस भरोसे पर पहला सार्वजनिक प्रहार 25 मई 2017 को ब्रसेल्स में दिखा। नाटो मुख्यालय के उद्घाटन समारोह में ट्रम्प मंच पर खड़े थे। चारों ओर यूरोप के नेता, सामने कैमरे। यह वही मौका था जब हर अमेरिकी राष्ट्रपति परंपरागत रूप से अनुच्छेद 5 को दोहराता है- ‘एक पर हमला, सब पर हमला।’ लेकिन ट्रम्प ने वह वाक्य बोला ही नहीं। समारोह खत्म होते ही यूरोपीय राजनयिक एक-दूसरे से फुसफुसाने लगे- ‘क्या यह भूल थी, या संकेत?’ उसी शाम जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल ने कह दिया- अब हमें अपनी किस्मत खुद अपने हाथ में लेनी होगी। यह बयान नाटो के भीतर एक मानसिक भूकम्प था। इसके बाद जुलाई 2018 की ब्रसेल्स समिट आई। नाटो के इतिहास की सबसे असहज बैठकों में से एक। बंद कमरे में ट्रम्प ने सीधे जर्मनी पर हमला बोला। उनका आरोप था कि जर्मनी रूस से गैस खरीदता है और हम उसे रूस से बचाने की उम्मीद करते हैं। आप रूस के कैदी हैं। कमरे में सन्नाटा पसर गया। नाटो का आर्थिक इंजन कहलाने वाला जर्मनी अचानक समस्या बना दिया गया। यहीं से यूरोप को पहली बार साफ दिखने लगा कि अमेरिका की नाराजगी अब रूस से ज्यादा अपने ही सहयोगियों पर है। ट्रम्प ने नाटो को कभी ‘खराब बिजनेस डील’ कहा, कभी ऐसा क्लब बताया, जहां अमेरिका बेवकूफ बनता आया है। अक्टूबर 2018 में यूरोप की ठंड अचानक और गहरी हो गई। ट्रम्प ने कहा कि अगर कोई छोटा नाटो देश रूस से उलझता है, तो ‘सोचना पड़ेगा’ कि अमेरिका उसकी मदद करे या नहीं। लिथुआनिया, लातविया और एस्टोनिया जैसे देशों के लिए यह बयान किसी अलार्म से कम नहीं था। नीदरलैंड्स के शहर द हेग में मई 2025 की एक सुबह। दुनिया के सबसे ताकतवर देशों के नेता यहां जमा थे। माहौल में नाटो के 75 साल पूरे होने का जश्न नहीं, बल्कि गहरी बेचैनी थी। सम्मेलन कक्ष के भीतर एक मेज पर एक पतली-सी फाइल रखी थी, जिस पर लिखा था- अमेरिका की नई नेशनल सिक्योरिटी स्ट्रैटजी 2025। यह नाटो के लिए ‘डेथ वारंट’ जैसा लग रहा था। ट्रम्प की इस रणनीति में नाटो को अब स्थायी सुरक्षा की गारंटी नहीं, बल्कि कंडीशनल सर्विस कहा गया है। फरमान सीधा, ठंडा और कठोर था- अपनी जीडीपी का 5 प्रतिशत रक्षा पर खर्च करो, वरना पुतिन के टैंकों के सामने अकेले खड़े रहने के लिए तैयार रहो। कमरे में सन्नाटा था। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि यह चेतावनी है, सौदा है, या नाटो के अंत की घंटी। क्या एक दिन ऐसा आएगा जब ग्रीनलैंड में तैनात अमेरिकी बंदूकें पश्चिमी यूरोप की ओर मुड़ जाएंगी? क्या आदेश आएगा- फायर? और अगर ऐसा हुआ, तो क्या दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य ताकत नाटो को उसी क्षण खत्म मान लिया जाएगा? अखिरकार नाटो की सैन्य ताकत में अमेरिका अकेले 42% का हिस्सेदार है। नाटो के करीब 35 लाख सैनिकों में अकेले अमेरिका के 13 लाख हैं। कुल 22400 विमानों में अमेरिका के 14000 हैं। अमेरिका निकला तो नाटो सच में ‘पेपर नाटो’ हो जाएगा। आज नाटो के अंत की अटकलें सिर्फ अखबारों की सुर्खियों या टीवी डिबेट तक सीमित नहीं हैं। यह सवाल अब रणनीतिक दस्तावेजों, सैन्य मुख्यालयों और राष्ट्राध्यक्षों के भाषणों में घूम रहा है- क्या नाटो सच में खत्म हो सकता है? और अगर हुआ, तो क्या दुनिया नए-नए गठबंधनों में बंट जाएगी? नाटो पर दशकों तक काम करने वाले इतिहासकार मार्क ट्रेचटेनबर्ग अपनी किताब ए कंस्ट्रक्टेड पीस में लिखते हैं कि गठबंधन अक्सर किसी धमाके के साथ नहीं टूटते। वे धीरे-धीरे, भरोसे के घटने से खोखले होते हैं। अगर नाटो कमजोर पड़ेगा, तो वह किसी एक तारीख को बंद नहीं होगा। उसके झंडे फहराते रहेंगे, शिखर सम्मेलन होते रहेंगे, घोषणाएं जारी रहेंगी, लेकिन अनुच्छेद 5 का भरोसा सिर्फ एक औपचारिक वाक्य बन जाएगा। यही वह स्थिति है जिसे कई विश्लेषक पेपर नाटो कहते हैं। कुछ रणनीतिकार मानते हैं कि आज अमेरिका की असली चुनौती चीन है, रूस नहीं। इसलिए रूस से तनाव कम करके चीन को संतुलित करना चाहिए। इसे ‘रिवर्स निक्सन स्ट्रैटजी’ कहा जाता है। जैसे- 1970 के दशक में राष्ट्रपति निक्सन ने चीन को सोवियत संघ से अलग किया था। आज डोनाल्ड ट्रम्प जब पुतिन को ‘दोस्त’ कहते हैं, तो इसी रणनीति की झलक दिखती है, लेकिन समस्या यह है कि रूस खुद को अपमानित महसूस करता है। राजनीतिक वैज्ञानिक जॉन मियर्सहाइमर साफ कहते हैं- ‘महाशक्तियां अपमान को भूलती नहीं हैं, वे उसका जवाब देती हैं।’ यूक्रेन युद्ध के बाद रूस के लिए बराबरी का भरोसा और भी दूर चला गया है। भविष्य की दुनिया शायद साफ-सुथरे खेमों में बंटी नहीं होगी। यह एक अस्थिर बहुध्रुवीय व्यवस्था होगी, जहां चीन आर्थिक और तकनीकी शक्ति बनेगा, अमेरिका सैन्य और वित्तीय ताकत रखेगा, रूस ऊर्जा और सैन्य बल से प्रासंगिक रहेगा और यूरोप लगातार तय करता रहेगा कि वह शक्ति बनना चाहता है या सिर्फ बाजार। नाटो का भविष्य इसी अस्थिरता में छिपा है। अगर नाटो बचा, तो पहले जैसा नहीं रहेगा। वह ज्यादा यूरोपीय और कम अमेरिकी होगा। अगर वह टूटा, तो दुनिया ज्यादा सुरक्षित नहीं, बल्कि ज्यादा अनिश्चित हो जाएगी। जैसा कि विंस्टन चर्चिल ने चेताया था- ‘मित्र देशों के आपसी असुरक्षा से लड़ने से भी बदतर केवल एक ही चीज है और वह है मित्र को साथ लिए बिना दुश्मन से लड़ना।’ —------ References…
भारत ने ऐसे ढीले किए ट्रंप के तेवर, ट्रैप में फंसने से पहले खेला दांव; यूरोपीय देश कैसे रह गए पीछे?
Trump Dealing With Europe: यूरोप ने ट्रंप से एक बड़ा सबक लिया है कि उनकी चापलूसी करने और व्यापार समझौते के बावजूद भी वह ट्रंप के निशाने से नहीं बच सकते हैं, हालांकि यह सबक भारत पहले ही ले चुका है.
हवा में खाने और सोने में माहिर अबाबील पक्षियां हजारों की संख्या में इन दिनों छत्तीसगढ़ में अपना अशियाना ढूंढ रहे है। हजारों किलोमीटर की उड़ान के बाद रायपुर पहुंचे पक्षियों ने आरंग के कुकरा गांव में महानदी मुख्य नहर पर बने पुल के नीचे अपना स्थायी ठिकाना बनाया है। नेचर एक्सपर्ट ने इसके यूरोप या भारत के हिमाचल प्रदेश से छत्तीसगढ़ पहुंचने की संभावना जताई है। एक्सपर्ट के मुताबिक, इस पक्षी की खासियत है कि ये हवा में उड़ते उड़ते ही खाना भी लेते है और आराम से सो भी जाते है। अबाबील की खासियत केवल इसकी रफ्तार ही नहीं, बल्कि इसकी जीवनशैली भी है। सुबह एक साथ अपने बसेरे से निकलते है और सूर्यास्त के पहले अपने ठिकाने पर लौट आते हैं। रायपुर में इन पक्षियों के झूंड को देखकर आसपास के लोग मोबाइल से इनकी तस्वीरें कैद कर रहे हैं। हजारों की संख्या में यह पक्षी छोटे-छोटे झुंड में भी बट जाते हैं। अबाबील जिसे स्वेल्लो और स्विफ्ट के नाम से भी जाना जाता है, आकार में गौरैया जैसी लेकिन क्षमताओं में उससे कहीं आगे मानी जाती है। यह खूबसूरत देशी-प्रवासी पक्षी अपनी तेज उड़ान और सामूहिक जीवनशैली के लिए प्रसिद्ध है। अबाबिल नर और मादा में आपसी साझेदारी और सहयोग की भावना होती है। बिल्डिंग या पुल के नीचे बनाते है ठिकाना घोंसला निर्माण के मामले में भी अबाबील बेहद अनोखी है। पुराने मकान, महल, खंडहर, मस्जिद, मंदिर, गुफाएं या ओवरब्रिज के नीचे ये घोंसले समूह में बनाए जाते हैं। एक ही जगह सैकड़ों छोटे-छोटे घोंसलों की कॉलोनी विकसित हो जाती है, जो देखने में बेहद आकर्षक लगती है। यूरोप और हिमाचल से छत्तीसगढ़ आने की संभावना बर्ड विशेषज्ञों के मुताबिक, अबाबील एक प्रवासी पक्षी है और समय की बड़ी पाबंद मानी जाती है। यह झुंड में रहना पसंद करती है और निश्चित समय पर लंबी दूरी का सफर तय करती है। छत्तीसगढ़ में ये यूरोप या भारत के हिमाचल प्रदेश से पहुंचने की संभावना है। बर्ड विशेषज्ञ बताते है कि रफ्तार, अनुशासन और सामूहिक जीवन की मिसाल पेश करने वाली अबाबील न सिर्फ प्रकृति की खूबसूरती बढ़ाती है, बल्कि इंसानों को भी मिलकर आगे बढ़ने की सीख देती है। अबाबील का अर्थ जानिए नेचर एक्सपर्ट मोहित साहू स्टेट वाइल्ड लाइफ बोर्ड के मेंबर भी है, उनके मुताबिक, अबाबील (Ababil) एक प्रकार की काली चिड़िया होती है, जिसे अंग्रेजी में 'Martlet' या 'Swallow' कहते हैं। यह कुरान में वर्णित चमत्कारी पक्षियों के समूह का नाम है, जिन्होंने काबा की रक्षा की थी, और इसका अर्थ बहुत सारे पक्षी भी होता है। इंफोग्राफिक: विपुल शर्मा ....................... इससे जुड़ी खबर भी पढ़ें... प्रवासी पक्षियों से गुलजार खैरागढ़..ब्राह्मणी बतख भी दिखी: जिले में 213 प्रजाति के पक्षी; वेटलैंड्स में 90 रंगबिरंगे सारस, 1100 से ज्यादा बत्तख दिखे छत्तीसगढ़ के खैरागढ़ इस समय प्रवासी पक्षियों से गुलजार है। जिले में 213 प्रजाति के पक्षी मिले हैं। रूस के कॉमन क्रेन पक्षी के अलावा 90 पेंटेड स्टॉर्क्स और 1100 से अधिक प्रवासी बत्तखें देखी गई हैं। जलचर पक्षियों में नॉर्दर्न शोवलर, यूरेशियन कर्ल्यू और कॉमन पोचार्ड शामिल हैं। पढ़ें पूरी खबर...
नाटो सदस्य देश डेनमार्क के स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड को अमेरिका में मिलाने की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मंशा ने ट्रांस-अटलांटिक संबंधों में गंभीर तनाव पैदा कर दिया है। इस मुद्दे पर अब यूरोप के शीर्ष नेता खुलकर सामने आ गए हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वर्ल्ड इकोनामिक फोरम (WEF) के मंच से एक बार फिर अपने आक्रामक और विस्तारवादी एजेंडे को खुलकर सामने रखा है। ग्रीनलैंड को लेकर लंबे समय से चल रही अटकलों और विवादों के बीच ट्रंप ने साफ शब्दों में कहा कि अमेरिका को किसी भी हालत में ग्रीनलैंड चाहिए।
ट्रंप यूरोपीय देशों पर नहीं लगाएंगे टैरिफ, क्या ग्रीनलैंड पर नाटो महासचिव के साथ हुई डील?
Trump U Turn on Tariff : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावोस में नाटो महासचिव मार्क रुट्टे के साथ बैठक के बाद बताया कि अमेरिका यूरोपीय देशों के खिलाफ टैरिफ नहीं लगाएगा। ट्रंप ने स्पष्ट कि वह ग्रीनलैंड पर कब्जा चाहते हैं लेकिन इसके लिए सैन्य ...
भारत और यूरोप को मदर ऑफ ऑल डील्स की कितनी जरूरत
नई दिल्ली में 26 जनवरी को होने वाली गणतंत्र दिवस की परेड, भारत की विदेश नीति और कूटनीति के बारे में भी बहुत कुछ बताती है। इसमें शिरकत करने वाले मुख्य अतिथि आम तौर पर उन्हीं देशों के होते हैं, जिन्हें भारत तवज्जो देना चाहता है। मुख्य अतिथि का ...
LIVE: ट्रंप नहीं लगाएंगे यूरोपीय देशों पर टैरिफ
Latest News Today Live Updates in Hindi : अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को लेकर यूरोपीय देशों पर टैरिफ नहीं लगाने का फैसला किया है। पल पल की जानकारी...
हरियाणा के पर्वतारोही ने यूरोप की सबसे ऊंची चोटी माउंट एल्ब्रुस पर बिना ऑक्सीजन के 24 घंटे बिता दिए। हिसार के गांव मलापुर के रोहताश खिलेरी ने 18,510 फीट की ऊंचाई पर बिना किसी ऑक्सीजन सपोर्ट के लगातार 24 घंटे बिताने के बाद खुद वीडियो शूट किया। रोहताश ने दावा किया कि यह वर्ल्ड रिकॉर्ड है और वह ऐसा कारनामा करने वाले दुनिया के पहले इंसान हैं। वह 8 साल से पर्वतारोहण कर रहे हैं। 20 जनवरी को रोहताश जब माउंट एल्ब्रुस पर्वत पर थे, तब वहां का तापमान -40C से -50C तक था। 50 से 60 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवा चल रही थी। बता दें कि रोहताश के पिता सुभाष चंद्र किसान हैं जबकि माता बंसी देवी गृहिणी हैं। 8 साल का कड़ा संघर्ष और 2 उंगलियों की कुर्बानीरोहताश ने सोशल मीडिया पर अपने एक्सप्रेशन शेयर करते हुए बताया कि यह जीत आसान नहीं थी। उनका यह सफर 2018 में शुरू हुआ था। 2020 में एक गाइड की जान बचाने के लिए उन्हें मिशन बीच में छोड़ना पड़ा और 2023 में खराब मौसम ने रास्ता रोका। इस ऐतिहासिक मिशन के दौरान रोहताश को फ्रॉस्ट बाइट का सामना करना पड़ा, जिसमें उन्होंने अपनी 2 उंगलियां गंवा दीं, लेकिन उनके हौसले नहीं डिगे। इससे पहले बाबू चिरी शेर्पा ने 1999 में माउंट एवरेस्ट के शिखर पर बिना ऑक्सीजन के 21 घंटे बिताए थे, जो कि एक विश्व रिकॉर्ड बना। मौत को मात देकर फहराया तिरंगापर्वतारोही ने बताया कि शिखर पर स्थिति बेहद भयावह थी। तापमान -40C से -50C तक था। कोई भी साथी इतनी ठंड में साथ रुकने को तैयार नहीं था, रोहताश वहां अकेले डटे रहे। रोहताश ने अपनी इस कामयाबी को तिरंगे की शान और देशवासियों को समर्पित किया है। उन्होंने कहा कि एवरेस्ट की ट्रेनिंग ने उन्हें इस जानलेवा ठंड में जीवित रहने और इतिहास रचने की ताकत दी। इंडिया बुक में रिकॉर्ड दर्ज कर चुकेपर्वतारोही रोहताश खिलेरी का इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड में नाम दर्ज हुआ है। रोहताश को डाक के माध्यम से सर्टिफिकेट मिले। रोहताश ने वर्ष 2021 में 21 मार्च को अफ्रीका महाद्वीप की सबसे ऊंची चोटी माउंट किलिमंजारो पर 24 घंटे रुककर तिरंगा लहराया था, जोकि 5,895 मीटर ऊंची है। इसके आधार पर खिलेरी का इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड में नाम दर्ज हुआ है। इसलिए खास है रोहताश की उपलब्धि... एल्ब्रुस पर सबसे ज्यादा चढ़ाई का रिकॉर्ड भी हरियाणवी के नाम 2 बार माउंट एवरेस्ट फतेह करने वाली संतोष यादव भी हरियाणवीहरियाणा की संतोष यादव ने 2 बार माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई की है। संतोष यादव ने साल 1992 में पहली बार माउंट एवरेस्ट को फतह किया। इसके बाद उन्होंने साल 1993 में वह दोबारा एवरेस्ट को फतह करने गईं और सफल रहीं। संतोष यादव ने दुनिया की पहली महिला होने का रिकॉर्ड कायम किया, जिन्होंने 8848 मीटर शिखर माउंट एवरेस्ट को 2 बार फतह किया हो। संतोष कांगशंग की तरफ से माउंट एवरेस्ट पर सफलतापूर्वक चढ़ने वाली दुनिया की पहली महिला भी हैं।
ताजमहल देखने आए फ्रांस के एक विदेशी जोड़े ने 40 साल तक लिव-इन में रहने के बाद आगरा में हिंदू रीति-रिवाजों से विवाह रचाकर सभी को चौंका दिया। भारतीय संस्कृति और परंपराओं से प्रभावित होकर दोनों ने मंदिर में वैदिक मंत्रों के बीच अग्नि को साक्षी मानकर सात फेरे लिए। फ्रांस के बोर्दो शहर से आए 74 वर्षीय फिलिप और 68 वर्षीय सिल्विया बीते करीब 25 दिनों से भारत भ्रमण पर थे। ताजमहल के दीदार के बाद भारतीय संस्कृति, सनातन परंपराओं और धार्मिक संस्कारों ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि उन्होंने अपने जीवन को वैवाहिक बंधन में बांधने का निर्णय भारत में ही लिया। इस अनोखे विवाह का आयोजन स्थानीय टूर ऑपरेटर पंकज शर्मा की संस्था ‘आमंत्रण वोयाजेस’ के माध्यम से कराया गया। आगरा स्थित राधा-कृष्ण मंदिर में पंडितों द्वारा वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच हिंदू विधि-विधान से विवाह संपन्न कराया गया। दूल्हा-दुल्हन पारंपरिक भारतीय परिधान में नजर आए और पूरे समारोह के दौरान भारतीय संस्कृति में रंगे दिखाई दिए। विदेशी जोड़े ने बताया कि वे बीते 40 वर्षों से साथ रह रहे थे, लेकिन भारतीय विवाह परंपरा को उन्होंने सबसे पवित्र और आध्यात्मिक अनुभव बताया। उनका कहना था कि भारत भ्रमण के दौरान मिली सांस्कृतिक समझ ने उनके जीवन की सोच बदल दी। शादी की जानकारी मिलते ही बड़ी संख्या में स्थानीय लोग मंदिर पहुंचे और इस अनोखे विवाह के साक्षी बने। ताजमहल की नगरी में रची गई यह नई प्रेम कहानी अब शहर में चर्चा का विषय बनी हुई है, जो यह संदेश देती है कि प्रेम, संस्कार और संस्कृति की कोई उम्र या सीमा नहीं होती।
ट्रम्प के चंगुल से ग्रीनलैंड को बचाने के लिए कितनी दूर जा सकता है यूरोपीय यूनियन?
ग्रीनलैंड के भविष्य पर चर्चा के लिए वॉशिंगटन वार्ता बुधवार को विफल हो गई, जिसमें डेनमार्क और ग्रीनलैंड के विदेश मंत्री व्हाइट हाउस से यह संदेश लेकर घर लौटे कि ग्रीनलैंड सही मायने में अमेरिका का है और ट्रम्प इसके अधिग्रहण के समय पर फैसला करेंगे
खामेनेई के खिलाफ प्रदर्शन करती फ्रांसीसी महिला का वीडियो ईरान के दावे से वायरल
वीडियो में दिख रही महिला फ्रांस की एक्टिविस्ट कैमिली इरोस हैं, उन्होंने बूम से पुष्टि की कि यह वीडियो पेरिस में ईरान के लोगों के समर्थन में हुए प्रदर्शन का है.
फ्रांस के मशहूर अभिनेता एलेन डेलन का निधन, 88 वर्ष की उम्र में ली अंतिम सांस
Alain Delon passes away: 'द लेपर्ड' और 'रोक्को एंड हिज ब्रदर्स' जैसी सुपर हिट फिल्मों में अभिनय का जौहर दिखाने वाले फ्रांस के मशहूर अभिनेता एलेन डेलन का निधन हो गया है। एलेन डेलन ने 88 वर्ष की उम्र में आखिरी सांस ली। अभिनेता के पारिवारिक सूत्रों ने ...
इटली से फ्रांस तक समंदर के बीच होगा Anant-Radhika का दूसराप्री वेडिंग फंक्शन, जानिए मेहमानों से लेकरड्रेस कोड तक सबकुछ
Heeramandi के बाद अब Cannes में अपनी 'गजगामिनी चाल' दिखाएंगी Aditi Rao Haidari,फ्रांस के लिए रवाना हुईबिब्बोजान
यूरोप से लेकर Sri Lanka तक इन देशो में शूट हुई है Surya और Bobby Deol की फिल्म Kanguva, बजट उड़ा देगा होश

