पुतिन की यूरोप को सीधी धमकी: 'हम युद्ध के लिए तैयार, लेकिन परमाणु संघर्ष में कोई विजेता नहीं बचेगा'
पुतिन की यूरोप को सीधी धमकी: 'हम युद्ध के लिए तैयार, लेकिन परमाणु संघर्ष में कोई विजेता नहीं बचेगा'
रामायणम् को मिली अंतरराष्ट्रीय सराहना, फ्रांसिस डॉमिनिक ने जताई खुशी
नमित मल्होत्रा की बहुप्रतीक्षित फिल्म 'रामायणम्' को वैश्विक स्तर पर सराहा गया, जहां कंटेंट क्रिएटर फ्रांसिस डॉमिनिक ने इसके निर्माण और विजुअल क्राफ्ट की तारीफ की।
दिसंबर में ब्रसेल्स जाकर भारत-ईयू एफटीए पर हस्ताक्षर करेंगे पीएम मोदी: यूरोपीय परिषद अध्यक्ष
New Delhi, 30 अक्टूबर . India और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच बहुप्रतीक्षित मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को लेकर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है. यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष…
यूरोप और अमेरिका में आने वाली है रिकॉर्ड महंगाई, देखें दुनिया आजतक
रूसी सेना ने यूक्रेन के दो शहरों निप्रो और चेर्निहिव पर बड़ा हमला किया. जहां रूस ने निप्रो के रेलवे स्टेशन को निशाना बनाया. इस हमले में 14 लोगों की मौत हो गई और कई जख्मी हो गए. चेर्निहि हमले में 15 साल की दो लड़कियों की मौत हो गई और कई जख्मी बताए जा रहे हैं. वहीं, तेल के बढ़ते दाम और यूरोप के साथ अमेरिका में भी महंगाई बढ़ा रहे हैं. यूरोप में लोगों को पेट्रोल के लिए 30 फीसदी ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है. दुनिया की ऐसी ही ताजा और अहम खबरों के लिए देखें दुनिया आजतक.
जापान, साउथ कोरिया और फ्रांस में 'क्लीन' है हाई-स्पीड ट्रेन का रिकॉर्ड
दुनिया भर में हाई-स्पीड ट्रेनों (बुलेट ट्रेनों) का जाल तेजी से बिछ रहा है। समय की बचत और आधुनिक सुविधाओं के कारण रोजाना करोड़ों लोग इनमें सफर करते हैं। जब बात सुरक्षा और विश्वसनीयता की आती है, तो जापान की 'शिंकानसेन' (Shinkansen), फ्रांस की 'टीजीवी' (TGV) और साउथ कोरिया की 'केटीएक्स' (KTX) का नाम सबसे ऊपर लिया जाता है। इन तीनों देशों ने दशकों के अपने परिचालन में ऐसा रिकॉर्ड बनाया है कि आज तक हाई-स्पीड ट्रैक पर ट्रेन की टक्कर या पटरी से उतरने (Derailment) के कारण किसी एक भी यात्री की जान नहीं गई है। लेकिन इसके विपरीत, दुनिया में कुछ ऐसे देश भी हैं जहां हाई-स्पीड रेल नेटवर्क पर कई भयानक हादसों में सैकड़ों बेकसूर यात्री अपनी जान गंवा चुके हैं।#1 जापान, फ्रांस और साउथ कोरिया के 'जीरो-फेटालिटी' सुरक्षा रिकॉर्ड का राजजापान ने साल 1964 में दुनिया की पहली बुलेट ट्रेन 'शिंकानसेन' चलाकर इतिहास रचा था। पिछले 60 से अधिक वर्षों में अरबों लोगों को मंजिल तक पहुंचाने वाली शिंकानसेन का रिकॉर्ड पूरी तरह बेदाग रहा है। जापान का ऑटोमैटिक ट्रेन कंट्रोल (ATC) और अर्ली वार्निंग सिग्नल्स भूकंप या तेज आंधी जैसी प्राकृतिक आपदाओं के आते ही ट्रेन को कुछ ही सेकंड में रोक देते हैं।ठीक इसी तरह, फ्रांस की प्रसिद्ध TGV (ट्रेन आ ग्रांद वीतेस) ने 1981 से हाई-स्पीड सर्विस शुरू की थी। फ्रांस की टीजीवी का कमर्शियल संचालन में हाई-स्पीड पटरियों पर शून्य यात्री मृत्यु का शानदार रिकॉर्ड है। वहीं दूसरी ओर, दक्षिण कोरिया की 'केटीएक्स' (KTX) ने 2004 से अपनी सेवाएं शुरू कीं और सख्त रखरखाव मानकों व सेंसर तकनीक के कारण इसका सेफ्टी रिकॉर्ड भी एकदम क्लीन रहा है।#1 दुनिया की हाई-स्पीड ट्रेनों में सबसे ज्यादा मौतें किस देश में हुईं?हाई-स्पीड रेल नेटवर्क (200 किमी/घंटा या उससे अधिक रफ्तार वाली ट्रेनों) में सबसे ज्यादा मौतें दर्ज करने वाले दो प्रमुख देश जर्मनी और चीन हैं:जर्मनी (एशेड हादसा - 1998): यूरोपीय हाई-स्पीड रेल इतिहास का सबसे भीषण और भयावह हादसा 3 जून 1998 को जर्मनी के एशेड (Eschede) में हुआ था। जर्मन ICE 1 हाई-स्पीड ट्रेन लगभग 200 किमी/घंटा की रफ्तार से दौड़ रही थी, तभी पहिए में आई यांत्रिक खराबी के कारण ट्रेन पटरी से उतर गई और एक कंक्रीट ओवरपास ब्रिज से जा टकराई। इस दर्दनाक हादसे में 101 लोगों की मौत हो गई थी और 80 से अधिक यात्री गंभीर रूप से घायल हुए थे।चीन (वेनझोउ हादसा - 2011): दुनिया का सबसे बड़ा और लंबा हाई-स्पीड नेटवर्क रखने वाले चीन में 23 जुलाई 2011 को एक बड़ा हादसा हुआ था। झेजियांग प्रांत के वेनझोउ (Wenzhou) में सिग्नलों की विफलता और आकाशीय बिजली गिरने के कारण एक हाई-स्पीड ट्रेन रुक गई थी, जिसे पीछे से आ रही दूसरी तेज़ रफ्तार हाई-स्पीड ट्रेन ने जोरदार टक्कर मार दी। इस हादसे में 40 यात्रियों की मौत हुई थी और 200 से अधिक लोग घायल हुए थे।#1 स्पेन और स्पेनिश नेटवर्क के दर्दनाक हादसेहाल के वर्षों में स्पेन का हाई-स्पीड रेलवे नेटवर्क भी सुरक्षा चिंताओं के कारण सुर्खियों में रहा है। यद्यपि 2013 में सैंटियागो डी कंपोस्टेला में हुआ भयावह हादसा (जिसमें 80 लोगों की मौत हुई थी) एक पारंपरिक अपग्रेडेड लाइन पर ओवरस्पीडिंग के कारण हुआ था, लेकिन इसके बाद भी हाई-स्पीड कॉरिडोर पर कई बार सुरक्षा को लेकर सवाल उठे हैं। हादसों के आंकड़ों को देखा जाए तो एकल ट्रेन दुर्घटना (Single High-Speed Train Disaster) के मामले में सबसे ज्यादा मौतें जर्मनी के खाते में दर्ज हैं।
Adani Ports Bid For Evos Terminals Acquisition: अदाणी ग्रुप की प्रमुख कंपनी 'अदाणी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक जोन' (APSEZ) ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपने पोर्ट और टर्मिनल कारोबार को तेजी से बढ़ाने के लिए बड़ा कदम उठाया है। ग्लोबल स्तर पर अपने पैरों पसारते हुए अदाणी पोर्ट्स ने पैन-यूरोपीय लिक्विड स्टोरेज और टर्मिनल ऑपरेटर 'इवोस टर्मिनल्स' (Evos Terminals) का अधिग्रहण करने के लिए करीब 3 अरब यूरो की बाइंडिंग ऑफर पेश की है।मौजूदा भू-राजनीतिक उथल-पुथल और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा की बढ़ती चिंताओं के बीच गौतम अदाणी की अगुवाई वाली यह कंपनी यूरोप के बाजार में अपनी पकड़ को बेहद मजबूत करना चाहती है।क्या है इवोस टर्मिनल्स का बिजनेस और क्षमता?इग्नियो इंफ्रास्ट्रक्चर पार्टनर्स के मालिकाना हक वाली इवोस टर्मिनल्स यूरोप की सबसे बड़ी और प्रमुख लिक्विड स्टोरेज कंपनियों में गिनी जाती है। इवोस के पास यूरोप के 5 प्रमुख देशों के 7 बंदरगाहों पर कुल 8 बड़े टैंक टर्मिनल्स हैं। इन सभी की कुल भंडारण क्षमता 6.4 मिलियन क्यूबिक मीटर है। साल 2025 में इस कंपनी का अनुमानित EBITDA 200 मिलियन यूरो रहा था, जो इसके मजबूत बिजनेस मॉडल को दर्शाता है।दुनिया के दिग्गजों से है कड़ी टक्करअदाणी पोर्ट्स ने यह बाइंडिंग ऑफर इसी हफ्ते एक कड़े कॉम्पिटेटिव ऑक्शन के तहत सबमिट किया है। इस मेगा डील को हथियाने की रेस में दुनिया के कई जाने-माने ग्लोबल इन्वेस्टर्स और फंड्स शामिल हैं, जिनमें KKR, EQT, मैक्वेरी, गोल्डमैन सैक्स अल्टरनेटिव्स, ब्लैकराॅक और सीपीपी इन्वेस्टमेंट्स जैसे नाम बड़े हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, आने वाले कुछ हफ्तों में इस पूरी डील पर अंतिम फैसला आने की उम्मीद है।यूके डील के बाद ग्लोबल एक्सपेंशन पर फोकसअदाणी पोर्ट्स का यह विदेशी विस्तार प्लान हाल ही में उस घटना के तुरंत बाद आया है, जिसमें कंपनी को यूके-बेस्ड 'एसोसिएटेड ब्रिटिश पोर्ट्स' (ABP) की बिड में सुपरएनुएशन फंड IFM के हाथों पीछे हटना पड़ा था।कंपनी प्रबंधन ने हाल ही में स्पष्ट किया था कि वह अपने वैश्विक विस्तार रणनीति के तहत दुनिया भर की करीब 20 रणनीतिक परिसंपत्तियों (पोर्ट्स और टर्मिनल्स) का बारीकी से मूल्यांकन कर रही है, ताकि अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार में कंपनी का दबदबा और बढ़ सके।
फ्रांस की राजधानी पेरिस और उसके आसपास के इलाकों में इस अक्टूबर महीने दो पंजाबी युवकों की मौत होने की दुखद खबर सामने आई है। मृतकों की पहचान अमृतसर के 22 वर्षीय आयुष वर्मा और जालंधर के 42 वर्षीय नरिंदर कुमार के रूप में हुई है। दोनों के शवों को भारत (पंजाब) लाने के लिए एक समाजसेवी संस्था और पीड़ित परिवार द्वारा आर्थिक मदद की अपील की जा रही है। पहला मामला: समंदर में नहाते समय डूबा 22 साल का आयुष वर्माअमृतसर के कोट खालसा (दशमेश नगर) का रहने वाला 22 वर्षीय आयुष वर्मा कुछ समय पहले ही सुनहरे भविष्य की तलाश में फ्रांस गया था। जानकारी के अनुसार, आयुष फ्रांस के मार्सिले (Marseille) इलाके में समंदर किनारे नहाने गया था। अचानक समंदर में उठीं तेज लहरों के बहाव में आने से वह गहरे पानी में डूब गया। उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान 25 अक्टूबर को उसने दम तोड़ दिया। आयुष का परिवार बेहद गरीब है और उसके शव को भारत लाने के लिए भारी खर्च की आवश्यकता है। दूसरा मामला: बॉबिग्नी में संदिग्ध परिस्थितियों में नरिंदर की मौतदूसरा मामला जालंधर के रुड़का कलां का है। यहां के रहने वाले 42 वर्षीय नरिंदर कुमार की पेरिस के पास बॉबिग्नी (Bobigny) इलाके में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। यह घटना 23 और 24 अक्टूबर की दरमियानी रात को हुई। पुलिस मामले की जांच कर रही है। पार्थिव शरीर भारत लाने के लिए मदद की अपीलदोनों पंजाबी युवकों के पार्थिव शरीरों को पंजाब (भारत) उनके परिवारों तक पहुंचाने के लिए सामाजिक संस्था 'ऑर्डोन' (Ordon) के संचालक इकबाल सिंह भट्टी और पीड़ित परिवार आगे आए हैं। संस्था ने विदेशों में रहने वाले पंजाबी समुदाय और दानवीरों से आर्थिक सहयोग देने की अपील की है ताकि कागजी कार्रवाई और ट्रांसपोर्टेशन का खर्च पूरा किया जा सके।
बोस्निया में बड़ा हेलीकॉप्टर हादसा: यूरोपीय संघ के शांति मिशन के चार कर्मियों की मौत, 11 घायल; जांच शुरूBosnia Helicopter crash EU peacekeeping force several killed injured rescue operations hindi news updates
मुख्यमंत्री डॉ. यादव से फ्रांस के महावाणिज्य दूत श्री पैट्रिक लेवेरिनो ने की शिष्टाचार भेंट
मुख्यमंत्री डॉ. यादव से फ्रांस के महावाणिज्य दूत श्री पैट्रिक लेवेरिनो ने की शिष्टाचार भेंट #topmpleader,#topmadhyapradeshleader,#madhyapradeshtopleader,#mpnews,#madhyapradeshnews,#bhopalnews,#DrMohanYadav,#mohanyadav,#mpcm भोपाल : बुधवार, अक्टूबर 28, 2026 मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से बुधवार को मुम्बई में फ्रांस के महावाणिज्य दूत श्री पैट्रिक लेवेरिनो के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री निवास स्थित समत्व भवन में शिष्टाचार भेंट की। मुख्यमंत्री डॉ. […]
यूरोपीय सेंट्रल बैंक की अध्यक्ष क्रिस्टीन लेगार्ड ने दिया इस्तीफा, 7 फरवरी 2027 को छोड़ेंगी पद
यूरोपीय सेंट्रल बैंक की अध्यक्ष क्रिस्टीन लेगार्ड ने दिया इस्तीफा, 7 फरवरी 2027 को छोड़ेंगी पद
यूक्रेन-रूस युद्ध के बाद भारत यूरोपीय देशों को गोला-बारूद का एक प्रमुख निर्यातक बनकर उभरा है, जिसने $872 मिलियन मूल्य के हथियार बेचे हैं।
शिकागो रॉकफोर्ड एयरपोर्ट से भारत-यूरोप के बीच नई कार्गो सेवा शुरू
चैलेंज ग्रुप 4 नवंबर 2026 से बोइंग 777 विमानों के जरिए नवी मुंबई और अमेरिका के बीच दवाइयों और विशेष खेपों का परिवहन शुरू करेगा।
एक्टिंग की पहली कमाई से मां को पहली बार यूरोप ले गए थे हॉलीवुड स्टार विन डीजल
मुंबई, 29 अक्टूबर (आईएएनए)। हॉलीवुड स्टार विन डीजल ने एक भावुक नोट साझा किया कि कैसे उन्होंने 1998 की युद्ध फिल्म 'सेविंग प्राइवेट रयान' में अपनी भूमिका के लिए मिले पहले एक्टिंग चेक का इस्तेमाल अपनी मां के लिए यूरोप का टिकट खरीदने में किया।
राजस्थान की संस्कृति, परंपराओं और मेहमाननवाजी का आकर्षण सात समंदर पार फ्रांस तक पहुंच गया। सीकर जिले के दूजोद गांव में फ्रांस के रहने वाले हूबर्ट और उनकी मंगेतर सोफी ने बुधवार शाम भारतीय रीति-रिवाजों के साथ शादी की। दूजोद के पूर्व सरपंच विक्रम सिंह शेखावत के घर वैदिक मंत्रोच्चार के बीच विवाह मंडप सजाया गया। पंडित देवेंद्र शर्मा ने विधि-विधान से रस्में पूरी करवाईं। दोनों ने अग्नि को साक्षी मानकर 7 फेरे लिए। दो साल पहले भारत घूमने आए थे हूबर्ट फ्रांस में बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में रिसर्च कर रहे हूबर्ट करीब दो साल पहले 30 लोगों के एक समूह के साथ भारत घूमने आए थे। इस दौरान दूजोद निवासी फ्रेंच गाइड गोवर्धन सिंह ने उन्हें जयपुर, मंडावा, जैसलमेर, जोधपुर और आगरा की सैर कराई थी। इसी यात्रा के दौरान हूबर्ट भारतीय संस्कृति, संस्कारों और यहां मिलने वाले अपनत्व से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपनी जीवनसंगिनी सोफी के साथ भारत में ही शादी करने का फैसला कर लिया। इसके बाद दोनों ने राजस्थान के सीकर जिले के दूजोद गांव को अपनी शादी के लिए चुना। पहले देखिए विवाह से जुड़े PHOTOS… जॉइंट फैमिली कल्चर से हुए प्रभावित हूबर्ट ने बताया कि फ्रांस में एक निश्चित उम्र के बाद बच्चे परिवार से अलग रहने लगते हैं। जबकि भारत में परिवार, माता-पिता और रिश्तेदारों के बीच गहरा जुड़ाव और अपनापन देखने को मिलता है। उनके मुताबिक, भारतीय परिवारों में दिखाई देने वाला यह रिश्ता और पारिवारिक संस्कृति उन्हें बेहद खास लगी। इसी पारिवारिक जुड़ाव और भारतीय संस्कृति से प्रभावित होकर उन्होंने फ्रांस से अपनी मंगेतर सोफी को सीकर लाकर शादी की। दुल्हन सोफी ने भी अपनाईं भारतीय कल्चर सोफी फ्रांस के रेवेन्यू डिपार्टमेंट में कार्यरत हैं। उन्होंने भी भारतीय रीति-रिवाजों को खुशी-खुशी अपनाया। विवाह समारोह में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच सभी रस्में पूरी की गईं। आतिशबाजी और स्थानीय लोगों के गर्मजोशी भरे स्वागत ने इस विदेशी जोड़े के लिए शादी के पल को यादगार बना दिया। 11 दिन तक ऐतिहासिक स्थलों की करेंगे सैर विवाह संपन्न होने के बाद अब यह नवविवाहित जोड़ा अगले 11 दिनों तक उदयपुर, मंडावा, बीकानेर, जैसलमेर, पुष्कर और आगरा के ऐतिहासिक स्थलों की यात्रा करेगा।
भावनाओं नहीं, संभावनाओं का गठबंधन: यूरोप को भी भारत की उतनी ही जरूरत; गोयल के छह दिन के दौरे से क्या हासिल?---India-Europe Trade Relations: Why Europe Needs India as Much as India Needs Europe
भारतीय कूटनीति और वैश्विक कूटनीतिक गलियारों (Global Diplomacy) से इस वक्त देश के लिए एक बहुत ही गर्व और उत्साह से भर देने वाली खबर सामने आ रही है। भारत के बढ़ते अंतरराष्ट्रीय प्रभाव और वैश्विक मंचों पर उसकी मजबूत होती दावेदारी को एक और बड़ी सफलता हासिल हुई है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में भारत की स्थायी और गैर-स्थायी सदस्यता की आवाज को पूरी दुनिया में लगातार समर्थन मिल रहा है। इसी कड़ी में, यूरोप के एक प्रमुख और बेहद प्रभावशाली देश लिकटेंस्टीन (Liechtenstein) ने आधिकारिक रूप से वर्ष 2028-2029 के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की गैर-स्थायी सीट पर भारत की दावेदारी का खुला समर्थन कर दिया है। लिकटेंस्टीन के प्रिंस एलियोस की भारत की राजकीय यात्रा के दौरान यह बड़ा कूटनीतिक ऐलान किया गया है। इसके साथ ही दोनों देशों ने सीमापार आतंकवाद और अप्रैल 2025 में हुए पहलगाम आतंकी हमले की कड़ी निंदा करते हुए आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक एकजुटता पर जोर दिया है। आइए विस्तार से जानते हैं कि भारत और लिकटेंस्टीन के बीच हुई इस उच्च-स्तरीय बैठक के क्या मायने हैं और वैश्विक कूटनीति के लिहाज से यह क्यों इतना महत्वपूर्ण है।लिकटेंस्टीन के प्रिंस एलियोस की भारत यात्रा और UNSC की उम्मीदवारी पर समर्थनभारत की राजधानी नई दिल्ली स्थित ऐतिहासिक हैदराबाद हाउस (Hyderabad House) में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लिकटेंस्टीन के प्रिंस एलियोस (Prince Alois) और प्रिंसेस सोफी की आधिकारिक मेजबानी की। दोनों नेताओं के बीच द्विपक्षीय संबंधों को और अधिक प्रगाढ़ बनाने तथा आपसी हितों से जुड़े विभिन्न क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर बेहद सकारात्मक और विस्तृत चर्चा हुई।चर्चा के दौरान सबसे बड़ा कूटनीतिक मोड़ तब आया जब लिकटेंस्टीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की गैर-स्थायी सदस्यता (2028-2029 कार्यकाल) के लिए भारत की उम्मीदवारी को अपना पूर्ण समर्थन देने की घोषणा की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अहम समर्थन के लिए लिकटेंस्टीन के प्रिंस का हार्दिक धन्यवाद किया। कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि यूरोपीय देशों द्वारा भारत की इस दावेदारी का लगातार समर्थन किया जाना इस बात का प्रमाण है कि वैश्विक मंच पर भारत की स्थिति कितनी मजबूत और भरोसेमंद हो चुकी है। संयुक्त राष्ट्र जैसे सर्वोच्च वैश्विक निकाय में सुधार और प्रतिनिधित्व के मामले में भारत का दावा अब दुनिया भर के देशों द्वारा स्वीकार किया जा रहा है।सीमापार आतंकवाद और पहलगाम हमले की कड़ी निंदा, न्याय के कठघरे में लाने पर जोरइस उच्च-स्तरीय द्विपक्षीय बैठक के बाद जारी किए गए संयुक्त वक्तव्य (Joint Statement) में दोनों देशों ने आतंकवाद के नासूर के खिलाफ बिना किसी दोटूक के अपनी कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। भारत और लिकटेंस्टीन ने स्पष्ट रूप से कहा कि आतंकवाद और उग्रवाद का कोई भी रूप मानवता के लिए स्वीकार्य नहीं है और सीमापार आतंकवाद (Cross-Border Terrorism) वैश्विक शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा है।खास तौर पर, दोनों पक्षों ने अप्रैल 2025 में भारत के पहलगाम (Pahalgam Terror Attack) में हुए कायराना आतंकी हमले की एक स्वर में तीव्र भर्त्सना की। इस दौरान इस बात पर भी गहरी एकजुटता दिखाई गई कि आतंकवादियों और इस घटना के असली साजिशकर्ताओं तथा इसके वित्तपोषकों को जल्द से जल्द न्याय के कठघरे में खड़ा किया जाना बेहद जरूरी है। दोनों देशों ने आतंकवाद की फंडिंग (Terror Financing) को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुफिया जानकारी साझा करने और सख्त सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता पर भी विशेष बल दिया।राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात और विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएंअपनी इस राजकीय यात्रा के दौरान लिकटेंस्टीन के प्रिंस एलियोस और प्रिंसेस सोफी ने देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू (Droupadi Murmu) से भी शिष्टाचार भेंट की। राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति मुर्मू ने मेहमान शाही मेहमानों के सम्मान में एक विशेष राजकीय भोज (Banquet) का आयोजन किया।राष्ट्रपति मुर्मू ने इस अवसर पर कहा कि भारत और लिकटेंस्टीन के बीच पारंपरिक रूप से भले ही भौगोलिक दूरियां हों, लेकिन आपसी मूल्यों और सहयोग के मोर्चे पर दोनों देशों के संबंध बेहद प्रगाढ़ हैं। राष्ट्रपति ने इस बात पर विशेष प्रकाश डाला कि दोनों देश आने वाले समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) अनुसंधान, कौशल विकास (Skill Development) और स्वच्छ हरित तकनीक (Clean Technology) के क्षेत्रों में आपसी सहयोग की अपार संभावनाओं को मिलकर तलाश सकते हैं।विदेश मंत्रालय द्वारा दी गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार, दोनों देशों के बीच व्यापार एवं निवेश, अत्याधुनिक नवाचार, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, तथा दोनों देशों के नागरिकों के बीच आपसी संबंधों (People-to-People Ties) को मजबूत करने को लेकर भी कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर सहमति बनी है। इसके साथ ही, प्रिंस एलियोस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिकटेंस्टीन आने का औपचारिक निमंत्रण भी दिया है।आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के नियमन और वैश्विक सुशासन पर बनी सहमतिआज के इस आधुनिक और तकनीकी युग में डिजिटल सुरक्षा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का दायरा तेजी से बढ़ रहा है। भारत और लिकटेंस्टीन ने अपनी इस बैठक के दौरान इस बात पर पूर्ण सहमति व्यक्त की कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का विकास और उसका संचालन पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवीय मूल्यों पर आधारित होना चाहिए, ताकि तकनीक का दुरुपयोग रोका जा सके और वैश्विक मानवाधिकारों की रक्षा की जा सके।लिकटेंस्टीन जैसे यूरोपीय देश द्वारा भारत की संप्रभुता, आतंकवाद के खिलाफ उसकी लड़ाई और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उसकी दावेदारी का समर्थन करना यह साबित करता है कि दुनिया का हर बड़ा राष्ट्र आज भारत को एक जिम्मेदार और शक्तिशाली वैश्विक महाशक्ति के रूप में देख रहा है। यह कूटनीतिक सफलता आने वाले वर्षों में भारत के अंतरराष्ट्रीय रसूख को और अधिक ऊंचाई पर ले जाने का काम करेगी।
जिस फ्रांस को मैंने देखा: पेरिस की खूबसूरती और बदहाली का विरोधाभास
फैशन, खूबसूरती, आजादी व आधुनिकता के लिए मशहूर फ्रांस की चमकदार तस्वीर के पीछे बेरोजगारी, असमानता और असंतोष की कहानियां भी छिपी हैं।
यूरोप में यूपी के ‘योगी मॉडल’ पर अमल के अंतरराष्ट्रीय निहितार्थ
यूरोप में कानून-व्यवस्था, हिंसक प्रदर्शनों, संगठित अपराध और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने की घटनाओं के संदर्भ में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की शासन-शैली पर चर्चा एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक और नीतिगत विषय है। लेकिन इसका विश्लेषण करते समय एक बुनियादी सवाल समझना आवश्यक है कि क्या यूरोप को यूपी के 'योगी मॉडल' की सख्ती अपनाने की जरूरत है, या उसे उस मॉडल के कुछ चुनिंदा प्रशासनिक उपायों से सीख लेनी चाहिए? यहां पर यह बुनियादी सवाल इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि वर्ष 2017 के बाद अमेरिका-यूरोप ने योगी मॉडल की आलोचना की थी! लिहाजा, इस प्रश्न का उत्तर यूरोप की राजनीतिक व्यवस्था, मानवाधिकार संबंधी प्रतिबद्धताओं और उत्तर प्रदेश में अपनाई गई नीतियों के वास्तविक परिणामों को साथ रखकर ही दिया जा सकता है। लेकिन जब 'इस्लामिक अतिवादी' स्थानीय असंतुष्ट लोगों के साथ मिलकर यूरोप का इस्लामीकरण पर उतारू हों और ईरान का परोक्ष बरदहस्त उन्हें प्राप्त हो तो अमेरिका के बाद यूरोपीय विवशता समझी जा सकती है। इसे भी पढ़ें: Yogi Model ने Italy में मचाई धूम, दंगाइयों-उपद्रवियों से UP Style में निबटेंगी PM Giorgia Meloni सबसे पहला सवाल यह है की ‘योगी मॉडल’ से हमारा आपका क्या आशय है? तो माकूल जवाब यही होगा कि राजनीतिक विमर्श में ‘योगी मॉडल’ का प्रयोग मुख्यतः उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था को प्राथमिकता देने, अपराधियों के विरुद्ध पुलिस कार्रवाई, संगठित अपराध पर नियंत्रण, प्रशासनिक सख्ती और अवैध अतिक्रमण के विरुद्ध कार्रवाई जैसी नीतियों के लिए किया जाता है। हालाँकि, इन सभी उपायों को एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं है। अपराध की जाँच, दोषसिद्धि, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना और संपत्ति संबंधी विवादों का निपटारा अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएँ हैं। चूंकि यूपी में बेलगाम अल्पसंख्यक अपराधियों, सत्ता संरक्षित बाहुबलियों, इनसे जुड़े मनबढ़ युवाओं और शातिर अपराधियों के इशारे पर अपराध कर रहे बहुसंख्यक अपराधियों को नियंत्रित करने में यूपी के योगी मॉडल ने आशातीत सफलता प्राप्त की है, इसलिए चारो तरफ से जल रहे फ्रांस, इटली जैसे यूरोपीय देशों के पास कोई दूसरा चारा भी नहीं है। सर्वप्रथम इटली की प्रमुख और मोदी की मित्र जॉर्जिया मेलोनी ने यूपी के योगी मॉडल पर अमल करने की घोषणा की, तत्पश्चात मोदी के दूसरे मित्र फ्रांस के प्रमुख मैक्रो ने जब यूपी के योगी मॉडल की अच्छी नीतियों पर अमल करना शुरू किया तो अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार 'गैंग' सक्रिय हो गया और यूरोपीय देशों को उस नकारा लोकतंत्र की दुहाई देने लगा, जहां के बेलगाम लोग 'जुल्मी पूंजीवादी अड्डों' को फूंकने के बजाय अपने देश के सार्वजनिक जगहों, नागरिक सुविधाओं और ठिकानों को ही फूंक रहे हैं! यूरोप में इस मॉडल की चर्चा के तीन संभावित कारण हैं:- एक, कानून का प्रभावी प्रवर्तन: हिंसा, लूटपाट और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वालों के विरुद्ध त्वरित एवं निष्पक्ष कार्रवाई करना। दो, प्रशासनिक जवाबदेही: पुलिस और स्थानीय प्रशासन की तैयारी, समन्वय तथा निर्णय लेने की क्षमता में सुधार करना। तीन, राज्य की विश्वसनीयता: नागरिकों को यह भरोसा दिलाना कि शांतिपूर्ण जीवन, सार्वजनिक परिवहन और व्यापारिक गतिविधियों की सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन किसी मॉडल का प्रभाव उसके नाम या राजनीतिक लोकप्रियता से नहीं, बल्कि उसके परिणामों और कानूनी प्रक्रियाओं के पालन से मापा जाना चाहिए। दूसरा प्रासंगिक सवाल यह है कि यूरोप के लिए इसके क्या अंतरराष्ट्रीय निहितार्थ हो सकते हैं? एक, कानून-व्यवस्था की बहस में बदलाव: यदि यूरोपीय देश उत्तर प्रदेश की तरह अपराधियों के विरुद्ध कार्रवाई की गति, पुलिस-प्रशासन के समन्वय और सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा पर अधिक ध्यान देते हैं, तो उनकी आंतरिक सुरक्षा नीतियों में बदलाव आ सकता है। इससे भारत के प्रशासनिक अनुभवों में अंतरराष्ट्रीय रुचि बढ़ सकती है। दो, भारत की सॉफ्ट पावर और नीतिगत प्रतिष्ठा: भारत के किसी राज्य की प्रशासनिक नीति पर यूरोप में गंभीर चर्चा होना भारतीय संघीय व्यवस्था के अनुभवों को आंतरिक सुरक्षा नीतियों में बदलाव आ सकता है। इससे भारत के प्रशासनिक अनुभवों में अंतरराष्ट्रीय रुचि बढ़ सकती है। तीन, मानवाधिकार और कानून के शासन पर बहस: यूरोप में पुलिस कार्रवाई के साथ नागरिक स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण प्रदर्शन और न्यायिक समीक्षा का विशेष महत्त्व है। यूरोप की परिषद ने 23 अक्टूबर 2026 के आसपास जारी अपने हालिया वक्तव्य में भी शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और हिंसा करने वाले व्यक्तियों के बीच अंतर करने तथा पुलिस बल के कानूनी और आनुपातिक इस्तेमाल पर जोर दिया है। चार, भारत-यूरोप संबंधों में नई चर्चा: यदि यूरोपीय सरकारें भारतीय राज्यों के पुलिस प्रशिक्षण, डिजिटल निगरानी के कानूनी ढाँचे या प्रशासनिक समन्वय जैसे क्षेत्रों में उपयोगी अनुभव पाती हैं, तो तकनीकी सहयोग और नीतिगत संवाद के अवसर बन सकते हैं। अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिज्ञ बताते हैं कि इसे अभी एक संभावित दिशा समझना चाहिए, न कि यूरोप द्वारा योगी मॉडल स्वीकार कर लेने का प्रमाण! तीसरा अहम सवाल है कि क्या यूरोप में ‘बुलडोजर नीति’ भी अपनाई जा सकती है? तो जवाब होगा कि यहीं पर इस बहस का सबसे संवेदनशील पक्ष सामने आता है। उत्तर प्रदेश में अवैध निर्माणों के विरुद्ध कार्रवाई को लेकर ‘बुलडोजर मॉडल’ राजनीतिक विमर्श का प्रमुख हिस्सा रहा है। लेकिन अवैध निर्माण हटाना और किसी आपराधिक मामले में आरोपी व्यक्ति को दंडित करने के लिए उसकी संपत्ति गिराना, दोनों अलग बातें हैं। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 13 नवंबर 2024 को स्पष्ट किया कि केवल किसी आपराधिक मामले में आरोपी होने के आधार पर, कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना, किसी की संपत्ति गिराना असंवैधानिक है। न्यायालय ने नोटिस, सुनवाई और न्यायिक समीक्षा से जुड़े निर्देश भी दिए। लिहाजा, यूरोप में भी ऐसी किसी नीति को लागू करने के लिए स्थानीय कानून, संपत्ति अधिकार, निष्पक्ष सुनवाई और आनुपातिक कार्रवाई के मानकों का पालन आवश्यक होगा। इसलिए यूरोप के लिए संभावित सीख यह नहीं कि वह बिना कानूनी प्रक्रिया के कठोर दंडात्मक कार्रवाई अपनाए, बल्कि यह कि अवैध गतिविधियों पर कार्रवाई प्रभावी, प्रमाण-आधारित और न्यायिक समीक्षा के अधीन हो। चौथा महत्वपूर्ण सवाल है कि योगी मॉडल बनाम यूरोपीय व्यवस्था की तुलनात्मक दृष्टि क्या है? इसे हमलोग विषय दर विषय, उससे संबंधित उत्तर प्रदेश के मॉडल से जुड़ी बहस और यूरोपीय व्यवस्था की प्रमुख कसौटी के आधार पर निम्नलिखित तरीके से समझ सकते हैं:- एक, अपराध नियंत्रण- पुलिस कार्रवाई और अपराधियों पर दबाव - प्रभावी जाँच, अभियोजन और निष्पक्ष सुनवाई। दो, हिंसक भीड़- सार्वजनिक व्यवस्था बहाल करना- हिंसक व्यक्तियों पर कार्रवाई, शांतिपूर्ण प्रदर्शन की सुरक्षा। तीन, संपत्ति संबंधी कार्रवाई- अवैध निर्माण और अतिक्रमण हटाना, कानून के अनुसार नोटिस, सुनवाई और अपील। चार, पुलिस की जवाबदेही- प्रशासनिक अनुशासन और कार्रवाई- आनुपातिक बल प्रयोग, स्वतंत्र जाँच और जवाबदेही। पांच, शासन की विश्वसनीयता- नागरिक सुरक्षा और कानून का प्रवर्तन- सुरक्षा के साथ मौलिक अधिकारों का संरक्षण। यूरोप की परिषद के मानवाधिकार मानकों में पुलिस कार्रवाई के लिए आवश्यकता, आनुपातिकता और जवाबदेही पर जोर दिया जाता है। ये मानक हिंसक घटनाओं से निपटने के साथ-साथ शांतिपूर्ण सभा के अधिकार की रक्षा भी करते हैं। जहां तक अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर इसके संभावित प्रभाव की बात है तो इससे भारत की प्रशासनिक छवि मज़बूत होगी। यदि उत्तर प्रदेश की किसी नीति से अपराध नियंत्रण या पुलिस-प्रशासन के समन्वय में मापने योग्य सुधार सिद्ध होता है, तो भारत अपने अनुभवों को अंतरराष्ट्रीय नीति-चर्चाओं में प्रस्तुत कर सकता है। इससे भारतीय राज्यों के प्रशासनिक प्रयोगों पर शोध और संवाद को बढ़ावा मिल सकता है। चूंकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा और सफल लोकतंत्र है, इसलिए भारत की बातों को अनसुनी करना अन्य देशों के लिए घातक भी हो सकता है। जहां तक यूरोप में राजनीतिक ध्रुवीकरण की बात है तो कठोर कानून-व्यवस्था की नीतियों को कुछ राजनीतिक समूह सार्वजनिक सुरक्षा के लिए आवश्यक मान सकते हैं, जबकि दूसरे समूह उनके दुरुपयोग और नागरिक स्वतंत्रताओं पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर सवाल उठा सकते हैं। इसका वास्तविक प्रभाव देश, सरकार और लागू नीति के अनुसार अलग होगा। जहां तक लोकतांत्रिक शासन की परीक्षा की बात है तो किसी सरकार की क्षमता केवल हिंसा रोकने से नहीं, बल्कि निर्दोष नागरिकों की सुरक्षा, निष्पक्ष न्याय और प्रशासनिक गलतियों को सुधारने की व्यवस्था से भी मापी जाती है। यह कसौटी भारत और यूरोप, दोनों पर लागू होती है। अब प्रासंगिक सवाल है कि आख़िर यूरोप को वास्तव में किन किन पहलुओं से सीखने पर विचार करना चाहिए? तो जवाब होगा कि यूरोपीय देशों के लिए उपयोगी नीति-चर्चा पाँच बिंदुओं पर केंद्रित हो सकती है:- एक, हिंसक घटनाओं के दौरान पुलिस, अभियोजन पक्ष और स्थानीय प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना। दो, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने तथा संगठित अपराध के मामलों में साक्ष्य-आधारित जाँच और समयबद्ध न्यायिक प्रक्रिया का अनुपालन करना। तीन, हिंसक व्यक्तियों और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के बीच स्पष्ट अंतर करना और हिंसक व्यक्तियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई करना। चार, पुलिस कार्रवाई की स्वतंत्र समीक्षा और गलत कार्रवाई के लिए अधिकारियों की जवाबदेही तय करना। पांच, अपराध की रोकथाम के साथ उन सामाजिक परिस्थितियों पर भी ध्यान देना जो बार-बार हिंसा को जन्म देती हैं। फ्रांस के न्याय मंत्रालय ने जून-जुलाई 2023 की शहरी हिंसा के बाद गिरफ्तार और दोषसिद्ध व्यक्तियों की पृष्ठभूमि तथा घटनाओं के कारणों का विश्लेषण कराया था। यह उदाहरण बताता है कि हिंसक घटनाओं से निपटने के लिए केवल तत्काल पुलिस कार्रवाई नहीं, बल्कि बाद का संस्थागत विश्लेषण भी महत्त्वपूर्ण है। कोरा सवाल है कि क्या योगी मॉडल यूरोप के लिए नया प्रशासनिक विकल्प बन सकता है? तो जवाब होगा कि इस प्रश्न पर गंभीर अंतरराष्ट्रीय चर्चा संभव है, क्योंकि यूरोप ने उत्तर प्रदेश के योगी मॉडल को अपना लिया है। मुख्य बात यह है कि कठोर शासन और प्रभावी शासन एक ही चीज नहीं हैं। प्रभावी शासन वह है जो हिंसा और अपराध पर नियंत्रण रखे, नागरिकों को सुरक्षित बनाए, कानून का निष्पक्ष पालन करे और प्रशासन को भी कानून के प्रति जवाबदेह रखे। यदि उत्तर प्रदेश की किसी विशिष्ट नीति के सकारात्मक परिणाम स्वतंत्र आँकड़ों से प्रमाणित होते हैं, तो यूरोपीय देश उसकी उपयोगिता पर विचार कर सकते हैं। लेकिन नीतियों को उनके नाम या राजनीतिक छवि के आधार पर नहीं, बल्कि प्रमाण, लागत, परिणाम और मानवाधिकारों पर उनके प्रभाव के आधार पर परखना चाहिए। यही वह दृष्टिकोण है जिसके तहत ‘योगी मॉडल’ पर बहस भारत की आंतरिक राजनीति से आगे बढ़कर कानून-व्यवस्था, लोकतंत्र और अंतरराष्ट्रीय प्रशासनिक सहयोग के व्यापक प्रश्नों तक पहुँच सकती है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
फ्रांस में करीना-सैफ का फैमिली वेकेशन, तैमूर-जेह संग देखें खूबसूरत तस्वीरें
करीना कपूर और सैफ अली खान इन दिनों फ्रांस में छुट्टियां मना रहे हैं। सैफ ने वेकेशन की कुछ तस्वीरें शेयर की हैं, जिनमें परिवार का मस्ती भरा अंदाज और कैजुअल लुक देखने को मिल रहा है।
फ्रांस में चंडीगढ़ के विरासत फर्नीचर की नीलामी हुई। 25 अक्टूबर को सात लाॅट 1.68 करोड़ रुपये में बिके। हेरिटेज प्रोटेक्शन सेल ने प्रशासन से एफआईआर दर्ज करने और बिके फर्नीचर की डिलीवरी रोकने की मांग की है।
यूरोप में अशांति से शहरवासी भी प्रभावित हो रहे हैं। कानपुर से नवंबर से दिसंबर में यूरोप के देशों की यात्रा की तैयारी कर रहे औसत सात हजार लोगों में से 50 प्रतिशत ने अपनी बुकिंग कैंसिल करा दी है।
अमेरिका ने जताई चिंता, यूरोपीय विमान निर्माता एयरबस को मिले निवेश ऋण
वाशिंगटन, अमेरिका ने यूरोपीय विमान निर्माता एयरबस को दिए गए रिकॉर्ड स्तर के निवेश ऋण पर चिंता जताई है। अमेरिका का कहना है कि इस कदम से अमेरिका और यूरोप के बीच व्यापार संबंधों में नई अनिश्चितता पैदा हो गई है और विमान सब्सिडी विवाद पर बने पुराने समझौते के भविष्य को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।
फ्रांस में शिक्षा व्यवस्था और बढ़ते जीवन खर्च के खिलाफ छात्रों के हिंसक प्रदर्शनों के बाद सरकार ने विश्वविद्यालयों में दाखिले की प्रक्रिया बदलने का फैसला किया है। सरकार 2027 में मौजूदा ऑनलाइन प्रवेश प्रणाली में बड़े बदलाव करेगी और 2028
Basmati Export: पेरिस व्यापार मेले में यूरोपीय खरीदारों ने दिखाई दिलचस्पी, निर्यात 60 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचने की उम्मीद; पश्चिमी यूपी के किसानों को फायदा
लिमिटेड की नई इकाई का उद्घाटन रविवार को राजातालाब के खोचवां में रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया। इस यूनिट की स्थापना पर करीब 150 करोड़ रूपये का निवेश किया गया है।
वैचारिक संकेत: यूरोप में हिंसा से जामिया के आंदोलन तक... बयानों के संदर्भ बेशक अलग, संकेतों को समझना जरूरी
विदेश जाकर परिवार की आर्थिक हालत सुधारने का सपना देख रहे 19 वर्षीय युवक अमन सैनी हत्या से परिवार टूट गया। आज यानी 25 अक्टूबर को दिल्ली में उसका बायोमेट्रिक होना था और इसके 8 से 10 दिन बाद उसे यूरोप जाना था। परिवार इसके लिए करीब 16.50 लाख रुपए खर्च करने की तैयारी कर रहा था। लेकिन प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही युवक की चाकू मारकर हत्या कर दी गई। पिता ने बेटे के दोस्त रमन पर शक जताते हुए आरोप लगाया कि उसे जबरन साथ ले जाया गया था। पुलिस शक के आधार पर पूछताछ कर रही है। पहले UK का वीजा कम उम्र से रिफ्यूज हुआ था अमन के पिता राजकुमार सैनी कुरुक्षेत्र के लाडवा में साइकिल रिपेयरिंग की दुकान चलाते हैं। उन्होंने बताया कि अमन ने 2022-23 में कॉमर्स से 12वीं की पढ़ाई पूरी की थी। इसके बाद उसने लैब का काम सीखा और अलग-अलग लैब में काम भी करता रहा। अमन एक साल पहले यूके जाने के लिए वीजा लगवा चुका था, लेकिन कम उम्र के कारण वीजा नहीं मिला। इसके बाद उसने यूरोप जाने की तैयारी की। वह कहता था कि विदेश जाकर मजदूरी भी करनी पड़े तो करेगा, लेकिन अपने पैरों पर खड़ा होगा। उसकी दो बहनें हैं, जिनमें बड़ी की शादी हो चुकी है। अमन की शादी की योजना 25 साल की उम्र तक नहीं थी। पिता बोले- रमन घर से बुलाकर ले गया था राजकुमार के अनुसार, 24 अक्टूबर की रात करीब 9 बजे रमन अमन को यह कहकर साथ ले गया कि उसके रिश्तेदार का ऑपरेशन हुआ है और अस्पताल में हाल-चाल लेना है। पिता का आरोप है कि अमन ने जाने से मना किया था, फिर भी रमन उसे बाइक पर ले गया। बाद में दोनों न्यू बहादुर चंद कॉलोनी स्थित बालाजी मंदिर के पास पहुंचे, जहां 4-5 हमलावरों ने अमन पर चाकुओं से हमला कर दिया। पिता ने आरोप लगाया कि रमन मौके पर खड़ा रहा और उसे चोट भी नहीं आई। उन्होंने शिवा, कृष गांधी, राधे और 2-3 अन्य युवकों पर हमले में शामिल होने का आरोप लगाया। पिता का कहना है कि हमला अचानक नहीं, बल्कि साजिश के तहत हुआ। हालांकि, इसकी पुष्टि जांच के बाद ही होगी। पुलिस CCTV फुटेज खंगाल रही हमले में गंभीर रूप से घायल अमन को अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। पुलिस और एफएसएल टीम ने मौके से साक्ष्य जुटाए। थाना शहर के एसएचओ रामलाल और सदर बाजार चौकी इंचार्ज सतीश कुमार के अनुसार, मामले की गहनता से जांच की जा रही है। पुलिस आसपास के सीसीटीवी फुटेज खंगाल रही है और शक के आधार पर संबंधित लोगों से पूछताछ कर रही है। पुलिस ने भरोसा दिया है कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।
फ्रांस में Shamonda Virus का पहला इंसानी केस मिला, WHO ने की पुष्टि
हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने फ्रांस में शमोंडा वायरस के पहले इंसानी मामले की पुष्टि की है। फ्रांस के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, संक्रमित व्यक्ति की उम्र 60 साल से ज्यादा थी और उनका इम्यून सिस्टम भी काफ कमजोर था। लेकिन इनका इलाज के दौरान मौत हो गई। वैसे यह वायरस पहले सिर्फ जानवरों में ही पाया गया था और अब आमतौर पर मवेशियों, भेड़ों, बकरियों और घोड़ों को प्रभावित करता है। आइए आपको बताते हैं वायरस क्या है और इंसानों में इसके लक्षण को कैसे करता है। क्या है शमोंडा वायरस? असल में शमोंडा वायरस पहली बार 1960 के दशक में नाइजीरिया के मवेशियों में पाया गया था। इसके बाद से अफ्रीका और एशिया के कुछ हिस्सों में इसके छोटे-मोटे मामले दर्ज किए गए हैं। बता दें कि, यह वायरस श्मालेनबर्ग वायरस परिवार से आता है, जो पशुओं में प्रजनन से संबंधित समस्याएं पैदा होती हैं। इंसानों में शमोंडा वायरस के लक्षण वैसे इंसानों में इस वायरस के संक्रमण का ये पहला मामला पाया गया है। इसलिए इंसानों में इसके लक्षण कैसे हो सकते हैं, इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। लेकिन इंसानों में इसके संक्रमण की वजह मिज, मक्खी जैसे एक छोटे कीड़े को माना जा रहा है। ये कीड़ा संक्रमित पशुओं के काटने के बाद वायरस का कैरियर बन जाता है और इंसानों में ये वायरस फैल सकता है। हालांकि, इसका अभी तक कोई प्रमाण मिला नहीं है कि शमोंडा वायरस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैल सकता है। वहीं, संक्रमित पशुओं के छूने, उनकी देखभाल करने या उनके पास रहने से भी ये वायरस नहीं फैलता। वायरस के बारे जांच जारी वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक, संक्रमित व्यक्ति उस क्षेत्र में पाएं जाते हैं, जहां पशुओं में शमोंडा वायरस फैल रहा था और वहां क्यूलिकोइड्स प्रजाति की मिज मक्खियां मौजूद थीं। वैसे संक्रमण के कारण और इनके खतरों को बेहतर तरीके से जानने के लिए अभी भी इस वायरस पर रिसर्च जारी है।
आखिर क्यों धधक रहा है फ्रांस और अन्य यूरोपीय देश? पुलिस प्रशासन के सामने क्या हैं चुनौतियाँ?
यूरोप में हिंसक विरोध-प्रदर्शनों, दंगों, आगजनी और पुलिस के साथ टकराव को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर नहीं समझा जा सकता। चूंकि इसके पीछे आर्थिक असंतोष, सामाजिक विभाजन, आव्रजन और एकीकरण की बहस, राजनीतिक ध्रुवीकरण, युवाओं में भविष्य को लेकर चिंता तथा पुलिस और नागरिकों के बीच विश्वास का संकट जैसे कई कारक हो सकते हैं। लेकिन एक बुनियादी अंतर समझना जरूरी है, वह यह कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतांत्रिक अधिकार है, जबकि आगजनी, लूटपाट, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान और लोगों पर हमले अपराध हैं। किसी प्रदर्शन में हिंसा होने का अर्थ यह नहीं कि उसमें शामिल हर व्यक्ति हिंसक है या पूरा समुदाय उसके लिए जिम्मेदार है। शायद इसी भ्रम में देश के देश जल रहे हैं और पुलिस तत्काल बहुत कुछ कर नहीं पाती। इससे आत्ताइयों के हौसले बुलंद हैं और लोकतांत्रिक सोच अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रही है। इसे भी पढ़ें: Vishwakhabram : France में Macron के खिलाफ विद्रोह जैसे हालात, पूरे यूरोप में फैल सकती है जनाक्रोश की आग! भले ही फ्रांस और अन्य यूरोपीय देशों की परिस्थितियाँ भी एक जैसी नहीं हैं। इसलिए यह देखना आवश्यक है कि अशांति किन कारणों से भड़कती है, पुलिस की कार्रवाई कहाँ कठिन हो जाती है और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करते हुए हिंसा रोकने के लिए कौन-से उपाय प्रभावी हो सकते हैं। # सवाल है कि अक्टूबर 2026 में फ्रांस में वास्तव में क्या हो रहा है? तो जवाब होगा कि फ्रांस में सितंबर के अंत से शुरू हुआ छात्र आंदोलन अक्टूबर में व्यापक अशांति में बदल गया। प्रारंभिक असंतोष स्कूलों की खराब सुविधाओं, शिक्षकों की कमी और शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी शिकायतों को लेकर था। बाद में महँगाई, जीवन-यापन की बढ़ती लागत और सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति जैसे मुद्दे भी आंदोलन से जुड़ गए। आखिर पेरिस सहित कई शहरों में लूटपाट, तोड़फोड़ और पुलिस से टकराव हुए। सरकार को बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी तैनात करने पड़े और कुछ क्षेत्रों में रात्रिकालीन कर्फ्यू प्रतिबंध लगाए गए। फ्रांसीसी अधिकारियों ने सुरक्षा व्यवस्था की तैयारियों और हिंसा के पूर्वानुमान में कमियों को भी स्वीकार किया। इसी समय इटली में भी जीवन-यापन की लागत, कम वेतन और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़ी शिकायतों के बीच प्रदर्शन हिंसक हुए। स्पेन और पुर्तगाल में आवास की समस्या को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए हैं। हालांकि, इन सभी घटनाओं के कारण और उनका स्वरूप अलग-अलग हैं। # सवाल है कि आखिर यूरोप में असंतोष बार-बार क्यों भड़कता है? तो इसके कुछ कारण हैं जो निम्नलिखित हैं:- पहला, महँगाई, आवास और आर्थिक असुरक्षा: जब किराया, ऊर्जा, परिवहन और रोजमर्रा के खर्च बढ़ते हैं, लेकिन आय और रोजगार के अवसर उसी गति से नहीं बढ़ते, तो लोगों में व्यवस्था के प्रति नाराजगी बढ़ सकती है। युवाओं के लिए अच्छी शिक्षा, रोजगार और स्वतंत्र जीवन की संभावनाएँ सीमित महसूस होना इस असंतोष को और बढ़ा सकता है। दूसरा, सार्वजनिक सेवाओं पर दबाव: स्कूलों में शिक्षकों की कमी, जर्जर सुविधाएँ और स्थानीय सेवाओं की कमजोर स्थिति नागरिकों को यह महसूस करा सकती है कि उनकी समस्याओं को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं मिल रही। फ्रांस के हालिया आंदोलन में शिक्षा से जुड़ी शिकायतें शुरुआती मुद्दों में शामिल थीं। तीसरा, सामाजिक अलगाव और अवसरों में असमानता: कुछ शहरी और वंचित इलाकों में रोजगार, शिक्षा और सामाजिक उन्नति के अवसरों की कमी असंतोष को गहरा सकती है। यदि नागरिकों को लगता है कि संस्थाएँ उनकी बात नहीं सुनतीं या उनके साथ भेदभाव होता है, तो राज्य पर भरोसा कमजोर पड़ सकता है। लेकिन इसे हर उपद्रव का एकमात्र कारण मानना उचित नहीं होगा। चौथा, राजनीतिक ध्रुवीकरण और आंदोलन का हिंसक हो जाना: किसी जायज मांग के साथ बड़ी संख्या में लोग शांतिपूर्वक जुट सकते हैं, लेकिन कुछ समूह उसी भीड़ का इस्तेमाल तोड़फोड़, लूटपाट या पुलिस को उकसाने के लिए कर सकते हैं। सोशल मीडिया पर तेजी से फैलने वाली तस्वीरें और संदेश भी तनाव बढ़ा सकते हैं। आंदोलन की मांगों और हिंसा करने वाले व्यक्तियों की जिम्मेदारी को अलग-अलग समझना जरूरी है। पाँचवाँ, आव्रजन और राष्ट्रीय पहचान पर विवाद: यूरोप के अनेक देशों में आव्रजन, शरणार्थियों के एकीकरण, राष्ट्रीय पहचान और सार्वजनिक संसाधनों के वितरण पर राजनीतिक बहस चलती रही है। ये विवाद ध्रुवीकरण बढ़ा सकते हैं, लेकिन फ्रांस की अक्टूबर 2026 की हिंसा के लिए किसी विशेष धार्मिक या प्रवासी समुदाय को जिम्मेदार ठहराने के पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि आर्थिक असंतोष हिंसा की पृष्ठभूमि तैयार कर सकता है, लेकिन वह हिंसा को उचित नहीं ठहराता। इसी प्रकार, किसी अपराधी की पहचान या पृष्ठभूमि के आधार पर पूरे समुदाय को दोषी ठहराना भी तथ्यपरक समाधान नहीं है। # सवाल है कि उत्पाती और हिंसक भीड़ पर नियंत्रण में पुलिस क्यों पिछड़ जाती है? तो जवाब होगा कि यह इस पूरे संकट का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू है। अक्टूबर 2026 की फ्रांसीसी घटनाओं में पुलिस की विफलता के कुछ ठोस कारण सामने आए हैं। इन्हें केवल पुलिस की कमजोरी या इच्छाशक्ति की कमी कह देना अधूरा विश्लेषण होगा। एक, खुफिया आकलन और तैयारी में चूक: फ्रांस में 17 अक्टूबर के प्रदर्शनों के लिए भीड़ का अनुमान वास्तविक संख्या से काफी कम रहा। आंतरिक मंत्रालय के शुरुआती अनुमान लगभग 60,000–110,000 प्रदर्शनकारियों के थे, जबकि बाद में संशोधित अनुमान 200,000 तक पहुँचे और मंत्रालय ने वास्तविक उपस्थिति लगभग 550,000 बताई। यह सरकारी अनुमान है, स्वतंत्र रूप से सत्यापित अंतिम गणना नहीं। इतनी बड़ी भीड़ के बीच हिंसा करने वाले छोटे समूहों की पहचान और सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा कठिन हो जाती है। दो, पुलिस बल की तैनाती और संसाधनों का असंतुलन: यदि कई शहरों में एक साथ हिंसा फैलती है, तो पुलिस को लोगों की सुरक्षा, दुकानों की रक्षा, यातायात नियंत्रण और हिंसक घटनाओं पर कार्रवाई जैसे अनेक काम करने पड़ते हैं। फ्रांस की हालिया घटनाओं में पुलिसकर्मियों की संख्या और तैनाती के समय को लेकर भी सवाल उठे। तीन, शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी और हिंसा करने वाले एक ही भीड़ में:पुलिस के सामने यह कठिन चुनौती रहती है कि हिंसा करने वालों पर कार्रवाई करते हुए शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और आसपास के आम नागरिकों को नुकसान से कैसे बचाया जाए। जल्दबाजी में की गई कार्रवाई तनाव बढ़ा सकती है, जबकि देर करने पर तोड़फोड़ और लूटपाट का दायरा बढ़ सकता है। चार, पुलिस की कठोर कार्रवाई के कानूनी और सामाजिक परिणाम: फ्रांस में प्रदर्शन के दौरान बल प्रयोग की आवश्यकता, उसकी आनुपातिकता और कुछ पुलिसकर्मियों के आचरण को लेकर जाँच चलती रही है। अक्टूबर में छात्र प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में पुलिस के कथित अनुचित आचरण की 18 आंतरिक जाँचें शुरू होने की खबर आई। इसका अर्थ यह नहीं कि हर पुलिस कार्रवाई गलत थी। लेकिन बल का अनुचित प्रयोग नागरिकों का भरोसा घटा सकता है और तनाव बढ़ा सकता है। पांच, पुलिस थकान, समन्वय और बदलती परिस्थितियाँ: लगातार कई दिनों तक आंदोलन चलने पर पुलिसकर्मियों की उपलब्धता, स्थानीय इकाइयों और विशेष प्रशिक्षित बलों के बीच समन्वय तथा बदलती परिस्थितियों के अनुसार रणनीति बदलने की क्षमता महत्त्वपूर्ण हो जाती है। फ्रांस की घटनाओं में इन पहलुओं पर भी सवाल उठे हैं। # सवाल है कि क्या पुलिस को और अधिक कठोर बना देना ही समाधान है? तो जवाब होगा कि नहीं, सवाल केवल कठोरता का नहीं बल्कि समय पर कार्रवाई, निश्चित जवाबदेही, कानून का समान अनुपालन और सही रणनीति का है। यूरोप की परिषद की संसदीय सभा की 2025 की रिपोर्ट में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच संवाद, मध्यस्थता, विशेष प्रशिक्षण, नागरिकों के भरोसे और बल के सीमित व आनुपातिक उपयोग पर जोर दिया गया था। रिपोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि कुछ आंदोलनों में संगठित हिंसक समूह शांतिपूर्ण विरोध को बिगाड़ सकते हैं। पुलिस प्रशासन को तीन परिस्थितियों में अंतर करना चाहिए: एक, उपयुक्त प्रशासनिक दृष्टिकोण: शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा, संवाद और प्रदर्शन के अधिकार की रक्षा। दो, तनावपूर्ण भीड़, हिंसा का जोखिम: प्रशिक्षित बल, समन्वय, स्पष्ट चेतावनी और तनाव कम करने के उपाय। तीन, आगजनी, लूटपाट या लोगों पर हमला: त्वरित एवं लक्षित कानूनी कार्रवाई, साक्ष्य जुटाना और दोषियों की जवाबदेही। लिहाजा लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस को न तो हिंसा के सामने निष्क्रिय रहना चाहिए, न ही पूरी भीड़ को अपराधी मान लेना चाहिए। # आखिर हिंसक भीड़ से निपटने का ठोस और दीर्घकालिक इलाज क्या है? पहला, बेहतर पूर्वानुमान और खुफिया समन्वय: बड़े प्रदर्शनों के संभावित आकार, संवेदनशील स्थानों और हिंसा के जोखिम का समय रहते आकलन किया जाए। वैध प्रदर्शन और हिंसा की तैयारी में अंतर रखा जाए; केवल राजनीतिक विचारों के आधार पर लोगों को संदिग्ध न माना जाए। दूसरा, प्रशिक्षित पुलिस और स्पष्ट कमान: भीड़ प्रबंधन के लिए विशेष प्रशिक्षण, एकीकृत कमान, पर्याप्त संसाधन और नागरिकों को सुरक्षित रखने की स्पष्ट जिम्मेदारी हो। बल का प्रयोग कानून के अनुसार आवश्यक और आनुपातिक होना चाहिए। तीसरा, अपराधियों की पहचान और शीघ्र न्याय: जहाँ कानूनी रूप से अनुमत हो, वहाँ उपलब्ध वीडियो, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और अन्य विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय की जाए। गिरफ्तारी, अभियोजन और न्यायिक प्रक्रिया कानून के अनुरूप हो; निर्दोष लोगों को सामूहिक दंड न दिया जाए। चौथा, पुलिस की जवाबदेही भी सुनिश्चित हो: कार्रवाई की स्वतंत्र समीक्षा, शिकायतों की निष्पक्ष जाँच और गलत आचरण पर उचित दंड आवश्यक हैं। इससे पुलिस का अधिकार कमजोर नहीं, बल्कि उसकी वैधता और नागरिकों का विश्वास मजबूत होता है। पाँचवाँ, सामाजिक असंतोष के मूल कारणों पर काम: शिक्षा, रोजगार, आवास, सार्वजनिक सेवाओं और भेदभाव से जुड़ी शिकायतों को गंभीरता से सुना जाए। केवल पुलिस बल बढ़ाकर उन समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता जो लगातार नई अशांति को जन्म देती हैं। # आखिर भारत के लिए इसमें क्या सबक निहित है? फ्रांस का अनुभव भारत के लिए भी प्रासंगिक है, क्योंकि भारत में भी बड़े जनसमूह, राजनीतिक रैलियाँ, धार्मिक आयोजन, छात्र आंदोलन और स्थानीय विरोध-प्रदर्शन पुलिस प्रशासन के सामने अलग-अलग चुनौतियाँ पैदा कर सकते हैं। भारत के संदर्भ में पाँच सबक महत्त्वपूर्ण हैं: एक, कानून का समान पालन: राजनीतिक समर्थन, विरोध या सामाजिक पहचान के आधार पर कार्रवाई का मानक नहीं बदलना चाहिए। दो, भीड़ से पहले तैयारी: आयोजकों, स्थानीय प्रशासन, आपातकालीन सेवाओं और पुलिस के बीच समन्वय हो। तीन, हिंसा पर लक्षित कार्रवाई: शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और हिंसा करने वालों को अलग-अलग देखा जाए। चार, डिजिटल साक्ष्य और जवाबदेही: अफवाहों की जाँच हो, साक्ष्य सुरक्षित रखे जाएँ और गलत सूचना फैलाने वालों पर भी कानून के अनुसार कार्रवाई हो। पांच, नागरिक विश्वास: पुलिस की निष्पक्षता, पारदर्शिता और शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई को प्राथमिकता मिले। इन उपायों का उद्देश्य केवल भीड़ को तितर-बितर करना नहीं, बल्कि हिंसा को रोकना और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है। # वस्तुत: समस्या पुलिस की ताकत से बड़ी है: फ्रांस की अक्टूबर 2026 की घटनाएँ दिखाती हैं कि बड़े पैमाने की अशांति में खुफिया आकलन की चूक, अपर्याप्त या असंतुलित तैनाती, पुलिस थकान और आंदोलन के भीतर हिंसक समूहों की मौजूदगी मिलकर गंभीर संकट पैदा कर सकते हैं। दूसरी ओर, बल का अनुचित प्रयोग और सामाजिक शिकायतों की उपेक्षा भी संस्थाओं के प्रति अविश्वास बढ़ा सकती है। लोकतांत्रिक राज्य की असली परीक्षा यह है कि वह शांतिपूर्ण विरोध की रक्षा करे, हिंसक अपराधों को रोके और दोनों काम कानून की मर्यादा में रहते हुए करे। केवल दमन से असंतोष समाप्त नहीं होता और केवल संवाद से तत्काल हिंसा नहीं रुकती। प्रभावी व्यवस्था को दोनों की जरूरत है—अपराध पर निष्पक्ष कानूनी कार्रवाई और असंतोष के कारणों का गंभीर समाधान। यही दृष्टिकोण पुलिस प्रशासन को प्रभावी तथा लोकतंत्र को अधिक सुरक्षित बना सकता है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
विचार: बड़े संकट की ओर बढ़ता यूरोप
यूरोप की समस्या केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरे आर्थिक और राजनीतिक कारण भी हैं।
France Protest Update News: मॉल लूटे, गाड़ियां फूंकी... फ्रांस में बेकाबू हुई हिंसा| Emmanuel Macron
France Protest Update News: फ्रांस में बढ़ती महंगाई और जीवन-यापन की बढ़ती लागत के खिलाफ प्रदर्शन ने कई जगह हिंसक रूप ले लिया। पेरिस समेत कई शहरों में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प हुई। आगजनी, तोड़फोड़ और लूटपाट की घटनाओं से हालात बिगड़ गए।
फ्रांस की हिंसा पर बोलीं कंगना रनौत, रिजीम चेंज पर भी दिया बयान
विपक्ष की ओर से सत्ता परिवर्तन को लेकर दिए गए बयानों पर बीजेपी सांसद कंगना रनौत ने कहा, 'इस तरह की ओछी हरकतें देश को लगातार यह याद दिलाती हैं कि एक मजबूत नेतृत्व की कितनी जरूरत है.'
फ्रांस में कुछ ठीक नहीं हो रहा: बढ़ता कर्ज, नाराज युवा और राजनीतिक संकट ने बढ़ाई मुश्किलें
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स्कॉलरशिप: यूरोप से करें मास्टर डिग्री, 37 नए प्रोग्राम में प्रवेश का मौका, 1.5 लाख+ तक की मदद
इरास्मस मुंड्स जॉइंट मास्टर्स स्कॉलरशिप के तहत यूरोप के 37 नए मास्टर प्रोग्राम में प्रवेश का मौका है। चयनित छात्रों को 24 महीने तक हर माह 1,400 यूरो तक की आर्थिक सहायता मिल सकती है।
फ्रांस के स्टूडेंट्स प्रोटेस्ट में ट्रंप का बड़ा दावा
फ्रांस में स्कूल और यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स प्रोटेस्ट अब देश की राजनीति और अमेरिका तक पहुंच गया है. शुरुआत शिक्षकों, नर्स और स्टाफ की कमी को लेकर हुई, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे बड़े पैमाने पर प्रवासन और इस्लाम से जोड़ दिया. वहीं फ्रांसीसी अधिकारियों और छात्र संगठनों के मुताबिक आंदोलन की शुरुआती मांगें स्कूलों की सुविधाओं और कर्मचारियों से जुड़ी हैं. सोशल मीडिया पर पुराने वीडियो और भ्रामक दावों ने भी विवाद बढ़ाया है.
फ्रांस में छात्र प्रदर्शन: अबतक 5 हजार गिरफ्तार, इनमें 87% नाबालिग
फ्रांस में शिक्षा व्यवस्था की बदहाली के खिलाफ छात्रों का गुस्सा सड़कों पर है. इस आंदोलन में गिरफ्तार किए गए 5,000 से ज्यादा लोगों में 87 प्रतिशत नाबालिग हैं. स्कूलों में शिक्षकों की कमी, खराब इमारतों और बुनियादी सुविधाओं की कमी से छात्र परेशान हैं. प्रदर्शन के दौरान हिंसा और पुलिस कार्रवाई ने सरकार के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है.
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फिजिक्स का नोबेल पुरस्कार 2026 प्रोफेसर फ्रांसिस हाल्जेन को अंटार्कटिका में आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी की स्थापना और ब्रह्मांडीय न्यूट्रिनो की खोज के लिए दिया गया है।
श्वेता तिवारी के लिए यूरोपियन विदेशी दूल्हा ढूंढेंगी मल्लिका, बनाया प्लान
‘द ट्रेटर्स 2’ में श्वेता तिवारी की लव लाइफ पर मल्लिका शेरावत ने मजेदार बात कही. मल्लिका बोलीं कि वह श्वेता के लिए एक अच्छा यूरोपियन लड़का ढूंढेंगी.
जलवायु परिवर्तन का संकट झेलने लगा यूरोप
यूरोप में जो लोग समझते थे कि जलवायु परिवर्तन भविष्य की पीढ़ियों के लिए समस्या है उन्हें इस बार की गर्मियों ने सच्चाई बता दी है. जलवायु परिवर्तन के महंगे और जीवन बदलने वाले आर्थिक नतीजे यूरोप को अपनी चपेट में ले चुके हैं
यूरोप में भीषण गर्मी का कहर... इटली में रेड अलर्ट, ऑस्ट्रिया में तापमान का टूटा रिकॉर्ड
यूरोप में भीषण गर्मी और लू ने कई देशों के तापमान रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. इटली सरकार ने 27 प्रमुख शहरों को रेड अलर्ट पर रखा है. ऑस्ट्रिया में तापमान 41.2 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है, जो अब तक का सबसे ज्यादा तापमान है. इस गर्मी और सूखे का असर बिजली उत्पादन, परिवहन और पर्यटन पर भी पड़ा है. पर्यावरणविद ग्लोबल वार्मिंग को इस स्थिति का मुख्य कारण मानते हैं.
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स्पेन की पुलिस बॉर्डर पर अलर्ट खड़ी है. पुलिस की गोलियों से अंदर घुसने की कोशिश कर रहे कई प्रवासियों की मौत हो चुकी है. 'यूरोप का दरवाजा' कहा जाने वाला स्यूटा शहर में प्रवासियों की बाढ़ ने इस शहर में कानून-व्यवस्था का संकट खड़ा कर दिया है.
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अभूतपूर्व जंगल की आग से जूझते फ्रांस में पहली बार फायर क्लाउड यानी आग के बादल बनते देखा गया है. आखिर आग के बादल होते क्या हैं और इनका क्या असर होता है. फ्रांस में इसे देखने के बाद क्यों चिंता बढ़ रही है
60 की उम्र में मिलिंद सोमन ने रचा इतिहास, यूरोप से अफ्रीका तक तैरकर पार किया स्ट्रेट ऑफ जिब्राल्टर
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Heeramandi के बाद अब Cannes में अपनी 'गजगामिनी चाल' दिखाएंगी Aditi Rao Haidari,फ्रांस के लिए रवाना हुईबिब्बोजान
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