बात 18 अक्टूबर 1954 की है। सुबह का वक्त था और जगह पुडुचेरी का कीझूर इलाका। एक सरकारी इमारत के कमरे में काफी हलचल थी। एक कोने में पप्पा गौबार्ट नाम से मशहूर इंडो-फ्रेंच नेता एडौर्ड गौबार्ट खड़े थे। सफेद खादी के कुर्ते में लिपटे गौबार्ट कभी फ्रांसीसी प्रशासन का दाहिना हाथ माने जाते थे। उनके सामने फ्रांसीसी कमिश्नर का प्रतिनिधि पसीने पोंछते हुए फाइलों में उलझा था। बाहर हजारों की भीड़ देशभक्ति के नारे लगा रही थी। 178 लोग लाइन में लगे थे। सबके हाथ में मतपत्र था। वे एक-एक करके पेटी में वोट डाल रहे थे। जैसे ही आखिरी वोट डला, गौबर्ट बाहर निकले, उन्होंने अपना हाथ हवा में लहराया और देखते ही देखते कीझूर की धूल भरी सड़क 'जय हिंद' के नारों से गूंज उठी। 178 में से 170 लोगों ने पुडुचेरी के भारत में विलय के लिए वोट किया। इसके बाद पुडुचेरी भारत का हिस्सा बन गया, लेकिन फ्रेंच सरकार को इसकी कानूनी प्रक्रिया पूरी करने में 8 साल लग गए। 1962 में पुडुचेरी कानूनी तौर पर भारत में शामिल हो गया। आज, यानी 9 अप्रैल को पुडुचेरी में वोटिंग है। ऐसे में आज कहानी, मिनी फ्रांस कहे जाने वाले पुडुचेरी, यानी पांडिचेरी की जो साल में दो बार आजादी मनाता है… 1498 में पुर्तगाली नाविक वास्को डी गामा ने भारत का रास्ता खोजा। इसके बाद यूरोप में होड़ मच गई। वजह थी- भारत के मसाले, रेशम, सोना और दौलत। डच, अंग्रेज और फ्रेंच भी दौड़ में जुट गए। 1665 में फ्रेंच अफसर फ्रांसिस कैरो भारत आए। 1668 में फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी ने सूरत में पहला ट्रेड सेंटर खोला। इसके बाद फ्रांसीसी पांडिचेरी की ओर बढ़े। तब पांडिचेरी मछली पकड़ने वाला छोटा गांव था। यह बीजापुर रियासत में आता था। 1673 में फ्रेंच अफसर फ्रांस्वा मार्टिन ने बीजापुर के सुल्तान के सूबेदार शेर खान लोधी से पांडिचेरी को लीज पर ले लिया। उन्होंने यहां ट्रेड सेंटर खोला। धीरे-धीरे यह शहर बन गया। 18वीं सदी के आखिर में फांसीसियों ने पांडिचेरी के साथ-साथ यनम, माहे और कराईकल पर भी कब्जा कर लिया। ये इलाके दूर थे, लेकिन समुद्र किनारे थे। पांडिचेरी पर कई बार अंग्रेजों ने भी राज किया, लेकिन हर बार फ्रांसीसी इसे वापस ले लेते थे। आखिरकार 1816 में फ्रांसिसियों ने पांडिचेरी में खूंटा गाड़ दिया और फिर कभी अंग्रेजों के हाथ नहीं आया। फ्रांसीसियों ने पांडिचेरी को एक नहर के सहारे दो हिस्सों में बांट दिया। पहला- 'विले ब्लांश' यानी वाइट टाउन, जहां फ्रेंच अधिकारी, व्यापारी और भारतीय ईसाई रहते थे। दूसरा- 'विले नोयर' यानी ब्लैक टाउन, जहां आम भारतीय रहते। फ्रांसीसियों ने पांडिचेरी में नेवल बेस बनाया। टेक्सटाइल इंडस्ट्री खोली, जिससे फ्रांस को भारी मुनाफा हुआ। सालाना 1.95 लाख डॉलर की कमाई होती। यानी आज के हिसाब से करीब 40 करोड़ रुपए। 17 साल के लड़के ने शुरू किया आंदोलन फ्रेंच अफसर पांडिचेरी की कपड़ा मिल के मजदूरों से पूरे हफ्ते जी-तोड़ मेहनत करवाते और महीने में मुश्किल से 1 रुपए तनख्वाह देते। मजदूर गुस्से में थे। उनमें क्रांति की आग सुलग रही थी। 1908 में मशहूर लेखक और क्रांतिकारी सुब्रमण्यम भारती अंग्रेजों से बचते हुए मद्रास से भागकर पांडिचेरी आ गए। फ्रेंच कॉलोनी होने के कारण यह ब्रितानी हुकूमत के अधिकार क्षेत्र से बाहर था। इसका फायदा भारतीय क्रांतिकारी उठाते। सुब्रमण्यम ने पांडिचेरी से 'इंडिया' नाम की विकली मैगजीन निकाली। इसने ब्रिटिश भारत के साथ पांडिचेरी में भी क्रांति जगा दी। 1910 में पांडिचेरी के सवाना कपड़ा मिल के मजदूरों ने वेतन बढ़वाने के लिए हड़ताल की, लेकिन फ्रेंच पुलिस ने इसे बेरहमी से कुचल दिया। 17-18 साल तक ऐसा ही चला, लेकिन मजदूरों की हालत नहीं सुधरी। फिर आया साल 1928, 10वीं में पढ़ने वाले 17 साल के एक लड़के ने पांडिचेरी के कालवे कॉलेज में स्टूडेंट मूवमेंट खड़ा कर दिया। उसका नाम था- वरदराजुलु सुब्बैया उर्फ वी सुब्बैया। वे जवाहरलाल नेहरू, महात्मा गांधी और रूसी क्रांति की सोच से प्रेरित थे। आंदोलन 3 महीने चला। खत्म होने पर सुब्बैया को 6 महीने के लिए सस्पेंड किया गया। जैसे-तैसे उन्हें 10वीं की परीक्षा देने को मिली। फिर वे नौकरी के लिए मद्रास चले गए। जब 12 मौतों के बाद मजदूरों को हक मिला 1933 में वी सुब्बैया पांडिचेरी लौटे। उन्होंने महात्मा गांधी के 'हरिजन सेवक संघ' की एक शाखा पांडिचेरी में खोली। दलितों और मजदूरों को जोड़ा। साथ ही 'सुदंतीरम' नाम की मंथली मैगजीन निकाली। 14 फरवरी 1935 को सुब्बैया ने सवाना मिल में हड़ताल शुरू की। मांग रखी कि काम के 10 घंटे तय हों, बाल मजदूरी रुके, वेतन 6 आने हो और गर्भवती महिलाओं को वेतन के साथ छुट्टी मिले। 84 दिनों की हड़ताल के बाद मजदूरों की मांगें मानी गईं। सुब्बैया दलितों और मजदूरों में मशहूर हो गए। जुलाई 1936 में सुब्बैया ने पांडिचेरी की रोडिए, सवाना और एली मिल के मजदूरों के साथ आंदोलन शुरू किया। उनकी मांग थी कि मजदूरों को ट्रेड यूनियन बनाने का अधिकार मिले। 29 जुलाई को सुब्बैया के भाषण के दौरान फ्रेंच पुलिस ने गोलीबारी कर दी। 12 मजदूर मारे गए। गुस्साए मजदूरों ने सवाना मिल को आग लगा दी। दुनियाभर में इसकी चर्चा हुई। विरोध प्रदर्शन हुए। फ्रेंच पीएम लियों ब्लम से दखल की मांग गुई। फ्रेंच संसद में भी ये मुद्दा उठा। सरकार ने सुब्बैया को मिलने बुलाया। जवाहरलाल नेहरू की सलाह पर सुब्बैया पेरिस गए। फ्रेंच सरकार ने मांगें मानीं। मजदूरों को ट्रेड यूनियन का अधिकार मिला। पांडिचेरी एशिया की पहली जगह बनी, जहां काम के 8 घंटे तय हुए। ‘पप्पा गौबार्ड’ की बगावत से कमजोर हुए फ्रांसीसी वी सुब्बैया आजादी के लिए स्ट्रैटजी बना रहे थे, लेकिन 1938 में गिरफ्तार कर लिए गए। 1942 में रिहा होने के बाद उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ पांडिचेरी बनाई, लेकिन एक साल के लिए उन्हें पांडिचेरी से निकाल दिया गया। 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ। अब पांडिचेरी में भी आजादी का आंदोलन तेज हो गया। मांग थी कि पांडिचेरी का भारत में विलय हो, लेकिन फ्रांसीसी इसे छोड़ना नहीं चाहते थे। जनवरी 1950 में फ्रेंच पुलिस पांडिचेरी की सड़कों पर उतर गई। सुब्बैया के खिलाफ अरेस्ट वारंट जारी हो गया। कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया जाने लगा। सुब्बैया का घर जला दिया गया, जहां कम्युनिस्ट पार्टी का दफ्तर भी था। सुब्बैया अंडरग्राउंड होकर कई बार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की टॉप लीडरशिप से मिले। उन्हें मिली कि आंदोलन को गांव-गांव तक फैलाएं। 1952 में उन्होंने वापस आकर हथियारबंद दस्ते बनाए। आंदोलन को गांव-गांव फैलाया। इसी बीच एक और बड़ी घटना हुई। फ्रेंच नेशनल असेंबली में पांडिचेरी के प्रतिनिधि एडौर्ड गौबार्ट की फ्रांसीसी अधिकारियों से अनबन हो गई। नाराज पप्पा गौबार्ट ने बगावत कर दी। मार्च 1954 में गौबार्ट फ्रांस से पांडिचेरी आ गए। उन्होंने ‘समानांतर सरकार’ बना ली। वैचारिक मतभेद होने के बावजूद सुब्बैया ने इस सरकार को समर्थन दिया। यहां से पांडिचेरी पर फ्रांस की पकड़ ढीली पड़ने लगी। 7 अप्रैल 1954 को कम्युनिस्ट पार्टी ने 'डायरेक्ट एक्शन' का ऐलान कर दिया। कम्युनिस्टों ने तिरूबुवानी इलाके को आजाद करा लिया। पुलिस से हथियार छीने और थाने पर राष्ट्रीय झंडा फहरा दिया। धीरे-धीरे कई इलाके आजाद करा लिए। भारत की आजादी के 15 साल बाद स्वतंत्र हुआ पांडिचेरी भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू चाहते थे कि कूटनीति से मसला सुलझे, ताकि फ्रांस से रिश्ते खराब न हों। सो भारत, फ्रांस और पांडिचेरी के बीच कई बैठकें हुईं। आखिरकार 13 अक्टूबर 1954 को फ्रेंच पीएम पियरे मेंडेस फ्रांसे पांडिचेरी छोड़ने को तैयार हो गए। 18 अक्टूबर 1954 को पांडिचेरी के कीझूर में भारत के साथ विलय के लिए वोटिंग हुई। 178 स्थानीय प्रतिनिधियों में से 170 ने विलय के पक्ष में वोट दिया। 1 नवंबर 1954 को फ्रांस ने पांडिचेरी, यनम, माहे और कराईकल इलाकों का प्रशासनिक नियंत्रण भारत को दे दिया। पांडिचेरी को ‘डि फैक्टो’ आजादी मिल गई। यानी वास्तव या व्यवहार में आजाद हो गया, लेकिन फ्रांस ने अब भी कानूनी संप्रभुता नहीं छोड़ी थी। इस बीच फ्रांस में राजनीतिक अस्थिरता आ गई। जल्दी-जल्दी सरकारें बदलने लगीं। वहीं अल्जीरिया में आजादी की मांग होने लगी। युद्ध जैसे हालात बन गए। लेकिन अब भी कानूनी बात नहीं बनी। फिर फ्रांस की सत्ता पर काबिज हुए जनरल चार्ल्स डी गॉल। उन्हें लगा कि फ्रेंच कॉलोनियों को लंबे वक्त तक कंट्रोल में नहीं रखा जा सकता। इसके चलते मई 1956 में भारत-फ्रांस के बीच एक ट्रीटी हुई, जिसमें फ्रांस ने भारत को अपने कब्जे वाले इलाके सौंपने को लेकर हामी भरी। लेकिन इसे फ्रांसीसी संसद से मंजूरी मिलने में 6 साल लग गए। मई 1962 में फ्रांसीसी संसद ने इस पर मुहर लगाई। 16 अगस्त 1962 को फ्रांस ने ये दस्तावेज भारत को सौंपे। इसी दिन पांडिचेरी को ‘डि ज्यूर’ आजादी मिल गई। यानी कानूनन पांडिचेरी आजाद हो गया और भारत का हिस्सा बन गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने पांडिचेरी की जनता से वादा किया था कि कोई बाहरी उन पर शासन नहीं करेगा। इसीलिए पांडिचेरी को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिया गया और विधानसभा गठित की गई। गौबार्ट पांडिचेरी के पहले सीएम बने, जबकि सुब्बैया विपक्ष में बैठे। पीले फ्रेंच क्वार्टर, फ्रेंच लैंग्वेज, फ्रेंच फूड आज भी मौजूद जैसे हर साल 15 अगस्त को पूरे भारत में आजादी का जश्न मनाया जाता है, वैसे पांडिचेरी में भी होता है। हालांकि 16 अगस्त को डि ज्यूर ट्रांसफर डे और 1 नवंबर को लिबरेशन डे भी मनाया जाता है। अक्टूबर 2006 में पांडिचेरी का नाम ‘पुडुचेरी’ कर दिया गया। ये दो तमिल शब्दों से मिलकर बना है- 'पुदु' यानी नया और 'चेरी' यानी गांव। प्राचीन तमिल साहित्य में इस इलाके का नाम 'पुडुचेरी' ही था, लेकिन फ्रेंच अफसरों को बोलने में कठिनाई होती थी, तो उन्होंने इसे बिगाड़कर पांडिचेरी कर दिया। आज भी यहां फ्रेंच कॉलोनी की निशानियां मौजूद हैं। ‘वाइट टाउन’ में आज भी पीले दीवारों, ऊंची खिड़कियों और बोगनवेलिया के फूलों से लदी बालकनियों के साथ फ्रेंच क्वार्टर मौजूद हैं। गलियों के नाम आज भी 'रुई' से शुरू होते हैं, जैसे 'रुई ड्यूमास' या 'रुई रोमां रोलां'। फ्रेंच भाषा में सड़कों को रूई कहते हैं। पुडुचेरी के कैफे, रेस्टोरेंट, होटल में दक्षिण भारतीय इडली-डोसा के साथ फ्रेंच डिश क्रॉसों, बैगेट, क्रेप्स और रैटटौई वगैरह भी मिलते हैं। फ्रेंच वाइन आज भी यहां के लोगों की पसंद है। फ्रेंच कॉलोनी के दौर में यहां की पुलिस 'कैपी' नाम की मशहूर लाल टोपी पहनती थी। आज भी ये बरकरार है। तमिल भले ही यहां की प्राइमरी ऑफिशियल लैंग्वेज है, लेकिन अग्रेंजी और फ्रेंच को भी ये दर्जा मिला है। यहां रहने वाले लोग फ्रेंच, तमिल, हिंदी और अंग्रेजी बोल सकते हैं। पुडुचेरी में रचे-बसे फ्रेंच कल्चर के कारण लोग बोल-चाल में इसे ‘मिनी फ्रांस’ तक कहते हैं। केंद्र शासित प्रदेश और तीन राज्यों में फैले होने के कारण पुडुचेरी की राजनीति केंद्र सरकार के प्रभाव में और स्थानीय गठबंधनों के हिसाब से चलती है। यहां 30 विधानसभा सीट हैं, जिनके लिए वोटिंग होती है। जबकि 3 अन्य सीटों पर केंद्र सरकार के नॉमिनेटेड विधायक होते हैं। अभी यहां एन. रंगासामी की सरकार है। उनकी पार्टी AINRC का बीजेपी के साथ अलायंस है, यानी NDA में है। 10 सीट पर AINRC और 6 पर बीजेपी काबिज है। बीजेपी के पास 3 नॉमिनेटेड विधायक भी हैं, यानी बीजेपी के पास कुल 9 विधायक हैं। वहीं एमके स्टालिन की DMK के पास 6 और कांग्रेस के 2 सीटें हैं। 6 पर निर्दलीय विधायक हैं। कल, यानी 9 अप्रैल को पुडुचेरी में वोटिंग होनी है। NDA के खिलाफ कांग्रेस और एमके स्टालिन की DMK का गठजोड़ चुनावी मैदान में है। फिर भी वैसे तो संभावना है कि ‘AINRC-बीजेपी बनाम कांग्रेस-DMK’ के बीच ही मुकाबला होगा, लेकिन माना जा रहा है कि तमिल एक्टर विजय की पार्टी TVK की एंट्री से समीकरण बदल सकते हैं। ******* चुनाव से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए… 'शूद्र' महिलाओं से संबंध बनाते थे नंबूदरी ब्राह्मण: नस्ल सुधारने के नाम पर जन्मे बच्चों से दूर रहते, केरलम की राजनीति में कितना असर केरलम का त्रावणकोर इलाका। एक ब्राह्मण पुरुष तैयार होकर नायर बस्ती में जाता है। वहां एक घर के बाहर नहाता है। कपड़े बदलता है। खाना खाता है। फिर घर के बाहर चप्पल उतार कर अंदर जाता है, जहां एक महिला उसका इंतजार कर रही होती है। जब उसका पति लौटता है और उसे एक आदमी की चप्पल दिखती है, तो बिना कुछ कहे लौट जाता है। क्योंकि वो समझ जाता है कि उसकी पत्नी एक नंबुदरी ब्राह्मण पुरुष के साथ संबंधम में है। पूरी खबर पढ़िए…
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अमृतसर कमिश्नरेट पुलिस ने एक अंतरराष्ट्रीय ड्रग स्मगलिंग माड्यूल को ध्वस्त कर दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है। इनके पास से पुलिस ने 4.13 किलो हेरोइन बरामद की है। पुलिस के प्रारंभिक जांच में यह सामने आया है कि गिरफ्तार आरोपियों का सीधा संपर्क यूरोप स्थित हैंडलर्स और जेल में बंद अपराधियों से था। ये नेटवर्क पंजाब के माझा और दोआबा क्षेत्रों में ड्रग्स की आपूर्ति कर रहा था। अभी आरोपितों की पहचान नहीं बताई गई है। जानकारी के अनुसार गिरफ्तार दोनों आरोपी पहले भी एनडीपीएस और आर्म्स एक्ट के तहत आपराधिक गतिविधियों में शामिल रहे हैं। उनके खिलाफ कई केस दर्ज हैं। पुलिस ने इस मामले में एफआईआर थाना सुलतानविंड, अमृतसर में दर्ज कर ली है। आगे की जांच जारी है, ताकि पूरे नेटवर्क का खुलासा किया जा सके और अन्य शामिल सदस्यों को भी पकड़ने में सफलता मिल सके। पंजाब के डीजीपी गौरव यादव ने जानकारी देते हुए बताया कि राज्य पुलिस ड्रग्स के खिलाफ लगातार कड़े कदम उठा रही है। उन्होंने कहा कि पंजाब पुलिस प्रतिबद्ध है कि राज्य को ड्रग मुक्त और सुरक्षित बनाने के लिए किसी भी स्तर पर कार्रवाई जारी रखेगी। उन्होंने आगे कहा कि ऐसे अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क्स को पकड़ने और उन्हें जड़ से खत्म करने के लिए पुलिस लगातार नई तकनीकों और खुफिया सूचनाओं का इस्तेमाल कर रही है। पुलिस ने जनता से अपील की है कि वे किसी भी संदिग्ध गतिविधि की जानकारी तुरंत नजदीकी पुलिस थाना को दें।
अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध की आग में मारवाड़ की विश्व प्रसिद्ध मेहंदी उद्योग भी झुलस रहा है। राजस्थान के सोजत (पाली) में 150 से ज्यादा फैक्ट्रियों में मशीनों के पहिए थम गए हैं। 2200 से ज्यादा मजदूरों को घर भेजा जा चुका है।सोजत के निर्यातकों का करीब 250 करोड़ रुपए का माल पोर्ट और गोदामों में फंसा हुआ है। 4 से 5 हजार रुपए सालाना टर्नओवर वाले इस कारोबार पर ब्रेक लग गया है। प्रोडक्शन 80% गिरा, फैक्ट्रियां बंद होने की कगार परव्यापारियों के अनुसार, पिछले एक महीने से एक्सपोर्ट पूरी तरह ठप है। सोजत में करीब 35 ऐसी बड़ी फैक्ट्रियां हैं, जो खास तौर पर मिडिल ईस्ट के लिए नेचुरल मेहंदी और हेयर डाई बनाती हैं। मांग न होने के कारण उत्पादन 20% तक सिमट गया है। व्यापारी नितेश अग्रवाल का कहना है कि कोरोना काल के बाद पहली बार ऐसे हालात बने हैं। पलायन बनी मजबूरीमेहंदी व्यापारी अनिल हिरानी ने बताया कि काम बंद होने के कारण अब तक करीब 2200 मजदूरों को घर भेजा जा चुका है। इनमें से 80% श्रमिक यूपी, बिहार और कोटपूतली (राजस्थान) के हैं। काम न मिलने के कारण श्रमिक पलायन को मजबूर हैं, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था और मंडी सप्लायर्स पर भी बुरा असर पड़ा है। माल भाड़ा हुआ डबल, पेमेंट भी फंसानिर्यातक विनोद लोढ़ा के अनुसार, मुंबई पोर्ट और दिल्ली एयर कार्गो में करीब 150 करोड़ का माल अटका हुआ है। युद्ध के कारण खाड़ी देशों की ओर जाने वाले जहाजों का जोखिम बढ़ गया है, जिससे शिपिंग कंपनियों ने माल भाड़ा दोगुना कर दिया है। पुराने भेजे गए माल का पेमेंट भी समय पर नहीं मिल पा रहा है। रमजान के बाद आए ऑर्डर ठप, 100 करोड़ का माल गोदामों में कैदसोजत के मैन्युफैक्चरर और एक्सपोर्टर विनोद लोढ़ा ने बताया- रमजान से पहले के ऑर्डर तो समय पर चले गए थे, लेकिन उसके बाद आए सभी ऑर्डर युद्ध के कारण रुक गए हैं। वर्तमान में करीब 100 करोड़ रुपए की मेहंदी अकेले सोजत के गोदामों में तैयार पड़ी है, जिसे दुबई भेजा जाना था। लेकिन न तो नए ऑर्डर मिल रहे हैं और न ही पुराने ऑर्डर्स की डिस्पैचिंग हो पा रही है। गुजरात से आने वाला कच्चा माल हुआ महंगामेहंदी व्यापारी सुरेन हिरानी ने बताया कि मेहंदी के कोन और पाउडर बनाने के लिए जरूरी रॉ-मटेरियल मुख्य रूप से गुजरात से आता है। युद्ध के कारण सप्लाई चेन प्रभावित होने से वहां के सप्लायर्स ने रेट बढ़ा दिए हैं। 10 ग्राम से लेकर 1 किलो तक की पैकिंग में इस्तेमाल होने वाला मटेरियल, जो पहले 250 रुपए किलो मिलता था, वह अब 350 रुपए तक पहुंच गया है। एक्सपोट्र्स बोले- न दाम बढ़ा सकते, न माल बेच सकते हैंएक्सपोट्र्स की सबसे बड़ी दुविधा यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में मंदी और डिमांड की कमी के चलते वे अपनी फिनिश्ड गुड्स (तैयार माल) की कॉस्ट नहीं बढ़ा पा रहे हैं। लागत में 40% तक की बढ़ोतरी होने के बावजूद पुरानी रेट पर भी खरीदार नहीं मिल रहे हैं। घरेलू बाजार में भी माल भेजना अब महंगा हो गया है, क्योंकि ट्रांसपोर्टेशन की लागत बढ़ चुकी है। 130 देशों का 'ग्लोबल मार्केट' अब अधर मेंसोजत की मेहंदी का रसूख इतना बड़ा है कि यह केवल भारत या खाड़ी देशों तक सीमित नहीं है। यह फ्रांस, पेरिस, आयरलैंड, रूस और ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों तक अपनी पहुंच बना चुकी है। व्यापारियों के अनुसार, सोजत से निकलने वाली प्रीमियम मेहंदी और नेचुरल हेयर डाई की मांग यूरोपीय देशों में साल भर रहती है, लेकिन मौजूदा युद्ध ने शिपिंग रूट्स को इतना असुरक्षित बना दिया है कि 130 देशों का यह विशाल नेटवर्क ठप होने की कगार पर है।जो मेहंदी स्पेन, यूनान और माल्टा जैसे देशों के बाजारों की शोभा बढ़ाती थी, वह अब ट्रांसपोर्टेशन और लॉजिस्टिक्स की समस्याओं के कारण सोजत के गोदामों से बाहर नहीं निकल पा रही है। क्वालिटी का डर- 1 महीने में खराब हो जाता है मेहंदी कोनव्यापारियों की सबसे बड़ी चिंता क्वालिटी को लेकर है। मेहंदी कोन की लाइफ महज एक महीना होती है, जिसके बाद वह खराब होने लगता है। हेयर डाई की क्वालिटी भी 6 महीने बाद गिरने लगती है। अगर युद्ध लंबा चला, तो व्यापारियों को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। 4 से 5 हजार रुपए का सालाना टर्नओवरसोजत का मेहंदी कारोबार का सालाना टर्नओवर 4 से 5 हजार रुपए सालाना है। व्यापारियों ने दावा किया- यदि युद्ध आज भी रुक जाए, तो स्थिति को सामान्य होने में कम से कम 4 से 6 महीने का समय लगेगा। व्यापारी बोले- समझ नहीं आ रहा उद्योग कैसे बचाएंमेहंदी व्यापारी सुरेन हिरानी कहते हैं- सोजत की मेहंदी का सीधा कनेक्शन मिडिल ईस्ट से है। वहां युद्ध शुरू होते ही हमारी सप्लाई लाइन कट गई। अब गुजरात से आने वाला कच्चा माल महंगा हो गया और ट्रांसपोर्ट के दाम बढ़ गए। समझ नहीं आ रहा कि उद्योग को कैसे बचाएं। 80% श्रमिक बाहरी राज्यों के, रोजी-रोटी का संकटसोजत के मेहंदी उद्योग में उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान के कोटपूतली (राजस्थान) क्षेत्र से बड़ी संख्या में श्रमिक आते हैं। कुल निकाले गए मजदूरों में 80 फीसदी प्रवासी हैं, जबकि 20 फीसदी स्थानीय लोग हैं। इन मजदूरों के लिए मेहंदी सीजन ही साल भर की कमाई का मुख्य जरिया होता है, लेकिन युद्ध ने उनके इस भरोसे को तोड़ दिया है। केवल मजदूर नहीं, पूरी 'सप्लाई चेन' प्रभावित काम बंद होने का असर केवल फैक्ट्री के भीतर तक सीमित नहीं है। इसका 'चेन रिएक्शन' पूरे सिस्टम पर दिख रहा है। किसान: मेहंदी की फसल बेचने वाले किसानों को खरीदार नहीं मिल रहे। मंडी: सोजत मंडी में व्यापारिक गतिविधियां सुस्त पड़ गई हैं। सप्लायर: पैकेजिंग, ट्रांसपोर्ट और कच्चा माल सप्लाई करने वालों का काम भी रुक गया है। खाड़ी देशों की पहली पसंद है 'सोजत मेहंदी'सोजत की मेहंदी अपनी ए-ग्रेड क्वालिटी के लिए जानी जाती है। यहां मेहंदी में केमिकल के बजाय लौंग, नीलगिरी और टी-3 नेचुरल ऑयल का इस्तेमाल होता है। यही वजह है कि इसकी डिमांड मिडिल ईस्ट के अलावा दुनिया के 130 देशों में है। लेकिन वर्तमान युद्ध की स्थिति ने इस चमक को फिलहाल धुंधला कर दिया है। लातविया से लेकर पुर्तगाल तक... हर जगह सोजत का डंकासोजत की मेहंदी की गुणवत्ता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यह एस्टोनिया, लिथुआनिया, बुल्गारिया, स्लोवाकिया, और क्रोएशिया जैसे देशों में भी निर्यात की जाती है। यूरोप का बाजार- यहां नेचुरल कॉस्मेटिक्स की भारी डिमांड है, जिसे सोजत पूरा करता है। एशियाई बाजार- नेपाल और मलेशिया जैसे देशों में सोजत की मेहंदी एक अनिवार्य ब्रांड बन चुकी है। पेरिस के फैशन से रूस के बाजार तकसोजत की मेहंदी की सबसे बड़ी खूबी इसका 'केमिकल फ्री' होना है। इसी कारण पेरिस (फ्रांस) जैसे फैशन हब और रूस व बेलारूस जैसे ठंडे देशों में भी इसे स्किन-फ्रेंडली हेयर डाई के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। फिलहाल इन सभी देशों से आने वाले नए ऑर्डर्स पर युद्ध की अनिश्चितता के कारण 'ब्रेक' लग गया है। 38 हजार हेक्टेयर में फैला है ‘मेहंदी का साम्राज्य’पाली जिले का सोजत और उसके पड़ोसी क्षेत्र रायपुर व जैतारण मिलकर दुनिया का सबसे बड़ा मेहंदी उत्पादक हब बनाते हैं। कुल 38 हजार हेक्टेयर भूमि पर होने वाली यह खेती यहां की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। यहां की मिट्टी और जलवायु मेहंदी के लिए इतनी अनुकूल है कि यहां पैदा होने वाली मेहंदी में लॉसोने (रंग देने वाला तत्व) की मात्रा दुनिया में सर्वाधिक पाई जाती है। प्रति हेक्टेयर 15 क्विंटल का उत्पादन, पर बाजार में सन्नाटा इस क्षेत्र में औसतन 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर मेहंदी का उत्पादन होता है। इस साल भी पैदावार बंपर होने की उम्मीद है, लेकिन युद्ध के कारण सोजत की मंडी और फैक्ट्रियों में रौनक गायब है। बंपर स्टॉक: खेतों से मंडी तक माल पहुंच रहा है, लेकिन निर्यात रुकने से स्टॉक जमा होता जा रहा है। भाव का डर: मांग कम होने से किसानों को डर है कि उन्हें अपनी फसल का वाजिब दाम नहीं मिल पाएगा। क्यों खास है सोजत की मेहंदी?सोजत की मेहंदी को इसकी शुद्धता और गहरे रंग के लिए GI टैग (Geographical Indication) भी मिल चुका है। यहां की मेहंदी में किसी भी प्रकार के हानिकारक केमिकल के बजाय प्राकृतिक तेलों का उपयोग किया जाता है, जो इसे अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा उतारता है। ------ अमेरिका-ईरान युद्ध के साइड इफेक्ट की यह खबर भी पढ़िए… राजस्थान में सैकड़ों फैक्ट्रियां बंद, हजारों लोग बेरोजगार, डिमांड लगातार कम हो रही, घाटा करोड़ों में अमेरिका-इजराइल और ईरान युद्ध के कारण राजस्थान का मिनरल उद्योग प्रभावित हुआ है। गुजरात के मोरबी की सिरेमिक इंडस्ट्रीज में डिमांड घटने से करीब 2300 से ज्यादा मिनरल्स-ग्राइंडिंग यूनिट्स बंद हो गई हैं। पढ़ें पूरी खबर...
पंजाब के संगरूर जिले में विदेश भेजने के नाम पर ठगी का एक मामला सामने आया है। इस मामले में एक आवेदक से 2,49,990 रुपये की धोखाधड़ी की गई है। पुलिस ने इस संबंध में तीन आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज किया है और मामले की जांच शुरू कर दी है। कुलार खुर्द निवासी जसकरनदीप सिंह ने शिकायत दर्ज कराई है कि मनप्रीत सिंह, उसकी पत्नी रिया (निवासी खानपुर फकीरा) और उनके पार्टनर गगन सिंह (इंस्टीट्यूट आइरिस, चंडीगढ़) ने उसे यूरोप के स्लोवाकिया भेजने का झांसा दिया था। आरोपियों ने वीजा और अन्य प्रक्रियाओं के नाम पर उससे कुल 2,49,990 रुपये ले लिए। न विदेश भेजा, न पैसे लौटाए शिकायतकर्ता के अनुसार, आरोपियों ने न तो उसे विदेश भेजा और न ही उसकी राशि वापस की। एसएसपी संगरूर के आदेश पर मामले की जांच की गई। जांच के बाद पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ धोखाधड़ी के आरोप में केस दर्ज कर लिया है। पुलिस फिलहाल मामले की आगे जांच कर रही है और आरोपियों की गिरफ्तारी के प्रयास जारी हैं।
ट्रम्प के चंगुल से ग्रीनलैंड को बचाने के लिए कितनी दूर जा सकता है यूरोपीय यूनियन?
ग्रीनलैंड के भविष्य पर चर्चा के लिए वॉशिंगटन वार्ता बुधवार को विफल हो गई, जिसमें डेनमार्क और ग्रीनलैंड के विदेश मंत्री व्हाइट हाउस से यह संदेश लेकर घर लौटे कि ग्रीनलैंड सही मायने में अमेरिका का है और ट्रम्प इसके अधिग्रहण के समय पर फैसला करेंगे
उभरती वैश्विक भूराजनीति में यूरोप कहां है?
अमीर यूरोपीय देशों, खासकर जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन की तिकड़ी के लिए, साल 2026 में जो भूराजनीतिक स्थिति बन रही है, उसमें अस्तित्व के संकट के काफी तत्व हैं
फ्रांस के मशहूर अभिनेता एलेन डेलन का निधन, 88 वर्ष की उम्र में ली अंतिम सांस
Alain Delon passes away: 'द लेपर्ड' और 'रोक्को एंड हिज ब्रदर्स' जैसी सुपर हिट फिल्मों में अभिनय का जौहर दिखाने वाले फ्रांस के मशहूर अभिनेता एलेन डेलन का निधन हो गया है। एलेन डेलन ने 88 वर्ष की उम्र में आखिरी सांस ली। अभिनेता के पारिवारिक सूत्रों ने ...
इटली से फ्रांस तक समंदर के बीच होगा Anant-Radhika का दूसराप्री वेडिंग फंक्शन, जानिए मेहमानों से लेकरड्रेस कोड तक सबकुछ
Heeramandi के बाद अब Cannes में अपनी 'गजगामिनी चाल' दिखाएंगी Aditi Rao Haidari,फ्रांस के लिए रवाना हुईबिब्बोजान
यूरोप से लेकर Sri Lanka तक इन देशो में शूट हुई है Surya और Bobby Deol की फिल्म Kanguva, बजट उड़ा देगा होश

