परीक्षा के सवाल, परीक्षा पर सवाल
देश में परीक्षाएँ अब केवल विद्यार्थियों की नहीं रहीं, बल्कि स्वयं परीक्षाओं की भी परीक्षा होने लगी है।
इस्लामाबाद : एक अलग तरह की राजधानी
पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के बारे में बड़ा मज़ा लेकर पाकिस्तानी कहता है इस्लामाबाद में न तो इस्लाम है और न आबादी! मगर हम उसे इस्लामाबाद कहते हैं।
पर्यावरण क्षरण और इंसानी लालच पर केंद्रित बसंत राघव की लघुकथाएं
मेरे गाँव के बाहर कच्ची सड़क के किनारे एक विशाल नीम का वृक्ष निस्पृह-निरपेक्ष भाव से झूमता हुआ खड़ा था।
फायदेमंद ही नहीं, हर उम्र के लिए मजेदार भी है योगासन, आयुष मंत्रालय ने बताया कैसे
योग दिवस को अब कुछ ही दिन शेष रह गए हैं। इस बीच भारत सरकार का आयुष मंत्रालय रोजाना नए योगासनों के बारे में जानकारी देते हुए इसे दिनचर्या में शामिल करने की सलाह दे रहा है
तृणमूल कांग्रेस में टूट और ममता की बढ़ती चिन्ताएं
पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), जिसने पिछले डेढ़ दशक से बंगाल की राजनीति पर लगभग एकाधिकार स्थापित कर रखा था, आज आंतरिक असंतोष, नेतृत्व संबंधी प्रश्नों और जनविश्वास के संकट से जूझती दिखाई दे रही है। पार्टी के भीतर असंतुष्ट नेताओं और विधायकों ... Read more
एसआईआर को हरी झंडी और बाहर हुए लोगों की मुश्किलें
एक गहरे स्तर पर एसआईआर प्रक्रिया की यह अव्यवस्था भारतीय लोकतंत्र के कामकाज में मौजूद एक बड़ी समस्या की ओर भी इशारा करती है।
उत्तराखंड के जड़धार में जंगल बचाने, पानी-मिट्टी का संरक्षण, परम्परागत खेती और देशी बीज बचाने का अनूठा काम हुआ है और आज भी जारी है।
इतना गर्म कैसे हो गया यूपी का बांदा जिला?
उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड इलाका यूं तो गर्मी और सूखे की खबरों को लेकर अक्सर चर्चा में रहता है लेकिन इसी इलाके का एक जिला बांदा, पिछले कुछ साल से देश के सबसे गर्म जिलों में शामिल होने का रिकॉर्ड बनाता जा रहा है
बीजेपी ने पटना के विकास के दावे से AI एडिटेड वीडियो शेयर किया
बूम ने वीडियो बनाने वाले कंटेट क्रिएटर से संपर्क किया जिन्होंने बताया कि उन्होंने पटना के असली विजुअल में एआई की मदद से लाइटिंग बढ़ाकर दिखाया है.
फैक्ट चेक: बांग्लादेश में मुस्लिम कट्टरपंथी ने काटे हिंदू महिला के बाल? जानें सच्चाई
बूम ने पाया वीडियो के साथ किया गया सांप्रदायिक दावा गलत है. घटना 2 मार्च 2026 की है, जहां बांग्लादेश के रूपगंज में चोरी के आरोप में तीन मुस्लिम महिलाओं के बाल काट दिए गए थे.
यूएन सुरक्षा परिषद की सीट नहीं मिलने से जर्मनी को झटका लगा
संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में अस्थायी सीट पाने की जर्मनी की कोशिशों को झटका लगा है. बुधवार को हुई वोटिंग में ऑस्ट्रिया और पुर्तगाल को जीत मिली.
जर्मनी ने 20 साल में अपने एक तिहाई पेटेंट गंवाए, किसने जीते?
चीन की कंपनियों ने बीते सालों में बड़ी तेजी से जर्मनी के अंतरराष्ट्रीय पेटेंट पर कब्जा जमाया है. हालांकि जर्मनी के पेटेंट हथियाने वाले देशों में सबसे आगे है अमेरिका
तालिबान और रूस के बीच क्यों बढ़ रही नजदीकियां?
रूस और तालिबान ने सोवियत जमाने के रूस में बने हथियारों की मरम्मत के लिए एक समझौता किया है
5 जून को एनसीआर में फिर येलो अलर्ट : आंधी-तूफान और बारिश के आसार; 6 जून से मौसम रहेगा सुहावना
भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) के लिए एक बार फिर 5 जून को येलो अलर्ट जारी किया है
जब परीक्षा व्यवस्था स्वयं परीक्षा में असफल होने लगे ?
रात के दो बजे हैं। देश के किसी छोटे शहर में एक विद्यार्थी अभी भी जाग रहा है। मेज पर खुली हुई पुस्तकें हैं,दीवार पर समय-सारिणी चिपकी है और मोबाइल फोन महीनों से लगभग निष्क्रिय पड़ा है। घर के बाकी सदस्य सो चुके हैं,पर उसकी आँखों में नींद नहीं,भविष्य है। वह अकेला नहीं है। भारत ... Read more
देश के प्रधानमंत्री के नाम खुला पत्र
माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी, नमस्कार। मैं कोसीनोक जैन, अजमेर का निवासी, आपसे एक गंभीर विषय पर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। जानकारी के अनुसार, देश की संसद में वर्ष 2003 से कोल्ड ड्रिंक्स की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया गया था। इसका उद्देश्य सांसदों और मंत्रियों के स्वास्थ्य की सुरक्षा तथा इन पेयों में ... Read more
'भाषाविज्ञान के विद्यार्थियों को पढ़ाया जाता है कि जो वैदिक संस्कृत थी आगे चलकर उसका स्थान लौकिक संस्कृत ने ले लिया,
'विश्व पर्यावरण दिवस' पर विशेष जैव-विविधता के मार्फत बचाया जा सकता है पर्यावरण!
अनियंत्रित मानवीय हस्तक्षेप और कृत्रिम जलवायु परिवर्तन-जैव-विविधता के संकट को बढ़ाने में इंसान का सीधा हस्तक्षेप सबसे ज्यादा जिम्मेदार है।
पद्म विभूषण, धर्मेंद्र और कानून-सम्मान के मंच पर परंपरा बनाम वैधता का प्रश्न
धर्मेंद्र का जीवन और योगदान निर्विवाद रूप से असाधारण रहा है। हिंदी सिनेमा में उनका छह दशकों का सफर एक युग की तरह देखा जाता है।
केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचना करते सेना प्रमुख का यह वीडियो डीपफेक है
बूम ने पाया कि भारतीय सेना प्रमुख उपेंद्र द्विवेदी मूल वीडियो में देश की सैन्य तैयारियों पर बात कर रहे हैं.
नशा: राष्ट्र की जड़ों को खोखला करने वाली चुनौती
भारत आज विश्व की सबसे युवा आबादी वाले देशों में अग्रणी है। देश की लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु की है। यह युवा शक्ति भारत की सबसे बड़ी सामर्थ्य, सबसे बड़ी पूंजी और उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला है। विज्ञान, तकनीक, उद्योग, शिक्षा, खेल और नवाचार के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियों ... Read more
देशभर में मौसम का मिजाज बदलने वाला है। पहाड़ी राज्यों में बर्फबारी और भारी बारिश की संभावना है, जबकि दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान समेत कई राज्यों में आंधी-बारिश का अलर्ट जारी किया गया है। मानसून केरल में दस्तक देने की तैयारी में है।
ललित सुरजन की कलम से इस चेतावनी को सुनें
'यह व्यापार ही तो है जिसके चलते दुनिया के भूगोल में कई बार परिवर्तन हुए हैं और राजनीतिक इतिहास में नए-नए मोड़ आए हैं। अमेरिका ने लैटिन अमेरिकी देशों को हमेशा अपने अंगूठे के नीचे रखना चाहा, जिसका सफल प्रतिकार सबसे पहले फिदेल कास्त्रो के क्यूबा ने किया। कास्त्रो की राह पर ही वेनेजुएला के ह्यूगो शावेज, ब्राजील के जेवियर लूला, बोलेविया के इवो मोरालेस आदि चले, अर्जेन्टीना के नेस्टर किर्चनर ने भी काफी हद तक उसी रास्ते को अपनाया। यह सब अमेरिका को पसंद नहीं आया, परिणाम सामने है। ब्राजील में राष्ट्रपति दिलमा रूसेफ को संसद में महाभियोग लाकर हटाकर एक कार्पोरेट मुखिया को राष्ट्रपति बना दिया गया। वेनेजुएला में राष्ट्रपति निकोलस मदुरो को हटाने की कोशिशें हो रही हैं। अर्जेन्टीना में पूर्व राष्ट्रपति क्रिस्टीना किर्चनर के ऊपर मुकदमे की तैयारी चल रही है। इधर रूस और चीन की निकटता बढ़ी है। पाकिस्तान के साथ भी रूस ने संबंध बढ़ाए हैं। चीन ने भारत को ''वन बेल्ट वन रोड' परियोजना में भागीदार बनने के लिए आमंत्रित किया है। भारत अभी तय नहीं कर पा रहा है कि वह समयसिद्ध मित्र रूस के साथ कहां तक संबंध निभाए, पाकिस्तान के प्रति उसकी नीति क्या हो और चीन से रिश्तों की शक्ल क्या बने।' (अक्षर पर्व फरवरी 2017 अंक की प्रस्तावना) https://lalitsurjan.blogspot.com/2017/02/blog-post_8.html
कौड़ियों में उलझा भाषायी चरित्र
आज गांधी के अहिंसा के दर्शन पर बात करने की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि पिछले कई सालों से हिंसा को सामान्य भाव की तरह लिया जाने लगा है।
क्या रहने लायक बचे हैं, हमारे शहर?
क्लाइमेट स्मार्ट शहरों का निर्माण-अगर हमें अपने शहरों को भविष्य में रहने योग्य बनाए रखना है, तो पारंपरिक निर्माण और शहरी नियोजन के ढर्रे को पूरी तरह से 'ब्लू-ग्रीन इन्फ्रास्ट्रक्चर' में बदलना होगा।
वेब टेलीस्कोप ने कैद किया इंटरस्टेलर कॉमेट 3आई-एटलस का केमिकल फिंगरप्रिंट
यूरोपीय स्पेस एजेंसी (ईएसए) ने एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक खोज की जानकारी साझा करते हुए बताया है कि जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप ने पहली बार किसी इंटरस्टेलर यानी दूसरे स्टार सिस्टम से आए खगोलीय पिंड का विस्तृत केमिकल फिंगरप्रिंट रिकॉर्ड किया है।
स्वस्थ जीवन एवं स्वस्थ पर्यावरण का आधार है साइकिल
विश्व साइकिल दिवस, 3 जून 2026 पर विशेषः हर वर्ष 3 जून को मनाया जाने वाला विश्व साइकिल दिवस केवल एक साधारण वाहन के सम्मान का अवसर नहीं है, बल्कि यह मानव स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समानता और सतत विकास के प्रति वैश्विक प्रतिबद्धता का प्रतीक है। आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, बढ़ती ... Read more
ललित सुरजन की कलम से भारत और पड़ोसी देश
'बंगलादेश के साथ हमारे संबंध स्वाभाविक रूप से मधुर होना चाहिए।
'विश्व साइकिल दिवस' जीवन के लिए जरूरी साइकिल का साथ
साइकिल केवल परिवहन का साधन नहीं, बल्कि एक समय सामाजिक समानता और सादगी का प्रतीक भी रही है।
अमेरिका के सामने भारत इतना दब्बू पहले कभी नहीं रहा
आम तौर पर किसी देश का विदेश मंत्री भारत के दौरे पर आता है या भारत के विदेश मंत्री किसी देश के दौरे पर जाते हैं तो उनकी बात अपने समकक्ष से होती है।
दिल्ली-यूपी समेत उत्तर भारत में फिर बदलेगा मौसम, तीन दिन आंधी-बारिश और ओलों की चेतावनी
दिल्ली-एनसीआर, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब और हरियाणा में अगले तीन दिनों तक आंधी, बारिश और ओलावृष्टि की संभावना। मौसम विभाग ने तेज हवाओं और तापमान में गिरावट का अलर्ट जारी किया।
क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता कोरा बुलबुला है या वास्तविक चुनौती?
मानव सभ्यता के इतिहास में कुछ ऐसी क्रांतियां हुई हैं जिन्होंने जीवन की दिशा और दशा दोनों को बदल दिया। कृषि क्रांति ने मनुष्य को स्थायित्व दिया, औद्योगिक क्रांति ने उत्पादन और श्रम की परिभाषा बदली, सूचना क्रांति ने ज्ञान और संचार की सीमाएं समाप्त कर दीं। अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई की क्रांति मानव ... Read more
देश-प्रदेश की सवैधानिक सामाजिक महत्वपूर्ण कड़ी अधिवक्ता समुदाय है
राजनीतिक आर्थिक सामाजिक रूप से अधिवक्ताओं की देश के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका भी रहती रही है। पिछले कुछ वर्षों से कांग्रेस संगठन में कांग्रेस समर्थित अधिवक्ताओं से कांग्रेस के आला कमान की दूरी देखने को मिली है, जबकि समाज से जन समुदाय से सीधा संपर्क रखने वाला सबसे बड़ा समुदाय अधिवक्ता परिवार है, भाजपा ... Read more
परीक्षाओं में गड़बड़ियां मोदी सरकार के आर्थिक प्रगति के दावों पर एक दुखद टिप्पणी
भारत को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का वादा, मोदी सरकार के राजनीतिक संदेशों का एक सबसे लगातार दोहराया जाने वाला विषय बन गया है।
विपक्ष के मैदान में बने होने और एकजुट होने के संदेश की, विधानसभा चुनावों के हाल के चक्र के बाद जरूरत और भी बढ़ गयी है।
बीते दिनों कुछ ऐसी खबरें देखने और सुनने मिली हैं, जिनसे पर्यटन पर नयी बहस शुरु होने की गुंजाइश बनी है। पर्यटन की भारत में प्राचीन परंपरा रही है।
गाजियाबाद के सूर्या हत्याकांड के आरोपियों से जोड़कर मध्य प्रदेश का वीडियो वायरल
बूम ने पाया कि वीडियो मध्य प्रदेश के मंदसौर का है, जहां एक युवक की हत्या के मामले में गिरफ्तार आरोपी घटनास्थल पर ले जाने के दौरान लंगड़ाते हुए नजर आए थे.
गाजियाबाद के सूर्या हत्याकांड के आरोपी असद का नहीं है यह वीडियो, जानें सच
बूम ने पाया कि वायरल वीडियो में आरोपी असद नहीं है. वीडियो में नजर आ रहा युवक करण है, जो अप्रैल 2026 में दिल्ली के शालीमार बाग में हुई एक हत्या के मामले में आरोपी है.
संविधान के आलोक में विश्वास की पूंजी से हों कानूनी बदलाव
सत्ता की ताकत का बेजा इस्तेमाल करने की जगह लोक कल्याण और जन परंपराओं को पुष्ट करने में लगाना होगा। तभी लोकतंत्र मजबूत होगा।
सरकार हिन्दू-मुसलमान से बनती है बच्चों की पढ़ाई लिखाई से क्या मतलब!
शिक्षा की नींव ही गलत रखी। गांव-गांव स्कूल खुलवाने से लेकर उच्च शिक्षा तक एक मजबूत ढांचा बनवा कर बेवजह समस्याएं बढ़वाईं।
माता-पिता हैं वर्तमान की शक्ति और भविष्य की प्रेरणा
विश्व माता-पिता दिवस- 1 जून, 2026 विश्व के अधिकतर देशों की संस्कृति में माता-पिता का रिश्ता सबसे बड़ा एवं प्रगाढ़ माना गया है। भारत में तो इन्हें ईश्वर का रूप माना गया है। माता-पिता को उनके बच्चों के लिए किए गए उनके काम, बच्चों के प्रति उनकी निस्वार्थ प्रतिबद्धता और इस रिश्ते को पोषित करने ... Read more
त्रिभाषा फार्मूला है भारत की शिक्षा का नया क्षितिज
भारत केवल एक राष्ट्र नहीं, बल्कि भाषाओं, बोलियों, संस्कृतियों और परंपराओं का विराट संगम है। यहां भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि पहचान, संस्कृति, संवेदना और सामाजिक चेतना का आधार भी है। ऐसे बहुभाषी देश में शिक्षा व्यवस्था को किस भाषा में संचालित किया जाए और बच्चों को कौन-कौन सी भाषाएं पढ़ाई जाएं, यह ... Read more
अभी कई सारे गीत उन पर लिखे जाने की प्रतीक्षा में हैं
स्वरांगी साने किताब - गीत फ़िल्मी है लेकिन... लेखक - डॉ. सुनील देवधर मूल्य - 450 रुपए प्रथम संस्करण - सन् 2025 प्रकाशक - भावना प्रकाशन, दिल्ली। पृष्ठ - 263 समीक्षक - स्वरांगी साने पुणे डा.सुनील देवधर आकाशवाणी से सहायक निदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। वे उस दौर के साक्षी रहे हैं, जिसे आकाशवाणी का स्वर्ण युग कह सकते हैं। आकाशवाणी पर काम करने से विविध भारती पर बजते गीत सालों-साल कई घंटों तक उनके कानों में रस घोलते रहे होंगे। कहने को तो उस दौर में पनवारी और धोबी-परचून की दुकानों पर भी दिेन भर रेडियो बजता था लेकिन रेडियो के बजने और रेडियो सुनने में अंतर है। जब किसी संवेदनशील व्यक्ति का गंभीर मन उसे सुनता है और वह रचनात्मक लेखन भी करता हो तो वे गीत उसकी लेखनी में उतर आते हैं। संयोग ही रहा कि जब वे पहले-पहल कागज़ों पर उतरने लगे तो मैं एक अख़बार में नियमित कार्यरत थी और उनकी गीतों की उस श्रृंखला को हमने स्तंभ के रूप में प्रकाशित किया। तब उन गीतों से गुज़रते हुए कई बार मन अवाक् रह गया कि इस गीत के बारे में ऐसा तो कभी सोचा ही नहीं था। उस स्तंभ ने आगे चलकर 51 गीतों की किताब का रूप लिया, जिसे स्तंभ की तरह ही काफी पसंद किया गया। उसका नाम भी वही था, जो उस स्तंभ का था 'बड़े अनमोल गीतों के बोल'। इसके बाद गीतों पर आधारित उनकी यह दूसरी किताब है 'गीत फ़िल्मी हैं, लेकिन...'। पहली किताब पढ़ी तब पाठक से पहले एक अख़बारी संपादक के तौर पर उसमें छपे गीतों की 'बिटवीन द लाइंस' से गुज़र चुकी थी। दूसरी किताब पढ़ते हुए संपादक का चश्मा आँखों पर नहीं था और बिना उस चश्मे के किताब पढ़ना अधिक आनंददायक रहा। रस ग्रहण करते हुए अध्ययन अपने आप हो गया क्योंकि हर गीत को लेखक ने नए सिरे से तराशकर एक नगीने के रूप में सामने रखा है। इस किताब में भी लगभग उतने ही गीत है। इंस्टाग्राम पर बनने वाली रील्स और यू ट्यूब के शॉर्ट्स के इस दौर में आप इन गीतों को तसल्ली से पढ़िए, हफ्ते में एक गीत, इस विलंबित गति तक से उन गीतों का आनंद लेते चलिए, देखिए आप एक साल में अनुभवों से कितने अधिक समृद्ध हो जाएँगे। किताब में हर फ़िल्म का उस ज़माने का पोस्टर दिया गया है, उसके बाद वह पूरा गीत है और उसके बाद उसे पंक्ति दर पंक्ति खोला गया है। इन गीतों पर लिखते हुए दुनियाभर के लेखकों, कवियों, शायरों से लेकर वेद-पुराण और ऐतिहासिक संदर्भ भी दिए गए हैं। गीतों को भारतीय दर्शन से जोड़ा गया है। भारतीय दर्शन के साथ उर्दू साहित्य के संदर्भ में इन गीतों के विश्लेषण में मिलते हैं। डॉ. देवधर का भाषा सामर्थ्य और ज्ञान उनके द्वारा किए गए हर गीत के विश्लेषण में दिखता है। इसे महज़ विश्लेषण न कहकर मीमांसा कहना अधिक सही होगा। इस किताब का हर गीत गहरे अर्थों को समेटने वाला है। पहला गीत 'मेला' फ़िल्म का 'ये जि़ंदगी के मेले...'। गीतकार और संगीतकार का नाम भी हर गीत के प्रारंभ में दिया जाता है। दूसरा गीत 'आवारा' फ़िल्म का है। हर पोस्टर के नीचे कुछ वाक्यों में सिनोपसिस की तरह दिया गया है। शैलेंद्र की गीत 'आवारा हूँ' को उस दौर में कितना पसंद किया गया था। लेखक उससे जुड़े प्रसंग का जिक्र करता है कि शैलेंद्र आजादी के संघर्ष और सामाजिक क्रांति के विषय में कविताएँ लिखते थे, उन्होंने राजकपूर से सवाल किया था 'मैं पैसों के लिए नहीं लिखता, मैं क्यों लिखूँ'? राजकपूर ने न केवल 'आवारा' फ़िल्म का बल्कि 'बरसात' फ़िल्म का 'बरसात में हमसे मिले तुम'...भी शैलेंद्र से लिखवाया। 'दो बीघा ज़मीन' के पुराने पोस्टर के नीचे लेखक का वक्तव्य है कि 'रीमिक्स, पॉप और हिप-हॉप,रैप संगीत के दौर में भी पुराना गीत संगीत आज भी पसंद किया जाता है'। इस फिल्म के 'धरती कहे पुकार' को किताब में शामिल किया गया है। शैलेंद्र की कलम को संगीतबद्ध मदन मोहन ने किया है। सन् 1953 में आई विमल राय की इस फ़िल्म में बलराज साहनी के उत्कृष्ट अभिनय को देखा जा सकता है। फ़िल्मी गीतों के मर्म को सामने रखते हुए लेखक बताते हैं कि इन गीतों में कैसे आध्यात्मिकता और दार्शनिकता है जो कई बार निस्संगता तक ले जाती है। 'दो आँखें बारह हाथ' के पोस्टर के नीचे लेखक अपनी बात कहते हुए बड़ा सीधा सवाल पूछते हैं कि 'कई फ़िल्मी गीतकारों के साहित्यिक अवदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता, फिर उन गीतों-कहानियों की चर्चा साहित्य में क्यों नहीं होती'? 'ऐ मालिक तेरे बंदे हम' गीत को ही ले लीजिए। भरत व्यास के शब्द कितने ही सार्थक क्यों न हों, डॉ. देवधर तो गीता का उद्धरण भी यहाँ देते हैं कि 'देशेकाले च पात्रेच तद्दानं सात्विकं स्मृतम्'...पर वे महर्षि वेद व्यास तक इसलिए नहीं पहुँच सकते क्योंकि हमने शुरू से ही फ़िल्मों को और फ़िल्मी गीतों या कह लीजिए फ़िल्मी दुनिया को निकृष्ट, ओछा माना है। वी. शांताराम की इस फ़िल्म का यह गीत आज भी कई संस्कार केंद्रों और संस्थाओं में प्रार्थना की तरह गाया जाता है लेकिन केवल फ़िल्मी होने से वह हमारे घरों के मंदिरों-पूजा गृहों में न आ सका। हमने फ़िल्मों को हमेशा ग्लैमर से जोड़ा भले ही उनमें से कई फ़िल्में नेकी और भलाई के रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करती हों तब भी। फ़िल्मों को ओछा माना जाता था तो उन्हें कला और जनसंचार के माध्यम का दर्जा किसने दिया होगा। इसका जवाब भी लेखक 'मदर इंडिया' फ़िल्म के पोस्टर के नीचे दिए अपने वक्तव्य में देते हैं कि साप्ताहिक धर्मयुग ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई थी। समांतर सिनेमा को धर्मयुग पत्रिका ने स्थापित किया तो रेडियो ने उन्हें बार-बार बजाकर या प्रसारित कर प्रतिष्ठित किया। लोगों को भले ही न पता हो कि ठुमरी, चैती, होरी, कजरी शास्त्रीय संगीत के प्रकार हैं या शास्त्रीय संगीत के कितने राग हैं पर उस दौर में उन पर आधारित गीत सबकी ज़ुबान पर चढ़े थे तो वह आकाशवाणी की ही देन है। अस्तु, 'मदर इंडिया' का गीत 'दुनिया में हम आए हैं तो जीना ही पड़ेगा' कब लोकोक्ति में बदल गया होगा कहा नहीं जा सकता। शकील बदायूँनी ने इसे जिस तरीके से लिखा और नौशाद ने जिस तरह संगीत दिया वह इतिहास बन गया है। डॉ. देवधर इस गीत के साथ उस किस्से का भी जिक्र करते हैं जब मिस्र के राष्ट्रपति नासिर भारत आए थे। तब उन्हें मदर इंडिया दिखाई गई थी। फिल्म खत्म होने के बाद भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने संकोचवश उनसे पूछ लिया कि उन्हें फ़िल्म कैसी लगी? नासिर साहब का जवाब हैरान करने वाला था कि वे उससे पहले तीन बार इसे काहिरा में देख चुके थे। गीत की पंक्ति 'जल जाएँ मगर आग पे चलते ही रहेंगे' को डॉ. देवधर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की कविता की पंक्तियों 'विपदाएँ आती हैं आएँ, हम न रुके हैं, हम न रुकेंगे' से जोड़ते हैं। श्रम के महत्व को प्रतिपादित करते हुए वे पंजाबी की कहावत लिखते हैं कि 'ऊँट न रुन्ने, बोरे रून्ने' अर्थात् सामान ढोने वाला ऊँट न रोया बल्कि बोरे ही रोने लगे। डॉ. देवधर का अथाह अध्ययन संस्कृत-उर्दू के संदर्भ इस किताब में कई बार प्रत्यक्षे किं प्रमाणम् की तरह उनकी विद्वत्ता के साक्षी बनते हैं। वे वर्तमान समय को भी अपनी लेखनी पर तौलते हैं कि पहले लिखा जाता था इश्क ईमान है, इश्क कुरआन है और अब इश्क कमीना लिखा जा रहा है। 'घर संसार' फ़िल्म के पोस्टर के नीचे वे अपनी यह बात कहते हैं। गीतकार एस.एच. बिहारी के इस फ़िल्म के लिखे गीत 'भला करने वाले भलाई किए जा' की जब वे बात करते हैं तो उनके द्वारा लिखे कई गीतों की याद दिला देते हैं जैसे 'कजरा मुहब्बतवाला', 'रातों को चोरी-चोरी', 'हौले-हौले चलो मोरे साजना', 'मेरा प्यार वो है', 'दीवाना हुआ बादल', 'इशारों-इशारों में', 'तारीफ करूँ क्या'...। 'घर-संसार' के गीत की बानगी देते हुए वे कबीर-रहीम, कवि बेकन, खलील जिब्रान तक को उद्धृत करते हैं। ऐसा लगता है जैसे वे अपने हाथों को लंबा पसार रहे हैं और जितना समेट सकते हैं सब चीज़ों को समेटते जा रहे हैं। 'अनाड़ी' के गीत 'सब कुछ सीखा हमने, ना सीखी होशियारी' तो जैसे उनके व्यक्तित्व का हिस्सा है। उनकी विद्वत्ता उनकी लेखनी, वाणी में झलकती है लेकिन व्यवहार में वे किसी को कमतर नहीं आँकते। वे इस गीत को कबीरदास से जोड़कर कहते हैं कि 'जो तोको काँटा बुवै, ताहि बोई तू फूल'। किताब की विशेषता है कि हर गीत की व्याख्या उतनी ही लयात्मकता से की गई है। कहीं भी यह लय टूटती नहीं है। किताब का प्रकाशन भी साफ-सुधरा और त्रुटिविहीन है। 'दीदी' फ़िल्म के गीत 'हमने सुना था एक है भारत' के साथ वे सामाजिक परिवेश में होते बदलाव कैसे साहित्य और सिनेमा में भी दिखते हैं, यह बताते हैं। 'छलिया' फ़िल्म के 'छलिया मेरा नाम' गीत के संदर्भ वे जोश मलीहाबादी की पंक्तियों में भी देते हैं और सूरदास के पद भी कि 'खेलत में कऊ काको गुसइयाँ' यानी खेल में कोई किसी का स्वामी कैसे हो सकता है। डॉ. देवधर द्वारा चुने हर गीत में उनका फलसफा दिखता है लेकिन वे 'जिस देश में गंगा बहती है' के गीत को याद करते हुए कहते हैं कि साहिर लुधियानवी के गीत अपने में एक फलसफा लिये होते थे। वैसे इस फ़िल्म के जिस गीत को वे रखते हैं वह शैलेंद्र का 'मेरा नाम राजू' है, जिसका संगीत शंकर-जयकिशन ने दिया था। इस गीत की व्याख्या करते हुए वे बिहारी कवि, गंग कवि, कवि मान, कविराज, महाकवि पद्माकर की याद करते चलते हैं। 'हमारी याद आएगी' के गीत 'सोचता हूँ ये क्या किया मैंने' लिखा। जबकि 'हम दोनों' के गीत 'अल्लाह तेरो नाम' को चुना। यह गीत सन् 1965 के भारत-पाक युद्ध की पृष्ठभूमि पर लिखा गया था। 'बंदिनी' के गीत 'अब के बरस भेज' ने कितनों को रुलाया होगा कहा नहीं जा सकता। शैलेंद्र के शब्द और सचिन देव बर्मन का संगीत इस गीत को अधिक मर्मस्पर्शी बना देता है। 'फूल बने अंगारे' के गीत 'वतन पर जो फिदा होगा' फिर पाठकों को देशभक्ति की ओर ले जाता है। समझ नहीं आता कि देशभक्ति के गीतों को अलग से सिलसिलेवार क्यों नहीं दिया गया। हो सकता है पाठकों का जायका बदलता रहे इसलिए ऐसा किया गया होगा। साहिर के इस गीत में भी देशभक्ति की भावना दिखती है जिसे कल्याणजी-आनंदजी ने संगीतबद्ध किया था। भारत-चीन के सन् 1962 के युद्ध की याद इस गीत में है। इसके बाद 'दोस्ती' फ़िल्म का मजरूह का लिखा गीत है कोई जब राह न पाए'। इस गीत में भी वेदों की पंक्तियों का हवाला दिया गया है तो इतिहास भी रखा गया है कि कैसे तात्या टोपे को उनके ही साथी ने पकड़वाया था और चंद्रशेखर आज़ाद की मुखबिरी भी उनके साथी ने ही की थी। इस गीत के साथ सन् 1971 के युद्ध की पृष्ठभूमि को भी तौला गया है। 'साँझ-सवेरा' फ़िल्म के गीत 'अजहुँ न आए बालमा', को हसरत जयपुरी ने लिखा है और शंकर जयकिशन ने संगीत दिया है। डॉ. देवधर के शब्दों में कहें तो पहले के गीतों में शब्दों की अपनी ताकत होती थी, उनकी उपस्थिति एक लय बनाती थी। पहले के गीतों में लोक बोलियों के शब्द और उनकी मिठास थी जैसे 'अजहूँ न आए'...। इस गीत पर लिखते हुए डॉ. देवधर प्रकृति के चितेरे कवि पंत और रीतिकाल के कवि सेनापति की पंक्तियों को याद करते हैं। कालिदास के मेघदूत की पंक्तियाँ भी इस लेख में आ जाती हैं तो पं. नरेंद्र शर्मा भी। अगला गीत 'जहाँआरा' फ़िल्म का 'वो चुप रहें तो मेरे दिल के दाग' है। गीतकार राजेंद्र कृष्ण के शब्दों के साथ मदन मोहन का संगीत न्याय करता सा लगता है। भाषा, भाव और बयान एक साथ इस गीत के कहन में है। आप इस गीत में डूबते-उतरते हैं कि किताब में अगला गीत 'शहीद' फ़िल्म का 'मेरा रंग दे बसंती चोला' आ जाता है। इसके गीतकार-संगीतकार प्रेम धवन हैं। इस फ़िल्म के अन्य गीतों का उल्लेख भी यहाँ मिलता है जैसे 'ए वतन, ए वतन', 'हमको तेरी कसम', 'सरफरोशी की तमन्ना', 'पगड़ी सम्हाल जट्टा' और 'जोगी हम तो लुट गए तेरे प्यार में'..। डॉ. देवधर इस गीत के साथ भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु, महाराणा प्रताप, लक्ष्मीबाई, गुरू गोविंद सिंह, दुर्गावती, रानी चेनम्मा, राणा सांगा, पृथ्वीराज चौहान, बाजीराव आदि का जिक्र करते हैं। 'सिकंदर-ए-आजम' फ़िल्म के गीत 'जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया' के बारे में अधिक जानना हो तो भी आप इस किताब को पढ़ सकते हैं। इतना ही क्यों 'वक्त' मूवी के 'वक्त से दिन और रात', 'बादल' मूवी का 'ख़ुदगज़र् दुनिया में ये' जैसे कई गीत इस किताब से खुलते चले जाते हैं। 'तीसरी कसम' फ़िल्म के पोस्टर के नीचे लेखक ने जानकारी दी कि सन् 1910 में दादासाहेब फालके ने दि लाइफ ऑफ क्राइस्ट देखकर भारतीय सिनेमा रचने का संकल्प किया और सन् 1913 में फ़िल्म आई राजा हरिश्चंद्र। वैसे यह बात भी समझ से परे है कि फिल्म के पोस्टर के नीचे दी जानकारी इतनी असंगत क्यों है, भले ही महत्वपूर्ण हो। मतलब फ़िल्म के पोस्टर से उसके नीचे चस्पा की गई जानकारी का वैसे कोई लेना-देना नहीं है। जबकि गीतों पर लिखते हुए वे अपनी बात पर टिके हुए लगते हैं। 'तीसरी कसम' फ़िल्म का 'दुनिया बनाने वाले' गीत लिया गया है। सर्वज्ञात है कि यह फ़िल्म फणीश्वरनाथ रेणु की कथा 'मारे गए गुलफाम' पर आधारित है। हसरत जयपुरी के इस गीत में पूछे सवाल पर डॉ. देवधर की कलम बृहदारण्यक उपनिषद का वाक्य देते हैं कि 'स वै नैव रेमे, तस्मात एकाकी न रमते, सद्वितीयम्इच्छत' अर्थात् वह अकेला नहीं रमा। ज्याँ पॉल सार्त्र का उद्धरण देते हैं कि यदि मनुष्य न भी होता, तब भी सृष्टि होती और शायद कुछ बेहतर होती। इसके बाद 'ममता' फ़िल्म के 'छुपा लो यूँ दिल में यूँ प्यार मेरा, कि जैसे मंदिर में लौ दिये की', को लिया गया है। सन् 1966 में ये फ़िल्म रिलीज़ हुई थी। मजरूह सुलतानपुरी ने गीत लिखे थे और रोशन का संगीत था। 'इक कली मुस्काई' के पोस्टर के बाद 'ना तुम बेवफा हो, ना हम' को लिया गया है। 'नीलकमल' के पोस्टर के बाद उन दिनों को याद किया गया है जब सिनेमाघरों में 5 से 10 मिनट का वृत्तचित्र दिखाया जाता था और याद हो आया कि फ़िल्म प्रभाग की डॉक्युमेंट्रीज का प्रदर्शन अब बहुत कम होता है। इस फ़िल्म का गीत 'हे रोम-रोम में बसने वाले राम' है। इसके बाद सन् 1968 में आई फ़िल्म 'सरस्वतीचंद्र' का गीत 'मैं तो भूल चली बाबुल का देस' का वर्णन अपने आपमें सामाजिक दस्तावेज है। वहाँ से चलते हुए फ़िल्म 'जीने की राह' का 'एक बंजारा गाए' गीत आता है। फिर फ़िल्म 'मेरा नाम जोकर' का 'ए भाई, जरा देख के चलो' गीत वर्णित है। गीतकार नीरज ने इसे लिखा है, जिनके बारे में कहा जाता है कि वे फ़िल्मी दुनिया में बतौर गीतकार केवल पाँच साल ही थे। इसके बाद योगेश का लिखा 'आनंद' फ़िल्म का गीत है 'जि़ंदगी कैसी है पहेली'। 'पहचान' फ़िल्म का गीत 'बस यही अपराध' अगली बानगी है। यहाँ गीतों के नाम इसलिए दिए जा रहे हैं ताकि पढ़ने वालों के मन में उत्सुकता जगी रहे। आदमी और इंसान के अंतर को स्पष्ट करते हुए लेखक मिर्जा गालिब का हवाला देता है कि 'बस कि दुश्वार है हर काम का आसां होना, आदमी को मयस्सर नहीं इंसां होना'। मतलब आदमी से इंसान होना एक प्रक्रिया है। फ़िल्म 'सीमा' के गीत 'जब भी ये दिल उदास होता है' को भी इस किताब से करीबी से जाना जा सकता है। फ़िल्म 'पिया का घर' के गीत 'ये जीवन है, इस जीवन का', के फलसफे को भी इस किताब से समझा जा सकता है। 'दाग' फिल्म के गीत 'जब भी जी चाहे नई दुनिया बसा'...साहिर के शब्दों को लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने स्वर दिए लेकिन उस आवाज़ का भी जिक्र होना था, जिसने इसमें दर्द भरा। इस गीत के बहाने डॉ. देवधर, मोहन राकेश, और अज्ञेय को भी याद करते हैं। गीत जहाँ ख़त्म होता है, वहाँ नायिका के मुँह से सिसकी निकलती है। इस गीत के बारे में पढ़ने के बाद वह सिसकी याद आती है,या कहिए ज़ेहन में अटक जाती है। इसके बाद दिल के भाव को बनाए रखने के लिए 'दिल की राहें' की गज़ल 'रस्म-ए-उल्फत को निभाएँ' को दिया गया है। नक्श लायलपुरी ने जैसे इसे लिखा है, वैसे ही मदन मोहन ने संगीत से इसे तराशा है। इस गज़ल के साथ निकहत नसीम, जयशंकर प्रसाद और गालिब भी आ जाते हैं। फ़िल्म 'परिणय' का गीत 'जैसे सूरज की गर्मी से', को तो भजनों में स्थान मिल गया है। रामानंद शर्मा की लेखनी और जयदेव के संगीत ने इसे उस स्थान तक पहुँचाया है। यह स्थान दिलाने में उज्जैन के शर्मा बंधुओं यानी पं. गोपाल शर्मा, सुखदेव शर्मा, पं. कौशलेंद्र और पं. राघवेंद्र शर्मा का भी योगदान है। राम दरबार गायकों के रूप में जाने जाते इन बंधुओं में से पं. गोपाल शर्मा और शुकदेव कुमार ने इसे गाया था। इसमें तरूवर क्यों लिखा गया है इसका उत्तर देते हुए डॉ. देवधर; रहीम का दोहा बताते हैं कि 'तरूवर फल नहीं खात है, सरवर करै न पान, कह रहीम पर काज हित, संपत्ति संचहि सुजान'। भक्तिभाव को ही आगे बढ़ाते हुए फ़िल्म 'मेहमान' का गीत आता है 'राम रहीम, कृष्ण करीम'। साहिर ने यह गीत लिखा है और डॉ. देवधर रेखांकित करते हैं कि साहिर की कलम से ही 'तोरा मन दर्पण कहलाए', 'हे रोम रोम में बसने वाले राम', 'प्रभु तेरो नाम जो ध्याए' के साथ रोमांटिक गीत व कई कव्वालियाँ लिखी हैं। बालकवि बैरागी के 'क्षितिज' फ़िल्म के गीत 'अंधे सफर में हम भी' है। इसके तुरंत बाद फ़िल्म 'चोर मचाए शोर' का वह गीत है जिसे लिखा भी और संगीतबद्ध भी किया रवींद्र जैन ने- 'ले जाएँगे, ले जाएँगे, दिलवाले दुल्हनियाँ'। पैसे वालों के देखते रहने की बात के साथ डॉ. देवधर; प्रेमचंद का लिखा भी रखते हैं कि 'बरात का बराती कभी खुश नहीं होता'। फ़िल्म 'वरदान' का गीत 'हे गिरिधारी, मेरे कृष्ण मुरारी' भी इस किताब में है। 'इम्तेहाँ' फ़िल्म का गीत 'रुक जाना नहीं तू कहीं हार के' की अभिव्यक्ति भी इस किताब में है, जिसके साथ वे प्रसाद की 'कामायनी' पर भी बात करते हैं कि 'अपने सुख को विस्तृत कर लो'। फ़िल्म 'घटना' के गीत 'हज़ार बातें कहे ज़माना' को लेखक ने गज़लनुमा गीत कहा है। गीतकार का नाम रविशंकर शर्मा आता है और संगीत रवि का। रविशंकर शर्मा ही संगीतकार रवि हैं। भारतीय फ़िल्मों में जितने गीत मिलते हैं, उतने शायद दुनिया के किसी देश की किसी भाषा में नहीं। ये गीत केवल मनोरंजन नहीं बल्कि जि़ंदगी की बात भी करते हैं जैसे फ़िल्म 'रफ़्तार' का गीत 'संसार है एक नदिया, सुख-दु:ख दो किनारे'। फ़िल्म 'फकीरा' का गीत 'फकीरा चल चला चल' भी इसी दार्शनिकता को बया करता है। फ़िल्म 'कर्मा' का लिया गीत 'समय तू धीरे-धीरे चल' भी उसी तर्ज पर है, तो फ़िल्म 'अपनापन' का गीत 'आदमी मुसाफ़िर है, आता है जाता है' भी और फिर 'गोलमाल' का यह गीत भी 'आनेवाला पल, जाने वाला' है। गुलज़ार के इस गीत के बाद किताब में निदा फाजली का गीत है 'कभी पलकों में आँसू हैं, कभी लब पे शिकायत है' (फ़िल्म हरजाई)। 'प्रेम तपस्या' फ़िल्म का गीत 'आदमी दीवाना है, एतबार करता है' भी जीवन, प्रकृति, मौसम, समाज, अध्यात्म और दर्शन की बात करता है। गीतकार आनंद बख्शी के इस गीत के बाद दूसरा गीत भी इसी तर्ज पर है। वह गीत है- 'रोते रोते हँसना सीखो, हँसते-हँसते रोना'। 'राम तेरी गंगा मैली' फ़िल्म के शीर्षक गीत पर लिखते हुए डॉ. देवधर गंगा के अवतरण की पौराणिक कथा बताते हैं। जीवन की दूसरी सच्चाई अगले गीत में आती है, जो 'मेरी जंग' का है। गीत है 'जि़ंदगी हर कदम एक नई जंग है'। हर नए गीत को नए तरीके से रखने का सिलसिला इस किताब में इस गीत के साथ खत्म होता है पर हम चाहते हैं कि गीतों पर अगली किताब भी शीघ्र आए क्योंकि अभी कई सारे गीत उन पर लिखे जाने की प्रतीक्षा में हैं।
न जाने किस गली में जिंदगी की....
सैयद मोहम्मद बशीर जो बाद में बशीर बद्र के नाम से मशहूर हुए तो कह उठे कि
असम: सैनिक स्कूल में कोच बनने का मौका, 18 और 19 जून को होगा वॉक-इन इंटरव्यू
सैनिक स्कूल गोलपारा, असम ने शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए कोच/क्लब शिक्षक के विभिन्न 13 पदों पर भर्ती के लिए एक आधिकारिक अधिसूचना जारी करके योग्य और इच्छुक उम्मीदवारों से आवेदन आमंत्रित किए हैं।
एस्ट्रोनॉट्स की पहचान 'मिशन पैच', शुभांशु शुक्ला ने किया भावुक पोस्ट
भारतीय एयरफोर्स के ऑफिसर और एस्ट्रोनॉट शुभांशु शुक्ला अक्सर अपनी स्पेस यात्रा से जुड़ी रोचक और मजेदार पोस्ट कर जानकारी देते रहते हैं
नाज़ुक आर्थिक दौर में संरचनात्मक बदलावों का समय
भारत को अनुसंधान और नवाचार में निवेश, श्रम उत्पादकता में सुधार, व्यापारिक पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत और क्षेत्रीय व्यापार एकीकरण को सुदृढ़ करना चाहिए।
उदन्त मार्तण्ड से लुप्त मेरुदण्ड तक हिंदी पत्रकारिता के दो सौ बरस
अभी हाल में मोदी विदेश दौरे से लौटे हैं: कायदे से तो प्रेस का काम था कि वह पांचों देशों की यात्रा के कारणों और परिणामों का विश्लेषण करती।
साइकिल की सवारी में बेहतरी हमारी
गांव में स्थित स्वयंसेवी संस्था के कार्यकर्ता साइकिल से चलते थे। संस्था की ओर से सचल पुस्तकालय (मोबाइल लाइब्रेरी) संचालित किया जाता था।
“उजाले अपनी यादों के…” : बशीर बद्र की शायरी में मोहब्बत, विस्थापन और इंसानियत का दर्द
91 वर्ष की उम्र में दुनिया को अलविदा कहने वाले मशहूर शायर बशीर बद्र ने उर्दू ग़ज़ल को आम लोगों की ज़ुबान बनाया। मेरठ दंगों, विस्थापन, मोहब्बत और इंसानियत के दर्द से भरी उनकी शायरी आज भी समाज को आईना दिखाती है।
अवैध घुसपैठियों के बांग्लादेश लौटने के दावे से बंगाल इत्जिमा का वीडियो वायरल
बूम ने वीडियो को शूट करने वाले शेख अली से संपर्क किया जिन्होंने पुष्टि की कि फुटेज में लोग इस साल जनवरी में आयोजित हुए हुगली इज्तिमा में भाग लेते नजर आ रहे हैं.
31 मई को फुल-मून : अपने मोबाइल से लीजिए चांद की बेहतरीन फोटो, नासा ने शेयर किए फोटोग्राफी टिप्स
31 मई को आसमान में एक बार फिर खूबसूरत नजारा यानी कि 'फुल मून' देखने को मिलेगा। इस रात चांद की खूबसूरत तस्वीर हर कोई अपने मोबाइल में कैद करना चाहेगा, लेकिन स्मार्टफोन से चांद की अच्छी तस्वीरें लेने में कई चुनौतियां भी हैं।
एसी ऑन करने से पहले आजमाएं ये छोटी की ट्रिक, कमरा तेजी से होगा ठंडा, बिजली की भी होगी बचत
गर्मियों में बाहर तेज धूप से परेशान लोग जैसे ही घर पहुंचते हैं, सबसे पहले एयर कंडीशनर चालू करते हैं
ललित सुरजन की कलम से बिलासपुर की पांच बहनें
'हमारे समाज में न जाने क्यों लड़कियों को शुरु से ही बोझ मान लिया जाता है।
डिजिटल आक्रोश या नया राजनीतिक विकल्प: 'कॉकरोच जनता पार्टी' के उभार के मायने
देश के मौजूदा राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए इस आंदोलन के पीछे एक और गहरी राजनीतिक साजिश या प्रोपेगैंडा होने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
दिल्ली-एनसीआर में गरज-चमक के साथ हुई बारिश, भीषण गर्मी से मिली राहत
भीषण गर्मी और लगातार चल रही लू से परेशान दिल्ली-एनसीआर के लोगों को गुरुवार की शाम को राहत मिली। राजधानी दिल्ली और आसपास के कई इलाकों में तेज आंधी, गरज-चमक और हल्की से मध्यम बारिश ने मौसम का मिजाज पूरी तरह बदल दिया। बारिश के बाद तापमान में गिरावट दर्ज की गई और लोगों ने लंबे समय बाद ठंडी हवाओं का एहसास किया।
हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष : जनचेतना से लोकतंत्र तक
–बाबूलाल नागा 30मई1826को जब पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने कोलकाता से हिंदी के पहले समाचार पत्रउदन्त मार्तण्डका प्रकाशन शुरू किया,तब शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि यह छोटा-सा प्रयास आने वाले समय में करोड़ों लोगों की आवाज बन जाएगा। वर्ष2026हिंदी पत्रकारिता के लिए ऐतिहासिक पड़ाव है,क्योंकि यह केवल200वर्षों का उत्सव नहीं,बल्कि लोकतंत्र,जनसंघर्ष ... Read more
बकरा ईद (ईद-उल-अजहा) इस्लाम धर्म को मानने वालो का प्रमुख पर्व है जो त्याग, समर्पण और अल्लाह के प्रति अटूट विश्वास का प्रतीक है । यह पर्व पैगंबर इब्राहिम द्वारा अपने पुत्र हज़रत इस्माइल की अल्लाह की राह में दी जाने वाली सर्वोच्च कुर्बानी की याद में मनाया जाता है ।बकरा ईद से जुड़ी बातें ... Read more
चोर चुप ही रहता तो कम पिटता..यह लतीफा इस समय उन लोगों के लिए बड़ा मौजू बैठता है तो इन दिनों की महंगाई और आर्थिक बदहाली का अजब-गजब तर्कों से बचाव कर रहे हैं और अपना बिना बात मखौल उड़वा रहे हैं। बहुत संभव है उन्हें मंहगाई से होने वाली दुर्गति का अहसास ना हो। ... Read more
मानसिक शांति के लिए फायदेमंद रोजमेरी, तनाव कम कर देती है बेहतर नींद
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में अच्छी नींद लेना बहुत बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। देर रात तक मोबाइल और लैपटॉप का इस्तेमाल, काम का दबाव, तनाव और चिंता जैसी समस्याएं धीरे-धीरे लोगों की नींद को प्रभावित कर रही हैं
मेंस्ट्रुअल हाइजीन डे : पीरियड्स को लेकर चुप्पी तोड़ना जरूरी, स्वच्छता और जागरूकता से बनेगी बात
पीरियड्स या मासिक धर्म महिलाओं के जीवन का एक महत्वपूर्ण चरण होता है, लेकिन कई बार उन्हें इस दौरान सामाजिक भेदभाव और असहज परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है
ललित सुरजन की कलम से - शिक्षा और परीक्षा
'जब हम पढ़ रहे थे, इंजीनियरिंग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज, आईआईटी, आईआईएम तब भी थे।
पाठक जानते हैं कि सीबीएसई बारहवीं बोर्ड परीक्षा के नतीजे इस बार सात सालों में सबसे खराब रहे, केवल 85.20 प्रतिशत बच्चे ही उत्तीर्ण हो पाए।
क्या आम आदमी विकास से बाहर छूट रहा है?
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद नए भारत के निर्माण के जिन आधार स्तंभों की कल्पना की गई थी, उनमें शिक्षा और चिकित्सा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई थी। यह माना गया था कि यदि देश के नागरिक शिक्षित, स्वस्थ और जागरूक होंगे तो लोकतंत्र मजबूत होगा, सामाजिक असमानताएं कम होंगी और राष्ट्र विकास के पथ पर ... Read more
क्षेत्रीय संतुलन, सामाजिक प्रतिनिधित्व और संगठनात्मक शैली को लेकर बहस तेज
भाजयुमो की नई प्रदेश कार्यकारिणी पर उठे सवाल जयपुर। राजस्थान भाजपा युवा मोर्चा की नई 63 सदस्यीय प्रदेश कार्यकारिणी घोषित होते ही संगठन और राजनीतिक हलकों में क्षेत्रीय संतुलन, सामाजिक प्रतिनिधित्व और कार्यकर्ता उपेक्षा को लेकर बहस तेज हो गई है। प्रदेशाध्यक्ष शंकर गोरा द्वारा घोषित इस टीम में प्रदेश उपाध्यक्ष, महामंत्री, मंत्री, मीडिया, आईटी ... Read more
आज भारत के पहले प्रधानमंत्री प जवाहरलाल नेहरू की पुण्य तिथि है। उन्हें याद करते हुए मैं राजनीति से इतर एक दृष्टा या पथ प्रदर्शक के रूप में देखता हूँ। अपनी कल्पना की उड़ान को जब देश की आजादी के मुहाने पर खड़ा करता हूँ तो भीतर तक सिहरन उठ जाती ... Read more
क्या एआई मानवता के महाविनाश का कारण बनेगी?
कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई आज केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं रह गई है, बल्कि वह मानव सभ्यता के भविष्य का निर्णायक मोड़ बनती जा रही है। जिस गति से यह तकनीक विकसित हुई है, उसने दुनिया को आश्चर्यचकित भी किया है और चिंतित भी। अभी तक विज्ञान और तकनीक मनुष्य के हाथों में उपकरण थे, ... Read more
–श्रीमती संतोष शर्मा स्वतंत्र पत्रकार साकेत नगर ढाई अक्षर के प्रेम शब्द में वह शक्ति है जिससे दो आत्माओं का पवित्र मिलन होता है। जो प्यार करने वाले दो दिलों को हमेशा हमेशा के लिए एक दूसरे से बांध देता है। यह प्रेम दो आत्माओं में अपनापन होने पर स्वतः ही पैदा होता है। प्रेम ... Read more
ललित सुरजन की कलम से- स्वच्छ प्रशासन की चिंता
'देश की जनता को अपने अफसरों से यह सवाल करना चाहिए कि आप तो लोक सेवक हैं; जो भी सरकारी संस्थाएं हैं वे ठीक से काम करें यह देखना आपकी अपनी जिम्मेदारी है
नेहरू की पुण्यतिथि आज : नेहरू और पटेल को बैलों की एक जोड़ी के रूप में देखते थे गांधीजी
नेहरू और पटेल एक दूसरे के पूरक थे। नेहरू का वैचारिक आधार फेबियन समाजवाद की विचारधारा थी जिसके अनुसार संसदीय लोकतंत्र मानवीय आकांक्षाओं की पूर्ति का सबसे अधिक शक्तिशाली साधन है
मोदी सरकार में बच्चों का भविष्य खतरे में!
नरेन्द्र मोदी के हिंदू-मुस्लिम एजेंडे को धर्म की रक्षा मानना और हिंदू जाग गया है जैसे बेतुके दावों पर यकीन करके इस देश ने किस तरह अपना भविष्य बर्बाद कर लिया है
कॉकरोच जनता पार्टी के भ्रष्ट दरोगा को पकड़ने और पथराव के दावे वायरल वीडियो का सच जानिए
बूम ने पाया कि वायरल हो रहे दोनों वीडियो फरवरी 2026 से इंटरनेट पर मौजूद हैं और अलग-अलग घटनाओं से संबंधित हैं.
विपक्ष से सत्ता पक्ष में आने के लिये संगठित होकर शंखनाद तो करना ही होगा
अजमेर कांग्रेस :-पूरे राजस्थान प्रदेश की कांग्रेस और उसमें अजमेर की कांग्रेस हमेशा से ही एक अहम भूमिका मैं अपना वर्चस्व अपनी अलग पहचान प्रदेश ही नहीं राष्ट्रीय स्तर पर भी बनाए हुए हैं, कार्यशील है, प्रगतिशील है भले ही 20-25 वर्षों से तो लगातार अजमेर के दोनों विधानसभा क्षेत्र हारते आ रहै है। लोकसभा ... Read more
डैंड्रफ और खुजली से राहत दिलाने में छाछ मददगार, बालों की कई समस्याओं से दिलाती है छुटकारा
आजकल बहुत से लोग बालों के झड़ने, रूखेपन, डैंड्रफ, खुजली और ऑयली स्कैल्प जैसी समस्याओं से परेशान हैं
यह कैसा समाज है, जिसमें अदालतें समझाएं रिश्तों का धर्म
किसी भी सभ्यता की वास्तविक पहचान उसकी ऊँची इमारतों, चमकती सड़कों, आर्थिक प्रगति या तकनीकी उपलब्धियों से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपने बुजुर्गों, माता-पिता और निर्बल वर्ग के प्रति कितना संवेदनशील है। लेकिन आज का सबसे पीड़ादायक प्रश्न यही है कि जिस भारत ने “मातृ देवो भवः, पितृ देवो ... Read more
ललित सुरजन की कलम से अडवानी या मोदी : फर्क क्या है?
अगर अटल बिहारी वाजपेयी की बात सुनी गई होती तो 2002 में ही नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री के पद से हट जाना चाहिए था।
जब सरकारें हास्य से डरती हैं, तो यह दिखाता है कि बहुत कुछ गलत है
'कॉकरोच जनता पार्टी' की लोकप्रियता यह भी दिखाती है कि राजनीतिक सोच बदल रही है।
पेट काटकर जनता बचाए, मोदीशाही अमेरिका की भेंट चढ़ाए!
नरेंद्र मोदी के राज ने जिस एक चीज में सबसे ज्यादा महारत हासिल की है, वह यह है कि वास्तव में यह सरकार जो करती है, उससे ठीक उल्टा करने का ढोल पीटती है।
नए भारत के जन्म पर सोहर गायन- मनीष मिश्रा (अध्यक्ष, पहल)
भारत की सनातन परम्परा में, किसी भी आँगन में जब कोई मांगलिक बयार बहती है, तो वह किसी न किसी सुर, ताल और गीत का आँचल पकड़कर ही आती है।
स्वयं को होशियार समझता ऐसा भ्राता नहीं हूं मैं, गले मिलकर ही गला काटें ऐसी-मात्रा नहीं हूं मैं। गैरों का भी जो दर्द समझते ऐसा एक इंसान हूं मैं, क्या होता है यें प्रेम भली-भांति से समझता हूं मैं ।। दिल में अपनें दुःख समेटे उम्र भर जीता रहा हूं मैं, सब देखकर भी अनजानों ... Read more
ललित सुरजन की कलम से भ्रष्टाचार तो आज़ादी के पहले से है
अरेबियन नाइट्स याने सहस्र रजनीचरित अथवा कथा सरित्सागर की तर्ज पर हर दिन एक नया किस्सा सुनाया जा रहा है ।
रुपये की गिरावट एक गंभीर चेतावनी, सरकार नजरअंदाज नहीं कर सकती
भारत का रुपया सिर्फ़ कमजोर ही नहीं हो रहा है बल्कि यह एक ऐसी अर्थव्यवस्था की ढांचागत कमज़ोरियों के बारे में एक चेतावनी का संकेत दे रहा है,
गोदी मीडिया का विकल्प यू ट्यूब और सोशल मीडिया
जब बीजेपी विपक्ष में थी तब भी अखबारों में उसे ही प्राथमिकता दी जाती थी। इसके लिए नई-नई अवधारणाएं लाई जाती थीं।
सिंडिकेट बैंक की बेगमपेट शाखा में उस सोमवार को सुबह से ही भीड़ थी। मार्च का आखिरी पड़ाव और हर कोई किसी जरूरी काम के बोझ तले दबा हुआ था
लोकचेतना और मानवीय संवेदना के कवि भगवती लाल सेन
२३ मई छत्तीसगढ़ की साहित्यिक चेतना के लिए केवल एक जन्मतिथि नहीं बल्कि लोकसंवेदना, सामाजिक सरोकार और जनपक्षधर काव्यधारा के स्मरण का दिन है
धूप, तनाव और गलत खानपान से बिगड़ता है स्किन का पीएच बैलेंस, हो सकती है मुंहासे-रूखेपन की समस्या
आजकल लोग चमकदार और स्वस्थ त्वचा पाने के लिए तरह-तरह के ब्यूटी प्रोडक्ट्स इस्तेमाल करते हैं, लेकिन सिर्फ बाहरी चमक ही अच्छी स्किन की निशानी नहीं होती
*कॉकरोच पार्टी ;-व्यंग्य विधा की जीत*
कॉकरोच ..कॉकरोच.. कॉकरोच… सोशल मीडिया की सीलन पर इस कदर फैले हुए है गोया हम किसी मलबे के ढेर पर खड़े हैं और कॉकरोच हमारे दिमाग में चढ़ गए हैं ..। जबकि सोशल मीडिया से उठे इस तकनीकी गुबार की बहुत दिनों तक बने रहने की संभावना बहुत कम है। बावजूद इसके ... Read more
पीरियड्स में खतरनाक हो सकती है लापरवाही, इन 3 बातों का रखें खास ख्याल
मासिक धर्म महिलाओं की सामान्य शारीरिक प्रक्रिया है, लेकिन इस दौरान साफ-सफाई का ध्यान न रखने पर कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं
चिंता पैदा करती है 'न्याय की भाषा'
भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत शर्मा द्वारा भरी अदालत में कुछ समूहों को 'परजीवी' और 'तिलचट्टे' के रूप में वर्गीकृत करना दुर्भाग्यपूर्ण, चिंताजनक और परेशान करने वाला है।
आर्थिक संयम की अपील : राष्ट्रवाद या संकट प्रबंधन?
यह अपील सतही तौर पर 'आर्थिक राष्ट्रवाद' लगती है, पर संदर्भ में यह वैश्विक अस्थिरता और घरेलू दबावों की आपात प्रतिक्रिया प्रतीत होती है।

