राजस्थान कांग्रेस में खेल अभी बाकी है मेरे दोस्त…
सियासत में मुस्कानें कभी-कभी शब्दों से ज्यादा बोलती हैं। संकेत मौन से ज्यादा मुखरित होते हैं। और इशारे अक्सर नई कहानी कहते हैं। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ। राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे अशोक गहलोत और उप मुख्यमंत्री रहे सचिन पायलट जब पद के बिना आमने-सामने आए,तो हाथ सिर्फ मिले नहीं, ठहरे। मुस्कानें सिर्फ ... Read more
बंगाल में BJP को वोट न देने के लिए धमकाती महिला का पुराना वीडियो गलत दावे से वायरल
बूम ने पाया कि वीडियो 2022 का पश्चिम बंगाल के खड़गपुर का है, जहां नगर निगम चुनाव में कैंडिडेट लिस्ट को लेकर विवाद के बाद तत्कालीन BJP नेता बेबी कोल ने लोगों को BJP की उम्मीदवार मौसुमी दास को वोट न देने के लिए धमकाया था.
अब प्रधानमंत्री मोदी बता सकते हैं। हुगली नदी ने राजनीति के कितने रंग-रूप बंगाल में देखे हैं।
ललित सुरजन की कलम से, अडवानी या मोदी :फर्क क्या है?
'1952 के पहले आम चुनाव से लेकर 2009 के चुनावों तक संघ के इस राजनीतिक मंच ने बहुत से उतार-चढ़ाव देखे हैं।
1 मई से लागू होंगे ऑनलाइन गेमिंग के नए नियम, सरकार ने तैयार किया सख्त फ्रेमवर्क
सरकार ने बुधवार को कहा कि देश में तेजी से बढ़ते ऑनलाइन गेमिंग सेक्टर को नियंत्रित करने के लिए 1 मई 2026 से नए नियम लागू होंगे
अस्थिर विश्व में भारत:अर्थनीति, कूटनीति और छवि का पुनर्पाठ
इज़रायल के प्रति रुख में आया बदलाव यह संकेत देता है कि वैश्विक राजनीति में अब अंध-समर्थन के बजाय मानवीय और नैतिक प्रश्न अधिक प्रभावी हो रहे हैं।
पुस्तकें हैं जीवन का दीप, समाधान का सेतु
विश्व पुस्तक एवं कॉपीराइट दिवस, 23 अप्रैल 2026 पर विशेषः हर वर्ष 23 अप्रैल को समूचा विश्व ज्ञान, सृजनशीलता और मानवीय सभ्यता की अमूल्य धरोहर पुस्तकों का उत्सव मनाता है। यूनेस्को द्वारा 1995 में प्रारंभ किया गया यह दिवस केवल औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि लेखकों के सम्मान, सृजनाधिकार की रक्षा और पठन संस्कृति के संवर्धन ... Read more
RSS के कार्यक्रम में जाने से प्रमोशन होने की बात जस्टिस स्वर्णकांता ने नहीं कही
बूम ने पाया कि वायरल वीडियो साल 2024 में काशी विद्यापीठ में आयोजित एक कार्यक्रम का है, जहां भाषण में स्वर्णकांता शर्मा ने अपने आगे बढ़ने का श्रेय भगवान शिव और विश्वविद्यालय को दिया था.
राजस्थान कांग्रेस में दिग्गजों को दरकिनार करने की साजिश
राजस्थान कांग्रेस रणभूमि बनी हुई है। खतरा डिजिटल खेल का है। तीर बाहर अंदर से चल रहे हैं। केंद्र में हैं गोविंद सिंह डोटासरा, जो अपने समर्थकों की हरकतों की हवा से घिरते हुए, धीरे-धीरे कमजोर पड़ते हुए और दूसरों को दरकिनार ठिकाने लगाने की कोशिश में खुद ठिकाने लगते हुए।यह परिदृश्य इसलिए बना क्योंकि ... Read more
लंबी शिफ्ट में भी फिट रहने का आसान तरीका ‘वाई-ब्रेक’, सेहत और फोकस दोनों में होगा सुधार
आज की तेज रफ्तार जिंदगी और लंबे ऑफिस घंटों के बीच कर्मचारियों को कई शारीरिक और मानसिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। घंटों एक ही जगह बैठकर काम करने से गर्दन, पीठ, कंधों और पैरों में दर्द के साथ-साथ तनाव और चिंता भी बढ़ रही है। ऐसे में आयुष मंत्रालय द्वारा शुरू किया गया ‘वाई-ब्रेक’ कर्मचारियों के लिए एक आसान और असरदार समाधान साबित हो रहा है।
महिला आरक्षण की आड़ में लोकतंत्र के एन्काउंटर का खेल
महिला आरक्षण का रास्ता साफ करने के नाम पर बुलायी गयी संसद की तीन दिन की विशेष बैठक में, जब संसद में सरकार की ओर से पेश, संविधान संशोधन समेत तीन विधेयकों पर चर्चा शुरू हो रही थी
ललित सुरजन की कलम से आई बी और आई बी
भारत सरकार के ये दोनों अभिकरण अलग-अलग कारणों से चर्चा में आए इसलिए इनकी चर्चा करना गैरमुनासिब न होगा।
मोदी का राष्ट्र के नाम संबोधन उर्फ़ घटिया चुनावी भाषण
सरकार का इरादा भी विधेयक पारित कराने से ज्यादा इस विधेयक को लेकर विपक्ष को बदनाम करने का था।
तुम मुझे वोट दो, मैं तुम्हें गलत इतिहास बताऊंगा
प.बंगाल चुनाव में उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने एक रैली में कहा कि, 'स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा'
छात्रों का आत्मघातः सपनों का बोझ है या सिस्टम की नाकामी?
कुरुक्षेत्र स्थित राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान कुरुक्षेत्र में दो महीनों के भीतर चार छात्रों द्वारा आत्महत्या की घटनाएं केवल एक संस्थान की त्रासदी एवं नाकामी नहीं हैं, बल्कि पूरे भारतीय समाज, शिक्षा व्यवस्था और हमारी सामूहिक संवेदनहीनता पर लगा गहरा प्रश्नचिह्न हैं। ये घटनाएं हमें झकझोरती हैं कि आखिर वह कौन-सी परिस्थितियां हैं, जिनमें देश की ... Read more
महामृत्युंजय: मृत्यु के पार चेतना का विज्ञान
मानव सभ्यता के इतिहास में कुछ ऐसे सूत्र, ध्वनि-विन्यास और आध्यात्मिक प्रयोग विद्यमान हैं, जो सामान्य धार्मिक आस्था की सीमाओं से परे जाकर कहीं अधिक गहरे और व्यापक अर्थों को धारण करते हैं। महामृत्युंजय मंत्र ऐसा ही एक विरल सूत्र है—एक ऐसा मंत्र जो मात्र प्रार्थना नहीं, बल्कि चेतना, ऊर्जा और जीवन के गहन रहस्यों ... Read more
पश्चिम बंगाल के चुनाव में महिलाओं की होगी निर्णायक भूमिका
— तीर्थंकर मित्रा ‘लक्ष्मी भंडार’ महज़ एक आर्थिक हस्तक्षेप से कहीं ज़्यादा है। यह एक सामाजिक-राजनीतिक पुनर्संतुलन का प्रयास है। इस योजना ने महिलाओं को, सिर्फ अपने लिंग के आधार पर ही, इस योजना का लाभार्थी बनने का अवसर प्रदान किया है। इसके परिणामस्वरूप, मतदान का अधिकार अब महिला मतदाताओं के लिए अपनी पहचान और अपनी बात को ज़ोरदार ढंग से रखने का एक सशक्त माध्यम बन गया है। बयानबाजी, नए गठजोड़ और आपसी आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच, पश्चिम बंगाल की महिला मतदाताएं पिछले एक दशक में एक शक्तिशाली ताकत के रूप में उभरी हैं, क्योंकि उनके फैसले अब सरकारों के भविष्य को तय करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस, जिसका पिछले 15 सालों से राज्य पर एकछत्र राज रहा है, ने इस चुनावी मुकाबले में सबसे ज़्यादा महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। कुल मिलाकर, पिछली राज्य विधानसभा में टीएमसी की ओर से 41 महिला विधायकों ने प्रतिनिधित्व किया था। तेज़-तर्रार नेता ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली इस राजनीतिक पार्टी ने देश भर की अन्य राजनीतिक पार्टियों की तुलना में ज़्यादा महिलाओं को चुनाव में उतारा है। यह विधानसभा की कुल सदस्य संख्या का 13.94 प्रतिशत है, जो कि देश भर की अन्य राज्य विधानसभाओं के 8 प्रतिशत के राष्ट्रीय औसत से काफी ज़्यादा है। टीएमसी की बदौलत, महिला मतदाताएं अब चुनावी समीकरणों में सिर्फ एक सहायक भूमिका नहीं निभा रही हैं। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, पश्चिम बंगाल में 3,76,00,611 महिला मतदाताएं हैं। आने वाले चुनावों में सभी उम्मीदवार इस वर्ग को अपने पक्ष में करने की पूरी कोशिश करेंगे, ताकि वे राजनीतिक माहौल को अपने पक्ष में मोड़ सकें। टीएमसी सरकार की प्रमुख सामाजिक कल्याण योजना, ‘लक्ष्मी भंडार’ ने लोगों की राजनीतिक निष्ठाओं और उनकी आर्थिक वास्तविकताओं को पूरी तरह से बदल दिया है। 2021 में शुरू की गई इस योजना के 2.2 करोड़ लाभार्थी हैं, और इस पर खर्च किए गए हज़ारों करोड़ रुपये की राशि ने टीएमसी को लगातार चुनावों में ज़बरदस्त राजनीतिक फ़ायदा पहुंचाया है, जिससे विपक्षी दलों के लिए अपनी जगह बना पाना और भी मुश्किल हो गया है। ‘लक्ष्मी भंडार’ महज़ एक आर्थिक हस्तक्षेप से कहीं ज़्यादा है। यह एक सामाजिक-राजनीतिक पुनर्संतुलन का प्रयास है। इस योजना ने महिलाओं को, सिर्फ अपने लिंग के आधार पर ही, इस योजना का लाभार्थी बनने का अवसर प्रदान किया है। इसके परिणामस्वरूप, मतदान का अधिकार अब महिला मतदाताओं के लिए अपनी पहचान और अपनी बात को ज़ोरदार ढंग से रखने का एक सशक्त माध्यम बन गया है। आंकड़े खुद-ब-खुद अपनी कहानी बयां करते हैं। जहां टीएमसी ने 52 महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है, वहीं वामपंथी दलों ने 34 महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया है; जबकि 2026 के राज्य विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और भाजपा ने क्रमश: 35 और 33 महिला उम्मीदवारों को चुनाव में उतारा है। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि टीएमसी ने बड़ी संख्या में महिला मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने के मुद्दे पर अपनी आवाज़ बुलंद की है। राज्य टीएमसी की महिला विंग की प्रमुख चंद्रिमा भट्टाचार्य ने कहा कि महिला मतदाताओं के नाम हटाए जाने का मकसद उनकी पार्टी के वोट बैंक को नुकसान पहुंचाना है। लेकिन राज्य में महिलाओं के लिए चलाई जा रही सामाजिक कल्याण योजनाएं ही टीएमसी के पक्ष में महिलाओं के वोटों में आए बदलाव का एकमात्र कारण नहीं हैं। पश्चिम बंगाल की महिला मतदाताएं लंबे समय से अपनी गहरी राजनीतिक समझ के लिए जानी जाती रही हैं। उनके फैसले लेने का तरीका पारिवारिक चर्चाओं, सामाजिक दायरों और आखिर में वोटिंग बूथ की एकांत जगह में सामने आता है। यह पूरी तरह से राजनीतिक होता है और राज्य तथा महिला नागरिकों के बीच बदलते आपसी तालमेल से तय होता है। लेकिन महिला मतदाताओं के समर्थन को हल्के में नहीं लिया जा सकता। यह न तो एक जैसा होता है और न ही इसका पहले से अंदाज़ा लगाया जा सकता है। लक्ष्मी भंडार, कन्याश्री, रूपाश्री जैसी महिलाओं पर केंद्रित कुछ सामाजिक कल्याण योजनाओं के लाभार्थियों के वोट टीएमसी को ही मिलेंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं है। ये योजनाएं बस इस बात को पक्का करती हैं कि टीएमसी के राजनीतिक परिदृश्य में महिलाओं की मौजूदगी को सम्मान की नजऱ से देखा जाए। महिला मतदाताओं के एक बड़े हिस्से को अपने पाले में करने के लिए, चुनावी प्रचार के तरीके में एक सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण बदलाव किया गया है। चुनाव प्रचार संभालने वालों को इस बात को नजऱअंदाज़ नहीं करना चाहिए कि कोलकाता की महिला मतदाताओं की प्राथमिकताएं, ग्रामीण इलाकों की महिलाओं की प्राथमिकताओं से अलग होंगी। इस विविधता को देखते हुए, महिलाओं से जुड़े मुद्दों को और भी बारीकी से समझने की ज़रूरत है। महिला मतदाताओं का यह समूह कई तरह के लोगों से मिलकर बना है, इसलिए उम्मीदवार और उनके चुनाव प्रचारकों को अपनी बात रखने से पहले इस बात को ध्यान में रखना होगा। रैलियां, गठबंधन और ज़ोरदार चुनावी अभियान हर चुनाव का एक अहम हिस्सा होते हैं। लेकिन पश्चिम बंगाल की महिला मतदाताओं को अपना मन बनाने में मदद करने के लिए, एक ज़्यादा संवेदनशील और जवाबदेह रवैया अपनाना ज़रूरी है; महिलाओं पर केंद्रित सामाजिक कल्याण योजनाओं के अलावा, सबसे ज़्यादा महिला उम्मीदवारों को टिकट देना भी टीएमसी की लैंगिक संवेदनशीलता को दिखाता है। महिला मतदाताएं—या और भी साफ़ शब्दों में कहें तो उनमें से ज़्यादातर महिलाएं—‘खामोश किंगमेकर’ (सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाने वाली) होती हैं। कुछेक को छोडक़र, ज़्यादातर महिलाएं राजनीतिक मंच के सबसे शक्तिशाली मंच से अपनी बात नहीं रखतीं। हो सकता है कि उनकी आवाज़ सबसे ज़्यादा सुनाई देने वाली आवाज़ न हो। लेकिन यह एक सच्चाई है कि ज़्यादातर महिला मतदाताएं तृणमूल की मुखिया ममता बनर्जी के साथ खुद को जुड़ा हुआ महसूस करती हैं। यही वजह है कि उनका समर्थन उन चुनावी क्षेत्रों में भी, जहां कोई महिला उम्मीदवार नहीं है, भले ही ऊपरी तौर पर कम दिखे, लेकिन असल में वह बहुत ही निर्णायक और महत्वपूर्ण होता है। जब 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे, तो पश्चिम बंगाल की महिला मतदाताओं की यह खामोश लेकिन मज़बूत भूमिका, उनके राज्य के भविष्य को तय करने में एक अहम किरदार निभाएगी।
चुनाव आयोग की भूमिका पर संदेह और सवालों का घेरा
एसआईआर की नई प्रक्रिया सामान्य लोगों के लिए कठिन है। एसएसआर में मौजूदा सूची में वोटरों के नाम जोड़े और काटे गए थे।
पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर कुछ वक्त की घोषित शांति के बाद एक बार फिर से सुलग उठा है।
ललित सुरजन की कलम से - अध्यक्ष राहुल: कांग्रेस की ज़रूरत
राजनीति के अध्येता देख रहे हैं कि कांग्रेस के ऊपर लंबे समय से उचित-अनुचित वार हो रहे हैं
अष्टद्रव्यसेपूजाकरें,भावोंकाविस्तार, प्रभुचरणोंमेंअर्पितकरें,श्रद्धाअपार। जल-चंदन-अक्षत-पुष्प,नैवेद्यदीपउजियार, धूप-फलसेपूर्णहो,प्रभुकासत्कार॥ जलचढ़ाऊँचरणोंमें,समर्पणकाभाव, जैसेबहतानिर्मलजल,नम्रबनेस्वभाव। हेप्रभु!ऐसाविनयदे,मनहोनिर्मल-नीर, तेरेचरणोंमेंबसूँ,मिटेअहंकारकीपीर॥ चंदनतिलकलगाऊँमैं,श्रद्धाकाआधार, हृदयमेंतेरास्मरण,होजीवनसाकार। तेरेप्रतिविश्वाससे,भरजाएयहमन, हरश्वासमेंबसजाए,प्रभुतेराहीध्यान॥ अक्षतअर्पणकरूँमैं,भेद-विज्ञानकाप्रकाश, सत्य-असत्यकाभानहो,मिटेअज्ञानकात्रास। शुद्धचेतनाजागेअब,अंतरकाहोसुधार, तेरीवाणीसेमिले,जीवनकोआधार॥ पुष्पचढ़ाऊँप्रेमसे,हृदयकीयहपुकार, भावोंकीसुगंधसे,महकेसारासंसार। प्रेमहीपूजासच्चीहै,प्रेमहीतेराद्वार, तेरेचरणोंमेंमिले,जीवनकासार॥ नैवेद्यअर्पितकरूँ,तुझकोहीसमर्पण, जोकुछपायाहैप्रभु,तुझकोहीअर्पण। तेरीकृपासेमिलासब,हेपतित-पावन, सेवामेंहीसुखमिले,धन्यहोयहजीवन॥ दीपजलाऊँज्ञानका,मिटेअज्ञानअंधेरा, तेरीकृपासेजागे,अंतरकासवेरा। ज्ञान-ज्योतिजलतीरहे,हरपलहरबार, तेरेमार्गपरचलूँ,होजीवनकाउद्धार॥ धूपचढ़ाऊँभावसे,सद्गुणकीमहक, जैसेसुगंधफैलती,वैसेगुणचमक। करुणा,दया,क्षमाभरदे,ऐसाहोव्यवहार, तेरीभक्तिमेंढलेजीवन,होभव-पार॥ फलअर्पितकरूँ,प्रभुकृपाबरसाए, सार्थकहोयहजीवन,मिटेजन्मकाजाल। तेरेचरणोंमेंमिले,कर्मोंकाविश्राम, फलवानहोआराधना,पूर्णहोंसबकाम॥ अष्टद्रव्यकीयहपूजा,भावोंकीपहचान, समर्पणसेफलतकका,सुंदरयहविधान। हेजिनवर!कृपाकरो,रहेअटलयहप्रीति, प्रभुचरणोंमें“राहत”,बसतीरहेभक्ति॥ ”राहतटीकमगढ़”
कृत्रिम बुद्धिमत्ता: सुविधा का वरदान या मूल्यों का संकट
मानव सभ्यता के विकास का इतिहास यदि देखा जाए तो यह स्पष्ट होता है कि हर नई तकनीक अपने साथ संभावनाओं और संकटों का एक द्वंद्व लेकर आती है। आज का समय भी इसी द्वंद्व से गुजर रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के रूप में विकसित हो रही नवीन तकनीक ने जीवन को सरल, तीव्र और ... Read more
ललित सुरजन की कलम से जेम्स बॉन्ड की राजनीति
1962 में बनी पहली फिल्म का निर्माण उस समय हुआ था जब शीतयुद्ध अपनी चरमसीमा पर था।
हंसा मेहता ने महिलाओं को 'मानव' का दर्जा दिलाया
केंद्र सरकार ने साल 2023 में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने के लिए 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' कानून बनाया था।
राहुल ने मोदी का जादू खत्म किया
राहुल ने बिल्कुल सही कहानी सुनाई थी। जादूगर का जादू खत्म हो गया और जादूगर भी खत्म हो गया।
देश में अब एक बार फिर सच को नकारने की कोशिश और झूठ को बढ़ावा देने की राजनीति शुरु हो गई है। शनिवार का प्रधानमंत्री का राष्ट्र के नाम संबोधन ऐसी ही एक कोशिश थी।
बाबू गोपालचंद्र बड़े नेता थे, क्योंकि उन्होंने लोगों को समझाया था और लोग समझ भी गए थे कि अगर वे स्वतंत्रता-संग्राम में दो बार जेल - 'ए क्लास' में - न जाते, तो भारत आजाद होता ही नहीं।
अक्षय तृतीया पर्व है लोक से लोकोत्तर की दिव्य यात्रा
अक्षय तृतीया- 19 अप्रैल, 2026 अक्षय तृतीया महापर्व का न केवल सनातन परम्परा में बल्कि जैन परम्परा में विशेष महत्व है। इसका लौकिक और लोकोत्तर-दोनों ही दृष्टियों में महत्व है। अक्षय शब्द का अर्थ है कभी न खत्म होने वाला। संस्कृत में, अक्षय शब्द का अर्थ है ‘समृद्धि, आशा, खुशी, सफलता’, जबकि तृतीया का अर्थ ... Read more
मांगलिक कार्यो को आरंभ करने का अबूझ मुहूर्त है -अक्षय तृतीया
परशुराम जयन्ती भी मनायी जाती है धूमधाम से ऐसा दिन जिसका सभी बेसर्बी से इंतजार करते है वह है – अक्षय तृतीया का दिन। यही ऐसा अबूझ मुहूर्त है जिसमें हर सामान्य नागरिक अपने शुभ कार्य निपटाना चाहता है। इस दिन से ब्याह-परिणय करने का आरम्भ हो जाता है। बड़े-वृद्ध अपने पुत्र-पुत्रियों के लगन का ... Read more
दोहरा तेल संकट और कमजोर भारतीय रुपया
भरतीय रिज़र्व बैंक के मार्च 2026 के द्विमासिक पारिवारिक मुद्रास्फीति अनुमान सर्वेक्षण के अनुसार अनुमानित मुद्रास्फीति 7.2 प्रतिशत है।
मध्यप्रदेश में आदिवासियों के बीच पौष्टिक भोजन की वापसी की पहल की जा रही है। इस पहल से विशेष तौर पर महिलाओं और बच्चों को जोड़ा जा रहा है।
‘वात्सल्य पीठ’: करुणा, साधना और आत्मोन्नति का दिव्य तीर्थ
दिल्ली जैसे महानगर की आपाधापी, भागदौड़ और संवेदनहीनता के बीच यदि कोई ऐसा स्थान निर्मित हो, जहाँ पहुंचते ही मन शांत हो जाए, आत्मा को विश्राम मिले और जीवन को एक नई दिशा का बोध हो, तो निश्चय ही वह स्थान साधारण नहीं, बल्कि दिव्यता का स्पंदित केन्द्र होता है। ‘वात्सल्य पीठ’ ऐसा ही एक ... Read more
केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने बुधवार को नई दिल्ली में ब्रिक्स स्वास्थ्य कार्य समूह (एचडब्ल्यूजी) की पहली बैठक 2026 की मेजबानी की।
हाइड्रोथेरेपी: पानी से उपचार का बेहतरीन तरीका, माइग्रेन से जोड़ों के दर्द तक में कारगर
'जल ही जीवन है...' ये तो हम सब जानते हैं, लेकिन जल से कई शारीरिक व मानसिक रोगों का इलाज भी संभव है, क्या ये आप जानते हैं? पानी से उपचार का प्राकृतिक और प्रभावी तरीका है हाइड्रोथेरेपी या जल चिकित्सा।
पुराना तकिया बन सकता है गर्दन और सिर दर्द की बड़ी वजह, बढ़ा सकता है सांस की परेशानी
हम अक्सर अच्छी नींद के लिए बिस्तर, गद्दा, या कमरे के माहौल पर ध्यान देते हैं, लेकिन एक जरूरी चीज को नजरअंदाज कर देते हैं
50 वैज्ञानिकों ने ड्रग-रेसिस्टेंट फंगस से लड़ने के पांच तरीके बताए
दुनियाभर में फंगल संक्रमणों का खतरा अब और गंभीर होता जा रहा है, क्योंकि कई प्रकार के फंगस दवाओं के प्रति तेजी से प्रतिरोधक (रेजिस्टेंट) बनते जा रहे हैं
चेहरे के अनचाहे बालों से छुटकारा पाना आसान, इन घरेलू उपायों से पाएं साफ रंगत
खूबसूरत और साफ त्वचा पाने की चाह लगभग हर किसी की होती है, खासकर महिलाएं अपनी त्वचा को लेकर काफी सजग रहती हैं
गेहूं की रोटी में मिलाएं ये चीजें, शरीर को मिलेगा भरपूर प्रोटीन
भारतीय रसोई में रोटी सिर्फ एक खाना नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा है, लेकिन सिर्फ गेहूं की रोटी शरीर की सभी जरूरतों को पूरा नहीं कर पाती, खासकर जब बात प्रोटीन की आती है तो गेहूं की रोटी इस जरूरत को पूरा करने में थोड़ी पीछे रह जाती है।
18 अप्रैल का पंचांग : बैशाख शुक्ल की प्रतिपदा तिथि, नोट कर लें शुभ-अशुभ समय
सनातन धर्म में पंचांग का बेहद महत्व है। दिन की शुरुआत से लेकर शुभ-अशुभ समय का निर्धारण भी इसके पांच अंगों (करण, योग, नक्षत्र, तिथि और वार) की आधार पर होता है
ललित सुरजन की कलम से- प्रधानमंत्री की सही लेकिन अधूरी पहल
राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री आदि की गाड़ी में लालबत्ती रहे न रहे, इससे क्या फर्क पड़ता है? वे जब भी सडक़ पर निकलेंगे उनके लिए पहले से यातायात रोक दिया जाता है
बहुत तेज़ी से बढ़ रही हैं कीमतें और मुद्रास्फीति
भू-राजनीतिक तनाव और कमज़ोर भारतीय रुपये के कारण देश में सभी वस्तुओं और परिवहन की लागत में काफ़ी बढ़ोतरी देखी जा रही है। रोज़मर्रा की ज़रूरी चीज़ों की खुदरा कीमतें तेज़ी से बढ़ रही हैं।
योगीजी, घर सुधारिए नक्सलवाद चला जाएगा
एक-दो जगह पुलिस से हिंसक झड़प भी हुई और सरकार ने तुरंत मजदूरों से बातचीत के लिए एक उच्च स्तरीय कमेटी बना दी।
वेदांता हादसा, वही पुराने सवाल
छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले में वेदांता पावर प्लांट में हुए बड़े हादसे ने बिहार से बंगाल तक कई परिवारों पर बड़ा दुख बरपाया है।
यूपी में पांच साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म की घटना में कोई सांप्रदायिक एंगल नहीं है
कुशीनगर पुलिस ने इस संबंध में बताया कि बच्ची के साथ दुष्कर्म करने वाले वास्तविक आरोपी की गिरफ्तारी हो गई है, जिसका नाम सुरेंद्र सिंह है.
गर्मियों में खतरनाक डायबिटीज को लेकर लापरवाही, संतुलित आहार और सही कैलोरी काउंट से बनेगी बात
गर्मियों का मौसम शुरू होते ही तापमान के साथ-साथ डायबिटीज की समस्या भी बढ़ जाती है। देश में डायबिटीज के मरीज बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। ऐसे में गर्मी में लापरवाही से यह और खतरनाक हो सकती है
एलोवेरा-हल्दी: सस्ते और प्राकृतिक तरीके से पाएं चमकदार त्वचा, दाग-धब्बे होंगे दूर
गर्मियों में बढ़ते तापमान और प्रदूषण से चेहरे पर दाग-धब्बे, मुंहासे और फीकी त्वचा की समस्या आम हो गई है। महंगे ब्यूटी प्रोडक्ट्स और पार्लर ट्रीटमेंट पर हजारों रुपए खर्च करने के बावजूद स्थायी निखार नहीं मिल पाता
भारत में नोएडा से औद्योगिक अशांति, दिल्ली-एनसीआर के कई राज्यों में फैली
नोएडा के फेज़-2 में प्रदर्शन हिंसक हो गया, और एक पुलिस वैन और दूसरी गाड़ियों में तोड़फोड़ की गई,
यह वह मगध है, जिसे तुम मेरी तरह गंवा चुके हो!
पच्चीस से तीस फिर से नीतीश, यही नारा जदयू के कार्यकर्ताओं ने पिछले साल के बिहार चुनाव में बुलंद किया था।
16 अप्रैल को मासिक शिवरात्रि, अभिजित के साथ विजय मुहूर्त, नोट कर लें राहुकाल
देवाधिदेव महादेव व माता पार्वती को समर्पित मासिक शिवरात्रि गुरुवार यानी 16 अप्रैल को मनाई जाएगी। यह दिन भगवान शिव और माता पार्वती को विशेष रूप से प्रिय माना जाता है
फरीदाबाद में रेप के बाद महिला को कार से फेंकने के दावे से ब्राजील का वीडियो वायरल
बूम ने पाया कि वायरल वीडियो ब्राजील के Macap का है. वीडियो में कैद यह घटना 28 मार्च 2026 की है, जहां एक महिला चलती गाड़ी से कूद गई थी.
BJP पर टिप्पणी करते सम्राट चौधरी का 12 साल पुराना वीडियो भ्रामक दावे से वायरल
बूम ने पाया कि बिहार के नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का यह वीडियो साल 2014 का है. उस समय उन्होंने राजद से अलग होकर जदयू को समर्थन देने की बात कही थी.
देकर अपनी जवानी के बहुमूल्य वो सारे पल खरीदीं है हमने थोड़ी सी सरकार की पेंशन, वृद्ध अवस्था में अपने चाहे साथ दे या ना दे हमें भूखें रखते नहीं कभी, हमारी यह पेंशन। दुनियां चाहे जो भी कहे पेंशन के बारे में पर पेंशन धारकों के लिए सर का ताज है पेंशन, औरों के ... Read more
सूंघने की क्षमता में गिरावट भी अल्जाइमर्स का शुरुआती संकेत
अल्जाइमर एक ऐसी अवस्था है जिसमें ढलती उम्र के साथ याददाश्त कमजोर होती चली जाती है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, अल्जाइमर डिमेंशिया (मस्तिष्क क्षीणता) का एक प्रकार है
ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित करने में मददगार अर्जुन की छाल
आजकल बढ़ते हृदय रोग और सांस संबंधी समस्याओं के बीच आयुर्वेद में उपयोग होने वाला अर्जुन एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक औषधि माना जाता है
आंबेडकर के लिए राष्ट्र का भाग्य सर्वोपरि था
आंबेडकर को संविधान निर्माता के तौर पर पहचान मिली है, लेकिन वह प्लानर और अर्थशास्त्री भी थे।
2029 को लेकर अभी से डरे हुए हैं मोदी
कांग्रेस की ओर से पार्टी के संचार विभाग के प्रभारी महासचिव जयराम रमेश ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके परिसीमन के प्रस्ताव पर सवाल उठाया।
मजदूरों के गुस्से का पाकिस्तान और नक्सली लिंक
मई दिवस या अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस आने में अभी एक पखवाड़े का वक्त बचा है, लेकिन जिन वजहों से 140 साल पहले मजदूरों ने अपनी आवाज़ बुलंद की थी, वो वजहें अब कई गुना सघनता के साथ समाज में मौजूद हैं।
आज से ही सब छोड़ दो यह गेंहू की रोटिया खाना, नही तो यारो पहुंचा देगा यह सभी को सफाखाना। खा खाकर जिससे सब लोग आज बढ़ा रहे है तोंद, जीना है तो गेंहू छोड़ दो सब मानो हमारा कहना।। मोटापा-डायबिटीज बढ़ रहा है इससे हृदय के रोग, आज मिक्स अनाज खाकर रहो आप सब ... Read more
मेरे लफ़्ज़ों की आख़िरी बात तू
मेरेलफ़्ज़ोंकीआख़िरीबाततू, मेरीख़ामोशीकाहरराज़तू, तुझसेहीचलतीहैयेधड़कन, मेरेहोनेकाएहसासतू तेरेबिनासबफीकासालगे, जैसेकोईसपनाअधूरालगे, तूजोमिलेतोरंगभरजाएँ, वरनाहरपलबसधुंधलालगे तूपासआएतोदिलयेकहे, अबऔरकुछभीज़रूरीनारहे मेरेलफ़्ज़ोंकीआख़िरीबाततू, मेरीख़ामोशीकाहरराज़तू, तुझसेहीजुड़ीमेरीहरकहानी, मेरेजीनेकीहरवजहतू तेरेख्यालोंमेंबहतारहूँ, तेरेसाथहीठहरतारहूँ, तूजोमिलेतोसबमिलजाए, तेरेबिनाक्योंजीतारहूँ जबतूसाथहैतोकमीक्याहै, तेरेबिनाहरखुशीअधूरीसीहै मेरेलफ़्ज़ोंकीआख़िरीबाततू, मेरीरूहकागहराराज़तू, तुझमेंहीसिमटामेराहरसफर, मेरीदुनिया,मेराआजतू “राहतटीकमगढ़”
नोएडा: कर्मचारी प्रदर्शन से जोड़कर मध्यप्रदेश का वीडियो वायरल
बूम ने पाया कि पुलिसकर्मियों द्वारा युवक को लात मारने का यह वीडियो मध्यप्रदेश के शहडोल जिले का है. इसका नोएडा प्रोटेस्ट से कोई संबंध नहीं है.
सतुआ संक्रांति: देवताओं को प्रिय तो दान से तृप्त होते हैं पूर्वज, जानें सत्तू व घड़े के दान का महत्व
नई दिल्ली, 14 अप्रैल (आईएएनएस)। आज देश भर में सतुआ संक्रांति या सतुआन पर्व मनाया जा रहा है। इस दिन घड़ा, पंखा, सत्तू और ठंडे फलों का दान करने का विधान है। मान्यता है कि ये दान करने से ढेरों पुण्य प्राप्त होते हैं।
हेल्थ टिप्स : गर्मियों में बढ़ जाता है 'फूड पॉइजनिंग' का मामला, ऐसे करें बचाव
गर्मी के मौसम में फूड पॉइजनिंग के मामले बढ़ते दिखते हैं। ऐसे में हेल्थ एक्सपर्ट लोगों को चेतावनी देने के साथ इससे बचाव के उपाय भी बताते हैं
ललित सुरजन की कलम से -सेंसरशिप: प्लेटो से अब तक
यह कहना एक स्थापित सत्य को दोहराना ही होगा कि जनतंत्र की पहिली शर्त अभिव्यक्ति की आजादी है।
क्या चंबल से कुछ सीखेगी दुनिया?
आज जब दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध और संघर्ष की आग भड़कती दिखाई दे रही है—चाहे वह देशों के बीच चल रहे सैन्य टकराव हों या समाजों के भीतर गहराते वैचारिक विभाजन—ऐसे समय में शांति की बातें अक्सर आदर्शवादी लगती हैं,
हिन्दू धर्म त्यागकर बौद्ध धर्म अंगीकार कर मैं बहुत प्रसन्न हूं : डॉ अम्बेडकर
'ईसाई धर्म बुनियादी रूप से गरीबों का धर्म है। इसी तरह बौद्ध धर्म महारों का धर्म है। ब्राह्मण लोग गौतम बुद्ध को 'वो गौतम' कहकर पुकारते थे।
अद्भूत जीवटता की मिसाल आशा भोंसले
फिल्म और संगीत जगत की महान गायिका आशा भोंसले ने 92 साल की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
सूरों की आशा बनकर गूंजती रहेगी आशा भोसले
भारतीय संगीत का आकाश आज कुछ अधिक मौन, कुछ अधिक रिक्त प्रतीत होता है। स्वर की वह चंचल चिड़िया, जन-जन को चमत्कृत करने वाली आवाज जिसने दशकों तक हर हृदय में मधुरता के बीज बोए, आज भले ही भौतिक रूप से हमारे बीच न हो, पर उसकी गूंज अनंत में विलीन होकर भी अमर बनी ... Read more
सुपारी: भारतीय संस्कृति की अमिट पहचान- ज्योतिषाचार्य वेद प्रकाश पांडे
भारत में जब भी त्योहारों और शादियों का मौसम आता है, तो पूरा देश रंगों, संगीत और परंपराओं से सराबोर हो जाता है। इन उल्लासपूर्ण आयोजनों के बीच एक छोटी-सी चीज़ अक्सर अनदेखी रह जाती है –सुपारी। यह साधारण-सा बीज वास्तव में भारतीय संस्कृति का एक गहरा प्रतीक है, जो सदियों से हमारे धार्मिक और ... Read more
समानता और न्याय के अग्रदूत: डॉ. अंबेडकर की विचारधारा आज भी प्रासंगिक
14अप्रैल डॉ.भीमराव अंबेडकर जयंती विशेष लेख 14अप्रैल का दिन भारतीय इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसी दिनभीमराव अंबेडकरका जन्म हुआ था,जिन्हें पूरे देश में बाबा साहेब के नाम से जाना जाता है। वे भारतीय संविधान के निर्माता,महान समाज सुधारक,न्यायविद,अर्थशास्त्री और दूरदर्शी नेता थे। उनका जीवन संघर्ष,शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन की प्रेरणादायक गाथा है। डॉ. अंबेडकर ... Read more
प्रतिभा के पुंज —डॉ. भीमराव अंबेडकर
डॉ. अंबेडकर जयंती पर विशेष सन 1930 में लंदन में आयोजित गोलमेज कॉन्फ्रेंस में शेर की तरह दहाड़ते हुए एक युवक ने कहा ‘‘अंग्रेजों पहले तुम भारत छोड़ो‘‘। युवक के मन में देश को गुलामी की जंजीरों से मुक्त करवाने एवं वहां रह रहे दलितों के जीवन स्तर को सुधार कर सभी लोगों को समान ... Read more
ललित सुरजन की कलम से युद्ध नहीं, शांति चाहिए
जब एक तरफ सिर्फ एक सैनिक की गिरफ्तारी से उपजे भय और रिहाई की घोषणा से मिली राहत है, तब दूसरी तरफ आक्रामक मुद्रा अपनाकर हम क्या हासिल करना चाहते हैं?
नेहरू से मनमोहन सिंह तक एक ही विदेश नीति हम नहीं देश बड़ा!
शकील अख्तर बड़े नेताओं का यह आत्मविश्वास होता है। और वे यह मानते हैं नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक कि बड़ा होना खुद से नहीं है महान भारत के बड़े देश होने से है। यहां तो खुद को बड़ा मानते हैं। इसीलिए स्वकेन्द्रित विदेश नीति चला रहे थे। उसी का परिणाम है पाकिस्तान को बेवजह तवज्जो मिल जाना। भारत में ताकत है फिर 'पुनर्मुषको भव' करने की। समय आएगा। फिलहाल बातचीत खत्म होने से कौन खुश है? इजराइल! और सऊदी अरब एवं इसके साथ के कुछ अरब देश। देखिए कितना मजेदार इक्वेश्न बन रहा है। एक तरफ इजराइल और अरब देशों के बीच कई जंग हो चुकी हैं। दोनों एक दूसरे की शक्ल भी देखना नहीं चाहते। मगर दोनों ईरान को बरबाद होता देखना चाहते हैं। अमेरिका पर दोनों का दबाव है कि ईरान को खत्म कर दो। लेकिन ईरान ने बता दिया कि यह ख्याली पुलाव हैं। पिछले डेढ़ महीने से वह जिस तरह अमेरिका और इजराइल से लड़ा युद्ध इतिहास में वह बहादुरी की नई मिसाल है। यह कुछ नेपोलियन बोनापार्ट की याद दिलाता है कि कहां है पहाड़ (आल्पस)? वैसे ही ईरान की बहादुर जनता और नेतृत्व कह रहा है कि कौन है अमेरिका और इजराइल? जनता जब शहादत पर उतर आए तो कोई उसे हरा नहीं सकता। 'सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है!' भारत की आजादी के लिए जनता ऐसे ही खड़ी हुई थी। और वह अंग्रेज सरकार जिसके राज में सूरज नहीं डूबता था उसे भारत छोड़कर भागना पड़ा। और उसके बाद हर जगह से ऐसी ही दुर्दशा हुई। तत्काल बाद ही उसे स्वेज नहर पर दावा छोड़ना पड़ा। और वह मिस्र की नहर हो गई। उस समय इजराइल ब्रिटेन के साथ आया था। आज के होर्मुज स्ट्रेट (जलडमरूमध्य) की तरह उस समय स्वेज नहर तेल के जहाज लाने का मुख्य जलमार्ग था। 1956 की बात है नेहरू थे। अन्तरराष्ट्रीय नेता। उनके प्रयासों से वह संकट हल हुआ था। लेकिन इस समय हम नेहरू के अन्तरराष्ट्रीय रुतबे की बात करना नहीं चाह रहे। भक्तों, गोदी मीडिया और भाजपा के नेताओं को बहुत दुख होगा। नेहरू को ही तो छोटा बताने के लिए यह सब रात-दिन काम कर रहे हैं। बाकी तो विश्व में हमारी स्थिति नगण्य बना ही दी है। बहरहाल बात हो रही थी कि जनता की बहादुरी की। तो हम बता रहे थे कि एक बार बहादुर जनता से मात खाने के बाद बड़ी से बड़ी विश्व शक्ति के भी हौसले टूट जाते हैं। भारत की जनता से हार कर ग्रेट ब्रिटेन इजराइल मिस्र से भी हारे थे। स्वेज नहर से ब्रिटेन के जहाज को टोल टैक्स देकर निकलना पड़ा था। हार का असर यही होता है। ग्रेट ब्रिटेन भारत की जनता से हारने के बाद मिस्र से भी हारा। ईरान की जनता इस बात को बखूबी समझती है। इसलिए इतनी लंबी लड़ाई, इतने नुकसान के बाद भी वह अपने नेतृत्व से नहीं कह रही कि समझौता करो। निकलो इस से। नहीं वह जानती है कि आज अमेरिका इजराइल की शर्तों पर समझौता उसे हमेशा के लिए वैसा ही गुलाम बना देगा जैसा बाकी अरब देश हैं। हम चाह नहीं रहे नेहरू का लिखना। दोस्तों को तकलीफ पहुंचती है। मगर क्या करें यह नेहरू हैं ही ऐसी चीज की सिर्फ भारत नहीं दुनिया के किसी भी उलझे हुए मुद्दे पर उनकी भूमिका याद आ जाती है। होना तो यह चाहिए था कि देश के सम्मान का ख्याल करके वर्तमान सरकार और उसके समर्थक नेहरू के महान रोल को और दुनिया के सामने पेश करते। लेकिन यहां कहानी उलटी है। नेहरू का कद छोटा करके समझते हैं कि उनका कद बढ़ा हो गया। काश ऐसा हो सकता! तो उनका कद बड़ा करने के लिए हम सब नेहरू के पीछे पड़ जाते। मगर दूसरे की लकीर छोटी करने से आप की लकीर की लंबाई बढ़ती नहीं है। वह उतनी ही रहती है। तो उस समय मिस्र में नेहरू के दोस्त अब्दुल नासिर राष्ट्रपति थे। उनके हौसले ने केवल मिस्र को नहीं सारे अरब देशों को एक बड़ी ताकत बना दिया था। मगर न नेहरू रहे, न नासिर और न ही मिस्र सहित वे अरब देश। आज अमेरिका के गुलाम बन गए हैं। इजराइल उन्हें मारता है। ईरान इजराइल से उन्हें बचाता है। मगर वे अपना नंबर एक दुश्मन ईरान को मानते हैं। और अमेरिका के थ्रू इजराइल की मदद करते हैं। सऊदी अरब युद्धविराम के खिलाफ था। वहां के शासक अमेरिका से डायरेक्ट और इजराइल से उसके माध्यम से कह रहे थे कि मिटा दो ईरान को। खतम कर दो। उसी के बाद प्रेसिडेन्ट ट्रंप ने यह राक्षसी धमकी दी थी कि ईरान की सभ्यता खतम कर देंगे। उसे पाषाण युग में पहुंचा देंगे। मगर फिर भी ईरान की जनता नहीं डरी, नहीं घबराई। अभी इस्लामाबाद में हुई बातचीत विफल है या दोनों पक्षों ने थोड़ा समय और लिया है कोई नहीं जानता। मगर युद्ध के खिलाफ और शांति के पक्षधर यह समझते हैं कि बातचीत फिर होगी। युद्ध वापस शुरू नहीं होना ही बातचीत वापस होने के संकेत हैं। अमेरिका बहुत बुरी तरह फंस गया था। भारी सैनिक, लड़ाकू जहाजों और आर्थिक नुकसान तो हो ही रहा रहा था मगर सबसे बड़ी बात कि उसकी छवि एक युद्ध उन्मादी देश की बन गई थी। सामान्य शब्दों में कटखने कुत्ते, मरखने सांड की। उससे निकलना उसके लिए बहुत जरूरी था। इसलिए वह बातचीत की टेबल पर बैठा। ऐसे में ही गांधी का संदेश कारगर होता है। मगर कोई देने वाला नहीं था। जो हैं वे रात-दिन गांधी की छवि को कलंकित करते रहते हैं। नहीं तो क्या अमेरिका और ईरान बातचीत के लिए पाकिस्तान जाते? 12 साल पहले कोई सोच भी नहीं सकता था। मनमोहन सिंह की सरकार ने उसे एक कोने में लगा दिया था। मगर 2014 में अपने शपथ ग्रहण समारोह में वहां के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को बुलाकर उसका अन्तरराष्ट्रीय अकेलापन खत्म करवा दिया। और फिर जब लगा कि खाली अकेलापन खतम करवाने से काम नहीं चलेगा तो अचानक लाहौर जा पहुंचे। पाकिस्तान को पूरी मान्यता दिलवा दी। मनमोहन सिंह दस साल में एक बार भी नहीं गए थे। उनकी जन्मभूमि था। निमंत्रण था। ऐसे ही निमंत्रण पर आडवानी गए थे। जिन्ना को सर्टिफिकेट दे आए थे। मोदी ने नवाज शरीफ को दिया। नतीजा बातचीत पाकिस्तान में हुई। अब उसके सफल न होने से भक्त और गोदी मीडिया खुश हैं। मतलब अगर सफल हो जाती तो पूरी दुनिया खुश होती और ये दुखी! बहुत छोटे-छोटे दु:ख-सुख पाल रखे हैं। बातचीत पाकिस्तान में होने से कोई उसका रुतबा नहीं बढ़ गया। हुआ केवल यह कि हमारी व्यक्ति केन्द्रित अन्तरराष्ट्रीय नीति से हमारा वजन कम हो गया। मैं दोस्त, और वह मेरा दोस्त से विदेश नीति नहीं चलती। विदेश नीति में धमक आती है आंख से आंख मिलाकर बात करने से। जैसे इन्दिरा गांधी करती थीं। उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन को चुनौती देते हुए पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए। और फिर भुट्टो को भारत शिमला बुलाकर समझौता किया। नरसिम्हा राव ने 1994 में संसद के दोनों सदनों में प्रस्ताव पास करवा के दुनिया को यह संदेश दिया कि जम्मू-कश्मीर तो है ही पाक अधिकृत कश्मीर भी हमारा है। दुनिया भारत का लोहा मानती थी। क्या मजाल कि कोई कह दे कि मैं भारत के प्रधानमंत्री का राजनीतिक कैरियर खतम कर सकता हूं! भारत के प्रधानमंत्री मुझसे सर सर करके बात करते हैं। सर करके बात करने में कोई प्राब्लम नहीं है। समकक्ष लोग करते हैं। समस्या है उसे इस तरह बताने की जिससे अपना रुतबा ऊंचा और दूसरे का नीचा दिखाई दे। सर कहने के आदी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष पूछते थे हम आनरेबल भारत की प्राइमिनिस्टर इन्दिरा गांधी जी को क्या कह कर संबोधित कर सकते हैं। जब विदेश विभाग यह सवाल इन्दिरा जी के सामने लाता था तो वे हंस कर कहती थीं कि कह दो कुछ भी कहें कोई फर्क नहीं पड़ता। बड़े नेताओं का यह आत्मविश्वास होता है। और वे यह मानते हैं नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक कि बड़ा होना खुद से नहीं है महान भारत के बड़े देश होने से है। यहां तो खुद को बड़ा मानते हैं। इसीलिए स्वकेन्द्रित विदेश नीति चला रहे थे। उसी का परिणाम है पाकिस्तान को बेवजह तवज्जो मिल जाना। भारत में ताकत है फिर 'पुनर्मुषको भवÓ करने की। समय आएगा। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)
इस्लामाबाद वार्ता से निकला संदेश
अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध को खत्म करने के लिए पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुई इस्लामाबाद वार्ता बेनतीजा खत्म हो गई।
स्मृति शेषः आशा जी की मधुर और सुरमयी आवाज सदा दिलों में अमर रहेगी
आशा भोंसले जी का नाम भारतीय संगीत इतिहास में अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने अपने करियर में आठ दशकों से भी अधिक समय तक संगीत जगत में अमूल्य योगदान दिया है और लगभग12हजार से अधिक गीतों को अपनी मधुर आवाज से सजाया है। आशा भोंसले जी,जो भारत की महानतम और दिग्गज गायिकाओं ... Read more
कूनो नेशनल पार्क में खुशखबरी: भारतीय मूल की चीता ‘गामिनी’ ने 4 शावकों को दिया जन्म
मध्य प्रदेश में श्योपुर जिले के कूनो नेशनल पार्क से एक बार फिर बड़ी खुशखबरी सामने आई है। यहां 25 माह की भारतीय मूल की चीता गामिनी ने चार शावकों को शनिवार को जन्म दिया है
पार्किंसन एक ऐसी बीमारी है जो धीरे-धीरे शरीर की गतिविधियों को प्रभावित करती है, और समय रहते लक्षणों को पहचानना बहुत जरूरी है
सुबह के नाश्ते में कहीं आप भी तो नहीं कर रहे ये गलती? ऐसे करें बचाव
सुबह का नाश्ता दिन का सबसे महत्वपूर्ण भोजन है। यह न सिर्फ शरीर को ऊर्जा देता है, बल्कि पूरे दिन के स्वास्थ्य और एक्टिविटी को भी प्रभावित करता है
दिल्ली की 'जहरीली हवा' पर कांग्रेस नेता अजय माकन की चेतावनी
अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के कोषाध्यक्ष और दिल्ली विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष अजय माकन ने राष्ट्रीय राजधानी में बढ़ते वायु प्रदूषण को लेकर गंभीर चिंता जताते हुए इसे “नीतिगत विफलता” करार दिया है
डिजिटल जनगणना 2027 : भारत की प्रशासनिक क्षमता का नया अध्याय
इस जनगणना के सामाजिक प्रभावों के साथ इसके राजनीतिक परिणाम भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इसके बाद परिसीमन के तहत जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं पुनर्निर्धारित होंगी,
— बाबा मायाराम नर्मदा उसकी कई सहायक नदियों के सूखने के कारण वह बहुत कमजोर हो गई है। लेकिन हम इस सबसे नहीं चेत रहे हैं और पानी का बेहिसाब इस्तेमाल से पानी के स्रोतों को ही खत्म कर रहे हैं, जो शायद फिर पुनर्जीवित न हो सकें। अगर हमें बड़ी नदियों को बचाना है तो छोटी नदियों पर ध्यान देना होगा। छोटी नदियों का संरक्षण जरूरी है। अगर हम इन पर छोटे-छोटे स्टापडेम बनाकर जल संग्रह करें तो नदियां भी बचेंगी और खेती में भी सुधार संभव है। गर्मी शुरू होते ही पानी की किल्लत शुरू हो जाती है। भोजन, पानी और हवा हमारी बुनियादी जरूरतें हैं। इनके बिना जीवन असंभव है। पानी के मामले में हमारी स्थिति बहुत ही अच्छी थी। हमारे अपने जीवन में ही कुएं, तालाब, बावड़ी और नदियां थीं, जो सैकड़ों सालों से सदानीरा थीं। लेकिन ऐसा क्या हुआ कि सब के सब सूखते चले रहे हैं। आज इसी मुद्दे पर बात करना चाहूंगा, जिससे पानी जैसे जरूरी संसाधन के बारे में समझें और इसे बचाने के लिए काम करें। आमतौर जब कभी नदियों पर बात होती है तो ज्यादातर वह बड़ी नदियों पर केंद्रित होती है। लेकिन इन सदानीरा नदियों का पेट भरने वाली छोटी नदियों पर हमारा ध्यान नहीं जाता, जो आज अभूतपूर्व संकट से गुजर रही हैं। अगर हम नजर डालें तो पाएंगे कि कई छोटी-बड़ी नदियां या तो सूख चुकी हैं या फिर बरसाती नाले बनकर रह गई हैं। गांव-समाज के बीच से तालाब, कुएं और बावड़ी जैसे परंपरागत पानी के स्रोत तो पहले से ही खत्म हो गए हैं। अब इन छोटी नदियों पर आए संकट से बड़ी नदियां तो प्रभावित हो ही रही हैं। जनजीवन के साथ पशु, पक्षी और वन्य- जीवों को भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। देश-दुनिया में नदियों के किनारे ही सभ्यताएं पल्लवित-पुष्पित हुई है। जहां जल है, वहां जीवन है। लेकिन आज नदियां धीरे-धीरे दम तोड़ रही हैं। नदियों का प्रवाह अवरूद्ध हो रहा है। वर्षों पुरानी नदी संस्कृति खत्म रही है। उनमें पानी नहीं हैं,पानी को स्पंज की तरह सोखकर रखने वाली रेत नहीं है। मध्यप्रदेश के सतपुड़ा अंचल की बारहमासी सदानीरा नदियां या तो सूख गई है या बारिश में ही उनकी जलधारा प्रवाहित होती हैं, फिर टूट जाती है। उनके किनारे लगे हरे-भरे पेड़ और उन पर रहने वाले पक्षी भी अब नजर नहीं आते। यानी पानी बिना सब सून। मध्यप्रदेश में सतपुड़ा पहाड़ और जंगल कई छोटे-बड़े नदी-नालों का उद्गम स्थल है। पहाड़ और जंगलों में पेड़ पानी को जड़ों में संचित करके रखते हैं और धीरे-धीरे वह पानी रिसकर नदियों में जलधाराओं के रूप में प्रवाहित होता है। जंगल कम हो रहे हैं। कुछ वर्षों से बारिश कम हो रही है या बार-बार सूखा पड़ रहा है। सतपुड़ा की दुधी, मछवासा, आंजन, ओल, पलकमती और कोरनी जैसी नदियां धीरे-धीरे दम तोड़ रही हैं। देनवा में अभी पानी नजर आता है लेकिन उसमें भी साल दर साल पानी कम होता जा रहा है। तवा और देनवा में भी पानी कम है। अमरकंटक से निकलकर इस इलाके से गुजरने वाली सबसे बड़ी नर्मदा भी इसी इलाके से गुजरती है। इनमें से ज्यादातर नदियां नर्मदा में मिलती हैं। इनके सूखने से नर्मदा भी प्रभावित हो रही है। अगर हम मध्यप्रदेश के पूर्वी छोर पर नर्मदापुरम और नरसिंहपुर जिले विभक्त करने वाली दुधी नदी की बात करें, तो नदियों के संकट को समझा जा सकता है। यह नदी कुछ वर्ष पहले तक एक बारहमासी सदानीरा नदी थी। दुधी यानी दूध के समान। दुधी नदी के नाम से एक पौराणिक कथा भी जुड़ी हुई है। हनुमान और उनकी माता अंजनी से जुड़ी हुई है। इसका पानी साफ और स्वच्छ। छिंदवाड़ा जिले में महादेव की पहाड़ियों से पतालकोट से दुधी निकलती है और सांडिया से ऊपर सिरसिरी व खैरा नामक स्थान में नर्मदा में आकर मिलती है। यह नर्मदा की सहायक नदी है। पर आज दुधी में एक बूंद भी पानी नहीं ढूंढने से नहीं मिलता। बारिश के दिनों में ही पानी रहता है और अप्रैल-मई माह तक आते-आते पानी की धार टूट जाती है और रेत ही रेत नजर आती है। इन पंक्तियों के लेखक का गांव भी इसी नदी के किनारे है। जहां कभी पानी होने के कारण नदी में जनजीवन की चहल-पहल होती थी, पशु-पक्षी पानी पीते थे। बरौआ- कहार समुदाय के लोग इसकी रेत में डंगरवारी तरबूज-खरबूज की खेती करते थे। धोबी कपड़े धोते थे, मछुआरे मछली पकड़ते थे, केंवट समुदाय के लोग जूट के रेशों से रस्सी बनाते थे। वहां अब सन्नाटा पसरा रहता है। नदी संस्कृति खत्म हो गई है। अब लोग नदी के स्थान पर हैंडपंप और ट्यूबवेल पर आश्रित हो गए हैं, जिनकी अपनी सीमाएं हैं। इसी जिले के पिपरिया कस्बे से गुजरने वाली मछवासा नदी भी सूख चुकी है। सोहागपुर की पलकमती कचरे से पट गई है। इन नदियों में जो पानी दिखता है, वह नदियों का नहीं, शहरों की गंदी नालियों का है। पलकमती से ही पूरे सोहागपुर का निस्तार होता था। सोहागपुर का रंगाई उद्योग और पानी की खेती दूर-दूर तक मशहूर थे। इस नदी के किनारे पान की खेती भी होती थी, अब भी कुछ शेष है। रेल से सफर करते हुए यह पान के बरेजे दिखाई देते हैं। सोहागपुर के दिवंगत शिक्षक ने मुझे बताया था कि पलकमती कभी नदी थी, जो अब नाला दिखाई देती है। यह गहरी थी और इसमें बाढ़ आती थी। मातापुरा का जो क्षेत्र है, वहां से अंग्रेज लोगों का कपड़ा रंगा कर जाता था। बाम्बे, केलकटा सारे बड़े शहरों से रंगाई के काम आते थे। पहले नदी का सहारा था। अब नदी के किनारे हैं तो किस काम के? नदी से न तो पानी मिल रहा है न मिट्टी। रंगाई उद्योग खत्म हो गया है। पान के बरेजे सिमट गए हैं। यहां का बंगला पान फेमस था। यहां की सुराही और मिट्टी के बर्तन का ठेका रेलवे का था। रेलवे स्टेशन पर सुराहियों के ढेर लगे रहते थे। नदियों में पानी कम होने का गहरा असर उन समुदायों पर हो रहा है जिनकी आजीविका सीधे तौर पर नदियों से जुड़ी है। मछली पकड़ने वाले और डंगरवारी (तरबूज-खरबूज की खेती) करने वाले कहार- केंवट समुदाय पूरी तरह इसी पर आश्रित थे। कहार समुदाय के लोग बताते हैं कि नदियों में पानी नहीं रहने से उनकी डंगरवारी की खेती खत्म हो गई है। उनके पास कोई रोजगार नहीं है। यही वे समुदाय हैं, जिन्हें नदियों की प्रकृति व उसकी पारिस्थितिकीय के बारे में अच्छी समझ है। हालांकि नर्मदा उसकी कई सहायक नदियों के सूखने के कारण वह बहुत कमजोर हो गई है। लेकिन हम इस सबसे नहीं चेत रहे हैं और पानी का बेहिसाब इस्तेमाल से पानी के स्रोतों को ही खत्म कर रहे हैं, जो शायद फिर पुनर्जीवित न हो सकें। अगर हमें बड़ी नदियों को बचाना है तो छोटी नदियों पर ध्यान देना होगा। छोटी नदियों का संरक्षण जरूरी है। अगर हम इन पर छोटे-छोटे स्टापडेम बनाकर जल संग्रह करें तो नदियां भी बचेंगी और खेती में भी सुधार संभव है। इस पूरे काम में स्थानीय मछुआरों और उनके परंपरागत ज्ञान और कौशल की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। वे इससे भलीभांति परिचित हैं। क्या हम इस दिशा में आगे बढ़ना चाहेंगे?
बंगाल को बचाने का विकल्प : वाम मोर्चे का घोषणा-पत्र 2026
*केवल वादों की सूची नहीं, बल्कि बंगाल के पुनर्निर्माण का व्यावहारिक खाका है।* – केशव कुमार भट्टड़ कोलकाता। पश्चिम बंगाल के 2026 विधानसभा चुनाव से ठीक पहले वाम-लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष शक्तियों ने “बंगाल को बचाने के लिए” घोषणा-पत्र जारी किया है। यह दस्तावेज़ राज्य में व्याप्त अराजकता, लूट, भ्रष्टाचार और सांप्रदायिक विभाजन की राजनीति का स्पष्ट विकल्प ... Read more
ज्योतिबा फुले जयंती: समानता की अधूरी लड़ाई और हमारी जिम्मेदारी
11 अप्रैल का दिन भारतीय समाज के लिए सिर्फ एक जयंती नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है। यह दिन हमें ज्योतिराव गोविंदराव फुले के उस संघर्ष की याद दिलाता है, जिसने सदियों से जकड़े हुए समाज को सवालों के कटघरे में खड़ा किया। ज्योतिबा फुले ने केवल अन्याय का विरोध नहीं किया, बल्कि एक वैकल्पिक, ... Read more
किशोर आक्रामकता एवं हिंसा पर अंकुश लगाने की पहल हो
भारतीय किशोरों में बढ़ रही हिंसक प्रवृत्ति एवं क्रूर मानसिकता चिन्ताजनक है, नये भारत एवं विकसित भारत के भाल पर यह बदनुमा दाग है। पिछले कुछ समय से किशोरों में बढ़ती हिंसा की प्रवृत्ति निश्चित रूप से डरावनी, मर्मांतक एवं खौफनाक है। चिंता का बड़ा कारण इसलिए भी है क्योंकि जिस उम्र में किशोरों के ... Read more
पाकिस्तान की प्रशंसा करते रवीश कुमार और शिव अरूर के वीडियो डीपफेक हैं
बूम ने पाया कि वीडियो को एआई-जनरेटेड वॉयसओवर का इस्तेमाल करके डिजिटल रूप से एडिट किया गया है.
समानता के संघर्ष का ऐतिहासिक प्रतीक: महाड़ सत्याग्रह
इतिहास में कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जो अपने समय की सीमाओं को लाँघकर शाश्वत चेतना का रूप ले लेती हैं। महाड़ सत्याग्रह भी ऐसी ही एक घटना है, जिसने केवल एक स्थानीय समस्या का समाधान करने का प्रयास नहीं किया, बल्कि भारतीय समाज की गहराइयों में जड़ जमा चुकी असमानताओं को चुनौती देने का ... Read more
धुंधली नजर को न करें नजरअंदाज, खतरनाक हो सकते हैं ये लक्षण, ऐसे करें बचाव
अगर आपको या आपके घर के बुजुर्ग को धुंधला दिखाई देने लगा है या बार-बार चश्मे का नंबर बदलना पड़ रहा है तो इसे कभी भी नजरअंदाज न करें
ललित सुरजन की कलम से चलो, लंगर में चलते हैं
'बहुत बात होती है कि आजादी के पैंसठ साल बाद भी यह नहीं हो सका या वह नहीं हो सका।
अमेरिकी कांग्रेस में ट्रंप पर महाभियोग लगाने की मांग तेज
यह केवल विचारधारा की बात भी नहीं है। यह इस बारे में नहीं है कि कोई प्रशासन की व्यापक नीतियों का समर्थन करता है या विरोध।
ज्ञानेश कुमार को गुस्सा क्यों आता है?
पांच राज्यों में चल रहे विधानसभा चुनावों के बीच केन्द्रीय निर्वाचन आयोग एक बार फिर गलत कारणों से सुर्खियों में आया है। बुधवार को चुनाव आयोग की सोशल मीडिया एक्स पर लिखी एक पोस्ट से सवाल उठने लगे कि क्या एक संवैधानिक संस्था की भाषा और लहजा ऐसा होना चाहिए। दरअसल आयोग के आधिकारिक हैंडल पर लिखा था- चुनाव आयोग की तृणमूल कांग्रेस को दो टूक। पश्चिम बंगाल में इस बार चुनाव भयरहित, हिंसारहित, धमकी रहित, प्रलोभन रहित, छापा रहित, बूथ और सोर्स जामिंग रहित होकर ही रहेंगे। पहले तो यह संदेह हुआ कि यह वाकई चुनाव आयोग ने लिखा है या किसी ने आयोग की छवि खराब करने के लिए इस तरह तृणमूल कांग्रेस का नाम लेकर दो टूक बात कही है। क्योंकि पहले चुनाव से लेकर अब तक कभी ऐसा नहीं हुआ जब चुनाव आयोग ने सीधे किसी दल का नाम लेकर उसके लिए इस भाषा में बयान दिया हो। विपक्ष और आयोग के बीच कई बार रस्साकशी हुई है। बीते कुछ सालों में यह तनाव ज्यादा बढ़ गया है। जिसमें विपक्ष बार-बार चुनाव आयोग पर पक्षपात का आरोप लगाता है और इस बार तो मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ संसद के दोनों सदनों में प्रस्ताव लाने की तैयारी भी विपक्ष ने कर ली थी, जो सफल नहीं हुई। लेकिन इन सबके बावजूद चुनाव आयोग में बैठे लोगों ने किसी एक दल का नाम लेकर ऐसी टिप्पणी नहीं की, जो अब की गई है। इसके बाद अब यही बचता है कि चुनाव आयोग विपक्ष के नेताओं का नाम लेकर उन्हें जवाब देने लगे। क्योंकि निष्पक्षता नाम की चिड़िया शायद डाल से उड़ चुकी है। यह पोस्ट चुनाव आयोग ने ही डाली है, इसमें कोई संदेह नहीं रह गया है, क्योंकि इसकी बाकायदा पृष्ठभूमि भी सामने आई है। दरअसल पश्चिम बंगाल में एसआईआर के बाद 90.66 लाख वोटरों के नाम हटाने के विरोध में टीएमसी का प्रतिनिधिमंडल बुधवार को मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार से मिला। डेरेक ओ ब्रायन, सागरिका घोष, साकेत गोखले और मेनका गुरुस्वामी इस प्रतिनिधिमंडल में शामिल थे। टीएमसी के इस दल ने मुख्यत: दो बातों पर चुनाव आयोग से जवाब मांगा कि ममता बनर्जी ने अब तक नौ पत्र चुनाव आयोग को लिखे हैं, लेकिन लंबे समय से आयोग चुप बैठा है, पत्रों का जवाब नहीं दे रहा। और दूसरी शिकायत नंदीग्राम में मुख्य चुनाव अधिकारी और एक वरिष्ठ भाजपा नेता के बीच कथित सांठगांठ को लेकर थी। ये कोई ऐसी शिकायतें नहीं हैं, जिनका जवाब नहीं दिया जा सकता। लेकिन चार लोगों के साथ यह बैठक केवल सात मिनट ही चली। टीएमसी का आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने उनकी बातें नहीं सुनी और सात मिनट की बातचीत के बाद उन्हें गेट आउट कहा। डेरेक ओब्रायन ने कहा, 'चुनाव आयोग ने हमें अपमानित किया और परिसर छोड़ने को कहा। फिर उन्होंने सोशल मीडिया पर झूठी जानकारी फैलाई। यह भाजपा की साजिश है। लोकतंत्र की आत्मा पर हमला है।' आपको बता दें कि चुनाव आयोग की उपरोक्त पोस्ट इस बैठक के बाद ही आई है। आयोग इस बात पर इठला रहा है कि उसने टीएमसी को दो टूक जवाब दे दिया, लेकिन क्या यह शर्मिन्दगी की बात नहीं होनी चाहिए कि एक राजनैतिक दल के सवालों का संतोषजनक जवाब देने की जगह यह ढिंढोरा पीटा जाए कि हमने दो टूक जवाब दे दिया। इसका एक अर्थ यह भी होता है कि चुनाव आयोग विपक्ष के सवालों का जवाब देने के लिए खुद को जिम्मेदार नहीं मानता है। बुधवार की बैठक के बारे में टीएमसी के आरोपों पर निर्वाचन आयोग का कहना है कि टीएमसी सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने मीटिंग ने चिल्लाते हुए कहा कि हम यहां बात सुनने नहीं आए हैं। इसके बाद मीटिंग में माहौल गरमा गया और टीएमसी का प्रतिनिधिमंडल चला गया। हालांकि अब इस दल के सदस्यों ने निर्वाचन आयोग को चुनौती दी है कि वह इस बैठक की ट्रांसक्रिप्ट जारी करे। टीएमसी ने यह भी कहा है कि अगर आयोग इसे जारी नहीं करेगा तो हम इसे जारी करेंगे। अब बैठक किस वजह से पूरी नहीं हुई और किसने पहले आपा खोया, क्यों खोया? और क्या ऐसी तनातनी लोकतंत्र के लिए सही है? इन सारे सवालों के जवाब देश को दिए जाने चाहिए, इसकी पहल चुनाव आयोग से ही होना चाहिए। क्योंकि ऊंगलियां उसी पर उठी हैं। वैसे बैठक में बहस का एक और वाकया प.बंगाल के संदर्भ में ही पेश आया। जहां बुधवार को ही ज्ञानेश कुमार वर्चुअल मीटिंग ले रहे थे और सभी अधिकारियों से बारी-बारी से पूछ रहे थे कि उनके यहां कितने पोलिंग बूथ आदि हैं। जब यूपी कैडर के आईएएस अधिकारी और कूचबिहार के पर्यवेक्षक बनाए गए अनुराग यादव से यही सवाल हुआ तो उन्हें जवाब देने में थोड़ी देरी हुई। जिस पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कोई टिप्पणी कर दी। तो अनुराग यादव ने सख्त ऐतराज जताते हुए कहा कि आप हमसे इस तरह से बात नहीं कर सकते। हमने भी इस सेवा में 25 साल गुजारे हैं। अनुराग यादव के इस तरह से मुख्य चुनाव आयुक्त को जवाब दिए जाने के बाद कुछ देर के लिए बैठक में सन्नाटा छा गया। फिर दूसरे विषयों को लेकर बात शुरू की गई और किसी तरह बैठक को निपटाया गया। इस प्रसंग के बाद अनुराग यादव को पर्यवेक्षक के पद से हटा दिया गया है। हालांकि आयोग के अधिकारियों का कहना है कि उन्हें हटाने की वजह बैठक में हुई बहस नहीं थी। लेकिन यह भी कहा गया कि अगर कई बार के दौरे के बावजूद पर्यवेक्षक को यह नहीं पता कि उसके क्षेत्र में कितने बूथ हैं, तो यह सही बात नहीं है। इन दोनों प्रसंगों में एक चीज सामान्य है कि ज्ञानेश कुमार पर नाराज होने का आरोप लगा है। भले वे इसके लिए सामने वाले पक्ष को जवाबदेह मानें, लेकिन इससे उनकी नाराजगी या भड़कना या आपा खोना जायज नहीं हो जाता। लोकतंत्र में यकीन और चुनाव को एक पर्व की तरह देखने वालों के लिए यह बड़ी दुखद स्थिति है कि चुनाव आयोग जैसी संस्था के सामने विश्वनीयता का संकट उसकी अपनी कारगुजारियों के कारण खड़ा हो चुका है। क्या इस संस्था की साख कभी लौट पाएगी?
जनगणना में प्रवासी मजदूरों की गिनती जरूरी
सिर्फ प्रवासी बन जाने से वहां रहना, खाना, पहनना, ओढ़ना से लेकर पढ़ाई तक का काम कितना मुश्किल हो गया है इसकी कल्पना मुश्किल है।

