बेंगलुरु, 23 अक्टूबर (आईएएनएस)। कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने शुक्रवार को बेंगलुरु के एक निजी होटल में पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क के साथ द्विपक्षीय बातचीत की। पोलैंड के प्रधानमंत्री टस्क और उनका प्रतिनिधिमंडल गुरुवार रात दिल्ली से बेंगलुरु पहुंचे, जहां वे कई कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे।
Delhi में बैठे बैठे मोदी ने Iraq में कर दिया खेल, India के पास अब तेल ही तेल
दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि भारत रूस से कितना तेल खरीद रहा है, वेनेजुएला से कितना तेल खरीदेगा और अमेरिकी दबाव के आगे भारत अपने फैसले बदलेगा या नहीं। लेकिन इस पूरे शोर-शराबे के बीच एक बड़ा सवाल जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है कि इराक से भारत कितनी बड़ी मात्रा में तेल खरीद रहा है और इस खरीद से अपने आर्थिक हितों को कैसे साध रहा है? देखा जाये तो रूस और वेनेजुएला के तेल पर दुनिया बहस करती रहे, लेकिन भारत की असली रणनीति समझनी है तो इराक के साथ उसके तेल कारोबार पर नजर डालनी होगी। यही वह मोर्चा है, जहां भारत अपनी जरूरत, बाजार और कीमत के हिसाब से फैसले लेकर दुनिया को यह संदेश दे रहा है कि उसकी ऊर्जा नीति किसी के दबाव से नहीं, बल्कि देश के हितों से तय होती है। इराक: भारत की ऊर्जा सुरक्षा का एक बड़ा स्तंभ देखा जाये तो भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक है। देश की अर्थव्यवस्था, परिवहन व्यवस्था, उद्योग और आम आदमी के जीवन में पेट्रोलियम की अहम भूमिका है। ऐसे में तेल की कीमतों में मामूली वृद्धि भी भारत के आयात बिल, महंगाई और रुपये पर दबाव डाल सकती है। भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में इराक ने भारत को 4.711 करोड़ मीट्रिक टन कच्चा तेल उपलब्ध कराया। यह भारत के कुल तेल आयात के मूल्य का लगभग 19.16 प्रतिशत था। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद इराक भारत का दूसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बना हुआ है। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि इराक भारत के लिए कोई मामूली या वैकल्पिक आपूर्तिकर्ता नहीं है। वह भारत की ऊर्जा व्यवस्था का एक प्रमुख आधार है। भारतीय तेल कंपनियां इराक से नियमित रूप से तेल खरीदती हैं और इस व्यापार के माध्यम से दोनों देशों के आर्थिक संबंध भी मजबूत होते हैं। इसे भी पढ़ें: Prabhasakshi NewsRoom: Saudi Arabia में हालात बिगड़ते ही भारतीय जायरीनों को सुरक्षित निकालने के लिए एक्शन में आई मोदी सरकार, अब तक 13 हजार से ज्यादा लौटे अक्टूबर 2026 की खरीद: क्यों चर्चा में आया इराक का तेल? इराक से भारत की खरीद का महत्व हाल के घटनाक्रमों से और बढ़ गया है। 22 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर में भारत ने इराक से प्रतिदिन लगभग 8.30 लाख बैरल तेल आयात किया, जबकि अगस्त में यह मात्रा लगभग 1.71 लाख बैरल प्रतिदिन थी। इसी दौरान भारत का रूस से तेल आयात लगभग 14 प्रतिशत घटकर 18 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया। यह बदलाव बताता है कि भारत की तेल खरीद किसी एक राजनीतिक समीकरण से तय नहीं होती। जब मध्य-पूर्व का तेल प्रतिस्पर्धी कीमतों पर उपलब्ध होता है, तो भारतीय रिफाइनरियां उसकी ओर रुख कर सकती हैं। रूस का तेल भी भारतीय बाजार के लिए महत्वपूर्ण बना रहता है, लेकिन खरीद का फैसला कीमत, परिवहन खर्च, उपलब्धता और रिफाइनरी की जरूरतों के आधार पर होता है। इस रणनीति का एक और उल्लेखनीय उदाहरण सामने आया। इसी महीने की एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन ने इराक के बसरा टर्मिनल से लगभग 20 लाख बैरल बसरा मीडियम क्रूड की एक खेप खरीदने पर सहमति जताई थी। रिपोर्ट में इस खरीद के लिए दुबई के तेल मूल्य से 32 डॉलर प्रति बैरल कम कीमत का उल्लेख किया गया। यह उदाहरण उस मूल सिद्धांत को सामने लाता है जिस पर भारत की ऊर्जा रणनीति आधारित होनी चाहिए। यानि जहां बेहतर आर्थिक शर्तें मिलें, वहां से तेल खरीदने के विकल्प खुले रखे जाएं। वैश्विक बाजार पर क्या पड़ता है इसका असर? देखा जाये तो तेल बाजार में भारत जैसे बड़े खरीदार का निर्णय केवल उसकी घरेलू अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रहता। भारत प्रतिदिन लाखों बैरल कच्चे तेल का आयात करता है। इसलिए यदि भारतीय कंपनियां रूस के बजाय इराक या दूसरे मध्य-पूर्वी उत्पादकों से अधिक तेल खरीदती हैं, तो अलग-अलग तेल ग्रेड की मांग, व्यापारिक प्रवाह और क्षेत्रीय मूल्य प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है। सितंबर 2026 में मध्य-पूर्व से भारत का कुल तेल आयात बढ़कर लगभग 28 लाख बैरल प्रतिदिन पहुंच गया। यह भारत के कुल तेल आयात का लगभग 54 प्रतिशत था। बताया जा रहा है कि मध्य-पूर्वी तेल की बेहतर उपलब्धता और रूसी तेल पर घटते मूल्य-लाभ ने इस बदलाव में भूमिका निभाई। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि इराक से ज्यादा तेल खरीदते ही दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतें गिर जाएंगी। वैश्विक कीमतों पर ओपेक की उत्पादन नीति, युद्ध, समुद्री परिवहन, मांग और आपूर्ति जैसे कई कारक असर डालते हैं। लेकिन भारत का विविध स्रोतों से खरीदना आपूर्तिकर्ताओं के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ाने और अपने लिए बेहतर सौदे हासिल करने में मदद कर सकता है। यहां सवाल उठता है कि इस सबसे भारत को क्या फायदा हो सकता है? देखा जाये तो पहला फायदा है आयात लागत में बचत। अगर किसी खेप का वास्तविक पहुंच-मूल्य अन्य विकल्पों की तुलना में कम पड़ता है, तो भारतीय कंपनियों का खर्च घट सकता है। इसका लाभ रिफाइनरियों के मुनाफे और व्यापक अर्थव्यवस्था को मिल सकता है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कम कीमत का लाभ पेट्रोल-डीजल के खुदरा दामों में कितना पहुंचेगा, यह करों, रिफाइनिंग लागत और सरकारी मूल्य निर्धारण जैसे दूसरे कारकों पर भी निर्भर करता है। दूसरा फायदा है रणनीतिक स्वतंत्रता। भारत को रूस, इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका और जरूरत के अनुसार अन्य उत्पादकों से तेल खरीदने के विकल्प बनाए रखने चाहिए। इससे किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता कम होती है और प्रतिबंधों या आपूर्ति संकट की स्थिति में विकल्प उपलब्ध रहते हैं। तीसरा फायदा है भारत की सौदेबाजी की ताकत। जब भारतीय रिफाइनरियां कई बाजारों से खरीद सकती हैं, तो किसी एक आपूर्तिकर्ता की शर्तों को स्वीकार करना उनकी मजबूरी नहीं रह जाता। लेकिन इस लाभ को बनाए रखने के लिए समुद्री मार्गों की सुरक्षा, तेल की गुणवत्ता, परिवहन बीमा और भुगतान व्यवस्था का भी ध्यान रखना जरूरी है। इसके अलावा, इराक से प्रतिस्पर्धी शर्तों पर तेल खरीदना और अंतरराष्ट्रीय दबावों के बावजूद भारत के हितों को सर्वोपरि रखना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ऊर्जा रणनीति का एक बड़ा मास्टरस्ट्रोक है। दुनिया भर की सरकारें तेल की बढ़ती कीमतों और उसके आर्थिक बोझ से जूझ रही हैं, वहीं भारत ने अंतरराष्ट्रीय उथल-पुथल के बीच पेट्रोल-डीजल की घरेलू कीमतों में लगभग स्थिरता बनाए रखकर आम जनता को बड़ी राहत देने की कोशिश की है। रूस हो, इराक हो या कोई दूसरा तेल उत्पादक देश, भारत का जोर इस बात पर रहा है कि तेल जहां से भी मिले, उसकी खरीद देश के आर्थिक हितों और ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखकर की जाए। यही मोदी सरकार की रणनीति की खासियत है कि वैश्विक संकट के बीच भारत के लिए बेहतर विकल्प तलाशना और अंतरराष्ट्रीय बाजार के दबाव को सीधे आम आदमी की जेब पर हावी न होने देना। जब दुनिया के कई देश महंगे तेल की चुनौती से जूझ रहे हैं, तब भारत में कीमतों को अपेक्षाकृत स्थिर बनाए रखना मोदी सरकार की ऊर्जा नीति की एक अहम उपलब्धि के रूप में पेश किया जा सकता है। हालांकि इराक से तेल खरीदने में जोखिम भी हैं। खाड़ी क्षेत्र में संघर्ष, होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों की सुरक्षा और आपूर्ति में संभावित बाधाएं भारत के लिए गंभीर चुनौती बन सकती हैं। इसलिए सस्ता तेल तभी वास्तविक रणनीतिक लाभ है, जब उसकी आपूर्ति भरोसेमंद और आर्थिक रूप से व्यवहार्य भी हो। बहरहाल, दुनिया भारत की रूस से तेल खरीद पर नजर रखे या वेनेजुएला से संभावित खरीद पर बहस करे, भारत की ऊर्जा नीति का मूल्यांकन व्यापक तस्वीर के आधार पर होना चाहिए। इराक से 4.711 करोड़ टन वार्षिक तेल आपूर्ति और सितंबर 2026 में वहां से आयात में आई तेज बढ़ोतरी यह दिखाती है कि मध्य-पूर्व भारत की ऊर्जा सुरक्षा में कितनी अहम भूमिका निभाता है। यदि मोदी सरकार और भारतीय तेल कंपनियां प्रतिस्पर्धी कीमतों, सुरक्षित आपूर्ति और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को एक साथ साध पाती हैं, तो यह व्यावहारिक कूटनीति की बड़ी सफलता होगी। -नीरज कुमार दुबे
अक्टूबर में भारत की कारोबारी गतिविधियां 4 महीने के उच्च स्तर पर पहुंची: पीएमआई डेटा
नई दिल्ली, अक्टूबर में भारत के निजी क्षेत्र की कारोबारी गतिविधियों (बिजनेस एक्टिविटी) में जोरदार तेजी दर्ज की गई और यह चार महीनों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई।
सपा की सियासत में आजम की ताकत और रामपुर जेल का सियासी फलसफा
उत्तर प्रदेश की राजनीति में रामपुर की जेल सिर्फ एक चारदीवारी नहीं, बल्कि वर्तमान में समाजवादी पार्टी के भविष्य और मुस्लिम सियासत के नए ध्रुवीकरण का केंद्र बन चुकी है। 22 अक्टूबर 2026 को सपा प्रमुख अखिलेश यादव और पार्टी के सबसे कद्दावर मुस्लिम चेहरे आजम खान के बीच रामपुर जिला जेल में हुई लगभग एक घंटे की मुलाकात केवल दो नेताओं की शिष्टाचार भेंट नहीं थी। यह उत्तर प्रदेश के आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात पर चली गई एक ऐसी चाल है, जिसके दूरगामी परिणाम न केवल समाजवादी पार्टी के भीतर, बल्कि पूरे राज्य के सामाजिक-राजनीतिक ताने-बाने पर दिखाई देंगे। कानूनी शिकंजे में फंसे और चुनावी राजनीति से तकनीकी रूप से दूर हो चुके आजम खान की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके एक इशारे पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की दर्जनों सीटों का गणित बदल सकता है। यही कारण है कि अखिलेश यादव को खुद रामपुर जेल पहुंचकर यह संदेश देना पड़ा कि समाजवादी पार्टी में आजम खान की हैसियत न तो कम हुई है और न ही उन्हें हाशिए पर धकेला जा सकता है। यह मुलाकात इस बात का जीवंत प्रमाण है कि सत्ता और कानूनी मुकदमों के उतार-चढ़ाव के बावजूद, सपा की सियासत में आजम की ताकत का सूरज पूरी तरह अस्त नहीं हुआ है, बल्कि रामपुर जेल की सलाखों के पीछे से वह एक नई ऊर्जा के साथ उभर रहा है। यह घटनाक्रम यह भी दर्शाता है कि जब-जब उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन या बड़े राजनैतिक उलटफेर की नींव रखी जाती है, तब-तब रामपुर का किला और वहां का नेतृत्व स्वतः ही मुख्यधारा की चर्चा के केंद्र में आ जाता है। इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए समाजवादी पार्टी के अंतर्विरोधों और उत्तर प्रदेश के बदलते मुस्लिम नेतृत्व के संकट को देखना जरूरी है। पिछले कुछ समय से यह चर्चा आम थी कि आजम खान के जेल जाने और उनके परिवार पर आए कानूनी संकट के दौरान समाजवादी पार्टी ने उस आक्रामकता के साथ उनका साथ नहीं दिया, जिसकी उम्मीद एक संस्थापक सदस्य को होती है। पार्टी के भीतर और बाहर इस बात को लेकर सुगबुगाहट थी कि अखिलेश यादव अपनी छवि को एक नए, आधुनिक और गैर-विवादास्पद रूप में ढालने के लिए 'माई' (मुस्लिम-यादव) समीकरण से थोड़ा इतर 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नारा दे रहे हैं। इस नए विमर्श में आजम खान जैसे पुराने समाजवादी दिग्गजों की कट्टर छवि फिट नहीं बैठ रही थी। इसी बीच, असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम और अन्य क्षेत्रीय दलों ने इस खालीपन को भरने की कोशिश शुरू कर दी। ओवैसी लगातार यह आरोप लगाते रहे कि सपा मुस्लिमों के वोट तो लेती है, लेकिन जब उनके बड़े नेताओं पर संकट आता है, तो नेतृत्व चुप्पी साध लेता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जो कभी आजम खान का अभेद्य किला माना जाता था, वहां मुस्लिम मतदाताओं के बीच उपजे इस असमंजस को अखिलेश यादव भांप चुके थे। रामपुर लोकसभा उपचुनाव और उसके बाद के घटनाक्रमों में जिस तरह से अंदरूनी गुटबाजी सामने आई, उसने पार्टी आलाकमान को सचेत कर दिया कि आजम खान को नजरअंदाज करने की कीमत २०२७ में बेहद भारी पड़ सकती है। इसलिए, अखिलेश यादव का रामपुर जेल जाना राजनीतिक मजबूरी भी था और एक सोची-समझी रणनीति भी, जिसके जरिए उन्होंने एक ही झटके में ओवैसी के नैरेटिव को ध्वस्त करने और अपने कोर वोटर को यह भरोसा दिलाने का प्रयास किया कि 'नेताजी' (मुलायम सिंह यादव) के दौर के स्तंभ आज भी उतने ही आदरणीय हैं। यह कदम यह भी स्पष्ट करता है कि सपा अपने पारंपरिक और वफादार वोट बैंक को किसी भी अन्य वैचारिक प्रयोग की वेदी पर होम करने के लिए तैयार नहीं है। इसे भी पढ़ें: SP सच में मुसलमानों की हितैषी है तो Muslim CM का चेहरा घोषित करे: अखिलेश को OP राजभर की सीधी चुनौती जेल की इस मुलाकात ने न केवल सपा के कार्यकर्ताओं में नया जोश भरा है, बल्कि पार्टी के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान पर भी एक तरह से विराम लगाने का काम किया है। हाल के दिनों में रामपुर के वर्तमान सांसद मोहिबुल्लाह नदवी और आजम खान के समर्थकों के बीच की दूरी जगजाहिर रही है। स्थानीय स्तर पर संगठन दो धड़ों में बंटा नजर आ रहा था। अखिलेश यादव ने जेल से बाहर आकर जिस तरह आजम थे, आजम हैं और आजम रहेंगे का हुंकार भरा, उससे उन्होंने यह साफ कर दिया कि रामपुर और पूरे रूहेलखंड क्षेत्र में समाजवादी पार्टी का चेहरा और कमान आज भी परोक्ष रूप से आजम खान के पास ही रहेगी। खबरों के मुताबिक, इस मुलाकात के दौरान आजम खान की पत्नी तंजीन फातिमा ने अखिलेश यादव को संभावित उम्मीदवारों और रणनीतिक बदलावों की एक सूची भी सौंपी। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि २०२७ के विधानसभा चुनावों में टिकटों के बंटवारे से लेकर गठबंधन के स्वरूप तक, आजम खान की राय को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी। भले ही आजम खान खुद चुनावी मैदान में न उतर सकें, लेकिन उनका 'रिमोट कंट्रोल' यूपी की सियासत में बेहद प्रभावी रहने वाला है। उनका यही प्रभाव अखिलेश यादव को उनके पास खींच लाया, क्योंकि वे जानते हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुस्लिम समाज में आजम खान की आवाज आज भी एक भावनात्मक अपील रखती है, जिसे कोई दूसरा नेता रिप्लेस नहीं कर पाया है। यह प्रभाव केवल रामपुर तक सीमित नहीं है, बल्कि मुरादाबाद, बिजनौर, बरेली और अमरोहा जैसे पूरे मुस्लिम बहुल बेल्ट में आजम खान की राजनीतिक छत्रछाया आज भी टिकटार्थियों के भाग्य का फैसला करने की क्षमता रखती है। दूसरी तरफ, इस मुलाकात ने विपक्षी खेमे, विशेषकर भारतीय जनता पार्टी को एक बार फिर सपा पर हमलावर होने का मौका दे दिया है। भाजपा ने इसे तुष्टिकरण की राजनीति का नया अध्याय और अपराधियों को संरक्षण देने की कोशिश करार दिया है। सत्ताधारी दल का तर्क है कि कानून सम्मत कार्रवाई के तहत जेल में बंद एक सजायाफ्ता नेता से राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री की यह मुलाकात यह दर्शाती है कि सपा आज भी अपने पुराने ढर्रे और तुष्टिकरण की नीति से बाहर नहीं निकल पाई है। भाजपा के रणनीतिकार इस मुलाकात को बहुसंख्यक मतदाताओं के बीच भुनाने की कोशिश करेंगे, ताकि सपा के खिलाफ एक बार फिर ध्रुवीकरण का माहौल बनाया जा सके। भाजपा के लिए यह मुलाकात एक ऐसा हथियार है जिसके जरिए वे यह साबित करने की कोशिश करेंगे कि अखिलेश यादव का 'पीडीए' सिर्फ एक मुखौटा है, और असलियत में वे उसी पुरानी राजनीति की ओर लौट रहे हैं जिसे जनता ने नकारा था। सुभासपा और अन्य छोटे दलों ने भी इसे केवल एक 'चुनावी नौटंकी' बताया है। विपक्ष का यह तीखा हमला दिखाता है कि वे भी अच्छी तरह जानते हैं कि आजम और अखिलेश का यह पुनर्मिलन अगर जमीन पर रंग लाया, तो विपक्षी दलों के लिए मुस्लिम वोटों में सेंध लगाना नामुमकिन हो जाएगा। भाजपा की ओर से आने वाले तीखे बयान इस बात का भी संकेत हैं कि वे आने वाले समय में कानून-व्यवस्था के मुद्दे को एक बार फिर चुनाव के केंद्र में लाएंगे और आजम खान का नाम लेकर सपा को घेरने की हरसंभव कोशिश करेंगे। इस पूरे परिदृश्य में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि क्या रामपुर जेल की यह मुलाकात समाजवादी पार्टी को 2027 की सत्ता के सिंहासन तक पहुंचा पाएगी? उत्तर प्रदेश की सियासत अब 2012 या 2017 जैसी नहीं रह गई है। मतदाता बेहद जागरूक हैं और केवल भावनात्मक अपीलों पर वोट नहीं करते। आजम खान की ताकत का एक पहलू अगर उनका भारी जनसमर्थन है, तो दूसरा पहलू उनकी छवि को लेकर होने वाला काउंटर-ध्रुवीकरण भी है। अखिलेश यादव के सामने चुनौती यह होगी कि वे आजम खान की ताकत का इस्तेमाल मुस्लिम वोटों को एकजुट करने में तो करें, लेकिन इसके साथ ही बहुसंख्यक और गैर-यादव ओबीसी मतदाताओं को छिटकने न दें। पीडीए का जो गुलदस्ता अखिलेश ने तैयार किया है, उसमें आजम खान की हिस्सेदारी को इस तरह पिरोना होगा कि वह समावेशी दिखे, न कि केवल एक वर्ग विशेष की राजनीति। पश्चिमी उत्तर प्रदेश का जो जाट-मुस्लिम-दलित गठबंधन सपा बनाने का प्रयास कर रही है, उसमें आजम खान की स्वीकार्यता को संतुलित रखना एक बेहद बारीक राजनीतिक कला होगी। यदि सपा इस संतुलन को साधने में सफल रही, तो रामपुर जेल से शुरू हुआ यह सफर २०२७ में लखनऊ के सचिवालय तक पहुंच सकता है, अन्यथा ध्रुवीकरण की तेज हवा इस पूरी रणनीति को बिखेर भी सकती है। बहरहाल, रामपुर जेल के बंद कमरों से निकला यह सियासी संदेश उत्तर प्रदेश की वादियों में गूंजने लगा है। इसने यह तय कर दिया है कि आने वाले दिनों में रामपुर की धरती एक बार फिर सूबे की राजनीति का कुरुक्षेत्र बनेगी। आजम खान जेल की सलाखों के पीछे रहकर भी सपा की सियासत के सबसे बड़े खिलाड़ियों में से एक बने हुए हैं, और अखिलेश यादव के इस कदम ने यह साबित कर दिया है कि उत्तर प्रदेश की सत्ता का रास्ता आज भी रामपुर के सियासी गलियारों से होकर ही गुजरता है। अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार
आखिर कब थमेगा धार्मिक आयोजनों में मौत का सिलसिला?
धर्म, आस्था और विश्वास के केंद्रों पर इंसान सुकून, शांति और सुख-समृद्धि की कामना लेकर पहुंचता है लेकिन जब वही स्थान चीख-पुकार, दमघोंटू भीड़ और मौत के मंजर में तब्दील हो जाएं तो यह हमारी व्यवस्था की संवेदनहीनता और सुरक्षा संबंधी तैयारियों की विफलता का भयावह प्रमाण है। कोलकाता के चोरबागान दुर्गा पूजा पंडाल में 17 अक्तूबर की शाम भगदड़ जैसी स्थिति में 19 लोगों की मौत और दो दर्जन से अधिक लोगों के घायल होने की खबर ने एक बार फिर देश को झकझोर दिया। सप्तमी की शाम मां दुर्गा के दर्शन की लालसा लेकर निकले श्रद्धालुओं को क्या पता था कि घर लौटने के बजाय कई परिवारों को अपने प्रियजनों के शव मिलेंगे? जिस उत्सव में जीवन, शक्ति और विजय का संदेश गूंजना चाहिए था, वहां मातम पसरा था। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर हमारी आस्था के स्थलों पर इंसानी जिंदगी इतनी सस्ती क्यों हो जाती है? चोरबागान की घटना को केवल अचानक उमड़ी भीड़ या दुर्भाग्यपूर्ण हादसा बताकर जिम्मेदारी से बचना आसान है लेकिन ऐसा करना त्रासदी के वास्तविक कारणों से आंखें मूंदना होगा। बारिश के बीच पंडाल में प्रवेश और निकास के रास्तों पर भीड़ का दबाव बढ़ा और अफरा-तफरी की स्थिति पैदा हुई। घटनास्थल की संकरी गलियों, लोगों की आवाजाही तथा सुरक्षा प्रबंधों को लेकर भी सवाल उठे हैं। हालांकि, दुर्घटना के वास्तविक कारणों और जिम्मेदारी का निर्धारण निष्पक्ष जांच से ही होना चाहिए। फिर भी, यदि भारी भीड़ और खराब मौसम के बावजूद आवाजाही को सुरक्षित रखने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी तो यह गंभीर प्रशासनिक और आयोजन संबंधी विफलता का मामला है। जब किसी आयोजन में हजारों लोगों के जुटने की संभावना पहले से मालूम हो, तब संभावित खतरे का अनुमान लगाने के लिए दुर्घटना होने की प्रतीक्षा क्यों की जाती है? भारत में धार्मिक स्थलों और सार्वजनिक आयोजनों में भगदड़ कोई नई समस्या नहीं है। मंदिरों, तीर्थस्थलों, धार्मिक मेलों, जुलूसों और पर्व-समारोहों में भीड़ का बेकाबू होना बार-बार जानलेवा साबित होता रहा है। वर्ष 2005 में महाराष्ट्र के मांढरदेवी मंदिर में भगदड़ से 300 से अधिक लोगों की मौत हुई थी। 2011 में केरल के सबरीमाला में भगदड़ ने 100 से अधिक लोगों की जान ले ली थी। 2013 में मध्य प्रदेश के रतनगढ़ मंदिर में 100 से अधिक लोगों की मौत हुई। 2022 में जम्मू स्थित वैष्णो देवी मंदिर में भगदड़ से 12 श्रद्धालुओं की जान गई। 2024 में हाथरस में धार्मिक सत्संग के बाद मची भगदड़ में 121 लोगों की मौत ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया। 2025 में प्रयागराज महाकुंभ और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भी भीड़ से जुड़ी जानलेवा घटनाओं ने सार्वजनिक सुरक्षा की तैयारियों पर गंभीर प्रश्न खड़े किए थे। हालांकि अलग-अलग घटनाओं के कारण और परिस्थितियां भिन्न थी लेकिन इनके बीच एक चिंताजनक समानता रही, भीड़ के दबाव में इंसानी जीवन की असुरक्षा। इसे भी पढ़ें: आस्था के सैलाब में कब तक गुम होती रहेगी जिंदगियां? हर त्रासदी के बाद शोक संदेश जारी होते हैं, मुआवजे की घोषणाएं होती हैं, जांच समितियां गठित की जाती हैं और इसके बाद व्यवस्था फिर पुराने ढ़र्रे पर लौट जाती है। यही हमारी सबसे बड़ी विफलता है। यदि पिछली दुर्घटनाओं से सबक लेकर प्रभावी सुरक्षा तंत्र विकसित किया गया होता तो बार-बार ऐसी मौतों का सामना नहीं करना पड़ता। जांच का उद्देश्य केवल दोषियों की पहचान करना नहीं, उन खामियों को दूर करना भी होना चाहिए, जिनके कारण एक ही प्रकार की त्रासदियां बार-बार सामने आती हैं। सवाल यह नहीं कि अगला हादसा कहां होगा बल्कि यह है कि उसे रोकने के लिए हमने अब तक क्या किया है? यह समझना जरूरी है कि भगदड़ केवल लोगों के अचानक दौड़ने से नहीं होती। जब किसी सीमित स्थान में भीड़ की संख्या उसकी क्षमता से अधिक हो जाती है, प्रवेश और निकास का प्रवाह बाधित होता है, लोग एक-दूसरे को धक्का देने लगते हैं या अफवाह के कारण एक साथ आगे बढ़ते हैं, तब स्थिति तेजी से जानलेवा बन सकती है। भीड़ के अत्यधिक दबाव में व्यक्ति के लिए सांस लेना और स्वयं को संभालना कठिन हो जाता है। गिरने वाला व्यक्ति दूसरों के लिए भी गंभीर खतरा पैदा कर सकता है। ऐसे हालात में कुछ क्षणों की अव्यवस्था भी अनेक जिंदगियां लील सकती है। इसलिए भीड़ प्रबंधन का अर्थ केवल पुलिसकर्मियों की तैनाती, बैरिकेडिंग या लाउडस्पीकर से घोषणाएं करना नहीं है। इसके लिए भीड़ की क्षमता का वैज्ञानिक आकलन, आवाजाही की सतत निगरानी, प्रशिक्षित कर्मियों और स्पष्ट आपातकालीन योजना की आवश्यकता होती है। धार्मिक आयोजनों में सुरक्षा को अक्सर आस्था के उत्साह और आयोजन की भव्यता के पीछे गौण कर दिया जाता है। ऊंचे-ऊंचे पंडाल, आकर्षक सजावट, रोशनी, प्रचार और प्रायोजकों की प्रतिस्पर्धा पर भरपूर ध्यान दिया जाता है लेकिन प्रवेश द्वार कितने हैं, निकास कितना चौड़ा है, आपातकालीन रास्ते खुले हैं या नहीं, पर्याप्त रोशनी है या नहीं और भीड़ बढ़ने पर क्या किया जाएगा, इन बुनियादी सवालों की अनदेखी कर दी जाती है। लोकप्रियता के नाम पर भीड़ को आमंत्रित करना और फिर उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी से बचना किसी भी दृष्टि से स्वीकार्य नहीं हो सकता। आयोजकों को समझना होगा कि किसी पूजा पंडाल की सफलता श्रद्धालुओं की संख्या से नहीं बल्कि इस बात से तय होती है कि प्रत्येक श्रद्धालु सुरक्षित घर लौटे। सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी भी आयोजन स्थल पर पुलिस तैनात कर देने तक सीमित नहीं हो सकती। अनुमति देने से पहले स्थल की क्षमता, प्रवेश-निकास मार्गों, अग्नि सुरक्षा, संरचनात्मक मजबूती और आपातकालीन निकासी की व्यवस्था का वास्तविक निरीक्षण होना चाहिए। कोई भी तकनीक तभी कारगर होगी, जब उसके आधार पर समय रहते निर्णय लेने वाले जिम्मेदार लोग मौजूद हों। जवाबदेही तय करने में किसी प्रकार का पक्षपात नहीं होना चाहिए। यदि आयोजकों, अधिकारियों या अन्य जिम्मेदार व्यक्तियों की लापरवाही प्रमाणित होती है तो कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। केवल कुछ गिरफ्तारियों या इस्तीफों को न्याय की पूर्णता नहीं माना जा सकता। साथ ही, जांच निष्पक्ष होनी चाहिए और दोष का निर्धारण राजनीतिक बयानबाजी के बजाय साक्ष्यों के आधार पर होना चाहिए। श्रद्धालुओं की भी अपनी जिम्मेदारी है। धक्का-मुक्की से बचना, अफवाहों पर विश्वास न करना, सुरक्षा निर्देशों का पालन करना और अत्यधिक भीड़ दिखाई देने पर प्रवेश करने की जिद न करना आवश्यक है। आयोजकों को भीड़ को आकर्षित करने के लिए सोशल मीडिया पर प्रचार करते समय सुरक्षा क्षमता का ध्यान रखना चाहिए। हालांकि, नागरिकों से सावधानी की अपेक्षा प्रशासनिक लापरवाही का विकल्प नहीं हो सकती। सुरक्षा की प्राथमिक जिम्मेदारी उन लोगों की है, जो आयोजन की योजना बनाते हैं, अनुमति देते हैं और व्यवस्था संचालित करते हैं। बहरहाल, चोरबागान की त्रासदी हमें चेतावनी दे रही है कि आस्था का सम्मान केवल पूजा-अर्चना, भव्य पंडालों और धार्मिक नारों से नहीं होता। उसका वास्तविक सम्मान मानव जीवन की रक्षा से होता है। मां दुर्गा की आराधना शक्ति, विवेक और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा देती है। यदि उनके दर्शन के लिए उमड़े श्रद्धालु अव्यवस्था के कारण अपनी जान गंवा दें तो हमें अपनी व्यवस्थाओं का कठोर आत्ममंथन करना ही होगा। अब वक्त शोक जताकर आगे बढ़ जाने का नहीं बल्कि व्यवस्था बदलने का है। हर धार्मिक स्थल, हर पूजा पंडाल और हर बड़े सार्वजनिक आयोजन में सुरक्षा को सर्वाेच्च प्राथमिकता देनी होगी। जब तक लापरवाही पर जवाबदेही तय नहीं होगी, सुरक्षा नियमों का कठोरता से पालन नहीं होगा और पिछली दुर्घटनाओं से मिले सबक जमीन पर नहीं उतरेंगे, तब तक श्रद्धालुओं की जान पर मंडराता खतरा समाप्त नहीं होगा। आस्था के नाम पर मौत को नियति मान लेना सबसे बड़ी भूल है। भगवान के दरबार में इंसान जिंदगी की दुआ मांगने जाता है, जान गंवाने नहीं। किसी भी सभ्य समाज और संवेदनशील शासन व्यवस्था की असली परीक्षा यही है कि श्रद्धालु विश्वास के साथ घर से निकलें और सुरक्षित अपने घर लौटें। - योगेश कुमार गोयल (लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और हिन्दी अकादमी दिल्ली के सौजन्य से प्रकाशित ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ पुस्तक के लेखक हैं)
अगर भारत में हो रहे प्रदर्शनों के पीछे विदेशी शक्तियों का हाथ, तो अमित शाह क्या कर रहे हैं : उदित राज
जर्मन कंपनियों के लिए भारत में बड़े अवसर: पीयूष गोयल
नई दिल्ली, केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने शुक्रवार को जर्मनी की राजधानी बर्लिन में कई प्रमुख उद्योगपतियों और कारोबारी नेताओं के साथ बैठकों के दौरान कहा कि भारत जर्मन कंपनियों के लिए निवेश, विनिर्माण और नवाचार के क्षेत्र में अपार अवसर प्रदान करता है।
Delhi Protest: सौरव दास और आशुतोष रांका को फिर नोटिस भेज सकती है क्राइम ब्रांच, आज नेहा बोरा की याचिका पर फैसला
कित्तूर की वीरांगना रानी चेन्नम्मा की जयंती पर केंद्रीय मंत्री गडकरी समेत कई नेताओं ने किया नमन
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कोटिया पर फिर गरमाई राजनीति! नवीन पटनायक ने भेजी BJD की बड़ी टीम
ओडिशा में बीजू जनता दल (बीजेडी) का एक प्रतिनिधिमंडल 23 अक्टूबर को कोटिया पंचायत का दौरा करेगा। यह दौरा ओडिशा के कोरापुट जिले के पोटांगी ब्लॉक में स्थित कोटिया के कुछ गांवों में आंध्र प्रदेश द्वारा कथित तौर पर चुनाव से जुड़ी गतिविधियां चलाए जाने के विरोध में किया जा रहा है।
नाबालिगों के कथित नशे का वीडियो सामने आते ही मचा बवाल, बिट्टू ने सरकार को घेरा
पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता रवनीत सिंह बिट्टू ने एक कथित वीडियो साझा कर पंजाब में नशे की समस्या को लेकर राज्य की आम आदमी पार्टी (आप) सरकार पर तीखा हमला बोला है
दिलजीत दोसांझ शो पर सियासी संग्राम! BJP-AAP आमने-सामने
दिल्ली भाजपा अध्यक्ष हर्ष मल्होत्रा ने गुरुवार को गायक दिलजीत दोसांझ के 30 अक्टूबर को प्रस्तावित दिल्ली शो को अनुमति नहीं दिए जाने के मुद्दे पर आम आदमी पार्टी (आप) की आलोचना की
तमिलनाडु में बारिश का संकट गहराया, राहुल गांधी ने कांग्रेस को दिया 'राहत मिशन' का आदेश
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने तमिलनाडु, पुडुचेरी, कराईकल, केरल और लक्षद्वीप के लिए भारी से बहुत भारी बारिश का अलर्ट जारी किया है
उत्तरी असम के मरीजों को बड़ी सौगात, तेजपुर में बनेगा सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल
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नशा विरोधी कार्यकर्ताओं की मौत पर जवाब देने से बच रही पंजाब सरकार : अश्वनी शर्मा
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बिहार विधान परिषद चुनाव से पहले जदयू उम्मीदवार नीरज कुमार से मिले नीतीश कुमार, अस्पताल में चल रहा था इलाज
सोनम वांगचुक ने केंद्र सरकार पर लगाया वादाखिलाफी का आरोप, पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग दोहराई
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मध्य प्रदेश: नगर निकाय की खरीद को लेकर एसीएस का वायरल वीडियो विवाद का कारण बना
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केरल में नकदी फसलों के बढ़े दाम, किसान मोर्चा ने केंद्र सरकार को सराहा
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संगठन कौशल, राष्ट्र की आंतरिक सुरक्षा और दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ सार्वजनिक जीवन में विशिष्ट पहचान
कुछ व्यक्तित्व अपनी पहचान पद और प्रतिष्ठा से बनाते हैं, कुछ अपने विचारों से और कुछ अपने संकल्प को परिणाम में बदलने की कार्यशैली से। अमित शाह जी भारतीय राजनीति के ऐसे प्रमुख व्यक्तित्व हैं, जिनकी राजनीतिक यात्रा संगठन निर्माण, रणनीतिक दृष्टि, दृढ़ इच्छाशक्ति और महत्वपूर्ण राष्ट्रीय जिम्मेदारियों के निर्वहन के संदर्भ में विशेष महत्व रखती है। आज 22 अक्टूबर को उनके जन्मदिवस के अवसर पर उनके सार्वजनिक जीवन और कार्यशैली पर विचार करना एक ऐसे नेतृत्व को समझने का अवसर है, जिसने संगठनात्मक राजनीति से राष्ट्रीय नेतृत्व तक का लंबा सफर तय किया है। अमित शाह जी के व्यक्तित्व की एक विशिष्ट विशेषता यह है कि वे किसी लक्ष्य को निर्धारित करने के बाद उसे प्राप्त करने के लिए योजनाबद्ध ढंग से कार्य करने, संगठन को सक्रिय रखने और परिणामों की समीक्षा पर विशेष ध्यान देते हैं। उनके निकट रहकर कार्य करने का अवसर प्राप्त करने वाले व्यक्ति के रूप में मैंने उनकी कार्यपद्धति में लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता, समय के महत्व और दायित्वों के निर्वहन के प्रति गंभीरता को विशेष रूप से महत्वपूर्ण पाया है। उनका कार्य-दृष्टिकोण इस विचार को रेखांकित करता है कि केवल संकल्प व्यक्त करना पर्याप्त नहीं होता; संकल्प को सिद्धि तक पहुँचाने के लिए निरंतर परिश्रम, अनुशासन और प्रभावी क्रियान्वयन आवश्यक है। इसे भी पढ़ें: BJP विस्तार से Article 370 हटाने तक, गृह मंत्री Amit Shah का ऐसा रहा राजनीतिक सफर संगठन निर्माण से राष्ट्रीय नेतृत्व तक: 22 अक्टूबर 1964 को जन्मे अमित शाह जी ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़कर की। इसके बाद उन्होंने भारतीय जनता पार्टी में विभिन्न संगठनात्मक जिम्मेदारियाँ निभाईं और गुजरात की राजनीति में सक्रिय भूमिका के माध्यम से अपना राजनीतिक अनुभव विकसित किया। वर्ष 2013 में उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय महासचिव और उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया। वर्ष 2014 में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का दायित्व संभालने के बाद उनके नेतृत्व में संगठन विस्तार, बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं की सक्रियता और चुनावी प्रबंधन को विशेष महत्व मिला। उनकी राजनीतिक यात्रा इस बात का उदाहरण है कि किसी बड़े संगठन की सफलता के लिए स्पष्ट दिशा, समर्पित कार्यकर्ता, मजबूत संपर्क व्यवस्था और जिम्मेदारियों का प्रभावी निर्वहन कितना आवश्यक होता है। किसी भी संगठन की वास्तविक शक्ति केवल उसके शीर्ष नेतृत्व में नहीं, बल्कि उन हजारों कार्यकर्ताओं में भी होती है, जो स्थानीय स्तर पर जनता से जुड़कर संगठन के उद्देश्यों को आगे बढ़ाते हैं। अमित शाह जी की संगठनात्मक कार्यशैली में लक्ष्य निर्धारण, कार्यकर्ताओं की भूमिका, परिस्थितियों का आकलन और योजनाओं के क्रियान्वयन जैसे पहलुओं को महत्वपूर्ण स्थान मिला है। इसी कारण भारतीय राजनीतिक विमर्श में उन्हें अक्सर ‘राजनीति का चाणक्य’ कहा जाता है। यह उपाधि मुख्यतः उनकी चुनावी रणनीति, संगठनात्मक विस्तार और राजनीतिक परिस्थितियों के विश्लेषण की क्षमता के संदर्भ में प्रचलित हुई है। हालाँकि, किसी भी सार्वजनिक व्यक्तित्व का वास्तविक मूल्यांकन केवल लोकप्रिय उपाधियों से नहीं, बल्कि उसके कार्यों, निर्णयों और उनके परिणामों से किया जाना चाहिए। अमित शाह जी का सार्वजनिक जीवन भारतीय राजनीति में संगठन तथा रणनीति की भूमिका को समझने का एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है। नक्सलवाद के विरुद्ध अभियान: दृढ़ संकल्प और परिणामोन्मुख कार्यपद्धति: केंद्रीय गृह मंत्री के रूप में अमित शाह जी की भूमिका का एक महत्वपूर्ण अध्याय नक्सलवाद और वामपंथी उग्रवाद के विरुद्ध अभियान रहा है। दशकों तक नक्सली हिंसा ने देश के अनेक क्षेत्रों में नागरिकों, सुरक्षा बलों और विकास कार्यों के सामने गंभीर चुनौतियाँ खड़ी कीं। विशेष रूप से छत्तीसगढ़, झारखंड और मध्य भारत के कई क्षेत्रों में इस समस्या का प्रभाव लंबे समय तक बना रहा। अमित शाह जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में देश को नक्सलवाद से मुक्त कराने के लिए 31 मार्च 2026 की समय-सीमा निर्धारित करने और उस दिशा में व्यापक अभियान चलाने पर जोर दिया। केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय, सुरक्षा बलों की कार्रवाई, खुफिया तंत्र की मजबूती, नक्सली नेटवर्क पर प्रहार, आत्मसमर्पण की नीति तथा प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्यों को इस रणनीति में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया। गृह मंत्रालय ने जुलाई 2026 में देश को वामपंथी उग्रवाद से मुक्त होने की घोषणा की। यह घटनाक्रम भारत की आंतरिक सुरक्षा के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना गया। इस अभियान में सुरक्षा बलों के साहस, अधिकारियों के योगदान, राज्य सरकारों के सहयोग और कठिन परिस्थितियों में कर्तव्य निभाने वाले जवानों की भूमिका को विशेष सम्मान के साथ याद किया जाना चाहिए। मेरे विचार में इस अभियान की महत्वपूर्ण विशेषता लक्ष्य को स्पष्ट रूप से निर्धारित करना और उसे प्राप्त करने के लिए समन्वित प्रयास करना है। किसी गंभीर राष्ट्रीय समस्या का समाधान केवल घोषणाओं से संभव नहीं होता। उसके लिए मजबूत इच्छाशक्ति के साथ प्रभावी रणनीति, संसाधनों का समुचित उपयोग, प्रशासनिक समन्वय और निरंतर निगरानी आवश्यक होती है। इसके साथ ही स्थायी शांति के लिए प्रभावित क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, रोजगार और संचार सुविधाओं का विस्तार भी उतना ही महत्वपूर्ण है। स्थानीय समुदायों का विश्वास, आदिवासी नागरिकों के अधिकारों का सम्मान और विकास के अवसरों की उपलब्धता ही शांति को स्थायी आधार प्रदान कर सकती है। किसी भी राष्ट्रीय अभियान की व्यापक सफलता तब और अधिक सार्थक होती है, जब उसका सकारात्मक प्रभाव आम नागरिकों के जीवन में दिखाई देने लगे। राष्ट्रीय सुरक्षा और न्याय व्यवस्था में सुधार: केंद्रीय गृह मंत्री के रूप में अमित शाह जी के दायित्व केवल नक्सलवाद के विरुद्ध अभियान तक सीमित नहीं हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद से मुकाबला, सीमाओं की सुरक्षा, आंतरिक कानून-व्यवस्था के विषयों पर केंद्र-राज्य समन्वय और देश की आपराधिक न्याय व्यवस्था में सुधार जैसे महत्वपूर्ण विषय भी गृह मंत्रालय के कार्यक्षेत्र में आते हैं। भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम के माध्यम से आपराधिक न्याय व्यवस्था में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए। ये कानून 1 जुलाई 2024 से लागू हुए। इनका उद्देश्य न्यायिक प्रक्रियाओं को आधुनिक बनाना, तकनीक और फॉरेंसिक के उपयोग को बढ़ाना तथा जांच और अभियोजन व्यवस्था में बदलाव लाना है। ऐसे सुधारों की वास्तविक सफलता प्रभावी क्रियान्वयन, पुलिस और न्यायिक तंत्र के प्रशिक्षण, पर्याप्त संसाधनों, समयबद्ध न्याय और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा से निर्धारित होती है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रताओं के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। सहकारिता से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने की दिशा: अमित शाह जी की जिम्मेदारियों में सहकारिता मंत्रालय भी शामिल है। भारत में सहकारी संस्थाओं की भूमिका कृषि, दुग्ध उत्पादन, ग्रामीण ऋण, विपणन और स्थानीय आर्थिक गतिविधियों में महत्वपूर्ण रही है। सहकारिता का मूल विचार सामूहिक प्रयास, साझा स्वामित्व और सदस्यों के हितों की रक्षा पर आधारित है। सहकारी संस्थाओं को आधुनिक तकनीक, पारदर्शी प्रबंधन, पेशेवर प्रशिक्षण और बाजार तक बेहतर पहुँच उपलब्ध कराकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है। इससे किसानों, छोटे उत्पादकों और ग्रामीण उद्यमियों के लिए नए अवसर विकसित होने की संभावना रहती है। इस क्षेत्र में संस्थाओं की वित्तीय स्थिति, लोकतांत्रिक संचालन, सदस्यों की भागीदारी और जवाबदेही पर ध्यान देना आवश्यक है। सहकारिता की सफलता तभी व्यापक होगी, जब उसका लाभ ग्रामीण परिवारों और स्थानीय समुदायों तक पहुँचे। सादगी, अध्ययनशीलता और कर्तव्यपरायणता: किसी व्यक्ति की पहचान केवल उसके पद से नहीं बनती। उसके व्यवहार, कार्य के प्रति दृष्टिकोण, अध्ययन की प्रवृत्ति, निर्णय लेने की क्षमता और जिम्मेदारियों के निर्वहन का तरीका भी उसके व्यक्तित्व को विशिष्ट बनाता है। अमित शाह जी के व्यक्तित्व में उनकी संगठनात्मक क्षमता, राजनीतिक रणनीति, अध्ययनशीलता और लक्ष्य के प्रति निरंतर सक्रियता को विशेष महत्व देते हैं। सार्वजनिक जीवन में अध्ययन और लेखन के प्रति रुचि किसी भी व्यक्ति को जटिल विषयों को समझने, तथ्यों का विश्लेषण करने और विभिन्न विकल्पों पर विचार करने में सहायता देती है। सादगी, सरलता, शुचिता, ईमानदारी और कर्तव्यपरायणता ऐसे मूल्य हैं, जिनका महत्व प्रत्येक सार्वजनिक सेवक के लिए है। इन मूल्यों की वास्तविक कसौटी सार्वजनिक आचरण, पारदर्शिता, जिम्मेदारी और कार्य के प्रति प्रतिबद्धता है। किसी भी पद पर आसीन व्यक्ति के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने दायित्वों को गंभीरता से निभाए और जनहित को अपने निर्णयों के केंद्र में रखे। अमित शाह जी की कार्यशैली से जुड़ा एक प्रमुख विचार यह है कि लक्ष्य निर्धारित करने के बाद उसके क्रियान्वयन पर निरंतर ध्यान दिया जाए। यह दृष्टिकोण केवल राजनीति तक सीमित नहीं है। प्रशासन, शिक्षा, उद्योग और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में भी स्पष्ट लक्ष्य, अनुशासन, अध्ययन और निरंतर परिश्रम सफलता के महत्वपूर्ण आधार हैं। विकास, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्र निर्माण: भारत का विकास केवल आर्थिक प्रगति और आधुनिक बुनियादी ढाँचे तक सीमित नहीं है। देश की सांस्कृतिक विरासत, ऐतिहासिक स्मृतियाँ, परंपराएँ और सामाजिक विविधता भी उसकी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। आधुनिक विकास और सांस्कृतिक संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना भारत जैसे विशाल देश के लिए विशेष महत्व रखता है। राष्ट्रीय नेतृत्व के सामने रोजगार सृजन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य सेवाएँ, कृषि की चुनौतियाँ, पर्यावरण संरक्षण और तकनीकी आत्मनिर्भरता जैसे अनेक विषय हैं। इन क्षेत्रों में प्रगति के लिए केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग, प्रभावी नीतियाँ, पारदर्शी प्रशासन और नागरिकों की भागीदारी आवश्यक है। किसी भी नेतृत्व की कार्यक्षमता का व्यापक मूल्यांकन इसी आधार पर होना चाहिए कि उसके निर्णयों से आम नागरिकों के जीवन में कितना सकारात्मक परिवर्तन आया, संस्थाएँ कितनी मजबूत हुईं और विकास के अवसर समाज के विभिन्न वर्गों तक किस सीमा तक पहुँचे। संकल्प, कर्म और राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता: अमित शाह जी की राजनीतिक यात्रा संगठन निर्माण, रणनीति, राष्ट्रीय सुरक्षा और प्रशासनिक जिम्मेदारियों के अनेक पहलुओं को सामने लाती है। उनके समर्थकों के लिए उनकी विशेष पहचान दृढ़ संकल्प, संगठनात्मक कौशल और परिणामोन्मुख कार्यशैली में है। वहीं, लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी नेता के कार्यों और नीतियों का निष्पक्ष मूल्यांकन भी आवश्यक है, ताकि उपलब्धियों के साथ चुनौतियों और भविष्य की जरूरतों को समग्रता में समझा जा सके। मेरे विचार में सार्वजनिक जीवन की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी यह है कि व्यक्ति अपने दायित्वों को कितनी गंभीरता से निभाता है और उसके कार्यों से राष्ट्र तथा समाज को कितना लाभ मिलता है। नेतृत्व का महत्व केवल लक्ष्य निर्धारित करने में नहीं, बल्कि उन लक्ष्यों को जनजीवन में सकारात्मक परिवर्तन के रूप में साकार करने के प्रयासों में है। अमित शाह जी के जन्मदिवस पर उनके सार्वजनिक जीवन की चर्चा करते हुए यही कामना है कि देश की सुरक्षा, विकास, सामाजिक सद्भाव और नागरिकों के कल्याण के लिए किए जाने वाले प्रयास निरंतर आगे बढ़ें। भारत का भविष्य मजबूत संस्थाओं, जागरूक नागरिकों, जवाबदेह नेतृत्व और सामूहिक राष्ट्रीय प्रयासों से निर्मित होगा। संकल्प तभी सार्थक होता है, जब वह कर्म में दिखाई दे; और कर्म तभी स्थायी महत्व प्राप्त करता है, जब उससे राष्ट्र और समाज के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आए। - डॉ. राकेश मिश्र पूर्व कार्यकारी सचिव, अमित शाह
एक ओर मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू भारत से 3,000 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता का लाभ ले रहे हैं, तो दूसरी ओर पाकिस्तान पहुंचकर रक्षा और समुद्री सहयोग सहित 20 समझौतों पर हस्ताक्षर कर रहे हैं। जिस भारत ने आर्थिक संकट के समय मालदीव को सहारा दिया, उसकी उदारता का लाभ उठाकर इस द्वीपीय देश के राष्ट्रपति अब पाकिस्तान के साथ सामरिक रिश्ते मजबूत करने में जुटे हैं। यह महज कूटनीतिक सक्रियता नहीं, बल्कि भारत के लिए एक गंभीर रणनीतिक सवाल है कि क्या उसका पड़ोसी उसकी आर्थिक सहायता को अपना अधिकार और उसके सामरिक हितों की अनदेखी को अपनी विदेश नीति की स्वतंत्रता समझने लगा है? देखा जाये तो मुइज्जू की पाकिस्तान यात्रा ने भारत की इसी चिंता को हवा दी है। एक दशक से अधिक समय बाद मालदीव का कोई राष्ट्रपति पाकिस्तान गया है। तीन दिवसीय इस यात्रा के दौरान पाकिस्तान के सेना प्रमुख और चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के साथ उनकी मुलाकात और रक्षा सहयोग बढ़ाने पर सहमति विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। दोनों देशों ने रक्षा, समुद्री सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अन्य क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए 20 समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए हैं। सवाल यह है कि इन समझौतों का वास्तविक स्वरूप क्या होगा, इनके क्रियान्वयन की दिशा क्या होगी और हिंद महासागर में इनका इस्तेमाल किस तरह किया जाएगा? इन सवालों के जवाब सामने आना अभी बाकी है, लेकिन भारत के लिए सतर्क होने की वजहें स्पष्ट हैं। इसे भी पढ़ें: Prabhasakshi NewsRoom: France से लेकर India तक हुए प्रदर्शनों के पीछे काम कर रहा था 13 देशों के 101 संगठनों का Network, Fox News ने किया बड़ा खुलासा! देखा जाये तो मालदीव कोई साधारण भौगोलिक इकाई नहीं है। हिंद महासागर में उसकी स्थिति उसे समुद्री व्यापार मार्गों, नौवहन की सुरक्षा और क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती है। भारत की समुद्री सुरक्षा का सीधा संबंध इस क्षेत्र में स्थिरता से है। मालदीव के साथ भारत के संबंध इसलिए भी अहम हैं, क्योंकि दोनों देशों के बीच समुद्री निगरानी, रक्षा प्रशिक्षण, आपदा प्रबंधन और सुरक्षा सहयोग का लंबा इतिहास रहा है। ऐसे में यदि पाकिस्तान इस रिश्ते में रक्षा और समुद्री सहयोग के माध्यम से अपनी जगह बनाने की कोशिश करता है, तो भारत को केवल द्विपक्षीय समझौतों की सूची नहीं, बल्कि उनके दीर्घकालीन सामरिक परिणामों पर भी नजर रखनी होगी। दूसरी ओर, पाकिस्तान की अपनी सीमाएं हैं। आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों से जूझ रहा पाकिस्तान मालदीव को भारत जैसी व्यापक आर्थिक सहायता देने की स्थिति में नहीं दिखता। फिर भी इस्लामाबाद के लिए माले के साथ बढ़ती नजदीकी का महत्व आर्थिक लाभ से कहीं अधिक कूटनीतिक और रणनीतिक हो सकता है। भारत के निकटवर्ती समुद्री क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने, दक्षिण एशिया में भारत की भूमिका को चुनौती देने और क्षेत्रीय मंचों पर अपने लिए समर्थन जुटाने की उसकी कोशिशों को इसी संदर्भ में देखना चाहिए। साथ ही मुइज्जू का पाकिस्तान में दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के शिखर सम्मेलन को जल्द बुलाने का आह्वान भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। उन्होंने कहा कि मालदीव सदस्य देशों से परामर्श कर सार्क की गतिविधियां दोबारा शुरू कराने के लिए तैयार है। सुनने में यह क्षेत्रीय सहयोग की सकारात्मक पहल लग सकती है, लेकिन इसकी पृष्ठभूमि को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वर्ष 2016 में इस्लामाबाद में प्रस्तावित सार्क शिखर सम्मेलन जम्मू-कश्मीर के उरी में हुए आतंकी हमले के बाद रद्द हो गया था। भारत का स्पष्ट रुख रहा है कि आतंकवाद और क्षेत्रीय सहयोग साथ-साथ नहीं चल सकते। पाकिस्तान को पहले ऐसा वातावरण बनाना होगा जिसमें आतंकवाद से मुक्त होकर सार्थक सहयोग संभव हो। ऐसे में मुइज्जू का पाकिस्तान की धरती से सार्क सम्मेलन बहाल करने की पैरवी करना भारत के लिए असहज करने वाला है। इससे पहले भी वह भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत आगे बढ़ाने के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभाने की पेशकश कर चुके हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या दक्षिण एशिया की समस्याओं का समाधान आतंकवाद पर पाकिस्तान की जवाबदेही तय किए बिना हो सकता है? क्या क्षेत्रीय सहयोग के नाम पर उस बुनियादी समस्या को किनारे रखा जा सकता है, जिसने सार्क को वर्षों से निष्क्रिय बना रखा है? भारत के लिए यह स्वीकार करना कठिन होगा कि आतंकवाद पर ठोस कार्रवाई के बिना पाकिस्तान को क्षेत्रीय कूटनीति के केंद्र में वापस लाने की कोशिश की जाए। हैरानी की बात यह भी है कि इसी दौरान भारत ने मालदीव की आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए 30 अरब रुपये की मुद्रा अदला-बदली सुविधा को आगे बढ़ाने की मंजूरी दी है। अप्रैल में दी गई इस राशि की सुविधा के तहत भारतीय रुपये तक पहुंच मालदीव को तरलता संबंधी दबाव से निपटने में मदद करती है। भारत 2012 से अब तक मालदीव को 1.1 अरब डॉलर से अधिक की मुद्रा अदला-बदली सहायता भी दे चुका है। इसके अलावा भारतीय निवेश से मालदीव के सरकारी ऋण-पत्रों को समर्थन मिला है। मालदीव की विदेश मंत्री ने इस फैसले के लिए भारत के प्रति आभार जताया और इसे दोनों देशों की पुरानी मित्रता का प्रमाण बताया है। देखा जाये तो भारत की सहायता को कमजोरी समझना मुइज्जू की सबसे बड़ी भूल होगी। भारत का सहयोग किसी राजनीतिक दल या राष्ट्रपति पर एहसान नहीं, बल्कि पड़ोस में स्थिरता, समृद्धि और साझा सुरक्षा सुनिश्चित करने की दीर्घकालीन नीति का हिस्सा है। लेकिन मित्रता का अर्थ सामरिक हितों के प्रति उदासीनता भी नहीं होता। आर्थिक सहायता और रक्षा सहयोग दो अलग-अलग विषय हैं, फिर भी जब कोई देश एक ओर भारत से वित्तीय सहारा ले और दूसरी ओर पाकिस्तान के साथ संवेदनशील क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाए, तो नई दिल्ली को अपने हितों की रक्षा के लिए स्पष्ट कूटनीतिक संदेश देना चाहिए। समय की मांग यही है कि भारत को मालदीव के साथ संवाद बनाए रखते हुए इन 20 समझौतों के वास्तविक क्रियान्वयन, रक्षा प्रशिक्षण, समुद्री सूचनाओं के आदान-प्रदान और संभावित सुरक्षा प्रभावों पर करीबी नजर रखनी चाहिए। साथ ही मालदीव को यह समझाना होगा कि हिंद महासागर में स्थिरता किसी तीसरे देश के विरुद्ध खेमेबंदी से नहीं, बल्कि पारदर्शी और भरोसेमंद सहयोग से मजबूत होती है। मुइज्जू को तय करना होगा कि उनकी विदेश नीति का आधार दीर्घकालीन राष्ट्रीय हित हैं या भारत-विरोधी संतुलन साधने की राजनीतिक कवायद। मालदीव की भौगोलिक स्थिति उसे रणनीतिक महत्व देती है, लेकिन यही स्थिति उसे बड़ी शक्तियों की प्रतिस्पर्धा का मैदान भी बना सकती है। पाकिस्तान के साथ समझौते करना मालदीव का संप्रभु निर्णय है; मगर उन समझौतों के वास्तविक परिणामों को लेकर भारत की चिंता भी उतनी ही जायज है। बहरहाल, हिंद महासागर में भारत अपनी सुरक्षा को लेकर कोई जोखिम नहीं उठा सकता। मित्रता का हाथ बढ़ाना उसकी ताकत है, लेकिन उस ताकत का अर्थ यह नहीं कि उसके सामरिक हितों की अनदेखी की जाए और वह चुपचाप तमाशा देखता रहे। मुइज्जू की पाकिस्तान यात्रा ने नई दिल्ली के सामने एक स्पष्ट चुनौती रख दी है। यह चुनौती है पड़ोसियों की आर्थिक मदद जारी रखते हुए यह सुनिश्चित करना कि भारत की उदारता उसके अपने सामरिक हितों के विरुद्ध इस्तेमाल न होने पाए। -नीरज कुमार दुबे
Gyanesh Kumar के इस्तीफे पर 23 Oct को किसान-सिविल सोसायटी का मार्च, कैसे निपटेगी सरकार?
शिक्षा क्षेत्र में सुधार के लिए मेघालय सरकार प्रतिबद्ध, 2,000 से अधिक स्कूलों को किया गया अपग्रेड
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कांग्रेस ने राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े जमीन के एक सौदे पर भी सवाल उठाए हैं। जयराम रमेश के मुताबिक, संबंधित जमीन को शाम 7:10 बजे तिवारी और अंसारी ने कुसुम पाठक से दो करोड़ रुपये में खरीदा था। इसके पांच मिनट बाद, शाम 7:15 बजे, उसी जमीन को राम मंदिर ट्रस्ट ने कथित तौर पर 18.5 करोड़ रुपये में खरीद लिया।
Rubio के लिए Modi से बड़े Ambani? Epstein Files का दबाव या कुछ और, Modi सरकार दरकिनार क्यों?
ई-मुद्रा मामले : सरकार ने जांच के दिए निर्देश
मुंबई, डिजिटल सिग्नेचर और आम जनता तक पहुंच के लिए वेबसाइट्स को सिक्योरिटी सर्टिफिकेट जारी करने वाली ई-मुद्रा को लेकर सरकार की ओर से सुरक्षा जांच के निर्देश के बाद, कंपनी के शेयरों में भारी गिरावट दर्ज की गई है।
कोई भी हारने वाले को पसंद नहीं करता। कोई भी धमकाया जाना पसंद नहीं करता। फिर भी हम खड़े हैं, हम धरती पर सबसे बड़ी महाशक्ति हैं और हर कोई हमारे हिस्से का खा रहा है। यह ठीक नहीं है। अगर मैं अपना धंधा ऐसे चलाता तो खुद को बाहर कर देता। अमेरिका को फिर से जीतना शुरु करना होगा। आओ हम सब मिलकर अमेरिका को मजबूत बनाएं और उसे फिर से महान बनाएं। इन शब्दों के साथ अकड़ते और हवा में मुट्टियां लहराते हुए डोनाल्ड जॉन ट्रंप ने जून 2015 में दुनिया की सबसे ताकतवर कुर्सी को हासिल करने के लिए अपने शुरु किए चुनाव प्रचार को जीत के साथ समाप्त किया था। कट टू 2024 हम अपने देश को ठीक करने में मदद करने जा रहे हैं। हमारे पास एक ऐसा देश है जिसे मदद की ज़रूरत है और उसे मदद की सख्त ज़रूरत है। हम अपनी सीमाएं फिक्स करने जा रहे हैं। हम सब कुछ फिक्स करने जा रहे हैं। इन लाइनों के साथ अपनी चुनावी जीत के बाद ट्रंप ने ये दर्शाया था कि आने वाले दिनों में कुर्सी संभालने के बाद उनके तेवर कैसे रहने वाले हैं। जनवरी 2024 में दोबारा से शपथ लेने के तुरंत बाद इन्होंने कहा कि अवैध अप्रवासियों को बर्थ राइट सिटीजनशिप नहीं मिलेगी। फिर कहा ड्राइवर गाड़ी निकालो हमें डब्लूएचओ से बाहर जाना है। फिर कहा क्लाइमेट चेंज बकवास है। अमेरिका पेरिस समझौते जैसी फालतू चीज में शामिल नहीं होगा। दुनिया मतलब राष्ट्रपति बने थे अमेरिका के लेकिन दुनिया को ये दिखा रहे थे कि नहीं मैं पूरी दुनिया का राष्ट्रपति बन गया हूं। जिसे चाह रहे थे उसे धमका रहे जिसे जैसे चाह रहे थे उसके साथ वैसा बर्ताव कर रहे थे। किसी की बेइज्जती वाइट हाउस में बिठाकर कर रहे थे। तो किसी की बेइज्जती अपने बयान में बयानों में कर रहे थे। न क्या आप यकीन करेंगे कि वही ट्रंप जो दुनिया को धमका रहे थे अब से पहले तक वो ट्रंप आज गिड़गिड़ा रहे हैं। अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मुश्किलें बढ़ती दिखाई दे रही है। एक तरफ देश में महंगाई और बढ़ती कीमतों से आम जनता परेशान है तो दूसरी तरफ ट्रंप की लोकप्रियता में भी लगातार गिरावट देखने को मिल रही है और अब इन सबका असर नवंबर में होने वाले मध्यावधि यानी कि मिड टर्म चुनाव पर दिखाई दे सकता है। अमेरिका में 3 नवंबर को मिड टर्म चुनाव होने हैं और इन चुनाव से यह तय होगा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी अमेरिकी संसद यानी कि कांग्रेस के दोनों सदनों में आप अपना बहुमत बचा पाती है या फिर नहीं। लेकिन चुनाव से ठीक पहले सामने आए कई सर्वेक्षणों यानी कि सर्वे में रिपब्लिकन पार्टी की चिंता बढ़ गई है। इन सर्वेक्षणों में डेमोक्रेटिक पार्टी को बढ़त मिलती दिखाई दे रही है और सबसे बड़ी बात यह है कि अमेरिकी मतदाता अब अर्थव्यवस्था, महंगाई और सरकार की नीतियों को लेकर सवाल उठा रहे हैं। कई लोगों का मानना है ट्रंप की नीतियों की वजह से उनकी रोजमर्रा की जिंदगी और ज्यादा महंगी हो गई है यानी महंगाई बढ़ी है। ऐसे में सवाल है क्या अमेरिका की जनता ट्रंप सरकार के कामकाज से नाराज है? क्या यह नाराजगी चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी को भारी पड़ सकती है? और अगर डेमोक्रेटिक पार्टी जीत जाती है तो ट्रंप के लिए आगे की राह कितनी मुश्किल हो जाएगी? आइए इस पूरी राजनीतिक तस्वीर का एमआरआई स्कैन करते हैं। इसे भी पढ़ें: Mukesh Ambani के कारोबारी सामर्थ्य का अचानक मुरीद क्यों हुआ अमेरिका? Marco Rubio ने Jamnagar Refinery में क्या क्या देखा? दुनिया को धमकाने वाले ट्रंप गिड़गिड़ाने क्यों लगे आपने देखा होगा किस तरीके से अमेरिका ने रशिया से डीजल खरीदने की डील की वो कोई आम डील नहीं थी। वो डीजल जरूर आम हो सकता है। 3 लाख टन डीजल जरूर आम सी बात हो सकती है। जरूर किसी और देश से ज्यादा पैसे में अमेरिका खरीद सकता था उस डीजल को लेकिन रशिया के सामने ही क्यों इसके लिए गिड़गिड़ाया? क्यों यूक्रेन को अकेला छोड़ दिया? जिस यूक्रेन को बिलियंस ऑफ डॉलर दिए कि रूस के साथ लड़ाई करो। मतलब दुनिया में बहुत सारी चीजें ऐसे जापान का साथ छोड़ दिया। साउथ कोरिया को मना कर दिया। यूक्रेन का नेट बंद करवा दिया। आइलॉन मस्क के यूरोप का नेट की स्पीड घटवा दी। डेनमार्क को धमका दिया कि हमें ग्रीनलैंड चाहिए ही चाहिए। वो ट्रंप आज दुनिया के सामने गिड़गिड़ा रहे हैं। दुनिया में भी पहले रूस के सामने गिड़गिड़ाए और अब भारत में उनका संदेश लेकर मार्को रूबियो फिलहाल भारत में मौजूद है। मार्को रूबियो जामनगर रिफाइनरी में गए। जामनगर की रिफाइनरी वो रिफाइनरी है जो रोजाना 14 लाख बैरल तेल रिफाइन करती है । वेनेजुएला के तेल पर कब्जा तो अमेरिका ने कर लिया लेकिन उसे रिफाइन नहीं कर सकता। उसके लिए भारत की जरूरत होगी। आज अमेरिका को डीजल की जरूरत है। पेट्रोल की जरूरत है और इसी वजह से जो अप्रूवल रेटिंग है ट्रंप की वो लगातार घटती जा रही है क्योंकि अमेरिका में महंगाई लगातार बढ़ रही है। अमेरिका में रहना मुश्किल हो गया है। अमेरिका में रहना महंगा हो गया है। खाना महंगा हो गया है। ऊर्जा महंगी हो गई है। तो अब विटर्म में जाने वाले हैं ट्रंप रिपब्लिकन पार्टी डेमोक्रेटिक पार्टी है। दोनों पार्टियां चुनाव में जाने वाली हैं। 3 नवंबर को यह चुनाव है। ट्रंप चाहते हैं कि 3 नवंबर से पहले लगभग 10-12 दिन जो हैं उससे पहले पहले वो सब कुछ ठीक कर लें। जो महंगाई आउट ऑफ कंट्रोल जा चुकी है उसे वो कंट्रोल कर रहे हैं। कई रिपोर्ट्स दावा करती है कि अमेरिका में रहने वाले चार लोगों में से तीन लोग ट्रंप से नफरत करते हैं। ट्रंप की नीतियों का समर्थन नहीं करते। मतलब 25% लेकिन कुछ रिपोर्ट्स फिर भी थोड़ा सा दावा करती हैं कि नहीं थोड़ी सी इज्जत बची हुई है और अभी लगभग 31% तक ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग है। इसे भी पढ़ें: रूस पर चौंकाया...भारत पहुंचते ही अमेरिका के विदेश मंत्री ने किया बड़ा धमाका, सब हैरान! 34% अमेरिकी ट्रंप के कामकाज से संतुष्ट आपको बता दें कि अप्रूवल रेटिंग जो होती है वो डोनाल्ड ट्रंप की गिरती जा रही है। अब अप्रूवल रेटिंग का मतलब यह होता है कितने लोग राष्ट्रपति के कामकाज से संतुष्ट हैं और कितने लोग उनसे असहमत हैं। एनबीसी न्यूज़ के एक रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ 34% अमेरिकी ट्रंप के कामकाज से संतुष्ट हैं। जबकि 66% लोगों ने उनके प्रदर्शन पर असहमति जताई है। इस सर्वेक्षण में 51% लोगों ने तो ट्रंप के कामकाज से बहुत ज्यादा असहमति जताई है और यह उनके दूसरे कार्यकाल के दौरान इस सर्वे में दर्ज किया जा किया गया सबसे ऊंचा आंकड़ा बताया जा रहा है। वहीं वाशिंगटन पोस्ट एबीसी न्यूज़ और जो एप्सोस में सर्वे हुए हैं उसमें ट्रंप के अप्रूवल रेटिंग सिर्फ 33% सामने आई है। जबकि 66% लोगों ने उनके कामकाज को लेकर असहमति जताई है। यह आंकड़ा भी इस सर्वेक्षण के इतिहास में ट्रंप का सबसे कमजोर प्रदर्शन बताया गया। यानी कि सर्वे के आंकड़े साफ संकेत दे रहे हैं कि ट्रंप को लेकर अमेरिकी मतदाताओं के बीच असंतोष बढ़ा है। महंगाई बनी ट्रंप की सरकार की सबसे पर बड़ी परेशानी ये लोगों का कहना है क्योंकि ये सबसे बड़ा मुद्दा है किसी भी देश के लिए सरकार का चुनावी भविष्य तय करने के लिए ये बड़ी भूमिका भी निभाता है और यह मुद्दा है अर्थव्यवस्था का। इसे भी पढ़ें: US Presidential Election 2028 | राष्ट्रपति चुनाव के लिए जेडी वेंस को समर्थन देने पर डोनाल्ड ट्रंप का टालमटोल, कहा- 'अभी बहुत जल्दी है' क्या चुनाव जीत पाएंगे ट्रंप? हालांकि इसका मकसद ट्रंप के समर्थकों की भागीदारी बढ़ाना था। लेकिन इस कदम से डेमोक्रेट और निर्दलीय मतदाता भी उनकी मतलब जैसे उन्होंने कहा कि हर सीट पर आप ट्रंप को ही मानकर चलिए कि ट्रंप चुनाव लड़ रहे हैं। चाह तो थे चाहते थे कि रिपब्लिकन की जो वोट है वो बढ़े लेकिन यहां पर मामला उल्टा पड़ गया। उल्टा यहां पर अगर डेमोक्रेट्स की बात करें तो उनका कहना है कि ट्रंप ने खर्च कम करने और युद्ध खत्म करने के अपने चुनावी वादों को पूरा नहीं किया। उन्होंने वादा किया कि अगर मतदाता उन्हें किसी भी सदन में बहुमत देते हैं तो वो अमेरिकियों के जीवन यापन का खर्च कम करने के लिए काम करेंगे और कथित भ्रष्टाचार के लिए प्रशासन को जवाबदेह ठहराएंगे। यहां पर अगर आपको बात करें तो ऊर्जा जो है वो 34% तक महंगी हो चुकी है। खाना पीना ढाई से तीन गुना तक ढाई से 3% तक महंगा हो चुका है। यहां पर ये अमेरिका के हाल हैं। अमेरिका की अगर बात करें तो ट्रिपल ए के अनुसार पेट्रोल की राष्ट्रीय औसत कीमत $4.28 है जो 1 साल पहले की तुलना में $1.2 ज्यादा है। मतलब $5 प्रति गैलन तक यहां पर कीमत बढ़ चुकी है। डीजल की कीमतें लगभग 3 गैलन $3 प्रति गैलन तक यहां पर बढ़ चुकी हैं। और अगर बाकी बात करें तो गृह सुरक्षा विभाग के आंकड़ों से पता चलता है कि जो बाइडन के प्रशासन की तुलना में दक्षिणी पश्चिमी सीमा में पकड़े गए जो प्रवासी आते हैं उनमें कमी आई है। 95% तक उनका आना कम हुआ है। लेकिन बाकी जो चीजें हैं वो यहां पर महंगी हुई हैं। अमेरिका में रहना महंगा हो चुका है। मतलब एक रिपोर्ट यह दावा करती है कि अगर किसी परिवार का खर्च महीने का अमेरिका में रहने का अब तक $3000 था तो वो अब यहां मतलब अगर मौजूदा वक्त की बात करें तो वो $311 तक पहुंच चुका है। मतलब $11 की बढ़ोतरी पिछले कुछ महीनों में हुई है। जिस तरीके से ईरान ने स्टेट ऑफ़ होर्मुज चौक की हुई है और बाबल मंदिर पर कब्जा किसका है? हूतियों का कब्जा है। हूतियों को हथियार कौन दे रहा है? चीन और रूस दे रहे हैं। ईरान को हथियार कौन दे रहा है? चीन और रूस दे रहे हैं। ईरान का तेल कौन खरीद रहा है? चीन खरीद रहा है। मतलब एक तरीके से अमेरिका को पूरी तरीके से रशिया और चाइना ने काउंटर कर लिया है। घेर कर मार दिया है। अब यहां जीत तो बहुत दूर की बात है। हार भी बहुत बुरी ना ट्रंप की हो जाए। ये कहा जा रहा है अमेरिका में। जो डेमोक्रेट्स हैं उनकी जो रेटिंग है या फिर जो उनका आंकड़ा है जिस तरीके से भी अमेरिका में ये गिनती होती होगी वो 92% 52% के पार पहुंच चुका है। वहीं ट्रंप की पार्टी की बात करें तो 42 फ़ीसदी पर अटकी हुई है। और अगर ये अप्रूवल रेटिंग नहीं बढ़ी तो फिर रिपब्लिकनंस चुनाव हार जाएंगे और राष्ट्रपति तो रहेंगे। ट्रंप 4 साल तक आने वाले 2 साल भी राष्ट्रपति तो रहेंगे। लेकिन काम क्या कुछ कर पाएंगे या नहीं कर पाएंगे वह वक्त बताएगा। रिपब्लिकन के सामने क्या चुनौती रिपब्लिकन पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह मतदाताओं को कैसे भरोसा दिलाएं कि उनकी नीतियां अर्थव्यवस्था को बेहतर बना सकती है। डेमोक्रेटिक पार्टी को सर्वेक्षणों में बढ़त मिलती दिखाई दी है। देखिए चुनावी मुकाबले की बात करें तो सर्वे में डेमोक्रेटिक पार्टी रिपब्लिकन पार्टी से आगे दिख रही है। एबीसी न्यूज़, वाशिंगटन पोस्ट और कई ऐसे अमेरिकी जो चैनल्स हैं उसके सर्वे में प्रतिनिधि सभा के चुनाव के लिए डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों को 52% और रिपब्लिकन उम्मीदवारों को 44% समर्थन मिला। यानी डेमोक्रेट्स को 8% अंकों की बढ़त दिखाई दी। वहीं रटर्स और अह इप्सोस के सर्वेक्षण में डेमोक्रेटिक पार्टी को बढ़त मिली। इस सर्वेक्षण में डेमोक्रेट्स को 47 और रिपब्लिकन पार्टी को 35% समर्थन मिला। यानी कि यहां भी अंतर 12% अंकों का है। इन आंकड़ों से पता चलता है चुनाव से पहले डेमोक्रेटिक पार्टी का प्रदर्शन बेहतर दिखाई दे रहा है। हालांकि यह याद रखना जरूरी है कि राष्ट्रीय सर्वेक्षणों के आधार पर सीधे चुनाव के नतीजों का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है।
इस्लाम के सबसे पवित्र शहर मक्का की एक मस्जिद में अशोभनीय कृत्य के मामले में सऊदी अरब ने दो बांग्लादेशी नागरिकों को मृत्युदंड दे दिया है। 14 अक्टूबर को हुई इन फाँसियों ने न केवल धार्मिक स्थलों की मर्यादा और सऊदी अरब के कठोर दंड कानूनों पर बहस छेड़ दी है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर न्यायिक पारदर्शिता और विदेशों में काम करने वाले प्रवासी नागरिकों के अधिकारों को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि बांग्लादेश सरकार के अनुसार, उसे इन मृत्युदंडों के क्रियान्वयन से पहले आधिकारिक सूचना नहीं दी गई थी। ढाका अब रियाद से पूरे मामले का ब्योरा माँग रहा है। पवित्र स्थल में कथित कृत्य, फिर मृत्युदंड सऊदी अरब के गृह मंत्रालय के अनुसार, मृत्युदंड पाने वाले बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान नज़रुल इस्लाम अब्दुल बशीर और सिटी अख्तर के रूप में की गई है। अधिकारियों का कहना है कि दोनों को मक्का की एक मस्जिद में अनैतिक कृत्य करने के मामले में गिरफ्तार किया गया था। जाँच के बाद मामला अदालत में पहुँचा, जहाँ आरोप सिद्ध होने पर दोनों को मृत्युदंड सुनाया गया। संबंधित न्यायिक प्राधिकरण से फैसले की पुष्टि और शाही आदेश के बाद 14 अक्टूबर को सजा लागू कर दी गई। इसे भी पढ़ें: Saudi Aramco Attack | सऊदी अरामको पर दहलाने वाला ड्रोन हमला! दो की मौत और घायल लोगों में एक भारतीय भी शामिल, अमेरिका ने जारी किया देश छोड़ने का फरमान सऊदी अधिकारियों ने अपने बयान में धार्मिक स्थल की पवित्रता, अपराध की गंभीरता और समय-स्थान की मर्यादा के उल्लंघन को सजा का आधार बताया। हालाँकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि कथित कृत्य वास्तव में क्या था, घटना किस मस्जिद में हुई थी और आरोपियों के खिलाफ कौन-कौन से साक्ष्य प्रस्तुत किए गए थे। हालांकि सोशल मीडिया पर दावे किये जा रहे हैं कि दोनों को केवल चुंबन लेने या किसी खास प्रकार की शारीरिक निकटता के कारण मृत्युदंड दिया गया। हालांकि ये सोशल मीडिया के दावे हैं इसके बारे में कोई प्रमाण नहीं हैं। बांग्लादेश सरकार ने उठाए सवाल देखा जाये तो इस मामले का सबसे गंभीर पहलू केवल मृत्युदंड नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया को लेकर पैदा हुआ विवाद है। बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय और जेद्दा स्थित उसके वाणिज्य दूतावास ने कहा है कि उन्हें फाँसी से पहले इसकी सूचना नहीं मिली थी। ढाका ने सऊदी अधिकारियों को राजनयिक पत्र भेजकर आरोपों का पूरा विवरण, अदालत के फैसलों की प्रतियाँ और मृत्युदंड की प्रक्रिया से संबंधित जानकारी माँगी है। बांग्लादेश सरकार ने यह भी जानना चाहा है कि उसके नागरिकों को मुकदमे के दौरान किस प्रकार की कानूनी सहायता उपलब्ध कराई गई और राजनयिक मिशन को समय रहते जानकारी क्यों नहीं दी गई? देखा जाये तो किसी विदेशी नागरिक को मृत्युदंड देने से पहले उसके देश को हर परिस्थिति में सूचना देना और हिरासत में लिए गए व्यक्ति के कांसुलर अधिकारों की रक्षा करना सभी सरकारों का दायित्व होता है। इस्लामी कानून में ताज़ीर का क्या अर्थ है? उधर, सऊदी अरब ने इस मामले में ‘ताज़ीर’ के अंतर्गत मृत्युदंड दिए जाने की बात कही है। इस्लामी न्यायशास्त्र में ताज़ीर उन अपराधों के लिए विवेकाधीन दंड की श्रेणी है, जिनकी सजा निर्धारित करने में न्यायाधीश को लागू कानूनी व्यवस्था के अंतर्गत भूमिका मिलती है। यह ऐसा प्रावधान नहीं है जिसके अंतर्गत प्रत्येक अनुचित व्यवहार के लिए स्वतः मृत्युदंड निर्धारित हो जाता हो। यही इस मामले का सबसे संवेदनशील प्रश्न है: यदि अपराध की प्रकृति और उसके प्रमाण सार्वजनिक नहीं हैं, तो आम लोग यह कैसे समझें कि इतनी कठोर सजा किन परिस्थितियों में उचित मानी गई? देखा जाये तो न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता केवल सजा देने से नहीं, बल्कि स्पष्ट आरोप, विश्वसनीय साक्ष्य, निष्पक्ष सुनवाई और जवाबदेह प्रक्रिया से भी स्थापित होती है। यह भी ध्यान रखना होगा कि इस्लामी कानून की व्याख्या और उसका क्रियान्वयन हर मुस्लिम देश में एक समान नहीं है। सऊदी अरब की कानूनी व्यवस्था को सीधे बांग्लादेश या दुनिया के सभी मुसलमानों की धार्मिक समझ का प्रतिनिधि मानना उचित नहीं होगा। धार्मिक स्तर पर क्या होंगे प्रभाव? उल्लेखनीय है कि मक्का और मदीना दुनिया भर के मुसलमानों के लिए अत्यंत पवित्र स्थान हैं। मक्का में मस्जिद अल-हरम और काबा का विशेष धार्मिक महत्त्व है। ऐसे स्थान पर मर्यादा के उल्लंघन का आरोप स्वाभाविक रूप से धार्मिक भावनाओं को प्रभावित करता है। सऊदी सरकार की दृष्टि में कठोर कार्रवाई पवित्र स्थलों की प्रतिष्ठा और अनुशासन बनाए रखने का संदेश हो सकती है। लेकिन इस घटना का दूसरा पहलू भी है। धार्मिक आस्था और न्यायिक प्रक्रिया को एक-दूसरे का विरोधी नहीं होना चाहिए। यदि किसी अपराध के लिए कठोरतम दंड दिया जाता है, तो उसके आधार और प्रक्रिया की स्पष्टता भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण हो जाती है। धार्मिक स्थलों के सम्मान की रक्षा के नाम पर न्यायिक पारदर्शिता के प्रश्नों को अनदेखा नहीं किया जा सकता। बांग्लादेश में सामाजिक और राजनीतिक असर दूसरी ओर, बांग्लादेश में इस मामले का प्रभाव तीन स्तरों पर पड़ सकता है। एक तो विदेशों में काम करने वाले नागरिकों की सुरक्षा और उनके कानूनी अधिकारों को लेकर सरकार पर दबाव बढ़ सकता है। दूसरा, सऊदी अरब में काम कर रहे लाखों बांग्लादेशी श्रमिकों के परिवारों के बीच चिंता पैदा हो सकती है। साथ ही धार्मिक आस्था और मृत्युदंड की कठोरता को लेकर सार्वजनिक बहस तेज हो सकती है। रिपोर्टों के अनुसार, सऊदी अरब में लगभग 35 लाख बांग्लादेशी कामगार रहते हैं और वहाँ से भेजी जाने वाली रकम बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था तथा अनेक परिवारों की आजीविका के लिए महत्त्वपूर्ण है। ऐसे में यह मामला केवल दो व्यक्तियों तक सीमित नहीं रह जाता; यह प्रवासी श्रमिकों की कानूनी सुरक्षा और दोनों देशों के राजनयिक संबंधों से भी जुड़ जाता है। बहरहाल, मक्का की मस्जिद से जुड़ा यह मामला एक बुनियादी सवाल सामने रखता है कि क्या किसी पवित्र स्थल की मर्यादा की रक्षा और न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता साथ-साथ सुनिश्चित नहीं की जानी चाहिए? सऊदी अरब ने धार्मिक स्थल की पवित्रता के उल्लंघन को मृत्युदंड का आधार बताया है, जबकि बांग्लादेश अब आरोपों, अदालती फैसलों और राजनयिक सूचना की पूरी जानकारी माँग रहा है। सजा के पक्ष में कोई भी तर्क दिया जाये लेकिन किसी भी न्याय व्यवस्था की वास्तविक कसौटी केवल उसकी कठोरता नहीं, बल्कि उसका न्यायपूर्ण, पारदर्शी और जवाबदेह होना भी है। -नीरज कुमार दुबे
गुजरात स्थित जामनगर में बुधवार को एक ऐसी मुलाकात हुई, जिसके मायने किसी औद्योगिक दौरे से कहीं ज्यादा बड़े हैं। अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो दुनिया की सबसे बड़ी सिंगल-साइट ऑयल रिफाइनरी देखने पहुंचे, जहां रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर मुकेश अंबानी तथा एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अनंत अंबानी ने उनका स्वागत किया। उनके साथ भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर भी मौजूद रहे। सवाल यह है कि अमेरिका के शीर्ष राजनयिक ने दिल्ली के बजाय जामनगर को इतना महत्व क्यों दिया? जवाब है तेल, ऊर्जा सुरक्षा, वेनेजुएला का भारी कच्चा तेल और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर बढ़ता दबाव। हम आपको बता दें कि जामनगर में रुबियो को केवल रिफाइनरी की विशाल मशीनें और अत्याधुनिक तकनीक नहीं दिखाई गई, बल्कि रिलायंस के उस औद्योगिक सामर्थ्य से भी परिचित कराया गया, जिसकी जरूरत आज अमेरिका को भी महसूस हो रही है। कंपनी के मुताबिक, अंबानी ने उन्हें रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स के अलावा निर्माणाधीन डेटा सेंटरों और चरणबद्ध तरीके से शुरू हो रही न्यू एनर्जी गीगा-फैक्ट्रियों की जानकारी दी। बातचीत में पारंपरिक ऊर्जा, नई ऊर्जा, तकनीकी सहयोग, मजबूत सप्लाई चेन और डेटा सेंटरों के लिए भरोसेमंद बिजली की जरूरत जैसे मुद्दे शामिल रहे। यानी चर्चा सिर्फ तेल खरीदने-बेचने की नहीं, बल्कि ऊर्जा और डिजिटल अर्थव्यवस्था के भविष्य की भी थी। इसे भी पढ़ें: मार्को रूबियो की भारत यात्रा के पीछे की रणनीतिक साझेदारी या दबाव की कूटनीति को बारीकी से समझिए आखिर जामनगर में ऐसा क्या है? हम आपको बता दें कि जामनगर रिफाइनरी कॉम्प्लेक्स की संयुक्त कच्चा तेल प्रसंस्करण क्षमता प्रतिदिन 14 लाख बैरल है। इसमें 1999 में शुरू हुई पहली रिफाइनरी और 2008 में चालू हुई निर्यात-केंद्रित दूसरी रिफाइनरी शामिल हैं। रिलायंस के मुताबिक, यह कॉम्प्लेक्स 216 से अधिक प्रकार के कच्चे तेल का प्रसंस्करण कर चुका है। इसकी सबसे बड़ी ताकत भारी और अधिक सल्फर वाले कच्चे तेल को भी उपयोगी पेट्रोलियम उत्पादों में बदलने की क्षमता है। यही क्षमता इसे अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से अहम बनाती है। वेनेजुएला का भारी कच्चा तेल दुनिया की हर रिफाइनरी आसानी से संसाधित नहीं कर सकती। लेकिन रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी इस मामले में विशिष्ट क्षमता रखती है। अमेरिका की वेनेजुएला-केंद्रित तेल रणनीति और वहां से कच्चे तेल की आपूर्ति बढ़ाने की कोशिशों के बीच रिलायंस एक महत्वपूर्ण संभावित साझेदार बनकर उभरी है। रुबियो ने साफ कहा कि रिलायंस के पास वेनेजुएला समेत पश्चिमी देशों में निकलने वाले भारी कच्चे तेल को रिफाइन करने की खास क्षमता है। यही वजह है कि अमेरिका रिलायंस के साथ मिलकर काम करने के नए रास्ते तलाश रहा है। अनुमानों के मुताबिक, अक्टूबर में रिलायंस हर दिन वेनेजुएला से करीब 3.5 लाख से 3.7 लाख बैरल कच्चा तेल मंगा सकती है। इससे साफ है कि वेनेजुएला के तेल को इस्तेमाल करने की अमेरिकी रणनीति में जामनगर रिफाइनरी की भूमिका बेहद अहम हो सकती है। अमेरिका की परेशानी और रिलायंस की अहमियत इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा पहलू अमेरिकी घरेलू अर्थव्यवस्था है। अमेरिका में डीजल की कीमतों में उछाल और ईंधन आपूर्ति को लेकर चिंताओं के बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन पर भारी दबाव है। नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले महंगे ईंधन का मुद्दा राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील है। रिलायंस इस तस्वीर में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जामनगर से डीजल, पेट्रोल और विमानन ईंधन सहित बड़ी मात्रा में रिफाइंड उत्पाद दुनिया भर में भेजे जाते हैं। रिपोर्टों के मुताबिक 2025 की पहली छमाही में जामनगर से 2.166 करोड़ टन रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात हुआ। इसमें 98.1 लाख टन डीजल, 61.4 लाख टन पेट्रोल और 20.6 लाख टन जेट ईंधन शामिल था। यूरोप इन उत्पादों का सबसे बड़ा क्षेत्रीय बाजार रहा। साथ ही अमेरिका के लिए रिलायंस की अहमियत सिर्फ उसकी रिफाइनरी तक सीमित नहीं है। भारत में अमेरिकी गैस की बढ़ती मांग भी इसकी बड़ी वजह है। भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर के मुताबिक, पिछले एक साल में भारत के कुल एलपीजी आयात में अमेरिकी गैस की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से बढ़कर 67 प्रतिशत हो गई है। यानी अब भारत को एलपीजी सप्लाई करने वाला अमेरिका सबसे बड़ा देश बन गया है। अमेरिका में अंबानी का निवेश भी चर्चा के केंद्र में इसके अलावा, रुबियो के दौरे के पीछे एक और बड़ा आर्थिक पहलू है। ट्रंप प्रशासन अमेरिका में औद्योगिक उत्पादन और रोजगार वापस लाने की नीति को अपनी प्रमुख उपलब्धियों के रूप में पेश करता रहा है। इसी सिलसिले में टेक्सास के पोर्ट ऑफ ब्राउन्सविल में प्रस्तावित नई तेल रिफाइनरी में रिलायंस की भागीदारी को खास महत्व दिया जा रहा है। अमेरिका में करीब पांच दशकों बाद लगने जा रही इस प्रमुख नई रिफाइनरी पर लगभग 3 से 4 अरब डॉलर खर्च होने का अनुमान है। इसकी सालाना प्रसंस्करण क्षमता करीब 6 करोड़ बैरल अमेरिकी कच्चे तेल की होगी। रिलायंस ने इसके उत्पादन का बड़ा हिस्सा खरीदने के लिए 20 साल का समझौता किया है और इसके 2029 के आसपास परिचालन शुरू करने की उम्मीद है। रूस का तेल, यूक्रेन युद्ध और भारत पर अमेरिकी दबाव रिलायंस की अहमियत का तीसरा पहलू रूस-यूक्रेन युद्ध है। 2022 में युद्ध शुरू होने के बाद भारत रूसी तेल का बड़ा खरीदार बनकर उभरा और रिलायंस ने भी रूसी कच्चे तेल का आयात बढ़ाया। कंपनी के तेल स्रोतों में रूस की हिस्सेदारी 2022 से पहले लगभग 3 प्रतिशत थी, जो 2025 में बढ़कर करीब 50 प्रतिशत तक पहुंच गई। रूसी तेल खरीदने के मुद्दे पर ट्रंप प्रशासन ने भारत पर अतिरिक्त टैरिफ का दबाव बनाया। इसके बाद रिलायंस ने रूसी कच्चे तेल का आयात घटाया। रुबियो ने स्वीकार किया कि भारत अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता ला रहा है, लेकिन रूस से बड़ी मात्रा में तेल खरीदना तुरंत बंद करना आसान नहीं है। उन्होंने भारत को अमेरिका का महत्वपूर्ण साझेदार भी बताया। अमेरिकी मीडिया की नजर में यह दौरा क्यों खास है? उधर, अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय मीडिया इस दौरे को सिर्फ एक कारोबारी मुलाकात के तौर पर नहीं देख रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि रिलायंस अमेरिका के कई अहम हितों से जुड़ी हुई है। अमेरिका चाहता है कि भारत रूसी तेल पर अपनी निर्भरता कम करे, वेनेजुएला के तेल का ज्यादा इस्तेमाल हो, ईंधन की कीमतों पर काबू पाया जा सके और अमेरिकी कंपनियों में निवेश बढ़े। इन सभी मुद्दों पर रिलायंस की भूमिका अहम हो सकती है। अंबानी बनाम मस्क: अमेरिकी हितों की एक और पेचीदगी दिलचस्प बात यह है कि जहां ट्रंप प्रशासन रिलायंस के साथ ऊर्जा सहयोग बढ़ाने की संभावनाएं तलाश रहा है, वहीं ट्रंप के करीबी एलन मस्क का रिलायंस से टकराव भी सामने आया है। मस्क की कंपनी स्टारलिंक भारत में परिचालन लाइसेंस हासिल करने की कोशिश कर रही है। मस्क ने आरोप लगाया कि भारत में जियो को फायदा पहुंचाने के लिए स्टारलिंक के प्रवेश में बाधाएं डाली जा रही हैं। रिलायंस ने जवाब दिया कि उसे प्रतिस्पर्धा से कभी डर नहीं लगा और वह घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय निवेश एवं नवाचार का स्वागत करने वाले भारत में विकसित हुई है। देखा जाये तो यही विरोधाभास इस पूरे घटनाक्रम को और दिलचस्प बनाता है। अमेरिका के कारोबारी और राजनीतिक हित हर मुद्दे पर एक जैसे नहीं हैं, लेकिन ऊर्जा के मोर्चे पर रिलायंस की क्षमता वॉशिंगटन को उसके साथ बातचीत के लिए प्रेरित कर रही है। कुल मिलाकर देखें तो जामनगर में मार्को रुबियो का दौरा भारत की औद्योगिक ताकत और मुकेश अंबानी के कारोबारी सामर्थ्य का भी बड़ा संकेत है। दुनिया के सबसे ताकतवर देशों में शामिल अमेरिका के विदेश मंत्री का भारत आकर किसी उद्योगपति के साथ ऊर्जा और निवेश जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा करना अपने आप में खास है। इससे पता चलता है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में रिलायंस की क्षमता और जामनगर रिफाइनरी की अहमियत को अमेरिका भी गंभीरता से लेता है। रिलायंस ने भी अपने बयान में कहा है कि इस दौरे के दौरान पारंपरिक और नई ऊर्जा के क्षेत्र में कारोबारी साझेदारी की संभावनाओं, सस्ती और भरोसेमंद ऊर्जा आपूर्ति, आधुनिक तकनीक और मजबूत सप्लाई चेन पर चर्चा हुई। कंपनी ने अमेरिकी कंपनियों के साथ तकनीक, इंजीनियरिंग और आधुनिक विनिर्माण के क्षेत्र में सहयोग की संभावनाओं पर भी अपने विचार रखे। बहरहाल, जामनगर से निकला संदेश साफ है कि भारत की औद्योगिक ताकत और मुकेश अंबानी की कारोबारी क्षमता को अमेरिका भी नजरअंदाज नहीं कर सकता। अमेरिकी विदेश मंत्री का किसी भारतीय उद्योगपति से मिलने के लिए उसके औद्योगिक परिसर तक पहुंचना इस बात को रेखांकित करता है कि वैश्विक ऊर्जा की राजनीति में रिलायंस की भूमिका कितनी अहम हो गई है। यह सिर्फ अंबानी की कारोबारी सफलता की कहानी नहीं, बल्कि भारत की उस बढ़ती ताकत का भी संकेत है, जिसके साथ अमेरिका अपने ऊर्जा और आर्थिक हितों को जोड़कर देख रहा है। -नीरज कुमार दुबे
विजयादशमी पर सनातन विजय व राष्ट्र को नशामुक्त करने का संकल्प
असत्य पर सत्य की विजय का महापर्व विजयादशमी रावण के पुतलों के दहन के साथ धूमधाम से संपन्न हो चुका है। इस अवसर पर देशभर में भव्य कार्यक्रमों का आयोजन हुआ। इसी दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपना स्थापना दिवस मनाया। यह अवसर संकल्पों का अवसर भी रहा इनमें सबसे महत्वपूर्ण संकल्प गृहमंत्री अमित शाह ने पंजाब में लिया। गृहमंत्री ने दिसंबर 2029 तक पंजाब को नशे से मुक्ति दिलाने का संकल्प लिया। यह एक देशव्यापी संकल्प है क्योंकि आज केवल पंजाब में ही नहीं अपितु अन्य प्रान्तों के युवाओं को भी नशे की लत में झोंका जा रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विजयादशमी कार्यक्रम को सर संघचालक डा. मोहन भागवत ने संबोधित किया। उन्होंने यूरोप के देशों मे हो रहे विरोध प्रदर्शनों, जेन-जी और एआई पर अपने विचार व्यक्त करते हुए नई पीढ़ी को एकजुटता का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि भारत की प्रगति के लिए एकजुटता बहुत जरूरी है। भारत विकास की राह पर अग्रसर है, अभी विकास पूरा नही हुआ है तो समस्याएं तो रहेंगी ही, समस्या के चलते आंदोलन होते ही हैं और लोकतंत्र मे आंदोलन होंगे ही किंतु आंदोलन समाधान के लिए होना चाहिए समस्या के लिए नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि हमें पश्चिम में चली आंधी से बचना ही होगा हमारी किसी भी कृति से समाज में अनबन, द्वेष या विभाजन पैदा नहीं होना चाहिए। डॉ. भागवत ने चेताया कि आंदोलन किसी दूसरे लक्ष्य से चले तो वह राजनीतिक साधन बन जाता है। इसका लाभ भारत को दबाने वाली शक्तियां लेती हैं। वे भारत को बांटकर दूसरा वर्ग बनाती हैं असंतोष और अराजकता भड़काती हैं। उन्होंने कहा कि पश्चिम से आंधी चली है जो हर तरह की व्यवस्था, भद्रता, मांगल्य और सांस्कृतिक मानवीय संस्कार से विरोध रखती है। फ्रांस, अल्बानिया, बांग्लादेश और नेपाल में क्या हुआ ये सब किया कराया उनका ही है उन लोगों का कहना है कि रिजीम चेंज करने से परिस्थिति बनती है लेकिन ऐसा कभी हुआ नहीं है पहले नहीं हुआ है और आज भी नहीं हुआ है। इसे भी पढ़ें: सरसंघचालक मोहन भागवत का संदेश: सत्ता परिवर्तन का भ्रम और राष्ट्र की आंतरिक स्थिरता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दशहरा उत्सव में भाग लेते हुए देश के दुश्मनों को स्पष्ट चेतावनी दी कि हम 2047 तक भारत को विकसित भारत बनाकर ही रहेंगे। प्रधानमंत्री ने वस्तुतः अपने नये नारे “हम करके रहेंगे“ को ही दोहराया और बता दिया है कि अंत में विजय हमारी ही होगी। प्रधानमंत्री ने देश के सामने आ रही वर्तमान चुनौतियों से मिलकर लड़ने का संदेश दिया और देश के सभी राजनैतिक दलों व समस्त संवैधानिक संस्थाओं से राष्ट्रहित में एकजुट हो जाने का आह्वान किया। प्रधानमंत्री ने देश के तीन दुश्मनों का उल्लेख करते हुए कहा कि देश के मान सम्मान को नुकसान पहुंचाने वाली ताकतें, समाज में फूट डालने वाले लोग और भारतीय समाज से नफरत करने वाली सोच ऐसी चुनौतिया हैं जिनका सामना देश को मिलकर करना होगा। उन्होंने देश की एकता व संस्कृति को मजबूत बनाए रखने पर बल दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भगवान राम के आदर्शों को याद करते हुए कहा कि रामराज्य में शासन का उद्देश्य जनकल्याण होता है। वहां भेदभाव की जगह न्याय और सभी को समान अवसर देना होता है। साथ ही गरीबों, वंचितों की सेवा करना भी है, सरकार और समाज दोनों का ध्यान इन लोगों की सहायता पर होना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी के संबोधन से आगामी समय में सरकार द्वारा लिए जाने वाले संभावित साहसिक निर्णयों व संकल्पों का संदेश भी निकल रहा है। संभव है सरकार संसद के माध्यम से अपने कुछ ऐतिहासिक संकल्पों को पूर्ण करने के लिए आगे बढ़े और इसी कारण से प्रधानमंत्री ने देशहित में सभी राजनीतिक दलों से एकजुटता का आह्वान किया है। सरकार परिसीमन बिल, महिला आरक्षण बिल तथा एक देश एक चुनाव व्यवस्था पर आगे बढ़ना चाहती है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि वर्तमान समस्याओं का अंत रामराज्य के माध्यम से ही संभव है। प्रधानमंत्री मोदी ने अयोध्या में दिए गए अपने संबोधन को स्मरण किया और प्रभु श्रीराम के गुणों व विशेषताओं का वर्णन करते हुए राम राज्य की स्थापना व उस समय लिए गए सभी संकल्पों को पूर्ण करने का भी स्मरण किया और कहा कि “अंत में विजय हमारी ही होगी।“ उन्होंने कहा कि आज देश का जन-मन अधर्म पर धर्म की जीत का उद्घोष कर रहा है भगवान राम ने रावण का अंत किया और मानवता को ऐसे आदर्श दिए जो इतिहास में अतुलनीय हैं। भगवान राम ने कठिनाईयों के बाद भी सत्य और नीति का मार्ग नहीं छोड़ने की सीख दी। उधर उत्तर प्रदेश में सभी की दृष्टि गोरखपुर में आयोजित विजयादशमी उत्सव के अवसर पर उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के संबोधन पर भी टिकी हुई थी। योगी जी ने अपनी चिर-परिचित शैली में सनातन की बात की। उन्होंने अयोध्या की रामलीला, दीपोत्सव और राम मंदिर निर्माण का उल्लेख करते हुए कहा कि जिन लोगों ने अयोध्या की रामलीला तक नहीं देखी वे भी वहां को लेकर दुष्प्रचार कर रहे हैं। योगी ने कहा कि राम मंदिर का निर्माण तय समय से पहले हो गया है। जो लोग कभी अयोध्या गए ही नहीं उन लोगों को भगवान श्रीराम के मंदिर का निर्माण कैसे बर्दाश्त होगा। उन्होंने समाज को जाति, क्षेत्र और भाषा के नाम पर बांटने वालों की तुलना रावण से की और कहा कि देश को कमजोर करने का प्रयास करने वाले लोगों में रावण की आत्मा आ गई है। उन्होंने कहा कि कालनेमि भी राम-राम कहता था उन्होंने लोगों से बजरंग बली की तरह सही और गलत की पहचान करने की अपील की। महाराष्ट्र से देवेन्द्र फड़नवीस, उत्तराखंड से पुष्कर सिंह धामी, असम से हिमंता बिस्वा सरमा और पश्चिम बंगाल से शुभेंदु अधिकारी के सन्देश और संकल्प भी चर्चा में रहे। - मृत्युंजय दीक्षित
सौरव दास और आशुतोष रांका की जमानत पर शायना एनसी का तंज, कहा-'जमानत कोई जीत नहीं, कोर्ट की सख्त शर्त है'
भगवंत मान के पेरिस दौरे पर भाजपा का आरोप, महंगे जूते और डिजाइनर सूट की कस्टम जांच पर उठाए सवाल
नई दिल्ली : पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के पेरिस दौरे से लौटने के बाद दिल्ली हवाई अड्डे पर कथित तौर पर हिरासत में लिए जाने का मामला राजनीतिक विवाद में बदल गया है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने बुधवार को आम आदमी पार्टी (आप) पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि मान के पास महंगे जूते, डिजाइनर सूट, आभूषण और इत्र थे, जिनकी सीमा शुल्क विभाग के सामने कथित तौर पर घोषणा नहीं की गई थी। भाजपा ने इस मामले को लेकर आप पर जनता के सामने गलत तस्वीर पेश करने और 'विक्टिम कार्ड' खेलने का आरोप लगाया। हालांकि, भाजपा के इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और मुख्यमंत्री मान या आप की ओर से तत्काल कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। दिल्ली एयरपोर्ट पर हिरासत का क्या है पूरा मामला? आम आदमी पार्टी ने रविवार को आरोप लगाया था कि पेरिस से लौटने के बाद भगवंत मान को दिल्ली हवाई अड्डे पर करीब तीन घंटे तक हिरासत में रखा गया। पार्टी ने यह भी दावा किया कि इस दौरान उन पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया। आप के अनुसार, अधिकारियों ने कार्रवाई के पीछे 'ऊपर से भारी दबाव' होने की बात कही थी। हालांकि, पार्टी ने यह स्पष्ट नहीं किया था कि मुख्यमंत्री को किन परिस्थितियों में रोका गया और कथित जुर्माना किस आधार पर लगाया गया। इसी मुद्दे को लेकर भाजपा ने अब मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के नेतृत्व पर सवाल खड़े किए हैं। भाजपा ने महंगे जूतों और इत्र को लेकर क्या कहा? भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर वीडियो संदेश जारी कर भगवंत मान पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि मुख्यमंत्री पेरिस में छुट्टियां मनाने गए थे और वहां से लौटते समय उनके पास करीब 2.5 लाख रुपये के जूते, उनकी पत्नी के लिए लाखों रुपये के सूट तथा महंगे इत्र थे। भंडारी के मुताबिक, इन वस्तुओं की सीमा शुल्क विभाग के समक्ष घोषणा नहीं की गई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि जब कथित अनियमितता सामने आई, तो आम आदमी पार्टी ने खुद को पीड़ित दिखाने की कोशिश शुरू कर दी। भाजपा प्रवक्ता ने अपने संदेश में कहा कि यदि किसी ने नियमों का उल्लंघन किया है, तो उसे कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, महंगी वस्तुओं की खरीद, उनकी कीमत और सीमा शुल्क नियमों के कथित उल्लंघन से संबंधित इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। करदाताओं के पैसे से छुट्टियां मनाने का आरोप भंडारी ने अपनी एक्स पोस्ट में सवाल उठाया कि यदि मुख्यमंत्री के पास महंगे जूते, इत्र, आभूषण और डिजाइनर कपड़े थे, तो उनकी घोषणा सीमा शुल्क विभाग को क्यों नहीं की गई। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मान का पेरिस दौरा जनता के पैसे के इस्तेमाल को लेकर सवाल खड़े करता है। भाजपा प्रवक्ता ने दावा किया कि मुख्यमंत्री के इस कथित आचरण से पंजाब के लोगों का अपमान हुआ है। उन्होंने आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल को भी निशाने पर लिया और दिल्ली में उनके सरकारी आवास को लेकर लगाए जाने वाले भाजपा के पुराने आरोपों का जिक्र किया। भंडारी ने आरोप लगाया कि केजरीवाल ने दिल्ली में आलीशान आवास बनवाने के लिए सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग किया। उन्होंने पंजाब में नशे की समस्या का मुद्दा उठाते हुए कहा कि राज्य सरकार को इस समस्या से निपटने पर ध्यान देना चाहिए, न कि विदेश यात्राओं पर। आप और भगवंत मान की प्रतिक्रिया का इंतजार भाजपा ने इस पूरे मामले को आम आदमी पार्टी की राजनीति और शासन व्यवस्था से जोड़ते हुए मुख्यमंत्री से जवाब मांगा है। दूसरी ओर, आप ने पहले हिरासत और जुर्माने को लेकर सवाल उठाए थे। अब भाजपा के नए आरोपों पर मुख्यमंत्री या पार्टी की ओर से तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।
चुनौतियों के बावजूद बढ़ती हिंदी
बांग्ला संस्कृति का मूल स्वर सहिष्णुता, उदारता और समन्वय का रहा है। उन्नीसवीं सदी में बंगाल की धरती ने नवजागरण का स्वागत किया, जिसके मूल में ईश्वरचंद्र विद्यासागर और स्वामी विवेकानंद के विचार रहे। इस समन्वय की संस्कृति का ही असर रहा कि बंगाल की ही धरती से ना सिर्फ हिंदी पत्रकारिता का उद्भव हुआ, बल्कि उसकी जड़ें मजबूत भी हुईं। लेकिन वही बंगाल बदल गया है। बांग्ला संस्कृति समन्वय के सूत्रों को कहीं पीछे छोड़ती नजर आने लगी है। अगर ऐसा नहीं होता तो कोलकाता नगर निगम के उस पोस्टर पर विवाद नहीं होता, जिसमें बांग्ला और हिंदी भाषा के शब्दों का अनूठा और कलात्मक संगम था। बांग्ला संस्कृति के प्रतीक पर्व दुर्गा पूजा के दौर में भाषायी सौंदर्य और कला के अनूठे मेल पर राजनीति ने जब सवाल उठाया तो कोलकाता नगर निगम ने अपना पोस्टर ही वापस ले लिया। शायद निगम ने सोचा होगा कि उत्साह और उल्लास का स्वाद राजनीतिक कंकड़ से खराब ना हो। जिस पोस्टर पर विवाद हुआ, उसके बारे में जानना जरूरी है। यह भी जानना जरूरी है कि आखिर उसमें क्या रहा, जिससे पश्चिम बंगाल का विपक्षी दल तृणमूल कांग्रेस परेशान हो गया। दरअसल दुर्गा पूजा के दौरान दस से 21 अक्टूबर तक कोलकाता नगर निगम ने देश की पूर्व राजधानी वाले शहर में चलाए जा रहे सफाई अभियान के लिए एक विशेष पोस्टर जारी किया था। जिसमें लिखा था, 'मायेर कोरबो स्वच्छता से स्वागत' यानी मां दुर्गा का स्वागत स्वच्छता से करेंगे। जैसा कि शब्दों से पता चलता है, पोस्टर के अकेले वाक्य में बांग्ला और हिंदी शब्दों का अनूठा मेल पेश किया गया। विज्ञापन के भाषा की जिन्हें समझ है, उन्हें पता है कि बांग्ला और हिंदी के इस अनूठे मेल के जरिए जो संदेश दिया गया, वह कितना प्रभावी रहा। लेकिन तृणमूल कांग्रेस को इस वाक्य के तीन शब्द ‘स्वच्छता से स्वागत’ बंगाल में हिंदी थोपने का षडयंत्र नजर आने लगा। वैसे भी राज्य में अब भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। भाजपा की पहचान हिंदुत्व और हिंदी को लेकर रही है। इसलिए तृणमूल के लिए यह आरोप लगाना और उसे भाजपा के हिंदी वर्चस्ववाद के छद्म नैरेटिव से जोड़ना आसान रहा। लेकिन कोलकाता नगर निगम ने राजनीति से किनारा करना उचित समझा और इसे बदलने में उसने देर नहीं लगाई। पोस्टर के वाक्य को पूरी तरह बांग्ला कर दिया, 'स्वच्छतार साथे, मां के स्वागत जनाई' कर दिया। बांग्ला के इस वाक्य का भाव वही है, जो पहले वाक्य का रहा। अफसोस यह कि राजनीति की वजह से भाषाई मेल का अनूठापन गायब हो गया। इसे भी पढ़ें: आस्था के सैलाब में कब तक गुम होती रहेगी जिंदगियां? संविधान सभा में हिंदी को जितनी चुनौतियों का सामना नहीं करना पड़ा, उससे ज्यादा हिंदी इन दिनों वह चुनौतियों से जूझ रही है। वैसे तो तमिल जैसी क्षेत्रीय राजनीतिक अस्मिताएं हिंदी की राह में रोड़े डालती रही हैं। इसका साथ कभी कर्नाटक तो कभी महाराष्ट्र देता रहा है। यहां गौर करने की बात यह है कि भारतीय राष्ट्रीयता के अंतर्गत कई उपराष्ट्रीयताएं भी हैं, जिसे हम क्षेत्रीय अस्मिताओं के नाम से भी जानते हैं। भारतीय राष्ट्रीयता का मूल स्वर हिंदी के जरिए उद्घाटित होता है। जिसे हम हिंदी हार्टलैंड या हृदय प्रदेश कहते हैं, वहां राष्ट्रीयता पर अपवादस्वरूप ही सवाल उठते हैं। लेकिन उपराष्ट्रीयताएं अक्सर हिंदी पर हमले के बहाने राष्ट्रीयता को प्रकारांतर से चुनौती देती रहती हैं। तब उनका एक मात्र तर्क यही होता है कि हिंदी थोपी जा रही है। दिलचस्प यह है कि जिस भाषा ने करीब दो सौ साल तक देश को गुलाम बनाए रखा, उसे अपनाने में उपराष्ट्रीयताएं गर्व समझती हैं। संविधान सभा की आखिरी बैठक के दिन सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ने खुलेतौर पर स्वीकार किया था कि भाषा की समस्या का ठोस हल सभा नहीं निकाल पायी है। फिर भी उन्हें उम्मीद थी कि आने वाले दिनों में भाषा के मुद्दे पर देश गांधी की तरह सोचेगा। हालांकि महावीर प्रसाद त्यागी को ऐसी उम्मीद नहीं थी। इसीलिए उन्होंने अपने आखिरी भाषण में कहा था कि वे संविधान के पृष्ठों पर गांधीजी को खोज रहे हैं, लेकिन उन्हें गांधी नजर नहीं आए। पता नहीं, तृणमूल कांग्रेस को यह पता है या नहीं, लेकिन उसे जानना चाहिए कि आर्य समाज के प्रमुख ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश को हिंदी में लिखने के लिए बांग्ला माटी के सपूत केशवचंद्र सेन ने स्वामी दयानंद सरस्वती को प्रेरित किया था। भावी भारत की संपर्क या राष्ट्रभाषा बनने की क्षमता हिंदी में देखने वाले प्राथमिक लोगों में केशवचंद्र सेन भी रहे। कांग्रेस का अध्यक्ष बनने के बाद बंगाल की माटी के क्रांतिकारी सपूत सुभाष चंद्र बोस ने ना सिर्फ हिंदी सीखने के लिए शिक्षक रखा था, बल्कि उन्होंने कोलकाता नगर निगम के अध्यक्ष के नाते पिछली सदी के तीस के दशक में हिंदी को लेकर अर्थपूर्ण भाषण भी दिया था। हिंदी पर सवाल कभी-कभी कर्नाटक में भी उठता है और किंचित महाराष्ट्र में भी। लेकिन हिंदी को स्वाधीनता से पहले से ही सबसे बड़ी चुनौती तमिलनाडु में मिलती रही है। हाल ही में तमिलनाडु के करूर और कोयंबटूर के सरकारी अस्पतालों में मरीजों को दी जाने वाली दवाओं के पर्चे के कवर पर तमिल और अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी में भी निर्देश छापे गए थे। जिसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर जारी करते हुए विपक्षी द्रमुक पार्टी के नेता टी.आर.बी. राजा ने सवाल उठाया कि क्या तमिलनाडु में चुपचाप 'तीन-भाषा नीति' लागू की जा चुकी है। हिंदी की ग्रंथि से प्रभावित तमिलनाडु राजनीति सवाल उठाए तो विवाद होना ही था। जब विवाद बढ़ा तो दोनों सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों ने मरीजों को दिए जाने वाले त्रिभाषी कवर का वितरण तत्काल रोक दिया और उसकी जगह तमिल और अंग्रेजी लिखी पर्चियां जारी कर दीं। तमिलनाडु में हाल ही में राजमार्ग के साइनबोर्ड पर हिंदी लिखे जाने को लेकर भी विवाद खड़ा किया गया। राज्य के तूतीकोरिन जिले के सत्तानकुलम-नाजरेथ राज्य राजमार्ग 93 पर हिंदी में जगहों का नाम लिखा जाना यहां की विपक्षी राजनीति को रास नहीं आया। जब विवाद बढ़ा तो दो सहायक इंजीनियरों भूमिनाथन और मुथु लक्ष्मी को निलंबित कर दिया गया। इतना ही नहीं, साइनबोर्ड से तत्काल हिंदी नामों को मिटा दिया गया। दरअसल, हाईवे पर लगे नए साइनबोर्ड में तमिल और अंग्रेजी के साथ कस्बों के नाम हिंदी में भी लिखे गए थे। हिंदी उस राज्य के लिए कितनी खतरनाक हो सकती है, जिसकी एक मंत्री एस कीर्तना ने मई में शपथ लेते ही हिंदी बोलकर लोगों का दिल जीत लिया था। तब उनका तर्क था कि हिंदी के जरिए वे अपने नेता यानी जोसेफ विजयन की नीतियों को व्यापक समुदाय तक पहुंचाना चाहती हैं। राजनीति के चलते भले ही कोलकाता नगर निगम और तमिलनाडु सरकार झुक गए हों, लेकिन देश की सहज संपर्क भाषा को चुनौती समझने वाले इन राज्यों की राजनीति को समझना होगा कि उनके विरोध के बावजूद हिंदी खुद बढ़ रही है। कोलकाता में पोस्टर तैयार करने वाले दिमाग और हाथों को हिंदी के प्रयोग के जरिए भाषायी चमत्कार करना कलात्मक लगता है तो यह हिंदी की ही जीत है। तमिलनाडु के वे इंजीनियर भी बधाई के पात्र हैं, जिन्होंने लीक पर चलने की बजाय राजमार्ग के पास के शहरों और कस्बों के नामों को देवनागरी में लिखना उचित समझा। चाहे पोस्टर तैयार करने वाला दिमाग हो या फिर कस्बों का नाम हिंदी में उकेरने वाले विचार, उनकी नजर में हिंदी कोई चुनौती नहीं, बल्कि भारतीय अभिव्यक्ति का विस्तार है। इसलिए उन हाथों और दिमागों का स्वागत किया जाना चाहिए। - उमेश चतुर्वेदी लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं
बिहार MLC चुनाव आज, 8 सीटों पर 150 उम्मीदवारों की किस्मत दांव पर
बिहार विधान परिषद (एमएलसी) की आठ सीटों के लिए प्रचार बुधवार शाम 5 बजे समाप्त हो गया। मतदान 23 अक्टूबर को सुबह 8 बजे से शाम 4 बजे तक होगा।
अदालतों के जरिए चुनाव रोकने की कोशिश कर रही है वाईएसआaरसीपी : चंद्रबाबू नायडू
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने वाईएसआर कांग्रेस पार्टी पर आरोप लगाया कि वह अदालतों का दरवाजा खटखटाकर चुनाव और विकास कार्यों को रोकने की कोशिश कर रही है।
आंध्र प्रदेश के साथ नए तनाव के बीच, ओडिशा के मंत्री ने कोटिया सीमा विवाद पर कार्रवाई का आश्वासन दिया
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अदालतों के जरिए चुनाव रोकने की कोशिश कर रही है वाईएसआरसीपी : चंद्रबाबू नायडू
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'सरकारी मदरसों में भी लागू हो एक जैसी नीति', सीएम धामी के फैसले पर वीएचपी प्रवक्ता विनोद बंसल
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जम्मू-कश्मीर में मेडिकल इंटर्न्स को बड़ी राहत, मासिक वजीफा बढ़कर 25,000 रुपए हुआ
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सरसंघचालक मोहन भागवत का संदेश: सत्ता परिवर्तन का भ्रम और राष्ट्र की आंतरिक स्थिरता
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने नागपुर में संघ के शताब्दी वर्ष के ऐतिहासिक विजयदशमी उत्सव (20 अक्टूबर 2026) के मंच से एक ऐसा वैचारिक विमर्श देश के सामने रखा है, जो केवल तात्कालिक राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि दीर्घकालिक राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक भू-राजनीति की गहरी समझ को रेखांकित करता है। उन्होंने समकालीन विश्व की उथल-पुथल, विशेषकर बांग्लादेश, नेपाल और पश्चिम के देशों में मचे सामाजिक-राजनीतिक घमासान का हवाला देते हुए एक अत्यंत गंभीर और दूरगामी वक्तव्य दिया। उनका यह स्पष्ट कथन कि “रिजीम चेंज करने से परिस्थितियां नहीं बदलतीं, ऐसा पहले भी नहीं हुआ है और आज भी नहीं होगा”, आज के वैश्विक और भारतीय परिदृश्य में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विचारणीय विमर्श की मांग करता है। यह विश्लेषण इस बात को गहराई से रेखांकित करता है कि आखिर क्यों बाहरी सत्ताओं का बदलना किसी देश की बुनियादी समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं हो सकता, और क्यों भारत को वैश्विक 'आसुरी ताकतों' के इस चक्रव्यूह से सावधान रहने की आवश्यकता है। इतिहास और समकालीन विश्व राजनीति इस बात की गवाह हैं कि जब-जब किसी राष्ट्र में व्यवस्था को भीतर से सुधारने के बजाय हिंसक, अराजक या विदेशी प्रायोजित तरीकों से केवल 'शीर्ष' को बदलने का प्रयास किया गया है, वहां की जनता को विनाशकारी परिणाम भुगतने पड़े हैं। मोहन भागवत ने अपने संबोधन में फ्रांस, अल्बानिया, बांग्लादेश और नेपाल जैसे विविध भौगोलिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि वाले देशों के उदाहरण देकर इसी शाश्वत सत्य की ओर दुनिया का ध्यान आकर्षित किया। पश्चिम से उठे सांस्कृतिक मार्क्सवाद या 'वोक' विमर्श के उस आधुनिक तूफान का जिक्र करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि यह केवल सत्ताओं को बदलने का साधारण राजनीतिक आंदोलन नहीं है, बल्कि यह हर स्थापित मानवीय मूल्य, पारंपरिक सामाजिक ताने-बाने, पारिवारिक मर्यादाओं और राष्ट्रीय अस्मिता को मटियामेट करने की एक अत्यंत अराजक चेष्टा है। जब किसी समाज में केवल स्थापित सत्ता को उखाड़ फेंकने को ही परम लक्ष्य मान लिया जाता है, तो उसके बाद पैदा होने वाला शून्यता का दौर उस देश को गृहयुद्ध, आर्थिक कंगाली और चरमपंथ की आग में झोंक देता है। हाल के वर्षों में हमने देखा है कि जिन भी देशों में बाहरी ताकतों के सहयोग या आंतरिक उन्माद के दम पर अचानक 'रिजीम चेंज' हुआ, वहां लोकतंत्र मजबूत होने के बजाय अराजकता, कट्टरपंथ और सेना का दखल अधिक गहरा हो गया। भागवत का यह बयान इसी कड़वी हकीकत का एक ऐतिहासिक, प्रासंगिक और दार्शनिक विश्लेषण है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसे भी पढ़ें: VHP ने RSS पर टिप्पणी को लेकर Rahul Gandhi पर साधा निशाना, बताया मानसिक दिवालियापन भारत के संदर्भ में संघ प्रमुख का यह वक्तव्य एक अत्यंत महत्वपूर्ण सामरिक चेतावनी के रूप में सामने आता है। वर्तमान में भारत वैश्विक पटल पर आर्थिक, सामरिक, कूटनीतिक और तकनीकी मोर्चे पर अद्वितीय प्रगति कर रहा है और एक महाशक्ति के रूप में उभर रहा है। लेकिन इस अभूतपूर्व प्रगति के साथ ही भारत के प्रति वैश्विक शक्तियों की ईर्ष्या और असहजता भी खतरनाक स्तर पर बढ़ी है। सरसंघचालक ने बहुत ही बेबाकी से उन 'आसुरी ताकतों' की ओर इशारा किया जो दुनिया भर में अपने आर्थिक और राजनीतिक वर्चस्व को साधे रखने के लिए विभिन्न देशों में अपने 'पिट्ठू' स्थापित करना चाहती हैं। चूंकि ये ताकतें भारत को सैन्य या आर्थिक रूप से सीधे टक्कर देने की स्थिति में नहीं हैं, इसलिए वे भारत के भीतर ही अदृश्य विभाजनकारी रेखाएं खींचने का कुत्सित प्रयास कर रही हैं। जाति, भाषा, प्रांतीयता, वर्ग और संप्रदाय के नाम पर समाज को आपस में लड़ाना इन ताकतों का मुख्य सामरिक औजार बन चुका है। भारत को अस्थिर करने के लिए एक सुनियोजित 'नैरेटिव वॉर' और 'टूलकिट' प्रोपेगैंडा चलाया जा रहा है, जिसका एकमात्र उद्देश्य देश की संवैधानिक संस्थाओं, न्यायपालिका और सुरक्षा तंत्र की विश्वसनीयता को धूल-धूसरित करना है। हाल के दिनों में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य संवैधानिक पदों के खिलाफ जिस तरह के प्रायोजित, हिंसक और तीखे प्रदर्शन देखने को मिले हैं, वे इसी गहरी वैश्विक साजिश का हिस्सा प्रतीत होते हैं, जिसका लक्ष्य देश में एक कृत्रिम संकट पैदा करना है। एक जीवंत लोकतंत्र में असहमति, विरोध और शांतिपूर्ण आंदोलन स्वाभाविक हैं और इन्हें किसी भी जागरूक समाज का आवश्यक लक्षण माना जाना चाहिए। मोहन भागवत ने भी अपने भाषण में स्पष्ट किया कि व्यवस्था की कमियों के खिलाफ आवाज उठाना जनता का लोकतांत्रिक अधिकार है और इसमें कुछ भी गलत नहीं है। परंतु, समस्या तब उत्पन्न होती है जब इन आंदोलनों का नियंत्रण और फंडिंग देशविरोधी ताकतों, विदेशी संस्थाओं या संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थों के हाथ में चला जाता है। ऐसी स्थिति में वे आंदोलन राष्ट्र की संप्रभुता और अखंडता के लिए सीधा खतरा बन जाते हैं। यही कारण है कि संघ प्रमुख ने देश के प्रदर्शनकारियों, नागरिक समाज, प्रशासनिक तंत्र और राजनीतिक नेतृत्व—सभी से एक सुर में संविधान, कानून और नागरिकता के दायरे में रहकर काम करने की पुरजोर अपील की है। किसी भी लोकतांत्रिक देश में यदि सड़कों पर होने वाले हिंसक फैसले संसद और सर्वोच्च न्यायालयों से बड़े होने लगेंगे, तो वह देश बहुत जल्द अराजकता के गर्त में गिर जाएगा। आंदोलनों को राजनीतिक रोटियां सेकने और देश को वैश्विक स्तर पर बदनाम करने का जरिया बनाने के बजाय, उनका उद्देश्य हमेशा रचनात्मक और सुधारात्मक होना चाहिए। जब तक देश का हर नागरिक अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने नागरिक कर्तव्यों और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति सचेत नहीं होगा, तब तक हम इन आधुनिक हाइब्रिड वॉरफेयर और आंतरिक साजिशों का पूरी ताकत से मुकाबला नहीं कर पाएंगे। इस पूरे विमर्श का सबसे दार्शनिक और व्यावहारिक पहलू यह है कि किसी भी राष्ट्र की बुनियादी समस्याओं का स्थायी समाधान केवल राजनीतिक उथल-पुथल, नारों या शासकों को बदल देने से कभी नहीं होता। असली, टिकाऊ और स्थायी बदलाव हमेशा समाज के भीतर से, उसकी चेतना से आता है। जब तक समाज का नैतिक पतन होता रहेगा, जब तक हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों और पूर्वजों के गौरव से कटे रहेंगे, और जब तक हमारे भीतर सामाजिक समरसता का अभाव रहेगा, तब तक केवल नई सरकारें चुन लेने या व्यवस्था परिवर्तन कर देने से देश का भाग्य नहीं बदलेगा। भारत का इतिहास इस बात का जीवंत साक्षी है कि हमारी वास्तविक शक्ति हमेशा से हमारी सांस्कृतिक एकजुटता, आपसी भाईचारे और आध्यात्मिक चेतना में रही है, न कि केवल राजसी सत्ताओं के महलों में। यदि समाज भीतर से जातियों और संप्रदायों में बंटा हो और खोखला हो, तो दुनिया की सबसे मजबूत राजनीतिक व्यवस्था भी ताश के पत्तों की तरह ढह जाती है। इसलिए, वर्तमान समय की सबसे बड़ी मांग यह है कि हम केवल राजनीतिक दोषारोपण और रोज-रोज के चुनावी नफे-नुकसान के खेल में न उलझकर एक सजग, समरस, सुशिक्षित और आत्मनिर्भर समाज के निर्माण में जुटें। जब देश का सामाजिक ताना-बाना मजबूत होगा, तो दुनिया की कोई भी 'आसुरी ताकत' या विदेशों से प्रायोजित कोई भी आंदोलन हमारे लोकतंत्र और संप्रभुता को हिला नहीं पाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मोहन भागवत के इस महत्वपूर्ण संबोधन को सोशल मीडिया पर साझा करते हुए 'प्रेरणादायी' बताना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि देश का शीर्ष राजनीतिक और नीतिगत नेतृत्व भी इन वैश्विक चुनौतियों की गंभीरता को भली-भांति समझता है। यह समय दलगत राजनीति, तुष्टिकरण और संकीर्ण क्षेत्रीय हितों से ऊपर उठकर 'राष्ट्र प्रथम' की भावना को पूर्ण रूप से आत्मसात करने का है। विपक्ष हो या सत्ता पक्ष, सभी को यह जिम्मेदारी समझनी होगी कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और सत्ता की भूख देश की सुरक्षा और साख की कीमत पर नहीं होनी चाहिए। संघ के शताब्दी वर्ष में दिया गया यह विजयदशमी संदेश केवल एक भाषण नहीं, बल्कि देश के नागरिकों के लिए एक गंभीर आत्ममंथन का आह्वान है। हमें एक नागरिक के तौर पर यह तय करना होगा कि क्या हम बाहरी ताकतों के हाथ की कठपुतली बनकर अपने ही देश को आंतरिक कलह की आग में झोंकने वाले अदृश्य एजेंडों का हिस्सा बनेंगे, या फिर अपनी संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर रहकर एक सुदृढ़, अखंड, समरस और प्रगतिशील भारत का निर्माण करेंगे। 'रिजीम चेंज' की इस भ्रामक मृगमरीचिका से बाहर निकलकर अपनी आंतरिक सामाजिक शक्ति को पहचानना ही आज के वैश्विक संकट काल में भारत का एकमात्र सुरक्षित और गौरवशाली मार्ग है। - अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार
नक्सलवाद से मुक्त होकर विकास का नया अध्याय लिख रहा है छत्तीसगढ़ : विष्णुदेव साय
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Sourav Das-Ashutosh Ranka को बेल, Jantar Mantar पर नो एंट्री! क्या CJP आंदोलन पर लगा ब्रेक?
सपा घोषणापत्र जारी करने से पहले जनता के सामने अपना रिपोर्ट कार्ड पेश करे : भाजपा
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बर्नस्टीन : निफ्टी का टारगेट घटाकर 25,000 हुआ
मुंबई, ब्रोकरेज फर्म बर्नस्टीन ने निफ्टी के लिए इस साल के अंत तक का टारगेट प्राइस घटाकर 25,000 कर दिया है, जो कि पहले 26,000 था। इसकी वजह अमेरिका से ट्रेड डील पर अनिश्चितता और भारतीय इक्विटी की आय में सुधार को लेकर चिंताएं बने रहना है।
CJP नेताओं की रिहाई, कानूनी जंजाल में फंसेगा CJP? Vote Chori आंदोलन पर क्या होगा असर?
दोपहर करीब 1 बजकर 45 मिनट तक बाजार की तस्वीर पूरी तरह बदल गई थी। दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, सेंसेक्स अपने दिन के उच्चतम स्तर से 1,400.41 अंक फिसलकर 73,281.78 अंक पर आ गया। दूसरी ओर, निफ्टी भी अपने दिन के शिखर से 448.65 अंक नीचे आकर 22,672.25 अंक पर कारोबार करता दिखाई दिया।
पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान सीपीआईएम का एक और बुक स्टॉल तोड़ा, भाजपा नेता गिरफ्तार
पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान सीपीआईएम का एक और बुक स्टॉल तोड़ा, भाजपा नेता गिरफ्तार
एकनाथ शिंदे की लोकप्रियता से घबराए विपक्षी नेता, कर रहे गलत बयानबाजी : शायना एनसी
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भारत : ऑटोमोबाइल सेक्टर में तीसरी तिमाही में 33 सौदे हुए
नई दिल्ली, भारत के ऑटोमोबाइल सेक्टर में 2026 की तीसरी तिमाही में 1.7 अरब डॉलर के 33 सौदे दर्ज किए गए। यह पिछली तिमाही के 71.7 करोड़ डॉलर के 20 सौदों से काफी अधिक है। इस वृद्धि के पीछे विलय एवं अधिग्रहण (एमएंडए), निजी पूंजी निवेश और सार्वजनिक बाजार से दोबारा धन जुटाने की गतिविधियों में तेजी प्रमुख कारण रहे।
कंपनी के ₹30,213 करोड़ के सार्वजनिक निर्गम (IPO) को निवेशकों की जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, बुधवार को इश्यू खुलने के महज 100 मिनट के भीतर यह पूरी तरह सब्सक्राइब हो गया। इसके साथ ही जियो प्लेटफॉर्म्स ने इश्यू के आकार, सब्सक्रिप्शन की रफ्तार और एंकर निवेशकों की मांग के मामले में नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं।
शेयर बाजार के मूल्यांकन में 100 अरब डॉलर की बढ़ोतरी
नई दिल्ली, भारत के तेजी से बढ़ते आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) इकोसिस्टम से सूचीबद्ध कंपनियों का मूल्यांकन अगले दो से तीन वर्षों में 50-100 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है।
केंद्र सरकारी बैंकों : एफडीआई 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 49 प्रतिशत करने पर विचार
नई दिल्ली, केंद्र सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की सीमा को मौजूदा 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 49 प्रतिशत करने पर विचार कर रही है। विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस संबंध में वित्त मंत्रालय ने एक प्रारूप कैबिनेट नोट तैयार किया है और प्रस्तावित बदलाव पर अन्य मंत्रालयों से राय मांगी है।
हिंदुत्व त्यागने का पछतावा, इसलिए बार-बार भगवा-भगवा कर रहे उद्धव ठाकरे : राम कदम
हिंदुत्व त्यागने का पछतावा, इसलिए बार-बार भगवा-भगवा कर रहे उद्धव ठाकरे : राम कदम
रोहित पवार ने एकनाथ शिंदे पर साधा निशाना, कहा-मेला समर्पित करने के बजाय किसानों को प्रति हेक्टेयर एक लाख आर्थिक मदद दें
बंगाल में बिना हिंसा चुनाव कराना बड़ी सफलता, अब नशे के खिलाफ होगी जंग: अमित शाह
बंगाल में बिना हिंसा चुनाव कराना बड़ी सफलता, अब नशे के खिलाफ होगी जंग: अमित शाह
Dussehra 2026: कहीं 221 फीट के रावण का दहन, तो कहीं पीएम मोदी और प्रियंका गांधी ने चलाया तीर
Dussehra 2026: कहीं 221 फीट के रावण का दहन, तो कहीं पीएम मोदी और प्रियंका गांधी ने चलाया तीर
पिथौरागढ़ में आदि कैलाश अल्ट्रा मैराथन 2.0 की तैयारियों का डीएम ने लिया जायजा, 24 से 26 अक्टूबर तक होगा आयोजन
सच्चा व्यक्ति बलिदानी महापुरुषों के प्रति किए गए उपकार को कभी नहीं भूलते, पीएम मोदी ने साझा किया सुभाषित
31 मार्च 2026 को देश नक्सलवाद से मुक्त हुआ, 3,600 जवानों के बलिदान से मिली जीतः अमित शाह
31 मार्च 2026 को देश नक्सलवाद से मुक्त हुआ, 3,600 जवानों के बलिदान से मिली जीतः अमित शाह
पुलिस स्मृति दिवस पर पीएम मोदी ने शहीद जवानों को दी श्रद्धांजलि, कहा - 'उनका साहस और बलिदान हमेशा रहेगा याद'
देश में सरकार बदलनी है तो चुनाव से बदलो, बांग्लादेश जैसी घेराबंदी नहीं चलेगी: सीएम सुवेंदु अधिकाaरी
पश्चिम बंगाल में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति को सामान्य करार देते हुए मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने कहा कि कुछ स्थानों पर डॉक्टरों की कमी के बावजूद पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर और मैनपावर के सहयोग से ट्रॉमा, इमरजेंसी, एडमिशन और एंबुलेंस सेवाएं निर्बाध रूप से संचालित हो रही हैं। लोकतंत्र पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि भारत में सरकार बदलनी है तो चुनाव के माध्यम से बदलनी चाहिए, यह बांग्लादेश नहीं है, जहां घेराबंदी कर सत्ता परिवर्तन हो जाए, देश प्रगति के पथ पर है और सभी को देशहित में एकजुट होना चाहिए।
टाइगर श्रॉफ पर फायरिंग से दहशत में फिल्म इंडस्ट्री, रेणुका शहाणे बोलीं- सख्त कार्रवाई जरूरी
मुंबई, 20 अक्टूबर (आईएएनएस)। अभिनेता टाइगर श्रॉफ से जुड़े फायरिंग मामले को लेकर फिल्म इंडस्ट्री और राजनीतिक जगत से प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। अभिनेत्री रेणुका शहाणे, कांग्रेस नेता राज बब्बर, शिवसेना (यूबीटी) के एमएलसी अंबादास दानवे और अभिनेता महेश ठाकुर ने घटना पर चिंता जताई। उन्होंने सुरक्षा व्यवस्था, कानून-व्यवस्था और अपराध पर सख्ती से कार्रवाई करने की जरूरत पर जोर दिया।
रावण के साथ जला कॉकरोच का पुतला, कपिल मिश्रा बोले- दीमकों को हो रहा दर्द
रावण के साथ जला कॉकरोच का पुतला, कपिल मिश्रा बोले- दीमकों को हो रहा दर्द
संवैधानिक संस्थाओं पर कब्जे से aदेश को नुकसान, आरएसएस प्रमुख के बयान पर कांग्रेस का पलटवार
कांग्रेस ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष अनिल जयहिंद ने आरएसएस प्रमुख पर निशाना साधते हुए कहा कि संघ संचालक अपनी बात से बहुत जल्दी पलट जाते हैं
दशहरा पर वीएचपी प्रवक्ता विनोद बंसल की अपील, कहा- अराजक तत्वों से मुक्त हो देश
दशहरा पर वीएचपी प्रवक्ता विनोद बंसल की अपील, कहा- अराजक तत्वों से मुक्त हो देश
दुर्ग और मुंबई में विजयादशमी पर पुलिस ने की शस्त्र पूजा, सुरक्षा का संकल्प दोहराया
दुर्ग और मुंबई में विजयादशमी पर पुलिस ने की शस्त्र पूजा, सुरक्षा का संकल्प दोहराया
अखिलेश यादव को भारत नहीं फ्रांस दिख रहा, राहुल गांधी से मिल रही प्रेरणा: दिनेश प्रताप सिंह
अखिलेश यादव को भारत नहीं फ्रांस दिख रहा, राहुल गांधी से मिल रही प्रेरणा: दिनेश प्रताप सिंह
संजय राउत के 'सुप्रीम कोर्ट जलाने' वाले पोस्ट पर सियासी घमासान, भाजपा-शिवसेना ने बताया राष्ट्रविरोधी
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दिल्ली की रेस कोर्स मस्जिद को छह दिन में खाली करने का नोटिस, मीरवाइज उमर फारूक ने चिंता जताई
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नई दिल्ली, दशहरा के अवसर पर आज घरेलू शेयर बाजारों में कारोबार बंद है, लेकिन निवेशकों और खरीदारों की नजर सोने-चांदी की कीमतों पर बनी हुई है। हाल के उतार-चढ़ाव के बावजूद सोना मजबूत स्तरों पर कारोबार कर रहा है और सोने का भाव 1.47 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम के ऊपर बना हुआ है।
राहुल गांधी की कथित वियतनाम यात्रा को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है। भाजपा इसे कांग्रेस की राजनीतिक प्राथमिकताओं से जोड़ रही है, जबकि कांग्रेस का कहना है कि विदेश यात्राओं को लेकर सवाल उठाना उचित नहीं है।
सपा को 29 नवंबर की महारैली से लगेगा बड़ा झटका: ओम प्रकाश राजभर
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कर्नाटक: दशहरा पर्व पर भाजपा कार्यालय में की गई आयुध पूजा, बी.वाई. विजयेंद्र ने मां चामुंडेश्वरी से की प्रार्थना
शशि थरूर का किरेन रिजिजू को जवाब, बोले- भारत न बांग्लादेश है, न फ्रांस; SIR वापस लेने की मांग
किरेन रिजिजू के आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए थरूर ने कहा कि भारत की परिस्थितियों की तुलना फ्रांस या बांग्लादेश में हुई घटनाओं से नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा, “मेरा मानना है कि भारत बांग्लादेश नहीं है और भारत फ्रांस भी नहीं है। मुझे ये तुलना खास तौर पर प्रासंगिक नहीं लगती।”
'महाराष्ट्र में जंगलराज'... संजय राउत की बड़ी मांग, बोले- अब राष्ट्रपति शासन ही आखिरी रास्ता
शिवसेना (उद्धव ठाकरे) के सांसद संजय राउत ने सोमवार को महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग करते हुए आरोप लगाया कि बॉलीवुड अभिनेता टाइगर श्रॉफ की गाड़ी को निशाना बनाकर की गई हालिया गोलीबारी सहित कई चर्चित आपराधिक घटनाओं के बाद राज्य सरकार कानून-व्यवस्था बनाए रखने में विफल रही है
दिल्ली: नरेला में डीडीए एलआईजी फ्लैटों की ऑनलाइन बुकिंग मंगलवार से शुरू होगी
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मानसा में परविंदर सिंह झोटा हत्याकांड को लेकर उबाल, इंसाफ कमेटी ने सरकार से सीएम और डीजीपी का इस्तीफा मांगा
केरल में कांग्रेस नेताओं को सार्वजनिक रूप से अपनी शिकायतें जाहिर न करने का निर्देश
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Chai Par Sameeksha: CJP की हवा कैसे निकली? Rahul Gandhi की राजनीति Congress पर क्यों पड़ रही भारी?
प्रभासाक्षी की साप्ताहिक कार्यक्रम चाय पर समीक्षा में हमने इस सप्ताह कॉकरोच जनता पार्टी और कांग्रेस की रणनीति पर चर्चा की। हमेशा की तरह इस कार्यक्रम में मौजूद रहे प्रभासाक्षी के संपादक नीरज कुमार दुबे। कॉकरोच जनता पार्टी पर नीरज कुमार दुबे ने साफ तौर पर कहा कि जुलाई अगस्त के दौरान इन्होंने अच्छे दिन देखे लेकिन कांठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती। उन्होंने कहा कि वह लगातार ब्लैकमेल की रणनीति अपना रहे थे। लेकिन इस बार सरकार पूरी तरीके से तैयार थी और यही कारण है कि यह लोग जो दिल्ली में करना चाहते थे उसमें कामयाब नहीं हुए। उन्होंने कहा कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को ठीक से समझे बिना विदेशी दबाव बनाने की यह राजनीति आखिर क्यों चल रही है? क्या किसी राजनीतिक दल या किसी संगठन के आंदोलन के दौरान लगाये गये आरोपों को ही सच मानकर भारत को कटघरे में खड़ा कर देना इन सांसदों का नया शगल बन गया है? अगर इन्हें वाकई लोकतंत्र और नागरिकों की आजादी की इतनी चिंता है, तो यह चिंता हर देश के मामले में एक जैसी क्यों नहीं दिखती? आखिर भारत के मामले में ही इनका लोकतांत्रिक प्रेम क्यों उमड़ने लगता है? क्या भारत को नसीहत देना और उसके आंतरिक मामलों में दखल देना ही इनकी राजनीति का असली मकसद है? इसे भी पढ़ें: Congress में लौटे Ram Sharan Nautiyal, कुमारी शैलजा ने किया स्वागत, BJP पर साधा निशाना उन्होंने कहा कि जो लोग सत्ता पलटने का ख्वाब देख रहे हैं उन्हें भी समझना होगा कि भारत की ताकत किसी एक सरकार में नहीं, बल्कि उस करोड़ों भारतीयों के जनादेश में है, जिसने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की नींव मजबूत की है। इस देश को न विदेशी मंचों पर बैठकर भाषण देने वाले कुछ नेता चला सकते हैं, न सोशल मीडिया पर शोर मचाकर खुद को लोकतंत्र का सबसे बड़ा रखवाला बताने वाले लोग! भारत की छवि को झूठे आरोपों, आधी-अधूरी जानकारी और राजनीतिक एजेंडे के सहारे चोट पहुंचाने का सपना देखने वालों को समझना होगा कि भारत कोई कमजोर देश नहीं, जिसकी साख चंद बयानों से मिटा दी जाए। भारत पर उंगली उठाने से पहले अपने तथ्यों की जांच करो, आरोप लगाने से पहले सबूत जुटाओ और लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने से पहले यह समझो कि भारत का भविष्य तय करने का अधिकार भारतीय जनता के पास है, किसी विदेशी नेता या सोशल मीडिया के स्वयंभू विशेषज्ञ के पास नहीं! सवाल पूछने हैं तो पूछिए, लेकिन सवालों की आड़ में देश की संस्थाओं को बदनाम करने का ठेका मत लीजिए। क्योंकि भारत की असली ताकत तिरंगे के नीचे खड़े करोड़ों लोगों का विश्वास, स्वाभिमान और अपने देश का फैसला खुद करने का अधिकार है। कांग्रेस की रणनीति को लेकर नीरज दुबे ने साफ तौर पर कहा कि फिलहाल राहुल गांधी कॉकरोच जनता पार्टी को अपना कंपीटीटर मान रहे हैं और कॉकरोच जनता पार्टी की चर्चा ना हो इसलिए वह लगातार मैदान में बैठने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इंडिया ब्लॉक को लगता है कि वोट चोरी हो रही है तो सबसे पहले इंडिया ब्लॉक शासित राज्य सरकारों को इस्तीफा दे देना चाहिए। इसके अलावा नीरज दुबे ने यह भी कहा कि फिलहाल राहुल गांधी किसी ने किसी तरीके से चर्चा के केंद्र में रहना चाहते हैं और यही कारण है कि फिलहाल वह एक जूता दिखाने की कोशिश कर रही है।
धर्म, संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना का त्योहार है दशहरा
दशहरा केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय समाज और राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना, शौर्य तथा नवसंकल्प का महापर्व है। यह एक त्योहार नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक एकता और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। भारत में प्रत्येक पर्व केवल धार्मिक आस्था का अवसर नहीं होता, बल्कि वह समाज को नैतिक मूल्यों, सांस्कृतिक विरासत और सामूहिक चेतना से जोड़ने का माध्यम भी बनता है। दशहरा एक महत्त्वपूर्ण पर्व है जो धर्म की प्रतिष्ठा, संस्कृति की निरंतरता और राष्ट्रीय चेतना के जागरण का संदेश देता है। रावण के पुतले का दहन केवल बाहरी बुराई का अंत नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के भीतर छिपे काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार और आलस्य जैसी प्रवृत्तियों को त्यागने का संदेश देता है। इसे भी पढ़ें: दशहराः शौर्य, साधना एवं नवसंकल्प का महापर्व सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है दशहरा का त्योहार दशहरा सांस्कृतिक एकता का प्रतीक माना जाता है क्योंकि पूरे भारत में उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक अलग-अलग रूपों में मनाया जाता है। दशहरा से अधर्म पर धर्म की विजय प्राप्ति का संदेश पूरे राष्ट्र की आध्यात्मिकता एकता का परिचायक है। साथ ही यह पर्व भगवान श्रीराम द्वारा अहंकार और अधर्म के प्रतीक रावण पर विजय का प्रतीक है, जो सिखाता है कि अंततः सत्य की ही जीत होती है। धर्म और अधर्म के संघर्ष का प्रतीक है दशहरा भारतीय चिंतन में धर्म का अर्थ केवल पूजा-पद्धति या धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। धर्म का व्यापक अर्थ है कर्तव्य, न्याय, सत्य, मर्यादा और लोककल्याण। दशहरे का मूल संदेश इसी व्यापक धर्मबोध में निहित है। रामायण की परंपरा के अनुसार, भगवान श्रीराम ने रावण का वध करके अन्याय और अहंकार पर विजय प्राप्त की। इसी प्रकार, देवी दुर्गा द्वारा महिषासुर पर विजय शक्ति, साहस और न्याय की स्थापना का प्रतीक है। यह परंपरा हमें अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने तथा निर्बल और पीड़ित लोगों की रक्षा करने की प्रेरणा देती है। इस दृष्टि से दशहरा धर्म की विजय के साथ-साथ मानवीय गरिमा और न्यायपूर्ण व्यवस्था की स्थापना का भी पर्व है। दशहरा के दिन होती है शक्ति और शस्त्र की पूजा आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला यह त्योहार देवी दुर्गा की शक्ति की उपासना तथा शस्त्र-पूजन (आयुध पूजा) का पावन अवसर होता है। भारतीय संस्कृति का जीवंत उत्सव है दशहरा दशहरा भारतीय संस्कृति की समृद्धि, विविधता और जीवंतता का परिचायक है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में यह पर्व अलग-अलग परंपराओं और उत्सवों के माध्यम से मनाया जाता है। उत्तर भारत में रामलीला और रावण-दहन इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं। पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के अनेक क्षेत्रों में दुर्गापूजा के समापन के साथ विजयादशमी का विशेष महत्त्व है। मैसूर का दशहरा अपनी भव्य सांस्कृतिक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है, जबकि अनेक स्थानों पर शस्त्र-पूजन और आयुध-पूजन की परंपरा भी प्रचलित है। दशहरा हमारी लोककलाओं, संगीत, नाटक, शिल्प और सामुदायिक परंपराओं को भी जीवित रखता है। रामलीला के मंचन से नई पीढ़ी को भारतीय महाकाव्यों, आदर्श चरित्रों और नैतिक शिक्षाओं से परिचित होने का अवसर मिलता है। इस प्रकार यह पर्व अतीत की विरासत को वर्तमान से जोड़ते हुए भविष्य की पीढ़ियों तक पहुँचाने का महत्त्वपूर्ण माध्यम बनता है। आंतरिक बुराइयों का दहन करता है दशहरा रावण के पुतले का दहन केवल बाहरी बुराई का अंत नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के भीतर छिपे काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार और आलस्य जैसी प्रवृत्तियों को त्यागने का संदेश देता है। राष्ट्रीय चेतना के जागरण का माध्यम है दशहरा राष्ट्रीय चेतना केवल राष्ट्र के प्रति भावनात्मक लगाव का नाम नहीं है। इसमें देश की सांस्कृतिक विरासत के प्रति सम्मान, संविधान के मूल्यों के प्रति निष्ठा, नागरिक कर्तव्यों का निर्वहन और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना भी शामिल है। दशहरा इन मूल्यों को सुदृढ़ करने की प्रेरणा देता है। भारत की राष्ट्रीय एकता उसकी विविध भाषाओं, धर्मों, परंपराओं और जीवन-पद्धतियों के बीच पारस्परिक सम्मान पर आधारित है। दशहरा इस सांस्कृतिक विविधता के भीतर विद्यमान साझा नैतिक मूल्यों को रेखांकित करता है। सत्य, न्याय, साहस, करुणा और लोककल्याण जैसे आदर्श किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं हैं, बल्कि समूची मानवता के लिए प्रासंगिक हैं। राष्ट्रीय चेतना का वास्तविक अर्थ यह भी है कि नागरिक अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों को समझें। देश के प्रति निष्ठा केवल नारों और उत्सवों तक सीमित न रहे, बल्कि ईमानदारी, अनुशासन, सामाजिक सहयोग और सार्वजनिक संपत्ति के संरक्षण जैसे व्यवहारों में दिखाई दे। यदि दशहरे के अवसर पर हम इन संकल्पों को अपने जीवन में अपनाते हैं, तो यह पर्व राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है दशहरा देशभर में रामलीलाओं का मंचन, कुल्लू और मैसूर के भव्य आयोजन, तथा बंगाल में दुर्गा विसर्जन के साथ यह पर्व विविधता में एकता और सामाजिक सौहार्द को मजबूत करता है। आध्यात्मिक राष्ट्रवाद और दशहरा भारतीय परंपरा में राष्ट्र को केवल भौगोलिक सीमाओं से परिभाषित नहीं किया गया है; उसके साथ भूमि, जनसमुदाय, संस्कृति, इतिहास और साझा जीवन-मूल्यों का गहरा संबंध है। आध्यात्मिक राष्ट्रवाद की दृष्टि से राष्ट्रप्रेम का आधार केवल राजनीतिक या भौतिक उपलब्धियां नहीं, बल्कि नैतिकता, आत्मानुशासन, सेवा और व्यापक मानवीय कल्याण भी है। कृषि और नई शुरुआत का पर्व है दशहरा भारत में यह पर्व खरीफ की फसलों के आने और कृषि समृद्धि का भी प्रतीक है। ऐतिहासिक रूप से इसी दिन से राजा-महाराजा और योद्धा अपने नए अभियानों की शुरुआत करते थे। आज भी प्रासंगिक है दशहरा रावण-दहन की परंपरा तभी सार्थक होगी, जब हम अपने भीतर के अहंकार, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या और अन्यायपूर्ण प्रवृत्तियों को पहचानने का प्रयास करेंगे। केवल पुतले जलाने से सामाजिक बुराइयों का अंत नहीं हो सकता। इसके लिए शिक्षा, नैतिक जागरूकता, सामाजिक सहभागिता और कानून के प्रति सम्मान आवश्यक हैं। निष्कर्षतः दशहरा धर्म, संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना का ऐसा महापर्व है, जो भारतीय जीवन-दृष्टि के अनेक महत्त्वपूर्ण आदर्शों को एक सूत्र में पिरोता है। यह धर्म के माध्यम से कर्तव्य और न्याय का बोध कराता है, संस्कृति के माध्यम से हमारी ऐतिहासिक एवं सामूहिक स्मृति को सुरक्षित रखता है और राष्ट्रीय चेतना के माध्यम से राष्ट्रनिर्माण के प्रति उत्तरदायित्व जगाता है। दशहरा की वास्तविक विजय तब होगी, जब सत्य हमारे आचरण में, संस्कृति हमारे व्यवहार में, धर्म हमारे कर्तव्यपालन में और राष्ट्रप्रेम हमारे जनसेवा के कार्यों में दिखाई देगा। आवश्यकता इस बात की है कि हम इस पर्व को केवल परंपरा के निर्वाह का अवसर न मानें, बल्कि आत्ममंथन और सामाजिक परिवर्तन का संकल्प-दिवस बनाएं। जब व्यक्ति अपने भीतर की बुराइयों पर विजय प्राप्त करेगा, तभी समाज सशक्त बनेगा और राष्ट्र की प्रगति को स्थायी आधार मिलेगा। यही दशहरे की आत्मा सांस्कृतिक गरिमा और राष्ट्रीय प्रासंगिकता है। - प्रज्ञा पाण्डेय
विपक्ष अक्सर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अमेरिका के आगे झुकने का आरोप लगाता रहता है लेकिन जो परिदृश्य उभर कर सामने आ रहा है वह दर्शा रहा है कि भारत की ताकत और मोदी की कूटनीति के आगे अमेरिका को झुकना पड़ा है। चाहे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हों, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो हों, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस हों या फिर अमेरिकी उद्योगपति एलन मस्क हों, आप उनके ताजा बयानों को देखेंगे तो पाएंगे कि रातोंरात अचानक उनमें बड़ा परिवर्तन आ गया है। भारत पर रूस से तेल खरीदने को लेकर भारी टैरिफ लगाने की धमकी देने वाले डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को अब अपने कदम पीछे खींचने पड़े हैं। साथ ही अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने खुद माना है कि भारत के साथ होने वाला व्यापार समझौता इस फैसले की एक बड़ी वजह है। उन्होंने यहां तक कह दिया है कि भारत की अपनी जरूरतें हैं और वह एकदम से रूस से तेल खरीदना बंद नहीं कर सकता। रूस से तेल पर अमेरिका की अकड़ ढीली, भारत बना अहम फैक्टर हम आपको बता दें कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर अमेरिकी दबाव के बीच सबसे महत्वपूर्ण संकेत विदेश मंत्री मार्को रुबियो के बयान से आया है। उज्बेकिस्तान में पत्रकारों से बातचीत के दौरान रुबियो ने स्वीकार किया कि रूस के तेल पर प्रतिबंधों में छूट देने के फैसले में भारत के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौते को भी ध्यान में रखा गया है। उन्होंने कहा कि दोनों देश समझौते को अंतिम रूप देने के बेहद करीब हैं। यह बयान ऐसे समय आया है, जब ट्रंप प्रशासन ने रूस से संबंधित प्रतिबंधों के प्रभावों का आकलन करने के लिए 60 दिनों की राहत दी है। रुबियो के मुताबिक, अमेरिका को यह भी देखना होगा कि एक साथ प्रतिबंध और टैरिफ लगाने से वैश्विक अर्थव्यवस्था और खुद अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा? इसे भी पढ़ें: राजनीति नहीं चली तो कूटनीति में हाथ आजमाने चले Rahul Gandhi ! मगर Jaishankar पर हमला करते ही सामने आ गया Salman Khurshid का रिकॉर्ड यानी जिस रूस-तेल मुद्दे को भारत पर दबाव बनाने के हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा था, उसी पर अब वॉशिंगटन को अपने कदमों के परिणामों की चिंता सता रही है। मार्को रुबियो का यह कहना, ''भारत रूस से ऊर्जा आयात को एक झटके में बंद नहीं कर सकता। नई आपूर्ति व्यवस्था विकसित करने में समय लगता है और ऊर्जा की कीमतों में उछाल का सीधा असर आम लोगों तथा उद्योगों पर पड़ता है'', दर्शा रहा है कि मोदी की कूटनीति कितनी कामयाब रही। साथ ही रुबियो ने यह भी स्वीकार किया कि भारत अमेरिका का महत्वपूर्ण साझेदार है और उसकी ऊर्जा जरूरतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अमेरिकी महंगाई का दबाव, ट्रंप प्रशासन की बढ़ी मुश्किलें देखा जाये तो अमेरिका की इस बदली हुई रणनीति के पीछे घरेलू आर्थिक चिंताएं भी हैं। महंगे ईंधन का असर अमेरिकी उपभोक्ताओं पर पड़ रहा है। ऐसे माहौल में भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने से वैश्विक आपूर्ति और कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। आगामी मध्यावधि चुनावों से पहले महंगाई ट्रंप प्रशासन के लिए राजनीतिक चुनौती भी बन सकती है। दूसरी तरफ, भारत भी महंगाई के दबाव से अछूता नहीं है। ऐसे में भारत के लिए सस्ती और भरोसेमंद ऊर्जा आपूर्ति केवल व्यापार का सवाल नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता का भी मुद्दा है। नई दिल्ली का रुख स्पष्ट रहा है कि ऊर्जा आपूर्ति के स्रोत बाजार की परिस्थितियों और राष्ट्रीय जरूरतों के हिसाब से तय होंगे। जेडी वेंस की सफाई, एच-1बी विवाद पर नहीं थमा विवाद इसके साथ ही अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के तेवरों में भी नरमी आई है। एच-1बी वीजा कर्मचारियों को ‘फॉरेन इंडेंटर्ड सर्वेंट्स’ कहने के बाद उनकी टिप्पणी पर विवाद बढ़ा था। भारत के विदेश मंत्रालय ने उनके बयान को अनुचित और गहरा अपमानजनक बताया था। सीबीएस न्यूज के टाउन हॉल कार्यक्रम में वेंस ने कहा कि उनकी आलोचना वीजा कर्मचारियों की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था और कंपनियों की थी, जिनके जरिए विदेशी कर्मचारियों को ऐसी स्थिति में रखा जा सकता है जहां नौकरी जाने का डर उनके अधिकारों को कमजोर कर देता है। उन्होंने माना कि उनकी भाषा बेहतर हो सकती थी, लेकिन उन्होंने अपनी टिप्पणी वापस नहीं ली। उन्होंने अपनी भारतीय ससुराल का जिक्र करते हुए पत्नी उषा वेंस और उनके दक्षिण भारतीय माता-पिता के प्रति सम्मान भी जताया। एलन मस्क भी नरम पड़े, भारतीय नियमों के सामने चुनौती इसी बीच, एलन मस्क की स्टारलिंक और रिलायंस इंडस्ट्रीज के बीच उपग्रह इंटरनेट सेवाओं को लेकर चला विवाद भी नया मोड़ लेता दिखा। हम आपको याद दिला दें कि भारत में स्टारलिंक की संभावित एंट्री के बीच मस्क ने सोशल मीडिया पर भारतीय कारोबारी मुकेश अंबानी और बाजार की प्रतिस्पर्धा से जुड़े आरोप लगाए थे। रिलायंस ने जवाब में कहा कि वह उपग्रह संचार सेवाओं में प्रतिस्पर्धा का स्वागत करती है, लेकिन हर कंपनी को भारतीय कानूनों और नीतियों का पालन करना होगा। कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया कि जियो की अपनी उपग्रह सेवाएं भी मंजूरियों की प्रतीक्षा कर रही हैं। इसके बाद मस्क ने रिलायंस की प्रतिक्रिया पर ‘Much appreciated’ कहकर जवाब दिया। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो भारत के दौरे पर आ रहे हैं। वह मुंबई में भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात के अलावा गुजरात के जामनगर जाकर रिलायंस इंडस्ट्रीज की रिफाइनरी का अवलोकन भी करेंगे। खास बात यह है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज उन्हीं मुकेश अंबानी की है जिन्हें एलन मस्क ने भारत का प्रधानमंत्री बताया था। भारत का संदेश—रिश्ते बराबरी के, फैसले राष्ट्रीय हित में बहरहाल, रुबियो, वेंस और मस्क के ढीले पड़ते तेवर और ट्रंप का बदला रुख दर्शा रहे हैं कि दुनिया में भारत की कूटनीति कुछ भी हासिल कर सकती है। रूस से तेल खरीदने का सवाल हो, अमेरिका के साथ व्यापार समझौता हो, एच-1बी वीजा विवाद हो या स्टारलिंक की भारत में एंट्री का मुद्दा हो, इन सभी घटनाक्रमों के केंद्र में एक चीज स्पष्ट है कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों पर बाहरी दबाव कभी स्वीकार नहीं करेगा। भारत ऐसा साझेदार नहीं है जिसके सामने केवल दबाव बनाकर मनचाहा फैसला हासिल कर लिया जाए। नई दिल्ली का संदेश स्पष्ट है कि रिश्ते मजबूत होंगे, व्यापार भी बढ़ेगा, लेकिन फैसले भारत के राष्ट्रीय हितों के आधार पर ही होंगे। -नीरज कुमार दुबे
पश्चिम बंगाल में गूंजा 'श्यामा प्रसाद मुखर्जी अमर रहे' का नारा, बालुरघाट में प्रतिमा का अनावरण
पश्चिम बंगाल में गूंजा 'श्यामा प्रसाद मुखर्जी अमर रहे' का नारा, बालुरघाट में प्रतिमा का अनावरण
Tiger Shroff Firing Case: Lawrence Bishnoi पर सियासी संग्राम, हमले के बाद केंद्र पर तीखे सवाल
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस में हिंसा और लूटपाट की घटनाओं के बाद ट्रुथ सोशल पर जो टिप्पणी की है, उसने पूरी दुनिया में एक नई बहस छेड़ दी है। ट्रंप ने लिखा, “फ्रांस जल रहा है!” और चेतावनी दी है कि अलग दुनिया से आए लोगों के आव्रजन ने कभी महान रहे देश को संकट में डाल दिया है। उन्होंने फ्रांस से अपनी सीमाएं बंद करने और बहुत देर होने से पहले हालात पर नियंत्रण हासिल करने की अपील की है। ट्रंप की यह टिप्पणी भले ही राजनीतिक रूप से कठोर हो, लेकिन इसके पीछे उठ रहा बुनियादी सवाल बेहद महत्वपूर्ण है कि आखिर किसी राष्ट्र की सीमाओं, सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी किसकी है? और जब सरकारें इन चुनौतियों से निपटने में विफल होती हैं, तो उसकी कीमत कौन चुकाता है? फ्रांस के हालात से पूरी दुनिया स्तब्ध फ्रांस में 17 अक्टूबर को हुए प्रदर्शनों के दौरान जो तस्वीरें सामने आईं, वे किसी भी राष्ट्र के लिए चिंताजनक हैं। महंगाई, शिक्षा व्यवस्था और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़ी शिकायतों को लेकर सड़कों पर उतरे हजारों लोगों के बीच हिंसक समूहों ने दुकानों में लूटपाट की, वाहनों में आग लगाई और सरकारी इमारतों को निशाना बनाया। लिमोज शहर का ऐतिहासिक टाउन हॉल आगजनी में बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। पेरिस, मार्सेई और लियोन में भी हिंसा और तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आईं। फ्रांसीसी अधिकारियों ने कट्टरपंथी वामपंथी समूहों और उपद्रवियों को हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराया। इसे भी पढ़ें: राजनीति नहीं चली तो कूटनीति में हाथ आजमाने चले Rahul Gandhi ! मगर Jaishankar पर हमला करते ही सामने आ गया Salman Khurshid का रिकॉर्ड फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने राष्ट्र के नाम संबोधन में इस हिंसा पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि शहरों की सड़कों को इस तरह बर्बाद होते देखना असहनीय है। मैक्रों ने सुरक्षा बलों के समर्थन में खड़े होते हुए स्पष्ट किया कि जायज मांगों और हिंसा के बीच अंतर किया जाना चाहिए। उन्होंने प्रशासन को सार्वजनिक इमारतों और कारोबारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने, जरूरत पड़ने पर कुछ प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगाने तथा हिंसा करने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने के निर्देश दिए। उनका संदेश साफ था कि संवाद का अर्थ कमजोरी और लोकतांत्रिक अधिकारों का अर्थ दंड से मुक्ति नहीं है। देखा जाये तो एक बुनियादी बात समझने की जरूरत है। लोकतंत्र में विरोध करना अधिकार है, लेकिन हिंसा करके सरकार को झुकाना, सार्वजनिक संपत्ति नष्ट करना और आम नागरिकों के जीवन को संकट में डालना अधिकार नहीं हो सकता। यदि कोई समूह अपनी राजनीतिक या वैचारिक मांगों के लिए कानून को चुनौती देने लगे, तो सरकार का दायित्व है कि वह निर्णायक कार्रवाई करे। सरकार की लोकप्रियता और उसकी नीतियों पर सवाल उठ सकते हैं, लेकिन देश की कानून-व्यवस्था को बंधक नहीं बनाया जा सकता। इटली में भी बिगड़े हालात दूसरी ओर, यूरोप की यह बेचैनी अब केवल फ्रांस तक सीमित नहीं है। इटली में भी 17 और 18 अक्टूबर को महंगाई, कम वेतन और सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति के विरोध में प्रदर्शन हुए। मिलान में नकाबपोश प्रदर्शनकारियों ने दुकानों के शीशे तोड़े, आगजनी की और पुलिस पर पत्थर फेंके। पुलिस को आंसू गैस और पानी की बौछारों का इस्तेमाल करना पड़ा। बोलोन्या, ब्रेसिया, बर्गामो और ट्यूरिन में भी झड़पों की खबरें आईं। प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने हिंसा की निंदा करते हुए पुलिस के समर्थन में बयान दिया और स्थिति पर चर्चा के लिए सरकारी बैठक बुलाई। इटली की घटनाएं एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने लाती हैं। यूरोप में बढ़ती महंगाई, कम वेतन, महंगे आवास और सार्वजनिक सेवाओं की बदहाली ने लोगों में असंतोष पैदा किया है। इस असंतोष को केवल आव्रजन या किसी एक विचारधारा के खाते में डालना वास्तविक समस्याओं से आंखें मूंदना होगा। लेकिन जब जायज शिकायतों के बीच हिंसक समूह घुस आते हैं और विरोध को लूटपाट में बदल देते हैं, तो आम नागरिकों का नुकसान होता है और लोकतांत्रिक आंदोलन की विश्वसनीयता भी खत्म होने लगती है। फ्रांस और इटली दोनों की घटनाओं से यही सबक मिलता है कि सरकारों को जनता की समस्याओं का समाधान भी करना होगा और अराजकता फैलाने वालों के खिलाफ कठोरता भी दिखानी होगी। फ्रांस, इटली की घटनाओं का भारत के लिए निहितार्थ भारत के लिए इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू अवैध घुसपैठ और राष्ट्रीय सुरक्षा है। बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ तथा म्यांमार से आए रोहिंग्या समुदाय के लोगों की अनधिकृत मौजूदगी लंबे समय से सुरक्षा और प्रशासन से जुड़े सवाल खड़े करती रही है। भारत जैसे विशाल और संवेदनशील सीमाओं वाले देश के लिए यह कोई मामूली विषय नहीं है। सीमा पार से आने वाले प्रत्येक व्यक्ति की पहचान, नागरिकता और कानूनी स्थिति का सत्यापन होना चाहिए। जहां अवैध प्रवेश प्रमाणित हो, वहां कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ अपराध या सुरक्षा संबंधी गतिविधियों के ठोस प्रमाण हों, तो जांच और अभियोजन में कोई ढिलाई नहीं होनी चाहिए। मोदी-शाह ने खतरे को पहले ही भांप लिया था वैसे ट्रंप आज दुनिया को सीमाओं की सुरक्षा और अवैध घुसपैठ पर सख्ती का जो संदेश दे रहे हैं, उसे भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बहुत पहले ही भांप लिया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह इस चुनौती से निपटने के लिए पहले से ही कदम उठा रहे हैं। मोदी सरकार ने अवैध घुसपैठ और उससे जुड़े जनसांख्यिकीय बदलावों की पड़ताल के लिए उच्चस्तरीय समिति गठित की है, जिसकी अध्यक्षता सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति प्रकाश प्रभाकर नाओलेकर कर रहे हैं। गृह मंत्रालय ने 26 मई 2026 को इस समिति का गठन किया और 14 अक्टूबर को इसका आधिकारिक पोर्टल demography.mha.gov.in शुरू किया गया। इस पोर्टल के माध्यम से केंद्र और राज्य सरकारें, संस्थाएं तथा आम नागरिक जनसांख्यिकीय बदलावों, असामान्य बसावट और अवैध घुसपैठ से संबंधित जानकारी दे सकते हैं। समिति का उद्देश्य अवैध प्रवासियों की पहचान, हिरासत और निर्वासन के लिए कानूनी, निष्पक्ष और समयबद्ध व्यवस्था की सिफारिश करना भी है। इसके अलावा, अमित शाह सीमाओं की सुरक्षा के लिए स्मार्ट बॉर्डर परियोजना को आगे बढ़ा रहे हैं। इसके तहत ड्रोन, रडार, निगरानी कैमरे, वॉचटावर और अत्याधुनिक सेंसर जैसी तकनीकों को सीमा सुरक्षा व्यवस्था से जोड़ा जा रहा है। जुलाई 2026 में सिलीगुड़ी के झुमागाछ स्थित सीमा चौकी पर अमित शाह ने फेंसिंग में सेंध का पता लगाने वाली प्रणाली और दुर्गम इलाकों में घुसपैठ की चेतावनी देने वाली तकनीक का निरीक्षण भी किया था। सरकार का लक्ष्य केवल सीमा पार से होने वाली घुसपैठ रोकना नहीं, बल्कि देश के भीतर मौजूद अवैध प्रवासियों की पहचान और उनके मामलों का कानूनी निपटारा करना भी है। भारत में घुसपैठ का मुद्दा तब और गंभीर हो जाता है, जब राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषय को वोट बैंक की राजनीति की भेंट चढ़ा दिया जाता है। अवैध घुसपैठियों की पहचान और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई का विरोध करने वाले राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि सत्ता की लालसा में देश के भविष्य से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। आज फ्रांस और इटली में जो कुछ देखने को मिल रहा है, भारत को उससे सबक लेना है, वैसी परिस्थितियों का इंतजार नहीं करना है। भारत कोई प्रयोगशाला नहीं है, जहां राजनीतिक स्वार्थ के लिए देश की सामाजिक स्थिरता और आंतरिक सुरक्षा को दांव पर लगा दिया जाए। और चिंता तब और बढ़ जाती है, जब बांग्लादेश में हिंसक घटनाओं के बाद हुए सत्ता परिवर्तन से प्रेरणा लेने की बातें सामने आती हैं या खुलेआम यह कहा जाता है कि सत्ता पलटना ही मुख्य मकसद है। सवाल सीधा है कि भारत में सत्ता परिवर्तन का फैसला जनता करेगी या कुछ स्वयंभू नेता और दबाव समूह सड़कों पर शक्ति प्रदर्शन करके सरकार बदलने का रास्ता तय करेंगे? लोकतंत्र में सरकारें चुनाव से बनती और बदलती हैं, न कि हिंसा, अराजकता या किसी विदेशी घटनाक्रम से प्रेरित होकर पैदा किए गए दबाव से। मोदी सरकार और अमित शाह के सामने चुनौती केवल घुसपैठ रोकने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की भी है कि कानून का राज किसी राजनीतिक सौदेबाजी का मोहरा न बने। भारत की सीमाओं से लेकर लोकतांत्रिक संस्थाओं तक, देश की सुरक्षा और संप्रभुता से कोई समझौता नहीं होना चाहिए। बहरहाल, यह सबको स्पष्ट रहना चाहिए कि लोकतंत्र में सरकार बदलने का अधिकार जनता के पास है और इसका सबसे वैध रास्ता चुनाव है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन, सरकार की आलोचना और जवाबदेही की मांग लोकतंत्र का हिस्सा हैं। लेकिन यदि कोई संगठन या दबाव समूह हिंसा, धमकी या गैर-संवैधानिक तरीकों से सत्ता परिवर्तन कराने की कोशिश करता है, तो उसकी मंशा और गतिविधियों की जांच होनी चाहिए। आंदोलन की आड़ में कानून तोड़ने वालों को राजनीतिक संरक्षण कतई नहीं मिलना चाहिए। -नीरज कुमार दुबे
क्या कभी आत्मदैन्य से मुक्त हो सकेंगे हम?
कोई भी राष्ट्र जिस स्थिति में होता है, उसके लिए वह खुद जिम्मेदार होता है। जापानी जैसे हैं ,उनका देश वैसा ही है। इसी तरह की बात इजरायल, चीन और ईरान या किसी भी देश के बारे में हो सकती है। भारत भी वैसा ही है, जैसे हम हैं! ऐसे में कभी विदेशी आक्रांताओं,कभी मैकाले और कभी अपनी आजादी के बाद सत्ता में आए नायकों को कोसते हुए हम अपने कर्तव्यबोध से मुक्त हो जाते हैं। कोई भी राष्ट्र अपने नागरिकों की सामूहिक चेतना के आधार पर विकसित होता है। उसका इतिहासबोध, संस्कृतिबोध, मित्रबोध और शत्रुबोध मिलकर उसका निर्माण करते हैं। इनसे ही राष्ट्रीय मानस या राष्ट्रीय भाव बनता है। लंबे समय की गुलामी ने हमें आत्मदैन्य और आत्महीनता की ओर ढकेल दिया। भारतीय समाज के अपने पारंपरिक मूल्यों को छोड़कर हम शासक वर्गों द्वारा थोपी जा रही संस्कृति का अनुगमन करने लगे। हमें लगा हमारे अंग्रेज शासक, उनकी भाषा, पहनावा और उनकी संस्कृति-पंथ सबकुछ हमसे बेहतर है। उनके अनुयायी बनकर ही हमारी मुक्ति है। तत्कालीन समाज के श्रेष्ठ जन भी ब्रिटिश शासन में अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त कर भारत लौटते थे और खुद को आधा-अधूरा अंग्रेज साबित करने में जुट जाते थे। ऐसे में शेष समाज अपने श्रेष्ठ वर्ग का आचरण देख वैसा ही बनने का प्रयास करने लगा। देश में तमाम सर, रायबहादुर और साहेब बहादुर हमारे आदर्श बन गए। स्वामी विवेकानंद, लोकमान्य तिलक, महर्षि अरविन्द, महर्षि दयानंद, महात्मा गांधी, भारतेंदु हरिश्चंद्र, जयशंकर प्रसाद, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय,रवीन्द्र नाथ टैगोर के बहुत गहरे भारतबोध की प्रज्ञा ने हमें संभाला ,वरना हमारी दास्तां भी न होती दास्तानों में। हमारी हस्ती मिटने से कोई रोक नहीं सकता था। इसे भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट नहीं बनेगा नेताओं का अखाड़ा औसत भारतीय का आचरण अंग्रेजी शासनकाल में कैसा था, कहने की जरूरत नहीं है। हम कोहिनूर को छोड़कर कांच की ओर दौड़ रहे थे। अंग्रेजी भाषा और संस्कृति श्रेष्ठता की परिचायक बन गई। जब तक अपना कोई व्यक्ति या कार्य पश्चिम में स्थापित न हो जाए, उसे हम श्रेष्ठ मानने को तैयार नहीं थे। अंग्रेजी शासन और उसके बाद के आजादी के साल भी आत्मगौरव के अभाव में गुजरे साल बनकर रह गए। सत्ता के आतंक और सत्ता से जुड़े रहने के आकर्षण से हमने 'अपने जीवन मूल्यों का सनातन सिद्ध राजमार्ग' छोड़कर 'अंग्रेजियत की पगडंडियों' पर चलना प्रारंभ कर दिया, जो हमारा देखा-परखा रास्ता नहीं था। जाहिर है इस मार्ग पर हम नेतृत्वकर्ता नहीं, अनुगामी ही बन सकते थे। हमारे एकत्व को चोटिल करने के सचेतन प्रयास प्रारंभ हुए। भारतीय शिक्षा पद्धति को अंग्रेजी राज में कैसे नष्ट किया गया, इसे धर्मपाल जी को पढ़कर ही समझ में आएगा। 'स्व' के स्थान पर 'परकीय' विचारों की स्थापना के प्रयास खूब चले। हम एक 'राष्ट्र' नहीं हैं, बताया गया। अनेक स्थानीयताओं को राष्ट्रीयता के बरक्स स्थापित करने के अकादमिक प्रयास भी खूब चले, सफल भी हुए। कैसे और कितने विभाजन गढ़े जा सकते हैं, सारा जोर इसी पर था। भारतीय ज्ञान परंपरा पर चल रहे लोगों के आत्मविश्वास को समाप्त कर इस पूरे विचार को ही पोंगापंथ और पिछड़ेपन के रुप में आरोपित किया जाना फैशन बन गया। राजनीतिक परिवर्तन के कारण लंबे समय के बाद भारत फिर से खुद को खोज रहा है। अपनी जड़ों की तरफ वापसी करना चाहता है। जिसे 'विचारों की घर वापसी' कहकर संबोधित किया गया। जरूरी है कि भारत प्रेमी बौद्धिक वर्ग सत्य के सूर्य की स्थापना करने के लिए अध्यवसाय में जुट जाए। सिर्फ भावनात्मक प्रवचनों, कार्यक्रमों से आगे बढ़कर भ्रमों के निवारण का जतन करे। ऐसे कुशल बौद्धिक योद्धा ही अपनी ज्ञान परंपरा को सामने लाकर तथ्य, प्रमाणों के साथ उनकी युगानुकुल व्याख्या करेंगे। इसके लिए हमें लोकसंग्रही और विनम्र बनना पहली शर्त है। परंपरा,जीवन पद्धति और परिवार पर छाए संकटों के बीच ये प्रयत्न ही हमें आत्मशक्ति देंगे। दुनिया भर में चल रहे सभ्यतागत संघर्ष के बीच भारत को अपनी वृहत्तर भूमिका का निर्वहन करना है, क्योंकि हमारे पास दुनिया को देने के लिए समावेशी विचार है। जहां साझापन सौंदर्य की तरह है, विविधता और बहुलता का यहां उत्सव मनाया जाता है। हम पूजा में भी अनेक देवताओं की पूजा करते हैं। बहुलतावादी समाज होने कारण हमने मतभिन्नता का सदैव स्वागत किया। इसका उदाहरण हमारी 'शास्त्रार्थ' परंपरा है। इसलिए एक किताब,एक विचार, एक देवता को मानने और दूसरे विचार को समाप्त करने को आतुर विचार भारत को नहीं समझ सकते। जहां दुनिया के हर पंथ के लोग नैसर्गिक सहजता से सांस ले सकते हैं। यहां कोई श्रेष्ठ और निकृष्ट नहीं है। सब समान रूप से इस धरती मां की संतानें हैं। ऐसे में भारत केंद्रित विमर्श ही विश्व शांति का मार्ग है। 'स्वत्व' ही मार्ग है, जिस पर चलने के लिए हमें महात्मा गांधी, धर्मपाल, सीताराम गोयल, दीनदयाल उपाध्याय, वासुदेव शरण अग्रवाल, निर्मल वर्मा, विद्यानिवास मिश्र का अध्ययन मदद कर सकता है। इससे भारत के मूल विचार को समझने तथा भारत का मौलिक चिंतन स्थापित करने में मदद मिलती है। इससे ही ग़लत बातों का खंडन करते हुए हम सही विमर्श की स्थापना में सफल हो पाएंगे। भारतीय उदात्त जीवन मूल्यों के आधार पर संपूर्ण विश्व के लिए हमें ही वैश्विक बौद्धिक नेतृत्व देना होगा। जिसकी एक झलक हमें स्वामी विवेकानंद में दिखती है। ऐसे में ‘स्वबोध‘ का जागरण ही विकल्प है। पहले हमारे अपने विचार को भारत तो स्वीकार करे। वह आत्मदैन्य से मुक्त होकर 'भारत' को 'भारत' (इंडिया नहीं) की नजर से देखना प्रारंभ करे। वैचारिक साम्राज्यवाद से मुक्ति के लिए कई स्तरों पर कार्य करने की आवश्यकता है। इसे इस तरह से समझिए कि गोरा बनाना और अंग्रेजी सिखाना आज भी हिंदुस्तान में दो सबसे बड़े व्यापार हैं। यही उपनिवेशवादी मानसिकता है। इसके चलते ही हमारे गांव उजड़ते चले गए और संयुक्त परिवार बिखर गए। आज एकल परिवारों के नाते अलग तरह के सामाजिक-सांस्कृतिक संकट हमारे सामने हैं। जाति, भाषा, क्षेत्र,पंथ की लड़ाइयों को छोड़कर भी बहुत सी विभाजनकारी बातें हर दिन आज भी खोजी जाती हैं , फिर आख्यान (नरेटिव) गढ़े जाते हैं। भारत जिसे कभी 'इंडिया' बनाने की कोशिशें हुईं, उसे भारत बनाए रखने के लिए हमें ही आगे आना होगा। क्योंकि भारत का नष्ट होना, उस विचार का मिट जाना होगा, जिसने हमें वसुधैव कुटुम्बकम् का संदेश दिया। जिसने हमें राम, कृष्ण,शिव, बुद्ध, महावीर, गुरु नानक देव जैसे नायक दिए। जिसने सर्वे भवन्तु सुखिन: में अपनी मुक्ति देखी और लोक-मंगल जिसका मूलमंत्र रहा। - प्रो. संजय द्विवेदी (लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)
'भारत को कभी नहीं तोड़ सकतीं विरोधी ताकतें', पाकिस्तानी झंडों के साथ कांग्रेस के झंडे दिखने पर बोले किरेन रिजिजू
सुप्रीम कोर्ट नहीं बनेगा नेताओं का अखाड़ा
देश के सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि वह राजनीतिक दलों की सत्ता को लेकर चल रही मारामारी के बीच अखाड़ा नहीं बनेगा। सुप्रीम कोर्ट सिर्फ कायदे कानून और संविधान के दायरे में रह कर ही काम करेगा। दरअसल यह संदेश सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस के जरिए तमाम राजनीतिक दलों को दिया, जोकि सुप्रीम कोर्ट के जरिए राजनीतिक फायदा उठाने का प्रयास कर रहे हैं। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट के बारे में कोई गलतफहमी या अफवाह पहले, इससे पहले ही मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने अप्रत्याशित कदम उठाते हुए पत्रकार वार्ता आयोजित की। सीजेआई ने यह कदम इसलिए उठाया कि नेता कहीं बात का बतंगड़ नहीं बना दे और उसमें सुप्रीम कोर्ट को इसमें नहीं घसीट लें। इसे भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट के आवश्यक न्यायिक फैसलों के उजाले लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधान न्यायाधीश को पत्र लिखकर मुलाकात का समय मांगा था कि वे उन्हें एक ज्ञापन सौंपना चाहते थे, जिसमें 'वोट चोरी' रोकने, मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे, मतदाता सूची के एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) को रोकने और पुन: मतपत्र प्रणाली पर लौटने की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने यह मांग यह कहते हुए ठुकरा दी, कि यदि सुनवाई चाहते हो तो रिट याचिका दायर करो। सीजेआई ने राहुल गांधी के आधिकारिक ईमेल के जवाब में कहा कि इस तरह की मुलाकात उचित नहीं होगी, क्योंकि जिन मुद्दों पर चर्चा की मांग की गई है, वे पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं। इसी के साथ सीजेआई ने दूरदर्शिता अपनाते हुए अगले ही दिन प्रेस कांफ्रेंस करके स्थिति स्पष्ट कर दी, ताकि राजनीतिक दल उसकी बातों का गलत मतलब नहीं निकाल पाएं और सुप्रीम कोर्ट को राजनीतिक विवाद में नहीं घसीट सकें। सीजेआई सूर्यकांत ने यह भी स्पष्ट किया कि संवैधानिक व्यवस्था के तहत सुप्रीम कोर्ट, प्रशासनिक स्तर पर सरकार के कामकाज में दखल नहीं दे सकता, हालांकि नेताओं को अपने मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायिक पक्ष में अदालत का दरवाजा खटखटाने की छूट है। सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में एक दो बार ही ऐसा हुआ है, जब सुप्रीम कोर्ट की तरफ से मीडिया के जरिए कोई जानकारी दी गई है, वरना तो मीडिया ही सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और सुनवाई की जानकारी देता है। भारतीय सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में जजों द्वारा मीडिया से सीधे संवाद करने या प्रेस कॉन्फ्रेंस करने का सबसे चर्चित मौका 12 जनवरी 2018 को आया था। सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ न्यायाधीशों—जस्टिस जे. चेलामेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन बी. लोकूर और जस्टिस कुरियन जोसेफ ने एक ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। भारतीय न्यायिक इतिहास में यह पहला अवसर था जब वर्तमान जजों ने इस तरह मीडिया को संबोधित किया था। इन जजों ने तब के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) दीपक मिश्रा के खिलाफ रोस्टर और प्रशासनिक कामकाज को लेकर सार्वजनिक सवाल उठाए थे। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट अपनी अधिकांश जानकारी और फैसले आधिकारिक प्रेस विज्ञप्तियों अपनी वेबसाइट और सुनवाई के जरिए ही साझा करता है। हाल के दौर में अदालत ने न्यायिक कार्यवाही के लाइव-स्ट्रीमिंग और उसके डिजिटल क्लिप्स के कमर्शियल इस्तेमाल को लेकर भी कड़े नियम तय किए हैं। सीजेआई सूर्यकांत ने मीडिया के सामने स्पष्ट किया था कि मुझे कल बैठक के अनुरोध के संबंध में एक पत्र मिला था। मैंने कल रात ही उसका जवाब दे दिया था, जिसमें उन कारणों का उल्लेख किया गया था कि मैं क्यों नहीं मिल पाऊंगा? सीजेाई ने आगे कहा, सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे सभी के लिए खुले हैं। किसी भी आम नागरिक या निर्वाचित निकाय के सदस्य की किसी भी याचिका का स्वागत है। हर भारतीय नागरिक को अदालत का दरवाजा खटखटाने का अधिकार है। हम उनकी चिंताओं को सुनेंगे और कानून के तहत जो भी उचित होगा, वह करेंगे। सुप्रीम कोर्ट से स्थिति स्पष्ट होने के बाद इंडिया गठबंधन के दलों के पास अपनी मांगों को लेकर कानूनी प्रक्रिया अपनाने का एक ही रास्ता बचा था, वह था रिट याचिका के जरिए न्याय का तकाजा। इंडिया गठबंधन के नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट तक पैदल मार्च निकाला और रिट याचिका दायर की। जिसमें राहुल गांधी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव समेत 11 विपक्षी नेता याचिकाकर्ता हैं। इसमें चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पार्टी बनाया गया है। दरअसल इससे पहले सीजेआई से अकेले ही मुलाकात की मांग करके कांग्रेस ने यह साबित करने की कोशिाश की थी, इंडिया गठबंधन का नेतृत्व वही करती है। बाकी सब उसके पीछे हैं, किन्तु सीजेआई द्वारा मिलने से इंकार करने से कांग्रेस को अपने दाव में सफलता नहीं मिल सकी। जब सीजेआई ने मिलने से इंकार कर दिया और कानूनी तरीका अपनाने की सलाह दी, तब गठबंधन के बाकी नेताओं को भी साथ लेकर याचिका दायर की गई। सुप्रीम कोर्ट ने जाहिर कर दिया कि गैर कानूनी और गैर संवैधानिक तरीके से इंडिया गठबंधन के नेताओं के मंसूबे कामयाब नहीं होने देगा। जो भी करेगा संविधान के दायरे में करेगा, अन्यथा सुप्रीम कोर्ट की साख पर भी बट्टा लग सकता है। यह भी निश्चित है कि कांग्रेस और विपक्षी दलों को कोई खास सफलता सुप्रीम कोर्ट से हाथ नहीं लगने वाली, सिवाए एसआईआर में कुछ प्रशासनिक आदेश निर्देश के, क्यों कि ज्ञानेश कुमार को हटाया नहीं जा सकता, उन्हें संविधान का संरक्षण प्राप्त है। केवल संसद में महाभियोग के जरिए ही मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाया जा सकता है, वह इसलिए पूरा नहीं होगा कि संसद में मोदी सरकार का बहुमत है। इससे पहले भी राजनीतिक इरादों को पूरा करने के विपक्षी दलों के मंसूबों पर सुप्रीम कोर्ट पानी फेर चुका है। नवम्बर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने देश में चुनावों में धांधली का आरोप लगाने वाली एक जनहित याचिका को खारिज कर दिया था। पीठ ने कहा था कि जब आप चुनाव जीतते हैं, तो ईवीएम से छेड़छाड़ नहीं होती। जब आप चुनाव हार जाते हैं, तो छेड़छाड़ हो जाती है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर तीखा व्यंग्य करते हुए पूछा कि ये याचिका दायर करने संबंधित आपको शानदार विचार कैसे मिला? इसी तरह सुप्रीम कोर्ट ने अप्रेल 2023 में 14 विपक्षी दलों की सीबीआई और ईडी की कार्रवाई के लिए नेताओं के लिए अलग से गाइडलाइंस बनाने के निर्देश देने से इंकार कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि विपक्षी नेताओं के खिलाफ ईडी और सीबीआई के ज्यादा केस दिखाने वाले आंकड़ों के आधार पर केवल नेताओं के लिए गाइडलाइन की मांग नहीं कर सकते हैं। उन्हें अभियोजन से कोई छूट नहीं मिलती है। कोर्ट ने कहा कि नेता आम नागरिकों के बराबर ही होते हैं। इसके बाद कोर्ट ने याचिका को वापस लेने की अनुमति दे दी। राजनीतिक दलों के मामले में दूरी बनाए रखने के सुप्रीम कोर्ट के नजरिए से साफ है कि इंडिया गठबंधन को अपने राजनीतिक मुद्दों की लड़ाई जनता की अदालत में लड़नी होगी। सत्ता किसे देनी है और किसे नहीं, इसका फैसला मतदाता ही करेंगे। - योगेन्द्र योगी
'हे देवेश्वरी! आप भक्तों की संकटों से रक्षा करती हैं', पीएम मोदी ने मां सिद्धिदात्री से की मंगलकामना
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चोरबागान हादसे के बाद एक्शन में बंगाल सरकार, तीन दुर्गा पूजा समितियों को नोटिस
चोरबागन में दुर्गा पूजा के दौरान हुई भगदड़ की घटना के बाद पश्चिम बंगाल सरकार एक्शन में आ गई है। राज्य सरकार ने दुर्गा पूजा पंडालों में जीवन सुरक्षा और अग्नि सुरक्षा इंतजामों की समीक्षा के लिए एक उच्च-स्तरीय समिति का गठन किया है, जिसने कई पंडालों का निरीक्षण कर तीन बड़ी पूजा समितियों को नोटिस जारी किया है।
गुजरात: सीएम भूपेंद्र पटेल ने महाअष्टमी पर अंबाजी मंदिर का दौरा किया, नवरात्रि की तैयारियों का लिया जायजा

