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1 नवंबर की कांग्रेस रैली पर विवाद, भाजपा बोली- सिख समुदाय की भावनाओं को पहुंची ठेस

1 नवंबर की कांग्रेस रैली पर विवाद, भाजपा बोली- सिख समुदाय की भावनाओं को पहुंची ठेस

समाचार नामा 30 Oct 2026 10:29 pm

विधान परिषद- छोटा चुनाव बड़े सबक

उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक की 28 विधान परिषद सीटों के चुनाव संपन्न हो चुके हैं। सर्वाधिक 11 सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश का चुनाव परिणाम आ चुका है जो भाजपा तथा सपा के बीच 6-5 के परिणाम से समाप्त हुआ। यह था तो छोटा चुनाव किंतु इस पर सभी राजनैतिक विश्लेषकों की दृष्टि थी कि 2027 विधानसभा चुनाव के पहले कौन क्लीन स्वीप करता है किंतु शिक्षकों व स्नातकों ने स्पष्ट संदेश दे दिया है कि आगामी चुनाव किसी भी दल या गठबंधन के लिए बहुत आसान नहीं होंगे। मुकाबला कांटे का होगा। जिस दल के प्रत्याशी व कार्यकर्ता धरातल पर उतर कर अपने मतदाताओं के साथ गहन संपर्क व संवाद में रहेंगे उन्हीं को लाभ होगा। विधान परिषद चुनावों में भाजपा मात्र छह सीटों पर पर अपनी साख बचाने में सफल रही जबकि समाजवादी पार्टी अपने पीडीए के बल पर पांच सीटें जीतने में सफल रही और यही नहीं उसने वाराणसी, आगरा व लखनऊ में बीजेपी के गढ़ों में परचम फहराकर भाजपा के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दीं। अब सपा में उत्साह का वातावरण है। उसके नेता व प्रवक्ता कह रहे हैं कि वर्ष 2024 में अयोध्या में भगवान राम का आशीर्वाद उन्हें प्राप्त हुआ और अब 2026 में काशी की नगरी में महादेव और लखनऊ में प्रभु श्रीराम के अनुज लक्ष्मणजी का भी आशीर्वाद मिल चुका है। सफलता से उत्साहित समाजवादी पार्टी अब इसी नैरेटिव को आगे बढ़ाएगी। इसे भी पढ़ें: चार राज्यों के विधान परिषद चुनावों के मिले-जुले परिणामों के महत्वपूर्ण सियासी संदेश भारतीय जनता पार्टी के लिए अत्यंत सतर्क हो जाने का समय आ गया है। यदि वर्ष 2024 में लोकसभा चुनाव के दौरान प्रदेश के मतदाताओं ने जो रवैया दिखाया था और सपा -कांग्रेस गठबंधन ने प्रदेश में लोकसभा की सर्वाधिक सीटें जीत ली थीं अगर वही रुख अभी भी बरकार है तब यह परिस्थितियों को और भी कठिन बना सकता है। भारतीय जनता पार्टी को सबसे बड़ा झटका रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के संसदीय क्षेत्र लखनऊ की स्नातक सीट पर लगा है। यहाँ पार्टी के प्रत्याशी इंजीनियर अवनीश सिंह को सपा प्रत्याशी कांति सिंह ने बहुत आसानी से पराजित कर दिया। यह स्पष्ट संकेत है कि अगर भाजपा ने अपना चुनावी प्रबंधन और कार्यकर्ताओं व मतदाताओं के मध्य अपना संवाद, संपर्क, व्यवहार नहीं सुधारा तो फिरऔर भी नुकसान उठाना पड़ सकता है। वाराणसी का परिणम भी स्थिति को गंभीर बना रहा है। प्रदेश के संगठन पर सवालिया निशान भी उठ रहे हैं। वाराणसी का जनमानस प्रश्न कर रहा है कि जो उम्मीदवार पिछले चुनावों में पराजित हो चुका था, जनता के मध्य कभी नहीं रहता, केवल चुनावो के छह महीने पूर्व गणेश परिक्रमा करके पार्टी का टिकट कैसे लेकर आ जाता है? ऐसी परिस्थितियों में उन कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरता है जो धरातल पर उतरकर पार्टी के लिए कड़ी मेहनत कर रहे होते हैं। वाराणसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में जितना विकास हुआ है उतनी किसी ने कल्पना भी नहीं करी थी फिर भी वहां भाजपा के वोट प्रतिशत में लगातार गिरावट और विधान परिषद की दोनों सीटों पर हार भाजपा के लिए चिंता का विषय है। काशी विश्वनाथ मंदिर का भव्य कारिडोर बना, जिससे पर्यटकों की संख्या में भारी वृद्धि हुई, रोप-वे बन रहा है, वाराणसी को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम मिलने जा रहा है, रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर क्रियाशील है, काशी को सांस्कृतिक-आध्यात्मिक गतिविधियों पूरे भारत से से जोड़ा जा रहा है, निवेशक आ रहे हैं, काशी -तमिल संगमम का आयोजन किया जा रहा है। इस सबके बाद भी वाराणसी में एमएलसी चुनावों में दोनों सीटों पर पराजय स्थानीय नेतृत्व पर सवाल खड़े कर रही है। वाराणसी की पराजय से यह बात भी उठ रही है कि वाराणसी नगर भाजपा में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। भाजपा के लिए अच्छी बात ये है कि विधानसभा चुनावों के पूर्व एक लिटमस टेस्ट हो गया। अभी भी भाजपा के पास कार्यकर्ताओं में उत्साह जागरण तथा अपनी रणनीति नए सिरे से गढ़ने के लिए पर्याप्त समय है। प्रदेश भाजपा की नवगठित कर्यकारिणी की बैठक होने जा रही है जिसमें हर बिंदु पर चर्चा होगी। यहाँ अमित शाह जी की अध्यक्षता में कडे़ कदम भी उठाए जा सकते हैं। दीपावली के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियां तथा भाजपा का चुनाव अभियान प्रारंभ होगा। भाजपा के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि जनमानस तो योगी-योगी कर रहा है किंतु कार्यकर्ताओं में उत्साह नहीं है। भाजपा के लिए अपने कार्यकर्ताओं में उत्साह जगाने का समय है क्योंकि विभिन्न कारणों से उणमें धरातल पर उत्साह नहीं दिखाई दे रहा है। अगर बीजेपी का कार्यकर्ता उत्साहित हो गया और घरों से निकल पड़ा तो फिर भाजपा आसानी से तीन सौ पार जा सकती है। भाजपा अपने कार्यकर्ताओं की नाराजगी जितनी जल्दी जितना कम कर लेगी, टिकट वितरण सही होगा, योगी आदित्यनाथ सरकार चुनावों से पूर्व एक लाख नौकरी देने का वादा सफलतापूर्वक पूरा कर लेगी और साथ ही अगर 69,000 शिक्षकों की भर्ती का मामला सुप्रीम कोर्ट से सुलझ जाएगा तो विधानसभा चुनाव भाजपा के नियंत्रण में आ जाएगा। - मृत्युंजय दीक्षित

प्रभासाक्षी 30 Oct 2026 6:51 pm

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: क्या अब सुधरेंगे फ्रॉड पीड़ितों के हालात?

भारत में डिजिटल क्रांति ने जहाँ आम नागरिक के जीवन को सुगम बनाया है, वहीं इसने एक ऐसे अदृश्य और खौफनाक अपराध तंत्र को भी जन्म दे दिया है जिसने देश की पूरी बैंकिंग और सुरक्षा व्यवस्था के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। आज के दौर में साइबर फ्रॉड और विशेष रूप से 'डिजिटल अरेस्ट' जैसी त्रासदियाँ किसी महामारी की तरह फैल चुकी हैं, जहाँ पलक झपकते ही किसी व्यक्ति की जीवनभर की गाढ़ी कमाई अपराधियों के खातों में चली जाती है। ऐसे माहौल में देश की सर्वोच्च अदालत, सुप्रीम कोर्ट का हालिया रुख न केवल डिजिटल और साइबर फ्रॉड के पीड़ितों के हक में एक ऐतिहासिक कदम है, बल्कि यह देश की बैंकिंग प्रणाली के लिए एक बेहद सख्त चेतावनी भी है। अदालत ने बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि बैंकों की लापरवाही या उनकी उचित सावधानी (ड्यू डिलिजेंस) में कमी के कारण कोई नागरिक ठगी का शिकार होता है, तो संबंधित बैंक को उस नुकसान की पूरी भरपाई करनी होगी। मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ का यह निर्देश इस मायने में क्रांतिकारी है क्योंकि यह पहली बार उपभोक्ताओं के नुकसान की सीधी जवाबदेही उन वित्तीय संस्थानों पर डालता है, जो सुरक्षा का दावा तो करते हैं लेकिन अपनी कमियों को छिपाने में लगे रहते हैं। अदालत द्वारा रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया को आगामी संशोधित 'केवाईसी गाइडलाइंस' में पीड़ितों को मुआवजा देने का प्रावधान अनिवार्य रूप से शामिल करने का आदेश देना एक ऐसा नीतिगत बदलाव है, जिसकी प्रतीक्षा लंबे समय से की जा रही थी। इस आदेश के तहत आरबीआई को तीस नवंबर दो हजार छब्बीस तक नए नियम अधिसूचित करने हैं, जो इकतीस दिसंबर दो हजार छब्बीस से देश भर में प्रभावी हो जाएंगे। अदालत का यह समयबद्ध दृष्टिकोण दर्शाता है कि न्यायपालिका इस संकट की गंभीरता को कितनी गहराई से महसूस कर रही है। इस पूरे संकट का सबसे स्याह पहलू यह है कि अब तक साइबर अपराध के मामलों में पूरी व्यवस्था का दृष्टिकोण केवल पीड़ित को उपदेश देने या उसे जागरूक करने तक ही सीमित रहा है। सरकारें, पुलिस और बैंक अक्सर विज्ञापनों के माध्यम से यह कहकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं कि किसी को अपना ओटीपी या पासवर्ड न बताएं। परंतु, आज का साइबर अपराध केवल ओटीपी चोरी करने तक सीमित नहीं रह गया है। 'डिजिटल अरेस्ट' जैसी नई और परिष्कृत तकनीकों में अपराधियों द्वारा कानून प्रवर्तन एजेंसियों का फर्जी रूप धरकर, पीड़ितों को मानसिक रूप से बंधक बना लिया जाता है और अत्यधिक मनोवैज्ञानिक दबाव में उनसे पैसे ऐंठे जाते हैं। ऐसे में साधारण नागरिक, चाहे वह कितना भी पढ़ा-लिखा क्यों न हो, भय और भ्रम के जाल में फंस जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस कड़वी सच्चाई को स्वीकार किया है कि इस साल देश में डिजिटल अरेस्ट और साइबर फ्रॉड के कारण जनता ने लगभग आठ सौ करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि गंवाई है। यह आंकड़ा केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि यह उन हजारों परिवारों की मानसिक प्रताड़ना, आर्थिक तबाही और टूटे हुए सपनों की दास्तां है, जिन्होंने अपनी जमा-पूंजी को सुरक्षित मानकर बैंकों के हवाले किया था। जब कोई अपराधी किसी खाते से करोड़ों रुपये ट्रांसफर करने में सफल हो जाता है, तो यह केवल पीड़ित की सादगी नहीं, बल्कि उस बैंक के सुरक्षा चक्र की पूर्ण विफलता होती है। अदालत ने इसी बिंदु पर प्रहार करते हुए बैंकों को निर्देश दिया है कि यदि किसी खाताधारक के सामान्य व्यवहार या पुराने पैटर्न से अलग कोई 'असामान्य ट्रांजैक्शन' या संदिग्ध लेनदेन होता है, तो बैंक को उस पर तुरंत अस्थाई रोक लगानी होगी। यह एक ऐसा सुरक्षात्मक कदम है जो अगर पहले से मुस्तैदी से लागू होता, तो आज आठ सौ करोड़ रुपये का यह राष्ट्रीय नुकसान रोका जा सकता था। इसे भी पढ़ें: डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) कानून क्या है? इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती क्यों दी गई है? इस पूरे संगठित अपराध की रीढ़ की हड्डी 'म्यूल अकाउंट्स' यानी वे फर्जी बैंक खाते हैं, जिनका उपयोग साइबर ठग अपनी पहचान छिपाने और पैसे को अलग-अलग खातों में घुमाने के लिए करते हैं। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि बिना बैंकों के भीतर बैठे कुछ भ्रष्ट तत्वों की मिलीभगत या फिर बैंकों के ढीले रवैये के, हजारों की संख्या में फर्जी दस्तावेजों पर खाते खोलना और उनमें करोड़ों का लेन-देन होना संभव नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इन फर्जी खातों के जाल पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए साफ किया है कि बैंकों को अपने ग्राहक को जानो की प्रक्रिया को केवल एक कागजी औपचारिकता नहीं, बल्कि एक अभेद्य सुरक्षा कवच बनाना होगा। अब तक बैंक इन फर्जी खातों के जरिए होने वाले अपराधों से खुद को अलग कर लेते थे और सारा दोष पुलिस या पीड़ित पर मढ़ दिया करते थे। लेकिन इस नए आदेश के बाद जब लापरवाही साबित होने पर मुआवजा देना बैंकों के लिए कानूनी रूप से अनिवार्य हो जाएगा, तब वित्तीय संस्थानों को अपनी तकनीकी सुरक्षा और आंतरिक निगरानी तंत्र को दुरुस्त करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। जब बैंकों को यह समझ आएगा कि सुरक्षा में चूक की कीमत उनके अपने मुनाफे से कटेगी, तब वे संदिग्ध खातों पर नजर रखने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और उन्नत सुरक्षा प्रणालियों में निवेश करने को तत्पर होंगे। इसके साथ ही, बैंकों को यह भी निर्देश दिया गया है कि वे किसी भी संदिग्ध डिजिटल अरेस्ट या वित्तीय धोखाधड़ी की गतिविधि की भनक लगते ही तुरंत नजदीकी पुलिस स्टेशन को सूचित करें, जिससे वित्तीय सुरक्षा और कानून व्यवस्था के बीच एक मजबूत और त्वरित तालमेल स्थापित हो सके। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक आदेश जितना स्वागत योग्य है, इसे जमीन पर उतारने की राह में उतनी ही जटिल चुनौतियां भी खड़ी हैं। सबसे बड़ा कानूनी और व्यावहारिक संकट यह उठेगा कि 'बैंक की लापरवाही' और 'ग्राहक की गलती' के बीच की महीन रेखा को कौन और कैसे तय करेगा। बैंक निश्चित रूप से हर मामले में अपनी कानूनी टीमों के सहारे यह साबित करने की पुरजोर कोशिश करेंगे कि उपभोक्ता ने स्वयं अपनी संवेदनशील वित्तीय जानकारियां या क्रेडेंशियल्स साझा किए थे, और इसलिए बैंक मुआवजे के लिए कतई उत्तरदायी नहीं है। इसके अलावा, बैंकिंग लॉबी की ओर से इस बात को लेकर भी कानूनी प्रतिरोध देखने को मिल सकता है कि तकनीकी रूप से सुरक्षित प्रणालियों के बावजूद यदि कोई उपभोक्ता 'सोशल इंजीनियरिंग' या मनोवैज्ञानिक दबाव (जैसे डिजिटल अरेस्ट) का शिकार होता है, तो उसकी पूरी वित्तीय देनदारी बैंक पर कैसे थोपी जा सकती है। इसके लिए आरबीआई को अपने संशोधित नियमों में बहुत स्पष्ट, निष्पक्ष और पारदर्शी मापदंड तय करने होंगे ताकि पीड़ितों को न्याय पाने के लिए बैंकों के चक्कर न काटने पड़ें और न ही उन्हें उपभोक्ता अदालतों के अंतहीन मुकदमों में उलझना पड़े। एक और चिंताजनक पहलू इस कानून के लागू होने की समयसीमा है। दिसंबर दो हजार छब्बीस तक का समय अपराधियों को नए रास्ते खोजने का मौका दे सकता है, इसलिए इस संक्रमण काल के दौरान भी बैंकों को अपनी स्वेच्छा से सुरक्षा मानकों को कड़ा करना चाहिए। निष्कर्षतः, सुप्रीम कोर्ट का यह कड़ा रुख देश के करोड़ों डिजिटल उपभोक्ताओं के लिए एक नई उम्मीद की किरण लेकर आया है। डिजिटल इंडिया का सपना तभी पूरी तरह साकार और सफल हो सकता है, जब देश का हर नागरिक डिजिटल रूप से खुद को सुरक्षित महसूस करे। अदालत ने अपना काम बखूबी कर दिया है और अब गेंद पूरी तरह से रिजर्व बैंक और देश के तमाम वाणिज्यिक बैंकों के पाले में है। उन्हें यह समझना होगा कि वित्तीय सुरक्षा में सेंध केवल एक व्यक्ति का नुकसान नहीं, बल्कि पूरी बैंकिंग व्यवस्था से जनता के भरोसे का उठ जाना है, और इस भरोसे को बनाए रखना अब उनकी कानूनी मजबूरी भी है। - अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार

प्रभासाक्षी 30 Oct 2026 6:46 pm

भारतीय शेयर बाजार गिरावट के साथ हुआ बंद

मुंबई, भारतीय शेयर बाजार शुक्रवार के कारोबारी सत्र में बड़ी गिरावट के साथ बंद हुआ।

देशबन्धु 30 Oct 2026 5:49 pm

भारत में तेजी से घट रही गरीबी: वर्ल्ड बैंक

नई दिल्ली, भारत ने गरीबी में बीते एक दशक में दुनिया की सबसे तेज गिरावट में से एक दर्ज की है और देश में 2011 से 2023 के बीच करीब 49.6 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकले हैं।

देशबन्धु 30 Oct 2026 5:31 pm

भाजपा की 'लोकतंत्र बचाओ' रैली पर उदित राज का हमला, बोले- दबाव में है सरकार

भाजपा की 'लोकतंत्र बचाओ' रैली पर उदित राज का हमला, बोले- दबाव में है सरकार

समाचार नामा 30 Oct 2026 4:21 pm

Mock Parliament या Public Impeachment को लेकर क्या कहता है भारत का संविधान?

संसद में हंगामा और संसद के बाहर ड्रामा। यह लाइन आज के विपक्ष पर खूब फिट बैठती है। एक ओर संसद की कार्यवाही को लगातार बाधित किया जाता है दूसरी ओर किसी नेता के घर पर संसद की कार्यवाही का मंचन कर सुर्खियां हासिल करने की कोशिश की जाती है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अभियान को 'जन महाभियोग' का नाम दे रहे विपक्षी दलों ने जिस मॉक पार्लियामेंट का आयोजन किया है उस पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। यहां सवाल यह भी उठता है कि बात-बात पर संविधान की पुस्तक दिखाने वाले राहुल गांधी ने क्या संविधान को पढ़ा ही नहीं है? दरअसल भारतीय संविधान में किसी राजनीतिक दल, विपक्षी गठबंधन या संगठन को संसद अथवा विधानसभा का मॉक सत्र आयोजित कर उसे संवैधानिक कार्यवाही का स्वरूप देने या अपनी ओर से जन महाभियोग चलाने का कोई अधिकार नहीं दिया गया है। संविधान ने संसद और विधानसभाओं के गठन, सत्र संचालन तथा महाभियोग जैसी प्रक्रियाओं के लिए स्पष्ट प्रावधान निर्धारित किए हैं। इसलिए इन संवैधानिक व्यवस्थाओं के समानांतर राजनीतिक मंच खड़ा करना और उसे संसदीय या महाभियोग की कार्यवाही के रूप में प्रस्तुत करना संवैधानिक मर्यादाओं और निर्धारित संस्थागत प्रक्रियाओं पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। संविधान में समानांतर संसद की कोई व्यवस्था नहीं हम आपको बता दें कि संविधान का अनुच्छेद 85 स्पष्ट करता है कि संसद के सत्र बुलाने का अधिकार राष्ट्रपति के पास है। वहीं अनुच्छेद 174 के तहत राज्य विधानमंडल का सत्र बुलाने का अधिकार राज्यपाल को दिया गया है। अनुच्छेद 118 संसद के दोनों सदनों को अपनी कार्यवाही संचालित करने के लिए नियम बनाने का अधिकार देता है। इसका मतलब बिल्कुल स्पष्ट है कि संसद की बैठक, कार्यवाही, अध्यक्षता और विधायी निर्णय किसी राजनीतिक संगठन की मनमर्जी से नहीं चल सकते। इसे भी पढ़ें: Ministry of Corporate Affairs ने NCLT और NCLAT को पूरी तरह Hijack कर लिया है, CJI Surya Kant ने Modi सरकार पर की बेहद कड़ी टिप्पणी साथ ही अनुच्छेद 105 के तहत संसद के सदस्यों को प्राप्त विशेषाधिकार भी इसी संवैधानिक संस्था और उसकी कार्यवाही से संबंधित हैं। किसी निजी आयोजन में शामिल होने वाले राजनीतिक नेताओं को इन विशेषाधिकारों का लाभ नहीं मिलता। इसलिए किसी आयोजन को संसद की कार्यवाही के रूप में प्रस्तुत करना संवैधानिक अधिकारों और वास्तविक राजनीतिक गतिविधि के बीच की सीमा को धुंधला करता है। 2010 का मॉक पार्लियामेंट विवाद इसका प्रमाण है उल्लेखनीय है कि 20 अगस्त 2010 को लोकसभा में हंगामे के बाद लगभग 70 सांसदों ने सदन के भीतर ही मॉक पार्लियामेंट आयोजित कर दी थी। इस घटना पर तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने नाराजगी जताई थी। 25 अगस्त 2010 को हुई सर्वदलीय बैठक में राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों ने इस घटना पर खेद जताया था। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि संसद जैसी संवैधानिक संस्था की कार्यवाही का राजनीतिक प्रदर्शन स्वयं संसदीय व्यवस्था के भीतर भी गंभीर आपत्ति का विषय बना था। साथ ही जन महाभियोग संविधान की निर्धारित प्रक्रिया का विकल्प नहीं है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ जन महाभियोग आयोजित करने का विचार इससे भी अधिक गंभीर संवैधानिक प्रश्न खड़ा करता है। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के अनुसार मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिन आधारों पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है। इसके लिए अनुच्छेद 124(4) में निर्धारित प्रक्रिया लागू होती है। हम आपको बता दें कि न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत लोकसभा में कम से कम 100 या राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर से प्रस्ताव प्रस्तुत किया जा सकता है। प्रस्ताव स्वीकार होने पर जांच समिति गठित होती है। आरोपों की जांच के बाद दोनों सदनों में निर्धारित विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना आवश्यक है। उसके बाद राष्ट्रपति द्वारा हटाने का आदेश जारी किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में जनता की किसी प्रतीकात्मक संसद, राजनीतिक गठबंधन या पूर्व लोकसभा अध्यक्ष की अध्यक्षता वाली निजी सभा के लिए कोई स्थान निर्धारित नहीं है। इसलिए किसी राजनीतिक आयोजन में मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ आरोपों की सुनवाई करना, प्रतीकात्मक प्रस्ताव पारित करना या जन महाभियोग की घोषणा करना वास्तविक संवैधानिक महाभियोग नहीं हो सकता। ऐसे आयोजन से किसी संवैधानिक पदाधिकारी की स्थिति पर कोई कानूनी प्रभाव नहीं पड़ता। नाम बदलने से संवैधानिक प्रश्न समाप्त नहीं होता साथ ही यदि मॉक पार्लियामेंट का नाम बदलकर जन संसद अथवा जन महाभियोग कर दिया जाए तो इससे उसकी संवैधानिक स्थिति नहीं बदल जाती। किसी आयोजन की वैधता उसके नाम से नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक गतिविधियों से निर्धारित होती है। कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों को समझना चाहिए कि संविधान शांतिपूर्ण विरोध और राजनीतिक अभिव्यक्ति का अधिकार देता है। लेकिन इन अधिकारों के आधार पर किसी को संसद की वैधानिक शक्तियां अथवा महाभियोग की संवैधानिक प्रक्रिया अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं मिलता। इसलिए मॉक पार्लियामेंट को वास्तविक संसदीय सत्र और जन महाभियोग को वास्तविक संवैधानिक महाभियोग के रूप में पेश करना कानूनी रूप से निराधार है। ऐसी कार्यवाहियां किसी संवैधानिक निर्णय को जन्म नहीं दे सकतीं और न ही संसद द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का स्थान ले सकती हैं। बहरहाल, संविधान ने संसद बनाई है, राजनीतिक दलों को अपनी संसद बनाने का अधिकार नहीं दिया। संविधान ने महाभियोग की प्रक्रिया निर्धारित की है, राजनीतिक मंचों को महाभियोग का फैसला सुनाने का अधिकार नहीं दिया। यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक तथ्य है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 30 Oct 2026 3:54 pm

अरबों से बगावत, यहूदियों से 'रक्त-संधि': जब Muslim-Jews ने मिलकर बनाया इजरायल, 1948 के युद्ध की अनस

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्। अर्थात हे भारत, जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म में वृद्धि होती है, तब-तब मैं धर्म की स्थापना के लिए स्वयं को प्रकट करता हूँ। विश्व इतिहास में महाभारत के युद्ध को धर्मयुद्ध कहा गया। लेकिन महाभारत के लिए जो युद्ध लड़ा गया था वो किसी धर्म या संप्रदाय के लिए नहीं बल्कि सत्य और न्याय की समाज में स्थापना के लिए लड़ा गया था। इसका उद्देश्य किसी नए धर्म की स्थापना करके दूसरे धर्मों का क्रूर दमन करना नहीं था और न ही उनके धार्मिक स्थलों को नष्ट करना था। दुनिया के सभी धर्मों को दो हिस्सों में अब्राहिम रिलीजन और इंडियन रिलीजन में बांटा गया है। अब्राहिम रिलीजन में ईसाई, यहूदी और मुसलमान आते हैं तो वहीं इंडियन रिलीजन में बुद्धिस्ट, हिंदू और सिख जैसे बहुत सारे धर्म शामिल हैं, जिनकी जड़े हमारे भारत देश से मिलती हैं। यानी इनकी स्थापना और शुरुआत भारत देश से ही कि गई थी। ईसाई धर्म जब अपनी ठीक ठाक जगह यूरोप में बना चुका था। उस वक्त ईसाई जब अपने धर्म का विस्तार कर रहे थे, तो उनका नारा सिर्फ और सिर्फ समाज में मोहब्बत बांटने का था। जीसस क्राइस्ट शोअर्ड अस, हाऊ टू लव अदर्स यानी जीसस ने हमें बताया है कि लोगों से कैसे मोहब्बत की जाए। लेकिन सवाल ये था कि जिनकी जुबान पर जीसस के नाम पर मोहब्बत बांटने वाले गीत थे, उन्होंने क्रूसेड का रास्ता क्यों चुना? लोगों को नफरत छोड़कर प्यार बांटने के गीत गाने वालों ने पूरे यूरोप में तबाही क्यों मचाई और वो भी दूसरे धर्म वालों का नरसंहार करके। इसी को द क्रूसिड के नाम से जाना जाता है। इसे भी पढ़ें: नेतन्याहू जिसे शर्म कहते थे, अब इजरायल में वही मुस्लिम शासन? मिट जाएगा इतिहास! इज़राइल बनाने के लिए यहूदी-मुस्लिम मिलकर लड़े थे साथ बाइबल में कहा गया है कि यह भूमि यहूदियों के लिए है, और पवित्र धर्मग्रंथों से असहमति नहीं जताई जानी चाहिए। मैं और मेरे लोग यहूदी राज्य के वफादार नागरिकों के रूप में शांति से रहना चाहते हैं,—यह बात गैलिली (उत्तरी इज़राइल) के मुस्लिम बदू अल-हैब जनजाति के प्रमुख शेख हुसैन इस्माइल अबू यूसुफ ने 1948 की शुरुआत में यिगल एलोन से कही थी। एलोन ब्रिटिश-शासित फ़िलिस्तीन में यहूदियों के विशिष्ट सैन्य बल 'पलमाच' (Palmach) के कमांडर थे। मई 1948 में इज़राइल द्वारा स्वतंत्रता की घोषणा करने से कुछ महीने पहले, अबू यूसुफ ने यहूदी बलों के साथ गठबंधन की मांग की थी। इसके बाद उनकी जनजाति के लगभग 70 युवकों को यहूदी सेना के साथ मिलकर लड़ने के लिए प्रशिक्षित किया गया। एक ऐसे समय में जब यहूदी सेनाएँ फ़िलिस्तीनी अरब समूहों से लड़ रही थीं और इज़राइल का अस्तित्व में आना बाकी था, एक मुस्लिम अरब प्रमुख की ओर से यह एक असाधारण घोषणा थी। जब अबू यूसुफ ने यह निर्णय लिया, तब फ़िलिस्तीन पर ब्रिटिश शासन अपने अंत के करीब था, और यहूदी व फ़िलिस्तीनी अरब सेनाएँ उस क्षेत्र के भविष्य को लेकर आपस में लड़ रही थीं। जहाँ अधिकांश अरब दुनिया एक यहूदी राष्ट्र के निर्माण का विरोध कर रही थी, वहीं इस क्षेत्र में कुछ ऐसे मुस्लिम बदू कबीले भी थे जिन्होंने यहूदियों का समर्थन करने का फैसला किया। यूसुफ के नेतृत्व वाली अल-हैब जनजाति भी उन्हीं में से एक थी। इस कबीले के सदस्यों ने खुफिया जानकारी दी, यहूदी लड़ाकों की मदद की और एक ऐसी सैन्य इकाई में शामिल हुए जिसने उस युद्ध में हिस्सा लिया, जिसके परिणामस्वरूप इज़राइल की स्थापना हुई। हालाँकि यह कहानी मध्य पूर्व में यहूदी-अरब प्रतिद्वंद्विता के बारे में आज की धारणा को चुनौती देती है, लेकिन यह यह भी दिखाती है कि किस तरह संघर्ष और विजय ने यहूदियों और अरबों को, और यहाँ तक कि अरब समुदायों को भी आपस में बाँट दिया। इज़राइल के गठन के लगभग आठ दशक बाद, यहूदियों और अरबों के बीच के संबंध वहां की राजनीति के केंद्र में आ गए हैं। 27 अक्टूबर के चुनाव के नतीजों के अनुमान के मुताबिक, इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के गुट को 53 सीटें और उनके प्रतिद्वंद्वी गादी आइसेनकोट के गुट को 48 सीटें मिल सकती हैं। 120 सदस्यों वाली 'नेसेट' (इज़राइली संसद) में बहुमत के लिए 61 सीटों की जरूरत होती है, जो दोनों गुटों के पास नहीं हैं। अरब पार्टियों ने रिकॉर्ड 19 सीटें जीतने का अनुमान लगाया है और वे 'किंगमेकर' की भूमिका में आ सकती हैं। यह स्थिति तब है जब यहूदी नेतृत्व वाले कई विपक्षी दल, इज़राइल की दो अरब पार्टियों के समर्थन पर निर्भर रहने से कतराते रहे हैं। इस गतिरोध और इज़राइली अरब मतदाताओं की संख्या बढ़ाने के लिए विदेशी फंडिंग मिलने के आरोपों ने, इज़राइल में यहूदी-अरब संबंधों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। ऐसे में, मुस्लिम बेदुइन लोगों की कहानी आज और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, जिसे याद करना प्रासंगिक है। इज़रायल के बनने से पहले ही एक युद्ध शुरू हो चुका था 20वीं सदी की शुरुआत में फिलिस्तीन में यहूदियों के लिए एक अलग देश की मांग जोर पकड़ने लगी थी। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 'होलोकॉस्ट' (यहूदियों के नरसंहार) के बाद यह मांग और भी प्रबल हो गई। इस नरसंहार में एडोल्फ हिटलर के नाज़ी जर्मनी और उसके सहयोगियों ने लगभग 60 लाख यहूदियों की हत्या कर दी थी। इस नरसंहार और बचे हुए यहूदियों की दयनीय स्थिति ने एक यहूदी राष्ट्र की स्थापना के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन को और बढ़ा दिया। 29 नवंबर 1947 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें ब्रिटिश शासन वाले फिलिस्तीन को बांटकर एक यहूदी और एक अरब देश बनाने का सुझाव दिया गया था। दिलचस्प बात यह है कि भारत उन 13 देशों में शामिल था, जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र की इस विभाजन योजना के खिलाफ वोट दिया था। यहूदी नेतृत्व ने विभाजन योजना को स्वीकार कर लिया, लेकिन फ़िलिस्तीनी अरब नेताओं और पड़ोसी अरब देशों ने इसे अस्वीकार कर दिया। उस समय फ़िलिस्तीन ब्रिटिश शासन के अधीन था, और आप्रवासन, भूमि और क्षेत्र पर प्रतिस्पर्धी दावों को लेकर यहूदी और अरब समुदायों के बीच तनाव बढ़ रहा था। यहूदी समूह एक राष्ट्रीय मातृभूमि स्थापित करना चाहते थे, जबकि फ़िलिस्तीनी अरब यहूदी मांगों का विरोध कर रहे थे और अपनी भूमि पर नियंत्रण खोने से भयभीत थे। संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के बाद, हगानाह सहित यहूदी सैन्य संगठनों और स्थानीय मिलिशिया और लड़ाकों सहित फ़िलिस्तीनी अरब सशस्त्र समूहों के बीच लड़ाई छिड़ गई। मुख्य यहूदी सैन्य संगठन हगानाह और उसकी विशिष्ट लड़ाकू टुकड़ी, पल्माच ने यहूदी बस्तियों की रक्षा और सैन्य अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जैसे ही ब्रिटेन ने फ़िलिस्तीन से हटने की तैयारी की, संघर्ष और तीव्र हो गया। इसने इज़राइल की स्वतंत्रता की घोषणा का मार्ग प्रशस्त किया। यहूदियों के मुख्य सैन्य संगठन 'हगाना' और उसके विशिष्ट लड़ाकू बल 'पाल्माच' ने यहूदी बस्तियों की रक्षा करने और सैन्य अभियान चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जैसे-जैसे ब्रिटेन ने फिलिस्तीन से हटने की तैयारी की, संघर्ष और तेज हो गया। इसी पृष्ठभूमि में मई 1948 में इज़राइल ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की, जिसके बाद पड़ोसी अरब देशों के साथ युद्ध छिड़ गया। 14 मई 1948 को डेविड बेन-गुरियन ने इज़राइल की स्वतंत्रता की घोषणा की। अगले दिन, मिस्र, ट्रांसजॉर्डन (अब जॉर्डन), सीरिया और इराक की सेनाएँ युद्ध में शामिल हो गईं। लेबनान ने भी इसमें हिस्सा लिया। यह युद्ध 1949 तक चलता रहा। इज़राइल न केवल बचा रहा, बल्कि उसने संयुक्त राष्ट्र की विभाजन योजना में यहूदी राज्य के लिए प्रस्तावित क्षेत्र से भी कहीं अधिक ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया। फिलिस्तीनियों के लिए, यह युद्ध 'नक्बा' यानी एक बड़ी तबाही बन गया, जिसके दौरान लगभग 7 लाख लोगों को अपने घर छोड़कर भागना पड़ा या उन्हें वहाँ से निकाल दिया गया। लेकिन, यह लड़ाई कोई ऐसी सीधी-सादी स्थिति नहीं थी जहाँ सभी अरब एक तरफ होकर सभी यहूदियों के खिलाफ लड़ रहे हों। कुछ अरब समुदायों ने यहूदी सेनाओं का समर्थन किया, कुछ ने उनके खिलाफ लड़ाई लड़ी, और कुछ तटस्थ रहने की कोशिश करते रहे। यहूदियों का पक्ष चुनने वालों में 'अल-हैब' कबीले के मुस्लिम बेदौइन (खानाबदोश) लोग भी शामिल थे। वे गैलिली क्षेत्र में 'तूबा' गाँव के आसपास रहते थे। यह इलाका उस समय ब्रिटिश शासन वाले फिलिस्तीन का हिस्सा था, और आज उत्तरी इज़राइल में 'तूबा-ज़ंगारिये' नामक कस्बे के रूप में जाना जाता है। इसे भी पढ़ें: Israel के घरेलू विवाद में घसीटे जाने पर Doha चुप नहीं रहेगा, Qatar की चेतावनी मुस्लिम कबीले ने यहूदियों का पक्ष क्यों चुना? 1948 में यहूदी सेनाओं का समर्थन करने का 'अल-हैब' कबीले का फैसला, बरसों की दोस्ती, कबीलाई प्रतिद्वंद्विता और राजनीतिक हिसाब-किताब का नतीजा था। 'पालमाच' (यहूदियों की एक विशेष लड़ाकू टुकड़ी, जो बाद में इज़रायली सेना का हिस्सा बन गई) के अभिलेखों के अनुसार, मुस्लिम बेदौइन 'अल-हैब' कबीले के पड़ोसी यहूदी बस्तियों के साथ बरसों से दोस्ताना संबंध थे। यहाँ तक कि 1936 से 1939 के 'अरब विद्रोह' के दौरान भी—जब फिलिस्तीनी अरबों ने ब्रिटिश शासन और यहूदियों के बढ़ते प्रवास के खिलाफ बगावत की थी—इस कबीले ने यहूदी समुदायों पर होने वाले हमलों में शामिल होने से इनकार कर दिया था। इसके प्रमुख, हुसैन इस्माइल अबू यूसुफ ने 'ज्यूइश नेशनल फंड' को 500 डुनम (लगभग 70 मानक फुटबॉल मैदानों के बराबर) ज़मीन बेची थी। बाद में यह ज़मीन 'किबुत्ज़ कफार हनासी' का हिस्सा बन गई, जो जॉर्डन नदी के पास (उत्तरी इज़राइल में) ऊपरी गैलिली क्षेत्र में स्थित एक यहूदी बस्ती है। यह कबीला काफी छोटा था, जिसमें 1948 के समय महिलाओं और बच्चों सहित लगभग 400 सदस्य थे। हालाँकि, इसके हथियारबंद लोगों को गैलिली के पहाड़ी इलाकों की अच्छी जानकारी थी, जिससे वे एक बहुत ही उपयोगी सहयोगी साबित हो सकते थे। 'अल-हैब' कबीले के 'अरब हायर कमिटी' के साथ भी लंबे समय से मतभेद चल रहे थे; यह कमिटी फिलिस्तीनी अरब राष्ट्रीय आंदोलन का प्रतिनिधित्व करने वाली मुख्य राजनीतिक संस्था थी। 'पाल्माच' अभिलेखागार के अनुसार, अबू यूसुफ का मानना ​​था कि आने वाले युद्ध में यहूदी सेनाओं की जीत होगी। उनके इस फैसले पर सीरिया के दबाव का भी असर था। कहा जाता है कि सीरिया के प्रतिनिधियों ने उन्हें यह प्रस्ताव दिया था कि अगर वे अपने कबीले को गोलान हाइट्स (जो उस समय सीरिया के नियंत्रण में था) ले जाएँ, तो पुरानी दुश्मनी भुला दी जाएगी। लेकिन अबू यूसुफ ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। इसके बजाय, उन्होंने यहूदी सेनाओं से संपर्क किया और एक ऐसा गठबंधन करना चाहा जिससे उनके कबीले का भविष्य सुरक्षित हो सके। इसे भी पढ़ें: Israel Election: विदेशी दखल की जांच हो पर Arab आबादी को न करें बदनाम, बोले Isaac Herzog यहूदी कमांडरों ने शेख की परीक्षा कैसे ली प्रस्तावित रक्त समझौते के कारण मुस्लिम कबीले के मुखिया और यहूदी सैन्य नेतृत्व के बीच मुलाकात का रास्ता साफ हो गया। 1948 की शुरुआत में, रोश पिना की यहूदी बस्ती के दो लोगों - अमीहुद श्वार्ट्ज और मानो फ्रीडमैन - ने अबू यूसुफ और पाल्माच कमांडर यिगाल एलोन के बीच एक बैठक आयोजित करने में मदद की। इसमें यरुहम कोहेन ने भी सहायता की, जो गैलिली के अरब समुदायों से अच्छी तरह परिचित थे। अबू यूसुफ ने एलोन से कहा कि वह चाहता है कि उसके लोग प्रस्तावित यहूदी राज्य में शांति से रहें। लेकिन यहूदी कमांडरों ने बिना जांच-पड़ताल किए उसके आश्वासनों पर भरोसा नहीं किया। पाल्माच के अभिलेखों (archives) के अनुसार, उन्होंने शेख से 'बनोट याकोव ब्रिज' के पार सीरियाई सेना की स्थिति के बारे में बताने को कहा; यह पुल सीरियाई सीमा के पास एक महत्वपूर्ण रास्ता था। कमांडर ने इस जानकारी का मिलान अन्य स्रोतों से मिली खुफिया जानकारी से किया। दोनों जानकारियां मेल खा गईं। इससे यहूदी नेताओं को यकीन हो गया कि शेख पर भरोसा किया जा सकता है। इस बैठक में एक समझौता हुआ, जिसके तहत कबीले के नौजवानों को मिलाकर एक सैन्य इकाई बनाई जानी थी। यह इकाई पाल्माच की 'यिफताह ब्रिगेड' के अधीन काम करने वाली थी। इस गठबंधन ने अबू यूसुफ के कबीले को उस पक्ष के साथ जगह दी, जिसके जीतने की उम्मीद थी। इस गठबंधन की बदौलत यहूदी सेना को ऐसे लोग मिल गए जो उस इलाके को अच्छी तरह जानते थे, स्थानीय अरब समुदायों को समझते थे, और ऐसी खुफिया जानकारी जुटा सकते थे जिसे हासिल करने में यहूदी लड़ाकों को काफी मुश्किल होती। 70 मुस्लिम बेदौइन जिन्होंने यहूदी 'पालमाच' (Palmach) में हिस्सा लिया इस गठबंधन के परिणामस्वरूप 'पाल-हेइब प्लाटून' का गठन हुआ। यह एक ऐसी सैन्य इकाई थी जिसमें मुस्लिम बेदौइन लड़ाके शामिल थे, जो यहूदी सेनाओं के साथ मिलकर काम करते थे। इस इकाई का कमांडर इसाक हैंकिन को बनाया गया, जो महमूद अल-उबैद के साथ मिलकर काम करते थे। महमूद अल-उबैद एक बेदौइन लड़ाके थे, जो बाद में इज़राइल रक्षा बलों (Israel Defense Forces) की 'अल्पसंख्यक इकाई' (Minorities Unit) में भी शामिल हुए। हैंकिन ने 'अल-हेइब' कबीले के युवाओं को प्रशिक्षण देना शुरू किया। उनकी शुरुआती जिम्मेदारियों में गांव की सुरक्षा को मजबूत करना शामिल था—जैसे खाइयां खोदना, आश्रय स्थल बनाना और संभावित हमलों से निपटने के लिए मोर्चे तैयार करना। बाद में, कबीले के लगभग 70 चुने हुए लोगों को सैन्य प्रशिक्षण दिया गया। उन्होंने युद्ध की तकनीकें सीखीं, हथियारों को चलाना सीखा और यह भी सीखा कि छोटे समूहों में रहकर कैसे काम किया जाता है। इस इकाई ने 'ऑपरेशन माताते' से पहले खुफिया अभियान चलाए। यह ऑपरेशन 3 मई 1948 को शुरू हुआ था। इज़राइल की स्वतंत्रता की घोषणा से ठीक 11 दिन पहले। यह ऑपरेशन एक बड़े यहूदी सैन्य अभियान का हिस्सा था, जिसका मकसद पड़ोसी अरब सेनाओं के संभावित हस्तक्षेप से पहले रणनीतिक रास्तों और ठिकानों को सुरक्षित करना था। अल-हैब लड़ाकों ने इस क्षेत्र और यहाँ के लोगों के बारे में अपनी जानकारी का इस्तेमाल करके, अरबों की स्थिति और उनकी गतिविधियों के बारे में जानकारी जुटाने में मदद की। लेकिन यहूदी सेनाओं के साथ जुड़ने के उनके फैसले में काफी जोखिम था, क्योंकि इससे वे अरबों के दुश्मन बन गए। 14 मई को डेविड बेन-गुरियन द्वारा इज़राइल की स्थापना की घोषणा के एक दिन बाद, मिस्र, ट्रांसजॉर्डन (अब जॉर्डन), सीरिया, लेबनान और इराक की सेनाओं ने पहला अरब-इज़राइली युद्ध छेड़ दिया। यह लड़ाई कई महीनों तक चली। इज़राइली सेनाओं ने कई मोर्चों पर अरब सेनाओं का मुकाबला किया। अल-हैब कबीले ने गैलिली में खुफिया जानकारी और सैन्य सहायता उपलब्ध कराई।

प्रभासाक्षी 30 Oct 2026 2:14 pm

उत्तर प्रदेश: लखनऊ में पार्टी की राज्य कार्यसमिति की बैठक करेंगे अमित शाह, सीएम योगी सहित कई नेता होंगे शामिल

उत्तर प्रदेश: लखनऊ में पार्टी की राज्य कार्यसमिति की बैठक करेंगे अमित शाह, सीएम योगी सहित कई नेता होंगे शामिल

समाचार नामा 30 Oct 2026 8:35 am

20 साल के सुशासन का जश्न, 24 नवंबर को जेडीयू मनाएगी बड़ा उत्सव

जनता दल (यूनाइटेड) 24 नवंबर को ‘सुशासन दिवस’ के रूप में मनाएगी। यह दिन 2005 में नीतीश कुमार के बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभालने की 20वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में मनाया जाएगा।

देशबन्धु 30 Oct 2026 7:20 am

एमपीएससी परीक्षा लीक जांच: आयोग ने जवाब दाखिल करने की अंतिम तिथि 16 नवंबर निर्धारित की

एमपीएससी परीक्षा लीक जांच: आयोग ने जवाब दाखिल करने की अंतिम तिथि 16 नवंबर निर्धारित की

समाचार नामा 29 Oct 2026 10:39 pm

'शांति समझौता बातचीत के पक्षधर गुट पर लागू होता है': असम सीएम ने मंत्री की 'उल्फा' संबंधी टिप्पणी पर स्पष्टीकरण दिया

'शांति समझौता बातचीत के पक्षधर गुट पर लागू होता है': असम सीएम ने मंत्री की 'उल्फा' संबंधी टिप्पणी पर स्पष्टीकरण दिया

समाचार नामा 29 Oct 2026 8:34 pm

MLC चुनाव में बीजेपी को अपने ही गढ़ों में झटका, पटना से काशी और लखनऊ से नागपुर तक हार की चर्चा

चार राज्यों की विधान परिषद की 28 सीटों पर हुए चुनाव के नतीजों ने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। बीजेपी ने 12 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि उसके सहयोगी दलों को तीन सीटें मिलीं। इस तरह एनडीए के खाते में कुल 15 सीटें आईं।

देशबन्धु 29 Oct 2026 8:17 pm

तिरुपति नगर निगम चुनाव: वाईएसआरसीपी ने बूथ धांधली और हिंसा की जताई आशंका, चुनाव आयोग से कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की मांग

तिरुपति नगर निगम चुनाव: वाईएसआरसीपी ने बूथ धांधली और हिंसा की जताई आशंका, चुनाव आयोग से कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की मांग

समाचार नामा 29 Oct 2026 8:06 pm

जम्मू-कश्मीर की कहानी अब सिर्फ अतीत की चुनौतियां नहीं, वर्तमान के प्रयास और भविष्य की संभावनाएं भी : एलजी मनोज सिन्हा

जम्मू-कश्मीर की कहानी अब सिर्फ अतीत की चुनौतियां नहीं, वर्तमान के प्रयास और भविष्य की संभावनाएं भी : एलजी मनोज सिन्हा

समाचार नामा 29 Oct 2026 7:18 pm

चार राज्यों के विधान परिषद चुनावों के मिले-जुले परिणामों के महत्वपूर्ण सियासी संदेश

चार राज्यों के विधान परिषद चुनावों के मिले-जुले परिणामों में भले ही भाजपा-राजग को बढ़त मिली हो, लेकिन उत्तरप्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भाजपा -राजग को विपक्षी दलों द्वारा कड़ी टक्कर मिली है, जबकि कर्नाटक की चारो सीट जीतकर भाजपा राजग ने वहां की सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी को जबर्दस्त सियासी पटखनी दी है। वहीं, कांग्रेस के सामने संगठनात्मक चुनौती खड़ी हुई है। उसे एक मात्र नागपुर स्नातक सीट मिली है। लेकिन आरएसएस मुख्यालय होने और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के क्षेत्र में मिली कांग्रेस को यह जीत इस बात का संकेत है कि सवर्ण वोटर अब भाजपा की अतिवादी दलित-ओबीसी नीतियों से ऊब चुके हैं और कांग्रेस के अच्छे उम्मीदवार को जितवाने से भी उन्हें गुरेज नहीं है। इसे भी पढ़ें: RSS के किले Nagpur और Modi के गढ़ Varanasi में BJP की करार हार से सत्ता पक्ष की नींद उड़ी यदि राजनीतिक नजरिए से देखा जाए तो उत्तर प्रदेश में सपा की मजबूती और बिहार में जन सुराज का आगाज—बीजेपी-एनडीए को सवर्ण वोटरों की उदासीनता के दृष्टिगत सावधान कर रहे हैं। भले ही चार राज्यों की 28 विधान परिषद सीटों के नतीजे 28 अक्टूबर 2026 को सामने आए, लेकिन इन मिले जुले परिणामों ने उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक और महाराष्ट्र में भारतीय राजनीति की एक दिलचस्प तस्वीर पेश की है। जहां भाजपा और उसके राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के सहयोगियों ने कुल 28 सीटों में से 16 सीट पर जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस को एक मात्र सीट मिली है। दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने पांच सीटें जीतकर अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराई, तो बिहार में जन सुराज को पहली सफलता मिली। महाराष्ट्र में भी मुकाबला पूरी तरह एकतरफा नहीं रहा और भाजपा नीत महायुति गठबंधन को कांग्रेस नीत महा विकास अघाड़ी की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी शरद पवार से कड़ी टक्कर मिली है। इन नतीजों का महत्व केवल जीत और हार की संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि ये राजनीतिक दलों की संगठनात्मक क्षमता, स्थानीय नेतृत्व, शिक्षक एवं स्नातक मतदाताओं से जुड़ाव और विपक्षी गठबंधनों के भीतर प्रतिस्पर्धा के बारे में भी संकेत देते हैं। जहां तक चारों राज्यों के चुनावी गणित का सवाल है तो यह जान लीजिए कि गत 23 अक्टूबर 2026 को उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक और महाराष्ट्र की विधान परिषद की कुल 28 सीटों के लिए मतदान हुआ, जिसकी मतगणना 28 अक्टूबर को हुई। उत्तर प्रदेश की 11, बिहार की 8, कर्नाटक की 4 और महाराष्ट्र की 5 यानी कुल 28 सीटों के नतीजे आए। उत्तर प्रदेश की कुल 11 सीटें में से भाजपा को 6 और समाजवादी पार्टी (सपा) को 5 सीटों पर जीत मिली, यानी मुकाबला कांटे का रहा। वहीं, बिहार की कुल 8 सीटों में भाजपा को 3 और जनता दल (यूनाइटेड) को 1 सीट मिली। यानी भाजपा नीत राजग 8 सीटों में से 4 सीटें जितने में कामयाब रहा। जबकि मुख्य विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) को 1, जन सुराज पार्टी को 1 और निर्दलीय को 2 सीटें मिली हैं। इस प्रकार बिहार में भाजपा सबसे अधिक तीन सीटें जीतने वाली पार्टी रही। निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी दो सीटें हासिल कीं। इनकी भी पृष्ठभूमि भाजपाई ही रही है। वहीं, कर्नाटक की कुल 4 सीटों में भाजपा को 3 सीटें और जनता दल (सेक्युलर) को 1 सीट मिली। यहां की सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस 0 पर आऊट हो गई। कर्नाटक में भाजपा-जद(एस) गठबंधन ने चारों सीटें जीत लीं। वहीं, महाराष्ट्र की कुल 5 सीटों में भाजपा को 1, शिवसेना (महायुति) को 1, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) को 2 और कांग्रेस को 1 सीट मिली। वहीं, महाराष्ट्र विधान परिषद की नागपुर स्नातक निर्वाचन सीट के चुनाव आयोग और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कांग्रेस उम्मीदवार अभिजीत वंजारी ने इस सीट पर जीत दर्ज की है। उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार सुधाकर कोहले को शिकस्त दी है। # भाजपा और राजग के लिए क्या संदेश? चार राज्यों में 16 सीटें जीतना भाजपा और उसके सहयोगियों के लिए संगठनात्मक सफलता का संकेत है। विशेष रूप से कर्नाटक में चारों सीटों पर जीत ने विपक्षी गठबंधन के समन्वय और कांग्रेस की स्थानीय चुनावी रणनीति पर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि, इन परिणामों को सीधे विधानसभा चुनावों के जनादेश के बराबर मानना उचित नहीं होगा। भाजपा के सामने अब इस सफलता को व्यापक जनसंपर्क, स्थानीय समस्याओं के समाधान और आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारी से जोड़ने की चुनौती है। # कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस द्वारा चारों राज्यों में मात्र एक सीट जीत पाना उसके लिए गंभीर राजनीतिक सवाल पैदा करता है। खासकर कर्नाटक में उसकी अपनी सरकार है, फिर भी पार्टी किसी सीट पर जीत हासिल नहीं कर सकी। इसके तीन संभावित सबक हैं: एक, स्थानीय स्तर पर संगठन और उम्मीदवार चयन की समीक्षा आवश्यक है। दो, शिक्षक एवं स्नातक जैसे विशिष्ट मतदाता वर्गों से निरंतर संवाद जरूरी है। तीन, गठबंधन की राजनीति के साथ-साथ अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान को भी मजबूत करना होगा। हालांकि, विधान परिषद चुनावों के मतदाता सीमित और विशिष्ट वर्गों से आते हैं। इसलिए इन नतीजों के आधार पर कांग्रेस के समूचे जनाधार के बारे में अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। # उत्तर प्रदेश में सपा ने भाजपा को क्या चुनौती दी? उत्तर प्रदेश के नतीजे खास महत्व रखते हैं, क्योंकि राज्य में 2027 की शुरुआत में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। भाजपा ने कई सीटों पर अपना प्रभाव बनाए रखा, लेकिन सपा ने पांच सीटें जीतकर यह दिखाया कि वह विधान परिषद के चुनावों में भी प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता रखती है। सपा को वाराणसी की दो सीटों पर सफलता मिलना भी उल्लेखनीय रहा। इसका सियासी अर्थ यह है कि दोनों दलों को अपने संगठन, स्थानीय नेतृत्व और मतदाता संपर्क पर ध्यान देना होगा। फिर भी, विधान परिषद के सीमित मतदाता वर्ग और विधानसभा के व्यापक मतदाता वर्ग में अंतर है। इसलिए इन नतीजों को आगामी विधानसभा चुनाव का निश्चित संकेत नहीं माना जा सकता। # बिहार में जन सुराज की जीत क्यों महत्वपूर्ण है? बिहार के दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में जन सुराज के सुरेश प्रसाद राय ने कांग्रेस के निवर्तमान विधान परिषद सदस्य मदन मोहन झा को 324 मतों से हराया। इससे जन सुराज को विधान परिषद में पहली चुनावी सफलता मिली। पटना शिक्षक सीट पर राजद ने भाजपा के नवल किशोर यादव को हराया, जबकि सारण में निर्दलीय उम्मीदवार राहुल राज ने जीत दर्ज की। इन परिणामों से तीन बातें सामने आती हैं: एक, नए राजनीतिक विकल्प की गुंजाइश: जन सुराज ने सीमित लेकिन महत्वपूर्ण चुनावी सफलता हासिल की। दो, स्थानीय असंतोष का महत्व: पुराने और स्थापित उम्मीदवारों को भी मतदाताओं की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है। तीन, निर्दलीय उम्मीदवारों की प्रासंगिकता: स्थानीय पहचान और मतदाताओं से सीधा संपर्क दलगत समर्थन के अतिरिक्त भी भूमिका निभा सकता है। जन सुराज के लिए असली चुनौती इस सफलता को दूसरे क्षेत्रों में भी संगठनात्मक विस्तार में बदलना होगी। # महाराष्ट्र का संदेश- मुकाबला बहुकोणीय है: महाराष्ट्र में महायुति और विपक्षी गठबंधन के बीच मुकाबला मिश्रित रहा। शरद पवार के नेतृत्व वाली राकांपा (एसपी) ने पुणे स्नातक और छत्रपति संभाजीनगर स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में जीत हासिल की। वहीं भाजपा और महायुति के अन्य सहयोगियों को भी सफलता मिली। जबकि नागपुर स्नातक सीट पर कांग्रेस ने बाजी मारी। यह परिणाम बताता है कि राज्य की राजनीति को केवल एक दल बनाम दूसरे दल के रूप में समझना पर्याप्त नहीं है। गठबंधन, स्थानीय उम्मीदवार, क्षेत्रीय नेतृत्व और मतदाता समूहों की प्राथमिकताएं भी परिणामों को प्रभावित करती हैं। # क्या इन चुनावों से राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय होगी? विधान परिषद चुनावों में केवल निर्धारित शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के पात्र मतदाता मतदान करते हैं। इन चुनावों में मतपत्रों का इस्तेमाल होता है, ईवीएम का नहीं। इसलिए इन परिणामों से संगठनात्मक ताकत, स्थानीय असंतोष और उम्मीदवारों की स्वीकार्यता के संकेत तो मिलते हैं, लेकिन पूरे राज्य या देश की जनता की राजनीतिक पसंद का सीधा अनुमान नहीं लगाया जा सकता। इसके बावजूद, परिणाम तीन व्यापक प्रश्न जरूर खड़े करते हैं: एक, क्या सत्तारूढ़ दल अपनी स्थानीय उपलब्धियों और संगठन को प्रभावी चुनावी समर्थन में बदल पा रहे हैं? दो, क्या विपक्षी दल स्थानीय स्तर पर मजबूत उम्मीदवार और साझा रणनीति तैयार कर पा रहे हैं? तीन, क्या नए राजनीतिक दल और निर्दलीय उम्मीदवार स्थापित दलों के लिए कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में चुनौती बन सकते हैं? वस्तुत: चार राज्यों के विधान परिषद चुनावों का सबसे बड़ा सियासी संदेश यह है कि भाजपा-राजग को समग्र बढ़त मिली है, लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा कायम है। उत्तर प्रदेश में सपा की सफलता, बिहार में जन सुराज का प्रवेश, कर्नाटक में कांग्रेस की हार और महाराष्ट्र में मिला-जुला परिणाम—ये सभी अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों को दर्शाते हैं। किसी एक राज्य की सफलता को दूसरे राज्य में दोहराया हुआ जनादेश मानना उचित नहीं होगा। अंततः राजनीतिक दलों के लिए इन चुनावों की उपयोगिता इसी में है कि वे मतदाताओं के संदेश को समझें, संगठनात्मक कमियों की पहचान करें और जनता के मुद्दों पर अपनी जवाबदेही बढ़ाएं। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 29 Oct 2026 6:43 pm

Pakistan के खिलाफ Rajnath Singh के तेवर देख बगलें झांकने लगा America, India की Defence Diplomacy ने पूरी दुनिया में छोड़ा प्रभाव

राजनाथ सिंह की रक्षा कूटनीति ने अमेरिका के सामने भारत की सुरक्षा चिंताओं को जिस दृढ़ता और दोटूक अंदाज में रखा है, उसने पाकिस्तान को सैन्य सहायता देने के मुद्दे पर वाशिंगटन को भी असहज स्थिति में ला खड़ा किया। एफ-16 लड़ाकू विमानों के लिए अमेरिकी सहायता पैकेज पर भारत की कड़ी आपत्ति और पाकिस्तान को दी जाने वाली संवेदनशील तकनीक के तीसरे देश तक पहुंचने की आशंका उठाकर राजनाथ सिंह ने स्पष्ट कर दिया कि भारत अब अपनी सुरक्षा के सवाल पर किसी भी तरह की ढिलाई बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। आतंकवाद पर दोहरे मापदंडों के खिलाफ रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का सख्त संदेश इस बात का संकेत है कि भारत-अमेरिका की रणनीतिक साझेदारी अपनी जगह है, लेकिन पाकिस्तान के मामले में भारत अपने हितों से समझौता नहीं करेगा। देखा जाये तो रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक बार फिर साबित किया है कि बदलते वैश्विक शक्ति-संतुलन में भारत की रक्षा कूटनीति केवल बैठकों और औपचारिक बयानों तक सीमित नहीं है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों की स्पष्ट पैरवी करने, मित्र देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी मजबूत करने और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भारत की शर्तों को प्रभावी ढंग से सामने रखने का माध्यम भी है। इसे भी पढ़ें: Philippines ने भी लिया BrahMos, Rajnath Singh ने वैश्विक मंच पर दिखाई भारत की ताकत हम आपको बता दें कि फिलीपींस के सेबू में आसियान रक्षा मंत्रियों की बैठक के दौरान राजनाथ सिंह ने अमेरिका के सामने पाकिस्तान को एफ-16 लड़ाकू विमानों के लिए सहायता पैकेज देने का मुद्दा उठाया। इसके साथ ही जापान और ऑस्ट्रेलिया के रक्षा मंत्रियों के साथ उनकी मुलाकातों ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की बढ़ती रणनीतिक सक्रियता का एक महत्वपूर्ण संदेश दिया। राजनाथ सिंह ने भारत का पक्ष इतनी स्पष्टता से रखा कि वाशिंगटन के लिए पाकिस्तान को दी जाने वाली सैन्य सहायता के दुष्परिणामों पर जवाब देना और इस्लामाबाद का बचाव करना मुश्किल हो गया। अमेरिका के रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के साथ बातचीत में राजनाथ सिंह ने पाकिस्तान के एफ-16 कार्यक्रम से जुड़े सहायता पैकेज पर भारत की गंभीर चिंता व्यक्त की। हम आपको बता दें कि अमेरिका का 64.9 करोड़ डॉलर का यह पैकेज पाकिस्तान के लड़ाकू विमानों की परिचालन क्षमता और रखरखाव को मजबूत करने से जुड़ा है। इसमें एवियोनिक्स सुधार, तकनीकी उपकरण, स्पेयर पार्ट्स, प्रशिक्षण, सिमुलेटर और लॉजिस्टिक सहायता जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। भारत की आपत्ति का मूल प्रश्न यही है कि पाकिस्तान को मिलने वाली ऐसी सैन्य सहायता का वास्तविक इस्तेमाल किस उद्देश्य से होगा और इसका दक्षिण एशिया की सुरक्षा पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। भारत लंबे समय से सीमा पार आतंकवाद का मुद्दा उठाता रहा है। ऐसे में पाकिस्तान की सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने वाले किसी भी कदम को नई दिल्ली क्षेत्रीय सुरक्षा के व्यापक संदर्भ में देखती है। राजनाथ सिंह ने अमेरिकी पक्ष को इस बात के लिए भी आगाह किया कि पाकिस्तान को दी जाने वाली संवेदनशील सैन्य तकनीक किसी तीसरे देश तक पहुंच सकती है। देखा जाये तो यह चिंता केवल भारत-पाकिस्तान संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि तकनीकी सुरक्षा, हथियारों के प्रसार और व्यापक क्षेत्रीय सामरिक संतुलन से भी जुड़ी है। राजनाथ सिंह की कूटनीतिक पहल का महत्व इस बात में है कि भारत ने अपनी सुरक्षा संबंधी चिंताओं को सीधे अमेरिकी नेतृत्व के सामने स्पष्टता और दृढ़ता के साथ रखा है। भारत ने यह संदेश दिया है कि रणनीतिक साझेदारी अपनी जगह है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर वह चुप्पी नहीं साधेगा। आतंकवाद पर दोहरा मापदंड नहीं चलेगा राजनाथ सिंह ने अपने अमेरिकी समकक्ष के साथ बातचीत के दौरान आतंकवाद के खिलाफ शून्य-सहिष्णुता की नीति पर जोर दिया। उनका संदेश स्पष्ट था कि आतंकवादी संगठनों को समर्थन, प्रशिक्षण या वित्तीय सहायता देने वाले देशों के प्रति अंतरराष्ट्रीय समुदाय का रवैया सुसंगत और कठोर होना चाहिए। अमेरिकी रक्षा मंत्री ने भी सीमा पार आतंकवाद से मुकाबले में भारत के प्रति समर्थन दोहराया। यह भारत के लिए महत्वपूर्ण कूटनीतिक आधार है, क्योंकि आतंकवाद के विरुद्ध सहयोग तभी प्रभावी हो सकता है जब सुरक्षा संबंधी चिंताओं को केवल बयानों में नहीं, बल्कि व्यावहारिक नीतियों में भी जगह मिले। इसके अलावा, भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी के दस वर्षीय ढांचे की समीक्षा, सैन्य आदान-प्रदान, समुद्री सुरक्षा और रक्षा आपूर्ति शृंखलाओं पर चर्चा से यह भी स्पष्ट होता है कि दोनों देश अपने सहयोग को व्यापक रणनीतिक दिशा देना चाहते हैं। भारत का प्रयास है कि अमेरिका के साथ साझेदारी मजबूत बनी रहे, लेकिन उसके साथ ही पाकिस्तान को सैन्य सहायता देने जैसे मुद्दों पर भारतीय चिंताओं को नजरअंदाज न किया जाए। जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ ‘JAI’: हिंद-प्रशांत में रणनीतिक संदेश साथ ही राजनाथ सिंह की कूटनीति का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ उनकी बातचीत है। जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइज़ुमी के साथ चर्चा में समुद्री सुरक्षा, नौसैनिक जहाज निर्माण, डिजाइन और माइन काउंटरमेजर्स क्षमताओं में सहयोग जैसे मुद्दे शामिल रहे। जापान की तकनीकी विशेषज्ञता और भारत की विनिर्माण क्षमता को जोड़ने की संभावनाएं रक्षा औद्योगिक सहयोग को नई दिशा दे सकती हैं। जापान के साथ वायुसेना सहयोग बढ़ाने और रक्षा उद्योग से जुड़ी कंपनियों के बीच संपर्क मजबूत करने पर भी जोर दिया गया। यह सहयोग केवल सैन्य अभ्यासों तक सीमित नहीं है; इसका उद्देश्य दीर्घकाल में रक्षा क्षमताओं, तकनीकी सहयोग और औद्योगिक साझेदारी को मजबूत करना भी है। ऑस्ट्रेलिया के उपप्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री रिचर्ड मार्ल्स के साथ बैठक में दोनों देशों ने रक्षा सहयोग की समीक्षा की और आपसी समन्वय बढ़ाने पर चर्चा की। राजनाथ सिंह ने उन्हें फरवरी 2027 में बेंगलुरु में प्रस्तावित एयरो इंडिया में शामिल होने का निमंत्रण भी दिया। इसी बीच राजनाथ सिंह की जापानी और ऑस्ट्रेलियाई समकक्षों के साथ तस्वीर तथा उनका संदेश, ‘JAI: Japan, Australia, India’, विशेष राजनीतिक और रणनीतिक महत्व रखता है। यह तीनों देशों के बीच सहयोग, विश्वास और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में साझा हितों का प्रतीक है। एक स्वतंत्र, खुला और सुरक्षित हिंद-प्रशांत भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया की साझेदारी का प्रमुख आधार बना हुआ है। राजनाथ सिंह के नेतृत्व में रक्षा कूटनीति का व्यापक दृष्टिकोण इन बैठकों को एक साथ देखने पर राजनाथ सिंह की रक्षा कूटनीति के दो महत्वपूर्ण आयाम सामने आते हैं। एक तो अमेरिका जैसे प्रमुख रणनीतिक साझेदार के सामने पाकिस्तान को सैन्य सहायता देने के दुष्परिणामों पर स्पष्ट आपत्ति दर्ज कराना। दूसरा, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे विश्वसनीय साझेदारों के साथ रक्षा, तकनीक, समुद्री सुरक्षा और औद्योगिक सहयोग को आगे बढ़ाना। यही सक्रिय रक्षा कूटनीति की विशेषता है। भारत किसी एक देश के साथ संबंधों पर निर्भर रहने के बजाय कई स्तरों पर साझेदारियां मजबूत कर रहा है। वह अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए क्षेत्रीय सहयोग का दायरा भी बढ़ाना चाहता है। बहरहाल, पाकिस्तान को एफ-16 सहायता पर अमेरिकी मंत्री के सामने दोटूक आपत्ति और जापान-ऑस्ट्रेलिया के साथ ‘JAI’ का संदेश, ये दोनों घटनाक्रम मिलकर भारत की उस रक्षा नीति को रेखांकित करते हैं, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा पर दृढ़ता और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी का विस्तार साथ-साथ चलते हैं। राजनाथ सिंह के नेतृत्व में भारत की रक्षा कूटनीति का यही व्यापक दृष्टिकोण उसे बदलते वैश्विक परिदृश्य में अधिक सक्रिय और प्रभावशाली भूमिका निभाने का अवसर देता है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 29 Oct 2026 5:50 pm

महाराष्ट्र: नागपुर में अपनी जीत पर सीएम फडणवीस पर बरसी कांग्रेस, डिलीट पोस्ट को बनाया मुद्दा

महाराष्ट्र: नागपुर में अपनी जीत पर सीएम फडणवीस पर बरसी कांग्रेस, डिलीट पोस्ट को बनाया मुद्दा

समाचार नामा 29 Oct 2026 4:34 pm

'असहमति की आवाज को दबाने कोशिश,' शिक्षकों पर सीएम सुवेंदु के बयान पर सौगत रॉय का पलटवार

'असहमति की आवाज को दबाने कोशिश,' शिक्षकों पर सीएम सुवेंदु के बयान पर सौगत रॉय का पलटवार

समाचार नामा 29 Oct 2026 4:28 pm

नई पीढ़ी को बौद्धिक परतंत्रता और सांस्कृतिक अलगाव से बचाना जरुरी

संकटग्रस्त और बिखरती पारिवारिक व्यवस्था, ध्वस्त होते जीवन-मूल्य, अपनी जड़ों से उखड़ती पीढ़ी वर्तमान की सबसे बड़ी चुनौतियां हैं। इनके बीच उपनिवेशवादी मानसिकता से प्रभावित शिक्षा व्यवस्था हमें अभी भी जकड़े हुए है। अंग्रेजों के जाने के आठ दशक बाद भी अपनी शिक्षा व्यवस्था को हम उन संकटों से मुक्त नहीं करा पाए हैं, जो हमें हमारी लंबी दासता ने दिये थे। इस शिक्षा व्यवस्था के नाते 'इंडिया' से 'भारत' की ओर हमारा प्रवास संभव नहीं हो पा रहा है। धर्मपाल जी की किताब 'द ब्यूटीफुल ट्री' हमें जिस भारत के दर्शन कराती है, वहां प्रत्येक गांव में एक या अधिक स्कूल थे। ये हर तरह का ज्ञान और कौशल दे रहे थे। अंग्रेजों ने इस समूची भारतीय शिक्षा व्यवस्था का 'कैसे' ध्वंस किया? 'क्यों किया' यह जानना अनिवार्य है। महात्मा गांधी के आरंभिक लेखन में इस क्षत-विक्षत हो रहे भारत का दर्द दिखता है। अंग्रेजी शिक्षा ने हमें 'कमजोर और कम भारतीय' बनाया। साथ ही अपनी जमीन और उसके मूल्यों के प्रति हिकारत और हीनता बोध पैदा किया। यह आत्मदैन्य या 'एहसास-ए-कमतरी' आज भी हमें जकड़े हुए है। इसे भी पढ़ें: Education और Innovation को बढ़ावा देने के लिए 15 October को मनाते हैं World Students Day किताबों तक सिमटी शिक्षाः अंग्रेजी शिक्षा ने 'घर' और 'स्कूल' के बीच दूरी बनाई। इस पढ़ाई ने हमें यह सिखाया कि स्कूल कोई ऊंची जगह है और घर ठीक नहीं है। इस हीनता में फंसकर हमने अपनी संस्कारशाला 'परिवार' और उसके द्वारा दिए जा रहे मूल्यों को कमतर मान लिया। बच्चों में नैतिक मूल्य, आदर और सामाजिक जिम्मेदारियां परिवार और समाज द्वारा सिखाई जाती थीं। यह जिम्मेदारी भी पूरी तरह स्कूलों पर डाल दी गई। इससे परिवारों की भूमिका गौण होती चली गई । शिक्षा मुख्य रूप से किताबों और चार दीवारों तक सीमित हो गई। फलतः बच्चे घर के पारंपरिक कामकाज, खेती, दस्तकारी और व्यावहारिक जीवन के अनुभवों से दूर होते गए। ये सभी काम पहले घर के माध्यम से स्वतः सीखते थे। अंग्रेजों की नकल सिर्फ भाषा तक नहीं रही बल्कि वह हमारे जीवन में भी प्रवेश कर गई। खानपान, परिधान, दिनचर्या , कैलेण्डर सब बदल गये। स्कूल जब बदलते हैं तो वह पूरा सांस्कृतिक परिवेश बदलने की क्षमता रखते हैं। यह हमने हिंदुस्तान में होते हुए देखा। इसीलिए उस जमाने में भारत के गवर्नर जनरल रहे लॉर्ड विलियम बेंटिक ने कहा था, पढ़ने के बाद वे हमारी नकल करने लगे हैं। क्या से क्या हो गए देखते-देखतेः ऐसा देश जहां सब 'स्वधर्म' पर चलते हुए अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं। अगर उस समाज में घरों ताले नहीं हैं, चोरियां नहीं होती,लोग झूठ नहीं बोलते, ऊंच-नीच नहीं है तो सोचिए कि वह समाज और उसकी शिक्षा कैसी रही होगी? अनेक विदेशी यात्रियों ने भारत के बारे में अपने जो अनुभव दर्ज किए हैं। वे हैरान करने वाले हैं। अंग्रेजों ने अपनी शिक्षा व्यवस्था से भारतीय समाज का मानस बदल दिया। नतीजतन समाज बदला, उसके मूल्यों में व्यापक बदलाव हुए। सरकार, पुलिस, कोर्ट-कचहरी, प्रशासन तंत्र का महत्व बना। हमारी स्वायत्तता और समाज केंद्रित व्यवस्थाएं नष्ट हुईं। हम सरकार के सामने याचक की तरह खड़े हो गए। गांव उजड़ने लगे। स्थानीय उद्यम नष्ट हुए। कुटीर उद्योग तबाह हो गए। पारिवारिक कौशल नष्ट हुए। गैर-बराबरी बढ़ती गई। अपनी चीजों से ही नफ़रत करने वाला समाज विकसित हुआ। अंग्रेजी शिक्षा ने भारत में गहरे विभाजन पैदा किए। अलीट और नान अलीट का बंटवारा, 'भारत' और 'इंडिया' की पृथक पहचान बन गया। हम यह समझ ही नहीं पाए कि पांव छूने, नमस्कार करने और हाथ मिलाने में अंतर क्या है और श्रेष्ठ क्या है? हर जानकारी नहीं है ज्ञानः हर जानकारी ज्ञान नहीं है। इस शिक्षा व्यवस्था ने ज्ञान के नाम पर ढेरों जानकारियां परोस दीं। इनका जीवन संघर्षों में कोई उपयोग नहीं । हम 'मानने' को 'जानना' समझने लगे हैं। 'क्यों' का विचार मन में आता ही नहीं। अपनी जिस शिक्षा व्यवस्था से हमने 1750 में दुनिया का 33 प्रतिशत उत्पादन और व्यापार सुनिश्चित किया था । अंग्रेजी राज और उसकी शिक्षा ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा। अपनी स्वायत्तता से अग्रणी समाज कैसे सरकारी प्रशासनिक तंत्र से चौपट हो जाता, भारत इसकी ही कहानी है। नई अंग्रेजी शिक्षा मुक्त नहीं करती थी। बांधती थी। सेवक बनाने पर जोर था। जबकि गुरुकुल पद्धति, स्थानीय हस्तकलाएं, कृषि ज्ञान और स्वदेशी विज्ञान हाशिए पर चले गए। आधुनिक शिक्षा ने पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को नष्ट कर दिया। ये प्रणालियां स्थानीय समाज की जरूरतों के अनुकूल थीं। 'लोक' की उपेक्षा से ऐसा समाज खड़ा हुआ जो अपनी जड़ों से उखड़ा हुआ है। स्कूल आधुनिक और पश्चिमी मूल्यों को बढ़ावा देते रहे हैं, जबकि अधिकांश भारतीय घर पारंपरिक और सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़े होते हैं। इस वैचारिक अंतर के कारण घर और विद्यालय के परिवेश में टकराव की स्थिति उत्पन्न हो रही है। इस शिक्षा प्रणाली ने अंग्रेजों की नीतियों को सही ठहराने वाला एक ऐसा वर्ग तैयार किया जो मानसिक रूप से उपनिवेशवादी सोच का समर्थन करने लगा। इसने देश की आर्थिकी और बौद्धिक संपदा को परतंत्र बनाए रखा। जब तक हम अपनी माटी के ज्ञान और भाषा का सम्मान करना नहीं सीखेंगे, तब तक औपनिवेशिक छांव से पूरी तरह मुक्त होना असंभव है। अंग्रेजी की लंबी छायाः भारत ने स्थानीय भाषाओं में अपना सब कुछ विकसित किया था। अब अंग्रेजी थोप दी गई। वह सिर्फ भाषा की तरह नहीं “कौशल' की तरह आई। इसे न जानने वाले कमतर माने जाने लगे। शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी होने के कारण आम जनता के लिए उच्च शिक्षा और विज्ञान के दरवाजे बंद हो गए। रटने वाली शिक्षा को बढ़ावा मिला, जिससे मौलिक सोच, अनुसंधान और स्वतंत्र चिंतन पर विपरीत प्रभाव पड़ा। अंग्रेजी जानने वाले शिक्षित वर्ग और पारंपरिक शिक्षा पाने वाले या अशिक्षित आम जनमानस के बीच एक गहरी खाई बन गई। ऐसे में 'कोलोनिजियम' को 'डिकोड' करने के जैसे सचेतन प्रयास किए जाने थे, हमने कहां किए? आज भी इसकी छाया आपको सरकारी कामकाज में दिखेगी। शिक्षा मंत्रालय को मानव संसाधन मंत्रालय बनाया गया। फिर उसे शिक्षा मंत्रालय बनाया गया है। जबकि संस्कृति मंत्रालय को शिक्षा से अलग रखा गया है। क्या संस्कृति और शिक्षा एक-दूसरे के पूरक नहीं हैं? गुलामी के लंबे कालखंड में आक्रांताओं ने हमारे विश्वविद्यालयों को बार-बार लूटा, नष्ट किया। अंग्रेजों ने जड़ों पर चोट की। मानसिकता बदली। हीन भावना भरी और हमारे अपने लोगों को हमारे विचार के विरुद्ध खड़ा कर दिया। इस संकट से आज भी हिंदुस्तान जूझ रहा है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम बौद्धिक गुलामी की बेड़ियों को तोड़ें, जो हमें अपनी ही माटी में पराया बनाती है। जब तक हमारी शिक्षा हमारी अपनी संस्कृति, भाषा और मौलिक चिंतन से नहीं जुड़ेगी, तब तक हम वास्तविक अर्थों में स्वतंत्र नहीं हो सकते। उपनिवेशवाद के छोड़े अंधेरों को मिटाकर ही हम एक आत्मविश्वासी, स्वदेशी और सशक्त भारतीय समाज का निर्माण कर सकते हैं। प्रो. संजय द्विवेदी (लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। भारतीय जन संचार संस्थान-आईआईएमसी के महानिदेशक रहे हैं।)

प्रभासाक्षी 29 Oct 2026 4:28 pm

आईआरसीटीसी मनी लॉन्ड्रिंग मामले में लालू यादव को दिल्ली हाईकोर्ट से राहत, ईडी को नोटिस

आईआरसीटीसी मनी लॉन्ड्रिंग मामले में लालू यादव को दिल्ली हाईकोर्ट से राहत, ईडी को नोटिस

समाचार नामा 29 Oct 2026 4:11 pm

Tata Group पर राजनीति करते ही फँस गये Rahul Gandhi, Aircel Founder के पुराने बयान ने खोली Congress के जमाने की पोल

टाटा समूह के नेतृत्व से जुड़े विवाद पर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के आरोपों और केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के जवाब के बीच अब एयरसेल के संस्थापक सी. शिवशंकरन का बयान भी चर्चा में है। हम आपको याद दिला दें कि शिवशंकरन ने पूर्ववर्ती यूपीए शासनकाल के दौरान कारोबारियों पर कथित राजनीतिक दबाव का अपना अनुभव साझा किया था। उन्होंने कहा था कि उस समय कारोबार बढ़ने पर उद्यमियों को अपनी कंपनी किसी खास व्यक्ति को बेचने के लिए दबाव का सामना करना पड़ता था, जबकि आज कारोबारी माहौल पहले से अलग है। उनके बयान ने कांग्रेस शासनकाल में उद्योग जगत और राजनीतिक सत्ता के संबंधों पर बहस को एक नया संदर्भ दिया है। राहुल गांधी का आरोप, टाटा विवाद पर सरकार को घेरा हम आपको बता दें कि राहुल गांधी ने 28 अक्टूबर को सोशल मीडिया मंच एक्स पर आरोप लगाया कि टाटा को आपराधिक तरीके से बर्बाद किया जा रहा है और देश के बड़े कारोबारी नेता इस मुद्दे पर बोलने से डर रहे हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को निशाने पर लेते हुए सवाल किया कि कारोबारी कब तक चुप रहेंगे और क्या भारतीय कारोबार सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों की जागीर है। दरअसल, यह विवाद टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति के प्रस्ताव को लेकर टाटा ट्रस्ट्स की ओर से उठाई गई आपत्तियों के बीच सामने आया था। राहुल गांधी ने इस आंतरिक कॉरपोरेट विवाद को सरकार और कारोबारी जगत के संबंधों से जोड़ते हुए राजनीतिक मुद्दा बनाया। इसे भी पढ़ें: Tata Group पर Rahul Gandhi के आरोपों पर Nirmala Sitharaman का पलटवार, कांग्रेस पर साधा निशाना निर्मला सीतारमण ने कांग्रेस के लाइसेंस-कोटा राज का उठाया मुद्दा राहुल गांधी के आरोपों पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पलटवार करते हुए कहा कि नेता प्रतिपक्ष को हर मुद्दे का राजनीतिकरण करने से बचना चाहिए। उन्होंने व्यावसायिक और कानूनी मामलों को बिना ठोस आधार के आपराधिक करार देने पर भी आपत्ति जताई। सीतारमण ने कांग्रेस के शासनकाल के लाइसेंस-कोटा राज का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि उस व्यवस्था ने भारतीय उद्यमियों की कारोबारी क्षमता और उद्यमशीलता को बाधित किया। इसके विपरीत उन्होंने केंद्र की मौजूदा सरकार की नीतियों को उद्योग, निवेश और रोजगार सृजन को प्रोत्साहित करने वाला बताया। इसके बाद, राहुल गांधी ने जवाब में सवाल किया कि टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के प्रतिनिधियों को अमित शाह के आवास पर किस कारोबारी या कानूनी मामले के सिलसिले में बुलाया गया था। इस तरह दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप और तेज हो गए। एयरसेल संस्थापक का बयान: कारोबार बढ़ने पर कंपनी बेचने का दबाव दूसरी ओर, आपको याद दिला दें कि एयरसेल के संस्थापक सी. शिवशंकरन ने मई 2024 में उद्यमी और पॉडकास्ट होस्ट राज शमानी के कार्यक्रम में अपने कारोबारी अनुभव साझा किए थे। शिवशंकरन ने कहा था कि पहले भारत में कारोबार बढ़ने पर उद्यमियों को कंपनी किसी खास व्यक्ति को बेचने के लिए दबाव का सामना करना पड़ता था। एयरसेल में अपनी 74 प्रतिशत हिस्सेदारी की 2006 में मैक्सिस को हुई बिक्री का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा था कि उन्हें इस सौदे से लगभग 3,400 करोड़ रुपये मिले, जबकि उनके मुताबिक एटीएंडटी को बेचने पर उन्हें आठ अरब डॉलर तक मिल सकते थे। उन्होंने कहा कि उस समय उन्हें सबसे ऊंची पेशकश स्वीकार करने का अवसर नहीं मिला। शिवशंकरन ने तत्कालीन कारोबारी माहौल और मौजूदा स्थिति की तुलना करते हुए कहा था, “Today no one can pressurize you”, साथ ही उन्होंने भारत को अब उदारीकृत अर्थव्यवस्था बताया था। उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर कहा था कि पहले कारोबारियों को किसी खास खरीदार को कंपनी बेचने के लिए दबाव झेलना पड़ता था, जबकि अब उद्यमी अपना कारोबार बनाने और आगे बढ़ाने के लिए अधिक स्वतंत्र महसूस कर सकते हैं। हम आपको बता दें कि एयरसेल की बिक्री को लेकर शिवशंकरन ने पहले भी आरोप लगाए थे कि उन पर कंपनी को बाजार मूल्य से कम कीमत पर बेचने का दबाव बनाया गया। तत्कालीन दूरसंचार मंत्री दयानिधि मारन और उनके भाई कलानिधि मारन से जुड़े आरोपों की जांच हुई थी। हालांकि, 2017 में विशेष सीबीआई अदालत ने मारन बंधुओं को मामले में आरोपमुक्त कर दिया था। उद्योग जगत पर दबाव या कारोबार की आजादी? बहरहाल, राहुल गांधी का आरोप है कि कारोबारी नेता मौजूदा सरकार के दबाव में खुलकर बोलने से बच रहे हैं। इसके जवाब में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कांग्रेस के शासनकाल की लाइसेंस-कोटा व्यवस्था पर सवाल उठाए। वहीं, एयरसेल के संस्थापक सी. शिवशंकरन का बयान इस बहस को एक अलग संदर्भ देता है। उन्होंने अपने कारोबारी अनुभव साझा करते हुए बताया था कि पहले उद्यमियों पर अपनी कंपनी किसी खास खरीदार को बेचने का दबाव बनाया जाता था। उन्होंने मौजूदा कारोबारी माहौल को पहले से अलग बताया। खैर...अब सारा प्रकरण जनता के सामने है और चुनावों के दौरान जनता की अदालत में ही फैसला होगा कि कौन सही है और कौन गलत। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 29 Oct 2026 3:03 pm

एक नवंबर से डिफॉल्ट होगा डायरेक्ट प्लान: म्यूचुअल फंड्स

मुंबई, एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (एएमसी) के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर म्यूचुअल फंड स्कीमों में एक नवंबर से डायेक्ट प्लान डिफॉल्ट होंगे।

देशबन्धु 29 Oct 2026 2:31 pm

RSS के किले Nagpur और Modi के गढ़ Varanasi में BJP की करार हार से सत्ता पक्ष की नींद उड़ी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जैसे ही सोशल मीडिया पर कांग्रेस की सीटों की संख्या को लेकर तंज कसते हुए पूछा कि आखिर कांग्रेस को कितनी सीटें मिलीं, उसके कुछ ही समय बाद महाराष्ट्र के नागपुर में कांग्रेस ने जीत दर्ज कर अपना खाता खोल दिया। इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में भी भाजपा को दोनों विधान परिषद सीटों पर हार का सामना करना पड़ा और विपक्षी समाजवादी पार्टी ने जीत हासिल की। इस तरह कांग्रेस पर कटाक्ष करने की कोशिश में भाजपा खुद ही राजनीतिक कटाक्ष का निशाना बन गई। RSS के मुख्यालय नागपुर में कांग्रेस की जीत और मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में विपक्ष की सफलता ने इन MLC चुनावों के नतीजों को एक नया राजनीतिक मोड़ दे दिया। देखा जाये तो चार राज्यों के विधान परिषद चुनावों के नतीजों ने राष्ट्रीय राजनीति में एक दिलचस्प तस्वीर पेश की है। भाजपा के नेतृत्व वाले NDA ने कुल 28 सीटों में 16 पर जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस को केवल महाराष्ट्र की नागपुर स्नातक सीट पर सफलता मिली। लेकिन इन परिणामों का राजनीतिक महत्व केवल सीटों के कुल आंकड़े तक सीमित नहीं है। महाराष्ट्र में नागपुर और उत्तर प्रदेश में वाराणसी की हार ने भाजपा के लिए प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उसके संगठनात्मक प्रभाव पर चर्चा शुरू कर दी है। इसे भी पढ़ें: डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) कानून क्या है? इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती क्यों दी गई है? हम आपको बता दें कि महाराष्ट्र की नागपुर स्नातक निर्वाचन सीट पर कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने भाजपा के सुधाकर कोहले को 3,271 मतों से हराकर सीट बरकरार रखी। वंजारी को 67,231 और कोहले को 63,960 वोट मिले। लगभग दो दिन चली मतगणना में दूसरे वरीयता के मत निर्णायक साबित हुए। इस निर्वाचन क्षेत्र का महत्व इसलिए भी है कि नागपुर RSS का मुख्यालय होने के साथ-साथ मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का गृहक्षेत्र भी है। यह परिणाम भाजपा के लिए स्थानीय स्तर पर संगठन और मतदाता संपर्क की समीक्षा का अवसर है। गडकरी लंबे समय तक इसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं और भाजपा ने इस बार भी सीट वापस पाने के लिए अभियान चलाया था। इसके बावजूद कांग्रेस की लगातार दूसरी जीत बताती है कि मजबूत वैचारिक और संगठनात्मक आधार वाले क्षेत्र में भी चुनावी परिणाम स्वतः सुनिश्चित नहीं होते। दूसरी ओर, कांग्रेस ने इस जीत को भाजपा के शुरुआती दावों के जवाब के रूप में पेश किया। महाराष्ट्र कांग्रेस ने मुख्यमंत्री फडणवीस की उस सोशल मीडिया पोस्ट पर तंज कसा, जिसमें उन्होंने कांग्रेस के शून्य सीटों पर रहने की बात कही थी। नागपुर का परिणाम आने के बाद पार्टी ने उनकी पोस्ट हटाए जाने को लेकर भी कटाक्ष किया। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने इसे भाजपा के राजनीतिक दावों के लिए झटका बताया। वहीं उत्तर प्रदेश के चुनावों में वाराणसी का परिणाम और भी महत्वपूर्ण रहा। समाजवादी पार्टी ने वाराणसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में लाल बिहारी यादव के माध्यम से अपनी सीट बरकरार रखी। इसके साथ ही सपा के आशुतोष सिन्हा ने वाराणसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में भी जीत हासिल की। इस तरह प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय क्षेत्र से जुड़ी दोनों विधान परिषद सीटें भाजपा के हाथ से निकल गईं। पूरे उत्तर प्रदेश में भाजपा ने 11 में से छह और सपा ने पांच सीटें जीतीं। वैसे इन नतीजों का अर्थ यह नहीं है कि वाराणसी के सभी मतदाताओं ने भाजपा के खिलाफ मतदान किया है। विधान परिषद के शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों का मतदाता वर्ग सीमित और विशिष्ट है। फिर भी, 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले वाराणसी में दोनों सीटों पर हार सपा के लिए राजनीतिक उत्साह बढ़ाने वाली और भाजपा के लिए स्थानीय संगठन की समीक्षा करने वाली घटना है। हम आपको यह भी बता दें कि प्रधानमंत्री मोदी ने MLC चुनावों में कांग्रेस के शुरुआती कमजोर प्रदर्शन पर तंज कसा था। इसके जवाब में कांग्रेस नेताओं ने नागपुर और वाराणसी के परिणामों को सामने रखकर भाजपा पर पलटवार किया। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि प्रधानमंत्री को कांग्रेस की सीटों की संख्या पर टिप्पणी करने के साथ यह भी आत्ममंथन करना चाहिए कि वाराणसी में भाजपा दोनों सीटें क्यों हार गई और RSS के गढ़ नागपुर में कांग्रेस ने जीत कैसे हासिल की? उन्होंने बेरोजगारी, महंगाई और निजी निवेश से जुड़े मुद्दों का उल्लेख करते हुए दावा किया कि मतदाताओं ने केंद्र सरकार की नीतियों के प्रति असंतोष जताया है। वहीं कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने भी प्रधानमंत्री की बैलेट पेपर वाली टिप्पणी पर पलटवार करते हुए नागपुर और वाराणसी के परिणामों का उल्लेख किया। उनका तर्क था कि यदि भाजपा बैलेट पेपर से हुए चुनावों के नतीजों को कांग्रेस की कमजोरी का प्रमाण बता रही है, तो उसे अपने उन क्षेत्रों में हार पर भी जवाब देना चाहिए जहां भाजपा की मजबूत राजनीतिक मौजूदगी मानी जाती है। दूसरी ओर, समग्र तस्वीर में NDA की 16 सीटों की जीत महत्वपूर्ण है। कर्नाटक में भाजपा-जेडीएस गठबंधन ने चारों सीटें जीतीं, उत्तर प्रदेश में भाजपा छह सीटों पर विजयी रही और बिहार में भाजपा-जदयू ने मिलकर चार सीटें हासिल कीं। दूसरी ओर, महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी ने पांच में से तीन सीटें जीतीं और उत्तर प्रदेश में सपा ने पांच सीटों पर सफलता हासिल की। इन परिणामों से तीन राजनीतिक संदेश निकलते हैं। एक तो NDA का कुल प्रदर्शन उसे मनोवैज्ञानिक बढ़त देता है। दूसरा, नागपुर और वाराणसी जैसे प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में हार भाजपा के लिए स्थानीय चुनावी समीकरणों और संगठनात्मक रणनीति की समीक्षा का विषय है। तीसरा, कांग्रेस और INDIA गठबंधन के लिए क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ समन्वय और चुनावी प्रदर्शन को मजबूत करना जरूरी है। बहरहाल, नागपुर और वाराणसी में भाजपा की हार को महज स्थानीय चुनावी घटनाक्रम बताकर खारिज नहीं किया जा सकता। एक ओर NDA ने कुल सीटों के आंकड़े में बढ़त बनाकर अपनी चुनावी ताकत का प्रदर्शन किया, तो दूसरी ओर विपक्ष ने उन क्षेत्रों में भाजपा को शिकस्त दी, जिनकी पहचान उसके मजबूत राजनीतिक प्रभाव से जुड़ी है। RSS के मुख्यालय नागपुर में कांग्रेस की जीत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में समाजवादी पार्टी की सफलता ने भाजपा के राजनीतिक दावों के बीच असहज सवाल खड़े कर दिए हैं। अब निगाहें आगामी विधानसभा चुनावों पर हैं, देखना होगा कि क्या विपक्ष इन प्रतीकात्मक जीतों को व्यापक जनसमर्थन में बदलकर भाजपा के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर पाएगा, या भाजपा इन झटकों से सबक लेकर अपने गढ़ों में फिर पकड़ मजबूत करेगी? -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 29 Oct 2026 2:30 pm

रबी फसलों की खरीद बढ़ी में बढ़ोतरी

नई दिल्ली, छह रबी फसलों की खरीद बढ़कर 2025-26 में 3,921 लाख मीट्रिक टन हो गई है, जो कि वित्त वर्ष 2004-05 में 2,302 लाख मीट्रिक टन थी।

देशबन्धु 29 Oct 2026 1:43 pm

चुनावों में मिली हार और पार्टी के भीतर बगावत के बीच एआईएडीएमके जिला सचिवों की बैठक 1 नवंबर को

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समाचार नामा 29 Oct 2026 12:28 pm

'लोकतंत्र के लिए खतरनाक', नसीरुद्दीन शाह की 'दिमागी नक्सल' टिप्पणी पर किरेन रिजिजू ने साधा निशाना

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समाचार नामा 29 Oct 2026 12:24 pm

मोदी के तंज से गरमाई सियासत, कांग्रेस का पलटवार; वाराणसी और नागपुर में BJP की हार पर उठाए सवाल

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री की टिप्पणी पर पलटवार करते हुए उन्हें 'प्रवचनमंत्री' कहकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री को दूसरों को उपदेश देने के बजाय आत्मविश्लेषण करना चाहिए।

देशबन्धु 29 Oct 2026 11:29 am

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ओहियो रैली में की भारतीय मूल के रामास्वामी को जिताने की अपील

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ओहियो रैली में की भारतीय मूल के रामास्वामी को जिताने की अपील

समाचार नामा 29 Oct 2026 8:55 am

प्रधानमंत्री मोदी ने शेयर किया गीता का श्लोक, कहा- 'जैसी श्रद्धा वैसा ही होती है मनुष्य की सोच और आचरण'

प्रधानमंत्री मोदी ने शेयर किया गीता का श्लोक, कहा- 'जैसी श्रद्धा वैसा ही होती है मनुष्य की सोच और आचरण'

समाचार नामा 29 Oct 2026 8:54 am

MLC चुनाव 2026: क्या बदल रही है राजनीति की हवा? आशुतोष का विश्लेषण

विधान परिषद चुनाव 2026 के नतीजों ने बीजेपी, कांग्रेस और विपक्ष की रणनीति पर सवाल खड़े किए। कर्नाटक, बिहार, यूपी और महाराष्ट्र में चुनावी नतीजों का क्या संकेत है? वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष का खास विश्लेषणः

सत्य हिंदी 29 Oct 2026 8:33 am

MLC Election Results: 4 राज्यों की 28 सीटों पर नतीजे घोषित, बीजेपी सबसे आगे; देखें विजेताओं की पूरी लिस्ट

MLC Election Results: 4 राज्यों की 28 सीटों पर नतीजे घोषित, बीजेपी सबसे आगे; देखें विजेताओं की पूरी लिस्ट

समाचार नामा 29 Oct 2026 8:30 am

2027 की जंग की तैयारी शुरू! अमित शाह 30 अक्टूबर को लखनऊ से देंगे बड़ा संदेश

उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) 30 अक्टूबर को लखनऊ में प्रदेश कार्यसमिति की बैठक के जरिए संगठन की रणनीति और चुनावी तैयारियों को धार देगी

देशबन्धु 29 Oct 2026 7:20 am

व्यापारियों की गुहार सुनने के लिए राहुल गांधी के पास 20 मिनट भी नहीं है: तुहिन सिन्हा

व्यापारियों की गुहार सुनने के लिए राहुल गांधी के पास 20 मिनट भी नहीं है: तुहिन सिन्हा

समाचार नामा 28 Oct 2026 10:34 pm

एमएलसी चुनाव नतीजों पर अमित शाह का तंज, पूछा- कांग्रेस ने 28 में से कितनी सीटें जीतीं?

एमएलसी चुनाव नतीजों पर अमित शाह का तंज, पूछा- कांग्रेस ने 28 में से कितनी सीटें जीतीं?

समाचार नामा 28 Oct 2026 10:27 pm

टाटा विवाद पर राहुल और निर्मला आमने-सामने, आरोपों से गरमाई सियासत

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के बीच टाटा समूह को लेकर बुधवार को वाकयुद्ध छिड़ गया

देशबन्धु 28 Oct 2026 10:23 pm

स्थानीय निकाय चुनावों में जीत पार्टी कार्यकर्ताओं की कड़ी मेहनत को दिखाती है: सीएम भजनलाल शर्मा

स्थानीय निकाय चुनावों में जीत पार्टी कार्यकर्ताओं की कड़ी मेहनत को दिखाती है: सीएम भजनलाल शर्मा

समाचार नामा 28 Oct 2026 10:20 pm

योग्यता आधारित भर्ती से असम के युवाओं को समान अवसर मिल रहे हैं: मुख्यमंत्री सरमा

योग्यता आधारित भर्ती से असम के युवाओं को समान अवसर मिल रहे हैं: मुख्यमंत्री सरमा

समाचार नामा 28 Oct 2026 8:29 pm

'चार बड़े राज्यों में मतपत्रों से हुए एमएलसी चुनाव, कांग्रेस कितनी सीटें जीतीं?', नतीजों को लेकर पीएम मोदी का तंज

'चार बड़े राज्यों में मतपत्रों से हुए एमएलसी चुनाव, कांग्रेस कितनी सीटें जीतीं?', नतीजों को लेकर पीएम मोदी का तंज

समाचार नामा 28 Oct 2026 6:29 pm

मल्लिकार्जुन खड़गे के बयान पर सीएम शर्मा का पलटवार, बोले- हार पर आत्ममंथन करे कांग्रेस

मल्लिकार्जुन खड़गे के बयान पर सीएम शर्मा का पलटवार, बोले- हार पर आत्ममंथन करे कांग्रेस

समाचार नामा 28 Oct 2026 6:28 pm

डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) कानून क्या है? इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती क्यों दी गई है?

भारत में डिजिटल निजता की रक्षा के लिए बनाया गया डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) अधिनियम, 2023 अब व्यक्तिगत गोपनीयता और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच संतुलन को लेकर एक बड़ी कानूनी बहस का विषय बन गया है। लेकिन उससे भी बड़ी बहस की बात यह है कि आखिर मीडिया की आड़ में कब तक कुछेक संस्थान विपक्ष के लिए फर्जी न्यूज प्लांट करेंगे, विदेशी दूतावासों से सांठ- गांठ करके महत्त्वपूर्ण मंत्रालयों और विभिन्न संस्थाओं की खुफिया गिरी करेंगे? शायद यही वजह है कि सरकार अब मीडिया को मिली बेलगाम स्वतंत्रता को नियंत्रित करना चाहती है। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बाद मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा खुफिया रिपोर्टों के बाद ही ऐसे सख्त कानून अमल में लाए जाने की सोची गई। डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया की खबरी अराजकता और सनसनीखेज झूठ सच न्यूज से जनता भी भ्रमित हो जाती है। इसे भी पढ़ें: DPDP Act से पत्रकारिता पर संकट, Supreme Court ने केंद्र सरकार को भेजा नोटिस उल्लेखनीय है कि 27 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने 21 प्रमुख समाचार संगठनों का प्रतिनिधित्व करने वाली डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) की याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा। अदालत ने तत्काल अंतरिम रोक लगाने से इनकार किया और मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर के लिए निर्धारित की। इस विवाद का मूल प्रश्न यह है कि, क्या किसी व्यक्ति की डिजिटल निजता की रक्षा करते हुए पत्रकारों को भ्रष्टाचार, अनियमितताओं और जनहित से जुड़े मामलों की स्वतंत्र जांच करने की पर्याप्त छूट मिलनी चाहिए? पहला सवाल है कि DPDP कानून क्या है? तो यह जान लीजिये कि इसका पूरा नाम Digital Personal Data Protection Act, 2023 है। यह कानून डिजिटल माध्यमों से जुड़े व्यक्तिगत डेटा के संग्रह, इस्तेमाल और सुरक्षा के लिए बनाया गया है। इसका उद्देश्य लोगों की निजी जानकारी का दुरुपयोग रोकना और डेटा का इस्तेमाल करने वाले संस्थानों की जवाबदेही तय करना है। उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति का नाम, फोन नंबर, पता, डिजिटल पहचान या उससे जुड़ी अन्य व्यक्तिगत जानकारी किसी संस्था के पास हो, तो उस जानकारी का इस्तेमाल कानून के अनुरूप होना चाहिए। कानून के अंतर्गत डेटा संभालने वाली संस्था को Data Fiduciary और जिस व्यक्ति का डेटा है, उसे Data Principal कहा जाता है। सामान्यतः डेटा के इस्तेमाल के लिए सहमति या कानून में निर्धारित वैध आधार जरूरी होता है। उल्लंघन के कुछ मामलों में अधिकतम ₹250 करोड़ तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। दूसरा सवाल यह है कि आख़िर इस कानून को लेकर विवाद क्यों खड़ा हुआ? तो जवाब होगा कि, एक, पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट का अभाव: समाचार रिपोर्टिंग और खोजी पत्रकारिता को कानून में विशेष छूट नहीं दी गई है। प्रकाशकों का कहना है कि भ्रष्टाचार या किसी सार्वजनिक अनियमितता की जांच करते समय पत्रकार को संबंधित व्यक्ति की जानकारी इस्तेमाल करनी पड़ सकती है। यदि सहमति और अन्य डेटा-सुरक्षा नियमों का पालन हर मामले में अनिवार्य हुआ, तो जांच प्रभावित हो सकती है। दो, खबर हटाने या उसमें बदलाव का दबाव की आशंका: प्रकाशकों को शक है कि डेटा मिटाने के अधिकार और सहमति वापस लेने से जुड़े प्रावधानों का इस्तेमाल प्रकाशित खबरों को हटवाने या बदलवाने के लिए किया जा सकता है। इससे पुरानी रिपोर्टों और जनहित के दस्तावेजी रिकॉर्ड पर भी असर पड़ने की आशंका है। यह प्रकाशकों की कानूनी दलील है, अदालत द्वारा स्थापित निष्कर्ष नहीं, जो कि बहस के बाद स्पष्ट होगा। तीन, गोपनीय सूत्रों की पहचान उजागर होने का खतरा मंडराने के आसार प्रबल: पत्रकारों को कई बार गोपनीय सूत्रों से जानकारी मिलती है। प्रकाशकों का तर्क है कि सरकार को डेटा संबंधी जानकारी मांगने की व्यापक शक्ति देने और कुछ परिस्थितियों में ऐसी मांग की सूचना सार्वजनिक करने पर रोक लगाने से पत्रकारों के सूत्रों की गोपनीयता प्रभावित हो सकती है। चार, सूचना के अधिकार (RTI) पर प्रभाव: अधिनियम की धारा 44(3) ने RTI कानून की धारा 8(1)(j) में बदलाव किया। पहले व्यक्तिगत जानकारी से जुड़े मामलों में निजता के साथ व्यापक जनहित को भी ध्यान में रखकर सूचना देने पर विचार किया जा सकता था। संशोधित प्रावधान व्यक्तिगत जानकारी से संबंधित सूचना को छूट देता है। आलोचकों को आशंका है कि इससे सरकारी कामकाज और सार्वजनिक पदाधिकारियों से जुड़े कुछ मामलों की जानकारी हासिल करना कठिन हो सकता है। तीसरा सवाल है कि प्रकाशकों ने कानून की किन धाराओं को चुनौती दी है? प्राप्त जानकारी के मुताबिक, DNPA की याचिका में अधिनियम की कई धाराओं और 2025 के नियमों को चुनौती दी गई है। प्रमुख विवाद इस प्रकार हैं: मुख्य प्रावधान और विवाद का मुख्य मुद्दा निम्नलिखित है:- एक, धारा 7 और 17 में डेटा के वैध इस्तेमाल तथा छूट के प्रावधानों में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट अपवाद नहीं होना चाहिए। दो, धारा 12- व्यक्तिगत डेटा मिटाने के अधिकार का समाचार अभिलेखों और रिपोर्टिंग पर संभावित प्रभाव। तीन, धारा 36 तथा नियम 23- सरकार द्वारा डेटा संबंधी जानकारी मांगने की शक्ति और उससे जुड़े सुरक्षा उपाय। तीन, धारा 44(3)- RTI कानून में व्यक्तिगत जानकारी के प्रकटीकरण संबंधी बदलाव। प्रकाशकों का दावा है कि इन प्रावधानों का संयुक्त प्रभाव अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, पत्रकारिता और नागरिकों के जानने के अधिकार पर पड़ सकता है। याचिका में संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है; हालांकि इस पर अंतिम फैसला अभी नहीं हुआ है। चौथा सवाल है कि, इन 21 प्रमुख न्यूज पब्लिशर्स में कौन-कौन शामिल हैं? याचिका डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन की ओर से दायर की गई है। इससे जुड़े प्रमुख समाचार संगठनों में अधिकांश बड़े समूह शामिल हैं। पांचवां सवाल है कि सरकार के पास डेटा मांगने की शक्ति को लेकर चिंता क्या है? इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू अधिनियम की धारा 36 और इससे संबंधित नियम 23 है। प्रकाशकों के अनुसार, इन प्रावधानों के तहत सरकार डेटा संभालने वाली संस्थाओं से जानकारी मांग सकती है और कुछ परिस्थितियों में उन्हें उस मांग के बारे में दूसरों को बताने से भी रोका जा सकता है। उनकी चिंता है कि यदि पर्याप्त प्रक्रियागत सुरक्षा, स्वतंत्र निगरानी और न्यायिक समीक्षा नहीं हुई, तो इससे पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों की पहचान सामने आने या उनके संचार की जानकारी उजागर होने का जोखिम पैदा हो सकता है। हालांकि, सरकार द्वारा जानकारी मांगने की शक्ति अपने आप में हर मांग को गैरकानूनी नहीं बनाती। वास्तविक प्रश्न यह है कि इस शक्ति के इस्तेमाल पर क्या सीमाएं हैं, उसका औचित्य कैसे तय होगा और उसके दुरुपयोग के विरुद्ध क्या उपाय उपलब्ध हैं? छठा सवाल है कि क्या व्यक्तिगत निजता की रक्षा जरूरी नहीं है? निश्चित रूप से जरूरी है। इस विवाद में केवल मीडिया की स्वतंत्रता नहीं, बल्कि आम नागरिकों की निजता भी महत्वपूर्ण है। अब दोनों पक्षों के हित बारीकी पूर्वक समझिए: व्यक्तिगत निजता की रक्षा पत्रकारिता और जनहित- एक, निजी जानकारी का अनधिकृत इस्तेमाल रोका जाए। दो, भ्रष्टाचार और अनियमितताओं की स्वतंत्र जांच हो। तीन, निजी डेटा हटाने और सहमति से जुड़े अधिकार सुरक्षित रहें। चार, जनहित की खबरों को अनुचित दबाव में न हटाना पड़े। पांच, नागरिकों को डेटा के दुरुपयोग से सुरक्षा मिले। छह, गोपनीय समाचार सूत्रों की पहचान सुरक्षित रहे। सात, डेटा संभालने वाले संस्थानों की जवाबदेही तय हो। आठ, सरकार और सार्वजनिक संस्थानों की जवाबदेही भी बनी रहे। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस संतुलन की जरूरत पर जोर दिया। अदालत ने मीडिया संगठनों से भी पूछा कि व्यक्तिगत डेटा के दुरुपयोग को रोकने के लिए कौन-से सुरक्षा उपाय अपनाए जा सकते हैं। सातवां सवाल है कि सुप्रीम कोर्ट में अब तक क्या हुआ? तो यह जान लीजिए कि अगस्त, 2023, DPDP अधिनियम पारित। संसद ने डिजिटल व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा के लिए कानून बनाया। नवंबर, 2025: नियम अधिसूचित। DPDP Rules, 2025 जारी हुए। उनका क्रियान्वयन अलग-अलग चरणों में निर्धारित किया गया। 27 अक्टूबर, 2026: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को नोटिस दिया। अदालत ने सरकार से जवाब मांगा, लेकिन तत्काल अंतरिम रोक नहीं लगाई। 17 नवंबर, 2026: अगली सुनवाई निर्धारित। अदालत को कानून की संवैधानिक वैधता, पत्रकारिता संबंधी छूट और व्यक्तिगत निजता के बीच संतुलन से जुड़े प्रश्नों पर आगे विचार करना है। इस विश्लेष्ण स्रोत सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर 27 अक्टूबर 2026 की रिपोर्टें हैं। अठवंत सवाल यह है कि, इस विवाद के व्यापक राजनीतिक, कानूनी और सामाजिक मायने क्या हैं? इस मामले का महत्व केवल 21 मीडिया संगठनों तक सीमित नहीं है। इसके संभावित प्रभाव तीन स्तरों पर देखे जा सकते हैं:- एक, लोकतंत्र: यदि जनहित की खबरों के लिए अत्यधिक कठिन शर्तें लागू होती हैं, तो सार्वजनिक संस्थाओं की जवाबदेही प्रभावित हो सकती है। दो, निजता: यदि व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा कमजोर होती है, तो आम नागरिकों की निजी जानकारी का दुरुपयोग बढ़ सकता है। तीन, डिजिटल अर्थव्यवस्था: स्पष्ट और व्यावहारिक नियम नागरिकों, मीडिया संस्थानों तथा तकनीकी कंपनियों के बीच भरोसा बढ़ाने में मदद कर सकते हैं। प्रकाशकों की मांग पत्रकारिता के लिए स्पष्ट कानूनी सुरक्षा की है। दूसरी ओर, ऐसी छूट बनाते समय यह भी सुनिश्चित करना होगा कि मीडिया के नाम पर किसी नागरिक की निजी जानकारी का अनावश्यक खुलासा न हो। वस्तूतः DPDP कानून का उद्देश्य व्यक्तिगत डेटा की रक्षा करना है, लेकिन उसके क्रियान्वयन में पत्रकारिता और RTI पर पड़ने वाले प्रभाव गंभीर संवैधानिक प्रश्न उठाते हैं। आगे का रास्ता इस बात पर निर्भर करेगा कि अदालत निजता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, गोपनीय समाचार सूत्रों और नागरिकों के जानने के अधिकार के बीच किस तरह संतुलन स्थापित करती है। इस मामले का अंतिम न्यायिक परिणाम अभी सामने नहीं आया है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि अदालत कानून को असंवैधानिक घोषित करेगी या उसमें बदलाव का निर्देश देगी। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 28 Oct 2026 5:49 pm

बैलेट पेपर का लिटमस टेस्ट: 'वोट चोरी' का नैरेटिव और सांगठनिक विफलता का असली आईना

भारतीय लोकतांत्रिक विमर्श में पिछले कुछ वर्षों से एक अजीब और गहरी चिंताजनक परिपाटी देखने को मिल रही है। देश के राजनैतिक दल अपनी सांगठनिक कमजोरियों, जमीन से कटते जा रहे कार्यकर्ताओं और जनता के बीच नीतियों के गहरे संकट पर आत्ममंथन करने के बजाय, अपनी हर पराजय का पूरा ठीकरा देश की संवैधानिक चुनावी व्यवस्था पर फोड़ देते हैं। इस पूरे राजनैतिक खेल में 'इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन' यानी ईवीएम को एक बड़े वैश्विक खलनायक के रूप में पेश किया गया। कांग्रेस समेत समूचे विपक्ष ने एक सुर में 'वोट चोरी' का एक ऐसा आक्रामक और संदेहास्पद नैरेटिव गढ़ा, जिसने आम मतदाताओं के मन में देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास के बीज बोने की पुरजोर कोशिश की। राष्ट्रीय स्तर पर महीनों तक इस बात का माहौल बनाया गया कि यदि देश को वापस मतपत्र यानी पुरानी बैलेट पेपर प्रणाली के दौर में ले जाया जाए, तो लोकतंत्र का खोया हुआ गौरव और निष्पक्षता रातों-रात बहाल हो जाएगी। लेकिन भारतीय लोकतंत्र की यही सबसे बड़ी खूबसूरती है कि वह अपने शांत मगर अचूक और ऐतिहासिक फैसलों से बड़े-बड़े राजनैतिक ढोंग, खोखले दावों और हवा-हवाई नैरेटिव की कलई खोलकर रख देता है। हाल ही में उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक की 28 विधान परिषद सीटों पर पूरी तरह बैलेट पेपर से हुए चुनावों के परिणाम किसी भी गंभीर राजनैतिक विश्लेषक के लिए आंखें खोलने वाले हैं। जब चुनावी खेल पूरी तरह से कांग्रेस की मनपसंद मतपत्र प्रणाली से खेला गया—जहां न तो कोई माइक्रोचिप थी, न कोई सॉफ्टवेयर था, न कोई प्रोग्रामिंग थी और न ही तकनीक का कोई अदृश्य हस्तक्षेप था—तब भी कांग्रेस को मिला करारा सांगठनिक झटका यह अकाट्य रूप से साबित करता है कि समस्या मशीनों की तकनीक में नहीं, बल्कि पार्टी की बुनियादी राजनीति, नीयत और धरातल में है। इसे भी पढ़ें: MLC Election नतीजों पर DK Shivakumar बोले, लोगों ने हमें संदेश दिया है; सुधारात्मक कदम उठाएंगे 23 अक्टूबर को देश के चार बड़े और राजनैतिक रूप से बेहद संवेदनशील राज्यों की 28 विधान परिषद सीटों पर मतपत्रों के जरिए वोट डाले गए थे। 27-28 अक्टूबर को जब मतपेटियां खुलीं, तो चुनावी भूगोल की एक बिल्कुल नई और अप्रत्याशित तस्वीर सामने आई। यह चुनाव कोई आम जनता या आम जनसभाओं का पारंपरिक चुनाव नहीं था, बल्कि यह विधान परिषद के 'स्नातक' और 'शिक्षक' निर्वाचन क्षेत्रों का विशेष चुनाव था। इन चारों राज्यों का संपूर्ण चुनावी परिदृश्य कांग्रेस के दावों की जमीनी हकीकत को बयां करता है: पहले कर्नाटक की बात करें-यहाँ कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा, ऐतिहासिक और सबसे आत्मघाती झटका रहा है। कर्नाटक में कांग्रेस की पूर्ण बहुमत वाली सिद्धारमैया सरकार होने के बावजूद, बैलेट पेपर से हुए इस चुनाव में भाजपा-जेडीएस गठबंधन ने बाजी मार ली। बेंगलुरु टीचर्स निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा-जेडीएस के एपी रंगनाथ ने सिटिंग एमएलसी पुट्टन्ना को करारी शिकस्त दी, वहीं वेस्ट ग्रेजुएट्स सीट पर भाजपा के एस.वी. संकनूर ने लगातार तीसरी बार कांग्रेस के मोहन लिम्बिकाई को ९,३२३ मतों के बहुत बड़े अंतर से पराजित किया। जब सत्ताधारी दल अपने ही राज्य में मतपत्रों से हार जाए, तो दोष किसे दिया जाए? बिहार की शिक्षक और स्नातक सीटों पर कांग्रेस का प्रदर्शन एक बार फिर दयनीय और निराशाजनक रहा। दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में प्रशांत किशोर की नवगठित 'जन सुराज पार्टी' के उम्मीदवार सुरेश राय ने कांग्रेस के कद्दावर नेता और पूर्व बिहार प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा को करारी शिकस्त देकर राज्य के राजनैतिक गलियारों में हलचल मचा दी। यहां तक कि मतपत्रों के दौर में भी कांग्रेस अपने पुराने नेताओं की साख नहीं बचा पा रही है। उत्तर प्रदेश में वजूद का संकट उभर आया। यहाँ की 11 सीटों पर मुख्य मुकाबला सत्तारूढ़ भाजपा और मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (SP) के बीच ही सिमट कर रह गया। मेरठ जैसी महत्वपूर्ण सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज की और वाराणसी में सपा ने अपना दमखम दिखाया, जबकि कांग्रेस इस पूरे मतपत्र वाले चुनाव में कहीं भी रेस में दिखाई नहीं दी। महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी और विशेषकर कांग्रेस के लिए राहत की बात केवल यह रही कि नागपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस के मौजूदा एमएलसी अभिजीत वंजारी शुरुआती दौर से ही भाजपा के सुधाकर कोहले पर बढ़त बनाए रखने में सफल रहे। हालांकि, अगर चारों राज्यों के ओवरऑल प्रदर्शन को देखा जाए, तो कांग्रेस अपने सहयोगियों की तुलना में बेहद कमजोर और ढीली जमीन पर खड़ी दिखाई देती है। कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व से लेकर स्थानीय प्रवक्ताओं तक ने देश में एक ऐसा आभासी माहौल बना दिया था कि देश की जनता तो हमें छप्पर फाड़कर जिताना चाहती है, लेकिन सरकारी मशीनरी ईवीएम में गुप्त हेरफेर करके हमारे वैध वोट चुरा लेती है। हालिया हरियाणा विधानसभा चुनाव हो या देश के अन्य बड़े चुनाव, कांग्रेस ने हमेशा इसी विक्टिम कार्ड का इस्तेमाल करके अपनी सांगठनिक कमजोरियों पर पर्दा डाला। लेकिन २८ विधान परिषद सीटों के इन बैलेट पेपर वाले परिणामों ने कांग्रेस को तार्किक रूप से एक ऐसे बंद कमरे में ला खड़ा किया है, जहां से निकलने का अब कोई वैचारिक रास्ता नहीं बचा है। अब यक्ष प्रश्न यह उठता है कि क्या कांग्रेस कर्नाटक और बिहार के इन करारे परिणामों के बाद भी 'वोट चोरी' का वही पुराना विलाप कर सकती है? जहां हर एक मतपत्र पर प्रत्येक वोटर ने अपने हाथ से पेन के जरिए अपनी प्राथमिकता दर्ज की थी, जहां मतपेटियों को सील करने से लेकर स्ट्रांग रूम की सुरक्षा और निगरानी तक कांग्रेस के अपने अधिकृत काउंटिंग एजेंट चौबीसों घंटे तैनात थे, वहां कांग्रेस की इस सांगठनिक दुर्गति का आखिर क्या बहाना होगा? विशेष रूप से कर्नाटक जैसे राज्य में, जहां गृह विभाग से लेकर पूरा प्रशासनिक और पुलिस अमला खुद कांग्रेस सरकार के अधीन कार्य कर रहा है, वहां बैलेट पेपर पर भाजपा-जेडीएस गठबंधन कैसे क्लीन स्विप कर गया? इस पराजय ने विरोधी दलों को एक अचूक और अकाट्य राजनैतिक ब्रह्मास्त्र थमा दिया है। अब भाजपा का यह तंज तार्किक रूप से बिल्कुल सही प्रतीत होता है कि कांग्रेस को देश की जागरूक जनता, चुनाव आयोग और ईवीएम तकनीक से सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए। जब कोई राजनैतिक दल अपनी वास्तविक सांगठनिक बीमारियों का इलाज करने के बजाय एक काल्पनिक दुश्मन खड़ा कर लेता है, तो वह आत्ममुग्धता का शिकार हो जाता है, और यही कांग्रेस के पतन का सबसे बड़ा कारण बन रहा है। इन चुनावों की अंतर्निहित प्रकृति को समझना भी बेहद आवश्यक है। यह कोई सामान्य, भावुक, मुफ़्त की घोषणाओं या पारंपरिक जातिगत समीकरणों पर लड़ा जाने वाला आम चुनाव नहीं था। स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में मतदान का विधिक अधिकार केवल उसी नागरिक को होता है जिसके पास किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय की न्यूनतम स्नातक (Graduation) की डिग्री हो। इसी प्रकार, शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में केवल वे ही वोटर होते हैं जो माध्यमिक या उच्च शिक्षण संस्थानों में अध्यापन कार्य से जुड़े हैं। यानी सीधे शब्दों में कहें तो यह हमारे समाज का सबसे 'प्रबुद्ध', 'शिक्षित', 'जागरूक' और 'बौद्धिक' वर्ग है, जो अखबारों की सुर्खियों से लेकर सोशल मीडिया के प्रोपेगैंडा और सरकारों की नीतियों का बहुत बारीक और तार्किक विश्लेषण करता है। इस प्रबुद्ध वर्ग द्वारा बैलेट पेपर के सामने खड़े होकर भी कांग्रेस की राजनीति को बड़े पैमाने पर खारिज किए जाने के पीछे तीन स्पष्ट और कड़े संदेश छिपे हैं: पहला --देश का शिक्षित युवा और प्रबुद्ध समाज अब केवल इस बात पर आंख मूंदकर वोट नहीं देता कि संविधान खतरे में है या देश की सभी लोकतांत्रिक संस्थाएं बेची जा रही हैं। वे एक रचनात्मक और व्यावहारिक विकल्प देखना चाहते हैं। कांग्रेस का पूरा ध्यान चौबीसों घंटे केवल केंद्र सरकार पर कीचड़ उछालने और व्यवस्था को कोसने में केंद्रित रहा, लेकिन जब बात युवाओं को रोजगार देने, शिक्षा व्यवस्था के बुनियादी ढांचे में सुधार करने और आर्थिक नीतियों का एक बेहतर स्थानीय मॉडल पेश करने की आई, तो कांग्रेस के पास कोई ठोस वैचारिक खाका नहीं था। शिक्षित वर्ग ने इस राजनैतिक नकारात्मकता को सिरे से खारिज कर दिया। विधान परिषद के इन विशिष्ट चुनावों में मतदाता सूची आम चुनावों की तरह स्वतः नहीं बनती। इस चुनाव से कई महीने पहले राजनैतिक दलों के कार्यकर्ताओं को घर-घर जाकर, डिग्री कॉलेजों, दफ्तरों और सोसायटियों में जाकर स्नातकों के फॉर्म भरवाने होते हैं और बड़ी मशक्कत के साथ उन्हें वोटर लिस्ट में पंजीकृत करवाना होता है। जिस पार्टी का कैडर और जमीनी नेटवर्क जितना सक्रिय होगा, उसके वोटर उतने ही अधिक बनेंगे। भाजपा और उसके वैचारिक संगठनों का पन्ना-प्रमुख स्तर का ढांचा इस काम में महीनों पहले से जुट जाता है। इसके विपरीत, कांग्रेस का पूरा ढांचा केवल सोशल मीडिया की वॉर-रूम, प्रेस कॉन्फ्रेंस और बड़े नेताओं की रैलियों तक ही सीमित रह गया है। कांग्रेस का कार्यकर्ता जमीन पर जाकर युवाओं का पंजीकरण कराने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ, जिसका खामियाजा नतीजों में भुगतना पड़ा। साथ ही शिक्षित मतदाता हमेशा उम्मीदवार की व्यक्तिगत साख, उसकी समाज में पहुंच और उसकी बौद्धिक क्षमता को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। कांग्रेस के भीतर की अंदरूनी गुटबाजी और स्थानीय जमीनी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा का खामियाजा पार्टी को इन राज्यों में भुगतना पड़ा है। कर्नाटक हो या महाराष्ट्र, टिकटों के बंटवारे में अक्सर दिल्ली दरबार या बड़े क्षत्रपों की निजी पसंद-नापसंद हावी रहती है, जिससे जमीन पर सालों से पसीना बहाने वाला स्थानीय नेता उपेक्षित रह जाता है। प्रबुद्ध मतदाताओं ने ऐसे पैराशूट या कमजोर उम्मीदवारों को तवज्जो देने से साफ इनकार कर दिया। - अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार

प्रभासाक्षी 28 Oct 2026 5:38 pm

ब्रिक्स संसदीय मंच है शांति और न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था का संकल्प

आज जब दुनिया युद्धों, क्षेत्रीय संघर्षों, आर्थिक अस्थिरता, आतंकवाद, व्यापारिक तनाव और जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर चुनौतियों से घिरी हुई है, तब अंतरराष्ट्रीय सहयोग की सार्थकता केवल कूटनीतिक घोषणाओं में नहीं, बल्कि आम आदमी के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने में निहित है। ऐसे समय में 26-27 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली के संविधान सदन में आयोजित 12वां ब्रिक्स संसदीय मंच वैश्विक लोकतांत्रिक संवाद, जन-केंद्रित विकास और बहुपक्षीय सहयोग की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण अवसर बनकर सामने आया है। भारत की अध्यक्षता में आयोजित यह सम्मेलन इस विश्वास को सुदृढ़ करता है कि दुनिया की समस्याओं का स्थायी समाधान टकराव, वर्चस्व और संकीर्ण राष्ट्रीय हितों में नहीं, बल्कि संवाद, सहमति और साझा जिम्मेदारी में निहित है। इस संसदीय मंच का सबसे महत्त्वपूर्ण संदेश है कि विकास का वास्तविक उद्देश्य केवल आर्थिक समृद्धि नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में सम्मान, सुरक्षा, अवसर और खुशहाली सुनिश्चित करना है। सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि, तकनीकी प्रगति, व्यापार का विस्तार और बुनियादी ढाँचे का विकास तभी सार्थक हैं, जब उनका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। विकास की चमक के बीच यदि गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, असमानता और सामाजिक वंचना बनी रहती है, तो प्रगति का दावा अधूरा है। इसलिए जन-केंद्रित विकास की अवधारणा आज वैश्विक नीतियों की अनिवार्य कसौटी बननी चाहिए। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला का संसदीय संवाद, लोकतांत्रिक मूल्यों और जनहित को प्राथमिकता देने पर बल इसी दृष्टि से विशेष प्रासंगिकता रखता है। संसद लोकतंत्र की आत्मा है। वह केवल कानून बनाने वाली संस्था नहीं, बल्कि जनता की आकांक्षाओं, पीड़ाओं, अधिकारों और अपेक्षाओं की प्रतिनिधि है। सांसदों का दायित्व सरकारों के निर्णयों का समर्थन करना भर नहीं, बल्कि उनकी समीक्षा करना, जनहित के प्रश्न उठाना और सत्ता को जवाबदेह बनाए रखना भी है। जब विभिन्न देशों के निर्वाचित प्रतिनिधि एक मंच पर बैठकर अनुभवों और विचारों का आदान-प्रदान करते हैं, तब संसदीय लोकतंत्र की शक्ति राष्ट्रीय सीमाओं से आगे बढ़कर वैश्विक कल्याण का माध्यम बन सकती है। इस मंच की प्रासंगिकता इसलिए भी बढ़ जाती है कि वर्तमान विश्व व्यवस्था अनेक विरोधाभासों से जूझ रही है। एक ओर विज्ञान, संचार और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने मानव जीवन को अभूतपूर्व क्षमताएँ प्रदान की हैं, वहीं दूसरी ओर युद्धों, अविश्वास, हथियारों की प्रतिस्पर्धा और आर्थिक विषमताओं ने मानवता के भविष्य को अनिश्चित बनाया है। ऐसे वातावरण में सांसदों का साझा दायित्व है कि वे अपने-अपने देशों की नीतियों को मानवीय संवेदनाओं, शांति और न्याय के व्यापक उद्देश्यों से जोड़ें। संसदों के बीच संवाद कार्यपालिका की कूटनीति को जनप्रतिनिधियों के अनुभवों से समृद्ध करता है और अंतरराष्ट्रीय निर्णयों में पारदर्शिता तथा लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व को प्रोत्साहित करता है। इसे भी पढ़ें: New Delhi में BRICS मंच ने उठाई Global South की आवाज, संयुक्त राष्ट्र में बदलाव की अपील ब्रिक्स संसदीय मंच के चार प्रमुख आधार-संस्थागत लचीलापन, नवाचार, सहयोग और सतत विकास-भविष्य की वैश्विक राजनीति के लिए विशेष महत्त्व रखते हैं। संस्थागत लचीलापन लोकतांत्रिक संस्थाओं को संकटों के बीच भी सक्षम और उत्तरदायी बनाएगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल तकनीक के उपयोग में नैतिकता, पारदर्शिता तथा मानवीय हितों की रक्षा आवश्यक है, ताकि तकनीक सुविधा का माध्यम बने, असमानता और नियंत्रण का नहीं। इसी प्रकार सतत विकास का अर्थ आर्थिक प्रगति और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना है। जलवायु संकट का सामना कोई देश अकेले नहीं कर सकता, इसके लिए संसाधनों, ज्ञान और उत्तरदायित्व का न्यायपूर्ण बँटवारा जरूरी है। इस सम्मेलन का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष ग्लोबल साउथ अर्थात विकासशील देशों की आवाज को अंतरराष्ट्रीय निर्णय प्रक्रिया में अधिक प्रभावशाली बनाना है। विश्व की बड़ी आबादी इन देशों में निवास करती है, लेकिन वैश्विक वित्तीय व्यवस्था, व्यापारिक नियमों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में उनकी अपेक्षाओं को हमेशा पर्याप्त स्थान नहीं मिला है। खाद्य सुरक्षा, उर्वरक उपलब्धता, ऊर्जा की सुलभता, ऋण का बोझ और विकास के लिए वित्तीय संसाधनों की कमी जैसी समस्याएँ करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करती हैं। ऐसे में ब्रिक्स देशों के सांसदों को यह सुनिश्चित करने का प्रयास करना चाहिए कि वैश्विक नीतियाँ शक्तिशाली देशों के हितों तक सीमित न रहें, बल्कि विकासशील समाजों की वास्तविक आवश्यकताओं को भी प्रतिबिंबित करें। भारत की भूमिका इस संदर्भ में विशेष रूप से उल्लेखनीय है। भारत अपनी लोकतांत्रिक परंपराओं, विविधतापूर्ण सामाजिक संरचना, विकास संबंधी अनुभवों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की नीति के माध्यम से विभिन्न देशों के बीच संवाद का सेतु बन सकता है। भारत की शक्ति केवल उसकी आर्थिक क्षमता या जनसंख्या में नहीं, बल्कि विविधताओं को साथ लेकर चलने और मतभेदों के बीच सहमति खोजने की लोकतांत्रिक क्षमता में भी निहित है। नई दिल्ली में इस मंच का आयोजन भारतीय संसदीय कूटनीति को नई ऊर्जा प्रदान करता है। भारत का प्रयास होना चाहिए कि ब्रिक्स सहयोग किसी एक देश के वर्चस्व का साधन न बने, बल्कि सभी सदस्य और साझेदार देशों के साझा हितों का मंच बने। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने अपने उद्घाटन संबोधन में इस बात पर विशेष बल दिया कि ब्रिक्स की वास्तविक सफलता संवाद को ठोस परिणामों में बदलने से मापी जाएगी। उन्होंने युवाओं की आकांक्षाओं को अवसरों से जोड़ने तथा विकास और पर्यावरण संरक्षण को परस्पर पूरक बनाने की आवश्यकता भी रेखांकित की। इन विचारों में भविष्य की दिशा छिपी है। दुनिया की युवा आबादी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल, रोजगार और नवाचार के अवसर उपलब्ध कराना केवल राष्ट्रीय सरकारों का दायित्व नहीं, बल्कि वैश्विक सहयोग का भी विषय है। यदि युवाओं की ऊर्जा को सकारात्मक दिशा नहीं मिलेगी, तो निराशा और असमानता सामाजिक अस्थिरता को जन्म दे सकती हैं। इसी तरह आतंकवाद के विरुद्ध साझा रणनीति, अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सम्मान और संयुक्त राष्ट्र जैसी वैश्विक संस्थाओं में सुधार आज की अपरिहार्य जरूरतें हैं। भारत ने आतंकवाद के विरुद्ध सहयोग और अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण वैश्विक शासन व्यवस्था की आवश्यकता को संसदीय संवाद के महत्त्वपूर्ण विषयों के रूप में उठाया है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की विश्वसनीयता तभी बढ़ेगी, जब वे सभी देशों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करें और संकटों के समाधान में प्रभावी भूमिका निभाएँ। शांति का अर्थ केवल युद्ध का अभाव नहीं, बल्कि भयमुक्त जीवन, न्यायपूर्ण अवसर और मानवीय गरिमा की सुरक्षा भी है। अंततः 12वें ब्रिक्स संसदीय मंच का वास्तविक महत्त्व इस बात में निहित है कि वह दुनिया के सांसदों को उनकी मूल जिम्मेदारी का स्मरण कराता है-वे केवल अपने देशों की सीमाओं के भीतर जनता के प्रतिनिधि नहीं, बल्कि साझा मानव भविष्य के निर्माण में भागीदार भी हैं। संविधान सदन से उठने वाला संदेश स्पष्ट है कि लोकतंत्र की सार्थकता जनता के विश्वास, संस्थाओं की जवाबदेही और नीतियों के मानवीय परिणामों में है। यह सम्मेलन तभी ऐतिहासिक सिद्ध होगा, जब इसके विचार ठोस नीतियों, प्रभावी कानूनों और जनजीवन में दिखाई देने वाले परिवर्तनों का रूप लेंगे। दुनिया को आज केवल शक्तिशाली राष्ट्रों की नहीं, बल्कि संवेदनशील नेतृत्व, उत्तरदायी संसदों और मानवीय दृष्टि से प्रेरित नीतियों की आवश्यकता है। भारत की अध्यक्षता में ब्रिक्स संसदीय मंच इसी दिशा में आशा जगाता है कि संवाद संघर्षों को कम कर सकता है, सहयोग विषमताओं को घटा सकता है और लोकतंत्र विकास को मानवीय बना सकता है। यही इस सम्मेलन का संदेश है, यही इसकी प्रासंगिकता और यही एक शांतिपूर्ण, समावेशी तथा न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था की सबसे बड़ी आवश्यकता है। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

प्रभासाक्षी 28 Oct 2026 5:24 pm

विपक्ष ने 'लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ' मार्च की आलोचना की, रैली की अनुमति देने पर उठाए सवाल

विपक्ष ने 'लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ' मार्च की आलोचना की, रैली की अनुमति देने पर उठाए सवाल

समाचार नामा 28 Oct 2026 4:43 pm

भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का आकार 44 अरब डॉलर पहुंचने का अनुमान

नई दिल्ली, भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र आर्थिक विकास, निजी निवेश और औद्योगिक क्षमताओं को बढ़ाने में लगातार महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।

देशबन्धु 28 Oct 2026 4:21 pm

भारतीय म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री का औसत एयूएम 14.1 प्रतिशत बढ़ा: रिपोर्ट

नई दिल्ली, भारतीय म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री की औसत एसेट अंडर मैनेजमेंट (एयूएम) वित्त वर्ष 27 की दूसरी तिमाही में तिमाही आधार पर 4.9 प्रतिशत और सालाना आधार पर 14.1 प्रतिशत बढ़कर 89.51 लाख करोड़ रुपए हो गई है।

देशबन्धु 28 Oct 2026 2:48 pm

मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार को राजनीतिक सरंक्षण, सरकार ने साध रखी है चुप्पी : माकपा

मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार को राजनीतिक सरंक्षण, सरकार ने साध रखी है चुप्पी : माकपा

समाचार नामा 28 Oct 2026 2:37 pm

सत्ता में बैठे लोगों का 'लोकतंत्र बचाने' के लिए रैली निकालना अजीब विडंबनाः मनीष तिवारी

सत्ता में बैठे लोगों का 'लोकतंत्र बचाने' के लिए रैली निकालना अजीब विडंबनाः मनीष तिवारी

समाचार नामा 28 Oct 2026 2:36 pm

भारतीय मुसलमान अपने धर्म पर कायम रहेंगे, देश की एकता और तरक्की में देंगे योगदानः मोतासिम खान

भारतीय मुसलमान अपने धर्म पर कायम रहेंगे, देश की एकता और तरक्की में देंगे योगदानः मोतासिम खान

समाचार नामा 28 Oct 2026 2:35 pm

दलाल स्ट्रीट पर राज, सबसे बड़े IPO और सरप्राइज लिस्टिंग के साथ बना 13 नए रिकॉर्ड का सरताज, सभी ने कहा 'Jio मेरे लाल'

भारतीय शेयर बाजार के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया है। रिलायंस इंडस्ट्रीज की डिजिटल इकाई जियो प्लेटफॉर्म्स (Jio Platforms) ने दलाल स्ट्रीट पर कदम रखते ही ऐसा तूफान खड़ा किया कि फंड जुटाने से लेकर निवेशकों की भागीदारी तक के सारे पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त हो गए। महज 100 मिनट के भीतर पूरी तरह सब्सक्राइब होकर और 1.38 करोड़ से ज्यादा बोलियां बटोरकर कंपनी का ₹30,188 करोड़ का यह मेगा इश्यू हुंडई मोटर इंडिया (₹27,870 करोड़) को पछाड़ देश का अब तक का सबसे बड़ा आईपीओ बन गया है। संस्थागत और खुदरा निवेशकों के इस ऐतिहासिक भरोसे ने इस लिस्टिंग को भारतीय कैपिटल मार्केट का सबसे यादगार पड़ाव बना दिया है। 1. निवेशकों के आवेदन रिकॉर्ड 1.38 करोड़ के पार देश के सबसे बड़े इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) - जियो प्लेटफॉर्म्स IPO - की सबसे खास बातों में से एक, इसमें आए आवेदनों की संख्या रही। जियो प्लेटफॉर्म्स को 1.38 करोड़ से ज़्यादा आवेदन मिले, जो भारतीय IPO के पिछले 97.33 लाख आवेदनों के रिकॉर्ड से कहीं ज़्यादा हैं। इस शानदार प्रतिक्रिया से कंपनी में निवेशकों की गहरी दिलचस्पी का पता चलता है। इसमें रिटेल निवेशकों, हाई-नेट-वर्थ व्यक्तियों, संस्थागत निवेशकों और रिलायंस इंडस्ट्रीज के पात्र शेयरधारकों - सभी ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। 2. खुदरा भागीदारी ने एक नया मानक स्थापित किया खुदरा निवेशकों की ओर से 1.05 करोड़ से अधिक आवेदन आए। खुदरा हिस्से के लिए 2.72 गुना सब्सक्रिप्शन मिला, जो यह दर्शाता है कि व्यक्तिगत निवेशकों के लिए आरक्षित शेयरों की तुलना में मांग कहीं अधिक थी। जियो जैसी बड़ी पेशकश के मामले में भागीदारी का यह स्तर विशेष रूप से उल्लेखनीय है। 3. पब्लिक इश्यू में लगभग 5 लाख करोड़ रुपये की बोलियां आईं इस पेशकश के पब्लिक हिस्से में करीब 4.9 लाख करोड़ रुपये की बोलियां आईं। मांग का स्तर सब्सक्रिप्शन के लिए उपलब्ध शेयरों के मूल्य से कहीं अधिक था, जिससे यह इश्यू भारतीय प्राइमरी मार्केट की गहराई और क्षमता के लिए एक बड़ी परीक्षा बन गया। 4. संस्थागत निवेशकों ने बड़ा दांव लगाया क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल बायर्स (QIBs) ने लगभग 3.87 लाख करोड़ रुपये के शेयरों के लिए बोली लगाई, और उनके लिए आरक्षित हिस्सा 70.55 गुना सब्सक्राइब हुआ। इस प्रतिक्रिया से पता चलता है कि जियो प्लेटफॉर्म्स में संस्थागत निवेशकों की कितनी गहरी दिलचस्पी है, और भारत के दूरसंचार तथा डिजिटल सेवा बाजारों में इसकी क्या स्थिति है। 5. पब्लिक इश्यू से पहले एंकर बुक में काफी दिलचस्पी दिखी जियो प्लेटफॉर्म्स की एंकर बुक में लगभग 8,110 करोड़ रुपये के आवंटन के मुकाबले करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये की बोलियां आईं। यह मांग पब्लिक सब्सक्रिप्शन अवधि शुरू होने से पहले ही आ गई थी, जो बड़े निवेशकों (जिनमें ग्लोबल एसेट मैनेजर और घरेलू वित्तीय संस्थान शामिल हैं) की गहरी दिलचस्पी को दर्शाती है। 6. रिलायंस इंडस्ट्रीज के मौजूदा शेयरधारकों ने बड़ी संख्या में हिस्सा लिया शेयरधारक आरक्षण श्रेणी (शेयरहोल्डर रिज़र्वेशन कैटेगरी) में 21 लाख से अधिक आवेदन प्राप्त हुए। रिलायंस इंडस्ट्रीज के पात्र शेयरधारकों को IPO में भाग लेने के लिए एक अलग रास्ता दिया गया था, जिससे इस पब्लिक इश्यू को जियो की मूल कंपनी (पैरेंट कंपनी) के निवेशक आधार से जोड़ा जा सका। 7. शेयरधारकों की बोलियां आरक्षित राशि से काफी अधिक रहीं शेयरधारक आरक्षण श्रेणी के तहत लगभग 19,000 करोड़ रुपये की बोलियां लगाई गईं, जबकि इसके लिए 2,500 करोड़ रुपये तक का आरक्षण रखा गया था। इस प्रतिक्रिया से पता चलता है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज के पात्र शेयरधारकों में जियो प्लेटफॉर्म्स की शेयर बाजार में एंट्री (लिस्टिंग) में हिस्सा लेने को लेकर काफी दिलचस्पी है। 8. हाई-नेट-वर्थ निवेशकों ने मांग बढ़ाई 'स्मॉल हाई-नेट-वर्थ इंडिविजुअल' (sHNI) श्रेणी से आए आवेदनों की संख्या 5.75 लाख को पार कर गई, जबकि 'लार्ज HNI' श्रेणी से आए आवेदन 3.5 लाख से अधिक रहे। इन श्रेणियों में क्रमशः 2 लाख रुपये से 10 लाख रुपये तक और 10 लाख रुपये से अधिक के गैर-संस्थागत (non-institutional) आवेदन शामिल हैं। इनकी भागीदारी से पता चलता है कि मांग केवल खुदरा निवेशकों और बड़े संस्थानों तक ही सीमित नहीं थी। 9. IPO को बहुत जल्दी पूरा सब्सक्रिप्शन मिल गया 21 अक्टूबर को खुलने के 100 मिनट के भीतर ही जियो प्लेटफॉर्म्स का IPO पूरी तरह सब्सक्राइब हो गया। 'क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल बायर्स' (QIB) का हिस्सा तो पहले 10 मिनट में ही सब्सक्राइब हो गया, जो बड़े निवेशकों की ओर से शुरुआती मजबूत मांग को दर्शाता है। पहले दिन के अंत तक, पूरा इश्यू 3.16 गुना सब्सक्राइब हो चुका था। 10. इश्यू साइज के मामले में जियो ने हुंडई मोटर इंडिया को पीछे छोड़ा 30,188 करोड़ रुपये के इश्यू साइज के साथ, जियो प्लेटफॉर्म्स ने हुंडई मोटर इंडिया के 27,870 करोड़ रुपये के IPO को पीछे छोड़ दिया है और यह भारत का सबसे बड़ा पब्लिक ऑफरिंग बन गया है। यह उपलब्धि भारत के इक्विटी फंड जुटाने वाले बाजार के बढ़ते दायरे और बड़ी कंपनियों की निवेशकों से भारी पूंजी जुटाने की क्षमता को दर्शाती है। 11. इस पेशकश में केवल नए शेयर शामिल थे, इसमें 'ऑफर फॉर सेल' (मौजूदा शेयरधारकों द्वारा शेयरों की बिक्री) शामिल नहीं था आम IPO के विपरीत, जिनमें नए शेयर जारी करने के साथ-साथ मौजूदा शेयरधारकों द्वारा शेयरों की बिक्री ('ऑफर फॉर सेल') भी शामिल होती है, जियो प्लेटफॉर्म्स की इस पेशकश में केवल नए इक्विटी शेयर शामिल थे। इसमें लगभग 27 करोड़ नए शेयर जारी किए गए। इससे प्राप्त राशि का मुख्य उद्देश्य रिलायंस जियो इन्फोकॉम के कर्ज को चुकाना या समय से पहले वापस करना है, जबकि बची हुई राशि का उपयोग सामान्य कॉर्पोरेट कार्यों के लिए किया जाएगा। 12. इसका अनुमानित मूल्यांकन 100 अरब डॉलर से अधिक था जियो प्लेटफॉर्म्स ने IPO कीमत पर 100 अरब डॉलर से अधिक के अनुमानित इक्विटी मूल्यांकन के साथ पब्लिक मार्केट में प्रवेश किया। यह मूल्यांकन इसके दूरसंचार और डिजिटल सेवा व्यवसायों के बड़े पैमाने को दर्शाता है, साथ ही भारत की तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था को लेकर निवेशकों की उम्मीदों को भी दिखाता है। लिस्टिंग के समय, BSE पर जियो प्लेटफॉर्म्स का मार्केट कैपिटलाइजेशन लगभग 12.51 लाख करोड़ रुपये था। इस तरह यह भारती एयरटेल से आगे निकल गया और केवल अपनी मूल कंपनी, रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) के पीछे रहा। लगभग 15.90 लाख करोड़ रुपये के मार्केट मूल्यांकन के साथ, RIL भारत की लिस्टेड कंपनियों में शीर्ष स्थान पर बनी रही। 13. शेयरों की शुरुआत 21.4% के भारी प्रीमियम के साथ हुई 28 अक्टूबर को जियो प्लेटफॉर्म्स के शेयर BSE और NSE दोनों पर 1,358 रुपये के भाव पर लिस्ट हुए, जबकि इनका इश्यू प्राइस 1,119 रुपये था। यह 21.36% का लिस्टिंग प्रीमियम था। इस लिस्टिंग प्राइस के आधार पर, कंपनी का मार्केट कैपिटलाइजेशन लगभग 12.5 लाख करोड़ रुपये हो गया, जिससे यह भारत की सबसे मूल्यवान लिस्टेड कंपनियों में से एक बन गई।

प्रभासाक्षी 28 Oct 2026 2:26 pm

चुनाव आयोग के हलफनामे पर कांग्रेस का हमला, जयराम रमेश ने लगाए भ्रामक दावे करने के आरोप

कांग्रेस के संचार महासचिव जयराम रमेश का आरोप, आयोग ने फार्म-6 को लेकर झूठ बोला। उन्‍होंने कहा- यह हलफनामा खुद चुनाव आयोग के लिए बेहद नुकसानदेह है।

देशबन्धु 28 Oct 2026 12:39 pm

भारतीय शेयर बाजार में गिरावट जारी

मुंबई, कमजोर वैश्विक संकेतों के बीच आईटी और बैंकिंग शेयरों में भारी बिकवाली के चलते हफ्ते के तीसरे दिन बुधवार को भी भारतीय शेयर बाजार गिरावट के साथ लाल निशान में खुला। इस दौरान प्रमुख बेंचमार्कों सेंसेक्स और निफ्टी 50 में एक प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई। यह लगातार सातवां दिन है जब बाजार में गिरावट देखने को मिली है।

देशबन्धु 28 Oct 2026 11:10 am

MLC Election Results 2026: यूपी में BJP का दबदबा, कर्नाटक में कांग्रेस को झटका; बिहार में कई सीटों पर उलटफेर

MLC Election Results 2026: यूपी में BJP का दबदबा, कर्नाटक में कांग्रेस को झटका; बिहार में कई सीटों पर उलटफेर

समाचार नामा 28 Oct 2026 8:38 am

मल्लिकार्जुन खड़गे के बयान पर भड़कीं राज्यमंत्री प्रतिभा शुक्ला, बोलीं- तुरंत माफी मांगें

मल्लिकार्जुन खड़गे के बयान पर भड़कीं राज्यमंत्री प्रतिभा शुक्ला, बोलीं- तुरंत माफी मांगें

समाचार नामा 27 Oct 2026 11:09 pm

सोनिया गांधी की आत्मकथा से मचेगा सियासी भूचाल, बोलीं अब मेरी बारी

कांग्रेस संसदीय दल (सीपीपी) की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मंगलवार को कहा कि उनकी आत्मकथा 'बिलॉन्गिंग: अ जर्नी ऑफ लव' के 10 नवंबर को दुनियाभर में प्रकाशित होने के बाद राजनीतिक तमाशा देखने को मिल सकता है

देशबन्धु 27 Oct 2026 10:22 pm

यूरोप में यूपी के ‘योगी मॉडल’ पर अमल के अंतरराष्ट्रीय निहितार्थ

यूरोप में कानून-व्यवस्था, हिंसक प्रदर्शनों, संगठित अपराध और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने की घटनाओं के संदर्भ में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की शासन-शैली पर चर्चा एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक और नीतिगत विषय है। लेकिन इसका विश्लेषण करते समय एक बुनियादी सवाल समझना आवश्यक है कि क्या यूरोप को यूपी के 'योगी मॉडल' की सख्ती अपनाने की जरूरत है, या उसे उस मॉडल के कुछ चुनिंदा प्रशासनिक उपायों से सीख लेनी चाहिए? यहां पर यह बुनियादी सवाल इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि वर्ष 2017 के बाद अमेरिका-यूरोप ने योगी मॉडल की आलोचना की थी! लिहाजा, इस प्रश्न का उत्तर यूरोप की राजनीतिक व्यवस्था, मानवाधिकार संबंधी प्रतिबद्धताओं और उत्तर प्रदेश में अपनाई गई नीतियों के वास्तविक परिणामों को साथ रखकर ही दिया जा सकता है। लेकिन जब 'इस्लामिक अतिवादी' स्थानीय असंतुष्ट लोगों के साथ मिलकर यूरोप का इस्लामीकरण पर उतारू हों और ईरान का परोक्ष बरदहस्त उन्हें प्राप्त हो तो अमेरिका के बाद यूरोपीय विवशता समझी जा सकती है। इसे भी पढ़ें: Yogi Model ने Italy में मचाई धूम, दंगाइयों-उपद्रवियों से UP Style में निबटेंगी PM Giorgia Meloni सबसे पहला सवाल यह है की ‘योगी मॉडल’ से हमारा आपका क्या आशय है? तो माकूल जवाब यही होगा कि राजनीतिक विमर्श में ‘योगी मॉडल’ का प्रयोग मुख्यतः उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था को प्राथमिकता देने, अपराधियों के विरुद्ध पुलिस कार्रवाई, संगठित अपराध पर नियंत्रण, प्रशासनिक सख्ती और अवैध अतिक्रमण के विरुद्ध कार्रवाई जैसी नीतियों के लिए किया जाता है। हालाँकि, इन सभी उपायों को एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं है। अपराध की जाँच, दोषसिद्धि, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना और संपत्ति संबंधी विवादों का निपटारा अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएँ हैं। चूंकि यूपी में बेलगाम अल्पसंख्यक अपराधियों, सत्ता संरक्षित बाहुबलियों, इनसे जुड़े मनबढ़ युवाओं और शातिर अपराधियों के इशारे पर अपराध कर रहे बहुसंख्यक अपराधियों को नियंत्रित करने में यूपी के योगी मॉडल ने आशातीत सफलता प्राप्त की है, इसलिए चारो तरफ से जल रहे फ्रांस, इटली जैसे यूरोपीय देशों के पास कोई दूसरा चारा भी नहीं है। सर्वप्रथम इटली की प्रमुख और मोदी की मित्र जॉर्जिया मेलोनी ने यूपी के योगी मॉडल पर अमल करने की घोषणा की, तत्पश्चात मोदी के दूसरे मित्र फ्रांस के प्रमुख मैक्रो ने जब यूपी के योगी मॉडल की अच्छी नीतियों पर अमल करना शुरू किया तो अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार 'गैंग' सक्रिय हो गया और यूरोपीय देशों को उस नकारा लोकतंत्र की दुहाई देने लगा, जहां के बेलगाम लोग 'जुल्मी पूंजीवादी अड्डों' को फूंकने के बजाय अपने देश के सार्वजनिक जगहों, नागरिक सुविधाओं और ठिकानों को ही फूंक रहे हैं! यूरोप में इस मॉडल की चर्चा के तीन संभावित कारण हैं:- एक, कानून का प्रभावी प्रवर्तन: हिंसा, लूटपाट और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वालों के विरुद्ध त्वरित एवं निष्पक्ष कार्रवाई करना। दो, प्रशासनिक जवाबदेही: पुलिस और स्थानीय प्रशासन की तैयारी, समन्वय तथा निर्णय लेने की क्षमता में सुधार करना। तीन, राज्य की विश्वसनीयता: नागरिकों को यह भरोसा दिलाना कि शांतिपूर्ण जीवन, सार्वजनिक परिवहन और व्यापारिक गतिविधियों की सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन किसी मॉडल का प्रभाव उसके नाम या राजनीतिक लोकप्रियता से नहीं, बल्कि उसके परिणामों और कानूनी प्रक्रियाओं के पालन से मापा जाना चाहिए। दूसरा प्रासंगिक सवाल यह है कि यूरोप के लिए इसके क्या अंतरराष्ट्रीय निहितार्थ हो सकते हैं? एक, कानून-व्यवस्था की बहस में बदलाव: यदि यूरोपीय देश उत्तर प्रदेश की तरह अपराधियों के विरुद्ध कार्रवाई की गति, पुलिस-प्रशासन के समन्वय और सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा पर अधिक ध्यान देते हैं, तो उनकी आंतरिक सुरक्षा नीतियों में बदलाव आ सकता है। इससे भारत के प्रशासनिक अनुभवों में अंतरराष्ट्रीय रुचि बढ़ सकती है। दो, भारत की सॉफ्ट पावर और नीतिगत प्रतिष्ठा: भारत के किसी राज्य की प्रशासनिक नीति पर यूरोप में गंभीर चर्चा होना भारतीय संघीय व्यवस्था के अनुभवों को आंतरिक सुरक्षा नीतियों में बदलाव आ सकता है। इससे भारत के प्रशासनिक अनुभवों में अंतरराष्ट्रीय रुचि बढ़ सकती है। तीन, मानवाधिकार और कानून के शासन पर बहस: यूरोप में पुलिस कार्रवाई के साथ नागरिक स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण प्रदर्शन और न्यायिक समीक्षा का विशेष महत्त्व है। यूरोप की परिषद ने 23 अक्टूबर 2026 के आसपास जारी अपने हालिया वक्तव्य में भी शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और हिंसा करने वाले व्यक्तियों के बीच अंतर करने तथा पुलिस बल के कानूनी और आनुपातिक इस्तेमाल पर जोर दिया है। चार, भारत-यूरोप संबंधों में नई चर्चा: यदि यूरोपीय सरकारें भारतीय राज्यों के पुलिस प्रशिक्षण, डिजिटल निगरानी के कानूनी ढाँचे या प्रशासनिक समन्वय जैसे क्षेत्रों में उपयोगी अनुभव पाती हैं, तो तकनीकी सहयोग और नीतिगत संवाद के अवसर बन सकते हैं। अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिज्ञ बताते हैं कि इसे अभी एक संभावित दिशा समझना चाहिए, न कि यूरोप द्वारा योगी मॉडल स्वीकार कर लेने का प्रमाण! तीसरा अहम सवाल है कि क्या यूरोप में ‘बुलडोजर नीति’ भी अपनाई जा सकती है? तो जवाब होगा कि यहीं पर इस बहस का सबसे संवेदनशील पक्ष सामने आता है। उत्तर प्रदेश में अवैध निर्माणों के विरुद्ध कार्रवाई को लेकर ‘बुलडोजर मॉडल’ राजनीतिक विमर्श का प्रमुख हिस्सा रहा है। लेकिन अवैध निर्माण हटाना और किसी आपराधिक मामले में आरोपी व्यक्ति को दंडित करने के लिए उसकी संपत्ति गिराना, दोनों अलग बातें हैं। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 13 नवंबर 2024 को स्पष्ट किया कि केवल किसी आपराधिक मामले में आरोपी होने के आधार पर, कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना, किसी की संपत्ति गिराना असंवैधानिक है। न्यायालय ने नोटिस, सुनवाई और न्यायिक समीक्षा से जुड़े निर्देश भी दिए। लिहाजा, यूरोप में भी ऐसी किसी नीति को लागू करने के लिए स्थानीय कानून, संपत्ति अधिकार, निष्पक्ष सुनवाई और आनुपातिक कार्रवाई के मानकों का पालन आवश्यक होगा। इसलिए यूरोप के लिए संभावित सीख यह नहीं कि वह बिना कानूनी प्रक्रिया के कठोर दंडात्मक कार्रवाई अपनाए, बल्कि यह कि अवैध गतिविधियों पर कार्रवाई प्रभावी, प्रमाण-आधारित और न्यायिक समीक्षा के अधीन हो। चौथा महत्वपूर्ण सवाल है कि योगी मॉडल बनाम यूरोपीय व्यवस्था की तुलनात्मक दृष्टि क्या है? इसे हमलोग विषय दर विषय, उससे संबंधित उत्तर प्रदेश के मॉडल से जुड़ी बहस और यूरोपीय व्यवस्था की प्रमुख कसौटी के आधार पर निम्नलिखित तरीके से समझ सकते हैं:- एक, अपराध नियंत्रण- पुलिस कार्रवाई और अपराधियों पर दबाव - प्रभावी जाँच, अभियोजन और निष्पक्ष सुनवाई। दो, हिंसक भीड़- सार्वजनिक व्यवस्था बहाल करना- हिंसक व्यक्तियों पर कार्रवाई, शांतिपूर्ण प्रदर्शन की सुरक्षा। तीन, संपत्ति संबंधी कार्रवाई- अवैध निर्माण और अतिक्रमण हटाना, कानून के अनुसार नोटिस, सुनवाई और अपील। चार, पुलिस की जवाबदेही- प्रशासनिक अनुशासन और कार्रवाई- आनुपातिक बल प्रयोग, स्वतंत्र जाँच और जवाबदेही। पांच, शासन की विश्वसनीयता- नागरिक सुरक्षा और कानून का प्रवर्तन- सुरक्षा के साथ मौलिक अधिकारों का संरक्षण। यूरोप की परिषद के मानवाधिकार मानकों में पुलिस कार्रवाई के लिए आवश्यकता, आनुपातिकता और जवाबदेही पर जोर दिया जाता है। ये मानक हिंसक घटनाओं से निपटने के साथ-साथ शांतिपूर्ण सभा के अधिकार की रक्षा भी करते हैं। जहां तक अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर इसके संभावित प्रभाव की बात है तो इससे भारत की प्रशासनिक छवि मज़बूत होगी। यदि उत्तर प्रदेश की किसी नीति से अपराध नियंत्रण या पुलिस-प्रशासन के समन्वय में मापने योग्य सुधार सिद्ध होता है, तो भारत अपने अनुभवों को अंतरराष्ट्रीय नीति-चर्चाओं में प्रस्तुत कर सकता है। इससे भारतीय राज्यों के प्रशासनिक प्रयोगों पर शोध और संवाद को बढ़ावा मिल सकता है। चूंकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा और सफल लोकतंत्र है, इसलिए भारत की बातों को अनसुनी करना अन्य देशों के लिए घातक भी हो सकता है। जहां तक यूरोप में राजनीतिक ध्रुवीकरण की बात है तो कठोर कानून-व्यवस्था की नीतियों को कुछ राजनीतिक समूह सार्वजनिक सुरक्षा के लिए आवश्यक मान सकते हैं, जबकि दूसरे समूह उनके दुरुपयोग और नागरिक स्वतंत्रताओं पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर सवाल उठा सकते हैं। इसका वास्तविक प्रभाव देश, सरकार और लागू नीति के अनुसार अलग होगा। जहां तक लोकतांत्रिक शासन की परीक्षा की बात है तो किसी सरकार की क्षमता केवल हिंसा रोकने से नहीं, बल्कि निर्दोष नागरिकों की सुरक्षा, निष्पक्ष न्याय और प्रशासनिक गलतियों को सुधारने की व्यवस्था से भी मापी जाती है। यह कसौटी भारत और यूरोप, दोनों पर लागू होती है। अब प्रासंगिक सवाल है कि आख़िर यूरोप को वास्तव में किन किन पहलुओं से सीखने पर विचार करना चाहिए? तो जवाब होगा कि यूरोपीय देशों के लिए उपयोगी नीति-चर्चा पाँच बिंदुओं पर केंद्रित हो सकती है:- एक, हिंसक घटनाओं के दौरान पुलिस, अभियोजन पक्ष और स्थानीय प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना। दो, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने तथा संगठित अपराध के मामलों में साक्ष्य-आधारित जाँच और समयबद्ध न्यायिक प्रक्रिया का अनुपालन करना। तीन, हिंसक व्यक्तियों और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के बीच स्पष्ट अंतर करना और हिंसक व्यक्तियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई करना। चार, पुलिस कार्रवाई की स्वतंत्र समीक्षा और गलत कार्रवाई के लिए अधिकारियों की जवाबदेही तय करना। पांच, अपराध की रोकथाम के साथ उन सामाजिक परिस्थितियों पर भी ध्यान देना जो बार-बार हिंसा को जन्म देती हैं। फ्रांस के न्याय मंत्रालय ने जून-जुलाई 2023 की शहरी हिंसा के बाद गिरफ्तार और दोषसिद्ध व्यक्तियों की पृष्ठभूमि तथा घटनाओं के कारणों का विश्लेषण कराया था। यह उदाहरण बताता है कि हिंसक घटनाओं से निपटने के लिए केवल तत्काल पुलिस कार्रवाई नहीं, बल्कि बाद का संस्थागत विश्लेषण भी महत्त्वपूर्ण है। कोरा सवाल है कि क्या योगी मॉडल यूरोप के लिए नया प्रशासनिक विकल्प बन सकता है? तो जवाब होगा कि इस प्रश्न पर गंभीर अंतरराष्ट्रीय चर्चा संभव है, क्योंकि यूरोप ने उत्तर प्रदेश के योगी मॉडल को अपना लिया है। मुख्य बात यह है कि कठोर शासन और प्रभावी शासन एक ही चीज नहीं हैं। प्रभावी शासन वह है जो हिंसा और अपराध पर नियंत्रण रखे, नागरिकों को सुरक्षित बनाए, कानून का निष्पक्ष पालन करे और प्रशासन को भी कानून के प्रति जवाबदेह रखे। यदि उत्तर प्रदेश की किसी विशिष्ट नीति के सकारात्मक परिणाम स्वतंत्र आँकड़ों से प्रमाणित होते हैं, तो यूरोपीय देश उसकी उपयोगिता पर विचार कर सकते हैं। लेकिन नीतियों को उनके नाम या राजनीतिक छवि के आधार पर नहीं, बल्कि प्रमाण, लागत, परिणाम और मानवाधिकारों पर उनके प्रभाव के आधार पर परखना चाहिए। यही वह दृष्टिकोण है जिसके तहत ‘योगी मॉडल’ पर बहस भारत की आंतरिक राजनीति से आगे बढ़कर कानून-व्यवस्था, लोकतंत्र और अंतरराष्ट्रीय प्रशासनिक सहयोग के व्यापक प्रश्नों तक पहुँच सकती है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 27 Oct 2026 7:24 pm

Siang Dam Project भविष्य के लिए भारत की 'रणनीतिक तैयारी' है, परियोजना का विरोध करने से पहले जरूरी बातें जानें

अरुणाचल प्रदेश की सियांग नदी पर प्रस्तावित 11,200 मेगावाट की सियांग अपर मल्टीपर्पज परियोजना (SUMP) के विरोध में उठे स्वरों का लगातार तेज होना केंद्र और राज्य सरकार के लिए मुश्किलों का सबब बन गया है। हालांकि यह बात भी सही है कि जब चीन तिब्बत में ब्रह्मपुत्र पर दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में से एक बना रहा है, तब भारत के लिए चुप बैठना आसान नहीं है। लेकिन इस परियोजना के खिलाफ सड़कों पर उतरे स्थानीय लोगों की नाराजगी भी नजरअंदाज नहीं की जा सकती। देखा जाये तो एक तरफ चीन की चुनौती है, तो दूसरी तरफ अपनी जमीन, जंगल और पहचान बचाने की लड़ाई है। सवाल यह है कि चीन की बढ़ती ताकत का मुकाबला करने के लिए भारत को क्या करना चाहिए और इस कोशिश में अपने ही सीमावर्ती नागरिकों का भरोसा कैसे बनाए रखना चाहिए? चीन की विशाल परियोजना और भारत की रणनीतिक चुनौती हम आपको बता दें कि तिब्बत में ब्रह्मपुत्र की ऊपरी धारा यारलुंग त्सांगपो पर चीन लगभग 60,000 मेगावाट क्षमता की विशाल जलविद्युत परियोजना बना रहा है। यह भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यही नदी अरुणाचल प्रदेश में सियांग और आगे असम में ब्रह्मपुत्र कहलाती है। नदी के ऊपरी हिस्से पर चीन की बढ़ती क्षमता भारत के सामने जल प्रवाह, बाढ़ प्रबंधन और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े सवाल खड़े करती है। वहीं भारत की प्रस्तावित सियांग परियोजना चीन की बढ़ती जलविद्युत ताकत का जवाब देने की दिशा में एक अहम कदम है। अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू के मुताबिक, इस परियोजना में करीब 9.2 अरब घन मीटर पानी जमा करने की क्षमता होगी, जबकि चीन की परियोजना की अनुमानित भंडारण क्षमता करीब 5.5 अरब घन मीटर है। यानी बिजली उत्पादन में चीन का बांध बड़ा हो सकता है, लेकिन पानी जमा करने के मामले में भारत की प्रस्तावित परियोजना अधिक सक्षम हो सकती है। यही इसकी सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत है। अगर चीन भविष्य में ब्रह्मपुत्र के पानी के प्रवाह में बदलाव करता है, तो सियांग परियोजना भारत को जल प्रबंधन और बाढ़ नियंत्रण के लिए एक महत्वपूर्ण विकल्प दे सकती है। इसलिए यह परियोजना केवल बिजली बनाने तक सीमित नहीं, बल्कि भारत की जल सुरक्षा मजबूत करने और चीन के मुकाबले अपनी रणनीतिक स्थिति बेहतर बनाने का भी अवसर है। इसे भी पढ़ें: चीन के खिलाफ ढाल बनेगा सियांग डैम, तो फिर अरुणाचल के 'Gen Z' क्यों कर रहे हैं बगावत? समझिए पूरी Inside Story पासीघाट की हिंसा और आंदोलन के पीछे बढ़ता असंतोष जहां तक इस परियोजना के विरोध की बात है तो आपको बता दें कि 23 अक्टूबर की रात पासीघाट में परियोजना विरोधी प्रदर्शन हिंसक हो गए। NHPC कार्यालय और पुलिस थाने में आगजनी हुई तथा राजनीतिक प्रतिनिधियों के आवासों में तोड़फोड़ और लूटपाट की घटनाएं सामने आईं। पुलिसकर्मियों के घायल होने के बाद प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की और सार्वजनिक जमावड़े पर प्रतिबंध लगाए। इस घटनाक्रम ने सरकार और स्थानीय संगठनों के बीच पहले से मौजूद अविश्वास को और उजागर किया। रिपोर्टों के मुताबिक स्थानीय संगठनों ने यहां तक आरोप लगाया है कि केंद्र की परियोजना संबंधी पहल सियांग क्षेत्र को भारत-चीन रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का मैदान बना रही है। आदि बाने केबांग-यूनाइटेड नामक संगठन के प्रवक्ता दातिक रतन ने परियोजना के सर्वेक्षण, स्थानीय सहमति और पैतृक भूमि के अधिकारों को लेकर सवाल उठाए। संगठन ने दावा किया कि प्रभावित गांवों के लगभग 80 प्रतिशत परिवार परियोजना का विरोध कर रहे हैं। संगठन ने मुख्यमंत्री पेमा खांडू को सार्वजनिक बहस की चुनौती भी दी और कहा कि वह विकास के खिलाफ नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों की अनदेखी करके विकास थोपे जाने के खिलाफ है। देखा जाये तो इस विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू स्थानीय लोगों की पहचान, सम्मान और सुरक्षा की भावना है। साथ ही आदि और गालो समुदायों के लिए सियांग नदी सिर्फ पानी का स्रोत नहीं, बल्कि उनकी कृषि, सांस्कृतिक पहचान, पारंपरिक जीवन और पूर्वजों की भूमि का आधार है। विरोधी संगठनों का दावा है कि प्रस्तावित जलाशय से 27 गांव डूब सकते हैं और लगभग डेढ़ लाख लोग विस्थापित हो सकते हैं। इसके अलावा, सीमावर्ती समुदाय भारत की सुरक्षा और संप्रभुता के महत्वपूर्ण साझेदार हैं। यदि उन्हें लगता है कि उनकी जमीन, संस्कृति और भविष्य के बारे में निर्णय उनकी आवाज सुने बिना लिए जा रहे हैं, तो अविश्वास बढ़ सकता है। देखा जाये तो चीन के सामने भारत की स्थिति मजबूत करने के लिए स्थानीय नागरिकों के साथ विश्वास का रिश्ता कमजोर करना किसी भी रणनीति के लिए नुकसानदेह होगा। क्या आंदोलन के पीछे राजनीतिक स्वार्थ भी हैं? हम आपको यह भी बता दें कि इस परियोजना के विरोध पर सवाल भी उठ रहे हैं। सियांग परियोजना पर अरुणाचल की राजनीति में अलग-अलग रुख दिखाई दे रहे हैं। कुछ नेता और संगठन इसे चीन की चुनौती का जवाब मानते हैं, जबकि दूसरे समूह इसे स्थानीय अस्तित्व और पर्यावरण से जुड़ा खतरा बताते हैं। बांध बनने के फायदे और न बनने की संभावित कीमत की यदि बात करें तो परियोजना के संभावित लाभों में बड़े पैमाने पर बिजली उत्पादन, रोजगार, बुनियादी ढांचे का विकास और जल भंडारण की अतिरिक्त क्षमता शामिल हैं। चीन की विशाल परियोजना के संदर्भ में यह भारत को एक महत्वपूर्ण रणनीतिक विकल्प दे सकती है। दूसरी ओर, हिमालयी क्षेत्र में भूकंप, भूस्खलन और अत्यधिक वर्षा जैसे जोखिम हैं। विस्थापन, उपजाऊ खेतों, जंगलों और ऐतिहासिक धरोहरों पर प्रभाव का निष्पक्ष मूल्यांकन भी जरूरी है। हम आपको यह भी बता दें कि सियांग परियोजना अभी पूर्व-व्यवहार्यता अध्ययन के चरण में है, लेकिन इसे केवल आज के फायदे-नुकसान के नजरिये से देखना पर्याप्त नहीं होगा। सवाल आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा का भी है। तिब्बत में ब्रह्मपुत्र की ऊपरी धारा पर चीन जिस विशाल जलविद्युत परियोजना का निर्माण कर रहा है, उसके मद्देनजर भारत को भी अपनी जल सुरक्षा मजबूत करने के लिए समय रहते तैयारी करनी होगी। रणनीतिक चुनौतियों का जवाब संकट सिर पर आने के बाद नहीं, बल्कि पहले से तैयारी करके दिया जाता है। सियांग परियोजना भारत को बिजली उत्पादन, जल भंडारण और बाढ़ प्रबंधन की अतिरिक्त क्षमता दे सकती है। इसलिए इसके हर पहलू का गंभीरता से अध्ययन करना और इसकी संभावनाओं को आगे बढ़ाना देश के दीर्घकालिक हित में महत्वपूर्ण है। यह सही है कि स्थानीय लोगों की जमीन, आजीविका, संस्कृति और पर्यावरण से जुड़ी चिंताएं अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह इन चिंताओं को दूर करे, प्रभावित परिवारों के अधिकारों की रक्षा करे और किसी भी संभावित नुकसान के लिए उचित पुनर्वास तथा मुआवजे की व्यवस्था सुनिश्चित करे। लेकिन लोगों को भी यह समझना होगा कि किसी परियोजना से जुड़ी आशंकाओं और उसके वास्तविक परिणामों में अंतर हो सकता है। अधूरी जानकारी, अफवाहों या राजनीतिक दावों के आधार पर फैसला करने के बजाय उन्हें तथ्यों, वैज्ञानिक आकलन और व्यापक राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखना चाहिए। आज की तैयारी कल की सुरक्षा बन सकती है। यदि वैज्ञानिक अध्ययन यह साबित करते हैं कि सियांग परियोजना सुरक्षित और उपयोगी ढंग से बनाई जा सकती है, तो उसके रास्ते में आने वाली समस्याओं का समाधान खोजने के लिए सरकार और स्थानीय समुदायों को मिलकर काम करना चाहिए। देशहित में कभी-कभी कठिन फैसले लेने पड़ते हैं, लेकिन उन फैसलों का बोझ किसी एक समुदाय पर नहीं डाला जाना चाहिए। संभावित स्थानीय नुकसान को कम करना और प्रभावित लोगों को न्याय देना भी उतना ही जरूरी है जितना देश की सामरिक क्षमता बढ़ाना। बहरहाल, चीन की चुनौती का सामना करने के लिए भारत को मजबूत बुनियादी ढांचे, बेहतर जल प्रबंधन और दूरदर्शी रणनीति की जरूरत है। सियांग परियोजना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण विकल्प हो सकती है। इसलिए स्थानीय लोगों को विरोध और समर्थन के बीच किसी एक पक्ष को आंख मूंदकर चुनने के बजाय तथ्यों को समझना चाहिए, अपने अधिकारों के लिए आवाज उठानी चाहिए और साथ ही देश की सुरक्षा से जुड़े व्यापक सवालों पर भी विचार करना चाहिए। आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित जल संसाधन, मजबूत सीमाएं और विकास के अवसर देना आज की जिम्मेदारी है। राष्ट्रहित और स्थानीय हितों को आमने-सामने खड़ा करने के बजाय, दोनों की रक्षा करने वाला रास्ता निकालना ही सरकार की असली परीक्षा होगी। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 27 Oct 2026 7:17 pm

ज्ञानेश कुमार पर सवाल उठाने वालों को चुनाव आयोग ने 'मिलकर' दिया करारा जवाब! आरोपों की निकाल दी हवा

चुनाव आयोग पर सवाल उठाना विपक्ष का लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन सवालों की आड़ में संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर लगातार हमला करना और तथ्यों के सामने आने के बाद भी राजनीतिक आरोपों की धार बनाए रखना लोकतांत्रिक विमर्श की स्वस्थ परंपरा नहीं हो सकती। हम आपको बता दें कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में काम कर रहे भारतीय निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे के जरिए उन आरोपों का जवाब दिया है, जिनके माध्यम से आयोग की निर्णय प्रक्रिया और विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की निष्पक्षता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। आयोग का पक्ष सामने आने के बाद अब इस पूरे विवाद को केवल राजनीतिक आरोपों के चश्मे से देखना पर्याप्त नहीं होगा। दस्तावेज क्या कहते हैं, कानून क्या कहता है और अदालत के सामने कौन-सी दलीलें रखी गई हैं, यह देखना भी उतना ही जरूरी है। हम आपको यह भी बता दें कि आज इस मामले पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के हलफनामे पर जवाब दाखिल करने के लिए याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह को 10 दिन का समय दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले की सुनवाई दिवाली की छुट्टियों के बाद करने का फैसला किया है। अगली सुनवाई 17 नवंबर को होने की संभावना है। इसका अर्थ यह है कि अदालत ने अभी न तो आयोग के पक्ष को अंतिम रूप से स्वीकार किया है और न ही याचिकाकर्ताओं के आरोपों को सही ठहराया है। अदालत दोनों पक्षों की दलीलें सुनकर मामले को आगे बढ़ाएगी। इसे भी पढ़ें: Chai Par Sameeksha: Rahul Gandhi Vietnam Visit और भारत में चल रहे प्रदर्शनों का क्या कनेक्शन है? दूसरी ओर, आयोग के हलफनामे का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उसने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर एकतरफा फैसले लेने के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि एसआईआर से जुड़े तीन प्रमुख आदेश 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 को तीनों सदस्यों की सर्वसम्मति से जारी किए गए थे। आयोग के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों निर्वाचन आयुक्तों की सहमति से ही इन निर्णयों को अंतिम रूप दिया गया। हलफनामे को भी ज्ञानेश कुमार, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की सर्वसम्मति से मंजूरी दी गई। साथ ही यहां एक बुनियादी बात समझना जरूरी है। किसी फाइल पर किसी अधिकारी या निर्वाचन आयुक्त की टिप्पणी, सवाल अथवा सुझाव दर्ज होने का अर्थ अपने आप यह नहीं होता कि आयोग ने अंतिम निर्णय भी उसी टिप्पणी के आधार पर लिया। आयोग ने अपने हलफनामे में इसी अंतर को स्पष्ट किया है। उसका कहना है कि फाइलें निर्धारित प्रक्रिया के तहत एक निर्वाचन आयुक्त से दूसरे निर्वाचन आयुक्त और फिर मुख्य चुनाव आयुक्त के पास जाती हैं। जरूरी मामलों में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से मंजूरी भी ली जा सकती है, जिसे बाद में रिकॉर्ड पर दर्ज किया जाता है। आयोग का तर्क है कि आंतरिक विचार-विमर्श को अंतिम निर्णय के साथ मिलाकर देखना उचित नहीं है। यह दलील उन आरोपों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है, जिनमें दावा किया गया था कि एसआईआर से जुड़े 14 निर्णय दोनों निर्वाचन आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद आयोग के नाम पर लिए गए। लेकिन आयोग ने इन आरोपों के आधार को चुनौती देते हुए कहा है कि समाचार पत्रों में प्रकाशित रिपोर्ट अपने आप में आरोपों का निर्णायक कानूनी प्रमाण नहीं हो सकती। अब याचिकाकर्ता को अपना जवाब दाखिल करना है और अदालत को यह तय करना है कि उपलब्ध रिकॉर्ड से क्या निष्कर्ष निकलता है। दूसरा बड़ा मुद्दा फॉर्म-6 को लेकर है, जिसका इस्तेमाल मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए किया जाता है। आयोग ने कहा है कि वैधानिक फॉर्म-6 में संशोधन नहीं किया गया। उसके मुताबिक, एसआईआर के दौरान मांगा गया अतिरिक्त घोषणा-पत्र अलग दस्तावेज है, जिसे मूल आवेदन-पत्र में संशोधन नहीं माना जाना चाहिए। हालांकि आयोग ने यह स्वीकार किया कि ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया की प्रस्तुति से फॉर्म-6 में बदलाव होने का आभास पैदा हो सकता था। इसके बाद 21 अक्टूबर से ऑनलाइन प्रक्रिया को फॉर्म-6 और अलग एसआईआर घोषणा-पत्र में विभाजित करने की व्यवस्था किए जाने की बात भी कही गई। यही वह बिंदु है जहां आयोग के पक्ष को संतुलित दृष्टि से देखना चाहिए। किसी प्रक्रिया को स्पष्ट करने के लिए उसमें सुधार करना प्रशासनिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। यदि ऑनलाइन व्यवस्था से भ्रम पैदा हुआ था, तो उसे अलग करना उपयोगी कदम हो सकता है। लेकिन इससे यह निष्कर्ष अपने आप नहीं निकलता कि हर विवाद समाप्त हो गया। असली कसौटी यह है कि व्यवस्था कानून के अनुरूप है या नहीं और पात्र मतदाताओं को किसी प्रकार की परेशानी तो नहीं हो रही। साथ ही आयोग ने मतदाता सूची के पुनरीक्षण पर भी अपना पक्ष रखा है। उसका कहना है कि जिन मतदाताओं का रिकॉर्ड पुरानी मतदाता सूचियों से नहीं मिल पाता, उनके घर जाकर बूथ स्तर के अधिकारी दस्तावेज एकत्र कर सकते हैं। ऐसे मतदाताओं को सामान्यतः सुनवाई के लिए बुलाने की जरूरत नहीं होगी और असाधारण मामलों में सुनवाई की जा सकती है। आयोग ने यह भी कहा है कि ECINet प्रणाली पर किसी मतदाता का नाम जोड़ने या हटाने के लिए संबंधित निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी का आदेश आवश्यक है। इसके अतिरिक्त, तकनीकी व्यवस्था की जांच के लिए आईआईटी और भारतीय विज्ञान संस्थान के विशेषज्ञों को शामिल करने वाली समिति का उल्लेख किया गया है। इन दलीलों से आयोग यह बताना चाहता है कि मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए निर्धारित प्रक्रियाएं और प्रशासनिक सुरक्षा उपाय मौजूद हैं। मतदाता सूची में मृत, स्थानांतरित या दोहरी प्रविष्टियों की पहचान करना आवश्यक है, लेकिन किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटना भी उतना ही गंभीर विषय है। अब बात ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व की। किसी मुख्य चुनाव आयुक्त की कार्यक्षमता का फैसला इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि विपक्ष उनके कामकाज से संतुष्ट है या नहीं। असली प्रश्न यह है कि क्या निर्णय कानून के अनुरूप लिए जा रहे हैं, क्या उनका रिकॉर्ड उपलब्ध है और क्या मतदाता के अधिकार सुरक्षित हैं। आयोग का हलफनामा इन सवालों का जवाब देने का एक औपचारिक प्रयास है। यदि उसके तर्क न्यायिक परीक्षण में सही साबित होते हैं, तो यह उसके संस्थागत पक्ष को मजबूती देगा। वहीं, यदि किसी निर्णय में कानूनी खामी पाई जाती है, तो उसे सुधारना भी उसी संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा है जिसकी रक्षा आयोग करता है। हम आपको यह भी बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही स्पष्ट किया था कि वह रिकॉर्ड की जांच करेगा और कानून के विपरीत पाए जाने वाले निर्णयों पर हस्तक्षेप कर सकता है। इसलिए इस मामले में न तो आयोग को अदालत से पहले क्लीन चिट दी जा सकती है और न ही केवल आरोपों के आधार पर उसे दोषी ठहराया जा सकता है। यही न्यायिक प्रक्रिया की खूबसूरती है। बहरहाल, चुनाव आयोग किसी राजनीतिक दल का प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है। उसकी आलोचना होनी चाहिए तो प्रमाणों के साथ और उसका बचाव होना चाहिए तो तथ्यों के आधार पर। ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखा है। अब याचिकाकर्ता का जवाब और अदालत की अगली सुनवाई इस विवाद की दिशा तय करेंगे। लोकतंत्र के हित में सबसे जरूरी यही है कि राजनीतिक शोर से ऊपर उठकर मतदाता के अधिकार, कानून की सर्वोच्चता और चुनाव आयोग की जवाबदेही को केंद्र में रखा जाए। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 27 Oct 2026 7:13 pm

‘समान नियम’ का मतलब ‘एक जैसे नियम’ नहीं, भारत की विधायी विविधता का सम्मान जरूरी: विजेंद्र गुप्ता

‘समान नियम’ का मतलब ‘एक जैसे नियम’ नहीं, भारत की विधायी विविधता का सम्मान जरूरी: विजेंद्र गुप्ता

समाचार नामा 27 Oct 2026 6:37 pm

इजरायल में 26वीं नेसेट के लिए मतदान, मतदाताओं ने शांति और लोकतंत्र पर जताया भरोसा

इजरायल में 26वीं नेसेट के लिए मतदान, मतदाताओं ने शांति और लोकतंत्र पर जताया भरोसा

समाचार नामा 27 Oct 2026 6:30 pm

मदन लाल खुराना की पुण्यतिथि पर भाजपा नेताओं ने दी श्रद्धांजलि, बताया 'दिल्ली का विकास पुरुष'

मदन लाल खुराना की पुण्यतिथि पर भाजपा नेताओं ने दी श्रद्धांजलि, बताया 'दिल्ली का विकास पुरुष'

समाचार नामा 27 Oct 2026 4:18 pm

31 प्रतिशत गिरा स्टर्लिंग टूल्स का मुनाफा

मुंबई, ऑटोमोटिव सेक्टर की कंपनी स्टर्लिंग टूल्स ने मंगलवार को वित्त वर्ष 27 की दूसरी तिमाही (जुलाई-अक्टूबर) के नतीजे जारी किए।

देशबन्धु 27 Oct 2026 4:00 pm

स्तरहीनता एवं विरोध की भाषा में उलझती कांग्रेस

लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष एक-दूसरे के विरोधी अवश्य होते हैं, लेकिन उनकी भाषा शत्रुता की नहीं, वैचारिक प्रतिस्पर्धा की होनी चाहिए। राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र की शक्ति हैं, पर जब ये मतभेद व्यक्तिगत कटाक्ष, पारिवारिक टिप्पणियों और अपमानजनक शब्दों में बदलने लगते हैं, तब राजनीति का स्तर गिरता है और लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा प्रभावित होती है। भारतीय राजनीति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति कांग्रेस के अनेक नेताओं की आक्रामक टिप्पणियों और अब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के पटना में दिए गए विवादास्पद बयान ने एक बार फिर भाषाई मर्यादा पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। 25 अक्टूबर 2026 को पटना में बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह की 139वीं जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में खड़गे की एक टिप्पणी राजनीतिक विवाद का कारण बन गई। कार्यक्रम में उपस्थित एक व्यक्ति की टिप्पणी के जवाब में उन्होंने कहा, “मोदी का बाप भी जाएगा।” इस बयान की भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने तीखी आलोचना की। दूसरी ओर, कांग्रेस ने इस टिप्पणी को वैचारिक संदर्भ में समझाने का प्रयास किया। समाचारों के अनुसार संबंधित व्यक्ति ने भी बाद में कहा कि उसकी पूरी बात नहीं सुनी गई थी। इस घटनाक्रम के विभिन्न पक्ष अपनी-अपनी व्याख्या प्रस्तुत कर रहे हैं, लेकिन विवाद से अलग एक बुनियादी प्रश्न अपनी जगह कायम है-क्या देश के सर्वोच्च राजनीतिक पद पर आसीन व्यक्ति के प्रति विरोध जताने का यही तरीका होना चाहिए? खड़गे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं और लंबे राजनीतिक अनुभव के साथ पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। ऐसे व्यक्ति से सार्वजनिक मंच पर अधिक संयम और विवेक की अपेक्षा स्वाभाविक है। राजनीतिक सभा में कोई प्रतिकूल टिप्पणी हो जाए, तो उसका उत्तर तर्क, तथ्य और आत्मविश्वास से दिया जा सकता है। लेकिन जब जवाब व्यक्तिगत संबंधों और परिवार तक पहुंच जाए, तब मुद्दे की गंभीरता पीछे छूट जाती है और शब्दों का विवाद मुख्य समाचार बन जाता है। राजनीति में शब्द केवल वक्ता की तत्काल प्रतिक्रिया नहीं होते, वे उसकी सार्वजनिक जिम्मेदारी और लोकतांत्रिक संस्कारों की भी परीक्षा लेते हैं। कांग्रेस की राजनीति में नरेंद्र मोदी को लेकर तीखे और विवादास्पद वक्तव्यों का इतिहास भी इस बहस को व्यापक संदर्भ देता है। वर्ष 2007 में सोनिया गांधी ने गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान मोदी के लिए ‘मौत का सौदागर’ शब्द का प्रयोग किया था। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में मणिशंकर अय्यर की ‘चायवाला’ संबंधी टिप्पणी ने भी बड़ा राजनीतिक विवाद पैदा किया। बाद के वर्षों में राहुल गांधी के ‘चौकीदार चोर है’ नारे ने राजनीतिक बहस को व्यक्तिगत आरोपों की दिशा में मोड़ा। इन बयानों के पीछे अपने-अपने राजनीतिक संदर्भ और वक्ताओं की दलीलें रही हैं, लेकिन इनका सार्वजनिक प्रभाव इस प्रश्न को सामने लाता है कि क्या किसी नेता की आलोचना उसके कामकाज तक सीमित रखी जा सकती है, अथवा उसे व्यक्तिगत उपहास का विषय बनाना आवश्यक समझा जाने लगा है? इसे भी पढ़ें: आत्मघाती कड़वाहट: हताशा में मर्यादा की लक्ष्मण रेखा भूली कांग्रेस प्रियंका गांधी सहित कांग्रेस के अन्य नेताओं ने भी मोदी और उनकी सरकार के विरुद्ध कई अवसरों पर तीखे राजनीतिक हमले किए हैं। यह ध्यान रखना जरूरी है कि तीखी आलोचना अपने आप में अमर्यादित नहीं होती। सरकार की नीतियों, बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक सद्भाव, लोकतांत्रिक संस्थाओं और प्रशासनिक निर्णयों पर कठोर सवाल उठाना विपक्ष का संवैधानिक दायित्व है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब नीतिगत असहमति को व्यक्तिगत अपमान से जोड़ दिया जाता है और तर्क के स्थान पर कटाक्ष को राजनीतिक प्रभाव का माध्यम बनाया जाने लगता है। किसी नेता के प्रत्येक बयान को एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं, लेकिन बार-बार होने वाले विवादों से राजनीतिक भाषा के स्तर पर विचार करने की आवश्यकता अवश्य पैदा होती है। यहां कांग्रेस के सामने एक बड़ी चुनौती है। विपक्ष के रूप में उसकी सार्थकता इस बात से तय होगी कि वह जनता के जीवन से जुड़े प्रश्नों पर कितना प्रभावी विमर्श खड़ा करती है। किसानों की समस्याएं, युवाओं के रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक असमानता और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर ठोस विकल्प प्रस्तुत करना उसकी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। यदि सार्वजनिक चर्चा बार-बार प्रधानमंत्री पर व्यक्तिगत टिप्पणियों तक सिमट जाती है, तो नीतिगत बहस पीछे छूटने का खतरा रहता है। इससे विपक्ष की आलोचना का वास्तविक आधार भी कमजोर पड़ सकता है। राजनीतिक विमर्श में मुद्दों की जगह व्यक्तियों को केंद्र में रख देने से लोकतंत्र को अपेक्षित लाभ नहीं मिलता। दूसरी ओर नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व और उनकी वैश्विक सक्रियता भारतीय राजनीति के महत्वपूर्ण पहलू हैं। प्रधानमंत्री के रूप में उनकी विदेश यात्राएं, विभिन्न देशों के नेतृत्व के साथ संवाद, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की भागीदारी और आर्थिक एवं रणनीतिक साझेदारियों को आगे बढ़ाने के प्रयास देश की वैश्विक भूमिका से जुड़े हैं। उनके समर्थक इन गतिविधियों को भारत की प्रतिष्ठा और प्रभाव में वृद्धि के रूप में देखते हैं। साथ ही, किसी भी प्रधानमंत्री के कार्यकाल का निष्पक्ष आकलन केवल अंतरराष्ट्रीय छवि से नहीं, बल्कि घरेलू नीतियों, आर्थिक परिणामों, सामाजिक समावेशन और शासन के रिकॉर्ड से भी किया जाना चाहिए। लोकतंत्र की सुंदरता इसी में है कि नेतृत्व की उपलब्धियों का सम्मान हो और उसके निर्णयों की आलोचनात्मक समीक्षा भी संभव बनी रहे। यह भी विचारणीय है कि किसी नेता के विरुद्ध जितनी अधिक व्यक्तिगत और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल होता है, उतना ही उसके समर्थकों में प्रतिक्रिया की भावना पैदा हो सकती है। नरेंद्र मोदी के संदर्भ में कांग्रेस की आलोचना का राजनीतिक असर हमेशा एक जैसा रहा हो, ऐसा निष्कर्ष निकालना तथ्यों से परे होगा। चुनावी परिणाम अनेक कारणों से प्रभावित होते हैं-नेतृत्व, संगठन, स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवार, गठबंधन और मतदाताओं की अपेक्षाएं। फिर भी, यह एक महत्वपूर्ण राजनीतिक जोखिम है कि यदि विपक्ष अपनी आलोचना को प्रमाण और नीतिगत विकल्पों के बजाय व्यक्तिगत टिप्पणियों पर आधारित करता है, तो वह अपनी बात जनता तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने का अवसर खो सकता है। इसके विपरीत भाजपा को भी केवल विरोधियों के विवादास्पद बयानों पर प्रतिक्रिया देने के बजाय अपने कामकाज और नीतियों के आधार पर जनता के सामने जवाबदेह रहना चाहिए। राजनीति की भाषा समाज के व्यवहार को प्रभावित करती है। जब शीर्ष नेता सार्वजनिक मंचों पर संयम खोते हैं, तब उनके समर्थकों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच भी कटुता बढ़ने की आशंका रहती है। सोशल मीडिया इस प्रवृत्ति को और तेज कर देता है, जहां किसी बयान का छोटा-सा अंश पूरे विमर्श पर हावी हो सकता है। इसलिए नेताओं को बोलने से पहले शब्दों के सामाजिक प्रभाव और पद की गरिमा पर विचार करना चाहिए। राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को अपमानित करना और उसके तर्क को पराजित करना दो अलग बातें हैं, लोकतंत्र में दूसरी बात अधिक महत्वपूर्ण है। अंततः कांग्रेस हो या भाजपा, किसी भी दल की वास्तविक राजनीतिक शक्ति उसकी भाषा की आक्रामकता से नहीं, बल्कि उसके विचारों, नीतियों, जनसेवा और जनता के विश्वास से निर्धारित होनी चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी की आलोचना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन आलोचना तथ्यों और तर्कों पर आधारित होनी चाहिए। इसी प्रकार कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे हों या सत्तापक्ष के अन्य नेता सभी से अपेक्षा है कि वे असहमति को अपमान में न बदलें। राजनीति में शब्दों की मर्यादा कोई औपचारिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा है। सत्ता बदलेगी, नेता बदलेंगे और दलों की स्थितियां बदलेंगी, लेकिन सार्वजनिक जीवन में बोले गए शब्द लंबे समय तक समाज की स्मृति में रहते हैं। इसलिए राजनीति को कटुता की नहीं, संवाद की भाषा चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र में विचारों की विजय होनी चाहिए, व्यक्तिगत अपमान की नहीं। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

प्रभासाक्षी 27 Oct 2026 2:46 pm

माओवादी आ-तंक समाप्त: मोदी सरकार में कितना बदला बस्तर?

अक्सर कुछ लोग कहते मिल जाते हैं कि भाजपा और मोदी सरकार में क्या ही बदला है? ये इतना सामान्यीकरण करने वाला प्रश्न है। जो किसी के गले नहीं उतरता है। कहीं और की बात न करें केवल छत्तीसगढ़ और बस्तर को ही देखें तो हमें पूरी तस्वीर ही अलग दिखाई देती है। भाजपा सरकार ने तय समय पर 31मार्च 2026 को छत्तीसगढ़ समेत देश को सशस्त्र माओवादी आ-तंक से मुक्त कर दिया। बस्तर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर गृहमंत्री अमित शाह और अब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का पहुंचना। ये कोई सामान्य बात नहीं है। ये इतिहास की वो लकीर है। जो राष्ट्र की आंतरिक सुरक्षा और समृद्धि की संघर्षमय-प्रतिबद्धता की कहानी कहती है। 2024 में जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ये ऐलान किया था। उस समय लोग विश्वास नहीं कर रहे थे। 'विरोध के लिए विरोध करने वाले' धड़े, उपहास उड़ा रहे थे। किन्तु जब तय समय सीमा में देश से माओवादी आ-तंक ( नक्सलवाद) समाप्त हो गया तो विरोध करने वाले उपहास का पात्र बनकर रह गए। हालांकि 'अर्बन नक्सली' और उन्हीं के र-क्तबीज 'दिमागी नक्सली' आज भी बस्तर में आंखें गड़ाए बैठे हैं। किन्तु वो अब कभी भी सफल नहीं हो पाएंगे। क्योंकि पूरा समाज जाग चुका है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार 23 अक्टूबर 2026 को बस्तर में राष्ट्रपति का जाना हुआ है। सैकड़ों साल पुरानी 'मुरिया दरबार' परंपरा और वहां की कई परंपराओं से राष्ट्रपति का साक्षात्कार होना ।हमारी सांस्कृतिक अन्तश्चेतना का प्रतिबिम्ब है। ये कोई सामान्य बात नहीं है। यह उस संकल्प की परिणति है। जो संकल्प—बस्तर की ख़ुशहाली के लिए प्रतिबद्ध है। इसे भी पढ़ें: Bastar से Naxalism का खात्मा: Union Home Minister Amit Shah ने उजागर किया पांच दशकों के आतंक का सच बस्तर में यही लोकतन्त्र का उदय है। जहां अब लोग निर्भय होकर जीवन जी रहे हैं। राष्ट्रप्रमुख उनके बीच पहुंच रहे हैं। जबकि इसके पहले 'अर्बन नक्सलियों' की कमांड से संचालित होने वाले सशस्त्र माओवादी — वहां हिं-सा, रक्त'-पात का वीभत्स खेल, रचते थे। 'जनताना' सरकार के नाम पर भारत के लोकतन्त्र और संविधान को चुनौती देते थे। इन्हें किस विचार और पूर्ववर्ती सरकार का घोषित-अघोषित समर्थन प्राप्त था? क्या ये किसी से छिपा है? लेकिन अब नक्सली नेस्तनाबूद हो चुके हैं। जिन माओवादियों ने सरेंडर किया है। उनके पुनर्वास के कार्यक्रम चल रहे हैं। उनको कौशल सम्पन्न बनाया जा रहा है। मुख्य धारा से जोड़ा जा रहा है। ये केंद्र की मोदी और राज्य की साय सरकार ने ही कर दिखाया है। आप इनकी और मुद्दों पर आलोचना कर सकते हैं। लेकिन माओवादी आ-तंक को समाप्त करने का जो साहसिक कार्य भाजपा सरकार ने किया है। वो 'न भूतो न भविष्यति' जैसा ही है। अब बस्तर में - बस्तर पंडुम हो रहा है, बस्तर ओलंपिक हो रहा है। पर्यटन का विस्तार हो रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सड़कों का नया जाल बुना जा रहा है। भारत की राष्ट्रपति के तौर पर द्रौपदी मुर्मु का बस्तर पहुंचना भी कोई सामान्य बात नहीं है। उनका राष्ट्रपति बनना भी कोई साधारण बात नहीं थी। ये भी ध्यान रखना चाहिए कि- जनजातीय समाज से आने वाली बेटी 'द्रौपदी मुर्मु' को भाजपा ने सर्वोच्च पद राष्ट्रपति की आसंदी तक पहुंचाया है। जबकि कांग्रेस नेतृत्व वाले इंडी गठबंधन ने- जनजातीय समाज की इसी बेटी के ख़िलाफ़ अपना उम्मीदवार उतारा था। वो किसी भी स्थिति में जनजातीय समाज से आने वाली बेटी को राष्ट्रपति नहीं बनने देना चाहते थे। भला, कांग्रेस और इंडी गठबंधन को जनजातीय समाज के विरोध में आने से क्या हासिल हुआ? क्या ये कॉलोनियल माइंडसेट नहीं था, जो जनजातीय समाज को कभी भी स्वीकार नहीं करना चाहता है? वहीं गाहे-बगाहे कुछ लोग भारत के लोकतन्त्र को नसीहतें देते रहते हैं। उपनिवेश की मानसिकता के गुलाम आज भी कहते हैं कि —“15 अगस्त 1947 के बाद ही भारत में लोकतन्त्र आया।” ऐसे में उन्हें बस्तर के 'मुरिया दरबार' को जानना चाहिए। जहां सैकड़ों सालों से लोकतन्त्र और जन-संवाद का अद्भुत उदाहरण मिलता है। सैकड़ों गांवों के मांझी, चालकी और प्रतिनिधि 'मुरिया दरबार' में अपनी बातें रखते थे। क्षेत्र से जुड़े मुद्दों पर गहन, चिंतन और विमर्श करने की परंपरा निर्बाध रूप से जारी है। जहां पूरा समाज एक-दूसरे का पूरक है। भारत के कोने-कोने में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं। अंतर केवल इतना है कि भारत ने लोकतन्त्र शब्द का झुनझुना नहीं बजाया बल्कि लोकतन्त्र को जीवन में उतारा है। इसे शराब और ऐय्याशी में डूबे एसी कमरों में बैठने वाले तथाकथित अकादमिक जल्लाद और गल्पकार ( इतिहासकार) नहीं समझ सकते हैं। ये भी ध्यान में रखना चाहिए कि वो लोग जो हमारे जनजातीय बांधवों को अपने चश्मे से दिखाते हैं। बताते हैं कि 'आदिवासी हिन्दू नहीं हैं।' वो 75 दिनों तक चलने वाले बस्तर दशहरे को देखें। हमारा जनजातीय समाज ही बस्तर दशहरे का मुख्य कर्ताधर्ता है। पारंपरिक रीति-रिवाजों, मान्यताओं का जितना कड़ाई से जनजातीय समाज पालन करता है। उसका हम आप सहस्त्रांश नहीं कर पाते। यही हिन्दुत्व का विराट स्वरूप है। ये जो जात-पात, वाद आदि के ज़हर से समाज को तोड़ने की साज़िश करते रहते हैं। वो ज़रा! पूरे बस्तर दशहरा में एक कोई प्रकरण ढूंढ़ कर ला दें। जब पूरे बस्तर दशहरे के आयोजन के बीच कहीं कोई भेदभाव होता हो। यहां हर समाज के लोग बस आस्था और परंपरा के रंगों में डूबे मिलते हैं। प्रसन्नता के साथ धार्मिक अनुष्ठानों को पूरा करते मिलते हैं। कहने का आशय ये है कि —अब बस्तर में बारूद की गंध नहीं है। अब बस्तर में प्रकृति, संस्कृति, परिवर्तन और विकास की नई चेतना हिलोरें ले रही है। ये इसीलिए संभव हो पाया है क्योंकि देश की जनता ने प्रधानमंत्री के तौर पर नरेन्द्र मोदी को दिल्ली में चुनकर भेजा है। जो 'विकास और विरासत' को एक साथ लेकर चलने के लिए संकल्पबद्ध है। आप सोचिए कि —अगर केंद्र और राज्य में भाजपा सरकार नहीं होती तो क्या देश से माओवादी आ-तंक समाप्त हो पाता ? क्या धारा-370 ख़त्म हो पाती? बस्तर में हम जो दृश्य देख पा रहे हैं क्या वो कभी दिख पाते ? ज़रा ! इन सवालों के ज़वाब ख़ुद से एक बारगी ज़रूर पूछिएगा ! — कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल (साहित्यकार, स्तंभकार एवं पत्रकार)

प्रभासाक्षी 27 Oct 2026 12:57 pm

'पंजाब में माइनिंग माफिया का 2000 करोड़ का कच्चा-चिट्ठा बेनकाब', मजीठिया नेता ने आम आदमी पार्टी पर लगाए आरोप

'पंजाब में माइनिंग माफिया का 2000 करोड़ का कच्चा-चिट्ठा बेनकाब', मजीठिया नेता ने आम आदमी पार्टी पर लगाए आरोप

समाचार नामा 27 Oct 2026 12:03 pm

कमजोर वैश्विक संकेतों के चलते लाल निशान में खुला बाजार

मुंबई, हफ्ते के दूसरे कारोबारी दिन मंगलवार को भारतीय शेयर बाजार ने सुस्त शुरुआत की। यह लगातार छठा दिन है जब बाजार में गिरावट दर्ज की गई है, वहीं इस हफ्ते का गिरावट का यह लगातार दूसरा दिन है। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव के चलते बाजार में सतर्कता का माहौल बना हुआ है।

देशबन्धु 27 Oct 2026 10:50 am

यूपी : विधान परिषद की 11 सीटों पर मतगणना शुरू, भाजपा-सपा के बीच सियासी मुकाबले पर नजर

यूपी : विधान परिषद की 11 सीटों पर मतगणना शुरू, भाजपा-सपा के बीच सियासी मुकाबले पर नजर

समाचार नामा 27 Oct 2026 8:31 am

क्रांतिकारी जतींद्रनाथ दास की जयंती पर भजनलाल शर्मा और सम्राट चौधरी समेत कई नेताओं ने दी श्रद्धांजलि

क्रांतिकारी जतींद्रनाथ दास की जयंती पर भजनलाल शर्मा और सम्राट चौधरी समेत कई नेताओं ने दी श्रद्धांजलि

समाचार नामा 27 Oct 2026 8:26 am

आगरा एमएलसी चुनाव में चूक पर कार्रवाई, चुनाव आयोग ने छह अधिकारियों के निलंबन के दिए आदेश

आगरा एमएलसी चुनाव में चूक पर कार्रवाई, चुनाव आयोग ने छह अधिकारियों के निलंबन के दिए आदेश

समाचार नामा 26 Oct 2026 10:35 pm

ईवीएम और एसआईआर पर विपक्ष को भाजपा का जवाब, आरपी सिंह बोले- हार की खीझ में उठा रहे सवाल

ईवीएम और एसआईआर पर विपक्ष को भाजपा का जवाब, आरपी सिंह बोले- हार की खीझ में उठा रहे सवाल

समाचार नामा 26 Oct 2026 10:34 pm

'ड्रग सर्वे रिपोर्ट सार्वजनिक करे पंजाब सरकार', भाजपा नेता सुनील जाखड़ की चुनौती

'ड्रग सर्वे रिपोर्ट सार्वजनिक करे पंजाब सरकार', भाजपा नेता सुनील जाखड़ की चुनौती

समाचार नामा 26 Oct 2026 10:31 pm

लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन निजी हमले स्वीकार्य नहीं : रोहन गुप्ता

लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन निजी हमले स्वीकार्य नहीं : रोहन गुप्ता

समाचार नामा 26 Oct 2026 8:18 pm

सऊदी में फंसे हज और उमरा यात्रियों को सरकार अपने खर्च पर वापस लाए : नसीम सिद्दीकी

सऊदी में फंसे हज और उमरा यात्रियों को सरकार अपने खर्च पर वापस लाए : नसीम सिद्दीकी

समाचार नामा 26 Oct 2026 7:33 pm

मल्लिकार्जुन खड़गे के बचाव में उतरे प्रियांक खड़गे, बोले- भाजपा चुनिंदा मुद्दों को लेकर राजनीति कर रही है

मल्लिकार्जुन खड़गे के बचाव में उतरे प्रियांक खड़गे, बोले- भाजपा चुनिंदा मुद्दों को लेकर राजनीति कर रही है

समाचार नामा 26 Oct 2026 6:37 pm

तमिलनाडु: कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर 31 अक्टूबर को प्रदर्शन करेगी डीएमके महिला विंग

तमिलनाडु: कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर 31 अक्टूबर को प्रदर्शन करेगी डीएमके महिला विंग

समाचार नामा 26 Oct 2026 6:27 pm

Chai Par Sameeksha: Rahul Gandhi Vietnam Visit और भारत में चल रहे प्रदर्शनों का क्या कनेक्शन है?

प्रभासक्षी के साप्ताहिक कार्यक्रम चाय पर समीक्षा में इस सप्ताह हमने प्रदर्शनों को लेकर चर्चा की। हमेशा की तरह इस कार्यक्रम में मौजूद रहे प्रभासाक्षी के संपादक नीरज कुमार दुबे। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि 13 देशों में लगातार प्रदर्शनों का दौर है और इन सभी देशों में एक कुछ खास संगठन के लोग ही इन प्रदर्शनों को संचालित कर रहे हैं। नेपाल और बांग्लादेश में इन्हें सफलता मिली जिसके बाद से इनका हौसला बढ़ा हुआ है और यह लगातार उन देशों को टारगेट कर रहे हैं जो तेजी से तरक्की कर रहे हैं। नीरज दुबे ने साफ तौर पर कहा कि ज्यादातर देशों में हमने देखा कि विद्यार्थियों के प्रदर्शन से इस तरह की चीज शुरू होती है जो लगातार अलग-अलग मुद्दों पर बढ़ती जा रही है और फिर सत्ता परिवर्तन होता है। नीरज दुबे ने साफ तौर पर कहा कि जो तार सभी प्रदर्शनों से मिलते हुए नजर आ रहे हैं उस पर मंथन करने की जरूरत है। जिस तरह की कोर्ट में टिप्पणियां की जा रही है, उस पर भी गौर करने की जरूरत है। नीरज दुबे ने यह भी कहा कि इस देश में पहले शुरू हुआ, किस देश में बाद में शुरू हुआ यह चर्चा का विषय नहीं है। चर्चा इस बात पर होनी चाहिए कि यह आंदोलन शुरू कैसे हुए और जहां इस पर गौर करेंगे वही आपको पता चल जाएगा कि आखिर प्रदर्शनकारियों के मकसद क्या है। उन्होंने कहा कि हमारी दिल्ली पुलिस, हमारे सुरक्षा बलों ने धैर्य और संयम रखा जिसका नतीजा हम सब देख रहे हैं। विश्व के कई देशों में आगजनी जैसा माहौल है लेकिन भारत में जोर-जोर से दुर्गा पूजा मनाया गया और अब दिवाली की तैयारी चल रही है। इसे भी पढ़ें: PM Modi पर बयान के बाद देशभर में BJP का विरोध, Rahul Gandhi और Kharge से माफी की मांग की राहुल गांधी पर बोलते हुए नीरज दुबे ने साफ तौर पर कहा कि हाल के दिनों में वह चौथी बार वियतनाम गए हैं। उन्होंने कहा कि निजी जीवन सबका होता है लेकिन जब आप सार्वजनिक जीवन में है और आप नेता प्रतिपक्ष हैं तब आपको देश को बताना चाहिए कि आप कहां जा रहे हैं। आपका मकसद क्या है। उन्होंने कहा कि सरकार के पास बहुत सारी चीजें जानकारी में रहती हैं लेकिन आपकी जानकारी को सरकार सार्वजनिक नहीं कर सकती है। लेकिन आप एलओपी हैं, ऐसे में आपको अगर एक ही देश का दौरा बार-बार करना पड़ रहा है तो आप उसे देशवासियों को बता सकते हैं। नीरज दुबे ने कहा कि जब आपको देश में दुर्गा पूजा उत्सव और विजयदशमी में शामिल होना चाहिए था तब आप विदेश चले गए। इसके अलावा अब जब व्यापारियों के लिए बिजनेस का माहौल आ रहा है तब आप रामलीला मैदान में आंदोलन करने की तैयारी कर रहे हैं। ऐसे में व्यापारी को नुकसान हो रहा है। इंडिया ब्लॉक के ऑनलाइन मीटिंग कैंसिल होने पर नीरज दुबे ने कहा कि आप दिल्ली में इतने बड़े रैली का कॉल दे चुके हैं लेकिन आप खुद विदेश चले गए। त्यौहार का मौसम है और आप जिन नेताओं पर लोगों को लाने के लिए कह रहे हैं उनके ऊपर भी प्रेशर है और ऐसे में वह लोग कहां से लाएं यह बड़ी चुनौती रहने वाली है। क्योंकि त्योहारों का मौसम है और रैली के लिए लोग इतनी दूर घर छोड़कर कैसे आएंगे। यह बड़ा सवाल है। यही कारण है कि इंडिया ब्लॉक को अपनी ऑनलाइन मीटिंग कैंसिल करनी पड़ी। उत्तर प्रदेश में सीट बंटवारे का पेंच भी फंसा हुआ है। इस पर नीरज दुबे ने साफ तौर पर कहा कि दोनों दल एक दूसरे के साथ लड़ना तो चाहते हैं। लेकिन एक दूसरे को किस तरीके से कमजोर किया जाए इसकी भी कोशिश जारी है।

प्रभासाक्षी 26 Oct 2026 5:37 pm

कर्नाटक भाजपा ने पीएम मोदी के पिता पर खड़गे की टिप्पणी के विरोध में प्रदर्शन किया, माफी की मांग की

कर्नाटक भाजपा ने पीएम मोदी के पिता पर खड़गे की टिप्पणी के विरोध में प्रदर्शन किया, माफी की मांग की

समाचार नामा 26 Oct 2026 4:43 pm

खड़गे की टिप्पणी पर आर. अशोक का पलटवार, बोले- यह कांग्रेस की हताशा का प्रतीक

खड़गे की टिप्पणी पर आर. अशोक का पलटवार, बोले- यह कांग्रेस की हताशा का प्रतीक

समाचार नामा 26 Oct 2026 4:39 pm

पंजाब में कानून-व्यवस्था ध्वस्त, खुलेआम हो रही हत्याएं और लूटपाट: वीरेंद्र सचदेवा

पंजाब में कानून-व्यवस्था ध्वस्त, खुलेआम हो रही हत्याएं और लूटपाट: वीरेंद्र सचदेवा

समाचार नामा 26 Oct 2026 4:36 pm

ब्रह्माकुमारीज संस्था के 'नशा-मुक्त भारत' अभियान को पूरा समर्थन देगी सरकारः नितिन नवीन

ब्रह्माकुमारीज संस्था के 'नशा-मुक्त भारत' अभियान को पूरा समर्थन देगी सरकारः नितिन नवीन

समाचार नामा 26 Oct 2026 2:27 pm

मल्लिकार्जुन खड़गे को अपने बयान के लिए माफी मांगनी चाहिए : दानिश अंसारी

मल्लिकार्जुन खड़गे को अपने बयान के लिए माफी मांगनी चाहिए : दानिश अंसारी

समाचार नामा 26 Oct 2026 2:23 pm

फारूक अब्दुल्ला पर भाजपा नेता ने बोला हमला, कहा- 'पाकिस्तान से इतना प्रेम है तो वहीं चले जाएं'

फारूक अब्दुल्ला पर भाजपा नेता ने बोला हमला, कहा- 'पाकिस्तान से इतना प्रेम है तो वहीं चले जाएं'

समाचार नामा 26 Oct 2026 2:10 pm

मोदी का नाम लेकर 193 देशों के सामने ट्रंप की बेइज्जती करने वाले ने कैसे ब्राजील में पलट दी बाजी, लैटिन अमेरिका की राजनीति पर क्या पड़ेगा इस जीत का असर?

लैटिन अमेरिका के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश ब्राजील में जहां राष्ट्रपति चुनाव के बेहद कांटे के मुकाबले में मौजूदा राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा ने ऐतिहासिक जीत दर्ज कर ली है। लेकिन इस जीत के साथ ही ब्राजील में एक सियासी बवंडर भी शुरू हो गया है। पूर्व राष्ट्रपति जायर बोलसुनारो के बेटे और विपक्षी उम्मीदवार फ्लेवियो बोलसुनारो ने नतीजों को मानने से साफ इंकार कर दिया है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और चुनाव प्रक्रिया पर सीधे तौर पर धांधली और नियमों से छेड़छाड़ का गंभीर आरोप लगाते हुए चुनावों को रद्द करने की मांग कर दी है। पहले राउंड में पिछड़े फिर पलटीबाजी और अब ऐसी जीत की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की दक्षिणपंथी राजनीति के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया। ब्राजील में 80 साल के लुईस इनासियो लूला दा सिल्वा ने राष्ट्रपति चुनाव जीतकर इतिहास रच दिया। उन्होंने फ्लावियो बोलसनारो को हराकर चौथी बार राष्ट्रपति पद हासिल किया है। लेकिन इस जीत की सबसे बड़ी बात सिर्फ इतनी नहीं कि लूला फिर सत्ता में लौटे हैं। असली कहानी है उनकी चुनावी वापसी। ब्राजील की संप्रभुता और अमेरिका के साथ रिश्तों का भविष्य। क्योंकि लूला खुले तौर पर ट्रंप की कई नीतियों की आलोचना करते रहे हैं। वहीं उनके प्रतिद्वंदी फ्लावियो बालसुनारो दक्षिणपंथी नेता और पूर्व राष्ट्रपति जार बोलसुनारो के बेटे हैं। ऐसे में लूला की जीत को ट्रंप की राजनीति के लिए झटके के तौर पर देखा जा रहा है। लेकिन क्या यह वाकई ट्रंप की हार है? क्या ब्राजील ने अमेरिका को साफ संदेश दे दिया है? कि वो किसी के दबाव में नहीं आएगा और पहले दौर में पीछे रहने के बाद लूला ने आखिर में जो है बाजी कैसे पलट दी। इसने ट्रंप के घमंड और दादागिरी को कैसे चूरचूर कर डाला और लूला का चौथी बार ब्राजील का राष्ट्रपति बनना लैटिन अमेरिका की राजनीति पर कैसा संभावित असर डालने वाला है। कैसे लूला ने सेंकेड राउंड में पलट दी बाजी ब्राजील के राष्ट्रपति चुनाव का पहला दौर लूला के लिए चुनौती लेकर आया था। दक्षिणपंथी सेनेटर फ्लावियो बोलसनारो पहले दौर में आगे रहे जबकि लूला दूसरे स्थान पर थे। ऐसा लग रहा था कि ब्राजील में सत्ता का समीकरण बदल सकता है। लेकिन दूसरे दौर में तस्वीर पलट गई। ब्राजील के सुपीरियर इलेक्टोरल कोर्ट यानी टीएसई की तरफ से जारी आधिकारिक नतीजों के मुताबिक वोटों की गिनती पूरी हो चुकी है। अगर नतीजों के आंकड़ों पर नजर डालें तो सत्ताधारी वर्कर्स पार्टी के नेता लूला डसिलवा को 51.78% वैध वोट मिले हैं। वहीं लिबरल पार्टी के उम्मीदवार फ्लेवियो को 48.23% वोट हासिल हुए हैं। यानी कि जीत और हार का अंतर महज 3.5% का है। यह अंतर दिखाता है कि ब्राजील की जनता वैचारिक रूप से दो फाड़ हो चुकी है और मुकाबला आखिरी वोट तक कितना करीबी था। इस चुनाव की सबसे दिलचस्प बात यह रही कि पहले दौर में लूला दसिलवा पीछे चल रहे थे। 4 अक्टूबर को हुए पहले राउंड के मतदान में फ्लेवियो बोलसनारो 47.03% वोटों के साथ बढ़त बनाए हुए थे। जबकि लूला को 45% 16% वोट मिले थे। उस वक्त ऐसा लग रहा था कि दक्षिणपंथी लहर लूला की सत्ता को उखाड़ फेंकेगी। लेकिन इसके बाद लैटिन अमेरिका में तीन हफ्तों तक चला आक्रामक चुनाव प्रचार। लूला ने अपने मजदूर वर्ग के जनाधार पूर्वोत्तर के गढ़ और आम जनता के बीच जमीन नापी। दूसरे दौर यानी रन ऑफ में शानदार वापसी करते हुए लूला ने बाजी पलट दी। इसे भी पढ़ें: ट्रंप के मुखर आलोचक Lula Da Silva ब्राजील में फिर जीते; 44 लाख वोटों से Flavio Bolsonaro हारे, चुनाव नतीजे रद्द करने की मांग की नतीजों पर प्रतिद्वंद्वी बोलसनारो ने क्या कहा अब बात करते हैं उस विवाद की जिसने ब्राजील को एक बार फिर राजनीतिक अस्थिरता के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। हार के बाद ब्राज़लिया से फ्लेवियो बोलसनारो ने तीखा बयान जारी करते हुए कहा कि जिन परिस्थितियों में यह सब हुआ उसके बाद नतीजों को स्वीकार करना असंभव है। हम कानूनी कारवाई करेंगे और चुनाव को रद्द करने की मांग करेंगे। रविवार की दोपहर क्रिस्टियानो जानी ने मतदान केंद्रों को 2 घंटे अतिरिक्त खुला रखने का आदेश दे दिया। फ्लेवियो बल्सनारो का आरोप है कि जस्टिस जानिन को लूला ने ही सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किया था और वह पहले लूला के निजी वकील रह चुके हैं। एंड वक्त पर वोटिंग का समय बढ़ाकर सुप्रीम कोर्ट ने खेल के नियम बदल दिए जिससे लूला को फायदा पहुंचाया गया है। हालांकि इस पूरे विवाद पर एक पेच यह भी है कि खुद बालसुनारो के कैंप ने भी खराब मौसम के चलते कुछ राज्यों में समय बढ़ाने की मांग की थी। इलेक्ट्रोरल कोर्ट के चीफ कांसियो नून्स मारकेस ने दोनों उम्मीदवारों से बात की और लूला की जीत की औपचारिक पुष्टि कर दी। दिलचस्प बात यह भी है कि मार्केस को पूर्व राष्ट्रपति जायर व्सेसारो के कार्यकाल में नियुक्त किया गया था। मार्केस ने साफ किया कि आखिरी पलों में समय बढ़ाने के फैसले से काउंटिंग पर असर जरूर पड़ा है। लेकिन अंतिम नतीजों में कोई बाहरी दखल नहीं था और चुनाव निष्पक्ष रहा है। लेकिन दुनिया की चिंताएं इसलिए बढ़ गई है क्योंकि यह पूरा घटनाक्रम साल 2022 के चुनाव की याद दिलाता है। उस समय जाहिर बोलसुनारो ने भी लूला से मिली करीबी हार को स्वीकार नहीं किया था। जिसके बाद उनके समर्थकों ने संसद और सरकारी इमारतों पर धावा बोल दिया था। इसे भी पढ़ें: ''White House ऐसा लगता है जैसे Saddam Hussein ने Cheesecake Factory खोल ली हो'', Obama के तंज पर बुरी तरह भड़के Trump लूला की वापसी और वाशिंगटन के लिए संदेश यह जीत 80 वर्षीय लूला की एक और राजनीतिक वापसी है। उन्हें 2018 से 2019 के बीच भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल हुई थी, लेकिन बाद में ये आरोप खारिज कर दिए गए। 2022 में जायर बोल्सोनारो को हराकर वे फिर से सत्ता में लौटे। लूला की यह जीत ऐसे समय में हुई है, जब लैटिन अमेरिका के कुछ हिस्सों में दक्षिणपंथी सरकारों की ओर झुकाव बढ़ रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान, उन्होंने बोल्सोनारो के खेमे पर ब्राजील की संप्रभुता के लिए खतरा पैदा करने का आरोप लगाया। साथ ही, उन्होंने ऐसी नीतियों के खिलाफ चेतावनी दी जो सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों को कमजोर कर सकती हैं, और गरीबी कम करने तथा पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में हुई प्रगति को उलट सकती हैं। यह नतीजा ट्रम्प के लिए एक झटका है, जिनके प्रशासन ने बोल्सोनारो परिवार को फिर से सत्ता में लाने की कोशिशों का समर्थन किया था। लूला का लगातार नेतृत्व इस क्षेत्र में वाशिंगटन के प्रभाव को संतुलित करने का काम कर सकता है। लूला के कार्यकाल में विदेश मंत्री रहे सेल्सो अमोरिम ने रॉयटर्स को बताया कि लैटिन अमेरिका में संतुलन बनाए रखने में ब्राज़ील के राष्ट्रपति की भूमिका अहम होगी। इसे भी पढ़ें: Iran ने कहा America के साथ कूटनीति के रास्ते खुले, मध्यस्थों से भेजे जा रहे संदेश इस जीत ने कैसे ट्रंप को हरा दिया? लूला डसिलवा वही शख्सियत हैं जिन्होंने ना सिर्फ डोनाल्ड ट्रंप को उंगलियां दिखाई, तेवर दिखाया और यह भी जता दिया कि ब्राजील जो है अमेरिका का कोई गुलाम बनने वाला देश नहीं है। उसके प्रभाव से जो है मुक्त रहने वाला देश है। उसने साफ-साफ कह दिया था कि अगर हमारे ऊपर किसी भी तरह से व्यापारिक दबाव बढ़ाने की कोशिश की जाती है तो हमारे पास और भी बहुत सारे रास्ते खुले हुए हैं। डोनाल्ड ट्रंप को यह बातें जो है अपने ईगो से ज्यादा बड़ी दिखाई दी। उनका ईगो कहीं ना कहीं इससे हर्ट होता हुआ दिखाई दिया था। ऐसी अपेक्षाएं रही होंगी उनको कि लूरा डसिलवा जो है सत्ता से अब बेदखल हो जाए। लेकिन इस चुनाव ने कहीं ना कहीं उनकी उम्मीदों पर पानी फेर कर रख दिया है। कंजेर्वेटिव कांग्रेस लूला के लिए पेश कर रही है चुनौती अपनी जीत के बावजूद, लूला को अपने चौथे कार्यकाल के दौरान बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ब्राज़ील ने 1980 के दशक में लोकतंत्र की बहाली के बाद से अपनी सबसे रूढ़िवादी कांग्रेस चुनी है, जहाँ बोल्सोनारो की लिबरल पार्टी और उसके सहयोगियों का दोनों सदनों में गहरा प्रभाव रहने की उम्मीद है। यह राजनीतिक संतुलन लूला के लिए नए कानून पारित कराने और बजट संबंधी निर्णयों पर नियंत्रण बनाए रखने में मुश्किलें खड़ी कर सकता है। आर्थिक दबाव भी एक और बड़ी चिंता का विषय है। सरकार ने अगले वर्ष 2.3% की आर्थिक वृद्धि का अनुमान लगाया है, जबकि सार्वजनिक ऋण बढ़कर सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 82% से अधिक हो गया है। ऊँची ब्याज दरें, घरेलू कर्ज़ और सरकारी खर्च को नियंत्रित करने का दबाव प्रशासन पर भारी पड़ने के आसार हैं। इसलिए लूला को सामाजिक कार्यक्रमों और राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा के अपने वादे को पूरा करने के साथ-साथ एक रूढ़िवादी विधायिका के साथ तालमेल बिठाकर काम करना होगा। उनकी इस जीत ने एक और कार्यकाल तो सुरक्षित कर लिया है, लेकिन बोल्सोनारो खेमे द्वारा चुनावी नतीजों को स्वीकार करने से इनकार करने के कारण आने वाले हफ्तों में राजनीतिक तनाव और बढ़ सकता है।

प्रभासाक्षी 26 Oct 2026 1:27 pm