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मिशन 2027 में जुटी भाजपा, यूपी मीडिया टीम में बड़ा फेरबदल

उत्तर प्रदेश में 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी ने संगठन को मजबूत करने की दिशा में तैयारियां तेज कर दी हैं

देशबन्धु 3 Oct 2026 11:28 pm

एसआईआर पर भड़के सलीम इंजीनियर, बोले- 13 करोड़ वोटर्स के नाम काटना गंभीर अपराध

एसआईआर पर भड़के सलीम इंजीनियर, बोले- 13 करोड़ वोटर्स के नाम काटना गंभीर अपराध

समाचार नामा 3 Oct 2026 10:31 pm

कांग्रेस ने फिर अपनाई बांटो और राज करो की नीति

वर्तमान समय में कांग्रेस पार्टी जहां एक ओर अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए चुनाव आयोग व देश की अन्य संवैधानिक संस्थाओं पर हमलावर है वहीं दूसरी ओर उसके तेलंगाना राज्य के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने हिंदू देवी देवताओें का विभाजन करके कांग्रेस की बांटो और राज करो की नीति को आगे बढ़ाकर राजनैतिक माहौल को गर्म कर दिया है। दक्षिण का राज्य तेलंगाना कांग्रेस के शासन में आर्थिक तंगी व भ्रष्टाचार से गुजर रहा है। अपनी प्रशासनिक नाकामियों तथा चुनावी वादों को पूरा करने में नाकाम रहने व मुस्लिम तुष्टिकरण को छुपाने के लिए रेवंत रेड्डी ने प्रभु श्रीराम को उत्तर और भगवान शिव को दक्षिण का देवता बताकर एक नयी विभाजक रेखा खींचने का असफल प्रयास किया है। उत्तर भारत में अपने अस्तित्व का संघर्ष करती कांग्रेस अब विभाजनकारी मानसिकता के सबसे निचले पायदान पर पहुँच गयी लगती है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी इससे पूर्व भी कई विवादित बयान दे चुके हैं। एक बार उन्होंने कहा था कि मुस्लिम ही कांग्रेस है और कांग्रेस ही मुस्लिम है। रेवंत रेड्डी का कहना है कि भगवान राम अमीरों के देवता हैं और भगवान शिव गरीबों के देवता हैं। वे स्वयं को भगवान शिव का भक्त बताते हुए कहते हैं कि भाजपा ने भगवान राम को चोरी कर लिया है। रेवंत रेड्डी का कहना है भाजपा के लोग “हर हर महादेव“ तक नहीं बोलते। वह एक बार हिंदुओं के 33 करोड़ देवताओं पर भी विकृत बयानबाजी कर चुके हैं। दिमागी नक्सली नेताओं का यही लक्ष्य रहता है किसी न किसी प्रकर हिंदू देवी देवताओं का अपमान किया जाए। विगत सितम्बर में हुए गणेशोत्सव आयोजन के दौरान तेलंगाना में कई जगह से गणेशेत्सवों के आयोजन पर बाधाओं के समाचार आ रहे थे। इसे भी पढ़ें: राम और शिव के बारे में रेवंत रेड्डी की टिप्पणियां हिंदू धर्म के प्रति उनकी घोर अज्ञानता को प्रदर्शित कर रही हैं कांग्रेस पार्टी ने अयोध्या में श्री राम मंदिर के निर्माण में और वाराणसी में काशी विश्वनाथ कारिडोर का विरोध किया। ज्ञानवापी में मिले शिवलिंग को फव्वारा बताने में सबसे पहले कांग्रेस ही मैदान में उतर पड़ी थी। रेवंत रेड्डी संभवतः यह बात भूल गए कि भगवान शिव को नीलकंठ भी कहा जाता है क्योंकि उन्होंने समाज की रक्षा के लिए विष को भी अपने गले में ही धारण कर लिया था। तेलंगाना के मुख्यमंत्री को भगवान श्रीराम का चरित्र पढ़ना चहिए। मुख्यमंत्री को यह नहीं पता कि भगवान श्रीराम मर्यादा पुरषोत्तम थे। अंग्रेजों की बनाई हुई पार्टी कांग्रेस ने अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की रणनीति के तहत ही विगत 76 वर्षों में हिंदू समाज को जाति, पंथ, संप्रदाय, भाषा और क्षेत्र के आधार पर बांटने की पूरी कोशिश की है और वह लगातार जारी है। मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने अपने बयान के माध्यम से आर्य बनाम द्रविड का विभाजन करते हुए यह भी कहाकि हम द्रविड़ हैं और हम भगवान शिव की आराधना करते हैं जबकि आर्य प्रभु श्रीराम को मानते हैं। रेवंत रेड्डी का कहना है कि बीजेपी के मंचों से जयश्रीराम का नारा सुनाई देता है जबकि “हर हर महादेव“ का उद्घोष नहीं किया जाता । रेड्डी ने कहा कि “मोदीजी हर हर महादेव क्यों नहीं कहते?“ रेवंत रेड्डी का बयान झूठ का पुलिंदा भर है। रेवंत रेड्डी को यह नहीं पता कि उत्तर भारत में केदारनाथ, विश्वनाथ और महाकाल जैसे ज्योतिर्लिंग हैं, उत्तर भारत में ही काँवड़ यात्रा होती है और श्रावण माह महादेव को ही समर्पित रहता है। कांग्रेस को तो भगवान शिव के मंदिरों के विकास से भी चिढ़ रही है। गुजरात के पवित्र सेामनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार रोकने और तत्कालीन राष्ट्रपति स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद को सोमनाथ मंदिर न जाने देने का भरसक प्रयास स्वयं नेहरु जी ने किया था। सोमनाथ मंदिर के 1000 वर्ष पूर्ण होने पर आयोजित कर्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रतिभाग पर भी कांग्रेस ने नफरत भरा बयान दिया था। मध्य प्रदेश के उज्जैन में बने भव्य महाकाल कॉरिडोर का विरोध भी कांग्रेस नेताओं ने ही किया था। आज दक्षिण भारत के जो कांग्रेसी नेता अपने आपको शिवभक्त बता रहे हैं वह ज्ञानवापी में मिले शिवलिंग के उद्धार के लिए आगे क्यों नही आ रहे हैं? कांग्रेस के शासनकाल में भगवान शिव के मंदिरों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी को एक बार काशी विश्वनाथ धाम और सोमनाथ मंदिर में जाकर दर्शन करना चाहिए तब उन्हें स्पष्ट रूप से पता चल जाएगा कि आर्य प्रभु श्रीराम के भी भक्त हैं और भगवान शिव के भी भक्त हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रामेश्वरम में भी भगवान की पूजा करते हैं और काशी विश्वनाथ धाम में भी। वह अपनी हर जनसभा में हर-हर महादेव के नारे लगाते हैं। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवत रेड्डी ने निहित राजनीतिक स्वार्थ व गांधी परिवार की चाटुकारिता के लिए एक निंदनीय बयान दिया है। यह बयान भारत को उत्तर और दक्षिण में बांटने की कांग्रेस की राजनीति का हिस्सा है। भाषा के आधार पर भी कांग्रेस उत्तर और दक्षिण को लड़ाती रही है। इस बयानबाजी का एक पक्ष मुस्लिम समाज को खुश रखने के लिए हिन्दुओं की आस्था पर प्रहार करना भी है। यहां पर एक बड़ा सवाल यह भी है कि कांग्रेस के नेता कभी अन्य धर्मों के प्रति इस प्रकार के बयान क्यों नहीं देते? यह बात पूरी तरह से स्पष्ट हो चुकी है गांधी परिवार व विपक्ष को अयोध्या का भव्य राम मंदिर व काशी विश्वनाथ धाम सहित अन्य मंदिरों का विकास अच्छा नहीं लग रहा है इसलिए अब उसने यह नया नैरेटिव गढ़ना शुरू कर दिया है कि प्रधानमंत्री मोदी व बीजेपी के लोग “हर- हर महादेव“ नहीं बोलते। वास्तविकता ये है देश की जनता कांग्रेस की इस फूट डालो-राज करो की नीति अच्छी तरह से समझ चुकी है यही कारण है कि कांग्रेस लगातार सिमट रही है लेकिन वह अपने में सुधार के बजाए चुनाव आयोग व संवैधानिक संस्थाओं पर हमलावर होकर सत्ता में वापसी का प्रयास कर रही है। - मृत्युंजय दीक्षित

प्रभासाक्षी 3 Oct 2026 7:14 pm

कैप्टन स्मित मच्छार की बहादुरी ने टाली बड़ी हवाई त्रासदी

आसमान में उड़ता हुआ विमान सामान्यतः यात्रियों के लिए सुरक्षित यात्रा और मंजिल तक पहुंचने का भरोसा लेकर चलता है। विमान के भीतर बैठे लोग यह कल्पना भी नहीं करते कि कुछ ही क्षणों में वही यात्रा जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष में बदल सकती है। 30 सितंबर 2026 को दुबई से तेल अवीव जा रहे एक विमान में कुछ ऐसा ही हुआ। उड़ान के दौरान ऐसी भयावह स्थिति पैदा हुई, जिसमें विमान में सवार लोगों की जान पर गंभीर खतरा मंडराने लगा। उस समय भारतीय विमान चालक कैप्टन स्मित मच्छार ने जिस साहस, धैर्य और कर्तव्यनिष्ठा का परिचय दिया, उसकी चर्चा भारत ही नहीं, दुनिया के अनेक हिस्सों में हो रही है। दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की उड़ान संख्या एफजेड1073 में लगभग 174 यात्री सवार थे। विमान बोइंग 737 मैक्स 8 था। उड़ान के दौरान विमान में कार्यरत सह-पायलट ने कथित तौर पर कैप्टन स्मित मच्छार पर चाकू से हमला किया। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, हमले के बाद विमान की स्थिति अचानक गंभीर हो गई और वह कुछ ही क्षणों में लगभग 14000 फुट नीचे चला गया। इस घटना ने विमान में मौजूद यात्रियों और चालक दल के सदस्यों को भारी संकट में डाल दिया। सबसे कठिन स्थिति यह थी कि जिस व्यक्ति के हाथ में विमान की सुरक्षित उड़ान की जिम्मेदारी थी, उसी पर हमला कर दिया गया था। कैप्टन मच्छार गंभीर रूप से घायल हो गए, लेकिन उन्होंने अपना धैर्य नहीं खोया। उपलब्ध विवरण के अनुसार, उन्होंने घायल अवस्था में भी विमान के नियंत्रण और यात्रियों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी। उन्होंने कक्ष का दरवाजा खोलने में सफलता प्राप्त की, जिसके बाद यात्रियों और चालक दल के सदस्यों ने मिलकर हमलावर को काबू करने में मदद की। विमान में मौजूद दो अन्य विमान चालकों ने भी स्थिति संभालने में सहायता की। अंततः विमान को सऊदी अरब के तबूक हवाई अड्डे पर आपात स्थिति में उतारा गया। इसे भी पढ़ें: नीरजा भनोट से स्मित मच्छार तक, हिन्दुओं की शूरवीरता की कायल दुनिया इस पूरी घटना का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि संकट के उस क्षण में कैप्टन मच्छार ने केवल अपने जीवन की चिंता नहीं की। उनके सामने विमान में बैठे सैकड़ों लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी थी। एक विमान चालक के लिए सामान्य परिस्थितियों में भी निर्णय लेना अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, लेकिन जब स्वयं चालक घायल हो, विमान असामान्य स्थिति में हो और कुछ ही क्षणों में बड़ा हादसा हो सकता हो, तब निर्णय लेने की क्षमता की वास्तविक परीक्षा होती है। कैप्टन मच्छार ने इसी परीक्षा में असाधारण धैर्य दिखाया। घटना के बाद कैप्टन मच्छार को तबूक के अस्पताल में भर्ती कराया गया। भारतीय अधिकारियों के अनुसार वह गंभीर रूप से घायल हुए थे, लेकिन उनका उपचार किया जा रहा था और उनकी स्थिति सुरक्षित बताई गई। उनकी बहादुरी की प्रशंसा भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने भी की। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी कैप्टन मच्छार के साहस की सराहना करते हुए उन्हें सच्चा नायक बताया। कैप्टन स्मित मच्छार का विमानन क्षेत्र में लंबा अनुभव भी इस घटना के संदर्भ में उल्लेखनीय है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार वह मुंबई के घाटकोपर क्षेत्र से हैं और इससे पहले स्पाइसजेट में कार्य कर चुके हैं। जून 2022 में वह फ्लाईदुबई से जुड़े थे। उनके पास बोइंग 737 विमानों को उड़ाने का लगभग 9750 घंटे का अनुभव बताया गया है। इतने लंबे अनुभव ने निश्चित रूप से उन्हें कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने की व्यावसायिक क्षमता प्रदान की होगी, लेकिन केवल अनुभव से उस क्षण का साहस नहीं समझाया जा सकता। घायल होने के बावजूद यात्रियों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देना उनके कर्तव्यबोध को भी सामने लाता है। इस घटना की एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि यात्रियों ने भी संकट के समय असाधारण सहयोग किया। विमान के भीतर उत्पन्न खतरे को केवल चालक दल ने ही नहीं संभाला, बल्कि यात्रियों ने भी हमलावर को काबू करने में मदद की। इससे पता चलता है कि आपात स्थिति में सामूहिक सहयोग कितना महत्वपूर्ण हो सकता है। एक व्यक्ति की बहादुरी ने रास्ता बनाया, लेकिन उसके बाद कई लोगों के सहयोग ने स्थिति को नियंत्रण में लाने में भूमिका निभाई। इस घटना को केवल एक व्यक्ति की कहानी मानना पूरी तस्वीर को छोटा कर देना होगा। यह साहस, प्रशिक्षण, जिम्मेदारी और सामूहिक सहयोग की कहानी भी है। घटना के बाद विमान सुरक्षित रूप से तबूक पहुंचा और यात्रियों को आगे उनकी मंजिल तक पहुंचाने की व्यवस्था की गई। उपलब्ध समाचारों के अनुसार सभी यात्री सुरक्षित रहे। जिस स्थिति में विमान हजारों फुट नीचे आ गया था, उसमें सुरक्षित अवतरण अपने आप में महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। विमान की आपात स्थिति और उसके बाद हुई घटनाओं की जांच संबंधित अधिकारियों द्वारा की जा रही है। इसलिए सह-पायलट की वास्तविक मंशा, हमले का कारण और घटना के पीछे की पूरी परिस्थितियों के बारे में अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा। कैप्टन मच्छार की बहादुरी को लेकर भारत में भी भावनात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिली। उत्तर प्रदेश के कुंडा क्षेत्र से विधायक रघुराज प्रताप सिंह, जिन्हें राजा भैया के नाम से भी जाना जाता है, ने उनकी बहादुरी की प्रशंसा करते हुए एक महत्वपूर्ण सुझाव रखा। उन्होंने कहा कि यदि ऐसे बहादुर विमान चालक को सम्मानपूर्वक भारतीय सेना में विमान चालक के पद पर नियुक्त किया जाए तो यह गर्व की बात होगी। उन्होंने केंद्रीय नेतृत्व से इस विषय पर विचार करने का आग्रह किया। यह फिलहाल एक राजनीतिक नेता द्वारा किया गया सुझाव है, कोई सरकारी नियुक्ति या निर्णय नहीं। राजा भैया की इस मांग ने एक अलग बहस को भी जन्म दिया है। भारतीय सेना में नियुक्तियां निर्धारित नियमों, पात्रताओं और प्रक्रियाओं के अनुसार होती हैं। किसी व्यक्ति की असाधारण बहादुरी निश्चित रूप से सम्मान का विषय हो सकती है, लेकिन किसी विशिष्ट पद पर नियुक्ति का निर्णय संबंधित नियमों और संस्थागत प्रक्रियाओं के अनुसार ही किया जा सकता है। इसलिए राजा भैया की मांग को एक सम्मानजनक सुझाव के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि किसी घोषित सरकारी फैसले के रूप में। कैप्टन मच्छार की कहानी हमें यह भी याद दिलाती है कि किसी पेशे की असली परीक्षा तब होती है, जब सामान्य परिस्थितियां अचानक असामान्य हो जाएं। विमान चालक के लिए यात्रियों की सुरक्षा केवल नौकरी की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक नैतिक दायित्व भी है। कैप्टन मच्छार ने जिस परिस्थिति में अपना संयम बनाए रखा, उसमें उनके सामने अपने जीवन का खतरा भी था और विमान में सवार लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी। ऐसे समय में भय स्वाभाविक है, लेकिन भय के बावजूद जिम्मेदारी निभाना ही साहस का वास्तविक अर्थ है। इस घटना के संदर्भ में कैप्टन मच्छार के कुछ पुराने विचार भी उल्लेखनीय हैं। विमानन क्षेत्र से जुड़ी एक रिपोर्ट में उनके पूर्व कथनों का उल्लेख किया गया है, जिनमें उन्होंने यात्रियों के सुरक्षित विमान से बाहर निकलने को अपनी प्राथमिकता बताया था। उन्होंने यह भी कहा था कि कठिन परिस्थितियों में यात्रियों से संवाद बनाए रखना महत्वपूर्ण होता है। आज जब उनकी अपनी उड़ान में असाधारण संकट आया, तब उनके व्यवहार में भी यात्रियों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने की वही भावना दिखाई दी। आकाश में घटित यह घटना कई सवाल भी छोड़ गई है। विमान में चालक दल की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए? यदि चालक दल के किसी सदस्य से ही अचानक खतरा उत्पन्न हो जाए तो ऐसी परिस्थिति से निपटने के लिए क्या अतिरिक्त व्यवस्थाएं होनी चाहिए? आपातकालीन प्रशिक्षण में ऐसी घटनाओं को किस तरह शामिल किया जाना चाहिए? इन प्रश्नों का उत्तर संबंधित विमानन संस्थाओं और जांच एजेंसियों को देना होगा। घटना की जांच से सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर विमानन सुरक्षा व्यवस्था में आवश्यक सुधार किए जा सकते हैं। फिलहाल सबसे बड़ी बात यह है कि एक बेहद कठिन परिस्थिति में विमान सुरक्षित रूप से जमीन पर पहुंचा और उसमें सवार यात्रियों की जान बच गई। कैप्टन स्मित मच्छार स्वयं घायल हुए, लेकिन उन्होंने अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटने के बजाय संकट का सामना किया। यही कारण है कि उनकी बहादुरी की चर्चा सीमाओं से परे हो रही है। भारत के प्रधानमंत्री से लेकर इजरायल के प्रधानमंत्री तक ने उनके साहस की सार्वजनिक रूप से सराहना की है। कैप्टन स्मित मच्छार की कहानी केवल एक विमान दुर्घटना को टालने की कहानी नहीं है। यह उस मानवीय साहस की कहानी है, जिसमें व्यक्ति अपने सामने उपस्थित खतरे के बावजूद दूसरों की सुरक्षा को प्राथमिकता देता है। यह कहानी विमान चालकों, सुरक्षा कर्मियों, चिकित्सकों, सैनिकों और उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा का विषय बन सकती है, जिनके काम में दूसरों के जीवन की जिम्मेदारी जुड़ी होती है। किसी भी बहादुरी का सबसे बड़ा पुरस्कार लोगों का सुरक्षित घर लौटना होता है। कैप्टन मच्छार के लिए भी शायद यही सबसे महत्वपूर्ण बात होगी कि जिस विमान की जिम्मेदारी उनके हाथों में थी, उसके यात्री सुरक्षित अपनी मंजिल तक पहुंचे। सम्मान, प्रशंसा और पुरस्कार बाद की बातें हैं। संकट की घड़ी में कर्तव्य से पीछे न हटना ही उनकी कहानी का सबसे मजबूत पक्ष है। घायल शरीर के बावजूद जिम्मेदारी निभाने वाले इस विमान चालक ने यह दिखाया कि साहस केवल युद्धभूमि में ही नहीं, बल्कि जीवन के किसी भी मोर्चे पर सामने आ सकता है। आकाश में कुछ क्षणों तक चली इस असाधारण घटना ने एक बात स्पष्ट कर दी कि संकट कितना भी बड़ा क्यों न हो, धैर्य, प्रशिक्षण, कर्तव्यबोध और सामूहिक सहयोग मिलकर बड़ी से बड़ी त्रासदी को टालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

प्रभासाक्षी 3 Oct 2026 6:30 pm

प्रियंका कक्कड़ के कांग्रेस ज्वाइन करने पर भाजपा का तंज, पंजाब में डूब रहा 'आप' का जहाज

प्रियंका कक्कड़ के कांग्रेस ज्वाइन करने पर भाजपा का तंज, पंजाब में डूब रहा 'आप' का जहाज

समाचार नामा 3 Oct 2026 6:26 pm

नीरजा भनोट से स्मित मच्छार तक, हिन्दुओं की शूरवीरता की कायल दुनिया

कैप्टन स्मित मच्छार की बहादुरी को जहां आज पूरी दुनिया सलाम कर रही है वहीं इस घटना ने आज से लगभग चालीस साल पहले हुई इसी तरह की घटना की याद दिलवा दी है जब एक अन्य हिंदू विरांगना नीरजा भनोट ने अपनी जान दे कर जहाज में सवार कई दर्जन यात्रियों की जान बचाई थी। आज पूरी दुनिया हिन्दुओं की इसी बहादुरी व कर्तव्यपरायणता को सलाम कर रही है। 30 सितम्बर को दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की उड़ान एफजेड-1073 में उस समय अफरा-तफरी मच गई, जब कॉकपिट के अंदर दोनों पायलटों के बीच हिंसक झड़प हो गई। घटना के दौरान भारतीय कैप्टन स्मित मच्छार गंभीर रूप से घायल हो गए। इसके बाद विमान अचानक तेजी से नीचे जाने लगा। विमान ने बेहद कम समय में हजारों फीट की ऊंचाई खो दी। स्थिति बिगड़ती देख यात्रियों और चालक दल के सदस्यों ने कॉकपिट तक पहुंचने की कोशिश की। घायल होने के बावजूद कैप्टन मच्छार ने कॉकपिट का दरवाजा खोलने में मदद की, जिससे अंदर मौजूद हमलावर को काबू करने का रास्ता बना। इसे भी पढ़ें: flydubai पायलट Smit Machhar ने घायल हालत में खोला Cockpit, PM Modi ने की जमकर तारीफ इसके बाद इजारायली यात्री यानिव हयून कॉकपिट के अंदर पहुंचे, हयून ने हमलावर को पीछे से पकडक़र नियंत्रण से दूर किया और पायलट की सीट पर पहुंचकर विमान को संभालने में मदद की। इस तरह स्मित मच्छार ने जहाज में सवार 174 लोगों की जान बचाई, जिनमें अधिकतर इस्राइली नागरिक थे। विमान को क्रैश करने की कोशिश करने वाला को-पायलट ओमान का निवासी था। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप समेत दुनिया भर के बड़े नेताओं ने इस हिन्दू सपूत की बहादुरी की प्रशंसा की है। नेतन्याहू ने कैप्टन स्मित मच्छार के साहस को ‘अविस्वसनीय’ बताया। उन्होंने कहा कि घायल होने के बावजूद भारतीय पायलट ने जिस तरह स्थिति का सामना किया, उसने यात्रियों और चालक दल को हस्तक्षेप का मौका दिया। पीएम मोदी ने उन्हें ‘हीरो’ बताते हुए कहा कि उनके साहस ने सैकड़ों लोगों की जान बचाने और एक बड़ी त्रासदी को टालने में मदद की। डोनाल्ड ट्रंप ने भी घटना को लेकर कैप्टन मच्छार और यात्री यानिव हयून की तारीफ की। ट्रंप ने कहा कि गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद पायलट ने दरवाजा खोलकर अहम भूमिका निभाई। वैसे इस घटना का आधिकारिक कारण सामने नहीं आया है परंतु समझा जा रहा है कि अगर दुर्घटना हो जाती तो यह अमेरिका के ट्विन टावरों पर हुए आतंकी घटना का ही दूसरा रूप होती, संभव है इसके बाद इस्राईल की भी सैनिक प्रक्रिया होती और दुनिया में शांति व्यवस्था को नया खतरा पैदा हो जाता, जो पहले ही इरान-अमेरिका और रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते संकट में चली आ रही है। स्मित मच्छार की बहादुरी ने न केवल पौने दो सौ लोगों का जीवन बचाया बल्कि दुनिया को भी एक बड़े संकट से बचा लिया। 30 सितम्बर को हुई इस घटना ने एक और हिन्दू विरांगना नीरजा भनोट का पुण्य स्मरण करवा दिया है जो इसी तरह की घटना में शहीद हुई थीं परंतु जीवन के अंतिम क्षण तक अपहृत जहाज के यात्रियों की सुरक्षा के लिए आतंकियों से लड़ती रहीं। उनकी बहादुरी को देख कर पाकिस्तान ने भी उन्हें तमगा-ए-इंसानियत पुरस्कार से सम्मानित किया। 5 सितंबर 1986 की सुबह कराची का जिन्ना अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पैन अमेरिकन वल्र्ड की फ्लाइट 73 मुंबई से न्यूयॉर्क के सफर पर थी और कराची उसका एक पड़ाव था। विमान में करीब 360 यात्री और 19 क्रू सदस्य मौजूद थे। लेकिन अचानक विमान में चार हथियारबंद आतंकी घुस आए और उन्होंने फ्लाइट को हाईजैक कर लिया। उस समय विमान की सीनियर फ्लाइट पर्सर थीं 22 साल की नीरजा भनोट। हालात बेहद खतरनाक थे, लेकिन नीरजा ने घबराने के बजाय तुरंत समझ लिया कि यात्रियों को बचाने के लिए क्या करना जरूरी है। उन्होंने कॉकपिट तक हाईजैक का संकेत पहुंचाया। इसकी वजह से पायलट और दूसरे कॉकपिट क्रू सदस्य विमान से बाहर निकलने में कामयाब रहे जिससे विमान के उड़ान भरने की संभावना खत्म हो गई और आतंकवादी अंदर फंस गए यात्रियों पर नियंत्रण बनाए रखने की कोशिश करने लगे। आतंकवादियों की नजर अमेरिकी यात्रियों पर थी। नीरजा ने अमेरिकी यात्रियों के पासपोर्ट छिपाने शुरू कर दिए। पासपोर्ट कूड़ेदान में डाल दिए गए, ताकि आतंकवादियों को यह पता न चल सके कि विमान में कौन-कौन से अमेरिकी नागरिक मौजूद हैं। करीब 17 घंटे तक विमान जमीन पर खड़ा रहा। जब विमान की बिजली चली गई, तो स्थिति अचानक और ज्यादा खतरनाक हो गई। अंधेरे का फायदा उठाकर आतंकवादियों ने गोलीबारी शुरू कर दी। अफरा-तफरी के बीच नीरजा ने इमरजेंसी गेट खोल दिया। उनके सामने मौका था कि वह खुद सबसे पहले विमान से बाहर निकल जाएं, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने यात्रियों को बाहर निकलने में मदद करना शुरू किया। नीरजा ने बच्चों समेत कई यात्रियों को सुरक्षित बाहर निकलने में मदद की। इसी दौरान वह आतंकवादियों की गोली का निशाना बन गईं। तीन बच्चों को बचाने की कोशिश करते हुए उन्हें गोली मार दी गई। गंभीर रूप से घायल नीरजा को अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उनकी जान नहीं बच सकी। इस घटना में 20 लोगों की मौत हुई. हालांकि, नीरजा की सूझबूझ और साहस के कारण सैकड़ों यात्री सुरक्षित बच पाए। नीरजा भनोट की बहादुरी को भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में सम्मान मिला. भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया। पाकिस्तान ने भी उनकी बहादुरी को मान्यता देते हुए उन्हें ‘तमगा-ए-इंसानियत’ से सम्मानित किया। अमेरिका में भी उनकी बहादुरी के लिए उन्हें कई सम्मान मिले। बाद के वर्षों में उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया गया और मुंबई में एक चौक का नाम भी उनके नाम पर रखा गया। आज स्मित मच्छार ने नीरजा भनोट की उसी बहादुरी की पुन: स्मृति करवा दी है और दुनिया हिन्दुओं की शूरवीरता व कर्तव्यपरायणता को सलाम कर रही है। - राकेश सैन

प्रभासाक्षी 3 Oct 2026 6:20 pm

मच्छर, हाथी, घोड़ा और बिच्छू… Gujarat के इन अजीब Surnames से जुड़ी कहानी सुनकर चौंक जाएंगे!

फ्लाईदुबई की एक उड़ान में संकट टालने वाले कप्तान स्मित मच्छर का नाम सामने आया तो उनकी बहादुरी के साथ उनके अनोखे उपनाम ने भी लोगों का ध्यान खींचा। ‘मच्छर’ नाम सुनकर भले ही पहले उड़ने वाले कीट की तस्वीर सामने आए, लेकिन यहां बात एक ऐसे पायलट की है, जिसने 9/11 जैसे आतंकी हमले को घटित होने से रोका और सभी विमान यात्रियों की जान बचाई। स्मित मच्छर नाम ने गुजरात के उन अनोखे उपनामों की कहानी भी सामने ला दी, जिनमें पशु-पक्षियों और कीट-पतंगों के नाम पीढ़ियों से लोगों की पहचान बने हुए हैं। हम आपको बता दें कि गुजराती समाज में विशेषकर कुछ नागर ब्राह्मण, ब्रह्मक्षत्रिय और लोहाना समुदायों में पशु-पक्षियों और कीट-पतंगों से जुड़े कई उपनाम मिलते हैं। इनमें घोड़ा, मांकड़ यानी खटमल, मांकड़ी यानी बड़ी चींटी, पोपट यानी तोता, विंछी यानी बिच्छू, शियाल यानी सियार, तीतर और हाथी जैसे उपनाम शामिल हैं। यानी एक ही सामाजिक संसार में कहीं मच्छर भनभना रहा है, कहीं बिच्छू डंक मार रहा है, कहीं घोड़ा दौड़ रहा है और कहीं हाथी चिंघाड़ रहा है! इसे भी पढ़ें: राजनयिक संबंध नहीं रखने वाले देश का पायलट इजराइली उड़ानें संचालित नहीं कर सकता, फिर Omani Co-Pilot कैसे Flydubai Flight में आ गया? इस कहानी में कैप्टन मनोज हाथी का किस्सा भी बेहद दिलचस्प है। एयर इंडिया में संचालन विभाग के पूर्व निदेशक रहे कैप्टन हाथी का उपनाम सचमुच ‘हाथी’ है। जब उन्होंने बोइंग 747 जैसे विशाल जंबो विमान को उड़ाने के लिए प्रशिक्षण लिया, तो उनके साथियों को मजाक करने का एक और मौका मिल गया। कैप्टन हाथी ने मीडिया को बताया कि एयर इंडिया में उनके समय कप्तान वाघ और पारसी इनफ्लाइट पर्यवेक्षक होमी घोड़ा भी थे। यानी विमानन जगत में उनके आसपास ही पूरा ‘जंगल’ बसा हुआ था। विदेश में भी कैप्टन हाथी के नाम ने खूब ध्यान खींचा, लेकिन वहां इसे याद रखना लोगों के लिए आसान था। ब्रिटेन में कई लोग उनके नाम को ‘द जंगल बुक’ के मशहूर किरदार कर्नल हाथी से जोड़ लेते थे। भारत में लोग अक्सर उनसे मजाक में पूछते थे कि जब उपनाम हाथी है तो इतने दुबले क्यों हैं? अब वजन थोड़ा बढ़ा तो मजाक भी बदल गया। लोग कहने लगे कि अब कैप्टन हाथी अपने नाम के साथ पूरी तरह न्याय कर रहे हैं। इसके अलावा, गुजरात के जूनागढ़ के नागर समुदाय से जुड़े फिल्मकार अभिलाष घोड़ा भी अपने उपनाम को गर्व से धारण करते हैं। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, उनका कहना है कि गुजरात से बाहर यह नाम अक्सर लोगों का ध्यान खींचता है, लेकिन उनके परिवार ने इसे पीढ़ियों से सम्मान और आत्मविश्वास के साथ अपनाया है। हालांकि परिवार के कई लोगों को भी यह निश्चित रूप से पता नहीं कि इस उपनाम की मूल उत्पत्ति क्या रही होगी। वहीं ‘मच्छर’ उपनाम का संबंध गुजरात के ब्रह्मक्षत्रिय समुदाय से बताया जाता है। वाधवान स्थित समुदाय संस्था के सचिव राजू दुबल के अनुसार, सुरेंद्रनगर सहित गुजरात के कुछ इलाकों में यह उपनाम विशेष रूप से देखने को मिलता है। अहमदाबाद की भारती विंछी भी ब्रह्मक्षत्रिय समुदाय से आती हैं। उन्होंने बताया कि ऐसे उपनाम समुदाय में संख्या की दृष्टि से कम हैं। परिवार में बुजुर्गों से मिली जानकारी के अनुसार उनके पूर्वज कीटों के काटने, खासकर बिच्छू के डंक का उपचार करने में दक्ष माने जाते थे। इसी कारण बिच्छू से जुड़ा नाम समुदाय की पहचान का हिस्सा बन गया। इस परंपरा में केवल पशु-पक्षी और कीट ही नहीं, बल्कि भूत और जोगी जैसे उपनाम भी मिलते हैं। इस पूरे मामले पर समाजशास्त्री गौरांग जानी का कहना है कि गुजराती उपनामों के इतिहास पर विनोदिनी नीलकंठ की 1942 में प्रकाशित पुस्तक ‘गुजराती अटकाओं नो इतिहास’ अब भी महत्वपूर्ण विद्वतापूर्ण स्रोत मानी जाती है। उनके अनुसार, ऐसे उपनामों को संभावित रूप से ‘टोटेम’ परंपराओं से जोड़ा जा सकता है। अर्थात किसी समूह का किसी विशेष पशु के प्रति सम्मान, उससे जुड़ाव या उसके सकारात्मक गुणों को अपनाने की सामाजिक परंपरा रही थी। गौरांग जानी के मुताबिक सौराष्ट्र में ऐसे उपनामों की अधिकता का कारण बड़े जातीय ढांचे से ज्यादा वहां के करीबी और आपस में जुड़े समुदायों की मजबूत सामाजिक संरचना हो सकती है। बहरहाल, अगली बार जब किसी खबर में कैप्टन मच्छर, कैप्टन हाथी या कोई घोड़ा दिखाई दे, तो नाम पर मुस्कुराने से पहले कहानी जरूर समझिए। क्योंकि गुजरात के इन उपनामों के पीछे केवल मजेदार शब्द नहीं, बल्कि समुदाय, परंपरा, पेशे, लोकविश्वास और सदियों पुरानी सामाजिक स्मृतियों की पूरी कहानी छिपी हो सकती है। और हां, मच्छर का विमान उड़ाना जितना असामान्य सुनाई देता है, हाथी का जंबो जेट उड़ाना उससे कहीं ज्यादा शानदार संयोग है! -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 3 Oct 2026 2:47 pm

केरल भाजपा ने उठाई सबरीमाला हवाई अड्डे की मांग, तीन हजार एकड़ जमीन के अध्ययन के लिए मांगी केंद्र की मंजूरी

केरल भाजपा ने उठाई सबरीमाला हवाई अड्डे की मांग, तीन हजार एकड़ जमीन के अध्ययन के लिए मांगी केंद्र की मंजूरी

समाचार नामा 3 Oct 2026 2:42 pm

कर्नाटक में केंद्रीय टीमों ने सूखे का आकलन शुरू किया, फसल का नुकसान 60,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है: डिप्टी सीएम

कर्नाटक में केंद्रीय टीमों ने सूखे का आकलन शुरू किया, फसल का नुकसान 60,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है: डिप्टी सीएम

समाचार नामा 3 Oct 2026 2:34 pm

बिहार: अनंत-नीरज विवाद पर बोले जदयू नेता श्रवण कुमार, 'बातचीत से जल्द निकलेगा समाधान'

बिहार: अनंत-नीरज विवाद पर बोले जदयू नेता श्रवण कुमार, 'बातचीत से जल्द निकलेगा समाधान'

समाचार नामा 3 Oct 2026 2:11 pm

आप नेता प्रियंका कक्कड़ कांग्रेस से जुड़ीं, बोलीं- ‘बंगला-गाड़ी छोड़ने की बात करने वाले चॉपर लेने लगे’

आप की राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़ ने आप पर हमला किया और कहा कि जिन्होंने बूथ लेवल पर भी काम नहीं किया उन्हें राजस्थान से उठाकर पंजाब में बंगला और गाड़ी सब दिया जा रहा है। पूर्व विधायक श्याम सुंदर शर्मा, रजत राकेश टंडन भी कांग्रेस में शामिल हुए।

सत्य हिंदी 3 Oct 2026 12:23 pm

South China Sea में Jinping ने खेला बड़ा खेल, Antelope Reef पर बन रहा Military Airstrip, Satellite images से हुए खुलासे से India हुआ सतर्क

दक्षिण चीन सागर में विस्तारवाद की दिशा में आगे बढ़ते हुए चीन अब समुद्र के बीच अपनी सैन्य ताकत का ऐसा किला खड़ा करने में जुटा हुआ है, जो आने वाले दिनों में पूरे हिंद-प्रशांत के सामरिक समीकरण को हिला सकता है। ताजा उपग्रह तस्वीरों से हुए खुलासे से पता चला है कि विवादित पैरासेल द्वीपसमूह के एंटीलोप रीफ पर चीन तेजी से रनवे और विशाल सैन्य ढांचे का निर्माण कर रहा है। इस कदम ने उसके इरादों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दरअसल, यह निर्माण पूरा होने के बाद यहां से लड़ाकू विमानों, निगरानी विमानों और अन्य सैन्य संसाधनों के संचालन की क्षमता विकसित की जा सकती है। यानी चीन समुद्र के बीच एक और ऐसा ठिकाना तैयार कर रहा है, जहां से वह अपने प्रतिद्वंद्वियों की गतिविधियों पर नजर रखने और जरूरत पड़ने पर अपनी सैन्य शक्ति को तेजी से आगे बढ़ाने की स्थिति में होगा। साफ है कि बीजिंग दक्षिण चीन सागर को सिर्फ अपने प्रभाव का क्षेत्र नहीं, बल्कि सैन्य शक्ति के विस्तार का विशाल मंच बनाने की रणनीति पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह रनवे 2027 के मध्य तक परिचालन में आ सकता है। तस्वीरों में मिट्टी समतल करने, बजरी और कंक्रीट डालने तथा भारी निर्माण मशीनों की गतिविधियां साफ दिखाई देती हैं। एक लदा हुआ बजरा नवनिर्मित घाट की ओर जाता हुआ भी देखा गया है। चीन ने आधिकारिक तौर पर इसे सैन्य अड्डा नहीं माना है और सरकारी माध्यमों ने इसे मौसम पूर्वानुमान, समुद्री वैज्ञानिक अनुसंधान तथा अन्य नागरिक उद्देश्यों से जोड़ने की कोशिश की है। लेकिन जिस पैमाने पर निर्माण हो रहा है, वह इस परियोजना के संभावित सामरिक उपयोग को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। इसे भी पढ़ें: 4 साल में पहली बार एक सुर में बोले रूस और यूक्रेन, दोनों को पसंद आया मोदी का प्रस्ताव एंटीलोप रीफ क्यों इतना महत्वपूर्ण है? हम आपको बता दें कि एंटीलोप रीफ कोई सामान्य समुद्री निर्माण परियोजना नहीं है। यह पैरासेल द्वीपसमूह में स्थित है, जिस पर चीन के साथ वियतनाम और ताइवान भी दावा करते हैं। चीन ने 1974 में दक्षिण वियतनाम की सेनाओं को पैरासेल क्षेत्र से हटाकर वहां अपना नियंत्रण स्थापित किया था और तब से इस क्षेत्र पर उसका कब्जा बना हुआ है। यदि यहां सैन्य श्रेणी का रनवे और पूरा अड्डा तैयार हो जाता है तो चीन के युद्धक विमानों, निगरानी विमानों और नौसैनिक शक्ति की पहुंच दक्षिण चीन सागर के उत्तरी हिस्से में काफी बढ़ सकती है। इससे चीन को अपने परमाणु-सक्षम पनडुब्बी बेड़े वाले हैनान द्वीप के आसपास के समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा और निगरानी मजबूत करने में भी मदद मिल सकती है। हम आपको बता दें कि चीन पहले ही स्प्रैटली द्वीपसमूह में फिएरी क्रॉस, मिसचीफ और सुबी रीफ पर बड़े रनवे, बंदरगाह, निगरानी और वायु रक्षा सुविधाएं विकसित कर चुका है। अब पैरासेल क्षेत्र में निर्माण उस व्यापक रणनीति का अगला चरण दिखाई देता है, जिसमें बीजिंग समुद्र के भीतर अपनी स्थायी सैन्य पहुंच और निगरानी का जाल मजबूत कर रहा है। तस्वीर यहीं खत्म नहीं होती। एंटीलोप रीफ के निकट यागोंग द्वीप पर भी नई संरचनाएं दिखाई दी हैं। अगस्त में सामने आई उपग्रह तस्वीरों के आधार पर कुछ विश्लेषकों ने वहां संभावित रडार या प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली जैसी संरचनाओं की संभावना जताई थी, हालांकि उनके वास्तविक उपयोग की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। इसी बीच ताइवान को अमेरिका से नए एफ-16वी ब्लॉक 70 लड़ाकू विमानों की पहली दो इकाइयां मिल गई हैं। ये 2019 में किए गए करीब 8 अरब डॉलर के 66 विमानों के सौदे का हिस्सा हैं। ताइवान के पास पहले से 139 पुराने एफ-16 विमानों को एफ-16वी मानक तक उन्नत किया जा चुका है; नई खेप पूरी होने पर उसका एफ-16 बेड़ा 200 से अधिक विमानों का हो जाएगा। इन विमानों में आधुनिक सक्रिय इलेक्ट्रॉनिक रूप से स्कैन किए जाने वाले रडार और उन्नत युद्ध प्रणालियां हैं। ताइवान के लिए इनका महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि उसे चीन की वायुसेना की नियमित गतिविधियों का सामना करना पड़ता है। हालांकि पूरी खेप की आपूर्ति में देरी हुई है और ताइवान को आगे की डिलीवरी का इंतजार है। इस प्रकार एक तरफ चीन दक्षिण चीन सागर में अपने ठिकाने मजबूत कर रहा है, तो दूसरी तरफ ताइवान अपनी वायु रक्षा क्षमता बढ़ा रहा है। यह हिंद-प्रशांत में तेजी से कठोर होते सैन्य संतुलन का स्पष्ट संकेत है। दूसरी ओर, भारत से हजारों किलोमीटर दूर दक्षिण चीन सागर में बन रहा चीनी अड्डा देखने में भले ही क्षेत्रीय विवाद लगे, लेकिन इसका सामरिक प्रभाव सीधे भारतीय समुद्री हितों तक पहुंचता है। कारण है मलक्का जलडमरूमध्य। दक्षिण चीन सागर और हिंद महासागर को जोड़ने वाला यह समुद्री मार्ग एशिया की ऊर्जा और व्यापार व्यवस्था की महत्वपूर्ण धुरी है। अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह इसकी पश्चिमी दिशा के बेहद करीब स्थित है। भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, मलक्का क्षेत्र भारतीय समुद्री सुरक्षा और व्यापार के लिए लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है। यही वह बिंदु है जहां चीन की दक्षिण चीन सागर रणनीति और भारत की समुद्री सुरक्षा एक-दूसरे से जुड़ती हैं। यदि चीन दक्षिण चीन सागर में एयरफील्ड, निगरानी केंद्र, बंदरगाह और नौसैनिक सुविधाओं की श्रृंखला बनाता है, तो संकट की स्थिति में उसके विमानों और युद्धपोतों की परिचालन पहुंच दक्षिण-पूर्व एशिया और मलक्का की दिशा में बढ़ सकती है। भारत के लिए इसका सीधा अर्थ है कि अंडमान-निकोबार अब केवल द्वीपसमूह नहीं, बल्कि हिंद-प्रशांत की सामरिक अग्रिम चौकी हैं। भारत ने इसी दिशा में अपनी तैयारी तेज की है। जनवरी 2026 में कार निकोबार वायुसेना स्टेशन के उन्नत रनवे का उद्घाटन किया गया। अधिकारियों के अनुसार इससे मलक्का जलडमरूमध्य की दिशा में भारत की निगरानी और त्वरित हवाई संचालन क्षमता मजबूत होती है। ग्रेट निकोबार में प्रस्तावित विशाल परियोजना भी इसी व्यापक रणनीतिक संदर्भ में महत्वपूर्ण है। इसमें अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, हवाई अड्डा, ऊर्जा संयंत्र और अन्य आधारभूत सुविधाएं शामिल हैं। मोदी सरकार इसे समुद्री व्यापार के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक जरूरतों से भी जोड़ रही है। बहरहाल, चीन समुद्र में धीरे-धीरे नहीं, बल्कि ईंट, कंक्रीट, रनवे, रडार और बंदरगाहों के जरिए अपना सामरिक भूगोल बदल रहा है। भारत के लिए जवाब केवल हथियारों की संख्या बढ़ाना नहीं हो सकता। उसे अंडमान-निकोबार में हवाई और नौसैनिक आधारभूत ढांचे, समुद्री निगरानी, लंबी दूरी की मारक क्षमता, पनडुब्बी रोधी युद्धक क्षमता, मानवरहित प्रणालियों और समुद्री क्षेत्र जागरूकता को एकीकृत करना होगा। एंटीलोप रीफ का निर्माण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताता है कि चीन भविष्य के युद्ध को केवल महाद्वीपीय सीमा पर नहीं, बल्कि समुद्री गलियारों, द्वीपों और दूरदराज के सैन्य अड्डों पर भी आकार दे रहा है। भारत के लिए सबसे बड़ा सबक यही है कि दक्षिण चीन सागर की हर नई चीनी चौकी को केवल बीजिंग और उसके पड़ोसियों का विवाद मानना रणनीतिक भूल होगी। भारत की पूर्वी समुद्री सीमा, मलक्का और अंडमान-निकोबार अब एक ही व्यापक सामरिक तस्वीर के हिस्से हैं। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 3 Oct 2026 12:09 pm

4 साल में पहली बार एक सुर में बोले रूस और यूक्रेन, दोनों को पसंद आया मोदी का प्रस्ताव

चार साल से ज्यादा समय से जंग लड़ रहे रूस और यूक्रेन के मोर्चे भले आज भी आमने-सामने हों, लेकिन शांति के सवाल पर दोनों तरफ से निकली आवाज पहली बार एक ही दिशा में जाती दिखाई दी है। और यह दिशा दी है भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने। यूक्रेन के विदेश मंत्री एंड्री सिबिहा ने भारत के प्रस्ताव को युद्ध समाप्त करने के लिए सामने आए चार प्रस्तावों में सबसे व्यापक बताया है। दूसरी तरफ रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी खुलकर कहा कि प्रधानमंत्री मोदी लगातार इस संघर्ष को खत्म करने का सवाल उठाते रहे हैं और उनके पास दोनों पक्षों को स्वीकार्य समाधान के लिए “बहुत अच्छे विचार” हैं। देखा जाये तो युद्ध के मैदान में एक-दूसरे पर हमला कर रहे मॉस्को और कीव की तरफ से आई इन टिप्पणियों ने भारत की उस कूटनीतिक पहल को अचानक केंद्र में ला दिया है, जो अब तक बंद कमरों की बातचीत से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर दिखाई देने लगी है। यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पहली बार यूक्रेन की ओर से भारत की पहल को सार्वजनिक रूप से इतनी स्पष्ट मान्यता मिली है। सिबिहा के अनुसार भारत ने पहली बार इस प्रक्रिया में भूमिका निभाने की इच्छा का संकेत दिया है। यूक्रेन ऊर्जा क्षेत्र और काला सागर में युद्धविराम पर विचार करने को तैयार है, बशर्ते ऊर्जा तथा बंदरगाह ढांचे पर हमले भी रुकें। साथ ही कीव ने संपर्क रेखा पर बिना शर्त युद्धविराम के विकल्प को भी खुला बताया है। इसे भी पढ़ें: सब पर दादागिरी झाड़ते रहे ट्रंप, मगर कोई झुक नहीं रहा था! अब तो खुद US President ने ही अपनी 'सीमित शक्तियों' का खुलासा कर दिया उधर, भारत की पहल की व्यापकता का सबसे बड़ा संकेत यही है कि यह केवल गोलाबारी रोकने तक सीमित नहीं दिखती। इसमें ऊर्जा सुरक्षा, बंदरगाहों, काला सागर में व्यापार और कृषि आपूर्ति जैसे उन क्षेत्रों को जोड़ने की कोशिश है, जिनका सीधा संबंध युद्ध से बाहर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा से है। वहीं तुर्किये और मिस्र की पहल मुख्यतः काला सागर तथा अनाज निर्यात से जुड़ी बताई गई है, जबकि अमेरिका की पहल ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमले रोकने पर केंद्रित है। यहीं पुतिन का बयान बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। उन्होंने कहा कि मोदी रूस के साथ अच्छे और मित्रतापूर्ण संबंध होने के बावजूद लगातार युद्ध समाप्त करने का प्रश्न उठाते हैं और दोनों पक्षों के लिए स्वीकार्य समाधान खोजने में उनकी गहरी रुचि है। पुतिन ने मोदी के शांतिपूर्ण तरीके से और जल्द से जल्द संघर्ष समाप्त करने के प्रयासों के लिए आभार भी जताया। देखा जाये तो मोदी की यह भूमिका अचानक पैदा नहीं हुई। वर्ष 2022 में ही उन्होंने कहा था कि “यह युद्ध का युग नहीं है।” जुलाई 2024 में रूस की यात्रा के दौरान उन्होंने साफ कहा था कि बम, बंदूक और गोलियों के बीच शांति वार्ता सफल नहीं हो सकती और समाधान युद्धभूमि पर नहीं निकलेगा। 31 अगस्त 2026 को बिश्केक में पुतिन से मुलाकात के दौरान भी उन्होंने “अनंत युद्ध” से “युद्ध की समाप्ति” की दिशा में बढ़ने की बात कही थी। यहीं इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सामरिक संदेश छिपा है। रूस से भारत के गहरे संबंध हैं, जबकि यूक्रेन के साथ भी भारत ने संवाद के रास्ते खुले रखे हैं। ऐसे समय में यदि भारत रूस तक अपनी बात पहुंचा सकता है और यूक्रेन भी उसकी पहल को व्यापक प्रस्ताव मानता है, तो नई दिल्ली के पास संवाद के लिए एक ऐसा कूटनीतिक स्थान बनता है जो कई पश्चिमी शक्तियों के लिए उपलब्ध नहीं है। दूसरी ओर, इसी कूटनीतिक हलचल के बीच रूस ने अपनी सैन्य शक्ति का भी जबरदस्त प्रदर्शन किया है। दो अक्टूबर को पुतिन ने यूराल क्षेत्र में चल रहे सेंटर-2026 सैन्य अभ्यास के अंतिम चरण का निरीक्षण किया। रूस के अनुसार इस अभ्यास में लगभग 47 हजार सैनिक, 11 प्रशिक्षण क्षेत्र और कैस्पियन सागर शामिल रहे। अंतिम चरण में करीब छह हजार सैनिक उतरे। चीन, बेलारूस, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, मंगोलिया और पाकिस्तान सहित कई देशों की सेनाएं इसमें शामिल रहीं तथा 55 देशों के प्रतिनिधियों ने अभ्यास देखा। इस अभ्यास में रूस ने करीब 700 सैन्य उपकरणों, 600 से अधिक मानवरहित विमानों और 60 से अधिक रोबोटिक प्रणालियों का इस्तेमाल दिखाया। पुतिन ने नए जेट-चालित जेरान मानवरहित विमानों का भी निरीक्षण किया, जिनका इस्तेमाल रूस यूक्रेन युद्ध में कर चुका है। इसका अर्थ साफ है कि मास्को युद्ध से मिले अनुभव को अगली पीढ़ी की युद्धक क्षमता में बदल रहा है। इसलिए तस्वीर बेहद दिलचस्प है। एक तरफ रूस युद्ध के मैदान में अपनी सैन्य क्षमता, मानवरहित युद्ध प्रणाली और दूर तक मार करने वाली तकनीक का प्रदर्शन कर रहा है; दूसरी तरफ उसी रूस के राष्ट्रपति भारत के प्रधानमंत्री के युद्ध समाप्त करने वाले विचारों की सार्वजनिक रूप से प्रशंसा कर रहे हैं। यही भारत की कूटनीति की असली परीक्षा और संभावित ताकत दोनों है। लेकिन रास्ता आसान नहीं है। यूक्रेन में रूसी हमले जारी हैं, ऊर्जा ढांचा लगातार निशाने पर है और काला सागर में सुरक्षा तथा अनाज आपूर्ति का संकट बना हुआ है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार रूस और यूक्रेन दोनों एक-दूसरे के ऊर्जा तथा ईंधन ढांचे पर हमले कर रहे हैं। ऐसे माहौल में भारत की चुनौती केवल प्रस्ताव देने की नहीं, बल्कि प्रस्ताव को युद्धभूमि से वार्ताकक्ष तक पहुंचाने की है। यदि नई दिल्ली रूस और यूक्रेन दोनों से संवाद कायम रखते हुए ऊर्जा, कृषि, काला सागर और अंततः व्यापक युद्धविराम को एक ही ढांचे में जोड़ पाती है, तो यह केवल एक युद्ध को रोकने की कोशिश नहीं होगी, यह बदलती विश्व व्यवस्था में भारत की बढ़ती कूटनीतिक भूमिका का बड़ा प्रमाण बन सकता है। फिलहाल इतना जरूर स्पष्ट है कि मोदी की शांति पहल को अब केवल भारतीय दावा नहीं कहा जा सकता; यूक्रेन ने उसे व्यापक प्रस्ताव बताया है और पुतिन ने स्वयं उसके पीछे मोदी की लगातार कोशिशों को स्वीकार किया है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 3 Oct 2026 12:05 pm

UP Congress Update: आराधना मिश्रा ‘मोना’ बनीं प्रदेश अध्यक्ष, जानिए ब्लॉक प्रमुख से यूपी कांग्रेस की कमान तक का सफर

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समाचार नामा 3 Oct 2026 10:40 am

'भ्रामक प्रचार फैलाकर पूरे देश को अस्थिर करना चाहती कांग्रेस', सीईसी के खिलाफ प्रदर्शन पर बोले भाजपा नेता

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समाचार नामा 3 Oct 2026 10:30 am

गृह मंत्री अमित शाह भोपाल में गोपालक सम्मेलन समेत कई कार्यक्रमों में लेंगे हिस्सा

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समाचार नामा 3 Oct 2026 9:38 am

'अस्तित्व बचाने के लिए यमदूत से भी समझौता कर लेंगी ममता बनर्जी', एआईटीएमसी के सीजेपी को समर्थन पर भाजपा का तंज

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समाचार नामा 3 Oct 2026 8:38 am

सीएम नायब सैनी और हरियाणा भाजपा के सभी विधायक आज दिल्ली में करेंगे पीएम मोदी से मुलाकात

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समाचार नामा 3 Oct 2026 7:58 am

मुंबई के शिवाजी पार्क में सीजेपी के प्रदर्शन के दौरान लगे 'जय श्री राम' के नारे, पुलिस ने संभाली स्थिति

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समाचार नामा 2 Oct 2026 11:46 pm

कांग्रेस और इंडी गठबंधन का निकल रहा 'लोकतंत्र बचाओ नहीं, वंशवाद बचाओ मार्च’: के लक्ष्मण

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समाचार नामा 2 Oct 2026 10:49 pm

राजस्थान में 3 से 16 अक्टूबर तक चलेगा ‘सही खान-पान, स्वस्थ राजस्थान’ अभियान

जयपुर, 2 अक्टूबर (आईएएनएस)। राजस्थान में लोगों को सुरक्षित, पौष्टिक और स्वस्थ खान-पान की आदतों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए 3 से 16 अक्टूबर तक 'सही खान-पान, स्वस्थ राजस्थान' अभियान आयोजित किया जाएगा।

समाचार नामा 2 Oct 2026 10:39 pm

छत्तीसगढ़: भ्रष्टाचार मामले में कांग्रेस विधायक देवेंद्र यादव को एसीबी का नोटिस

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समाचार नामा 2 Oct 2026 10:34 pm

चुनाव प्रचार में जेल नहीं, जनता से जुड़े मुद्दों पर बात होनी चाहिए, हिमंता बिस्वा सरमा का गौरव गोगोई पर तंज

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समाचार नामा 2 Oct 2026 10:31 pm

कर्नाटक में भाजपा ने निकाली 'सेवा संकल्प यात्रा' और 'विजय संकल्प यात्रा', कांग्रेस सरकार पर साधा निशाना

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समाचार नामा 2 Oct 2026 8:37 pm

विपक्ष हताश और निराश, केवल पीएम मोदी का विरोध उनका एजेंडा: भाजपा सांसद नरेश बंसल

विपक्ष हताश और निराश, केवल पीएम मोदी का विरोध उनका एजेंडा: भाजपा सांसद नरेश बंसल

समाचार नामा 2 Oct 2026 8:31 pm

घुट-घुटकर मरने से सम्मान के साथ मरना बेहतर, विश्वेंद्र सिंह ने दिए कांग्रेस छोड़ने के संकेत

घुट-घुटकर मरने से सम्मान के साथ मरना बेहतर, विश्वेंद्र सिंह ने दिए कांग्रेस छोड़ने के संकेत

समाचार नामा 2 Oct 2026 8:25 pm

आज कोई लाल बहादुर शास्त्री जैसा नहीं जो नैतिक आधार पर इस्तीफा दे, ज्ञानेश कुमार पर बोले अनिल शास्त्री

आज कोई लाल बहादुर शास्त्री जैसा नहीं जो नैतिक आधार पर इस्तीफा दे, ज्ञानेश कुमार पर बोले अनिल शास्त्री

समाचार नामा 2 Oct 2026 6:40 pm

महात्मा गांधी और लालबहादुर शास्त्री का त्याग भारतीयों को हमेशा प्रेरित करता रहेगा : मोहन माझी

महात्मा गांधी और लालबहादुर शास्त्री का त्याग भारतीयों को हमेशा प्रेरित करता रहेगा : मोहन माझी

समाचार नामा 2 Oct 2026 4:30 pm

दिल्ली: ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर विपक्ष का हल्ला बोल, यूथ कांग्रेस बोली- जारी रहेगा संघर्ष

दिल्ली: ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर विपक्ष का हल्ला बोल, यूथ कांग्रेस बोली- जारी रहेगा संघर्ष

समाचार नामा 2 Oct 2026 4:27 pm

चुनाव आयोग के सामने ही धरने पर बैठ गए मुख्यमंत्री! क्या है कर्नाटक का SIR विवाद, जिस पर मच गया बवाल?

चुनाव आयोग के सामने ही धरने पर बैठ गए मुख्यमंत्री! क्या है कर्नाटक का SIR विवाद, जिस पर मच गया बवाल?

समाचार नामा 2 Oct 2026 3:50 pm

विवेकानंद रेड्डी हत्याकांड: ईडी ने कडप्पा के सांसद अविनाश रेड्डी को भेजा नोटिस

विवेकानंद रेड्डी हत्याकांड: ईडी ने कडप्पा के सांसद अविनाश रेड्डी को भेजा नोटिस

समाचार नामा 2 Oct 2026 2:42 pm

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह देंगे मध्य प्रदेश को कई सौगातें : मोहन यादव

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह देंगे मध्य प्रदेश को कई सौगातें : मोहन यादव

समाचार नामा 2 Oct 2026 2:38 pm

आंध्र प्रदेश के राज्यपाल, मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री ने महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री को दी श्रद्धांजलि

आंध्र प्रदेश के राज्यपाल, मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री ने महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री को दी श्रद्धांजलि

समाचार नामा 2 Oct 2026 2:35 pm

एमएमडीआर संशोधन विधेयक पर सियासत तेज, संजय सेठ बोले-देश संविधान से चलता है, जिद से नहीं

एमएमडीआर संशोधन विधेयक पर सियासत तेज, संजय सेठ बोले-देश संविधान से चलता है, जिद से नहीं

समाचार नामा 2 Oct 2026 2:33 pm

सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में 5 अक्टूबर को होगी सुनवाई

सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में 5 अक्टूबर को होगी सुनवाई

समाचार नामा 2 Oct 2026 2:21 pm

खादी के वस्त्रों पर 30 जनवरी तक 25 फीसदी छूट : मुख्यमंत्री योगी

खादी के वस्त्रों पर 30 जनवरी तक 25 फीसदी छूट : मुख्यमंत्री योगी

समाचार नामा 2 Oct 2026 12:40 pm

पीयूष गोयल ने व्यापार मंत्रियों से की मुलाकात

मिल्वौकी, केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने भारत के आर्थिक संबंधों को मजबूत करने के लिए कनाडा के अंतराष्ट्रीय व्यापार के मंत्री मनिंदर सिद्धू , यूके के बिजनेस, इनोवेशन, साइंस और ट्रेड सेक्रेटरी ऑफ स्टेट जोनाथन रेनॉल्ड्स और ऑस्ट्रेलिया के व्यापार और पर्यटन मंत्री सीनेटर डॉन फैरेल से मुलाकात की।

देशबन्धु 2 Oct 2026 11:12 am

गांधी जी का रामराज्य और भारत

भारत के बारे हमारे देश के महापुरुषों की स्पष्ट कल्पना थी। वे भारत की जड़ों से बहुत गहरे तक जुड़े हुए थे। लेकिन आज भारत का जो स्वरूप हमारी आंखों के सामने है, वह भारत के महापुरूषों की मान्यताओं के अनरूप नहीं कहा जा सकता। आज जो बुराई दिखाई देती है, वह अंग्रेजी मानसिकता को अपनाने वाले कुछ लोगों की देन है। जबकि गांधी जी स्वदेशी के पक्षधर थे। ऐसे में सवाल यह भी आता है कि इन लोगों को भारतीय जीवन मूल्यों के बारे में या तो पता नहीं था या फिर जानते हुए भी उसे पुनर्स्थापित नहीं करना चाहते थे। भारत को स्वतंत्रता मिलने के पश्चात इस बात पर गहन चिंतन किया गया कि अब कैसा भारत बनाना चाहिए। महात्मा गांधी की इस बारे में स्पष्ट कल्पना थी। वे कहते थे कि मैं एक ऐसे भारत का निर्माण करना चाहता हूँ जिसमें शराब जैसी बुराई का नामोनिशान न हो, जहां समाज में भेदभाव न हो, गौहत्या पाप हो और रामराज्य स्थापित हो। गांधी जी की दृष्टि में भविष्य के भारत की बुनियाद में पुरातन और सांस्कृतिक मानबिन्दुओं का समावेश था। वे जानते थे कि इसके बिना भारत नहीं, क्योंकि भारत का आधार ही राम है। इसे भी पढ़ें: गांधी का पुनर्जन्म ही नहीं, गांधी-दृष्टि का पुनर्जागरण हो भारत महात्मा गांधी के इन विचारों को हमारे राजनीतिक दल आत्मसात करने में संकोच कर रहे हैं। कहीं न कहीं इन बातों को एक सांप्रदायिक बताने का खेल भी चल रहा है, लेकिन ऐसा करने में वे भूल जाते हैं कि भारत में रामराज्य की संकल्पना स्वतंत्रता मिलने के बाद की नहीं है और न ही यह केवल महात्मा गांधी का ही विचार है, बल्कि महात्मा गांधी ने उसी बात को आगे बढ़ाने का प्रयास किया, जो भारत में सनातन काल से चल रहा है। भारत के मनीषियों ने जो सांस्कृतिक मूल्य स्थापित किए थे, गांधी जी ने उनका हृदय से अनुगमन किया और आत्मसात किया। इसीलिए वे भारत में इसके स्थापन का प्रयास करते दिखाई दिए। महात्मा गांधी ने अप्रत्यक्ष रूप से अंग्रेजों की उस नीति का भी विरोध किया, जो समाज में विभाजन की रेखा खींचती थी। इसलिए वे समाज में भाईचारे के भाव का विस्तार चाहते थे। महात्मा गांधी जैसा चाहते थे, उन्हें वैसा दृश्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रमों में दिखाई दिया। इसलिए वे अपने जीवन के अंतिम दिनों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नजदीक आते जा रहे थे। उन्होंने संघ के वर्धा शिविर में भाग लिया। वहां उन्होंने भेदभाव रहित समाज का दर्शन किया, जो उस समय उनकी कल्पना में अपेक्षित था। गांधी जी जानते थे कि सामाजिक एकता इस देश के लिए कितनी आवश्यक है। वर्तमान में समाज की फूट के चलते अनेक विसंगतियों का जन्म हो रहा है। व्यभिचार बढ़ रहे हैं। जो गांधी जी के विचार के प्रतिकूल है। गांधी जी भगवान राम को सभी धर्म और संप्रदाय से ऊपर मानते थे। आज भगवान राम को जिस प्रकार से केवल हिन्दू समाज से जोड़कर देखा जाता है, वह दृष्टि महात्मा गांधी की नहीं थी। श्रीराम जी का जीवन एक ऐसा आदर्श है जो सबके लिए उत्थानकारी है। गांधी जी ने राम को भारतीय दृष्टि से देखा। आज के समाज से भी यही अपेक्षा की जाती है कि वह राम जी को संकुचित दायरे से न देखकर भारतीयता की दृष्टि से देखें। ऐसा करेंगे तो उन्हें राम अपने दिखाई देंगे, भारत के दिखाई देंगे। महात्मा गांधी का पूरा चिंतन भारत के विकास पर भी केंद्रित रहा। उन्होंने देश में स्वदेशी भावना को जगाने के लिए स्वयं के जीवन से कई उदाहरण दिए। आज बाजार में जिस प्रकार से विदेशी वस्तुओं का आक्रमण हुआ है, उसके कारण हमारे देश का पैसा विदेशी संस्थाओं को आर्थिक रूप से मजबूत कर रहा है। अपने देश का पैसा अपने देश में ही रहे, इसलिए गांधी जी ने स्वदेशी का विचार अपने जीवन में अपनाया और समाज को प्रेरित किया। आज इस भाव को इसलिए भी अपनाने की आवश्यकता है, क्योंकि आज भारत को आत्मनिर्भर बनाने की आवश्यकता है, जो केवल स्वदेशी विचार से ही संभव है। इतना ही नहीं गांधी जी भारत में लघु एवं कुटीर उद्योगों की स्थापना को भी देश के विकास का मजबूत आधार मानते थे। हालांकि अब भारत का समाज स्वदेशी की ओर जाग्रत भाव के साथ अग्रसर हुआ है। महात्मा गांधी गौहत्या पर पूरी तरह से प्रतिबंध चाहते थे। हम जानते हैं गौ हमारे देश का अर्थशास्त्र है। गाय देश की आर्थिक उन्नति से जुड़ी है। देश में जब गौ आधारित खेती होती थी, तब देश धन धान्य से संपन्न था। धरती के सोना उगलने का समय भी यही था। वास्तव में गांधी जी का चिंतन अद्भुत था। उनका हर शब्द भारत की आत्मा ही था। हमें भारत की आत्मा को बचाना है तो गांधी जी विचारों को आत्मसात करना होगा। इसी से भारत की समृद्धि का मार्ग निर्मित होगा और हम आत्मनिर्भर भारत की दिशा में मजबूती के साथ आगे बढ़ेंगे। - सुरेश हिंदुस्थानी, वरिष्ठ पत्रकार

प्रभासाक्षी 2 Oct 2026 10:46 am

तमिलनाडु के पूर्व सीएम और 'भारत रत्न' के. कामराज की पुण्यतिथि पर उपराष्ट्रपति समेत कई नेताओं ने दी श्रद्धांजलि

तमिलनाडु के पूर्व सीएम और 'भारत रत्न' के. कामराज की पुण्यतिथि पर उपराष्ट्रपति समेत कई नेताओं ने दी श्रद्धांजलि

समाचार नामा 2 Oct 2026 10:40 am

Chandrashekhar Azad: नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ NBW, संपत्ति कुर्क करने का भी आदेश

Chandrashekhar Azad: नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ NBW, संपत्ति कुर्क करने का भी आदेश

समाचार नामा 2 Oct 2026 10:40 am

'महात्मा गांधी के विचारों ने पूरी दुनिया को प्रेरित किया', पीएम मोदी ने राजघाट जाकर बापू को पुष्पांजलि अर्पित की

'महात्मा गांधी के विचारों ने पूरी दुनिया को प्रेरित किया', पीएम मोदी ने राजघाट जाकर बापू को पुष्पांजलि अर्पित की

समाचार नामा 2 Oct 2026 8:17 am

आज से 8 अक्टूबर तक देशभर में चलेगा अभियान, मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग करेगी कांग्रेस

कांग्रेस सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने हरियाणा विधानसभा चुनाव के परिणाम और चुनाव प्रक्रिया को लेकर भाजपा सरकार तथा चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए हैं

देशबन्धु 2 Oct 2026 7:30 am

‘तीन दिन नहीं, तीन महीने जेल में रख लो’ दिपके का फडणवीस पर हमला

कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और गृह मंत्री देवेंद्र फडणवीस पर जुबानी हमला किया। उन्होंने राज्य सरकार को रणनीतिक गलतियां न करने की चेतावनी दी और अधिकारियों को चुनौती दी कि वे मुंबई में 2 अक्टूबर से होने वाले सीजेपी के प्रदर्शनों से पहले उन्हें गिरफ्तार करके दिखाएं।

देशबन्धु 1 Oct 2026 10:39 pm

अराकू को वैश्विक स्तर पर अग्रणी कॉफी गंतव्य बनाने की दिशा में सरकार: चंद्रबाबू नायडू

अराकू को वैश्विक स्तर पर अग्रणी कॉफी गंतव्य बनाने की दिशा में सरकार: चंद्रबाबू नायडू

समाचार नामा 1 Oct 2026 10:32 pm

ममता बनर्जी ने अपने कोलकाता आवास के बाहर भाजपा पर 'गुंडागर्दी' का आरोप लगाया

ममता बनर्जी ने अपने कोलकाता आवास के बाहर भाजपा पर 'गुंडागर्दी' का आरोप लगाया

समाचार नामा 1 Oct 2026 8:19 pm

यूपी के मंत्रियों ने कहा-सपा का घमंड 2027 में प्रदेश की जनता ध्वस्त करेगी

यूपी के मंत्रियों ने कहा-सपा का घमंड 2027 में प्रदेश की जनता ध्वस्त करेगी

समाचार नामा 1 Oct 2026 4:38 pm

ओडिशा के सीईओ गोपालन ने वीआरएस मांगा, एसआईआर प्रक्रिया से कोई लेना-देना नहीं

ओडिशा के सीईओ गोपालन ने वीआरएस मांगा, एसआईआर प्रक्रिया से कोई लेना-देना नहीं

समाचार नामा 1 Oct 2026 4:28 pm

US Midterm Elections 2026: वो कौन सा 'श्राप' है, जिससे कांपती है अमेरिकी सरकार, 3 नवंबर को क्या ट्रंप का 'झोला' उठने वाला है?

बचपन में कहते थे कि जमीन को खोदो तो दूसरी तरफ अमेरिका में निकलोगे। दुनिया तो गोल है लेकिन मैप को जूम करके देखें तो अमेरिका एकदम पश्चिम में नजर आता है। आज बात उसी अमेरिका के लोकतांत्रिक पहलू और वहां के चुनाव की करेंगे। अमेरिका में होने वाला मध्यावधि चुनाव भारत के मध्यावधि चुनाव से बिल्कुल अलग होता है और भारत में कोई सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाती तो मध्य अवधि चुनाव होता है लेकिन अमेरिका में मध्यावधि चुनाव की वजह ऐसी नहीं है। सबसे बड़ी बात ये है की चुनाव में मौजूद राष्ट्रपति ट्रंप की पार्टी हार भी जाती है और संसद में अल्पमत में भी जाती है तो भी जो राष्ट्रपति बने रहेंगे और अमेरिका के इस मध्यावधि चुनाव से जुड़ी ऐसी कई दिलचस्प जानकारी है जो आज आपको बताएंगे और इस चुनाव का विश्लेषण भी करेंगे क्योंकि इस चुनाव का असर ना केवल अमेरिका पर बल्कि पुरी दुनिया पर भी हो सकता है। चूंकि इस बार चा चुनाव राष्ट्रपति के कार्यकाल के बीच में आया है। इसी वजह से इसे मिड टर्म इलेक्शन के नाम से जाना जाता है। आज हम अमेरिका के मिड टर्म इलेक्शन की पूरी कहानी को समझेंगे। संसद के चुनाव से राष्ट्रपति की कुर्सी पर क्या असर पड़ता है? इसे भी पढ़ें: जान दांव पर लगा भारतीय पायलट ने छुड़ाया हाईजैक विमान! एक लाईन से नेतन्याहू-ट्रंप सब ने ठोका सलाम भारतीय संसद से कितना अलग? हिंदुस्तान में कानून बनाने वाले सबसे बड़े संस्था संसद है जिसे विधायक का भी कहते हैं। संसद के हिस्से हैं। पहला लोकसभा जिसे निचला सदन कहते हैं और दूसरा राज्यसभा जिसे ऊपरी सदन कहते हैं। लोकसभा के सदस्य का कार्यकाल 5 साल का होता है। वही राज्यसभा कभी भंग नहीं होती और इसके सदस्य का कार्यकाल छह वर्ष का होता है। इसी तरह अमेरिका में संसद को अमेरिकी कांग्रेस कहा जाता है और अमेरिकी कांग्रेस भी दो हसन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट में बंटा होता है। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में 435 मेंबर होते हैं। हर मेंबर का कार्यकाल सिर्फ दो साल का होता है। सीटों का निर्धारण जनसंख्या के आधार पर होता है। दूसरे सदन को सीनेट बोलते हैं। इसके सदस्यों की संख्या 100 है। कार्यकाल 6 बरस का होता है। हर दो बरस में एक तिहाई सदस्यों का कार्यकाल पूरा होता है और फिर चुनाव होता है। अमेरिका में कुल 50 राज्य हर राज्य से दो सेनेटर चुने जाते हैं। सीटों के बंटवारे में जनसंख्या की भूमिका यहां नहीं होती। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के ठीक मध्य में होने वाले ये चुनाव प्रशासन के एजेंडे पर एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय जनमत संग्रह (रेफरेंडम) के रूप में काम करेंगे। सभी 50 राज्यों में करोड़ों अमेरिकी मतदाता वाशिंगटन में सत्ता के संतुलन को तय करने के लिए मतदान करेंगे, जिससे अमेरिकी प्रतिनिधि सभा और अमेरिकी सीनेट दोनों के नियंत्रण का फैसला होगा। कैपिटल हिल के गलियारों से परे 2026 के मध्यावधि चुनाव राज्यों में कार्यकारी शक्ति को भी नया रूप देंगे। इस दौरान 36 राज्यों के गवर्नर पदों, दर्जनों राज्य अटॉर्नी जनरल, सेक्रेटरी पदों और राज्य विधानमंडलों के सदनों का भविष्य भी दांव पर होगा। अमेरिका में मध्यावधि चुनाव (मिडटर्म इलेक्शन) क्या होते हैं? संसदीय व्यवस्थाओं के विपरीत, जहाँ प्रधानमंत्री अपनी सुविधानुसार चुनाव करवा सकते हैं या संसद भंग कर सकते हैं, अमेरिकी संविधान के अनुच्छेद I और II के तहत राष्ट्रीय चुनावों का एक निश्चित और अटल कार्यक्रम तय है। मध्यावधि चुनाव वे आम चुनाव हैं जो अमेरिका में हर चार साल में होते हैं और ये राष्ट्रपति के चार साल के कार्यकाल के ठीक आधे समय पर आयोजित किए जाते हैं। हालांकि मध्यावधि चुनाव वाले साल में राष्ट्रपति पद के लिए मतदान नहीं होता है, लेकिन संघीय और राज्य स्तर की सत्ता के लगभग सभी अन्य महत्वपूर्ण पदों के लिए चुनाव होते हैं: प्रतिनिधि सभा: प्रतिनिधि सभा की सभी 435 वोटिंग सीटों पर हर दो साल में चुनाव होते हैं। प्रतिनिधियों का कार्यकाल दो साल का होता है, जिसका अर्थ है कि सभी 50 राज्यों के हर एक निर्वाचन क्षेत्र (डिस्ट्रिक्ट) को संसद में अपनी विधायी आवाज़ चुननी होगी। अमेरिकी सीनेट: सीनेटरों का कार्यकाल छह साल का होता है, जिन्हें तीन चुनावी वर्गों (Classes) में विभाजित किया गया है। सीनेट के लगभग एक-तिहाई हिस्से पर हर दो साल में चुनाव होते हैं। 2026 में, मतदाता क्लास 2 से संबंधित 33 नियमित सीटों के साथ-साथ अधूरे कार्यकाल को भरने के लिए होने वाले विशेष चुनावों पर भी फैसला करेंगे। गवर्नर पद के चुनाव: 36 राज्यों और तीन अमेरिकी क्षेत्रों (टेरिटरीज़) के कार्यकारी प्रमुख (गवर्नर) चुनाव का सामना करेंगे। गवर्नरों का राज्य के बजट, न्यायिक नियुक्तियों, कानून व्यवस्था, शिक्षा और राज्य स्तरीय स्वास्थ्य नीतियों पर व्यापक प्रभाव होता है। राज्य विधानमंडल और स्थानीय प्रशासनिक पद: राज्य सीनेट और राज्य प्रतिनिधि सभा की हज़ारों सीटों पर चुनाव होंगे। इसके साथ ही सेक्रेटरी ऑफ स्टेट (अधिकांश राज्यों में मुख्य चुनाव अधिकारी) और अटॉर्नी जनरल (मुख्य कानून प्रवर्तन अधिकारी) जैसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक पद भी दांव पर होंगे। बैलेट: दर्जनों राज्यों के नागरिक संवैधानिक संशोधनों, वैधानिक बदलावों, कर प्रस्तावों, प्रजनन अधिकारों से जुड़े उपायों और मतदान अधिकारों से जुड़े कानूनों पर सीधे मतदान करेंगे। इसे भी पढ़ें: भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर Piyush Goyal और Jamieson Greer की बातचीत सीनेट की 'स्टैगर्ड' चुनाव व्यवस्था क्या है और यह कैसे काम करती है? अमेरिकी संविधान बनाने वालों ने सीनेट को एक स्थिर और लगातार काम करने वाली संस्था के तौर पर बनाया था। एक ही चुनाव में सभी सदस्यों के बदलने से रोकने के लिए, उन्होंने सीनेट को तीन अलग-अलग क्लास में बांटा: क्लास 1: 2024, 2030 और उसके बाद चुनाव के लिए। क्लास 2: 2026, 2032 और उसके बाद चुनाव के लिए। क्लास 3: 2022, 2028 और उसके बाद चुनाव के लिए। 2026 में, क्लास 2 की उन सीनेट सीटों पर चुनाव होगा जो मूल रूप से 2020 में चुनी गई थीं। क्योंकि क्लास 2 में ऐतिहासिक रूप से कड़े मुकाबले वाले 'स्विंग स्टेट्स' की ज़्यादा सीटें शामिल रही हैं, इसलिए 2026 का सीनेट मैप दोनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियों के लिए एक बहुत ही अनिश्चित और कड़े मुकाबले वाला मैदान है। ऐतिहासिक रूप से मिडटर्म चुनाव (मध्य-अवधि चुनाव) व्हाइट हाउस में काबिज़ राजनीतिक पार्टी के लिए एक बड़ी संरचनात्मक चुनौती पेश करते हैं। राष्ट्रपति की पार्टी क्यों हारती है मध्यावधि चुनाव? जानिए क्या है 'मिडटर्म कर्स' अमेरिकी गृह युद्ध के बाद से मौजूदा राष्ट्रपति की पार्टी ने 90 प्रतिशत से ज़्यादा मिडटर्म चुनावों में हाउस की सीटें और ज़्यादातर चुनावों में सीनेट की सीटें गंवाई हैं। जानकार इस घटना को, जिसे अक्सर मिडटर्म कर्स या मिडटर्म पेनल्टी कहा जाता है, कई मुख्य वजहों से जोड़कर देखते हैं। विपक्षी पार्टी के वोटर आम तौर पर ज़्यादा राजनीतिक रूप से प्रेरित, नाराज़ और वोट देने के लिए ज़्यादा सक्रिय होते हैं, जबकि मौजूदा राष्ट्रपति का समर्थन करने वाले वोटर शायद निश्चिंत महसूस करते हों या कार्यकाल के दौरान किए गए समझौतों से असंतुष्ट हों। मिडटर्म चुनाव अनिवार्य रूप से देश के आर्थिक प्रदर्शन, लोगों की सोच (कंज्यूमर सेंटीमेंट), जीवन-यापन की लागत और प्रशासन के शुरुआती दो सालों में लिए गए फैसलों पर एक तरह का जनमत-संग्रह बन जाते हैं। राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतने वाले उम्मीदवार द्वारा बनाया गया गठबंधन अक्सर सरकार चलाने के दौरान नीतिगत मतभेदों का सामना करता है, जिससे अलग-अलग वोटिंग समूहों के बीच वोटिंग की संख्या को ऊंचे स्तर पर बनाए रखना मुश्किल हो जाता है। अमेरिका में मिडटर्म चुनाव कैसे जीता जाता है? मिडटर्म चुनाव जीतने के लिए राष्ट्रपति चुनाव अभियान की तुलना में बहुत अलग राजनीतिक रणनीतियों की ज़रूरत होती है। राष्ट्रपति चुनाव वाले वर्षों में वोटिंग आमतौर पर योग्य मतदाताओं के 60% से 66% के बीच होती है। इसके विपरीत, मिडटर्म चुनाव में वोटिंग ऐतिहासिक रूप से काफी कम हो जाती है, जो आमतौर पर 40% से 50% के बीच रहती है। वोटिंग कम होने के कारण, मतदाताओं का स्वरूप बदल जाता है। ज़्यादा उम्र के अमेरिकी, जो चुनाव के साल की परवाह किए बिना लगातार बड़ी संख्या में वोट करते हैं, मिडटर्म चुनाव में मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा बन जाते हैं। कम उम्र के मतदाता, कम आय वाले परिवारों के लोग और नागरिकता पाने वाले लोग मिडटर्म चुनाव में कम संख्या में वोट करते हैं, जब तक कि उन्हें बहुत अच्छी तरह से संगठित ज़मीनी अभियानों या ज़रूरी मुद्दों के ज़रिए प्रेरित न किया जाए। जो भी पार्टी अपने निष्क्रिय समर्थकों को सक्रिय मिडटर्म मतदाताओं में बदलने में सफल होती है, उसे चुनाव के दिन एक बड़ा संरचनात्मक फ़ायदा मिलता है। अमेरिकी राजनीतिक गठबंधनों में भी बड़े बदलाव होते रहते हैं। कॉलेज-शिक्षित मतदाता खासकर उपनगरीय इलाकों में तेज़ी से डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों के साथ जुड़ रहे हैं, जबकि ग्रामीण और औद्योगिक क्षेत्रों में बिना कॉलेज-शिक्षा वाले मज़दूर वर्ग के मतदाता रिपब्लिकन की ओर तेज़ी से झुके हैं। इस बीच, मज़दूर वर्ग के हिस्पैनिक, अफ़्रीकी-अमेरिकी और एशियाई-अमेरिकी पुरुषों ने अलग-अलग क्षेत्रों में वोटिंग के बदलते रुझान दिखाए हैं, जिससे राजनीतिक अभियान योजनाकारों के लिए पारंपरिक जनसांख्यिकीय अनुमान कम भरोसेमंद हो गए हैं। बिना किसी पार्टी से जुड़े स्वतंत्र मतदाता, जो कई राज्यों में सबसे तेज़ी से बढ़ने वाला राजनीतिक समूह हैं, उपनगरीय हाउस और सीनेट क्षेत्रों में कड़े मुक़ाबले वाले चुनावों में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। हाल के सालों में राज्यों की विधानसभाओं ने वोटिंग से जुड़े कानूनों में अहम बदलाव किए हैं, जिससे अमेरिकियों के वोट डालने का तरीका बदल गया है: अर्ली वोटिंग (समय से पहले वोटिंग) का समय: ज़्यादातर राज्य 3 नवंबर को होने वाले आधिकारिक चुनाव दिवस से पहले कई दिनों या हफ़्तों तक व्यक्तिगत रूप से अर्ली वोटिंग की सुविधा देते हैं। मेल-इन और एब्सेंटी बैलेट (डाक से वोटिंग): बिना किसी खास कारण के मेल-इन वोटिंग, हस्ताक्षर की जांच, ड्रॉप-बॉक्स की सुविधा और बैलेट मिलने की समय-सीमा से जुड़े नियम हर राज्य में अलग-अलग होते हैं। वोटों की गिनती और नतीजों की घोषणा का समय: क्योंकि राज्य मेल-इन और अर्ली बैलेट की प्रक्रिया अलग-अलग समय-सीमाओं के तहत पूरी करते हैं, इसलिए कड़े मुकाबले वाले चुनावों में खासकर कैलिफ़ोर्निया, एरिज़ोना और नेवादा जैसे राज्यों में अंतिम नतीजों की पूरी गिनती में कई दिन लग सकते हैं। इसे भी पढ़ें: भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर Piyush Goyal और Jamieson Greer की बातचीत अमेरिकी मध्यावधि चुनाव 2026: क्या उम्मीद की जा सकती है? 2026 के मध्यावधि चुनावों के नतीजे तय करेंगे कि 2028 तक अमेरिका की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ेगी और इससे 120वीं अमेरिकी कांग्रेस के लिए सत्ता का बुनियादी ढांचा भी तय होगा। अगर रिपब्लिकन दोनों सदनों पर अपना नियंत्रण बनाए रखते हैं, तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के पास बजट पैकेज पास करने, टैक्स कानूनों में बदलाव करने और जजों की नियुक्ति को मंज़ूरी दिलाने के लिए कानून बनाने का साफ़ रास्ता होगा। इसके विपरीत, यदि डेमोक्रेट कांग्रेस के किसी भी सदन पर कब्जा कर लेते हैं, तो वाशिंगटन में विभाजित सरकार का युग शुरू हो जाएगा: हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में बहुमत होने पर: डेमोक्रेट हाउस की सभी समितियों पर नियंत्रण कर लेंगे, जिससे उन्हें सम्मन जारी करने, कार्यकारी शाखा के निर्णयों की निगरानी करने, प्रतिस्पर्धी संघीय बजट विधेयक तैयार करने और एकतरफा विधायी पहलों को रोकने का पूर्ण अधिकार प्राप्त हो जाएगा। सीनेट में बहुमत होने पर: डेमोक्रेट न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया को नियंत्रित करेंगे, जिससे उन्हें संघीय जिला न्यायालयों, अपीलीय न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में न्यायिक उम्मीदवारों को रोकने या विलंबित करने की शक्ति प्राप्त होगी, साथ ही कार्यकारी शाखा की नियुक्तियों की भी गहन जांच करने का अधिकार होगा। आखिर में सबसे बड़ी बात... 2026 के ये मध्यावधि चुनाव सिर्फ संसद के नियंत्रण की जंग नहीं हैं, बल्कि यह 2028 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव का आधिकारिक लॉन्चिंग पैड भी साबित होंगे। अहम स्विंग और बैटलग्राउंड राज्यों में एकतरफा जीत दर्ज करने वाले गवर्नर रातों-रात 2028 की राष्ट्रपति रेस के सबसे बड़े दावेदार बनकर उभरेंगे। वहीं, जो सीनेटर या राष्ट्रीय नेता उपनगरीय और कामकाजी वर्ग के वोटरों में अपनी मजबूत पकड़ साबित करेंगे, 2028 के प्राइमरी घमासान से पहले उनका पलड़ा सबसे भारी हो जाएगा। यानी 3 नवंबर की यह रात सिर्फ आज का फैसला नहीं करेगी, बल्कि तय करेगी कि अगले चार साल बाद व्हाइट हाउस की चाबी किसके हाथ में होगी!

प्रभासाक्षी 1 Oct 2026 4:17 pm

चुनाव आयोग पर शक पैदा कर रहे हैं राहुल गांधी, कांग्रेस हताशा से घिरी : बीवाई विजयेंद्र

चुनाव आयोग पर शक पैदा कर रहे हैं राहुल गांधी, कांग्रेस हताशा से घिरी : बीवाई विजयेंद्र

समाचार नामा 1 Oct 2026 2:34 pm

भाजपा नेताओं ने कहा-इंडी ब्लॉक की बैठक का कोई एजेंडा नहीं, सब जानती है जनता

भाजपा नेताओं ने कहा-इंडी ब्लॉक की बैठक का कोई एजेंडा नहीं, सब जानती है जनता

समाचार नामा 1 Oct 2026 2:31 pm

हाईटेक होते वृद्धाश्रम और बेदखल होता बुढ़ापा

पुणे के समीप संचालित एक आधुनिक वृद्धाश्रम में जब एक बेसहारा बुजुर्ग के दाखिले के लिए संपर्क किया गया, तो वहां का मासिक शुल्क पचास हजार रुपये बताया गया। यह केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह हमारे समकालीन समाज के बदलते चरित्र, नैतिक पतन और बुजुर्गों के प्रति संवेदनहीनता का एक भयावह दस्तावेज़ है। भारत जैसे विकासशील देश में, जहां एक आम कामकाजी नागरिक या सेवानिवृत्त व्यक्ति की पूरी मासिक आय भी अक्सर इस आंकड़े तक नहीं पहुंच पाती, वहां बुढ़ापे की शरणस्थली का इतना खर्चीला होना एक गंभीर सामाजिक संकट की ओर इशारा करता है। यह इस कड़वी हकीकत को उजागर करता है कि जो वृद्धाश्रम कभी करुणा, सेवा और निस्वार्थ आश्रय के पवित्र केंद्र हुआ करते थे, वे अब कॉर्पोरेट शैली के आलीशान रिसॉर्ट्स और फाइव स्टार होटलों में तब्दील हो चुके हैं। जब जीवन के अंतिम पड़ाव पर मिलने वाली सुरक्षा और गरिमा भी पूरी तरह से बाजारवाद की वस्तु बन जाए, तो समाज के गरीब, निम्न-मध्यमवर्गीय और सर्वहारा बुजुर्गों के जीवित रहने की उम्मीदें ही दम तोड़ने लगती हैं। यह स्थिति इस बुनियादी लोकतांत्रिक और मानवीय सवाल को जन्म देती है कि क्या सम्मान से जीने और शांति से मरने का अधिकार केवल समाज के धनाढ्य वर्ग तक ही सीमित रह गया है? इस संकट की जड़ें हमारे सामाजिक और पारिवारिक ढांचे में आए गहरे बिखराव से जुड़ी हुई हैं। भारत की पहचान सदियों से संयुक्त परिवार की उस व्यवस्था से रही है, जहां बुजुर्गों को घर का 'बरगद' माना जाता था, जिनकी छत्रछाया में पूरी गोत्र और पीढ़ियां खुद को सुरक्षित महसूस करती थीं। लेकिन वैश्वीकरण, तीव्र शहरीकरण और आधुनिक जीवनशैली की अंधी दौड़ ने इस पारंपरिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया है। आज की युवा पीढ़ी रोजगार, करियर और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की तलाश में महानगरों या सुदूर विदेशों की ओर पलायन कर रही है, जहां उनके जीवन में माता-पिता के लिए स्थान संकुचित होता जा रहा है। कई मामलों में तो युवा दंपति बुजुर्गों को अपने साथ रखना एक अनुत्पादक बोझ समझने लगते हैं। इसी पारिवारिक अलगाव और सामाजिक लाचारी को आज कॉर्पोरेट जगत ने एक बहुत बड़े व्यावसायिक अवसर के रूप में पहचान लिया है। अब इन संस्थानों को 'वृद्धाश्रम' जैसे पारंपरिक और संवेदनशील नामों के बजाय 'सीनियर लिविंग सोसाइटीज', 'सिल्वर होम्स' या 'रिटायरमेंट रिसॉर्ट्स' जैसे आकर्षक और भ्रामक नामों से प्रचारित किया जा रहा है, ताकि समाज में बुजुर्गों को छोड़ने के अपराध बोध को एक स्टेटस सिंबल में बदला जा सके। इसे भी पढ़ें: International Day for Older Persons: वृद्ध व्यक्ति परिवार पर बोझ नहीं, बल्कि परिवार और समाज की जीवित पूंजी हैं! महीने के पचास हजार रुपये या उससे अधिक की भारी-भरकम राशि वसूलने वाले ये हाईटेक आश्रम अपने विज्ञापनों में वातानुकूलित कमरों, आलीशान आंतरिक सज्जा, चौबीस घंटे वाई-फाई, आधुनिक जिम, स्विमिंग पूल, क्लब हाउस और कस्टमाइज्ड डाइट प्लान जैसी सुख-सुविधाओं का बढ़-चढ़कर दावा करते हैं। यह पूरा परिदृश्य बाहर से देखने पर अत्यंत आकर्षक और किसी पर्यटन स्थल जैसा प्रतीत हो सकता है, परंतु गहराई से विचार करने पर इसकी खोखली और वीरान प्रकृति साफ दिखाई देती है। जीवन के सांध्यकाल में पहुंचे, अपनों से उपेक्षित और अकेलेपन से जूझ रहे किसी बुजुर्ग को बुढ़ापे में इन कृत्रिम और यांत्रिक सुख-सुविधाओं की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि उन्हें दो पल के सच्चे प्यार, अपनों के साथ संवाद और मानसिक संबल की दरकार होती है। इन कॉर्पोरेट संस्थानों ने सुख और विलासिता के साधन तो ऊंचे दामों पर बेच दिए, लेकिन वे उस मानवीय अपनत्व और मानसिक शांति को नहीं बेच पाए जो केवल एक परिवार के भीतर ही संभव है। यह एक ऐसी विडंबना है जहां बुजुर्गों के पास सोने के लिए मखमली बिस्तर तो मौजूद है, लेकिन उस पर चैन की नींद सोने के लिए जरूरी पारिवारिक स्नेह और मानसिक संतोष पूरी तरह नदारद है। इस पूरे परिदृश्य का सबसे मार्मिक और चिंताजनक पहलू यह है कि इस नई व्यवस्था ने देश के गरीब और मध्यम वर्ग के बुजुर्गों को पूरी तरह से हाशिए पर धकेल दिया है। भारत की एक बहुत बड़ी आबादी आज भी असंगठित क्षेत्रों में दिहाड़ी मजदूरी या छोटे-मोटे काम करके अपना जीवन यापन करती है, जिनके पास न तो भविष्य के लिए कोई बड़ी जमापूंजी होती है और न ही बुढ़ापे को सुरक्षित करने के लिए कोई सरकारी पेंशन। यदि ऐसे परिवारों में संतानों द्वारा माता-पिता का परित्याग कर दिया जाए, तो वे इन महंगे आश्रमों की चौखट तक लांघने की कल्पना भी नहीं कर सकते। परिणामस्वरूप, ऐसे बेसहारा वृद्ध सड़कों पर, रेलवे स्टेशनों पर या धार्मिक स्थलों के बाहर अत्यंत दयनीय परिस्थितियों में भीख मांगने या लावारिस मौत मरने को मजबूर हो जाते हैं। दूसरी ओर, देश की विशाल जनसंख्या के अनुपात में सरकारी वृद्धाश्रमों की संख्या नगण्य है, और जो गिने-चुने मुफ्त या चैरिटेबल आश्रम संचालित भी हो रहे हैं, उनमें से अधिकांश की स्थिति इतनी जर्जर और अमानवीय है कि वहां बुनियादी स्वच्छता, शुद्ध पेयजल और न्यूनतम चिकित्सा सुविधाओं का भी घोर अभाव रहता है। ऐसे में देश के निर्धन बुजुर्गों के लिए बुढ़ापा एक अभिशाप और अंतहीन यातना का पर्याय बन चुका है। यद्यपि भारत सरकार ने बुजुर्गों के अधिकारों और उनके भरण-पोषण की रक्षा के लिए 'माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007' जैसा कड़ा कानून बनाया है, जिसके तहत संतानों के लिए अपने वृद्ध माता-पिता की देखभाल करना कानूनी रूप से अनिवार्य है। लेकिन व्यावहारिक धरातल पर इस कानून की सीमाएं और विफलताएं साफ नजर आती हैं। कोई भी भारतीय माता-पिता, चाहे उन पर दुखों का कितना भी पहाड़ क्यों न टूट पड़े, अपने ही बच्चों के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराने या उन्हें जेल भिजवाने के लिए कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। वे सामाजिक लोक-लाज, समाज के उपहास और अपनी अगाध ममता के वशीभूत होकर चुपचाप अपमान और प्रताड़ना को सहना ही अपनी नियति मान लेते हैं। इसी कानूनी लाचारी और सामाजिक संकोच का अनुचित लाभ उठाकर कई असंवेदनशील संतानें बुजुर्गों को उनकी अपनी ही गाढ़ी कमाई से बनाए गए घरों से बेदखल कर देती हैं और व्यवस्था मूकदर्शक बनी रहती है। जब जीवन की बुनियादी आवश्यकताएं जैसे कि शिक्षा, स्वास्थ्य और अब बुढ़ापे का आश्रय भी पूरी तरह से बेलगाम बाजारवाद और पूंजीपतियों के हवाले कर दिए जाते हैं, तो समाज में सामाजिक और आर्थिक असमानता की खाई और अधिक चौड़ी तथा हिंसक हो जाती है। इसलिए, निजी वृद्धाश्रमों के इस अनियंत्रित और संवेदनहीन व्यावसायीकरण पर तुरंत रोक लगाना अनिवार्य हो गया है। सरकार को इन निजी संस्थानों की मनमानी फीसों और कार्यप्रणाली को नियंत्रित करने के लिए एक सख्त नियामक संस्था या वैधानिक निकाय का गठन करना चाहिए, जो यह सुनिश्चित करे कि कोई भी व्यावसायिक घराना किसी बुजुर्ग की मजबूरी और लाचारी का सौदा न कर सके। इसके साथ ही, सरकार को देश के प्रत्येक जिले में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल के आधार पर ऐसे किफायती, स्वच्छ और सुरक्षित वृद्धाश्रमों का निर्माण करना चाहिए, जहां मध्यम और गरीब वर्ग के बुजुर्ग बिना किसी आर्थिक मानसिक तनाव के गरिमापूर्ण जीवन व्यतीत कर सकें। साथ ही, कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) के नियमों में संशोधन करके बड़ी कंपनियों के मुनाफे का एक निश्चित हिस्सा गरीब बुजुर्गों के मुफ्त आश्रय, भोजन और चिकित्सा के लिए अनिवार्य रूप से आरक्षित किया जाना चाहिए। अंततः, केवल कड़े कानून बनाने, अदालती आदेशों या सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन मात्र से इस अत्यंत संवेदनशील समस्या का पूर्ण और स्थाई समाधान संभव नहीं है। यह एक गंभीर सामाजिक, मानसिक और नैतिक व्याधि है, जिसका उपचार हमें अपने परिवारों और व्यक्तिगत चेतना से प्रारंभ करना होगा। हमें अपनी शिक्षा प्रणाली और पारिवारिक संस्कारों में ऐसे नैतिक मूल्यों को पुनर्जीवित करना होगा जो नई पीढ़ी को यह समझा सकें कि माता-पिता कोई उपयोग के बाद फेंक दी जाने वाली वस्तु या वित्तीय दायित्व नहीं हैं, बल्कि वे हमारे जीवन की सबसे अमूल्य धरोहर और सांस्कृतिक पूंजी हैं। जिस समाज या राष्ट्र में उसके बुजुर्गों की आंखों में अकेलेपन का आंसू, तिरस्कार का दर्द और असुरक्षा का भाव व्याप्त हो, वह समाज विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में कितनी भी प्रगति क्यों न कर ले, आत्मिक और नैतिक रूप से सदैव दरिद्र ही रहेगा। पुणे के आश्रम का यह पचास हजार रुपये का मासिक शुल्क हम सभी के लिए एक गंभीर चेतावनी है, जिसे यदि आज हमने अनदेखा कर दिया, तो आने वाले समय में बुढ़ापा केवल धनवानों का एक विशेषाधिकार बनकर रह जाएगा और देश की एक बहुत बड़ी गरीब आबादी के हिस्से में केवल लाचारी, सड़कों की धूल और घोर उपेक्षा ही आएगी। समय रहते इस बाजारवाद के विरुद्ध खड़े होना और अपनी सामाजिक आत्मा को जगाना आज के समय की सबसे बड़ी पुकार है। - अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार

प्रभासाक्षी 1 Oct 2026 11:46 am

झारखंड में एसआईआर की प्रक्रिया का अंतिम चरण शुरू, नोटिस पाने वाले 63 लाख मतदाताओं के घर तक पहुंचेंगे बीएलओ

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समाचार नामा 1 Oct 2026 10:42 am

'स्वच्छता ही सेवा' अभियान: दिल्ली में अलग-अलग जगह केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों ने चलाया सफाई अभियान

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समाचार नामा 1 Oct 2026 10:37 am

पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को जन्मदिन पर प्रधानमंत्री मोदी समेत कई नेताओं ने दी बधाई

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समाचार नामा 1 Oct 2026 8:31 am

सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ उद्धव-कांग्रेस का मोर्चा, भाजपा बोली- घुसपैठियों को बचाना चाहता है विपक्ष

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार द्वारा लिए गए वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के फैसले ने महाराष्ट्र से लेकर दिल्ली तक सियासी पारा चढ़ा दिया है।

देशबन्धु 1 Oct 2026 12:25 am

कर्नाटक में एसआईआर विवाद के बीच सीएम ने मांगा फॉर्म-7 का डेटा, बोले- हर असली मतदाता का अधिकार सुरक्षित रहे

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समाचार नामा 30 Sep 2026 11:27 pm

चुनाव केवल सरकार बनाने और सत्ता से हटाने का माध्यम नहीं, चार वर्षों का हिसाब भी लेना है: प्रशांत किशोर

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समाचार नामा 30 Sep 2026 10:37 pm

सपा सरकार में केवल गुंडागर्दी और जमीन कब्जाने की घटनाएं, सत्ता का मिला था पूरा संरक्षण: अनिल राजभर

सपा सरकार में केवल गुंडागर्दी और जमीन कब्जाने की घटनाएं, सत्ता का मिला था पूरा संरक्षण: अनिल राजभर

समाचार नामा 30 Sep 2026 10:24 pm

भाजपा की 'बल्लारी चलो' से प्रेरित है कांग्रेस की 'भारत जोड़ो 2.0' पदयात्रा: विजयेंद्र

भाजपा की 'बल्लारी चलो' से प्रेरित है कांग्रेस की 'भारत जोड़ो 2.0' पदयात्रा: विजयेंद्र

समाचार नामा 30 Sep 2026 8:34 pm

ग्रीन एनर्जी स्कीम 2035 तक 900 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य हासिल करने की दिशा में 'बड़ा कदम': पीएम मोदी

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समाचार नामा 30 Sep 2026 7:40 pm

पश्चिम बंगाल में बाल विवाह और कम उम्र में मां बनने के मामलों पर सरकार सख्त, जीरो टॉलरेंस का अपनाया रुख

पश्चिम बंगाल में बाल विवाह और कम उम्र में मां बनने के मामलों पर सरकार सख्त, जीरो टॉलरेंस का अपनाया रुख

समाचार नामा 30 Sep 2026 6:34 pm

पाकिस्तान: शहबाज के मंत्री बोले, 'केपी में इमरजेंसी लगाने पर गंभीरता से विचार कर रही केंद्र सरकार'

पाकिस्तान: शहबाज के मंत्री बोले, 'केपी में इमरजेंसी लगाने पर गंभीरता से विचार कर रही केंद्र सरकार'

समाचार नामा 30 Sep 2026 6:23 pm

डिजिटल रुपया क्या है? यह यूपीआई से कैसे अलग है? इसे बिना इंटरनेट के चलाने के लिए आरबीआई क्या तैयारी कर रही है?

डिजिटल रुपया (e₹) और यूपीआई (UPI) दोनों डिजिटल भुगतान से जुड़े हैं, लेकिन दोनों की प्रकृति अलग है। आइए सबसे पहले जानते हैं कि डिजिटल रुपया क्या है? दरअसल डिजिटल रुपया या e₹ भारत की केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (CBDC) है। इसे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) जारी करता है, इसलिए यह स्वयं रुपये का डिजिटल रूप है—जैसे ₹100 का नोट भौतिक रूप में है, वैसे ही e₹ डिजिटल रूप में। इसे डिजिटल वॉलेट में रखा जा सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक ने साफ किया है कि डिजिटल रुपया अब खुदरा व थोक दोनों क्षेत्रों में पायलट चरण में है। भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार 'ई' ₹ को बैंकों और गैर-बैंक संस्थाओं के डिजिटल वॉलेट में रखा जा सकता है। इससे व्यक्ति-से-व्यक्ति और व्यक्ति-से-दुकानदार भुगतान किया जा सकता है। गौरतलब है कि आरबीआई के 'ई'₹ वॉलेट में न्यूनतम राशि रखने की जरूरत नहीं है और इसके इस्तेमाल पर अलग से शुल्क नहीं है। इसे भी पढ़ें: UPI पेमेंट्स का हिसाब रखना हुआ आसान, ऐसे देखें अलग-अलग ऐप के लेनदेन आरबीआई ने यह भी साफ किया है कि बिना इंटरनेट से संभव हो सकने वाला 'ई'₹ भुगतान अभी बड़े पैमाने पर आम लोगों के लिए शुरू नहीं हुआ है, क्योंकि इसके अलग-अलग तकनीकी विकल्पों का लगातार परीक्षण किया जा रहा है। इसलिए इसकी अंतिम तकनीक, लेन-देन की सीमा, सुरक्षा व्यवस्था और आम लोगों के लिए लॉन्च की तारीख को लेकर अभी कोई निश्चित घोषणा नहीं हुई है। उल्लेखनीय है कि भारतीय रिजर्व बैंक ने 2022 में जारी ढांचे के तहत कार्ड, वॉलेट और मोबाइल उपकरणों के जरिए बिना इंटरनेट या दूरसंचार कनेक्टिविटी के भी कुछ ऑफलाइन भुगतान की अनुमति दी थी, जिसके तहत भुगतान आमने-सामने यानी निकट दूरी पर किया जाता है। बाद में यूपीआई लाइट एक्स के जरिये एनएफसी आधारित ऑफलाइन भुगतान की सुविधा भी विकसित की गई। # अब आइए जानते हैं कि e₹ और UPI में मुख्य अंतर क्या है? एक, डिजिटल रुपया (e₹) आरबीआई की डिजिटल मुद्रा है, जबकि UPI भुगतान का आधुनिक डिजिटल माध्यम है। दो, डिजिटल रुपया (e₹) डिजिटल वॉलेट में रखा जा सकता है, जबकि यूपीआई में बैंक खाते से सीधे भुगतान होता है। तीन, डिजिटल रुपया व्यक्ति और दुकानदार के बीच सीधा भुगतान किया जा सकता है। जबकि यूपीआई क्यूआरकोड, मोबाइल नंबर या यूपीआई आईडी से भुगतान किया जा सकता है। चार, भविष्य में ब्लू टूथ, एनएफसी के जरिए बिना इंटरनेट भुगतान की सुविधा देने पर काम हो रहा है। जबकि यूपीआई में सीमित ऑफलाइन विकल्प विकसित किए हुए हैं। पांच, डिजिटल रुपया रुपये का डिजिटल रूप है जोभुगतान करने का माध्यम/प्रणाली है। इसे आरबीआई जारी करता है। जबकि UPI का संचालन NPCI करता है। छह, डिजिटल रुपया कहाँ रहता है? e₹ वॉलेट में बैंक खाते से भुगतान होता है। जबकि यूपीआई की भूमिका डिजिटल मुद्रापैसा भेजने का माध्यम है। सात, डिजिटल रुपया भुगतान का आधार e₹ से e₹ वॉलेट में लेन-देन हो सकता है। बैंक खाते से बैंक खाते में भुगतान हो एकता है। अब इंटरनेट के बिना RBI इसके लिए ऑफलाइन तकनीकें विकसित/परीक्षण कर रहा है। जबकि UPI में भी UPI Lite X जैसी NFC-आधारित ऑफलाइन सुविधा है। RBI स्वयं स्पष्ट करता है कि e₹ डिजिटल रुपये का रूप है, जबकि UPI भुगतान का माध्यम है। e₹ को बैंक खाते से निकालकर अलग डिजिटल वॉलेट में रखा जा सकता है और CBDC लेन-देन में धन सीधे दो e₹ वॉलेट के बीच स्थानांतरित हो सकता है। चूंकि बिना इंटरनेट e₹ चलाने की RBI की तैयारी है। इसलिए यह सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। RBI के अनुसार ऑफलाइन e₹ के लिए अलग-अलग तकनीकी समाधान तलाशे और परीक्षण किए जा रहे हैं। इनमें प्रमुख रूप से: एक, Telecom-assisted offline: ऐसी व्यवस्था जिसमें इंटरनेट उपलब्ध न हो, लेकिन मोबाइल/टेलीकॉम कनेक्टिविटी उपलब्ध हो। दो, NFC आधारित भुगतान: दो पास-पास रखे NFC-सक्षम उपकरणों के बीच संचार के जरिए लेन-देन। यानी भविष्य में इंटरनेट न होने पर भी बहुत छोटी दूरी में फोन को टैप करके भुगतान संभव बनाने की दिशा में काम हो रहा है। RBI ने इसे e₹ के ऑफलाइन प्रयोगों में शामिल बताया है। तीन, RBI ने छोटे मूल्य के ऑफलाइन डिजिटल भुगतानों के लिए व्यापक ढांचा बनाया है: इसमें कार्ड, वॉलेट और मोबाइल उपकरणों के जरिए बिना इंटरनेट/टेलीकॉम कनेक्टिविटी के proximity यानी आमने-सामने भुगतान की व्यवस्था का प्रावधान है। चार, एक आसान उदाहरण: मान लीजिए किसी दूरदराज के गांव में इंटरनेट बंद है। सामान्य UPI भुगतान में बैंक से भुगतान कराने के लिए नेटवर्क की समस्या आ सकती है। भविष्य के ऑफलाइन e₹ मॉडल में फोन के डिजिटल वॉलेट में पहले से मौजूद e₹ का इस्तेमाल स्थानीय रूप से किया जा सकेगा। NFC जैसे समाधान में दो नजदीकी उपकरण आपस में डेटा का आदान-प्रदान कर सकते हैं। इसका उद्देश्य मूलतः डिजिटल भुगतान को नकदी जैसी उपलब्धता देना है—विशेषकर कमजोर इंटरनेट वाले ग्रामीण, दूरदराज या नेटवर्क-विहीन क्षेत्रों में। एक पंक्ति में यदि कहूं तो UPI पैसे भेजने का डिजिटल रास्ता है, जबकि e₹ स्वयं डिजिटल रुपया है। RBI की ऑफलाइन रणनीति का लक्ष्य e₹ को इस तरह विकसित करना है कि इंटरनेट न होने पर भी डिजिटल भुगतान के कुछ रूप संभव हों। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 30 Sep 2026 6:02 pm

NDA से अलग होकर अब योगी से भिड़ेंगे 'मोदी के हनुमान'?चिराग पासवान का UP प्लान क्या है,चौंका देगी सच्चाई!

मुझे शर्म आती है कि मैं इस सरकार के साथ हूं... प्रशासन पूरी तरह निकम्मा हो चुका है। यह किसी विपक्षी नेता का हमला नहीं, बल्कि केंद्र सरकार में मंत्री और खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हनुमान कहने वाले चिराग पासवान का खुला ऐलान-ए-जंग है। बिहार में बेलगाम अपराध और हालिया वारदातों पर चिराग के इन तल्ख तेवरों ने सूबे से लेकर दिल्ली तक के सियासी गलियारों में भूचाल ला दिया है। हैरानी इसलिए भी है क्योंकि जिस सरकार पर वह सवाल उठा रहे हैं, उसमें चिराग खुद हिस्सेदार हैं। जिस प्रशासन को वो निकम्मा बता रहे हैं, उसकी कमान सीधे डिप्टी सीएम और गृह मंत्री सम्राट चौधरी के हाथों में है। वही सम्राट चौधरी, जिन्हें सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाने में चिराग का कंधा भी लगा था। ऐसे में बड़ा सवाल यही उठता है कि आखिर चिराग पासवान के मन में पक क्या रहा है? क्या यह सम्राट चौधरी के खिलाफ सत्ता के भीतर से शुरू हुई कोई सुनियोजित घेराबंदी है? या फिर इसकी पटकथा 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को देखते हुए लिखी जा रही है? क्या बिहार में दबाव बनाकर चिराग यूपी में बीजेपी से अपनी शर्तों पर गठबंधन की जमीन तलाश रहे हैं? अपनों पर ही चिराग का यह तीखा वार महज़ कानून-व्यवस्था पर गुस्सा है, या फिर एनडीए के भीतर किसी बड़े सियासी खेल की शुरुआत? आइए आज इस बगावती तेवर के पीछे की रणनीति का एमआरआई स्कैन करते हैं। महज़ कानून-व्यवस्था पर गुस्सा है,या किसी सियासी खेल की शुरुआत 26 सितंबर को सिटी पोस्ट के कॉनक्लेव में चिराग पासवान पहुंचे थे। उनसे सवाल पूछा गया क्या आप मानते हैं कि बिहार में अपराधी बेखौफ हैं। दलित सुरक्षित नहीं है। बेटियां सुरक्षित नहीं है। इस पर चिराग पासवान का जवाब था कोई भी सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रहा है। आज की तारीख में। यह चिंता हमारी सरकार की है। एक सहयोगी और सरकार का हिस्सा होने के नाते मैं खुद इस सवाल से नहीं भाग सकता हूं। मुझे खुद शर्मिंदगीगी होती है जब मैं सोचता हूं कि मैं एक ऐसी सरकार के साथ हूं जहां ऐसी घटनाएं हो रही हैं। यह चिंता का विषय है और इसको कतई हम लोग हल्के में जाने नहीं दे सकते। चिराग ने आगे कहा राष्ट्रीय स्तर पर मेरे बिहार की छवि कैसी जा रही है? हमारे बिहार की बेटियों में सोचिए कैसे डर और सुरक्षा का माहौल उत्पन्न हो गया है। आज की तारीख में कोई बच्ची मुझे बता दीजिए जो शाम को निकलने से पहले 100 बार ना सोचती होगी। तो ऐसे में जिस सरकार का मैं हिस्सा हूं मेरी वह सरकार एक्सेंस ऑफ सिक्योरिटी ना दे पाए यह तो मैं स्वीकार नहीं करूंगा। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में मंत्री चिराग पासवान के बयान का टोन नया नहीं है। बिहार में यह टोन बहुत पुराना है। उन्हीं के गठबंधन के सबसे बड़े नेता नरेंद्र मोदी खुद इसी टोन में बयान देते रहे हैं। गृह मंत्री अमित शाह इस टोन का इस्तेमाल करते रहे हैं। ऐसे शब्दावली का इस्तेमाल करते रहे हैं। पूरी बीजेपी इसी भाषा में राष्ट्रीय जनता दल यानी आरजेडी, लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव को निशाना बनाती रहती है। हमले किए जाते हैं कि लालू राज में बिहार में सूर्यास्त के बाद कोई घर से निकल नहीं पाता था। इसे भी पढ़ें: BJP नेता Smriti Irani का हमला, हार के बाद Congress कर रही संवैधानिक संस्थाओं का अपमान क्या सम्राट चौधरी के खिलाफ सत्ता के भीतर शुरू हुई सुनियोजित घेराबंदी? चिराग उस गठबंधन का हिस्सा हैं जो बिहार में सरकार चला रही है। लोजपा रामविलास के 19 विधायक हैं। सम्राट चौधरी की सरकार में पार्टी के दो मंत्री भी हैं। लोकसभा में पार्टी के पांच सांसद हैं। केंद्र सरकार में एक मंत्री भी हैं जो कि खुद चिराग पासवान हैं। लेकिन बिहार में बढ़ते क्राइम पर उनकी चिंता अब तक सिर्फ बयानों में ही दिखी है। लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने एक्स पर लिखा है इस्तीफा देने के लिए किस शुभ मुहूर्त का इंतजार कर रहे हैं चिराग पासवान शर्म का बोझ उठाकर भी सत्ता का हिस्सा बने रहना कोई चिराग पासवान जी से सीखे। बहन बेटियों की सुरक्षा के लिए पूरी तरह से असुरक्षित हो चुके बिहार की वजह से जब सरकार का हिस्सा होने में उन्हें शर्मिंदगीगी महसूस हो ही रही है तो इस्तीफा देने की हिम्मत कौन से मुहूर्त के इंतजार में रुकी हुई है। चिराग पासवान के बयान की वजह से सम्राट चौधरी या उनकी सरकार की कार्यशैली खास बदलती दिख तो नहीं रही है या उनके बयान का लोड लेते हुए भी सम्राट चौधरी नहीं दिख रहे हैं। चिराग बीजेपी पर अटैक करके उसे बेवजह तो नाराज नहीं ही करना चाहेंगे। दिल्ली का समन उन्हें क्यों चाहिए? तो क्या यह कहीं पर निगाहें और कहीं पर निशाना वाला मामला है। इसे समझने के लिए 2025 बिहार चुनाव से ऐन पहले के वक्त को देखना होगा। जून जुलाई के महीने में एक के बाद एक चिराग के बयान आ रहे थे। लगातार नीतीश कुमार के नेतृत्व में चल रही सरकार को टारगेट कर रहे थे। यहां तक कह गए कि बिहार में ऐसा लगता है कि पुलिस प्रशासन ने अपराधियों के सामने सरेंडर कर दिया है। तब भी चिराग पासवान यही कह रहे थे कि उन्हें एक ऐसी सरकार का समर्थन करने पर दुख है। तब इन बयानों का विश्लेषण हुआ कि यह सब सीट शेयरिंग के टेबल पर जाने की तैयारी है। प्रेशर क्रिएट किया जा रहा है ताकि लोजपा रामविलास को ज्यादा से ज्यादा सीटें एनडीए में मिल सके। यूपी का चुनाव भी एक फैक्टर हुआ यह कि जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने दलित और महादलित दो कैटेगरी बांट दिया और जिसकी वजह से किसी जमाने में दलितों की राजनीति करने वाले रामविलास पासवान सिर्फ पासवान के नेता बनकर रह गए क्योंकि बाकी महादलितों के नेता या तो नीतीश कुमार हो गए या जीतन राम मांझी हो गए। वो दर्द आज भी पासवान की पार्टी को है कि पूरी राजनीतिक जमा पूंजी खत्म कर दी। अब वो मजबूरी है। रहना तो एनडीए में ही है। जा भी नहीं सकेंगे क्योंकि सत्ता सबको अच्छी लगती है। मलाई खाना सबको अच्छा लगता है। लेकिन स्टेटमेंट देकर दबाव बनाने की कोशिश है। चिराग पासवान फिर 2025 वाली भाषा का इस्तेमाल करने लगे हैं। कह रहे हैं कि उन्हें दुख और शर्मिंदगीगी महसूस हो रही है कि वह एक ऐसी सरकार का समर्थन कर रहे हैं जो बिहार में सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पा रही। लेकिन अब किस चुनाव में सीट शेयरिंग के टेबल पर बारगेनिंग करना चाहते हैं चिराग पासवान। यूपी में चुनाव होने वाले हैं। जहां चिराग पासवान चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। वह पार्टी का विस्तार करना चाहते हैं। तो चुनाव में अपनी पार्टी के लिए ज्यादा से ज्यादा सीटें मांगेंगे। पिछले बिहार चुनाव में भी सीट लेने के लिए नीतीश कुमार पर अटैक कर रहे थे। चिराग पासवान एक अच्छे बारगेनर हैं। इसलिए यूपी का चुनाव भी एक फैक्टर है। यूपी में जदयू कौन बनेगा और कौन होगा नीतीश कुमार? उत्तर प्रदेश में विधनसभा चुनाव वैसे तो अगले बरस है, लेकिन राजनीतिक दलों की ओर से तैयारियां तेज हो चली हैं। इस बार चुनावी मैदान में बिहार की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) भी उतरने की तैयारी में है। पार्टी प्रमुख और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने प्रयागराज में यूथ बोले तो कार्यक्रम के जरिए विधानसभा चुनाव के लिए अभियान का आगाज किया है। पार्टी ने साफ किया है कि उनकी तैयारी सभी 403 सीटों पर चल रही है। प्रयागराज से चिराग पासवान के ऐलान ने प्रदेश में राजनीतिक हलचल को तेज किया है। दरअसल, लोजपा (रामविलास) केंद्र और बिहार में एनडीए के साथ है। वहीं, यूपी चुनाव में पार्टी की तैयारी भाजपा को टक्कर देने की है। चिराग ने तो यह तक कह दिया है कि गठबंधन हो या ना हो उनकी पार्टी यूपी चुनाव लड़ेगी जरूर। यह बयान सुनते ही पॉलिटिक्स पर नजर रखने वालों को 2020 का बिहार चुनाव याद आ सकता है। जब खुद चिराग ने कहा था कि एनडीए गठबंधन में उन्हें 15 सीटें दी जा रही थी। उन्होंने नीतीश कुमार से भी नाराजगी जाहिर की थी तब जिसकी वजह से चिराग पासवान ने अकेले ही बिहार चुनाव में उतरने का निर्णय किया था। वह उतरे भी चुनाव लड़े उन्हें जीत तो हासिल नहीं हुई लेकिन उनकी वजह से जदयू को ठीक-ठाक नुकसान हो गया। नतीजों के बाद कहा गया कि चिराग जिस मिशन पर निकले थे यानी निकाले गए थे वह आखिरकार पूरा हुआ। यानी कम सीटें चिराग पासवान के लिए किसी गठबंधन में साथ रहने के नजरिए से रेड फ्लैग है। तो ऐसी स्थिति में इसे भी पढ़ें: श्री चरणी ने T20I Bowling Rankings में रचा इतिहास, 817 पॉइंट्स के साथ बनाया नया रिकॉर्ड प्रयागराज में दिखा चिराग पासवान का नया तेवर 28 सितंबर को प्रयागराज में आयोजित 'यूथ बोले तो' संवाद कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान बिल्कुल जुदा अंदाज में नजर आए। पारंपरिक राजनीतिक पहनावे को छोड़ वे कैजुअल जींस और टी-शर्ट में युवाओं के बीच पहुंचे। मंच से नौजवानों के साथ शिक्षा, रोजगार, स्किल डेवलपमेंट और राजनीति में युवाओं की सक्रियता पर खुलकर चर्चा करते हुए उन्होंने बड़ा सियासी ऐलान किया। चिराग ने साफ लफ्जों में कहा कि इसमें किसी को कोई संदेह नहीं होना चाहिएलोजपा (रामविलास) पूरी मजबूती के साथ उत्तर प्रदेश का 2027 विधानसभा चुनाव लड़ेगी। हालांकि जिस यूपी में बीजेपी, निषाद पार्टी, सुभाजपा और आरएलडी को उनकी मांग के मुताबिक सीटें देने के मूड में नहीं है, वहां एक नया बटाईदार पार्टी को क्यों ही पसंद आएगा? यह अब तक तो तय नहीं है। पता चला है कि मामला सीटों को लेकर ही फंस सकता है। लेकिन चिराग अपनी ओर से पूरा जोर लगा रहे हैं। माहौल बनाने के लिए कॉन्सर्ट नुमा कार्यक्रमों के आयोजन किए जा रहे हैं। स्टूडेंट्स को संवाद के जरिए जोड़ने की कोशिश हो रही है।

प्रभासाक्षी 30 Sep 2026 4:46 pm

आठ सरकारी विभागों पर 38,000 करोड़ रुपए का भुगतान बकाया: कर्नाटक ठेकेदार संघ

आठ सरकारी विभागों पर 38,000 करोड़ रुपए का भुगतान बकाया: कर्नाटक ठेकेदार संघ

समाचार नामा 30 Sep 2026 4:23 pm

मल्लिकार्जुन खड़गे का EC पर तीखा हमला: 2-8 अक्टूबर तक संसद से सड़क तक मार्च, 6 तारीख को EC दफ्तर का घेराव

मल्लिकार्जुन खड़गे का EC पर तीखा हमला: 2-8 अक्टूबर तक संसद से सड़क तक मार्च, 6 तारीख को EC दफ्तर का घेराव

समाचार नामा 30 Sep 2026 2:45 pm

'स्कूलों में अभिभावकों और जनता के जाने पर कोई पाबंदी नहीं', असम सरकार ने खबरों का किया खंडन

'स्कूलों में अभिभावकों और जनता के जाने पर कोई पाबंदी नहीं', असम सरकार ने खबरों का किया खंडन

समाचार नामा 30 Sep 2026 2:34 pm

असम को मिलेगा चौथा कृषि कॉलेज, बराक घाटी में 84.6 एकड़ जमीन आवंटित

असम को मिलेगा चौथा कृषि कॉलेज, बराक घाटी में 84.6 एकड़ जमीन आवंटित

समाचार नामा 30 Sep 2026 2:31 pm

सावधान! Electricity Bill में जुड़कर आयेगी बकाया Traffic Challan राशि, नहीं भरा जुर्माना तो कटेगी लाइट!

सड़क पर यातायात नियम तोड़कर चालान कटवाना आसान है, लेकिन अब उसे नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को लंबित ई-चालानों की वसूली के लिए ऐसा तंत्र बनाने की जरूरत बताई है, जिससे नियम तोड़ने वालों को जुर्माना चुकाने के लिए मजबूर होना पड़े। अदालत ने यहां तक सुझाव दिया कि बकाया यातायात चालान को बिजली बिल से जोड़ दिया जाए। बिजली का बिल नहीं चुकाने पर जिस तरह बिजली काटने की कार्रवाई होती है, उसी तरह चालान की वसूली सुनिश्चित करने का रास्ता खोजने की बात अदालत ने कही। न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने साफ कहा कि केवल हजारों-लाखों ई-चालान काटते रहना पर्याप्त नहीं है। असली सवाल जुर्माने की वसूली का है। अदालत के सामने रखे आंकड़ों के मुताबिक राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में करीब 45 हजार करोड़ रुपये के ई-चालान जारी किए गए हैं, जिनमें लगभग 25 हजार करोड़ रुपये ही वसूल हो पाए हैं। यानी करीब 20 हजार करोड़ रुपये अब भी बकाया हैं। इसे भी पढ़ें: पेंडिंग Traffic Challan पर नहीं बनेगा RC, Fitness और PUC, Supreme Court ने दिए कई सुझाव यह सुनवाई 2012 से लंबित सड़क सुरक्षा से जुड़ी जनहित याचिका के तहत हुई। अदालत ने लंबित चालानों से निपटने के लिए कई कठोर विकल्पों पर भी विचार किया। बकाया चालान वाले वाहनों को काली सूची में डालने, वाहन का स्वामित्व हस्तांतरण रोकने और पंजीकरण प्रमाणपत्र के नवीनीकरण पर रोक जैसे उपायों की चर्चा हुई। यहां तक कि ऐसे वाहनों के लिए प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र और फिटनेस प्रमाणपत्र रोकने तथा चालक के लाइसेंस के नवीनीकरण पर भी कार्रवाई का सुझाव सामने आया। अदालत ने परिवहन संबंधी ऑनलाइन व्यवस्था पर ऐसे वाहनों को चिह्नित करने और बकाया चालान साफ होने तक स्वामित्व परिवर्तन रोकने की बात कही। इसके साथ ही सड़कों पर रेंडम चेक बढ़ाने का सुझाव भी दिया गया, ताकि पता चल सके कि किन वाहनों पर पुराने ई-चालान लंबित हैं। हम आपको बता दें कि राजधानी दिल्ली के आंकड़े इस समस्या की गंभीरता को और ज्यादा उजागर करते हैं। 28 सितंबर 2026 तक दिल्ली में यातायात चालानों और कैमरे से जारी नोटिसों की कुल लंबित दर करीब 73 प्रतिशत है। मौके पर काटे गए करीब 1.7 करोड़ चालानों में लगभग 1.1 करोड़ लंबित हैं, जबकि कैमरे से जारी करीब 4.5 करोड़ नोटिसों में लगभग 3.4 करोड़ का भुगतान नहीं हुआ है। कैमरा आधारित नोटिसों की लंबित दर करीब 75.8 प्रतिशत, जबकि मौके पर काटे गए चालानों की लंबित दर करीब 66.4 प्रतिशत है। बकाया चालानों में सबसे ऊपर तेज रफ्तार है, जिसके करीब 1.7 करोड़ चालान लंबित हैं। इसके बाद गलत पार्किंग के करीब 85.4 लाख, बिना हेलमेट करीब 47.8 लाख और लालबत्ती तोड़ने के करीब 47.5 लाख मामले हैं। इस साल 28 सितंबर तक भी तेज रफ्तार के करीब 18.5 लाख, गलत पार्किंग के 17.3 लाख और बिना हेलमेट के 11.2 लाख चालान दर्ज हुए हैं। वसूली की राह में भुगतान प्रक्रिया भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। कई लोग लोक अदालतों का इंतजार करते हैं। कुछ मामलों में 2,000 रुपये का चालान लोक अदालत में 200 रुपये में निपटने की संभावना बताई जाती है। दूसरी ओर, रोज नए चालान बनते हैं, जबकि लोक अदालतें निश्चित समय पर लगती हैं, जिससे लंबित मामलों का ढेर बढ़ता रहता है। वहीं तेज रफ्तार के मामलों में ऑनलाइन भुगतान की समयसीमा 90 दिन है, जबकि लालबत्ती उल्लंघन में शिकायत दर्ज कराने के लिए 15 दिन की अवधि होती है। इसके अलावा चालान संदेशों के अनियमित पहुंचने और मौके पर तत्काल भुगतान न कर पाने की स्थिति भी वसूली को प्रभावित करती है। हालांकि दिल्ली में व्यवस्था सुधारने की कोशिशें तेज हुई हैं। सितंबर 2025 में दिल्ली यातायात पुलिस ने ई-चालान व्यवस्था को भारत बिल भुगतान प्रणाली से जोड़ा, जिससे पुराने और मौजूदा समझौता योग्य चालानों का भुगतान यूपीआई आधारित माध्यमों से किया जा सकता है। नागरिकों को व्हाट्सऐप के जरिए भी चालान की सूचना भेजी जा रही है। सूत्रों के अनुसार इन दोनों व्यवस्थाओं के बाद चालान भुगतान में पांच गुना वृद्धि हुई है। इसके अलावा, लोक अदालतों और शाम की अदालतों के बाद अब सप्ताहांत में भी सुनवाई बढ़ाने की कोशिश हो रही है और अधिक पीठों के जरिए मामलों के निपटारे की गति बढ़ाई जा रही है। देखा जाये तो सुप्रीम कोर्ट का संदेश साफ है कि सड़क पर नियम तोड़कर चालान कटवाना समस्या का अंत नहीं, बल्कि शुरुआत है। अब चुनौती चालान काटने की नहीं, हर बकाया रुपये की वसूली की है। उधर, सोशल मीडिया पर इस सुझाव को लेकर प्रतिक्रियाएं मिश्रित दिखाई दे रही हैं। कुछ लोगों ने इसे लंबित चालानों की वसूली सुनिश्चित करने के लिए कड़ा और व्यावहारिक दबाव बनाने वाला विचार बताया, जबकि कई लोगों ने सवाल उठाया कि बिजली का बिल पूरे परिवार या मकान से जुड़ा होता है, जबकि यातायात उल्लंघन किसी एक व्यक्ति या वाहन से संबंधित होता है। किरायेदार, साझा बिजली कनेक्शन और वाहन बेचने या स्थान बदलने जैसे मामलों को लेकर भी लोगों ने व्यावहारिक दिक्कतें गिनाईं। कुछ प्रतिक्रियाओं में यह सवाल भी उठाया गया कि चालान वसूलने के लिए वाहन, पंजीकरण या अन्य परिवहन संबंधी व्यवस्थाओं का इस्तेमाल किया जाए तो ज्यादा सीधा रास्ता हो सकता है। सोशल मीडिया की चर्चाओं में यह तथ्य भी सामने आया कि चालान वसूली से ज्यादा ध्यान सड़कों की हालत सुधारने पर देना चाहिए ताकि लोग दुर्घटनाओं के शिकार नहीं हों। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 30 Sep 2026 2:26 pm

'घबराए हुए हैं यूपी के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री', केशव प्रसाद मौर्य के बयान पर सपा सांसद का पलटवार

'घबराए हुए हैं यूपी के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री', केशव प्रसाद मौर्य के बयान पर सपा सांसद का पलटवार

समाचार नामा 30 Sep 2026 2:26 pm

भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ी मिलावटखोरी रोकने की व्यवस्था

बिडंबना ही कहेंगे कि जिस मिलावटखोरी से हर साल देश में करीब दो लाख लोग मौत की भेंट चढ़ जाते हैं, फिर भी हमारी कानूनी तंत्र इस पर प्रभावी रोक लगाने में नाकाम रहा है। वैसे तो हर साल त्योहारी सीजन के साथ ही मिलावटखोरी की चर्चा तेज हो जाती है। लेकिन इन दिनों इस चर्चा की वजह महाराष्ट्र के तेजतर्रार आईएएस अधिकारी तुकाराम मुंढे की कार्रवाई है। मुंढे ने जब से महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन यानी एफडीए के आयुक्त का पद संभाला है, मिलावटखोरों की शामत आ गई है। उन्होंने खाद्य कानूनों और नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ अभियान छेड़ दिया है। महाराष्ट्र एफडीए की टीमों ने शुरुआती 100 दिनों में ही 904 से ज्यादा छापे मारकर 450 से अधिक मिलावटखोरों को गिरफ्तार किया और करोड़ों के मिलावटी खाद्य पदार्थ जब्त किए। इस कार्रवाई से महाराष्ट्र में डिटर्जेंट और रसायनों से बने नकली दूध और ताड़ के तेल से बनने वाले 'एनालॉग पनीर' का रैकेट ध्वस्त हो गया है। नियमों और स्वच्छता मानकों की अनदेखी करने वाले कई नामी फूड चेन्स, बड़े रेस्तराओं आदि के लाइसेंस तक निलंबित या रद्द किए जा चुके हैं। महाराष्ट्र की घटनाएं इसलिए सामने आ रही हैं, क्योंकि वहां तेज-तर्रार अधिकारी खाद्य प्रशासन को मिला है। दूसरे इलाकों में ऐसी कार्रवाई नजर नहीं आती। इसका मतलब यह नहीं है कि भारत में मिलावटखोरी बंद हो गई है। इससे शायद ही किसी को इनकार हो कि शुद्ध खाना और दवा प्राप्त करना हर व्यक्ति का अधिकार है। ब्रिटेन और अमेरिका में ध्यान रखा जाता है कि उपभोक्ताओं तक वही सामान पहुंचे, जो शुद्ध है। ऐसी व्यवस्था भारत में भी की गई है। 2006 में संसद से पारित खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम के तहत भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण यानी एफएसएसएआई का गठन किया गया है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के तहत कार्यरत इस संस्था का दायित्व खाद्य पदार्थों के मानकों पर निगाह रखना और उन्हें तोड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई करना है। राज्यों की पुलिस, प्रशासन और आपूर्ति अधिकारियों को भी अधिकार है कि वे मिलावटखोरी रोकें। त्योहारी सीजन में ये संस्थाएं कार्रवाइयां करती भी हैं। इसे भी पढ़ें: Jan Gan Man: शिक्षा मंत्री ने इस्तीफा दिया, क्या शिक्षा व्यवस्था सुधर गयी? इसी तरह क्या Gyanesh Kumar के इस्तीफा देने भर से चुनाव व्यवस्था सुधर जायेगी? सरकारी आंकड़ों के अनुसार, साल 2020 से हर साल करीब एक लाख से अधिक खाद्य नमूनों की जांच की जा रही है। नियमों का उल्लंघन करने पर करीब आठ हजार से ज्यादा खाद्य व्यावसायिक लाइसेंस रद्द भी किए गए हैं। लेकिन देश में इस पर प्रभावी नियंत्रण नहीं लगाया जा सका है। रोक ना लग पाने के पीछे मोटे तौर पर तीन कारण नजर आते हैं। पहला है, मुनाफाखोरी की बढ़ती प्रवृत्ति, दूसरा नैतिकता का क्षरण और तीसरा कारण निश्चित तौर पर प्रशासनिक विफलता और भ्रष्टाचार है। विनोबा भावे ने करीब आठ दशक पहले लिखे अपने निबंध ‘नवयुवकों से दो बातें’ में कहा है कि देश में सुराख ही सुराख हैं। उन्होंने राष्ट्ररूपी घड़े में बने इन सुराखों को सदाचार से भरने की अपील की है। कुछ उसी तरह व्यवस्था में अब भी सुराख हैं। हमारे तंत्र के बड़े हिस्से से सदाचार और कर्तव्यपराणयता गायब है। वह राष्ट्र निर्माण के भाव से दूर है। इस वजह से वक्त पर कार्रवाई नहीं होती। कई बार तंत्र को जानकारी होती है कि फलां कारोबारी आटे में पत्थर का सफेद बुरादा मिला रहा है, चावलों में प्लास्टिक के दाने फेंट रहा है, दवाओं के सैंपल में गड़बड़ी कर रहा है, नकली मावे की मिठाई बेच रहा है, जाली शराब बिक रही है। वक्त पर इन गड़बड़ियों की जानकारी होने के बावजूद मुनाफाखोर से मिलने वाली चंद रकम के एवज में वह चुप रह जाता है। भले ही नकली दूध पीने से नागरिक बीमार हो रहा हो या नकली शराब से निर्दोष जान जा रही हो। नैतिकता का क्षरण भी मिलावटखोरी के लिए जिम्मेदार है। नैतिकता की कमी मुनाफाखोर कारोबारी और उत्पादक के साथ तंत्र में भी पैठी हुई है। सत्ता संभालते वक्त प्रधानमंत्री मोदी ने तंत्र को चेताया था कि सब चलता है-वाली मानसिकता की अब गुंजाइश नहीं रही। शुरू में इससे ग्रस्त लोगों में भय दिखा, लेकिन अब तंत्र का बड़ा हिस्सा उसी पुराने ढर्रे पर चलता दिखता है, इसलिए मुनाफाखोरों और मिलावटखोरों का डर कम हो चला है। स्वास्थ्य संविधान के समवर्ती सूची का विषय है, इसलिए इस मामले में केंद्र के साथ राज्य सरकारों को भी कार्रवाई का अधिकार है। ऐसे में तंत्र को प्रभावी और जवाबदेह बनाने के लिए केंद्र और राज्यों की सरकारों को जीरो टालरेंस की नीति अख्तियार करना जरूरी लगता है। तभी मुनाफाखोर, मिलावटखोर और लापरवाह प्रशासनिक तंत्र के पेंच कसे जा सकते हैं। पड़ोसी देश चीन का मिलावटखोरी रोकने वाला 'फूड सेफ्टी लॉ' दुनिया के सबसे कठोर कानूनों में से एक है। जिसके तहत जानबूझकर खाद्य पदार्थों में खतरनाक मिलावट करने वालों को मृत्युदंड देने का प्रावधान है। चीन में साल 2008 में दूध में मेलामाइन रसायन मिलाने के चर्चित मामले के दोषियों को मौत की सजा दी गई थी। स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने वाली मिलावटखोरों को इस कानून के तहत आजीवन कारावास के साथ ही भारी आर्थिक जुर्माने का भी प्रावधान है। चीन में खाद्य नियमों का उल्लंघन करने, घटिया या मानकरहित उत्पाद बेचने और सबूत नष्ट करने वाली कंपनियों और कारोबारियों पर वहां भारी-भरकम जुर्माना लगाया जाता है। साथ ही व्यवसाय का लाइसेंस रद्द भी किया जाता है। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में खाद्य सुरक्षा और मिलावटखोरी पर रोक के लिए कड़े कानून हैं। फूड स्टैंडर्ड्स ऑस्ट्रेलिया एंड न्यूजीलैंड की जवाबदेही है कि वह दोनों देशों के खाद्य मानक तैयार करे। खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने और मिलावटखोरी रोकने के लिए राज्यों के साथ ही स्थानीय निकायों की भी जवाबदेही है। दोनों देशों में खाद्य सुरक्षा नियमों का उल्लंघन करने, असुरक्षित या मिलावटी भोजन बेचने वाली कंपनियों और निगमों पर भारी जुर्माने का प्रावधान है। यहां जानबूझकर सार्वजनिक नुकसान या डर फैलाने के इरादे से खाद्य पदार्थों में मिलावट को गंभीर अपराध माना जाता है। ऐसे मामलों में 25 साल तक की जेल हो सकती है। संयुक्त राज्य अमेरिका में भी मिलावटखोरी के खिलाफ सख्त और प्रभावी कानून है, जिसे लागू करने की जवाबदेही फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन यानी एफडीए की है। अमेरिका में मिलावटखोरी पर लगाम के लिए संघीय फूड, ड्रग और कॉस्मेटिक एक्ट है, जो यहां का मुख्य और सबसे बड़ा कानून है। इस कानून के तहत ऐसे खाद्य पदार्थों, दवा या सौंदर्य प्रसाधन को मिलावटी माना जाता है, जो तय मानकों को पूरा नहीं करते या जिसमें हानिकारक पदार्थ मिलाया गया हो। इस कानून के तहत गलत और भ्रामक लेबलिंग पर भी रोक का प्रावधान है। अमेरिका में एक और फूड सेफ्टी मॉडर्नइजेशन एक्ट है, जिसका मकसद मिलावट और संक्रमण को निरोधात्मक कार्रवाई करना है। इन कानूनों के तहत अमेरिका में मिलावटी या दूषित खाद्य पदार्थ और दवाएं बेचना गंभीर अपराध है। इनका उल्लंघन करने वाली कंपनियों और व्यक्तियों पर भारी जुर्माने, जेल की सजा और उत्पादों को तुरंत नष्ट करने या जब्त करने की व्यवस्था है। अमेरिका की तरह ब्रिटेन में भी खाद्य पदार्थों में मिलावट और धोखाधड़ी रोकने के लिए सख्त कानूनी व्यवस्था है। यहां के फूड सेफ्टी एक्ट के तहत स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भोजन बेचना या तैयार करना गंभीर अपराध है। खाद्य मानकों और मिलावट पर नजर रखने के लिए यहां फूड स्टैंडर्ड एजेंसी है। कुछ इसी अंदाज में हमारे यहां भी कठोर कानून और नियमन की जरूरत है। तभी मिलावटखोरी को रोका जा सकता है और भारतीय नागरिकों को सुरक्षित माहौल मुहैया कराया जा सकता है। उमेश चतुर्वेदी लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

प्रभासाक्षी 30 Sep 2026 1:34 pm

CWC बैठक में सोनिया गांधी बोलीं- अच्छा हुआ पहले चले गए नीतीश कुमार

सूत्रों के अनुसार, सोनिया गांधी ने कहा कि नीतीश कुमार पर भरोसा करना मुश्किल था और उनका INDIA गठबंधन से अलग होना पहले से उनकी राजनीतिक दिशा का हिस्सा था। उन्होंने कथित तौर पर कहा कि नीतीश गठबंधन से बाहर निकलने के लिए रास्ते तलाश रहे थे।

देशबन्धु 30 Sep 2026 1:18 pm

बैठक शुरू होने से पहले ही बिखरा 'इंडी' गठबंधन, राहुल को नेता मानने को कोई तैयार नहीं: शिवराज सिंह चौहान

बैठक शुरू होने से पहले ही बिखरा 'इंडी' गठबंधन, राहुल को नेता मानने को कोई तैयार नहीं: शिवराज सिंह चौहान

समाचार नामा 30 Sep 2026 12:29 pm

पप्पू यादव बोले- 'नेताओं की जिंदगी में अय्याशी के अलावा कुछ नहीं', बेगूसराय की घटना के बाद महिला सुरक्षा पर पूछे सवाल

पप्पू यादव बोले- 'नेताओं की जिंदगी में अय्याशी के अलावा कुछ नहीं', बेगूसराय की घटना के बाद महिला सुरक्षा पर पूछे सवाल

समाचार नामा 30 Sep 2026 12:27 pm

राज्यसभा चुनाव: सपा ने राम गोपाल यादव और धनराज परिमल नाथवानी को बनाया उम्मीदवार, आज दाखिल करेंगे नामांकन

राज्यसभा चुनाव: सपा ने राम गोपाल यादव और धनराज परिमल नाथवानी को बनाया उम्मीदवार, आज दाखिल करेंगे नामांकन

समाचार नामा 30 Sep 2026 10:37 am

पीएमके नेता अंबुमणि रामदास ने तमिलनाडु में शराब की दुकानें बंद करने की मांग की

पीएमके नेता अंबुमणि रामदास ने तमिलनाडु में शराब की दुकानें बंद करने की मांग की

समाचार नामा 30 Sep 2026 10:27 am

पीएम मोदी ने शेयर किया गीता का श्लोक, बताया- स्वाभाविक कर्मों में तत्परता से मिलती है परम सिद्धि

पीएम मोदी ने शेयर किया गीता का श्लोक, बताया- स्वाभाविक कर्मों में तत्परता से मिलती है परम सिद्धि

समाचार नामा 30 Sep 2026 8:32 am

उज्जैन शाही मस्जिद विवाद पर वीएचपी का आरोप, बोले- यह माहौल बिगाड़ने की सुनियोजित कोशिश

महाकाल की नगरी उज्जैन में सड़क को चौड़ा करने का एक सरकारी प्रोजेक्ट अब विवादों में घिर गया है। एक तरफ सिंहस्थ कुंभ को देखते हुए शहर को सुंदर बनाने की योजना है

देशबन्धु 29 Sep 2026 11:28 pm

एसआईआर पर कांग्रेस के आरोपों को भाजपा ने बताया राजनीतिक भ्रम, बोले-गुजरात चुनाव से पहले ही हार की स्वीकार

एसआईआर पर कांग्रेस के आरोपों को भाजपा ने बताया राजनीतिक भ्रम, बोले-गुजरात चुनाव से पहले ही हार की स्वीकार

समाचार नामा 29 Sep 2026 10:26 pm

असम के मुख्यमंत्री ने बिना पैसे के नौकरियों को लेकर कांग्रेस पर सवाल उठाए

असम के मुख्यमंत्री ने बिना पैसे के नौकरियों को लेकर कांग्रेस पर सवाल उठाए

समाचार नामा 29 Sep 2026 10:24 pm

राहुल गांधी को चुनाव आयुक्तों को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया नहीं पता : प्रवीण खंडेलवाल

राहुल गांधी को चुनाव आयुक्तों को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया नहीं पता : प्रवीण खंडेलवाल

समाचार नामा 29 Sep 2026 8:38 pm

मदरसों के मुद्दे पर सपा प्रमुख अखिलेश यादव का बयान स्वागत योग्य: काजी नज्म अली

मदरसों के मुद्दे पर सपा प्रमुख अखिलेश यादव का बयान स्वागत योग्य: काजी नज्म अली

समाचार नामा 29 Sep 2026 8:34 pm

आम आदमी पार्टी के नेता मंत्रियों के आवासों पर कब्जा कर रहे हैं: सुनील जाखड़

आम आदमी पार्टी के नेता मंत्रियों के आवासों पर कब्जा कर रहे हैं: सुनील जाखड़

समाचार नामा 29 Sep 2026 8:33 pm

झारखंड में एसआईआर की प्रक्रिया तेज: सीईओ ने राजनीतिक दलों के साथ की बैठक

झारखंड में एसआईआर की प्रक्रिया तेज: सीईओ ने राजनीतिक दलों के साथ की बैठक

समाचार नामा 29 Sep 2026 8:26 pm