सीजेपी प्रदर्शन: दिल्ली पुलिस 10 अक्टूबर को सुबह 6 बजे से करेगी ट्रैफिक डायवर्जन, लोगों को अतिरिक्त समय लेकर यात्रा करने की सलाह
राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद गरजा विपक्ष, ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे तक जारी रहेगा आंदोलन
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्ष के 10 सांसदों ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से मुलाकात की। इसके बाद लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी ने मीडिया से बातचीत में दावा किया कि उन्होंने संबंधित मुद्दे को उठाया। इस पर उन्होंने हमसे कहा कि हम उनके सामने सबूत पेश करें।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना संवैधानिक अधिकार, लेकिन सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने से बचें: इफ्राहिम हुसैन
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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने हमारी बातों को गलत नहीं बताया, सबूत मांगा: सपा सांसद राजीव राय
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राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद राहुल का बड़ा दावा, वोट चोरी के सबूत मांगे गए
मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्षी नेताओं ने विजय चौक पर जोरदार प्रदर्शन किया। इसके बाद एक प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से भी मुलाकात की
'युवाओं को कोई नहीं रोक सकता', सीजेपी के प्रदर्शन के लिए ट्रेनें रद्द होने पर बोले चिराग पासवान
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सिनेमा और समाज सेवा का अनूठा संगम थे नाना पाटेकर
भारतीय कला जगत ने 8 अक्टूबर 2026 को अपना एक ऐसा अनमोल रत्न खो दिया जिसकी भरपाई करना शायद आने वाले कई दशकों तक संभव नहीं होगा। प्रख्यात अभिनेता नाना पाटेकर का 75 वर्ष की आयु में अचानक हृदय गति रुकने से निधन हो गया। यह दुखद समाचार दावानल की तरह पूरे देश में फैल गया और हर कोई स्तब्ध रह गया। नाना केवल एक साधारण अभिनेता नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसी बुलंद आवाज थे जो पर्दे पर आम इंसान की पीड़ा, उसके क्रोध और उसकी लाचारी को बेहद जीवंत रूप में प्रस्तुत करते थे। उनका जाना केवल कला जगत की ही क्षति नहीं है, बल्कि समाज के उस शोषित और वंचित वर्ग की भी बहुत बड़ी क्षति है, जिसके लिए वे हमेशा एक मसीहा बनकर खड़े रहे। उनके निधन से कला, संस्कृति और समाज सेवा के क्षेत्र में जो गहरा सन्नाटा पसरा है, उसे शब्दों में बांधना बेहद कठिन है। नाना पाटेकर का जन्म महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुड जंजीरा में हुआ था। उनका बचपन बेहद संघर्षपूर्ण और अभावों में बीता था। उन्होंने अपने जीवन के शुरुआती दिनों में ही जीवन की कठोर वास्तविकताओं का सामना किया। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण उन्होंने छोटी उम्र में ही काम करना शुरू कर दिया था। एक समय ऐसा भी था जब वे सड़कों पर पैदल यात्रियों के सड़क पार करने के लिए सफेद पट्टियां रंगने का काम करते थे और उसी से अपनी आजीविका चलाते थे। यह उनके जीवट और अथक परिश्रम का ही परिणाम था कि उन्होंने कभी परिस्थितियों के सामने घुटने नहीं टेके। इस कठोर संघर्ष ने उन्हें जीवन की उन गहराइयों से परिचित कराया, जो बाद में उनके अभिनय में स्पष्ट रूप से दिखाई देती थीं। उनके भीतर का कलाकार इसी भट्टी में तपकर कुंदन बना था। नाटकों और रंगमंच के प्रति उनका आकर्षण उन्हें धीरे-धीरे अभिनय की दुनिया की ओर ले गया, जहां उन्होंने अपनी एक अलग और अमिट पहचान बनाई। इसे भी पढ़ें: नाना पाटेकर के निधन पर अमिताभ बच्चन ने व्यक्त किया गहरा शोक! कहा- अद्वितीय कलाकार और सच्चे समाजसेवी को नमन रंगमंच से अपने अभिनय की शुरुआत करने वाले नाना पाटेकर ने जब रूपहले पर्दे पर कदम रखा, तो उन्होंने नायक की उस पारंपरिक छवि को पूरी तरह से तोड़ दिया जो उस समय तक सिनेमा में स्थापित थी। उनकी आंखें बोलती थीं और उनकी आवाज में वह कशिश थी जो दर्शकों को अंत तक बांधे रखती थी। उनका संवाद अदायगी का तरीका इतना स्वाभाविक और तेज होता था कि सामने बैठा दर्शक खुद को उस दृश्य का हिस्सा समझने लगता था। उन्होंने क्रांतिवीर, परिंदा, तिरंगा, खामोशी, प्रहार और नटसम्राट जैसी तमाम बेहतरीन रचनाओं में अपने अभिनय का जो उत्कृष्ट प्रदर्शन किया, वह अभिनय की पाठशाला में हमेशा एक मानक के रूप में पढ़ाया जाएगा। चाहे वह एक भ्रष्ट व्यवस्था से लड़ने वाला आम नागरिक हो, एक सख्त सैन्य अधिकारी हो या फिर एक गूंगे बहरे दंपति का संवेदनशील पिता, हर भूमिका में उन्होंने अपने प्राण फूंक दिए। उनके द्वारा बोले गए संवाद आज भी लोगों की जुबान पर हैं और वे मात्र संवाद न होकर समाज की कुरीतियों पर एक गहरा कटाक्ष प्रतीत होते हैं। नाना पाटेकर की एक और बहुत बड़ी विशेषता यह थी कि वे अपनी मातृभाषा मराठी और हिंदी, दोनों ही भाषाओं पर समान अधिकार रखते थे। उन्होंने जितनी सफलता हिंदी सिनेमा में प्राप्त की, उतनी ही ऊंचाई उन्होंने मराठी सिनेमा और रंगमंच में भी हासिल की। उनकी वाणी में एक विशेष प्रकार का ओज था। जब वे अपने संवाद बोलते थे, तो शब्दों के आरोह और अवरोह पर उनका नियंत्रण अद्भुत होता था। उन्होंने कभी भी किसी विदेशी भाषा या पाश्चात्य संस्कृति को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। वे अपनी जड़ों से जुड़े रहे और अपनी भारतीय संस्कृति पर हमेशा गर्व करते रहे। उनकी वेशभूषा, उनके विचार और उनका रहन सहन सब कुछ पूरी तरह से भारतीय था। चकाचौंध के इस दौर में भी उन्होंने अपनी भारतीयता को कभी नहीं छोड़ा। अभिनय की दुनिया में सर्वोच्च शिखर पर पहुंचने के बावजूद नाना पाटेकर ने कभी दिखावे की दुनिया को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। उन्होंने हमेशा एक बेहद सादा और संयमित जीवन व्यतीत किया। जब अन्य कलाकार विलासिता पूर्ण जीवन जी रहे थे, तब नाना अपने गांव में खेती कर रहे थे और एक साधारण इंसान की तरह जीवन बिता रहे थे। उनका यही गुण उन्हें अन्य सभी कलाकारों से अलग और श्रेष्ठ बनाता था। वे हमेशा अपनी जड़ों से जुड़े रहे और उन्होंने कभी अपने अतीत को नहीं भुलाया। यह उनकी महानता ही थी कि उन्होंने अपनी कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा समाज की भलाई के लिए दान कर दिया। विशेषकर महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त क्षेत्रों में किसानों की आत्महत्या की घटनाओं ने उनके हृदय को गहरे तक झकझोर दिया था। किसानों की पीड़ा को उन्होंने अपना दर्द समझा और उनकी सहायता के लिए एक संस्था का निर्माण किया। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने हजारों अनाथ बच्चों, विधवाओं और कर्ज में डूबे किसानों के परिवारों को आर्थिक और मानसिक संबल प्रदान किया। उन्होंने गांव गांव जाकर लोगों की समस्याएं सुनीं और उनके समाधान के लिए जमीनी स्तर पर कार्य किया। उनके इस निस्वार्थ सेवा भाव ने उन्हें जनता के बीच एक भगवान के समान दर्जा दिला दिया था। लोग उन्हें केवल एक कलाकार के रूप में नहीं बल्कि अपने परिवार के एक बड़े बुजुर्ग के रूप में देखते थे जो संकट के समय हमेशा उनके साथ खड़ा रहता था। वर्तमान समय में जहां युवा पीढ़ी बहुत जल्दी मानसिक तनाव का शिकार हो जाती है, नाना पाटेकर का जीवन उनके लिए एक खुला मार्गदर्शन है। उनका जीवन सिखाता है कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि मनुष्य के भीतर इच्छाशक्ति और दृढ़ संकल्प है, तो वह किसी भी बाधा को पार कर सकता है। उन्होंने बिना किसी बाहरी सहारे के अपने दम पर वह मुकाम हासिल किया, जो लाखों लोगों के लिए केवल एक सपना होता है। उनकी यात्रा शून्य से शिखर तक की एक बेहद प्रेरणादायक कहानी है। 8 अक्टूबर 2026 की वह मनहूस सुबह भारतीय कला जगत के लिए एक काला अध्याय लेकर आई। वे गोवा के डोना पाउला स्थित अपने आवास पर थे, जब सुबह के समय उन्हें अचानक गंभीर हृदयघात हुआ। परिजनों द्वारा उन्हें तुरंत समीप के एक बड़े अस्पताल ले जाया गया। वहां मौजूद चिकित्सकों ने करीब 45 मिनट तक उनके हृदय को पुनः सक्रिय करने का हर संभव प्रयास किया, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। सुबह 5 बजकर 20 मिनट पर चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। यह समाचार जैसे ही बाहर आया, पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई। जो आंखें उनकी कला को देखकर चमक उठती थीं, वे आंसुओं से नम थीं। चिकित्सकीय और कानूनी प्रक्रियाओं के बाद उनके पार्थिव शरीर को विशेष विमान और वाहन के माध्यम से महाराष्ट्र के पुणे लाया गया। उनका अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव डोंजे में पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ संपन्न हुआ। इस अवसर पर जनसैलाब उमड़ पड़ा था। हर कोई अपने चहेते नायक के अंतिम दर्शन करना चाहता था। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने स्वयं वहां पहुंचकर उनके पार्थिव शरीर को कंधा दिया, जो इस बात का प्रतीक था कि उनका कद राजनीति और कला की सीमाओं से कहीं बहुत ऊपर था। उनके अंतिम सफर में उनके पुराने मित्र, सहकर्मी और हजारों की संख्या में आम लोग शामिल हुए। हर आंख नम थी और हर दिल भारी था। नाना पाटेकर का जाना एक युग का अंत है। उन्होंने अपने अभिनय और अपने कर्मों से जो लकीर खींची है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा स्रोत बनी रहेगी। उनका भौतिक शरीर आज हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनकी कला, उनके विचार और मानवता के लिए किए गए उनके निस्वार्थ कार्य उन्हें हमेशा हमारे दिलों में जीवित रखेंगे। रूपहले पर्दे का वह शेर आज हमेशा के लिए शांत हो गया है, लेकिन उसकी दहाड़ भारतीय सिनेमा और समाज की चेतना में हमेशा गूंजती रहेगी। - महेन्द्र तिवारी
हिमालय की प्रदूषण-मुक्ति भी हो पहाड़ी तीर्थयात्रा का उद्देश्य
हिमालय केवल पर्वतों की एक शृंखला नहीं है, वह भारत की सांस्कृतिक चेतना, आध्यात्मिक आस्था और प्राकृतिक जीवन का आधार है। उसकी चोटियों में तप की स्मृतियां हैं, उसकी नदियों में करोड़ों लोगों की जीवनधारा बहती है और उसकी घाटियों में असंख्य धार्मिक स्थल सदियों से श्रद्धालुओं को आकर्षित करते रहे हैं। हिमाचल प्रदेश सहित पूरे हिमालयी क्षेत्र में हिंदू धर्म के अनेक प्रमुख तीर्थस्थल हैं। इन स्थानों पर पहुंचना श्रद्धालुओं के लिए आस्था का विषय है, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि पिछले कुछ वर्षों में तीर्थयात्रा और पर्यटन के बीच की सीमा धुंधली होती जा रही है। दर्शन और आध्यात्मिक अनुभूति के साथ मनोरंजन, मौज-मस्ती और उपभोक्तावादी जीवनशैली का प्रवेश पहाड़ों की संवेदनशीलता पर भारी पड़ रहा है। हिमालय की सबसे बड़ी विशेषता ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी है। यहां का पर्यावरण अत्यंत नाजुक है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मिट्टी की परत पतली है, वनस्पतियों की पुनरुत्पादन क्षमता सीमित है और कचरे के प्राकृतिक रूप से नष्ट होने की प्रक्रिया मैदानी क्षेत्रों की तुलना में बहुत धीमी है। इसके बावजूद हम हजारों-लाखों लोगों को एक साथ इन क्षेत्रों में पहुंचा रहे हैं। वाहनों की लंबी कतारें, पार्किंग का दबाव, होटल और ढाबों का अनियोजित विस्तार, प्लास्टिक की बोतलें, खाद्य पदार्थों के रैपर, पॉलीथिन और डिस्पोजेबल सामग्री पहाड़ों की प्राकृतिक सुंदरता और पर्यावरण को लगातार चोट पहुंचा रहे हैं। चारधाम यात्रा के दौरान इस वर्ष सितंबर के मध्य तक 800 टन से अधिक कचरा एकत्र होने की सूचना इस संकट की गंभीरता को सामने रखती है। केदारनाथ जैसे अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र में अप्रैल से अगस्त के बीच 50.30 टन कचरा जमा होना विशेष चिंता का विषय है। यह तथ्य इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में फेंकी गई एक प्लास्टिक बोतल केवल एक बोतल नहीं रहती, वह लंबे समय तक पर्यावरण में मौजूद रहकर मिट्टी, जलस्रोतों और वन्यजीवन के लिए खतरा बन सकती है। विडंबना देखिए-जिस स्थान पर मनुष्य आत्मशुद्धि, संयम और त्याग की भावना लेकर जाता है, वहीं वह अपने पीछे कचरे का निशान छोड़ आता है। क्या ऐसी यात्रा को वास्तव में तीर्थयात्रा कहा जा सकता है? तीर्थ का अर्थ केवल किसी मंदिर तक पहुंच जाना नहीं है। तीर्थ मनुष्य के भीतर परिवर्तन की यात्रा है। यदि मंदिर में माथा टेकने के बाद हम उसी पर्वत की गोद में प्लास्टिक फेंक दें, जिसकी पवित्रता के नाम पर वहां पहुंचे हैं, तो हमारी आस्था अधूरी रह जाती है। इसे भी पढ़ें: Delhi Pollution रोकने के लिए Construction Ban, Parking Charges डबल करने और Work From Home की नीति का ऐलान इस संदर्भ में ‘कैरी मी बैक’ अभियान उम्मीद की एक महत्वपूर्ण किरण है। लगभग पांच हजार तीर्थयात्रियों द्वारा करीब 18 किलोमीटर के रास्ते से 12 टन से अधिक कंप्रेस्ड प्लास्टिक वापस नीचे लाना बताता है कि श्रद्धालुओं को सहभागी बनाया जाए तो वे पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यह केवल कचरा उठाने का अभियान नहीं, बल्कि तीर्थयात्रा की मानसिकता बदलने का प्रयास है। ऐसे अभियानों को व्यापक स्वरूप देकर हिमाचल, उत्तराखंड और अन्य हिमालयी तीर्थ क्षेत्रों में लागू किया जाना चाहिए। अमरनाथ यात्रा से मिला अनुभव भी सकारात्मक दिशा दिखाता है। पुनः उपयोग किए जाने वाले बर्तनों और पानी भरने की सुविधाओं के विस्तार के कारण यात्रियों की संख्या में 17 प्रतिशत वृद्धि के बावजूद प्रति यात्री कचरे में 15 प्रतिशत कमी आना इस बात का प्रमाण है कि सुविधाजनक और वैज्ञानिक व्यवस्था उपलब्ध कराई जाए तो पर्यावरणीय दबाव कम किया जा सकता है। इसलिए केवल श्रद्धालुओं से अपील करना पर्याप्त नहीं है, प्रशासन को ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिसमें पर्यावरण-अनुकूल व्यवहार सबसे सहज विकल्प बने। हिमाचल प्रदेश के धार्मिक एवं पर्यटन स्थलों पर भीड़ का अनियंत्रित बढ़ना इसी व्यापक संकट का हिस्सा है। शिमला, मनाली, धर्मशाला, चामुंडा, ज्वालाजी, चिंतपूर्णी, नैना देवी और अन्य धार्मिक-पर्यटन स्थलों पर मौसम विशेष में बढ़ने वाला दबाव यातायात, जलापूर्ति, सीवेज, ठोस कचरा और स्थानीय संसाधनों पर असर डालता है। पहाड़ों की वहन क्षमता मैदानी शहरों जैसी नहीं है। इसलिए किसी भी तीर्थ या पर्यटन स्थल की लोकप्रियता को केवल अधिकाधिक लोगों को वहां पहुंचाने की सफलता के रूप में नहीं देखा जा सकता। अब समय आ गया है कि ‘जितने अधिक पर्यटक, उतना अधिक विकास’ की सोच को ‘जितना संवेदनशील पर्यावरण, उतना जिम्मेदार पर्यटन’ में बदला जाए। तीर्थस्थलों की वहन क्षमता का वैज्ञानिक अध्ययन हो और उसके आधार पर प्रतिदिन या मौसम के अनुसार आगंतुकों की संख्या निर्धारित की जाए। सिंगल-यूज प्लास्टिक पर प्रभावी नियंत्रण हो, पानी के रिफिल स्टेशन बढ़ाए जाएं, बोतलों और पैकेजिंग के लिए डिपॉजिट-रिटर्न व्यवस्था लागू की जाए तथा कचरे को स्रोत पर ही अलग करने की व्यवस्था हो। दुकानदारों, होटल संचालकों और वेंडरों को उनके द्वारा उत्पन्न कचरे के प्रति जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण है तीर्थयात्री की मानसिकता में परिवर्तन। पहाड़ हमारे मनोरंजन के मैदान नहीं हैं। वे हमारी आने वाली पीढ़ियों की प्राकृतिक विरासत हैं। जिस नदी के किनारे हम पूजा करते हैं, वही नदी नीचे बसे करोड़ों लोगों का जीवन है। जिस जंगल को हम कैमरे में कैद करते हैं, वही जंगल पहाड़ी पारिस्थितिकी को संतुलित करता है। जिस पर्वत को हम देवभूमि कहकर नमन करते हैं, उसकी ढलानों पर प्लास्टिक फेंकना हमारी अपनी श्रद्धा का अपमान है। नेपाल और हिमालयी क्षेत्र में समय-समय पर अत्यधिक वर्षा, बाढ़, भूस्खलन और हिमस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं ने यह चेतावनी दी है कि पर्वतीय पारिस्थितिकी के साथ छेड़छाड़ के परिणाम गंभीर हो सकते हैं। हर आपदा को सीधे पर्यटन या प्रदूषण का परिणाम मानना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा, लेकिन इतना निश्चित है कि अनियोजित निर्माण, अत्यधिक मानवीय दबाव, वन क्षरण और कचरा प्रबंधन की कमजोरी पर्वतीय क्षेत्रों की संवेदनशीलता को बढ़ा सकती है। हिमालय आज चिन्ताओं का हिमालय बन गया है। कुछ दशकों में खासकर हिमालयी क्षेत्र के राज्यों में विकास के नाम पर जहां प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन हुआ है, वहीं धार्मिक पर्यटन के नाम पर व्यापक स्तर पर प्रदूषण फैला है। इतना ही नहीं, प्रकृति से खिलवाड़ कर नियमों के खिलाफ ऐसा निर्माण खड़ा किया जा रहा है, जो बाढ़ और भूस्खलन के साथ बर्बादी लेकर आता रहा है। सवाल यह भी है कि पहाड़ी राज्यों में विकास का क्या पैमाना होना चाहिए? अगर विकास के नाम पर कहीं निर्माण गतिविधियां आवश्यक हों तो वह नियोजन के साथ ही आपदाओं को झेलने में सक्षम होनी चाहिए। आम तौर पर देखा गया है कि इन राज्यों में पर्यटन एवं धार्मिक यात्राओं को बढ़ावा देेने के नाम पर ऐसी बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी हो गईं जो न सिर्फ बाढ़ और भूस्खलन झेलने में अक्षम साबित हुईं, बल्कि पर्यावरण के हिसाब से भी नुकसानदेह रही हैं। ऐसे निर्माण में सरकारी स्तर पर सतर्कता की जो उम्मीद की जाती है, उसे नजरअंदाज किया गया। हिमालय हमें बहुत कुछ देता है-जल, वन, जैव विविधता, जलवायु संतुलन, संस्कृति और आध्यात्मिक ऊर्जा। बदले में हमारी जिम्मेदारी केवल वहां जाकर पूजा करना नहीं, बल्कि उस प्रकृति की रक्षा करना भी है। तीर्थयात्री यदि एक बोतल पानी लेकर पहाड़ पर जा सकता है तो खाली बोतल वापस भी ला सकता है। यह छोटा-सा संकल्प बड़े परिवर्तन का आधार बन सकता है। आस्था और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। धार्मिक यात्रा का वास्तविक संस्कार तभी पूर्ण होगा जब तीर्थयात्री मंदिर से लौटते समय अपने साथ प्रसाद ही नहीं, प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी भी लेकर लौटे। सरकारें व्यवस्था करें, स्थानीय समुदाय भागीदारी निभाएं और श्रद्धालु अपना कचरा वापस लाने का संकल्प लें-तभी हिमालय की पवित्रता सुरक्षित रह सकेगी। हिमालय को केवल देवभूमि कहने से उसकी रक्षा नहीं होगी, उसे देवभूमि की तरह व्यवहार देकर ही उसकी पवित्रता बचाई जा सकती है। यही सच्ची तीर्थयात्रा है, यही प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और यही आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारा नैतिक दायित्व है। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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बिना वोटिंग खत्म हुआ यूपी का राज्यसभा चुनाव! बीजेपी को मिलीं 8 सीटें, सपा के खाते में आईं 2; देखें विजेताओं की लिस्ट
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एलन मस्क के बयान से उठते गंभीर सवाल- भारत की संप्रभुता और सुरक्षा सर्वोपरि
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के करीबी और दुनिया के मशहूर उद्योगपति एलन मस्क के एक बयान ( सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर किया गया पोस्ट ) ने भारत में कई तरह के गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसका जवाब तलाशना और पूरी गंभीरता से देना बहुत जरूरी हो गया है। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि उदारीकरण और भूमंडलीकरण के इस दौर में प्राइवेट कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा होनी ही चाहिए ताकि लोगों को फायदा भी हो और उनके पास चुनने का विकल्प भी हो। इसी तर्क का हवाला देकर भारत के अंदर भी कई लोग एलन मस्क की पीड़ा को सही बताते हुए सरकार को नसीहतें दे रहे हैं। लेकिन भारत की संप्रभुता और वैश्विक कंपनियों को भारत में कारोबार करने की इजाज़त देने के बीच में एक बहुत ही हल्की सी रेखा आती है, जिसे पार करते ही कई तरह की समस्याएं खड़ी हो सकती है। इसे भी पढ़ें: Elon Musk ने घेरा तो मोदी सरकार ने दिया करारा जवाब! समझिये Starlink का भारत में प्रवेश क्यों अटका हुआ है? भारत के अंदर, हर भारतीय को यह स्वतंत्रता है कि वो अपनी सरकार से सवाल पूछ सके, अपनी सरकार पर सवाल उठा सके लेकिन क्या हम यही स्वतंत्रता किसी विदेशी कारोबारी को दे सकते हैं? कतई नहीं, भारत का असली बॉस कौन है, यह तय करने और बताने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ भारतीयों के पास ही रहना चाहिए। एलन मस्क ने 8 अक्टूबर को अपने ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर लिखा, स्टारलिंक को 165 से ज़्यादा देशों में लाइसेंस मिला हुआ है और कंपनी भारत सरकार के हर नियम और ज़रूरत को पूरा करने में पांच साल से काम कर रही है, फिर भी लाइसेंस क्यों नहीं मिला? क्या अंबानी ही भारत के असली बॉस हैं? जिस अंदाज में और जितनी तेजी से राहुल गांधी ने इस पर कमेंट किया, उसे लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। मस्क के पोस्ट को रिपोस्ट करते हुए राहुल ने लिखा, भारत में आपका स्वागत है, एलन। दूसरे शख्स के मिलने तक इंतजार कीजिए। राहुल गांधी के जवाब से गदगद मस्क ने तुरंत जवाब देते हुए लिखा, धन्यवाद राहुल, यह वाकई परेशान करने वाला है। यहां यह याद रखना भी बहुत जरूरी है कि मस्क पहले भी आरोप लगा चुके हैं कि भारत में इस सेक्टर से जुड़े बड़े कारोबारी स्टारलिंक की एंट्री भारत के बाज़ार में रोककर अपना दबदबा बनाए रखना चाहते हैं। लेकिन इस बार लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के जवाब देने के कारण, मामला बहुत गंभीर हो गया है। पिछले कई दिनों से राहुल, देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं और यह बात स्पष्ट तौर पर नज़र आ रही है केंद्र में सत्तारूढ़ सरकार और विपक्षी दल खासकर राहुल के साथ संवादहीनता की स्थिति आ गई है, जिसे कतई सही नहीं माना जा सकता है। इतने गंभीर मसले पर राहुल की इतनी तेजी से की गई टिप्पणी को कतई जायज नहीं ठहराया जा सकता है। यहां साफ-साफ नजर आ रहा है कि राहुल ने एक बड़ी गलती कर दी है,जिसका जवाब अब उन्हें लगातार देते रहना पड़ेगा। भारत सरकार ने गुरुवार, 8 अक्टूबर को ही मस्क के आरोपों को खारिज करते हुए यह साफ कर दिया कि, देश में सैटेलाइट कम्युनिकेशन सर्विसेज के लिए तय नियम सभी के लिए एक जैसे हैं। फिलहाल, तीनों कंपनियों के लिए सुरक्षा समीक्षा की प्रोसेस चल रही है। जैसे ही किसी कंपनी की सुरक्षा जांच पूरी हो जाएगी, वह अगली स्टेप यानी स्पेक्ट्रम आवंटन की मांग करने के लिए आगे बढ़ सकती है। सरकार ने आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि, यह कहना बिल्कुल गलत है कि नियमों को किसी के साथ भेदभाव करने के लिए लागू किया जा रहा है। मस्क के अलावा एयरटेल के मालिक सुनील भारती मित्तल की कंपनी यूटेलसैट वनवेब और मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस जियो भी लाइसेंस लेने की होड़ में है। एलन मस्क के आरोप अपनी जगह है लेकिन भारत की कोई भी सरकार देश की सुरक्षा और संप्रभुता से किसी तरह का समझौता नहीं कर सकती है। इस मामले में भारत के महत्वपूर्ण और बड़े राजनीतिक दलों को एक ही पेज पर होना चाहिए। सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह संसद के प्रमुख दलों को इससे जुड़े तथ्यों से अवगत कराएं। सरकार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के करीबी मित्र एलन मस्क को भी दो टूक शब्दों में यह बता देना चाहिए कि बयानों और सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए भारत की सरकार पर कोई दबाव नहीं डाला जा सकता है। यह मामला बहुत बड़ा है और इसे दुनिया की तमाम बड़ी कंपनियों के लिए एक उदाहरण की तरह पेश किया जाना चाहिए। इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि सब कुछ बिना किसी भेदभाव के होना चाहिए लेकिन ट्रंप प्रशासन जिस तरह से भारत, भारतीय कंपनियों और भारतीयों के खिलाफ लगातार फैसले ले रहा है, उसे भी ध्यान में रखना बहुत जरूरी है। - संतोष कुमार पाठक लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं
दिल्ली में राजनीतिक प्रदर्शनों और सुरक्षा व्यवस्था के चलते यातायात पर लग रही पाबंदियों का असर अब केवल आम यात्रियों तक सीमित नहीं रह गया है। राजधानी के बाजारों में ग्राहकों की आवाजाही घटने, कारोबार प्रभावित होने और दूसरे शहरों से खरीदारी के लिए आने वाले व्यापारियों की संख्या कम होने की शिकायतें सामने आ रही हैं। चिंता इसलिए भी गंभीर है क्योंकि नवरात्रि से दिवाली तक का समय खुदरा कारोबार, थोक खरीदारी, कपड़ों, इलेक्ट्रॉनिक्स, आभूषणों, सजावटी सामान और शादी-ब्याह की खरीदारी के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होता है। दिल्ली के व्यापारिक संगठनों के ताजा दावों के मुताबिक, पिछले कुछ दिनों में बाजारों की कारोबारी गतिविधियां लगभग 70 प्रतिशत तक गिर गई हैं। यह स्थिति बताती है कि सड़कों पर लगने वाली पाबंदियों और मेट्रो सेवाओं में व्यवधान का आर्थिक असर कितना व्यापक हो सकता है। इसे भी पढ़ें: पूरा ट्रांसपोर्ट बंद नहीं कर सकते, मेट्रो और ट्रेन रद्द करने पर दोबारा करें विचार, CJP प्रोटेस्ट से पहले पाबंदियों पर सरकार को SC का निर्देश हम आपको बता दें कि 8 अक्टूबर को दिल्ली में कांग्रेस और विपक्षी दलों के प्रदर्शन के दौरान राजघाट और कनॉट प्लेस के आसपास यातायात बाधित हुआ। इसके चलते, नई दिल्ली रेलवे स्टेशन तक पहुंचने के रास्ते बंद होने और ट्रैफिक प्रतिबंधों के कारण 5,000 से अधिक यात्री अपनी ट्रेनें नहीं पकड़ सके। साथ ही इस घटना का सीधा संबंध व्यापारिक नुकसान से भी है। दिल्ली में दूसरे राज्यों से आने वाले कारोबारी अक्सर ट्रेन से पहुंचते हैं। उन्हें स्टेशन से थोक बाजारों तक जाना होता है, माल खरीदना होता है और फिर निर्धारित समय में वापसी करनी होती है। जब स्टेशन तक पहुंचना ही मुश्किल हो जाए, तो उनकी यात्रा, खरीदारी और माल की ढुलाई तीनों प्रभावित होती हैं। कांग्रेस के प्रदर्शन के ठीक बाद अब 10 अक्टूबर को सीजेपी के प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की जा रही है। देखा जाये तो सुरक्षा व्यवस्था का उद्देश्य कानून-व्यवस्था बनाए रखना है। लेकिन जब बैरिकेडिंग, ट्रैफिक डायवर्जन, मेट्रो स्टेशन के प्रवेश-द्वारों पर प्रतिबंध और वाहनों की आवाजाही पर नियंत्रण जैसे कदम व्यावसायिक इलाकों को प्रभावित करते हैं, तो उनका आर्थिक असर भी होता है। विशेष चिंता यह है कि नई दिल्ली, कनॉट प्लेस, जनपथ और आसपास के बाजारों में ग्राहक पहुंचने से कतराने लगते हैं। ग्राहक यह सोचकर खरीदारी टाल देते हैं कि बाजार पहुंचना और वहां से लौटना मुश्किल होगा। यहां नुकसान केवल उस दिन की बिक्री का नहीं है। दुकानों में काम करने वाले कर्मचारियों की उपस्थिति, माल की डिलीवरी, थोक खरीदारों की यात्राएं, रेस्तरां की बिक्री और पार्किंग पर निर्भर कारोबारी गतिविधियां भी प्रभावित होती हैं। देखा जाये तो दिल्ली के व्यापारियों की चिंता का सबसे बड़ा कारण समय है। 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्र शुरू होने वाले हैं। इसके बाद रामलीला, दशहरा, दिवाली और शादी-ब्याह का सीजन कारोबार को गति देते हैं। इस दौरान कपड़े, साड़ियां, रेडीमेड गारमेंट, जूते, इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल फोन, सजावट के सामान, पूजा सामग्री, आभूषण और उपहारों की मांग बढ़ती है। दिल्ली के बाजार केवल राजधानी के स्थानीय ग्राहकों पर निर्भर नहीं हैं। देश के अनेक शहरों और कस्बों से छोटे व्यापारी थोक खरीदारी करने आते हैं। वे दिल्ली से माल खरीदकर अपने इलाकों में बेचते हैं। इस तरह दिल्ली के थोक बाजारों की गतिविधियां दूसरे राज्यों के खुदरा कारोबार से भी जुड़ी हैं। दूसरी तरफ, खुदरा खरीदारी करने वाले परिवार भी त्योहारों के लिए कपड़े, उपहार, घरेलू सामान और दूसरी जरूरतें खरीदने बाजार पहुंचते हैं। दुकानदार इसी समय के लिए पहले से स्टॉक जुटाते हैं, कर्मचारियों की व्यवस्था करते हैं और ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए छूट तथा विशेष सेल चलाते हैं। ऐसे में यदि बाजारों में ग्राहकों की आवाजाही बाधित होती है, तो माल दुकान में पड़ा रह सकता है। व्यापारी को किराया, कर्मचारियों का वेतन, बिजली, परिवहन और स्टॉक पर लगी पूंजी की लागत फिर भी चुकानी पड़ती है। यहां सवाल उठता है कि प्रदर्शनों के चलते आखिर व्यापारियों को कितना नुकसान हुआ और कितना हो सकता है? इस सवाल का सबसे महत्वपूर्ण आधार चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री (CTI) का 9 अक्टूबर को सामने आया आकलन है। संगठन ने अपने सर्वे के हवाले से कहा है कि पिछले तीन दिनों में दिल्ली के बाजारों की कारोबारी गतिविधियों में करीब 70 प्रतिशत गिरावट आई है। CTI के अनुसार, दिल्ली से बाहर से खरीदारी के लिए आने वाले ग्राहकों की संख्या सामान्य अनुमानित 2 से 3 लाख प्रतिदिन से घटकर करीब 40,000 से 50,000 रह गई। स्थानीय बाजारों में ग्राहकों की आवाजाही भी 50 प्रतिशत से अधिक कम होने का दावा किया गया है। हम आपको यह भी बता दें कि CTI ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में नवरात्रि से दिवाली तक प्रमुख व्यावसायिक इलाकों में बड़े प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगाने या उन्हें नियंत्रित करने की मांग की है। संगठन ने बड़े जमावड़ों के लिए मध्य दिल्ली से बाहर कोई स्थायी प्रदर्शन स्थल निर्धारित करने का सुझाव भी दिया है, जिसमें बुराड़ी या रामलीला मैदान जैसे स्थानों का उल्लेख है। बहरहाल, त्योहारों के इस अहम कारोबारी मौसम में दिल्ली के बाजारों को बार-बार ठप होने से बचाना केवल व्यापारियों का मुद्दा नहीं है। यह रोजगार, छोटे कारोबार, थोक-खुदरा आपूर्ति और उपभोक्ताओं की सुविधा से जुड़ा सवाल है। प्रदर्शन करने वालों को अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए, लेकिन ऐसी व्यवस्था भी जरूरी है कि राजनीतिक गतिविधियों और सुरक्षा प्रबंधों की कीमत आम नागरिकों और कारोबारियों को अपनी रोजी-रोटी गंवाकर न चुकानी पड़े। -नीरज कुमार दुबे
क्या अंबानी भारत के असली बॉस हैं? यह सवाल दुनिया के सबसे अमीर शख्स एलन मस्क ने एक्स पर एक पोस्ट पर पूछा है। इससे पहले 7 अक्टूबर को एलन मस्क ने एक्स पर एक पोस्ट किया था। इसमें मस्क ने लिखा था कि भारत के कुछ बड़े बिजनेसमैन नहीं चाहते कि स्टारलिंक का सेटेलाइट इंटरनेट भारत में आए। क्योंकि ऐसा होने से उनका एक छत्रुराज खत्म हो सकता है। हालांकि तब एलन मस्क ने किसी का नाम नहीं लिया था। लेकिन 8 अक्टूबर को मस्क का एक और पोस्ट आया है और इस बार उन्होंने सीधे अंबानी का नाम लिया। भारत की बढ़ती वैश्विक साख और तेजी से मजबूत होती अर्थव्यवस्था को देखकर अब सिर्फ देश के अंदर बैठे विरोधी ही नहीं बल्कि दुनिया के सबसे अमीर शख्स एलन मस्क के पेट में भी मरोड़ उठने लगी है और वो भी अब मोदी सरकार और अंबानी के खिलाफ खतरनाक खेल खेलने की फिराक में लग गए हैं। दरअसल एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक भारत के सेटेलाइट इंटरनेट मार्केट में पैर पसारने की फिराक में थी। लेकिन जब भारत सरकार ने विदेशी कंपनियों के मनमानी के आगे झुकने से इंकार कर दिया और देश के राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा नियमों से समझौता नहीं किया तो मस्क का असली रूप दुनिया के सामने आ गया। पहले मस्क ने भारत की कमर्शियल प्रक्रियाओं पर सवाल उठाए। फिर उन्होंने भारतीय उद्योगपतियों के लिए दिलचस्प शब्द का इस्तेमाल किया ऑलिगार्क। ऑलिगार्क का मतलब सिर्फ धन सेट नहीं होता है। कैमब्रिज डिक्शनरी के मुताबिक ऑलिगार्क एक ऐसा धन्ना सेट होता है जो अपने कनेक्शन और अकूत दौलत के बल पर सरकार और समाज को इन्फ्लुएंस करता है। तो ऑलिगार्क एक नेगेटिव कनोटेशन वाला लफ्ज़ है। रूस में पुतिन जिन 10-12 धन्ना सेठों के बल पर पूरे देश को कंट्रोल करते हैं उन्हें रशियन ऑलिगार्क कहा जाता है। पूरी दुनिया जानती है कि किस तरह पुतिन के आशीर्वाद से इन्हें ठेके मिलते हैं और बदले में यह लोग पुतिन के कामों में पैसा लगाते हैं। पुतिन के जो दुश्मन है उनको परेशान करते हैं। सेठ भी खुश, नेता भी खुश और जनता जनता के लिए इस गेम में कोई जगह नहीं है। कुल मिलाकर कहे तो ऑलिगार्क एक नेगेटिव कनोटेशन वाला शब्द है। अकूत पैसा, पावरफुल कनेक्शन और ऐसा कोई शख्स जो ऐसे बिजनेस में हो जहां स्टार्लिंग उसका डायरेक्ट राइवल हो। सोशल मीडिया एक स्वर में मुकेश अंबानी का नाम ले रहा है। हालांकि जब भारत सरकार ने मस्क के तमाम बेबुनियादी आरोपों को खारिज कर दिया तो बौखलाहट में मस्क ने सीधे भारत के स्वाभिमान पर हमला बोलते हुए एक ट्वीट कर दिया और छूटते ही पूछा क्या अंबानी भारत के असली बॉस हैं। तुरंत ही उनके ट्वीट पर राहुल गांधी ने ऐसा रिएक्ट किया कि पूरा देश पूरे खेल को ही समझ गया कि ये दोनों मिलकर भारत में क्या खतरनाक खेल खेलने की कोशिश में लग गए हैं। लेकिन ठहरिए मस्क का यह बयान सिर्फ एक कारोबारी खीज नहीं है बल्कि इसके पीछे एक बहुत खतरनाक क्रोनोलॉजी छिपी है। जैसे ही मस्क ने भारत और भारतीय कारोबारियों के खिलाफ जहर उगला वैसे ही देश के अंदर बैठे राहुल गांधी और उनका पूरा इकोसिस्टम मस्क के समर्थन में पलकें बिछाकर खड़ा हो गया। राहुल गांधी ने तुरंत सोशल मीडिया पर मस्क का स्वागत करते हुए भारतीय उद्योगपतियों और मोदी सरकार के खिलाफ तंज कस डाला। जिस पर मस्क ने भी राहुल को धन्यवाद दे दिया। सोचिए जो राहुल गांधी दिल्ली की सड़कों पर तांडव मचा रहे हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर मोहल भड़का रहे हैं। वही राहुल गांधी अब भारत की संप्रभुता को चुनौती देने वाले विदेशी अरबपति के सुर में सुर मिला रहे हैं। इसे भी पढ़ें: Satcom सेक्टर में नहीं चलेगी Monopoly, सिंधिया ने किया साफ- सुरक्षा जांच और चार्ज तय होने के बाद मिलेगा Spectrum अंबानी का नाम लेकर एलन मस्क ने क्या कहा? मस्क ने लिखा कि स्टारलिंक को 165 से ज्यादा देशों में लाइसेंस मिला हुआ है। कंपनी पिछले 5 साल से भारत सरकार की हर शर्त और कानून मान रही है। फिर भी भारत में स्टारलिंक को अब तक लाइसेंस क्यों नहीं मिला? इसके बाद मस्क ने सीधा सवाल पूछा, क्या अंबानी ही भारत के असली बॉस हैं? इसी पोस्ट को नेता विपक्ष राहुल गांधी ने रीट्वीट किया है। राहुल गांधी ने लिखा भारत में आपका स्वागत है। एलन दूसरे शख्स से मिलने का इंतजार करें। इसके बाद एलन मस्क ने भी इस पोस्ट को रीट्वीट किया है और थैंक यू लिखा है। यानी एलन मस्क के पोस्ट से शुरू हुआ यह विवाद अब बढ़ गया है। मस्क की स्टारलिंक का विवाद है क्या? स्टारलिंक भारत में सेटेलाइट इंटरनेट सेवा शुरू करने के लिए कई सालों से कोशिश कर रहा है। कंपनी को जून 2025 में जीएमपीसीएस लाइसेंस और जुलाई 2025 में आईए स्पेस से अनुमति मिल चुकी है। कंपनी ने भारत में ग्राउंड स्टेशन और जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर भी बना लिया है। लेकिन अभी भी सिक्योरिटी असेसमेंट, विदेशी निवेश की मंजूरी और स्पेक्ट्रम आवंटन बाकी है। आसान भाषा में समझे तो स्टार्लिंग को भारत में काम करने की इजाजत मिल चुकी है। लेकिन सर्विस शुरू करने के लिए जरूरी आखिरी हरी झंडी अभी नहीं मिली है। और इसी देरी को लेकर एलन मस्क अब खुलकर सवाल उठा रहे हैं। स्टार्लिंग ने भारत में अपनी मौजूदगी बढ़ाने के लिए महाराष्ट्र, गुजरात और मेघालय की सरकारों के साथ लेटर ऑफ इंटेंट भी साइन किए हैं। बहरहाल मस्क के इस बयान के बाद भारत सरकार ने भी जवाब दिया है। संचार मंत्रालय ने स्टारलिंग के साथ किसी तरह का भेदभाव किए जाने के आरोप को खारिज किया है। दरअसल सरकार ने तीन कंपनियों को भारत में सेटेलाइट इंटरनेट सर्विस देने का लाइसेंस दिया है। इनमें एलन मस्क की स्टारलिंग, Reliance Jio की Jio सेट और भारती के समर्थन वाली यूटेल सेट वन वेब शामिल है। लेकिन लाइसेंस मिलने के बावजूद यह कंपनियां अभी भारत में अपनी सर्विस शुरू नहीं कर सकती। इसके लिए सुरक्षा से जुड़ी जांच और स्पेक्ट्रम की मंजूरी जरूरी है। इसे भी पढ़ें: भारत Banana Republic नहीं, Ram Madhav बोले- Starlink स्पेक्ट्रम पर नियम से होगा फैसला क्या मस्क स्टारलिंग को जिओपॉलिटिकल वेपन की तरह इस्तेमाल करते हैं? मस्क एक एक्टिव पॉलिटिकल माइंड रखते हैं। दुनिया भर की पॉलिटिक्स को लेकर उनकी एक राय है। उनके दिमाग में स्कीम्स हैं। जर्मनी में चुनाव होते हैं तो वह दक्षिणपंथी एएफडी की तरफदारी करते हैं। ब्रिटेन में एंटी मुस्लिम नैरेटिव को हवा देते हैं। रिस्टोर ब्रिटेन और रिफॉर्म यूके जैसी पार्टियों का समर्थन करते हैं। अपने खुद के देश साउथ अफ्रीका में सरकार को टारगेट करते हैं। वाइट सुप्रीममेसी की बातें करते हैं। अब अगर मस्क सिर्फ़ दक्षिणपंथी ही होते पॉलिटिकली तो कोई कह सकता था कि इस हिसाब से मस्क को भारत में दिक्कत नहीं होनी चाहिए। भारत में भी दक्षिणपंथी सरकार अभी है। लेकिन दिक्कत यह है कि मस्क कब पाला बदलेंगे किसी को आईडिया नहीं है। कभी वो ट्रंप के दफ्तर में नजर आते हैं बच्चों के साथ। तो कभी ऐसे ट्वीट करते हैं कि ट्रंप को बताना पड़ता है कि भले तुमने पैसा लगाया हो कैंपेन में लेकिन राष्ट्रपति मैं हूं। मुझसे डर के रहो। मस्क आज किसी पार्टी का हाथ पकड़ कर दाखिल होंगे। कल उसी के दुश्मन भी बन सकते हैं और इसमें किसी को हैरानी भी नहीं होगी। मस्क की बौखलाहट और राहुल का एलन प्रेम! थोड़ा पीछे चलते हैं, 2024 में चुनाव प्रचार के दौरान दोनों नेता करीब आते हैं। डोनाल्ड ट्रंप की सबसे बड़ी जीत का श्रेय एलन मस्क को ही एक्सपर्ट्स ने तब दिया था। उन्होंने ट्रंप का सिर्फ समर्थन ही नहीं किया बल्कि ट्रंप के प्रचार में लगभग सात करोड़ डॉलर खर्च भी किए। बात जब टाइमिंग की आती है तो राजनीति में कोई भी घटना इत्तेफाक नहीं होती है। एक तरफ जब विपक्ष एसआईआर के खिलाफ ज्ञानेश कुमार को मोहरा बनाकर सड़कों पर गदर काट रहा है। ठीक उसी वक्त एलन मस्क मोदी सरकार और भारतीय उद्योगपतियों को निशाना बना रहे हैं। अंबानी का नाम लेकर ना जाने क्या-क्या दिखाने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं। सवाल यह है कि जो मस्क आज भारत में कानून और नियमों की बात का रोना रो रहे हैं। क्या वो अमेरिका में भी इसी तरह की बयानबाजी करने की हिम्मत रखते हैं? जब ट्रंप प्रशासन ने चीन की दिग्गज इलेक्ट्रिक वाहन कंपनी बीवाईडी पर 100 फीसदी तक भारी भरकम टेरिफ ठोक दिया था। तब तो मस्क की जुबान पर ताला लगा हुआ था। तब तो मस्क ने यह नहीं कहा कि अमेरिका में यह किसी से नहीं पूछा। क्या अमेरिका का बॉस एलन मस्क है? क्योंकि उन्हीं के कंपनियों की वजह से ट्रंप ने यह हरकत की थी। लेकिन जब भारत अपने सुरक्षा कारणों, राष्ट्रीय हितों, कानूनों का पालन करने के लिए निष्पक्ष नियम कानून लागू करता है तो मस्क को भारत में तानाशाही दिखने लगती है। भारत का बॉस अंबानी दिखने लगते हैं। सबसे अफसोसजनक बात तो यह है कि हमारे देश का विपक्ष यानी राहुल गांधी अपनी ही सरकार को घेरने के लिए ऐसे विदेशी कारोबारी के मोहरे बन जाते हैं जो भारत की अर्थव्यवस्था और घरेलू कंपनियों की बढ़त से परेशान है। जबकि मोदी सरकार ने एकदम साफ कर दिया है कि देश का सेटेलाइट कम्युनिकेशन रेगुलेटरी फ्रेमवर्क एकदम निष्पक्ष और गैर भेदभाव वाला है। सरकार ने तीन कंपनियों के सुरक्षा और कागजी गाइडलाइंस पूरे ना करने पर प्रोसेस को रोका है। जिसमें स्टार्लिंग, Jio सेट और यूटिल सेट वनवे तीनों शामिल हैं। तीनों कंपनियां एक ही सुरक्षा जांच के चरण में है। लेकिन मस्क चाहते हैं कि उन्हें बिना सुरक्षा क्लीयरेंस के स्पेशल ट्रीटमेंट मिले। जब ऐसा नहीं हुआ तो उन्होंने भारत को बदनाम करना शुरू कर दिया। मस्क के आरोपों पर टेलीकॉम मिनिस्टर ने क्या जवाब दिया संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि भारत किसी भी क्षेत्र में एकाधिकार की अनुमति नहीं देता। उन्होंने कहा कि एक खास कंपनी की काफी चर्चा हो रही है, लेकिन वास्तविकता यह है कि तीन कंपनियों को उपग्रह संचार (सैटकॉम) लाइसेंस मिल चुके हैं और वे सुरक्षा संबंधी शर्तों तथा निर्धारित लक्ष्यों को अलग-अलग पूरा करने के बाद परिचालन शुरू कर सकती हैं। उपग्रह संचार सेवाओं को लेकर जारी विवाद और अमेरिकी उद्योगपति एलन मस्क के आरोपों के बीच उन्होंने यह टिप्पणी की है। मस्क ने दावा किया है कि कुछ प्रभावशाली कारोबारी समूह उनकी कंपनी स्टारलिंक की उपग्रह संचार सेवाओं को शुरू होने से रोक रहे हैं। मस्क ने आरोप लगाया था कि ये समूह भारतीय लोगों पर अपना एकाधिकार बनाए रखना चाहते हैं। सिंधिया ने कहा कि भारत किसी भी क्षेत्र में एकाधिकार की अनुमति नहीं देता। हमारा काम हर ग्राहक को सेवाओं के व्यापक विकल्प उपलब्ध कराना है। खुले बाजार में ग्राहक को यह चयन करना होगा कि वह कौन-सी सेवा पसंद करता है और उन विकल्पों में से किस कंपनी की सेवा लेना चाहता है। सिंधिया ने कहा कि मस्क की स्टारलिंक, रिलायंस जियो की उपग्रह सेवा इकाई जियो सैटकॉम और भारती समर्थित यूटेलसैट वनवेब को लाइसेंस मिल चुके हैं। वहीं, अमेजन की कुइपर ने इस क्षेत्र में रुचि दिखाई है और उसे निर्धारित प्रक्रिया से गुजरना होगा। मंत्री ने कहा कि एक खास कंपनी को लेकर काफी चर्चा हो रही है, लेकिन सैटकॉम के लाइसेंस तीन सेवा प्रदाताओं को मिले हैं।
'अखिलेश के घर में भी चुनाव लड़कर जीत जाएंगे सीएम योगी', ओपी राजभर का सपा प्रमुख पर तंज
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'प्रधानमंत्री का अपमान बर्दाश्त नहीं', 'लाल हिट जनता पार्टी' के बैनर तले युवाओं का विपक्ष के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन
शेयर बाजार की कमजोरी के बावजूद आईपीओ बाजार में तेजी
नई दिल्ली, एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय कंपनियों ने 2026 के पहले नौ महीनों (जनवरी-सितंबर) के दौरान आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) के जरिए रिकॉर्ड 12.5 अरब डॉलर जुटाए हैं। यह आंकड़ा 1980 से उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार जनवरी-सितंबर अवधि का अब तक का सबसे बड़ा फंड जुटाव है।
अमेरिका में भारतीय प्रतिभा का लोहा मानने वाले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने अब उसी प्रतिभा के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं, जिसने अमेरिकी तकनीकी उद्योग को वैश्विक ताकत बनाने में अहम भूमिका निभाई है। एक तरफ ट्रंप भारतीय मूल के माइक्रोसॉफ्ट सीईओ सत्य नडेला की तारीफ करते हैं, तो दूसरी तरफ उपराष्ट्रपति जेडी वांस के नेतृत्व में अमेरिकी प्रशासन माइक्रोसॉफ्ट, टीसीएस, इंफोसिस, विप्रो और कॉग्निजेंट समेत आठ प्रमुख प्रौद्योगिकी कंपनियों को ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया से जुड़े PERM कार्यक्रम से निलंबित कर देता है। इस फैसले से हजारों भारतीय आईटी पेशेवरों के भविष्य और अमेरिका में स्थायी निवास पाने की उम्मीदों पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। हालांकि, भारत सरकार ने इस मामले पर अपनी प्रतिक्रिया में स्पष्ट किया है कि PERM कार्यक्रम और एच-1बी वीजा अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं तथा PERM आवेदनों पर रोक लगने से मौजूदा एच-1बी वीजा या उनके धारकों और आश्रितों की स्थिति अपने आप प्रभावित नहीं होती, भले ही पात्र कर्मचारियों की ग्रीन कार्ड प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है। विदेश मंत्रालय ने यह भी दोटूक कहा है कि प्रतिभाओं की आवाजाही भारत और अमेरिका, दोनों की अर्थव्यवस्थाओं के लिए फायदेमंद है। इससे अमेरिकी कंपनियों को उच्च कौशल वाले पेशेवर, नवाचार, अनुसंधान, उत्पादकता, प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता और रोजगार सृजन में मदद मिलती है। मंत्रालय ने वांस की उन टिप्पणियों पर भी आपत्ति जताई है, जिनमें विदेशी कर्मचारियों के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया गया। भारत ने कहा कि अमेरिका में भारतीय पेशेवर उच्च शिक्षित और कुशल योगदानकर्ता हैं तथा उन्हें औपनिवेशिक इतिहास की पीड़ादायक याद दिलाने वाली भाषा से संबोधित करना गहरे तौर पर आपत्तिजनक है। देखा जाये तो भारत का यह बयान महज औपचारिक कूटनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि वाशिंगटन के लिए स्पष्ट संदेश है कि भारतीय प्रतिभा को अपमानित करके और उसके अवसर सीमित करके दोनों देशों की साझा महत्वाकांक्षाओं को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। अब बड़ा सवाल यह है कि ट्रंप प्रशासन का यह कदम अमेरिकी रोजगार की सुरक्षा तक सीमित है या इसके पीछे चुनावी राजनीति, भारत पर आर्थिक दबाव और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ संबंधों के समीकरण भी काम कर रहे हैं? उल्लेखनीय है कि उपराष्ट्रपति जेडी वांस, श्रम सचिव कीथ सॉन्डरलिंग और अटॉर्नी जनरल टॉड ब्लांश ने अमेरिकी एंटी-फ्रॉड टास्क फोर्स पहल के तहत आठ प्रौद्योगिकी कंपनियों को PERM कार्यक्रम से निलंबित करने की घोषणा की। इनमें माइक्रोसॉफ्ट, एडोबी, टीसीएस, इंफोसिस, विप्रो, एचसीएल टेक्नोलॉजीज, कॉग्निजेंट और कैपजेमिनी शामिल हैं। प्रशासन का आरोप है कि कुछ कंपनियों ने विदेशी कर्मचारियों की भर्ती के लिए ऐसी व्यवस्था का इस्तेमाल किया, जिससे अमेरिकी कामगारों के रोजगार और वेतन पर प्रतिकूल असर पड़ा। अब सवाल उठता है कि आखिर PERM है क्या और इस पर रोक से भारतीयों को कितना नुकसान होगा? हम आपको बता दें कि PERM यानी Permanent Labor Certification रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड हासिल करने की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण है। सामान्यतः नियोक्ता को अमेरिकी श्रम विभाग से प्रमाणित कराना होता है कि संबंधित पद के लिए पर्याप्त इच्छुक और योग्य अमेरिकी कर्मचारी उपलब्ध नहीं हैं और विदेशी कर्मचारी की नियुक्ति से अमेरिकी कर्मचारियों के वेतन तथा कामकाजी परिस्थितियों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसके बाद ही नियोक्ता विदेशी कर्मचारी के रोजगार आधारित स्थायी निवास की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकता है। इस कार्यक्रम से आठ कंपनियों को बाहर करने का मतलब यह है कि वे नई PERM अर्जियां दाखिल नहीं कर पाएंगी और उनकी लंबित अर्जियों पर भी प्रक्रिया रुक जाएगी। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि इन कंपनियों में काम कर रहे सभी भारतीयों के एच-1बी वीजा रद्द हो गए हैं या उन्हें तत्काल अमेरिका छोड़ना पड़ेगा। असली खतरा उन कर्मचारियों के लिए है जो छह साल की सामान्य एच-1बी अवधि के करीब पहुंच रहे हैं और अमेरिका में लंबे समय तक बने रहने के लिए ग्रीन कार्ड प्रक्रिया पर निर्भर हैं। कुछ परिस्थितियों में ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया के निर्धारित चरण पूरे होने पर एच-1बी अवधि बढ़ाई जा सकती है। PERM प्रक्रिया रुकने से ऐसे कर्मचारियों के लिए भविष्य की योजना बनाना कहीं अधिक मुश्किल हो सकता है। देखा जाये तो अमेरिकी प्रशासन की इस कार्रवाई ने भारतीय आईटी उद्योग से लेकर अमेरिका में पढ़ाई और नौकरी करने का सपना देखने वाले युवाओं तक अनिश्चितता बढ़ा दी है। जेडी वांस ने माइक्रोसॉफ्ट पर सबसे तीखा हमला करते हुए आरोप लगाया कि कंपनी ने 2025 में करीब 6,000 अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी की, लेकिन साथ ही 6,000 से अधिक एच-1बी वीजा की मंजूरी हासिल की और 3,600 से अधिक PERM आवेदन भी दाखिल किए। उन्होंने विदेशी कर्मचारियों को 'फॉरेन इंडेंचर्ड सर्वेंट्स' और ऐसी कंपनियों को 'वीजा मिल्स' तक कह दिया। श्रम सचिव सॉन्डरलिंग का दावा है कि केवल इन कंपनियों ने 2009 से लगभग 30 लाख विदेशी कर्मचारियों के लिए अनुरोध किए, 2.30 लाख से अधिक एच-1बी वीजा मंजूर कराए और एक लाख से अधिक PERM प्रमाणन हासिल किए। प्रशासन इन आंकड़ों को अमेरिकी कामगारों के अवसर छिनने से जोड़ रहा है। लेकिन आवेदन, मंजूरी, वास्तविक नियुक्ति और अमेरिकी कर्मचारी की जगह विदेशी कर्मचारी रखे जाने के आंकड़े अलग-अलग हैं। माइक्रोसॉफ्ट का पक्ष भी इस बहस में महत्वपूर्ण है। कंपनी ने कहा है कि उसके करीब 6,000 एच-1बी आवेदनों में लगभग 80 प्रतिशत मौजूदा कर्मचारियों के वीजा विस्तार या उनकी स्थिति बदलने से संबंधित थे। इसका अर्थ है कि सभी आवेदनों को नई विदेशी भर्तियों के रूप में नहीं देखा जा सकता। साथ ही नेशनल ऑर्गनाइजेशन फॉर सॉफ्टवेयर एंड टेक्नोलॉजी प्रोफेशनल्स के संस्थापक राजीव दाभाडकर की व्याख्या इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू सामने लाती है। उनके मुताबिक, अमेरिकी प्रशासन अब केवल यह नहीं पूछ रहा कि विदेशी कर्मचारी योग्य है या नहीं, बल्कि यह भी जांच रहा है कि विदेशी श्रम की भर्ती, भुगतान और आपूर्ति का कारोबारी मॉडल किस तरह काम करता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी तकनीकी पद के लिए अमेरिकी कंपनी एक लाख पचास हजार डॉलर खर्च करती है और कोई मध्यस्थ विदेशी कर्मचारी को उसकी वास्तविक आर्थिक कीमत से काफी कम भुगतान करके अंतर अपने मुनाफे के रूप में रखता है, तो सवाल भारतीय कर्मचारी बनाम अमेरिकी कर्मचारी का नहीं, बल्कि पारदर्शी वेतन बनाम श्रम लागत के अनुचित लाभ का बनता है। यह जांच का वैध विषय हो सकता है, लेकिन इसका इस्तेमाल सभी भारतीय पेशेवरों को संदेह के घेरे में रखने के लिए नहीं होना चाहिए। अब सवाल उठता है कि ट्रंप ने सत्य नडेला की तारीफ क्यों की और वांस ने माइक्रोसॉफ्ट पर इतना सख्त रुख क्यों अपनाया? इसका उत्तर अमेरिकी राजनीति की दो प्राथमिकताओं में है। ट्रंप को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड कंप्यूटिंग और तकनीकी निवेश में अमेरिकी नेतृत्व मजबूत करना है। माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनी इस लक्ष्य में महत्वपूर्ण है। दूसरी ओर, वांस और रिपब्लिकन राजनीति का एक प्रमुख संदेश अमेरिकी नागरिकों को प्राथमिकता देना और विदेशी श्रमिकों पर निर्भरता घटाना है। किसी कंपनी के सीईओ की उपलब्धियों की प्रशंसा करना और उसी कंपनी की श्रम नीतियों की जांच करना प्रशासन के लिए विरोधाभासी नहीं है। लेकिन यदि नियमों का इस्तेमाल चुनिंदा कंपनियों को दबाने या राजनीतिक संदेश देने के लिए किया जाता है, तो निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। इस कार्रवाई का चुनावी पहलू भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 3 नवंबर 2026 को होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों से पहले अमेरिकी कामगारों की नौकरियों की रक्षा करने का संदेश रिपब्लिकन पार्टी के लिए राजनीतिक रूप से उपयोगी है। ट्रंप प्रशासन विदेशी श्रम के खिलाफ सख्त रुख दिखाकर अपने मतदाताओं को यह भरोसा देना चाहता है कि वह अमेरिकी रोजगार को प्राथमिकता दे रहा है। इसके साथ ही यह भी माना जा रहा है कि अपने तेवर कड़े दिखाकर जेडी वांस अगला राष्ट्रपति चुनाव लड़ने की तैयारी भी कर रहे हैं। साथ ही भारतीय छात्रों के लिए भी स्थिति चिंताजनक है। पढ़ाई पूरी करने के बाद अमेरिका में काम करने का अवसर देने वाला OPT कार्यक्रम और एच-1बी वीजा व्यवस्था दोनों राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं। अंतरराष्ट्रीय छात्रों से संबंधित OPT प्रस्ताव में पहली बार कार्यक्रम में शामिल होने वाले प्रत्येक छात्र के लिए संस्थानों पर 70,000 डॉलर और नवीनीकरण पर 30,000 डॉलर शुल्क लगाने की बात सामने आई है। यदि यह प्रस्ताव लागू होता है, तो विश्वविद्यालयों और नियोक्ताओं पर लागत बढ़ेगी, जिसका बोझ छात्रों पर भी पड़ सकता है। इसके अलावा, नए एच-1बी आवेदनों से संबंधित 1,00,000 डॉलर भुगतान की शर्त को लेकर भी विवाद है। इस शुल्क की लागू करने की प्रक्रिया संघीय अदालतों के आदेशों से फिलहाल बाधित है और मुकदमे जारी हैं। माना जा रहा है कि भारतीय आईटी कंपनियों के शुरुआती और मध्यम स्तर के इंजीनियरों पर दबाव अधिक पड़ सकता है। वरिष्ठ इंजीनियरों और बड़ी अमेरिकी तकनीकी कंपनियों में स्थापित पदों पर काम करने वाले कुछ पेशेवर अपेक्षाकृत सुरक्षित हो सकते हैं, लेकिन भारतीय कंसल्टिंग कंपनियों के माध्यम से अमेरिका जाने वाले युवाओं के लिए रास्ता कठिन होता जा रहा है। PERM पर रोक, एच-1बी संबंधी शुल्क विवाद और चयन प्रक्रिया में बदलाव मिलकर उस व्यवस्था को कमजोर कर सकते हैं जिसके सहारे पिछले तीन दशकों में बड़ी संख्या में भारतीय इंजीनियर अमेरिकी तकनीकी उद्योग तक पहुंचे। यहां एक सवाल यह भी उठता है कि क्या ट्रंप यह सब इसलिए कर रहे हैं कि भारत पर लगाए गए टैरिफ का अपेक्षित असर नहीं हुआ और अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर दबाव बनाने के लिए नया रास्ता अपनाया जा रहा है? देखा जाये तो इन कंपनियों में भारतीय आईटी उद्योग की प्रमुख हिस्सेदारी और प्रभावित पेशेवरों में भारतीयों की बड़ी संख्या के कारण भारत पर असर गंभीर हो सकता है। फिर भी प्रशासन का घोषित आधार अमेरिकी श्रम बाजार और आव्रजन व्यवस्था है। देखा जाए तो ट्रंप प्रशासन की इस कार्रवाई का असर वीजा और ग्रीन कार्ड तक सीमित रहने वाला नहीं है, बल्कि यह भारत-अमेरिका आर्थिक साझेदारी की बुनियाद को भी चुनौती दे सकता है। जिन भारतीय कंपनियों और पेशेवरों ने अमेरिकी तकनीकी उद्योग को अपनी मेहनत, विशेषज्ञता और नवाचार से मजबूत किया, आज उन्हीं के रास्ते में नए अवरोध खड़े किए जा रहे हैं। भारतीय कंपनियों को अमेरिकी बाजार में भर्ती, परियोजनाओं के संचालन और प्रतिभाशाली कर्मचारियों को बनाए रखने की रणनीति बदलने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। लेकिन अमेरिका को भी समझना होगा कि भारतीय प्रतिभा के लिए दरवाजे संकरे करके वह अपनी ही तकनीकी ताकत और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को नुकसान पहुंचाने का जोखिम उठा रहा है। भारत को इस दबाव के आगे झुकने के बजाय वाशिंगटन से दोटूक कहना चाहिए कि भारतीय कंपनियों और पेशेवरों के साथ किसी भी तरह का भेदभाव स्वीकार नहीं किया जाएगा। साथ ही, भारत को अपनी तकनीकी क्षमता, अनुसंधान और उच्च कौशल वाले रोजगार में इतना निवेश करना होगा कि भारतीय प्रतिभा के भविष्य का फैसला केवल अमेरिकी नीतियां न करें। बहरहाल, ट्रंप की नीति भारत के लिए महज एक चेतावनी नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर तकनीकी शक्ति बनने की दिशा में निर्णायक कदम उठाने का संकेत है। अमेरिका एक ओर भारतीय मूल के तकनीकी दिग्गजों की सफलता का गुणगान करता है और दूसरी ओर भारतीय पेशेवरों के लिए अवसर सीमित करने वाली नीतियां अपनाता है। यह दोहरा रवैया उस साझेदारी पर सवाल खड़ा करता है, जिसे दोनों देश लोकतांत्रिक मूल्यों, आर्थिक सहयोग और साझा रणनीतिक हितों पर आधारित बताते हैं। भारत को अमेरिका से संबंध तोड़ने की जरूरत नहीं, लेकिन यह भी स्वीकार नहीं किया जा सकता कि भारतीय इंजीनियरों का भविष्य अमेरिकी घरेलू राजनीति और चुनावी लाभ-हानि का मोहरा बन जाए। अब वक्त है कि भारत अपनी प्रतिभा, तकनीकी क्षमता और विशाल बाजार की ताकत को कूटनीतिक आत्मविश्वास में बदले और स्पष्ट संदेश दे कि भारत अमेरिका के साथ साझेदारी चाहता है, किसी की राजनीतिक मजबूरियों की कीमत पर अपने नागरिकों और कंपनियों के हितों से समझौता नहीं होगा। -नीरज कुमार दुबे
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीति और भारत की कनेक्टिविटी रणनीति का असर अब साफ दिखाई देने लगा है। भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा यानी IMEC को लेकर दुनिया के कई देश भारत के साथ जुड़ने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। मिस्र, लेबनान और ओमान ने IMEC के साथ काम करने की इच्छा जताई है, जबकि ग्रीस और साइप्रस इसके पूर्ण सदस्य बनने के इच्छुक हैं। यानी 2023 में भारत की पहल से शुरू हुआ यह गलियारा अब धीरे-धीरे अपना दायरा बढ़ा रहा है और बदलते वैश्विक हालात में भारत की रणनीतिक ताकत का बड़ा केंद्र बनता जा रहा है। फ्रांस के राष्ट्रपति के IMEC विशेष दूत जेरार्ड मेस्त्राले ने नई दिल्ली में साफ कहा है कि IMEC के विस्तार पर फैसला मौजूदा आठ हस्ताक्षरकर्ता सरकारें ही करेंगी। उल्लेखनीय है कि भारत, अमेरिका, सऊदी अरब, यूएई, फ्रांस, जर्मनी, इटली और यूरोपीय संघ इसके मौजूदा हस्ताक्षरकर्ता हैं। वर्ष 2023 में G20 शिखर सम्मेलन के दौरान सामने आया यह प्रोजेक्ट भारत को अरब प्रायद्वीप के रास्ते यूरोप से जोड़ने के लिए समुद्री मार्ग, रेल नेटवर्क, ऊर्जा ढांचे और डिजिटल कनेक्टिविटी को एक साथ जोड़ने की परिकल्पना करता है। सबसे अहम बात यह है कि इस साल के अंत तक IMEC की पहली मंत्रीस्तरीय बैठक होने की उम्मीद है। अब तक इसकी गतिविधियां मुख्यतः स्टीयरिंग कमेटी के स्तर तक सीमित रही हैं। मंत्रीस्तरीय बैठक न केवल परियोजना को राजनीतिक गति दे सकती है, बल्कि इसके भौगोलिक दायरे और सदस्यता विस्तार पर भी बड़ा फैसला संभव है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि जॉर्डन और इजरायल मूल समझौते में उल्लिखित थे, हालांकि वे आठ हस्ताक्षरकर्ताओं में शामिल नहीं हैं। युद्ध ने बदली IMEC की तस्वीर देखा जाये तो पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और तनाव ने IMEC के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है, लेकिन साथ ही इसकी जरूरत भी पहले से कहीं ज्यादा बढ़ा दी है। होर्मुज और बाब-अल-मंदेब जैसे अहम समुद्री रास्तों पर बढ़ते खतरे ने यह साफ कर दिया है कि IMEC को किसी एक संवेदनशील मार्ग पर निर्भर नहीं रहना होगा। सवाल यही है कि जिस कॉरिडोर का मकसद सुरक्षित और वैकल्पिक व्यापार मार्ग देना है, अगर वही कुछ जोखिम भरे रास्तों पर निर्भर रहा तो वह कितना भरोसेमंद साबित होगा? यही कारण है कि 2026 का IMEC, 2023 के IMEC से बिल्कुल अलग दिखाई दे रहा है। अब इसे एक सीधी लाइन वाले कॉरिडोर के बजाय 'नेटवर्क ऑफ कॉरिडोर्स' के रूप में देखने की जरूरत महसूस की जा रही है। अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सहयोग और विकास संगठन की मैरी-एस्टेल रे के अनुसार बदलते हालात ने मूल कॉरिडोर की संरचना बदल दी है और अब व्यापारियों के लिए कई वैकल्पिक मार्गों और विकल्पों की जरूरत है। साथ ही इस बदलाव में ओमान की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई है। ओमान अरब प्रायद्वीप के लिए एक वैकल्पिक प्रवेश द्वार बन सकता है और उसके बंदरगाह होर्मुज तथा बाब-अल-मंदेब के जोखिम से बचने वाली व्यवस्था में अहम भूमिका निभा सकते हैं। सोहर और यूएई के फुजैराह के बीच प्रस्तावित रेल संपर्क इसी नई रणनीतिक सोच की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। 'लाइन' नहीं, ऐसा नेटवर्क जिसे दुश्मन तोड़ न सके विशेषज्ञों का मानना है कि एक ही मार्ग पर निर्भर रहने वाला कॉरिडोर युद्ध या भू-राजनीतिक संकट में आसानी से बाधित हो सकता है। इसके विपरीत कई बंदरगाहों, रेल मार्गों और समुद्री विकल्पों वाला नेटवर्क संकट के दौरान अपना रास्ता बदल सकता है। यही IMEC की नई रणनीतिक दिशा बन सकती है। फुजैराह जैसे होर्मुज के बाहर स्थित बंदरगाहों को मजबूत करना, ओमान के सोहर और सलालाह जैसे विकल्पों को जोड़ना तथा मिस्र और अन्य संभावित मार्गों को नेटवर्क में शामिल करना इस परियोजना को ज्यादा प्रभावी बना सकता है। देखा जाये तो इसका अर्थ केवल IMEC की सीमा बढ़ाना नहीं, बल्कि उसकी पूरी भौगोलिक संरचना को फिर से डिजाइन करना है। भारत के हाथ में डिजिटल कमान भी साथ ही भारत केवल भौतिक कनेक्टिविटी पर निर्भर नहीं है। पूर्व बंदरगाह सचिव राजेश कुमार सिन्हा के मुताबिक IMEC की लॉजिस्टिक प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल बनाना आवश्यक है। भारत ने यूएई के साथ मिलकर MAITRI (Master Application for International Trade and Regulatory Interface) विकसित किया है, जो मई में लाइव हुआ। यह डिजिटल ढांचा आगे IMEC के दूसरे हिस्सों में भी दोहराया जा सकता है। IMEC का लक्ष्य सिर्फ सामान पहुंचाना नहीं, बल्कि तेज, सस्ता और सुरक्षित व्यापार तंत्र तैयार करना है। मूल परिकल्पना के अनुसार इससे ट्रांजिट समय में 40 प्रतिशत तक और लॉजिस्टिक लागत में करीब 30 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है। इसके साथ ग्रीन हाइड्रोजन, स्वच्छ ऊर्जा और सुरक्षित डिजिटल कनेक्टिविटी भी इस परियोजना के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। चीन के सामने भारत का रणनीतिक दांव इसके अलावा, IMEC का महत्व केवल व्यापार तक सीमित नहीं है। यह चीन की Belt and Road Initiative के सामने एक वैकल्पिक वैश्विक कनेक्टिविटी मॉडल भी प्रस्तुत करता है। साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया समर्थन ने इस परियोजना को फिर राजनीतिक ऊर्जा दी है। हालांकि अमेरिकी समर्थन का वित्तीय समर्थन में बदलना अभी निश्चित नहीं माना जा रहा। साथ ही भारत के लिए इसका सामरिक अर्थ और भी बड़ा है। यदि IMEC बहु-मार्गीय नेटवर्क में बदलता है, तो भारत पश्चिम एशिया और यूरोप के बीच व्यापार, ऊर्जा, डिजिटल कनेक्टिविटी और लॉजिस्टिक्स का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है। इसके अलावा, यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को भी मजबूत करेगा। यानी भारत किसी एक शक्ति या किसी एक व्यापारिक मार्ग पर निर्भर हुए बिना कई देशों और कई कॉरिडोरों के साथ समानांतर साझेदारी आगे बढ़ा सकेगा। भारत पहले ही IMEC के साथ-साथ International North-South Transport Corridor और Eastern Maritime Corridor जैसे अन्य संपर्क मार्गों पर काम कर रहा है। यही व्यापक रणनीति भारत को केवल IMEC का हिस्सा नहीं, बल्कि भविष्य के वैश्विक कनेक्टिविटी नेटवर्क का केंद्रीय खिलाड़ी बना सकती है। असली चुनौती: कॉरिडोर को जमीन पर उतारना हालांकि तस्वीर पूरी तरह आसान नहीं है। कई रेल लिंक, बंदरगाह और कनेक्टिविटी परियोजनाएं अभी विकास के दौर में हैं। युद्ध जोखिम, बीमा लागत, पूंजी की लागत और क्षेत्रीय अस्थिरता IMEC को व्यावसायिक रूप से चुनौतीपूर्ण बनाती है। भारत के सामने निर्यात के लिए पर्याप्त कार्गो उपलब्ध कराने की चुनौती भी है। इसके लिए मजबूत प्रशासनिक ढांचे की जरूरत होगी। जैसे कि एक साझा कानूनी या संस्थागत व्यवस्था, बेहतर डिजिटल एकीकरण, देशों के बीच समन्वय और व्यापारियों तथा निजी क्षेत्र की सक्रिय भागीदारी। बहरहाल, पश्चिम एशिया के संकट ने IMEC की जरूरत को कम नहीं किया, बल्कि इसे और बढ़ा दिया है। अब कोशिश इसे एक ही रास्ते तक सीमित रखने की नहीं, बल्कि ऐसे मजबूत नेटवर्क में बदलने की है, जिसमें किसी एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग के बंद होने पर भी व्यापार जारी रह सके। इस पूरी रणनीति में भारत की भूमिका बेहद अहम है। भारत अब केवल दूसरे देशों तक पहुंचने वाले रास्ते का हिस्सा नहीं बनना चाहता, बल्कि ऐसे नए रास्ते तैयार करने में प्रमुख भूमिका निभा रहा है, जो आने वाले समय में वैश्विक व्यापार की दिशा तय कर सकते हैं। -नीरज कुमार दुबे
'मतदान का अधिकार छीनने नहीं देंगे', सीईसी के इस्तीफे तक आंदोलन जारी रहेगा: कर्मवीर बौद्ध
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इटली: पीएम मेलोनी चाहती हैं 'बोनस सीट बिल' हो पास, संसद का निचला सदन लेगा फैसला आज
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10 अक्टूबर को Gyanesh Kumar पर आर-पार की जंग! INDIA Bloc vs Modi-RSS, क्या टकराव चाहती है सरकार?
एक फैसला, एक प्रेस कॉन्फ्रेंस और करोड़ों भारतीयों की ईएमआई का गणित रातों-रात बिगड़ गया! अगर आपने घर, कार या पर्सनल लोन ले रखा है, तो आपकी बैंक किश्त अब और महंगी होने वाली है। रिजर्व बैंक यानी RBI का एक फैसला। RBI की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी ने रेपो रेट 0.25% बढ़ाकर 5.50% कर दिया है। अब आप कहेंगे कि ये रेपो रेट और एमपीसी क्या बला है, हमारा इससे क्या लेना-देना? लेना-देना सीधा आपकी गाढ़ी कमाई से है। और लोग कहते हैं महंगाई सरकार बढ़ाती है। अक्सर हम और आप महंगाई का ठीकरा सरकारों पर फोड़ते हैं, लेकिन पर्दे के पीछे ब्याज दरों का रिमोट कंट्रोल किसके हाथ में होता है? एमपीसी क्या है और इसका सीधा असर आपके बैंक बैलेंस पर कैसे पड़ता है? चलिए, इस भारी-भरकम इकॉनमी का आज एमआरआई स्कैन करते हैं। इसे भी पढ़ें: मोदी के समर्थन में नारेबाजी पर भड़के कांग्रेस कार्यकर्ता, कश्मीरी युवक की कर दी पिटाई, बीजेपी आग बबूला रेपो रेट क्या बला है? इसे भी समझ लीजिए। यह वो रेट यानी दर होती है जिस पर रिजर्व बैंक दूसरे बैंकों को कर्ज देता है। मतलब यह हुआ कि जैसे ही आरबीआई दूसरे बैंकों को महंगे इंटरेस्ट रेट पर कर्ज देती है। दूसरे बैंक भी कस्टमर को मिलने वाले लोन पर ब्याज बढ़ा देते हैं। अगर रेपो रेट आरबीआई कम कर दे तो बैंक से मिलने वाला लोन सस्ता हो जाता है। इंटरेस्ट रेट कम हो जाता है। किस तरह के लोन होंगे इनमें? होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन। इसे ऐसे समझिए कि एक बड़ा साहूकार है जिससे छोटे-छोटे साहूकार पैसा उठाते हैं और लोगों को कर्ज देते हैं। इसे भी पढ़ें: Election Commission पर हार का ठीकरा फोड़कर अराजकता फैला रहे Rahul Gandhi, बोले CM Mohan Yadav बदले में उनसे क्या लेते हैं? ब्याज। तो अगर बड़ा साहूकार छोटे साहूकारों से ब्याज ज्यादा लेता है तो छोटा साहूकार भी लोगों से ब्याज ज्यादा लेने लगेगा क्योंकि उसको भी तो अपना घर चलाना है। वो क्यों नुकसान सा है भला? तो अब इसी रेपो रेट को बड़े साहूकार यानी आरबीआई ने बढ़ा दिया है। 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की गई है। तो रेपो रेट 5.50% हो गया। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कह दिया कि यह फैसला महंगाई के बदलते हालात को देखते हुए लिया गया। मल्होत्रा ने कहा कि महंगाई और उसके हालात अब उतने सामान्य नहीं है जितने पिछले साल थे। रेपो रेट बढ़ा है इसलिए आपके लोन की ईएमआई की राशि भी बढ़ जाएगी। अगर ईएमआई बढ़ाना नहीं चाहते हैं तो टेन्योर बढ़ जाएगा। यानी जो लोन 2 साल में खत्म होने वाला था वह अब 2 साल से ज्यादा वक्त में खत्म होगा। आम आदमी की जेब अब और भी खाली ज्यादा होने वाली है। इस बुरी खबर के बीच एक छोटी सी अच्छी खबर भी है। वो यह कि बैंक डिपॉजिट और फिक्स्ड डिपॉजिट यानी एफडी पर मिलने वाले ब्याज में भी बढ़ोतरी होगी। यानी अगर आपने एफडी किया है या करने वाले हैं तो उस पर मिलने वाला इंटरेस्ट अब पहले के मुकाबले ज्यादा होगा। मतलब यह हुआ कि आपका फायदा होने वाला है। लेकिन इसमें किंतु परंतु वाली स्थिति भी है। इसे भी पढ़ें: Elon Musk के आरोपों पर बोले Sunil Mittal, Eutelsat OneWeb भी भारत में मंजूरियों का कर रही इंतजार लिक्विडिटी की स्थिति क्या है? डिपॉजिट के लिए कंपटीशन कितना है मार्केट में? और आने वाले वक्त में इंटरेस्ट रेट कैसा हो सकता है यानी बढ़ेगा या घटेगा इसकी उम्मीद कितनी है? हालांकि अगर बैंक धीरे-धीरे डिपॉजिट रेट बढ़ाते हैं तो एफडी करने वालों को फायदा हो सकता है। इसे एक उदाहरण से समझ लीजिए। अगर कोई बैंक एक साल की एफडी की दर 6% देता है तो कस्टमर को हर साल ₹600 ब्याज मिलेगा। अब इस 6% को बढ़ाकर 6.25% कर दिया जाता है तो कस्टमर को 62500 का ब्याज मिलेगा। यानी हर साल ₹2500 ज्यादा। असली फायदा इस बात पर निर्भर करता है कि क्या बैंक 25 बीपीएस की पूरी बढ़ोतरी का फायदा डिपॉजिटर को देते हैं और क्या डिपॉजिटर नई एफडी में निवेश कर रहा है या मौजूदा में। पहला लोन किसने लिया? साल 1950 न्यूयॉर्क का एक बेहद आलीशान रेस्टोरेंट था। अमेरिका के एक जानेमाने बिजनेसमैन फ्रैंक मैकनारा अपने दोस्तों के साथ डिनर खत्म कर चुके थे। हंसीज़ाक का माहौल था। बातें चल रही थी। तभी वेटर आता है और टेबल पर बिल रख जाता है। फ्रैंक बहुत शान से अपनी सूट की जेब में हाथ डालते हैं। लेकिन अगले ही पल उनके चेहरे की हवाइयां उड़ जाती हैं। जेब खाली था। वॉलेट घर पर ही छूट गया था और पास में $1 का भी कैश नहीं था। अब सोचिए न्यूयॉर्क के इतने बड़े बिजनेसमैन के पास वेटर के सामने बिल चुकाने के पैसे नहीं है। कोई रास्ता ना देखकर मजबूरन उन्हें अपनी पत्नी को फोन करना पड़ा। उनकी पत्नी घर से पैसे लेकर रेस्टोरेंट पहुंची। फिर बिल चुकाया गया। तब जाकर फ्रैंक की जान में जान आया। उस रात फ्रैंक मैकन मारा को इतनी भयंकर शर्मिंदगीगी महसूस हुई कि उन्होंने कसम खाई कि दोबारा कभी ऐसी स्थिति में नहीं फसूंगा। तभी उनके मन में ख्याल भी आया। क्या कोई ऐसा तरीका नहीं हो सकता कि मैं बिना कैश लिए रेस्टोरेंट जाऊं। एक कार्ड दिखाऊं, खाना खाऊं और महीने के अंत में एक साथ सारा भुगतान कर दूं। और यह सारी कहानी मैंने आपको क्यों बताई? क्योंकि इसी एक शर्मिंदा करने वाली घटना से जन्म हुआ था डायनर्स क्लब का दुनिया के पहले आधुनिक क्रेडिट कार्ड का। इसे भी पढ़ें: 13 करोड़ वोटर लिस्ट में जुड़ने तक जारी रहेगी ECI के खिलाफ लड़ाई, Congress MP Imran Masood का दावा इंसान ने कर्ज का आविष्कार क्यों किया सोमेरियन सभ्यता जो आज के इराक वाले इलाके के आसपास पड़ती है। उस दौर में पैसा या करेंसी नाम की कोई चीज ही नहीं थी। तो सोचिए जब पैसा ही नहीं था तो लोन किस चीज का दिया जाता? लोन दिया जाता था अनाज का, बीज का और मवेशियों का। मान लीजिए एक सुमेरियन किसान है। बुवाई का मौसम आ गया लेकिन उसके पास बोने के लिए बीज ही नहीं है। फसल कटने में अभी 6 महीने बाकी हैं। और इस बीज परिवार का पेट भी पालना है। वो जाता था शहर के मुख्य मंदिर के पास या फिर राजा के महल के पास। वहां वो पुजारी या फिर अधिकारी से 10 बोरी जौ उधार मांगता। वो दे भी देते। लेकिन उनकी एक शर्त होती थी कि जब 6 महीने बाद फसल कटेगी तो किसान को 10 बोरी के बदले 13 बोरी जौ वापस लौटानी होगी। और यही जो तीन अतिरिक्त बोरियां थी यहीं जन्म हुआ इंटरेस्ट यानी ब्याज का। सुमेरियन भाषा में ब्याज को कहा जाता था मैश जिसका शाब्दिक अर्थ होता है छोटा बच्चा। यानी जैसे एक गाय एक बछड़े को जन्म देती है वैसे ही अनाज के लोन से ब्याज रूपी बच्चा पैदा होता है। अब सबसे दिलचस्प बात इस लेनदेन का हिसाब भी रखा जाता था। तब कागज तो था नहीं इसलिए वे क्ले टेबलेट्स यानी गीली मिट्टी की पट्टिकाएं लेते थे। उस पर यूनिफार्म लिपि में लिखा जाता था। चाणक्य का अर्थशास्त्र अगर हम भारत की बात करें तो भारत में भी कर्ज की व्यवस्था उतनी ही पुरानी और विकसित थी और ईसा पूर्व चौथी सदी में जब आचार्य चाणक्य ने अर्थशास्त्र लिखा तो उन्होंने भारत के वित्तीय नियमों को इतनी विस्तार से लिखा कि आज का आरबीआई भी हैरान रह जाए। चाणक्य ने अर्थशास्त्र में लिखा था कि आम व्यापारिक कर्ज पर ब्याज 15% प्रतिवर्ष होगी। लेकिन जो व्यापारी समुद्री रास्तों या खतरनाक जंगलों से होकर व्यापार करने जाते थे जोखिम ज्यादा होने के कारण उनसे 60% तक ब्याज लिया जा सकता था। भारत में डेप्ट एंड डिपॉजिट यानी ऋण और दान के पूरे कानून मौजूद थे। जहां ये तक तय था कि किस स्थिति में कर्ड चुकाना होगा और किस स्थित में नहीं।
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भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने छात्र आंदोलनों, नई शिक्षा नीति और CEC ज्ञानेश कुमार को लेकर जारी विवाद पर अपनी राय रखी। उन्होंने लोकतंत्र में निष्पक्ष चुनाव और पारदर्शिता को जरूरी बताया।
CEC Gyanesh Kumar के खिलाफ देशव्यापी उबाल! UP, Bihar से Karnataka तक प्रदर्शन, Jantar Mantar पर नजर
अचूक, अभेद्य और सटीक भारतीय वायु सेना: गर्व के साथ सफलता की ऊंचाइयों को छूते हुए
भारतीय वायु सेना (आई. ए. एफ.) आज (8 अक्टूबर, 2026) अपनी 94वीं वर्षगांठ मना रही है। यह दिन हवाई सुरक्षा, रणनीतिक प्रतिरोध और मानवीय सेवा के लगभग एक सदी के सफल सफर को दर्शाता है। इसे भी पढ़ें: IAF प्रमुख Amar Preet Singh ने 'ऑपरेशन सिंदूर' को किया याद! कहा- दुनिया ने देखी भारत की 'विध्वंसक ताकत', वायु सेना हर चुनौती के लिए पूरी तरह तैयार भारतीय वायु सेना दिवस क्यों मनाया जाता है भारतीय वायु सेना दिवस हर साल 8 अक्टूबर को मनाया जाता है, जो 1932 में हमारी वायु सेना की आधिकारिक स्थापना की याद दिलाता है। ब्रिटिश शासन के दौरान 'रॉयल इंडियन एयर फ़ोर्स' के रूप में स्थापित, वायु सेना ने 1950 में अपने नाम से रॉयल शब्द हटा दिया। यह दिन उन वायु योद्धाओं (सेवानिवृत्त एवं सेवारत) के साहस, पेशेवर रवैये और बलिदान का सम्मान करता है, जो शांति और संघर्ष के समय भारत के हवाई क्षेत्र, सीमाओं और नागरिकों की रक्षा करते हैं। भारतीय वायु सेना दिवस समारोह की खास बातें भारतीय वायु सेना दिवस समारोह भव्यता, सटीकता और टेक्नोलॉजी के प्रदर्शन के लिए जाने जाते हैं। सालाना एयर डिस्प्ले और फ्लाईपास्ट में फाइटर जेट, ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और हेलीकॉप्टर के तालमेल वाले हवाई करतब शामिल होते हैं। एयर-वॉरियर परेड में पुरुष और महिला दोनों तरह के कर्मियों का सटीक तालमेल वाला मार्च होता है, जो अनुशासन और मिलिट्री अंदाज़ को दिखाता है। फ्लाई-पास्ट कार्यक्रम को आम जनता तक पहुँचाने के लिए हर साल जगहें बदली जाती हैं, जैसे हिंडन एयर फ़ोर्स बेस, चंडीगढ़ और प्रयागराज। इस साल वाराणसी में 22, 23 और 25 अक्टूबर को फ्लाई-पास्ट डिस्प्ले होगा। थीम-बेस्ड कैंपेन में प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) और रक्षा मंत्रालय की तरफ़ से ऑफिशियल प्रमोशनल रिलीज़ शामिल हैं, जिनमें डायनामिक वीडियो कंटेंट होता है, जैसे 2026 का कैंपेन जिसकी थीम है, इंडियन एयर फ़ोर्स: अचूक, अभेद्य और सटीक। भारतीय वायु सेना की मुख्य बातें 2022 से लगातार पांचवें साल, भारतीय वायु सेना दुनिया भर में अमेरिका और रूस के बाद तीसरे स्थान पर है। यह युद्ध में खुद को साबित कर चुकी और अनुभवी सेना है। साथ ही, यह इस क्षेत्र की एकमात्र ऐसी वायु सेना है जो लगातार युद्ध अभियानों में शामिल रही है। 2019 में बालाकोट, 2020 से 2025 तक लद्दाख एल ए सी गतिरोध और मई 2025 में 'ऑपरेशन सिंदूर' जैसे अभियानों ने भारतीय वायु सेना की लंबी दूरी तक हमला करने और हवाई सुरक्षा की क्षमताओं को दिखाया है। ऑपरेशन का अनुभव इसकी एक बड़ी ताकत है। भारतीय वायु सेना 250 से ज़्यादा एसयू-30एम के आई एयर-डोमिनेंस फाइटर जेट्स का संचालन करती है। इन्हें एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे रडार और अस्त्र मार्क2 मिसाइलों के साथ 'सुपर सुखोई' मानकों के अनुसार अपग्रेड किया जा रहा है। राफेल 4.5-जेनरेशन फाइटर जेट्स, जो मीटियोर और स्कैल्प मिसाइलों और एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट से लैस हैं, 'ऑपरेशन सिंदूर' में बहुत असरदार साबित हुए। जल्द ही राफेल का एक नया वेरिएंट आने की उम्मीद है। तेजस मार्क-1, अपग्रेडेड मिग-29यूपीजी, मिराज-2000 और जगुआर फाइटर जेट्स जैसे अन्य प्लेटफॉर्म भी अलग-अलग तरह की ऑपरेशनल क्षमताएं प्रदान करते हैं। लेह (10,700 फीट की ऊंचाई) से लेकर कार निकोबार जैसी जगहों से काम करने की भारतीय वायु सेना की क्षमता इसे क्षेत्र की एकमात्र ऐसी वायु सेना बनाती है जो लगातार ऊंचाई वाले इलाकों में ऑपरेशन करने में सक्षम है। भारतीय वायु सेना एस-400 और आकाश सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम के साथ आईएसीसीएस और एएफनेट का इस्तेमाल करके असरदार इंटीग्रेटेड नेट-सेंट्रिक ऑपरेशन करती है। ये प्लेटफ़ॉर्म एक यूनिफाइड नेटवर्क के तौर पर काम करते हैं। एयर वॉरियर्स ने टेक्नोलॉजी-बेस्ड ऑपरेशन के तरीके को सफलतापूर्वक अपना लिया है। भारतीय वायु सेना का ट्रेनिंग का तरीका सबसे अच्छे तरीकों में से एक है और भारतीय वायु सेना के पायलटों ने कई इंटरनेशनल एक्सरसाइज़ जीती हैं। 'आत्मनिर्भर भारत' पहल और देश में ही मॉडर्नाइज़ेशन पर ध्यान देने के अच्छे नतीजे मिल रहे हैं। भारतीय वायु सेना ने 180 तेजस मार्क -1ए एयरक्राफ्ट का ऑर्डर दिया है और आमका (ए एम सी ए), फिफ्थ-जेनरेशन फाइटर, कैटस् टीमिंग ड्रोन और स्वदेशी अस्त्र बी वी आर मिसाइल को मंज़ूरी दी है। ये कदम आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देते हैं, साथ ही बदलाव के दौर में क्षमता की कमियों को दूर करने के लिए लगातार कोशिशें ज़रूरी हैं। इंडियन एयर फ़ोर्स की उपलब्धियाँ कई दशकों के इतिहास में, भारतीय वायु सेना बाइप्लेन के एक छोटे से बेड़े से बढ़कर दुनिया की टॉप पाँच सबसे ताकतवर एयर फ़ोर्स में से एक बन गई है। इसकी मुख्य उपलब्धियों में शामिल हैं: युद्ध के समय बहादुरी: बड़े मिलिट्री ऑपरेशन्स में अहम भूमिका, जिसमें दूसरा विश्व युद्ध; 1948, 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान संघर्ष; 1999 का कारगिल युद्ध शामिल हैं। और 2019 के बालाकोट ऑपरेशन जैसे सटीक क्रॉस-बॉर्डर हमले। सेना का आधुनिकीकरण और स्वदेशी इनोवेशन: पुराने आयातित विमानों से हटकर राफेल और एसयू-30एम के आई जैसे एडवांस्ड मल्टी-रोल फाइटर जेट, तेजस जैसे स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमान, सी-17 ग्लोबमास्टर और सी-295 जैसे आधुनिक भारी-भरकम सामान ढोने वाले विमान, और स्वार्म ड्रोन व ड्रोनाथॉन जैसी नई तकनीकों को अपनाना। मानवीय सहायता और आपदा राहत (एच ए डी आर): राष्ट्रीय आपातकाल, बाढ़ और भूकंप के दौरान ज़रूरी बचाव अभियान चलाना, और विदेशों में संघर्ष वाले इलाकों में फँसे नागरिकों और मेडिकल सप्लाई को एयरलिफ्ट करना। आज भारतीय वायु सेना के सामने चुनौतियाँ शानदार क्षमताओं के बावजूद, भारतीय वायु सेना को ऑपरेशन, स्ट्रक्चर और प्लानिंग से जुड़ी अहम चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमानों की संख्या में काफी कमी आ रही है। हालाँकि 42 फाइटर स्क्वाड्रन की मंज़ूरी है, लेकिन अभी संख्या इससे कम है। 2030 के दशक में इनके और कम होने की उम्मीद है क्योंकि मिग-21, मिग-29, जगुआर और मिराज-2000 जैसे पुराने बेड़े तेज़ी से रिटायर हो रहे हैं और उनकी जगह नए विमान उतनी तेज़ी से नहीं आ रहे हैं। यह बढ़ता अंतर भविष्य की तैयारी के लिए सेना के आधुनिकीकरण को बहुत ज़रूरी बनाता है। एयर चीफ मार्शल एयर मार्शल ए.पी. सिंह ने 3 अक्टूबर 2026 को कहा, हमारी संख्या कम है, लेकिन हम कमज़ोर नहीं हैं, जो भारतीय वायु सेना की मौजूदा स्थिति को दर्शाता है। 2021 में ऑर्डर किए गए स्वदेशी तेजस मार्क-1ए का एक स्क्वाड्रन साल के आखिर तक शामिल कर लिया जाएगा। तेजस मार्क-2 की पहली उड़ान सितंबर 2027 तक होने की संभावना है, जबकि आमका (ए एम सी ए) की पहली उड़ान सितंबर 2028 तक होने की उम्मीद है। भारतीय वायु सेना उत्तरी सीमा पर लंबे समय से चल रहे और बहुत अहम सैन्य गतिरोध को संभाल रही है, साथ ही परमाणु हथियार वाले पश्चिमी पड़ोसी के खिलाफ रणनीतिक तैयारी भी बनाए हुए है। इसे भी पढ़ें: Indian Air Force का 94वां स्थापना दिवस, Hindan Air Force Station पर भव्य परेड चीन का सैन्य बुनियादी ढांचे, एयरफील्ड और क्वांटम कंप्यूटिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और स्टील्थ क्षमताओं जैसी अगली पीढ़ी की तकनीकों का तेज़ी से आधुनिकीकरण क्षेत्रीय निर्माण क्षमताओं से कहीं आगे निकल रहा है। इससे प्रभावी 'फोर्स मल्टीप्लायर' (सैन्य क्षमता बढ़ाने वाले साधनों) और लगातार आधुनिकीकरण के ज़रिए सीमित संसाधनों का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल करने की ज़रूरत बढ़ जाती है। इन-फ्लाइट रिफ्यूलर (आई एल-78), एयरबोर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम (अवाक्स), लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल बैटरी और मज़बूत अनमैन्ड एरियल कॉम्बैट सिस्टम (यू ए एस) जैसे अहम 'फोर्स मल्टीप्लायर' की कुल संख्या में अभी भी कमी है, जिससे इन क्षमताओं को बड़े पैमाने पर तैनात करने में सीमाएँ आती हैं। भारतीय वायु सेना की लगातार प्रभावशीलता बनाए रखने के रोडमैप के लिए इन कमियों को दूर करना ज़रूरी है। --- प्रोफेसर (डॉ.) डी. के. पांडेय
नई दिल्ली, 8 अक्टूबर (आईएएनएस)। दवाओं की बिक्री को बढ़ावा देने के लिए फार्मा कंपनियों द्वारा डॉक्टरों को महंगे तोहफे और सुविधाएं देने की प्रथा पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को एक विशेष कमेटी का गठन करने और उसकी रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने का आदेश दिया है।
ममता के दिल्ली दौरे पर दिलीप घोष का तंज, बोले-याचिकाओं से बंगाल पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा
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नई दिल्ली, 8 अक्टूबर (आईएएनएस)। दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का गुरुवार सुबह गोवा स्थित उनके आवास पर निधन हो गया। 75 वर्षीय अभिनेता के निधन पर कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों और नेताओं ने शोक व्यक्त किया है। सभी ने ईश्वर से प्रार्थना की कि दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान और शोकाकुल परिजनों व प्रशंसकों को यह दुख सहने की शक्ति प्रदान करें।
Bihar Politics: SIR के खिलाफ महागठबंधन का बड़ा प्रदर्शन, पटना में राजभवन मार्च आज
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राहुल-प्रियंका के साथ कथित पुलिस कार्रवाई के खिलाफ आज कांग्रेस का विरोध प्रदर्शन
मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने बुधवार को पार्टी कार्यकर्ताओं से 8 अक्टूबर को राज्यभर में प्रदर्शन करने की अपील की। उन्होंने कहा कि नई दिल्ली में विरोध मार्च के दौरान लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और अन्य इंडिया गठबंधन सांसदों के साथ हुई कथित पुलिस कार्रवाई के विरोध में ये प्रदर्शन किए जाएंगे।
ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर आज देशभर में विपक्ष का प्रदर्शन, दिल्ली में सुरक्षा बढ़ाई गई
मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को लेकर जारी राजनीतिक विवाद के बीच कांग्रेस और INDIA गठबंधन ने शुक्रवार को देशभर में विरोध प्रदर्शन करने का फैसला किया है
राहुल की हुंकार, लोकतांत्रिक आवाज दबेगी नहीं
मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर कांग्रेस और INDIA गठबंधन का विरोध प्रदर्शन लगातार दूसरे दिन भी जारी रहा
गुजरात बोर्ड ने कक्षा 10 और 12 की मार्कशीट के लिए 'पारख सेल' और डिजीलॉकर सुविधा शुरू की
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आंध्र प्रदेश के राज्यपाल एस. अब्दुल नजीर ने लोक भवन में 77वें टीबी सील बिक्री अभियान की शुरुआत की
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'विशाखापत्तनम मेट्रो और बीच कॉरिडोर प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दे केंद्र', सीएम नायडू का पीएम मोदी से आग्रह
वैश्विक खाद्य संकट के काले बादलों के बावजूद भारत की स्थिति दुनिया के अन्य देशों की तुलना में काफी मजबूत और सुरक्षित है।
एसआईआर पर हंगामा, हकीकत से ज्यादा फसाना
विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर सियासी पारा लगातार चढ़ा हुआ है। विशेषकर विपक्षी दल जिस तरह से इस पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं, उससे माहौल में एक भ्रम फैल रहा है। विपक्षी हंगामे और सवालों के चलते ऐसे लोगों की संख्या बढ़ी है, जो मानने लगे हैं कि मतदाता सूची की जांच एक तरह से नागरिकता की जांच हो गई है। लोग एक बारगी वोटर न होने को बर्दाश्त कर भी लें, लेकिन कोई नहीं चाहेगा कि उसकी जन्मजात नागरिकता पर सवाल उठे या वह खतरे में पड़े। कहना न होगा कि विशेषकर पश्चिम बंगाल में हुए एसआईआर के बहाने विपक्ष यह भ्रम और डर-दोनों फैलाने में किंचित सफल रहा है। हालांकि यह भी सच है कि ऐसा भ्रम और डर सिर्फ पश्चिम बंगाल और बिहार के ही कुछ इलाकों में ही दिख रहा है। एसआईआर उत्तर प्रदेश में भी हुआ है और दिल्ली में भी जारी है। एसआईआर तमिलनाडु में भी हुआ है। लेकिन यहां के मतदाताओं के बीच ऐसा भ्रम और डर न के बराबर दिखा है। इसे भी पढ़ें: Voter List विवाद पर पूर्व जज SN Dhingra का बयान, ECI की SIR प्रक्रिया को बताया जरूरी ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर बिहार और पश्चिम बंगाल में ऐसा डर क्यों दिख रहा है? इसकी वजह है, वहां पिछले कुछ दशकों में बांग्लादेश से बढ़ी घुसपैठ। पश्चिम बंगाल में जब सत्ता में वाममोर्चा था, तब यही ममता बनर्जी वहां घुसपैठ के मुद्दे को उछालती रहती थीं और वाममोर्चे पर आरोप लगाती रहती थीं कि वह इसे बढ़ावा दे रहा है। ममता बनर्जी इस बहाने परोक्ष रूप से वाममोर्चा पर आरोप लगाती थीं कि मतदाता बने घुसपैठियों के ही सहारे वह पश्चिम बंगाल की सत्ता में काबिज है। बाद के दिनों में ये मतदाता ममता के समर्थक हो गए और ममता की सत्ता के आधार बनने लगे तो उन्हें भी यह मामला फिजूल का लगने लगा। बिहार का सीमांचल इलाका भी बांग्लादेशी घुसपैठ से प्रभावित रहा है। इसलिए वहां भी ऐसे सवाल और भ्रम उठ रहे हैं। चूंकि एसआईआर में ऐसे अवैध मतदाता ज्यादा सवालों के घेरे में हैं या फिर उनके नाम कट रहे हैं, इस वजह से इन्हीं राज्यों में यह मुद्दा कुछ ज्यादा तुर्श दिख रहा है। मतदाता सूची में सुधार और उसमें चुनाव आयोग एवं मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर भी बड़े सवाल उठे हैं। सवाल यह भी है कि क्या एसआईआर को लेकर उठाए जा रहे सवाल असल में प्रक्रियात्मक और कानूनी हैं या इनके जरिए सिर्फ राजनीति हो रही है? पहले ही कहा जा चुका है कि एसआईआर को लेकर विपक्षी दलों की सबसे ज्यादा आपत्तियां बिहार और पश्चिम बंगाल से जुड़ी बताई जा रही हैं। कुछ राजनेताओं और दलों ने एसआईआर के आधार पर इन राज्यों के चुनावी परिणामों और मतदाता सूची की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। यहां ध्यान रखने की बात है कि एसआईआर केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में भी हुआ, लेकिन वहां बिहार या पश्चिम बंगाल की तरह इस पर सियासी विवाद नहीं हुआ। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि यदि कुछ राज्यों में एसआईआर को लेकर गंभीर आपत्ति नहीं है तो फिर एक या दो राज्यों में गंभीर आपत्तियां क्या राजनीतिक एजेंडे की वजह से तो नहीं उठाई जा रहीं? एसआईआर को देखने और समझने की एक ही कसौटी हर राज्य में क्यों नहीं लागू की जा रही है? इससे तो यही संकेत जाता है कि इसका सियासी विरोध सेलेक्टिव है और दोहरे मापदंड से भरा हुआ है। क्या है एसआईआर की मानक प्रक्रिया? एसआईआर को लेकर जारी बहस में बड़े पैमाने पर नाम हटाने, तकनीकी प्रणाली के इस्तेमाल और पारदर्शिता जैसे सवाल उठाए गए हैं। मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया निर्धारित कानूनी और प्रशासनिक चरणों के तहत होती है। नाम हटाने से पहले मतदाता को नोटिस जारी करने और उसकी आपत्तियों और तर्कों की सुनवाई की जाती है। इसके बाद आखिरी निर्णय संबंधित निर्वाचन अधिकारी के स्तर पर होता है। इसलिए ड्राफ्ट मतदाता सूची में किसी मतदाता का नाम नहीं होना और अंतिम मतदाता सूची से नाम हट जाना, एक ही बात नहीं है। इसलिए जरूरी है कि दावे, ड्राफ्ट आंकड़े, आपत्तियों और अंतिम निर्णय, इन सभी चरणों को अलग-अलग समझा जाए। हर स्तर पर चूंकि आयोग ने पारदर्शी व्यवस्था अपना रखी है, इसे समझना हो तो अभी दिल्ली के किसी बीएलओ केंद्र का दौरा किया जा सकता है। दिल्ली में खूब नोटिस जारी किए गए हैं, उनके जवाब में लोग बीएलओ यानी बूथ स्तर के अधिकारी के पास पहुंच रहे हैं। लेकिन अफरातफरी, घबराहट या दहशत नहीं दिख रही। बीएलओ लोगों से जरूरी फॉर्म और प्रमाण ले रहे हैं। ज्यादातर नोटिस की वजह पूरा नाम ना होना, नाम की वर्तनी गलत होना, पिता या पति के नाम का पूरा न होना या फिर उनके नाम की वर्तनी में गड़बड़ी या कमी होना है। अधिकारियों का कहना है कि ईसीआईनेट का सॉफ्टवेयर मतदाता सूची के पहले से जारी नाम और आवेदन में कुछ ही गड़बड़ी पाता है तो वह नोटिस जेनरेट कर देता है। उदाहरण के लिए, पहले से किसी का नाम मतदाता सूची में सिर्फ रमेश दर्ज है, जबकि उसका पूरा नाम रमेश शर्मा है, या इसी तरह उसके पिता का पूरा नाम दर्ज नहीं है। लेकिन पहचान के दूसरे दस्तावेजों में उसका पूरा नाम दर्ज है। जब आयोग के अधिकारी ईसीआईनेट पर इसे लोड करते हैं तो सॉफ्टवेयर इस गड़बड़ी या बेमेल तथ्य को पकड़ता है। इसी तरह किसी का पता बदल गया है, जो पहले से दर्ज रिकॉर्ड से अलग है तो उसे भी नोटिस जा रही है। बस इन्हें प्रमाणित करना भर है। लेकिन राजनीतिक दल इसे या तो समझ नहीं रहे या फिर जानबूझकर नासमझी दिखा रहे हैं। वैसे भी इन प्रमाणों को घुसपैठिए या अवैध मतदाता साबित नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए उनके नाम कट रहे हैं या काटे जाने की संभावना बन रही है। एसआईआर को लेकर जारी मौजूदा बहस में नागरिकों के लिए कुछ प्रश्न बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं, क्या पुनरीक्षण निर्धारित संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया के तहत हुआ? क्या किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया? यदि ऐसा हुआ, तो क्या दावा और आपत्ति की प्रक्रिया के जरिए उसे सुधारा गया? क्या अलग-अलग राज्यों में समान प्रक्रियाओं को समान कसौटी पर देखा जा रहा है? इसे भी पढ़ें: आकाशवाणी भवन में जबरन घुसने का आरोप! Rahul Gandhi और Priyanka Gandhi के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने दर्ज की FIR संस्थाओं पर बहस हो, लेकिन तथ्यों के आधार पर एसआईआर, निर्वाचन आयोग और न्यायपालिका पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक तो है, लेकिन आरोप और प्रमाण, ड्राफ्ट सूची और अंतिम सूची, याचिका और न्यायिक आदेश तथा राजनीतिक मांग और कानूनी कार्रवाई, के बीच समझदारी से अंतर बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है। अव्वल तो मतदाता सूची की शुद्धता और चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर बहस तथ्यों, कानून और निर्धारित प्रक्रिया के आधार पर होनी चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। चुनाव आयोग बार-बार यह भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहा है कि एसआईआर मतदाताओं को बेहतर सुविधा देने की व्यवस्था है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य है, कोई भी वैध और योग्य मतदाता छूटे नहीं। मोटे तौर पर एसआईआर का एक ही मकसद है, हर योग्य और वैध मतदाता को सूची में जोड़ना, दिए गए पते पर न रहे मतदाताओं और मृतकों का नाम सूची से हटाना। इसके साथ ही विदेशी और घुसपैठियों को मतदाता सूची से बाहर करना है। एक आरोप यह लग रहा है कि मतदाता सूची तैयार करने में ईसीआईनेट सॉफ्टवेयर की भूमिका बीएलओ और ईआरओ की तुलना में बढ़ गई है, जिसकी वजह से मतदाता सूची को फाइनल करने के ईआरओ के अधिकार दरकिनार हो गए हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। ईसीआईनेट सिर्फ तकनीकी मंच है, जिसकी बुनियाद अधिकारियों द्वारा घर-घर से जुटाए आंकड़े हैं। नहीं भूलना चाहिए कि मतदाता सूची में किसी नाम को जोड़ने या उससे हटाने का निर्णय सिर्फ ईआरओ ही ले सकता है और वह भी जनप्रतिनिधित्व कानून 1950 और मतदाता सूची पंजीयन नियम 1960 के तहत, नोटिस और सुनवाई के बाद ही ऐसा कर सकता है। कहना न होगा कि ऐसा ही हो रहा है। लेकिन राजनीति इसे देखने की बजाय अपने हिसाब से घटनाओं और कार्यों की व्याख्या कर रही है। उमेश चतुर्वेदी लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
'सुवेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री रहते विधानसभा नहीं जाऊंगा', हुमायूं कबीर का ऐलान
'सुवेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री रहते विधानसभा नहीं जाऊंगा', हुमायूं कबीर का ऐलान
भारतीय शेयर बाजार लाल निशान में बंद
मुंबई, भारतीय शेयर बाजार बुधवार के कारोबारी सत्र में गिरावट के साथ बंद हुआ।
Jantar Mantar Protest: Rahul-Priyanka फिर Detain! Gyanesh Kumar को क्यों बचा रही Modi सरकार?
ममता की 2021 की 'खेला होबे' वाली तस्वीर बंगाल की राजनीति में फिर से चर्चा का विषय बनी
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भारतीय चुनावी राजनीति में इन दिनों EVM बनाम बैलेट पेपर की बहस फिर तेज है। विपक्षी दलों का एक वर्ग लगातार मांग कर रहा है कि देश में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की जगह पुराने बैलेट पेपर से चुनाव कराए जाएं। हाल में INDIA ब्लॉक ने भी बैलेट पेपर की वापसी की मांग दोहराई है और चुनाव आयोग के खिलाफ राजनीतिक अभियान तेज किया है। लेकिन इस बहस के बीच एक असहज सवाल विपक्ष से भी पूछा जाना चाहिए कि अगर बैलेट पेपर ही चुनावी निष्पक्षता की गारंटी है, तो हाल में बैलेट पेपर से हुए चुनावों के नतीजों की व्याख्या विपक्ष किस तरह करेगा? हम आपको बता दें कि असम के सिलचर में 3 अक्टूबर को नगर निगम के पहले चुनाव में बैलेट पेपर से मतदान हुआ। परिणाम में भाजपा ने 42 में से 32 सीटें जीतीं और उसकी सहयोगी असम गण परिषद ने दो सीटें हासिल कीं। कांग्रेस को केवल दो सीटें मिलीं, जबकि छह सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवार विजयी रहे। यानी बैलेट पेपर वाले चुनाव में भी भाजपा-नीत NDA ने दो-तिहाई से अधिक सीटें जीत लीं। यह परिणाम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि EVM पर सवाल उठाने वाली राजनीति में अक्सर यह धारणा बनाई जाती है कि यदि चुनाव बैलेट पेपर से हो तो परिणाम अलग होगा। सिलचर का परिणाम कम-से-कम इतना जरूर बताता है कि बैलेट पेपर अपने आप किसी पार्टी के पक्ष या विपक्ष में परिणाम नहीं बदल देता। मतदाता जिस राजनीतिक दल को समर्थन देना चाहता है, वह अपना समर्थन मतदान की किसी भी व्यवस्था में व्यक्त कर सकता है। इसी संदर्भ में इस साल हुए पांच विधानसभा चुनावों यानि असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के पोस्टल बैलेट आंकड़ों की भी चर्चा होनी जरूरी है। निर्वाचन आयोग के चुनाव नतीजों वाले पोर्टल पर प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में EVM वोटों के साथ पोस्टल वोटों का भी अलग विवरण दर्ज है। आप इनका विश्लेषण करेंगे तो पाएंगे कि भाजपा और एनडीए को अच्छी खासी संख्या में पोस्टल बैलेट के जरिये भी मत मिला था। असम में तो कई निर्वाचन क्षेत्रों में भाजपा उम्मीदवारों को पोस्टल बैलेट में मजबूत समर्थन मिला था। पश्चिम बंगाल में भी कई ऐसे निर्वाचन क्षेत्र रहे जहां भाजपा उम्मीदवारों को सैकड़ों पोस्टल वोट मिले और वे परिणाम तय करने में महत्वपूर्ण साबित हुए। हम आपको बता दें कि पोस्टल बैलेट मुख्यतः चुनाव ड्यूटी पर तैनात कर्मचारियों और कानून के तहत पात्र अन्य श्रेणियों के मतदाताओं से जुड़े होते हैं। इसलिए इनके आधार पर पूरे राज्य की जनता की राजनीतिक पसंद का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। लेकिन ये आंकड़े एक महत्वपूर्ण राजनीतिक सवाल जरूर खड़ा करते हैं। सवाल उठता है कि यदि किसी दल का तर्क है कि मतदान की मशीन यानि ईवीएम ही उसकी हार का कारण है, तो उसे उन चुनावों और निर्वाचन क्षेत्रों को भी देखना चाहिए जहां कागज पर वोट पड़े और फिर भी परिणाम उसके पक्ष में नहीं आया। देखा जाये तो विपक्ष के सामने वास्तविक राजनीतिक चुनौती केवल EVM पर सवाल उठाना नहीं, बल्कि यह समझना भी है कि मतदाता लगातार किन मुद्दों, नेतृत्व और संगठनात्मक विकल्पों को प्राथमिकता दे रहा है। चुनाव आयोग या किसी संवैधानिक संस्था की आलोचना करने का लोकतांत्रिक अधिकार विपक्ष के पास है। यदि कहीं चुनावी प्रक्रिया में ठोस अनियमितता का प्रमाण है, तो उसकी जांच और सुधार की मांग भी पूरी तरह जायज है। लेकिन हार के हर परिणाम को पहले से ही संस्थागत साजिश मान लेना और संगठन, उम्मीदवार, जनसंपर्क, स्थानीय मुद्दों तथा राजनीतिक रणनीति की समीक्षा से बचना लोकतांत्रिक राजनीति के लिए स्वस्थ रास्ता नहीं है। ईवीएम और चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहे दलों को समझना होगा कि भारत का लोकतंत्र किसी एक मशीन से बड़ा है। जनता का फैसला EVM, बैलेट पेपर और पोस्टल बैलेट, हर माध्यम से सामने आता है। इसलिए राजनीतिक दलों के लिए सबसे कठिन, लेकिन सबसे जरूरी सवाल यही है कि क्या वे चुनावी व्यवस्था बदलने की मांग से पहले अपने मतदाताओं के बदलते मिजाज को समझने की कोशिश कर रहे हैं?
पीएम मोदी 'विकसित भारत' के लक्ष्य के साथ देश को आगे बढ़ाने के लिए लगातार कर रहे काम: रेखा गुप्ता
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मल्लिकार्जुन खड़गे ने बुलाई इंडिया गठबंधन के नेताओं की लंच बैठक, धरना प्रदर्शन के बाद अगली रणनीति पर चर्चा
मध्य प्रदेश में कांग्रेस की जमीनी लड़ाई की तैयारी, रीवा संभाग की बैठक में हुआ मंथन
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2 महीने, 3 सरप्राइज एलीमेंट: बीजेपी हैरान, पुलिस परेशान, क्या है राहुल गांधी की 'धप्पा' पॉलिटिक्स!
संसद से चुनाव आयोग तक का रास्ता छावनी में तब्दील था, चप्पे-चप्पे पर भारी बैरिकेडिंग और अलर्ट मोड में खड़ी पुलिस… लेकिन राहुल गांधी ने एक बार फिर सबको 'धप्पा' दे दिया! मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कांग्रेस का मोर्चा खोलते हुए, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने अचानक आकाशवाणी भवन की ओर रुख किया और सीधे 8 घंटे की नाकाबंदी कर डाली। प्रशासन देखता ही रह गया और राहुल का यह सरप्राइज अटैक पूरी तरह कामयाब रहा। पिछले दो महीनों में यह तीसरी बार है जब राहुल गांधी के इस फ्लैश प्रोटेस्ट ने दिल्ली पुलिस ही नहीं, खुद अपनी पार्टी के नेताओं तक के होश उड़ा दिए हैं। पिछले दो महीनों में यह तीसरी बार है जब राहुल ने अचानक धरना देकर पुलिस और कुछ हद तक कांग्रेस नेताओं को भी चौंका दिया है। जुलाई में, कांग्रेस सांसद ने प्रधानमंत्री आवास के बाहर अचानक विरोध प्रदर्शन किया। पिछले महीने, उनकी नई रणनीति का दूसरा चरण तब देखने को मिला जब वह अचानक संसद मार्ग पुलिस स्टेशन में एक छात्र प्रदर्शनकारी के साथ घुस गए; इस छात्र को 20 जुलाई की हिंसा के दौरान पैलेट गन से चोट लगी थी और राहुल ने FIR दर्ज करने की मांग की। राहुल का यह नया सियासी 'प्लेबुक' अब विरोधियों के लिए बिल्कुल अप्रत्याशित सिरदर्द बन चुका है! इसे भी पढ़ें: Rahul Gandhi और Priyanka Gandhi हिरासत में, CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कर रहे थे प्रदर्शन CEC के विरोध-प्रदर्शन के दौरान राहुल का नया दांव सड़कों पर अचानक होने वाले ऐसे विरोध-प्रदर्शन राहुल के राजनीतिक हथियारों में एक नया हथियार बन गए हैं। मंगलवार को इसका तीसरा चरण देखने को मिला। ऐसा लग रहा था कि दिल्ली पुलिस को विपक्ष के निर्वाचन सदन तक मार्च करने की हर चाल का पहले से अंदाज़ा था। जब विपक्ष का मार्च ECI हेडक्वार्टर से कुछ सौ मीटर दूर नीति आयोग के दफ़्तर के पास पहुँचा, तो प्रदर्शनकारियों का सामना पुलिस से हुआ। इस गहमागहमी के बीच, राहुल ने कैमरों को तस्वीर लेने का मौका दिया। जब कांग्रेस नेता आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे थे, तब वह पुलिस बैरिकेड के ऊपर चढ़ गए और तिरंगा लहराया। हालांकि, पुलिस का सब्र जवाब दे गया। इसके बाद वही जाना-पहचाना नज़ारा देखने को मिला; पुलिस ने नेताओं को हिरासत में लेना और उन्हें बसों में भरना शुरू कर दिया। प्रियंका गांधी एक बस में सवार हुईं, जो आकाशवाणी भवन के पास खड़ी थी। राहुल भी बस में चढ़ने ही वाले थे। तभी हालात बदल गए। TOI और इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, जैसे ही राहुल बस में चढ़ने वाले थे, उन्होंने प्रियंका को कोई इशारा किया। जल्द ही, वायनाड के सांसद नीचे उतरे और गांधी भाई-बहन तेज़ी से आकाशवाणी भवन की ओर दौड़ पड़े। इस अचानक उठाए गए कदम से न सिर्फ़ पुलिस, बल्कि कांग्रेस नेता भी हैरान रह गए। आकाशवाणी भवन के गेट के पास कोई पुलिसकर्मी नहीं था। सुरक्षा गार्डों ने गांधी भाई-बहन को रोकने की कोशिश की, जिससे तनावपूर्ण स्थिति पैदा हो गई, लेकिन आखिरकार दोनों परिसर में दाखिल हो गए। पुलिस को उम्मीद थी कि लोगों को हिरासत में लेने से विरोध प्रदर्शन खत्म हो जाएगा, लेकिन अचानक बदले हालात ने एक नया धरना शुरू कर दिया। इस अफरातफरी के बीच राहुल ने पत्रकारों से कहा कि देश के साथ जो किया गया है, वह देशद्रोह है। इसे भी पढ़ें: CEC नियुक्ति में PM, LoP के साथ CJI भी हों शामिल, Owaisi ने मौजूदा चयन प्रक्रिया पर उठाए सवाल एक पेड़ के नीचे बैठ गए राहुल चाहे पीएम मोदी हों, अमित शाह हों या ज्ञानेश कुमार, किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा। यह पता नहीं चल पाया है कि गांधी भाई-बहन ने अचानक आकाशवाणी भवन में घुसने का फ़ैसला क्यों किया। हो सकता है कि राहुल निर्वाचन सदन जाने के लिए शॉर्टकट के तौर पर इस जगह का इस्तेमाल करना चाहते हों, क्योंकि निर्वाचन सदन आकाशवाणी भवन के पिछले गेट के पास ही है। हालाँकि, पुलिस ने तुरंत पिछला गेट बंद कर दिया, जिसके बाद कांग्रेस सांसदों को आकाशवाणी भवन के परिसर में ही घंटों तक धरना देना पड़ा। राहुल और प्रियंका ब्रॉडकास्टिंग हाउस के अंदर एक पेड़ के नीचे बैठ गए। केसी वेणुगोपाल, पवन खेड़ा और इमरान प्रतापगढ़ी समेत कांग्रेस के दूसरे नेता भी आकाशवाणी के गेट से अंदर घुसने में कामयाब रहे, जबकि पुलिस बल को तैनात करने की कोशिश कर रही थी। बाकी लोगों को बाउंड्री वॉल पर चढ़ते और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग करते हुए नारे लगाते देखा गया। कांग्रेस ने इस मौके का फ़ायदा उठाने में ज़रा भी देर नहीं की। पार्टी ने एक्स पर राहुल के अचानक रास्ते से हटकर कहीं और जाने का एक वीडियो शेयर किया, जिसके साथ मज़ाकिया अंदाज़ में धप्पा कैप्शन लिखा था। यह ड्रामा सूरज डूबने के काफी देर बाद तक चलता रहा। जब कांग्रेस नेताओं ने चुनाव आयुक्तों से मिले बिना वहां से हटने से इनकार कर दिया, तो उनके लिए रोल और एनर्जी ड्रिंक्स मंगवाए गए। इससे एक और विवाद खड़ा हो गया। आप इसके बारे में यहां पढ़ सकते हैं। रात करीब 8 बजे, पुलिस ने आखिरकार आकाशवाणी भवन परिसर को खाली कराना शुरू किया। तस्वीरों में राहुल को परिसर से खींचकर बस की ओर ले जाते हुए देखा गया। नेताओं को किंग्सवे कैंप पुलिस स्टेशन ले जाया गया और हिरासत में रखा गया, जिसके बाद रात 10 बजे उन्हें रिहा कर दिया गया। राहुल का सरप्राइज एलीमेंट वाला प्लेबुक यह पहली बार नहीं था जब राहुल गांधी ने प्रशासन को चकमा दिया हो। 21 जुलाई को संसद की ओर मार्च कर रहे प्रदर्शनकारी छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के ठीक एक दिन बाद, राहुल गांधी और कांग्रेस सांसदों का एक दल अचानक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास के पास पहुंच गया और बिना किसी पूर्व सूचना के धरने पर बैठ गया।इस अचानक हुए प्रदर्शन से पहले खुद कांग्रेस सांसदों को भी अंधेरे में रखा गया था। उन्हें शुरुआत में केवल यह कहकर बुलाया गया था कि वे कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर उनका जन्मदिन मनाने के लिए इकट्ठा हों। जैसे ही सभी नेता एकत्र हुए, उन्हें असल योजना की जानकारी दी गई और उन्होंने 7, लोक कल्याण मार्ग की ओर मार्च करना शुरू कर दिया, जो वहां से महज 2 किलोमीटर दूर है। इस अप्रत्याशित कदम ने पुलिस को पूरी तरह चौंका दिया। यह धरना तब जाकर समाप्त हुआ जब पुलिस ने राहुल गांधी को वहां से हटाया, और इस छीना-झपटी के दौरान उनकी नाक पर चोट भी लग गई थी। अगला घटनाक्रम एक महीने बाद, 21 अगस्त को हुआ। इसे भी पढ़ें: CEC विरोध पर CM Devendra Fadnavis बोले, संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने की है साजिश पैलेट गन पीड़ित को लेकर थाने के बाहर धरने पर बैठे राहुल पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन में सब कुछ सामान्य चल रहा था, तभी राहुल वहाँ साहिल लोचब के साथ पहुँचे। साहिल 19 साल का छात्र है, जिसे कथित तौर पर 20 जुलाई के विरोध प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन से चोट लगी थी। राहुल ने मांग की कि इस मामले में तुरंत FIR दर्ज की जाए। जब पुलिस ने टाल-मटोल की, तो राहुल अपनी बात पर अड़े रहे और पुलिस स्टेशन के बाहर धरने पर बैठ गए। जल्द ही, प्रियंका गांधी, कांग्रेस के अन्य नेता और विपक्ष के बड़े नेता भी उनके साथ शामिल हो गए। पुलिस स्टेशन के बाहर सुरक्षा बढ़ा दी गई और वही जाना-पहचाना ड्रामा देखने को मिला। राहुल ने साफ कर दिया कि जब तक FIR दर्ज नहीं हो जाती, वे वहाँ से नहीं हटेंगे, चाहे इसमें कितने भी घंटे क्यों न लगें। सात घंटे बाद यह गतिरोध खत्म हुआ, जब दिल्ली पुलिस ने आखिरकार पैलेट फायरिंग के मामले में FIR दर्ज कर ली। ये घटनाक्रम सरकार के खिलाफ अहम मुद्दों से निपटने के राहुल के तौर-तरीकों में आए बड़े बदलाव का संकेत देते हैं। अब वे किसी मुद्दे पर सिर्फ़ सोशल मीडिया पर बात नहीं करते, बल्कि ऐसे अचानक किए गए विरोध प्रदर्शनों के ज़रिए ज़मीन पर भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं। Dhappa https://t.co/IMP0mIK2NV — Congress (@INCIndia) October 6, 2026
पटना में 'संकल्प सभा': सीएम सम्राट बोले- 'विकसित भारत’ के लिए समृद्ध बिहार जरूरी
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दिल्ली की सड़कों पर इन दिनों जो कुछ दिखाई दे रहा है, उसमें केवल प्रदर्शनकारी और पुलिस आमने-सामने नहीं हैं। उनके बीच अब मोबाइल कैमरा भी खड़ा है, सोशल मीडिया भी खड़ा है और कुछ सेकंड में किसी घटना को देशभर में पहुंचा देने वाली तकनीक भी खड़ी है। शायद इसीलिए दिल्ली पुलिस के लिए आज किसी प्रदर्शन को नियंत्रित करना केवल बैरिकेड लगाने, भीड़ को रोकने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने का मामला नहीं रह गया है। पुलिस को कानून लागू भी करना है, स्वयं को उकसावे से बचाना भी है और साथ-साथ यह सुनिश्चित भी करना है कि अगले कुछ सेकंड में उसकी कोई प्रतिक्रिया काट-छांटकर वायरल वीडियो न बन जाए। दो अक्टूबर से नई दिल्ली क्षेत्र में शुरू हुए प्रदर्शनों ने कुछ ही दिनों में पुलिस के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। अलग-अलग राजनीतिक दलों, छात्र संगठनों, कार्यकर्ताओं और दूसरे समूहों के प्रदर्शन तथा प्रतिबंधित क्षेत्रों की तरफ बढ़ने की कोशिशों के कारण पुलिस को लगातार अपनी रणनीति बदलनी पड़ रही है। केवल एक स्थान पर खड़ी भीड़ के बजाय अलग-अलग दिशाओं में आगे बढ़ते समूहों को संभालना पुलिस के लिए नई चुनौती बन गया है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक असहज सवाल भी उठता है। सवाल यह है कि क्या जुलाई में जंतर-मंतर के प्रदर्शन से जुड़े मामलों में प्राथमिकी निरस्त किए जाने के चलते ही प्रदर्शनकारियों के बीच यह संदेश गया कि पुलिस के साथ टकराव का कानूनी परिणाम गंभीर नहीं होगा? क्या इसी कारण प्रदर्शनकारियों के मन में पुलिस का डर कम हो गया है? क्या इसी कारण कुछ लोग अब पुलिसकर्मियों से आक्रामक भाषा में बात करने, उन्हें चुनौती देने, धक्का-मुक्की करने या जानबूझकर उकसाने का जोखिम अधिक आसानी से उठा रहे हैं? हम आपको याद दिला दें कि जुलाई में हुए प्रदर्शनों के बाद दिल्ली पुलिस ने कई मामले दर्ज किए थे। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने प्राथमिकियों को निरस्त कर दिया था। साथ ही अदालती आदेश में यह भी कहा गया था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन में केवल भागीदारी अपने आप में अपराध नहीं मानी जा सकती। ऐसे में जब महिला पुलिसकर्मियों के साथ बदसलूकी और शारीरिक खींचतान के मामले सामने आ रहे हैं और पुरुष पुलिसकर्मियों पर दुर्व्यवहार के झूठे आरोप तक लगाये जा रहे हैं तब यह सवाल प्रमुखता से उठता है कि क्या एफआईआर निरस्त कर प्रदर्शनकारियों को सुधरने का जो मौका दिया गया था उसका उन्होंने गलत फायदा उठाया? दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस भी आरोप प्रत्यारोप के इस दौर में तकनीक के सहारे अपना बचाव कर रही है। नई दिल्ली क्षेत्र में तैनात पुलिसकर्मियों की वर्दी पर बॉडी-वॉर्न कैमरे लगाए गए हैं। संसद मार्ग पर प्रदर्शन से निपटने के लिए तैयार पुलिसकर्मियों की वर्दी पर ये छोटे कैमरे साफ दिखाई दे रहे हैं। पुलिस की रणनीति में सार्वजनिक उद्घोषणा के लिए लाउडस्पीकर का इस्तेमाल बढ़ाया गया है और कई पुलिसकर्मी डंडों के बिना तैनात दिखाई दिए। देखा जाये तो बॉडीकैम का अर्थ केवल पुलिस को आरोपों से बचाना नहीं है। यदि कोई पुलिसकर्मी सीमा पार करता है तो वही कैमरा उसके खिलाफ भी प्रमाण बन सकता है। यदि कोई प्रदर्शनकारी पुलिस को जानबूझकर उकसाता है, बैरिकेड तोड़ता है, हमला करता है या बाद में घटनाक्रम का अधूरा वीडियो प्रस्तुत करता है तो पुलिस के पास पूरी घटना का अपना दृश्य रिकॉर्ड मौजूद रहेगा। इसके अलावा, सुरक्षा व्यवस्था में दूसरा बड़ा परिवर्तन बहुस्तरीय बैरिकेडिंग है। प्रदर्शनकारियों को प्रतिबंधित क्षेत्रों की ओर बढ़ने से रोकने के लिए कई स्तरों पर अवरोध लगाए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि जुलाई की घटनाओं के बाद दिल्ली पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों ने अपनी तैयारियों की व्यापक समीक्षा की। ताजा प्रदर्शनों से पहले उन स्थानों तक की पहचान की गई जहाँ टूटा हुआ फुटपाथ, पत्थर अथवा दीवार का हिस्सा तनाव बढ़ने पर हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। जुलाई के अनुभवों के बाद सुरक्षा व्यवस्था की इस तरह समीक्षा बताती है कि अब भीड़ प्रबंधन में केवल पुलिस बल की संख्या नहीं, बल्कि प्रदर्शन-स्थल के भौतिक वातावरण को भी सुरक्षा का हिस्सा माना जा रहा है। एक और समस्या सोशल मीडिया की है। पुलिसकर्मी के चेहरे के बिल्कुल सामने कैमरा रख देना, लगातार सवाल करना, नारे लगाना अथवा ऐसी परिस्थिति बनाना जिसमें उससे कोई तीखी प्रतिक्रिया निकल जाए, ऐसे माहौल में पुलिसकर्मी के कुछ सेकंड के नियंत्रण खोने का परिणाम लाखों लोगों तक पहुंचने वाला वीडियो हो सकता है। इसीलिए नई पुलिस रणनीति में आत्मसंयम स्वयं एक सुरक्षा उपकरण बन गया है। इस चुनौती की गंभीरता तब और बढ़ जाती है जब तकनीक के जरिये फर्जी दृश्य भी बनाए जाने लगें। दिल्ली पुलिस ने हाल में एक ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार किया है जिसने एआई की मदद से ऐसा वीडियो बनाया जिसमें एक पुलिसकर्मी को महिला के साथ दुर्व्यवहार करते दिखाया गया था। बहरहाल, इसमें कोई दो राय नहीं कि दिल्ली पुलिस के सामने इस समय बेहद कठिन चुनौती है। उसे प्रदर्शन के लोकतांत्रिक अधिकार की रक्षा करनी है। उसे प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा करनी है। अपने जवानों विशेषकर महिला पुलिसकर्मियों की सुरक्षा करनी है। उसे आरोप लगने पर जवाबदेह भी होना है। साथ ही बैरिकेड टूटने, प्रतिबंधित क्षेत्र में भीड़ घुसने अथवा हिंसा होने की स्थिति में कानून भी लागू करना है। शायद इसीलिए राजधानी की पुलिसिंग तेजी से बदल रही है। वर्दी पर बॉडीकैम, बहुस्तरीय बैरिकेड, लाउडस्पीकर से लगातार चेतावनी और सूचना, अतिरिक्त पुलिस तथा अर्धसैनिक बल, संवेदनशील रास्तों की पहले से पहचान, मोबाइल वीडियो के समानांतर पुलिस की अपनी रिकॉर्डिंग और सोशल मीडिया पर फैलने वाली संदिग्ध सामग्री की डिजिटल जांच। लेकिन तकनीक चाहे जितनी बढ़ जाए, अंततः सबसे बड़ी परीक्षा सड़क पर खड़े पुलिसकर्मी के धैर्य की ही है। जनता भी पुलिस की दिक्कतों को समझ रही है और उसका हौसला बढ़ाने के लिए सड़कों पर उतर रही है। -नीरज कुमार दुबे
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा रेपो रेट में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी के बाद फ्लोटिंग ब्याज दर पर होम लोन लेने वाले ग्राहकों की कर्ज लागत बढ़ सकती है। केंद्रीय बैंक ने बुधवार को रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत कर दिया है।
पीएम मोदी के नेतृत्व के 25 साल पूरे, भाजपा नेताओं ने कहा- हर क्षेत्र में व्यापक बदलाव और विकास हुआ
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गुजरात से आई 'सेवा संकल्प बाइक यात्रा' के प्रतिभागियों का काशी में हुआ भव्य स्वागत
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क्या देश में मोदी विरोधी लहर शुरू हो चुकी है? अगर आज चुनाव हुए तो क्या परिणाम हो सकते हैं?
आज जब नरेंद्र मोदी सरकार के मुखिया के रूप में लगातार पच्चीस साल पूरे कर रहे हैं, तब भारतीय राजनीति की एक बेहद दिलचस्प और महत्वपूर्ण तस्वीर सामने आ रही है। सात अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में सरकार की कमान संभालने वाले नरेंद्र मोदी ने पहले गुजरात और फिर देश की सत्ता का नेतृत्व करते हुए बिना किसी लंबे अंतराल के पच्चीस वर्ष पूरे कर लिए हैं। यह अपने आप में भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की असाधारण राजनीतिक यात्रा है। इस अवसर पर सत्ता पक्ष इसे नेतृत्व, सेवा, विकास और निरंतर जनविश्वास की उपलब्धि के रूप में देख रहा है, तो दूसरी ओर विपक्ष ठीक इसी समय चुनावी संस्थाओं की विश्वसनीयता, मतदाता सूची और लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर सरकार और चुनाव आयोग को घेर रहा है। यानी नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा के पच्चीसवें वर्ष का यह पड़ाव उस समय आया है जब सत्ता के सामने सबसे बड़ा सवाल शायद विपक्ष की ताकत का नहीं, बल्कि संस्थाओं और जनविश्वास का है। देखा जाये तो सरकार और भारतीय जनता पार्टी के लिए आज का दिन स्वाभाविक रूप से उपलब्धियों को गिनाने का दिन है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने नरेंद्र मोदी के पच्चीस वर्ष के शासन को ऐतिहासिक उपलब्धि बताते हुए उनके गुजरात के मुख्यमंत्रित्व और केंद्र की तीन लगातार सरकारों को सार्वजनिक विश्वास का प्रमाण बताया है। सरकार की ओर से कल्याणकारी योजनाओं, बुनियादी ढांचे, डिजिटल व्यवस्था, आर्थिक सुधार, राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और तकनीकी उपलब्धियों को इस लंबे सफर की प्रमुख उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। प्रधानमंत्री ने भी इस अवसर को सेवा और राष्ट्रहित के भाव से जोड़ा है। लेकिन राजनीति सिर्फ उपलब्धियों की सूची से नहीं चलती। देश की राजनीति का दूसरा चेहरा भी उतनी ही ताकत से दिखाई दे रहा है। छह अक्टूबर को राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के विरोध में प्रदर्शन किया। संसद से चुनाव आयोग की ओर बढ़ते विपक्षी सांसदों को पुलिस ने रोका, जिसके बाद धरना, हिरासत और राजनीतिक टकराव की तस्वीरें सामने आईं। राहुल गांधी का बैरिकेड पर चढ़ना और “ज्ञानेश, इट्स डन ब्रो” जैसी युवा शैली की भाषा सोशल मीडिया पर तेजी से फैली। इस पूरे घटनाक्रम ने चुनाव आयोग और मतदाता सूची के विवाद को अचानक देश की राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया। विपक्ष इस पूरे विवाद को केवल मतदाता सूची की तकनीकी प्रक्रिया नहीं मान रहा। उसके लिए यह लोकतंत्र, मताधिकार और चुनावी निष्पक्षता का सवाल है। कांग्रेस और उसके सहयोगी आरोप लगा रहे हैं कि मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने से नागरिकों के मतदान अधिकार पर असर पड़ सकता है। विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग कर रहा है और इस पूरे मामले को व्यापक राजनीतिक आंदोलन में बदलने की कोशिश कर रहा है। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि कांग्रेस लगातार चुनाव हारने के बाद चुनाव आयोग को कठघरे में खड़ा कर रही है और उसे अपनी राजनीतिक कमजोरी का जिम्मेदार संस्थाओं को बनाने के बजाय जनता का विश्वास जीतने की कोशिश करनी चाहिए। भाजपा का यह भी सवाल है कि जिस चुनावी व्यवस्था के माध्यम से विपक्ष कई राज्यों में जीत हासिल करता रहा, उसी व्यवस्था को अपनी हार के बाद अविश्वसनीय कैसे कहा जा सकता है। यहीं से इस समय की राजनीति का सबसे बड़ा द्वंद्व सामने आता है। विपक्ष का सवाल है कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर प्रश्न उठे तो लोकतंत्र कैसे सुरक्षित रहेगा? सत्ता पक्ष का सवाल है कि बिना निर्णायक प्रमाण के चुनावी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करने से क्या लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा ही कमजोर नहीं होगा? दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क रख रहे हैं, लेकिन एक तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर बहस अब महज विपक्षी भाषण नहीं रह गई है। हालांकि इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि विपक्ष के सारे आरोप सिद्ध हो चुके हैं। चुनाव आयोग पर गंभीर सवाल उठना एक बात है और “चुनाव चोरी सिद्ध हो जाना” दूसरी बात है। शायद यही वह बिंदु है जहां से आम जनता और राजनीतिक विमर्श के बीच अंतर दिखाई देता है। राजनीति की दुनिया में इस समय SIR, चुनाव आयोग और ज्ञानेश कुमार सबसे बड़ा मुद्दा दिखाई दे रहे हैं। समाचार चैनलों और सोशल मीडिया पर भी यही सबसे अधिक दिखाई दे रहा है। लेकिन जब हम व्यापक जनमत संकेतकों को देखते हैं तो तस्वीर कुछ अलग है। सितंबर 2026 के ताजा इप्सॉस सर्वेक्षण में सात में से लगभग सात भारतीयों ने माना कि देश सही दिशा में जा रहा है और करीब आठ में से आठ ने वर्तमान आर्थिक स्थिति को सकारात्मक माना है। लेकिन उसी सर्वेक्षण में बेरोजगारी भारत की सबसे बड़ी चिंता बनी हुई है। यानी देश के भविष्य को लेकर आशावाद मौजूद है, मगर नौकरी और अवसर को लेकर बेचैनी भी उतनी ही वास्तविक है। यही भारतीय जनमत की वर्तमान जटिलता है। जनता का एक बड़ा हिस्सा यह मान सकता है कि देश आगे बढ़ रहा है, अर्थव्यवस्था टिकाऊ है, बुनियादी ढांचे में बदलाव आया है और भारत की वैश्विक स्थिति मजबूत हुई है, लेकिन उसी व्यक्ति के घर में नौकरी, आमदनी, महंगाई और भविष्य की सुरक्षा की चिंता भी हो सकती है। सितंबर में शहरी उपभोक्ता विश्वास में भी सुधार आया और भारत का उपभोक्ता विश्वास सूचकांक बढ़ा। इसका मतलब यह हुआ कि आर्थिक तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है; फिर भी रोजगार सबसे बड़ा चिंता का विषय बना हुआ है। इससे नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के सामने असली राजनीतिक प्रश्न भी स्पष्ट होता है। चुनौती केवल यह नहीं है कि विपक्ष कितना आक्रामक है। चुनौती यह है कि सरकार आर्थिक उपलब्धियों और बड़े राष्ट्रीय लक्ष्यों की कथा को आम नागरिक की रोजमर्रा की जिंदगी से कितना जोड़ पाती है। जब विकास का अर्थ सड़क, रेल, डिजिटल भुगतान और वैश्विक प्रतिष्ठा से आगे बढ़कर नौकरी, स्थिर आय और युवा के भविष्य में दिखाई देने लगेगा, तभी सरकारी उपलब्धियों का राजनीतिक असर और गहरा होगा। साथ ही नरेंद्र मोदी के व्यक्तिगत नेतृत्व को लेकर तस्वीर अभी भी पूरी तरह बदलती हुई नहीं दिखती। अगस्त 2026 के इंडिया टुडे-सी वोटर सर्वेक्षण में 48.7 प्रतिशत लोगों ने मोदी को अगले प्रधानमंत्री के लिए सबसे पसंदीदा विकल्प माना। हालांकि जनवरी के मुकाबले उनके समर्थन में कुछ कमी आई है। इस गिरावट को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन इसे सीधे मोदी विरोधी लहर भी नहीं कहा जा सकता। दूसरी ओर, राहुल गांधी अभी तक उस राजनीतिक बढ़त को हासिल नहीं कर पाए हैं, जो मोदी के समर्थन में कमी आने पर उन्हें स्वाभाविक रूप से मिल सकती थी। यानी मोदी की राजनीतिक ताकत अभी भी बनी हुई है, लेकिन उसमें एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई दे रहा है। पहले मोदी को लेकर बहस अक्सर इस बात पर केंद्रित रहती थी कि उनके मुकाबले कौन है? अब बहस का एक हिस्सा इस बात पर भी केंद्रित होने लगा है कि सरकार और संवैधानिक संस्थाएं जनता का विश्वास कितना कायम रख पा रही हैं? यही बदलाव आगे चलकर महत्वपूर्ण हो सकता है। सोशल मीडिया पर भी इस समय राजनीति का यही दोहरा चेहरा दिखाई दे रहा है। राहुल गांधी के प्रदर्शन के वीडियो और उनके अंदाज को उनके समर्थक पसंद कर रहे हैं, जबकि विरोधी इसे राजनीतिक दिखावा बता रहे हैं। भाजपा भी सोशल मीडिया के जरिए इसका जवाब दे रही है। यानी सोशल मीडिया ने राजनीतिक बहस को जरूर ज्यादा तेज और आक्रामक बना दिया है, लेकिन वहां दिखाई देने वाली प्रतिक्रियाओं को पूरे देश की राय मान लेना ठीक नहीं होगा। सोशल मीडिया पर वही आवाज ज्यादा सुनाई देती है, जिसके पीछे बड़ी संख्या में सक्रिय और भावनात्मक समर्थक हों। इसलिए सोशल मीडिया का शोर यह तो बताता है कि किसी मुद्दे पर बहस कितनी तेज है, लेकिन यह नहीं बताता कि जनता का बड़ा हिस्सा वास्तव में क्या सोच रहा है। इस पूरे परिदृश्य में युवाओं की बेचैनी को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कॉकरोच जनता पार्टी जैसे युवा केंद्रित आंदोलनों और उनसे जुड़ी डिजिटल राजनीति ने यह दिखाया है कि एक नया राजनीतिक असंतोष उभर रहा है जो जरूरी नहीं कि सीधे कांग्रेस या भाजपा की पारंपरिक राजनीति में समा जाए। रोजगार, परीक्षा व्यवस्था, अवसर और संस्थागत निष्पक्षता जैसे मुद्दे इस नई पीढ़ी को प्रभावित कर रहे हैं। यह नाराज़गी अभी किसी एक पार्टी के पक्ष में संगठित नहीं हुई है, लेकिन इसे हल्के में लेना भी उचित नहीं होगा। इसलिए आज की भारतीय राजनीति को अगर एक वाक्य में समझना हो तो तस्वीर यह है कि नरेंद्र मोदी का जनाधार टूटा नहीं है, मगर उनके नेतृत्व के इर्द-गिर्द सवालों की प्रकृति बदल रही है। व्यक्तिगत लोकप्रियता अभी मजबूत है, सरकार की उपलब्धियों का नैरेटिव अभी जीवित और प्रभावी है, देश की आर्थिक दिशा को लेकर आशावाद भी मौजूद है; लेकिन रोजगार की चिंता, युवा असंतोष और चुनावी संस्थाओं की विश्वसनीयता पर उठते सवाल एक नया दबाव पैदा कर रहे हैं। मोदी के लिए असली चुनौती विपक्ष की किसी एक रैली से नहीं, बल्कि इन अलग-अलग चिंताओं के एक साथ जुड़ जाने से पैदा हो सकती है। फिलहाल स्थिति को “मोदी विरोधी लहर” कहना अतिशयोक्ति होगी। लेकिन यह कहना भी गलत होगा कि जनता के भीतर कोई बेचैनी नहीं है। बेचैनी है, सवाल हैं, संस्थाओं को लेकर आशंका है और युवाओं में अवसर को लेकर अधीरता है। साथ ही देश के बड़े हिस्से में स्थिरता, आर्थिक दिशा और प्रधानमंत्री के नेतृत्व को लेकर भरोसा भी कायम है। दूसरे शब्दों में कहें तो भारतीय मतदाता इस समय न तो पूरी तरह नाराज़ होकर सत्ता से विमुख दिखाई दे रहा है और न ही आंखें बंद करके संतुष्ट है। यही नरेंद्र मोदी के पच्चीसवें वर्ष की सबसे बड़ी राजनीतिक सच्चाई है। यहां यह भी सवाल उठता है कि देश में आज चुनाव हों तो क्या होगा? उपलब्ध ताजा राष्ट्रीय जनमत संकेतक सरकार के लिए चेतावनी जरूर देते हैं लेकिन उसके लिए खतरे का संकेत नहीं दे रहे। अगस्त 2026 के इंडिया टुडे-सी वोटर सर्वेक्षण के मुताबिक आज लोकसभा चुनाव होने पर भाजपा को 261 और एनडीए को 326 सीटें मिल सकती हैं, जबकि इंडिया गठबंधन 185 सीटों तक पहुंच सकता है। यानी भाजपा अपने दम पर बहुमत से नीचे रहेगी, लेकिन एनडीए फिर भी आराम से सरकार बनाने की स्थिति में रहेगा। बहरहाल, मोदी की सबसे बड़ी ताकत आज भी उनका व्यक्तिगत नेतृत्व और जनता के एक बड़े हिस्से से बना सीधा राजनीतिक जुड़ाव है। लेकिन आने वाले वर्षों में उनकी सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि विकास, लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता, रोजगार और युवाओं के भविष्य को लेकर उठ रहे सवालों का सरकार कितना ठोस और भरोसेमंद जवाब दे पाती है। सरकार के मुखिया के रूप में 25 वर्ष पूरे होने पर नरेंद्र मोदी ने 2047 तक आत्मनिर्भर भारत बनाने का संकल्प दोहराते हुए कहा है, “वी विल डू इट।” यह नारा आने वाले भारत के लिए उनके बड़े लक्ष्य और राजनीतिक आत्मविश्वास को दर्शाता है। लेकिन इस लक्ष्य को जमीन पर उतारने के लिए सिर्फ संकल्प नहीं, बल्कि जनता के भरोसे को लगातार मजबूत करना भी जरूरी होगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि 25 वर्षों तक सरकार के मुखिया के रूप में बने रहना इतिहास है, लेकिन इतिहास की असली पहचान इस बात से होती है कि वह भविष्य को किस दिशा में ले जाता है। अब मोदी के सामने चुनौती इसी भविष्य को उपलब्धियों के साथ-साथ जनता के भरोसे का भविष्य बनाने की है। -नीरज कुमार दुबे
आज दुनिया भारत के पायलट की बात कर रही, कल 'मेड इन इंडिया' विमान की बात करेगी : पीएम मोदी
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RBI का बड़ा फैसला: 44 महीने बाद रेपो रेट बढ़कर 5.50% हुआ, महंगे होंगे लोन
आरबीआई का यह फैसला ऐसे समय आया है जब घरेलू महंगाई के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर भी कीमतों को लेकर दबाव बना हुआ है। गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि भू-राजनीतिक घटनाक्रमों के कारण वैश्विक आर्थिक माहौल चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
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दिल्ली में आज विपक्ष का शक्ति प्रदर्शन, CEO कार्यालय पर जुटेंगे AAP-कांग्रेस और लेफ्ट के नेता
वोट चोरी के आरोपों को लेकर आम आदमी पार्टी (आप) समेत विपक्षी दलों ने दिल्ली में सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन करने का ऐलान किया है
साइबर फ्रॉड पर PM मोदी का बड़ा जोर, टेक्नोलॉजी से मजबूत समाधान विकसित करने की अपील
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ग्लोबल सिस्टम फॉर मोबाइल कम्युनिकेशंस एसोसिएशन (जीएसएमए) के संचालन मंडल के सदस्यों के साथ बातचीत की और मोबाइल संचार उद्योग से साइबर धोखाधड़ी से निपटने के लिए टेक्नोलॉजी आधारित मजबूत समाधानों की आवश्यकता पर बल दिया
दिल्ली में आज विपक्ष का बड़ा मार्च, कांग्रेस-AAP और लेफ्ट 1 बजे CEO कार्यालय तक जाएंगे
कांग्रेस, आम आदमी पार्टी (आप) और वामपंथी दल दोपहर 1 बजे दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) के कार्यालय तक विरोध मार्च निकालेंगे।
भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) ने मंगलवार को विपक्षी सांसदों के मार्च और मुलाकात को लेकर स्थिति स्पष्ट करते हुए प्रेस नोट जारी किया है
राहुल-प्रियंका हिरासत से रिहा, चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन पर गरमाई सियासत
लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी समेत कांग्रेस नेताओं को किंग्सवे कैंप से रिहा कर दिया गया है। इसके बाद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा किंग्सवे कैंप स्थित न्यू पुलिस लाइन से रवाना हो गए हैं।
ओडिशा राज्य निर्वाचन आयोग ने 2027 पंचायत एवं नगर निगम चुनाव की तैयारियों पर सर्वदलीय बैठक की
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देशव्यापी आंदोलन को 'आप' का समर्थन, केजरीवाल बोले- ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा देना चाहिए
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दिल्ली: ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर हंगामा, विरोध मार्च के दौरान राहुल-प्रियंका हिरासत में
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चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट पर हमला बंद करे कांग्रेस, 2014 से चल रहा है यही नाटक: रिजिजू
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मुंबई के विकास में जनभागीदारी बढ़ाने के लिए ‘पार्टिसिपेट मुंबई’ लॉन्च, सीएम फडणवीस बोले-परियोजनाओं को मिलेगा बढ़ावा
वाराणसी में 'नमो बुक फेस्ट' का आयोजन, एक छत के नीचे पीएम मोदी पर लिखी किताबों का संग्रह
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सीईसी ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें, नहीं तो पूरा देश बनेगा जंतर-मंतर: अभिजीत दिपके
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Rahul Gandhi की हुंकार, सरकार पर सबसे बड़ा हमला! Gyanesh Kumar संकट में फंस गए PM Modi?
पहाड़ की राजनीति में वैसे तो मौसम कब करवट ले ले, कहा नहीं जा सकता, लेकिन इस बार कांग्रेस के भीतर का मौसम कुछ ज्यादा ही बिगड़ा हुआ नजर आ रहा है। एक तरफ भाजपा लगातार संगठन को चुनावी मोड में ले जा रही है, दूसरी तरफ कांग्रेस अपने ही घर की उठापटक से बाहर निकलने का रास्ता तलाश रही है। इस पूरी कहानी के केंद्र में एक बार फिर वही पुराने चेहरे हरीश रावत हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार सवाल यह है कि लगातार चुनावी पराजयों के बाद भी कांग्रेस आखिर बार-बार उन्हीं पर दांव क्यों लगाये? और क्या अब भी उनके पास उत्तराखंड की राजनीति को निर्णायक रूप से प्रभावित करने की उतनी ही ताकत बची है? हम आपको बता दें कि कांग्रेस हाईकमान ने हरीश रावत की ‘धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा’ को लेकर साफ संदेश दिया है कि चुनावी राज्य में किसी एक नेता का समानांतर अभियान नहीं चल सकता और पार्टी को सामूहिक रूप से चुनाव लड़ना होगा। लेकिन हरीश रावत पीछे हटने की बजाय अपनी यात्रा पर आगे बढ़े। उनका कहना है कि वे कांग्रेस को सत्ता में वापस लाने के लिए जनता के बीच जा रहे हैं। सुनने में यह बात बिल्कुल कांग्रेस के हित में लगती है, लेकिन राजनीति में सिर्फ इरादा नहीं, नतीजे भी देखे जाते हैं और यहीं से हरीश रावत की मौजूदा राजनीतिक हैसियत पर सवाल उठने शुरू होते हैं। हरीश रावत उत्तराखंड के बड़े नेताओं में रहे हैं, इसमें कोई दो राय नहीं। उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली, केंद्र की राजनीति में लंबी पारी खेली और उत्तराखंड कांग्रेस को कई मुश्किल दौर में संभाला। लेकिन राजनीति में किसी नेता का कद सिर्फ उसके पुराने पदों से नहीं मापा जाता। चुनावी राजनीति में जनता का फैसला सबसे बड़ा पैमाना होता है और अगर इसी पैमाने पर हरीश रावत के पिछले कुछ चुनावों को देखा जाए तो तस्वीर बहुत चमकदार नहीं दिखाई देती। 2017 का विधानसभा चुनाव शायद इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। मुख्यमंत्री रहते हुए हरीश रावत ने दो विधानसभा सीटों से चुनाव लड़ने का फैसला किया। हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा, दोनों सीटों पर वह मैदान में उतरे, लेकिन दोनों जगह हार गए। हरिद्वार ग्रामीण में भाजपा के यतीश्वरानंद ने उन्हें 12 हजार से ज्यादा वोटों से हराया, जबकि किच्छा में भाजपा के राजेश शुक्ला ने उन्हें शिकस्त दी। यानी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा उत्तराखंड का सबसे बड़ा कांग्रेसी चेहरा विधानसभा तक नहीं पहुंच सका। उस चुनाव में कांग्रेस की हालत इतनी खराब हुई कि पार्टी 70 में से सिर्फ 11 सीटों पर सिमट गई और भाजपा ने 57 सीटें जीतकर सत्ता पर कब्जा कर लिया। वैसे राजनीति में हार के बाद वापसी संभव होती है और हरीश रावत ने भी कोशिश जारी रखी। 2019 में वे नैनीताल-ऊधमसिंह नगर लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में उतरे, लेकिन भाजपा के अजय भट्ट के सामने टिक नहीं सके। अजय भट्ट को 7.72 लाख से ज्यादा वोट मिले और हरीश रावत करीब 4.33 लाख वोट पर रुक गए। हार का अंतर तीन लाख से ज्यादा रहा। इसके बाद 2022 में विधानसभा चुनाव आया तो रावत ने लालकुआं को अपना रणक्षेत्र बनाया। इस बार भी भाजपा के मोहन सिंह बिष्ट ने उन्हें 17,527 वोटों के अंतर से हरा दिया। यानी 2017 में दो विधानसभा सीटों पर हार, 2019 में लोकसभा की हार और 2022 में विधानसभा की हार, लगातार चुनावी पराजय का यह सिलसिला किसी भी नेता के राजनीतिक भविष्य पर सवाल खड़ा करने के लिए काफी है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। 2024 के लोकसभा चुनाव में हरिद्वार से कांग्रेस ने हरीश रावत के बेटे वीरेंद्र रावत को मैदान में उतारा। मुकाबला भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत से था। नतीजा फिर कांग्रेस के खिलाफ गया। त्रिवेंद्र सिंह रावत ने वीरेंद्र रावत को करीब 1.64 लाख वोटों से हरा दिया। यानी जिस परिवार को कांग्रेस लंबे समय से उत्तराखंड की राजनीति में एक मजबूत आधार मानती रही है, उसके सामने भी चुनावी जमीन उतनी मजबूत दिखाई नहीं दी, जितनी पार्टी शायद मानती रही है। यहीं से सवाल पैदा होता है कि बार-बार हरीश रावत पर ही दांव क्यों लगाया जाये? क्या कांग्रेस के पास उत्तराखंड में कोई नया चेहरा नहीं है? क्या पार्टी ने नई पीढ़ी का नेतृत्व तैयार नहीं किया? क्या संगठन के भीतर ऐसा कोई नेता नहीं है जो हरीश रावत के बिना कांग्रेस को चुनावी मुकाबले में खड़ा कर सके? या फिर कांग्रेस हाईकमान को अब भी लगता है कि चुनाव जीतने की क्षमता भले कम हुई हो, लेकिन हरीश रावत के पास वह राजनीतिक अनुभव, जनसंपर्क और संगठनात्मक पकड़ है जिसे नजरअंदाज करना पार्टी के लिए नुकसानदेह होगा? देखा जाये तो हरीश रावत की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वे उत्तराखंड की राजनीति को बेहद करीब से जानते हैं। वे पहाड़ की भाषा समझते हैं, मैदान की राजनीति को समझते हैं और कांग्रेस के पुराने कार्यकर्ताओं के बीच उनकी पकड़ भी है। वे राजनीतिक मुद्दों को जनता की भाषा में बदलने की कला जानते हैं। लेकिन उनकी सबसे बड़ी कमजोरी भी अब सामने है। उनकी व्यक्तिगत चुनावी विश्वसनीयता पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। जब कोई नेता खुद लगातार चुनाव हार रहा हो तो उसके समर्थकों के लिए यह कहना आसान नहीं होता कि वही नेता पार्टी को सत्ता तक पहुंचा देगा। यही वजह है कि कांग्रेस के भीतर हरीश रावत की भूमिका को लेकर असमंजस दिखाई देता है। पार्टी उन्हें पूरी तरह किनारे नहीं कर सकती, क्योंकि उनका अनुभव और जनाधार अब भी उपयोगी है। लेकिन पार्टी उन्हें पूरी तरह आगे भी नहीं कर सकती, क्योंकि तब बाकी नेताओं और गुटों के बीच असंतोष बढ़ने का खतरा है। अगर हरीश रावत अपनी अलग राजनीतिक गतिविधियां जारी रखते हैं तो हाईकमान को डर है कि चुनाव से पहले ही कांग्रेस का मंच अलग-अलग हिस्सों में बंट जाएगा। देखा जाये तो उत्तराखंड कांग्रेस की असली समस्या यही है। उसके पास नेता बहुत हैं, लेकिन नेतृत्व का सर्वमान्य चेहरा नहीं है। हर नेता अपने समर्थकों के साथ खड़ा है, हर गुट अपनी राजनीतिक जगह चाहता है और दिल्ली चाहती है कि चुनाव आते-आते सभी एक मंच पर दिखाई दें। लेकिन पहाड़ की राजनीति में जितनी ऊंचाई होती है, उतने ही मोड़ भी होते हैं। कांग्रेस के सामने इस समय सबसे बड़ा मोड़ नेतृत्व का ही है। उधर भाजपा की कहानी बिल्कुल अलग दिखाई दे रही है। 2017 में भाजपा ने 70 में से 57 सीटें जीतकर कांग्रेस को सत्ता से बाहर किया था। 2022 में भाजपा का आंकड़ा घटकर 47 जरूर हुआ, लेकिन सत्ता उसके हाथ से नहीं निकली। कांग्रेस 19 सीटों तक पहुंची, लेकिन सरकार बनाने से काफी दूर रही। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उत्तराखंड की पांचों सीटें जीतकर कांग्रेस का खाता तक नहीं खुलने दिया। यानी विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के पास लगातार चुनावी जीत की मनोवैज्ञानिक बढ़त भी है और मजबूत संगठन की ताकत भी। भाजपा की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह पिछली जीत के भरोसे बैठी दिखाई नहीं देती। वह उन सीटों पर भी संगठन मजबूत करने में जुटी है जहां उसे विधानसभा चुनाव में हार मिली थी। पार्टी की तैयारी बूथ स्तर तक दिखाई देती है और उसके सामने चुनाव सिर्फ सरकार बचाने का नहीं, बल्कि उत्तराखंड में अपने राजनीतिक वर्चस्व को और मजबूत करने का है। इसके उलट कांग्रेस के पास सरकार के खिलाफ मुद्दों की कोई कमी नहीं है। बेरोजगारी है, भर्ती परीक्षाओं के सवाल हैं, पलायन है, पहाड़ के गांवों का खाली होना है, जमीन और जंगल के सवाल हैं, युवाओं की नाराजगी है और स्थानीय अस्मिता से जुड़े मुद्दे हैं। लेकिन इन मुद्दों को एक बड़े राजनीतिक अभियान में बदलने से पहले कांग्रेस को अपने भीतर की लड़ाई खत्म करनी होगी। यही वह जगह है जहां भाजपा को सबसे बड़ा फायदा मिल रहा है। हालांकि कांग्रेस के लिए उम्मीद पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। 2024 में बद्रीनाथ और मंगलौर विधानसभा उपचुनाव जीतना यह दिखाता है कि भाजपा अजेय नहीं है। लेकिन केदारनाथ उपचुनाव में भाजपा की जीत ने यह भी साफ कर दिया कि कांग्रेस के सामने चुनौती छोटी नहीं है। उसे सिर्फ भाजपा के खिलाफ माहौल बनाने से काम नहीं चलेगा, उसे अपना संगठन, अपना नेतृत्व और अपना चुनावी संदेश तीनों मजबूत करने होंगे। इसी मोड़ पर हरीश रावत का सवाल सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है। अगर रावत पार्टी को मजबूत करने के लिए जनता के बीच जाना चाहते हैं तो कांग्रेस को उनके अनुभव का इस्तेमाल जरूर करना चाहिए। लेकिन अगर उनकी सक्रियता कांग्रेस के भीतर एक और ध्रुवीकरण पैदा करती है तो वही सक्रियता पार्टी के लिए बोझ बन सकती है। कांग्रेस को यह तय करना होगा कि हरीश रावत उसके लिए एक वरिष्ठ मार्गदर्शक और स्टार प्रचारक हैं या फिर एक बार फिर पूरा चुनाव उन्हीं के इर्द-गिर्द लड़ा जाएगा। क्योंकि इन दोनों रास्तों में जमीन-आसमान का फर्क है। देखा जाये तो उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत का अध्याय अभी खत्म नहीं हुआ है, लेकिन यह भी सच है कि उनका सबसे मजबूत दौर पीछे छूट चुका है। उनकी राजनीतिक प्रासंगिकता अब सिर्फ इस बात से तय नहीं होगी कि वे कितनी बड़ी रैलियां करते हैं या कितने जिलों में यात्रा निकालते हैं। असली सवाल यह होगा कि क्या वे कांग्रेस के भीतर बिखरे हुए नेताओं और कार्यकर्ताओं को एक मंच पर ला सकते हैं और क्या उनकी मौजूदगी पार्टी के वोट में बदल सकती है? वहीं कांग्रेस को भी यह समझना होगा कि उत्तराखंड की जनता सिर्फ पुराने चेहरों की यादों पर वोट नहीं करती। पहाड़ की जनता अपने नेताओं से हिसाब मांगती है। वह पूछती है कि पांच साल में क्या हुआ, रोजगार कहां है, गांव क्यों खाली हो रहे हैं, सड़क और स्वास्थ्य की हालत क्या है और आने वाली पीढ़ी के लिए राज्य में क्या बचा है। इसलिए 2027 का चुनाव अगर कांग्रेस सिर्फ हरीश रावत बनाम भाजपा बनाकर लड़ती है तो यह उसकी रणनीतिक भूल होगी। उसे हरीश रावत के अनुभव को इस्तेमाल करते हुए एक नई राजनीतिक टीम और नया नेतृत्व सामने लाना होगा। वरना खतरा यह है कि कांग्रेस हर बार पुराने चेहरे को देखकर पहाड़ की चढ़ाई शुरू तो कर दे, लेकिन चुनाव की चोटी तक पहुंचने से पहले ही फिर किसी पुराने मोड़ पर लौट आए। क्योंकि सवाल अब सिर्फ हरीश रावत के सियासी वजूद का नहीं है। सवाल यह है कि क्या उत्तराखंड कांग्रेस अपने पुराने सियासी चेहरे से आगे निकलकर नया नेतृत्व पैदा कर पाएगी, या फिर 2027 में भी पहाड़ वही पुराना सवाल पूछेगा कि कांग्रेस के पास आखिर नया क्या है? -नीरज कुमार दुबे
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