कोई भी हारने वाले को पसंद नहीं करता। कोई भी धमकाया जाना पसंद नहीं करता। फिर भी हम खड़े हैं, हम धरती पर सबसे बड़ी महाशक्ति हैं और हर कोई हमारे हिस्से का खा रहा है। यह ठीक नहीं है। अगर मैं अपना धंधा ऐसे चलाता तो खुद को बाहर कर देता। अमेरिका को फिर से जीतना शुरु करना होगा। आओ हम सब मिलकर अमेरिका को मजबूत बनाएं और उसे फिर से महान बनाएं। इन शब्दों के साथ अकड़ते और हवा में मुट्टियां लहराते हुए डोनाल्ड जॉन ट्रंप ने जून 2015 में दुनिया की सबसे ताकतवर कुर्सी को हासिल करने के लिए अपने शुरु किए चुनाव प्रचार को जीत के साथ समाप्त किया था। कट टू 2024 हम अपने देश को ठीक करने में मदद करने जा रहे हैं। हमारे पास एक ऐसा देश है जिसे मदद की ज़रूरत है और उसे मदद की सख्त ज़रूरत है। हम अपनी सीमाएं फिक्स करने जा रहे हैं। हम सब कुछ फिक्स करने जा रहे हैं। इन लाइनों के साथ अपनी चुनावी जीत के बाद ट्रंप ने ये दर्शाया था कि आने वाले दिनों में कुर्सी संभालने के बाद उनके तेवर कैसे रहने वाले हैं। जनवरी 2024 में दोबारा से शपथ लेने के तुरंत बाद इन्होंने कहा कि अवैध अप्रवासियों को बर्थ राइट सिटीजनशिप नहीं मिलेगी। फिर कहा ड्राइवर गाड़ी निकालो हमें डब्लूएचओ से बाहर जाना है। फिर कहा क्लाइमेट चेंज बकवास है। अमेरिका पेरिस समझौते जैसी फालतू चीज में शामिल नहीं होगा। दुनिया मतलब राष्ट्रपति बने थे अमेरिका के लेकिन दुनिया को ये दिखा रहे थे कि नहीं मैं पूरी दुनिया का राष्ट्रपति बन गया हूं। जिसे चाह रहे थे उसे धमका रहे जिसे जैसे चाह रहे थे उसके साथ वैसा बर्ताव कर रहे थे। किसी की बेइज्जती वाइट हाउस में बिठाकर कर रहे थे। तो किसी की बेइज्जती अपने बयान में बयानों में कर रहे थे। न क्या आप यकीन करेंगे कि वही ट्रंप जो दुनिया को धमका रहे थे अब से पहले तक वो ट्रंप आज गिड़गिड़ा रहे हैं। अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मुश्किलें बढ़ती दिखाई दे रही है। एक तरफ देश में महंगाई और बढ़ती कीमतों से आम जनता परेशान है तो दूसरी तरफ ट्रंप की लोकप्रियता में भी लगातार गिरावट देखने को मिल रही है और अब इन सबका असर नवंबर में होने वाले मध्यावधि यानी कि मिड टर्म चुनाव पर दिखाई दे सकता है। अमेरिका में 3 नवंबर को मिड टर्म चुनाव होने हैं और इन चुनाव से यह तय होगा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी अमेरिकी संसद यानी कि कांग्रेस के दोनों सदनों में आप अपना बहुमत बचा पाती है या फिर नहीं। लेकिन चुनाव से ठीक पहले सामने आए कई सर्वेक्षणों यानी कि सर्वे में रिपब्लिकन पार्टी की चिंता बढ़ गई है। इन सर्वेक्षणों में डेमोक्रेटिक पार्टी को बढ़त मिलती दिखाई दे रही है और सबसे बड़ी बात यह है कि अमेरिकी मतदाता अब अर्थव्यवस्था, महंगाई और सरकार की नीतियों को लेकर सवाल उठा रहे हैं। कई लोगों का मानना है ट्रंप की नीतियों की वजह से उनकी रोजमर्रा की जिंदगी और ज्यादा महंगी हो गई है यानी महंगाई बढ़ी है। ऐसे में सवाल है क्या अमेरिका की जनता ट्रंप सरकार के कामकाज से नाराज है? क्या यह नाराजगी चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी को भारी पड़ सकती है? और अगर डेमोक्रेटिक पार्टी जीत जाती है तो ट्रंप के लिए आगे की राह कितनी मुश्किल हो जाएगी? आइए इस पूरी राजनीतिक तस्वीर का एमआरआई स्कैन करते हैं। इसे भी पढ़ें: Mukesh Ambani के कारोबारी सामर्थ्य का अचानक मुरीद क्यों हुआ अमेरिका? Marco Rubio ने Jamnagar Refinery में क्या क्या देखा? दुनिया को धमकाने वाले ट्रंप गिड़गिड़ाने क्यों लगे आपने देखा होगा किस तरीके से अमेरिका ने रशिया से डीजल खरीदने की डील की वो कोई आम डील नहीं थी। वो डीजल जरूर आम हो सकता है। 3 लाख टन डीजल जरूर आम सी बात हो सकती है। जरूर किसी और देश से ज्यादा पैसे में अमेरिका खरीद सकता था उस डीजल को लेकिन रशिया के सामने ही क्यों इसके लिए गिड़गिड़ाया? क्यों यूक्रेन को अकेला छोड़ दिया? जिस यूक्रेन को बिलियंस ऑफ डॉलर दिए कि रूस के साथ लड़ाई करो। मतलब दुनिया में बहुत सारी चीजें ऐसे जापान का साथ छोड़ दिया। साउथ कोरिया को मना कर दिया। यूक्रेन का नेट बंद करवा दिया। आइलॉन मस्क के यूरोप का नेट की स्पीड घटवा दी। डेनमार्क को धमका दिया कि हमें ग्रीनलैंड चाहिए ही चाहिए। वो ट्रंप आज दुनिया के सामने गिड़गिड़ा रहे हैं। दुनिया में भी पहले रूस के सामने गिड़गिड़ाए और अब भारत में उनका संदेश लेकर मार्को रूबियो फिलहाल भारत में मौजूद है। मार्को रूबियो जामनगर रिफाइनरी में गए। जामनगर की रिफाइनरी वो रिफाइनरी है जो रोजाना 14 लाख बैरल तेल रिफाइन करती है । वेनेजुएला के तेल पर कब्जा तो अमेरिका ने कर लिया लेकिन उसे रिफाइन नहीं कर सकता। उसके लिए भारत की जरूरत होगी। आज अमेरिका को डीजल की जरूरत है। पेट्रोल की जरूरत है और इसी वजह से जो अप्रूवल रेटिंग है ट्रंप की वो लगातार घटती जा रही है क्योंकि अमेरिका में महंगाई लगातार बढ़ रही है। अमेरिका में रहना मुश्किल हो गया है। अमेरिका में रहना महंगा हो गया है। खाना महंगा हो गया है। ऊर्जा महंगी हो गई है। तो अब विटर्म में जाने वाले हैं ट्रंप रिपब्लिकन पार्टी डेमोक्रेटिक पार्टी है। दोनों पार्टियां चुनाव में जाने वाली हैं। 3 नवंबर को यह चुनाव है। ट्रंप चाहते हैं कि 3 नवंबर से पहले लगभग 10-12 दिन जो हैं उससे पहले पहले वो सब कुछ ठीक कर लें। जो महंगाई आउट ऑफ कंट्रोल जा चुकी है उसे वो कंट्रोल कर रहे हैं। कई रिपोर्ट्स दावा करती है कि अमेरिका में रहने वाले चार लोगों में से तीन लोग ट्रंप से नफरत करते हैं। ट्रंप की नीतियों का समर्थन नहीं करते। मतलब 25% लेकिन कुछ रिपोर्ट्स फिर भी थोड़ा सा दावा करती हैं कि नहीं थोड़ी सी इज्जत बची हुई है और अभी लगभग 31% तक ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग है। इसे भी पढ़ें: रूस पर चौंकाया...भारत पहुंचते ही अमेरिका के विदेश मंत्री ने किया बड़ा धमाका, सब हैरान! 34% अमेरिकी ट्रंप के कामकाज से संतुष्ट आपको बता दें कि अप्रूवल रेटिंग जो होती है वो डोनाल्ड ट्रंप की गिरती जा रही है। अब अप्रूवल रेटिंग का मतलब यह होता है कितने लोग राष्ट्रपति के कामकाज से संतुष्ट हैं और कितने लोग उनसे असहमत हैं। एनबीसी न्यूज़ के एक रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ 34% अमेरिकी ट्रंप के कामकाज से संतुष्ट हैं। जबकि 66% लोगों ने उनके प्रदर्शन पर असहमति जताई है। इस सर्वेक्षण में 51% लोगों ने तो ट्रंप के कामकाज से बहुत ज्यादा असहमति जताई है और यह उनके दूसरे कार्यकाल के दौरान इस सर्वे में दर्ज किया जा किया गया सबसे ऊंचा आंकड़ा बताया जा रहा है। वहीं वाशिंगटन पोस्ट एबीसी न्यूज़ और जो एप्सोस में सर्वे हुए हैं उसमें ट्रंप के अप्रूवल रेटिंग सिर्फ 33% सामने आई है। जबकि 66% लोगों ने उनके कामकाज को लेकर असहमति जताई है। यह आंकड़ा भी इस सर्वेक्षण के इतिहास में ट्रंप का सबसे कमजोर प्रदर्शन बताया गया। यानी कि सर्वे के आंकड़े साफ संकेत दे रहे हैं कि ट्रंप को लेकर अमेरिकी मतदाताओं के बीच असंतोष बढ़ा है। महंगाई बनी ट्रंप की सरकार की सबसे पर बड़ी परेशानी ये लोगों का कहना है क्योंकि ये सबसे बड़ा मुद्दा है किसी भी देश के लिए सरकार का चुनावी भविष्य तय करने के लिए ये बड़ी भूमिका भी निभाता है और यह मुद्दा है अर्थव्यवस्था का। इसे भी पढ़ें: US Presidential Election 2028 | राष्ट्रपति चुनाव के लिए जेडी वेंस को समर्थन देने पर डोनाल्ड ट्रंप का टालमटोल, कहा- 'अभी बहुत जल्दी है' क्या चुनाव जीत पाएंगे ट्रंप? हालांकि इसका मकसद ट्रंप के समर्थकों की भागीदारी बढ़ाना था। लेकिन इस कदम से डेमोक्रेट और निर्दलीय मतदाता भी उनकी मतलब जैसे उन्होंने कहा कि हर सीट पर आप ट्रंप को ही मानकर चलिए कि ट्रंप चुनाव लड़ रहे हैं। चाह तो थे चाहते थे कि रिपब्लिकन की जो वोट है वो बढ़े लेकिन यहां पर मामला उल्टा पड़ गया। उल्टा यहां पर अगर डेमोक्रेट्स की बात करें तो उनका कहना है कि ट्रंप ने खर्च कम करने और युद्ध खत्म करने के अपने चुनावी वादों को पूरा नहीं किया। उन्होंने वादा किया कि अगर मतदाता उन्हें किसी भी सदन में बहुमत देते हैं तो वो अमेरिकियों के जीवन यापन का खर्च कम करने के लिए काम करेंगे और कथित भ्रष्टाचार के लिए प्रशासन को जवाबदेह ठहराएंगे। यहां पर अगर आपको बात करें तो ऊर्जा जो है वो 34% तक महंगी हो चुकी है। खाना पीना ढाई से तीन गुना तक ढाई से 3% तक महंगा हो चुका है। यहां पर ये अमेरिका के हाल हैं। अमेरिका की अगर बात करें तो ट्रिपल ए के अनुसार पेट्रोल की राष्ट्रीय औसत कीमत $4.28 है जो 1 साल पहले की तुलना में $1.2 ज्यादा है। मतलब $5 प्रति गैलन तक यहां पर कीमत बढ़ चुकी है। डीजल की कीमतें लगभग 3 गैलन $3 प्रति गैलन तक यहां पर बढ़ चुकी हैं। और अगर बाकी बात करें तो गृह सुरक्षा विभाग के आंकड़ों से पता चलता है कि जो बाइडन के प्रशासन की तुलना में दक्षिणी पश्चिमी सीमा में पकड़े गए जो प्रवासी आते हैं उनमें कमी आई है। 95% तक उनका आना कम हुआ है। लेकिन बाकी जो चीजें हैं वो यहां पर महंगी हुई हैं। अमेरिका में रहना महंगा हो चुका है। मतलब एक रिपोर्ट यह दावा करती है कि अगर किसी परिवार का खर्च महीने का अमेरिका में रहने का अब तक $3000 था तो वो अब यहां मतलब अगर मौजूदा वक्त की बात करें तो वो $311 तक पहुंच चुका है। मतलब $11 की बढ़ोतरी पिछले कुछ महीनों में हुई है। जिस तरीके से ईरान ने स्टेट ऑफ़ होर्मुज चौक की हुई है और बाबल मंदिर पर कब्जा किसका है? हूतियों का कब्जा है। हूतियों को हथियार कौन दे रहा है? चीन और रूस दे रहे हैं। ईरान को हथियार कौन दे रहा है? चीन और रूस दे रहे हैं। ईरान का तेल कौन खरीद रहा है? चीन खरीद रहा है। मतलब एक तरीके से अमेरिका को पूरी तरीके से रशिया और चाइना ने काउंटर कर लिया है। घेर कर मार दिया है। अब यहां जीत तो बहुत दूर की बात है। हार भी बहुत बुरी ना ट्रंप की हो जाए। ये कहा जा रहा है अमेरिका में। जो डेमोक्रेट्स हैं उनकी जो रेटिंग है या फिर जो उनका आंकड़ा है जिस तरीके से भी अमेरिका में ये गिनती होती होगी वो 92% 52% के पार पहुंच चुका है। वहीं ट्रंप की पार्टी की बात करें तो 42 फ़ीसदी पर अटकी हुई है। और अगर ये अप्रूवल रेटिंग नहीं बढ़ी तो फिर रिपब्लिकनंस चुनाव हार जाएंगे और राष्ट्रपति तो रहेंगे। ट्रंप 4 साल तक आने वाले 2 साल भी राष्ट्रपति तो रहेंगे। लेकिन काम क्या कुछ कर पाएंगे या नहीं कर पाएंगे वह वक्त बताएगा। रिपब्लिकन के सामने क्या चुनौती रिपब्लिकन पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह मतदाताओं को कैसे भरोसा दिलाएं कि उनकी नीतियां अर्थव्यवस्था को बेहतर बना सकती है। डेमोक्रेटिक पार्टी को सर्वेक्षणों में बढ़त मिलती दिखाई दी है। देखिए चुनावी मुकाबले की बात करें तो सर्वे में डेमोक्रेटिक पार्टी रिपब्लिकन पार्टी से आगे दिख रही है। एबीसी न्यूज़, वाशिंगटन पोस्ट और कई ऐसे अमेरिकी जो चैनल्स हैं उसके सर्वे में प्रतिनिधि सभा के चुनाव के लिए डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों को 52% और रिपब्लिकन उम्मीदवारों को 44% समर्थन मिला। यानी डेमोक्रेट्स को 8% अंकों की बढ़त दिखाई दी। वहीं रटर्स और अह इप्सोस के सर्वेक्षण में डेमोक्रेटिक पार्टी को बढ़त मिली। इस सर्वेक्षण में डेमोक्रेट्स को 47 और रिपब्लिकन पार्टी को 35% समर्थन मिला। यानी कि यहां भी अंतर 12% अंकों का है। इन आंकड़ों से पता चलता है चुनाव से पहले डेमोक्रेटिक पार्टी का प्रदर्शन बेहतर दिखाई दे रहा है। हालांकि यह याद रखना जरूरी है कि राष्ट्रीय सर्वेक्षणों के आधार पर सीधे चुनाव के नतीजों का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है।
इस्लाम के सबसे पवित्र शहर मक्का की एक मस्जिद में अशोभनीय कृत्य के मामले में सऊदी अरब ने दो बांग्लादेशी नागरिकों को मृत्युदंड दे दिया है। 14 अक्टूबर को हुई इन फाँसियों ने न केवल धार्मिक स्थलों की मर्यादा और सऊदी अरब के कठोर दंड कानूनों पर बहस छेड़ दी है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर न्यायिक पारदर्शिता और विदेशों में काम करने वाले प्रवासी नागरिकों के अधिकारों को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि बांग्लादेश सरकार के अनुसार, उसे इन मृत्युदंडों के क्रियान्वयन से पहले आधिकारिक सूचना नहीं दी गई थी। ढाका अब रियाद से पूरे मामले का ब्योरा माँग रहा है। पवित्र स्थल में कथित कृत्य, फिर मृत्युदंड सऊदी अरब के गृह मंत्रालय के अनुसार, मृत्युदंड पाने वाले बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान नज़रुल इस्लाम अब्दुल बशीर और सिटी अख्तर के रूप में की गई है। अधिकारियों का कहना है कि दोनों को मक्का की एक मस्जिद में अनैतिक कृत्य करने के मामले में गिरफ्तार किया गया था। जाँच के बाद मामला अदालत में पहुँचा, जहाँ आरोप सिद्ध होने पर दोनों को मृत्युदंड सुनाया गया। संबंधित न्यायिक प्राधिकरण से फैसले की पुष्टि और शाही आदेश के बाद 14 अक्टूबर को सजा लागू कर दी गई। इसे भी पढ़ें: Saudi Aramco Attack | सऊदी अरामको पर दहलाने वाला ड्रोन हमला! दो की मौत और घायल लोगों में एक भारतीय भी शामिल, अमेरिका ने जारी किया देश छोड़ने का फरमान सऊदी अधिकारियों ने अपने बयान में धार्मिक स्थल की पवित्रता, अपराध की गंभीरता और समय-स्थान की मर्यादा के उल्लंघन को सजा का आधार बताया। हालाँकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि कथित कृत्य वास्तव में क्या था, घटना किस मस्जिद में हुई थी और आरोपियों के खिलाफ कौन-कौन से साक्ष्य प्रस्तुत किए गए थे। हालांकि सोशल मीडिया पर दावे किये जा रहे हैं कि दोनों को केवल चुंबन लेने या किसी खास प्रकार की शारीरिक निकटता के कारण मृत्युदंड दिया गया। हालांकि ये सोशल मीडिया के दावे हैं इसके बारे में कोई प्रमाण नहीं हैं। बांग्लादेश सरकार ने उठाए सवाल देखा जाये तो इस मामले का सबसे गंभीर पहलू केवल मृत्युदंड नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया को लेकर पैदा हुआ विवाद है। बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय और जेद्दा स्थित उसके वाणिज्य दूतावास ने कहा है कि उन्हें फाँसी से पहले इसकी सूचना नहीं मिली थी। ढाका ने सऊदी अधिकारियों को राजनयिक पत्र भेजकर आरोपों का पूरा विवरण, अदालत के फैसलों की प्रतियाँ और मृत्युदंड की प्रक्रिया से संबंधित जानकारी माँगी है। बांग्लादेश सरकार ने यह भी जानना चाहा है कि उसके नागरिकों को मुकदमे के दौरान किस प्रकार की कानूनी सहायता उपलब्ध कराई गई और राजनयिक मिशन को समय रहते जानकारी क्यों नहीं दी गई? देखा जाये तो किसी विदेशी नागरिक को मृत्युदंड देने से पहले उसके देश को हर परिस्थिति में सूचना देना और हिरासत में लिए गए व्यक्ति के कांसुलर अधिकारों की रक्षा करना सभी सरकारों का दायित्व होता है। इस्लामी कानून में ताज़ीर का क्या अर्थ है? उधर, सऊदी अरब ने इस मामले में ‘ताज़ीर’ के अंतर्गत मृत्युदंड दिए जाने की बात कही है। इस्लामी न्यायशास्त्र में ताज़ीर उन अपराधों के लिए विवेकाधीन दंड की श्रेणी है, जिनकी सजा निर्धारित करने में न्यायाधीश को लागू कानूनी व्यवस्था के अंतर्गत भूमिका मिलती है। यह ऐसा प्रावधान नहीं है जिसके अंतर्गत प्रत्येक अनुचित व्यवहार के लिए स्वतः मृत्युदंड निर्धारित हो जाता हो। यही इस मामले का सबसे संवेदनशील प्रश्न है: यदि अपराध की प्रकृति और उसके प्रमाण सार्वजनिक नहीं हैं, तो आम लोग यह कैसे समझें कि इतनी कठोर सजा किन परिस्थितियों में उचित मानी गई? देखा जाये तो न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता केवल सजा देने से नहीं, बल्कि स्पष्ट आरोप, विश्वसनीय साक्ष्य, निष्पक्ष सुनवाई और जवाबदेह प्रक्रिया से भी स्थापित होती है। यह भी ध्यान रखना होगा कि इस्लामी कानून की व्याख्या और उसका क्रियान्वयन हर मुस्लिम देश में एक समान नहीं है। सऊदी अरब की कानूनी व्यवस्था को सीधे बांग्लादेश या दुनिया के सभी मुसलमानों की धार्मिक समझ का प्रतिनिधि मानना उचित नहीं होगा। धार्मिक स्तर पर क्या होंगे प्रभाव? उल्लेखनीय है कि मक्का और मदीना दुनिया भर के मुसलमानों के लिए अत्यंत पवित्र स्थान हैं। मक्का में मस्जिद अल-हरम और काबा का विशेष धार्मिक महत्त्व है। ऐसे स्थान पर मर्यादा के उल्लंघन का आरोप स्वाभाविक रूप से धार्मिक भावनाओं को प्रभावित करता है। सऊदी सरकार की दृष्टि में कठोर कार्रवाई पवित्र स्थलों की प्रतिष्ठा और अनुशासन बनाए रखने का संदेश हो सकती है। लेकिन इस घटना का दूसरा पहलू भी है। धार्मिक आस्था और न्यायिक प्रक्रिया को एक-दूसरे का विरोधी नहीं होना चाहिए। यदि किसी अपराध के लिए कठोरतम दंड दिया जाता है, तो उसके आधार और प्रक्रिया की स्पष्टता भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण हो जाती है। धार्मिक स्थलों के सम्मान की रक्षा के नाम पर न्यायिक पारदर्शिता के प्रश्नों को अनदेखा नहीं किया जा सकता। बांग्लादेश में सामाजिक और राजनीतिक असर दूसरी ओर, बांग्लादेश में इस मामले का प्रभाव तीन स्तरों पर पड़ सकता है। एक तो विदेशों में काम करने वाले नागरिकों की सुरक्षा और उनके कानूनी अधिकारों को लेकर सरकार पर दबाव बढ़ सकता है। दूसरा, सऊदी अरब में काम कर रहे लाखों बांग्लादेशी श्रमिकों के परिवारों के बीच चिंता पैदा हो सकती है। साथ ही धार्मिक आस्था और मृत्युदंड की कठोरता को लेकर सार्वजनिक बहस तेज हो सकती है। रिपोर्टों के अनुसार, सऊदी अरब में लगभग 35 लाख बांग्लादेशी कामगार रहते हैं और वहाँ से भेजी जाने वाली रकम बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था तथा अनेक परिवारों की आजीविका के लिए महत्त्वपूर्ण है। ऐसे में यह मामला केवल दो व्यक्तियों तक सीमित नहीं रह जाता; यह प्रवासी श्रमिकों की कानूनी सुरक्षा और दोनों देशों के राजनयिक संबंधों से भी जुड़ जाता है। बहरहाल, मक्का की मस्जिद से जुड़ा यह मामला एक बुनियादी सवाल सामने रखता है कि क्या किसी पवित्र स्थल की मर्यादा की रक्षा और न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता साथ-साथ सुनिश्चित नहीं की जानी चाहिए? सऊदी अरब ने धार्मिक स्थल की पवित्रता के उल्लंघन को मृत्युदंड का आधार बताया है, जबकि बांग्लादेश अब आरोपों, अदालती फैसलों और राजनयिक सूचना की पूरी जानकारी माँग रहा है। सजा के पक्ष में कोई भी तर्क दिया जाये लेकिन किसी भी न्याय व्यवस्था की वास्तविक कसौटी केवल उसकी कठोरता नहीं, बल्कि उसका न्यायपूर्ण, पारदर्शी और जवाबदेह होना भी है। -नीरज कुमार दुबे
गुजरात स्थित जामनगर में बुधवार को एक ऐसी मुलाकात हुई, जिसके मायने किसी औद्योगिक दौरे से कहीं ज्यादा बड़े हैं। अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो दुनिया की सबसे बड़ी सिंगल-साइट ऑयल रिफाइनरी देखने पहुंचे, जहां रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर मुकेश अंबानी तथा एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अनंत अंबानी ने उनका स्वागत किया। उनके साथ भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर भी मौजूद रहे। सवाल यह है कि अमेरिका के शीर्ष राजनयिक ने दिल्ली के बजाय जामनगर को इतना महत्व क्यों दिया? जवाब है तेल, ऊर्जा सुरक्षा, वेनेजुएला का भारी कच्चा तेल और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर बढ़ता दबाव। हम आपको बता दें कि जामनगर में रुबियो को केवल रिफाइनरी की विशाल मशीनें और अत्याधुनिक तकनीक नहीं दिखाई गई, बल्कि रिलायंस के उस औद्योगिक सामर्थ्य से भी परिचित कराया गया, जिसकी जरूरत आज अमेरिका को भी महसूस हो रही है। कंपनी के मुताबिक, अंबानी ने उन्हें रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स के अलावा निर्माणाधीन डेटा सेंटरों और चरणबद्ध तरीके से शुरू हो रही न्यू एनर्जी गीगा-फैक्ट्रियों की जानकारी दी। बातचीत में पारंपरिक ऊर्जा, नई ऊर्जा, तकनीकी सहयोग, मजबूत सप्लाई चेन और डेटा सेंटरों के लिए भरोसेमंद बिजली की जरूरत जैसे मुद्दे शामिल रहे। यानी चर्चा सिर्फ तेल खरीदने-बेचने की नहीं, बल्कि ऊर्जा और डिजिटल अर्थव्यवस्था के भविष्य की भी थी। इसे भी पढ़ें: मार्को रूबियो की भारत यात्रा के पीछे की रणनीतिक साझेदारी या दबाव की कूटनीति को बारीकी से समझिए आखिर जामनगर में ऐसा क्या है? हम आपको बता दें कि जामनगर रिफाइनरी कॉम्प्लेक्स की संयुक्त कच्चा तेल प्रसंस्करण क्षमता प्रतिदिन 14 लाख बैरल है। इसमें 1999 में शुरू हुई पहली रिफाइनरी और 2008 में चालू हुई निर्यात-केंद्रित दूसरी रिफाइनरी शामिल हैं। रिलायंस के मुताबिक, यह कॉम्प्लेक्स 216 से अधिक प्रकार के कच्चे तेल का प्रसंस्करण कर चुका है। इसकी सबसे बड़ी ताकत भारी और अधिक सल्फर वाले कच्चे तेल को भी उपयोगी पेट्रोलियम उत्पादों में बदलने की क्षमता है। यही क्षमता इसे अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से अहम बनाती है। वेनेजुएला का भारी कच्चा तेल दुनिया की हर रिफाइनरी आसानी से संसाधित नहीं कर सकती। लेकिन रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी इस मामले में विशिष्ट क्षमता रखती है। अमेरिका की वेनेजुएला-केंद्रित तेल रणनीति और वहां से कच्चे तेल की आपूर्ति बढ़ाने की कोशिशों के बीच रिलायंस एक महत्वपूर्ण संभावित साझेदार बनकर उभरी है। रुबियो ने साफ कहा कि रिलायंस के पास वेनेजुएला समेत पश्चिमी देशों में निकलने वाले भारी कच्चे तेल को रिफाइन करने की खास क्षमता है। यही वजह है कि अमेरिका रिलायंस के साथ मिलकर काम करने के नए रास्ते तलाश रहा है। अनुमानों के मुताबिक, अक्टूबर में रिलायंस हर दिन वेनेजुएला से करीब 3.5 लाख से 3.7 लाख बैरल कच्चा तेल मंगा सकती है। इससे साफ है कि वेनेजुएला के तेल को इस्तेमाल करने की अमेरिकी रणनीति में जामनगर रिफाइनरी की भूमिका बेहद अहम हो सकती है। अमेरिका की परेशानी और रिलायंस की अहमियत इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा पहलू अमेरिकी घरेलू अर्थव्यवस्था है। अमेरिका में डीजल की कीमतों में उछाल और ईंधन आपूर्ति को लेकर चिंताओं के बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन पर भारी दबाव है। नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले महंगे ईंधन का मुद्दा राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील है। रिलायंस इस तस्वीर में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जामनगर से डीजल, पेट्रोल और विमानन ईंधन सहित बड़ी मात्रा में रिफाइंड उत्पाद दुनिया भर में भेजे जाते हैं। रिपोर्टों के मुताबिक 2025 की पहली छमाही में जामनगर से 2.166 करोड़ टन रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात हुआ। इसमें 98.1 लाख टन डीजल, 61.4 लाख टन पेट्रोल और 20.6 लाख टन जेट ईंधन शामिल था। यूरोप इन उत्पादों का सबसे बड़ा क्षेत्रीय बाजार रहा। साथ ही अमेरिका के लिए रिलायंस की अहमियत सिर्फ उसकी रिफाइनरी तक सीमित नहीं है। भारत में अमेरिकी गैस की बढ़ती मांग भी इसकी बड़ी वजह है। भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर के मुताबिक, पिछले एक साल में भारत के कुल एलपीजी आयात में अमेरिकी गैस की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से बढ़कर 67 प्रतिशत हो गई है। यानी अब भारत को एलपीजी सप्लाई करने वाला अमेरिका सबसे बड़ा देश बन गया है। अमेरिका में अंबानी का निवेश भी चर्चा के केंद्र में इसके अलावा, रुबियो के दौरे के पीछे एक और बड़ा आर्थिक पहलू है। ट्रंप प्रशासन अमेरिका में औद्योगिक उत्पादन और रोजगार वापस लाने की नीति को अपनी प्रमुख उपलब्धियों के रूप में पेश करता रहा है। इसी सिलसिले में टेक्सास के पोर्ट ऑफ ब्राउन्सविल में प्रस्तावित नई तेल रिफाइनरी में रिलायंस की भागीदारी को खास महत्व दिया जा रहा है। अमेरिका में करीब पांच दशकों बाद लगने जा रही इस प्रमुख नई रिफाइनरी पर लगभग 3 से 4 अरब डॉलर खर्च होने का अनुमान है। इसकी सालाना प्रसंस्करण क्षमता करीब 6 करोड़ बैरल अमेरिकी कच्चे तेल की होगी। रिलायंस ने इसके उत्पादन का बड़ा हिस्सा खरीदने के लिए 20 साल का समझौता किया है और इसके 2029 के आसपास परिचालन शुरू करने की उम्मीद है। रूस का तेल, यूक्रेन युद्ध और भारत पर अमेरिकी दबाव रिलायंस की अहमियत का तीसरा पहलू रूस-यूक्रेन युद्ध है। 2022 में युद्ध शुरू होने के बाद भारत रूसी तेल का बड़ा खरीदार बनकर उभरा और रिलायंस ने भी रूसी कच्चे तेल का आयात बढ़ाया। कंपनी के तेल स्रोतों में रूस की हिस्सेदारी 2022 से पहले लगभग 3 प्रतिशत थी, जो 2025 में बढ़कर करीब 50 प्रतिशत तक पहुंच गई। रूसी तेल खरीदने के मुद्दे पर ट्रंप प्रशासन ने भारत पर अतिरिक्त टैरिफ का दबाव बनाया। इसके बाद रिलायंस ने रूसी कच्चे तेल का आयात घटाया। रुबियो ने स्वीकार किया कि भारत अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता ला रहा है, लेकिन रूस से बड़ी मात्रा में तेल खरीदना तुरंत बंद करना आसान नहीं है। उन्होंने भारत को अमेरिका का महत्वपूर्ण साझेदार भी बताया। अमेरिकी मीडिया की नजर में यह दौरा क्यों खास है? उधर, अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय मीडिया इस दौरे को सिर्फ एक कारोबारी मुलाकात के तौर पर नहीं देख रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि रिलायंस अमेरिका के कई अहम हितों से जुड़ी हुई है। अमेरिका चाहता है कि भारत रूसी तेल पर अपनी निर्भरता कम करे, वेनेजुएला के तेल का ज्यादा इस्तेमाल हो, ईंधन की कीमतों पर काबू पाया जा सके और अमेरिकी कंपनियों में निवेश बढ़े। इन सभी मुद्दों पर रिलायंस की भूमिका अहम हो सकती है। अंबानी बनाम मस्क: अमेरिकी हितों की एक और पेचीदगी दिलचस्प बात यह है कि जहां ट्रंप प्रशासन रिलायंस के साथ ऊर्जा सहयोग बढ़ाने की संभावनाएं तलाश रहा है, वहीं ट्रंप के करीबी एलन मस्क का रिलायंस से टकराव भी सामने आया है। मस्क की कंपनी स्टारलिंक भारत में परिचालन लाइसेंस हासिल करने की कोशिश कर रही है। मस्क ने आरोप लगाया कि भारत में जियो को फायदा पहुंचाने के लिए स्टारलिंक के प्रवेश में बाधाएं डाली जा रही हैं। रिलायंस ने जवाब दिया कि उसे प्रतिस्पर्धा से कभी डर नहीं लगा और वह घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय निवेश एवं नवाचार का स्वागत करने वाले भारत में विकसित हुई है। देखा जाये तो यही विरोधाभास इस पूरे घटनाक्रम को और दिलचस्प बनाता है। अमेरिका के कारोबारी और राजनीतिक हित हर मुद्दे पर एक जैसे नहीं हैं, लेकिन ऊर्जा के मोर्चे पर रिलायंस की क्षमता वॉशिंगटन को उसके साथ बातचीत के लिए प्रेरित कर रही है। कुल मिलाकर देखें तो जामनगर में मार्को रुबियो का दौरा भारत की औद्योगिक ताकत और मुकेश अंबानी के कारोबारी सामर्थ्य का भी बड़ा संकेत है। दुनिया के सबसे ताकतवर देशों में शामिल अमेरिका के विदेश मंत्री का भारत आकर किसी उद्योगपति के साथ ऊर्जा और निवेश जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा करना अपने आप में खास है। इससे पता चलता है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में रिलायंस की क्षमता और जामनगर रिफाइनरी की अहमियत को अमेरिका भी गंभीरता से लेता है। रिलायंस ने भी अपने बयान में कहा है कि इस दौरे के दौरान पारंपरिक और नई ऊर्जा के क्षेत्र में कारोबारी साझेदारी की संभावनाओं, सस्ती और भरोसेमंद ऊर्जा आपूर्ति, आधुनिक तकनीक और मजबूत सप्लाई चेन पर चर्चा हुई। कंपनी ने अमेरिकी कंपनियों के साथ तकनीक, इंजीनियरिंग और आधुनिक विनिर्माण के क्षेत्र में सहयोग की संभावनाओं पर भी अपने विचार रखे। बहरहाल, जामनगर से निकला संदेश साफ है कि भारत की औद्योगिक ताकत और मुकेश अंबानी की कारोबारी क्षमता को अमेरिका भी नजरअंदाज नहीं कर सकता। अमेरिकी विदेश मंत्री का किसी भारतीय उद्योगपति से मिलने के लिए उसके औद्योगिक परिसर तक पहुंचना इस बात को रेखांकित करता है कि वैश्विक ऊर्जा की राजनीति में रिलायंस की भूमिका कितनी अहम हो गई है। यह सिर्फ अंबानी की कारोबारी सफलता की कहानी नहीं, बल्कि भारत की उस बढ़ती ताकत का भी संकेत है, जिसके साथ अमेरिका अपने ऊर्जा और आर्थिक हितों को जोड़कर देख रहा है। -नीरज कुमार दुबे
विजयादशमी पर सनातन विजय व राष्ट्र को नशामुक्त करने का संकल्प
असत्य पर सत्य की विजय का महापर्व विजयादशमी रावण के पुतलों के दहन के साथ धूमधाम से संपन्न हो चुका है। इस अवसर पर देशभर में भव्य कार्यक्रमों का आयोजन हुआ। इसी दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपना स्थापना दिवस मनाया। यह अवसर संकल्पों का अवसर भी रहा इनमें सबसे महत्वपूर्ण संकल्प गृहमंत्री अमित शाह ने पंजाब में लिया। गृहमंत्री ने दिसंबर 2029 तक पंजाब को नशे से मुक्ति दिलाने का संकल्प लिया। यह एक देशव्यापी संकल्प है क्योंकि आज केवल पंजाब में ही नहीं अपितु अन्य प्रान्तों के युवाओं को भी नशे की लत में झोंका जा रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विजयादशमी कार्यक्रम को सर संघचालक डा. मोहन भागवत ने संबोधित किया। उन्होंने यूरोप के देशों मे हो रहे विरोध प्रदर्शनों, जेन-जी और एआई पर अपने विचार व्यक्त करते हुए नई पीढ़ी को एकजुटता का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि भारत की प्रगति के लिए एकजुटता बहुत जरूरी है। भारत विकास की राह पर अग्रसर है, अभी विकास पूरा नही हुआ है तो समस्याएं तो रहेंगी ही, समस्या के चलते आंदोलन होते ही हैं और लोकतंत्र मे आंदोलन होंगे ही किंतु आंदोलन समाधान के लिए होना चाहिए समस्या के लिए नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि हमें पश्चिम में चली आंधी से बचना ही होगा हमारी किसी भी कृति से समाज में अनबन, द्वेष या विभाजन पैदा नहीं होना चाहिए। डॉ. भागवत ने चेताया कि आंदोलन किसी दूसरे लक्ष्य से चले तो वह राजनीतिक साधन बन जाता है। इसका लाभ भारत को दबाने वाली शक्तियां लेती हैं। वे भारत को बांटकर दूसरा वर्ग बनाती हैं असंतोष और अराजकता भड़काती हैं। उन्होंने कहा कि पश्चिम से आंधी चली है जो हर तरह की व्यवस्था, भद्रता, मांगल्य और सांस्कृतिक मानवीय संस्कार से विरोध रखती है। फ्रांस, अल्बानिया, बांग्लादेश और नेपाल में क्या हुआ ये सब किया कराया उनका ही है उन लोगों का कहना है कि रिजीम चेंज करने से परिस्थिति बनती है लेकिन ऐसा कभी हुआ नहीं है पहले नहीं हुआ है और आज भी नहीं हुआ है। इसे भी पढ़ें: सरसंघचालक मोहन भागवत का संदेश: सत्ता परिवर्तन का भ्रम और राष्ट्र की आंतरिक स्थिरता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दशहरा उत्सव में भाग लेते हुए देश के दुश्मनों को स्पष्ट चेतावनी दी कि हम 2047 तक भारत को विकसित भारत बनाकर ही रहेंगे। प्रधानमंत्री ने वस्तुतः अपने नये नारे “हम करके रहेंगे“ को ही दोहराया और बता दिया है कि अंत में विजय हमारी ही होगी। प्रधानमंत्री ने देश के सामने आ रही वर्तमान चुनौतियों से मिलकर लड़ने का संदेश दिया और देश के सभी राजनैतिक दलों व समस्त संवैधानिक संस्थाओं से राष्ट्रहित में एकजुट हो जाने का आह्वान किया। प्रधानमंत्री ने देश के तीन दुश्मनों का उल्लेख करते हुए कहा कि देश के मान सम्मान को नुकसान पहुंचाने वाली ताकतें, समाज में फूट डालने वाले लोग और भारतीय समाज से नफरत करने वाली सोच ऐसी चुनौतिया हैं जिनका सामना देश को मिलकर करना होगा। उन्होंने देश की एकता व संस्कृति को मजबूत बनाए रखने पर बल दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भगवान राम के आदर्शों को याद करते हुए कहा कि रामराज्य में शासन का उद्देश्य जनकल्याण होता है। वहां भेदभाव की जगह न्याय और सभी को समान अवसर देना होता है। साथ ही गरीबों, वंचितों की सेवा करना भी है, सरकार और समाज दोनों का ध्यान इन लोगों की सहायता पर होना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी के संबोधन से आगामी समय में सरकार द्वारा लिए जाने वाले संभावित साहसिक निर्णयों व संकल्पों का संदेश भी निकल रहा है। संभव है सरकार संसद के माध्यम से अपने कुछ ऐतिहासिक संकल्पों को पूर्ण करने के लिए आगे बढ़े और इसी कारण से प्रधानमंत्री ने देशहित में सभी राजनीतिक दलों से एकजुटता का आह्वान किया है। सरकार परिसीमन बिल, महिला आरक्षण बिल तथा एक देश एक चुनाव व्यवस्था पर आगे बढ़ना चाहती है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि वर्तमान समस्याओं का अंत रामराज्य के माध्यम से ही संभव है। प्रधानमंत्री मोदी ने अयोध्या में दिए गए अपने संबोधन को स्मरण किया और प्रभु श्रीराम के गुणों व विशेषताओं का वर्णन करते हुए राम राज्य की स्थापना व उस समय लिए गए सभी संकल्पों को पूर्ण करने का भी स्मरण किया और कहा कि “अंत में विजय हमारी ही होगी।“ उन्होंने कहा कि आज देश का जन-मन अधर्म पर धर्म की जीत का उद्घोष कर रहा है भगवान राम ने रावण का अंत किया और मानवता को ऐसे आदर्श दिए जो इतिहास में अतुलनीय हैं। भगवान राम ने कठिनाईयों के बाद भी सत्य और नीति का मार्ग नहीं छोड़ने की सीख दी। उधर उत्तर प्रदेश में सभी की दृष्टि गोरखपुर में आयोजित विजयादशमी उत्सव के अवसर पर उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के संबोधन पर भी टिकी हुई थी। योगी जी ने अपनी चिर-परिचित शैली में सनातन की बात की। उन्होंने अयोध्या की रामलीला, दीपोत्सव और राम मंदिर निर्माण का उल्लेख करते हुए कहा कि जिन लोगों ने अयोध्या की रामलीला तक नहीं देखी वे भी वहां को लेकर दुष्प्रचार कर रहे हैं। योगी ने कहा कि राम मंदिर का निर्माण तय समय से पहले हो गया है। जो लोग कभी अयोध्या गए ही नहीं उन लोगों को भगवान श्रीराम के मंदिर का निर्माण कैसे बर्दाश्त होगा। उन्होंने समाज को जाति, क्षेत्र और भाषा के नाम पर बांटने वालों की तुलना रावण से की और कहा कि देश को कमजोर करने का प्रयास करने वाले लोगों में रावण की आत्मा आ गई है। उन्होंने कहा कि कालनेमि भी राम-राम कहता था उन्होंने लोगों से बजरंग बली की तरह सही और गलत की पहचान करने की अपील की। महाराष्ट्र से देवेन्द्र फड़नवीस, उत्तराखंड से पुष्कर सिंह धामी, असम से हिमंता बिस्वा सरमा और पश्चिम बंगाल से शुभेंदु अधिकारी के सन्देश और संकल्प भी चर्चा में रहे। - मृत्युंजय दीक्षित
मार्को रूबियो की भारत यात्रा के पीछे की रणनीतिक साझेदारी या दबाव की कूटनीति को बारीकी से समझिए
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो की भारत यात्रा का महत्त्व केवल भारत-अमेरिका संबंधों को मजबूत करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके केंद्र में व्यापार समझौता, रूस से भारत की तेल खरीद, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा सहयोग, अत्याधुनिक तकनीक और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति-संतुलन जैसे मुद्दे भी अहम हैं। साथ ही, यह यात्रा एक बुनियादी प्रश्न भी उठाती है, वह यह कि क्या भारत अमेरिका के साथ सहयोग करते हुए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर सकता है? क्योंकि अमेरिका की दुश्मनी से ज्यादा दोस्ती खतरनाक होती है! अमेरिकी नेताओं ने भारत और भारतीय पेशेवरों के लिए जिन निकृष्टम शब्दों का उपयोग किया, तरह तरह की प्रतिबंधक चालें चलीं, उसको भूलना बिल्कुल कठिन है। आखिर भारत के खिलाफ कभी पाकिस्तान, कभी बांग्लादेश और कभी नेपाल को भड़काने वाला अमेरिका भारत से कितनी दोस्ती निभा पाएगा, वह गुजश्ता वक्त ही बताएगा! यूं तो 20 अक्टूबर को विजयदशमी जैसे अहम दिनों में मुंबई में रूबियो और विदेश मंत्री एस. जयशंकर की वार्ता हुई। जहां अमेरिकी पक्ष ने व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की दिशा में प्रगति की बात कही। वहीं, दोनों देशों ने ऊर्जा, रक्षा और प्रौद्योगिकी सहयोग पर भी चर्चा की। हालांकि, बातचीत में प्रगति को किसी अंतिम समझौते के संपन्न होने के बराबर नहीं माना जाना चाहिए। इसे भी पढ़ें: Prabhasakshi NewsRoom: कभी Pakistan पर सख्त कार्रवाई चाहते थे Marco Rubio, अब उसी की पैरवी कर रहे हैं! सीनेटर से विदेश मंत्री बनते ही क्यों बदल गये सुर? अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो की भारत यात्रा के कुछ प्रमुख कूटनीतिक निहितार्थ इस प्रकार हैं:- पहला, व्यापार समझौता एक अवसर भी और एक दबाव भी: अमेरिका भारत के लिए एक बड़ा निर्यात बाजार है। दूसरी ओर, अमेरिकी टैरिफ नीति भारतीय उद्योगों, निर्यातकों और रोजगार को प्रभावित कर सकती है। अगस्त 2025 में व्यापार वार्ता टूटने के बाद अमेरिका ने भारतीय वस्तुओं पर कुछ मामलों में 50% तक टैरिफ लगाया था। लेकिन फरवरी 2026 में घोषित रूपरेखा के तहत यह दर घटाकर 18% की गई, लेकिन व्यापक व्यापार समझौते पर वार्ता अटकी रही। ऐसी परिस्थितियों में रूबियो ने 20 अक्टूबर को कहा कि समझौता लगभग अंतिम चरण में है, हालांकि अभी कुछ मुद्दे सुलझने बाकी हैं। ऐसे में भारत के लिए असली सवाल क्या है? क्या समझौते से भारतीय निर्यात, विनिर्माण और रोजगार को दीर्घकालीन लाभ मिलेगा, या भारत को अपने कृषि, डेयरी, डिजिटल कारोबार और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में असमान रियायतें देनी पड़ेंगी? दूसरा, रूसी तेल से जुड़ी भारत की ऊर्जा नीति पर अमेरिकी प्रभाव: भारत की रूस से रियायती कच्चा तेल खरीदने की नीति ऊर्जा लागत और आपूर्ति के विविधीकरण से जुड़ी है। अमेरिका चाहता है कि भारत अमेरिकी ऊर्जा की खरीद बढ़ाए और अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाए। अलबत्ता यहाँ दो अलग हित आमने-सामने हैं। जहां अमेरिका का हित अपने ऊर्जा निर्यात को बढ़ाना और रूस पर आर्थिक दबाव की नीति को आगे बढ़ाना है। वहीं, भारत का हित सस्ती तथा विश्वसनीय ऊर्जा उपलब्ध रखना, महँगाई नियंत्रित करना और अपनी विदेश नीति के विकल्प सुरक्षित रखना है। ऐसे में रूबियो ने अमेरिकी ऊर्जा व्यापार को भारत की आपूर्ति शृंखला विविधता से जोड़कर प्रस्तुत किया। वहीं, रूसी तेल पर संभावित प्रतिबंधों और शुल्क का प्रश्न दोनों देशों के संबंधों में तनाव का सबसे बड़ा कारण बना हुआ है, क्योंकि रूस भारत का भरोसेमंद साझीदार देश रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ में उसने भारत के पक्ष में कई बार वीटो का प्रयोग किया है। दरअसल, भारत के लिए चुनौती अमेरिकी तेल खरीदने या रूसी तेल खरीदने में से किसी एक को राजनीतिक निष्ठा का प्रमाण बनाने की नहीं, बल्कि लागत, उपलब्धता, राष्ट्रीय सुरक्षा और कूटनीतिक परिणामों के आधार पर निर्णय लेने की है। तीसरा, रक्षा सहयोग से तकनीक मिलेगी, लेकिन निर्भरता का जोखिम भी रहेगा: अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग से भारत को उन्नत तकनीक, खुफिया सहयोग, सैन्य उपकरणों और संयुक्त अनुसंधान के अवसर मिल सकते हैं। लेकिन अत्याधुनिक अमेरिकी प्रणालियों पर बहुत अधिक निर्भरता होने पर स्पेयर पार्ट्स, रखरखाव, सॉफ्टवेयर, निर्यात नियंत्रण और राजनीतिक शर्तों का प्रश्न उठ सकता है? लिहाजा भारत को तीन बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए: एक, रक्षा खरीद के साथ तकनीक हस्तांतरण और भारत में उत्पादन की ठोस व्यवस्था हो। दो, किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता के बजाय स्वदेशी क्षमता तथा विविध स्रोत विकसित हों। तीन, समझौते भारत की स्वतंत्र निर्णय क्षमता को सीमित न करें। इस दौरान रूबियो ने रक्षा और असैन्य परमाणु सहयोग में प्रगति का उल्लेख किया और अमेरिकी तकनीक तथा प्रणालियों की अधिक खरीद की वकालत की। यह सहयोग का अवसर है, लेकिन भारत को हर प्रस्ताव का मूल्यांकन उसकी लागत, तकनीकी शर्तों और दीर्घकालीन निर्भरता के आधार पर करना होगा। चौथा, हिंद-प्रशांत और चीन के दृष्टिगत अमेरिका व भारत का साझा हित, लेकिन समान प्राथमिकताएँ जरूरी नहीं: भारत और अमेरिका दोनों के लिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता, समुद्री व्यापार और क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन महत्त्वपूर्ण हैं। चीन की बढ़ती सामरिक भूमिका भी दोनों के बीच सहयोग का एक प्रमुख कारण है। फिर भी दोनों देशों की प्राथमिकताएँ हमेशा एक जैसी नहीं होतीं। जहां अमेरिका अपनी वैश्विक रणनीति, गठबंधनों और घरेलू राजनीतिक हितों के अनुसार नीतियाँ बदल सकता है। वहीं, भारत को चीन के साथ सीमा विवाद, पड़ोसी देशों के साथ संबंध और अपनी आर्थिक जरूरतों को स्वतंत्र रूप से देखना होता है। इसलिए भारत रूस सहित अन्य देशों के साथ भी संबंध बनाए रखना चाहता है। इसलिए भारत-अमेरिका सहयोग को किसी तीसरे देश के विरुद्ध स्थायी प्रतिबद्धता में बदलने के बजाय, साझा हितों पर आधारित रखना भारत की कूटनीतिक स्वायत्तता के अनुकूल होगा। पांचवां, मुंबई और जामनगर की पूंजीवादी आर्थिक कूटनीति का संकेत: रूबियो की यात्रा में मुंबई में सरकारी तथा कारोबारी वार्ताएँ और गुजरात के जामनगर में ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ा कार्यक्रम शामिल था। इससे स्पष्ट है कि यात्रा का आर्थिक पक्ष भी प्रमुख है। एक मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका भारत की रिलायंस इंडस्ट्रीज को वेनेजुएला के कच्चे तेल के अधिक प्रसंस्करण और संभावित उत्पादन संबंधी अवसरों से जोड़ने में रुचि रखता है। भारत के लिए इसका अर्थ केवल ऊर्जा आयात का स्रोत बदलना नहीं है, बल्कि उसे देखना होगा कि ऐसे सहयोग से भारतीय कंपनियों को क्या लाभ होगा, ऊर्जा आपूर्ति कितनी सुरक्षित होगी और किसी बाहरी नीति-परिवर्तन से निवेश या कारोबार पर क्या असर पड़ सकता है। सुलगता सवाल है कि क्या अमेरिका के अतीत के ट्रैक रिकॉर्ड के कारण उस पर भरोसा करना जोखिमपूर्ण है? इस प्रश्न का उत्तर अमेरिकी विदेश नीति के कुछ महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक उदाहरणों को देखकर अधिक स्पष्ट होता है। अमेरिका को न तो हर परिस्थिति में अविश्वसनीय मानना उचित है, न ही उसकी घोषणाओं को स्थायी प्रतिबद्धता समझना। कुछ प्रमुख उदाहरण पर गौर फरमाना उचित होगा। एक, 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद अमेरिकी प्रतिबंध: भारत के पोखरण-II परमाणु परीक्षणों के बाद अमेरिका ने भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए। इससे स्पष्ट हुआ कि परमाणु अप्रसार जैसे मुद्दों पर वाशिंगटन अपने नीतिगत उद्देश्यों के लिए भारत पर आर्थिक दबाव डाल सकता है। बाद के वर्षों में संबंधों में सुधार हुआ और असैन्य परमाणु सहयोग का रास्ता भी खुला। दो, पाकिस्तान के साथ अमेरिकी संबंध भारत के लिए चिंता की बात: शीतयुद्ध और अफगानिस्तान संघर्ष के अलग-अलग चरणों में अमेरिका ने पाकिस्तान के साथ सुरक्षा सहयोग किया। यह भारत की सुरक्षा संबंधी चिंताओं का विषय रहा है। हालांकि, अमेरिकी-पाकिस्तानी संबंधों में भी उतार-चढ़ाव आए हैं। इससे पता चलता है कि अमेरिकी नीतियाँ अक्सर अपने सामरिक उद्देश्यों के अनुसार बदलती रही हैं। तीन, भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौता: 2005–2008 के दौरान दोनों देशों ने असैन्य परमाणु सहयोग की दिशा में ऐतिहासिक प्रगति की। यह इस बात का उदाहरण है कि अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं और हितों के बावजूद, ठोस बातचीत तथा संस्थागत समझौतों से दीर्घकालीन सहयोग संभव है। चार, हाल के वर्षों में टैरिफ और रूसी तेल का विवाद: 2025–2026 में अमेरिकी टैरिफ और रूस से भारत की तेल खरीद को लेकर तनाव सामने आया। बाद में टैरिफ में कमी और रूसी तेल से संबंधित प्रतिबंधों पर अस्थायी राहत की दिशा में कदम भी दिखे। यह उदाहरण बताता है कि आर्थिक दबाव की नीति और व्यावहारिक समझौते एक ही संबंध में साथ-साथ चल सकते हैं। इन उदाहरणों से एक उपयोगी निष्कर्ष निकलता है, वह यह कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में भरोसा किसी देश की सद्भावना की धारणा से अधिक, उसके व्यवहार, समझौतों की शर्तों और हितों के मेल पर आधारित होना चाहिए। अमेरिका का ऐतिहासिक रिकॉर्ड सहयोग और दबाव—दोनों का रहा है। भारत को इस रिकॉर्ड को ध्यान में रखकर समझौते करने चाहिए, लेकिन अतीत के हर विवाद को भविष्य के हर सहयोग की विफलता का प्रमाण भी नहीं मानना चाहिए। सवाल है कि अमेरिका पर भरोसा करने के बजाय भारत को कौन-सी रणनीति अपनानी चाहिए? तो जवाब होगा कि भारत के सामने विकल्प केवल अमेरिका पर भरोसा करने या उससे दूरी बनाने के नहीं हैं। वह सहयोग भी कर सकता है और अपने जोखिमों को सीमित भी रख सकता है। क्षेत्रवार भारत के लिए व्यावहारिक दृष्टिकोण इस प्रकार है। व्यापार क्षेत्र में पारस्परिक लाभ, स्पष्ट शर्तें और विवाद समाधान की व्यवस्था होनी चाहिए। ऊर्जा क्षेत्र में अमेरिका, रूस तथा अन्य आपूर्तिकर्ताओं के बीच विविधता का उदाहरण बन सकता है। रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी उत्पादन, तकनीक हस्तांतरण और बहु-स्रोत खरीद महत्वपूर्ण नीति है। विदेश नीति के क्षेत्र में अमेरिका, रूस, यूरोप और अन्य साझेदारों के साथ स्वतंत्र संबंध विकसित कर सकता है। प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में घरेलू अनुसंधान, डेटा सुरक्षा और महत्त्वपूर्ण तकनीकों में आत्मनिर्भरता जरूरी है। कूटनीति के क्षेत्र में लिखित समझौते, नियमित समीक्षा और उल्लंघन की स्थिति में सुरक्षा उपाय नितांत जरूरी है। इन उपायों का उद्देश्य अमेरिका से दूरी बनाना नहीं, बल्कि किसी एक बाहरी शक्ति के नीतिगत बदलाव से भारत की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को कम करना है। सवाल है कि रूबियो की यात्रा के बाद भारत को किन संकेतों पर नजर रखनी चाहिए? तो जवाब होगा कि किसी राजनयिक यात्रा की सफलता का आकलन स्वागत, भाषणों या संयुक्त तस्वीरों से नहीं, बल्कि उसके बाद सामने आने वाले परिणामों से होना चाहिए। एक, व्यापार समझौता: क्या अंतिम समझौता वास्तव में संपन्न होता है? क्या भारतीय निर्यातकों को प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले उचित अवसर मिलते हैं? दो, रूसी तेल: क्या भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के अनुसार निर्णय ले सकता है, या उस पर खरीद घटाने के लिए अतिरिक्त दबाव आता है? तीन, रक्षा और तकनीक: क्या भारत को वास्तविक तकनीक, घरेलू उत्पादन और अनुसंधान के अवसर मिलते हैं? चार, पाकिस्तान और क्षेत्रीय सुरक्षा: क्या अमेरिका भारत की सुरक्षा संबंधी चिंताओं को समझते हुए संतुलित और स्पष्ट नीति अपनाता है? पांच, समझौतों का पालन: क्या अमेरिका की नीतियों में बदलाव होने पर भी पहले से तय प्रतिबद्धताएँ सुरक्षित रहती हैं? वस्तुत:, भारत का अमेरिका पर भरोसा हो, लेकिन राष्ट्रीय हितों की कीमत पर कतई नहीं। मार्को रूबियो की भारत यात्रा को एक साथ दो दृष्टियों से देखना चाहिए। पहली, भारत-अमेरिका सहयोग से व्यापार, ऊर्जा, रक्षा और प्रौद्योगिकी में वास्तविक लाभ हासिल किए जा सकते हैं। दूसरी, अमेरिकी सरकारों की नीतियाँ बदल सकती हैं और वाशिंगटन अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है—जैसा कि अन्य बड़ी शक्तियाँ भी करती हैं। इसलिए भारत की नीति का आधार न तो अमेरिका-विरोध होना चाहिए, न अमेरिका पर असीमित निर्भरता। उसे मुद्दा-आधारित सहयोग, रणनीतिक स्वायत्तता, विविध साझेदारियों और अपने राष्ट्रीय हितों की स्पष्ट रक्षा पर आधारित होना चाहिए। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अमेरिका से संबंध अच्छे हों, फिर भी भारत के पास स्वतंत्र निर्णय लेने के विकल्प बने रहें। किसी भी समझौते में भारत को यह देखना चाहिए कि लाभ और जोखिम क्या हैं, प्रतिबद्धताएँ कितनी स्पष्ट हैं और भविष्य में परिस्थितियाँ बदलने पर उसके पास कितनी गुंजाइश बचती है। यही कसौटी रूबियो की इस यात्रा और भविष्य के भारत-अमेरिका संबंधों के मूल्यांकन में उपयोगी होगी। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
सौरव दास और आशुतोष रांका की जमानत पर शायना एनसी का तंज, कहा-'जमानत कोई जीत नहीं, कोर्ट की सख्त शर्त है'
चुनौतियों के बावजूद बढ़ती हिंदी
बांग्ला संस्कृति का मूल स्वर सहिष्णुता, उदारता और समन्वय का रहा है। उन्नीसवीं सदी में बंगाल की धरती ने नवजागरण का स्वागत किया, जिसके मूल में ईश्वरचंद्र विद्यासागर और स्वामी विवेकानंद के विचार रहे। इस समन्वय की संस्कृति का ही असर रहा कि बंगाल की ही धरती से ना सिर्फ हिंदी पत्रकारिता का उद्भव हुआ, बल्कि उसकी जड़ें मजबूत भी हुईं। लेकिन वही बंगाल बदल गया है। बांग्ला संस्कृति समन्वय के सूत्रों को कहीं पीछे छोड़ती नजर आने लगी है। अगर ऐसा नहीं होता तो कोलकाता नगर निगम के उस पोस्टर पर विवाद नहीं होता, जिसमें बांग्ला और हिंदी भाषा के शब्दों का अनूठा और कलात्मक संगम था। बांग्ला संस्कृति के प्रतीक पर्व दुर्गा पूजा के दौर में भाषायी सौंदर्य और कला के अनूठे मेल पर राजनीति ने जब सवाल उठाया तो कोलकाता नगर निगम ने अपना पोस्टर ही वापस ले लिया। शायद निगम ने सोचा होगा कि उत्साह और उल्लास का स्वाद राजनीतिक कंकड़ से खराब ना हो। जिस पोस्टर पर विवाद हुआ, उसके बारे में जानना जरूरी है। यह भी जानना जरूरी है कि आखिर उसमें क्या रहा, जिससे पश्चिम बंगाल का विपक्षी दल तृणमूल कांग्रेस परेशान हो गया। दरअसल दुर्गा पूजा के दौरान दस से 21 अक्टूबर तक कोलकाता नगर निगम ने देश की पूर्व राजधानी वाले शहर में चलाए जा रहे सफाई अभियान के लिए एक विशेष पोस्टर जारी किया था। जिसमें लिखा था, 'मायेर कोरबो स्वच्छता से स्वागत' यानी मां दुर्गा का स्वागत स्वच्छता से करेंगे। जैसा कि शब्दों से पता चलता है, पोस्टर के अकेले वाक्य में बांग्ला और हिंदी शब्दों का अनूठा मेल पेश किया गया। विज्ञापन के भाषा की जिन्हें समझ है, उन्हें पता है कि बांग्ला और हिंदी के इस अनूठे मेल के जरिए जो संदेश दिया गया, वह कितना प्रभावी रहा। लेकिन तृणमूल कांग्रेस को इस वाक्य के तीन शब्द ‘स्वच्छता से स्वागत’ बंगाल में हिंदी थोपने का षडयंत्र नजर आने लगा। वैसे भी राज्य में अब भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। भाजपा की पहचान हिंदुत्व और हिंदी को लेकर रही है। इसलिए तृणमूल के लिए यह आरोप लगाना और उसे भाजपा के हिंदी वर्चस्ववाद के छद्म नैरेटिव से जोड़ना आसान रहा। लेकिन कोलकाता नगर निगम ने राजनीति से किनारा करना उचित समझा और इसे बदलने में उसने देर नहीं लगाई। पोस्टर के वाक्य को पूरी तरह बांग्ला कर दिया, 'स्वच्छतार साथे, मां के स्वागत जनाई' कर दिया। बांग्ला के इस वाक्य का भाव वही है, जो पहले वाक्य का रहा। अफसोस यह कि राजनीति की वजह से भाषाई मेल का अनूठापन गायब हो गया। इसे भी पढ़ें: आस्था के सैलाब में कब तक गुम होती रहेगी जिंदगियां? संविधान सभा में हिंदी को जितनी चुनौतियों का सामना नहीं करना पड़ा, उससे ज्यादा हिंदी इन दिनों वह चुनौतियों से जूझ रही है। वैसे तो तमिल जैसी क्षेत्रीय राजनीतिक अस्मिताएं हिंदी की राह में रोड़े डालती रही हैं। इसका साथ कभी कर्नाटक तो कभी महाराष्ट्र देता रहा है। यहां गौर करने की बात यह है कि भारतीय राष्ट्रीयता के अंतर्गत कई उपराष्ट्रीयताएं भी हैं, जिसे हम क्षेत्रीय अस्मिताओं के नाम से भी जानते हैं। भारतीय राष्ट्रीयता का मूल स्वर हिंदी के जरिए उद्घाटित होता है। जिसे हम हिंदी हार्टलैंड या हृदय प्रदेश कहते हैं, वहां राष्ट्रीयता पर अपवादस्वरूप ही सवाल उठते हैं। लेकिन उपराष्ट्रीयताएं अक्सर हिंदी पर हमले के बहाने राष्ट्रीयता को प्रकारांतर से चुनौती देती रहती हैं। तब उनका एक मात्र तर्क यही होता है कि हिंदी थोपी जा रही है। दिलचस्प यह है कि जिस भाषा ने करीब दो सौ साल तक देश को गुलाम बनाए रखा, उसे अपनाने में उपराष्ट्रीयताएं गर्व समझती हैं। संविधान सभा की आखिरी बैठक के दिन सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ने खुलेतौर पर स्वीकार किया था कि भाषा की समस्या का ठोस हल सभा नहीं निकाल पायी है। फिर भी उन्हें उम्मीद थी कि आने वाले दिनों में भाषा के मुद्दे पर देश गांधी की तरह सोचेगा। हालांकि महावीर प्रसाद त्यागी को ऐसी उम्मीद नहीं थी। इसीलिए उन्होंने अपने आखिरी भाषण में कहा था कि वे संविधान के पृष्ठों पर गांधीजी को खोज रहे हैं, लेकिन उन्हें गांधी नजर नहीं आए। पता नहीं, तृणमूल कांग्रेस को यह पता है या नहीं, लेकिन उसे जानना चाहिए कि आर्य समाज के प्रमुख ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश को हिंदी में लिखने के लिए बांग्ला माटी के सपूत केशवचंद्र सेन ने स्वामी दयानंद सरस्वती को प्रेरित किया था। भावी भारत की संपर्क या राष्ट्रभाषा बनने की क्षमता हिंदी में देखने वाले प्राथमिक लोगों में केशवचंद्र सेन भी रहे। कांग्रेस का अध्यक्ष बनने के बाद बंगाल की माटी के क्रांतिकारी सपूत सुभाष चंद्र बोस ने ना सिर्फ हिंदी सीखने के लिए शिक्षक रखा था, बल्कि उन्होंने कोलकाता नगर निगम के अध्यक्ष के नाते पिछली सदी के तीस के दशक में हिंदी को लेकर अर्थपूर्ण भाषण भी दिया था। हिंदी पर सवाल कभी-कभी कर्नाटक में भी उठता है और किंचित महाराष्ट्र में भी। लेकिन हिंदी को स्वाधीनता से पहले से ही सबसे बड़ी चुनौती तमिलनाडु में मिलती रही है। हाल ही में तमिलनाडु के करूर और कोयंबटूर के सरकारी अस्पतालों में मरीजों को दी जाने वाली दवाओं के पर्चे के कवर पर तमिल और अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी में भी निर्देश छापे गए थे। जिसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर जारी करते हुए विपक्षी द्रमुक पार्टी के नेता टी.आर.बी. राजा ने सवाल उठाया कि क्या तमिलनाडु में चुपचाप 'तीन-भाषा नीति' लागू की जा चुकी है। हिंदी की ग्रंथि से प्रभावित तमिलनाडु राजनीति सवाल उठाए तो विवाद होना ही था। जब विवाद बढ़ा तो दोनों सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों ने मरीजों को दिए जाने वाले त्रिभाषी कवर का वितरण तत्काल रोक दिया और उसकी जगह तमिल और अंग्रेजी लिखी पर्चियां जारी कर दीं। तमिलनाडु में हाल ही में राजमार्ग के साइनबोर्ड पर हिंदी लिखे जाने को लेकर भी विवाद खड़ा किया गया। राज्य के तूतीकोरिन जिले के सत्तानकुलम-नाजरेथ राज्य राजमार्ग 93 पर हिंदी में जगहों का नाम लिखा जाना यहां की विपक्षी राजनीति को रास नहीं आया। जब विवाद बढ़ा तो दो सहायक इंजीनियरों भूमिनाथन और मुथु लक्ष्मी को निलंबित कर दिया गया। इतना ही नहीं, साइनबोर्ड से तत्काल हिंदी नामों को मिटा दिया गया। दरअसल, हाईवे पर लगे नए साइनबोर्ड में तमिल और अंग्रेजी के साथ कस्बों के नाम हिंदी में भी लिखे गए थे। हिंदी उस राज्य के लिए कितनी खतरनाक हो सकती है, जिसकी एक मंत्री एस कीर्तना ने मई में शपथ लेते ही हिंदी बोलकर लोगों का दिल जीत लिया था। तब उनका तर्क था कि हिंदी के जरिए वे अपने नेता यानी जोसेफ विजयन की नीतियों को व्यापक समुदाय तक पहुंचाना चाहती हैं। राजनीति के चलते भले ही कोलकाता नगर निगम और तमिलनाडु सरकार झुक गए हों, लेकिन देश की सहज संपर्क भाषा को चुनौती समझने वाले इन राज्यों की राजनीति को समझना होगा कि उनके विरोध के बावजूद हिंदी खुद बढ़ रही है। कोलकाता में पोस्टर तैयार करने वाले दिमाग और हाथों को हिंदी के प्रयोग के जरिए भाषायी चमत्कार करना कलात्मक लगता है तो यह हिंदी की ही जीत है। तमिलनाडु के वे इंजीनियर भी बधाई के पात्र हैं, जिन्होंने लीक पर चलने की बजाय राजमार्ग के पास के शहरों और कस्बों के नामों को देवनागरी में लिखना उचित समझा। चाहे पोस्टर तैयार करने वाला दिमाग हो या फिर कस्बों का नाम हिंदी में उकेरने वाले विचार, उनकी नजर में हिंदी कोई चुनौती नहीं, बल्कि भारतीय अभिव्यक्ति का विस्तार है। इसलिए उन हाथों और दिमागों का स्वागत किया जाना चाहिए। - उमेश चतुर्वेदी लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं
बिहार MLC चुनाव आज, 8 सीटों पर 150 उम्मीदवारों की किस्मत दांव पर
बिहार विधान परिषद (एमएलसी) की आठ सीटों के लिए प्रचार बुधवार शाम 5 बजे समाप्त हो गया। मतदान 23 अक्टूबर को सुबह 8 बजे से शाम 4 बजे तक होगा।
अदालतों के जरिए चुनाव रोकने की कोशिश कर रही है वाईएसआaरसीपी : चंद्रबाबू नायडू
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने वाईएसआर कांग्रेस पार्टी पर आरोप लगाया कि वह अदालतों का दरवाजा खटखटाकर चुनाव और विकास कार्यों को रोकने की कोशिश कर रही है।
आंध्र प्रदेश के साथ नए तनाव के बीच, ओडिशा के मंत्री ने कोटिया सीमा विवाद पर कार्रवाई का आश्वासन दिया
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अदालतों के जरिए चुनाव रोकने की कोशिश कर रही है वाईएसआरसीपी : चंद्रबाबू नायडू
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'सरकारी मदरसों में भी लागू हो एक जैसी नीति', सीएम धामी के फैसले पर वीएचपी प्रवक्ता विनोद बंसल
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नशे के खिलाफ मान सरकार ने नहीं की गंभीरता से कार्रवाई, केंद्र करेगा सख्त कार्रवाई : विजय सांपला
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जम्मू-कश्मीर में मेडिकल इंटर्न्स को बड़ी राहत, मासिक वजीफा बढ़कर 25,000 रुपए हुआ
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नक्सलवाद से मुक्त होकर विकास का नया अध्याय लिख रहा है छत्तीसगढ़ : विष्णुदेव साय
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Sourav Das-Ashutosh Ranka को बेल, Jantar Mantar पर नो एंट्री! क्या CJP आंदोलन पर लगा ब्रेक?
सपा घोषणापत्र जारी करने से पहले जनता के सामने अपना रिपोर्ट कार्ड पेश करे : भाजपा
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बर्नस्टीन : निफ्टी का टारगेट घटाकर 25,000 हुआ
मुंबई, ब्रोकरेज फर्म बर्नस्टीन ने निफ्टी के लिए इस साल के अंत तक का टारगेट प्राइस घटाकर 25,000 कर दिया है, जो कि पहले 26,000 था। इसकी वजह अमेरिका से ट्रेड डील पर अनिश्चितता और भारतीय इक्विटी की आय में सुधार को लेकर चिंताएं बने रहना है।
CJP नेताओं की रिहाई, कानूनी जंजाल में फंसेगा CJP? Vote Chori आंदोलन पर क्या होगा असर?
दोपहर करीब 1 बजकर 45 मिनट तक बाजार की तस्वीर पूरी तरह बदल गई थी। दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, सेंसेक्स अपने दिन के उच्चतम स्तर से 1,400.41 अंक फिसलकर 73,281.78 अंक पर आ गया। दूसरी ओर, निफ्टी भी अपने दिन के शिखर से 448.65 अंक नीचे आकर 22,672.25 अंक पर कारोबार करता दिखाई दिया।
दशहरा रैली में उद्धव और शिंदे की ताजा भिड़ंत ने बालासाहेब की विरासत की जंग को और भड़का दिया है
महाराष्ट्र की राजनीति में दशहरा पर्व सियासी शक्ति प्रदर्शन और एक-दूसरे पर हमले का बड़ा मौका भी है। मुंबई में इस बार भी यही नजारा दिखा। दादर के शिवाजी पार्क में उद्धव ठाकरे की हुंकार थी, तो गोरेगांव के नेस्को सेंटर में एकनाथ शिंदे का पलटवार था। दोनों नेता एक-दूसरे पर निशाना साध रहे थे, लेकिन उनकी असली नजर महाराष्ट्र की जनता पर थी, जिसे तय करना है कि बालासाहेब ठाकरे की राजनीतिक विरासत का असली वारिस कौन है। इस बार दोनों रैलियों में ‘रिजीम चेंज’ यानी सत्ता परिवर्तन का मुद्दा भी खास रहा। उद्धव ठाकरे ने केंद्र की भाजपा सरकार को हटाने और सत्ता बदलने की खुली हुंकार भरी। उन्होंने युवाओं के विरोध प्रदर्शनों और वोटर लिस्ट में कथित गड़बड़ियों का हवाला देते हुए सवाल उठाया कि जब लोगों को न्याय नहीं मिलेगा, तो वे सत्ता परिवर्तन की मांग क्यों न करें? जवाब में एकनाथ शिंदे ने तंज कसते हुए कहा कि सत्ता में कौन रहेगा, इसका फैसला जनता करती है। उन्होंने उद्धव को याद दिलाया कि उनकी अपनी पार्टी में भी सत्ता और नेतृत्व का बदलाव हो चुका है। दोनों के इन बयानों का सियासी मतलब यह है कि जहां उद्धव महाराष्ट्र की लड़ाई को केंद्र की भाजपा सरकार के खिलाफ व्यापक विपक्षी अभियान से जोड़ना चाहते हैं, वहीं शिंदे सत्ता परिवर्तन की मांग को जनता के फैसले के खिलाफ विपक्ष की बेचैनी बताकर खारिज करना चाहते हैं। साथ ही उद्धव और शिंदे की दशहरा रैली से जो तस्वीर उभरती है वह साफ बताती है कि यह मुकाबला अब महज दो नेताओं की निजी अदावत नहीं रह गया है। इसके केंद्र में हिंदुत्व की परिभाषा, मराठी अस्मिता, किसानों की बदहाली, चुनावी जनादेश और सत्ता की वैधता जैसे सवाल हैं। दोनों खेमे अपनी-अपनी कहानी सुना रहे हैं, लेकिन असली परीक्षा जनता की अदालत में होनी है। इसे भी पढ़ें: एकनाथ शिंदे का उद्धव ठाकरे पर तीखा हमला: 2019 का गठबंधन ‘जनादेश की डकैती’, ‘इंडिया’ गठबंधन को बताया रावण उद्धव ठाकरे का हमला देखा जाये तो शिवाजी पार्क उद्धव ठाकरे के लिए सिर्फ रैली का मैदान नहीं, राजनीतिक विरासत का प्रतीक है। यही वह जमीन है, जहां बालासाहेब ठाकरे ने शिवसेना की आक्रामक राजनीति को आवाज दी थी। उद्धव इसी विरासत के सहारे अपनी लड़ाई को आगे बढ़ा रहे हैं। उनका संदेश था कि शिवसेना की पहचान किसी चुनाव आयोग के फैसले, किसी सरकारी मुहर या सत्ता के गणित से तय नहीं होगी। उद्धव ने भाजपा के साथ अपने पुराने गठबंधन को बड़ी राजनीतिक भूल बताते हुए कहा कि उसके साथ 25 साल गंवा दिए। उन्होंने कहा कि भाजपा ने बालासाहेब के हिंदुत्व का इस्तेमाल किया और बाद में शिवसेना को ही किनारे कर दिया। यह हमला केवल भाजपा पर नहीं था; इसके जरिए उद्धव ने शिंदे खेमे पर भी सवाल उठाया कि सत्ता की मलाई के लिए शिवसेना की मूल राजनीतिक पहचान से समझौता किसने किया। उद्धव ने मतदाता सूची से कथित रूप से नाम हटाए जाने, संवैधानिक संस्थाओं और केंद्र सरकार की कार्यशैली को लेकर भी सवाल उठाए। युवा प्रदर्शनकारियों को उन्होंने अराजक तत्व नहीं, बल्कि बदलाव की मांग करने वाले क्रांतिकारी बताया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व पर निशाना साधते हुए उन्होंने सत्ता परिवर्तन की जरूरत का संदेश दिया। यानी उद्धव की रणनीति साफ है। शिंदे के पास सरकार हो सकती है, पार्टी का आधिकारिक नाम हो सकता है, विधानसभा में ज्यादा विधायक हो सकते हैं; लेकिन ठाकरे खेमे के पास वह राजनीतिक भावनात्मक पूंजी है, जिसे वह बालासाहेब की विरासत और मराठी अस्मिता के नाम पर भुनाना चाहता है। एकनाथ शिंदे का पलटवार उधर नेस्को सेंटर में एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे को उनके ही पुराने फैसलों के कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की। उनका तर्क था कि 2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के साथ चुनाव लड़कर बाद में कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ सरकार बनाना मतदाताओं के जनादेश के साथ विश्वासघात था। शिंदे ने इसे ही सबसे बड़ी ‘वोट चोरी’ करार दिया। देखा जाये तो यह एकनाथ शिंदे की सियासत का केंद्रीय तर्क है। वह उद्धव को याद दिलाना चाहते हैं कि सत्ता की राजनीति में नैतिकता का सवाल उठाने से पहले अपने पुराने फैसलों का हिसाब भी देना पड़ता है। उनके लिए 2022 में शिवसेना से बगावत करना पार्टी को बचाने की लड़ाई है, जबकि उद्धव के लिए वही घटना पार्टी तोड़ने और जनादेश की अवमानना का उदाहरण है। यानि एक ही घटना, परन्तु दो बिल्कुल उलटी व्याख्याएं! उद्धव कहते हैं कि शिवसेना को तोड़ा गया, शिंदे कहते हैं कि उन्होंने शिवसेना को उसकी मूल विचारधारा की ओर लौटाया। उद्धव के लिए शिंदे सत्ता के सहारे विरासत हथियाने वाले नेता हैं, तो शिंदे के लिए उद्धव कांग्रेस के साथ जाकर बालासाहेब की राजनीति से दूर चले गए नेता हैं। देखा जाये तो यही महाराष्ट्र की इस लड़ाई का सबसे दिलचस्प पहलू है। दोनों बालासाहेब का नाम लेते हैं, दोनों भगवे पर अपना दावा जताते हैं और दोनों अपने प्रतिद्वंद्वी को शिवसेना की मूल आत्मा से भटका हुआ बताते हैं। सवाल यह है कि बालासाहेब की विरासत का फैसला नारों से होगा, संगठन से, चुनावी नतीजों से या जनता के वोटों से? हम आपको यह भी बता दें कि इस बार की दशहरा रैलियों में किसानों का मुद्दा भी खूब उछला। महाराष्ट्र के सूखे और संकटग्रस्त किसानों की दुर्दशा ने दोनों नेताओं को एक-दूसरे पर हमला करने का मौका दिया। शिंदे ने किसानों के बीच जाकर मदद पहुंचाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि यह वक्त आरोप-प्रत्यारोप का नहीं, संकट में फंसे किसानों के साथ खड़े होने का है। उनकी ओर से किसानों के लिए राहत सामग्री पहुंचाने और जरूरतमंद परिवारों की मदद करने की बात भी सामने रखी गयी। उन्होंने उद्धव पर सवाल उठाया कि जब किसान परेशान हैं, तब केवल राजनीतिक प्रदर्शन करने से क्या हासिल होगा? वहीं उद्धव ने सरकार की राहत राशि और किसानों की वास्तविक जरूरतों को लेकर सवाल उठाए। उनके हमले का आशय यह था कि सरकार की घोषणाओं और किसानों के हाथ में पहुंचने वाली मदद के बीच बड़ा अंतर है। उन्होंने शिंदे खेमे पर भी निशाना साधा और राजनीतिक बगावत के लिए कथित तौर पर दिए गए पैसों की तुलना किसानों को मिलने वाली छोटी राहत से की। देखा जाये तो महाराष्ट्र की राजनीति में किसान का सवाल कभी सिर्फ खेत और फसल तक सीमित नहीं रहता। वह सत्ता की साख, ग्रामीण नाराजगी और चुनावी समीकरणों से जुड़ जाता है। इसलिए दोनों नेताओं के लिए किसानों का जिक्र जरूरी था। लेकिन किसानों के लिए असली सवाल यह नहीं है कि किस मंच से ज्यादा जोरदार भाषण हुआ; सवाल यह है कि सूखती फसल, कर्ज और घरेलू खर्च के बीच उन्हें ठोस राहत कितनी मिली। इसमें कोई दो राय नहीं कि संगठन और सत्ता के गणित में शिंदे का पलड़ा भारी है। 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में उनकी शिवसेना ने 57 सीटें जीती थीं, जबकि उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) को 20 सीटें मिली थीं। चुनाव आयोग की मान्यता और सरकार में उनकी भागीदारी भी शिंदे को संस्थागत बढ़त देती है। इसके बावजूद शिवाजी पार्क का ऐतिहासिक मंच उद्धव के पास बना रहना बताता है कि राजनीतिक विरासत और चुनावी ताकत हमेशा एक ही तराजू में नहीं तौली जातीं। महाराष्ट्र की इस लड़ाई में दोनों नेताओं की कमजोरियां भी साफ हैं। जहां उद्धव को साबित करना है कि भावनात्मक समर्थन को चुनावी ताकत में बदला जा सकता है। वहीं शिंदे को साबित करना है कि पार्टी का नाम, विधायक और सत्ता होने के अलावा बालासाहेब की विरासत भी उन्हीं के साथ है। बहरहाल, दशहरा रैली में तीर खूब चले, लेकिन सियासी रावण अभी पूरी तरह गिरा नहीं है। महाराष्ट्र की राजनीति में अगला अध्याय इस बात से तय होगा कि जनता किसकी कहानी पर भरोसा करती है उद्धव की, जिन्होंने पार्टी तोड़े जाने का दर्द अपनी राजनीति का आधार बनाया है, या शिंदे की, जो इसे शिवसेना को उसकी मूल दिशा में लौटाने की लड़ाई बताते हैं। फिलहाल महाराष्ट्र में भगवा एक है, लेकिन उसके दावेदार दो हैं। एक कहता है, शिवसेना हमारी विरासत है; दूसरा कहता है, शिवसेना हमारी असली पहचान है। इसी खींचतान में महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे बड़ा सवाल गूंज रहा है कि बालासाहेब के नाम पर तालियां कौन बटोरेगा और जनता के वोट कौन जीतेगा? -नीरज कुमार दुबे
पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान सीपीआईएम का एक और बुक स्टॉल तोड़ा, भाजपा नेता गिरफ्तार
पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान सीपीआईएम का एक और बुक स्टॉल तोड़ा, भाजपा नेता गिरफ्तार
भारत : ऑटोमोबाइल सेक्टर में तीसरी तिमाही में 33 सौदे हुए
नई दिल्ली, भारत के ऑटोमोबाइल सेक्टर में 2026 की तीसरी तिमाही में 1.7 अरब डॉलर के 33 सौदे दर्ज किए गए। यह पिछली तिमाही के 71.7 करोड़ डॉलर के 20 सौदों से काफी अधिक है। इस वृद्धि के पीछे विलय एवं अधिग्रहण (एमएंडए), निजी पूंजी निवेश और सार्वजनिक बाजार से दोबारा धन जुटाने की गतिविधियों में तेजी प्रमुख कारण रहे।
कंपनी के ₹30,213 करोड़ के सार्वजनिक निर्गम (IPO) को निवेशकों की जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, बुधवार को इश्यू खुलने के महज 100 मिनट के भीतर यह पूरी तरह सब्सक्राइब हो गया। इसके साथ ही जियो प्लेटफॉर्म्स ने इश्यू के आकार, सब्सक्रिप्शन की रफ्तार और एंकर निवेशकों की मांग के मामले में नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं।
शेयर बाजार के मूल्यांकन में 100 अरब डॉलर की बढ़ोतरी
नई दिल्ली, भारत के तेजी से बढ़ते आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) इकोसिस्टम से सूचीबद्ध कंपनियों का मूल्यांकन अगले दो से तीन वर्षों में 50-100 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है।
केंद्र सरकारी बैंकों : एफडीआई 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 49 प्रतिशत करने पर विचार
नई दिल्ली, केंद्र सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की सीमा को मौजूदा 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 49 प्रतिशत करने पर विचार कर रही है। विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस संबंध में वित्त मंत्रालय ने एक प्रारूप कैबिनेट नोट तैयार किया है और प्रस्तावित बदलाव पर अन्य मंत्रालयों से राय मांगी है।
हिंदुत्व त्यागने का पछतावा, इसलिए बार-बार भगवा-भगवा कर रहे उद्धव ठाकरे : राम कदम
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रोहित पवार ने एकनाथ शिंदे पर साधा निशाना, कहा-मेला समर्पित करने के बजाय किसानों को प्रति हेक्टेयर एक लाख आर्थिक मदद दें
पहली छमाही में हुआ 80.7 अरब डॉलर का घाटा: एंथ्रोपिक
नई दिल्ली, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) कंपनी एंथ्रोपिक ने इस वर्ष की पहली छमाही में 80.7 अरब डॉलर का भारी शुद्ध घाटा दर्ज किया है।
बंगाल में बिना हिंसा चुनाव कराना बड़ी सफलता, अब नशे के खिलाफ होगी जंग: अमित शाह
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पिथौरागढ़ में आदि कैलाश अल्ट्रा मैराथन 2.0 की तैयारियों का डीएम ने लिया जायजा, 24 से 26 अक्टूबर तक होगा आयोजन
सच्चा व्यक्ति बलिदानी महापुरुषों के प्रति किए गए उपकार को कभी नहीं भूलते, पीएम मोदी ने साझा किया सुभाषित
31 मार्च 2026 को देश नक्सलवाद से मुक्त हुआ, 3,600 जवानों के बलिदान से मिली जीतः अमित शाह
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पुलिस स्मृति दिवस पर पीएम मोदी ने शहीद जवानों को दी श्रद्धांजलि, कहा - 'उनका साहस और बलिदान हमेशा रहेगा याद'
देश में सरकार बदलनी है तो चुनाव से बदलो, बांग्लादेश जैसी घेराबंदी नहीं चलेगी: सीएम सुवेंदु अधिकाaरी
पश्चिम बंगाल में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति को सामान्य करार देते हुए मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने कहा कि कुछ स्थानों पर डॉक्टरों की कमी के बावजूद पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर और मैनपावर के सहयोग से ट्रॉमा, इमरजेंसी, एडमिशन और एंबुलेंस सेवाएं निर्बाध रूप से संचालित हो रही हैं। लोकतंत्र पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि भारत में सरकार बदलनी है तो चुनाव के माध्यम से बदलनी चाहिए, यह बांग्लादेश नहीं है, जहां घेराबंदी कर सत्ता परिवर्तन हो जाए, देश प्रगति के पथ पर है और सभी को देशहित में एकजुट होना चाहिए।
टाइगर श्रॉफ पर फायरिंग से दहशत में फिल्म इंडस्ट्री, रेणुका शहाणे बोलीं- सख्त कार्रवाई जरूरी
मुंबई, 20 अक्टूबर (आईएएनएस)। अभिनेता टाइगर श्रॉफ से जुड़े फायरिंग मामले को लेकर फिल्म इंडस्ट्री और राजनीतिक जगत से प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। अभिनेत्री रेणुका शहाणे, कांग्रेस नेता राज बब्बर, शिवसेना (यूबीटी) के एमएलसी अंबादास दानवे और अभिनेता महेश ठाकुर ने घटना पर चिंता जताई। उन्होंने सुरक्षा व्यवस्था, कानून-व्यवस्था और अपराध पर सख्ती से कार्रवाई करने की जरूरत पर जोर दिया।
'2019 में भाजपा के नाम पर वोट लेकर जनादेश से किया धोखा', दशहरा रैली में एकनाथ शिंदे का उद्धव ठाकरे पर बड़ा हमला
रावण के साथ जला कॉकरोच का पुतला, कपिल मिश्रा बोले- दीमकों को हो रहा दर्द
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दशहरा पर वीएचपी प्रवक्ता विनोद बंसल की अपील, कहा- अराजक तत्वों से मुक्त हो देश
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दुर्ग और मुंबई में विजयादशमी पर पुलिस ने की शस्त्र पूजा, सुरक्षा का संकल्प दोहराया
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अखिलेश यादव को भारत नहीं फ्रांस दिख रहा, राहुल गांधी से मिल रही प्रेरणा: दिनेश प्रताप सिंह
अखिलेश यादव को भारत नहीं फ्रांस दिख रहा, राहुल गांधी से मिल रही प्रेरणा: दिनेश प्रताप सिंह
संजय राउत के 'सुप्रीम कोर्ट जलाने' वाले पोस्ट पर सियासी घमासान, भाजपा-शिवसेना ने बताया राष्ट्रविरोधी
संजय राउत के 'सुप्रीम कोर्ट जलाने' वाले पोस्ट पर सियासी घमासान, भाजपा-शिवसेना ने बताया राष्ट्रविरोधी
दिल्ली की रेस कोर्स मस्जिद को छह दिन में खाली करने का नोटिस, मीरवाइज उमर फारूक ने चिंता जताई
दिल्ली की रेस कोर्स मस्जिद को छह दिन में खाली करने का नोटिस, मीरवाइज उमर फारूक ने चिंता जताई
नई दिल्ली, दशहरा के अवसर पर आज घरेलू शेयर बाजारों में कारोबार बंद है, लेकिन निवेशकों और खरीदारों की नजर सोने-चांदी की कीमतों पर बनी हुई है। हाल के उतार-चढ़ाव के बावजूद सोना मजबूत स्तरों पर कारोबार कर रहा है और सोने का भाव 1.47 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम के ऊपर बना हुआ है।
अमित शाह के पंजाब दौरे पर कुलतार सिंह संधवां ने उठाए सवाल, कांग्रेस ने भी घेरा
अमित शाह के पंजाब दौरे पर कुलतार सिंह संधवां ने उठाए सवाल, कांग्रेस ने भी घेरा
राहुल गांधी की कथित वियतनाम यात्रा को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है। भाजपा इसे कांग्रेस की राजनीतिक प्राथमिकताओं से जोड़ रही है, जबकि कांग्रेस का कहना है कि विदेश यात्राओं को लेकर सवाल उठाना उचित नहीं है।
कर्नाटक: दशहरा पर्व पर भाजपा कार्यालय में की गई आयुध पूजा, बी.वाई. विजयेंद्र ने मां चामुंडेश्वरी से की प्रार्थना
शशि थरूर का किरेन रिजिजू को जवाब, बोले- भारत न बांग्लादेश है, न फ्रांस; SIR वापस लेने की मांग
किरेन रिजिजू के आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए थरूर ने कहा कि भारत की परिस्थितियों की तुलना फ्रांस या बांग्लादेश में हुई घटनाओं से नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा, “मेरा मानना है कि भारत बांग्लादेश नहीं है और भारत फ्रांस भी नहीं है। मुझे ये तुलना खास तौर पर प्रासंगिक नहीं लगती।”
'महाराष्ट्र में जंगलराज'... संजय राउत की बड़ी मांग, बोले- अब राष्ट्रपति शासन ही आखिरी रास्ता
शिवसेना (उद्धव ठाकरे) के सांसद संजय राउत ने सोमवार को महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग करते हुए आरोप लगाया कि बॉलीवुड अभिनेता टाइगर श्रॉफ की गाड़ी को निशाना बनाकर की गई हालिया गोलीबारी सहित कई चर्चित आपराधिक घटनाओं के बाद राज्य सरकार कानून-व्यवस्था बनाए रखने में विफल रही है
दिल्ली: नरेला में डीडीए एलआईजी फ्लैटों की ऑनलाइन बुकिंग मंगलवार से शुरू होगी
दिल्ली: नरेला में डीडीए एलआईजी फ्लैटों की ऑनलाइन बुकिंग मंगलवार से शुरू होगी
मानसा में परविंदर सिंह झोटा हत्याकांड को लेकर उबाल, इंसाफ कमेटी ने सरकार से सीएम और डीजीपी का इस्तीफा मांगा
केरल में कांग्रेस नेताओं को सार्वजनिक रूप से अपनी शिकायतें जाहिर न करने का निर्देश
केरल में कांग्रेस नेताओं को सार्वजनिक रूप से अपनी शिकायतें जाहिर न करने का निर्देश
सौरव दास और आशुतोष रांका की न्यायिक हिरासत बढ़ी, कोर्ट से नहीं मिली राहत
दिल्ली की एक विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट अदालत ने सोमवार को कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संयोजक सौरव दास और आशुतोष रांका की न्यायिक हिरासत दो दिन के लिए बढ़ा दी
Chai Par Sameeksha: CJP की हवा कैसे निकली? Rahul Gandhi की राजनीति Congress पर क्यों पड़ रही भारी?
प्रभासाक्षी की साप्ताहिक कार्यक्रम चाय पर समीक्षा में हमने इस सप्ताह कॉकरोच जनता पार्टी और कांग्रेस की रणनीति पर चर्चा की। हमेशा की तरह इस कार्यक्रम में मौजूद रहे प्रभासाक्षी के संपादक नीरज कुमार दुबे। कॉकरोच जनता पार्टी पर नीरज कुमार दुबे ने साफ तौर पर कहा कि जुलाई अगस्त के दौरान इन्होंने अच्छे दिन देखे लेकिन कांठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती। उन्होंने कहा कि वह लगातार ब्लैकमेल की रणनीति अपना रहे थे। लेकिन इस बार सरकार पूरी तरीके से तैयार थी और यही कारण है कि यह लोग जो दिल्ली में करना चाहते थे उसमें कामयाब नहीं हुए। उन्होंने कहा कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को ठीक से समझे बिना विदेशी दबाव बनाने की यह राजनीति आखिर क्यों चल रही है? क्या किसी राजनीतिक दल या किसी संगठन के आंदोलन के दौरान लगाये गये आरोपों को ही सच मानकर भारत को कटघरे में खड़ा कर देना इन सांसदों का नया शगल बन गया है? अगर इन्हें वाकई लोकतंत्र और नागरिकों की आजादी की इतनी चिंता है, तो यह चिंता हर देश के मामले में एक जैसी क्यों नहीं दिखती? आखिर भारत के मामले में ही इनका लोकतांत्रिक प्रेम क्यों उमड़ने लगता है? क्या भारत को नसीहत देना और उसके आंतरिक मामलों में दखल देना ही इनकी राजनीति का असली मकसद है? इसे भी पढ़ें: Congress में लौटे Ram Sharan Nautiyal, कुमारी शैलजा ने किया स्वागत, BJP पर साधा निशाना उन्होंने कहा कि जो लोग सत्ता पलटने का ख्वाब देख रहे हैं उन्हें भी समझना होगा कि भारत की ताकत किसी एक सरकार में नहीं, बल्कि उस करोड़ों भारतीयों के जनादेश में है, जिसने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की नींव मजबूत की है। इस देश को न विदेशी मंचों पर बैठकर भाषण देने वाले कुछ नेता चला सकते हैं, न सोशल मीडिया पर शोर मचाकर खुद को लोकतंत्र का सबसे बड़ा रखवाला बताने वाले लोग! भारत की छवि को झूठे आरोपों, आधी-अधूरी जानकारी और राजनीतिक एजेंडे के सहारे चोट पहुंचाने का सपना देखने वालों को समझना होगा कि भारत कोई कमजोर देश नहीं, जिसकी साख चंद बयानों से मिटा दी जाए। भारत पर उंगली उठाने से पहले अपने तथ्यों की जांच करो, आरोप लगाने से पहले सबूत जुटाओ और लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने से पहले यह समझो कि भारत का भविष्य तय करने का अधिकार भारतीय जनता के पास है, किसी विदेशी नेता या सोशल मीडिया के स्वयंभू विशेषज्ञ के पास नहीं! सवाल पूछने हैं तो पूछिए, लेकिन सवालों की आड़ में देश की संस्थाओं को बदनाम करने का ठेका मत लीजिए। क्योंकि भारत की असली ताकत तिरंगे के नीचे खड़े करोड़ों लोगों का विश्वास, स्वाभिमान और अपने देश का फैसला खुद करने का अधिकार है। कांग्रेस की रणनीति को लेकर नीरज दुबे ने साफ तौर पर कहा कि फिलहाल राहुल गांधी कॉकरोच जनता पार्टी को अपना कंपीटीटर मान रहे हैं और कॉकरोच जनता पार्टी की चर्चा ना हो इसलिए वह लगातार मैदान में बैठने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इंडिया ब्लॉक को लगता है कि वोट चोरी हो रही है तो सबसे पहले इंडिया ब्लॉक शासित राज्य सरकारों को इस्तीफा दे देना चाहिए। इसके अलावा नीरज दुबे ने यह भी कहा कि फिलहाल राहुल गांधी किसी ने किसी तरीके से चर्चा के केंद्र में रहना चाहते हैं और यही कारण है कि फिलहाल वह एक जूता दिखाने की कोशिश कर रही है।
विपक्ष अक्सर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अमेरिका के आगे झुकने का आरोप लगाता रहता है लेकिन जो परिदृश्य उभर कर सामने आ रहा है वह दर्शा रहा है कि भारत की ताकत और मोदी की कूटनीति के आगे अमेरिका को झुकना पड़ा है। चाहे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हों, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो हों, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस हों या फिर अमेरिकी उद्योगपति एलन मस्क हों, आप उनके ताजा बयानों को देखेंगे तो पाएंगे कि रातोंरात अचानक उनमें बड़ा परिवर्तन आ गया है। भारत पर रूस से तेल खरीदने को लेकर भारी टैरिफ लगाने की धमकी देने वाले डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को अब अपने कदम पीछे खींचने पड़े हैं। साथ ही अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने खुद माना है कि भारत के साथ होने वाला व्यापार समझौता इस फैसले की एक बड़ी वजह है। उन्होंने यहां तक कह दिया है कि भारत की अपनी जरूरतें हैं और वह एकदम से रूस से तेल खरीदना बंद नहीं कर सकता। रूस से तेल पर अमेरिका की अकड़ ढीली, भारत बना अहम फैक्टर हम आपको बता दें कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर अमेरिकी दबाव के बीच सबसे महत्वपूर्ण संकेत विदेश मंत्री मार्को रुबियो के बयान से आया है। उज्बेकिस्तान में पत्रकारों से बातचीत के दौरान रुबियो ने स्वीकार किया कि रूस के तेल पर प्रतिबंधों में छूट देने के फैसले में भारत के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौते को भी ध्यान में रखा गया है। उन्होंने कहा कि दोनों देश समझौते को अंतिम रूप देने के बेहद करीब हैं। यह बयान ऐसे समय आया है, जब ट्रंप प्रशासन ने रूस से संबंधित प्रतिबंधों के प्रभावों का आकलन करने के लिए 60 दिनों की राहत दी है। रुबियो के मुताबिक, अमेरिका को यह भी देखना होगा कि एक साथ प्रतिबंध और टैरिफ लगाने से वैश्विक अर्थव्यवस्था और खुद अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा? इसे भी पढ़ें: राजनीति नहीं चली तो कूटनीति में हाथ आजमाने चले Rahul Gandhi ! मगर Jaishankar पर हमला करते ही सामने आ गया Salman Khurshid का रिकॉर्ड यानी जिस रूस-तेल मुद्दे को भारत पर दबाव बनाने के हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा था, उसी पर अब वॉशिंगटन को अपने कदमों के परिणामों की चिंता सता रही है। मार्को रुबियो का यह कहना, ''भारत रूस से ऊर्जा आयात को एक झटके में बंद नहीं कर सकता। नई आपूर्ति व्यवस्था विकसित करने में समय लगता है और ऊर्जा की कीमतों में उछाल का सीधा असर आम लोगों तथा उद्योगों पर पड़ता है'', दर्शा रहा है कि मोदी की कूटनीति कितनी कामयाब रही। साथ ही रुबियो ने यह भी स्वीकार किया कि भारत अमेरिका का महत्वपूर्ण साझेदार है और उसकी ऊर्जा जरूरतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अमेरिकी महंगाई का दबाव, ट्रंप प्रशासन की बढ़ी मुश्किलें देखा जाये तो अमेरिका की इस बदली हुई रणनीति के पीछे घरेलू आर्थिक चिंताएं भी हैं। महंगे ईंधन का असर अमेरिकी उपभोक्ताओं पर पड़ रहा है। ऐसे माहौल में भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने से वैश्विक आपूर्ति और कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। आगामी मध्यावधि चुनावों से पहले महंगाई ट्रंप प्रशासन के लिए राजनीतिक चुनौती भी बन सकती है। दूसरी तरफ, भारत भी महंगाई के दबाव से अछूता नहीं है। ऐसे में भारत के लिए सस्ती और भरोसेमंद ऊर्जा आपूर्ति केवल व्यापार का सवाल नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता का भी मुद्दा है। नई दिल्ली का रुख स्पष्ट रहा है कि ऊर्जा आपूर्ति के स्रोत बाजार की परिस्थितियों और राष्ट्रीय जरूरतों के हिसाब से तय होंगे। जेडी वेंस की सफाई, एच-1बी विवाद पर नहीं थमा विवाद इसके साथ ही अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के तेवरों में भी नरमी आई है। एच-1बी वीजा कर्मचारियों को ‘फॉरेन इंडेंटर्ड सर्वेंट्स’ कहने के बाद उनकी टिप्पणी पर विवाद बढ़ा था। भारत के विदेश मंत्रालय ने उनके बयान को अनुचित और गहरा अपमानजनक बताया था। सीबीएस न्यूज के टाउन हॉल कार्यक्रम में वेंस ने कहा कि उनकी आलोचना वीजा कर्मचारियों की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था और कंपनियों की थी, जिनके जरिए विदेशी कर्मचारियों को ऐसी स्थिति में रखा जा सकता है जहां नौकरी जाने का डर उनके अधिकारों को कमजोर कर देता है। उन्होंने माना कि उनकी भाषा बेहतर हो सकती थी, लेकिन उन्होंने अपनी टिप्पणी वापस नहीं ली। उन्होंने अपनी भारतीय ससुराल का जिक्र करते हुए पत्नी उषा वेंस और उनके दक्षिण भारतीय माता-पिता के प्रति सम्मान भी जताया। एलन मस्क भी नरम पड़े, भारतीय नियमों के सामने चुनौती इसी बीच, एलन मस्क की स्टारलिंक और रिलायंस इंडस्ट्रीज के बीच उपग्रह इंटरनेट सेवाओं को लेकर चला विवाद भी नया मोड़ लेता दिखा। हम आपको याद दिला दें कि भारत में स्टारलिंक की संभावित एंट्री के बीच मस्क ने सोशल मीडिया पर भारतीय कारोबारी मुकेश अंबानी और बाजार की प्रतिस्पर्धा से जुड़े आरोप लगाए थे। रिलायंस ने जवाब में कहा कि वह उपग्रह संचार सेवाओं में प्रतिस्पर्धा का स्वागत करती है, लेकिन हर कंपनी को भारतीय कानूनों और नीतियों का पालन करना होगा। कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया कि जियो की अपनी उपग्रह सेवाएं भी मंजूरियों की प्रतीक्षा कर रही हैं। इसके बाद मस्क ने रिलायंस की प्रतिक्रिया पर ‘Much appreciated’ कहकर जवाब दिया। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो भारत के दौरे पर आ रहे हैं। वह मुंबई में भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात के अलावा गुजरात के जामनगर जाकर रिलायंस इंडस्ट्रीज की रिफाइनरी का अवलोकन भी करेंगे। खास बात यह है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज उन्हीं मुकेश अंबानी की है जिन्हें एलन मस्क ने भारत का प्रधानमंत्री बताया था। भारत का संदेश—रिश्ते बराबरी के, फैसले राष्ट्रीय हित में बहरहाल, रुबियो, वेंस और मस्क के ढीले पड़ते तेवर और ट्रंप का बदला रुख दर्शा रहे हैं कि दुनिया में भारत की कूटनीति कुछ भी हासिल कर सकती है। रूस से तेल खरीदने का सवाल हो, अमेरिका के साथ व्यापार समझौता हो, एच-1बी वीजा विवाद हो या स्टारलिंक की भारत में एंट्री का मुद्दा हो, इन सभी घटनाक्रमों के केंद्र में एक चीज स्पष्ट है कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों पर बाहरी दबाव कभी स्वीकार नहीं करेगा। भारत ऐसा साझेदार नहीं है जिसके सामने केवल दबाव बनाकर मनचाहा फैसला हासिल कर लिया जाए। नई दिल्ली का संदेश स्पष्ट है कि रिश्ते मजबूत होंगे, व्यापार भी बढ़ेगा, लेकिन फैसले भारत के राष्ट्रीय हितों के आधार पर ही होंगे। -नीरज कुमार दुबे
पश्चिम बंगाल में गूंजा 'श्यामा प्रसाद मुखर्जी अमर रहे' का नारा, बालुरघाट में प्रतिमा का अनावरण
पश्चिम बंगाल में गूंजा 'श्यामा प्रसाद मुखर्जी अमर रहे' का नारा, बालुरघाट में प्रतिमा का अनावरण
Tiger Shroff Firing Case: Lawrence Bishnoi पर सियासी संग्राम, हमले के बाद केंद्र पर तीखे सवाल
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस में हिंसा और लूटपाट की घटनाओं के बाद ट्रुथ सोशल पर जो टिप्पणी की है, उसने पूरी दुनिया में एक नई बहस छेड़ दी है। ट्रंप ने लिखा, “फ्रांस जल रहा है!” और चेतावनी दी है कि अलग दुनिया से आए लोगों के आव्रजन ने कभी महान रहे देश को संकट में डाल दिया है। उन्होंने फ्रांस से अपनी सीमाएं बंद करने और बहुत देर होने से पहले हालात पर नियंत्रण हासिल करने की अपील की है। ट्रंप की यह टिप्पणी भले ही राजनीतिक रूप से कठोर हो, लेकिन इसके पीछे उठ रहा बुनियादी सवाल बेहद महत्वपूर्ण है कि आखिर किसी राष्ट्र की सीमाओं, सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी किसकी है? और जब सरकारें इन चुनौतियों से निपटने में विफल होती हैं, तो उसकी कीमत कौन चुकाता है? फ्रांस के हालात से पूरी दुनिया स्तब्ध फ्रांस में 17 अक्टूबर को हुए प्रदर्शनों के दौरान जो तस्वीरें सामने आईं, वे किसी भी राष्ट्र के लिए चिंताजनक हैं। महंगाई, शिक्षा व्यवस्था और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़ी शिकायतों को लेकर सड़कों पर उतरे हजारों लोगों के बीच हिंसक समूहों ने दुकानों में लूटपाट की, वाहनों में आग लगाई और सरकारी इमारतों को निशाना बनाया। लिमोज शहर का ऐतिहासिक टाउन हॉल आगजनी में बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। पेरिस, मार्सेई और लियोन में भी हिंसा और तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आईं। फ्रांसीसी अधिकारियों ने कट्टरपंथी वामपंथी समूहों और उपद्रवियों को हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराया। इसे भी पढ़ें: राजनीति नहीं चली तो कूटनीति में हाथ आजमाने चले Rahul Gandhi ! मगर Jaishankar पर हमला करते ही सामने आ गया Salman Khurshid का रिकॉर्ड फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने राष्ट्र के नाम संबोधन में इस हिंसा पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि शहरों की सड़कों को इस तरह बर्बाद होते देखना असहनीय है। मैक्रों ने सुरक्षा बलों के समर्थन में खड़े होते हुए स्पष्ट किया कि जायज मांगों और हिंसा के बीच अंतर किया जाना चाहिए। उन्होंने प्रशासन को सार्वजनिक इमारतों और कारोबारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने, जरूरत पड़ने पर कुछ प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगाने तथा हिंसा करने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने के निर्देश दिए। उनका संदेश साफ था कि संवाद का अर्थ कमजोरी और लोकतांत्रिक अधिकारों का अर्थ दंड से मुक्ति नहीं है। देखा जाये तो एक बुनियादी बात समझने की जरूरत है। लोकतंत्र में विरोध करना अधिकार है, लेकिन हिंसा करके सरकार को झुकाना, सार्वजनिक संपत्ति नष्ट करना और आम नागरिकों के जीवन को संकट में डालना अधिकार नहीं हो सकता। यदि कोई समूह अपनी राजनीतिक या वैचारिक मांगों के लिए कानून को चुनौती देने लगे, तो सरकार का दायित्व है कि वह निर्णायक कार्रवाई करे। सरकार की लोकप्रियता और उसकी नीतियों पर सवाल उठ सकते हैं, लेकिन देश की कानून-व्यवस्था को बंधक नहीं बनाया जा सकता। इटली में भी बिगड़े हालात दूसरी ओर, यूरोप की यह बेचैनी अब केवल फ्रांस तक सीमित नहीं है। इटली में भी 17 और 18 अक्टूबर को महंगाई, कम वेतन और सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति के विरोध में प्रदर्शन हुए। मिलान में नकाबपोश प्रदर्शनकारियों ने दुकानों के शीशे तोड़े, आगजनी की और पुलिस पर पत्थर फेंके। पुलिस को आंसू गैस और पानी की बौछारों का इस्तेमाल करना पड़ा। बोलोन्या, ब्रेसिया, बर्गामो और ट्यूरिन में भी झड़पों की खबरें आईं। प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने हिंसा की निंदा करते हुए पुलिस के समर्थन में बयान दिया और स्थिति पर चर्चा के लिए सरकारी बैठक बुलाई। इटली की घटनाएं एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने लाती हैं। यूरोप में बढ़ती महंगाई, कम वेतन, महंगे आवास और सार्वजनिक सेवाओं की बदहाली ने लोगों में असंतोष पैदा किया है। इस असंतोष को केवल आव्रजन या किसी एक विचारधारा के खाते में डालना वास्तविक समस्याओं से आंखें मूंदना होगा। लेकिन जब जायज शिकायतों के बीच हिंसक समूह घुस आते हैं और विरोध को लूटपाट में बदल देते हैं, तो आम नागरिकों का नुकसान होता है और लोकतांत्रिक आंदोलन की विश्वसनीयता भी खत्म होने लगती है। फ्रांस और इटली दोनों की घटनाओं से यही सबक मिलता है कि सरकारों को जनता की समस्याओं का समाधान भी करना होगा और अराजकता फैलाने वालों के खिलाफ कठोरता भी दिखानी होगी। फ्रांस, इटली की घटनाओं का भारत के लिए निहितार्थ भारत के लिए इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू अवैध घुसपैठ और राष्ट्रीय सुरक्षा है। बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ तथा म्यांमार से आए रोहिंग्या समुदाय के लोगों की अनधिकृत मौजूदगी लंबे समय से सुरक्षा और प्रशासन से जुड़े सवाल खड़े करती रही है। भारत जैसे विशाल और संवेदनशील सीमाओं वाले देश के लिए यह कोई मामूली विषय नहीं है। सीमा पार से आने वाले प्रत्येक व्यक्ति की पहचान, नागरिकता और कानूनी स्थिति का सत्यापन होना चाहिए। जहां अवैध प्रवेश प्रमाणित हो, वहां कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ अपराध या सुरक्षा संबंधी गतिविधियों के ठोस प्रमाण हों, तो जांच और अभियोजन में कोई ढिलाई नहीं होनी चाहिए। मोदी-शाह ने खतरे को पहले ही भांप लिया था वैसे ट्रंप आज दुनिया को सीमाओं की सुरक्षा और अवैध घुसपैठ पर सख्ती का जो संदेश दे रहे हैं, उसे भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बहुत पहले ही भांप लिया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह इस चुनौती से निपटने के लिए पहले से ही कदम उठा रहे हैं। मोदी सरकार ने अवैध घुसपैठ और उससे जुड़े जनसांख्यिकीय बदलावों की पड़ताल के लिए उच्चस्तरीय समिति गठित की है, जिसकी अध्यक्षता सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति प्रकाश प्रभाकर नाओलेकर कर रहे हैं। गृह मंत्रालय ने 26 मई 2026 को इस समिति का गठन किया और 14 अक्टूबर को इसका आधिकारिक पोर्टल demography.mha.gov.in शुरू किया गया। इस पोर्टल के माध्यम से केंद्र और राज्य सरकारें, संस्थाएं तथा आम नागरिक जनसांख्यिकीय बदलावों, असामान्य बसावट और अवैध घुसपैठ से संबंधित जानकारी दे सकते हैं। समिति का उद्देश्य अवैध प्रवासियों की पहचान, हिरासत और निर्वासन के लिए कानूनी, निष्पक्ष और समयबद्ध व्यवस्था की सिफारिश करना भी है। इसके अलावा, अमित शाह सीमाओं की सुरक्षा के लिए स्मार्ट बॉर्डर परियोजना को आगे बढ़ा रहे हैं। इसके तहत ड्रोन, रडार, निगरानी कैमरे, वॉचटावर और अत्याधुनिक सेंसर जैसी तकनीकों को सीमा सुरक्षा व्यवस्था से जोड़ा जा रहा है। जुलाई 2026 में सिलीगुड़ी के झुमागाछ स्थित सीमा चौकी पर अमित शाह ने फेंसिंग में सेंध का पता लगाने वाली प्रणाली और दुर्गम इलाकों में घुसपैठ की चेतावनी देने वाली तकनीक का निरीक्षण भी किया था। सरकार का लक्ष्य केवल सीमा पार से होने वाली घुसपैठ रोकना नहीं, बल्कि देश के भीतर मौजूद अवैध प्रवासियों की पहचान और उनके मामलों का कानूनी निपटारा करना भी है। भारत में घुसपैठ का मुद्दा तब और गंभीर हो जाता है, जब राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषय को वोट बैंक की राजनीति की भेंट चढ़ा दिया जाता है। अवैध घुसपैठियों की पहचान और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई का विरोध करने वाले राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि सत्ता की लालसा में देश के भविष्य से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। आज फ्रांस और इटली में जो कुछ देखने को मिल रहा है, भारत को उससे सबक लेना है, वैसी परिस्थितियों का इंतजार नहीं करना है। भारत कोई प्रयोगशाला नहीं है, जहां राजनीतिक स्वार्थ के लिए देश की सामाजिक स्थिरता और आंतरिक सुरक्षा को दांव पर लगा दिया जाए। और चिंता तब और बढ़ जाती है, जब बांग्लादेश में हिंसक घटनाओं के बाद हुए सत्ता परिवर्तन से प्रेरणा लेने की बातें सामने आती हैं या खुलेआम यह कहा जाता है कि सत्ता पलटना ही मुख्य मकसद है। सवाल सीधा है कि भारत में सत्ता परिवर्तन का फैसला जनता करेगी या कुछ स्वयंभू नेता और दबाव समूह सड़कों पर शक्ति प्रदर्शन करके सरकार बदलने का रास्ता तय करेंगे? लोकतंत्र में सरकारें चुनाव से बनती और बदलती हैं, न कि हिंसा, अराजकता या किसी विदेशी घटनाक्रम से प्रेरित होकर पैदा किए गए दबाव से। मोदी सरकार और अमित शाह के सामने चुनौती केवल घुसपैठ रोकने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की भी है कि कानून का राज किसी राजनीतिक सौदेबाजी का मोहरा न बने। भारत की सीमाओं से लेकर लोकतांत्रिक संस्थाओं तक, देश की सुरक्षा और संप्रभुता से कोई समझौता नहीं होना चाहिए। बहरहाल, यह सबको स्पष्ट रहना चाहिए कि लोकतंत्र में सरकार बदलने का अधिकार जनता के पास है और इसका सबसे वैध रास्ता चुनाव है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन, सरकार की आलोचना और जवाबदेही की मांग लोकतंत्र का हिस्सा हैं। लेकिन यदि कोई संगठन या दबाव समूह हिंसा, धमकी या गैर-संवैधानिक तरीकों से सत्ता परिवर्तन कराने की कोशिश करता है, तो उसकी मंशा और गतिविधियों की जांच होनी चाहिए। आंदोलन की आड़ में कानून तोड़ने वालों को राजनीतिक संरक्षण कतई नहीं मिलना चाहिए। -नीरज कुमार दुबे
क्या कभी आत्मदैन्य से मुक्त हो सकेंगे हम?
कोई भी राष्ट्र जिस स्थिति में होता है, उसके लिए वह खुद जिम्मेदार होता है। जापानी जैसे हैं ,उनका देश वैसा ही है। इसी तरह की बात इजरायल, चीन और ईरान या किसी भी देश के बारे में हो सकती है। भारत भी वैसा ही है, जैसे हम हैं! ऐसे में कभी विदेशी आक्रांताओं,कभी मैकाले और कभी अपनी आजादी के बाद सत्ता में आए नायकों को कोसते हुए हम अपने कर्तव्यबोध से मुक्त हो जाते हैं। कोई भी राष्ट्र अपने नागरिकों की सामूहिक चेतना के आधार पर विकसित होता है। उसका इतिहासबोध, संस्कृतिबोध, मित्रबोध और शत्रुबोध मिलकर उसका निर्माण करते हैं। इनसे ही राष्ट्रीय मानस या राष्ट्रीय भाव बनता है। लंबे समय की गुलामी ने हमें आत्मदैन्य और आत्महीनता की ओर ढकेल दिया। भारतीय समाज के अपने पारंपरिक मूल्यों को छोड़कर हम शासक वर्गों द्वारा थोपी जा रही संस्कृति का अनुगमन करने लगे। हमें लगा हमारे अंग्रेज शासक, उनकी भाषा, पहनावा और उनकी संस्कृति-पंथ सबकुछ हमसे बेहतर है। उनके अनुयायी बनकर ही हमारी मुक्ति है। तत्कालीन समाज के श्रेष्ठ जन भी ब्रिटिश शासन में अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त कर भारत लौटते थे और खुद को आधा-अधूरा अंग्रेज साबित करने में जुट जाते थे। ऐसे में शेष समाज अपने श्रेष्ठ वर्ग का आचरण देख वैसा ही बनने का प्रयास करने लगा। देश में तमाम सर, रायबहादुर और साहेब बहादुर हमारे आदर्श बन गए। स्वामी विवेकानंद, लोकमान्य तिलक, महर्षि अरविन्द, महर्षि दयानंद, महात्मा गांधी, भारतेंदु हरिश्चंद्र, जयशंकर प्रसाद, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय,रवीन्द्र नाथ टैगोर के बहुत गहरे भारतबोध की प्रज्ञा ने हमें संभाला ,वरना हमारी दास्तां भी न होती दास्तानों में। हमारी हस्ती मिटने से कोई रोक नहीं सकता था। इसे भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट नहीं बनेगा नेताओं का अखाड़ा औसत भारतीय का आचरण अंग्रेजी शासनकाल में कैसा था, कहने की जरूरत नहीं है। हम कोहिनूर को छोड़कर कांच की ओर दौड़ रहे थे। अंग्रेजी भाषा और संस्कृति श्रेष्ठता की परिचायक बन गई। जब तक अपना कोई व्यक्ति या कार्य पश्चिम में स्थापित न हो जाए, उसे हम श्रेष्ठ मानने को तैयार नहीं थे। अंग्रेजी शासन और उसके बाद के आजादी के साल भी आत्मगौरव के अभाव में गुजरे साल बनकर रह गए। सत्ता के आतंक और सत्ता से जुड़े रहने के आकर्षण से हमने 'अपने जीवन मूल्यों का सनातन सिद्ध राजमार्ग' छोड़कर 'अंग्रेजियत की पगडंडियों' पर चलना प्रारंभ कर दिया, जो हमारा देखा-परखा रास्ता नहीं था। जाहिर है इस मार्ग पर हम नेतृत्वकर्ता नहीं, अनुगामी ही बन सकते थे। हमारे एकत्व को चोटिल करने के सचेतन प्रयास प्रारंभ हुए। भारतीय शिक्षा पद्धति को अंग्रेजी राज में कैसे नष्ट किया गया, इसे धर्मपाल जी को पढ़कर ही समझ में आएगा। 'स्व' के स्थान पर 'परकीय' विचारों की स्थापना के प्रयास खूब चले। हम एक 'राष्ट्र' नहीं हैं, बताया गया। अनेक स्थानीयताओं को राष्ट्रीयता के बरक्स स्थापित करने के अकादमिक प्रयास भी खूब चले, सफल भी हुए। कैसे और कितने विभाजन गढ़े जा सकते हैं, सारा जोर इसी पर था। भारतीय ज्ञान परंपरा पर चल रहे लोगों के आत्मविश्वास को समाप्त कर इस पूरे विचार को ही पोंगापंथ और पिछड़ेपन के रुप में आरोपित किया जाना फैशन बन गया। राजनीतिक परिवर्तन के कारण लंबे समय के बाद भारत फिर से खुद को खोज रहा है। अपनी जड़ों की तरफ वापसी करना चाहता है। जिसे 'विचारों की घर वापसी' कहकर संबोधित किया गया। जरूरी है कि भारत प्रेमी बौद्धिक वर्ग सत्य के सूर्य की स्थापना करने के लिए अध्यवसाय में जुट जाए। सिर्फ भावनात्मक प्रवचनों, कार्यक्रमों से आगे बढ़कर भ्रमों के निवारण का जतन करे। ऐसे कुशल बौद्धिक योद्धा ही अपनी ज्ञान परंपरा को सामने लाकर तथ्य, प्रमाणों के साथ उनकी युगानुकुल व्याख्या करेंगे। इसके लिए हमें लोकसंग्रही और विनम्र बनना पहली शर्त है। परंपरा,जीवन पद्धति और परिवार पर छाए संकटों के बीच ये प्रयत्न ही हमें आत्मशक्ति देंगे। दुनिया भर में चल रहे सभ्यतागत संघर्ष के बीच भारत को अपनी वृहत्तर भूमिका का निर्वहन करना है, क्योंकि हमारे पास दुनिया को देने के लिए समावेशी विचार है। जहां साझापन सौंदर्य की तरह है, विविधता और बहुलता का यहां उत्सव मनाया जाता है। हम पूजा में भी अनेक देवताओं की पूजा करते हैं। बहुलतावादी समाज होने कारण हमने मतभिन्नता का सदैव स्वागत किया। इसका उदाहरण हमारी 'शास्त्रार्थ' परंपरा है। इसलिए एक किताब,एक विचार, एक देवता को मानने और दूसरे विचार को समाप्त करने को आतुर विचार भारत को नहीं समझ सकते। जहां दुनिया के हर पंथ के लोग नैसर्गिक सहजता से सांस ले सकते हैं। यहां कोई श्रेष्ठ और निकृष्ट नहीं है। सब समान रूप से इस धरती मां की संतानें हैं। ऐसे में भारत केंद्रित विमर्श ही विश्व शांति का मार्ग है। 'स्वत्व' ही मार्ग है, जिस पर चलने के लिए हमें महात्मा गांधी, धर्मपाल, सीताराम गोयल, दीनदयाल उपाध्याय, वासुदेव शरण अग्रवाल, निर्मल वर्मा, विद्यानिवास मिश्र का अध्ययन मदद कर सकता है। इससे भारत के मूल विचार को समझने तथा भारत का मौलिक चिंतन स्थापित करने में मदद मिलती है। इससे ही ग़लत बातों का खंडन करते हुए हम सही विमर्श की स्थापना में सफल हो पाएंगे। भारतीय उदात्त जीवन मूल्यों के आधार पर संपूर्ण विश्व के लिए हमें ही वैश्विक बौद्धिक नेतृत्व देना होगा। जिसकी एक झलक हमें स्वामी विवेकानंद में दिखती है। ऐसे में ‘स्वबोध‘ का जागरण ही विकल्प है। पहले हमारे अपने विचार को भारत तो स्वीकार करे। वह आत्मदैन्य से मुक्त होकर 'भारत' को 'भारत' (इंडिया नहीं) की नजर से देखना प्रारंभ करे। वैचारिक साम्राज्यवाद से मुक्ति के लिए कई स्तरों पर कार्य करने की आवश्यकता है। इसे इस तरह से समझिए कि गोरा बनाना और अंग्रेजी सिखाना आज भी हिंदुस्तान में दो सबसे बड़े व्यापार हैं। यही उपनिवेशवादी मानसिकता है। इसके चलते ही हमारे गांव उजड़ते चले गए और संयुक्त परिवार बिखर गए। आज एकल परिवारों के नाते अलग तरह के सामाजिक-सांस्कृतिक संकट हमारे सामने हैं। जाति, भाषा, क्षेत्र,पंथ की लड़ाइयों को छोड़कर भी बहुत सी विभाजनकारी बातें हर दिन आज भी खोजी जाती हैं , फिर आख्यान (नरेटिव) गढ़े जाते हैं। भारत जिसे कभी 'इंडिया' बनाने की कोशिशें हुईं, उसे भारत बनाए रखने के लिए हमें ही आगे आना होगा। क्योंकि भारत का नष्ट होना, उस विचार का मिट जाना होगा, जिसने हमें वसुधैव कुटुम्बकम् का संदेश दिया। जिसने हमें राम, कृष्ण,शिव, बुद्ध, महावीर, गुरु नानक देव जैसे नायक दिए। जिसने सर्वे भवन्तु सुखिन: में अपनी मुक्ति देखी और लोक-मंगल जिसका मूलमंत्र रहा। - प्रो. संजय द्विवेदी (लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)
'भारत को कभी नहीं तोड़ सकतीं विरोधी ताकतें', पाकिस्तानी झंडों के साथ कांग्रेस के झंडे दिखने पर बोले किरेन रिजिजू
सुप्रीम कोर्ट नहीं बनेगा नेताओं का अखाड़ा
देश के सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि वह राजनीतिक दलों की सत्ता को लेकर चल रही मारामारी के बीच अखाड़ा नहीं बनेगा। सुप्रीम कोर्ट सिर्फ कायदे कानून और संविधान के दायरे में रह कर ही काम करेगा। दरअसल यह संदेश सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस के जरिए तमाम राजनीतिक दलों को दिया, जोकि सुप्रीम कोर्ट के जरिए राजनीतिक फायदा उठाने का प्रयास कर रहे हैं। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट के बारे में कोई गलतफहमी या अफवाह पहले, इससे पहले ही मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने अप्रत्याशित कदम उठाते हुए पत्रकार वार्ता आयोजित की। सीजेआई ने यह कदम इसलिए उठाया कि नेता कहीं बात का बतंगड़ नहीं बना दे और उसमें सुप्रीम कोर्ट को इसमें नहीं घसीट लें। इसे भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट के आवश्यक न्यायिक फैसलों के उजाले लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधान न्यायाधीश को पत्र लिखकर मुलाकात का समय मांगा था कि वे उन्हें एक ज्ञापन सौंपना चाहते थे, जिसमें 'वोट चोरी' रोकने, मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे, मतदाता सूची के एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) को रोकने और पुन: मतपत्र प्रणाली पर लौटने की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने यह मांग यह कहते हुए ठुकरा दी, कि यदि सुनवाई चाहते हो तो रिट याचिका दायर करो। सीजेआई ने राहुल गांधी के आधिकारिक ईमेल के जवाब में कहा कि इस तरह की मुलाकात उचित नहीं होगी, क्योंकि जिन मुद्दों पर चर्चा की मांग की गई है, वे पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं। इसी के साथ सीजेआई ने दूरदर्शिता अपनाते हुए अगले ही दिन प्रेस कांफ्रेंस करके स्थिति स्पष्ट कर दी, ताकि राजनीतिक दल उसकी बातों का गलत मतलब नहीं निकाल पाएं और सुप्रीम कोर्ट को राजनीतिक विवाद में नहीं घसीट सकें। सीजेआई सूर्यकांत ने यह भी स्पष्ट किया कि संवैधानिक व्यवस्था के तहत सुप्रीम कोर्ट, प्रशासनिक स्तर पर सरकार के कामकाज में दखल नहीं दे सकता, हालांकि नेताओं को अपने मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायिक पक्ष में अदालत का दरवाजा खटखटाने की छूट है। सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में एक दो बार ही ऐसा हुआ है, जब सुप्रीम कोर्ट की तरफ से मीडिया के जरिए कोई जानकारी दी गई है, वरना तो मीडिया ही सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और सुनवाई की जानकारी देता है। भारतीय सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में जजों द्वारा मीडिया से सीधे संवाद करने या प्रेस कॉन्फ्रेंस करने का सबसे चर्चित मौका 12 जनवरी 2018 को आया था। सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ न्यायाधीशों—जस्टिस जे. चेलामेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन बी. लोकूर और जस्टिस कुरियन जोसेफ ने एक ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। भारतीय न्यायिक इतिहास में यह पहला अवसर था जब वर्तमान जजों ने इस तरह मीडिया को संबोधित किया था। इन जजों ने तब के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) दीपक मिश्रा के खिलाफ रोस्टर और प्रशासनिक कामकाज को लेकर सार्वजनिक सवाल उठाए थे। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट अपनी अधिकांश जानकारी और फैसले आधिकारिक प्रेस विज्ञप्तियों अपनी वेबसाइट और सुनवाई के जरिए ही साझा करता है। हाल के दौर में अदालत ने न्यायिक कार्यवाही के लाइव-स्ट्रीमिंग और उसके डिजिटल क्लिप्स के कमर्शियल इस्तेमाल को लेकर भी कड़े नियम तय किए हैं। सीजेआई सूर्यकांत ने मीडिया के सामने स्पष्ट किया था कि मुझे कल बैठक के अनुरोध के संबंध में एक पत्र मिला था। मैंने कल रात ही उसका जवाब दे दिया था, जिसमें उन कारणों का उल्लेख किया गया था कि मैं क्यों नहीं मिल पाऊंगा? सीजेाई ने आगे कहा, सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे सभी के लिए खुले हैं। किसी भी आम नागरिक या निर्वाचित निकाय के सदस्य की किसी भी याचिका का स्वागत है। हर भारतीय नागरिक को अदालत का दरवाजा खटखटाने का अधिकार है। हम उनकी चिंताओं को सुनेंगे और कानून के तहत जो भी उचित होगा, वह करेंगे। सुप्रीम कोर्ट से स्थिति स्पष्ट होने के बाद इंडिया गठबंधन के दलों के पास अपनी मांगों को लेकर कानूनी प्रक्रिया अपनाने का एक ही रास्ता बचा था, वह था रिट याचिका के जरिए न्याय का तकाजा। इंडिया गठबंधन के नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट तक पैदल मार्च निकाला और रिट याचिका दायर की। जिसमें राहुल गांधी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव समेत 11 विपक्षी नेता याचिकाकर्ता हैं। इसमें चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पार्टी बनाया गया है। दरअसल इससे पहले सीजेआई से अकेले ही मुलाकात की मांग करके कांग्रेस ने यह साबित करने की कोशिाश की थी, इंडिया गठबंधन का नेतृत्व वही करती है। बाकी सब उसके पीछे हैं, किन्तु सीजेआई द्वारा मिलने से इंकार करने से कांग्रेस को अपने दाव में सफलता नहीं मिल सकी। जब सीजेआई ने मिलने से इंकार कर दिया और कानूनी तरीका अपनाने की सलाह दी, तब गठबंधन के बाकी नेताओं को भी साथ लेकर याचिका दायर की गई। सुप्रीम कोर्ट ने जाहिर कर दिया कि गैर कानूनी और गैर संवैधानिक तरीके से इंडिया गठबंधन के नेताओं के मंसूबे कामयाब नहीं होने देगा। जो भी करेगा संविधान के दायरे में करेगा, अन्यथा सुप्रीम कोर्ट की साख पर भी बट्टा लग सकता है। यह भी निश्चित है कि कांग्रेस और विपक्षी दलों को कोई खास सफलता सुप्रीम कोर्ट से हाथ नहीं लगने वाली, सिवाए एसआईआर में कुछ प्रशासनिक आदेश निर्देश के, क्यों कि ज्ञानेश कुमार को हटाया नहीं जा सकता, उन्हें संविधान का संरक्षण प्राप्त है। केवल संसद में महाभियोग के जरिए ही मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाया जा सकता है, वह इसलिए पूरा नहीं होगा कि संसद में मोदी सरकार का बहुमत है। इससे पहले भी राजनीतिक इरादों को पूरा करने के विपक्षी दलों के मंसूबों पर सुप्रीम कोर्ट पानी फेर चुका है। नवम्बर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने देश में चुनावों में धांधली का आरोप लगाने वाली एक जनहित याचिका को खारिज कर दिया था। पीठ ने कहा था कि जब आप चुनाव जीतते हैं, तो ईवीएम से छेड़छाड़ नहीं होती। जब आप चुनाव हार जाते हैं, तो छेड़छाड़ हो जाती है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर तीखा व्यंग्य करते हुए पूछा कि ये याचिका दायर करने संबंधित आपको शानदार विचार कैसे मिला? इसी तरह सुप्रीम कोर्ट ने अप्रेल 2023 में 14 विपक्षी दलों की सीबीआई और ईडी की कार्रवाई के लिए नेताओं के लिए अलग से गाइडलाइंस बनाने के निर्देश देने से इंकार कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि विपक्षी नेताओं के खिलाफ ईडी और सीबीआई के ज्यादा केस दिखाने वाले आंकड़ों के आधार पर केवल नेताओं के लिए गाइडलाइन की मांग नहीं कर सकते हैं। उन्हें अभियोजन से कोई छूट नहीं मिलती है। कोर्ट ने कहा कि नेता आम नागरिकों के बराबर ही होते हैं। इसके बाद कोर्ट ने याचिका को वापस लेने की अनुमति दे दी। राजनीतिक दलों के मामले में दूरी बनाए रखने के सुप्रीम कोर्ट के नजरिए से साफ है कि इंडिया गठबंधन को अपने राजनीतिक मुद्दों की लड़ाई जनता की अदालत में लड़नी होगी। सत्ता किसे देनी है और किसे नहीं, इसका फैसला मतदाता ही करेंगे। - योगेन्द्र योगी
'हे देवेश्वरी! आप भक्तों की संकटों से रक्षा करती हैं', पीएम मोदी ने मां सिद्धिदात्री से की मंगलकामना
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गुजरात: सीएम भूपेंद्र पटेल ने महाअष्टमी पर अंबाजी मंदिर का दौरा किया, नवरात्रि की तैयारियों का लिया जायजा
'आरएसएस को राजनीतिक चश्मे से नहीं, सेवा कार्यों से समझें', 'हंड्रेड ईयर्स यंग' की लेखिका रश्मि सामंत
'आरएसएस को राजनीतिक चश्मे से नहीं, सेवा कार्यों से समझें', 'हंड्रेड ईयर्स यंग' की लेखिका रश्मि सामंत
'जानबूझकर देश का माहौल खराब कर रहे'; अभिजीत दिपके की सशर्त जमानत पर भाजपा
'जानबूझकर देश का माहौल खराब कर रहे'; अभिजीत दिपके की सशर्त जमानत पर भाजपा
वोट चोरी की प्लानिंग मोदी, संचालन अमित शाह और लागू ज्ञानेश कुमार करते हैं: राहुल गांधी
गोवा की 'गोय राखण यात्रा' में राहुल गांधी ने कहा, मेरे ऊपर 45 से ज्यादा अवमानना केस हैं। लेकिन जब मैं कहता हूं- नरेंद्र मोदी 'वोट चोरी' करते हैं, तब मेरे ऊपर कोई केस नहीं करता। अगर ये केस लग गया तो मामला क़ानूनी हो जाएगा, जिसमें ये उलझ जाएंगे।
कोलकाता दुर्गा पूजा पंडाल में भगदड़ पर भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन ने जताया दुख, कहा-'बंगाल के लोगों के साथ मजबूती से खड़े'
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने दी चेतावनी
वाशिंगटन, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की नीति-निर्धारक समिति ने चेतावनी दी है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को युद्धों, व्यापारिक तनावों, ऊर्जा आपूर्ति में बाधाओं और बढ़ते कर्ज से जुड़े जोखिमों का सामना करना पड़ रहा है।
अजय राय ने पिंडरा से विधानसभा चुनाव लड़ने का किया ऐलान, बोले- यह मेरा घर और परिवार है
अजय राय ने पिंडरा से विधानसभा चुनाव लड़ने का किया ऐलान, बोले- यह मेरा घर और परिवार है
बजट सत्र में पंजाबी, पहाड़ी और गोजरी को मिलेगी आधिकारिक मान्यता: सुरिंदर चौधरी
बजट सत्र में पंजाबी, पहाड़ी और गोजरी को मिलेगी आधिकारिक मान्यता: सुरिंदर चौधरी
जीतन राम मांझी ने अनंत सिंह के 'नौ हत्याओं' वाले बयान की जांच की मांग की
जीतन राम मांझी ने अनंत सिंह के 'नौ हत्याओं' वाले बयान की जांच की मांग की
पश्चिम बंगाल: मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तारी का डर, इंद्रनील सेन ने सुप्रीम कोर्ट का खटखटाया दरवाजा
उत्तराखंड में महानवमी पर सार्वजनिक अवकाश, धामी सरकार का बड़ा फैसला
उत्तराखंड में महानवमी पर सार्वजनिक अवकाश, धामी सरकार का बड़ा फैसला
जंतर-मंतर हिंसा: सुप्रीम कोर्ट की समिति ने प्रभावित लोगों से शिकायतें मांगीं
जंतर-मंतर हिंसा: सुप्रीम कोर्ट की समिति ने प्रभावित लोगों से शिकायतें मांगीं
शुभेन्दु अधिकारी के मुख्यमंत्री बनने के बाद पश्चिम बंगाल में इस बार दुर्गा पूजा महोत्सव की छटा कुछ अलग ही नजर आ रही है। भव्य पंडालों, रंग-बिरंगी रोशनी से जगमगाती सड़कों और बंगाल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती अनूठी कलात्मक प्रस्तुतियों ने दुर्गोत्सव को विशेष आकर्षण प्रदान किया है। मां दुर्गा की आराधना के साथ इस बार कई पंडालों में राष्ट्रगीत वंदे मातरम्, उसके रचयिता बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय, जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और भगवान श्रीराम से जुड़े विषय भी प्रमुखता से उभर रहे हैं। इसी उत्सवी माहौल के बीच केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह रविवार, 18 अक्टूबर को बंगाल के दौरे पर पहुंचेंगे। बेलूर मठ में दर्शन-पूजन से शुरू होकर ऐतिहासिक शोभाबाजार राजबाड़ी और कोलकाता के प्रमुख दुर्गा पूजा पंडालों तक उनका कार्यक्रम बंगाल की सांस्कृतिक जड़ों, आध्यात्मिक परंपराओं और दुर्गोत्सव की भव्यता से जुड़ने की पहल के रूप में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अमित शाह का दौरा सुबह 10:45 बजे हावड़ा स्थित बेलूर मठ में दर्शन-पूजन से शुरू होगा। इसके बाद सुबह 11:30 बजे वे बाली के देशबंधु क्लब दुर्गा पूजा पंडाल पहुंचेंगे। दोपहर एक बजे ऐतिहासिक शोभाबाजार राजबाड़ी में मां दुर्गा के दर्शन करेंगे और दोपहर 1:30 बजे दमदम दक्षिण के लेक टाउन स्थित श्रीभूमि दुर्गा पूजा पंडाल का दौरा करेंगे। इस कार्यक्रम में आध्यात्मिक परंपरा, ऐतिहासिक पारिवारिक पूजा और आधुनिक सामुदायिक उत्सवों के विविध स्वरूपों को स्थान दिया गया है। इसे भी पढ़ें: Kolkata के Durga Puja पंडालों में राम मंदिर और Vande Mataram की थीम पर उमड़ी भीड़ बेलूर मठ से राजबाड़ी तक, बंगाल की सांस्कृतिक विरासत पर जोर बेलूर मठ का चयन इस दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि यह स्वामी विवेकानंद की आध्यात्मिक और वैचारिक विरासत से जुड़ा प्रमुख केंद्र है। देखा जाये तो बंगाल की पहचान केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें साहित्य, दर्शन, सामाजिक सुधार और आध्यात्मिक चिंतन की भी गहरी परंपरा रही है। इसके बाद शोभाबाजार राजबाड़ी का अमित शाह का दौरा बंगाल की ऐतिहासिक बोनेदी बाड़ी पूजा यानी प्रतिष्ठित पारिवारिक दुर्गा पूजा की परंपरा से जुड़ने का अवसर देगा। हम आपको बता दें कि बंगाल में दुर्गोत्सव का इतिहास समय के साथ व्यापक सामाजिक भागीदारी की कहानी भी कहता है। कभी संपन्न और प्रभावशाली परिवारों की राजबाड़ियों तक सीमित रहने वाली पूजा धीरे-धीरे बारोवारी और सार्वजनिक पूजा के माध्यम से आम लोगों के बड़े उत्सव में बदल गई। सामुदायिक पंडालों ने दुर्गा पूजा को अधिक व्यापक सामाजिक स्वरूप दिया। आज यही उत्सव बंगाल की सामूहिक चेतना, कलात्मक प्रतिभा और सामाजिक सहभागिता का प्रतीक बन चुका है। वंदे मातरम् से श्यामा प्रसाद मुखर्जी तक, पंडालों में राष्ट्रभाव की झलक हम आपको बता दें कि इस वर्ष कोलकाता के कई प्रमुख पूजा पंडालों में राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर विशेष प्रस्तुतियां देखने को मिल रही हैं। संतोष मित्र स्क्वायर, 66 पल्ली, कालीघाट, कांकुड़गाछी मिलन मेला समिति और सोदपुर के बिजॉयपुर सार्वजनिन जैसे पूजा आयोजनों ने इस विषय को अपने पंडालों की परिकल्पना में शामिल किया है। संतोष मित्र स्क्वायर में इस बार ‘सनातनी चेतनाय वंदे मातरम्’ की थीम के तहत लाल किले की आकृति से प्रेरित पंडाल और रोशनी से सजे भारत के मानचित्र को आकर्षण का केंद्र बनाया गया है। वहीं, न्यू अलीपुर के सुरुचि संघ ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के 125वें जन्मवर्ष के अवसर पर ‘उत्स’ यानी उद्गम विषय के माध्यम से उनके जीवन को प्रदर्शित किया है। प्रतिमाओं, तस्वीरों और समाचार-पत्रों की कतरनों के जरिए उनके जीवन और योगदान को सामने लाने का प्रयास किया गया है। इन प्रस्तुतियों में पूजा समितियों की कलात्मक कल्पनाशीलता के साथ इतिहास और राष्ट्रभाव को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश भी दिखाई देती है। रंगों से सजी सड़कें, आकर्षक पंडाल और उत्सव का नया दृश्य साथ ही दुर्गा पूजा से पहले कोलकाता की सड़कों, पुलों और फ्लाईओवरों को भी रंगीन रूप दिया गया है। गड़ियाहाट और रेड रोड जैसे इलाकों में पीले, नारंगी, गुलाबी, हरे और लाल रंगों की पट्टियों के साथ पारंपरिक बंगाली अल्पना की कलाकृतियां उत्सव का वातावरण बना रही हैं। शहर की सजावट और पंडालों की भव्यता ने दुर्गोत्सव के दृश्यात्मक आकर्षण को और बढ़ाया है। हम आपको बता दें कि पश्चिम बंगाल में ‘नवपत्रिका’ के पारंपरिक स्नान के साथ दुर्गा पूजा की शुरुआत हुई। ‘नवपत्रिका’ का अर्थ नौ पौधों के समूह से है। दुर्गा पूजा आयोजकों ने साड़ी में लिपटी ‘नवपत्रिका’ को धार्मिक रीति-रिवाज के अनुसार स्नान कराने के लिए गंगा और अन्य नदियों तथा जलाशयों के तटों की ओर रुख किया। कोलकाता में सुबह से ही पंडालों में लोगों के आने का सिलसिला शुरू हो गया था। मौसम अनुकूल रहने के कारण बड़ी संख्या में लोग शहर में भव्य रूप से सजाए गए पूजा पंडालों को देखने के लिए निकले। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने इस मौके पर लोगों को शुभकामनाएं दीं, जबकि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य भी शहर के विभिन्न दुर्गा पूजा पंडालों में गये। इस वर्ष महा सप्तमी के अनुष्ठान दो दिन तक चलेंगे। सप्ताहांत होने के कारण त्योहार का उत्साह और बढ़ गया है। राजनीति से आगे, बंगाल की सांस्कृतिक पहचान की चुनौती देखा जाये तो भाजपा के लिए इस बार का दुर्गोत्सव केवल धार्मिक आयोजनों में भागीदारी का अवसर नहीं, बल्कि बंगाल के समाज और उसकी विशिष्ट सांस्कृतिक परंपराओं के साथ जुड़ाव मजबूत करने की भी कसौटी है। अमित शाह का बेलूर मठ और ऐतिहासिक पूजा स्थलों का प्रस्तावित दौरा इसी व्यापक संदर्भ में महत्वपूर्ण है। बंगाल की सांस्कृतिक पहचान बहुलतावादी रही है। यहां दुर्गा पूजा आस्था के साथ कला, साहित्य, सामाजिक सहभागिता और लोकजीवन का उत्सव भी है। फिलहाल, रंगों से सजी सड़कों, भव्य पंडालों, ऐतिहासिक विषयों और राष्ट्रभाव से जुड़ी प्रस्तुतियों के बीच बंगाल का दुर्गोत्सव एक बार फिर अपने विराट स्वरूप में सामने है। भाजपा शासन में आयोजित हो रहा यह पहला दुर्गा पूजा महोत्सव राजनीतिक दृष्टि से भले ही विशेष महत्व रखता हो, लेकिन इसकी सबसे बड़ी पहचान मां दुर्गा के प्रति श्रद्धा, बंगाल की कलात्मक प्रतिभा और जनभागीदारी की जीवंत परंपरा ही है। अमित शाह का दौरा इसी उत्सवी माहौल में सांस्कृतिक जुड़ाव का एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ने जा रहा है। साथ ही इस बार भाजपा सरकार की ओर से मिले सहयोग और समर्थन के चलते पूजा समितियों में भी उत्साह और संतोष का माहौल दिखाई दे रहा है। आयोजकों को उम्मीद है कि सरकारी सहयोग से दुर्गोत्सव और अधिक भव्य एवं व्यवस्थित रूप ले सकेगा। बहरहाल, हर हिंदू बिना किसी डर या बाधा के पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मां दुर्गा की पूजा कर पा रहा है, ऐसा माहौल बनाने में मिली सफलता भाजपा सरकार के लिए एक बड़ी उपलब्धि की तरह है। -नीरज कुमार दुबे
भीड़ और अवधि का ब्योरा जरूरी, तभी मिलती है सेंट्रल पार्क में आयोजन की अनुमति: एनडीएमसी अध्यक्ष
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Rahul Gandhi के तेवरों से हिली सत्ता, घबराई BJP! कब तक कुर्सी पर रहेंगे Gyanesh Kumar?
London में Dhruv Rathee और Washington में 6 अमेरिकी सांसदों ने थामी भारत विरोधी अभियान की कमान
भारत के अंदरूनी मामलों में टांग अड़ाने और दुनिया भर में भारत को कटघरे में खड़ा करने का खेल एक बार फिर शुरू हो गया है। अमेरिकी सांसद प्रमिला जयपाल, इल्हान उमर, जिम मैकगवर्न, रशीदा तलाइब, एलेनॉर होम्स नॉर्टन और जीसस गार्सिया ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो को चिट्ठी लिखकर मांग की है कि वे भारत दौरे पर छात्र प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई और कथित हिरासतों का मुद्दा उठाएं। यहां सवाल उठता है कि भारत को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने निकले इन सांसदों को आखिर किसने हक दिया कि वे हमारे देश के आंतरिक मामलों में दखल दें? भारत की समस्याओं पर इतनी चिंता दिखाने वाले इन नेताओं से यह भी पूछा जाना चाहिए कि उनकी यह चिंता चुनिंदा मुद्दों पर ही क्यों जागती है और भारत के मामले में वे हर बार उंगली उठाने के लिए सबसे आगे क्यों खड़े नजर आते हैं? साथ ही सवाल यह भी उठता है कि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र पर उंगली उठाने वाले इन जनप्रतिनिधियों की अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं और अंतरराष्ट्रीय आचरण की पड़ताल कौन करेगा? वैसे यह कोई पहला अवसर नहीं है जब इन अमेरिकी नेताओं ने भारत की नीतियों पर सवाल उठाए हों। प्रमिला जयपाल ने 2019 में भी जम्मू-कश्मीर में संचार प्रतिबंधों और हिरासतों को लेकर भारत से जवाब मांगा था। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने उस समय उनके आकलन को अनुचित बताते हुए उनसे मुलाकात करने तक में रुचि नहीं दिखाई थी। अप्रैल 2022 में इल्हान उमर के पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर के दौरे पर भारत ने कड़ी आपत्ति जताई थी और इसे देश की संप्रभुता से जुड़ा मामला बताया था। इल्हान उमर का तो अक्सर भारत विरोधी रवैया सामने आता ही रहता है। इसे भी पढ़ें: Dhruv Rathee ने 'वोट चोरी' के खिलाफ लंदन में विरोध प्रदर्शन की घोषणा की; कहा- अब 'अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आवाज उठाने' का समय आ गया है सवाल उठता है कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को ठीक से समझे बिना विदेशी दबाव बनाने की यह राजनीति आखिर क्यों चल रही है? क्या किसी राजनीतिक दल या किसी संगठन के आंदोलन के दौरान लगाये गये आरोपों को ही सच मानकर भारत को कटघरे में खड़ा कर देना इन सांसदों का नया शगल बन गया है? अगर इन्हें वाकई लोकतंत्र और नागरिकों की आजादी की इतनी चिंता है, तो यह चिंता हर देश के मामले में एक जैसी क्यों नहीं दिखती? आखिर भारत के मामले में ही इनका लोकतांत्रिक प्रेम क्यों उमड़ने लगता है? क्या भारत को नसीहत देना और उसके आंतरिक मामलों में दखल देना ही इनकी राजनीति का असली मकसद है? अब बात ध्रुव राठी की। जर्मनी में रहने वाले इस यूट्यूबर ने लंदन पहुंचकर पार्लियामेंट चौक में महात्मा गांधी की प्रतिमा के निकट 18 अक्टूबर को प्रदर्शन करने का आह्वान किया है। उन्होंने भारत में कथित ‘वोट चोरी’ के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने की बात कही है और विदेशों में लोगों से इस अभियान में शामिल होने का आग्रह किया है। यहां सवाल उठता है कि अगर ध्रुव राठी के पास वोट चोरी के सबूत थे तो वह उन्होंने अपने भारत दौरे के दौरान पुलिस या कोर्ट को क्यों नहीं दिये? क्यों वह वापस विदेश भाग गये? हर बात पर विदेशों में ढिंढोरा पीटना और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की चुनावी व्यवस्था को बदनाम करने की कोशिश करना आखिर किस बात का संकेत है? चुनावी प्रक्रिया से शिकायत होना अलग बात है, लेकिन अपनी राजनीतिक खुन्नस निकालने के लिए पूरी चुनाव व्यवस्था पर सवाल उठाना और दुनिया भर में भारत के लोकतंत्र की साख पर बट्टा लगाने की कोशिश करना अलग बात है। देखा जाये तो आरोप लगाना आसान है, लेकिन आरोपों को सबूतों के दम पर साबित करना ही असली कसौटी है! सवाल यह भी है कि ध्रुव राठी आखिर विदेशों में बैठकर भारत के खिलाफ इतना बड़ा अभियान किसके दम पर चला रहे हैं? लंदन में प्रदर्शन, विदेशी मंचों पर भारत को घेरने की कोशिश और देश की राजनीति को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने की मुहिम, क्या यह सब महज संयोग है, या इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है? विदेशी फंडिंग के आरोपों को झुठलाने वाले ध्रुव राठी को बताना चाहिए कि इस पूरे अभियान का पैसा कहां से आ रहा है, इसे कौन चला रहा है और इसके पीछे किसके हित जुड़े हैं? आखिर कौन है जो भारत की छवि को विदेशों में नुकसान पहुंचाने वाले ऐसे अभियानों को ताकत दे रहा है? साथ ही लंदन में भारत सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थन में भारतीयों का मैदान में उतरना उन लोगों के लिए करारा जवाब है, जो विदेशों में बैठकर भारत के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश करते हैं। उन्हें समझ लेना चाहिए कि विदेशों में रहने वाले भारतीय कोई उनके इशारे पर चलने वाली भीड़ नहीं हैं। इस देश से प्यार करने वाले लाखों भारतीय दुनिया के किसी भी कोने में हों, तिरंगा उठाना और अपनी सरकार के समर्थन में आवाज बुलंद करना जानते हैं। भारत के खिलाफ नारे लगाने वाले ही लोकतंत्र के ठेकेदार नहीं हैं; भारत के समर्थन में खड़े होने वालों को भी अपनी बात कहने का पूरा हक है। करोड़ों भारतीयों के वोट से बनी सरकार का फैसला विदेशों में बैठे कुछ लोगों के शोर-शराबे से नहीं बदला जा सकता। भारत किस दिशा में आगे बढ़ेगा, यह फैसला भारत की जनता करेगी, कोई विदेशी ताकत नहीं! इसके अलावा, यह भी बड़ी हैरानी की बात है कि संयुक्त राष्ट्र की संस्थाओं को भारत के मामलों में दखल देने की इतनी जल्दी रहती है कि वे किसी भी आरोप पर चिंता जताने से पहले पूरी सच्चाई जानने की जहमत तक नहीं उठातीं! 10 अक्टूबर को दिल्ली में प्रदर्शनों के दौरान हिरासतों की खबरों पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने चिंता जताई, तो भारत ने भी साफ-साफ जवाब दे दिया कि देश के आंतरिक मामलों में इस तरह की दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति में भी भारत ने इन टिप्पणियों पर कड़ा ऐतराज जताते हुए अपने संविधान, स्वतंत्र न्यायपालिका और स्वतंत्र प्रेस का हवाला दिया। सवाल यह है कि मानवाधिकारों की दुहाई देने वाली इन वैश्विक संस्थाओं को दुनिया के हर मामले में एक जैसी तत्परता क्यों नहीं दिखती? भारत के मामले में बिना पूरी तस्वीर समझे बयान देने की जल्दी और दूसरे मामलों में चुप्पी...आखिर यह दोहरा रवैया कब तक चलेगा? जब संस्थाएं चुनिंदा मुद्दों पर ही जागेंगी और अलग-अलग देशों के लिए अलग-अलग तराजू रखेंगी, तो उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठेंगे ही। यही रवैया उनकी विश्वसनीयता को कमजोर करता है और दुनिया भर में लोगों के मन में यह सवाल खड़ा करता है कि क्या ये संस्थाएं सचमुच मानवाधिकारों की रक्षा कर रही हैं या चुनिंदा राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने का जरिया बनती जा रही हैं? उधर, भारत सरकार ने साफ कर दिया है कि भारत के संविधान, लोकतांत्रिक व्यवस्था और संस्थाओं पर बिना पूरी जानकारी के उंगली उठाने वालों को मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा। भारत कोई ऐसा देश नहीं है कि कोई भी विदेशी संस्था या नेता उठे और बिना सोचे-समझे हमें लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने लगे! भारत के अपने कानून हैं, अपनी अदालतें हैं और अपना संवैधानिक ढांचा है। लिहाजा, भारत पर सवाल उठाने वालों को पहले तथ्यों की जांच करनी चाहिए, फिर बयानबाजी करनी चाहिए। भारत को बदनाम करने की कोशिश करने वालों को यह समझना होगा कि हर आरोप पर जवाब मिलेगा और तथ्यों के दम पर मिलेगा। बहरहाल, जो लोग सत्ता पलटने का ख्वाब देख रहे हैं उन्हें भी समझना होगा कि भारत की ताकत किसी एक सरकार में नहीं, बल्कि उस करोड़ों भारतीयों के जनादेश में है, जिसने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की नींव मजबूत की है। इस देश को न विदेशी मंचों पर बैठकर भाषण देने वाले कुछ नेता चला सकते हैं, न सोशल मीडिया पर शोर मचाकर खुद को लोकतंत्र का सबसे बड़ा रखवाला बताने वाले लोग! भारत की छवि को झूठे आरोपों, आधी-अधूरी जानकारी और राजनीतिक एजेंडे के सहारे चोट पहुंचाने का सपना देखने वालों को समझना होगा कि भारत कोई कमजोर देश नहीं, जिसकी साख चंद बयानों से मिटा दी जाए। भारत पर उंगली उठाने से पहले अपने तथ्यों की जांच करो, आरोप लगाने से पहले सबूत जुटाओ और लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने से पहले यह समझो कि भारत का भविष्य तय करने का अधिकार भारतीय जनता के पास है, किसी विदेशी नेता या सोशल मीडिया के स्वयंभू विशेषज्ञ के पास नहीं! सवाल पूछने हैं तो पूछिए, लेकिन सवालों की आड़ में देश की संस्थाओं को बदनाम करने का ठेका मत लीजिए। क्योंकि भारत की असली ताकत तिरंगे के नीचे खड़े करोड़ों लोगों का विश्वास, स्वाभिमान और अपने देश का फैसला खुद करने का अधिकार है। -नीरज कुमार दुबे
प्रधानमंत्री मोदी 25 अक्टूबर को करेंगे वाराणसी का दौरा, नमो घाट पर आयोजित एयर शो में होंगे शामिल
प्रधानमंत्री मोदी 25 अक्टूबर को करेंगे वाराणसी का दौरा, नमो घाट पर आयोजित एयर शो में होंगे शामिल
भारतीय शेयर बाजार में तेजी, एफआईआई फिर बने खरीदार
नई दिल्ली, विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) ने शुक्रवार को भारतीय शेयर बाजार में 1,166 करोड़ रुपए का इक्विटी में निवेश किया। इसकी वजह बाजार में तेजी लौटना था। यह जानकारी एनालिस्ट की ओर से शनिवार को दी गई।
'हिंदुस्तान न बांग्लादेश बन सकता और न पाकिस्तान, यहां अपनी संस्कृति', विपक्ष के प्रदर्शन पर बोले स्वतंत्र देव सिंह
सवालों के घेरे में हैं 'जेएनयू के क्रांतिकारियों' की 'चयनित चुप्पियां'
शिक्षा केंद्रों की कलंक कथाएं अनंत हैं। गुरु-शिष्य परंपरा को लजाते प्रकरण मुंह चिढ़ा रहे हैं। ऐसी खबरें अब बहुत विचलित नहीं करतीं। किंतु बात जब जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय जैसे शिक्षा केंद्र की हो तो मामला साधारण नहीं रह जाता। आरोप किसी साधारण शिक्षक पर नहीं, मणिपुर से लोकसभा के सांसद प्रोफेसर अंगोमचा बिमोल अकोइजम पर हैं। वे जेएनयू के सामाजिक विज्ञान अध्ययन केंद्र में प्राध्यापक थे। जेएनयू प्रशासन ने 11 छात्राओं की शिकायतों की जांच के बाद प्रोफेसर अंगोमचा बिमोल अकोइजम को बर्खास्त कर दिया है। वे अभी सांसद बने हुए हैं। प्रो. बिमोल ने इन आरोपों पर सफाई देते हुए कहा कि उन्हें सरकार विरोधी रवैये के कारण शिकार बनाया जा रहा है। इस सफाई के बहुत मायने नहीं हैं। मुद्दा है शिक्षक की गरिमा का, यदि वह जनप्रतिनिधि हैं तो मामला गंभीर हो जाता है। कटघरों को तोड़कर आगे आती बेटियां- जेएनयू जैसे विश्वविद्यालय में जागरुक विद्यार्थियों की संख्या काफी है। राजनीतिक तौर पर भी उनकी सक्रियता किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में किसी प्राध्यापक का यह रवैया आश्चर्यजनक है। उन छात्राओं के साहस को भी नमन करना चाहिए, जिनके कारण यह प्रकरण प्रकाश में आ सका। हमारी परंपरा में शिक्षक अपने विद्यार्थियों के लिए अभिभावक हैं। इस गरिमा को छोड़कर अपने विद्यार्थियों का किसी भी तरह का शोषण स्वीकार्य नहीं है। यह उस अकादमिक भरोसे की हत्या है, जिस पर शिक्षा की नींव टिकी है। आरोपी प्रोफेसर के बारे में विश्वविद्यालय की आंतरिक शिकायत समिति ने शिकायतों को सही पाया है। नैतिकता के आधार पर उन्हें सांसद पद से इस्तीफा देना चाहिए। उनकी अपनी कांग्रेस पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक बयान अभी तक सामने नहीं आया है। यह बात रेखांकित करती है कि शिक्षा केंद्रों में शिक्षक सुरक्षित माहौल नहीं देगें तो युवा पीढ़ी का मानसिक और शैक्षणिक विकास कैसे होगा? यह भी सुखद है कि जागरुक विद्यार्थी अब किसी तरह के शोषण को सहने को तैयार नहीं हैं। पीड़िताएं अब डरने के बजाए संस्थागत प्रक्रियाओं का दरवाजा खटखटा रही हैं। इसे भी पढ़ें: 11 छात्राओं के आरोप और FIR के बाद Congress MP Bimol Akoijam को Delhi Police का समन स्त्रियों ने इस समय में अपनी शक्ति को पहचान लिया है। वे बेहतर कर रही हैं और आगे आसमां छूने की कोशिशों में हैं। यहां भी पुरुष सत्ता चोटिल होती हुई लगती है। उसके प्रति सम्मान और संवेदनशीलता के बजाए, किस्से बनाने और उसे कमतर साबित करने की कोशिशें हर स्तर हो रही हैं। तेज होते सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों के इस दौर में सिर्फ कानून ही स्त्री के साथ खड़े हैं। कई जगह स्त्रियां भी, स्त्रियों के खिलाफ खड़ी हैं। यह संक्रमण काल है, स्त्री को अपने वजूद को साबित करते हुए निरंतर आगे बढ़ने का समय है। वह जीत रही है और आगे बढ़ रही है। आज की बेटियां अपने सपनों में रंग भर रही हैं। आसान शिकार होने के नाते कुछ शिकारी उसकी घात में हैं, किंतु आज की औरत इससे डरती नहीं। घबराती नहीं। वह बने-बनाए कठघरों को तोड़कर आगे आ रही है। दलगत सीमाओं से ऊपर उठें- कानून से ऊपर कोई नहीं है। आरोपी प्रोफेसर सांसद हैं तो उन्हें कुछ विशेषाधिकार जरुर हासिल हैं। ऐसे में मुद्दा यह भी है कि जब कानून बनाने वाले ही महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचा रहे हैं तो राजनीतिक शुचिता का क्या होगा। दलगत राजनीति और चयनित चुप्पियों के समय में राजनीतक दलों का रवैया दोमुंहा हो जाता है। टीवी डिबेट्स में राजनीतिक दलों की महिला प्रवक्ता भी उक्त प्राध्यापक का बचाव करते नजर आ रहे हैं। यह तर्क भी कितने गलीज हैं कि दूसरे दल के लोगों पर भी आरोप लगे हैं। इससे गहरी राजनीतिक संवेदनहीनता प्रकट होती है। आपको इसलिए छोड़ दिया जाए क्योंकि प्रतिपक्ष पर भी ऐसे आरोप हैं। नैतिकता और महिला सुरक्षा के मुद्दों पर दलीय सीमाओं से ऊपर उठकर स्त्री सम्मान के लिए सभी को खड़ा होना चाहिए। संसद को हम लोकतंत्र का मंदिर मानते हैं। वहां बैठे सांसदों से उच्च नैतिक आचरण की अपेक्षाएं बेमानी नहीं हैं। हालात इतने बदतर हैं कि गंभीर आरोपों से घिरे लोग अकसर संस्थागत जांच की वैधता पर सवालिया निशान लगाकर सहानुभूति हासिल करने का प्रयास करते हैं। इस मामले में भी यही दिख रहा है। वहीं दूसरी ओर जेएनयू प्रशासन का यह दावा कि उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए आंतरिक समिति की रिर्पोट के आधार पर सांसद-प्राध्यापक पर कार्रवाई की गई है। यह साबित करता है कि राजनीतिक पदों की धमक से ऊपर अब संस्थागत नियमों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। लक्ष्मण रेखा खींचने की जरुरत- विश्वविद्यालयों के परिसरों में वैचारिक विमर्श हों। संवाद हों। किंतु वे ताकतवर लोगों के लिए सुरक्षित शरणगाह नहीं बनें। लक्ष्मण रेखा खींचने की जरुरत है। इस पर शिक्षकों को विचार करना होगा। अपने गिरेबां में झांकना होगा। शिक्षा परिसरों में पुलिस डेरा डाल रही है। उनकी स्वायत्तता और सम्मान आज हाशिए पर है। राजनीतिक दलों से जुड़ी अपनी आस्थाओं के कारण अगर शिक्षक अपनी भूमिका से समझौता करेगें, तो उनका सम्मान बच नहीं सकता। विचारधारा और देशद्रोही विचारों के आधार पर चलने वाली शक्तियां परिसर को तो कलंकित करेंगी। शिक्षकों के सम्मान को आहत करेंगी। जेएनयू में कई वर्षों से चल रही भारत विरोधी गतिविधियों को रोकने, संभालने और अपने युवाओं को सही राह दिखाने की कोशिशें होतीं तो यह आज नासूर बनकर न फूटता। सवाल सीधा है कि जेएनयू में हर देशद्रोही को स्पेस क्यों मिल जाता है? कोई भी विचार तभी तक स्वीकार्य है, जब तक हमारी अकादमिक योग्यताओं को निखारने और संवर्धित करने में सहायक हो। जो विचार देश तोड़ने और उसके टुकड़े करने के स्वप्न देखे उसका मिट जाना ही ठीक है। संस्थागत जवाबदेही जरुरी- अब जबकि स्त्रियों के सम्मान का मामला सामने है, तब ‘जेएनयू के क्रांतिकारियों’ की चयनित चुप्पियां सवालों के घेरे में हैं। यह प्रकरण अपने पद का दुरुपयोग करते हुए छात्राओं के उत्पीड़न का है। यह गुरु-शिष्य संबंधों को प्रभावित करता है। छात्राओं को भयभुक्त वातावरण प्रदान करना शासन- विश्वविद्यालय प्रशासन की जिम्मेदारी है। क्यों हम अपने परिसरों को छात्राओं के लिए सुरक्षित स्थान नहीं बना पाए हैं? जेएनयू जैसे जागरुक परिसर में ऐसा हो रहा है तो छोटे स्थान पर क्या हो रहा होगा? किसी छात्रा के लिए सत्ता प्रतिष्ठान से टकराना साधारण नहीं होता। बात जब यौन उत्पीड़न की हो मामला और संवेदनशील हो जाता है। छात्राओं को हिम्मत देना जरूरी है। जेएनयू की प्रथम महिला कुलपति प्रोफेसर शांतिश्री धूलिपुड़ी पंडित ने संवेदना के साथ इस विषय में न्याय किया है। समाज के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया है। स्त्री सुरक्षा से जुड़े मामलों में ऐसी ही कार्रवाई अपेक्षित है। इस मामले के बाद उच्च शिक्षा परिसरों में सुरक्षा, सत्ता के दुरुपयोग और संस्थागत जबावदेही के सवाल उठेंगे। इसलिए इसका परिप्रेक्ष्य व्यापक है। “लड़की हूं लड़ सकती हूं” और “बेटी बचाओ -बेटी पढ़ाओ” के नारों के बीच ऐसी घटनाएं हमें मुंह चिढ़ा रही हैं। इस सिलसिले को रोकने के लिए कौन आएगा ? जीवंत समाज अपने समाज के प्रश्नों के हल खुद खोजता है। वह टीवी बहसों से प्रभावित नहीं होता। क्योंकि ये हमेशा अंतहीन और निष्कर्षहीन ही होती हैं। स्त्री सुरक्षा पर हमने आज ही सोचने और कुछ करने की शुरुआत नहीं की तो कल बहुत देर हो जाएगी। - प्रो. संजय द्विवेदी (लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। भारतीय जनसंचार संस्थान के महानिदेशक रहे हैं। )
राहुल गांधी राजनीति सही से नहीं कर पा रहे तो उन्होंने कूटनीति में हाथ आजमाना चाहा लेकिन यहां भी उन्हें लेने के देने पड़ गये। दरअसल विदेश मंत्री एस. जयशंकर की मुंबई में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से प्रस्तावित मुलाकात को लेकर राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा लेकिन जैसा ही कांग्रेस के अतीत का एक वाकया सामने आया वैसे ही विपक्ष के नेता बगलें झांकने लगे। जयशंकर के मुंबई में विदेशी मेहमानों से मिलने पर सवाल उठाने से पहले राहुल गांधी शायद यह भूल गए कि उनकी पार्टी की अगुवाई वाली यूपीए सरकार के दौरान तत्कालीन विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने भी जयपुर में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ की मेजबानी की थी। तब विदेशी मेहमानों से मुलाकात के लिए दिल्ली के बजाय किसी दूसरे शहर को चुनने पर कांग्रेस को कोई असहजता नहीं थी। ऐसे में सवाल उठता है कि जो तरीका कांग्रेस की सरकार में स्वीकार्य था, वही आज मोदी सरकार के समय राजनीतिक हमले का मुद्दा कैसे बन गया? हम आपको बता दें कि भारतीय विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को स्पष्ट किया कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर 19 और 20 अक्टूबर को मुंबई में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के उपप्रधानमंत्री एवं विदेश मंत्री अब्दुल्ला बिन जायद अल नाहयान की मेजबानी करेंगे। इसके बाद 20 अक्टूबर को उनकी अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ वार्ता होगी। जयशंकर अमेरिका की स्वतंत्रता की 250वीं वर्षगांठ के समारोह में भी विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल होंगे। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इन कार्यक्रमों की जानकारी देते हुए साफ किया कि विदेशी प्रतिनिधियों की मेजबानी दिल्ली से बाहर करना कोई नई या असाधारण परंपरा नहीं है। दिल्ली के बाहर कूटनीति पर कांग्रेस का दोहरा रवैया? दरअसल, विवाद तब शुरू हुआ, जब राहुल गांधी ने एक्स पर पोस्ट कर प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधा। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि रुबियो ने अपने कर्मचारी को मुंबई बुलाया है और विदेश मंत्रालय के अधिकारी ही इस मुलाकात को लेकर असमंजस में हैं। राहुल ने प्रधानमंत्री से पूरे मामले पर सफाई देने की मांग की और यहां तक कह दिया कि जरूरत पड़े तो वह खुद भी इसे समझा सकते हैं। इससे पहले अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर के रुबियो और जयशंकर की मुंबई में प्रस्तावित मुलाकात की जानकारी देने पर भी कांग्रेस ने सवाल उठाए थे। इसे भी पढ़ें: दिल्ली के बाहर विदेशी मेहमानों की मेजबानी स्थापित परंपरा, Rahul Gandhi को MEA का जवाब वहीं राहुल गांधी के आरोपों का जवाब देते हुए विदेश मंत्रालय ने साफ किया कि विदेशी नेताओं और मंत्रियों की मेजबानी दिल्ली के बजाय दूसरे शहरों में करना कोई नई बात नहीं है। प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि पिछले कई वर्षों से भारत में यह परंपरा जारी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्पेन के प्रधानमंत्री से वडोदरा और जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज से अहमदाबाद में मुलाकात कर चुके हैं। मॉरीशस के प्रधानमंत्री की मेजबानी वाराणसी में हुई, जबकि विदेश मंत्रियों की बैठक गोवा और ‘हार्ट ऑफ एशिया’ सम्मेलन अमृतसर में आयोजित किया गया। इतना ही नहीं, गुजरात के केवड़िया में बोत्सवाना के विदेश मंत्री का भी स्वागत किया गया था। 2013 में सलमान खुर्शीद ने जयपुर में किया था पाकिस्तानी पीएम का स्वागत देखा जाये तो कांग्रेस के लिए सबसे असहज करने वाला उदाहरण मार्च 2013 का है। उस समय केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार थी और सलमान खुर्शीद विदेश मंत्री थे। नौ मार्च 2013 को उन्होंने जयपुर के रामबाग पैलेस होटल में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ के लिए दोपहर के भोज की मेजबानी की थी। दरअसल, अशरफ भारत की एक दिवसीय निजी यात्रा पर अजमेर शरीफ दरगाह में जियारत करने आए थे। उस समय सरकार ने स्पष्ट किया था कि इस मुलाकात में किसी ठोस द्विपक्षीय मुद्दे पर बातचीत का कार्यक्रम नहीं था। इसे सीमित भागीदारी वाला ‘वर्किंग लंच’ बताया गया था। विदेश मंत्रालय के तत्कालीन प्रवक्ता ने यह भी कहा था कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री एक महत्वपूर्ण पड़ोसी देश के नेता हैं और दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध हैं। यानी, कांग्रेस सरकार के समय भी एक पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की मेजबानी दिल्ली के बजाय जयपुर में हुई थी, भले ही यात्रा निजी धार्मिक उद्देश्य से जुड़ी थी और औपचारिक द्विपक्षीय वार्ता प्रस्तावित नहीं थी। इस ऐतिहासिक तथ्य को नजरअंदाज करके मुंबई में जयशंकर की कूटनीतिक मुलाकात पर सवाल उठाना कांग्रेस के तर्कों को कमजोर करता है। कूटनीति को राजनीति का हथियार बनाने से बचें राहुल देखा जाये तो विदेश नीति जैसे संवेदनशील विषय पर सरकार से सवाल पूछना विपक्ष का अधिकार है। लेकिन सवाल तथ्यों के आधार पर होने चाहिए, न कि हर सरकारी कदम को संदेह के घेरे में खड़ा करने के लिए। किसी विदेशी नेता या मंत्री से दिल्ली के बाहर मुलाकात होना अपने आप में न तो असामान्य है और न ही किसी तरह की कूटनीतिक कमजोरी का प्रमाण। साथ ही राहुल गांधी को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि यदि जयपुर में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की मेजबानी कांग्रेस सरकार के लिए सामान्य राजनयिक व्यवहार था, तो मुंबई में अमेरिकी विदेश मंत्री से बातचीत को लेकर इतना हंगामा क्यों हो रहा है? आखिर कूटनीति का मूल्यांकन मुलाकात के स्थान से होगा या उसके उद्देश्य, एजेंडे और परिणामों से? बहरहाल, राजनीतिक बयानबाजी से सुर्खियां जरूर बटोरी जा सकती हैं, लेकिन विदेश नीति पर गंभीर बहस के लिए तथ्यों और निरंतरता को समझना जरूरी है। राहुल गांधी को जयशंकर पर सवाल उठाने से पहले अपनी ही पार्टी के शासनकाल का रिकॉर्ड देखना चाहिए। राहुल गांधी को समझना होगा कि लोकतंत्र में जवाबदेही सबकी होती है सत्ता पक्ष की भी और विपक्ष की भी। -नीरज कुमार दुबे
झोटा हत्याकांड में सचिन पायलट और गुरजीत औजला ने 'मान सरकार' को घेरा, कानून व्यवस्था पर उठाए सवाल
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'कॉकरोच जनता पार्टी' का दावा- 'लहरा दो तिरंगा' अभियान सफल, संस्थापक अभिजीत दिपके हिरासत में
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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु 23 अक्टूबर को पहुंचेंगी बस्तर, ऐतिहासिक 'मुरिया दरबार' में होंगी शामिल
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गुजरात के मुख्यमंत्री ने प्रदर्शनों के पीछे ‘सत्ता परिवर्तन’ का एजेंडा होने का आरोप लगाया
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कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उन्माद और वैश्विक बाजार की चिंता
कृत्रिम बुद्धिमत्ता को इक्कीसवीं सदी की सबसे प्रभावशाली तकनीकी उपलब्धियों में गिना जा रहा है। चिकित्सा, शिक्षा, कृषि, उद्योग, संचार और प्रशासन तक इसका विस्तार नई संभावनाओं के द्वार खोल रहा है। बड़ी कंपनियां इस तकनीक को विकसित करने और अपने कारोबार में शामिल करने के लिए भारी धनराशि खर्च कर रही हैं। लेकिन जब किसी नई तकनीक के प्रति उम्मीदें बहुत तेजी से बढ़ती हैं, तब उसके साथ जुड़े आर्थिक जोखिम भी बढ़ने लगते हैं। 15 अक्टूबर 2026 को वैश्विक शेयर बाजारों में दिखाई दी उथल-पुथल ने इसी प्रश्न को सामने ला दिया है कि क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता में किया जा रहा विशाल निवेश भविष्य में अपेक्षित लाभ दे पाएगा। रॉयटर्स की रिपोर्टों के अनुसार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में गिरावट के बीच निवेशकों ने सरकारी बांड जैसे अपेक्षाकृत सुरक्षित निवेश साधनों की ओर रुख किया। दक्षिण कोरिया का शेयर बाजार विशेष रूप से प्रभावित हुआ। वहां प्रमुख शेयर सूचकांक कोस्पी 7.57 प्रतिशत गिरकर 5,554.22 पर बंद हुआ। कारोबार के दौरान गिरावट इतनी तेज थी कि कुछ समय के लिए व्यापार रोकना पड़ा। सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स और एसके हाइनिक्स जैसी प्रमुख अर्धचालक कंपनियों के शेयरों में भी भारी गिरावट दर्ज की गई। जापान का शेयर बाजार भी इस वैश्विक दबाव से अछूता नहीं रहा। इन घटनाओं ने स्पष्ट कर दिया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़ी कंपनियों में निवेशकों की दिलचस्पी के साथ-साथ उनकी आशंकाएं भी बढ़ रही हैं। इसे भी पढ़ें: OpenAI में जासूसी के खुलासे से हड़कंप! AI ने पकड़ा अपना ही इंजीनियर Abdulrahman Alfozan, Silicon Valley में मचा घमासान इस गिरावट के पीछे केवल शेयरों की कीमतों में पहले आई तेजी नहीं थी। इसके साथ अमेरिका में महंगाई के अपेक्षा से अधिक बने रहने और ब्याज दरों को लेकर बढ़ती अनिश्चितता का भी संबंध था। जब ब्याज दरें ऊंची रहती हैं, तब कंपनियों के लिए कर्ज लेना महंगा हो जाता है। भविष्य में मिलने वाले लाभ का वर्तमान मूल्य भी कम हो सकता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में अनेक कंपनियां ऐसे उपकरणों और प्रतिष्ठानों पर भारी धनराशि खर्च कर रही हैं, जिनसे वास्तविक आय प्राप्त होने में कई वर्ष लग सकते हैं। इसलिए महंगे कर्ज और अनिश्चित लाभ का मेल निवेशकों के लिए चिंता का विषय बन गया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता का आधुनिक ढांचा तैयार करना साधारण काम नहीं है। इसके लिए अत्यंत शक्तिशाली संगणक, उन्नत अर्धचालक चिपें, विशाल आंकड़ा केंद्र, निरंतर बिजली आपूर्ति और प्रभावी शीतलन प्रणालियां चाहिए। इन सबके निर्माण और संचालन में भारी पूंजी लगती है। कंपनियां इस उम्मीद में निवेश कर रही हैं कि आने वाले वर्षों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मांग तेजी से बढ़ेगी और उनके द्वारा तैयार की गई संगणना क्षमता का पर्याप्त उपयोग होगा। लेकिन यदि मांग अनुमान से कम रही या ग्राहकों ने अपेक्षित धनराशि खर्च नहीं की, तो कंपनियों के लिए अपने निवेश से पर्याप्त लाभ कमाना कठिन हो सकता है। अमेरिकी कंपनी कोरवीव का उदाहरण इस चिंता को समझने में मदद करता है। यह कंपनी कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़ी संगणना सेवाएं उपलब्ध कराती है। रॉयटर्स की 15 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी पर लगभग 50 अरब डॉलर का कर्ज है। उसके शेयरों में लगातार गिरावट आई और उसके कुछ बांडों पर मिलने वाला प्रतिफल भी बहुत बढ़ गया। इससे निवेशकों ने कंपनी की वित्तीय क्षमता और कर्ज चुकाने की योग्यता पर सवाल उठाए। दूसरी ओर, कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने कर्मचारियों को भरोसा दिलाया कि उसके पास भविष्य में आय देने वाले अनुबंधों का बड़ा भंडार है। यहां समझने वाली बात यह है कि भविष्य के अनुबंधों का बड़ा मूल्य होना और समय पर पर्याप्त नकदी प्राप्त होना अलग-अलग बातें हैं। किसी कंपनी को कर्मचारियों के वेतन, बिजली, उपकरणों, ब्याज और ऋण की किस्तों का भुगतान लगातार करना पड़ता है। यदि आय आने में देरी होती है, तो अच्छे अनुबंध होने के बावजूद वित्तीय दबाव पैदा हो सकता है। इसके विपरीत, यदि मांग मजबूत रहती है और कंपनी अपने अनुबंधों को वास्तविक आय में बदल पाती है, तो भारी निवेश लाभदायक भी साबित हो सकता है। इसलिए किसी कंपनी के शेयरों में गिरावट को उसके कारोबार के समाप्त होने का प्रमाण मानना उचित नहीं है। इस घटनाक्रम ने सरकारी बांडों की भूमिका को भी फिर चर्चा में ला दिया है। जब निवेशकों को शेयर बाजार में अधिक जोखिम दिखाई देता है, तब वे अपनी पूंजी का कुछ हिस्सा सरकारी प्रतिभूतियों में लगाते हैं। इससे इन बांडों की मांग बढ़ सकती है और उनकी कीमतों में तेजी आ सकती है। सामान्यतः बांड की कीमत और उससे मिलने वाला प्रतिफल विपरीत दिशा में चलते हैं। 15 अक्टूबर को वैश्विक बाजारों में सरकारी बांडों की ओर बढ़ते रुझान को इसी संदर्भ में देखा गया। हालांकि सरकारी बांड भी ब्याज दरों में बदलाव से प्रभावित होते हैं, इसलिए उन्हें हर परिस्थिति में पूरी तरह जोखिममुक्त नहीं माना जा सकता। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता का वर्तमान विस्तार किसी आर्थिक बुलबुले का रूप ले रहा है। आर्थिक बुलबुले की स्थिति तब बन सकती है, जब किसी परिसंपत्ति का बाजार मूल्य उसकी वास्तविक कमाई और दीर्घकालीन संभावनाओं से बहुत आगे निकल जाए। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में कुछ कंपनियों के ऊंचे मूल्यांकन, भारी कर्ज और भविष्य की आय को लेकर अनिश्चितता ने इस आशंका को बढ़ाया है। फिर भी पूरे उद्योग को एक ही दृष्टि से देखना उचित नहीं होगा। कुछ कंपनियों के पास पर्याप्त नकदी, मजबूत ग्राहक आधार और विविध कारोबार हैं, जबकि कुछ कंपनियां विस्तार के लिए लगातार कर्ज पर निर्भर हैं। दोनों की वित्तीय स्थिति और जोखिम अलग-अलग हैं। इसका भारत पर भी प्रभाव पड़ सकता है। वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बढ़ने पर विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से भी पूंजी निकाल सकते हैं। इससे शेयरों की कीमतों और रुपये में उतार-चढ़ाव बढ़ने की आशंका रहती है। दूसरी ओर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विस्तार से भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों के लिए नई संभावनाएं भी पैदा हो सकती हैं। आंकड़ा प्रबंधन, तकनीकी सेवाओं, साइबर सुरक्षा और व्यावसायिक प्रक्रियाओं को अधिक प्रभावी बनाने के क्षेत्र में भारतीय कंपनियां महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। लेकिन इन अवसरों का लाभ उठाने के लिए कौशल विकास, अनुसंधान, बिजली की उपलब्धता और तकनीकी ढांचे में निवेश जरूरी होगा। भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े प्रतिष्ठानों का विस्तार करते समय भी वित्तीय अनुशासन का ध्यान रखना होगा। केवल भविष्य की मांग के अनुमान पर भारी कर्ज लेकर विशाल आंकड़ा केंद्र तैयार करना जोखिमपूर्ण हो सकता है। निवेश का आधार वास्तविक ग्राहक मांग, संभावित आय और दीर्घकालीन आर्थिक उपयोगिता होनी चाहिए। सरकार और उद्योग को यह भी देखना होगा कि इन प्रतिष्ठानों की बिजली तथा पानी की जरूरतें किस प्रकार पूरी की जाएंगी और उनका पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ेगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता में मौजूदा उथल-पुथल तकनीकी विकास के विरुद्ध कोई प्रमाण नहीं है। यह संभव है कि आने वाले वर्षों में यह तकनीक उद्योगों की उत्पादकता बढ़ाए, नई सेवाओं को जन्म दे और आर्थिक गतिविधियों का स्वरूप बदल दे। लेकिन किसी तकनीक की उपयोगिता और उससे जुड़ी कंपनियों के शेयरों का उचित मूल्यांकन दो अलग प्रश्न हैं। तकनीकी प्रगति अपने आप में इस बात की गारंटी नहीं देती कि हर निवेशक को लाभ होगा या प्रत्येक कंपनी सफल रहेगी। अंततः कृत्रिम बुद्धिमत्ता का भविष्य केवल शक्तिशाली संगणकों और अरबों डॉलर के निवेश से तय नहीं होगा। उसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह समाज और अर्थव्यवस्था की वास्तविक समस्याओं का कितना प्रभावी समाधान करती है, उससे कितनी टिकाऊ आय पैदा होती है और कंपनियां अपने खर्च तथा कर्ज का प्रबंधन कितनी जिम्मेदारी से करती हैं। तकनीकी महत्वाकांक्षा आवश्यक है, लेकिन उसके साथ विवेकपूर्ण निवेश और वित्तीय अनुशासन भी उतने ही जरूरी हैं। वैश्विक बाजार की मौजूदा चिंता इसी संतुलन की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
भारतीय शेयर बाजार लगातार दूसरे दिन बढ़त के साथ बंद
मुंबई, भारतीय शेयर बाजार शुक्रवार के कारोबारी सत्र में लगातार दूसरे दिन मजबूती के साथ बंद हुआ। दिन के अंत में सेंसेक्स 413.66 अंक या 0.56 प्रतिशत की तेजी के साथ 74,729.27 और निफ्टी 148.80 अंक या 0.65 प्रतिशत की मजबूती के साथ 23,146.15 पर था।
'Regime Change' का हौव्वा या जन-आक्रोश? हज़ारों पुलिस के पहरे में Tiranga March, Modi सरकार नाकाम!

