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प्रदूषण के बारूद पर नहीं, पर्यावरण के उजास पर सजे दीपोत्सव

दीवाली, उजालों का त्योहार, खुशियों का स्वागत! लेकिन जब यही जश्न हमारी सांसों को घुटन से भर दे और हमारे वातावरण को जहर बना दे, तब कहीं न कहीं हमारी संवेदनशीलता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। सदियों से भारत में दीयों की रोशनी और हल्की आतिशबाजी के साथ दीपोत्सव मनाने की परम्परा रही है। यह उत्सव प्रतीक है बुराई पर अच्छाई की विजय का, अंधकार पर प्रकाश का, लेकिन पिछले कुछ दशकों में इसका स्वरूप इस कदर बदल गया है कि अब यह ‘आतिशबाजी का युद्ध’ प्रतीत होता है। जिस उत्सव की आत्मा प्रकाश और शांति में निहित थी, वह अब शोर, धुआं और प्रदूषण का पर्याय बन गया है। बीते वर्षों में अत्यधिक विस्फोटक पटाखों की भरमार ने इस पवित्र पर्व की सादगी को निगल लिया है। यही पटाखे वायु प्रदूषण को भयावह स्तर तक पहुंचाने और पहले से बिगड़ती पर्यावरणीय स्थिति को बेहद विकराल बनाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। तेज रोशनी वाले और बारूद से लबालब पारंपरिक पटाखे पलभर में न केवल जान-माल का भारी नुकसान कर डालते हैं बल्कि वायु, ध्वनि और मिट्टी, तीनों को गहराई से प्रदूषित करते हैं। इन पटाखों में बेरियम, कॉपर, गंधक, सीसा जैसे रासायनिक तत्व होते हैं, जो फूटने के बाद 100 घंटे तक वातावरण में घुले रहते हैं। बेरियम रेडियोधर्मी और विषैला होता है, कॉपर के यौगिक कैंसर का खतरा बढ़ाते हैं और गंधक श्वसन रोगों को जन्म देता है। पटाखों के धुएं में सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी जहरीले गैसें होती हैं, जो फेफड़ों, दिल और आंखों पर सीधा प्रभाव डालती हैं। इनसे सिरदर्द, एलर्जी, खांसी, ब्रोंकाइटिस, न्यूमोनिया, अनिद्रा और यहां तक कि कैंसर जैसी असाध्य बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ध्वनि प्रदूषण का खतरा भी कम नहीं है। कई स्थानों पर पटाखों की आवाज 130 से 150 डेसीबल तक पहुंच जाती है, जो कानों के लिए खतरनाक है। इससे बहरेपन, तनाव, नींद की कमी और हृदय की धड़कनों में असामान्यता जैसे रोग तेजी से बढ़ते हैं। इसे भी पढ़ें: दीपावली और सनातन स्वाभिमान: तुष्टीकरण की सियासत पर चोट मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षी और पालतू जानवर भी इस शोर और प्रदूषण से अत्यधिक प्रभावित होते हैं। शोध बताते हैं कि पटाखों की तीव्र ध्वनि कुत्तों सहित अन्य जीवों की सुनने की क्षमता को स्थायी रूप से क्षति पहुंचा सकती है। वायु प्रदूषण का एक और गंभीर प्रभाव पुरुषों के प्रजनन स्वास्थ्य पर देखा गया है। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार, प्रदूषण के कारण वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या में 40 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई है, जिससे नपुंसकता का खतरा बढ़ रहा है। देश में हर दसवां व्यक्ति अस्थमा का शिकार है और प्रदूषित हवा गर्भ में पल रहे बच्चों तक के लिए खतरा बन चुकी है। ऐसे में, जब पहले से ही पराली, औद्योगिक धुआं, टूटी-फूटी सड़कों की धूल और निर्माण कार्यों के कारण हवा जहरीली हो चुकी हो, तब एक रात की अंधाधुंध आतिशबाजी इस संकट को और भयावह बना देती है। सर्वोच्च न्यायालय ने पटाखों से होने वाले प्रदूषण की गंभीरता और पर्यावरण संरक्षण की अनिवार्यता को देखते हुए हरित पटाखों के इस्तेमाल तथा उनकी बिक्री को लेकर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि स्वच्छ हवा और प्रदूषण नियंत्रण की जिम्मेदारी केवल दिल्ली-एनसीआर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे देश का सामूहिक दायित्व है। न्यायालय ने हरित पटाखों के इस्तेमाल की अनुमति देते हुए उनकी गुणवत्ता, प्रमाणन और बिक्री पर कड़ी निगरानी रखने पर जोर दिया है। अदालत ने अपने 29 अक्तूबर के आदेश में कुछ अतिरिक्त और कड़े प्रावधान लागू किए हैं, जिसके तहत दिल्ली-एनसीआर में केवल उन्हीं हरित पटाखों के निर्माण और बिक्री की अनुमति दी गई है, जिन्हें वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान तथा पैट्रोलियम एवं विस्फोटक सुरक्षा संगठन से वैध प्रमाणन प्राप्त है और जो संस्थान की अधिकृत सूची में शामिल हैं। प्रत्येक पैकेट पर उत्पाद-विशिष्ट क्यूआर कोड अनिवार्य किया गया है, जिसके माध्यम से निर्माता, पंजीकरण, लाइसेंस और परीक्षण प्रमाणपत्र की प्रामाणिकता जांची जा सकेगी। बेरियम युक्त पटाखों तथा लड़ियों और पटाखों की मालाओं के निर्माण एवं बिक्री पर भी रोक लगाई गई है। अवैध पटाखों की बिक्री अथवा आदेशों के उल्लंघन पर लाइसेंस रद्द करने, पटाखे जब्त करने और दोषियों के विरुद्ध अभियोजन की कार्रवाई करने के निर्देश भी दिए गए हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि केवल आदेश जारी करना पर्याप्त नहीं बल्कि उनका प्रभावी क्रियान्वयन और नागरिकों की जिम्मेदार भागीदारी भी उतनी ही आवश्यक है। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट आदेशों के अनुसार केवल हरित पटाखों के उपयोग की ही अनुमति है लेकिन विडंबना यह है कि प्रतिबंधों और दिशा-निर्देशों की खुलेआम धज्जियां उड़ाते हुए प्रदूषण फैलाने वाले पारंपरिक पटाखों की बिक्री बाजारों से लेकर गली-मोहल्लों तक धड़ल्ले से जारी रहती है। कानून और निर्णय केवल तभी सार्थक हैं, जब नागरिक भी अपनी जिम्मेदारी समझें। भारत में पहले से ही वायु एवं ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण कानून लागू हैं लेकिन उनकी पालना सुनिश्चित करने में प्रशासन की उदासीनता अक्सर नजर आती है। पर्यावरणीय मामलों में केवल न्यायपालिका नहीं, जनता की भूमिका भी निर्णायक है। जब लोग ही संवेदनशील नहीं होंगे तो अदालतें भी पर्यावरण को अकेले नहीं बचा सकती। हमें यह समझना होगा कि दीवाली की असली सुंदरता पटाखों के धमाके में नहीं बल्कि दीयों की उजली लौ में है। यह वह पर्व है, जो हमारे मन, घर और समाज को प्रकाशमान करता है, न कि उन्हें धुएं से ढ़क देता है। दीवाली पर साफ-सफाई की परंपरा रही है पर अब वही दिन कचरे, बारूद और प्लास्टिक की परतों में बदल जाता है। यह कैसा उत्सव है, जो हमारी सांसों को छीन लेता है? अब वक्त आ गया है कि हम अपनी परंपराओं को आधुनिक विवेक से जोड़ें। यदि हमें पटाखों का उपयोग करना है तो केवल हरित पटाखों का सीमित और नियंत्रित उपयोग करें। दीयों से घर-आंगन जगमगाएं, एक-एक पौधा लगाएं, बच्चों को सिखाएं कि असली रोशनी वही है, जो टिकाऊ हो, जो जीवन दे, न कि जहर घोले। ऑस्ट्रेलिया में दिसंबर में मनाए जाने वाले एक त्योहार पर लोग आतिशबाजी करते हैं लेकिन उसी दिन हर परिवार एक पौधा भी लगाता है। यह एक छोटी-सी परंपरा है पर उसका पर्यावरणीय संदेश गहरा है। भारत भी ऐसी परंपराओं को अपना सकता है, जहां उत्सव और पर्यावरण दोनों का संतुलन बना रहे। आज जब दिल्ली और अन्य शहरों की हवा पहले से ही जहरीली हो चुकी है, हमें यह स्वीकार करना होगा कि एक रात का यह जश्न हमारे भविष्य की कीमत पर नहीं होना चाहिए। हमें अपने बच्चों को वह दीपावली देनी है, जो केवल आंखों को नहीं, दिलों को भी रोशनी दे। दीवाली दीयों की हो, धमाकों की नहीं क्योंकि असली रोशनी वही है, जो प्रकाश के संग करुणा और जिम्मेदारी का संदेश फैलाए। - योगेश कुमार गोयल (लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में निरन्तर सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार, पर्यावरण विषयों के जानकार और चर्चित पुस्तक ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ के लेखक हैं)

प्रभासाक्षी 7 Nov 2026 7:01 pm

दीपावली और सनातन स्वाभिमान: तुष्टीकरण की सियासत पर चोट

भारत केवल एक भू-भाग नहीं, बल्कि एक जीवंत सनातन सांस्कृतिक चेतना है। इस चेतना की अभिव्यक्ति हमारे पर्वों, उत्सवों और त्योहारों में होती है। दीपावली, जो अंधकार पर प्रकाश और अधर्म पर धर्म की विजय का शाश्वत संदेश देती है, वह महज एक कैलेंडर की तारीख नहीं बल्कि करोड़ों भारतीयों की सामूहिक आस्था का प्रतीक है। लेकिन हाल के वर्षों में, विशेषकर समकालीन राजनीतिक परिदृश्य में, देश के इन पावन त्योहारों को लेकर एक नई और चिंताजनक स्क्रिप्ट लिखी जा रही है। इस स्क्रिप्ट के केंद्र में है—बहुसंख्यक समाज की आस्था को कठघरे में खड़ा करना, सनातन परंपराओं पर चयनात्मक प्रतिबंध थोपना और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर सांस्कृतिक प्रतीकों का राजनीतिकरण करना। इस चौतरफा वैचारिक हमले के बीच, भारतीय जनता पार्टी और हिंदुत्व की विचारधारा आज केवल एक राजनीतिक दल या विमर्श की आवाज नहीं, बल्कि सदियों से दबाई गई बहुसंख्यक समाज की सांस्कृतिक अस्मिता और आत्मगौरव की ढाल बनकर उभरी है। स्वतंत्रता के बाद के दशकों में भारत की राजनीति पर एक खास किस्म की 'छद्म-धर्मनिरपेक्षता' हावी रही। इस व्यवस्था के तहत बहुसंख्यक हिंदू समाज को अपनी ही सांस्कृतिक जड़ों पर गर्व करने से रोका गया। तुष्टीकरण की राजनीति इस हद तक बढ़ गई कि अल्पसंख्यकों के त्योहारों पर तो सरकारी सुविधाएं और शुभकामनाएं बढ़-चढ़कर दी जाती थीं, लेकिन जब हिंदुओं के त्योहारों की बात आती थी, तो अचानक पर्यावरण चेतना, पशु क्रूरता और सामाजिक कुरीतियों के उपदेश शुरू हो जाते थे। इसे भी पढ़ें: दिल्ली-NCR में GRAP III की पाबंदियां लागू, वायु प्रदूषण का स्तर 'गंभीर' श्रेणी के करीब पहुंचा दीपावली के आते ही पटाखों से होने वाले प्रदूषण पर हाहाकार मचना, होली पर पानी की बर्बादी का रोना, और जन्माष्टमी या दही-हांडी पर सुरक्षा के नाम पर बंदिशें लगाना—यह एक तय ढर्रा बन चुका था। विडंबना यह थी कि यह ज्ञान केवल हिंदू त्योहारों तक ही सीमित रहता था। नए साल के जश्न, शादियों या अन्य धर्मों के त्योहारों पर होने वाले प्रदूषण या आतिशबाजी पर यही बुद्धिजीवी वर्ग और राजनीतिक दल चुप्पी साध लेते थे। इस चयनात्मक दृष्टिकोण ने बहुसंख्यक समाज के भीतर एक गहरी असुरक्षा और आक्रोश को जन्म दिया, जिसे भाजपा और हिंदुत्व के विचार ने एक सकारात्मक राजनीतिक दिशा दी। साल 2014 के बाद देश के राजनीतिक और सांस्कृतिक परिदृश्य में एक युगांतरकारी परिवर्तन आया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने 'विकास भी, विरासत भी' का जो मंत्र दिया, उसने देश के बहुसंख्यक समाज को अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करना सिखाया। अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण, काशी विश्वनाथ धाम का कायाकल्प, उज्जैन के महाकाल लोक का पुनरुद्धार और केदारनाथ-बद्रीनाथ का जीर्णोद्धार—यह केवल बुनियादी ढांचे का विकास नहीं है, बल्कि यह भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का शंखनाद है।इस पुनर्जागरण का सीधा असर त्योहारों को मनाने के तौर-तरीकों और उनके राजनीतिक विमर्श पर पड़ा है। आज जब अयोध्या में सरयू के तट पर लाखों दीये जलते हैं, तो वह केवल एक रिकॉर्ड नहीं होता, बल्कि वह सदियों की गुलामी की मानसिकता से मुक्ति और रामराज्य की उस परिकल्पना का उत्सव होता है, जो हिंदुत्व के मूल में है। भाजपा ने यह स्थापित किया है कि देश की प्रगति उसकी सांस्कृतिक जड़ों को कमजोर करके नहीं, बल्कि उन्हें और मजबूत करके ही संभव है। नवंबर 2026 की इस दीपावली पर बने हालिया विवादों को देखें तो दिल्ली-NCR में पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध या मुंबई में 'पर्यावरण-अनुूल' दिवाली के नाम पर हिंदू परंपराओं को निशाना बनाने की कोशिशें इस नई स्क्रिप्ट का हिस्सा हैं। मुंबई में एक सेलिब्रिटी के माध्यम से हिंदुओं को त्योहार मनाने का तरीका सिखाने के प्रयास पर जब भाजपा नेताओं ने आपत्ति जताई, तो इसे विपक्ष द्वारा 'ध्रुवीकरण' का नाम दे दिया गया। लेकिन सवाल यह है कि क्या अपनी आस्था की रक्षा करना और अपनी परंपराओं पर थोपे जा रहे ज्ञान का विरोध करना ध्रुवीकरण है? सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस साल 7 और 8 नवंबर को नियमों के साथ 'ग्रीन पटाखे' जलाने की सीमित छूट देना इस बात का प्रमाण है कि पूर्ण प्रतिबंध व्यावहारिक नहीं था और इससे केवल एक समुदाय विशेष की भावनाओं को ठेस पहुंच रही थी। विपक्ष के नेता जब हिंदुत्व को एक आक्रामक या विभाजनकारी विचारधारा के रूप में पेश करने की कोशिश करते हैं, तो वे भूल जाते हैं कि हिंदुत्व की प्रकृति कभी आक्रामक नहीं रही। हिंदुत्व 'वसुधैव कुटुंबकम' और 'सर्वे भवंतु सुखिनः' के दर्शन पर आधारित है। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि अपनी ही धरती पर सनातनी परंपराओं को दोयम दर्जे का व्यवहार सहना पड़े। जब विपक्ष के वरिष्ठ नेता दीपावली जैसे पवित्र अवसर पर भी हिंदू पहचान और हिंदुत्व को लेकर विवादित बयान देते हैं, तो वे अनजाने में ही सही, उस बहुसंख्यक विरोधी स्क्रिप्ट को आगे बढ़ा रहे होते हैं जिसका उद्देश्य समाज को बांटना है। विपक्ष का आरोप है कि भाजपा त्योहारों का उपयोग राजनीतिक लाभ और वोटों के ध्रुवीकरण के लिए करती है। लेकिन यदि निष्पक्षता से विश्लेषण किया जाए, तो भाजपा ने केवल उस शून्य को भरा है जो कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों ने अपनी तुष्टीकरण की नीतियों के कारण पैदा किया था। विपक्ष के लिए सेकुलरिज़्म का मतलब हमेशा से बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को दबाकर रखना रहा है ताकि एक निश्चित वोट बैंक सुरक्षित रहे। इसके विपरीत, हिंदुत्व की राजनीति ने बहुसंख्यक समाज को एकजुट किया है और उन्हें यह अहसास कराया है कि उनकी आस्था का भी इस देश में उतना ही अधिकार और सम्मान है जितना किसी और का। दीपावली के मंच से आज जो विमर्श निकल रहा है, वह ध्रुवीकरण का नहीं बल्कि 'सांस्कृतिक स्वाभिमान' का है। यह विमर्श इस बात का है कि भारत की आत्मा उसके त्योहारों में बसती है। यदि हम अपने त्योहारों की रौनक को, उनकी परंपराओं को राजनीति की वेदी पर चढ़ा देंगे, तो हम एक समाज के रूप में अपनी पहचान खो देंगे। भाजपा ने त्योहारों को राष्ट्रीय गौरव से जोड़ा है। आज सेना के जवानों के साथ प्रधानमंत्री का दिवाली मनाना राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक मूल्यों के उसी सुंदर संगम को दर्शाता है, जो हिंदुत्व की सोच की रीढ़ है। अल्टीमेटली, त्योहारों के मंच पर जो स्क्रिप्ट लिखी जा रही है, उसका अंतिम अध्याय जनता ही तय करेगी। भारत का आम नागरिक अब यह भली-भांति समझ चुका है कि कौन आस्था के साथ खड़ा है और कौन केवल चुनावी रोटियां सेकने के लिए त्योहारों का इस्तेमाल कर रहा है। हिंदुत्व का उद्देश्य किसी अन्य धर्म या संस्कृति को नीचा दिखाना नहीं है, बल्कि अपनी समृद्ध विरासत का संरक्षण करना है। दीपावली प्रकाश का पर्व है, और यह प्रकाश तब तक अधूरा है जब तक देश का बहुसंख्यक समाज आत्मगौरव और स्वतंत्रता के साथ अपनी परंपराओं का निर्वाह न कर सके। छद्म-धर्मनिरपेक्षता के पैरोकारों को यह समझना होगा कि भारत में यदि लोकतंत्र और विविधता सुरक्षित है, तो उसका सबसे बड़ा कारण सनातन संस्कृति की सहिष्णुता ही है। इसलिए, त्योहारों को विवाद का अखाड़ा बनाने के बजाय, उनकी मूल भावना का सम्मान किया जाना चाहिए। भाजपा और हिंदुत्व के नेतृत्व में चल रहा यह सांस्कृतिक आंदोलन भारत को एक 'विश्वगुरु' बनाने की दिशा में अग्रसर है, जहाँ आधुनिक प्रगति और प्राचीन विरासत दोनों कंधे से कंधा मिलाकर चलेंगे। यही नए भारत की नियति है और यही इस महापर्व का वास्तविक संदेश है। अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार

प्रभासाक्षी 7 Nov 2026 6:59 pm

भारत को पुनः वैभवशाली बनाने हेतु संघ द्वारा प्रयासों में तेजी लाई जा रही है

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी स्थापना के 101 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। संघ ने अपनी स्थापना की शताब्दी हाल ही में पूर्ण की है एवं संघ अब अपने अगले चरण में प्रवेश कर रहा है। शताब्दी वर्ष के दौरान संघ एवं समाज द्वारा मिलकर कई बड़े कार्यक्रमों का सफलतापूर्वक आयोजन किया गया। इन कार्यक्रमों को समाज में अच्छा प्रतिसाद भी मिला। इन विभिन्न कार्यक्रमों में स्वयंसेवकों एवं समाजजनों की बढ़ चढ़ कर भागीदारी रही। संघ की 100 वर्षों की यह एक अभिनव यात्रा है एवं समाज को साथ लेकर चलने की यात्रा है। साथ ही, समाज की सेवा के अथक प्रयासों की भी यह यात्रा है। इन 100 वर्षों में संघ ने क्या पाया, इसका सिहावलोकन एवं मूल्यांकन करना आवश्यक है। 100 वर्ष अपने आप में एक पर्याप्त कालावाधि है, जब किसी संगठन के कार्यों का मूल्यांकन किया जाना चाहिए। पिछले 100 वर्षों के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए एक बड़ी उपलब्धि यह रही है कि राष्ट्र में व्यक्ति निर्माण की अभिनव पद्धति के रूप में संघ की शाखा को देश एवं समाज के बीच में मान्यता मिली है। इसे संघ की बहुत बड़ी सफलता के रूप में देखा जा सकता है। शाखा की कार्यपद्धति के माध्यम से ही भारत के लाखों युवाओं में राष्ट्रत्व का भाव जगाया जा सका है एवं स्वयसेवकों का निर्माण कर उनके जीवन में परिवर्तन लाया जा सका है। आज नगरों एवं महानगरों के साथ ही सुदूर ग्रामीण इलाकों में भी संघ की शाखाएं लगाई जा रही हैं एवं इनमें समाज के समस्त घटकों की भागीदारी दिखाई दे रही है। मन में देश भक्ति का भाव लेकर भारत का युवा, स्वयंसेवक बनता है एवं प्रतिदिन शाखा में आकर शाखा की कार्यपद्धति का अनुपालन करते हुए कब उसमें राष्ट्रत्व की भावना जागृत हो जाती है उसे पता ही नहीं चलता है। आज हिंदू स्वयंसेवक संघ के माध्यम से कई अन्य देशों में भी शाखाएं लगाई जा रही है। विश्व में समस्त स्थानों पर लगाई जाने वाली शाखाओं की कार्यपद्धति समरूप है। भारत में आज अत्यंत समर्पित स्वयसेवकों की शृंखला खड़ी हो गई है एवं आज कई परिवारों की 5वीं एवं 6वीं पीढ़ी स्वयंसेवक के रूप में कार्य करते हुए दिखाई दे रही हैं। इस प्रकार, केवल स्वयंसेवक ही नहीं बल्कि उनके परिवार के सदस्य भी देश के लिए समर्पण की भावना के साथ संघ से जुड़े हुए हैं। इसे भी पढ़ें: Indira Gandhi ने संसद के बाहर साधुओं पर गोली चलवाई थी, BJP MP Nishikant Dubey का Congress पर वार संघ की कार्यपद्धति में दो श्रेणियों के माध्यम से कार्य सम्पन्न होते हैं। एक, संगठन श्रेणी, जिसके माध्यम से शाखा लगाई जाती है एवं स्वयंसेवक गढ़े जाते हैं। दूसरी, जागरण श्रेणी, जिसके माध्यम से स्वयसेवकों द्वारा समाज के बीच जाकर समाज परिवर्तन के प्रयास किए जाते हैं। समाज को जागृत करने के उद्देश्य से कुछ जागरण पत्रिकाओं का प्रकाशन भी किया जाता है, जिनकी पहुंच आज 3 लाख से अधिक गावों तक है। इसी प्रकार संघ के सम्पर्क विभाग के द्वारा समाज का नेतृत्व करने वाले संभ्रांत नागरिकों से सम्पर्क किया जाता है एवं इन्हें राष्ट्रीय विचारों से अवगत कराया जाता है जिसके चलते ही आज बड़ी मात्रा में समाज की सज्जन शक्ति संघ के साथ जुड़ गई है। संघ द्वारा 6 गतिविधियां भी प्रारम्भ की गई है - सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, समग्र ग्रामविकास, गोसेवा, कुटुंब प्रबोधन एवं धर्मजागरण। इन गतिविधियों के माध्यम से भी समाज को संघ के साथ जोड़ने के प्रयास किए जाते हैं। इस बीच, पंच परिवर्तन (स्व के भाव का जागरण, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन एवं नागरिक कर्तव्य) के प्रयोग भी संघ द्वारा चलाए गए ताकि समाज के आचरण में परिवर्तन लाया जा सके। विभिन्न प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच भी संघ पिछले 100 वर्षों के दौरान निरंतर आगे बढ़ता रहा क्योंकि संघ द्वारा शाखा पद्धति के रूप में एक अभिनव पद्धति का निर्माण एवं प्रयोग किया था। दूसरे, संघ व्यक्ति निरपेक्षता की नीति पर चलता आया है, अर्थात, स्वयसेवकों ने अपने आप को संगठन से सदैव नीचे रखा है। आज संघ की एक व्यापक संगठनात्मक रचना खड़ी हो गई है। संघ का लक्ष्य अपने संगठन को बड़ा बनाने का नहीं है बल्कि अपने संगठन को समाजव्यापी बनाने का लक्ष्य लेकर संघ आगे बढ़ रहा है। हिंदू समाज बड़ा बने एवं भारत एक बार पुनः परम वैभव की स्थिति पर आ जाए, यही संघ का मुख्य ध्येय है। भारतीय समाज पूर्ण रूप से एक रस हो जाए, इससे भी संघ की स्थापना के उद्देश्य की पूर्ति हो जाती है। संघ ने 100 वर्षों की एक लम्बी यात्रा सफलतापूर्वक तय कर ली है परंतु अभी भी बहुत कुछ कार्य शेष है। इस दृष्टि से आगे आने वाले समय में संघ के स्वयसेवकों के लिए करणीय कार्य क्या हो सकते हैं, इसका वर्णन हाल ही में संघ के माननीय सह सरकार्यवाह श्री अतुल लिमये जी द्वारा प्रदत्त एक उदबोधन में मिलता है। इन करणीय कार्यों को तेजी से सम्पन्न करने की आज आवश्यकता है क्योंकि इस दृष्टि से संघ की प्रतिस्पर्धा आज किसी अन्य संगठन के साथ नहीं बल्कि समय के साथ है। राष्ट्र में व्यक्ति निर्माण की प्रक्रिया चलाने वाली शाखाओं का विस्तार तेजी से करने की आज आवश्यकता है। आज पूरे देश में लगभग 72.42 प्रतिशत बस्तियों एवं 69 प्रतिशत मंडलों में संघ की शाखाएं एवं साप्ताहिक मिलन चलाए जा रहे है। इसका आशय यह है कि देश में लगभग 30 प्रतिशत बस्तियां एवं 31 प्रतिशत मंडल अभी भी संघ कार्य विहीन हैं। अतः प्रथम लक्ष्य है कि तेज गति से उक्त शेष बस्तियों एवं मंडलों में शखाएं खड़ी हो जाए। राम मंदिर निधि संकलन अभियान के समय लगभग 14 करोड़ परिवारों से सम्पर्क किया गया था, एक परिवार में यदि 5 सदस्य माने जाय तो लगभग 70 करोड़ नागरिकों के साथ उस समय सम्पर्क हुआ था। अतः देश की कुल जनसंख्या के 50 प्रतिशत नागरिकों के साथ केवल 45 दिनों में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से सम्पर्क किया गया था। हालांकि इस अभियान में स्वयसेवकों के साथ समाज के अन्य संगठन एवं नागरिक भी जुड़े थे। अतः शेष बस्तियों एवं मंडलों में संघ की शाखा की स्थापना के कार्य को समाजजन के सहयोग से गति दी जा सकती है। भारत में आज संघ के स्वयंसेवकों के गुणों के चलते उनकी एक अलग पहिचान है। सादगी, मितव्यितता, प्रामाणिकता, अनुशासन, समर्पण का भाव आदि तत्व स्वयसेवकों के गुणों में शामिल हैं। समाज जीवन में संघ की पहिचान संघ के स्वयंसेवक के माध्यम से ही बनती है। मीडिया सहित प्रचार के विभिन्न माध्यमों से संघ के विरोध में बहुत कुछ चलता भी रहता है परंतु समाज में इसका प्रभाव दिखाई नहीं देता है, क्योंकि स्वयंसेवक के गुण कुछ अलग ही कहानी वर्णित करते हैं। शाखा के गुणवत्ता पूर्ण कार्यक्रम स्वयंसेवक में राष्ट्रत्व का जो भाव गढ़ते हैं वह स्वयंसेवक में स्पष्ट रूप से दिखाई भी देता है। इस भाव को आज आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। शाखा विस्तार के साथ साथ स्वयसेवकत्व के उक्त गुणों को भी बनाए रखना आवश्यक है। आज संघ के विचार को समाज के बीच ले जाने की भी महती अवस्यकता है। इसके लिए स्वयसेवकों को समाज के बीच में जाकर कार्य करने पड़ेंगे। समाज में वैचारिक विमर्श का निर्माण करने की आवस्यकता है। भारत को यदि परम वैभवशाली देश बनाना है तो समाज का मन अनुकूल रखना होगा। देश की अपनी व्यवस्थाओं के प्रति आस्था रखने वाला समाज तैयार करना होगा। नागरिक कर्तव्य के बोध को बढ़ावा देने वाला समाज होना चाहिए। आज भारत में कुछ शक्तियां समाज में छोटे छोटे विभेद को बड़ा करने का प्रयास करती हुई नजर आ रही है। समाज के बीच अनास्था का निर्माण करने का प्रयास किया जा रहा है। इस कार्य को समाज के बीच फैलाने के लिए प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक, सोशल मीडिया, आदि माध्यमों का उपयोग किया जा रहा है। अतः समाज के बीच राष्ट्रीय विचारधारा से ओतप्रोत विचार प्रसारित करने हेतु अकादमिंक जगत के नागरिकों को अपने साथ जोड़ना होगा एवं विमर्श तैयार करना होगा ताकि समाज को राष्ट्रानुकूल बनाया जा सके। आज समाज का प्रत्यक्ष आचरण बदलने की भी आवश्यकता है। समाज के बीच आपस में विषमता एवं कटुता के कुछ उदाहरण आज भी दिखाई देते हैं। इससे समाज में समरसता प्रभावित होती हुई दिखाई देती है। आचरण बदलने के लिए अपनी एक व्यवस्था खड़ी करने की आवश्यकता है, जिससे समाज को समरस बनाया जा सके। विभिन्न समाजों के बीच कटुता फैलाने के लिए कुछ बाहरी शक्तियां भी सक्रिय बनी हुई हैं। पंच परिवर्तन की प्रक्रिया को बल देकर समाज जीवन का आचरण बदलने के प्रयास किए जा सकते हैं। समाज में व्याप्त कुरीतियों को समाप्त करना होगा। पंच परिवर्तन की प्रक्रिया को स्वयं के आचरण में लाकर ही नागरिकों का स्वभाव भी बदला जा सकता है। इस संदर्भ में कुछ रचनाएं खड़ी करने एवं कार्यपद्धती विकसित करने की आवश्यकता भी होगी। यह सही है कि आज समाज जीवन में कुछ समस्याएँ भी दिखाई देती हैं। जैसे, भ्रष्टाचार, युवाओं में नशे का बढ़ता प्रभाव, कुटुंब विच्छेद,, जमीन के जल स्तर में कमी, रासायनिक खाद का बढ़ता उपयोग, महंगी हो रही शिक्षा, आदि। इन समस्याओं का समाधान कैसे करना है, इस विषय पर भी भी आज विचार करने की आवश्यकता है। इसी प्रकार समाज में आज कुछ चुनौतियां भी मुंह बाये खड़ी है, जैसे मतांतरण, बड़ी मात्रा में जनसंख्या असंतुलन, सीमावर्ति क्षेत्रों में जनसंख्या का परिवर्तन, आदि। हम हिंदू नहीं है इस भाव को भी समाज के बीच फैलाने के प्रयास हो रहे है। विच्छेद निर्माण करने वाले आंदोलन हो रहे हैं एवं समाज के बीच अलगाव को बढ़ावा देने के प्रयास कुछ विदेशी ताकतों द्वारा किए जा रहे हैं। इन चुनौतियों का उत्तर भी देने की आज आवश्यकता है। शासन तो अपना काम कर ही रहा है परंतु समाज को भी इस संदर्भ में आज जगाने की आवश्यकता है। इस महती कार्य में सम्पूर्ण समाज की सहभागिता आवश्यक है। समाज जीवन में वैचारिक विमर्श को लेकर सम्पूर्ण समाज को जोड़ना होगा। इस पुनीत कार्य में समाज की सहभागिता कैसे बढ़ाना इसके लिए गम्भीरता से काम करने की आज आवश्यकता है। देश के लिए कुछ अच्छा करने का भाव समाज के बीच जागृत हुआ है एवं एवं समाज में कुछ नागरिक देश के लिए अच्छा काम करना चाहते हैं। परंतु, इस प्रकार का भाव रखने वाले नागरिकों के बीच समन्वय किस प्रकार स्थापित हो, इसके बारे में आज विचार करने की आवश्यकता है। बहुत से नागरिक देश के हित में बहुत कुछ करना चाहते हैं, उन्हें अलग अलग कामों की रचनाओं के साथ किस प्रकार जोड़ा जाए, इस विषय पर भी विचार करने की आज आवश्यकता है। देश में विभिन्न धार्मिक संगठन, सामाजिक संगठन, सांस्कृतिक संगठन आदि भी भारत को परम वैभव तक ले जाने के उद्देश्य से कार्य कर रहे हैं, इन समस्त संगठनों के बीच समन्वय का कार्य किस प्रकार स्थापित किया जा सकता है, इस संदर्भ में भी कार्य करने की आज आवश्यकता है। आज सम्पूर्ण समाज को साथ लेने की मन:स्थिति समस्त स्वयसेवकों एवं समाज के जागरूक नागरिकों को बनाने की आवश्यकता है। सम्पूर्ण समाज को साथ लेने की कार्यपद्धती भी विकसित करने की आवश्यकता है। समाज जीवन में परिवर्तन के लिए समस्त समविचारी संगठनों को साथ में आना होगा। हिंदू धर्म एवं हिन्दू समाज की रक्षा करने का दायित्व इन समस्त संगठनों का है। इन संगठनों के बीच तालमेल विकसित करने की आज महती आवश्यकता है। प्रहलाद सबनानी सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक, भारतीय स्टेट बैंक के-8, चेतकपुरी कालोनी, झांसी रोड, लश्कर, ग्वालियर - 474 009

प्रभासाक्षी 7 Nov 2026 6:49 pm

यूपी में सरकार ने जो काम कराए हैं, उससे भाजपा पर जनता का भरोसा कायम : नितिन नवीन

यूपी में सरकार ने जो काम कराए हैं, उससे भाजपा पर जनता का भरोसा कायम : नितिन नवीन

समाचार नामा 7 Nov 2026 5:29 pm

तमिलनाडु: रिश्वत देने के आरोप में अन्नाद्रमुक नेता पीएम मन्नन से लगातार दूसरे दिन पूछताछ

तमिलनाडु: रिश्वत देने के आरोप में अन्नाद्रमुक नेता पीएम मन्नन से लगातार दूसरे दिन पूछताछ

समाचार नामा 7 Nov 2026 2:41 pm

गोरखपुर में वनटांगियों संग दीपावली की खुशियां साझा करेंगे सीएम योगी

गोरखपुर में वनटांगियों संग दीपावली की खुशियां साझा करेंगे सीएम योगी

समाचार नामा 7 Nov 2026 1:32 pm

UP में Owaisi ने चला नया दांव, Mayawati से गठबंधन की तैयारी, Bhim and Meem साथ आये तो सपा के समीकरण बिगड़ेंगे

उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मुस्लिम और दलित वोटों को लेकर नई सियासी गोलबंदी की कोशिश तेज हो गई है। AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए सीधे उनके मुस्लिम वोट बैंक को चुनौती देना शुरू कर दिया है। इसी के साथ ओवैसी की नजर मायावती की बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन पर है। ‘भीम और मीम’ के नाम से उभर रही यह पहल यूपी की सियासत में नए समीकरण बनाने और अखिलेश यादव की राजनीतिक पकड़ को चुनौती देने की कोशिश के तौर पर देखी जा रही है। दरअसल, उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं के बीच समाजवादी पार्टी लंबे समय से अपनी मजबूत राजनीतिक पकड़ का दावा करती रही है। अखिलेश यादव की राजनीति का एक महत्वपूर्ण आधार मुस्लिम-यादव समीकरण रहा है। लेकिन ओवैसी इसी समीकरण में सेंध लगाने की रणनीति के साथ मैदान में उतरते दिखाई दे रहे हैं। उनकी सभाओं में अब भाजपा से ज्यादा समाजवादी पार्टी और उसके नेतृत्व पर सवाल उठाए जा रहे हैं। ओवैसी का आरोप है कि चुनाव के वक्त मुस्लिम समुदाय से समर्थन मांगा जाता है, लेकिन सत्ता और राजनीतिक हिस्सेदारी के सवाल पर उसे अपेक्षित प्रतिनिधित्व नहीं मिलता। इसे भी पढ़ें: बेअसर रही पूर्व वायुसेना प्रमुख की चिट्ठी, मोदी सरकार ने वापस ले ली Race Course Air Force Station की 39.5 एकड़ जमीन ओवैसी की इस आक्रामकता के पीछे 2027 का चुनावी लक्ष्य साफ दिखाई देता है। वह उन विधानसभा क्षेत्रों में लगातार सभाएं कर रहे हैं, जहां समाजवादी पार्टी का प्रभाव रहा है। बहराइच के मटेरा से लेकर कैराना, रामपुर, मुरादाबाद, सहारनपुर और बिजनौर तक उनकी सभाओं का सिलसिला इसी रणनीति का हिस्सा है। कैराना की सभा में उन्होंने अखिलेश यादव पर परिवारवाद को लेकर निशाना साधा और आरोप लगाया कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों से पहले मुस्लिम प्रतिनिधि चुने जाते थे, लेकिन अब वहां भी यादव परिवार के सदस्यों को राजनीतिक अवसर मिल रहे हैं। रामपुर में आजम खान का मुद्दा उठाकर ओवैसी ने अखिलेश यादव के नेतृत्व पर एक और सवाल खड़ा किया। उन्होंने आरोप लगाया कि जब मुस्लिम नेताओं और कार्यकर्ताओं पर मुश्किलें आती हैं, तब समाजवादी पार्टी का नेतृत्व उतनी मजबूती से उनके साथ खड़ा नहीं होता, जितनी मजबूती से चुनाव के दौरान मुस्लिम मतदाताओं से समर्थन मांगता है। मुजफ्फरनगर दंगों का मुद्दा उठाकर भी वह अखिलेश सरकार के कार्यकाल को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। लेकिन ओवैसी की राजनीति का दूसरा और ज्यादा महत्वपूर्ण पहलू मायावती के साथ संभावित गठबंधन है। AIMIM के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली ने मीडिया से बातचीत में कहा कि उनकी पार्टी बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन चाहती है। उनका कहना है कि दलितों और मुसलमानों का सामाजिक गठजोड़ स्वाभाविक राजनीतिक साझेदारी हो सकता है। पार्टी ने 2027 के चुनाव में लगभग 100 सीटों पर तैयारी करने की बात भी कही है। यहीं से यूपी की जातीय और सामाजिक राजनीति में नए समीकरण की चर्चा तेज हो जाती है। राज्य की आबादी में दलितों की हिस्सेदारी लगभग 21 प्रतिशत और मुसलमानों की हिस्सेदारी करीब 19 प्रतिशत बताई जाती है। दोनों समुदायों की सामाजिक उपस्थिति और कई विधानसभा क्षेत्रों में उनका चुनावी प्रभाव इस प्रस्तावित गठबंधन को राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ला रहा है। हालांकि मायावती की ओर से इस गठबंधन पर सहमति का कोई औपचारिक ऐलान नहीं हुआ है। ओवैसी की नजर चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी पर भी है। देखा जाये तो ओवैसी के लिए बिहार का अनुभव भी इस रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में AIMIM ने 28 सीटों पर चुनाव लड़कर पांच सीटें जीती थीं। इसके बाद उत्तर प्रदेश में भी पार्टी अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान और सीटों पर दावेदारी को लेकर अधिक सक्रिय नजर आ रही है। इसके उलट 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में AIMIM ने 95 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन उसे कोई सीट नहीं मिली थी और पार्टी का कुल वोट प्रतिशत लगभग दो फीसदी रहा था। इस बीच, भाजपा भी ओवैसी की मायावती से नजदीकी की कोशिशों को राजनीतिक नजरिए से देख रही है। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने इसे सकारात्मक संकेत बताते हुए कहा कि यदि AIMIM और BSP साथ आते हैं तो मुस्लिम मतों के विभाजन का असर समाजवादी पार्टी पर पड़ सकता है। इस तरह, अखिलेश यादव के सामने अब चुनौती सिर्फ भाजपा से मुकाबले की नहीं, बल्कि अपने पारंपरिक राजनीतिक आधार को संभाले रखने की भी है। ओवैसी मुस्लिम मतदाताओं के बीच राजनीतिक हिस्सेदारी का सवाल उठा रहे हैं, जबकि मायावती के साथ संभावित गठबंधन की चर्चा दलित राजनीति को भी इस बहस के केंद्र में ला रही है। बहरहाल, यूपी की सियासत में चुनाव से पहले गठबंधन बनते और बिगड़ते रहे हैं, लेकिन इस बार ‘भीम और मीम’ की चर्चा ने मुकाबले के पुराने समीकरणों को फिर बहस में ला दिया है। सवाल यह है कि क्या ओवैसी और मायावती के बीच राजनीतिक तालमेल की जमीन तैयार होगी या यह पहल समाजवादी पार्टी पर दबाव बनाने की रणनीति तक सीमित रहेगी? फिलहाल इतना तय है कि 2027 की चुनावी बिसात पर मुस्लिम प्रतिनिधित्व, दलित नेतृत्व और राजनीतिक हिस्सेदारी के सवालों ने नई जगह बना ली है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 7 Nov 2026 11:30 am

अमित शाह जी, मोदी जी को कन्फ़्यूज़ न करें, बस उन्हें मेरे साथ खुली बहस के लिए मना लीजिए: राहुल

राहुल गांधी ने अमित शाह के दो वीडियो को साझा करते हुए पीएम मोदी को कन्फ्यूज़ नहीं करने को कहा है। एक वीडियो में शाह कहते हैं कि SIR पर बहस संसद में नहीं हो सकती है, दूसरे वीडियो में वह बहस के लिए विशेष सत्र की बात कहते हैं।

सत्य हिंदी 7 Nov 2026 2:19 am

तेलंगाना कांग्रेस नेता ने गृह मंत्री शाह पर सूखा राहत सहायता न देने का आरोप लगाया

तेलंगाना कांग्रेस नेता ने गृह मंत्री शाह पर सूखा राहत सहायता न देने का आरोप लगाया

समाचार नामा 6 Nov 2026 7:31 pm

गोल्ड ईटीएफ निवेशकों तीन साल में फोलियो 2.6 गुना बढ़े

मुंबई, सोने की कीमतों में लगातार आई तेजी के बीच निवेशकों का रुझान गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) की ओर तेजी से बढ़ा है। एक नई रिपोर्ट के अनुसार, गोल्ड ईटीएफ में निवेश और फोलियो की संख्या में पिछले तीन वर्षों के दौरान इतनी तेज वृद्धि हुई है कि इसने लार्ज-कैप इक्विटी फंडों को भी पीछे छोड़ दिया है।

देशबन्धु 6 Nov 2026 3:38 pm

'योगी सरकार के प्रयासों ने दीपोत्सव को दिलाई वैश्विक पहचान', भावविभोर संतों ने जताया आभार

'योगी सरकार के प्रयासों ने दीपोत्सव को दिलाई वैश्विक पहचान', भावविभोर संतों ने जताया आभार

समाचार नामा 6 Nov 2026 3:15 pm

योजनाओं के लाभ में वोटर ID की भूमिका पर विवाद, राहुल गांधी ने सरकार पर साधा निशाना

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार पहले मतदाता सूची से नाम हटाने और अब लोगों के कल्याणकारी योजनाओं के अधिकार सीमित करने की दिशा में बढ़ रही है। राहुल ने इस आशंका को “गहरी साजिश” बताया।

देशबन्धु 6 Nov 2026 2:30 pm

2028 तक स्मार्ट मीटर लक्ष्य हासिल करने के लिए रोजाना 2.5 लाख मीटर लगाने होंगे

नई दिल्ली, भारत को मार्च 2028 तक 25 करोड़ स्मार्ट मीटर लगाने के अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए इंस्टॉलेशन की रफ्तार में उल्लेखनीय तेजी लानी होगी, और इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए देश को प्रतिदिन लगभग 2.5 लाख स्मार्ट मीटर स्थापित करने होंगे।

देशबन्धु 6 Nov 2026 2:12 pm

बेअसर रही पूर्व वायुसेना प्रमुख की चिट्ठी, मोदी सरकार ने वापस ले ली Race Course Air Force Station की 39.5 एकड़ जमीन

दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास के आसपास की बेशकीमती सरकारी जमीनों को वापस लेने की मोदी सरकार की मुहिम अब भारतीय वायु सेना के स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स तक पहुंच गई है। नई दिल्ली के लोक कल्याण मार्ग स्थित एयरफोर्स स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स की 39.5 एकड़ जमीन अब केंद्र सरकार ने अपने कब्जे में ले ली है। खास बात यह है कि इस जमीन को वापस लेने के फैसले का विरोध खुद पूर्व वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने किया था। उन्होंने न केवल रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को पत्र लिखकर इस फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की थी, बल्कि व्यक्तिगत मुलाकात में भी अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी। इसके बावजूद सरकार का फैसला नहीं बदला और आखिरकार वायु सेना को यह जमीन आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय के भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) को सौंपनी पड़ी। देखा जाये तो यह घटनाक्रम कई मायनों में महत्वपूर्ण है। पहला सवाल यही है कि जब देश के वायु सेना प्रमुख रहे अधिकारी ने किसी जमीन के सामरिक और परिचालन महत्व का हवाला देते हुए उसे वायु सेना के पास ही रखने की मांग की, तब भी सरकार ने उनकी आपत्ति को तवज्जो क्यों नहीं दी? दरअसल, एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने 26 अक्टूबर को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को पत्र लिखा था। 29 अक्टूबर को मुलाकात के दौरान भी उन्होंने इस मामले को उठाया था। 31 अक्टूबर को उनका कार्यकाल समाप्त हो गया। एपी सिंह का तर्क था कि रेस कोर्स एयरफोर्स स्टेशन के भीतर स्थित स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स वहां की समग्र व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसे वायु सेना के नियंत्रण में ही रहना चाहिए। उन्होंने 2014 में तत्कालीन शहरी विकास मंत्रालय, रक्षा संपदा विभाग और वायु सेना के संयुक्त सर्वेक्षण का भी हवाला दिया था। वायु सेना की ओर से इस क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था और ड्रोन जैसे हवाई खतरों से निपटने में स्टेशन की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया गया था। इस परिसर में गोल्फ कोर्स, स्विमिंग पूल, बैडमिंटन कोर्ट और दूसरी खेल सुविधाएं थीं। लेकिन इन तमाम दलीलों का कोई असर नहीं हुआ। 28 अक्टूबर को परिसर बंद कर दिया गया और 5 नवंबर को 39.5 एकड़ जमीन औपचारिक रूप से केंद्र सरकार को सौंप दी गई। जमीन का हस्तांतरण 'जैसी है, जहां है' के आधार पर किया गया है। अब संबंधित विभाग संयुक्त सर्वेक्षण के जरिए जमीन का सटीक क्षेत्रफल निर्धारित करेंगे। देखा जाये तो इस पूरे घटनाक्रम को केवल एयरफोर्स के एक स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स की जमीन वापस लेने की कार्रवाई के रूप में देखना गलती होगी। दरअसल, केंद्र सरकार पिछले कुछ समय से प्रधानमंत्री आवास के आसपास की बेशकीमती जमीनों और संपत्तियों को अपने नियंत्रण में लेने की व्यापक मुहिम चला रही है। इससे पहले दिल्ली रेस क्लब की 53 एकड़ जमीन वापस ली जा चुकी है। जयपुर पोलो ग्राउंड भी सरकार के कब्जे में आ चुका है। दिल्ली जिमखाना क्लब की लगभग 27.3 एकड़ जमीन को लेकर भी कार्रवाई की गई है। अब एयरफोर्स स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स की जमीन भी इसी अभियान का हिस्सा बन गई है। यहां राजनीतिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार दिल्ली के उस इलाके में अपनी पकड़ मजबूत कर रही है, जहां दशकों से कई प्रतिष्ठित संस्थाएं और प्रभावशाली लोगों की गतिविधियां केंद्रित रही हैं। अंग्रेजों के दौर से चली आ रही क्लब संस्कृति, विशिष्ट संस्थानों और विशेषाधिकार प्राप्त व्यवस्थाओं पर सरकार की कार्रवाई को सत्ता के केंद्रीकरण और प्रशासनिक नियंत्रण के विस्तार के रूप में भी देखा जा सकता है। हम आपको यह भी बता दें कि इस मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि संबंधित 39.5 एकड़ जमीन को वायु सेना स्टेशन की मूल परिचालन भूमि के बजाय उसके साथ स्थित सरकारी जमीन बताया गया है। इस कार्रवाई के साथ एक तथ्य और उभर कर आया है कि मोदी सरकार ने यह संदेश दिया है कि किसी संस्थान का दशकों पुराना कब्जा सरकारी जमीन पर उसके अधिकार का स्थायी आधार नहीं हो सकता। बहरहाल, यह फैसला बताता है कि सरकार इस जमीन को लेकर अपनी योजना पर किसी तरह का समझौता करने के मूड में नहीं थी। एपी सिंह ने रक्षा मंत्री को पत्र लिखकर वायु सेना की सुरक्षा और भविष्य की जरूरतों का सवाल उठाया था, लेकिन उनकी दलीलें भी फैसले को नहीं बदल सकीं। अब इस जमीन का नियंत्रण आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय के पास होगा। इससे प्रधानमंत्री आवास के आसपास के विशाल भूखंडों पर सरकार की पकड़ और मजबूत होगी। देखा जाये तो असली राजनीतिक महत्व इस बात में है कि सरकार केवल जमीनों का स्वामित्व वापस नहीं ले रही, बल्कि राजधानी के सबसे प्रभावशाली इलाके में दशकों से चली आ रही संस्थागत व्यवस्थाओं और उनके विशेषाधिकारों को भी बदल रही है। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि सरकार इस जमीन का क्या इस्तेमाल करती है और क्या लोक कल्याण मार्ग के आसपास ऐसे दूसरे परिसरों को लेकर भी इसी तरह की कार्रवाई आगे बढ़ेगी। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 6 Nov 2026 12:44 pm

धनतेरस : गोल्ड-सिल्वर के दाम 4,500 रुपए तक की गिरावट

नई दिल्ली, धनतेरस के मौके पर सोना-चांदी खरीदने की योजना बना रहे ग्राहकों के लिए राहत भरी खबर है। आज के दिन घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों बाजारों में कीमती धातुओं की कीमतों में गिरावट देखने को मिली है। पिछले कुछ दिनों से सोने-चांदी में तेज उतार-चढ़ाव बना हुआ था, लेकिन हफ्ते के आखिरी कारोबारी दिन शुक्रवार को कीमतों में आई नरमी से खरीदारों को अपेक्षाकृत सस्ते भाव पर खरीदारी का मौका मिला है।

देशबन्धु 6 Nov 2026 12:22 pm

UGC नियमों पर सुप्रीम कोर्ट में मोदी सरकार के डांवाडोल रुख से बढ़ सकती है सवर्णों की चिंता!

यूजीसी के नए नियमों को लेकर शुरू हुआ विवाद अब शिक्षा संस्थानों की चारदीवारी से निकलकर सीधे सियासत के मैदान में पहुंच चुका है। यह मामला अब सिर्फ जातिगत भेदभाव रोकने के प्रावधानों का नहीं, बल्कि सवर्णों की नाराजगी, राजनीतिक दलों के जातीय समीकरण और वोट बैंक की लड़ाई का भी बन गया है। खासकर पांच राज्यों के आगामी विधानसभा चुनावों से पहले इस विवाद ने राजनीतिक दलों की चिंता बढ़ा दी है। इन नियमों के खिलाफ पहले भी सवर्ण समाज ने देशभर में जोरदार विरोध प्रदर्शन किया था और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था, जहां अदालत को इन पर रोक लगानी पड़ी थी। अब एक बार फिर नियमों की समीक्षा और उन्हें लेकर जारी राजनीतिक बहस ने चुनावी माहौल में नए सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यूजीसी विवाद के बहाने सवर्ण समाज की नाराजगी चुनावी मुद्दा बनेगी और इसका असर उन राज्यों के जातीय समीकरणों पर पड़ेगा, जहां बीजेपी की राजनीति काफी हद तक परंपरागत सामाजिक समर्थन पर टिकी रही है? यूजीसी विवाद की नई करवट और केंद्र का ताजा रुख हम आपको बता दें कि सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक हलचल यह है कि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि वह यूजीसी के 2026 के इक्विटी रेगुलेशन की समीक्षा के लिए एक समिति बनाने पर विचार कर रही है। यानी सरकार ने न तो नियमों को पूरी तरह वापस लेने का फैसला किया है और न ही उन्हें उसी रूप में लागू करने का। सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार से कहा है कि नियमों पर दोबारा विचार किया जाए, ताकि किसी भी छात्र के साथ भेदभाव न हो और सभी के हित सुरक्षित रहें। हम आपको याद दिला दें कि 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित इन नियमों का मकसद उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकना था। इसके तहत विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में इक्विटी कमेटी और समान अवसर केंद्र बनाने का प्रावधान किया गया। लेकिन नियमों में जातिगत भेदभाव की परिभाषा को लेकर विवाद खड़ा हो गया। खासतौर पर नियम 3(1)(c) में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी के खिलाफ जाति आधारित भेदभाव को जिस तरह परिभाषित किया गया, उसे सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए असमान व्यवस्था बताया गया। सवर्ण संगठनों और सामान्य वर्ग के छात्रों ने आशंका जताई कि इन प्रावधानों का इस्तेमाल उनके खिलाफ शिकायतों और उत्पीड़न के हथियार के रूप में हो सकता है। देखते ही देखते विरोध प्रदर्शन कई राज्यों तक फैल गए थे। उत्तर प्रदेश में इस विरोध ने बीजेपी के भीतर भी बेचैनी पैदा कर दी। पार्टी के कुछ पदाधिकारियों ने इस्तीफे तक दिए। आखिरकार 29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों पर रोक लगा दी और 2012 के पुराने नियमों को जारी रखने का आदेश दिया। अदालत ने प्रावधानों की अस्पष्टता और उनके संभावित दुरुपयोग पर गंभीर सवाल उठाए थे। अब मोदी सरकार की ओर से समीक्षा समिति बनाने की बात सामने आने के बाद इस पूरे विवाद ने फिर राजनीतिक रंग पकड़ लिया है। पांच राज्यों के चुनाव में बीजेपी के सामने जातीय समीकरण की चुनौती इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा राजनीतिक असर 2027 के विधानसभा चुनावों में दिखाई दे सकता है। उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में चुनाव होने हैं। इनमें उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड बीजेपी के लिए सत्ता की प्रतिष्ठा से जुड़े हैं, जबकि पंजाब में पार्टी अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में यूजीसी का मुद्दा पांचों राज्यों में अलग-अलग राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सबसे बड़ी परीक्षा होगी। यहां ब्राह्मण, ठाकुर और वैश्य मतदाता लंबे समय से बीजेपी के मजबूत समर्थक आधार का हिस्सा रहे हैं। राम मंदिर आंदोलन से लेकर हिंदुत्व के मुद्दे पर बीजेपी ने ब्राह्मण, ठाकुर और अन्य सवर्ण जातियों के बीच अपना मजबूत जनाधार तैयार किया है। लेकिन यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ सवर्ण समाज में जिस तरह नाराजगी सामने आई है, उससे बीजेपी के इस परंपरागत वोट बैंक में असंतोष बढ़ने और पार्टी के साथ उसके पुराने राजनीतिक रिश्ते कमजोर पड़ने की आशंका पैदा हो गई है। बीजेपी के लिए परेशानी यह है कि एक तरफ सामान्य वर्ग की नाराजगी है तो दूसरी तरफ ओबीसी और दलित मतदाताओं का बड़ा राजनीतिक आधार है। किसी एक पक्ष को नाराज करने का मतलब दूसरे पक्ष के बीच राजनीतिक संदेश जाना है। इस नाराजगी के संकेत उत्तर प्रदेश बीजेपी के संगठन में भी दिखाई दिए हैं। हाल के एमएलसी चुनावों में वाराणसी और लखनऊ जैसी सीटों पर पार्टी को मिली हार को भी सवर्ण असंतोष के संदर्भ में देखा जा रहा है। इसलिए बीजेपी के लिए यह महज एक शैक्षणिक नियम का विवाद नहीं, बल्कि अपने परंपरागत वोट बैंक को बचाने की लड़ाई बन गया है। उत्तराखंड में भी यह मुद्दा कम महत्वपूर्ण नहीं है। यहां सवर्ण मतदाताओं का राजनीतिक प्रभाव है और बीजेपी का परंपरागत समर्थन आधार भी इसी सामाजिक समीकरण से जुड़ा रहा है। यूजीसी विवाद को लेकर नाराजगी अगर चुनावी मुद्दा बनती है तो कांग्रेस को बीजेपी के खिलाफ सवर्ण असंतोष को भुनाने का अवसर मिल सकता है। हालांकि पंजाब में समीकरण कुछ अलग हैं। यहां दलित आबादी का अनुपात देश में सबसे अधिक है। ओबीसी और सामान्य वर्ग के मतदाताओं का भी महत्वपूर्ण प्रभाव है। बीजेपी के लिए चुनौती यह होगी कि वह सवर्ण मतदाताओं की नाराजगी दूर करने के साथ दलित और पिछड़े वर्गों के बीच अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता भी बनाए रखे। क्योंकि यूजीसी विवाद को विपक्ष सामाजिक न्याय और सामान्य वर्ग के अधिकारों के बीच टकराव के रूप में पेश कर सकता है। साथ ही गोवा और मणिपुर में इस मुद्दे का प्रभाव उत्तर प्रदेश जैसा व्यापक न भी हो, लेकिन उच्च शिक्षित युवाओं, विद्यार्थियों और सामान्य वर्ग के संगठित समूहों के बीच इसकी राजनीतिक गूंज दिखाई दे सकती है। सोशल मीडिया और छात्र संगठनों के माध्यम से यह मुद्दा स्थानीय चुनावी बहस का हिस्सा बन सकता है। बीजेपी के लिए दोहरी राजनीतिक मुश्किल सबसे दिलचस्प बात यह है कि बीजेपी के सामने इस विवाद में दोहरी चुनौती है। अगर सरकार नियमों को पूरी तरह वापस लेती है या उनमें बड़ा बदलाव करती है तो सामाजिक न्याय के मुद्दे पर विपक्ष को हमला करने का मौका मिलेगा। वहीं अगर नियमों को पुराने स्वरूप में लागू करने की कोशिश होती है तो सवर्ण समाज की नाराजगी दोबारा भड़क सकती है। साथ ही विपक्ष के लिए यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में बीजेपी को बड़ा राजनीतिक झटका लगा था। संविधान और आरक्षण को लेकर विपक्ष के अभियान ने पिछड़े और दलित मतदाताओं के बीच असर डाला था। अब यूजीसी विवाद के जरिए विपक्ष सवर्ण असंतोष को भी बीजेपी के खिलाफ जोड़ने की कोशिश कर सकता है। देखा जाये तो केंद्र सरकार का सुप्रीम कोर्ट में समीक्षा समिति बनाने का संकेत इसी राजनीतिक दबाव के बीच आया है। यह फैसला फिलहाल विवाद को ठंडा करने की कोशिश जरूर है, लेकिन असली सवाल नियमों के अंतिम स्वरूप का है। बहरहाल, यूजीसी विवाद बीजेपी के लिए ऐसी राजनीतिक पहेली बन गया है जिसमें एक तरफ सवर्ण वोट बैंक है और दूसरी तरफ दलित-पिछड़े वर्गों का समर्थन। पांच राज्यों के चुनाव से पहले सरकार को इसी पहेली का जवाब तलाशना है। अगर यह मुद्दा चुनाव तक गर्म रहा तो उत्तर प्रदेश में इसका असर सबसे ज्यादा दिखाई दे सकता है। यूजीसी के नियम भले ही विश्वविद्यालयों के लिए बनाए गए हों, लेकिन अब उनका भविष्य दिल्ली की सत्ता, राज्यों की राजनीति और बीजेपी के चुनावी गणित से जुड़ चुका है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 6 Nov 2026 12:22 pm

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में छात्र संघ चुनाव के नतीजे घोषित, नोमान अशरफ अध्यक्ष चुने गए, नशरा नईम बनीं पहली महिला उपाध्यक्ष

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में छात्र संघ चुनाव के नतीजे घोषित, नोमान अशरफ अध्यक्ष चुने गए, नशरा नईम बनीं पहली महिला उपाध्यक्ष

समाचार नामा 6 Nov 2026 9:35 am

रक्षा मंत्री राजनाथ और गृह मंत्री शाह सहित कई नेताओं ने दी धनतेरस की शुभकामनाएं

रक्षा मंत्री राजनाथ और गृह मंत्री शाह सहित कई नेताओं ने दी धनतेरस की शुभकामनाएं

समाचार नामा 6 Nov 2026 9:31 am

क्या हिंदुत्व सनातन से अलग हो सकता है, दिग्विजय सिंह स्पष्ट करें: वीएचपी प्रवक्ता विनोद बंसल

क्या हिंदुत्व सनातन से अलग हो सकता है, दिग्विजय सिंह स्पष्ट करें: वीएचपी प्रवक्ता विनोद बंसल

समाचार नामा 5 Nov 2026 11:23 pm

दिल्ली गैस चैंबर बनने की ओर, 22 इलाकों में AQI 400 के पार

राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण लगातार गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है। गुरुवार को लगातार चौथे दिन शहर की हवा बहुत खराब श्रेणी में दर्ज की गई

देशबन्धु 5 Nov 2026 10:41 pm

टीवीके सरकार को कोई खतरा नहीं : थोल थिरुमावलवन

टीवीके सरकार को कोई खतरा नहीं : थोल थिरुमावलवन

समाचार नामा 5 Nov 2026 7:27 pm

जम्मू-कश्मीर : जेल सुरक्षा और कैदी कल्याण पर समीक्षा बैठक, एलजी ने की अध्यक्षता

जम्मू-कश्मीर : जेल सुरक्षा और कैदी कल्याण पर समीक्षा बैठक, एलजी ने की अध्यक्षता

समाचार नामा 5 Nov 2026 7:26 pm

पंजाब सरकार के कर्मचारियों ने डीए में बढ़ोतरी को किया खारिज; 13 नवंबर से शुरू होगा आंदोलन

पंजाब सरकार के कर्मचारियों ने डीए में बढ़ोतरी को किया खारिज; 13 नवंबर से शुरू होगा आंदोलन

समाचार नामा 5 Nov 2026 7:20 pm

अग्निपथ योजना के विस्तार का पंजाब भाजपा ने किया स्वागत, पीसीएस परीक्षा में गड़बड़ी पर जांच की मांग

अग्निपथ योजना के विस्तार का पंजाब भाजपा ने किया स्वागत, पीसीएस परीक्षा में गड़बड़ी पर जांच की मांग

समाचार नामा 5 Nov 2026 5:39 pm

आंध्र प्रदेश में चक्रवात मुरासु का असर कमजोर, बारिश से मिली राहत

आंध्र प्रदेश में चक्रवात मुरासु का असर कमजोर, बारिश से मिली राहत

समाचार नामा 5 Nov 2026 5:20 pm

'संसद में सोते हैं, बाहर बहस की बात करते हैं', राहुल गांधी की चुनौती पर भाजपा का तीखा तंज

'संसद में सोते हैं, बाहर बहस की बात करते हैं', राहुल गांधी की चुनौती पर भाजपा का तीखा तंज

समाचार नामा 5 Nov 2026 5:18 pm

तेहरान में तख्तापलट का ख्वाब, वॉशिंगटन में हो गया रिजीम चेंज? $5000 का अन्नादुराई स्टाइल दांव भी नहीं बचा सका ट्रंप का तख्त!

साल 1967 भारत का मद्रास राज्य जो वर्तमान में तमिलनाडु के नाम से जाना जाता है। प्रदेश में सूखे के कारण अनाज की भारी कमी थी और कीमतें बहुत अधिक थीं। विधानसभा चुनाव अपने चरम पर थे। तभी इस संकट के बीच डीएमके के संस्थापक सी. एन अन्नादुरई ने एक चुनावी नारा दिया- मूंड्रू पडी लट्चियम, ओरू पडी निचयम। मतलब तीन पडी चावल हमारा लक्ष्य है, लेकिन एक पडी चावल निश्चित रूप से दिया जाएगा। एक रुपये में 3 माप (लगभग 4.5 किलोग्राम) के इस लोक-लुभावन वादे ने जनता को आकर्षित किया और डीएमके ने कांग्रेस को हराकर पहली बार भारी बहुमत से सत्ता हासिल की। ये और बात है कि भले ही अन्नादुरई अपने समय में इसे पूरी तरह लागू नहीं कर पाए, लेकिन उनके इस विचार ने तमिलनाडु की राजनीति में हमेशा के लिए सस्ते अनाज और राशन की नींव रख दी। लगभग छह दशक बाद और आधी दुनिया दूर, चुनावी लोकतंत्र का यह खेल आज भी नहीं बदला है। जब महंगाई और आर्थिक दबाव से जूझते अमेरिकी नागरिकों को रिझाने के लिए डोनाल्ड ट्रंप हर नागरिक के खाते में $5,000 भेजने जैसा लुभावना दांव चलते हैं, तो यह अन्नादुरई के उसी 1967 वाले प्रयोग की आधुनिक और हाई-टेक पुनरावृत्ति जैसा दिखता है। अमेरिका में जब कभी भी चुनाव होते हैं तो उसके रिजल्ट का असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। खासकर की जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हो और मिड टर्म के नतीजे इतने पाथ ब्रेकिंग हो। मतलब जो दशकों में नहीं देखा गया था। जो बाइडेन के जाने के बाद जब ट्रंप की वापसी हो गई तो लगता था कि अमेरिका अब कई दशक तक रेड वेब की ही चपेट में रहेगा। भारत, कनाडा, यूरोप जैसे जो ट्रंप पीड़ित थे, इस बात की भी तैयारी करने लगे थे कि ट्रंप का रिप्लेसमेंट अगर ट्रंप का ही मानस पुत्र या पुत्री निकला तो फिर कहां जाएंगे। लेकिन मिड टर्म में वो फटका पड़ा है कि आने वाले दो साल हिचकोले खाते हुए बीतने वाले हैं। ट्रंप की हरकतों के चलते रिपब्लिकन पार्टी ने सेनेट और हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव दोनों जगह अपना बहुमत खो दिया है। डेमोक्रेट्स के पास अब सीनेट में 54 सीटें और हाउस में 228 सीट है। जिन अब्दुल अल सईद को ट्रंप ने जिहादी कह दिया था। कहा था कि मेटल डिटेक्टर से निकलवाऊंगा, अब जेडी वेंस उन्हीं को शपथ दिलवाएंगे। हाउस को हफीम जेफरीज के रूप में पहला ब्लैक स्पीकर भी मिल गया है। गवर्नरशिप के मामले में भी डेमोक्रेट्स ने रिपब्लिककंस को पछाड़ा है। 28 सूबों में डेमोक्रेट्स के गवर्नर जीते हैं। 2009 के बाद पहली बार डेमोक्रेट्स ने ये रिकॉर्ड तोड़ा है। इसे भी पढ़ें: हारते ही भारत पर टूट पड़े ट्रंप, 9 कंपनियों को हिला डाला कम से कम 47 बार ट्रंप ने बयान दिया था कि अमेरिका को ऐसे वोट डालना चाहिए जैसे मैं ही चुनाव लड़ रहा हूं। उन्हें लगा कि इसका फायदा पार्टी को होगा, लेकिन इसका उल्टा ही हो गया। ट्रंप की पिछली दो साल की गलतियों का खामियाजा रिपब्लिकन पार्टी को भुगतना पड़ा। टेक्सस, साउथ कैरोलिना, ट्रांसिस, आयोवा और ओहायो जैसे कट्टर रिपब्लिकन स्टेट्स में ब्लू वेब आ गई है। नेतन्याहू के साथ मिलकर डोनाल्ड ट्रंप ने सोचा था कि ईरान में हम रिजीम चेंज कर लाएंगे और नोबेल प्राइज मिल जाएगा। पूरी दुनिया का नक्शा ही बदल देंगे। लेकिन रिजीम चेंज डोनाल्ड ट्रंप को मिल तो गया वो भी अपने ही देश में मिल गया। रिजीम चेंज से मतलब ऐसा बिल्कुल नहीं है कि डोनाल्ड ट्रंप अपना ऑफिस छोड़कर जा रहे हैं। लेकिन रिजीम चेंज से मतलब ये कि अमेरिकन टर्मनलॉजी में कहे तो एक लेम डक प्रेसिडेंट बनकर ही रहेंगे। डेमोक्रेट्स की आंधी ने ट्रंप के किले को हरा कर रख दिया है। लेकिन इसके बावजूद ट्रंप का अहंकार वो जस का तस है। वो डेमोक्रेट्स के हर नेहले पर दहला फेंकने की तैयारी कर रहे हैं। इसका दावा कर रहे हैं। कई हफ्तों तक ट्रंप अपने समर्थकों से अपील करते रहे कि वे ऐसे वोट करें जैसे राष्ट्रपति पद के लिए खुद ट्रंप खड़े हो। उन्हें उम्मीद थी कि इससे रिपब्लिकन उम्मीदवारों को फायदा होगा। लेकिन जब नतीजे खराब आए तो उन्होंने इस बात को मानने से ही इंकार कर दिया कि मिड टर्म चुनावों का नतीजा उनके खिलाफ जनमत का किसी तरह का कोई संकेत है। आमतौर पर ट्रंप के समर्थन वाले उम्मीदवारों को चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करते देखा गया है। लेकिन इस बार वो वोटरों को अपने पक्ष में करने में नाकाम रहे। टेक्सस के सेनेट चुनाव में पैक्स्टन को हार का सामना करना पड़ा। जबकि ट्रंप ने उनका समर्थन किया था। नॉर्थ कैरोलना के सेनेट चुनाव में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार रॉय कूपर को हराने के लिए ट्रंप ने माइकल वाटली को चुना था। लेकिन वाइटली यह मुकाबला हार गए। ओहायो में भी ट्रंप ने विवेक रामास्वामी के लिए रास्ता लगभग साफ कर दिया था। इसे भी पढ़ें: US Midterm Elections में Republican Party की हार पर Donald Trump ने झाड़ा पल्ला अमेरिका के कई हिस्सों से आए ऐसे ही चौंकाने वाले नतीजों के लिए ट्रंप ने ईरान युद्ध को भी जिम्मेदार मानने से इंकार किया है। जबकि इसी युद्ध के बाद से ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग में सबसे बड़ी गिरावट आई है। अमेरिकी अखबार है, नाम है वॉल स्ट्रीट जनरल। से बातचीत में डोनल्ड ट्रंप ने कहा कि नतीजे खराब आने की वजहों में युद्ध महज एक छोटा हिस्सा है। उन्होंने बढ़ती कीमतों के लिए जिम्मेदार अपनी टेरिफ नीति को भी मानने से इंकार किया। जब बल्कि नतीजों के बाद भी उन्होंने यही कहा कि उनकी सरकार का एजेंडा पहले की तरह ही आगे बढ़ता रहेगा। तो क्या ऐसे में यह मान लिया जाए कि मिड टर्म चुनाव में हार के बावजूद डॉनल्ड ट्रंप ने अभी कोई सबक नहीं सीखा है। इसे भी पढ़ें: US Midterm Elections में Republican Party की हार पर Donald Trump ने झाड़ा पल्ला भारत के लिए क्या है नतीजे के मायने? भारत के लिए सबसे बड़ा लाभ कम कच्चे तेल की कीमतों के रूप में सामने आ सकता है। इससे आयात बिल घटेगा, रुपये पर दबाव कम होगा और महंगाई को नियंत्रण में रखने में मदद मिलेगी। साथ ही कमजोर डॉलर और नरम ट्रेजरी यील्ड विदेशी निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता बढ़ा सकते है, जिससे भारतीय बाजारों में निवेश प्रवाह को समर्थन मिल सकता है। डेमोक्रेट्स कैसे कर कते है बेअसर? विधायी व्यवस्था के अनुसार, राष्ट्रपति का वीटो पूरी तरह से अंतिम नहीं होता। अगर अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनो हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट दोबारा दो-तिहाई बहुमत से उस विधेयक को पारित कर देते है तो राष्ट्रपति का वीटो बेअसर हो जाता है और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बिना भी विधेयक कानून बन जाता है। इसे भी पढ़ें: Republican सांसद Thomas Massie ने Pete Hegseth से मांगा इस्तीफा, Impeachment की दी चेतावनी पहले 100 घंटे US और दुनिया के लिए क्यो महत्वपूर्ण ? हकीम जेफ्रीज ने हाउस के शुरुआती 100 घंटों में आम लोगों के खर्च का बोझ कम करने के लिए बड़ा कानूनी कदम उठाने का वादा किया है। उनकी प्राथमिकताओं में एक्सपायर हो चुकी अफोर्डेबल केयर एक्ट की हेल्थ इंश्योरेंस सब्सिडी बहाल करना, ट्रंप के कार्यकाल में मेडिकेड में की गई करीब 1 ट्रिलियन डॉलर की कटौती वापस लेना और टैरिफ हटाना शामिल है। डेमोक्रेट्स ईरान में लड़ाई खत्म करने पर भी जोर देंगे, जिससे ईंधन की कीमतें बढ़ी है।दोनों सदनों में बहुमत के साथ वे अपने प्रस्तावों पर वोट करा सकते है हालांकि, बजट को लेकर टकराव से सरकारी शटडाउन का खतरा भी है।

प्रभासाक्षी 5 Nov 2026 4:45 pm

पप्पू यादव का भाजपा की रैली पर तीखा तंज, कहा-‘देश में संविधान को कौन नहीं मान रहा, जनता सब जानती है’

पप्पू यादव का भाजपा की रैली पर तीखा तंज, कहा-‘देश में संविधान को कौन नहीं मान रहा, जनता सब जानती है’

समाचार नामा 5 Nov 2026 4:30 pm

गृह लक्ष्मियों के सशक्तीकरण पर भी ध्यान दें..

दीपावली की आहट सुनाई देने लगी है। घर-दुकान से लेकर कार्यालय आदि की साफ-सफाई का दौर चल रहा है। धन की देवी की बाट ताकती दुनिया को पता है कि भले ही उनकी सवारी उल्लू है, लेकिन उनकी कृपा उसी जगह होती है। जहां स्वच्छता होती है। लेकिन यह स्वच्छता आती कैसे है? बिना उद्यम और परिश्रम के क्या सफाई संभव है। मतलब साफ है कि बिना उद्यम के लक्ष्मी का आना संभव नहीं। हमारी परंपरा में घर-परिवार की महिलाओं-कन्याओं को भी देवी का ही रूप माना जाता है। बिनु घरनी घर भूत का डेरा, हमारे यहां यह माना जाता रहा है। यानी घर में जब घरनी या महिला होती है, तो वह सिर्फ महिला, पत्नी, बेटी, बहन या मां ही नहीं रह जाती, बल्कि घर की लक्ष्मी हो जाती है। घर की लक्ष्मी जब समर्थ होती है तो परिवार खुशहाल होता है। इन्हीं संदर्भो में याद आती है भारत सरकार की लखपति दीदी योजना। मोदी सरकार की कोशिशों से अब देश में तीन करोड़ महिलाएं लखपति दीदी बन चुकी हैं। अब भारत सरकार का लक्ष्य है कि इस संख्या को छह करोड़ तक पहुंचाया जाए। इस योजना की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अब कई दीदियां करोड़पति बन चुकी हैं या फिर उनका स्वयंसहायता समूह करोड़पति हो चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इतिहास में अपनी कई अनूठी पहलों के लिए याद किए जाएंगे। उनमें से ही एक अनूठी पहल है, लखपति दीदी योजना। इस योजना की शुरूआत उन्होंने स्वतंत्रता दिवस के दिन 15 अगस्त 2023 को किया था। इसके तहत अगले साल के केंद्रीय बजट में इसे औपचारिक रूप से देश भर में लागू करने का प्रावधान किया गया। इस योजना का नोडल केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय है। जिसके तहत चल रही दीनदयाल अंत्योदय योजना, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन को इस योजना को लागू करने की जिम्मेदारी दी गई है। इसके तहत ग्रामीण क्षेत्रों में स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को कौशल विकास की ट्रेनिंग देकर आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है, ताकि वे सालाना कम से कम ₹1 लाख की स्थायी आय अर्जित कर सकें। महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने वाली इस योजना के तहत उन्हें एलईडी बल्ब बनाने, प्लंबिंग, ड्रोन चलाने और रिपेयरिंग जैसे तकनीकी काम तो सिखाए ही जा रहे हैं, उन्हें स्थानीय स्तर पर काम करने और दस्तकारी आदि को बढ़ावा देने की भी कोशिश की जा रही है। शुरू में इस योजना के जरिए दो करोड़ महिलाओं को 'लखपति दीदी' बनाने का लक्ष्य रखा गयॉ था, जिसे फरवरी 2024 के अंतरिम बजट में बढ़ाकर तीन करोड़ कर दिया गया और यह लक्ष्य भी हासिल किया जा चुका है। इस योजना के तहत राज्य सरकारों की मदद से बैंकों से स्वयं सहायता समूहों को सस्ते दर पर कर्ज दिलाया जा रहा है। अच्छी बात यह है कि ज्यादातर दीदियां इस कर्ज से ना सिर्फ अपना काम बढ़ा रही हैं, बल्कि बैंकों को कर्ज की किश्तें भी नियमित रूप से चुका रही हैं। हाल ही में विजयवाड़ा में आयोजित दिल्ली के बाहर सरस मेले के दौरान केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस लक्ष्य को छह करोड़ करने का ऐलान किया और कहा कि अगले तीन साल में इस लक्ष्य को हासिल कर लिया जाएगा। इस दस्तकारों और स्वयंसहायता समूहों द्वारा निर्मित सामानों को बाजार उपलब्ध कराने की दृष्टि से केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय 1999 से ही दिल्ली में सरस मेले का आयोजन करता रहा है। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा शुरू किए गए इस बाजार को अब तक दिल्ली में ही लगाया जाता रहा है। लेकिन इस साल पहली बार विजयवाड़ा में 13 से 31 अक्टूबर तक विजयवाड़ा में यह आयोजन किया गया। इस आयोजन में विशेष रूप से सफल लखपति और करोड़पति दीदियों के काम को प्रदर्शित किया गया। इसी आयोजन में झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले लखपति दीदी मीनू रक्षित से मुलाकात हुई। ग्यारह महिला सदस्यों की सहायता से शुरू उनके ग्रुप का टर्न ओवर अब पचास लाख सालाना से ज्यादा हो गया है। इसका असर यह हुआ है कि कभी मजदूरी करके जीने वाला उनका परिवार अब आत्मनिर्भर हो गया है और ना सिर्फ उनके परिवार में खुशहाली आई है, बल्कि उनके समूह में शामिल महिलाओं की भी स्थिति सुधरी है। साबुन बनाने से शुरू हुआ उनका काम अब 35 तरह के घरेलू उत्पाद बना रहा है और देशभर से उनके माल की मांग बढ़ रही है। कुछ ऐसी ही कहानी रही राजस्थान के बीकानेर से इस मेले में शामिल होने आई राजीविका मिशन से जुड़ी ममता की भी कहानी है। बीकानेर अपने नमकीन के लिए मशहूर पहले से ही है। ममता भी अपने घर में अपने खाने-पीने के लिए नमकीन बनाती रहीं। लेकिन लखपति दीदी योजना से जुड़ने के बाद उनके समूह की ग्यारह महिलाओं का जैसे भाग्य ही बदल गया। महज तीन साल में ही इस समूह का सालाना टर्नओवर बारह लाख से ज्यादा हो गया है। इसका असर यह हुआ है कि इस समूह की महिलाएं अपने घर की आर्थिक मदद करने लगी हैं। अपने बच्चों के खर्च के लिए उन्हें किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ रहा। लखीमपुर से आई शमीमा की भी कुछ ऐसी ही कहानी रही। आज उनका समूह चमड़े के जूते-चप्पल बना रहा है। इस काम में उनके पति सहयोग करते हैं और उनके समूह का टर्नओवर साठ लाख को पार कर चुका है। इसे भी पढ़ें: Kerala High Court स्थापना दिवस पर बोले Arjun Ram Meghwal, केरल ने दिखाया महिला नीत विकास का रास्ता भारत में प्रबंधन की पढ़ाई के लिए मशहूर भारतीय प्रबंधन संस्थान यानी आईआईएम, अहमदाबाद ने हाल ही में लखपति दीदी योजना को लेकर एक शोध किया है। संस्थान ने अपने अध्ययन में देश के सत्रह राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के 6531 महिलाओं के काम को शामिल किया है। इस अध्ययन के मुताबिक लखपति दीदियों के परिवारों की आय में 61 फीसद तक का इजाफा देखा गया है। इसकी वजह से परिवारों की मासिक बचत में करीब 61.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। मार्च 2026 में खत्म हुए अध्ययन के अनुसार, करीब 48 प्रतिशत लखपति दीदियों के कारोबार में पिछले एक साल में विस्तार हुआ है। इसका असर यह हुआ है कि अब लखपति दीदियों के काम करने का दायरा भी बढ़ा है। अब वे एक साथ करीब-करीब दो-दो काम कर रही है। इस अध्ययन के मुताबिक एक लखपति दीदी की कामयाबी से दूसरी महिलाओं को भी प्रेरणा मिली और उन्होंने भी समूह बनाकर इस योजना का फायदा उठाया और अपनी आर्थिक स्थिति बेहतर की। घर की लक्ष्मी भले ही महिला को माना जाता रहा हो, लेकिन पारंपरिक परिवारों के अहम फैसलों में महिलाओं की राय की भूमिका कम रही है। लेकिन लखपति दीदियों की राय को पारिवारिक फैसलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आईआईएम के अध्ययन के अनुसार 36 प्रतिशत से ज्यादा लखपति दीदियों का कहना है कि पारिवारिक मामलों में उनकी राय का वजन बढ़ा है, साथ ही करबी 30.5 प्रतिशत दीदियों का मानना है कि उन्हें इस योजना के जरिए आर्थिक स्वायत्तता मिली है। आईआईएम अहमदाबाद की अध्ययन रिपोर्ट बताती है कि इस योजना से ग्रामीण समाज में भी बदलाव दिख रहा है। मराठी की एक कहावत है कि एक शिक्षित महिला के चलते सात पीढ़ियों तक शिक्षा का बदलाव दिखता है। कुछ इसी तर्ज पर कह सकते हैं कि लखपति दीदी योजना के चलते भारतीय समाज बदलाव के नए दौर में कदम रख चुका है। सोचिए अगर देश की छह करोड़ महिलाएं सालाना कम से कम एक लाख रूपए की आय वाली होंगी तो इसका क्या असर होगा। निश्चित तौर पर छह करोड़ परिवार गरीबी रेखा की सीमा को कुछ और फांद जाएंगे। लक्ष्मी पूजन के मौके पर लखपति दीदी योजना को इस रूप में भी देखा जाना चाहिए। उमेश चतुर्वेदी लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं..

प्रभासाक्षी 5 Nov 2026 4:00 pm

गोकुल दूध उत्पादकों ने हराया तो बीजेपी ने चेयरमैन चुनाव के नियम बदल दिए, यह वोट चोरी है: राहुल

कोल्हापुर की गोकुल सहकारी डेयरी चुनाव में हार के बाद बीजेपी ने नियम बदलकर 4 सरकारी डायरेक्टर नामित करने का फ़ैसला ले लिया। अब चेयरमैन की नियुक्ति डायरेक्टर ही करेंगे। राहुल गांधी ने बीजेपी पर 'दूध उत्पादकों के वोट चुराने' का आरोप लगाया है।

सत्य हिंदी 5 Nov 2026 1:48 pm

भारतीय शेयर बाजार : सेंसेक्स 1,600 अंक से ज्यादा उछला, निफ्टी में 1.80 प्रतिशत की तेजी

मुंबई, अमेरिकी मध्यावधि (मिडटर्म) चुनावों के नतीजों और कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट से मिले सकारात्मक संकेतों के बीच भारतीय शेयर बाजार ने गुरुवार को जोरदार शुरुआत की। इस दौरान प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी करीब 2 प्रतिशत की बढ़त के साथ खुले और बाजार में सभी प्रमुख सेक्टरों में खरीदारी देखने को मिली।

देशबन्धु 5 Nov 2026 1:21 pm

बढ़ तो रही है मगर बूढ़ी हो रही है भारत की आबादी! Supreme Court के फैसले से देश के सामने उभरी नई चिंता

भारत में जनसंख्या नियंत्रण कानून की मांग करने वालों के लिए सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी एक बड़ा झटका है। जिस देश में बढ़ती आबादी को सबसे बड़ी चुनौती बताकर दो बच्चों की नीति लागू करने की मांग जोर-शोर से उठाई जा रही थी, उसी देश में अब प्रजनन दर (Total Fertility Rate यानी TFR) इतनी नीचे पहुंच चुकी है कि सुप्रीम कोर्ट को दो बच्चों से अधिक संतान होने पर चुनाव लड़ने से रोकने वाले कानूनों की प्रासंगिकता पर ही सवाल उठाना पड़ा है। हम आपको बता दें कि 4 नवंबर को आए फैसले में अदालत ने साफ कहा है कि दो से अधिक बच्चे होने पर लोगों को दंडित करने वाले कानून अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं। यह टिप्पणी केवल किसी एक राज्य के पंचायत चुनाव या किसी एक महिला की चुनावी पात्रता तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के बदलते जनसांख्यिकीय भविष्य की तरफ एक बड़ा संकेत है। हम आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की अगुवाई में महाराष्ट्र की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव इंगले के मामले की सुनवाई करते हुए 2003 के ऐतिहासिक जावेद बनाम हरियाणा राज्य फैसले पर पुनर्विचार के लिए मामला बड़ी पीठ को भेज दिया था। उस समय अदालत ने दो बच्चों से अधिक संतान होने पर पंचायत चुनाव लड़ने से रोकने वाले हरियाणा के कानून को वैध ठहराया था। लेकिन अब अदालत के सामने तस्वीर बदल चुकी है। वर्ष 2003 में भारत की कुल प्रजनन दर 3.02 थी, जो 2024 में घटकर 1.9 रह गई है। अदालत ने स्पष्ट किया कि 2.1 की प्रजनन दर को प्रतिस्थापन स्तर माना जाता है, यानी वह स्तर जिस पर एक पीढ़ी अपनी संख्या अगली पीढ़ी में बनाए रख सकती है। भारत इस सीमा से नीचे जा चुका है। जनसंख्या का आंकड़ा बड़ा, लेकिन परिवार छोटे हो रहे हैं देखा जाये तो इस पूरे मामले को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। भारत की कुल आबादी अभी भी बढ़ रही है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि भारतीय परिवारों में बच्चों की संख्या भी बढ़ रही है। देश की आबादी में वृद्धि का एक बड़ा कारण Demographic Momentum है। यानी पहले के दशकों में पैदा हुई बड़ी आबादी अब युवा और प्रजनन योग्य आयु में है। इसलिए प्रति महिला बच्चों की औसत संख्या घटने के बावजूद कुल जन्म और आबादी में वृद्धि जारी रह सकती है। यही वह तथ्य है जिसे जनसंख्या नियंत्रण कानून की मांग करने वाली बहस अक्सर नजरअंदाज कर देती है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले में 1971 से 2024 के बीच प्रजनन दर में आई गिरावट का भी उल्लेख है। इस अवधि में TFR 5.2 से घटकर 1.9 हो गई। NFHS-5 के आंकड़ों में भी 2019-21 के दौरान यह दर 2.0 दर्ज की गई थी। अदालत ने 2024 के लिए NFHS-6 के आंकड़ों का हवाला देते हुए लगभग 2.0 का उल्लेख किया है। यानी भारत में छोटा परिवार अब केवल सरकारी नारा नहीं, बल्कि सामाजिक वास्तविकता बन चुका है। हालांकि इस राष्ट्रीय औसत के पीछे क्षेत्रीय असमानताएं भी हैं। बिहार में TFR 3.0, उत्तर प्रदेश में 2.4 और मेघालय में 2.9 दर्ज की गई थी, जबकि दिल्ली में 1.6, पश्चिम बंगाल में 1.6 और महाराष्ट्र में 1.7 थी। ये NFHS-5 के राज्यवार आंकड़े हैं। इसका मतलब है कि पूरे देश पर एक समान दो बच्चों का कानूनी प्रतिबंध थोपने का आधार और भी कमजोर पड़ता है। देश के अलग-अलग राज्यों की जनसांख्यिकीय परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं। दो बच्चे की नीति से आगे बढ़ चुकी है भारत की तस्वीर देखा जाये तो सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में एक और बेहद महत्वपूर्ण पहलू उठाया है। दो से अधिक बच्चे होने पर चुनाव लड़ने से रोकने का कानून केवल जनसंख्या नियंत्रण का मामला नहीं है, बल्कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व और महिलाओं के अधिकारों से भी जुड़ा है। महाराष्ट्र की मंगला भीमराव इंगले को तीसरी संतान होने के कारण सरपंच पद के लिए अयोग्य ठहराया गया था। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति की सार्वजनिक पद संभालने की योग्यता का उसके बच्चों की संख्या से सीधा संबंध नहीं है। ऐसे प्रतिबंध महिलाओं को प्रजनन संबंधी फैसले और लोकतांत्रिक भागीदारी के बीच चुनाव करने के लिए मजबूर करते हैं। भारत के सामने अब बढ़ती आबादी नहीं, बूढ़ी होती आबादी की चुनौती साथ ही इस फैसले का सबसे गंभीर पहलू देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने जापान और चीन के उदाहरणों का उल्लेख करते हुए बताया कि कम प्रजनन दर के परिणाम कितने गंभीर हो सकते हैं। चीन ने पहले एक बच्चे की नीति अपनाई, लेकिन बाद में दो और फिर तीन बच्चों की अनुमति देनी पड़ी। इसके बावजूद वहां जन्म दर में अपेक्षित उछाल नहीं आया। भारत के लिए यह एक महत्वपूर्ण चेतावनी है। अदालत के मुताबिक देश में 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की हिस्सेदारी 2014 के 8.3 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में 9.7 प्रतिशत हो गई है और 2036 तक इसके करीब 15 प्रतिशत पहुंचने का अनुमान है। इससे कामकाजी आबादी का अनुपात घटने, पेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा पर खर्च बढ़ने का खतरा है। यही वह बिंदु है जहां जनसंख्या नियंत्रण कानून की मांग और वास्तविक जनसांख्यिकीय आंकड़ों के बीच टकराव दिखाई देता है। भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी रही है। यही आबादी उद्योग, सेना, कृषि, सेवा क्षेत्र और उपभोग आधारित अर्थव्यवस्था को गति देती है। लेकिन यदि आने वाले दशकों में युवाओं का अनुपात तेजी से घटता है तो भारत के सामने श्रमशक्ति की कमी और बुजुर्गों की बढ़ती निर्भरता जैसी चुनौतियां खड़ी होंगी। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जनसंख्या संबंधी नीति का आधार अब बदलती वास्तविकताओं के अनुरूप होना चाहिए। अदालत ने यहां तक कहा कि पहले जिस अधिक आबादी को विकास में बाधा माना जाता था, आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं और स्वस्थ जनसंख्या वृद्धि की जरूरत पर भी ध्यान देना होगा। बहरहाल, अदालत का यह फैसला भारत की जनसंख्या बहस में एक निर्णायक मोड़ है। देश की आबादी का विशाल होना और देश की प्रजनन दर का कम होना दो अलग-अलग तथ्य हैं। इन्हें एक ही नजरिये से देखना भविष्य की बड़ी गलती साबित हो सकता है। दो बच्चों की अनिवार्यता और तीसरी संतान पर राजनीतिक अधिकार छीनने जैसी व्यवस्थाओं के औचित्य पर अब सुप्रीम कोर्ट ने ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर कानून बनाने की मांग करने वालों के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब देश प्रतिस्थापन प्रजनन दर से नीचे जा चुका है, तब और अधिक प्रतिबंधों की मांग आखिर किस जनसांख्यिकीय वास्तविकता पर आधारित है? -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 5 Nov 2026 12:57 pm

समाजवादी पार्टी सत्ता में आई तो 24 घंटे में खत्म करेंगे अग्निवीर व्यवस्था : अवधेश प्रसाद

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समाचार नामा 5 Nov 2026 12:37 pm

'प्रदर्शन का अधिकार दूसरे की आजीविका छीनने का लाइसेंस नहीं', कैट ने राहुल से पूछे सवाल, 'धिक्कार दिवस' मनाने का ऐलान

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समाचार नामा 5 Nov 2026 9:23 am

PM Modi का शरद पवार को फोन, बोले- सुप्रिया अब तैयार हैं, आप आराम कीजिए; विलय की अटकलों के बीच चर्चा

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समाचार नामा 5 Nov 2026 7:47 am

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय ने छात्रों से उच्च लक्ष्य रखने और नशे से दूर रहने का आग्रह किया

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समाचार नामा 4 Nov 2026 8:21 pm

अमेरिका में अब्दुल एल-सैयद की जीत का जिक्र कर ओवैसी बोले-यूपी में भी 'अब्दुल' बनेगा नेता

अमेरिका में अब्दुल एल-सैयद की जीत का जिक्र कर ओवैसी बोले-यूपी में भी 'अब्दुल' बनेगा नेता

समाचार नामा 4 Nov 2026 8:14 pm

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने चक्रवात प्रभावित जिलों का किया हवाई सर्वेक्षण

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने चक्रवात प्रभावित जिलों का किया हवाई सर्वेक्षण

समाचार नामा 4 Nov 2026 7:51 pm

1984 सिख दंगों की पीड़िता निरप्रीत कौर की मांग, 1 नवंबर को मनाया जाए 'काला दिवस'

1984 सिख दंगों की पीड़िता निरप्रीत कौर की मांग, 1 नवंबर को मनाया जाए 'काला दिवस'

समाचार नामा 4 Nov 2026 7:44 pm

गहलोत का भाजपा पर निशाना, बोले- लोकतांत्रिक इतिहास में पहली बार 'सत्ताधारी विपक्ष' का उदय

गहलोत का भाजपा पर निशाना, बोले- लोकतांत्रिक इतिहास में पहली बार 'सत्ताधारी विपक्ष' का उदय

समाचार नामा 4 Nov 2026 7:25 pm

'पहली बार सत्ता पक्ष विपक्ष के खिलाफ सड़कों पर उतरा', भाजपा की पदयात्रा पर बोलीं आराधना मिश्रा

'पहली बार सत्ता पक्ष विपक्ष के खिलाफ सड़कों पर उतरा', भाजपा की पदयात्रा पर बोलीं आराधना मिश्रा

समाचार नामा 4 Nov 2026 7:22 pm

पश्चिम बंगाल की राजनीतिक लड़ाई में 'बेबी-ममता' की नजदीकियों से वामपंथियों के बीच बेचैनी बढ़ी

पश्चिम बंगाल की राजनीतिक लड़ाई में 'बेबी-ममता' की नजदीकियों से वामपंथियों के बीच बेचैनी बढ़ी

समाचार नामा 4 Nov 2026 6:26 pm

यूपी में भाजपा की पदयात्रा का मेगा प्लान 'लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ' के राजनीतिक निहितार्थ

उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में भाजपा नीत राजग (NDA) और कांग्रेस नीत इंडी (INDIA) गठबंधन का मजबूत साथी समाजवादी पार्टी के बीच काँटे की टक्कर के आसार हैं! भाजपा भले ही दलितों और ओबीसी को पटाने के चक्कर में सवर्णों की सरजमीनी नाराजगी मोल ले चुकी है, जबकि समाजवादी नेता व उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पिछड़ा दलित अल्पसंख्यक (PDA) वोटरों को अपनी ओर खींचकर और कांग्रेस को साथ लेकर लोकसभा चुनाव 2024 और विधान परिषद चुनाव 2026 में भाजपा को अपनी मजबूत राजनीतिक ताकत का एहसास करवा चुके हैं। ऐसे में यूपी के सवर्ण वोटर यदि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ नाथ के सुशासन और विकास को ध्यान में रखते हुए भाजपा से जुड़े रहते हैं तो भाजपा मुकाबले में रहेगी, अन्यथा दलित और ओबीसी कानूनों को मजबूत करने और पूंजीवादी राज को प्रश्रय देने की कीमत उसे अपनी राज्य और केंद्र की सत्ता (2029) गंवा कर चुकानी पड़ेगी, जबकि भाजपा किसी भी कीमत पर यूपी की सत्ता गंवाना नहीं चाहती है। यही वजह है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने विपक्ष के राजनीतिक नैरेटिव को चुनौती देने के लिए नई रणनीति बनाई है? इसे भी पढ़ें: पंजाब की सियासत में 'कमल' की दस्तक और आम आदमी पार्टी का अंतर्विरोध भाजपा की यह पदयात्रा महज जनसंपर्क अभियान नहीं है बल्कि इसके पीछे उसकी संगठनात्मक शक्ति प्रदर्शन, विपक्ष की घेराबंदी और चुनावी मुद्दों की दिशा तय करने की व्यापक कोशिश भी है। यदि भाजपा अपने दिग्गज नेताओं के मतभेद को काबू में करने में सफल हो जाती है तो लखनऊ में उसकी तीसरी सरकार बनने का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा, क्योंकि वह कैडर बेस पार्टी है। उत्तर प्रदेश में भाजपा की 'लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ' पदयात्रा के मेगा प्लान में बड़े बड़े नेताओं को लगाना इन्हीं राजनीतिक संदर्भों में समझना चाहिए। यह अभियान ऐसे समय हो रहा है, जब प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे तेज हो रही हैं और भाजपा तथा विपक्ष के बीच चुनावी प्रक्रिया, संवैधानिक संस्थाओं और राजनीतिक विरोध के तौर-तरीकों को लेकर गंभीर बहस चल रही है। सबसे पहले जानिए कि आखिर पदयात्रा का कार्यक्रम क्या है? प्राप्त जानकारी के मुताबिक, भाजपा ने 3 से 5 नवंबर 2026 तक उत्तर प्रदेश के सभी छह संगठनात्मक क्षेत्रों में पदयात्राएं आयोजित करने की योजना बनाई है। इसका घोषित उद्देश्य लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के प्रति जागरूकता बढ़ाना और विपक्ष के आरोपों का जवाब देना है। इस सिलसिले में निर्धारित प्रमुख कार्यक्रम इस प्रकार हैं: तारीख, स्थान और प्रमुख नेतृत्व: 3 नवंबर को लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, और केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पदयात्रा की और वोटरों के मूड को बदलने का सकारात्मक प्रयास किया। वहीं, 3 नवंबर को ही बरेली में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, और केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी ने पदयात्रा की और वोटरों के मूड को समझने की सफल कोशिश की। वहीं, 4 नवंबर को गोरखपुर में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पदयात्रा करेंगे। वहीं, 4 नवंबर को ही प्रयागराज में उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य पदयात्रा करेंगे। वहीं, 4 नवंबर को ही कानपुर में उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक पदयात्रा करेंगे। वहीं, 5 नवंबर को गाजियाबाद में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पदयात्रा होगी। तीन नवंबर को लखनऊ में लोकभवन से परिवर्तन चौक तक पदयात्रा का आयोजन किया गया है। पार्टी ने इसमें बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं और विभिन्न सामाजिक वर्गों की भागीदारी का लक्ष्य रखा और उसे पूरा किया। दूसरा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि आखिर विपक्ष के नैरेटिव का जवाब देने की भाजपा की रणनीति कितनी जबर्दस्त है? इस पदयात्रा का पहला राजनीतिक निहितार्थ विपक्ष की ओर से उठाए जा रहे सवालों का जवाब देना है, क्योंकि विपक्ष चुनावी प्रक्रिया, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठा रहा है। जबकि भाजपा का कहना है कि चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाकर जनता के बीच भ्रम पैदा किया जा रहा है। इसलिए भाजपा ने 'लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ' जैसा दूरगामी असर वाला राजनीतिक संदेश चुना है। इसका अर्थ है कि पार्टी बहस को विपक्ष के आरोपों से हटाकर विपक्ष के विरोध प्रदर्शन, राजनीतिक आचरण और लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति उसके रवैये पर केंद्रित करना चाहती है। हालांकि, विपक्ष के आरोपों का जवाब केवल राजनीतिक सभाओं से नहीं, बल्कि पारदर्शी तथ्यों और संस्थागत जवाबदेही से भी देना आवश्यक होगा। तीसरा महत्वपूर्ण सवाल है कि आखिर एसआईआर और मतदाता सूची की बहस का राजनीतिक महत्व क्या है? इस अभियान के पीछे मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) भी एक महत्वपूर्ण संदर्भ है। इस मुद्दे पर दो अलग-अलग राजनीतिक दृष्टिकोण सामने हैं: एक, भाजपा का पक्ष: मतदाता सूची को शुद्ध और अद्यतन रखना स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव के लिए आवश्यक है। पार्टी इस प्रक्रिया के प्रति जनजागरूकता बढ़ाना चाहती है। दो, विपक्ष का पक्ष: मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया में पात्र मतदाताओं के नाम छूटने, पारदर्शिता और प्रशासनिक निष्पक्षता को लेकर आशंकाएं उठाई जा रही हैं। यहां महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या मतदाता सूची का पुनरीक्षण पूरी पारदर्शिता, उचित सूचना और आपत्ति दर्ज कराने के प्रभावी अवसर के साथ हो रहा है? लोकतंत्र में मतदाता सूची की शुद्धता जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी प्रत्येक पात्र नागरिक का मतदान का अधिकार सुरक्षित रखना भी है। इसलिए पदयात्रा के राजनीतिक संदेश के साथ-साथ एसआईआर पर तथ्यात्मक संवाद भी इस अभियान की कसौटी रहेगा। चौथा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि योगी आदित्यनाथ की राजनीतिक भूमिका और नेतृत्व का प्रदर्शन कैसा रहेगा? इस पदयात्रा में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सक्रिय भागीदारी के कई राजनीतिक पहलू हैं। एक, सरकार और संगठन के बीच तालमेल का प्रदर्शन: मुख्यमंत्री के साथ केंद्रीय मंत्रियों, भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व और प्रदेश संगठन के प्रमुख नेताओं की भागीदारी से अभियान को राष्ट्रीय और प्रादेशिक दोनों स्तरों पर महत्व मिलता है। दो, नेतृत्व की सार्वजनिक सक्रियता: पदयात्रा के माध्यम से मुख्यमंत्री और वरिष्ठ नेता सीधे कार्यकर्ताओं तथा नागरिकों के बीच उपस्थित होते हैं। इससे चुनाव से पहले संगठनात्मक संपर्क को सक्रिय रखने का अवसर मिलता है। तीन, 2027 के चुनाव की पृष्ठभूमि। योगी आदित्यनाथ की विभिन्न क्षेत्रों में भागीदारी को आगामी विधानसभा चुनाव से पहले नेतृत्व की राजनीतिक सक्रियता के संदर्भ में देखा जा सकता है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन और केंद्रीय मंत्रियों की भागीदारी इस कार्यक्रम को केवल स्थानीय संगठनात्मक गतिविधि तक सीमित नहीं रहने देती। पांचवां सवाल यह है कि यूपी के छह संगठनात्मक क्षेत्रों में पदयात्रा का क्या संदेश है? इस अभियान का एक महत्वपूर्ण पहलू इसका भौगोलिक विस्तार है। भाजपा ने केवल लखनऊ में एक बड़ी रैली आयोजित करने के बजाय छह संगठनात्मक क्षेत्रों में अलग-अलग पदयात्राओं की योजना बनाई है। इसके तीन संभावित संगठनात्मक उद्देश्य हैं: एक, कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना: स्थानीय इकाइयों, जनप्रतिनिधियों और पार्टी पदाधिकारियों को चुनावी तैयारी के लिए सक्रिय रखना। दो, स्थानीय संपर्क बढ़ाना: व्यापारियों, शिक्षकों, अधिवक्ताओं, चिकित्सकों, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों तक पहुंच बनाना। तीन, एक समान राजनीतिक संदेश: प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में एक ही नारे और राजनीतिक मुद्दे को सामने रखना। भाजपा की तैयारियों में सामाजिक और व्यावसायिक वर्गों की भागीदारी बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है। छठा प्रासंगिक सवाल यह है कि विपक्ष के सामने क्या राजनीतिक चुनौतियां हैं? इस अभियान से विपक्ष के सामने भी कुछ महत्वपूर्ण राजनीतिक सवाल खड़े होते हैं। एक, क्या विपक्ष मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया पर अपने आरोपों को ठोस प्रमाणों के साथ जनता के सामने रख पाएगा? दो, क्या समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इन मुद्दों पर एक साझा राजनीतिक दृष्टिकोण विकसित कर पाएंगे? तीन, क्या विपक्ष केवल विरोध की राजनीति तक सीमित रहेगा या रोजगार, महंगाई, किसानों, शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों को भी समान महत्व देगा? चार, क्या विपक्ष भाजपा के इस अभियान के जवाब में जनता के बीच अपनी बात रखने के लिए प्रभावी जनसंपर्क कर पाएगा? यहां एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक तथ्य भी समझना चाहिए। सरकार की नीतियों की आलोचना करना और चुनावी संस्थाओं से सवाल पूछना अपने आप में अराजकता नहीं है। उसी तरह शांतिपूर्ण राजनीतिक विरोध लोकतंत्र का वैध हिस्सा है। किसी भी पक्ष के आरोपों और दावों का मूल्यांकन प्रमाणों के आधार पर होना चाहिए। सातवां सवाल है कि आखिर भाजपा के लिए असली परीक्षा क्या होगी? पदयात्रा में कितनी भीड़ जुटती है, कितने बड़े नेता शामिल होते हैं और कितने स्थानों पर कार्यक्रम होते हैं, ये सभी संगठनात्मक गतिविधि के मापदंड हो सकते हैं। लेकिन इनसे अपने आप जनता के राजनीतिक समर्थन या चुनावी परिणाम का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। भाजपा के लिए वास्तविक सवाल होंगे: एक, क्या अभियान के माध्यम से आम नागरिकों की समस्याओं पर संवाद होगा? दो, क्या रोजगार और युवाओं के अवसरों पर ठोस चर्चा होगी? तीन, क्या किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े सवालों को पर्याप्त जगह मिलेगी? चार, क्या कानून-व्यवस्था और विकास संबंधी दावों को जमीनी अनुभवों से परखा जाएगा? पांचवां, क्या SIR से जुड़ी आशंकाओं का तथ्यात्मक समाधान प्रस्तुत किया जाएगा? इसी तरह विपक्ष के लिए भी जरूरी होगा कि वह केवल राजनीतिक आरोपों के बजाय प्रमाण, वैकल्पिक नीतियां और जनता से जुड़े मुद्दे प्रस्तुत करे। आठवां सवाल है कि 2027 के विधानसभा चुनाव पर इसका संभावित राजनीतिक प्रभाव क्या पड़ेगा? इस अभियान को 2027 के विधानसभा चुनाव की शुरुआती राजनीतिक तैयारियों के एक हिस्से के रूप में देखा जा सकता है। इसके संभावित प्रभावों को चार बिंदुओं में समझा जा सकता है। एक, संगठनात्मक सक्रियता: कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेतृत्व को सक्रिय रखने का अवसर। दो, राजनीतिक विमर्श: चुनावी प्रक्रिया और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर बहस को प्रमुखता देना। तीन, विपक्ष की रणनीति: भाजपा के आरोपों का तथ्यात्मक जवाब देने की चुनौती। चार, चुनावी मुद्दे: शासन, विकास, रोजगार और कानून-व्यवस्था के मुद्दों पर नई बहस। लेकिन यह अभियान भाजपा को कितना राजनीतिक लाभ देगा, इसका आकलन अभी करना जल्दबाजी होगी। इसके लिए जनता की प्रतिक्रिया, स्थानीय मुद्दों और आगामी राजनीतिक घटनाक्रम को देखना होगा। नौवां सवाल यह है कि इस अभियान के व्यापक लोकतांत्रिक निहितार्थ क्या-क्या हैं? इस पदयात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसके नाम और संदेश से जुड़ा है। 'लोकतंत्र बचाओ' और 'अराजकता हटाओ' दोनों ही ऐसे नारे हैं जिनके राजनीतिक और संवैधानिक अर्थ हैं। लेकिन लोकतंत्र की रक्षा किसी एक राजनीतिक दल की जिम्मेदारी नहीं है। इसके लिए कुछ बुनियादी शर्तें आवश्यक हैं:- एक, चुनाव आयोग और संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता। दो, मतदाता के मतदान अधिकार की सुरक्षा। तीन, सरकार की जवाबदेही और पारदर्शिता। चार, विपक्ष को शांतिपूर्ण विरोध और आलोचना की स्वतंत्रता। पांच, राजनीतिक दलों द्वारा संवैधानिक मर्यादाओं का पालन। यदि इस अभियान के दौरान इन विषयों पर सार्थक चर्चा होती है, तो इसका महत्व केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा। अंतिम सवाल यह है कि क्या भाजपा 2027 की चुनावी राजनीति का एजेंडा तय करने की कोशिश में है? तो जवाब होगा कि उत्तर प्रदेश की यह मेगा पदयात्रा भाजपा की तीन समानांतर कोशिशों को सामने लाती है- संगठन को सक्रिय रखना, विपक्ष के राजनीतिक आरोपों का जवाब देना और 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अपने राजनीतिक विमर्श को स्थापित करना। इसके जवाब में विपक्ष के सामने भी अपनी बात तथ्यों और जनहित के मुद्दों के आधार पर रखने की चुनौती है। हालांकि, लोकतंत्र की असली कसौटी यह नहीं है कि किस दल ने कितनी बड़ी पदयात्रा निकाली या किसने कितना बड़ा नारा दिया? असली कसौटी यह है कि नागरिकों के अधिकार कितने सुरक्षित हैं, संस्थाएं कितनी निष्पक्ष हैं, सरकार कितनी जवाबदेह है और राजनीतिक दल जनता के वास्तविक सवालों को कितना महत्व देते हैं? यही इस पूरे अभियान का सबसे बड़ा राजनीतिक और लोकतांत्रिक निहितार्थ है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 4 Nov 2026 4:11 pm

पंजाब की सियासत में 'कमल' की दस्तक और आम आदमी पार्टी का अंतर्विरोध

पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 की तारीखें अभी आधिकारिक तौर पर घोषित नहीं हुई हैं, लेकिन राज्य की राजनीतिक बिसात पर शह और मात का खेल अपने चरम पर पहुंच चुका है। आम आदमी पार्टी द्वारा 31 अक्टूबर 2026 को अपने 40 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी किए जाने के ठीक बाद, पार्टी के भीतर सुलग रही असंतोष की चिंगारी एक बड़े विस्फोट में बदल गई है। अमृतसर नॉर्थ से विधायक और पूर्व आईपीएस अधिकारी कुंवर विजय प्रताप सिंह, समाना से विधायक व पूर्व स्वास्थ्य मंत्री चेतन सिंह जौड़ामाजरा, और सनौर से विधायक हरमीत सिंह पठानमाजरा का एक साथ पाला बदलकर भारतीय जनता पार्टी में शामिल होना केवल तीन विधायकों का इस्तीफा नहीं है, बल्कि यह भगवंत मान सरकार और आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के लिए एक गहरा राजनीतिक और नैतिक झटका है। नई दिल्ली में भाजपा के केंद्रीय कार्यालय में 2 नवंबर 2026 को जिस तरह इन नेताओं को पार्टी की सदस्यता दिलाई गई, उसने इस चर्चा को फिर से हवा दे दी है कि क्या पंजाब में भी भाजपा का बहुचर्चित 'ऑपरेशन लोटस' पूरी ताकत से सक्रिय हो चुका है। इस राजनीतिक उठापटक को समझने के लिए इसके कालक्रम और पृष्ठभूमि को देखना अनिवार्य है। विपक्षी खेमे और राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, पंजाब में आम आदमी पार्टी को कमजोर करने या सत्ता परिवर्तन की इस पटकथा की शुरुआत हाल-फिलहाल में नहीं हुई, बल्कि इसकी जड़ें काफी गहरी हैं। मार्च 2024 और उसके बाद के महीनों में जब आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसदों का एक बड़ा धड़ा, जिसमें राघव चड्ढा और डॉ. संदीप पाठक जैसे प्रमुख चेहरे शामिल थे, धीरे-धीरे पार्टी लाइनों से दूर हुआ और बाद में 7 राज्यसभा सांसदों के एक गुट ने तकनीकी रूप से भाजपा के साथ विलय का रास्ता चुना, तभी से पंजाब की सत्ताधारी पार्टी के भीतर दरारें साफ दिखाई देने लगी थीं। उस समय भी मुख्यमंत्री भगवंत मान ने इसे 'गद्दारी' करार दिया था और केंद्रीय एजेंसियों के दबाव में किया गया दलबदल बताया था। इसके बाद जब भगवंत मान सरकार ने जालंधर में अपना शक्ति प्रदर्शन करने के लिए विधायकों की बैठक बुलाई, तो 94 विधायकों में से केवल 65 विधायक ही वहां पहुंचे। यह इस बात का स्पष्ट संकेत था कि पार्टी के लगभग 29 विधायक या तो नेतृत्व से नाराज थे या किसी अन्य राजनीतिक विकल्प की तलाश में थे। अब, नवंबर 2026 की शुरुआत में तीन सिटिंग विधायकों का इस्तीफा देना इसी सिलसिले की अगली और अधिक आक्रामक कड़ी है। इसे भी पढ़ें: Punjab में Congress कार्यकर्ताओं को Mallikarjun Kharge का संदेश, एकजुटता से ही मिलेगी पूरे देश में जीत संसदीय लोकतंत्र में जब भी किसी राज्य में सत्ताधारी दल के विधायक विपक्षी दल में शामिल होते हैं, तो सत्ता पक्ष द्वारा इसे 'ऑपरेशन लोटस' की संज्ञा दी जाती है। आम आदमी पार्टी का आरोप है कि भाजपा धनबल, बाहुबल और केंद्रीय जांच एजेंसियों जैसे प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई के डर का इस्तेमाल कर लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकारों को अस्थिर करने का प्रयास कर रही है। देश के राजनीतिक इतिहास में कर्नाटक, मध्य प्रदेश और गोवा जैसे राज्यों में सरकारों का गिरना या विधायकों का बड़े पैमाने पर दलबदल करना इस रणनीति का हिस्सा माना जाता रहा है। पंजाब के संदर्भ में भी, तीन विधायकों के भाजपा में जाने के बाद आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल और मुख्यमंत्री भगवंत मान ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उनका तर्क है कि पंजाब की जनता ने 2022 में आम आदमी पार्टी को 92 सीटों का प्रचंड बहुमत देकर बदलाव की जो जिम्मेदारी सौंपी थी, भाजपा उसे चोर दरवाजे से हथियाना चाहती है। हालांकि, इस सिक्के का दूसरा पहलू भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पार्टी छोड़ने वाले विधायकों ने जो आरोप लगाए हैं, वे केवल राजनीतिक अवसरवाद की कहानी नहीं कहते, बल्कि वे शासन और प्रशासन की गंभीर विफलताओं की ओर इशारा करते हैं। इस्तीफा देने वाले तीनों नेताओं—कुंवर विजय प्रताप, चेतन सिंह जौड़ामाजरा और हरमीत सिंह पठानमाजरा—ने मीडिया के सामने आकर अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा किया है। कुंवर विजय प्रताप सिंह, जिन्होंने 2015 के कोटकपूरा और बहबल कलां गुरु ग्रंथ साहिब बेअदबी मामले की जांच करने वाली एसआईटी का नेतृत्व किया था, लंबे समय से आम आदमी पार्टी की कार्यप्रणाली से असंतुष्ट चल रहे थे। उनका आरोप है कि जिस बेअदबी मामले को सुलझाने और दोषियों को सजा दिलाने के वादे पर आम आदमी पार्टी सत्ता में आई थी, उस पर मान सरकार ने जानबूझकर ढीली पैरवी की और राजनीति की। इसके अतिरिक्त, उन्होंने पंजाब के 'स्कूल्स ऑफ एमिनेंस' के दावों पर सवाल उठाए और राज्य में फैले माफिया राज की निंदा की। वहीं, पूर्व मंत्री चेतन सिंह जौड़ामाजरा और हरमीत सिंह पठानमाजरा ने सीधे तौर पर पंजाब में बढ़ते नशे (चिट्टा) के कारोबार, कानून-व्यवस्था के ध्वस्त होने, बेलगाम गैंगस्टर संस्कृति और राज्य पर बढ़ते ढाई लाख करोड़ रुपये के कर्ज को अपनी नाराजगी का कारण बताया। इन नेताओं का सबसे गंभीर आरोप यह है कि पंजाब की चुनी हुई सरकार को चंडीगढ़ से नहीं, बल्कि दिल्ली में बैठे कुछ खास लोगों और उनके सलाहकारों (जैसे विभव कुमार) द्वारा चलाया जा रहा है, जिससे स्थानीय विधायकों और मंत्रियों की गरिमा को ठेस पहुंची है। इस मोड़ पर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आने वाले दिनों में आम आदमी पार्टी के कितने और विधायक या नेता भाजपा का दामन थाम सकते हैं? राजनीतिक गलियारों और खुफिया रिपोर्टों में यह चर्चा आम है कि आम आदमी पार्टी के कम से कम 20 से 30 विधायक भाजपा और कांग्रेस के संपर्क में हैं। विशेष रूप से वे विधायक, जिन्हें डर है कि 2027 के चुनावों में उनका टिकट काटा जा सकता है, या जो भगवंत मान की कार्यशैली से लंबे समय से असंतुष्ट हैं, वे बहुत जल्द बड़ा कदम उठा सकते हैं। भाजपा के पंजाब प्रभारी सतीश पूनिया और राज्य इकाई के अध्यक्ष के अनुसार, यह केवल शुरुआत है और आने वाले दिनों में आम आदमी पार्टी के कई और बड़े चेहरे भाजपा में शामिल होंगे क्योंकि 'झाड़ू' का कुनबा पूरी तरह बिखर चुका है। पार्टी के भीतर असंतोष का मुख्य कारण टिकट वितरण की नीति और हाल ही में किए गए संगठनात्मक बदलाव हैं। उदाहरण के लिए, समाना निर्वाचन क्षेत्र में चेतन सिंह जौड़ामाजरा की अनदेखी कर शिरोमणि अकाली दल के पूर्व वरिष्ठ नेता सुरजीत सिंह रखड़ा को हलका इंचार्ज बना दिया गया, जिससे जौड़ामाजरा का टिकट कटना तय माना जा रहा था। इसी प्रकार, कई अन्य क्षेत्रों में भी पुराने वफादारों को दरकिनार कर पैराशूट नेताओं को तरजीह दी जा रही है, जो आने वाले समय में एक बड़ी भगदड़ का कारण बन सकता है। भाजपा के लिए पंजाब हमेशा से एक कठिन राजनीतिक मैदान रहा है, विशेष रूप से तीन कृषि कानूनों के विरोध में हुए किसान आंदोलनों के बाद से ग्रामीण क्षेत्रों में पार्टी को भारी विरोध का सामना करना पड़ा था। लेकिन अब, शिरोमणि अकाली दल के कमजोर होने और आम आदमी पार्टी के भीतर मचे इस घमासान के बीच, भाजपा पंजाब में अपने दम पर एक मजबूत विकल्प के रूप में उभरने की कोशिश कर रही है। आम आदमी पार्टी के कद्दावर हिंदू और सिख चेहरों को अपने पाले में लाकर भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि वह राज्य के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने के लिए तैयार है। पूर्व आईपीएस अधिकारी और सिख चेहरे के रूप में कुंवर विजय प्रताप की साफ-सुथरी छवि का उपयोग भाजपा माझा और मालवा क्षेत्रों में अपनी पैठ बढ़ाने के लिए करेगी। वहीं जौड़ामाजरा और पठानमाजरा जैसे जमीनी नेताओं के आने से पटियाला और उसके आसपास के जिलों में भाजपा का सांगठनिक ढांचा मजबूत होगा। भाजपा का यह रणनीतिक कदम स्पष्ट करता है कि वह पंजाब में केवल एक छोटी हिस्सेदार बनकर नहीं रहना चाहती, बल्कि 2027 में 'डबल इंजन' की सरकार बनाने के लक्ष्य के साथ आगे बढ़ रही है। दरअसल पंजाब की राजनीति इस समय एक बेहद संवेदनशील और अनिश्चित मोड़ पर खड़ी है। आम आदमी पार्टी जिसे अपनी सबसे सुरक्षित राजनीतिक जागीर समझ रही थी, वहां आंतरिक कलह और अंतर्विरोधों के कारण दरारें साफ दिखने लगी हैं। पहली लिस्ट आते ही जो बगावत शुरू हुई है, उसने यह साबित कर दिया है कि सत्ता का अति-केंद्रीकरण और विधायकों की आवाज को दबाना किसी भी राजनीतिक दल के लिए आत्मघाती हो सकता है। यह घटनाक्रम केवल विधायकों के दलबदल का मामला नहीं है, बल्कि यह पंजाब की जनता के उस जनादेश की परीक्षा है जो उसने पारंपरिक पार्टियों को नकार कर एक 'इंकलाब' के नाम पर दिया था। यदि भगवंत मान और अरविंद केजरीवाल समय रहते अपने विधायकों के असंतोष को दूर करने और शासन व्यवस्था में सुधार करने में विफल रहते हैं, तो पंजाब में कमल का खिलना केवल समय की बात रह जाएगी। आगामी महीनों में होने वाले दलबदल और गठबंधन के नए समीकरण ही यह तय करेंगे कि पंजाब की कमान किसके हाथ में होगी, लेकिन फिलहाल के लिए इतना जरूर कहा जा सकता है कि आम आदमी पार्टी का किला भीतर से दरक रहा है और इसकी गूंज दिल्ली से लेकर चंडीगढ़ तक साफ सुनी जा सकती है। - अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार

प्रभासाक्षी 4 Nov 2026 4:06 pm

उमर अब्दुल्ला की सरकार पर खतरा, जम्मू कश्मीर में शांति बनाए रखना जरूरी

देश के कई अन्य राज्यों की तरह अब जम्मू कश्मीर में भी राजनीतिक उठापटक शुरू हो गई है। राज्य की उमर अब्दुल्ला की सरकार गहरे संकट में फंस गई है क्योंकि उनकी अपनी ही पार्टी के सांसद, विधायक और कई अन्य दिग्गज नेता उनके खिलाफ हो गए हैं। बडगाम से तीन बार विधायक रह चुके और 2024 के लोकसभा चुनाव में श्रीनगर से सांसद चुने गए नेशनल कॉन्फ्रेंस के आगा रूहुल्लाह मेहंदी ने सांसदी छोड़ने का ऐलान करते हुए पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। उमर अब्दुल्ला को लेकर उनकी अपनी ही पार्टी में नाराजगी इस हद तक बढ़ चुकी है कि रूहुल्लाह ने मंगलवार को बडगाम में अपने पिता की पुण्यतिथि पर आयोजित की गई जनसभा में ही पार्टी और सांसदी, दोनों छोड़ने का ऐलान कर दिया। इसे भी पढ़ें: श्रीनगर सांसद Aga Ruhullah Mehdi ने लोकसभा और National Conference दोनों छोड़ी अब्दुल्ला परिवार की पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस जम्मू कश्मीर की पार्टी है और खासतौर से इसका प्रभाव कश्मीर घाटी में ही ज्यादा माना जाता है। कश्मीरियों के लिए पूर्ण राज्य का दर्जा वापस हासिल करना एक भावनात्मक मुद्दा है। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला हो या वर्तमान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, दोनों ही राज्य को फिर से पूर्ण राज्य का दर्जा देने के साथ-साथ अनुच्छेद 370 को हटाए जाने का मुद्दा भी जोर-शोर से उठाते रहे हैं। ऐसे में आगा रूहुल्लाह मेहंदी के आरोपों ने पार्टी की बुनियाद को ही हिला दिया है। पार्टी छोड़ने का ऐलान करते समय उन्होंने आरोप लगाया कि उमर अब्दुल्ला बीजेपी के दबाव में 370 पर अपना रुख बदल चुके हैं। वैसे पार्टी में बगावत की शुरुआत विधायकों का एक गुट पहले ही कर चुका है। पार्टी के 25 विधायकों ने रविवार को ही फारूक और उमर अब्दुल्ला को 14 दिनों का अल्टीमेटम देते हुए चेतावनी दी थी कि अगर उनकी मांगें पूरी नहीं हुई तो वे सरकार से समर्थन वापस ले सकते हैं। आपको याद दिला दें कि, 5 अगस्त 2019 को जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद - 370 को हटाने के साथ ही इसे दो हिस्सों में बांट दिया गया था।जम्मू कश्मीर से लद्दाख को अलग कर, दोनों ही इलाके को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया था। इसके लगभग 5 वर्ष बाद सितंबर-अक्टूबर 2024 में केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर में विधानसभा चुनाव करवाए गए। नेशनल कॉन्फ्रेंस ने कांग्रेस के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा। गठबंधन में हुए समझौते के मुताबिक, एनसी के हिस्से में 51 और कांग्रेस के हिस्से में 32 सीटें आईं और 5 सीटों पर दोनों दलों के उम्मीदवारों के बीच दोस्ताना मुकाबला हुआ। विधानसभा चुनाव में एनसी-कांग्रेस और अन्य पार्टियों के गठबंधन को जीत हासिल हुई। उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में एनसी ने 42, बीजेपी ने 29 और कांग्रेस ने 6 सीटों पर जीत हासिल की। लेकिन मुख्यमंत्री की कमान संभालने के साथ ही उमर अब्दुल्ला के सामने कई मुश्किलें भी आने लगी। सबसे पहले झटका तो यही लगा कि कांग्रेस ने सरकार में शामिल होने से इनकार करते हुए बाहर से समर्थन देने का ऐलान कर दिया। इससे पहले नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेताओं को पूर्ण राज्य और अनुच्छेद 370 के जमाने की सरकार चलाने की आदत थी लेकिन इस सरकार में उन्हें कदम-कदम पर उपराज्यपाल मनोज सिन्हा का सामना करना पड़ रहा था और दिल्ली की तरह जम्मू कश्मीर की पुलिस भी उनके अधीन नहीं थी। रही-सही कसर पार्टी नेताओं में उभरे असंतोष ने पूरी कर दी। नाराज़ विधायकों का अपने ही मुख्यमंत्री के खिलाफ 4 सदस्यों का प्रतिनिधिमंडल बनाकर मांगों की लंबी-चौड़ी फेहरिस्त रख देना अपने आप में एक बड़ा इशारा करता है कि हालात हाथ से निकल चुके हैं। नाराज विधायक उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी, सलाहकार पद से नासिर सोगामी के साथ ही ऐसे मंत्रियों को भी हटाने की मांग कर रहे हैं जो 2 साल से उमर अब्दुल्ला की सरकार में मंत्री है। वैसे तो इसे एक केन्द्र शासित प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी के अंदर मचे घमासान की ख़बर कहकर टाला जा सकता है। लेकिन हमें यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि भारत के सिर के इस ताज जम्मू कश्मीर पर नापाक पाक की बुरी नज़र हमेशा लगी रहती है। पाकिस्तान में लगातार खराब होते राजनीतिक हालात, बिगड़ती अर्थव्यवस्था, बेलगाम होती जा रही महंगाई और पाकिस्तान अधिकृत जम्मू कश्मीर के हिस्से में लगातार हो रहे विरोध प्रदर्शन के बीच पाकिस्तान लंबे समय से राज्य के हालात को खराब करने का मंसूबा बना रहा है। ऐसे हालात में जम्मू कश्मीर में राजनीतिक स्थिरता बहुत जरूरी है और इसके लिए मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को तुरंत कुछ बड़े कदम उठाने होंगे। पाकिस्तान इस हालात का फायदा उठाकर कोई बड़ी हरकत करने में कामयाब ना हो जाए, इससे बचने के लिए उपराज्यपाल मनोज सिन्हा को भी फौरन सेना, सुरक्षा बलों, पुलिस और इंटेलिजेंस के साथ मिलकर बड़ी रणनीति तैयार करनी पड़ेगी। यह समय बहुत महत्वपूर्ण है और इसलिए राज्य में राजनीतिक स्थिरता और शांति कायम रखने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अब्दुल्ला सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे कांग्रेस के सर्वेसर्वा राहुल गांधी को भी महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। - संतोष कुमार पाठक लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं

प्रभासाक्षी 4 Nov 2026 3:45 pm

राहुल गांधी भारतीय लोकतंत्र को कमजोर करने के लिए सोरोस से फंड ले रहे हैं : बोम्मई

राहुल गांधी भारतीय लोकतंत्र को कमजोर करने के लिए सोरोस से फंड ले रहे हैं : बोम्मई

समाचार नामा 4 Nov 2026 3:30 pm

'हम उनसे गुहार लगा रहे हैं कि लोकतंत्र को बचाइए', संजय राउत ने भाजपा पर साधा निशाना

'हम उनसे गुहार लगा रहे हैं कि लोकतंत्र को बचाइए', संजय राउत ने भाजपा पर साधा निशाना

समाचार नामा 4 Nov 2026 3:28 pm

'दिमागी नक्सल' वाला फ्लॉप बयान दोहरा रहे पीएम मोदी, वोट चोरी पर उनके पास कोई जवाब नहीं: खरगे

'दिमागी नक्सल' वाला फ्लॉप बयान दोहरा रहे पीएम मोदी, वोट चोरी पर उनके पास कोई जवाब नहीं: खरगे

समाचार नामा 4 Nov 2026 3:28 pm

विपक्षी नेताओं ने कहा- राहुल गांधी की चुनौती को स्वीकार करते हुए प्रधानमंत्री को जवाब देना चाहिए

विपक्षी नेताओं ने कहा- राहुल गांधी की चुनौती को स्वीकार करते हुए प्रधानमंत्री को जवाब देना चाहिए

समाचार नामा 4 Nov 2026 2:40 pm

मिड टर्म चुनाव में हारते ही महाभियोग में फंसे! ट्रंप कितने कमजोर हो जाएंगे? डेमोक्रेट्स की जीत से भारत को फायदा या बड़ा नुकसान

अमेरिका में ट्रंप की सबसे बड़ी हार। वो ट्रंप जो कि मोदी को हराने की उनके राजनीतिक करियर को खत्म करने की बात करते थे। कमला हैरिस ने तंज कसा। भारतीय मूल के नेताओं ने जमकर अमेरिकी चुनाव में धमाल मचाया है। सोचिए जिस नेता ने पूरी दुनिया को अपनी ताकत का एहसास कराने की बार-बार कोशिश की हो या धमकाया हो। जिस नेता ने चुनावी रैलियों में दावा किया कि अमेरिका की जनता उसके साथ खड़ी है। आज उसी नेता को अपनी ही पार्टी की चुनावी हार पर सफाई देनी पड़ रही है। अमेरिका से मिड टर्म चुनाव के जो शुरुआती नतीजे सामने आने लगे उन्होंने वाइट हाउस से लेकर अमेरिकी संसद तक हलचल मचा दी। ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी पिछड़ती दिखाई दे रही है और डेमोक्रेटिक पार्टी दोनों सदनों में बढ़त बनाती नजर आ रही या यह कह सकते हैं कि ट्रंप की हार हो चुकी है। लेकिन इस पूरी कहानी में सबसे दिलचस्प बात ट्रंप का वो बयान है जिसमें उन्होंने खुद कहा कि अगर मैं खुद चुनाव लड़ रहा होता तो हम भारी बहुमत से जीतते। यानी वह कह रहे हैं कि मैं खुद चुनाव नहीं लड़ रहा था। अब सवाल है कि अगर ट्रंप इतने ही लोकप्रिय हैं तो उनकी पार्टी के उम्मीदवार पीछे क्यों रह गए? क्या अमेरिकी जनता ने ट्रंप की नीतियों को नकारना शुरू कर दिया है? क्या महंगाई और अर्थव्यवस्था के मुद्दे ने राष्ट्रपति की मुश्किलें बढ़ा दी हैं? और क्या अब डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल पर महाभियोग का खतरा मडराने वाला है? अमेरिका के चुनावी नतीजों के पीछे की पूरी राजनैतिक कहानी क्या है और आने वाले दिनों में ट्रंप के सामने कौन-कौन सी बड़ी चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। आज का एमआरआई इसी पर करेंगे। इसे भी पढ़ें: ज्ञानेश कुमार साथ होते तो...ट्रंप की पार्टी को मिडटर्म इलेक्शन में मिली शिकस्त पर CJP ने लिए मजे चुनावी हार पर ट्रंप की सफाई ट्रंप की पार्टी को झटका लेकिन राष्ट्रपति की सफाई पहले से आ गई। अमेरिका में मंगलवार को मिड टर्म चुनाव संपन्न हुए। इन चुनाव में प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों और सीनेट की 35 सीटों पर मतदान हुआ। इसके अलावा 36 राज्यों में गवर्नर पद के लिए भी चुनाव कराए गए।सीनेट में भी डेमोक्रेट्स की स्थिति बहुत मजबूत दिखाई दी। यानी जिस अमेरिकी संसद में ट्रंप अपनी पार्टी के समर्थन के सहारे बड़े फैसले लेने की उम्मीद कर रहे थे, वहां अब विपक्ष की ताकत बढ़ती हुई नजर आई। और इसी बीच ट्रंप ने ऐसा बयान दिया जिसने इस चुनाव को और ज्यादा दिलचस्प बना दिया। ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म ट्रुथ सोशल पर लिखा कि वह खुद चुनाव में उम्मीदवार नहीं थे। अगर वह उम्मीदवार होते तो उनकी पार्टी बहुत बड़े अंतर से जीतती। अब जरा इस बयान के राजनीतिक मायने समझिए। चुनाव प्रचार के दौरान ट्रंप लगातार रिपब्लिकन उम्मीदवारों के लिए वोट मांग रहे थे। वह लोगों से कह रहे थे कि उम्मीदवारों को वोट देते समय उन्हें यानी ट्रंप को ध्यान में रखें। लेकिन जैसे ही नतीजों में पार्टी पिछड़ती दिखाई दी ट्रंप ने सफाई देना शुरू कर दिया कि वह खुद बैलेट पर मौजूद नहीं थे। दूसरी तरफ न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि वह चुनावी नतीजों को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं और डेमोक्रेट्स के साथ मिलकर काम करने की उम्मीद रखते हैं। यानी एक तरफ चुनावी हार की जिम्मेदारी से दूरी बनाने वाला बयान और दूसरी तरफ विपक्ष के साथ काम करने की बात। पांच बड़े राजनैतिक संकट महाभियोग की तलवार ट्रंप के सामने पहला और सबसे बड़ा राजनीतिक खतरा महाभियोग यानी इंपीचमेंट हो सकता है। अमेरिका के या अमेरिका में राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने की शक्ति प्रतिनिधि सभा के पास होती है। अगर डेमोक्रेटिक पार्टी प्रतिनिधि सभा में बहुमत हासिल कर लेती है तो उसके पास ट्रंप प्रशासन के फैसलों को और उसकी नीतियों की जांच करने को महाभियोग की प्रक्रिया आगे बढ़ाने को एक अवसर मिल सकता है। और यहां एक दिलचस्प बात है डॉनल्ड ट्रंप अपने पहले राष्ट्रपति कार्यकाल में भी दो बार महाभियोग का सामना कर चुके हैं। ऐसे में अगर दूसरे कार्यकाल में भी महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होती है तो यह उनके राजनैतिक भविष्य के लिए एक बड़ा झटका हो सकता है। हालांकि महाभियोग प्रस्ताव पास होने का मतलब राष्ट्रपति को तुरंत पद से हटाना नहीं होता। राष्ट्रपति को पद से हटाने के लिए सेनेट में दो तिहाई बहुमत की जरूरत होती है। लेकिन महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होना भी किसी राष्ट्रपति के लिए छोटी बात नहीं है। इसका मतलब होगा कि ट्रंप को अपने प्रशासन का बचाव करना पड़ेगा। विपक्ष के सवालों का जवाब देना पड़ेगा और राजनीतिक ऊर्जा का बड़ा हिस्सा इसी लड़ाई में खर्च करना पड़ सकता है। यानी जिस राष्ट्रपति का एजेंडा देश की नीतियों को बदलने का हो उसे अपने कार्यकाल की राजनीतिक बचाव में बिताना पड़ सकता है। इसे भी पढ़ें: VETO...अब ट्रंप क्या नया करने वाले हैं? मिडटर्म नतीजों के बाद अपने पोस्ट में बढ़ाई हलचल ट्रंप के कानून और वादे अटक सकते हैं अब बात करते हैं उस दूसरे खतरे की। मान लीजिए कि ट्रंप कोई बड़ा कानून बनाना चाहते हैं। टैक्स में कटौती करना है, आवरजन नियमों को सख्त करना है या अर्थव्यवस्था में कोई बड़ा बदलाव लाना है। लेकिन अगर संसद के एक या दोनों सदनों में डेमोक्रेटिक पार्टी का नियंत्रण हो गया तो क्या होगा? ऐसी स्थिति में ट्रंप के लिए अपने एजेंडे को लागू करना काफी मुश्किल होगा। अमेरिका की राजनीतिक व्यवस्था चेक एंड बैलेंस के सिद्धांत पर काम करती है। इसका मतलब है कि राष्ट्रपति के पास असीमित अधिकार नहीं होते। संसद की मंजूरी भी कई बड़े फैसलों के लिए जरूरी होती है। अगर विपक्षी पार्टी संसद में मजबूत हो जाती है तो वह ट्रंप के प्रस्तावित कानूनों को रोक सकती है। उनमें बदलाव की मांग कर सकती है या उन्हें मंजूरी देने में देरी कर सकती है। इसी स्थिति को राजनीतिक भाषा में ग्रिड ललॉक कहा जाता है। यानी सरकार और संसद के बीच ऐसा गतिरोध जिसमें बड़े फैसले आगे नहीं बढ़ पाते और इसका सीधा असर ट्रंप के राजनैतिक एजेंडे पर पड़ सकता है। नियुक्तियों में आ सकती हैं रुकावटें सीनेट वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों, राजदूतों और संघीय न्यायाधीशों (जिनमें सुप्रीम कोर्ट के लिए नामित लोग भी शामिल हैं) की नियुक्ति की पुष्टि करती है। डेमोक्रेट्स के नियंत्रण वाली सीनेट ट्रम्प द्वारा नामित लोगों की पुष्टि में देरी कर सकती है या उन्हें खारिज कर सकती है। इससे ट्रम्प के लिए अहम पदों को भरना और न्यायपालिका को अपनी पसंद के अनुसार ढालना मुश्किल हो जाएगा। ट्रम्प द्वारा पहले सुप्रीम कोर्ट के लिए नामित लोगों को रिपब्लिकन पार्टी (GOP) के नियंत्रण वाली सीनेट ने मंजूरी दी थी। असल में हाल के सभी सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों की पुष्टि उस सीनेट ने की है, जिस पर उसी पार्टी का नियंत्रण था जिससे राष्ट्रपति जुड़े थे। पिछली बार जब विपक्षी दल के नियंत्रण वाली सीनेट ने किसी उम्मीदवार को मंजूरी दी थी, तो वह 1991 की बात है। इसे भी पढ़ें: डेमोक्रेट्स की 5 ऐतिहासिक जीत: ट्रंप के 'MAGA' गढ़ में महा-उलटफेर, हिली अमेरिकी सियासत! बजट की लड़ाई अमेरिका में सरकारी खर्च पर कांग्रेस का नियंत्रण होता है। डेमोक्रेट्स, ट्रंप की प्राथमिकताओं के लिए फंडिंग को मंजूरी देने से इनकार कर सकते हैं। इससे बजट को लेकर लंबी बातचीत शुरू हो सकती है और नौबत सरकारी कामकाज ठप होने (गवर्नमेंट शटडाउन) तक भी आ सकती है। ऐसी स्थिति में जिस पार्टी के पास व्हाइट हाउस का नियंत्रण नहीं होता, वह अक्सर अपनी इस ताकत का इस्तेमाल करती है, जिसमें 'डेट-सीलिंग' (कर्ज की सीमा) बढ़ाने जैसी बातें शामिल हैं ताकि वह बहुमत वाली पार्टी से अपनी शर्तें मनवा सके। ट्रंप के पास अब भी कौन सी शक्तियां बची रहेंगी? संसद (कांग्रेस) के समर्थन के बिना भी अमेरिकी राष्ट्रपति के पास व्यापक शक्तियां मौजूद रहेंगी। वे कांग्रेस की विधायी मंजूरी के बिना भी कई बड़े नीतिगत फैसले कार्यकारी आदेशों (एग्जीक्यूटिव ऑर्डर्स) के जरिए ले सकते हैं। ट्रंप ने इन शक्तियों का इस्तेमाल ईरान पर सैन्य हमलों के आदेश देने, टैरिफ (आयात शुल्क) लगाने, बड़ी संख्या में संघीय कर्मचारियों को बर्खास्त करने और अमेरिका को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) व 2015 के पेरिस जलवायु समझौते से बाहर निकालने के लिए किया है। लिहाजा, कांग्रेस पर नियंत्रण खोने से ट्रंप की ये कार्यकारी शक्तियां खत्म नहीं होंगी। हालांकि, कांग्रेस पर डेमोक्रेट्स का नियंत्रण होने से ट्रंप के लिए अपनी शर्तों पर सरकार चलाना निश्चित रूप से पहले से कहीं अधिक कठिन हो जाएगा। ट्रंप के कार्यकाल के आधे पड़ाव पर अमेरिकी जनता ने अपना जनादेश दे दिया है। क्या ट्रंप इस संदेश को सुनेंगे?

प्रभासाक्षी 4 Nov 2026 2:07 pm

पुणे : शरद पवार को अस्पताल से मिली छुट्टी, मुंबई स्थित आवास के लिए रवाना

पुणे, 4 नवंबर (आईएएनएस)। एनसीपी (एसपी) प्रमुख शरद पवार को बुधवार को पुणे के एक अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। उनकी तबीयत में सुधार हुआ है और अब उनकी हालत स्थिर है।

समाचार नामा 4 Nov 2026 1:28 pm

मिशिगन से जीते अब्दुल-अल-सैयद, बोले 'सीनेट के लिए चुना जाना सम्मान और सौभाग्य की बात'

मिशिगन से जीते अब्दुल-अल-सैयद, बोले 'सीनेट के लिए चुना जाना सम्मान और सौभाग्य की बात'

समाचार नामा 4 Nov 2026 1:26 pm

पंजाब में बिगड़ी कानून व्यवस्था, 'आप' सरकार की नाकामी छिपा रहे मुख्यमंत्री: विजय इंदर सिंगला

पंजाब में बिगड़ी कानून व्यवस्था, 'आप' सरकार की नाकामी छिपा रहे मुख्यमंत्री: विजय इंदर सिंगला

समाचार नामा 4 Nov 2026 1:23 pm

2027 में अखिलेश यादव को फिर मुख्यमंत्री बनाना चाहते हैं सपा कार्यकर्ता : आशुतोष वर्मा

2027 में अखिलेश यादव को फिर मुख्यमंत्री बनाना चाहते हैं सपा कार्यकर्ता : आशुतोष वर्मा

समाचार नामा 4 Nov 2026 1:12 pm

'मस्जिद से एलर्जी है', कदीमी मस्जिद मामले को लेकर असदुद्दीन ओवैसी ने साधा केंद्र सरकार पर निशाना

'मस्जिद से एलर्जी है', कदीमी मस्जिद मामले को लेकर असदुद्दीन ओवैसी ने साधा केंद्र सरकार पर निशाना

समाचार नामा 4 Nov 2026 1:04 pm

ट्रंप 'राजनीतिक पंडित' बन हार-जीत पर देंगे राय, 'वीटो कैप' की पोस्ट

ट्रंप 'राजनीतिक पंडित' बन हार-जीत पर देंगे राय, 'वीटो कैप' की पोस्ट

समाचार नामा 4 Nov 2026 10:58 am

प्रधानमंत्री मोदी के मार्गदर्शन में डबल इंजन सरकार ने अयोध्या की सांस्कृतिक पहचान को दिया नया गौरव: सीएम योगी

प्रधानमंत्री मोदी के मार्गदर्शन में डबल इंजन सरकार ने अयोध्या की सांस्कृतिक पहचान को दिया नया गौरव: सीएम योगी

समाचार नामा 4 Nov 2026 9:36 am

सीआरपीएफ ने रचा नया रिकॉर्ड, एकa वर्ष में शून्य ऑपरेशनल मौत पर पीएम मोदी ने जताई खुशी

केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) ने एक वर्ष तक किसी भी ऑपरेशनल मौत का मामला दर्ज नहीं होने का नया रिकॉर्ड दर्ज किया है। यह रिकॉर्ड 47 वर्षों बाद दोहराया गया है। प्रधानमंत्री ने सीआरपीएफ के इस रिकॉर्ड पर खुशी जाहिर की है।

देशबन्धु 4 Nov 2026 5:30 am

'ऑपरेशन रिजीम चेंज' पर गरमाई सियासत, सीएम धामी बोले- देश को अस्थिर करने की साजिश बर्दाश्त नहीं

'ऑपरेशन रिजीम चेंज' पर गरमाई सियासत, सीएम धामी बोले- देश को अस्थिर करने की साजिश बर्दाश्त नहीं

समाचार नामा 3 Nov 2026 11:12 pm

राहुल गांधी की खुली चुनौती, PM मोदी से बोले- अब सामने आइए

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष तथा लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फिर खुली बहस की चुनौती देते हुए कहा कि 'अब 24 घंटे हो गए मोदी जी, मैंने आपको चैलेंज दिया है

देशबन्धु 3 Nov 2026 9:13 pm

राजस्थान पंचायत चुनाव: सीएम भजनलाल शर्मा के पिता ने पैतृक गांव में डाला वोट, नगला सिंघाड़ा ने किया मतदान का बहिष्कार

राजस्थान पंचायत चुनाव: सीएम भजनलाल शर्मा के पिता ने पैतृक गांव में डाला वोट, नगला सिंघाड़ा ने किया मतदान का बहिष्कार

समाचार नामा 3 Nov 2026 7:22 pm

विपक्षी हुंकार शक्ति-प्रदर्शन नहीं, जनकल्याण का कारण बने

लोकतंत्र केवल सत्ता परिवर्तन की व्यवस्था नहीं, बल्कि जनआकांक्षाओं, नागरिक अधिकारों, जवाबदेही और सार्थक राजनीतिक संवाद की जीवंत प्रणाली है। इसकी मजबूती केवल सत्तारूढ़ दल की कार्यक्षमता से नहीं, बल्कि विपक्ष की जिम्मेदारी, उसकी वैचारिक परिपक्वता और जनहित के प्रति उसकी प्रतिबद्धता से भी निर्धारित होती है। लेकिन जब विपक्ष की राजनीति का केंद्र जनता के बुनियादी सवालों के बजाय सत्ता का विरोध, नेतृत्व पर व्यक्तिगत हमले और आरोपों की पुनरावृत्ति बन जाए, तब लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती को लेकर प्रश्न खड़े होना स्वाभाविक है। दिल्ली के रामलीला मैदान में कांग्रेस के नेतृत्व में लगभग बीस विपक्षी दलों का जुटना और वोट चोरी के मुद्दे पर हुंकार भरना इसी संदर्भ में राजनीतिक समीक्षा की अपेक्षा करता है। सवाल यह नहीं कि विपक्ष को रैली करने का अधिकार है या नहीं, बल्कि यह है कि ऐसी रैलियों से लोकतंत्र और आम जनता को आखिर क्या हासिल हो रहा है? रामलीला मैदान ऐतिहासिक रूप से जनआंदोलनों, राजनीतिक चेतना और लोकतांत्रिक प्रतिरोध का साक्षी रहा है। यहां उमड़ने वाली भीड़ को केवल राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि उससे जुड़े संदेश और उद्देश्य का मूल्यांकन भी आवश्यक है। कांग्रेस ने सहयोगी दलों को एक मंच पर लाकर अपनी राजनीतिक एकजुटता प्रदर्शित करने का प्रयास किया। दस लाख लोगों के जुटने का दावा किया गया था, लेकिन उपलब्ध विवरणों के अनुसार वास्तविक उपस्थिति इस दावे से काफी कम रही। फिर भी इस आयोजन का महत्त्व केवल भीड़ के आकार से नहीं, बल्कि उसके राजनीतिक संदेश से तय होना चाहिए। दुर्भाग्य यह है कि इस रैली में भी विपक्ष की ओर से वही पुराने आरोप, वही राजनीतिक भाषण और वही सत्ता विरोधी तेवर अधिक दिखाई दिए, जिनकी पुनरावृत्ति लंबे समय से होती रही है। इसे भी पढ़ें: कांग्रेस की रैली - ‘खाली खाली कुर्सियां, खाली खाली तम्बू हैं’ और भेजा...? वोट चोरी और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण अर्थात एसआईआर को लेकर विपक्ष ने गंभीर सवाल उठाए हैं। चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष का अधिकार ही नहीं, उसका दायित्व भी है। प्रत्येक वैध मतदाता का नाम मतदाता सूची में सुरक्षित रहना चाहिए और किसी भी पात्र नागरिक को मतदान के अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए आरोपों के साथ प्रमाण और तथ्यों की विश्वसनीयता भी आवश्यक है। जिन मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने का प्रश्न उठाया जा रहा है, उनमें मृतक, स्थायी रूप से अन्यत्र स्थानांतरित हो चुके और एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत मतदाता भी शामिल बताए गए हैं। निर्वाचन आयोग ने भी एसआईआर से जुड़े निर्णयों को तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिया गया बताया है। इस प्रक्रिया को लेकर न्यायालय में विचार और निर्देश भी सामने आए हैं। इसलिए इस पूरे विषय पर अंतिम निष्कर्ष तथ्यों, प्रमाणों और न्यायिक परीक्षण के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए। विपक्ष का दायित्व है कि वह चुनाव आयोग से पारदर्शिता की मांग करे, मतदाता सूची की त्रुटियों को उजागर करे और पात्र मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए ठोस प्रयास करे। लेकिन केवल वोट चोरी का नारा बुलंद करने से लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति विश्वास मजबूत नहीं होगा। यदि विपक्ष वास्तव में मतदाता अधिकारों को लेकर गंभीर है तो उसे प्रत्येक मतदान केंद्र पर अपने बूथ लेवल एजेंट नियुक्त करने, मतदाता सूची की जांच करने, वास्तविक विसंगतियों के प्रमाण जुटाने और प्रभावित नागरिकों को न्याय दिलाने की व्यवस्था मजबूत करनी चाहिए। लोकतंत्र की रक्षा नारों से कम और धरातल पर किए गए कार्यों से अधिक होती है। इस रैली का एक दूसरा पहलू भी है। कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की राजनीतिक एकजुटता का आधार क्या है? क्या यह एकजुटता किसी साझा आर्थिक दृष्टि, रोजगार नीति, कृषि सुधार, शिक्षा की गुणवत्ता, स्वास्थ्य सेवाओं, महंगाई, भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा, युवाओं के भविष्य और सामाजिक न्याय के व्यापक कार्यक्रम पर आधारित है? अथवा इसका मुख्य उद्देश्य नरेंद्र मोदी सरकार का विरोध करना और सत्ता के विरुद्ध राजनीतिक वातावरण तैयार करना है? यदि किसी गठबंधन की एकता का सबसे बड़ा आधार किसी एक नेता या सरकार का विरोध हो, तो उसकी वैचारिक स्थिरता और भविष्य की दिशा पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। सत्ता विरोध अपने आप में कोई राजनीतिक दर्शन नहीं हो सकता। लोकतंत्र में विपक्ष केवल आलोचक नहीं होता, वह वैकल्पिक नीतियों का निर्माता भी होता है। संसद में विधेयकों पर गंभीर चर्चा, सरकार की नीतियों का तथ्यात्मक परीक्षण, आर्थिक और सामाजिक समस्याओं पर वैकल्पिक सुझाव तथा जनता की आवाज को संस्थागत मंचों तक पहुंचाना उसकी बुनियादी जिम्मेदारी है। लेकिन जब राजनीतिक विमर्श आरोप-प्रत्यारोप, व्यक्तिगत कटाक्ष और विरोध प्रदर्शनों तक सीमित होने लगता है, तब जनता के वास्तविक मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। विपक्ष को यह समझना होगा कि प्रधानमंत्री की आलोचना करना और प्रधानमंत्री के विकल्प के रूप में अपनी योग्यता प्रमाणित करना दो अलग-अलग बातें हैं। पहली बात राजनीतिक विरोध है, जबकि दूसरी लोकतांत्रिक नेतृत्व की कसौटी है। आज भारत अनेक बुनियादी चुनौतियों के दौर से गुजर रहा है। युवाओं के लिए गुणवत्तापूर्ण रोजगार, किसानों की आय और कृषि की उत्पादकता, छोटे व्यापारियों की आर्थिक सुरक्षा, शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार, पर्यावरण संरक्षण, शहरी अव्यवस्था, बढ़ती आर्थिक विषमता और महिलाओं की सुरक्षा जैसे प्रश्न किसी एक दल के नहीं, पूरे राष्ट्र के प्रश्न हैं। क्या रामलीला मैदान की हुंकार इन विषयों पर कोई ठोस वैकल्पिक कार्यक्रम प्रस्तुत कर सकी? क्या विपक्ष ने यह बताया कि वह इन समस्याओं के समाधान के लिए कौन-सी नीतियां अपनाएगा? क्या उसने देश के सामने कोई साझा विकास दृष्टि रखी? इन सवालों का उत्तर ही इस रैली की राजनीतिक सार्थकता का वास्तविक मूल्यांकन करेगा। यह भी समझना आवश्यक है कि लोकतंत्र में भीड़ जुटाना और जनमत अर्जित करना अलग-अलग बातें हैं। भीड़ किसी क्षणिक राजनीतिक उत्तेजना, संगठनात्मक शक्ति अथवा विरोध की भावना से जुट सकती है, लेकिन स्थायी जनविश्वास विचारों, नीतियों, आचरण और परिणामों से अर्जित होता है। राजनीतिक दलों को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि विशाल मंच, बड़े भाषण और एकजुटता के प्रदर्शन से जनता का विश्वास स्वतः प्राप्त हो जाएगा। आज का मतदाता पहले की तुलना में अधिक जागरूक है। वह केवल यह नहीं सुनना चाहता कि सरकार ने क्या गलत किया, बल्कि यह भी जानना चाहता है कि विपक्ष उस स्थिति को सुधारने के लिए क्या करेगा। कांग्रेस के लिए यह आत्ममंथन का अवसर है। देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी होने के नाते उससे केवल विरोध की राजनीति नहीं, बल्कि वैचारिक नेतृत्व और रचनात्मक विपक्ष की अपेक्षा भी की जाती है। राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं को अपनी राजनीतिक ऊर्जा का उपयोग ऐसे मुद्दों पर करना चाहिए, जो समाज के व्यापक वर्गों को प्रभावित करते हैं। विपक्षी एकता तभी सार्थक होगी, जब वह साझा नकारात्मकता के बजाय साझा सकारात्मक एजेंडे पर आधारित होगी। विभिन्न दलों के बीच नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा और राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रहित के प्रश्नों पर सहमति बनाना आवश्यक है। वस्तुतः लोकतंत्र की प्राण-प्रतिष्ठा केवल चुनावों, रैलियों, नारों और राजनीतिक हुंकारों से नहीं होती। इसके लिए संस्थाओं की निष्पक्षता, नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा, राजनीतिक दलों की जवाबदेही, विचारों की स्वतंत्रता और जनहित के प्रति संवेदनशील शासन व्यवस्था आवश्यक है। सत्तापक्ष को भी आलोचना सुनने और अपनी कमियों को सुधारने का साहस दिखाना चाहिए, जबकि विपक्ष को प्रमाणों के साथ सवाल उठाने और समाधान प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी निभानी चाहिए। लोकतंत्र किसी एक दल की बपौती नहीं, बल्कि समूचे राष्ट्र की साझी विरासत है। रामलीला मैदान की यह रैली विपक्ष के लिए केवल शक्ति प्रदर्शन का अवसर बनकर न रह जाए, बल्कि आत्ममंथन का कारण बने, यही समय की मांग है। सवाल यह नहीं कि विपक्ष मोदी सरकार के विरुद्ध कितनी बार एकजुट हो सकता है, बल्कि यह है कि वह देश के भविष्य के लिए कितनी बार एक सार्थक और विश्वसनीय विकल्प प्रस्तुत कर सकता है। लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए सत्ता का विरोध जरूरी हो सकता है, लेकिन उससे कहीं अधिक जरूरी है जनहित का समर्थन। लोकतंत्र को हुंकार से नहीं, विचार से; भीड़ से नहीं, विश्वास से और सत्ता की आलोचना से नहीं, जनकल्याण के ठोस संकल्प से मजबूती मिलती है। यही रामलीला मैदान की राजनीतिक गूंज से निकलने वाला सबसे महत्त्वपूर्ण संदेश होना चाहिए। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

प्रभासाक्षी 3 Nov 2026 5:53 pm

इन 55 हजार मौंतों की आशंका पर चर्चा तक नहीं

देश में सत्तारुढ़ राजनीतिक दलों के लिए मौसम परिवर्तन के दुष्प्रभाव चिंता का विषय नहीं है। ऐसे परिवर्तनों की चपेट में आने वाले गरीब होते हैं। इनकी आवाज सुनने वाली देश में कोई सरकार नहीं है। सिर्फ इनकी सुनवाई के दावे किए जाते हैं, जबकि पर्यावरण के प्रभावों से बचाने के इंतजामों पर चर्चा तक नहीं होती है। क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के जारी किया गए नक्शे आंकड़े काफी डराने वाले हैं। अलनीनो के प्रभाव से उत्पन्न गर्मी से भारत में जहां 55,200 लोगों की मौत होने की आशंका है। इसके बावजूद यह मुद्दा देश के सत्तारुढ़ दलों के चिंता का सबब नहीं है। अल नीनो हीट मॉर्टेलिटी ट्रैकर (अल नीनो के कारण गर्मी से होने वाली मौतों का ट्रैकर) नामक इस भयावह नक्शे के मुताबिक नक्शे के अनुसार जून 2026 में शुरू होने वाली इस घटना से मार्च 2027 तक गर्मी के कारण 857,400 अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं, जो वैज्ञानिकों द्वारा एक महीने पहले लगाए गए अनुमान से 350,000 ज्यादा है। इनमें से एक-तिहाई मौतें नाइजीरिया, भारत और ब्राजील में होने का अनुमान है। इसे भी पढ़ें: Bhutan की पहाड़ियों से उठी जलप्रलय की आहट, आपदा से निबटने के लिए India कितना तैयार है? शोधकर्ताओं का अनुमान है कि जून के बाद से 'अल नीनो' के कारण 484,500 अतिरिक्त मौतें हुई हैं। इसके कुछ असर इस तरह दिखे हैं। इंडोनेशिया में जंगलों में आग लगना, भारत में अहम मानसूनी बारिश का न होना और मध्य अमेरिका में सूखा पड़ना। अल नीनो की वजह से इन नौ महीनों की इस अवधि के अनुमान में लगाई गईं आधी से ज्यादा अतिरिक्त मौतें अगले छह महीनों के भीतर होने की आशंका है और भारत पर इसका भयावह रूप देखने को मिल सकता है। इतिहास के पन्नों में 1877-1878 के 'सुपर अल नीनो' को सबसे विनाशकारी मौसमी घटनाओं में गिना जाता है। उस दौरान इसके प्रभाव से भारत, चीन और ब्राजील जैसे देशों में भयंकर सूखा पड़ा था। लगातार बारिश न होने के कारण फसलें पूरी तरह से बर्बाद हो गई थीं। इतिहास में इसे 'ग्रेट फेमाइन' के रूप में जाना जाता है। इस अकाल के कारण भुखमरी और बीमारियों से दुनिया भर में करोड़ों लोगों की दर्दनाक मौत हुई थी। वैज्ञानिकों का मानना है कि समुद्र की सतह के तापमान में अत्यधिक वृद्धि उस सदी के सबसे बड़े जलवायु संकट का कारण बनी थी। क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के सह-संस्थापक और यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो में अर्थशास्त्र के मिल्टन फ्रीडमैन डिस्टिंग्विश्ड सर्विस प्रोफेसर, माइकल ग्रीनस्टोन ने कहा है कि सुपर अलनीनो पर हमारा शोध नई पूर्वानुमान क्षमताओं का इस्तेमाल करके हमारे सामने मौजूद सबसे जरूरी सवालों में से एक का जवाब देता है। अत्यधिक गर्मी के कारण कहां लोगों की जान जाने का खतरा है? अल नीनो एक मौसमी घटना है, जिसमें मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। यह अल नीनो-सदर्न ऑसिलेशन का गर्म चरण है। यह एक प्राकृतिक मौसमी पैटर्न है जो दुनिया भर में वायुमंडलीय परिसंचरण, हवाओं के तंत्र और बारिश के वितरण को प्रभावित करता है। इंडोनेशिया में धधकती भयानक जंगलों की आग से लेकर प्रशांत महासागर में तूफानों की असामान्य सक्रियता तक अल नीनो का असर दुनिया के लगभग हर कोने में देखने को मिल रहा है। इस असामान्य मौसमी गतिविधि के कारण आने वाले समय में दुनिया भर में अलग-अलग क्षेत्रों में अत्यधिक तापमान और अनिश्चित बारिश और अन्य प्राकृतिक आपदाओं का खतरा काफी बढ़ गया है। दिसंबर में अल नीनो अपने चरम पर पहुंच सकता है, जिसके प्रभाव से नवंबर से जनवरी के बीच भारत में सामान्य से कम सर्दी पड़ने की संभावना है। हालांकि उत्तरी हिस्से में ठंड की तीव्रता पश्चिमी विक्षोभ, पहाड़ों पर बर्फबारी और उत्तर-पश्चिमी हवाओं पर निर्भर करती है। इस दौरान दिल्ली समेत पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान एवं बिहार में कभी-कभी शीतलहर की आशंका को खारिज नहीं किया जा सकता। मैदानों में तापमान कुछ समय के लिए गिर सकता है। फिर भी मौसम विज्ञानियों का मानना है कि इस बार लंबे समय तक कड़ाके की ठंड पड़ने की आशंका काफी कमजोर है। डब्ल्यूएमओ के अनुसार नवंबर से जनवरी के दौरान प्रशांत महासागर में अलनीनो की स्थिति और मजबूत हो सकती है। कई जलवायु माडल संकेत दे रहे हैं कि दिसंबर में यह चरम पर पहुंच सकता है। समुद्र की सतह के तापमान में परिवर्तन का असर मौसम पर पड़ता है। हालांकि इसका असर देश के सभी हिस्सों में एक समान नहीं होगा। भारत में मानसून के दौरान 13 प्रतिशत कम बारिश होने के बाद, अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह मौसमी घटना सर्दियों में तापमान बढ़ाएगी, क्या ये बारिश के पैटर्न को बिगाड़ेगी और क्या कृषि पर दबाव बढ़ाएगी? भारत के मामले में अल नीनो पर कड़ी नजर रखी जाती है, क्योंकि आमतौर पर इसके कारण दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान सामान्य से कम बारिश होने का खतरा बढ़ जाता है। बीते मानसूनी सीजन में भारत के अलग-अलग हिस्सों में बारिश का असमान वितरण देखने को मिला। मध्य भारत में तो लगभग सामान्य बारिश हुई, लेकिन पूर्वी और पूर्वात्तर भारत में 26 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई जिसे असाधारण सूखा माना जा सकता है। वहीं दक्षिणी राज्यों में भी औसत से 24 प्रतिशत कम बारिश हुई। अल नीनो के और मजबूत होने से भारत के कुछ हिस्सों में सामान्य से ज्यादा गर्मी हो सकती है, जिससे जल संसाधनों और कृषि पर दबाव बढ़ सकता है। आने वाले महीनों में अल नीनो का बढ़ता असर भारत के जल संसाधनों, कृषि पैदावार और खाद्य सुरक्षा के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित होने वाला है। सरकार और कृषि विभागों को किसानों के लिए समय पर एडवाइजरी जारी करने, कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देने और जलाशयों में पानी के सही प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित करना होगा ताकि संभावित खाद्य संकट से बचा जा सके। सवाल यही है क्या देश के सत्तारुढ़ राजनीतिक दलों ने अलनीनो के प्रभाव से होने वाली मौतें और पेयजल तथा कृषि की चुनौतियों से निपटने के कोई इंतजाम किए हैं। दरअसल इसकी चर्चा तक किसी राजनीतिक दल ने नहीं की हैं। करीब 50 हजार लोगों की संभावित मौतों का यह मसला देश के नेताओं के लिए चिंता की बात नहीं है। ये मौतें अचानक नहीं होंगी। गर्मी के प्रभाव और पानी की कमी और दूषित पेयजल की मजबूरी से होने वाली मौतें धीमी मौत् होती है। यही वजह है कि नेताओं को इसकी चिंता नहीं है। इसका प्रमुख कारण है कि ऐसी मौतों का मसला वोट नहीं दिला सकता। इसी वजह से हर साल पर्यावरण परिवर्तन से होने वाली मौतें कभी भी राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा पत्र में शामिल नहीं की जाती हैं।

प्रभासाक्षी 3 Nov 2026 5:46 pm

कांग्रेस की रैली - ‘खाली खाली कुर्सियां, खाली खाली तम्बू हैं’ और भेजा...?

फिल्म मेरा नाम जोकर के गीत ‘खाली-खाली कुर्सियां हैं खाली खाली तम्बू हैं’ के गीतकार गोपालदास ‘नीरज’ अगर 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई कांग्रेस की रैली को देखते तो वहां की खाली कुर्सियां व खाली तम्बू देख कर वैचारिक पक्ष से लिख रहे होते कि ‘खाली खाली भेजा है।’ रैली में किसी भी नेता द्वारा ऐसी कोई तथ्यात्मक बात नहीं कही गई जिससे यह साबित होता हो कि वोटों की चोरी हुई है और एसआईआर में गड़बड़ी है। जो जो बातें बोली गईं, चुनाव आयुक्त, प्रधानमंत्री व गृहमंत्री को लेकर जो जो अपशब्द बोले गए वो सब पिछले कई महीनों से गढ़े जा रहे झूठे नैरेटिव के प्रयासों से अतिरिक्त कुछ नहीं था। शायद यही कारण है कि न तो देशवासियों ने इस रैली से पहले विपक्ष को गंभीरता से लिया और न ही बाद में इन बातों पर ध्यान दे रहा है। कांग्रेस चाहे इस रैली को लेकर कितनी भी उत्साहित नजर आए परंतु यह तो सच्चाई है कि रैली में उमड़ी भीड़ दस लाख के दावे के मुकाबले कहीं अधिक कम रही। रही सही कसर केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजु ने यह दावा करके पूरी कर दी है कि कांग्रेस जिन तस्वीरों से रैली की भीड़ दिखा रही है वह कृत्रिम बुद्धिमता से तैयारी की गई है। इसे भी पढ़ें: रामलीला मैदान की इंडी गठबंधन की महारैली के सियासी निहितार्थ को समझिए रैली के दौरान व इससे पूर्व कथित जनसंसद में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने 2024 के लोकसभा चुनावों को जिस तरीके से अवैध बताया इससे तो उन्होंने अपने नेता पद को भी अवैधानिक घोषित कर दिया है। दुनिया के राजनीतिक इतिहास में शायद ही ऐसा कभी हुआ हो कि संवैधानिक पद पर विराजमान किसी नेता ने अपने ही पद को अवैध घोषित किया हो। अब प्रश्न है कि अगर उनका पद ही अवैध है तो वे इस पद से अभी तक चिपके हुए क्यों हैं? वैसे तो नेता प्रतिपक्ष कई महीनों से वोट चोरी का झूठ फैला रहे हैं परंतु कांग्रेस को वोट चोरी का अपना अभियान तेज करने का मौका कुछ दिन पहले की उस खबर से मिला, जिससे यह संदेश देने की कोशिश की गई थी कि एसआइआर के मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। हालांकि चुनाव आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय में शपथपत्र देकर स्पष्ट रूप से कहा कि एसआइआर पर सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से हुए। इसके बाद भी विपक्षी दल अपने इस हठ पर कायम हैं कि वोट चोरी हो रही है। वे इस तथ्य पर भी ध्यान देने के लिए तैयार नहीं कि जिन 13 करोड़ लोगों के नाम वोटर लिस्ट हटाए गए हैं, वे उनके हैं जो अन्यत्र जा बसे हैं या जिनकी मृत्यु हो गई है अथवा जिनके नाम दो-तीन जगह दर्ज थे। सच यह भी है कि 13 करोड़ लोगों का नाम हटाने का फैसला अंतिम नहीं है और वैध मतदाता अपना नाम वोटर लिस्ट में अभी भी शामिल करा सकते हैं। इतना होने के बावजूद उक्त रैली की कुर्सियां व तम्बू खाली होने के साथ-साथ वैचारिक रूप से भेजा खाली होना न कहा जाए तो क्या कहें? विडंबना यह भी है कि न्यायालय में एसआइआर के खिलाफ याचिका दायर करने वाले विपक्षी नेता कथित वोट चोरी के खिलाफ कोई प्रमाण अदालत के समक्ष पेश करने के बजाय दिखावटी संसद बुलाकर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ जन महाभियोग पारित करने जैसे स्वांग कर अपना ही उपहास ही उड़ा रहे हैं। रैली की वैचारिकता के साथ-साथ इसमें जुटी भीड़ को लेकर जिस तरह से झूठ का सहारा लेने के आरोप लग रहे हैं वह साफ दर्शाता है कि खुद विपक्ष इस रैली से निराश है और येन केन प्रकारेन रैली को अधिक से अधिक सफल होने के दावे कर रहा है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि विपक्षी दल ने रैली में भारी भीड़ दिखाने के लिए एआई से बनी फर्जी तस्वीरों का सहारा लिया है। किरेन रिजिजू ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर तेलंगाना से कांग्रेस सांसद वामसी गड्डम और अन्य नेताओं द्वारा साझा की गई एक तस्वीर को पोस्ट करते हुए कटाक्ष किया। रिजिजू ने लिखा कि रामलीला मैदान को खचाखच भरा दिखाने के लिए कांग्रेस पार्टी की फेक नैरेटिव टीम एआई से बनी नकली फोटो भी ठीक से नहीं बना पाई। सोशल मीडिया यूजर्स ने भी इस तस्वीर को तुरंत पकड़ लिया और दावा किया कि मंच पर दिख रहे राहुल गांधी और सोनिया गांधी के चेहरे और मूल रैली का मंच असली तस्वीरों से बिल्कुल अलग हैं। इससे पहले बीजेपी प्रवक्ता और सांसद संबित पात्रा कह चुके हैं कि रैली से पहले कांग्रेस ने 10 लाख लोगों के जुटने का दावा किया था, लेकिन हकीकत में 40 फीसदी मैदान खाली रहा। उन्होंने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि रैली में दिखाई गई भीड़ केवल ट्रिक फोटोग्राफी का नतीजा है, और ऐसी ट्रिक्स किसी को प्रधानमंत्री नहीं बना सकतीं। महात्मा गांधी मानते थे कि हिंसक और असत्य साधनों से कभी कोई संघर्ष नहीं जीता जा सकता। ईवीएम की तरह एसआईआर पर भी कांग्रेस लगातार झूठ पर झूठ बोल रही है और यही कारण है कि यह मुद्दा जनता के बीच कहीं ठहर नहीं पा रहा है। अगर सचमुच में चोरी हुई होती और इसके पक्ष में कांग्रेस के पास कोई प्रमाण है तो उसे संसद में पेश किया जाना चाहिए था और इस पर तथ्यात्मक बहस करनी चाहिए थी, वहां भी बात नहीं बनती तो अदालत का दरवाटा खटखटाना चाहिए था परंतु इसके विपरीत कांग्रेस ने नक्सलवादी हल्ला बोल शैली में जन संसद व रैली का आयोजन किया। अदालत का दरवाजा तो खटखटाया परंतु अभी तक उसमें अपने पक्ष में एक भी तथ्य प्रस्तुत नहीं कर पाई। कांग्रेस स्मरण रखे कि जब तक वैचारिक रूप से भेजा खाली रहेगा तब तक कुर्सियां व तम्बू भी समर्थकों को तरसते रहेंगे। - राकेश सैन

प्रभासाक्षी 3 Nov 2026 5:39 pm

क्या निरस्त होगा केंद्रीय मंत्री का पर्चा? हरदीप सिंह पुरी के नामांकन पर कांग्रेस ने लगाई गंभीर आपत्तियों की झड़ी​​​​​​​​​​​​​​

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समाचार नामा 3 Nov 2026 5:38 pm

भोपाल में 4 नवंबर को भाजपा का 'लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ' मार्च, राजनाथ सिंह करेंगे नेतृत्व

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समाचार नामा 3 Nov 2026 4:58 pm

भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन दो दिवसीय दौरे पर यूपी जाएंगे, गोरखपुर में करेंगे 'लोकतंत्र बचाओ' पदयात्रा

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समाचार नामा 3 Nov 2026 4:37 pm

मध्य प्रदेश कैबिनेट की बैठक 18 नवंबर को गांधी सागर क्षेत्र में होगी

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समाचार नामा 3 Nov 2026 3:33 pm

अमित शाह के '3 करोड़ घुसपैठिए' वाले दावे पर कांग्रेस का पलटवार, कहा- 13 साल से क्या कर रही थी सरकार?

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समाचार नामा 3 Nov 2026 3:08 pm

'राहुल गांधी सिर्फ अराजकता में विश्वास करते हैं', स्टिंग ऑपरेशन का हवाला देकर बरसे भाजपा प्रवक्ता गौरव भाटिया

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समाचार नामा 3 Nov 2026 1:38 pm

ममता बनर्जी के लिए बंगाल की राजनीति में अब जगह नहीं बची, लोग लगा रहे 'जय श्री राम' के नारे : दिलीप घोष

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समाचार नामा 2 Nov 2026 11:25 pm

दीया मिर्जा का वीडियो हटाने पर भड़कीं ज्योति गायकवाड़, भाजपा पर लगाया मुद्दों से भटकाने का आरोप

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समाचार नामा 2 Nov 2026 10:32 pm

तमिलनाडु : मुख्यमंत्री ने पुडुकोट्टई में 80 करोड़ रुपए की विकास परियोजनाओं का उद्घाटन किया

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पुणे मेट्रो की नई पिंक लाइन में क्या है खास बात? प्रधानमंत्री मोदी ने प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डाला

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सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार मामले में एफआईआर के खिलाफ तमिलनाडु के पूर्व मंत्री केएन नेहरू की याचिका खारिज की

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समाचार नामा 2 Nov 2026 8:13 pm