सरकार युवाओं को वैश्विक रोजगार के अवसर उपलब्ध कराएगी: सीएम देवेंद्र फडणवीस
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि देश के युवाओं को रोजगार योग्य बनाने के लिए शिक्षा के साथ-साथ कौशल विकास, प्रशिक्षण और रोजगार को एकीकृत करना आवश्यक है।
राहुल की चुटकी, खड़गे का पलटवार और थरूर पर तंज, CWC बैठक में गूंजे ठहाके
चुनाव आयोग और वोटर लिस्ट पर चली लंबी चर्चा, लेकिन राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और शशि थरूर के बीच हुई मजेदार बातचीत ने सबका ध्यान खींचा
'देश में जो चुनाव हो रहे हैं, वो निष्पक्ष नहीं हैं', जयराम रमेश का दावा
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सीएमआरएल-एक्सालॉजिक मामला: पिनाराई विजयन, वीणा और रियास के खिलाफ एफआईआर की मांग वाली याचिका पर फैसला सुरक्षित
'इस बार विपक्ष ने नहीं, मीडिया ने सबूतों के साथ किया खुलासा', नितिन नवीन के बयान पर मनोज झा का पलटवार
'जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा बहाल करने के प्रस्ताव में अफसरशाही का दखल', एनसी का दावा
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'संवैधानिक संस्थाओं को बदनाम करने की आदत बना चुके हैं', भाजपा नेताओं ने विपक्ष को घेरा
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Bangladesh के आर्मी बेस में घुसे ISI के एजेंट, तुर्की-पाकिस्तान मिलकर ढाका में कराएंगे तख्तापलट?
जन-आंदोलन के बाद पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार गिरने और उनके देश छोड़कर भागने के महज दो साल बाद ही, बांग्लादेश एक और बड़े राजनीतिक संकट के मुहाने पर खड़ा नजर आ रहा है। कथित तौर पर देश के एक शीर्ष नेता ने सैन्य नेतृत्व के साथ मिलकर प्रधानमंत्री तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बीएनपी (BNP) सरकार को उखाड़ फेंकने की साजिश रची है। ऐसे में कहा जा रहा है कि क्या बांग्लादेश में क्या एक बार फिर से तख्ता पलट होने जा रहा है? क्या तारिक रहमान का भी वही हश्र होगा जो शेख हसीना का हुआ। यह सवाल इसलिए क्योंकि बांग्लादेश में पिछले कुछ दिनों में कई हलचल देखने को मिली है। आईएसआई के आतंकी वहां पर घूम रहे हैं। आर्मी के बेस पर जा रहे हैं। इसके अलावा तुर्की के इन्वॉल्वमेंट को लेकर खबरें हैं। क्या बांग्लादेश में सुलग रहा है तख्तापलट का नया संकट? नॉर्थ ईस्ट न्यूज की एक रिपोर्ट के अनुसार, तुर्किये और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों के साथ-साथ विदेश मंत्री खलीलुर रहमान भी कथित तौर पर इस साजिश में शामिल हैं। इसका मकसद प्रधानमंत्री तारिक रहमान को विवादित, नाकाम और अप्रभावी साबित कर राजनीतिक रूप से कमजोर करना है। बांग्लादेश की इंटेलिजेंस एजेंसी के एक सूत्र का हवाला देते हुए रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 22-23 सितंबर को मेजर जनरल महबूबुल आलम के साथ गुप्त बैठकें हुईं। महबूबुल आलम 'बांग्लादेश यूनिवर्सिटी ऑफ़ प्रोफेशनल्स' के वाइस चांसलर हैं, जो बांग्लादेश की सेना द्वारा चलाया जाने वाला एक संस्थान है। इस बैठक में अमर देश के संपादक महमूदुर रहमान (जो पूर्व सेना अधिकारी अब्दुल्ला अमान आज़मी के बेटे हैं) और एक अन्य पूर्व सेना अधिकारी हसीनुर रहमान भी मौजूद थे। इनके साथ तुर्की की इंटेलिजेंस एजेंसी का एक वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल था। रिपोर्ट के मुताबिक, इन बैठकों में खलीलुर रहमान और महमूदुर रहमान के नेतृत्व में लंबे समय तक चलने वाली गैर-राजनीतिक सरकार बनाने के रोडमैप पर चर्चा की गई। इसे भी पढ़ें: Bangladesh ने UN में कहा- हम मुस्लिमों से परेशान, पूरा भारत हैरान! क्या इसमें बांग्लादेश की सेना शामिल है? सूत्रों का कहना है कि सेना और जमात-ए-इस्लामी इस योजना का समर्थन करते हैं। कहा जा रहा है कि यह योजना पाकिस्तान में तैयार की जा रही है और इसे तुर्की से फंड मिल रहा है। इसका मकसद बांग्लादेश की दो मुख्य राजनीतिक पार्टियों—तारिक रहमान की अगुवाई वाली BNP और शेख हसीना की प्रतिबंधित अवामी लीग—को राजनीतिक रूप से कमज़ोर करना है।इससे पहले, आज़मी और हसीनुर् रहमान ने अलग-अलग दावा किया था कि बांग्लादेश सेना प्रमुख जनरल वाकर-उज़-ज़मान के साथ उनका नियमित संपर्क है और उन पर उनका नियंत्रण है। उन्होंने यह भी दावा किया कि सेना की कमांड चेन पर जनरल ज़मान का नियंत्रण नहीं है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, बांग्लादेश की मिलिट्री इंटेलिजेंस में कथित तौर पर इस्लामिक आतंकवाद-विरोधी गठबंधन सक्रिय और मज़बूत हो गया है, और हाल ही में ब्रिगेडियर शौकत उस्मान को इस गुप्त समूह का प्रमुख बनाया गया है। इसे भी पढ़ें: Shaurya Path: Eastern Front को भी Air Defence System से लैस करने की तैयारी कर रहे Modi, Kolkata में तैनात होकर Kusha बनेगा अभेद्य ढाल क्या तारिक रहमान का भी वही हाल होगा जो हसीना का हुआ? सूत्रों का यह भी कहना है कि बांग्लादेश की सेना और नागरिक प्रशासन में मौजूद ताकतवर लोग तारिक रहमान और उनके परिवार को देश से बाहर भेजने की साज़िश रच रहे हैं, ठीक वैसे ही जैसे शेख हसीना और उनके परिवार को देश छोड़कर भारत में शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ा था। खबरों के मुताबिक, खुफिया एजेंसियों को पता चला है कि विदेश मंत्री खलीलुल्लाह रहमान के इस ग्रुप से करीबी संबंध हैं। उन्हीं की पहल पर न्यूयॉर्क में यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली के दौरान तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ के साथ बैठकें हुईं। एर्दोगन और पेज़ेश्कियान के साथ हुई बैठकें पहले से तय नहीं थीं। माना जाता है कि खलील ने ये बैठकें इसलिए आयोजित कीं ताकि रहमान को उनकी तटस्थ विदेश नीति से भटकाकर विवादों में फंसाया जा सके। इसे भी पढ़ें: अचानक आ रहा US का F-35, France का Rafale और UAE का F-16 Fighter Jet, India में दुनिया की ताकतवर Air Forces का महाजमावड़ा देख दुश्मन काँपे बांग्लादेश में ISI क्या साज़िश रच रही है? इस बीच, खुफिया सूत्रों ने यह भी दावा किया कि पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) के दो सीनियर अधिकारी, मेजर मोहम्मद अकरम और मेजर अज़ीज़ बुट्टारी, चुपके से बांग्लादेश गए थे। खबरों के मुताबिक, अपनी 10 दिन की यात्रा के दौरान वे चट्टोग्राम समेत कई ठिकानों पर रुके और क्षेत्रीय सुरक्षा खतरों को लेकर सेना के सीनियर अधिकारियों के साथ बैठकें कीं। 25 सितंबर को बांग्लादेश से रवाना होने से पहले उन्होंने महमूदुर आज़मी और हसीनु्र से भी मुलाकात की। खलीलुर रहमान पर शक क्यों है? माना जाता है कि बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान, जो संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के मौजूदा अध्यक्ष भी हैं, ने प्रधानमंत्री तारिक़ की बेटी ज़ाइमा रहमान को UNGA अध्यक्ष के कार्यालय में कानूनी अधिकारी के तौर पर नियुक्त किया था, ताकि प्रधानमंत्री को विवाद में घसीटा जा सके। खलीलुर UNGA के अध्यक्ष और बांग्लादेश के विदेश मंत्री भी हैं, फिर भी उन्होंने तारिक़ रहमान के भाषण के लिए महासभा सत्र का सबसे अनुपयुक्त समय चुना। यह भाषण न्यूयॉर्क में देर दोपहर को दिया गया, जब हॉल में आमतौर पर बहुत कम लोग होते हैं, और बांग्लादेश में उस समय सुबह के 4:18 बज रहे थे। इसके अलावा, ज़ाइमा की नियुक्ति एक बड़ा मुद्दा बन गई और तारिक़ के विरोधियों ने 24 सितंबर को UNGA में उनके भाषण से पहले उन्हें निशाना बनाने के लिए इसका इस्तेमाल किया।
भाजपा की ओर से यूपी और बिहार में उम्मीदवारों की घोषणा के बाद विधान परिषद चुनाव की तस्वीर अब और स्पष्ट हो गई है। यूपी में पार्टी ने छह सीटों पर प्रत्याशी उतारे हैं, जबकि बिहार में भाजपा और जदयू के बीच आठ सीटों का बंटवारा सामने आया है।
दस साल पहले 28-29 सितंबर की रात भारत ने नियंत्रण रेखा पार कर आतंकवाद के उन ठिकानों पर प्रहार किया था, जिन्हें लंबे समय से सीमा पार आतंक की मशीनरी का हिस्सा माना जाता रहा था। यह केवल कुछ आतंकी ठिकानों पर की गई सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि भारत की सुरक्षा नीति में एक निर्णायक मोड़ था। उरी हमले में 19 भारतीय सैनिकों की शहादत के बाद हुई 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक ने यह संकेत दिया था कि सीमा पार से आतंकवाद को केवल कूटनीतिक या सीमित सैन्य प्रतिक्रिया तक सीमित रखने का पुराना ढांचा बदल रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते सप्ताह यानि 27 सितंबर 2026 को ‘मन की बात’ में इसी बदलाव को रेखांकित करते हुए 2016 की कार्रवाई को ऐतिहासिक उपलब्धि बताया था। उन्होंने कहा कि भारतीय सैनिक नियंत्रण रेखा पार कर आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई करने में सक्षम हैं, यह देखकर दुनिया हैरान रह गई थी। प्रधानमंत्री ने 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक को बालाकोट और 2025 के ऑपरेशन सिंदूर से जोड़ते हुए भारत की आतंकवाद विरोधी नीति में लगातार आए बदलाव को सामने रखा था। इसे भी पढ़ें: पाकिस्तान के बेतूके सवालः भारत के सटीक जबाव देखा जाये तो असल बदलाव समझने के लिए 2016 से पहले की तस्वीर देखनी होगी। संसद हमले और 2008 के मुंबई हमले जैसे बड़े आतंकवादी हमलों के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी रणनीतिक दुविधा यही थी कि पाकिस्तान की धरती से संचालित आतंकवाद का सैन्य जवाब देने पर कहीं दो परमाणु-संपन्न देशों के बीच व्यापक युद्ध न छिड़ जाए। इसी आशंका ने लंबे समय तक भारत की नीति को संयम की सीमा में रखा। लेकिन उरी ने इस गणित को बदल दिया। 28-29 सितंबर 2016 को भारतीय विशेष बलों ने नियंत्रण रेखा पार कर पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में आतंकी घुसपैठ के लिए इस्तेमाल किए जा रहे ठिकानों को निशाना बनाया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि सरकार ने इस कार्रवाई को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया। संदेश बिल्कुल स्पष्ट था कि आतंकवाद और उसके बुनियादी ढांचे के बीच दूरी बनाकर भारत को रोकने की रणनीति अब पहले जैसी प्रभावी नहीं मानी जाएगी। यहीं से भारत की प्रतिरोधक रणनीति का नया अध्याय शुरू हुआ। 2019 में पुलवामा हमले के बाद बालाकोट में हवाई कार्रवाई ने जवाब की भौगोलिक सीमा को नियंत्रण रेखा से आगे बढ़ाया। यानी 2016 में जहाँ जमीनी कार्रवाई नियंत्रण रेखा के पार आतंकी ठिकानों तक पहुँची थी, वहीं बालाकोट एअर स्ट्राइक ने यह दिखाया कि भारत आवश्यकता पड़ने पर पाकिस्तान के भीतर भी आतंकवादी बुनियादी ढांचे को निशाना बना सकता है। फिर 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद ऑपरेशन सिंदूर ने इस रणनीति को एक और स्तर पर पहुँचा दिया। 7 मई 2025 को पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में नौ आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया गया। मोदी सरकार ने इसे केंद्रित और नियंत्रित कार्रवाई बताया तथा कहा कि पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना नहीं बनाया गया। यानी उरी, बालाकोट और ऑपरेशन सिंदूर, यह तीनों एक जैसी सैन्य कार्रवाइयाँ नहीं थीं। इनके तरीके, हथियार, लक्ष्य और भौगोलिक दायरे अलग थे। लेकिन इनके पीछे दिखाई देने वाला रणनीतिक संदेश एक ही था कि भारत आतंकवादी हमले और उसके पीछे मौजूद बुनियादी ढांचे को पूरी तरह अलग-अलग घटनाएँ मानकर नहीं चलेगा। इस तरह 2016 का अभियान भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा सोच में निर्णायक बदलाव था। भारत ने तथाकथित ‘रणनीतिक संयम’ से आगे बढ़कर ऐसी प्रतिरोधात्मक कार्रवाई की दिशा पकड़ी जिसमें पूर्ण युद्ध की सीमा पार किए बिना अपनी क्षमता दिखाई गई। यही इस बदलाव का सबसे बड़ा रणनीतिक अर्थ है। इसका निशाना केवल आतंकवादी संगठन नहीं, बल्कि प्रॉक्सी युद्ध का पूरा गणित है। हालांकि भारत की कार्रवाइयों के बावजूद प्रॉक्सी युद्ध समाप्त नहीं हुआ है। खतरे ने अपना रूप बदला है। ड्रोन के जरिए हथियार और मादक पदार्थ भेजना, छोटे प्रशिक्षित घुसपैठ दल और कम दृश्यता वाली आतंकवादी कार्रवाइयाँ इसी बदलती रणनीति का हिस्सा मानी जा रही हैं। जम्मू क्षेत्र और पीर पंजाल के दक्षिण में बढ़ा सुरक्षा फोकस भी इसी बदलाव को दर्शाता है। बहरहाल, दस साल पहले सवाल था कि आतंकी हमले के बाद भारत जवाब देगा या नहीं? उरी के बाद वह सवाल बदल गया। अब सवाल यह है कि जवाब किस स्तर पर होगा, उसकी सीमा क्या होगी और आतंकवाद के पीछे मौजूद ढांचे पर उसकी कीमत कितनी भारी पड़ेगी। 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक ने इस बदलाव को दृश्यमान किया; बालाकोट ने उसे आगे बढ़ाया और ऑपरेशन सिंदूर ने उसकी अगली तस्वीर सामने रख दी। यही बीते दशक का सबसे बड़ा सामरिक संदेश है। -नीरज कुमार दुबे
'नौजवान आंदोलन की राह पकड़ें!' Rahul Gandhi की सीधी अपील, बदलेगा देश का माहौल?
भारतीय राजनीति में भगवानों के नाम पर सियासत कोई नई बात नहीं, लेकिन सवाल तब खड़ा होता है जब सत्ता की राजनीति में भगवानों को भी जाति, वर्ग और क्षेत्र के खांचों में बांटने की कोशिश होने लगे। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के ताजा बयान ने यही सवाल देश के सामने ला खड़ा किया है कि क्या अब भगवान राम और भगवान शिव को भी राजनीति के अलग-अलग खेमों में खड़ा किया जाएगा? क्या राम को अमीरों का और शिव को गरीबों का भगवान बताकर आस्था को भी वोटबैंक की राजनीति में बांटने की कोशिश होगी? सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि एक मुख्यमंत्री के मुंह से निकले ऐसे शब्द देश की धार्मिक और सामाजिक एकता को कहां ले जाएंगे? हम आपको बता दें कि एक कार्यक्रम में भाजपा पर निशाना साधते हुए तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने कहा कि “शिव गरीबों के भगवान हैं, जबकि राम अमीरों के भगवान हैं।” उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा ने भगवान राम को “चुरा” लिया है और उत्तर भारत में चुनावी सफलता के लिए राम की भावना और आस्था का राजनीतिक इस्तेमाल किया। रेड्डी ने अपने तर्क को उत्तर-दक्षिण और द्रविड़-आर्य पहचान से भी जोड़ा। उनका कहना था कि “हम द्रविड़ हैं और उत्तर भारत के लोग आर्य हैं। हम शिव के भक्त हैं और वे राम के भक्त हैं।” उन्होंने सवाल उठाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा नेता मंचों से “हर हर महादेव” क्यों नहीं कहते और केवल “जय श्रीराम” का उद्घोष क्यों सुनाई देता है? रेड्डी ने कहा कि जब दक्षिण भारत में “हर हर महादेव” बोला जाता है तो भाजपा को यह पसंद नहीं आता। इसे भी पढ़ें: Danam Nagender पर Supreme Court के फैसले के बाद बोले KTR, Rahul Gandhi और Revanth Reddy को तमाचा यहीं से विवाद ने राजनीतिक रूप ले लिया। केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता बंडी संजय कुमार ने रेड्डी पर भगवान राम और भगवान शिव के बीच राजनीतिक विभाजन खड़ा करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री को यह नहीं भूलना चाहिए कि उसी तेलंगाना में वेमुलवाड़ा को दक्षिण काशी और भद्राचलम को दक्षिण अयोध्या कहा जाता है। ऐसे में राम और शिव को उत्तर और दक्षिण की सीमाओं में बांटना उचित नहीं है। बंडी संजय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वाराणसी और काशी विश्वनाथ से जुड़ाव का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद नरेंद्र मोदी पहले प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने वेमुलवाड़ा स्थित श्री राजराजेश्वर स्वामी मंदिर का दौरा किया। देखा जाये तो भारतीय राजनीति में धर्म को चुनावी हथियार बनाने की प्रवृत्ति कोई नई बात नहीं है। लेकिन जब राजनीति सीधे भगवानों के बीच भी वर्ग, क्षेत्र और विचारधारा की दीवार खड़ी करने लगे, तब सवाल सिर्फ किसी एक पार्टी या नेता का नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में आस्था की मर्यादा का बन जाता है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी का ताजा बयान इसी वजह से गंभीर राजनीतिक बहस का विषय बन गया है। सवाल उठ रहा है कि भगवान राम और भगवान शिव को राजनीति के दो अलग-अलग खेमों में खड़ा करने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी? क्या किसी भी राजनीतिक दल के लिए यह उचित है कि करोड़ों लोगों की साझा आस्था को “अमीर बनाम गरीब” या “उत्तर बनाम दक्षिण” की राजनीतिक श्रेणियों में बांट दिया जाए? वैसे रेवंत रेड्डी का यह पहला विवादित बयान नहीं है। दिसंबर 2025 में उन्होंने हिंदू देवी-देवताओं की संख्या और अलग-अलग पूजा परंपराओं को लेकर भी ऐसी टिप्पणियां की थीं, जिन पर भाजपा और अन्य विपक्षी दलों ने हिंदू आस्था का मजाक उड़ाने का आरोप लगाया था। यही वजह है कि अब यह सवाल और तेज हो रहा है कि रेवंत रेड्डी के राजनीतिक भाषणों में हिंदू आस्था ही बार-बार निशाने पर क्यों दिखाई देती है? यहां हम यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि यह सवाल उठाना किसी दूसरे धर्म के प्रति पूर्वाग्रह नहीं है; बल्कि उद्देश्य यह पूछना है कि सत्ता और राजनीति में धार्मिक आस्थाओं के साथ समान मर्यादा क्यों नहीं होनी चाहिए? साथ ही यहां सवाल यह भी उठता है कि धर्म और भगवान पर टिप्पणी कर रहे मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी को हिंदू धर्म के बारे में कितना ज्ञान है? राम को अमीरों का भगवान बता रहे रेड्डी को शायद यह पता नहीं कि भगवान राम का शबरी के आश्रम में जाना और उनकी भक्ति स्वीकार करना, निषादराज गुह के साथ उनका आत्मीय संबंध तथा वनवासी समाज के लोगों के साथ उनका लगाव इस बात के उदाहरण हैं कि राम के लिए भक्त की सामाजिक या आर्थिक स्थिति जरा भी महत्व नहीं रखती। जिन राम ने पिता के वचन की लाज रखने के लिए सारा राजपाट छोड़कर वन की राह पकड़ ली उन्हें अमीरों का भगवान बताना बेशर्मी की पराकाष्ठा है। वहीं भगवान शिव की आराधना में भी भक्तिभाव को ही प्रमुख माना जाता है। एक और बात रेवंत रेड्डी को जाननी चाहिए कि रामचरितमानस के उत्तरकांड में भगवान राम स्वयं शिव की महिमा बताते हुए कहते हैं कि शंकर की आराधना के बिना उनकी भक्ति भी प्राप्त नहीं हो सकती। यानी जिस राम को राजनीति में “अमीरों का भगवान” और शिव को “गरीबों का भगवान” बताकर दो वर्गों में बांटने की कोशिश की जा रही है, उसी राम की परंपरा शिव को अपनी भक्ति का मार्ग बताती है। देखा जाये तो रेड्डी के बयान के बाद कांग्रेस को यह बताना चाहिए कि क्या 'भगवानों को बांटना' उसकी नई राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है? राम को अमीर और शिव को गरीब बताकर आखिर हासिल क्या होगा? उत्तर भारत को राम और दक्षिण भारत को शिव से जोड़कर क्या देश की एकता मजबूत होगी? भगवान किसी पार्टी की संपत्ति नहीं हैं। न राम भाजपा के हैं, न शिव कांग्रेस के। आस्था करोड़ों भारतीयों की निजी और सांस्कृतिक विरासत है। राजनीति को अगर धर्म से दूरी नहीं रखनी है तो कम-से-कम धर्म के प्रति मर्यादा तो रखनी ही होगी। भगवानों के नाम पर वोट मांगने की राजनीति हो या भगवानों को ही राजनीति के अखाड़े में एक-दूसरे के सामने खड़ा करने की सियासत हो, दोनों ही रूपों में आस्था का राजनीतिक इस्तेमाल सवालों के कठघरे में खड़ा होता है। -नीरज कुमार दुबे
रेवंत रेड्डी के बयान पर सियासी घमासान, भाजपा बोली-देश को बांटने की कोशिश, कांग्रेस ने किया बचाव
रेवंत रेड्डी के बयान पर सियासी घमासान, भाजपा बोली-देश को बांटने की कोशिश, कांग्रेस ने किया बचाव
प्रधानमंत्री लगातार कर रहे हैं विदेशी मुद्रा बचाने की अपील
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने एक बार पुनः भारतीय नागरिकों से आग्रह किया है कि वे आवश्यक नहीं हो तो सोना नहीं खरींदे अथवा कम मात्रा में खरीदें। साथ ही आपने यह भी अपील की है कि विदेशी पर्यटन को टालने का प्रयास करें एवं विदेश में जाकर शादी ब्याह के कार्यक्रम नहीं करें। यह समय की मांग है कि भारतीय नागरिक विदेशी मुद्रा को बचाने के उद्देश्य से स्वदेशी मंत्र को अपनायें। माननीय प्रधानमंत्री जी को देश के नागरिकों से उक्त आग्रह इसलिए करना पड़ा है क्योंकि वैश्विक स्तर पर परिस्थियां लगातार बिगड़ रही हैं। भारत चूंकि आर्थिक विकास के उस चक्र में आ गया है जहां छोटी सी चूक भी भारत में तेज गति से हो रहे आर्थिक विकास पर बहुत अधिक विपरीत प्रभाव डाल सकती है। इस कठिन दौर में भारत को बहुत संभल कर आगे बढ़ने की आवश्यकता है। रूस यूक्रेन युद्ध लम्बे समय से लगातार चल रहा है, इजरायल हमास युद्ध जारी ही था कि अमेरिका ईरान के बीच युद्ध छिड़ गया। उधर, अमेरिका में ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने के साथ ही विभिन्न देशों से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर टैरिफ की तलवार लगातार लटक रही है। वैश्विक स्तर पर इन विपरीत परिस्थितियों के बीच कई देशों के विदेशी व्यापार पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। इसमें भारत भी शामिल है, क्योंकि भारत अपनी कच्चे तेल की कुल खपत का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अन्य देशों से आयात करता है। इसी प्रकार, भारत देश में स्वर्ण की कुल मांग का भी 90 प्रतिशत से अधिक भाग आयात करता है। विशेष रूप से, अमेरिका ईरान के बीच छिड़े युद्ध के बाद स्ट्रेट ओफ होर्मुज से कच्चे तेल की आपूर्ति लगभग ठप्प पड़ गई है। भारत में होने वाले कच्चे तेल की कुल आपूर्ति का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से आता है। अतः भारत पर उक्त वर्णित परिस्थितियों का विशेष प्रभाव हुआ है। पिछले वर्ष भारत द्वारा 7,200 करोड़ अमेरिकी डॉलर का स्वर्ण आयात किया गया है, पिछले वर्ष की तुलना में यह 32 प्रतिशत अधिक है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्वर्ण की कीमतों में हुए तेज उछाल के चलते ही भारत के स्वर्ण आयात के बिल में 32 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है अन्यथा स्वर्ण आयात की मात्रा में कुछ कमी ही दर्ज हुई है। भारत के कुल आयात में कच्चे तेल के आयात की भागीदारी सबसे अधिक है, इसके बाद स्वर्ण के आयात की भागीदारी रहती है। इसके चलते भारत का विदेशी व्यापार घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है। इसे, यदि समय रहते नहीं सम्भाला गया तो भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर अतिरिक्त दबाव आने लगेगा और अंतरराष्ट्रीय बाजार में रुपए की कीमत और अधिक नीचे आने लगेगी। इसे भी पढ़ें: Pakistan के भीतर जाकर भारत ने किया आतंकवाद पर करारा प्रहार! Islamabad में SCO Meeting Attend कर India ने चल दिया बड़ा दाँव दूसरे, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से कई देशों में मुद्रा स्फीति की दर लगातार बढ़ रही है एवं इसके कारण एवं ब्याज दरों में वृद्धि के चलते इन देशों में बांड यील्ड भी लगातार बढ़ रही है। आज, विभिन्न देशों में बांड यील्ड पिछले कई वर्षों के उच्च स्तर पर आ गई है। जैसे, अमेरिका में 10 वर्षीय बांड यील्ड 4.80 प्रतिशत के उच्च स्तर से भी ऊपर पहुंच गई है, ब्रिटेन में 5.25 प्रतिशत (पिछले 18 वर्षों के उच्चत्तम स्तर पर है), फ्रान्स में 4.24 प्रतिशत (पिछले 17 वर्षों के उच्चत्तम स्तर पर है), जर्मनी में 3.37 प्रतिशत (पिछले 15 वर्षों के उच्चत्तम स्तर पर है), जापान में 2.99 प्रतिशत जहां पर शून्य प्रतिशत हुआ करती थी (पिछले 30 वर्षों के उच्चत्तम स्तर पर है), कनाडा में 3.75 प्रतिशत, ब्राजील में 14.56 प्रतिशत, ऑस्ट्रेलिया में 5.23 प्रतिशत, सिंगापुर में 2.40 प्रतिशत, दक्षिण कोरिया में 4.41 प्रतिशत एवं भारत में 6.98 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई है। यदि विकसित देशों में यदि मुद्रा स्फीति की दर और अधिक बढ़ती है तो इसे नियंत्रण में लाने के उद्देश्य से ब्याज की दरों को बढ़ाया जा सकता है इससे इन देशों में बांड यील्ड और अधिक बढ़ेंगी, जिसके चलते भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं से विदेशी मुद्रा में किए गए निवेश की निकासी होगी और यह राशि विकसित देशों में हस्तांतरित होगी क्योंकि इन देशों में बांड यील्ड आकर्षक स्तर पर पहुंच गई है। इन परिस्थितियों के बीच यदि भारत से भी विदेशी मुद्रा निवेश की निकासी प्रारम्भ होती है तो भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर अतिरिक्त दबाव आएगा और अंतरराष्ट्रीय बाजार में रुपए के मूल्य में तेज गिरावट दृष्टिगोचर होगी जिससे भारत में आयात और अधिक महंगे होने लगेंगे, इस प्रकार भारत में आयातित मंहगाई की अतिरिक्त मार पड़ेगी। इस बढ़ी हुई मंहगाई को नियंत्रित करने के लिए भारत को भी मजबूर होकर ब्याज दरों में वृद्धि करना होगी। ब्याज दरों में वृद्धि का विपरीत प्रभाव देश की सरकार द्वारा जारी किए जाने वाले बांड पर अदा की जाने वाली ब्याज की राशि पर भी पड़ता है, इससे सरकारों को अपने बजट में से और अधिक राशि के भुगतान का प्रावधान ब्याज के रूप में करना होता है और अपने पूंजीगत खर्चों एवं जनता की भलाई के लिए चलाई जा रही विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं पर पर खर्च की जाने वाली राशि में कटौती करनी होती है। लम्बे समय तक चलने वाले अधिक ब्याज दर के साइकल से देश में मंदी की आशंका भी बढ़ती है। विकसित देश आज इस समस्या से झूझते हुए दिखाई दे रहे हैं। भारत को इस दबाव से बचाने की आवश्यकता है। तीसरे, भारत के पास आज 75,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक का विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है। जापान के पास 1.2 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर एवं चीन के पास 3.4 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार उपलब्ध है। भारत अपने विदेशी मुद्रा भंडार को एक लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर तक ले जाना चाहता है क्योंकि इससे भारत को भविष्य में विदेशी व्यापार में होने वाली किसी भी प्रकार की परेशानी से बचाया जा सकेगा। यह तभी सम्भव हो सकेगा, जब भारतीय नागरिक विदेशी मुद्रा का सोच समझकर उपयोग करें। स्वर्ण की खरीद से, विदेश में पर्यटन करने से एवं विदेश में शादियों के कार्यक्रम आयोजित करने से विदेशी मुद्रा का खर्च बढ़ता है जिससे भारत के विदेशी मुद्रा भंडार कम होते हैं। चौथे, भारतीय नागरिकों में स्वर्ण के प्रति आकर्षण कुछ अधिक मात्रा में ही है। यह सही है कि स्वर्ण भविष्य में आर्थिक सुरक्षा प्रदान करता हुआ दिखाई देता है परंतु देश के विकास की दृष्टि से यह सुप्त मुद्रा के रूप में ही देखा जाता है। स्वर्ण में किए गए निवेश पर किसी भी प्रकार की आय का अर्जन नहीं होता है क्योंकि स्वर्ण में निवेश की गई राशि उत्पादक निवेश की श्रेणी में नहीं गिनी जाती है। एक अनुमान के अनुसार भारतीय परिवारों के पास लगभग 25,000 टन से अधिक का स्वर्ण भंडार मौजूद है, जिसकी बाजार कीमत लगभग 5 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर है, जो भारत के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 125 प्रतिशत है। इतनी भारी भरकम राशि का निवेश निष्क्रिय एवं अनुत्पादक अस्तियों में होने के चलते लाखों करोड़ रुपए की राशि पर किसी प्रकार की आय का अर्जन नहीं हो रहा है। यदि इसी निवेश को उत्पादक कार्यों में लगाया जाय तो देश की अर्थव्यवस्था को और अधिक गतिशील एवं प्रभावशाली बनाया जा सकता है। अतः भारत में यह लगातार प्रयास किया जा रहा है कि निवेश को अनुत्पादक अस्तियों में घटा कर उत्पादक अस्तियों में लगाया जाय। अतः अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उक्त वर्णित विपरीत परिस्थितियों के बीच भारत के प्रधानमंत्री, भारतीय नागरिकों से उक्त तीन आग्रह लगातार कर रहे हैं ताकि भारत की आर्थिक विकास दर को अक्षुण बनाए रखा जा सके, भारत में किए गए विदेशी मुद्रा के निवेश को भारत से बाहर निकलने से रोका जा सके एवं भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को और अधिक मजबूत बनाया जा सके ताकि भारत को भविष्य में विदेशी व्यापार में आने वाली किसी भी परेशानी से बचाया जा सके। - प्रहलाद सबनानी सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक, भारतीय स्टेट बैंक के-8, चेतकपुरी कालोनी, झांसी रोड, लश्कर, ग्वालियर - 474 009
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कमजोर वैश्विक संकेतों के बीच शेयर बाजार की धीमी शुरुआत
मुंबई, घरेलू शेयर बाजार मंगलवार को सुस्त शुरुआत के साथ खुले। कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और कमजोर वैश्विक संकेतों के बीच बेंचमार्क इंडेक्स में लगभग 0.2 प्रतिशत की गिरावट देखी गई।
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भारत चल पड़ा है नई औद्योगिक क्रांति के पथ पर
भारत में आज एक नई औद्योगिक क्रांति प्रारम्भ हो चुकी है, यह विचार अमेरिका की एक जानी मानी निवेश बैंक- जेफ्रीज ने व्यक्त किये हैं। भारत में, विशेष रूप से डाटा केंद्र स्थापित करने के उद्देश्य से करोड़ों अमेरिकी डॉलर का निवेश होता हुआ दिखाई दे रहा है। भारत में डाटा केंद्र स्थापित करने पर केंद्र सरकार की ओर से टैक्स में भारी भरकम छूट भी प्रदान की जा रही है। अतः भारत में डाटा केंद्र स्थापित करने की तो जैसे होड़ सी मच गई है। पिछले 5 वर्षों के दौरान भारत में डाटा केंद्रों की क्षमता दोगुनी हो चुकी है एवं आगे आने वाले 5 वर्षों के दौरान यह क्षमता बढ़कर 10 GW हो जाने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। वैश्विक स्तर पर डाटा केंद्र अब एक महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में उभर रहा है। साथ ही, भारत में सेमीकंडक्टर उत्पादन इकाईयों को उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना के अंतर्गत लाभ प्रदान किया जा रहा है, इसके लिए 1,300 करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि निर्धारित की गई है। इसका परिणाम यह है कि सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में विनिर्माण इकाईयों की स्थापना हेतु भारत में 2,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निवेश किया जा चुका है, और यह आगे भी जारी हैं। इसे भी पढ़ें: जीडीपी से नहीं जमीन पर नजर आए बदलाव भारत आज उन चुनिंदा देशों में से एक है, जिनके पास स्पेस क्षेत्र से सम्बंधित नवीनतम तकनीकी उपलब्ध है। भारत में स्पेस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था वर्ष 2030 तक 5 गुना तक बढ़ सकती है। वैश्विक स्तर पर एयरो स्पेस के क्षेत्र में मांग एवं आपूर्ति में असंतुलन के चलते भारत लाभ की स्थिति में पहुंच गया है क्योंकि कम लागत और कुशल इंजीनीयरिंग टैलेंट आज भारत में ही सम्भव है। इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में भारत आज केवल पुर्जों को इकट्ठा कर उत्पाद बनाने का कार्य करने तक सीमित नहीं है बल्कि इस क्षेत्र में उच्चस्तरीय उत्पादों का निर्माण भी करने लगा है। 6 वर्षों में मोबाइल कम्पोनेंट में घरेलू वैल्यू एडीशन लगभग 20 प्रतिशत से बढ़कर 50 प्रतिशत तक होने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। सोलर के क्षेत्र में भारत आज वैश्विक स्तर पर दूसरा सबसे बड़ा सोलर पीवी का उत्पादक देश बन गया है। इसका परिणाम यह है कि वर्तमान में भारत की 35 GW की सोलर क्षमता चालू है एवं 100 GW की क्षमता पर निर्माण कार्य चालू है। एशिया की सबसे बड़ी 100 कम्पनियों की सूची में आज भारत की 34 कम्पनियां शामिल हो चुकी हैं। कुल मिलाकर, पूर्व में भारत केवल फार्मा, टेक्स्टायल, चमड़ा उत्पाद, कृषि उत्पाद (मसाला, आदि) स्टील, ऑटोमोबील एवं सूचना प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में ही वैश्विक स्तर पर उक्त उत्पादों का निर्यात करने में सफल हो रहा था परंतु आज स्थितियां बदल गई हैं एवं अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों जैसे डाटा केंद्र, सेमीकंडक्टर उत्पादन, स्पेस क्षेत्र, इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र, सोलर क्षेत्र, सुरक्षा क्षेत्र में भी वैश्विक स्तर पर भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। भारत में उपलब्ध टैलेंट एवं श्रम के भरोसे विश्व की कई बड़ी कम्पनियों के बीच आज भारत में विशाल वैश्विक योग्यता केंद्रों (जीसीसी) की स्थापना करने की होड़ सी लग गई है। ब्रिटेन में फार्मा के क्षेत्र में कार्य करने वाली कम्पनी - एस्ट्रा जेनेका ने चेन्नई में एक विशाल वैश्विक योग्यता केंद्र की स्थापना की है। बैंक ऑफ अमेरिका ने अपना सबसे बड़ा बैक ऑफिस कार्यालय पुणे में स्थापित किया है, इस बैंक के पूरे विश्व में बैक ऑफिस में कार्य कर रहे 11,000 कर्मचारी इस केंद्र का ब्रेन बन गए हैं। अमेरिका के सबसे पुराने वित्तीय संस्थानों में से एक बैंक ओफ न्यूयॉर्क, मेलोन ने पुणे एवं चेन्नई में वैश्विक योग्यता केंद्रों की स्थापना की है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में कार्य करने वाली बोस्टन की एक कम्पनी ने फरवरी 2026 में हैदराबाद में विशाल स्तर पर अपने एक अंतरराष्ट्रीय कार्यालय की स्थापना की है। बेंगलुरु, हैदराबाद, चेन्नई एवं पुणे में आज 1,700 से अधिक वैश्विक योग्यता केंद्र स्थापित किए जा चुके हैं, इन केंद्रों में 19 लाख से अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं। भारत आज आउटसोर्सिंग हब से आगे बढ़कर उच्च स्तरीय टैलेंट केंद्र के रूप में स्थापित हो रहा है। भारत में स्थापित किए गए कुल वैश्विक योग्यता केंद्रों में से लगभग 65 प्रतिशत केंद्र अमेरिकी कम्पनियों द्वारा स्थापित किए गए हैं। इन कम्पनियों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में की जा रही रीसर्च का कार्य इन केंद्रों पर सम्पन्न हो रहा है एवं टेक्नॉलजी के क्षेत्र में नए नए उत्पादों का निर्माण भी इन्हीं केंद्रों में किया जा रहा है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्य कर रही अमेरिका की ही एक कम्पनी ट्रूब्रिज ने भी फरवरी 2026 में मुंबई में वैश्विक योग्यता केंद्र की स्थापना की है, इस केंद्र को आगे आने वाले समय में और अधिक विस्तार दिया जाने वाला है। इसी प्रकार, बीमा, बैंकिंग, स्वास्थ्य, साइबर सिक्युरिटी, फार्मा एवं सुरक्षा के क्षेत्रों में कार्यरत अनेक कंपनियां भारत में अपने वैश्विक योग्यता केंद्रों की स्थापना कर रही हैं। पूर्व में, अमेरिका एवं अन्य विकसित देशों को भारत से ब्रेन ड्रेन हो रहा था, परंतु अब परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं एवं अब विशेष रूप से अमेरिका से भारत को रिवर्स ब्रैन ड्रेन होने लगा है क्योंकि ट्रम्प प्रशासन की नीतियों के चलते अन्य देशों से अमेरिका में जाने वाले टैलेंट का अमेरिका में रहना अब मुश्किल हो रहा है। अमेरिका एवं अन्य यूरोपीयन देशों में पूंजीवाद एवं साम्यवाद की नीतियों के चलते इन देशों में जन्म दर भी लगातार कम हो रही है। इन देशों में समाज में प्रत्येक व्यक्ति केवल अपने आप पर ध्यान केंद्रित किए हुए है। विवाह जैसी अति पवित्र संस्था को पश्चिमी देशों ने केवल मौज मस्ती का माध्यम बना दिया गया है। केवल कामुकता के लिए विवाह नहीं किया जाता है जबकि यह एक सामाजिक जिम्मेदारी है। भारतीय दर्शन में अपने कुल को आगे बढ़ाने के लिए विवाह को एक पवित्र संस्था माना गया है। जबकि, पश्चिमी देशों में आज विवाह को आवश्यक ही नहीं माना जा रहा है बल्कि वहां के नागरिक लिव इन रिलेशनशिप में भी रहने लगे हैं। इन देशों में तलाक की दर में अतुलनीय वृद्धि दर्ज हो रही है। इन देशों में सामान्य जीवन यापन की लागत बहुत अधिक महंगी हो रही है। साथ ही, पश्चिमी दर्शन में पुनर्जन्म में विश्वास नहीं किया जाता है, जो कुछ भी भोगना है केवल इसी जन्म में सम्पन्न करना है। अतः इन देशों में अपनी पीढ़ी को आगे बढ़ाने के लिए बच्चे पैदा करना आवश्यक नहीं समझा जा रहा है। इन देशों में समाज की जीवन शैली ही इस प्रकार की बन गई है कि केवल अपने आप पर ध्यान केंद्रित करें एवं अपनी काया को किसी प्रकार का कष्ट नहीं होना चाहिए, परिवार पर एवं समाज पर किसी नागरिक का ध्यान बहुत कम है। पश्चिमी देशों में नागरिक, “मैं और केवल मैं” किस प्रकार अधिक से अधिक सुखी रह सकता हूं, इस विषय पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित किए हुए हैं। यह विशेषताएं पूंजीवाद एवं साम्यवाद पर आधारित अर्थव्यवस्थाओं में बहुत मुखर रूप से उभर का सामने आती है। बच्चे पैदा करने का निर्णय भी बचत एवं खर्च की दृष्टि को सामने रखकर लिया जा रहा है। चूंकि मैं अपने बच्चे पर होने वाले खर्च को वहन नहीं कर सकता हूं अतः मुझे बच्चे पैदा ही नहीं करना है। पश्चिमी देशों में सामान्य परिवार चलाने की लागतें बढ़ती जा रही है अतः परिवार में “डबल इनकम नो किड्ज़” (डिंक) का विचार भी जोर पकड़ता जा रहा है। इन देशों में पूंजीवाद एवं साम्यवाद पर आधारित आर्थिक नीतियों ने नागरिकों को दिमागी तौर पर दिवालिया बना दिया है। इन देशों में नागरिकों का पूरा ध्यान केवल भौतिकवादी विकास पर ही केंद्रित हो गया है। परिवार एवं समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी का एहसास समाप्त सा हो गया है। आज पश्चिमी देशों के नागरिक, विशेष रूप से प्रौढ़ नागरिक, जीवन के अपने अंतिम पलों को सहज बनाने के उद्देश्य से भारत में शिफ्ट हो रहे हैं। भारत की अध्यात्म नगरी ऋषिकेश, हरिद्वार, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड आदि स्थानों पर विकसित देशों के नागरिकों की जैसे बाढ़ सी आ गई है। कुछ देशों के नागरिक गोवा जैसे राज्यों में भी आकर बस रहे हैं। क्योंकि, भारत के इन स्थलों पर उन्हें मानसिक शांति प्राप्त हो रही है। पहिले तो ये विदेशी नागरिक योगा एवं आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के उद्देश्य से भारत आते हैं परंतु यहां आने के उपरांत उन्हें जो आत्मिक शांति प्राप्त होती है, उसके चलते ये लोग भारत में ही बस जाते हैं। - प्रहलाद सबनानी सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक, भारतीय स्टेट बैंक के-8, चेतकपुरी कालोनी, झांसी रोड, लश्कर, ग्वालियर - 474 009
'जीत पर ईवीएम ठीक, हार पर सवाल क्यों'; राजस्थान भाजपा अध्यक्ष मदन राठौड़ का विपक्ष पर निशाना
'जीत पर ईवीएम ठीक, हार पर सवाल क्यों'; राजस्थान भाजपा अध्यक्ष मदन राठौड़ का विपक्ष पर निशाना
यूएस फेड : गोल्ड-सिल्वर ईटीएफ 3.6 प्रतिशत तक गिरावट
मुंबई, अमेरिका में ब्याज दरों में बढ़ोतरी की उम्मीद के चलते सोमवार को सोने और चांदी की कीमतों को ट्रैक करने वाले गोल्ड-सिल्वर ईटीएफ (एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स) में 3.6 प्रतिशत तक की बड़ी गिरावट देखने को मिली।
अब हफ्ते में 5 दिन ही खुलेंगे बैंक? रातों-रात ऐसा क्या हुआ, 3-Day Bank Strike क्यों टाल दी गई
पिछले सात दिनों से पूरे देश के सीने पर एक भारी सस्पेंस लटका हुआ था। एक ही चेतावनी, एक ही डर कि 28, 29 और 30 सितंबर यानी लगातार 72 घंटे तक देश के बैंकों का दिल धड़कना बंद कर देगा! शटर नहीं उठेंगे, तिजोरियों पर ताले लटके रहेंगे और 30 सितंबर की महा-क्लोज़िंग के बीच देश की पूरी वित्तीय व्यवस्था वेंटिलेटर पर आ जाएगी। हमारे पिछले एमआरआई के एपिसोड में भी हमने इस आने वाले तूफ़ान की एक-एक आहट से आपको रूबरू कराया था। लेकिन फिर घड़ी की सुइयां रात के साढ़े नौ बजाती हैं। रविवार की रात जब पूरा देश सोने की तैयारी कर रहा था, ठीक उसी वक्त परदे के पीछे एक ऐसी बाज़ी पलटी जाती है, जिसने सबको सन्न कर दिया! अब देश की जनता और करोड़ों खाताधारकों के मन में सीधा सवाल यह कौंध रहा है कि आखिर रविवार की आधी रात को ऐसी कौन सी बातचीत हुई? बंद कमरों में ऐसा क्या समझौता हुआ कि जो यूनियंस आर-पार की जंग के मूड में थीं, जो कर्मचारी आक्रोश में सड़कों पर उतरने को तैयार थे, उन्होंने आखिरी वक्त में अपने कदम पीछे क्यों खींच लिए? क्या सरकार ने कर्मचारियों की सबसे पुरानी और सबसे बड़ी मांग यानी '5-डे बैंकिंग' को आखिरकार मंजूरी दे दी है? क्या अब हर शनिवार को देश की सभी बैंक शाखाएं पूरी तरह बंद रहेंगी? या फिर सरकार ने कर्मचारियों की दुखती रग पर हाथ रखकर कोई ऐसा दांव चल दिया, जिसे यूनियनें झेल नहीं पाईं? सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न अगर शनिवार की छुट्टी पर कोई फैसला हुआ ही नहीं, तो फिर ऐन वक्त पर यह हड़ताल वापस क्यों ली गई? क्या यह बैंक कर्मचारियों की कोई बड़ी रणनीतिक बढ़त है, ग्राहकों के हित में लिया गया फैसला है या फिर सरकार और यूनियनों के बीच केवल वक्त हासिल करने की कोई अंदरूनी चाल? आज के एपिसोड में हम बैंक हड़ताल टलने के पीछे की इनसाइड स्टोरी, आधी रात को बने समझौतों और आपके बैंक जाने से जुड़े हर नियम का एमआरआई स्कैन करेंगे। क्या थी बैंक कर्मचारियों की मांग 27 सितंबर को रात में करीब 9:30 बजे इंडियन बैंक्स एसोसिएशन यानी कि आईबीए और यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस यानी कि यूएफबीयू के बीच में एक बैठक होती है। इसके बाद यूनियंस ने 28, 29 और 30 सितंबर को प्रस्तावित हड़ताल को वापस लेने की घोषणा कर दी। सबसे पहले समझते हैं विवाद क्या था। आज जो वर्तमान में अगर हम बैंकिंग देखें तो महीने के दूसरे और चौथे शनिवार को बैंक की ब्रांचेस बंद रहती हैं। यानी कि बाकी शनिवार में कार्य दिवस रहता है। बैंक यूनियंस की बेसिक डिमांड यह थी कि सभी शनिवार को अवकाश घोषित किया जाए। यानी बैंकिंग में पांच डे वर्क वीक लागू हो। जैसा कि LIC में और सरकारी अस्पताल सरकारी कार्यालयों में लागू होता है। इसे भी पढ़ें: 28 से 30 सितंबर तक Bank Strike का ऐलान, PSU Banks में शाखा कामकाज रहेगा प्रभावित मांग को कर्माचरियों और ग्राहकों के नजरिए से समझें बैंक कर्मचारी से अगर आप पूछिए तो उसका कहना होगा कि बैंक का काम केवल बैंक की शाखा का शटर गिरते ही समाप्त नहीं होता। ग्राहकों से जुड़े काम की रिपोर्टिंग, लक्ष्य और दूसरी जिम्मेदारियां भी होती हैं। यूनियंस का तर्क है 5 दिन के कार्य सप्ताह पर गंभीरता से फैसला होना चाहिए। कर्मचारी बेहद दबाव में काम कर रहे हैं। अब ग्राहक से पूछिएगा जो सोमवार से शुक्रवार अपनी नौकरी करता है और उसके लिए शनिवार बैंक जाकर काम निपटाने का एक सुविधाजनक दिन हो सकता है। सरकार ने भी इसी बात को अपनी सार्वजनिक अपील में उठाया था कि बचे हुए शनिवार बहुत से ग्राहकों के लिए बैंकिंग सेवाएं लेने का मौका है। यह सरकार का पक्ष है। सवाल केवल कर्मचारियों की छुट्टी का नहीं रह जाता। सवाल यह भी है कि अगर बैंक का कार्य सप्ताह बदले तो ग्राहकों की पहुंच कैसे बनी रहेगी? इसे भी पढ़ें: 5 दिन बैंक बंद! कर्मचारियों के साथ ऐसा क्या हुआ? मेगा हड़ताल पर आ गए सभी, वजह जानकर आप भी चौंक जाएंगे बैठक में क्या तय हुआ बातचीत के बाद बैंक यूनियनों ने हड़ताल वापस लेने का ऐलान किया। यूएफबीयू कई बैंक कर्मचारी और अधिकारियों के संगठनों का ग्रुप है। यूएफबीयू ने सात बैंक यूनियन की ओर से एक संयुक्त बयान जारी किया है। जिसमें कहा है कि आईबीए और यूएफबीयू की एक हाई लेवल कमेटी तुरंत बनाई जाएगी। यह कमेटी बाकी शनिवार को छुट्टी देने के मुद्दे पर बात करेगी। कमेटी सभी संभावित विकल्पों पर विचार करेगी। अलग-अलग पक्षों से बात करेगी और ऐसा रास्ता निकालेगी और या निकालने की कोशिश करेगी जो बैंक कर्मचारियों के साथ-साथ ग्राहकों के लिए भी ठीक हो। बैंक यूनियंस की एक बड़ी मांग थी। यह मांग स्केल फोर और उससे ऊपर के बैंक अधिकारियों के लिए परफॉर्मेंस लिंक इंसेंटिव यानी काम के आधार पर मिलने वाली इंसेंटिव की योजना से जुड़ी है। यूनियनों ने इस योजना को वापस लेने की मांग की थी। इस पर भी बातचीत आगे बढ़ाने की बात हुई है। यूएफबीयू के मुताबिक आईबीए सरकार के सामने इस योजना के बदलाव का प्रस्ताव रखेगा ताकि यूनियनों की मांगों को ध्यान में रखा जा सके। इसके बाद जो मुद्दे बचेंगे उन पर दोनों पक्ष बातचीत करेंगे और जल्द कोई हल निकालने की कोशिश होगी। हड़ताल इतनी अहम क्यों थी? हड़ताल 28 से 30 सितंबर तक होनी थी। 30 सितंबर बैंकों के लिए हाफ ईयर क्लोजिंग का दिन होता है। इस दिन बैंक में कई जरूरी काम निपटाए जाते हैं। जैसे खातों का हिसाब मिलाना, पैसों का मिलान करना, जरूरी रकम का इंतजाम करना और ट्रेजरी और मार्केट से जुड़े काम पूरे करना। अगर 28 से 30 सितंबर तक बैंक बंद रहते हैं तो उससे ठीक पहले शनिवार और रविवार सैटरडे संडे भी पड़ रहा था। ऐसे में बैंकिंग सेवाएं लगातार 5 दिन तक प्रभावित हो सकती थी। इसी वजह से वित्त मंत्रालय ने 21 सितंबर को बैंक कर्मचारियों से हड़ताल पर नहीं जाने की अपील की थी। मंत्रालय ने कहा था कि हड़ताल से बैंकिंग सेवाएं प्रभावित होंगी। लोगों को परेशानी होंगी और बैंकों के कामकाज पर भी असर पड़ेगा। मंत्रालय के मुताबिक इसका नुकसान आखिरकार बैंक कर्मचारियों के हितों पर भी पड़ सकता है। इसके बाद 23 सितंबर को वित्त मंत्रालय ने पब्लिक सेक्टर बैंकों और रीजनल रूरल बैंकों को निर्देश दिया था कि 27 सितंबर यानी रविवार को भी बैंक खुले रहेंगे। रविवार को काम का अतिरिक्त वेतन और अनिश्चितकालीन हड़ताल की चेतावनी यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस (UFBU) द्वारा देर रात जारी किए गए आधिकारिक सर्कुलर से एक और बड़ी बात सामने आई है। वित्त मंत्रालय के निर्देश पर रविवार, 27 सितंबर को जिन बैंक कर्मचारियों और अधिकारियों ने शाखाओं में जाकर काम किया, उनके मुआवजे पर भी सहमति बन गई है। सर्कुलर के मुताबिक, रविवार को काम करने वाले क्लेरिकल और सब-स्टाफ कर्मचारियों को बायपार्टाइट समझौते के तहत दोगुना ओवर-टाइम (Double OT) भत्ता दिया जाएगा, जबकि अधिकारियों को इसके एवज में एक दिन का अतिरिक्त वेतन मिलेगा। गौरतलब है कि यूनियनों ने 28 से 30 सितंबर की हड़ताल के बाद 26 अक्टूबर से अनिश्चितकालीन हड़ताल का भी नोटिस दे रखा था। इस समझौते में 5-डे बैंकिंग और पीएलआई (PLI) के अलावा 8 मार्च 2024 से अटके पुराने मुद्दे जैसे एनपीएस से ओपीएस (OPS), पेंशन अपडेशन और नई भर्तियों के समाधान पर भी तेजी से बात करने पर सहमति बनी है। पांच दिन काम की मांग आखिर आई कहां से? यह जो पूरा विवाद है कि पांच दिन काम हो और दो दिन छुट्टी मिले। ये बात आई कहां से? बैंक यूनियनों का कहना है कि पहले बैंक सोमवार से शुक्रवार तक काम करते थे और शनिवार को आधे दिन का काम होता था। साल 2015 में हुए एक समझौते के बाद महीने के दूसरे और चौथे शनिवार को छुट्टी कर दी गई यानी कि सेकंड सैटरडे लेकिन बाकी शनिवार अभी भी पूरे दिन कामकाजी होते हैं। अब यूएफबीयू चाहता है कि बाकी शनिवार को भी छुट्टी मिले। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक यूनियन का कहना है कि केंद्र और राज्य सरकार के दफ्तरों, आरबीआई, LIC, प्राइवेट कंपनियों, स्टॉक मार्केट, मनी मार्केट और विदेशी मुद्रा बाजार में पहले से 5 दिन का काम होता है। अभी तीन दिन की बैंक हड़ताल टल गई है। लेकिन 5 दिन काम और दो दिन छुट्टी की मांग पर आखिरी फैसला अभी नहीं हुआ है। ना इसे मंजूरी मिली है और ना ही कहा जा सकता है कि विवाद हमेशा के लिए समाप्त हो गया है। हड़ताल टालने के लिए किया गया रेडिमेड उपाय तो नहीं ? समिति कब बनती है? बैठक कब करती है? ग्राहकों की सुविधा के लिए क्या प्रस्ताव रखती है? उसके बाद सरकार और संबंधित संस्थाएं इस पर क्या निर्णय लेती हैं? यही तीन कदम बताएंगे कि रविवार रात की बातचीत किसी स्थाई समाधान की शुरुआत थी या केवल हड़ताल को रुकवाने के लिए किया गया एक रेडीमेड उपाय था। इस पूरी कहानी को एक वाक्य में समझें तो बैंक हड़ताल टली है। 5 दिन की बैंकिंग पर अभी कोई फाइनल मुहर नहीं लगी। रविवार रात आईबीए और यूनियंस के बीच बातचीत से एक उच्च स्तरीय समिति बनाने और अंतिम तौर पर जो दूसरे लंबित मुद्दे हैं उन पर चर्चा के लिए केवल सहमति बनी है और इसी के बाद यूनियंस ने प्रस्तावित हड़ताल वापस ले ली है। ग्राहकों को तत्काल राहत मिली है। लेकिन शनिवार की बैंकिंग के अंतिम फैसले पर फाइनल मुहर लगनी बाकी है।
मायावती ने नगीना सांसद को लेकर दावा किया कि चंद्रशेखर आजाद का नगीना क्षेत्र में कोई खास जनाधार नहीं था, इसके बावजूद वह चुनाव जीत गए। उन्होंने आरोप लगाया कि EVM में कथित गड़बड़ी के जरिए बीजेपी ने उन्हें चुनाव जितवाया। मायावती ने यह भी आरोप लगाया कि चंद्रशेखर आजाद बीजेपी के इशारे पर काम करते हैं।
शिवसेना (यूबीटी) ने चुनाव आयोग पर वोटिंग से वंचित करने का लगाया आरोप, 'सामना' में जन-आक्रोश की चेतावनी
एनएसई के शेयर आईपीओ इश्यू प्राइस में हुई गिरावट
मुंबई, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ऑफ इंडिया (एनएसई) के हाल ही में सूचीबद्ध हुए शेयर सोमवार को अपने आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) के इश्यू प्राइस से नीचे फिसल गए। इसके साथ ही, शेयर बाजार में लिस्टिंग के बाद अपने उच्चतम स्तर से इनमें 6 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई।
बैंक हड़ताल टली, ग्राहकों को मिली राहत
नई दिल्ली, सरकारी बैंक कर्मचारियों के संघ यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस (यूएफबीयू) की ओर से प्रस्तावित 28-30 सितंबर तक की हड़ताल टलने से ग्राहकों को राहत मिली है और सभी बैंकों में कामकाज सामान्य बना हुआ है। यह जानकारी कई सरकारी बैंकों की ओर से सोमवार को दी गई।
सोने और चांदी की कीमतें 2.5 प्रतिशत तक गिरीं
मुंबई, सोने और चांदी में सोमवार के सत्र में गिरावट देखने को मिली और शुरुआती कारोबार में ही दोनों कीमती धातुओं का दाम करीब 2.5 प्रतिशत तक कम हो गया।
वैश्विक संकेतों से भारतीय शेयर बाजार में गिरावट
मुंबई, कमजोर वैश्विक संकेतों से भारतीय शेयर बाजार सोमवार के कारोबारी सत्र में गिरावट के साथ खुला। सुबह 9:17 पर सेंसेक्स 526.96 अंक या 0.71 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 73,368.78 और निफ्टी 174.20 अंक या 0.75 प्रतिशत की गिरावट के साथ 22,966.30 पर था।
'दृढ़ संकल्प और सादगी का संगम थे अशोक सिंहल', जन्मशताब्दी पर पीएम मोदी ने लिखा भावुक लेख
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‘पहले कांग्रेस को भी नहीं पूछा, अब मजबूरी में महात्मा गांधी’, ममता बनर्जी की विपक्ष से एकजुटता की अपील पर भाजपा का तंज
धरपुरम में गरजेंगे सीएम विजय, सत्यबामा के लिए 30 सितंबर को करेंगे प्रचार
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और तमिलगा वेट्ट्री कजगम (टीवीके) के अध्यक्ष सी. जोसेफ विजय 30 सितंबर को धरपुरम में एक जनसभा को संबोधित करेंगे। इस सभा में वे 6 अक्टूबर को होने वाले विधानसभा उपचुनाव में पार्टी की उम्मीदवार पी. सत्यबामा के लिए प्रचार करेंगे।
यूपी BJP में राज्यसभा को लेकर मंथन, 8 सीटों के लिए आज तय होंगे संभावित नाम
उत्तर प्रदेश में राज्यसभा चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया तेज कर दी है
चुनाव आयोग विवाद: किशन रेड्डी ने कांग्रेस पर 'दोहरे मापदंड' का आरोप लगाया
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नितिन नवीन के नेतृत्व में बंगाल भाजपा की संगठनात्मक बैठक, नेताओं ने संगठन को मजबूत करने पर दिया जोर
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राहुल गांधी विकास पर नहीं करते बात, विदेश में करते हैं भारत को बदनाम: प्रफुल पानशेरिया
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विपक्ष के पास कोई मुद्दा नहीं, इसलिए संवैधानिक संस्थाओं को निशाना बना रहा : नायब सैनी
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भारत का यूपीआई तेजी से आगे बढ़ रहा है
नई दिल्ली, नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) द्वारा संचालित यूपीआई भुगतान प्रणाली लेनदेन की मात्रा के लिहाज से दुनिया की सबसे बड़ी रिटेल फास्ट-पेमेंट सिस्टम है।
राष्ट्राध्यक्षों द्वारा हिंदी गाने गाकर सांस्कृतिक जुड़ाव की रणनीतिक
दिल्ली में हुए ब्रिक्स 2026 शिखर सम्मेलन के दौरान, मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने दो लोकप्रिय हिंदी फ़िल्मी गाने गाकर सबका ध्यान खींचा। उन्होंने ख्वाब हो तुम या कोई हकीकत और दोस्त, दोस्त न रहा, प्यार प्यार न रहा गाने गाए। इससे पहले, फरवरी 2026 में प्रधानमंत्री मोदी की मलेशिया यात्रा के दौरान, अनवर ने 'कभी खुशी कभी गम' फ़िल्म के गाने बोले चूड़ियाँ के साथ अपना आधिकारिक वीडियो एडिट करके उसमें बॉलीवुड का तड़का लगाया था। अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों में हिंदी गानों की भूमिका विदेशी नेता और अधिकारी लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों में हिंदी गाने गाते रहे हैं। जैसा कि कहा जाता है, संगीत की कोई भाषा नहीं होती। यह सीधे दिल से निकलता है। समय के साथ, कई गैर-भारतीय हस्तियों ने वैश्विक आयोजनों में हिंदी गाने गाकर दर्शकों का दिल जीता है। इसके कुछ उल्लेखनीय उदाहरण नीचे दिए गए हैं: (a)अगस्त 2023 में, भारत में तत्कालीन ब्रिटिश उच्चायुक्त सर अलेक्जेंडर एलिस ने किशोर कुमार की जयंती के अवसर पर 'ब्लैकमेल' (1973) फ़िल्म का गाना पल पल दिल के पास गाते हुए एक वीडियो पोस्ट किया। उन्होंने यह भी बताया कि उनकी पसंदीदा हिंदी फ़िल्में 'शोले' और 'चुपके-चुपके' हैं। यह सांस्कृतिक कूटनीति का एक बेहद व्यक्तिगत रूप था, क्योंकि ब्रिटिश राजनयिक ने खुद हिंदी गाना गाने में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया था। (b)27 से 28 अप्रैल 2018 तक चीनी विदेश मंत्रालय द्वारा आयोजित वुहान शिखर सम्मेलन के दौरान, हुबेई संग्रहालय में एक कार्यक्रम में चीनी संगीतकारों ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लिए हिंदी फ़िल्म 'ये वादा रहा' (1982) के गाने तू तू है वही दिल ने जिसे अपना कहा की धुन (इंस्ट्रूमेंटल) बजाई। प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट किया, विदेशी धरती पर भारतीय संगीत सुनकर बहुत अच्छा लगा... हमारे कलाकार दुनिया भर में लोकप्रिय हैं। दिवंगत ऋषि कपूर, जो मूल गाने में नज़र आए थे, ने भी ट्वीट किया, सम्मानित महसूस कर रहा हूँ। (c) मार्च 2021 में, भारतीय राजदूत तरनजीत सिंह संधू के लिए आयोजित एक डिनर में, जिसमें अमेरिकी नौसेना के चीफ ऑफ नेवल ऑपरेशन्स एडमिरल माइकल गिल्डे भी शामिल हुए थे, अमेरिकी नौसेना के आधिकारिक बैंड 'सी चैंटर्स' ने हिंदी फिल्म 'स्वदेश' (2004) का गाना ये जो देश है तेरा पेश किया। अमेरिकी नौसेना बैंड ने ट्वीट किया, नौसेना बैंड 1925 से ही नौसेना को सहयोगी देशों से जोड़ रहा है! होली की शुभकामनाएं। राजदूत संधू ने जवाब दिया, यह दोस्ती का ऐसा बंधन है जिसे तोड़ा नहीं जा सकता। (d) 2019 में, महात्मा गांधी की 150वीं जयंती मनाने के लिए 124 देशों के संगीतकारों ने भक्ति गीत वैष्णव जन तो तेने कहिए की एक मेडली (कई धुनों का मिश्रण) पेश की। भारत के विदेश मंत्रालय की अगुवाई वाली इस पहल में आर्मेनिया से अंगोला और आइसलैंड से इराक तक के देशों के कलाकार शामिल थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका संकलन वीडियो जारी किया। राजनीतिक वैज्ञानिक इस घटनाक्रम को सांस्कृतिक कूटनीति या बॉलीवुड कूटनीति कहते हैं। इसमें सॉफ्ट पावर के एक साधन के तौर पर हिंदी सिनेमा का इस्तेमाल किया जाता है और कूटनीतिक प्रोटोकॉल के साथ सांस्कृतिक जुड़ाव में संतुलन बनाया जाता है। प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने इस तरीके को अपनाने में काफी कुशलता दिखाई है। कूटनीति में तनाव कम करना और मनोवैज्ञानिक तालमेल जो विदेशी नेता या प्रतिनिधि हिंदी गाने गाते हैं या सीधे तौर पर भारतीय सांस्कृतिक चीजों से जुड़ते हैं, वे पब्लिक डिप्लोमेसी (जन-कूटनीति) के एक बहुत असरदार तरीके का इस्तेमाल करते हैं। आज के अंतरराष्ट्रीय संबंधों में, जहां प्रभाव राजनीतिक या सैन्य दबाव के बजाय आकर्षण पर टिका होता है, किसी देश की लोकप्रिय संस्कृति से सीधा जुड़ाव कूटनीतिक तनाव को कम करता है। इससे तुरंत सद्भावना बढ़ती है, हालांकि अगर यह दिखावा लगे तो बनावटी भी लग सकता है। पारंपरिक कूटनीतिक प्रोटोकॉल औपचारिक स्क्रिप्ट, राजकीय भोज और तयशुदा बयानों पर निर्भर करता है, जो अक्सर पक्षों के बीच दूरी बढ़ाते हैं। जब कोई विदेशी प्रतिनिधि कोई सांस्कृतिक काम करता है, जैसे कि कोई मशहूर हिंदी गाना गाना, तो आम प्रोटोकॉल से हटकर किया गया यह काम अपनापन, विनम्रता और कोशिश को दिखाता है; लेकिन अगर इसे अच्छी तरह से नहीं लिया गया, तो इसके अजीब लगने का खतरा भी रहता है। इस संरचनात्मक बदलाव से कई तरह से यह बदलता है कि राजनयिक बातचीत को कैसे देखा जाता है: सम्मान और तैयारी का संकेत: किसी विदेशी भाषा में गाने के बोल सीखना काफी मेहनत का काम है, जो यह दिखाता है कि आने वाला नेता मेज़बान देश की सांस्कृतिक पहचान को महत्व देता है। राजनीतिक हस्तियों को मानवीय रूप देना: यह तरीका किसी नेता के बारे में जनता की सोच को एक औपचारिक सरकारी प्रतिनिधि से बदलकर एक ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश करता है जिससे आसानी से जुड़ा जा सके। इससे अहम बातचीत के दौरान भावनात्मक दूरियां कम होती हैं, हालांकि अगर यह दिखावटी लगे तो इसका असर सीमित हो सकता है। साझा सांस्कृतिक और सिनेमाई मूल्यों से जुड़ाव हिंदी सिनेमा (बॉलीवुड) और संगीत ऐतिहासिक रूप से वैश्विक 'सॉफ्ट पावर' के बड़े माध्यम रहे हैं। दशकों से, भारतीय सिनेमा मध्य एशिया, मध्य पूर्व, अफ्रीका, पूर्वी यूरोप और दक्षिण-पूर्व एशिया में लोकप्रिय रहा है। जब गैर-भारतीय नेता शास्त्रीय या आधुनिक हिंदी गाने गाते हैं, तो वे लोगों की पुरानी सांस्कृतिक यादों को ताज़ा करते हैं: जैसे सोवियत-बाद के देशों और रूस में, सर पे लाल टोपी रूसी गाना, जिसे मेरा जूता है जापानी के नाम से भी जाना जाता है, 1955 की बॉलीवुड क्लासिक फ़िल्म 'श्री 420', जिसमें राज कपूर मुख्य भूमिका में थे, को बहुत ज़्यादा लोकप्रियता मिली। इस वापसी ने सोवियत-युग की यादें ताज़ा कर दीं और शीत युद्ध के बाद के रिश्तों को फिर से मज़बूत किया, जिससे राज कपूर एक सांस्कृतिक आइकन के तौर पर उभरे। दक्षिण-पूर्व एशिया में, रामायण और महाभारत जैसे साझा महाकाव्य और बॉलीवुड संगीत, गहरी सांस्कृतिक और भाषाई जड़ों वाले रिश्तों को और मज़बूत करते हैं। पश्चिमी देशों में, जिनमें अमेरिका और ब्रिटेन शामिल हैं, आज के दौर के ग्लोबल हिट गाने और क्रॉसओवर ट्रैक प्रभावशाली भारतीय समुदाय और वहाँ के मतदाताओं से जुड़ते हैं। भारतीय जनता और प्रवासी समुदायों से सीधा जुड़ाव: सरकार के मंत्रियों तक सीमित पारंपरिक विदेश नीति की पहलों के उलट, सांस्कृतिक जुड़ाव की कोशिशें ऊँचे राजनयिक चैनलों को छोड़कर सीधे आम जनता और दुनिया भर में बसे भारतीयों से जुड़ती हैं। इससे तुरंत सद्भावना बनाने वाली बात और पुख्ता होती है। भारत का प्रवासी समुदाय दुनिया में सबसे बड़ा है। फिर भी, इसका फ़ायदा इस बात पर निर्भर करता है कि यह पहल कितनी भरोसेमंद और लंबे समय तक चलने वाली लगती है। भारत की वैश्विक सांस्कृतिक पहचान के साथ तालमेल आज की भारतीय विदेश नीति में, 'सॉफ्ट पावर' की रणनीतियाँ - जैसे कि अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का दुनिया भर में विस्तार और अंतर्राष्ट्रीय शैक्षणिक आदान-प्रदान - देश की पहचान को 'विश्वमित्र' (एक वैश्विक दोस्त) और एक सांस्कृतिक शक्ति के तौर पर पेश करने में अहम भूमिका निभाती हैं। कड़े रुख में नरमी: उदाहरण के लिए, ब्रिक्स 2026 के दौरान माहौल काफी तनावपूर्ण था क्योंकि डी-डॉलराइजेशन (डॉलर का इस्तेमाल कम करना), अमेरिका की टैरिफ़ की धमकियाँ, रूस-यूक्रेन की स्थिति और भारत-चीन सीमा वार्ता जैसे कई मुद्दे एक साथ चल रहे थे। फिर भी, मलेशियाई प्रधानमंत्री के एक साधारण गाने ने तनाव को कम कर दिया। इसी तरह, रिश्तों को बेहतर बनाने के लिए, चीन ने 2018 में डोकलाम विवाद के ठीक बाद वुहान में तू तू है वही गाना बजाया। संगीत चुपचाप यह संदेश देता है: भले ही सीमा पर हमारे बीच टकराव हो, लेकिन हम एक धुन तो साझा कर ही सकते हैं। लोगों के बीच जुड़ाव की ताकत: जब 2023 में एलेक्स एलिस ने पल पल दिल के पास गाना गाया, तो UK हाई कमीशन के इंस्टाग्राम पर लोगों की भागीदारी (एंगेजमेंट) 300% बढ़ गई। अचानक, ब्रिटिश राजदूत हममें से ही एक लगने लगे। इसी तरह, जब US नेवी बैंड ने स्वदेश गाना बजाया, तो अमेरिका में रहने वाले भारतीयों ने तुरंत उसका वीडियो शेयर किया। इससे ऐसा अच्छा माहौल बना जो किसी भी सरकारी प्रेस रिलीज़ से नहीं बन सकता था। भू-राजनीतिक संतुलन: मलेशिया जैसे छोटे देश चीन या US के गुटों में बंधकर नहीं रहना चाहते। ब्रिक्स में हिंदी गाना गाकर, मलेशिया भारत को यह संकेत देता है: हम आपकी अपनी शर्तों पर कद्र करते हैं। यह वैसा ही है जैसे भारत व्लादिवोस्तोक फ़ोरम में कोई रूसी गाना गाए—यह तटस्थता दिखाने का एक सूक्ष्म और कम खर्चीला तरीका है जिसके बड़े फ़ायदे हो सकते हैं, हालांकि यह तरीका तब सबसे अच्छा काम करता है जब इसे सिर्फ़ दिखावा न समझा जाए। गाने से कड़े रुख नहीं बदलते। हिंदी गाना गाने से टैरिफ कम करने या UN में किसी मुद्दे पर भारत का समर्थन पाने जैसी समस्याएँ हल नहीं हो सकतीं। एलेक्स एलिस ने गाना गाया, लेकिन फिर भी UK ने आसानी से वीज़ा नहीं दिया; इससे पता चलता है कि सांस्कृतिक इशारे बातचीत के मुख्य रुख को बदले बिना माहौल को नरम बना सकते हैं। इसमें हमेशा दिखावे (tokenism) का जोखिम रहता है। सिर्फ़ गाना गाने से व्यापार घाटा या भुगतान की समस्याएँ ठीक नहीं होंगी। प्रतीकात्मक इशारों के साथ व्यावहारिक कदम भी उठाने ज़रूरी हैं। निष्कर्ष हिंदी गानों के इस्तेमाल ने पारंपरिक कूटनीतिक प्रोटोकॉल से आगे बढ़कर नेताओं के बीच व्यक्तिगत तालमेल को मज़बूत किया। जब विदेशी मेहमान हिंदी संगीत को अपनाते हैं, तो वे भारत के सांस्कृतिक कूटनीति मॉडल को मान्यता देते हैं। आपसी सांस्कृतिक सराहना एक बराबरी और सम्मान वाला आधार बनाती है जो आसान आर्थिक और भू-राजनीतिक बातचीत में मदद करता है, लेकिन यह व्यापक कूटनीतिक टूलकिट का सिर्फ़ एक हिस्सा है।
'डिजिटल संसद' की ओर नेपाल के बढ़ते कदम, आरएसपी सांसद ने साझा किया 'भागीदारी का लेखा-जोखा'
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तमिलनाडु सरकार का बड़ा फैसला, कानून-व्यवस्था विंग को आरटीआई के दायरे से किया बाहर
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अमेरिका-ईरान युद्ध- अगले हफ्ते तय होगी शेयर बाजार की चाल
मुंबई, भारतीय शेयर बाजार के लिए अगला हफ्ता काफी महत्वपूर्ण होने वाला है। इस दौरान कच्चा तेल, अमेरिका-ईरान युद्ध अपडेट और घरेलू आर्थिक आंकड़े जैसे ऑटो सेल्स, राजकोषीय घाटा, पीएमआई और इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन बाजार की चाल निर्धारित करेंगे।
केटी रामाराव ने पार्टी के अन्य नेताओं के साथ देखी एक्टर नानी की फिल्म ‘द पैराडाइज’
हैदराबाद, 27 सितंबर (आईएएनएस)। भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के कार्यकारी अध्यक्ष केटी रामा राव ने पार्टी के अन्य नेताओं के साथ हैदराबाद के एक थिएटर में एक्टर नानी की फिल्म ‘द पैराडाइज’ देखी और फिल्म की तारीफ की।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर केरल के सीएम सतीशन का तीखा हमला, इस्तीफे की मांग की
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर केरल के सीएम सतीशन का तीखा हमला, इस्तीफे की मांग की
ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाराष्ट्र कांग्रेस का हल्लाबोल, 28 सितंबर को राज्यभर में प्रदर्शन
महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी (एमपीसीसी) ने शनिवार को भारतीय चुनाव आयोग (ईसीआई) के साथ अपना टकराव बढ़ाते हुए 28 सितंबर को राज्यव्यापी आंदोलन की घोषणा की।
देश की पहली LNG ट्रेन को आज हरी झंडी देंगे अमित शाह
केंद्रीय मंत्री अमित शाह को 27 सितंबर यानी रविवार को साबरमती स्टेशन से देश की पहली एलएनजी संचालित ट्रेन का शुभारंभ करेंगे। यह भारतीय रेल की किफायती रेल परिचालन की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन आज श्रीलंका के पांच सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल की करेंगे मेजबानी
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीनभारत दौरे पर आ रहे श्रीलंका की सत्तारूढ़ जनता विमुक्ति पेरामुना (जेवीपी) के पांच सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल की मेजबानी करेंगे।
बैंक ग्राहकों के लिए बड़ी खबर, आज खुलेंगे बैंक, कल से हड़ताल
देश के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और कुछ पुराने निजी बैंकों के ग्राहकों के लिए अहम खबर है। बैंक कर्मचारी संगठनों ने 28 सितंबर से तीन दिवसीय देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया है
‘अफवाहों पर विश्वास न करें’, एंटी-सोशल एक्टिविटीज बिल पर सीएम सुवेंदु अधिकारी का बड़ा बयान
'द वेस्ट बंगाल पब्लिक सेफ्टी एंड कंट्रोल ऑफ एंटी-सोशल एक्टिविटीज बिल, 2026' को लेकर चल रही मीडिया रिपोर्ट्स पर पश्चिम बंगाल के सीएम सुवेंदु अधिकारी ने प्रतिक्रिया दी है
SIR पर ममता ने BJP, ECI को चेताया- 'आपने बंगाल लिया, हम दिल्ली ले लेंगे'; विपक्षी एकता पर जोर
ममता बनर्जी ने SIR विवाद पर बीजेपी और चुनाव आयोग को चेतावनी देते हुए कहा कि चुनाव आयोग से जुड़े मुद्दों पर चर्चा और विपक्ष की आगे की रणनीति तय करने के लिए दिल्ली में INDIA गठबंधन की बैठक होगी। उन्होंने कहा है कि राहुल को उन्होंने संदेश भेजा है।
यूपी ट्रेड शो : मिट्टी के गहनों में उतरी लखनऊ की चिकनकारी
विकास की रफ्तार के साथ जिंदगी भले ही आधुनिक होती जा रही हो, लेकिन इसी के बीच मिट्टी की खुशबू और हाथों की कारीगरी से जुड़ी पुरानी संस्कृति कहीं पीछे छूटती जा रही है
नशे के मुद्दे को लेकर सीएम पुष्कर धामी का 'आप' सरकार पर निशाना, बोले- हम बनाएंगे ‘उभरता पंजाब’
नशे के मुद्दे को लेकर सीएम पुष्कर धामी का 'आप' सरकार पर निशाना, बोले- हम बनाएंगे ‘उभरता पंजाब’
राष्ट्रपति ने नहीं लौटाया पश्चिम बंगाल का 'एंटी-गुंडा बिल', पीआईबी ने मीडिया रिपोर्ट्स को बताया भ्रामक
पश्चिम बंगाल के शहरी चुनावों के लिए सुरक्षा तैनाती जिला स्तरीय कानून व्यवस्था आकलन पर करेगी निर्भर
पश्चिम बंगाल के शहरी चुनावों के लिए सुरक्षा तैनाती जिला स्तरीय कानून व्यवस्था आकलन पर करेगी निर्भर
भाजपा और वीएचपी ने तेलंगाना के सीएम पर 'गांधी परिवार' वाली टिप्पणी को लेकर हमला बोला
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इस सप्ताह हमें बहुत से पाठकों/दर्शकों की ओर से अनुरोध आये कि चुनाव आयोग को लेकर उठे विवाद पर हम पूरी स्थिति का विश्लेषण करें इसलिए तमाम सवालों के जवाब देने वाला यह कार्यक्रम आपके समक्ष लेकर प्रस्तुत हुए हैं। देखा जाये तो चुनाव आयोग के भीतर दो निर्वाचन आयुक्तों की असहमति सामने आते ही ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है, मानो आयोग के भीतर मतभेद होना अपने आप में चुनावी कदाचार का प्रमाण हो। यह तर्क न संवैधानिक व्यवस्था समझता है, न संस्थागत कार्यप्रणाली और न ही चुनाव आयोग का इतिहास। तीन सदस्यीय चुनाव आयोग कोई ऐसी संस्था नहीं है जहां हर मुद्दे पर तीनों सदस्य एक ही राय बोलें। कानून खुद मानता है कि मतभेद हो सकते हैं और यदि सर्वसम्मति न बने तो बहुमत से फैसला होगा। इसे भी पढ़ें: Delhi में एकजुट दिखने वाले दल UP में आपस में लड़ रहे, INDIA Bloc की यह कैसी एकता है? यानी सवाल यह नहीं है कि आयोग के भीतर किसी ने असहमति जताई या नहीं। असली सवाल है कि अंतिम निर्णय किस प्रक्रिया से हुआ, क्या वह कानून के मुताबिक हुआ और क्या चुनाव निष्पक्ष रूप से सम्पन्न हुए? साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि वर्ष 1993 में चुनाव आयोग को स्थायी रूप से तीन सदस्यीय संस्था बनाए जाने के बाद से ही उसके भीतर मतभेद सामने आते रहे हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन और निर्वाचन आयुक्त एम.एस. गिल तथा जी.वी.जी. कृष्णमूर्ति के बीच तीखे मतभेद हुए थे। शेषन ने दोनों आयुक्तों की नियुक्ति तक को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। वर्ष 1995 में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि तीनों सदस्यों की निर्णय प्रक्रिया में समान भूमिका है। साल 2009 में मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने निर्वाचन आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफारिश राष्ट्रपति से की थी और राजनीतिक निष्पक्षता पर सवाल उठाया था। बाद में चावला स्वयं मुख्य चुनाव आयुक्त बने। 2019 में निर्वाचन आयुक्त अशोक लवासा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के विरुद्ध आदर्श आचार संहिता की शिकायतों पर आयोग के बहुमत से अलग राय दर्ज की थी। उन्होंने अपने असहमति नोटों को अंतिम आदेशों में दर्ज नहीं किए जाने पर भी आपत्ति जताई थी और 2020 में आयोग से इस्तीफा दे दिया। तो आज यदि दो निर्वाचन आयुक्त किसी प्रक्रिया पर टिप्पणी या आपत्ति दर्ज करते हैं, तो इसे अपने आप में संवैधानिक संकट घोषित कर देना इतिहास और कानून दोनों की अनदेखी है। इस बार हुआ क्या है? यदि इसको देखें तो तस्वीर साफ है कि भारतीय चुनाव आयोग के अनुसार, निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े कुछ निर्णयों पर पिछले दस महीनों में कम-से-कम 14 बार आपत्तियां या टिप्पणियां दर्ज कीं। आयोग ने इन टिप्पणियों को आंतरिक विचार-विमर्श और संस्थागत नियंत्रण-व्यवस्था का हिस्सा बताया है तथा कहा है कि अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए। यहां एक बात बेहद महत्वपूर्ण है कि असहमति दर्ज करना और कदाचार करना दो अलग बातें हैं। यदि किसी संस्था में सवाल पूछने की अनुमति ही न हो तो वह संस्था मजबूत नहीं होती। लेकिन सवाल पूछे जाने के बाद कानून के मुताबिक अंतिम फैसला हो, उसका रिकॉर्ड रहे और उस फैसले को चुनौती देने की वैधानिक व्यवस्था हो, तो मतभेद को भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं कहा जा सकता। सवाल उठता है कि चुनाव आयोग के काम का मूल्यांकन आंकड़ों से क्यों न हो? अब जरा चुनावी भागीदारी के आंकड़े देखिए। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में 67.13 प्रतिशत मतदान हुआ, जो 1951 के बाद राज्य में सबसे अधिक था। महिला मतदाताओं की भागीदारी 71.78 प्रतिशत रही। चुनाव में कोई पुनर्मतदान नहीं हुआ और आयोग के अनुसार विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद मतदाता सूची में गलत तरीके से नाम जोड़ने या हटाने के संबंध में कोई अपील प्राप्त नहीं हुई। 2026 में तमिलनाडु में लगभग 85.05 प्रतिशत मतदान दर्ज हुआ। केरल में 78.03 प्रतिशत मतदान हुआ, जो पिछले विधानसभा चुनाव से अधिक था। असम में 85.38 प्रतिशत और पुडुचेरी में 89.83 प्रतिशत मतदान हुआ। दोनों राज्यों और केंद्रशासित प्रदेश ने विधानसभा चुनावों में अपने अब तक के सर्वोच्च मतदान का रिकॉर्ड बनाया। पश्चिम बंगाल में पहले चरण में मतदान 91 प्रतिशत से भी ऊपर पहुंच गया और निर्वाचन आयोग के अपडेटेड आंकड़ों में यह 92.72 प्रतिशत तक दर्ज हुआ। यदि चुनाव आयोग मतदाताओं को मतदान से रोकने के लिए इतने बड़े पैमाने पर मतदाता सूची से नाम काट रहा था, तो बिहार में रिकॉर्ड मतदान कैसे हुआ? तमिलनाडु में करीब 85 प्रतिशत मतदान कैसे हुआ? केरल में 78 प्रतिशत, असम में 85 प्रतिशत से ज्यादा, पुडुचेरी में करीब 90 प्रतिशत और पश्चिम बंगाल में 90 प्रतिशत से ऊपर मतदान कैसे पहुंच गया? यह आंकड़ा अपने आप में यह साबित नहीं करता कि किसी भी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से नहीं काटा गया। लेकिन यह जरूर बताता है कि केवल नाम हटाए जाने के आंकड़े को लेकर पूरे चुनाव को ही चोरी या साजिश घोषित कर देना तथ्यों से कहीं आगे की छलांग है। सवाल उठता है कि नाम काटे गए तो कितनों ने चुनौती दी? देखा जाये तो यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है और यहां आंकड़ों को तोड़-मरोड़कर पेश करने की बजाय ईमानदारी से देखना चाहिए। बिहार की बात करें तो अंतिम सूची में लगभग 47 लाख की कमी आई लेकिन चुनाव आयोग के अनुसार शून्य अपील की गयी। तमिलनाडु में पुनरीक्षण के दौरान 97.37 लाख नाम हटे और अंतिम सूची में शुद्ध कमी लगभग 74.07 लाख रही। वहां दावों-आपत्तियों के दौरान 27.53 लाख पात्र मतदाता जोड़े गए। वहीं केरल में 8.57 लाख नाम हटे और लगभग 4.01 लाख विभिन्न प्रकार के आवेदन आये जिनमें समावेशन और सुधार के आग्रह थे। असम में अंतिम सूची में 2.43 लाख नाम कम हुए और वहां भी दावों-आपत्तियों की प्रक्रिया नियमानुसार पूरी हुई। पश्चिम बंगाल में 27.16 लाख मतदाता न्यायिक निर्णय के बाद हटाए गए। इनमें से 22.21 लाख, यानी लगभग 82 प्रतिशत ने पुनः शामिल किए जाने के लिए अपील की। बंगाल का आंकड़ा यह भी दर्शाता है कि पूरी प्रक्रिया में चुनौती देने का रास्ता मौजूद था और बड़ी संख्या में लोगों ने उसका इस्तेमाल किया। यहां एक और सवाल यह उठता है कि गैर-नागरिक को वोट का अधिकार देने पर कुछ पार्टियां क्यों तुली रहती हैं? जबकि भारत में चुनावी कानून इस मामले में बिल्कुल स्पष्ट है। चुनाव आयोग के आधिकारिक दस्तावेज के अनुसार भारत का नागरिक न होने वाला व्यक्ति मतदाता सूची में पंजीकृत नहीं हो सकता। यहां तक कि जिसने किसी दूसरे देश की नागरिकता ले ली हो, वह भी भारतीय मतदाता सूची में पंजीकृत नहीं हो सकता। यह सिद्धांत केवल भारत की विशेषता नहीं है। अमेरिका में संघीय चुनावों में गैर-नागरिक मतदान नहीं कर सकते। कनाडा में संघीय चुनाव के लिए कनाडाई नागरिक होना अनिवार्य है। ब्रिटेन में संसदीय चुनावों के लिए ब्रिटिश, आयरिश या पात्र राष्ट्रमंडल नागरिकों की श्रेणियां निर्धारित हैं। साथ ही यहां पश्चिम बंगाल से सामने आये उदाहरण को भी देखना चाहिए। पश्चिम बंगाल की सरकार ने कुछ समय पहले खुलासा किया था कि सरकारी योजनाओं का लाभ गैर भारतीय नागरिक भी बड़ी संख्या में ले रहे थे। इसके साथ ही ज्ञानेश कुमार का रिकॉर्ड भी बहस का हिस्सा होना चाहिए। ज्ञानेश कुमार 1988 बैच के केरल संवर्ग के भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी रहे हैं और 19 फरवरी 2025 को भारत के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त बने। इससे पहले उन्होंने केरल सरकार में जिलाधिकारी, नगर आयुक्त और कई विभागों में सचिव जैसी जिम्मेदारियां संभालीं। केंद्र में उन्होंने रक्षा उत्पादन मंत्रालय में संयुक्त सचिव, गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव और अतिरिक्त सचिव, संसदीय कार्य मंत्रालय के सचिव तथा सहकारिता मंत्रालय के सचिव के रूप में काम किया। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर से अभियांत्रिकी की पढ़ाई के अलावा उन्होंने व्यावसायिक वित्त और पर्यावरणीय अर्थशास्त्र का भी अध्ययन किया। चुनाव आयुक्त बनने के बाद उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव जैसी विशाल चुनावी प्रक्रिया में भूमिका निभाई और बाद में मुख्य चुनाव आयुक्त बने। साथ ही भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर ने उनके प्रशासनिक और चुनावी योगदान के लिए उन्हें विशिष्ट पूर्व छात्र सम्मान भी दिया। इस पूरे रिकॉर्ड को नजरअंदाज करके केवल वर्तमान राजनीतिक विवाद के आधार पर किसी अधिकारी की पूरी सार्वजनिक सेवा पर फैसला सुना देना भी उचित नहीं है। जहां तक राहुल गांधी की राजनीति का सवाल है तो वह लगातार इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीनों को “ब्लैक बॉक्स” बताते हुए उनकी पारदर्शिता पर सवाल उठाते रहे हैं। उन्होंने चुनाव आयोग पर मतदाता चोरी और चुनावी हेरफेर के आरोप लगाए तथा बाद में चुनाव आयोग को भविष्य में जवाबदेही की चेतावनी भी दी। देखा जाये तो यहां आलोचना करना उनका लोकतांत्रिक अधिकार है। विपक्ष को चुनाव आयोग से सवाल पूछने, आंकड़े मांगने और न्यायालय जाने का पूरा अधिकार है। लेकिन बहस का अगला चरण होना चाहिए कि दस्तावेज कहां हैं, प्रमाण क्या है, शिकायत किस निर्वाचन क्षेत्र में दर्ज हुई, कितने मामलों में जांच हुई और कितने मामलों में आरोप सही पाए गए? इसलिए बहस को व्यक्ति बनाम व्यक्ति बनाने की बजाय प्रमाण बनाम आरोप बनाना ज्यादा जरूरी है। इस तरह चुनाव आयोग से सवाल पूछना गलत नहीं है; लेकिन आयोग के भीतर मतभेद को कदाचार का प्रमाण बताना गलत है। और सबसे बड़ी बात यह है कि भारत के चुनाव आयोग का मूल्यांकन नारों से नहीं, चुनाव के वास्तविक आंकड़ों से कीजिए। बिहार में 67.13 प्रतिशत का रिकॉर्ड मतदान, तमिलनाडु में करीब 85 प्रतिशत, केरल में 78.03 प्रतिशत, असम में 85.38 प्रतिशत, पुडुचेरी में 89.83 प्रतिशत और पश्चिम बंगाल में 90 प्रतिशत से ऊपर की भागीदारी इस बात का ठोस संकेत है कि करोड़ों भारतीय मतदाता चुनाव प्रक्रिया में सक्रिय रूप से हिस्सा ले रहे हैं। विपक्ष को भी एक बार अपने गिरेबां में झांकना चाहिए। लोकतंत्र में हार या राजनीतिक असफलता के बाद दूसरों पर उसका ठीकरा फोड़ना सबसे आसान है। अक्सर देखने में आता है कि चुनाव में हार के बाद विपक्षी दल अपनी कमियों की समीक्षा करने की बजाय सिस्टम को ही दोषी ठहराने लगते हैं। इसे एक कमजोर विद्यार्थी के उदाहरण से समझिए। परीक्षा में नंबर कम आने के बाद एक विद्यार्थी अगर यह सोचने की बजाय कि उसने पढ़ाई में कहां कमी छोड़ी, शिक्षक, प्रश्नपत्र, परीक्षा व्यवस्था, समय और यहां तक कि अपनी किस्मत को दोष देने लगे, तो बहाने शायद उसे उस क्षण राहत दे दें, लेकिन अगली परीक्षा में उसकी स्थिति नहीं बदलेंगे। सुधार के लिए उसे आखिरकार अपनी किताब खोलनी ही पड़ेगी। राजनीति में भी यही सिद्धांत लागू होता है। अगर किसी दल को लगातार मतदाताओं का समर्थन नहीं मिल रहा, तो उसे सबसे पहले यह देखना चाहिए कि जनता उससे दूर क्यों जा रही है? संगठन कहां कमजोर है, जमीन पर कार्यकर्ता कितना सक्रिय है, उम्मीदवारों का चयन कैसा है, नीतियों और नारों का जनता पर क्या असर है और क्या मतदाता उस दल पर भरोसा कर रहा है। इन सवालों के जवाब खोजने की बजाय हर चुनाव के बाद ईवीएम, चुनाव आयोग, मतदाता सूची और संवैधानिक संस्थाओं को कठघरे में खड़ा कर देना आसान जरूर है, लेकिन इससे अपनी राजनीतिक कमियों का इलाज नहीं होता। चुनाव आयोग से सवाल पूछिए, उसकी गलतियां सामने लाइए, जहां किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया हो वहां आवाज उठाइए और जहां अनियमितता का प्रमाण हो वहां कार्रवाई की मांग कीजिए। लेकिन हर असहमति को साजिश और हर चुनावी नतीजे को चोरी बताने की राजनीति अंततः उसी लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा करती है, जिसके सहारे सत्ता में आने की लड़ाई लड़ी जाती है। इसलिए अब वक्त विपक्ष के लिए भी आत्ममंथन का है। हर हार का कारण चुनाव आयोग नहीं हो सकता, हर असफलता का कारण ईवीएम नहीं हो सकती और हर राजनीतिक कमजोरी के पीछे कोई संवैधानिक साजिश नहीं हो सकती। कभी-कभी समस्या सामने वाले की व्यवस्था में नहीं, अपनी तैयारी में भी होती है। -नीरज कुमार दुबे
Delhi में एकजुट दिखने वाले दल UP में आपस में लड़ रहे, INDIA Bloc की यह कैसी एकता है?
दिल्ली में विपक्षी गठबंधन INDIA के भीतर एक बार फिर एकजुटता की कवायद तेज हो गयी है। चुनाव आयोग से संबंधित मुद्दे पर साझा लड़ाई लड़ने की तैयारी हो रही है, नेताओं के बीच बातचीत बढ़ी है और दिल्ली में सभी विपक्षी दलों की बैठक भी बुला ली गई है। लेकिन सियासत का असली सवाल यह है कि क्या दिल्ली की एकजुटता उत्तर प्रदेश की जमीन तक पहुंच पाएगी? क्योंकि जिस गठबंधन को दिल्ली में एक मंच पर खड़ा करने की कोशिश हो रही है, उसी गठबंधन के सबसे बड़े चुनावी मैदान उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच खींचतान लगातार खुलकर सामने आ रही है। उल्लेखनीय है कि तृणमूल कांग्रेस नेता अभिषेक बनर्जी और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी चुनाव आयोग के मुद्दे पर विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने और उन दलों से संवाद बढ़ाने पर चर्चा कर रहे हैं, जो हाल के महीनों में कांग्रेस से दूरी बनाए हुए हैं। इसके साथ ही INDIA गठबंधन के घटक दलों की बैठक बुलाने, संयुक्त प्रेस वार्ता और देशव्यापी साझा आंदोलन की संभावना पर भी बातचीत चल रही है। यानी ऊपर से संदेश यही है कि विपक्ष को फिर एक साथ खड़ा किया जाए। इसे भी पढ़ें: Gyanesh Kumar से तीखे सवाल क्यों पूछने लगे Modi के 'हनुमान' Chirag Paswan? क्या NDA में भी बढ़ रहे हैं मतभेद? मगर हुजूर, राजनीति में असली परीक्षा मंच पर हाथ मिलाने की नहीं, मैदान में सीट बांटने की होती है। और यहीं से कहानी बदल जाती है। उत्तर प्रदेश में 403 विधानसभा सीटों का हिसाब किताब शुरू होते ही सपा और कांग्रेस के बीच पुरानी दोस्ती की परतें खुरचने लगी हैं। कांग्रेस ज्यादा सीटों की मांग कर रही है, जबकि समाजवादी पार्टी अपनी ताकत और पिछले चुनावी प्रदर्शन के आधार पर बड़ा हिस्सा अपने पास रखना चाहती है। दोनों दल अपने-अपने स्तर पर सीटों की ताकत-कमजोरी का आकलन कर रहे हैं और गंभीर सीट बंटवारे की बातचीत अक्टूबर में शुरू होने की संभावना बताई गई है। उधर, तनाव सिर्फ बंद कमरों की बातचीत तक सीमित नहीं है। कांग्रेस के इमरान मसूद ने जल्द गठबंधन तय करने की मांग की और कहा कि भ्रम की स्थिति में कांग्रेस चुनावी तैयारी नहीं कर सकती। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने तो यहां तक कहा कि मतभेद होने पर पार्टी सभी सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार है। दूसरी तरफ सपा की सांसद इकरा हसन ने साफ कहा कि उत्तर प्रदेश में भाजपा को चुनौती देने की क्षमता अखिलेश यादव के नेतृत्व में है। इस तरह यानी एक ही गठबंधन में दो सुर, दो दावे और दो नेतृत्व केंद्र दिखाई दे रहे हैं। अखिलेश यादव का रायबरेली से पीडीए यात्रा शुरू करना भी इसी रस्साकशी का हिस्सा माना जा रहा है। रायबरेली कांग्रेस का पारंपरिक गढ़ रहा है, लेकिन अखिलेश ने वहीं से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू कर यह संदेश दिया कि उत्तर प्रदेश में जमीन किसके पास है, इसका हिसाब अलग से होगा। इसे कई राजनीतिक विश्लेषक सीट बंटवारे से पहले सपा की राजनीतिक ताकत दिखाने की कवायद के तौर पर देख रहे हैं। और अब मैनपुरी-इटावा-सैफई की धरती से शिवपाल सिंह यादव का बयान इस खींचतान में नया तड़का लगा रहा है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने कहा था कि अखिलेश रायबरेली जा सकते हैं तो कांग्रेस भी इटावा, कन्नौज और मैनपुरी जाएगी। जवाब में शिवपाल ने कहा— जाइए, अभियान चलाइए, लेकिन वहां कांग्रेस को वोट नहीं मिलेगा। उन्होंने अपने जसवंतनगर क्षेत्र का हवाला देते हुए कांग्रेस को वहां वोट न मिलने की बात कही और सपा की जीत का दावा किया। अब शिवपाल के इस बयान का राजनीतिक मतलब समझिए। यह सिर्फ किसी एक रैली या दौरे पर प्रतिक्रिया नहीं है। यह दरअसल सपा के उस आत्मविश्वास का प्रदर्शन है जिसमें वह कांग्रेस को यह याद दिलाना चाहती है कि उत्तर प्रदेश में गठबंधन की जमीन सपा के संगठन और सामाजिक आधार से तैयार होती है। मैनपुरी, इटावा और सैफई जैसे इलाकों में कांग्रेस का चुनावी अभियान सपा के लिए सिर्फ सहयोगी दल की गतिविधि नहीं, बल्कि अपने प्रभाव क्षेत्र में दूसरे सहयोगी की राजनीतिक मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। यही INDIA गठबंधन की सबसे बड़ी पहेली है। दिल्ली में सवाल है कौन-कौन साथ आएगा? उत्तर प्रदेश में सवाल है किसके साथ कौन कितनी सीट पर लड़ेगा? दिल्ली में साझा मुद्दे खोजे जा रहे हैं, लखनऊ में सीटों का हिसाब किताब चल रहा है। दिल्ली में एकजुटता की तस्वीर खींची जा रही है और यूपी में दोनों दल अपने-अपने झंडे ऊंचे करने में जुटे हैं। हम आपको याद दिला दें कि 2024 में उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस ने मिलकर 43 लोकसभा सीटें जीती थीं। सपा 37 और कांग्रेस छह पर विजयी रही थी। यही प्रदर्शन अब दोनों दलों के आत्मविश्वास और दावेदारी का आधार बन रहा है। लेकिन 2027 की विधानसभा राजनीति का गणित अलग है। सपा अपने संगठन, सामाजिक समीकरण और विधानसभा में अपनी मौजूदा ताकत के आधार पर ज्यादा हिस्सेदारी चाहती है, जबकि कांग्रेस 2024 के प्रदर्शन और राहुल गांधी की सक्रियता को अपनी बढ़ती राजनीतिक हैसियत का आधार बना रही है। यानी मामला साफ है। INDIA गठबंधन को जोड़ने की कोशिश दिल्ली में हो रही है, लेकिन उसे बचाने की असली परीक्षा उत्तर प्रदेश में होनी है। क्योंकि गठबंधन सिर्फ नेताओं की मुलाकातों और साझा तस्वीरों से नहीं चलता। गठबंधन तब चलता है जब कार्यकर्ता एक-दूसरे के लिए जमीन छोड़ें, नेता एक-दूसरे की सीमा का सम्मान करें और सीटों के बंटवारे पर दोनों पक्ष अपनी महत्वाकांक्षा को किसी साझा फार्मूले में बांध सकें। वरना दिल्ली में जितनी बार हाथ मिलेंगे, मैनपुरी और रायबरेली में उतनी ही बार पैर एक-दूसरे की जमीन पर पड़ते दिखाई देंगे। उत्तर प्रदेश की राजनीति में यही पैर कब एक-दूसरे के रास्ते में आ जाएं, इसका फैसला अक्सर दिल्ली की बैठक नहीं, जमीन पर लड़ने वाला कार्यकर्ता करता है। -नीरज कुमार दुबे
भारत की कूटनीतिक गतिविधियां दिसंबर महीने में एक बड़े रणनीतिक अभियान का रूप लेने जा रही हैं और अब पूरी दुनिया मोदी की कूटनीति का कमाल देखने वाली है। हम आपको बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संभावित बहु-देशीय यात्रा में अमेरिका, कनाडा और यूरोप के कम से कम दो देशों को शामिल किए जाने की तैयारी की खबर है। हालांकि विदेश मंत्रालय ने अभी यात्रा कार्यक्रम की आधिकारिक घोषणा नहीं की है, लेकिन साफ संकेत मिल रहे हैं कि भारत दिसंबर को केवल राजनयिक यात्राओं का महीना नहीं, बल्कि व्यापारिक समझौतों, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक शक्ति-संतुलन को साधने के अवसर के रूप में देख रहा है। मोदी के इस कूटनीतिक अभियान का सबसे बड़ा पड़ाव अमेरिका हो सकता है। प्रधानमंत्री मोदी के 14-15 दिसंबर को मियामी में होने वाले जी-20 शिखर सम्मेलन में शामिल होने की संभावना है। यदि यह यात्रा होती है तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ द्विपक्षीय मुलाकात का भी रास्ता खुल सकता है। इसी मंच पर चार देशों के समूह क्वॉड की संभावित बैठक भी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होगी। इसे भी पढ़ें: Global Energy संकट के बीच 41 देशों से ईंधन खरीदकर बनाई मजबूत सप्लाई चेन, मोदी को बॉस मानने वाले PM ने भारत को लेकर क्या कहा? देखा जाये तो भारत-अमेरिका संबंधों में इस समय व्यापार और रूस से जुड़े मुद्दे सबसे बड़ी चुनौती बने हुए हैं। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के मुताबिक भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर लगभग सहमति बन चुकी है, लेकिन इसे लागू करने से पहले भारत अपने निर्यातकों के हित और उनकी प्रतिस्पर्धी क्षमता को सुनिश्चित करना चाहता है। साफ है कि मोदी सरकार सिर्फ समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए जल्दबाजी में नहीं है, बल्कि वह ऐसा करार चाहती है जिसका सीधा और ठोस फायदा भारतीय उद्योग और निर्यातकों को मिले। यहीं से भारत की कूटनीति का दूसरा और अधिक कठिन पक्ष सामने आता है। अमेरिका ने रूस और ईरान से जुड़े नए प्रतिबंध कानून के जरिए रूस की ऊर्जा खरीद जारी रखने वाले देशों पर भारी शुल्क लगाने की संभावना का रास्ता खोला है। इसका सीधा असर भारत की ऊर्जा रणनीति पर पड़ सकता है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ बातचीत में भारत की आर्थिक और रणनीतिक चिंताओं को रखा। अमेरिका की ओर से भी यह संकेत दिया गया कि ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर साझेदार देशों की चिंताओं को ध्यान में रखा जाएगा। यहां भारत की नीति को समझना जरूरी है। नई दिल्ली न तो रूस से संबंध तोड़ रही है और न ही अमेरिका से दूरी बना रही है। सितंबर में मोदी और व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात में ऊर्जा, रक्षा, व्यापार और यूक्रेन युद्ध पर चर्चा हुई। मोदी ने रूस के सामने भी युद्ध को समाप्त करने और संवाद व कूटनीति के रास्ते आगे बढ़ने की बात रखी। इसी दौरान भारत के विदेश मंत्री की यूक्रेन यात्रा ने यह संदेश दिया कि भारत केवल एक पक्ष से बात करने वाली शक्ति नहीं, बल्कि अलग-अलग शक्ति केंद्रों से संवाद बनाए रखने वाला देश है। यही इस वर्ष की भारतीय कूटनीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। यूक्रेन युद्ध जारी है, पश्चिम एशिया में संघर्ष और ऊर्जा आपूर्ति पर संकट की आशंका बनी हुई है, अमेरिका-रूस तनाव गहरा रहा है और चीन के साथ वैश्विक प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। ऐसे वातावरण में भारत ने रूस के साथ ऊर्जा और रक्षा संबंध बनाए रखते हुए अमेरिका के साथ व्यापार तथा रणनीतिक सहयोग बढ़ाया, यूरोप के साथ आर्थिक और सुरक्षा साझेदारी मजबूत की और यूक्रेन के साथ शांति संबंधी संवाद जारी रखा। उधर, यूरोप के मोर्चे पर भारत को बड़ी उपलब्धि मिल चुकी है। भारत और यूरोपीय संघ ने 27 जनवरी 2026 को मुक्त व्यापार समझौते की वार्ता पूरी की। सितंबर में यूरोपीय आयोग ने समझौते को हस्ताक्षर और अनुमोदन के लिए परिषद के समक्ष पेश कर दिया। प्रस्तावित समझौते के तहत यूरोपीय संघ के भारत को होने वाले 96 प्रतिशत से अधिक माल निर्यात पर शुल्क घटाने या समाप्त करने की व्यवस्था है। इसलिए दिसंबर में ब्रसेल्स में औपचारिक हस्ताक्षर की संभावना केवल व्यापारिक घटना नहीं होगी; यह भारत-यूरोप संबंधों के व्यापक रणनीतिक विस्तार का प्रतीक भी बन सकती है। कनाडा भी इसी कड़ी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मार्च 2026 में मोदी और कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते को वर्ष के अंत तक पूरा करने का लक्ष्य तय किया था। दोनों देशों ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 70 अरब कनाडाई डॉलर तक ले जाने की महत्वाकांक्षा भी जताई है। कार्नी ने जून में मोदी के साथ मुलाकात के दौरान संबंधों में सकारात्मक गति और आपूर्ति शृंखलाओं, ऊर्जा तथा खाद्य सुरक्षा के महत्व को रेखांकित किया था। यदि दिसंबर में कनाडा और ब्रसेल्स के पड़ाव जुड़ते हैं तो भारत एक ही यात्रा में उत्तर अमेरिका और यूरोप के दो महत्वपूर्ण आर्थिक केंद्रों से संबंधों को नई दिशा दे सकता है। जर्मनी में अंतर-सरकारी परामर्श की संभावित बैठक इस कूटनीतिक अभियान को और व्यापक बना सकती है। देखा जाये तो इस पूरी रणनीति का सामरिक अर्थ केवल इतना नहीं है कि भारत नए बाजार खोल रहा है। असली लक्ष्य आपूर्ति शृंखलाओं का विविधीकरण, ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी सहयोग, रक्षा साझेदारी और किसी एक शक्ति-केंद्र पर अत्यधिक निर्भरता से बचाव है। भारत-यूरोपीय संघ के बीच जनवरी में हुए समझौते के साथ सुरक्षा और रक्षा साझेदारी भी आगे बढ़ी है, जिसमें समुद्री सुरक्षा, रक्षा उद्योग, प्रौद्योगिकी, साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष और आतंकवाद-रोधी सहयोग शामिल हैं। इसलिए भारतीय कूटनीति को केवल यात्राओं और बैठकों की सूची के रूप में देखना अधूरा होगा। इसके केंद्र में एक ऐसी रणनीति दिखाई देती है जिसमें वॉशिंगटन से व्यापार, मॉस्को से ऊर्जा और रणनीतिक संबंध, यूरोप से बाजार और प्रौद्योगिकी, कनाडा से संसाधन व व्यापार और यूक्रेन से शांति संवाद—सभी को एक साथ साधने की कोशिश है। बहरहाल, भारत का संदेश स्पष्ट है। बदलती विश्व व्यवस्था में नई दिल्ली किसी एक खेमे की परिधि में नहीं, बल्कि अपने आर्थिक, ऊर्जा और सुरक्षा हितों के आधार पर अनेक शक्ति केंद्रों के साथ समानांतर संवाद बनाए रखना चाहती है। यही वह संतुलन है जिसने 2026 में तमाम संघर्षों और व्यापारिक तनावों के बीच भारत को वैश्विक कूटनीति के महत्वपूर्ण संवाद केंद्रों में बनाए रखा है। -नीरज कुमार दुबे
Modi सरकार के लिए मुसीबत बने CEC Gyanesh Kumar? Prabhu Chawla ने बताया क्यों बैकफुट पर है सरकार
CEC पर CJI Surya Kant क्या करेंगे? SIR पर लगेगी रोक, जेल जाएंगे Gyanesh Kumar?
मुंबई, वैश्विक चिंताओं के चलते भारतीय शेयर बाजार लगातार सातवें सप्ताह गिरावट के साथ बंद हुआ। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) की लगातार बिकवाली के कारण प्रमुख बेंचमार्क सेंसेक्स और निफ्टी में 0.88 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई।
'गृह लक्ष्मी' योजना के भुगतान में जानबूझकर देरी कर रही है कर्नाटक सरकार : आर. अशोक
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महाभियोग प्रस्ताव पर INDIA गठबंधन का मास्टरस्ट्रोक, क्या बच पाएंगे CEC Gyanesh Kumar?
राजनीतिक क्षेत्र में दूर की कोड़ी है लैंगिक समानता
विश्व आर्थिक मंच डब्बूईएफ द्वारा इसी 16 सितंबर, 2026 को जारी 20 वीं ग्लोबल जेंडर लैंगिक गैप रिपोर्ट 2026 से एक बात तो साफ हो गई है कि राजनीति में अभी तो सत्ता में महिलाओं की पुरुषों के समान भागीदार दूर की कोड़ी ही है। जेंडर गैप की हालिया रिपोर्ट में सबसे रौचक और चिंताजनक जानकारी यह सामने आई है कि संसद में भले ही महिलाओं की हिस्सेदारी 16 प्रतिशत हो गई हो पर मंत्रिमंडल में महिलाओं की भागीदारी केवल 5.9 प्रतिशत रह गई है। सबसे मजे की बात यह है कि 2019 की तुलना में मंत्रिमंडल में महिलाओं की उच्चतम स्तर 30 प्रतिशत की भागीदारी की तुलना में बहुत कम हो गई है। यह सब तो तब है जब केन्द्र सरकार 2023 में महिला आरक्षण बिल लेकर आई है। हांलाकि यह भी अभी तो राजनीति की भेंट ही चढ़ा हुआ है। यह इसलिए भी एलार्मिंग हो जाती है कि लैंगिक समानता की बात दुनिया के देशों द्वारा विभिन्न मंचों पर बढ़-चढ़ कर कितनी भी की जाएं परिणाम अभी तक अधिक सकारात्मक प्राप्त नहीं हुए हैं। आइसलैंड, फिनलैंड, नार्वें आदि अवश्य लैंगिक गैप को कम करने में कुछ हद तक सफल रहे हैं। निराश होने की बात इसलिए नहीं है कि शिक्षा-स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में लैंगिक गैप में लगातार सुधार देखा जा रहा है। आर्थिक मोर्चे पर भी महिलाओं की हिस्सेदारी में सुधार देखा जा रहा है। विश्व आर्थिक मंच या यों कहें कि वर्ल्ड इकोनोमिक फोरम की स्थापना 1971 में हुई और 2006 से डब्बूईएफ ने दुनिया के देशों में महिलाओं की भागीदारी को लेकर जेंडर लैंगिक गैप का सालाना सर्वे करना शुरु किया। 145 देशों में कराये गये हालिया सर्वें की रिपोर्ट में भारत की रेंक 131 वीं है। हांलाकि बीस सालों में रेंक में सुधार हुआ है। संस्था द्वारा जेंडर लैंगिक स्थिति का अध्ययन के लिए चार मानक बनाए हुए हैं। इनमें शिक्षा, स्वास्थ्य और सरवाइवल, आर्थिक गतिविधियों में महिलाओं भागीदारी और राजनीति सशक्तिकरण चार ऐसे क्षेत्र है जिनके माध्यम से दुनिया के देशों में महिलाओं की वैश्विक स्थिति का अध्ययन किया जाता है। जहां तक भारत की बात है देखा जाएं तो जेंडर लैंगिक गैप की रिपोर्ट के अनुसार शिक्षा और स्वास्थ्य व सरवाइवल के क्षेत्र में भारत में स्थिति बेहतर है। शिक्षा के क्षेत्र में यह 96.6 प्रतिशत और स्वास्थ्य और उत्तरजीवितता में 95.6 प्रतिशत का आंकड़ा है। इसे निश्चित रुप से सकारात्मक माना जाता है। इसका साफ साफ अर्थ यह हो जाता है कि शिक्षा और स्वास्थ्य व सरवाइवल क्षेत्र में लैंगिक गैप में सकारात्मकता है और महिलाओं और पुरुषों के बीच अंतर को लगभग पाट सा दिया है। जहां तक महिलाओं की आर्थिक क्षेत्र में भागीदारी की बात है तो इसमें समग्र रुप से 41.2 प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी है। यानी अभी भी लैंगिक गैप का अंतर 50 फीसदी से भी अधिक बना हुआ है। हांलाकि आर्थिक क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी में लगातार सुधार देखा जा रहा है। कुल कामकाजी महिलाओं की हिस्सेदारी 39.9 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 42 फीसदी हो गई है। आर्थिक मोर्चे पर लगभग सभी क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है पर जिस तेजी से बढ़ोतरी होनी चाहिए थी या जिस तरह से लैंगिक गैप कम होना चाहिए था वह अभी नहीं हो पाया है। इसे भी पढ़ें: Vishwakhabram: Italy की संसद में Women Politicians ने Mini Skirts पहन कर जताया विरोध, दुनिया हैरानी से देखती रह गयी तस्वीर का सबसे निराशाजनक पहलू राजनीतिक भागीदारी को लेकर हैं। खासतौर से मंत्रीमण्डल में तो महिलाओं की हिस्सेदारी में बहुत अधिक कमी देखने को मिल रही है। यह सब तो तब है जब सरकार राजनीति में महिला आरक्षण की दिशा में कदम बढ़ाने की पक्षधर है। एक बात जो सबसे महत्वपूर्ण है वह यह कि पिछले कुछ सालों के चुनावों पर नजर ड़ाली जाएं चाहे वे विधानसभाओं के हो या लोकसभा के सभी में मतदान से लेकर सरकार बनवाने में महिलाओं की भागीदारी महत्वपूर्ण रही है। कम से कम आंकड़े तो यही कह रहे हैं। हांलाकि फ्री बीज जैसी लुभावनी योजनाओं में महिलाओं को अपने पक्ष में करने के वादे सभी राजनीतिक दलों के घोषणा पत्रों में देखने को मिल जाएगा। संतोष की बात यह है कि 145 देशों की समग्र ग्लोबल जेंडर गैप 2026 का जेंडर गैप पेरिटी स्कोर 69.2 प्रतिशत है जबकि भारत की 131 वीं रेंक होने के बावजूद इस रिपोर्ट में भारत का ग्लोबल जेंडर लैंगिक गैप पेरिटी स्कोर 64.5 प्रतिशत रहा है। रिपोर्ट के समग्र अध्ययन से यह साफ हो जाता है कि भारत के सामने सबसे अधिक चुनौती राजनीतिक स्तर पर गैप को कम करना है तो आर्थिक मोर्चे पर भी अभी बहुत कुछ किया जाना जरुरी हो गया है। देश में बेटी बचाओं-बेटी पढ़ाओं जैसे अभियानों के सकारात्मक परिणाम प्राप्त हुए हैं। पंचायतों, निकाओं आदि में महिलाओं के आरक्षण से राजनीति में जो भागीदारी देखी जा रही है वह संभव हो पाई हैं। निर्णय के स्तर पर भी महिलाएं अधिक स्वतंत्र हुई है और चुनाव नतीजे इस बात को पुष्ट भी करते हैं। अब महिलाएं अपने मताधिकार का प्रयोग स्वविवेक से करने लगी है। ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट में 93 प्रतिशत के स्कोर के साथ आइसलैंड भले ही शीर्ष पर हो पर दुनिया के अधिकांश इस दौड़ में अभी बहुत पीछे हैं। शत-प्रतिशत स्कोर की तो अभी कल्पना करना बेमानी ही होगा। पर सकारात्मक पक्ष यह है कि लैंगिक गैप में अब काफी बदलाव देखने को मिल रहा है। शिक्षा और स्वास्थ्य का क्षेत्र इसका बड़ा उदाहरण है। आर्थिक मोर्चों पर भी महिलाओं की भागीदारी भले ही कम हो पर शीर्ष स्तर पर भी महिलाओं की हिस्सेदारी देखी जा सकती है। इसलिए चुनौती अवश्य है पर हालात सकारात्मकता की और संकेत कर रहे हैं। - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के बाहर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से आतंकवाद को लेकर सीधे सवाल किए गए, लेकिन उन्होंने जवाब देने की बजाय वहां से भाग जाना ही बेहतर समझा। इसके एक दिन बाद संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में विदेश मंत्री एस. जयशंकर के सामने जब पाकिस्तानी पत्रकार ने भारत पर आतंकवाद प्रायोजित करने का आरोप लगाते हुए सवाल किया, तो जयशंकर ने पलटकर ऐसा करारा जवाब दिया कि सवाल पूछने वाला ही कठघरे में खड़ा हो गया। जयशंकर ने दो टूक कहा, “एक आतंकवादी देश मुझसे यह सवाल पूछ रहा है। चलिए भी।” उधर, जयशंकर के बयान से गर्म हुए माहौल के बीच ही भारत ने संयुक्त राष्ट्र के मंच से पाकिस्तान पर एक और करारा हमला कर डाला। हम आपको बता दें कि भारत ने पाकिस्तान को एक ‘‘कठपुतली शासन’’ करार देते हुए संयुक्त राष्ट्र में उसके ‘‘झूठ’’ और ‘‘छल’’ पर तीखा प्रहार किया तथा चेतावनी दी कि इस्लामाबाद की ओर से लगातार जारी आतंकवाद के गंभीर परिणाम होंगे। दरअसल, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच पर अपने संबोधन के दौरान एक बार फिर कश्मीर मामले को उठाया और 2025 में भारत के साथ हुए सैन्य संघर्ष को रोकने का श्रेय अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ‘‘समय पर हस्तक्षेप’’ को दिया। शहबाज शरीफ के संबोधन के बाद भारत ने शुक्रवार रात ‘जवाब के अपने अधिकार’ का इस्तेमाल किया। इसे भी पढ़ें: 'पाकिस्तान को आतंकवाद के नतीजे भुगतने होंगे', संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत ने शहबाज़ शरीफ़ को दिया करारा जवाब संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन की प्रथम सचिव पेटल गहलोत ने कहा, ‘‘हमने एक ऐसे शासन से लोकतांत्रिक अधिकारों और मानवीय मूल्यों पर कुछ पाखंडपूर्ण उपदेश सुने हैं, जिसकी राजधानी को अपने ही लोगों से बचाने के लिए इसी समय किलेबंद किया जा रहा है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘और ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि यह सेना का, सेना द्वारा और सेना के लिए शासन है। उसकी कठपुतलियां आती-जाती रह सकती हैं, लेकिन इस बात को लेकर कोई भ्रम नहीं होना चाहिए कि असल में फैसले कौन करता है। पाकिस्तान की वास्तविकता उसके 27वें संविधान संशोधन और उसके असली शासक को दी गई आजीवन कानूनी छूट से जाहिर होती है।’’ गहलोत ने पिछले साल नवंबर में शहबाज शरीफ सरकार द्वारा पारित उस 27वें संविधान संशोधन का उल्लेख करते हुए यह बात की जिसके तहत पाकिस्तान के ‘चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज’ और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को किसी भी कानूनी मुकदमे से आजीवन छूट दी गई है। उन्होंने कहा, ‘‘हमें विश्वास है कि यह महासभा पाकिस्तान और उसकी नीतियों को उनके वास्तविक स्वरूप में देखेगी, न कि उस रूप में जैसे उसके प्रतिनिधि झूठे तरीके से पेश करते हैं। साल-दर-साल झूठ दोहराने से वह सच नहीं हो जाता। पाकिस्तान का आतंकवाद, छल और दोहरा रवैया न तो उसके लिए और न ही दुनिया के लिए फायदेमंद होगा।’’ हम आपको बता दें कि शहबाज शरीफ ने अपने संबोधन में ट्रंप को उनके ‘‘दृढ़तापूर्ण और दूरदर्शी नेतृत्व’’ के लिए धन्यवाद देते हुए कहा था कि अमेरिका के राष्ट्रपति के ‘‘समय पर हस्तक्षेप’’ ने दक्षिण एशिया में करोड़ों लोगों की जान बचाई। शहबाज शरीफ ने करीब 23 मिनट के अपने संबोधन में कश्मीर मुद्दा भी उठाते हुए कहा कि यह सुनिश्चित करने के लिए कश्मीर मुद्दे का न्यायसंगत और निष्पक्ष समाधान जरूरी है कि दक्षिण एशिया फिर कभी 2025 के संघर्ष जैसी स्थिति में न पहुंचे। उधर, भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा को याद दिलाया कि शहबाज शरीफ ने ये ‘‘विचित्र टिप्पणियां’’ ऐसे समय में की हैं जब महज दो सप्ताह पहले न्यूयॉर्क और दुनिया ने 11 सितंबर के भीषण आतंकवादी हमले की 25वीं बरसी मनाई थी। गहलोत ने कहा, ‘‘इस संदर्भ को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है क्योंकि उस हमले का मुख्य साजिशकर्ता ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान की सेना की प्रमुख अकादमी के बिल्कुल पास रह रहा था।’’ गहलोत ने शरीफ द्वारा कश्मीर मुद्दा उठाए जाने को लेकर उनकी आलोचना करते हुए कहा कि केंद्रशासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है। उन्होंने कहा, ‘‘और यह हमेशा ऐसा ही रहेगा। लेकिन अगर हमें कश्मीर की ही बात करनी है तो आइए, पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर पर ध्यान देते हैं। रावलाकोट के लोगों से बेमतलब की उन हत्याओं, बर्बर हिंसा और बुनियादी अधिकारों से वंचित किए जाने के बारे में पूछिए जिनका वे लंबे समय से सामना कर रहे हैं।’’ हम आपको बता दें कि पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 विवादित सीट को लेकर पिछले कई महीनों में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। इसे लेकर सुरक्षा बलों ने कार्रवाई भी की और हाल में तथाकथित विधानसभा के लिए हुए चुनावों में धांधली के आरोप भी लगे। गहलोत ने सीमा पार आतंकवाद की पाकिस्तान की ‘‘लंबे समय से बरकरार नीति’’ की आलोचना करते हुए कहा कि भारत ने पिछले साल दिखा दिया था कि ‘‘आतंकवादियों के पास न भागने की जगह होगी और न छिपने की।’’ गहलोत ने कहा, ‘‘हम आतंकवाद के खिलाफ आत्मरक्षा के अपने अधिकार का इस्तेमाल करेंगे। पाकिस्तान की ओर से आतंकवाद जारी रहने के परिणाम होंगे। इससे स्वाभाविक रूप से उन व्यवस्थाओं पर भी सवाल उठेंगे, जिनकी बुनियाद मित्रता और सद्भावना पर रखी गई थी।’’ उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र महासभा में शहबाज शरीफ द्वारा व्यक्त किए गए विचार ‘‘ऐसे लोगों की ओर से आए हैं जिनका कट्टरता और नफरत का लंबा इतिहास रहा है।’’ गहलोत ने कहा, ‘‘इस महासभा में धार्मिक असहिष्णुता पर उस शासन की ओर से टिप्पणियां की गईं, जिसकी व्यवस्था का एक प्रमुख आधार ईशनिंदा कानून हैं। दुनिया जानती है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है। कोई भी दिखावटी खोखली बात दुनिया को गुमराह नहीं कर सकती।’’ दूसरी ओर, जयशंकर के बयान की बात करें तो आपको बता दें कि मामला शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में उस समय गरमा गया, जब जयशंकर और लाइबेरिया की विदेश मंत्री सारा बेइसोलो न्यान्ती समुद्री परिवहन और नाविकों की सुरक्षा को लेकर बनाए गए ‘ग्रुप ऑफ फ्रेंड्स’ की जानकारी दे रहे थे। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद एक पाकिस्तानी पत्रकार ने जयशंकर से सवाल किया कि भारत पाकिस्तान में कथित आतंकवाद को प्रायोजित करना कब बंद करेगा? सवाल पूरा होते ही जयशंकर ने पलटवार किया, “एक आतंकवादी देश मुझसे यह सवाल पूछ रहा है। चलिए भी।” भारत के संयुक्त राष्ट्र में स्थायी प्रतिनिधि हरिश पर्वतनेनी ने भी साफ कर दिया कि जवाब सुना जा चुका है और वह बिल्कुल स्पष्ट है। उधर, संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने भाषण में बड़ी बड़ी बातें करने वाले शहबाज शरीफ से आतंकवाद के मुद्दे पर सवाल हुआ तो वह भाग खड़े हुए। हम आपको बता दें कि संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में प्रवेश करते समय पत्रकारों ने उनसे सीधे पूछा— “प्रधानमंत्री, आप आतंकवादियों को पनाह देना कब बंद करेंगे?” इस पर शहबाज शरीफ ने कोई जवाब नहीं दिया। बाद में बाहर निकलते समय उनसे लश्कर-ए-तैयबा के प्रमुख हाफिज सईद पर कार्रवाई को लेकर सवाल किया गया। इस सवाल पर भी उन्होंने चुप्पी साधी और भाग खड़े हुए। बहरहाल, संयुक्त राष्ट्र के मंच पर पाकिस्तान भारत पर आतंकवाद के आरोप लगाने पहुंचा, लेकिन सवाल जब उसके अपने दरवाजे पर पहुंचा तो जवाब गायब हो गया।
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इस घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू पश्चिम बंगाल में लंबे समय से राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी रहे तृणमूल कांग्रेस (TMC) और सीपीआई (एम) के बीच संवाद है। जानकारी के मुताबिक, ममता बनर्जी ने सीपीआई (एम) के महासचिव एमए बेबी से भी बात की।
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