राम मंदिर ट्रस्ट विवाद पर विहिप की डैमेज कंट्रोल की कवायद, केंद्रीय सलाहकार ने संतों से की मुलाकात,
राम मंदिर ट्रस्ट विवाद पर विहिप की डैमेज कंट्रोल की कवायद, केंद्रीय सलाहकार ने संतों से की मुलाकात,
'डेड इकोनॉमी' विवाद पर कांग्रेस नेता राकेश सिन्हा का पलटवार, बोले-जीडीपी आंकड़ों से नहीं छिपेगी जमीनी हकीकत
'लोगों की बात सुनें, नियमों का पालन करें और काम की क्वालिटी सुनिश्चित करें', गुजरात सीएम की पंचायत प्रतिनिधियों से अपील
7.8 प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ देश की तरक्की को दिखाती है: सीएम देवेंद्र फडणवीस
7.8 प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ देश की तरक्की को दिखाती है: सीएम देवेंद्र फडणवीस
भाजपा का 'बल्लारी चलो' मार्च: येदियुरप्पा ने कर्नाटक सरकार को उखाड़ फेंकने का लिया संकल्प
भाजपा का 'बल्लारी चलो' मार्च: येदियुरप्पा ने कर्नाटक सरकार को उखाड़ फेंकने का लिया संकल्प
'शुक्र है हम बिना वीजा के गोरखपुर जा सकते हैं', रवि किशन के 'स्पेन' वाले बयान पर चंद्रशेखर का तंज
'शुक्र है हम बिना वीजा के गोरखपुर जा सकते हैं', रवि किशन के 'स्पेन' वाले बयान पर चंद्रशेखर का तंज
केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान को जान से मारने की धमकी, गृह मंत्रालय से सुरक्षा बढ़ाने की मांग
केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान को जान से मारने की धमकी, गृह मंत्रालय से सुरक्षा बढ़ाने की मांग
न्यूयॉर्क में मोहन भागवत का संदेश- “E Pluribus Unum” से “वसुधैव कुटुम्बकम्” तक
न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का भाषण सुनकर अमेरिका की एक प्रचलित कहावत स्मरण हो आई “E Pluribus Unum”, “ई प्लूरिबस यूनम” अर्थात् ‘अनेक से एक’। भागवत जी ने अनेक ऐसे बिंदु चिह्नित किए जहाँ, “वसुधैव कुटुम्बकम्” और अमेरिकी “E Pluribus Unum” परस्पर पूरक और पर्याय सिद्ध होते हैं। सबसे बड़ी बात, उनका संदेश केवल अमेरिका में बसे भारतीयों के लिए नहीं था; उसमें भारत, भारतीयता, विविधता, सह-अस्तित्व और विश्व-मानवता के प्रति एक व्यापक दृष्टि का विकास क्रम था। भागवत जी ने अपने प्रबोधन में विविधता को भारत की शक्ति बताया। उन्होंने कहा कि भारत की एकता विविधताओं से सजती है और विविधता में केवल परस्पर एडजस्ट करना पर्याप्त नहीं है, विविधता को स्वीकार कर उसे सम्मान और संरक्षण भी देना होगा। यही भारतीय दर्शन है। धार्मिक, नस्लीय और सांस्कृतिक ध्रुवीकरण के चक्र फँसे वर्तमान विश्व हेतु यही आवश्यक है। मोहनराव जी के न्यूयॉर्क उद्बोधन से निकला सबसे महत्वपूर्ण संदेश हिंदू-मुस्लिम संबंधों पर स्पष्ट वक्तव्य था। उन्होंने दो टूक उस सोच को नकारा कि भारत में मुसलमानों के लिए कोई स्थान नहीं है। उन्होंने हिंदू और मुस्लिम समाज को साझा पूर्वजों से जोड़ते हुए “same DNA” की बात भी दोहराई। इसे भी पढ़ें: मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा: भारतीय चिंतन की सार्थक प्रस्तुति भारतीय-अमेरिकी समुदाय आज अमेरिका के सर्वाधिक सफल और प्रभावी प्रवासी समुदाय में से एक है। उसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध और अनेक भाषाई-सांस्कृतिक समूह शामिल हैं। यदि भारतीय मूल के लोग अपनी भारतीय पहचान को किसी एक धार्मिक पहचान तक सीमित न करके एक साझा सभ्यतागत पहचान के रूप में देखते हैं, तो अमेरिकी समाज में भारतीय समुदाय की एकता और प्रभाव दोनों बढ़ सकते हैं। भागवत का संदेश अमेरिका में भारतीय मूल की नई पीढ़ी के लिए विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है। पहली पीढ़ी के प्रवासी प्रायः भारत से भावनात्मक रूप से जुड़े रहते हैं, जबकि दूसरी और तीसरी पीढ़ी अमेरिकी सामाजिक परिवेश में पली-बढ़ी है। उनके सामने प्रश्न रहता है कि वे अपनी भारतीय सांस्कृतिक पहचान को अमेरिकी नागरिकता के साथ किस प्रकार संतुलित करें। भागवत का दृष्टिकोण इस प्रश्न का सकारात्मक उत्तर देता है, अमेरिका के प्रति पूर्ण निष्ठा और भारत की सभ्यतागत विरासत के प्रति सम्मान एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। ‘अपनी कर्मभूमि के प्रति निष्ठावान रहो’ विदेशी भूमि पर जाकर अपनों से यह कहने का सामर्थ्य, साहस और सहजता एक स्वयंसेवक या ‘संघ विचार’ के पास ही हो सकती है। यह विचार भारतीय-अमेरिकी समुदाय को “Hyphenated Identity” की समस्या से मुक्ति देकर एक आत्मविश्वासी नागरिक की पहचान देता है। मोहन भागवत जी के कहे पर चलें तो अमेरिकी भारतीय युवा श्रेष्ठ अमेरिकी होते हुए भी अपनी भारतीय जड़ों पर गर्व कर सकते हैं। भागवतजी ने भारतीयता को केवल धार्मिक आग्रह के रूप में नहीं बल्कि साझा सांस्कृतिक और मानवीय विरासत के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया। विश्व में अमेरिका अब एक सर्वाधिक विविधता भरा समाज बन गया है। अमेरीका को सौजन्यशाली विविधता देने में भारत का सबसे बड़ा योगदान है। अमेरिका में बसे अनेक प्रकार के भारतीय समुदाय आज अमेरिकी समाज को एक इंद्रधनुष का रूप देते हैं। यह हमारे लिए गौरान्वित करने वाला विषय है। भारतीय-अमेरिकी समुदाय अमेरिका की अर्थव्यवस्था, तकनीक, चिकित्सा, शिक्षा, उद्यमिता और सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण योगदान देता है। यदि इस समुदाय में सांस्कृतिक आत्मविश्वास और सामाजिक समरसता बढ़ती है तो उसका लाभ अमेरिकी समाज को भी मिलेगा। संघ प्रमुख ने भारतीय संस्कृति के प्रत्येक के रूप में तीन शब्द कहे “Acceptance, Respect and Protection”। उनके भाषण से यह पुनः सिद्ध हुआ कि ‘सहिष्णुता’ ‘Tolerance’ भारतीय शब्द है ही नहीं। भारतीयता का मूल स्वर है स्वीकार्यता। ‘सहिष्णुता’ ‘Tolerance’ से तो अहम् व्यक्त होता है। ‘सहिष्णुता’ शब्द से स्वर आता है कि “तुम मुझे पसंद नहीं किंतु फिर भी तुम यहाँ रह लो”। Acceptance और Respect का अर्थ है, सभी समुदाय को स्वीकारता हूँ और उनका सम्मान करता हूँ। सरसंघचालक के न्यूयार्क प्रवास के विषय में जोहरान ममदानी तो मध्ययुगीन मुस्लिम सिद्ध हो गए हैं। जोहरान ममदानी ने अप्रासंगिक बातें करके न्यूयार्क के मेयर पद की गरिमा को ही ध्वस्त कर दिया। ममदानी को पता ही नहीं कि भारत का दृष्टिकोण “Pluralistic” और “Secular republic” से बहुत आगे बढ़कर “वयं राष्ट्रे जागृयाम” का है। जिस प्रकार के शब्द ममदानी ने कहे हैं, उससे तो लगता है वे अपनी दिमागी हालत की चिंता करें, भारत की नहीं। यदि ममदानी के मूल्य लोकतांत्रिक नहीं हैं। वे इस कार्यक्रम के निजी स्थान, सार्वजनिक स्थान, कार्यक्रम रोकने जैसे शब्दों को प्रयोग करके ‘फासिस्ट’ और ‘मध्ययुगीन मुस्लिम’ सिद्ध हो गए हैं। जोहरान ममदानी ने अमेरिका के नागरिक और न्यूयार्क के मेयर की गरिमा के विरुद्ध जाकर यह व्यक्त किया कि यदि उनके पास अधिकार होते तो वे संघ प्रमुख को न्यूयार्क में भाषण ही नहीं देने देते। इससे अधिक शर्मनाक और वैचारिक निर्धनता भला और क्या हो सकती है। सरसंघचालक जी के भाषण के पूर्व ही “Exclusionary” जैसे शब्दों का प्रयोग करने वाले ममदानी इस भाषण के बाद अब वैचारिक रूप से कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं रह गए हैं। न्यूयॉर्क के मेयर से नहीं किंतु ममदानी के घर जाकर आज उनसे प्रश्न किया जाना चाहिए कि वे अमेरिकी लोकतांत्रिक विचारों से इतने भिन्न क्यों हैं? और यदि वे न्यूयार्क नगर की सभ्यता, संस्कृति और सहजता को आत्मसात नहीं कर पा रहें हैं तो वे मेयर पद पर टिके ही क्यों हैं? जोहरान ममदानी ने तो न्यूयार्क में “Free Speech” के अधिकार पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया है। भागवत जी के न्यूयॉर्क भाषण ने हिंदुत्व, हिंदू संस्कृति, भारतीय सभ्यता, भारतीय सर्वसमावेशिकता, सर्व स्पर्शिता को बड़ी सहजता से स्थापित किया है। यद्यपि यह पहले भी स्थापित ही थी किंतु अब इसे एक नया आयाम मिल गया है। भारत के संदर्भ में अमेरिका में एक नए विमर्श का आरम्भ है, भागवत जी का यह वैचारिक प्रबोधन। “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति”, “वसुधैव कुटुम्बकम्” और विविधता में एकता की परंपरा को मैडिसन स्क्वेयर से पुनर्परिभाषित करने हेतु मोहन राव जी का अभिनंदन कर रहा है ‘अमेरिकी भारतीय’ समुदाय। अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करने का अर्थ दूसरे की पहचान से घृणा करना नहीं है, यह सिद्ध करने हेतु भी वे अभिनन्दनीय हैं। अमेरिका कहावत “E Pluribus Unum”, अर्थात् ‘अनेक से एक’, को स्थापित करता और भारतीयता के मूल से जोड़ता यह संघ संवाद एक अद्भुत सार्थकता, स्वीकार्यता, सहजता व सामुदायिकता के भाव को जन्म देता है। कहना ही होगा कि यदि शिकागो से अमेरिका और समूचे विश्व को स्वामी विवेकानंद जी ने एक वैचारिक माला दी थी तो मोहन राव जी भागवत ने इस ‘विवेकानंद माला’ का पुनर्जाप ही किया है। - डॉ. प्रवीण दाताराम
सपाट बंद हुआ शेयर बाजार, आईटी शेयरों में दिखी खरीदी
मुंबई, भारतीय शेयर बाजार मंगलवार के कारोबारी सत्र में करीब सपाट बंद हुआ। दिन के अंत में सेंसेक्स 12.99 अंक या 0.02 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 76,944.28 और निफ्टी 24.60 अंक या 0.10 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 24,055.80 पर था।
मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा: भारतीय चिंतन की सार्थक प्रस्तुति
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत की अगस्त 2026 की अमेरिका यात्रा को केवल प्रवासी भारतीयों के एक कार्यक्रम तक सीमित करके देखना उसके व्यापक अर्थ को छोटा करना होगा। न्यूयार्क में 29 अगस्त को आयोजित ‘एक विश्व, एक मानवता’ कार्यक्रम में उनका संबोधन ऐसे समय हुआ, जब संघ को लेकर भारत ही नहीं, विदेशों में भी अनेक धारणाएं, आरोप और पूर्वाग्रह सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बने हुए हैं। ऐसे वातावरण में भागवत ने जिस प्रकार विविधता, संवाद, सेवा, सह-अस्तित्व और मानवीय एकात्मता को केंद्र में रखा, उसने संघ की विचारधारा को उसके समर्थकों के लिए ही नहीं, बल्कि वैश्विक समाज के सामने भी एक अलग दृष्टि से प्रस्तुत किया। यह यात्रा इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि संघ अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है और उसके विचार अब भारत की सीमाओं से बाहर भी व्यापक चर्चा का विषय बन रहे हैं। भागवत का अमेरिका जाना वस्तुतः संघ के विचार को प्रत्यक्ष संवाद के माध्यम से समझाने का अवसर बना। संघ के बारे में भारत में लंबे समय से दो विपरीत धारणाएं दिखाई देती रही हैं। एक पक्ष उसे भारतीय संस्कृति, राष्ट्रभावना, सेवा और सामाजिक संगठन की विराट शक्ति मानता है, जबकि दूसरा पक्ष उसके विचारों को संकीर्ण धार्मिक राजनीति से जोड़कर देखता है। कांग्रेस सहित विभिन्न विपक्षी दलों ने समय-समय पर संघ और उसके विचारों पर गंभीर राजनीतिक प्रश्न उठाए हैं। अमेरिका में भी कार्यक्रम से पहले कुछ संगठनों और राजनीतिक व्यक्तियों ने भागवत की यात्रा और संघ की विचारधारा पर आपत्तियां व्यक्त कीं। ऐसे माहौल में किसी संस्था की वास्तविक छवि केवल आरोप-प्रत्यारोप से नहीं बनती, वह संवाद से बनती है। यही इस यात्रा का सबसे बड़ा महत्व है। भागवत ने अपने विचार विरोधियों पर आक्रमण करके नहीं, बल्कि भारतीय चिंतन की व्याख्या करके सामने रखे। इससे संघ को लेकर बनी धारणाओं पर बहस का एक नया आधार तैयार हुआ। न्यूयार्क में भागवत के वक्तव्य का सबसे अधिक चर्चित पक्ष उनका हिंदू-मुस्लिम संबंधों पर स्पष्ट कथन रहा। उन्होंने कहा कि यदि कोई हिंदू यह मानता है कि भारत में मुसलमानों के लिए स्थान नहीं होना चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रह सकता। यह कथन राजनीतिक नारे से अधिक महत्वपूर्ण इसलिए है कि इसमें हिंदुत्व की उनकी व्याख्या को सामाजिक समावेश के साथ जोड़ा गया है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि सत्य एक है और उसे समझने तथा व्यक्त करने के मार्ग अलग-अलग हो सकते हैं। भारतीय परंपरा की यही विशेषता है कि वह मतभिन्नता को अस्तित्व के संकट के रूप में नहीं, बल्कि सत्य की विविध अभिव्यक्तियों के रूप में देखने की क्षमता रखती है। यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है-यदि हिंदुत्व का अर्थ भारत की सांस्कृतिक चेतना है, तो क्या वह किसी समुदाय को भारत से बाहर कर सकता है? भागवत का उत्तर स्पष्ट रूप से नकारात्मक दिखाई देता है। उनका कथन हिंदुत्व की उस व्याख्या को सामने रखता है, जिसमें भारतीयता किसी एक पूजा-पद्धति की बपौती नहीं, बल्कि साझा सांस्कृतिक विरासत है। इसे भी पढ़ें: Prabhasakshi NewsRoom: Muslims पर Bhagwat के बयान के बाद BJP ने Rajasthan में 8 मुसलमानों को थमाए टिकट, UP में भी दिखेगा बदलाव! भागवत ने अमेरिका में भारत की विविधता को उसकी कमजोरी नहीं, शक्ति बताया। उनके अनुसार विविधता और एकता भारत के स्वभाव में ही अंतर्निहित हैं। भारत में भाषा, जाति, पंथ, पूजा-पद्धति और परंपराओं की असंख्य धाराएं हैं, फिर भी इन्हें एक साझा सभ्यतागत चेतना जोड़ती रही है। यह संदेश आज के विश्व के लिए अत्यंत प्रासंगिक है। अनेक देशों में धार्मिक पहचान, नस्लीय भेद, सांस्कृतिक असहमति और राजनीतिक ध्रुवीकरण सामाजिक तनाव बढ़ा रहे हैं। ऐसे समय भारत का अनुभव यह बताता है कि भिन्नताओं को मिटाना आवश्यक नहीं, उन्हें सम्मान देकर भी एकता स्थापित की जा सकती है। यही विचार भागवत के संबोधन को सामान्य राजनीतिक भाषण से ऊपर उठाता है। उनका आग्रह था कि विविधता को स्वीकार ही नहीं, सम्मान और संरक्षण भी मिलना चाहिए। संघ की सार्वजनिक छवि का एक बड़ा हिस्सा राजनीतिक विमर्श से निर्मित हुआ है, जबकि संघ स्वयं को सामाजिक संगठन और सेवा-आधारित सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में प्रस्तुत करता रहा है। भागवत ने अमेरिका में भी सेवा, सामाजिक समरसता और संवाद को परिवर्तन का आधार बताया। यही वह बिंदु है जहां संघ की छवि को केवल चुनावी राजनीति के चश्मे से देखने की सीमा सामने आती है। किसी संगठन को समझने के लिए उसके राजनीतिक प्रभाव के साथ उसकी सामाजिक गतिविधियों, सेवा-कार्य, संगठनात्मक संस्कृति और वैचारिक आधार को भी देखना आवश्यक है। भागवत की यात्रा ने कम से कम इतना अवसर अवश्य दिया कि संघ को उसके अपने शब्दों और उसके सरसंघचालक की प्रत्यक्ष व्याख्या के आधार पर सुना जाए। अमेरिका में बसे भारतीयों से भागवत ने एक संतुलित संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जिस देश में वे रह रहे हैं, वह उनकी कर्मभूमि है और वहां के प्रति उनकी निष्ठा तथा दायित्व सर्वोपरि हैं। साथ ही भारत उनकी जन्मभूमि है, जिससे उन्हें मानवीय मूल्यों और सांस्कृतिक संस्कारों की विरासत मिली है। यह दृष्टि प्रवासी भारतीयों के सामने पहचान के संघर्ष के बजाय पहचान के समन्वय का मार्ग रखती है। अपनी जड़ों से जुड़े रहना और जिस समाज में रह रहे हैं उसके प्रति पूर्ण निष्ठा रखना-दोनों एक साथ संभव हैं। यही भारतीय संस्कृति की उदारता है। यह भी तथ्य है कि भागवत के कार्यक्रम का अमेरिका में विरोध हुआ और संघ की विचारधारा को लेकर तीखी आलोचनाएं सामने आईं। लेकिन लोकतांत्रिक समाज में किसी विचार का उत्तर उसे दबाकर नहीं, उसके साथ संवाद करके दिया जाता है। इस दृष्टि से यह यात्रा संघ के लिए भी एक परीक्षा थी। भागवत ने विरोध का उत्तर आक्रामक भाषा में देने के बजाय एकात्मता, मानवता और सह-अस्तित्व की बात की। यही इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है। आलोचक उनके शब्दों और संघ के व्यवहार के बीच अंतर का प्रश्न उठा रहे हैं, समर्थक इसे संघ के मूल विचारों की स्पष्ट अभिव्यक्ति मान रहे हैं। इस बहस का अंतिम निर्णय समय और व्यवहार करेगा, लेकिन इतना निश्चित है कि बहस अब अधिक प्रत्यक्ष और वैश्विक हो गई है। मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा को संघ की छवि पर वर्षों से चले आ रहे विवाद का अंतिम उत्तर मानना अतिशयोक्ति होगी। किंतु इसे एक महत्वपूर्ण मोड़ अवश्य कहा जा सकता है। जिन लोगों ने संघ को केवल राजनीतिक आरोपों और विरोधी व्याख्याओं के माध्यम से जाना है, उन्हें पहली बार इतने बड़े वैश्विक मंच पर उसके शीर्ष नेतृत्व की विचार-दृष्टि को सीधे सुनने का अवसर मिला। यह यात्रा संघ के लिए एक उजाला इसलिए बनी है कि इसमें प्रतिरक्षा की भाषा कम और आत्मविश्वास की भाषा अधिक दिखाई दी। इसमें यह कहने का प्रयास था कि भारतीयता किसी के निषेध से नहीं, सबके सम्मान से मजबूत होती है, हिंदुत्व किसी समुदाय के बहिष्कार से नहीं, मानवता की एकात्म दृष्टि से सार्थक होता है और भारत की शक्ति उसकी समानता में नहीं, उसकी विविधताओं के बीच बनी रहने वाली सांस्कृतिक एकता में है। आज विश्व को केवल आर्थिक शक्ति, सैन्य शक्ति और तकनीकी प्रगति की आवश्यकता नहीं है। उसे ऐसा जीवन-दर्शन भी चाहिए जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ सके। भागवत के अमेरिकी संबोधन में भारत की इसी भूमिका की कल्पना दिखाई दी-एक ऐसा भारत जो अपनी परंपरा के बल पर विश्व को सह-अस्तित्व, संवाद और एकात्मता का रास्ता दिखा सके। मोहन भागवत की यह यात्रा इसलिए स्मरणीय रहेगी कि उसने संघ के बारे में चल रही बहस को भारत की सीमाओं से निकालकर विश्व के सार्वजनिक विमर्श में पहुंचा दिया। अब संघ की पहचान केवल उसके विरोधियों के आरोपों या समर्थकों के दावों से नहीं, बल्कि उसके विचार, उसके व्यवहार और समाज के साथ उसके संवाद से तय होगी। अंततः किसी विचारधारा की सबसे बड़ी शक्ति उसका प्रचार नहीं, उसका आचरण होता है। अमेरिका की धरती से भागवत ने जो संदेश दिया है, उसकी वास्तविक कसौटी भारत की धरती पर सामाजिक समरसता, सेवा, संवाद और सह-अस्तित्व के रूप में दिखाई देगी। यदि यह संदेश व्यवहार में उतरता है, तो यह केवल संघ की छवि को नहीं, भारत की वैश्विक सांस्कृतिक प्रतिष्ठा को भी नई ऊंचाई दे सकता है। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
वित्तीय वर्ष 2026-27 की प्रथम तिमाही में आर्थिक विकास दर ने चौंकाया
दिनांक 31 अगस्त 2026 को सायंकाल में केंद्र सरकार ने भारत के वित्तीय वर्ष 2026-27 की प्रथम तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर के आंकड़े जारी किए हैं। विश्व बैंक एवं अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष सहित अन्य वैश्विक संस्थानों, एसोचेम, भारतीय रिजर्व बैंक आदि के अनुमानों को धत्ता बताते हुए अप्रेल-जून 2026 की तिमाही में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है। जबकि, उक्त संस्थानों ने उक्त अवधि में 6.5 प्रतिशत से 7 प्रतिशत के बीच की वृद्धि दर का अनुमान लगाया था। उक्त वृद्धि दर वैश्विक स्तर पर विभिन्न प्रकार की आर्थिक समस्याओं के बीच हासिल हुई है, इसलिए भारत के लिए यह एक मील का पत्थर साबित होगी। रूस-यूक्रेन युद्ध तो बहुत लम्बे समय से चल रहा है, ईरान-अमेरिका/इजराईल युद्ध भी इस तिमाही में जारी रहा, जिसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि देखने को मिली थी। एक समय तो कच्चे तेल की कीमतें 120 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच गई थीं। ज्ञातव्य हो कि भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। ईरान द्वारा स्ट्रेट ओफ होर्मुज को बंद करने के पश्चात इस मार्ग से गुजरने वाले तेल के जहाजों को रोक दिया गया था एवं कच्चे तेल की आपूर्ति पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ा था। परंतु, भारत ने इस दयनीय स्थिति को बहुत ही सूझ बूझ के साथ सम्भाला और अन्य कई देशों से तेल एवं गैस का आयात जारी रखा, जिससे भारत में न तो तेल की आपूर्ति कम हुई और न ही भारत में पेट्रोल एवं डीजल की कीमतों में भारी वृद्धि हुई। जबकि अन्य कई देशों में तो पेट्रोल एवं डीजल की कीमतों में 50 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज हुई है। भारत के युवाओं (जेन-जी) को इस बात को समझना होगा कि भारत आज आर्थिक विकास के जिस दौर से गुजर रहा है, वह बहुत ही संवेदनशील है। यदि देश में किसी भी प्रकार की अराजकता फैलायी जाती है तो आर्थिक विकास की पटरी से भारत डीरेल हो सकता है। आगे आने वाले 10 वर्षों तक भारत यदि विकास दर की इसी ट्रेजेक्टरी में अपने आप को बनाए रखने में सफल होता है तो भारत के वर्ष 1947 में विकसित राष्ट्र बनने के सपने को साकार होने से कोई रोक नहीं सकता है। अर्थ के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में अप्रेल-जून 2026 तिमाही में सराहनीय वृद्धि दर हासिल की गई है। सकल मूल्य संवर्धन में वृद्धि दर 8.2 प्रतिशत की रही है जो अप्रेल-जून 2025 की तिमाही में 7 प्रतिशत की रही थी। विनिर्माण के क्षेत्र में वृद्धि दर पिछले वर्ष की तिमाही में 8.3 प्रतिशत की रही थी जो इस वर्ष की तिमाही में बढ़कर 9.2 प्रतिशत की हो गई है। इसी प्रकार सेवा के क्षेत्र में भी आर्थिक विकास दर इस वर्ष की प्रथम तिमाही में बढ़कर 10 प्रतिशत पर पहुंच गई जो पिछले वर्ष इसी अवधि में 8 प्रतिशत रही थी। भारत की अर्थव्यवस्था उपभोग आधारित है, अतः निजी उपभोग में इस वर्ष की तिमाही में 7.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है जो पिछले वर्ष इसी अवधि में 6.8 प्रतिशत रही थी। सकल स्थिर पूंजी निर्माण में भी अतुलनीय 11.9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है जो पिछले वर्ष की इसी अवधि में केवल 5.8 प्रतिशत की रही थी। इसी प्रकार, रोजगार निर्मित करने वाले क्षेत्रों में भी विकास दर प्रभावशाली रही है। वित्तीय क्षेत्र में वृद्धि दर 12.1 प्रतिशत की दर्ज हुई है तो व्यापार, होटल, यातायात एवं संचार के क्षेत्र में 8.5 प्रतिशत की विकास दर हासिल की गई है। साथ ही गैस एवं विजली उत्पादन में भी वृद्धि दर 8.9 प्रतिशत की रही है। इसे भी पढ़ें: UPA के 'Fragile Five' से 7.8% GDP ग्रोथ तक: Ravi Shankar Prasad ने PM Modi के आर्थिक प्रबंधन को सराहा वित्तीय वर्ष 2026-27 की प्रथम तिमाही में सराहनीय विकास दर हासिल करने को केंद्र सरकार की योजनाओं की सफलता के रूप में भी देखा जा सकता है। केंद्र सरकार ने मेक इन इंडिया नामक योजना को तेजी से आगे बढ़ाया है और इसने भारत को कई क्षेत्रों में आत्म निर्भर बनाने का कार्य सफलतापूर्वक किया है। विशेष रूप से सूचना प्रौद्योगिकी, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट, डिजिटल भुगतान, फिन टेक, इंजिनीयरिंग डिजाइन, व्यापार परामर्श, वैश्विक ग्लोबल योग्यता सेंटर, आदि क्षेत्रों में भारत आज पूरे विश्व में लीड कर रहा है। मेक इन इंडिया योजना ने भारतीय नागरिकों में जोश भरा और भारत की प्रतिभा का डंका पूरे विश्व में बज गया है। दूसरे, भारत में उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना को भी लागू किया गया। इस योजना ने भारत को उपभोक्ता बाजार से निकालकर मजबूत वैश्विक विनिर्माण हब में बदल दिया है। उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना के अंतर्गत 14 प्रमुख क्षेत्रों में करीब 2.3 लाख करोड़ रुपए का निवेश हुआ है, 16.5 लाख करोड़ रुपए से अधिक का कुल उत्पादन हुआ है एवं 12 लाख से अधिक रोजगार के नए अवसर निर्मित हुए। इसके उपरांत प्रारम्भ हुई प्रधानमंत्री गति शक्ति योजना के अंतर्गत सड़क, रेल, बंदरगाह, एयरपोर्ट और लाजिस्टिक को पहली बार इंटीग्रेटेड तरीके से जोड़ने की कोशिश की गई। समर्पित मालवाहक गलियारों का निर्माण तो इस दृष्टि से मील का पत्थर साबित हुए हैं। नए एक्स्प्रेस वे ने माल ढुलाई का समय घटाया। लागत को कम किया और भारतीय उत्पादों को वैश्विक बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बनाया। 86,300 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निर्यात इस सफलता की कहानी को दर्शाता है। निर्यात में अतुलनीय वृद्धि दर उस समय पर हासिल की गई है जब अमेरिका की टैरिफ नीति ने पूरे विश्व को परेशान किया हुआ है। साथ ही, रूस यूक्रेन युद्ध, ईरान इजराईल-अमेरिका युद्ध, इजराईल हमास युद्ध एवं वैश्विक स्तर पर अस्थिरता का बने रहना भी शामिल है। इन परिस्थितियों के बीच भारत ने उत्पादों एवं सेवा के क्षेत्र में निर्यात का रिकार्ड बनाया है। जबकि कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं में सुस्ती बनी हुई है। भारत के कुल निर्यात में सेवा क्षेत्र की कुल हिस्सेदारी तेजी से बढ़ रही है। यदि भारत को चीन जैसी विनिर्माण क्षेत्र की ताकत बनाना है तो भारत को हाई वैल्यू मैन्युफेक्चरिंग, सेमीकंडक्टर, मशीनरी, और सूक्षम, लघु एवं मध्यम उद्योग के क्षेत्र को और अधिक मजबूत करना होगा। घरेलू उत्पाद बढ़ाकर न केवल उत्पादों के आयात को कम किये जाने का प्रयास किया जा रहा है बल्कि वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेसरी भी बढ़ाई जा रही है। भारत में हाल ही में आई मोबाइल एवं इलेक्ट्रॉनिक क्रांति का भी इसमें बहुत बड़ा योगदान है। वर्ष 2014 में भारत में केवल 2 मोबाइल उत्पादन इकाईयां कार्यरत थीं। आज भारत मोबाइल निर्माण के क्षेत्र में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा निर्माता देश बन गया है। ऐपल की फ्लेगशिप कम्पनी अब मैन्युफेक्चरिंग इन इंडिया की ओर आगे बढ़ रही हैं। इलेक्ट्रॉनिक उत्पादन 2014-15 के 1.9 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 2025-26 में 13.11 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। रक्षा के क्षेत्र में भी उत्पादन एवं निर्यात तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है। रक्षा के क्षेत्र में भारत अपनी छोटी मोटी जरूरतों के लिए अन्य देशों की ओर देखता था आज वह फिलिपींस को ब्रह्मोस मिसाईल का निर्यात कर रहा है। कई अफ्रीकी देशों को मेड इन इंडिया हेलिकोप्टर निर्यात कर रहा है। अब देश की कुल जरूरत का लगभा 65 प्रतिशत रक्षा उत्पाद देश में ही निर्मित हो रहा हैं। जो रक्षा उत्पादन वर्ष 2014-15 में 46,429 करोड़ रुपए का था वह 2025-26 में बढ़कर 1.78 लाख करोड़ रुपए के रिकार्ड स्तर पर पहुंच चुका है। रक्षा निर्यात 38,424 करोड़ रुपए के उच्चत्तम स्तर पर पहुंच चुका है। आज रक्षा के क्षेत्र में विभिन्न उत्पादों का निर्यात 100 से अधिक देशों को किया जा रहा है। ऑटोमोबाइल के क्षेत्र में उत्पादन में अतुलनीय वृद्धि दर्ज हुई है एवं फार्मा क्षेत्र में तो भारत को फार्मेसी आफ द वर्ल्ड कहा जा रहा है। भारत की एक्स्पोर्ट बास्केट भी बढ़ रही है - पेट्रोलीयम उत्पाद, इंजिनीयरिंग उत्पाद, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा, ऑटोमोबाइल, टेक्स्टायल जैसे कई क्षेत्रों में विकास दर तेजी से बढ़ रही है। भारत किसी एक सेक्टर पर निर्भर नहीं है। कई क्षेत्रों में एक साथ आगे बढ़ रहा है। दुनिया की सप्लाई चैन में भारत की नई भूमिका तय हो रही है। भारत एक लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का निर्यात करने की ओर आगे बढ़ रहा है। - प्रहलाद सबनानी सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक, भारतीय स्टेट बैंक के-8, चेतकपुरी कालोनी, झांसी रोड, लश्कर, ग्वालियर - 474 009
तेलंगाना भाजपा अध्यक्ष रामचंदर राव हैदराबाद में गिरफ्तार, नलगोंडा जाने से रोका
तेलंगाना भाजपा अध्यक्ष रामचंदर राव हैदराबाद में गिरफ्तार, नलगोंडा जाने से रोका
सीएम भूपेंद्र पटेल ने 7.8 प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ की तारीफ की, पीएम मोदी ने 'स्वदेशी' को बढ़ावा देने पर दिया जोर
भारत- जीएसटी संग्रह अगस्त में बढ़कर 2 लाख करोड़ रुपए रहा
नई दिल्ली, भारत का सकल वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह अगस्त 2026 में सालाना आधार पर 14.8 प्रतिशत बढ़कर 1,99,853 करोड़ रुपए हो गया है, जो कि पिछले साल समान अवधि में 1,74,116 करोड़ रुपए था। यह जानकारी मंगलवार को जारी किए गए सरकारी डेटा में दी गई।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी लगातार ऐसे मुद्दों को उठा रहे हैं, जिनके जरिए वह दलितों, पिछड़ों, महिलाओं और युवाओं के बीच एक नया सामाजिक गठजोड़ तैयार करना चाहते हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या देश को आगे ले जाने की राजनीति अतीत के विवादों को लगातार कुरेदकर होगी, या भविष्य के भारत की चुनौतियों का समाधान खोजकर? राहुल गांधी के हालिया बयानों और राजनीतिक गतिविधियों से यह संकेत मिलता है कि कांग्रेस अब एक नए सामाजिक समीकरण पर काम कर रही है। उनकी राजनीति का निशाना दलित, ओबीसी, महिलाएं, जेन-जी और अल्पसंख्यक हैं। पुणे के कार्यक्रम में महिलाओं के अधिकारों पर बात करते हुए राहुल गांधी ने पितृसत्ता को चुनौती देने की बात की और आरएसएस तथा भाजपा पर “मनुस्मृति की मानसिकता” रखने का आरोप लगाया। इसे भी पढ़ें: PM Modi Instagram New Reel | 'झूठ की गूंज' 7.8% की इकोनॉमिक ग्रोथ को नहीं छिपा सकती, इंस्टाग्राम पर PM मोदी का राहुल गांधी पर तंज देखा जाये तो महिलाओं की सुरक्षा, शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता और निर्णय लेने की क्षमता जैसे मुद्दे निस्संदेह महत्वपूर्ण हैं। इन पर जितनी गंभीर चर्चा हो, उतना बेहतर है। लेकिन सवाल यह है कि महिलाओं के आधुनिक अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए क्या हर बार हजारों वर्ष पुराने ग्रंथों को राजनीतिक कठघरे में खड़ा करना आवश्यक है? राहुल गांधी ने पुणे में महिलाओं से संवाद किया। उन्होंने महिलाओं की सुरक्षा, शिक्षा, आर्थिक कठिनाइयों और स्वतंत्र निर्णय लेने की समस्याओं को सुना। यह लोकतांत्रिक राजनीति का स्वाभाविक और स्वागतयोग्य हिस्सा है। लेकिन इसी विमर्श में मनुस्मृति को प्रमुख राजनीतिक हथियार बनाना एक अलग राजनीतिक संदेश देता है। साथ ही ऐसा लगता है कि राहुल गांधी मनुस्मृति का मुद्दा उठाकर दलित समाज तक भी पहुंच बनाना चाहते हैं। इसका ऐतिहासिक कारण भी है। 1927 में डॉ. बीआर आंबेडकर ने मनुस्मृति का दहन किया था और जातिगत भेदभाव तथा असमानता के विरुद्ध संघर्ष को एक मजबूत वैचारिक आधार दिया था। राहुल गांधी संभवतः इसी ऐतिहासिक स्मृति और वर्तमान के कथित असंतोष को एक साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। यानी महिला अधिकारों का मुद्दा, दलित अस्मिता का प्रश्न और जातिगत न्याय की राजनीति, तीनों को एक साझा राजनीतिक नैरेटिव में पिरोने का प्रयास हो रहा है। लेकिन यहां राहुल गांधी की राजनीति पर गंभीर सवाल उठता है। क्या हर सामाजिक समस्या का समाधान जाति के चश्मे से ही खोजा जाएगा? भारत आज 21वीं सदी की तीसरे दशक में है। देश कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष तकनीक, डिजिटल अर्थव्यवस्था, आधुनिक शिक्षा, रोजगार, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे समय में राजनीति का मुख्य प्रश्न यह होना चाहिए कि भारत अगले 25 वर्षों में दुनिया की अग्रणी शक्ति कैसे बनेगा? लेकिन राहुल गांधी की राजनीति बार-बार समाज को उसके पुराने जातीय खांचों में वापस ले जाती दिखाई देती है। ऐसे में कानूनविद और भारत के विधि आयोग के पूर्व सदस्य तहिर महमूद की टिप्पणी महत्वपूर्ण हो जाती है। महमूद का कहना है कि मनुस्मृति जैसे प्राचीन ग्रंथों को उनके ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए। केवल औपनिवेशिक काल में किए गए अंग्रेजी अनुवादों के आधार पर उनकी अंतिम व्याख्या कर देना उचित नहीं है। हम आपको बता दें कि महिलाओं के संबंध में मनुस्मृति के उस प्रसिद्ध श्लोक को अक्सर उद्धृत किया जाता है, जिसमें बचपन में पिता, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र द्वारा महिला की “रक्षा” की बात कही गई है। आधुनिक दृष्टि से यह व्यवस्था निश्चित रूप से महिलाओं की पूर्ण व्यक्तिगत स्वतंत्रता के विचार से मेल नहीं खाती। लेकिन तहिर महमूद का तर्क है कि इसमें प्रयुक्त संस्कृत शब्दों और उनके अनुवाद को लेकर गंभीर मतभेद हैं। उनके अनुसार, “रक्षा” का अर्थ केवल नियंत्रण नहीं, बल्कि सुरक्षा और संरक्षण भी हो सकता है। दरअसल, औपनिवेशिक दौर के कुछ शाब्दिक अनुवादों ने यह धारणा मजबूत की कि मनुस्मृति महिलाओं को स्वतंत्रता के योग्य ही नहीं मानती। महमूद का तर्क है कि इसे दूसरे दृष्टिकोण से भी समझा जा सकता है कि महिला को जीवन के किसी भी चरण में असुरक्षित या बेसहारा नहीं छोड़ा जाना चाहिए। इस व्याख्या से सहमत होना या असहमत होना अलग बात है, लेकिन एक तथ्य महत्वपूर्ण है कि प्राचीन संस्कृत ग्रंथों की व्याख्या कोई टीवी डिबेट की तात्कालिक राजनीतिक बहस नहीं है। यह भाषा, इतिहास, समाज और विधि की गंभीर विशेषज्ञता का विषय है। किसी एक श्लोक को संदर्भ से काटकर पूरे ग्रंथ का अंतिम फैसला सुना देना बौद्धिक दृष्टि से भी उचित नहीं है। हम आपको बता दें कि तहिर महमूद ने एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है। उनके अनुसार, मनुस्मृति और अन्य धर्मशास्त्रों को सामान्य रूप से “हिंदू कानून” कहना भी काफी हद तक ब्रिटिश शासनकाल की वर्गीकरण पद्धति का परिणाम है। जिस दौर में ये ग्रंथ लिखे गए, उस समय आज जैसी आधुनिक धार्मिक पहचान और कानूनी व्यवस्था मौजूद नहीं थी। महमूद का तर्क है कि जिस प्रकार रोमन कानून को केवल “ईसाई कानून” नहीं कहा जाता, उसी तरह प्राचीन भारतीय कानूनी और सामाजिक ग्रंथों को भी केवल आधुनिक धार्मिक पहचान के संकीर्ण दायरे में नहीं बांधा जाना चाहिए। यह दृष्टिकोण विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि औपनिवेशिक शासन ने भारत को समझने के लिए कई कठोर श्रेणियां बनाई थीं। अंग्रेजों ने हिंदू, मुस्लिम, जाति, कानून और समुदाय की ऐसी परिभाषाएं बनाईं, जिन्हें बाद में भारतीय राजनीति ने भी अपना लिया। विडंबना यह है कि आज भी कई राजनीतिक बहसें उन्हीं औपनिवेशिक व्याख्याओं के आधार पर चल रही हैं। यहां कोई भ्रम नहीं होना चाहिए कि भारत, भारतीय संविधान से चलता है। संविधान सर्वोपरि है। समानता, स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय और महिलाओं के अधिकार आधुनिक भारत की मूल संवैधानिक प्रतिबद्धताएं हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि संविधान की सर्वोच्चता सिद्ध करने के लिए भारत के हर प्राचीन ग्रंथ और पूरी ऐतिहासिक विरासत को राजनीतिक खलनायक बना दिया जाए। प्राचीन ग्रंथों में ऐसी अनेक बातें हो सकती हैं जो आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं हैं। उन्हें आधुनिक कानून नहीं बनाया जा सकता और न ही बनाया जाना चाहिए। समाज बदलता है, कानून बदलते हैं और मूल्यों की व्याख्या भी बदलती है। लेकिन किसी प्राचीन ग्रंथ की आलोचना और उस ग्रंथ को राजनीतिक हथियार बनाकर वर्तमान समाज में विभाजन पैदा करने में अंतर है। देखा जाये तो राहुल गांधी की सबसे बड़ी राजनीतिक समस्या शायद यही है कि वह हर महत्वपूर्ण प्रश्न में जातिगत कोण खोजने लगते हैं। जाति जनगणना हो, आरक्षण हो, दलित प्रतिनिधित्व हो या अब मनुस्मृति, उनकी राजनीति का केंद्रीय संदेश लगभग एक ही है कि भारत की हर समस्या का मूल जाति व्यवस्था में खोजिए। इसमें कोई दो राय नहीं कि जातिगत भेदभाव भारत की एक वास्तविक और गंभीर सामाजिक समस्या रही है और जहां भी भेदभाव है, उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन जातिगत अन्याय को समाप्त करने का रास्ता क्या जाति की राजनीतिक पहचान को लगातार और मजबूत करना है? राहुल गांधी को यह समझना होगा कि पुराने घावों की चर्चा और इतिहास की आलोचना जरूरी हो सकती है, लेकिन देश का भविष्य केवल अतीत के मुकदमे लड़कर नहीं बनाया जा सकता। मनुस्मृति पर बहस हो सकती है। उसके विवादित प्रावधानों की आलोचना भी हो सकती है। लेकिन उसकी व्याख्या इतिहास, भाषा और सामाजिक संदर्भ की गंभीर समझ के साथ होनी चाहिए, न कि हर चुनावी मौसम में उसे जातीय और धार्मिक ध्रुवीकरण के राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाए। भारत का संविधान सर्वोपरि है। लेकिन संविधान की भावना यही भी है कि देश समानता और आधुनिकता की ओर बढ़े, न कि लगातार जातियों और ऐतिहासिक विवादों के बीच उलझा रहे। देश को आगे बढ़ाने के लिए पुराने सामाजिक बंधनों से मुक्त होना होगा। सवाल यह है कि राहुल गांधी भारत को उस दिशा में ले जाना चाहते हैं या फिर हर मुद्दे में जाति, मनुस्मृति और अतीत का कोण खोजकर देश को उसी राजनीतिक बहस में उलझाए रखना चाहते हैं। -नीरज कुमार दुबे
फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म जोमैटो ने सोमवार को कहा कि उसने अपने प्लेटफॉर्म पर लिस्टेड रेस्टोरेंट द्वारा एनालॉग डेयरी उत्पादों से बनी डिश बेचने के मामले में 'जीरो-टॉलरेंस' पॉलिसी अपनाई है और ऐसे सभी खाद्य पदार्थों को प्लेटफॉर्म से हटा दिया है।
भारत की जीडीपी ग्रोथ पर एनडीए नेता बोले- 'मोदी सरकार जो कहती है, वो करके दिखाती है'
भारत की जीडीपी ग्रोथ पर एनडीए नेता बोले- 'मोदी सरकार जो कहती है, वो करके दिखाती है'
राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर को प्रियांक खड़गे ने बताया राजनीति से प्रेरित, भाजपा ने किया पलटवार
राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर को प्रियांक खड़गे ने बताया राजनीति से प्रेरित, भाजपा ने किया पलटवार
मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के तहत गठित स्ट्रैटेजिक पॉलिटिकल एंड डिफेंस कमेटी की पहली बैठक ने पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब के उभरते सुरक्षा समीकरण को नया और अधिक संगठित रूप दे दिया है। इस्तांबुल में हुई इस अहम बैठक में केवल रक्षा सहयोग बढ़ाने की बात नहीं हुई, बल्कि ‘मक्का डिफेंस अलायंस’ को संस्थागत ढांचा देने, सऊदी अरब में स्थायी सचिवालय स्थापित करने और उसके शुरुआती तीन वर्षों के नेतृत्व की जिम्मेदारी पाकिस्तान को सौंपने जैसे बड़े फैसले लिए गए। यही वह मोड़ है, जहां अब यह समझौता महज एक राजनीतिक घोषणा से आगे बढ़कर संभावित क्षेत्रीय सुरक्षा संरचना का रूप लेता दिखाई दे रहा है। हम आपको याद दिला दें कि 7 अगस्त को तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगान, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सऊदी क्राउन प्रिंस एवं प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन सलमान ने मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसकी सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्था यह है कि तीनों में से किसी एक देश पर सशस्त्र हमला तीनों के खिलाफ हमला माना जाएगा। तुर्किये के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने इसकी तुलना नाटो के अनुच्छेद-5 जैसी सामूहिक रक्षा अवधारणा से की है, हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि यह गठबंधन किसी विशेष देश के खिलाफ नहीं है और मौजूदा अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का स्थान भी नहीं लेगा। इसे भी पढ़ें: Uzbekistan ने क्या India को धोखा दे दिया? जब Modi से हाथ मिला रहे थे Mirziyoyev, उसी समय Tashkent में क्यों उतर रहे थे China के J-10 Fighter Jet? बैठक के बाद सबसे महत्वपूर्ण घोषणा यह रही कि रियाद में मक्का डिफेंस अलायंस का स्थायी सचिवालय स्थापित किया जाएगा। इस सचिवालय का नेतृत्व महासचिव करेगा और शुरुआती तीन वर्षों के लिए पहला महासचिव पाकिस्तान से होगा। यह फैसला पाकिस्तान के लिए कूटनीतिक उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है। तुर्किये के विदेश मंत्री हाकान फिदान के अनुसार, तीनों देशों ने गठबंधन के संस्थागत ढांचे की स्थापना की प्रक्रिया शुरू कर दी है। भविष्य में इसकी कार्यप्रणाली, बैठकों की व्यवस्था, राजनीतिक और सैन्य समन्वय तथा अन्य देशों की सदस्यता के नियमों पर भी रूपरेखा तैयार की जाएगी। हम आपको बता दें कि इस्तांबुल बैठक का एजेंडा बेहद व्यापक था। इसमें रक्षा क्षमताओं का विस्तार, तीनों सेनाओं के बीच इंटरऑपरेबिलिटी यानी संचालनात्मक तालमेल, संयुक्त सैन्य उत्पादन, अनुसंधान एवं विकास, तकनीकी सहयोग, लॉजिस्टिक्स, प्रशिक्षण, खुफिया साझेदारी और आतंकवाद विरोधी सहयोग जैसे मुद्दे शामिल रहे। यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि तुर्किये का रक्षा उद्योग तेजी से उभर रहा है, पाकिस्तान परमाणु हथियार संपन्न मुस्लिम देश होने के साथ रक्षा उत्पादन और सैन्य सहयोग का लंबा अनुभव रखता है, जबकि सऊदी अरब अपनी घरेलू रक्षा औद्योगिक क्षमता बढ़ाने में भारी निवेश कर रहा है। यदि यह त्रिकोण संयुक्त अनुसंधान और उत्पादन तक पहुंचता है तो इसके परिणाम केवल सैन्य अभ्यासों तक सीमित नहीं रहेंगे। देखा जाये तो यह बैठक ऐसे समय हुई जब पश्चिम एशिया और उसके आसपास का सुरक्षा वातावरण अत्यंत अस्थिर है। ईरान-अमेरिका तनाव, होरमुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा, लाल सागर में हूती हमले, समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा और गाजा शांति समझौते के दूसरे चरण से जुड़ी चुनौतियां भी चर्चा के प्रमुख विषयों में शामिल रहीं। हम आपको बता दें कि तुर्किये और पाकिस्तान को सऊदी अरब के नेतृत्व वाली लाल सागर सुरक्षा पहलों में रचनात्मक भूमिका निभाने वाले देशों के रूप में देखा जा रहा है। इससे स्पष्ट है कि गठबंधन की सोच केवल सदस्य देशों की सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि समुद्री सुरक्षा और व्यापक क्षेत्रीय संकटों तक फैल सकती है। साथ ही मक्का डिफेंस अलायंस के भविष्य का दूसरा बड़ा सवाल इसके विस्तार का है। फिलहाल मिस्र सबसे संभावित उम्मीदवार माना जा रहा है। मिस्र पहले से तुर्किये, पाकिस्तान और सऊदी अरब के साथ क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े आर-4 तंत्र का हिस्सा है और हाकान फिदान भी मिस्र की भागीदारी की इच्छा जता चुके हैं। बांग्लादेश का नाम भी संभावित भविष्य के संदर्भ में सामने आया है, हालांकि उसकी सदस्यता फिलहाल एजेंडे में नहीं दिखती। तुर्किये और पाकिस्तान सहित संस्थापक देशों की प्राथमिकता पहले तीन-सदस्यीय ढांचे को प्रभावी बनाना है। इसके बाद विस्तार का प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है। उधर, भारत के लिए इस घटनाक्रम को केवल एक और इस्लामी देशों के मंच के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब का रक्षा सहयोग यदि संस्थागत, तकनीकी और सैन्य स्तर पर गहरा होता है, तो यह दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया के बीच एक नए रणनीतिक संपर्क का निर्माण कर सकता है। पहला महत्वपूर्ण पहलू पाकिस्तान की भूमिका है। सचिवालय के शुरुआती नेतृत्व और पहले महासचिव का पद पाकिस्तान को मिलने से उसे गठबंधन की संस्थागत दिशा तय करने में प्रभाव मिल सकता है। साथ ही, तुर्किये की उन्नत रक्षा तकनीक और पाकिस्तान की सैन्य क्षमता का संयोजन भविष्य में रक्षा उत्पादन और तकनीकी सहयोग के नए रास्ते खोल सकता है। हालांकि भारत के लिए सबसे जटिल स्थिति तब बन सकती है, जब गठबंधन का विस्तार होगा। मिस्र भारत का महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है, इसलिए काहिरा की संभावित सदस्यता नई दिल्ली के लिए विशेष ध्यान का विषय होगी। दूसरी ओर, यदि भविष्य में बांग्लादेश जैसे दक्षिण एशियाई देश भी किसी व्यापक सुरक्षा ढांचे से जुड़ते हैं, तो क्षेत्रीय समीकरण और अधिक संवेदनशील हो सकते हैं। बहरहाल, इस्तांबुल की पहली बैठक ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मक्का समझौता अब केवल हस्ताक्षरित दस्तावेज नहीं रहना चाहता। रियाद में सचिवालय, पाकिस्तान का प्रारंभिक नेतृत्व, संयुक्त रक्षा उत्पादन, सैन्य तालमेल और विस्तार की संभावना, ये सभी संकेत एक नए क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे की ओर इशारा करते हैं। फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि मक्का डिफेंस अलायंस नाटो जैसी प्रभावी सैन्य संरचना बन जाएगा क्योंकि इसके वास्तविक सैन्य दायित्व और संचालनात्मक व्यवस्था अभी स्पष्ट नहीं हैं। लेकिन एक बात तय है कि पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब ने अब एक ऐसा संस्थागत मंच बनाना शुरू कर दिया है, जिसकी दिशा और विस्तार आने वाले वर्षों में पूरे क्षेत्र के रणनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। -नीरज कुमार दुबे
No Foreign Trips, No Gold! PM Modi ने Kyrgyzstan से क्यों दोहराई ये अपील, आर्थिक संकट का इशारा?
बिश्केक में पीएम मोदी की 'कार डिप्लोमेसी': राष्ट्रपति पुतिन के साथ एक ही गाड़ी में किया सफर
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से बिश्केक में मुलाकात की। इस मुलाकात के दौरान दोनों नेताओं के बीच द्विपक्षीय बैठक हुई, जहां भारत-रूस संबंधों, यूक्रेन युद्ध और विश्व में शांति स्थापित करने को लेकर चर्चा हुई। इस बीच पीएम मोदी की 'कार डिप्लोमेसी' भी देखने को मिली।
नीट प्रदर्शनकारियों पर दर्ज FIR रद्द करने की मांग, सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई आज
सुप्रीम कोर्ट आज उस याचिका पर सुनवाई करेगा जिसमें दिल्ली पुलिस ने नीट पेपर लीक के विरोध प्रदर्शनों में शामिल छात्रों के खिलाफ दर्ज 13 एफआईआर को रद्द करने की अनुमति मांगी है
8.86 एकड़ जमीन घोटाले में हेमंत सोरेन ने हाई कोर्ट में दायर की क्रिमिनल रिवीजन याचिका, ईडी कोर्ट के आदेश को दी चुनौती
पंजाब के भूजल स्तर में बढ़ोतरी, भाखड़ा बांध पूरी तरह सुरक्षित: मंत्री बरिंदर गोयल
पंजाब के भूजल स्तर में बढ़ोतरी, भाखड़ा बांध पूरी तरह सुरक्षित: मंत्री बरिंदर गोयल
पीएम के 'मन की बात' में जिक्र के बाद चिकमगलूर में तेजी से बढ़ रही एवोकाडो की खेती
पीएम के 'मन की बात' में जिक्र के बाद चिकमगलूर में तेजी से बढ़ रही एवोकाडो की खेती
अखिलेश यादव के आरोपों पर संजय निषाद का पलटवार, 'अपराधी की कोई जाति नहीं होती'
अखिलेश यादव के आरोपों पर संजय निषाद का पलटवार, 'अपराधी की कोई जाति नहीं होती'
दिल्ली में झंडेवालान फ्लैटेड फैक्ट्री कॉम्प्लेक्स बनेगी स्मार्ट इंडस्ट्रियल हब, मंत्री मनजिंदर सिरसा ने की समीक्षा बैठक
कर्नाटक के मंत्री बसवराज रायरेड्डी इस्लाम वाले बयान पर माफी क्यों मांगें: एसटी हसन
कर्नाटक के मंत्री बसवराज रायरेड्डी इस्लाम वाले बयान पर माफी क्यों मांगें: एसटी हसन
Chai Par Sameeksha: UP में किसे मिलेगा जाटों का साथ? Rahul Gandhi की 2024 वाली रणनीति!
प्रभासाक्षी की साप्ताहिक कार्यक्रम चाय पर समीक्षा में इस सप्ताह हमने भाजपा की सोशल मीडिया पर सक्रियता और राहुल गांधी द्वारा लगाए गए आरोपों पर चर्चा की। साथ ही साथ उत्तर प्रदेश की जाट पॉलिटिक्स पर भी हमने प्रभासाक्षी के संपादक नीरज कुमार दुबे से सवाल पूछे। भाजपा में हुए बदलाव और सोशल मीडिया पर सक्रियता को लेकर नीरज कुमार दुबे ने कहा कि हाल में ही देखे तो दिल्ली में जो प्रोटेस्ट हुआ, अगर वह इतना कामयाब हुआ तो उसमें सोशल मीडिया का बड़ा हाथ था। यही कारण है कि भाजपा ने भी अपने सोशल मीडिया टीम में बड़े बदलाव किए हैं और उसका असर अब हमें लगातार देखने को मिल रहा है। उन्होंने कहा कि बीजेपी सोशल मीडिया के जरिए युवाओं तक अपनी पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है ताकि उन्हें बताया जा सके कि मोदी सरकार में क्या काम हुए हैं और उससे पहले क्या स्थितियां थी। नीरज दुबे ने कहा कि हाल के दिनों में देखें तो भाजपा सोशल मीडिया पर पिछड़ती हुई दिखाई दे रही थी जिसका फायदा विपक्षी दल भी खूब उठा रहे थे। लेकिन अब भाजपा ने समय को ध्यान में रखते हुए बड़े बदलाव को करने के बाद एक आक्रामक नीति अपनाने की ओर बढ़ रही है। दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में सिंगर अंकित बालियान के मर्डर के बाद से जारी जाट राजनीति पर भी नीरज दुबे से सवाल पूछा। नीरज दुबे ने कहा कि अखिलेश यादव हर कीमत पर उत्तर प्रदेश चुनाव को जाति पर ले जाना चाहते हैं जबकि भाजपा इसे हिंदुत्व पर रखना चाहती हैं। इसे भी पढ़ें: 22000 करोड़ का कर्ज लिया और सिर्फ 6.5 करोड़ की वापसी? लोन माफी के आरोपों के बीच Essel Group के Subhash Chandra ने खुद खोला पूरा राज नीरज दुबे ने कहा कि यह सभी को पता है कि उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार की सबसे बड़ी कामयाबी वहां की कानून व्यवस्था है। यही कारण है कि अंकित बालियान मर्डर केस को उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था को जोड़ा जा रहा है। साथ ही साथ अखिलेश यादव जाट वोटो को साधने की कोशिश कर रही कर रहे हैं। उन्हें पता है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनका कुछ खास जनाधार नहीं है। मुसलमान वोट उनको मिल जाएंगे लेकिन जब तक मुसलमान के साथ किसी और समुदाय का वोट उन्हें ना मिले, तब तक वह कामयाब नहीं हो सकते हैं और इसीलिए वह जाट समुदाय को साधने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जयंत चौधरी जाट समुदाय के बड़े नेता है और उन पर निशाना साधकर अखिलेश यादव ने बड़ी गलती कर दी थी। शायद इस वजह से अब इस मुद्दे को वह जाट समाज से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि किसी की अगर हत्या होती है वह दुखद है और सरकार आरोपियों को हर हाल में सामने लाएगी और न्याय के कटघरे में खड़ा करेगी। राहुल गांधी के द्वारा शुद्धिकरण को लेकर लगाए जा रहे आरोपों पर नीरज दुबे ने कहा कि राहुल गांधी काफी दिनों के बाद यह मुद्दा उठा रहे हैं। सवाल यह भी है कि वह इतने दिनों तक क्या कर रहे थे। उन्होंने कहा कि आरोप लगाना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन अगर उनके आरोप में दम है तो उनके कार्यकर्ता खुद क्यों नहीं गए एफआईआर दर्ज कराने। नीरज दुबे ने कहा कि विपक्ष को फिलहाल कोई बड़ा मुद्दा नहीं मिल रहा है इसलिए वह हर मामले को जाति का रंग देना चाहती है ताकि चुनाव में फायदा हो सके। उत्तर प्रदेश उत्तराखंड में चुनाव होने हैं। इसी को लेकर राहुल गांधी 2024 वाला माहौल बना रहे हैं। लेकिन इस बार वह कामयाब होंगे इसकी संभावना बेहद कम है।
बिहार के ‘सहयोग मॉडल’ से बाकि राज्यों को भी सीखने की जरूरत
क्या किसी सरकारी स्कूल या हॉस्टल में गंदा पानी, खराब खाना या बिजली की किल्लत जैसी रोजमर्रा की समस्याओं का समाधान 30 दिन के भीतर पाना संभव है?...जहां देश के अधिकांश राज्यों में छात्र ऐसी बुनियादी सुविधाओं के लिए महीनों प्रशासनिक चक्कर काटने या सड़कों पर उतरने को मजबूर होते हैं, वहीं बिहार सरकार ने एक पारदर्शी ऑनलाइन व्यवस्था से इस धारणा को बदलने की कोशिश की है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी द्वारा शुरू की गई इस नई पहल ने छात्र शिकायतों के निपटारे का एक ऐसा मॉडल पेश किया है, जिसकी गूंज अब देश भर में सुनाई दे रही है। छात्रों की शिकायतें अक्सर लंबे समय तक अनसुलझी रहती हैं, इसकी बड़ी वजह प्रशासनिक प्रक्रिया की जटिलता है। किसी छात्र को हॉस्टल की सफाई, भोजन की गुणवत्ता, बिजली-पानी या फीस से जुड़ी दिक्कत होने पर पहले वार्डन, फिर प्रिंसिपल और जरूरत पड़ने पर जिला शिक्षा कार्यालय तक जाना पड़ता है। इस प्रक्रिया में न तो कोई तय समयसीमा होती है और न ही स्पष्ट जवाबदेही तय होती है, जिस वजह से छोटी शिकायतें भी हफ्तों-महीनों तक लंबित रह जाती हैं। इसे भी पढ़ें: “मखाना: भारत के पारंपरिक उत्पाद से वैश्विक सुपरफूड बनने का स्वर्णिम सफर” बिहार सरकार के विद्यार्थी सहयोग पोर्टल की खासियत यह है कि शिकायत दर्ज कराने के लिए दो अलग कैटेगरी बनाई गई हैं — पहली, शैक्षणिक संस्थान यानी विद्यालय, महाविद्यालय या विश्वविद्यालय से संबंधित विद्यार्थियों के लिए, और दूसरी, छात्रावास यानी हॉस्टल में रहने वाले विद्यार्थियों के लिए। पोर्टल के होमपेज पर ही यह दोनों विकल्प दिए गए हैं, जिससे छात्र सही कैटेगरी चुनकर सीधे संबंधित फॉर्म तक पहुंच जाता है। कैटेगरी चुनने के बाद छात्र के सामने एक सीधा-सादा फॉर्म खुलता है, जिसमें नाम, लिंग, पिता का नाम, जन्म तिथि और मोबाइल नंबर जैसी बुनियादी जानकारी भरनी होती है। ईमेल आईडी को वैकल्पिक रखा गया है, ताकि जिन छात्रों के पास ईमेल नहीं है वे भी शिकायत दर्ज करा सकें, जबकि मोबाइल नंबर को ओटीपी से वेरिफाई किया जाता है ताकि हर शिकायत असली छात्र की ओर से ही दर्ज हो। पोर्टल पर छात्रों के लिए तीन सुविधाएं दी गई हैं। शिकायत दर्ज कराने का विकल्प हॉस्टल सुविधाओं, भोजन, स्वच्छता, सुरक्षा और बिजली से जुड़ी समस्याओं के लिए है। इसके अलावा छात्र व्यवस्था सुधारने से जुड़े अपने सुझाव भी साझा कर सकते हैं, और सबसे अहम बात यह कि एक बार शिकायत दर्ज करने के बाद छात्र उसकी मौजूदा स्थिति और उस पर हुई कार्रवाई को ट्रैक भी कर सकता है। पोर्टल पर सबसे ज्यादा दर्ज होने वाली शिकायतों को भोजन, पेयजल, बिजली, शौचालय-सफाई, सुरक्षा, बुनियादी ढांचे और इंटरनेट जैसी कैटेगरी में पहले से बांटा गया है, जिससे शिकायत सीधे संबंधित विभाग तक पहुंचती है और निपटारे में देरी नहीं होती। पोर्टल पर दर्ज हर शिकायत का 30 दिनों के भीतर निपटारा सुनिश्चित करने की व्यवस्था की गई है। समाधान के बाद संबंधित छात्र को लिखित रूप से इसकी सूचना भी दी जाती है, ताकि यह साफ रहे कि उसकी शिकायत पर वाकई कार्रवाई हुई है। जिला प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि शिकायतकर्ता छात्र-छात्राओं की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखी जाएगी, जिससे छात्र बिना किसी डर के अपनी बात रख सकें। जिन छात्रों के पास ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराने की सुविधा नहीं है, उनके लिए टोल-फ्री हेल्पलाइन नंबर 1100 भी उपलब्ध कराया गया है। पोर्टल का मकसद छात्रों की शैक्षणिक, परीक्षा, छात्रावास, छात्रवृत्ति और अन्य संस्थागत समस्याओं का पारदर्शी और जवाबदेह तरीके से समाधान करना है। सरकारी पोर्टल और हेल्पलाइन की घोषणाएं आमतौर पर होती रहती हैं, लेकिन इनमें से ज्यादातर व्यवहार में उतनी असरदार साबित नहीं होतीं। लेकिन बिहार सरकार की अब तक की कोशिशों को देखें तो ऐसा लगता है कि सरकार गंभीरता से छात्रों की समस्याओं को सुनने की ओर अग्रसर है। इस पोर्टल की खासियत है कि इसमें एक जवाबदेही तंत्र भी जोड़ा गया है — तय समयसीमा में शिकायत का समाधान न होने पर संबंधित अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई का भी प्रावधान रखा गया है, जिससे यह सिर्फ कागजी व्यवस्था बनकर नहीं रह जाती। पोर्टल के साथ-साथ सरकार ने हर महीने सहयोग शिविर आयोजित करने की व्यवस्था भी बनाई है, जिनमें मंत्री, विधायक, सांसद और संबंधित अधिकारी सीधे स्कूल-कॉलेजों में जाकर छात्रों से बातचीत करेंगे। इन शिविरों में मिलने वाली शिकायतों और सुझावों को भी उसी पोर्टल पर दर्ज कर ट्रैक किया जाता है, जिससे पूरा सिस्टम एक जगह जुड़ा रहता है। यह व्यवस्था खासकर उन इलाकों में उपयोगी मानी जा रही है, जहां छात्र ऑनलाइन माध्यम के बजाय सीधी बातचीत में ज्यादा सहज महसूस करते हैं। जिन राज्यों में छात्र आंदोलन और कैंपस में असंतोष की घटनाएं सामने आती रही हैं, उनके लिए बिहार का यह मॉडल कुछ स्पष्ट संकेत देता है। शिकायत निवारण तंत्र तभी प्रभावी होता है जब उसमें तय समयसीमा और जवाबदेही दोनों शामिल हों। शिकायत और छात्रावास की समस्याओं को अलग-अलग कैटेगरी में बांटने और फॉर्म को आसान रखने से समाधान की रफ्तार तेज होती है, जबकि स्टेटस ट्रैक करने की सुविधा से छात्रों को भरोसा रहता है कि उनकी बात पर वाकई काम हो रहा है। साथ ही, सिर्फ डिजिटल पोर्टल पर निर्भर रहने के बजाय हेल्पलाइन और जमीनी शिविर जैसे विकल्प भी जरूरी हैं, ताकि हर वर्ग का छात्र इस व्यवस्था से जुड़ सके। शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए बड़ी घोषणाओं के साथ-साथ जमीनी क्रियान्वयन भी उतना ही जरूरी है। बिहार का अनुभव यह दिखाता है कि अगर शिकायत निवारण तंत्र में पारदर्शिता, आसान प्रोसेस और जवाबदेही तय की जाए, तो नतीजे भी सामने आते हैं। अब देखना यह होगा कि अन्य राज्य इस मॉडल से कितना सीखते हैं और अपने यहां इसे किस रूप में लागू करते हैं। - संजीव कुमार मिश्र
नेपाल की त्रासदी से भारत को सबक लेने की जरूरत
नेपाल में 26 अगस्त 2026 को आई विनाशकारी बाढ़ और हिमस्खलन ने एक बार फिर यह कठोर सत्य सामने ला दिया है कि प्रकृति के साथ खिलवाड़ और पहाड़ों की संवेदनशीलता की अनदेखी मानव सभ्यता के लिए कितनी भारी पड़ सकती है। भोटेकोशी नदी तंत्र में ग्लेशियर के बड़े हिस्से के टूटने, बर्फ-पत्थरों के विशाल मलबे के नीचे आने और नदी के प्रवाह में अस्थायी अवरोध बनने के बाद अचानक बाढ़ का जो रौद्र एवं भयावह रूप सामने आया, उसने नेपाल और चीन के तिब्बती क्षेत्र में भारी तबाही मचाई। 29 अगस्त तक उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार नेपाल में 579 और तिब्बत में 5 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है तथा लगभग 2,482 लोग लापता बताए जा रहे हैं। हजारों लोगों को बचाया गया है, लेकिन दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों और लगातार बने नए खतरे के कारण राहत एवं बचाव कार्य अभी भी चुनौतीपूर्ण हैं। यह घटना केवल नेपाल की प्राकृतिक त्रासदी नहीं है, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए भविष्य का भयावह संकेत है। प्रारंभिक वैज्ञानिक आकलन बताते हैं कि ग्लेशियर का हिस्सा टूटकर नीचे गिरा, जिससे बर्फ, चट्टान, मिट्टी और मलबे का विशाल प्रवाह पैदा हुआ। इसने नदी के प्रवाह को अवरुद्ध किया और बाद में जमा पानी तथा मलबे के दबाव से अचानक विनाशकारी बाढ़ आई। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे घटनाक्रम को केवल सामान्य बाढ़ कहना भूल होगी, यह ग्लेशियर, भूस्खलन, मलबा-प्रवाह और नदी-बाढ़ जैसे अनेक खतरों के एक साथ सक्रिय होने वाली ‘बहु-आपदा’ का उदाहरण है। इस त्रासदी का सबसे बड़ा संदेश जलवायु परिवर्तन से जुड़ा है। हिमालय केवल बर्फ से ढकी पर्वतमाला नहीं, बल्कि एशिया की जल-सुरक्षा का आधार है। तापमान बढ़ने के साथ ग्लेशियर तेजी से पीछे हट रहे हैं और अनेक नई ग्लेशियर झीलें बन रही हैं। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट के अनुसार हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में लगभग 25,000 ग्लेशियर झीलें हैं और बढ़ता तापमान ग्लेशियर झीलों के फटने यानी (जीएलओएफ) के जोखिम को बढ़ा रहा है। नेपाल में 1920 के दशक से अब तक 90 से अधिक ग्लेशियर झील विस्फोट बाढ़ दर्ज की जा चुकी हैं। इसलिए यह मान लेना उचित नहीं होगा कि नेपाल की घटना का एकमात्र कारण ग्लोबल वार्मिंग ही है। भूकंपीय गतिविधियां, भूगर्भीय अस्थिरता, अत्यधिक वर्षा, हिमस्खलन और प्राकृतिक ढलानों की कमजोरी भी महत्वपूर्ण कारक हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन इन जोखिमों को बढ़ाने वाली पृष्ठभूमि अवश्य तैयार कर रहा है। गर्म होता हिमालय ग्लेशियरों और पर्वतीय भूभाग को अस्थिर कर रहा है, जिससे ऐसी घटनाओं की संभावित तीव्रता और व्यापकता बढ़ सकती है। वैज्ञानिकों ने भी इस बात पर सावधानी बरती है कि किसी एक घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन का परिणाम घोषित करने के बजाय दीर्घकालिक जलवायु और भूगर्भीय बदलावों को साथ देखकर समझना चाहिए। इसे भी पढ़ें: तबाही से 90 दिन पहले चीन-नेपाल के बीच क्या हुआ था? जलप्रलय का मिनट-दर-मिनट का पूरा घटनाक्रम नेपाल की घटना भारत के लिए भी गहरी चेतावनी है। इस चेतावनी से सीख लेने की जरूरत है। उत्तराखंड की केदारनाथ त्रासदी, 2021 की ऋषिगंगा आपदा और हिमालयी राज्यों में बार-बार आने वाली बाढ़, भूस्खलन एवं बादल फटने की घटनाएं पहले ही बता चुकी हैं कि पहाड़ों की सहनशीलता असीमित नहीं है। हिमालय में सड़कें, सुरंगें, जलविद्युत परियोजनाएं, होटल, बस्तियां और अन्य निर्माण आवश्यकताओं को पूरा करने के नाम पर तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या इनके लिए पर्वतीय पर्यावरण की वहन क्षमता का पर्याप्त आकलन हो रहा है? विकास जरूरी है, मगर ऐसा विकास जो पहाड़ों को खोखला करके ही संभव हो, अंततः मानव जीवन और स्वयं विकास दोनों के लिए संकट बन सकता है। आज सबसे बड़ी आवश्यकता ‘आपदा के बाद राहत’ से आगे बढ़कर ‘आपदा से पहले तैयारी’ की है। अत्याधुनिक सैटेलाइट निगरानी, ड्रोन, रडार, नदी सेंसर, ग्लेशियर और ग्लेशियर झीलों की निरंतर निगरानी तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित पूर्वानुमान प्रणालियों को हिमालयी क्षेत्र में व्यापक स्तर पर विकसित करना होगा। शुरुआती चेतावनी प्रणाली केवल राजधानी या प्रशासनिक केंद्र तक सीमित न रहे, बल्कि पहाड़ के अंतिम गांव तक मोबाइल संदेश, सायरन, रेडियो और स्थानीय स्वयंसेवी तंत्र के माध्यम से पहुंचे। नेपाल में वर्तमान त्रासदी के बाद भी एक और संभावित झील के फटने की आशंका ने स्पष्ट कर दिया है कि एक आपदा समाप्त होते ही दूसरी आपदा का खतरा पैदा हो सकता है। नदियां राजनीतिक सीमाओं को नहीं पहचानतीं। भोटेकोशी जैसी सीमापार नदी प्रणालियों के लिए नेपाल, चीन, भारत और अन्य हिमालयी देशों के बीच वास्तविक समय में जल-प्रवाह, वर्षा, भूस्खलन, ग्लेशियर झील और हिमस्खलन संबंधी सूचनाओं का आदान-प्रदान आवश्यक है। किसी एक देश के पास उपलब्ध महत्वपूर्ण चेतावनी दूसरे देश के नागरिकों की जान बचा सकती है। अतः हिमालय के लिए एक साझा क्षेत्रीय आपदा-पूर्व चेतावनी नेटवर्क विकसित किया जाना चाहिए। भारत को इस दिशा में अपने हिमालयी राज्यों के लिए अलग ‘माउंटेन सेफ्टी पॉलिसी’ पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क या सुरंग बनाने से पहले भूगर्भीय जोखिम, जलधाराओं के प्राकृतिक मार्ग, भूस्खलन की संभावना और स्थानीय पारिस्थितिकी का वैज्ञानिक मूल्यांकन अनिवार्य होना चाहिए। अंधाधुंध वृक्ष कटाई, नदी किनारे अनियोजित निर्माण, पहाड़ों की अनावश्यक कटाई और पर्यटन के नाम पर अत्यधिक दबाव को नियंत्रित करना होगा। स्थानीय समुदायों को आपदा प्रबंधन की पहली पंक्ति बनाना होगा, क्योंकि किसी भी संकट में सबसे पहले वही लोग प्रभावित होते हैं और वही सबसे पहले सहायता भी कर सकते हैं। दुनिया को जापान, स्विट्जरलैंड और अन्य पर्वतीय देशों से आपदा-प्रबंधन, भवन सुरक्षा, पूर्व चेतावनी और स्थानीय प्रशिक्षण की तकनीक सीखनी चाहिए। हिमालय को केवल पर्यटन और आर्थिक विकास का क्षेत्र मानना अब पर्याप्त नहीं है इसे एक जीवित, संवेदनशील और अत्यंत नाजुक पारिस्थितिक तंत्र के रूप में देखना होगा। प्रकृति को नियंत्रित करने की मनुष्य की महत्वाकांक्षा जितनी बढ़ेगी, प्रकृति का प्रतिरोध भी उतना ही भयावह हो सकता है। नेपाल की त्रासदी इसलिए केवल शोक मनाने का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का क्षण है। हमें यह समझना होगा कि पहाड़ों को जीतना नहीं, उनके साथ जीना सीखना होगा। विकास की गति को प्रकृति की क्षमता के अनुरूप करना, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करना, वैज्ञानिक चेतावनियों को गंभीरता से लेना और सीमापार सहयोग बढ़ाना ही भविष्य की राह है। यदि इस त्रासदी से भारत और दुनिया ने समय रहते सबक ले लिया, तो नेपाल में बहा हुआ पानी केवल विनाश की कहानी नहीं रहेगा, वह आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित रखने की चेतावनी और नई पर्यावरणीय चेतना का संदेश भी बनेगा। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
हिंदू ध्रुवीकरण के मुकाबले ‘सम्मान की राजनीति’ को Congress बना रही नया हथियार
हिंदू ध्रुवीकरण के मुकाबले ‘सम्मान की राजनीति’ को Congress बना रही नया हथियार
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के ''अमेरिकी सम्बोधन' के अंतर्राष्ट्रीय सामाजिक कूटनीतिक मायने
आधुनिक भारत का सामाजिक चाणक्य समझे जाने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत एक असाधारण व्यक्तित्व के स्वामी हैं, क्योंकि उन्होंने भाजपा के 'गाबाज' नेतृत्व को बदलवाकर कांग्रेसियों/समाजवादियों को उनके ही राजनीतिक पीच पर 2014 में जो सियासी शिकस्त दिलवाई, उससे आम भारतीयों की राजनीतिक सोच ही बदल गई। फलसफा यह निकला कि आज भारत के जर्रे-जर्रे में भगवा ध्वज शान से लहरा रहा है और आरएसएस-भाजपा खुद SC-ST-OBC-EWS का हिमायती बन चुकी है, ताकि देशद्रोही सियासत के लिए कोई सामाजिक स्पेस ही न छोड़ी जाए। इससे सवर्ण बुद्धिजीवियों में हलचल जरूर है, लेकिन जो व्यक्ति भगवान परशुराम को 'लकड़हारा यानी 'बढ़ई जाति' से जोड़कर एक नया 'ओबीसी ब्राह्मण दर्शन' पैदा कर चुका हो, उसकी 'चाणक्य नीति' और 'श्रीरामजी आदर्श नीति' का आप सहज ही अंदाजा लगा सकते हैं। इसे भी पढ़ें: 'हमने किसी देश पर कब्ज़ा नहीं किया, न ही धर्म बदला', टोरंटो में मोहन भागवत ने भारत के 'यूनिवर्सल DNA' पर की बात | Mohan Bhagwat Toronto Speech पूरी दुनिया ने देखा कि एक मुस्लिम अमेरिकी महापौर (न्यूयॉर्क) ममदानी के विरोध के बावजूद मोहन भागवत सात समंदर पार अमेरिका पहुंचे और 29 अगस्त 2026 को न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में जो संबोधन दिया, वह केवल प्रवासी भारतीयों को संबोधित भाषण नहीं था, बल्कि इसे RSS के शताब्दी-वर्ष में हिंदुत्व की वैश्विक प्रस्तुति और भारत की सांस्कृतिक कूटनीति (वसुधैव कुटुम्बकम) के एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में पढ़ा जा सकता है। जिस प्रकार से मोहन भागवत ने वहां “एक विश्व–एक मानवता”, विविधता में एकता, मानवता और प्रवासी भारतीयों की जिम्मेदारी पर जो जोर दिया, वह यदि अगले 100 सालों में विश्व का सांस्कृतिक नक्शा बदल दे तो आपको हैरत में नहीं पड़ना चाहिए। क्योंकि कहा ही गया है कि अग्रसोचि सदा सुखी। इससे 100 साल पहले के आरएसएस और 100 बाद के आरएसएस की जो झलक उनकी इस यात्रा गत सम्बोधन में मिलती है, वह इस प्रकार है:- पहला, सबसे बड़ा संदेश है हिंदुत्व की वैश्विक री-ब्रांडिंग: भागवत ने अमेरिका में यह रेखांकित किया कि हिंदुत्व मुस्लिम-विरोधी विचार नहीं है और यदि कोई हिंदू यह मानता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए तो वह वास्तविक अर्थ में हिंदू नहीं है। अंतरराष्ट्रीय श्रोता के लिए इसका महत्व बहुत बड़ा है। RSS की पश्चिमी छवि लंबे समय से Hindu nationalism, majoritarianism और minority rights की बहस से जुड़ी रही है। ऐसे में भागवत ने उसी विचारधारा को pluralism, diversity और universal humanity की भाषा में प्रस्तुत करने का प्रयास किया। इसे एक तरह की वैचारिक कूटनीति (ideological diplomacy) कहा जा सकता है। दूसरा, अमेरिका को दिया गया दूसरा संदेश है “भारतीय बनो, लेकिन अमेरिकी भी रहो”: भागवत ने भारतीय-अमेरिकी समुदाय से अपनी karmabhoomi यानी अमेरिका के प्रति निष्ठा और योगदान की बात कही। इसका अर्थ है कि RSS की वैश्विक परियोजना केवल भारत के बाहर बसे हिंदुओं को संगठित करना नहीं, बल्कि उन्हें स्थानीय समाज में प्रभावशाली और जिम्मेदार नागरिक रहते हुए भारतीय सभ्यतागत पहचान से जोड़ना भी है। यह मॉडल भविष्य में अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और अन्य पश्चिमी देशों में भारतीय diaspora की राजनीतिक-सामाजिक शक्ति को बढ़ा सकता है। तीसरा, “भारत की विविधता” को अमेरिका में प्रस्तुत करना—बहुत सोचा-समझा संदेश: अमेरिका स्वयं को pluralistic society मानता है। भागवत ने इसी अमेरिकी संवेदनशीलता से संवाद करते हुए कहा कि America = pluralism and, Bharat = unity in diversity. उन्होंने कहा कि विविधता भारत के DNA में है और उसे स्वीकारना व सम्मानित करना चाहिए। यह महज सांस्कृतिक कथन नहीं है। यह भारत की soft power narrative को अमेरिका के राजनीतिक-सांस्कृतिक विमर्श के अनुरूप ढालने का प्रयास भी है। चौथा, लेकिन अमेरिका ने इसे एकतरफा स्वीकार नहीं किया: यहीं इस यात्रा का दूसरा और अधिक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय पहलू सामने आता है। भागवत के कार्यक्रम से पहले ही New York Mayor Zohran Mamdani ने RSS की विचारधारा को लेकर आपत्ति जताई थी। अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग USCIRF ने तो RSS से जुड़े लोगों पर targeted sanctions और भागवत का visa revoke करने जैसी सिफारिशें तक की थीं। भारत ने इन आरोपों को पक्षपातपूर्ण बताया है। यानी भागवत अमेरिका में जिस “inclusive Hinduism” को प्रस्तुत कर रहे थे, अमेरिकी आलोचकों का एक वर्ग RSS के भारतीय रिकॉर्ड और minority rights को उसके ठीक विपरीत देखता है। इससे उनकी अमेरिकी यात्रा का एक अनपेक्षित परिणाम भी हुआ: वह यह कि RSS अब केवल भारतीय राजनीति का विषय नहीं रहा; वह अमेरिकी public discourse में भी India, religion, democracy और minority rights की बहस का हिस्सा बन गया है। पांचवां, भारत-अमेरिका संबंधों के लिए क्या अर्थ?: सरकार-से-सरकार कूटनीति से अलग एक नया people-to-people / diaspora-to-politics channel मजबूत होता दिख रहा है। अमेरिका में भारतीय मूल की आबादी आर्थिक, तकनीकी और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली है। यदि RSS इस समुदाय में अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक स्वीकार्यता बढ़ाता है तो उसका असर भविष्य मेंअमेरिकी राजनीति में India-related lobbying, भारत की image-building, Hindu-American organisations, भारत-अमेरिका strategic relationship, धार्मिक स्वतंत्रता और minority-rights debates पर पड़ सकता है। छठा, सबसे दिलचस्प बदलाव: “हिंदू राष्ट्र” से “विश्व मानवता” तक: आपके पिछले सवाल से इसे जोड़ें तो सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यही है। भागवत की वैचारिक भाषा में एक trajectory दिखाई देती है: हिंदू संगठन → हिंदू राष्ट्र → सामाजिक समरसता → विश्वगुरु → “One World, One Humanity” न्यूयॉर्क में उन्होंने कहा कि RSS की दृष्टि दुनिया को एक परिवार/एक मानवता के रूप में देखने की है। इसलिए इसे “विश्व विजय” कहना शायद अतिशयोक्ति होगा; लेकिन भारतीय सभ्यतागत विचार को वैश्विक वैचारिक प्रभाव में बदलने की कोशिश कहना अधिक सटीक है। सातवां, और यही सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है: भागवत के अमेरिकी भाषण ने RSS के सामने एक नई कसौटी खड़ी कर दी है: यदि हिंदुत्व वास्तव में विविधता, मानव-एकता और मुसलमानों सहित सभी समुदायों की बराबर जगह को स्वीकार करता है, तो क्या यही सिद्धांत भारत के घरेलू सामाजिक-राजनीतिक व्यवहार में भी उसी स्पष्टता से दिखाई देगा? इसी प्रश्न को लेकर भारत में विपक्ष ने उनके अमेरिकी वक्तव्य पर सवाल उठाए हैं—आलोचकों ने इसे “doublespeak” तक कहा है। मेरे आकलन में अमेरिकी भाषण का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय मायना यही है: RSS पहली बार इतने बड़े वैश्विक मंच पर अपने को केवल Hindu organisation के रूप में नहीं, बल्कि मानवता, विविधता और वैश्विक सामाजिक व्यवस्था के बारे में एक वैकल्पिक सभ्यतागत विचार देने वाली संस्था के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। और यदि यह रणनीति आगे ब्रिटेन, कनाडा और अन्य देशों में भी जारी रहती है, तो RSS की शताब्दी के बाद का दशक भारत के भीतर वैचारिक प्रभाव से आगे बढ़कर वैश्विक वैचारिक प्रभाव की प्रतिस्पर्धा का दशक बन सकता है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर पर भड़की मध्य प्रदेश कांग्रेस कांग्रेस, कहा- कार्रवाई शुद्धिकरण कराने वालों पर होनी चाहिए
कांग्रेस कोटे से पर्यटन मंत्री राजेश कुमार ने साफ शब्दों में कहा है कि अगर TVK ने 2029 में राहुल गांधी के प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी का समर्थन नहीं किया तो कांग्रेस के मंत्री सरकार से बाहर हो सकते हैं।
वित्त वर्ष 27 में भारत की रियल जीडीपी वृद्धि दर 7-7.2 प्रतिशत रहने की उम्मीद
नई दिल्ली, भारत की रियल जीडीपी वृद्धि दर वित्त वर्ष 27 में 7-7.2 प्रतिशत के बीच रहने की उम्मीद है।
RSS Chief in US-Canada: Mohan Bhagwat के दौरे से संघ को फ़ायदा या भारी नुक़सान?
एक तरफ उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शौकत मिर्जियोयेव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ गले मिल रहे थे, भारत के साथ दीर्घकालिक यूरेनियम आपूर्ति का ऐलान हो रहा था और दूसरी तरफ उसी उज्बेकिस्तान की धरती पर चीन के J-10CE लड़ाकू विमान उतर रहे थे। यही है नई दुनिया की राजनीति, जहां मुस्कुराहटों के पीछे हित हैं, समझौतों के पीछे शक्ति है और दोस्ती की असली कीमत रणनीतिक क्षमता से तय होती है। भारत को इस तस्वीर को सिर्फ एक रक्षा सौदे के रूप में देखने की भूल नहीं करनी चाहिए। मध्य एशिया में चीन अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए सिर्फ सड़कें और निवेश नहीं, अब लड़ाकू विमान भी भेज रहा है। हम आपको बता दें कि उज्बेक वायुसेना ने चीन के चेंगदू एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन के J-10CE मल्टीरोल लड़ाकू विमानों की पहली खेप हासिल कर ली है। पाकिस्तान के बाद उज्बेकिस्तान इस चीनी लड़ाकू विमान को संचालित करने वाला दूसरा विदेशी देश बन गया है। रिपोर्टों के अनुसार उज्बेकिस्तान ने 24 J-10CE विमानों का ऑर्डर दिया है और इसमें कम से कम छह विमान देश को मिल चुके हैं। ये विमान उज्बेकिस्तान के 35वें स्वतंत्रता दिवस से ठीक पहले पहुंचे। सवाल उठता है कि चीन आखिर मध्य एशिया के आसमान में अपनी सैन्य मौजूदगी क्यों बढ़ाना चाहता है? इसे भी पढ़ें: Modi-Putin ने दुनिया को दिया बड़ा संदेश, भारत के आसमान को मिलेंगी 5 और S-400 Triumf, जमीन पर Indo-Russian AK-203 Sher Rifles मचाएंगी तहलका उल्लेखनीय है कि J-10CE कोई साधारण विमान नहीं है। चीन इसे अपनी एयरोस्पेस ताकत के प्रतीक के रूप में पेश करता है। ‘विगोरस ड्रैगन’ नाम वाला यह लड़ाकू विमान आधुनिक AESA रडार, इन्फ्रारेड सर्च एंड ट्रैक सिस्टम और उन्नत एवियोनिक्स से लैस है। इसके पास लंबी दूरी की हवा से हवा में मार करने वाली PL-15 मिसाइल है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तानी विमानों द्वारा इस्तेमाल की गई ऐसी मिसाइलों से जुड़े अवशेष पंजाब के खेतों में मिलने की खबरों ने भारतीय सुरक्षा प्रतिष्ठान का ध्यान इस चीनी हथियार प्रणाली की ओर खींचा था। साथ ही चीनी संस्करणों में PL-17 जैसी अत्यंत लंबी दूरी की मिसाइल भी शामिल है, जिसकी घोषित रेंज 400 किलोमीटर से अधिक है। ऐसी मिसाइलों का उद्देश्य लड़ाकू विमानों के पीछे छिपे बड़े रणनीतिक प्लेटफॉर्म जैसे AEW&CS और हवाई ईंधन भरने वाले विमान, आदि को निशाना बनाना होता है। यानी चीन केवल फाइटर जेट नहीं बेच रहा। वह हथियार, सेंसर, प्रशिक्षण, रखरखाव और भविष्य की सैन्य निर्भरता का पूरा पैकेज बेच रहा है। यही चीन की असली रणनीति है। वैसे J-10CE चीन का सबसे आधुनिक लड़ाकू विमान नहीं है। वह भूमिका J-20 जैसे स्टील्थ विमानों की है। लेकिन निर्यात बाजार में J-10CE कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हथियार साबित हो सकता है। एक इंजन वाला यह विमान अपेक्षाकृत कम लागत में आधुनिक रडार, मिसाइल और एवियोनिक्स उपलब्ध कराता है। हालांकि इसकी सीमाएं भी हैं। ट्विन-इंजन विमानों की तुलना में कम रेंज, सिंगल-इंजन सर्वाइवलिटी का जोखिम, रूसी इंजनों पर पुरानी निर्भरता और रडार पर अधिक दृश्यता इसे अत्याधुनिक विमानों की अपेक्षा कमजोर बनाती हैं। लेकिन सस्ता और आधुनिक विकल्प तलाश रहे देशों के लिए ये कमियां ज्यादा मायने नहीं रखतीं। हम आपको बता दें कि पाकिस्तान के पास करीब 20 J-10 विमान हैं, जबकि चीनी वायुसेना के पास 600 से अधिक बताए जाते हैं। अब उज्बेकिस्तान भी इस क्लब में शामिल हो गया है। बांग्लादेश भी इस विमान को हासिल करने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। अगर बांग्लादेश भी J-10CE खरीदता है, तो भारत के आसपास और व्यापक क्षेत्र में चीनी लड़ाकू विमानों की मौजूदगी बढ़ सकती है। इसलिए यह भारत के लिए चिंता की बात भी है। हालांकि रिपोर्टें यह भी कहती हैं कि चीन के रक्षा निर्यात में वैश्विक स्तर पर गिरावट आई है। SIPRI के अनुसार वैश्विक हथियार खरीद बढ़ने के बावजूद चीन की बाजार हिस्सेदारी घटी है। यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप में हथियारों की मांग विस्फोटक रूप से बढ़ी, लेकिन चीन इस बाजार का बड़ा लाभ नहीं उठा पाया। चीन के रक्षा निर्यात का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान पर केंद्रित रहा है। ऐसे में उज्बेकिस्तान का सौदा चीन के लिए व्यापार के साथ-साथ मध्य एशिया में सैन्य दरवाजा खोलने का मौका है। उधर, भारत-उज्बेकिस्तान के संबंधों की बात करें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उज्बेक राष्ट्रपति मिर्जियोयेव ने दीर्घकालिक यूरेनियम आपूर्ति व्यवस्था स्थापित करने की घोषणा की है। देखा जाये तो भारत के लिए यह मामूली समझौता नहीं है। भारत अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता का विस्तार कर रहा है और इसके लिए विश्वसनीय यूरेनियम आपूर्ति बेहद महत्वपूर्ण है। इसलिए उज्बेकिस्तान के साथ यह व्यवस्था सीधे भारत की ऊर्जा सुरक्षा और दीर्घकालिक रणनीतिक स्वायत्तता से जुड़ती है। प्रधानमंत्री मोदी की उज्बेकिस्तान यात्रा के दौरान उन्हें देश के सर्वोच्च राजकीय सम्मान ‘ओली दर्जाली दोस्तलिक’ से भी सम्मानित किया गया। दोनों नेताओं का गर्मजोशी से मिलना और गले लगना भारत-उज्बेकिस्तान संबंधों की बढ़ती निकटता का स्पष्ट संदेश था। लेकिन राष्ट्रहित की राजनीति में भावनाओं के लिए कोई जगह नहीं होती। उज्बेकिस्तान भारत का साझेदार हो सकता है, लेकिन वह चीन से हथियार भी खरीदेगा। क्योंकि ताशकंद अपनी विदेश नीति अपने राष्ट्रीय हित के हिसाब से चलाएगा। भारत भी यही कर रहा है मगर अब और भी ज्यादा आक्रामक तरीके से इसे करना होगा। देखा जाये तो भारत दशकों तक मध्य एशिया के साथ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों की बात करता रहा है। लेकिन अब मुकाबला इतिहास का नहीं, हार्ड पावर का है। चीन निवेश लेकर आता है, इंफ्रास्ट्रक्चर लेकर आता है और अब आधुनिक हथियार लेकर भी पहुंच रहा है। नई दिल्ली को समझना होगा कि केवल दोस्ती, सम्मेलन और सांस्कृतिक रिश्ते पर्याप्त नहीं हैं। जहां चीन फाइटर जेट बेच रहा है, वहां भारत को भी अपनी रक्षा क्षमता लेकर पहुंचना होगा। भारत के पास ब्रह्मोस जैसी मिसाइलें हैं, तेजस जैसे लड़ाकू विमान हैं, आकाश जैसी वायु रक्षा प्रणाली है और तेजी से विकसित होता रक्षा उद्योग है। भारत को मध्य एशिया में रक्षा निर्यात, संयुक्त उत्पादन, सैन्य प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग को अपनी विदेश नीति का केंद्रीय हथियार बनाना होगा। भारत को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि मध्य एशिया पूरी तरह चीनी सैन्य उपकरणों, स्पेयर पार्ट्स और तकनीकी सहायता पर निर्भर न हो जाए। क्योंकि एक बार कोई देश किसी रक्षा प्लेटफॉर्म के इकोसिस्टम में फंसता है तो उसके साथ दशकों की निर्भरता जुड़ जाती है। यही चीन की सबसे खतरनाक रणनीतिक ताकत है। आज विमान बिकता है, कल मिसाइल बिकती है। फिर प्रशिक्षण आता है, रखरखाव आता है, स्पेयर पार्ट्स आते हैं और अंततः सैन्य रिश्तों की ऐसी जंजीर बन जाती है जिसे तोड़ना आसान नहीं होता। देखा जाये तो उज्बेकिस्तान का J-10CE सौदा भारत के खिलाफ कोई सीधा सैन्य मोर्चा नहीं है। लेकिन इसे नजरअंदाज करना रणनीतिक भूल होगी। चीन मध्य एशिया में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है और भारत को इसका जवाब केवल बयानबाजी से नहीं, बल्कि आर्थिक, तकनीकी और सैन्य शक्ति से देना होगा। ताशकंद का यह पूरा घटनाक्रम भारत के सामने नई सच्चाई रखता है। एक तरफ मोदी के साथ यूरेनियम की साझेदारी है। दूसरी तरफ चीन के साथ फाइटर जेट की डील है। यानी मैदान खुला है और मुकाबला जारी है। भारत के लिए संदेश साफ है कि मध्य एशिया में जगह किसी की विरासत से तय नहीं होगी, बल्कि उसकी ताकत से तय होगी। चीन वहां पहुंच चुका है। अब भारत को सिर्फ पहुंचना नहीं है, भारत को अपनी मौजूदगी इतनी मजबूत करनी होगी कि मध्य एशिया की रणनीतिक राजनीति में नई दिल्ली को नजरअंदाज करना किसी भी देश के लिए संभव न रहे। -नीरज कुमार दुबे
Shuddhikaran Row: Rahul Gandhi की गिरफ्तारी से फंसेगी BJP? | Ashutosh का बड़ा दावा
राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर पर बोले राम कृपाल यादव, कहा-परेशान हैं राहुल, भविष्य नहीं दिख रहा
राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर पर बोले राम कृपाल यादव, कहा-परेशान हैं राहुल, भविष्य नहीं दिख रहा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की एससीओ शिखर सम्मेलन में होने वाली मुलाकात से ठीक पहले भारत-रूस रक्षा साझेदारी से जुड़ी दो बड़ी तस्वीरें सामने आई हैं। एक तरफ रूस ने भारत को पांच और एस-400 ट्रायम्फ स्क्वाड्रन देने के लिए 50 हजार करोड़ रुपये से अधिक का प्रस्ताव सौंप दिया है, तो दूसरी तरफ अमेठी के कोरवा में भारतीय सेना के नए ‘शेर’ यानी एके-203 की पूरी तरह स्वदेशी यात्रा निर्णायक पड़ाव पर पहुंच गई है। इस तरह एक ओर मिसाइल कवच भारत के आसमान को अभेद्य बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है और दूसरी तरफ राइफल सीमा पर खड़े सैनिक के हाथ को और मजबूत बना रही है। हम आपको बता दें कि रूस का प्रस्ताव रक्षा मंत्रालय को मिल चुका है और उस पर प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के बाद मार्च 2026 में पांच अतिरिक्त एस-400 स्क्वाड्रन खरीदने को मंजूरी दी थी। इनकी तैनाती पश्चिमी और पूर्वी मोर्चों पर किए जाने की संभावना है, जिससे भारत की लंबी दूरी की वायु रक्षा क्षमता और मजबूत होगी। मौजूदा एस-400 बेड़े के लिए 280 से अधिक अतिरिक्त मिसाइलें भी खरीदी जा रही हैं, ताकि इंटरसेप्टर का पर्याप्त भंडार बना रहे। इसे भी पढ़ें: डोभाल की कूटनीति और भारत-चीन संबंधों की नई करवट हम आपको बता दें कि एस-400 केवल एक मिसाइल प्रणाली नहीं, बल्कि भारत की बहुस्तरीय वायु रक्षा का बेहद महत्वपूर्ण लंबी दूरी वाला हिस्सा है। यह लड़ाकू विमानों, रणनीतिक विमानों, क्रूज मिसाइलों और अन्य हवाई लक्ष्यों को पहचानने, ट्रैक करने और निशाना बनाने में सक्षम है। अलग-अलग इंटरसेप्टर मिसाइलों के कारण यह विभिन्न ऊंचाइयों और दूरियों पर खतरे से निपट सकता है। इसकी कुछ मिसाइलें लगभग 400 किलोमीटर तक के लक्ष्य को निशाना बना सकती हैं। कई लक्ष्यों को एक साथ ट्रैक और एंगेज करने की क्षमता इसे एयरबेस, कमांड सेंटर और अन्य महत्वपूर्ण सैन्य प्रतिष्ठानों की सुरक्षा के लिए खास बनाती है। हम आपको याद दिला दें कि भारत ने 2018 में पांच एस-400 स्क्वाड्रन का मूल समझौता किया था। इनमें चार की डिलीवरी हो चुकी है, जबकि पांचवें और अंतिम स्क्वाड्रन के नवंबर 2026 तक आने की उम्मीद है। नए पांच स्क्वाड्रन की डिलीवरी समझौते पर हस्ताक्षर के करीब तीन साल बाद शुरू होने की संभावना है। इस तरह भारत अब सिर्फ तात्कालिक जरूरत ही पूरी नहीं कर रहा, बल्कि आने वाले वर्षों के लिए देश की एयर-डिफेंस छतरी का दायरा भी बढ़ा रहा है। लेकिन आसमान की सुरक्षा के साथ जमीन पर सैनिक के हाथ में मौजूद हथियार भी उतना ही निर्णायक है। यहीं अमेठी का एके-203 ‘शेर’ कहानी का दूसरा और ज्यादा आत्मनिर्भर चेहरा सामने लाता है। कोरवा स्थित इंडो-रशियन राइफल्स प्राइवेट लिमिटेड में बन रही एके-203 पूरी तरह भारतीय कलपुर्जों और सामग्री से बनी है। हालांकि यह रूसी डिजाइन को भारतीय क्षमता में बदलने की करीब एक दशक लंबी यात्रा है। इस परियोजना के लिए रूस से लगभग 90 हजार पन्नों का तकनीकी दस्तावेज मिला था। कोविड महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण तकनीक का हस्तांतरण प्रभावित हुआ और अंतिम टेक्नोलॉजी पैकेज 2024 में मिला। अगस्त 2023 में कोरवा में बनी पहली राइफल में भारतीय सामग्री की हिस्सेदारी करीब 5 प्रतिशत थी, दिसंबर 2024 में यह 15 प्रतिशत हुई और अगस्त 2026 तक सभी 50 प्रमुख तथा लगभग 180 छोटे कलपुर्जे भारत में बनने लगे। इस स्वदेशीकरण की असली चुनौती सिर्फ असेंबली नहीं थी। विशेष स्टील मिश्रधातुओं, स्प्रिंग, इंजीनियरिंग प्लास्टिक, कंपोजिट, कोटिंग और सटीक रासायनिक संरचना वाली धातुओं को भारतीय स्तर पर विकसित करना पड़ा। इसके लिए एडवांस्ड वेपन्स एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड और अडानी डिफेंस सिस्टम्स एंड टेक्नोलॉजीज समेत भारतीय औद्योगिक साझेदारों ने सप्लायर नेटवर्क तैयार किया। टीमों ने देशभर में करीब 76 सब-वेंडरों का निरीक्षण किया, जिनमें लगभग आधे उत्तर प्रदेश, खासकर कानपुर और लखनऊ क्षेत्र में हैं। अब कोरवा में करीब 76 तरह के परीक्षण करने वाली अपनी प्रयोगशाला है। हर राइफल को स्वीकार किए जाने से पहले करीब 70 राउंड फायर किए जाते हैं, जिनमें दो हाई-प्रेशर राउंड सामान्य से करीब 50 प्रतिशत अधिक दबाव पैदा करते हैं। पहली पूरी तरह भारतीय एके-203 ने लगातार 3,000 राउंड की फायरिंग परीक्षा भी सफलतापूर्वक पूरी की। साथ ही सेना के परीक्षण के लिए 100 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री वाली 10 राइफलें तैयार की जा रही हैं। बताया जा रहा है कि अब तक करीब 70 हजार राइफलें सेना को दी जा चुकी हैं। अप्रैल 2027 से उत्पादन क्षमता एक राइफल हर 100 सेकंड तक पहुंचाने का लक्ष्य है। कंपनी को 1.5 लाख से अधिक राइफलों की संभावित मांग के संकेत मिल चुके हैं और आगे निर्यात तथा कलाश्निकोव श्रेणी के अन्य हथियारों की दिशा में भी संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। बहरहाल, रणनीतिक संदेश साफ है कि भारत अब केवल हथियार खरीदने वाला देश नहीं रहना चाहता, बल्कि तकनीक को आत्मसात कर अपनी रक्षा औद्योगिक क्षमता खड़ी कर रहा है। एस-400 भारत की दूर से आने वाले हवाई खतरे को रोकने की क्षमता बढ़ाता है, जबकि पूरी तरह स्वदेशी एके-203 युद्ध के सबसे बुनियादी स्तर पर सैनिक की आत्मनिर्भरता मजबूत करता है। यही संयोजन भारत की बदलती सैन्य शक्ति की असली तस्वीर है। यानि आसमान में मजबूत सुरक्षा कवच और जमीन पर भारतीय हाथों से बना ‘शेर’।
3 लैंडफिल साइटों से 2.16 करोड़ टन कचरा साफ, 100 एकड़ जमीन मुक्त: सीएम रेखा गुप्ता
3 लैंडफिल साइटों से 2.16 करोड़ टन कचरा साफ, 100 एकड़ जमीन मुक्त: सीएम रेखा गुप्ता
'वेलिगोंडा प्रोजेक्ट का विजन और विकास वाईएसआर का था', वाईएसआरसीपी का सीएम नायडू पर हमला
'वेलिगोंडा प्रोजेक्ट का विजन और विकास वाईएसआर का था', वाईएसआरसीपी का सीएम नायडू पर हमला
'2028 में कांग्रेस की सरकार बनी तो खत्म कर देंगे यूसीसी', मध्य प्रदेश में विपक्ष के नेता उमंग सिंघार
'2028 में कांग्रेस की सरकार बनी तो खत्म कर देंगे यूसीसी', मध्य प्रदेश में विपक्ष के नेता उमंग सिंघार
‘शुद्धिकरण’ विवाद पर प्रकाश आंबेडकर का राहुल गांधी पर निशाना, पूछा- ‘एक्शन’ कब होगा?
‘शुद्धिकरण’ विवाद पर प्रकाश आंबेडकर का राहुल गांधी पर निशाना, पूछा- ‘एक्शन’ कब होगा?
तमिलनाडु में जल्द सस्ता मिलेगा प्याज
चेन्नई, खुदरा कीमतों में वृद्धि के कारण राज्य भर में आम लोगों के बजट पर दबाव पड़ने के बाद, तमिलनाडु का सहकारी क्षेत्र राशन की दुकानों के माध्यम से रियायती कीमतों पर प्याज बेचने की तैयारी कर रहा है।
अखिलेश यादव का बड़ा एलान, भाजपा राज में बंद 26 हजार स्कूलों को फिर खोलेगी सपा सरकार
अखिलेश यादव ने ऐलान किया कि सपा सरकार बनने पर भाजपा शासन में बंद किए गए करीब 26 हजार स्कूलों को फिर खोला जाएगा। उन्होंने रोजगार, भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था को लेकर भाजपा पर निशाना साधा।
'बहुत ही सुखद', सीएम सुवेंदु अधिकारी ने 'मन की बात' में उत्तम कुमार का जिक्र करने के लिए पीएम मोदी का किया धन्यवाद
वीसीके ने तमिलनाडु सरकार के पॉलिसी नोट से पेरियार और अंबेडकर का नाम हटाए जाने पर उठाए सवाल
वीसीके ने तमिलनाडु सरकार के पॉलिसी नोट से पेरियार और अंबेडकर का नाम हटाए जाने पर उठाए सवाल
लखनऊ में राजनाथ सिंह बोले, अंतरराष्ट्रीय मंच पर अब भारत की बात पूरी दुनिया कान खोलकर सुनती है
लखनऊ में राजनाथ सिंह बोले, अंतरराष्ट्रीय मंच पर अब भारत की बात पूरी दुनिया कान खोलकर सुनती है
मोहन भागवत के 'हिंदू-मुस्लिम' वाले बयान का भाजपा नेताओं ने किया समर्थन, कहा- यही भारत की असली पहचान
मोहन भागवत के 'हिंदू-मुस्लिम' वाले बयान का भाजपा नेताओं ने किया समर्थन, कहा- यही भारत की असली पहचान
सीएम योगी बोले- लखनऊ छावनी बनेगी ‘मॉडल छावनी', राजधानी में विरासत के साथ आधुनिकता का संगम
सीएम योगी बोले- लखनऊ छावनी बनेगी ‘मॉडल छावनी', राजधानी में विरासत के साथ आधुनिकता का संगम
मन की बात: पीएम मोदी ने एवोकाडो की खेती का किया जिक्र, कहा - 'इनोवेटिव किसानों ने कमाई की ढूंढ ली नई रेसिपी'
भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने गुणवत्ता मानकों का उल्लंघन पाए जाने पर एवरेस्ट फ़ूड प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड की सभी वैरिएंट वाली कंपाउंडेड हींग की बिक्री पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगा दिया है। यह कार्रवाई खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 के तहत जारी निषेध आदेश के माध्यम से की गई है। एफएसएसएआई ने इसी मामले में मेसर्स लालजी गोधू एंड कंपनी के खिलाफ भी कार्रवाई करते हुए उसकी कंपाउंडेड हींग के निर्माण और बिक्री पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है।
राहुल गांधी राजनीतिक फायदे के लिए जातीय उन्माद फैलाने की कोशिश कर रहे: सुबोध उनियाल
राहुल गांधी राजनीतिक फायदे के लिए जातीय उन्माद फैलाने की कोशिश कर रहे: सुबोध उनियाल
बंगाल: एंटाली पुलिस स्टेशन पर विरोध प्रदर्शन के लिए भाजपा ने सुदीप राम को निलंबित किया
बंगाल: एंटाली पुलिस स्टेशन पर विरोध प्रदर्शन के लिए भाजपा ने सुदीप राम को निलंबित किया
भागवत की न्यूयॉर्क यात्रा: आर्थिक निवेश, सांस्कृतिक कूटनीति और वैश्विक संघ नेटवर्क का विस्तार
आरएसएस प्रमुख डॉ. मोहन भागवत की न्यूयॉर्क यात्रा समकालीन वैश्विक परिदृश्य, भारत-अमेरिका संबंधों के रणनीतिक भविष्य और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सांस्कृतिक कूटनीति की बदलती दिशा के दृष्टिकोण से एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी घटनाक्रम है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर आयोजित इस वैश्विक संपर्क कार्यक्रम का उद्देश्य केवल प्रवासी भारतीयों से संवाद करना मात्र नहीं है, बल्कि यह उभरती हुई वैश्विक व्यवस्था में भारत की वैचारिक, दार्शनिक और आर्थिक ताकत को एक साथ रेखांकित करने का एक सुनियोजित प्रयास है। अगस्त 2026 में हो रही इस उच्च-स्तरीय यात्रा के बहुआयामी प्रभाव हैं, जो पारंपरिक कूटनीति के दायरों से बहुत आगे निकल जाते हैं। इस दौरे के प्रभाव को मुख्य रूप से तीन बड़े स्तंभों के माध्यम से समझा जा सकता है, जिसमें पहला अमेरिकी कॉर्पोरेट जगत के दिग्गजों और उद्यम पूंजीपतियों के साथ भविष्य की तकनीकों पर हुआ गंभीर आर्थिक विमर्श है, दूसरा वैश्विक स्तर पर प्रसिद्ध मैडिसन स्क्वायर गार्डन में भारतीय प्रवासियों का ऐतिहासिक सांस्कृतिक समागम है, और तीसरा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस यात्रा को लेकर पैदा हुए वैचारिक अंतर्विरोध और तीखे राजनीतिक विरोध प्रदर्शन हैं। इन सभी पहलुओं का एक साथ मिलकर विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि आधुनिक भारत के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने वाला यह संगठन अब वैश्विक स्तर पर देश की छवि, नीतियों और अंतरराष्ट्रीय विमर्श को प्रभावित करने के लिए किस प्रकार अपनी रणनीतियों का विस्तार कर रहा है। इस पूरी यात्रा का सबसे पहला और आर्थिक रूप से अत्यंत व्यावहारिक पड़ाव न्यूयॉर्क में वैश्विक कॉर्पोरेट जगत के शीर्ष अधिकारियों, नीति-निर्माताओं और उद्यम पूंजीपतियों के साथ आयोजित एक विशेष गोलमेज बैठक थी । इस संवाद के दौरान पारंपरिक द्विपक्षीय व्यापार के स्थापित ढांचों से आगे बढ़कर पूरी तरह से भविष्य की उन्नत प्रौद्योगिकियों यानी डीप-टेक पर ध्यान केंद्रित किया गया। इस उच्च-स्तरीय बैठक में दूरसंचार क्षेत्र के आधुनिकीकरण, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में निजी निवेश की संभावनाओं, स्वच्छ ऊर्जा के वैश्विक लक्ष्यों और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसी अत्याधुनिक विधाओं में भारत-अमेरिका के बीच सहयोग पर गहराई से विमर्श हुआ। डॉ. मोहन भागवत ने वैश्विक निवेशकों के सामने भारत को एक विश्वसनीय, लोकतांत्रिक, कानून सम्मत और विकासोन्मुख वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में मजबूती से प्रस्तुत किया। इस चर्चा के दौरान अमेरिकी निवेशकों ने भारत के विशाल बाजार और उसकी बढ़ती आर्थिक क्षमता की सराहना तो की, लेकिन साथ ही उन्होंने राज्य स्तर पर आने वाली प्रशासनिक और विनियामक बाधाओं पर अपनी व्यावहारिक चिंताएं भी साझा कीं। निवेशकों का मुख्य तर्क यह था कि यदि भारत को चीन के एक मजबूत और सुरक्षित विकल्प के रूप में वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के केंद्र में आना है, तो भूमि अधिग्रहण, जटिल कर संरचनाओं और स्थानीय स्तर पर फैक्ट्रियां स्थापित करने से जुड़ी प्रक्रियाओं को और अधिक सरल व पारदर्शी बनाना होगा, ताकि प्रशासनिक देरी के बिना निवेश धरातल पर उतर सके। इसी बैठक में सिलिकॉन वैली की जानी-मानी निवेश भागीदार आशा जडेजा मोटवानी जैसी हस्तियों ने भागवत के इस विचार का पुरजोर समर्थन किया कि भारत की युवा जनसांख्यिकी आज दुनिया की सबसे बड़ी ताकत है, और भारतीय युवा न केवल अपने देश के विकास के इंजन हैं बल्कि वे पूरी दुनिया में सकारात्मक और तकनीकी बदलावों के सबसे बड़े संवाहक बनकर उभर रहे हैं । इसे भी पढ़ें: USCIRF बनाम RSS: आरोप, अधिकार-सीमा और भारत-अमेरिका संबंधों की अग्निपरीक्षा इस तीन दिवसीय दौरे का दूसरा और दृश्य रूप से सबसे भव्य पहलू न्यूयॉर्क के ऐतिहासिक और दुनिया भर में प्रसिद्ध मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित होने वाला 'यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन' है । रक्षाबंधन के पावन सांस्कृतिक अवसर पर आयोजित होने वाले इस विशाल समागम में पूरे अमेरिका महाद्वीप से 5,000 से अधिक विशिष्ट भारतीय प्रवासियों और सैकड़ों सांस्कृतिक, दार्शनिक व आध्यात्मिक संगठनों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति सुनिश्चित की गई । इस भव्य आयोजन के पीछे बहुत गहरे भू-राजनीतिक और सामाजिक निहितार्थ छिपे हुए हैं, क्योंकि इस पूरे उत्सव का मूल दर्शन भारतीय संस्कृति के कालजयी विचार 'वसुधैव कुटुंबकम' यानी पूरी दुनिया एक परिवार है, के सार्वभौमिक सिद्धांत पर आधारित है। ऐसे दौर में जब पूरा विश्व भू-राजनीतिक संघर्षों, युद्धों, वैचारिक ध्रुवीकरण और गंभीर जलवायु संकटों से जूझ रहा है, मैडिसन स्क्वायर गार्डन जैसे अत्यधिक प्रभावशाली पश्चिमी मंच से सर्वसमावेशी, बहुसांस्कृतिक और अंतरधार्मिक एकता का संदेश देना भारत की उस 'विश्व-मित्र' वाली छवि को वैश्विक जनमानस में स्थापित करता है जो सभी के कल्याण की कामना करती है। यह आयोजन अमेरिकी समाज, वहां की अर्थव्यवस्था, विज्ञान और राजनीति में शीर्ष पदों पर आसीन भारतीय प्रवासियों की एकजुटता और उनकी जनसांख्यिकीय व आर्थिक शक्ति का भी एक बहुत बड़ा प्रदर्शन है , जिसकी उपेक्षा कोई भी अमेरिकी सरकार या नीति-निर्माता नहीं कर सकता। इसके अतिरिक्त, इस कार्यक्रम के माध्यम से संघ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने खिलाफ बने पुराने नैरेटिव को तोड़ने और पश्चिमी दुनिया के सामने खुद को एक वैश्विक, समावेशी और परोपकारी दार्शनिक आंदोलन के रूप में पेश करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठा रहा है। इस ऐतिहासिक यात्रा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी आयाम प्रवासी भारतीयों के बीच संघ की अंतरराष्ट्रीय शाखाओं, विशेष रूप से हिंदू स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों पर पड़ने वाला प्रभाव है। डॉ. भागवत की इस उपस्थिति ने अमेरिका, कनाडा और यूरोपीय देशों में सक्रिय एचएसएस के नेटवर्क को एक नई ऊर्जा और दिशा प्रदान की है। भारत से बाहर रहने वाले हिंदुओं को अपनी संस्कृति, जड़ों और मूल्यों से जोड़े रखने में हिंदू स्वयंसेवक संघ दशकों से मूक भाव से काम कर रहा है, लेकिन इस स्तर के शीर्ष नेतृत्व के प्रवास ने इन गतिविधियों को मुख्यधारा की वैश्विक चर्चा में ला खड़ा किया है। इस यात्रा के बाद विदेशों में चल रही संघ की साप्ताहिक और मासिक 'बालगोकुलम' जैसी गतिविधियों में तेजी आने की संभावना है, जहां प्रवासी परिवारों की नई पीढ़ी को भारतीय दर्शन, योग और नेतृत्व क्षमता के संस्कार दिए जाते हैं। एचएसएस के माध्यम से प्रवासी भारतीय केवल सांस्कृतिक रूप से ही संगठित नहीं हो रहे हैं, बल्कि वे अमेरिकी समाज में परोपकार, आपदा प्रबंधन और स्थानीय सामुदायिक सेवा के कार्यों में भी अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं। संघ प्रमुख ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि विदेशों में रहने वाले स्वयंसेवकों का यह दायित्व है कि वे अपनी कर्मभूमि (अमेरिका) के प्रति पूरी तरह वफादार और अनुशासित रहते हुए अपनी मातृभूमि (भारत) के सांस्कृतिक गौरव को अक्षुण्ण रखें। यह रणनीतिक मार्गदर्शन आने वाले समय में पश्चिमी देशों में भारतीय प्रवासियों को एक ऐसे सुदृढ़ सामाजिक समूह के रूप में स्थापित करेगा, जो वैश्विक स्तर पर भारत विरोधी दुष्प्रचार का मुकाबला करने और भारत के पक्ष में एक सकारात्मक जनमत तैयार करने में अधिक सक्षम होगा। सकारात्मक आर्थिक संवाद और सांस्कृतिक महाकुंभ के समानांतर, इस यात्रा का वह अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक विवाद और विरोध प्रदर्शन भी एक अनिवार्य पहलू है जिसने न्यूयॉर्क की राजनीति को गरमाए रखा । डॉ. भागवत की इस हाई-प्रोफाइल उपस्थिति का अमेरिकी मानवाधिकार लॉबी, कुछ नागरिक अधिकार संगठनों और स्थानीय राजनेताओं द्वारा तीखा विरोध किया गया है । उदाहरण के तौर पर, न्यू यॉर्क शहर के पहले भारतीय-अमेरिकी मेयर ज़ोहरान ममदानी ने सार्वजनिक रूप से इस आयोजन और संघ की विचारधारा पर अपनी गहरी वैचारिक असहमति व्यक्त की , हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह एक निजी संस्था द्वारा आयोजित कार्यक्रम है, इसलिए नगर प्रशासन के पास इसे रोकने का कोई विधिक आधार नहीं है । इसके साथ ही 'हिंदूस फॉर ' और 'इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल' जैसे कई मुखर संगठनों ने न्यू यॉर्क सिटी हॉल के बाहर और डिजिटल मंचों पर व्यापक विरोध अभियान चलाए , जिनका यह आरोप था कि संघ का मूल वैचारिक दर्शन भारत के बहुलवादी ढांचे को प्रभावित करता है, और इस तरह के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित मंचों पर संघ प्रमुख को स्थान मिलने से संगठन को वह वैश्विक वैधता और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है जिसके वे विरोधी हैं । इस पूरे विवाद को तब और राजनीतिक हवा मिली जब 'अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर अमेरिकी आयोग' की पुरानी आलोचनात्मक रिपोर्टों का हवाला देकर विरोधी समूहों ने वीज़ा और सुरक्षा संबंधी मुद्दों पर अमेरिकी प्रशासन पर दबाव बनाने का प्रयास किया , जिसे भारत के विदेश मंत्रालय ने हमेशा की तरह पूरी तरह से पूर्वाग्रह से ग्रसित और पक्षपातपूर्ण मानकर खारिज कर दिया। इन तीखे विरोधों, तकनीकी चुनौतियों और सुरक्षा चिंताओं के बावजूद, इस यात्रा की निर्बाध निरंतरता और इसे मिल रहा भारी समर्थन यह अकाट्य रूप से सिद्ध करता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज वैश्विक विमर्श और अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीति के केंद्र में एक ऐसी अपरिहार्य शक्ति बन चुका है, जिसे अब वैश्विक मंचों पर नजरअंदाज कर पाना संभव नहीं है । भागवत की यह न्यूयॉर्क यात्रा केवल एक पारंपरिक प्रवास नहीं है, बल्कि यह भविष्य के भारत-अमेरिका संबंधों के इतिहास में एक नया वैचारिक और रणनीतिक अध्याय जोड़ने वाली घटना है। जहाँ एक तरफ इस यात्रा ने अमेरिकी कॉर्पोरेट जगत के साथ सीधा संवाद स्थापित करके भारत में भविष्य की उन्नत तकनीकों और सुरक्षित निवेश के लिए विश्वास का एक नया माहौल तैयार किया है, वहीं दूसरी तरफ मैडिसन स्क्वायर गार्डन के मंच से 'वसुधैव कुटुंबकम' के दर्शन की गूंज ने भारत की सांस्कृतिक कूटनीति को वैश्विक मंच पर एक नई ऊंचाई प्रदान की है। विरोध और समर्थन के इन वैश्विक अंतर्विरोधों के बीच, यह दौरा स्पष्ट रूप से दिखाता है कि आधुनिक भारत की वैश्विक आकांक्षाओं को पूरा करने और दुनिया के सामने भारत का सकारात्मक पक्ष रखने में अब देश के प्रमुख सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन भी राजनयिक चैनलों के समानांतर एक बेहद प्रभावशाली और महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, जिसके दूरगामी आर्थिक और सामाजिक परिणाम आने वाले समय में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होंगे। अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार
डोभाल की कूटनीति और भारत-चीन संबंधों की नई करवट
भारत और चीन के संबंधों में पिछले कुछ वर्षों की तल्खी के बाद अब संवाद, संयम और व्यावहारिक सहयोग का एक नया दौर दिखाई दे रहा है। इसे किसी अचानक आए परिवर्तन के रूप में नहीं, बल्कि सुरक्षा, कूटनीति और राष्ट्रीय हितों को साथ लेकर चलने वाली एक दीर्घकालिक प्रक्रिया के रूप में देखना चाहिए। इस बदलते परिदृश्य में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण बनकर सामने आई है। 25 अगस्त को बीजिंग में चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ हुई 25वें दौर की विशेष प्रतिनिधि वार्ता ने इस प्रक्रिया को ठोस आधार दिया है। दोनों पक्षों ने सीमा पर शांति बनाए रखने, सीमा निर्धारण की दिशा में शीघ्र एवं सार्थक प्रगति करने तथा सैन्य-द्विपक्षीय संपर्क व्यवस्था को मजबूत करने पर सहमति बनाई है। डोभाल की बीजिंग यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह केवल सीमा विवाद पर बातचीत नहीं थी। यह उस व्यापक प्रश्न पर विमर्श था कि क्या भारत और चीन प्रतिस्पर्धा के बावजूद सह-अस्तित्व, स्थिरता और पारस्परिक हितों का रास्ता तलाश सकते हैं। दोनों देशों ने दो अतिरिक्त सैन्य संपर्क-बिंदु और पूर्वी तथा मध्य क्षेत्रों में दो अतिरिक्त सैन्य दूरभाष संपर्क स्थापित करने पर सहमति जताई है। सीमा व्यापार, कैलाश-मानसरोवर यात्रा और सीमा-पार सहयोग को भी आगे बढ़ाने का निर्णय हुआ है। अजीत डोभाल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे सुरक्षा और कूटनीति को परस्पर विरोधी नहीं मानते। उनका दृष्टिकोण स्पष्ट है-मजबूत सुरक्षा-व्यवस्था ही प्रभावी कूटनीति की आधारभूमि बन सकती है। चीन के संदर्भ में भी भारत का संदेश यही रहा है कि सीमा पर शांति और स्थिरता के बिना द्विपक्षीय संबंधों का पूर्ण सामान्यीकरण संभव नहीं है। 25वें दौर की वार्ता में यही भारतीय दृष्टिकोण प्रमुखता से सामने आया। डोभाल का व्यक्तित्व केवल वार्ताकार का नहीं, बल्कि सुरक्षा रणनीतिकार का है। वे लंबे समय तक खुफिया तंत्र में रहे, विभिन्न संवेदनशील क्षेत्रों में काम किया और बाद में खुफिया ब्यूरो के प्रमुख बने। भारत सरकार के अनुसार, उन्होंने पूर्वोत्तर, सिक्किम, जम्मू-कश्मीर, पंजाब और पाकिस्तान से जुड़े सुरक्षा मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे देश के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं। उनकी कार्यशैली में एक उल्लेखनीय संतुलन दिखाई देता है-जहां आवश्यक हो वहां कठोरता और जहां अवसर हो वहां संवाद। उड़ी के बाद की सर्जिकल कार्रवाई, बालाकोट की कार्रवाई, डोकलाम संकट के दौरान कूटनीतिक प्रयास और आंतरिक सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने में उनकी भूमिका इसी व्यापक दृष्टिकोण के उदाहरण माने जाते हैं। 2026 में उन्हें लोकमान्य तिलक राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने में उनके योगदान को विशेष रूप से रेखांकित किया। इसे भी पढ़ें: जयशंकर और डोभाल की रूस-चीन यात्रा के कूटनीतिक संदेश को ऐसे समझिए भारत-चीन संबंधों का सबसे कठिन दौर वर्ष 2020 में गलवान घाटी की हिंसक झड़प के बाद आया। चार वर्षों तक सीमा पर सैन्य तनाव बना रहा। अक्टूबर 2024 में दोनों देशों के बीच सैनिकों की पूर्ण वापसी और संबंधित विवादों के समाधान के बाद संबंधों को धीरे-धीरे पटरी पर लाने की प्रक्रिया शुरू हुई। उसी वर्ष कजान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात में दोनों नेताओं ने सीमा पर शांति तथा मतभेदों को संबंधों की समग्र दिशा को प्रभावित न करने देने पर जोर दिया था। यही वह बिंदु था जहां डोभाल की भूमिका और महत्वपूर्ण हो गई। दिसंबर 2024 में विशेष प्रतिनिधि स्तर की बातचीत से शुरू हुई प्रक्रिया अब 25वें दौर तक पहुंची है। इस बार आठ बिंदुओं पर बनी सहमति संकेत देती है कि बातचीत केवल औपचारिकता नहीं रह गई है। सीमा निर्धारण और सीमा प्रबंधन के लिए विशेषज्ञ तथा कार्य समूहों को सक्रिय करना, वास्तविक नियंत्रण रेखा पर गलतफहमी रोकने के लिए मौजूदा सैन्य एवं कूटनीतिक माध्यमों का उपयोग और नए संपर्क तंत्र बनाना व्यावहारिक विश्वास निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। भारत-चीन संबंध केवल सैनिक चौकियों और राजनयिक बैठकों तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच सभ्यतागत संपर्क भी रहा है। कैलाश-मानसरोवर यात्रा की पुनर्बहाली और विस्तार, सीमा व्यापार मार्गों को फिर खोलना तथा लोगों के बीच संपर्क बढ़ाना इसी व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा है। 2026 में कैलाश-मानसरोवर यात्रा लिपुलेख और नाथू ला, दोनों मार्गों से संचालित हुई है। 25वें दौर की वार्ता में तीन निर्धारित सीमा व्यापार केंद्रों को फिर खोलने की प्रगति का स्वागत किया गया तथा व्यापार और तीर्थयात्रा को और मजबूत करने पर सहमति बनी। यह छोटा कदम नहीं है। सीमा पर सैनिकों की संख्या घटाना एक सुरक्षा उपाय है, लेकिन सीमा के दोनों ओर रहने वाले लोगों के लिए व्यापार और सांस्कृतिक संपर्क बढ़ाना दीर्घकालिक शांति की सामाजिक नींव तैयार करता है। शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा एक अवसर भी है, परीक्षा भी है। इसी पृष्ठभूमि में 12-13 सितंबर, 2026 को नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन पर पूरी दुनिया की नजर है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा की संभावना जताई जा रही है। यदि यह यात्रा होती है तो यह सात वर्षों में उनकी पहली भारत यात्रा होगी। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार उनके साथ लगभग चार सौ अधिकारियों का बड़ा प्रतिनिधिमंडल भी आ सकता है। हालांकि 27 अगस्त तक चीन की ओर से उनकी यात्रा की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए शी की संभावित यात्रा को केवल एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भागीदारी नहीं माना जाना चाहिए। यह भारत-चीन संबंधों की वास्तविक दिशा को परखने का अवसर हो सकती है। वर्ष 2019 का चेन्नई संवाद अपेक्षाकृत सौहार्दपूर्ण वातावरण में हुआ था, लेकिन उसके एक वर्ष बाद गलवान ने संबंधों को गहरे संकट में डाल दिया। अब यदि शी नई दिल्ली आते हैं तो दोनों देशों के पास उस टूटे हुए विश्वास को सावधानी से जोड़ने का अवसर होगा। लेकिन भारत को उत्साह में अपनी मूल सुरक्षा चिंताओं को पीछे नहीं छोड़ना चाहिए। अरुणाचल प्रदेश पर चीन के दावे, सीमा निर्धारण का लंबित प्रश्न और वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पारदर्शिता जैसी चुनौतियां अभी समाप्त नहीं हुई हैं। इसलिए भारत की नीति मित्रता की आकांक्षा, लेकिन राष्ट्रीय हितों पर कोई समझौता नहीं होनी चाहिए। डोभाल की विशेषता यही है कि वे संवाद को कमजोरी नहीं बनने देते और शक्ति को टकराव का पर्याय भी नहीं बनाते। उनकी कूटनीति में संदेश स्पष्ट है-भारत शांति चाहता है, लेकिन अपनी सुरक्षा कीमत पर नहीं, सहयोग चाहता है, लेकिन समानता के आधार परय संबंध सुधारना चाहता है, लेकिन सीमा की वास्तविकताओं को भुलाकर नहीं। आज भारत-चीन संबंध जिस मोड़ पर खड़े हैं, वहां डोभाल की भूमिका संकटमोचक से आगे बढ़कर विश्वास-निर्माता और सुरक्षा-आधारित कूटनीति के सूत्रधार की बनती दिखाई देती है। 25वें दौर की वार्ता में हुई आठ सूत्रीय सहमति इसका प्रमाण है कि कठिनतम मतभेदों के बीच भी संवाद के रास्ते खुले रखे जा सकते हैं। शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा इस प्रक्रिया को शीर्ष नेतृत्व की राजनीतिक दिशा दे सकती है। किंतु असली सफलता किसी एक शिखर बैठक की तस्वीर में नहीं, बल्कि सीमा पर स्थायी शांति, पारस्परिक विश्वास, व्यापारिक संपर्क और विवादों के न्यायसंगत समाधान में होगी। भारत को चीन से संबंध सुधारने हैं, लेकिन अपनी सामरिक स्वायत्तता और सुरक्षा-सजगता के साथ। डोभाल की कूटनीति का सार भी यही है-संवाद के दरवाजे खुले रहें, पर राष्ट्रीय हितों की चौखट कभी कमजोर न हो। यही दृष्टिकोण भारत-चीन संबंधों को टकराव से प्रतिस्पर्धी सह-अस्तित्व और अंततः स्थायी शांति की ओर ले जाने की सबसे व्यावहारिक राह बन सकता है। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
संकट में Nepal के काम India ही आया, Kathmandu को China की 'दोस्ती' का सच आखिरकार समझ आया
नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ ने सिर्फ सैकड़ों जिंदगियां नहीं लील लीं, बल्कि हिमालयी क्षेत्र की राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा और पड़ोसी देशों के रिश्तों का एक बेहद महत्वपूर्ण आईना भी सामने रख दिया है। बुधवार को नेपाल-तिब्बत सीमा के आसपास ग्लेशियर के ढहने और उसके बाद मलबे के साथ आए भयावह जलप्रवाह ने रसुवा, नुवाकोट और आसपास के इलाकों में भारी तबाही मचाई। सड़कें, पुल, मकान और जलविद्युत परियोजनाएं बह गईं। इस आपदा ने नेपाल की बिजली व्यवस्था को भी ऐसा झटका दिया कि अब वही नेपाल, जो मानसून में भारत को बिजली बेचता है, जरूरत पड़ने पर भारत से बिजली मांग सकता है। यही इस त्रासदी का सबसे बड़ा विडंबनापूर्ण पहलू है। नेपाल की करीब 4,300 मेगावाट की स्थापित बिजली क्षमता में 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी जलविद्युत की है। बाढ़ ने करीब 13 जलविद्युत संयंत्रों और एक सौर परियोजना को प्रभावित किया और लगभग 360 मेगावाट उत्पादन क्षमता पर असर पड़ा। भारत को बिजली देने वाला 14 मेगावाट का देविघाट संयंत्र भी इसकी चपेट में आया। 26 अगस्त को बाढ़ के दिन भारत नेपाल से एक समय में 963.4 मेगावाट तक बिजली ले रहा था, लेकिन अगले ही दिन बिजली आपूर्ति लगभग आधी रह गई। इसे भी पढ़ें: Nepal Flood में 600 से ज्यादा मौतें, जीवित बचे लोगों ने सुनाई आपदा से जंग की दास्तान और अब तस्वीर उलट सकती है। आमतौर पर गर्मियों में भारत नेपाल से बिजली खरीदता है और सर्दियों में, जब नेपाल की जलविद्युत उत्पादन क्षमता घटती है, भारत नेपाल को बिजली देता है। लेकिन इस बार आपदा ने परिस्थितियां ऐसी बना दी हैं कि मानसून के इसी मौसम में भारत को नेपाल की मदद के लिए बिजली निर्यात करनी पड़ सकती है। दोनों देशों के बीच पहले से ही 1,000 मेगावाट की आयात-निर्यात क्षमता है, जिसे बढ़ाकर 1,400 मेगावाट से अधिक करने पर सहमति भी बन चुकी है। लेकिन बिजली से बड़ी कहानी भरोसे की है। आपदा तिब्बत से लगे इलाके में शुरू हुई। उपलब्ध वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार इसका संबंध ग्लेशियर के ढहने और भारी मलबे के नदी में आने से है। चीन ने यह आपदा पैदा की या नहीं, इसका जवाब तो वैज्ञानिक ही देंगे लेकिन आम लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि हिमालय के इस संवेदनशील भूभाग में सीमा के दोनों ओर होने वाली गतिविधियों, बुनियादी ढांचे और आपदा-प्रबंधन को लेकर भारत, नेपाल और चीन के बीच पारदर्शिता कितनी है? हालात इतने गंभीर थे कि तिब्बत की ओर एक नए ‘बैरियर लेक’ के बनने और उसके टूटने की आशंका ने नेपाल में फिर खतरे की घंटी बजा दी। इसी संकट में भारत और चीन के रवैये का फर्क नेपाल के सामने साफ दिखाई देता है। बाढ़ के कुछ ही घंटों के भीतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह से बात की और हरसंभव मानवीय सहायता का भरोसा दिया। उसी रात भारतीय वायुसेना का C-130J विमान हिंडन से काठमांडू पहुंचा और 10 टन राहत सामग्री तथा जरूरी दवाइयां भेजी गईं। इसके बाद राहत सामग्री की कुल मात्रा 47 टन से अधिक हो गई। भारत ने 24 घंटे काम करने वाला नियंत्रण कक्ष और हेल्पलाइन भी सक्रिय की। नेपाल के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और जनता जिस तरह भारत का शुक्रिया कर रहे हैं उससे उनका भारत के प्रति विश्वास भी परिलक्षित हो रहा है। देखा जाये तो यही अंतर है, मुसीबत में कौन आपके साथ खड़ा होता है और कौन सिर्फ सीमा के उस पार मौजूद रहता है। नेपाल के लिए यह समय किसी देश के पक्ष में राजनीतिक नारा लगाने का नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हित को ठंडे दिमाग से देखने का है। भारत से नेपाल का रिश्ता सिर्फ बिजली खरीदने-बेचने का नहीं है। खुली सीमा, गहरे सामाजिक रिश्ते, व्यापार, रोजगार, धार्मिक यात्राएं और रोजमर्रा की मानवीय आवाजाही दोनों देशों को असाधारण रूप से जोड़ती है। जब नेपाल में संकट आया तो भारत ने इन रिश्तों को कागज पर नहीं, जमीन और आसमान पर साबित किया। शायद नेपाल को इस संकट में एक पुरानी बात नए सिरे से समझ आई होगी, दोस्त वही नहीं जो सामान्य दिनों में साथ दिखे, दोस्त वह है जो आपदा में सबसे पहले पहुंच जाए। और चीन के साथ संबंधों को लेकर भी काठमांडू को यह तय करना होगा कि रणनीतिक साझेदारी का अर्थ केवल बड़े-बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट और निवेश नहीं है। असली साझेदारी संकट के समय दिखाई देती है। भारत और चीन के बीच नेपाल को किसी एक को चुनने की मजबूरी नहीं होनी चाहिए, लेकिन नेपाल यह जरूर देख सकता है कि उसके लिए कौन-सा पड़ोसी भरोसे का स्थायी आधार है। बहरहाल, इस बाढ़ ने नेपाल की बिजली व्यवस्था को झकझोर दिया है, लेकिन शायद इससे भी बड़ा संदेश उसकी विदेश नीति के लिए आया है। हिमालय ने एक बार फिर याद दिलाया है कि नक्शे पर सबसे नजदीक पड़ोसी ही संकट की घड़ी में सबसे उपयोगी पड़ोसी भी साबित हो सकता है। नीरज कुमार दुबे
निकाय चुनाव से ठीक पहले BJP में बगावत! पूर्व जिला महामंत्री राकेश भाटी ने थामा हाथ का साथ!
निकाय चुनाव से ठीक पहले BJP में बगावत! पूर्व जिला महामंत्री राकेश भाटी ने थामा हाथ का साथ!
America में Mohan Bhagwat का विरोध और Mamdani का दांव फेल! | Prabhu Chawla Analysis
सरकार ने शुरू की केंद्रीय बजट की तैयारियां
नई दिल्ली, केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2027-28 के केंद्रीय बजट की तैयारियां औपचारिक रूप से शुरू कर दी हैं।
भारत के हाथ आया Javelin हथियार, अब दुश्मनों के टैंकों की खैर नहीं! America से हुआ बड़ा रक्षा सौदा
भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग अब सिर्फ हथियार खरीदने तक सीमित नहीं रह गया है। भारतीय सेना द्वारा अमेरिकी Javelin एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल सिस्टम की खरीद के लिए Letter of Offer and Acceptance (LOA) पर हस्ताक्षर इस बदलते रिश्ते का एक महत्वपूर्ण संकेत है। अमेरिकी दूतावास ने इसे भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी को अधिक गहरा, सक्षम और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाने वाला कदम बताया है। खास बात यह है कि इस समझौते के साथ भविष्य में दोनों देशों के रक्षा उद्योगों के बीच सह-उत्पादन यानी co-production की संभावनाओं का रास्ता भी खुला है। Javelin की खासियत केवल यह नहीं है कि वह एक आधुनिक एंटी-टैंक मिसाइल है। यह एक man-portable, fire-and-forget प्रणाली है, यानी सैनिक मिसाइल दागने के बाद लक्ष्य पर लगातार नजर बनाए रखने के लिए उसी स्थान पर मौजूद रहने को मजबूर नहीं होता। यही क्षमता युद्धक्षेत्र में सैनिकों की survivability बढ़ाती है। अमेरिकी दूतावास के मुताबिक Javelin भारी बख्तरबंद वाहनों के अलावा कई दूसरे battlefield targets को भी निशाना बना सकती है और अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों में इस्तेमाल की जा सकती है। तेज engagement और उसके बाद तुरंत position बदलने की क्षमता इसे infantry के लिए खास तौर पर उपयोगी बनाती है। इसे भी पढ़ें: Shaurya Path: Kirana Hills और Skardu को लेकर पूर्व CDS Anil Chauhan के खुलासों से चौंकी दुनिया, Pakistan बात करना चाह रहा था, मगर India... भारत के लिए यह जरूरत अचानक पैदा नहीं हुई है। भारतीय सेना करीब 2009 से ही आधुनिक तीसरी पीढ़ी की anti-tank guided missile प्रणाली की तलाश में रही है। जरूरत ऐसी मिसाइल की थी जो हल्की हो, सटीक हो और fire-and-forget क्षमता से लैस हो, ताकि पुरानी wire-guided प्रणालियों की सीमाओं से बाहर निकला जा सके। लेकिन तकनीक हस्तांतरण, लागत, खरीद प्रक्रिया और बाद में स्वदेशी विकास पर जोर जैसी वजहों से आधुनिक ATGM की तलाश लंबे समय तक खिंचती रही। यही वजह है कि Javelin का मौजूदा सौदा केवल एक और विदेशी हथियार खरीद के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह भारतीय सेना की तत्काल operational जरूरत और दीर्घकालिक रक्षा औद्योगिक रणनीति के बीच एक पुल बन सकता है। अमेरिकी दूतावास ने साफ तौर पर कहा है कि LOA पर हस्ताक्षर के बाद भारत Javelin system का ग्राहक बन गया है और यह समझौता दोनों देशों के रक्षा उद्योगों के बीच भविष्य के सहयोग के लिए दरवाजा खोलता है। यानी असली रणनीतिक महत्व मिसाइलों की संख्या से कहीं आगे है। देखा जाये तो इस सौदे का सामरिक महत्व भी बेहद स्पष्ट है। भारत को ऐसे युद्धक्षेत्र में अपनी infantry की anti-armour क्षमता मजबूत करनी है जहां बख्तरबंद वाहनों के खिलाफ तेजी से प्रतिक्रिया और सटीक प्रहार महत्वपूर्ण हो जाते हैं। Javelin की portability का अर्थ है कि इसे अग्रिम मोर्चे पर तैनात सैनिक अपेक्षाकृत लचीले ढंग से इस्तेमाल कर सकते हैं। Fire-and-forget क्षमता सैनिक को launch के बाद तुरंत reposition करने की सुविधा देती है। ऐसे में missile केवल दुश्मन के armour को निशाना बनाने का साधन नहीं रहती, बल्कि छोटे infantry units की tactical flexibility बढ़ाने वाला हथियार बन जाती है। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों की दिशा का है। अमेरिकी राजदूत Sergio Gor ने कहा है कि यह समझौता अमेरिकी समर्थन की गहराई को दिखाता है और दोनों देशों के रक्षा उद्योगों के लिए नए अवसर पैदा करता है। वॉशिंगटन की नजर में भारत केवल हथियारों का खरीदार नहीं, बल्कि भविष्य के defence industrial cooperation का साझेदार भी बन सकता है। अमेरिकी दूतावास ने दोनों देशों के defence industrial bases को मजबूत करने की संभावना पर विशेष जोर दिया है। देखा जाये तो यहीं से इस सौदे का रणनीतिक महत्व बढ़ जाता है। भारत एक ओर अपनी सैन्य क्षमता को तेजी से आधुनिक बनाना चाहता है, वहीं दूसरी ओर रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में यदि Javelin के क्षेत्र में co-production की संभावना वास्तविक औद्योगिक साझेदारी में बदलती है, तो भारत को केवल तैयार हथियार हासिल करने की बजाय अमेरिकी defence technology और manufacturing ecosystem के साथ अधिक गहरा जुड़ाव मिल सकता है। यह भारत के लिए लंबी अवधि में अधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी। हालांकि एक बात अभी साफ नहीं है कि भारत कितने Javelin systems खरीद रहा है और इस खरीद की कुल कीमत कितनी है। अमेरिकी दूतावास और रक्षा मंत्रालय ने इन विवरणों को सार्वजनिक नहीं किया है। इसलिए इस सौदे को तत्काल बड़े पैमाने की anti-tank क्षमता में बदलाव मानना जल्दबाजी होगी। फिलहाल इसकी सबसे बड़ी अहमियत यह है कि भारत ने Javelin को अपने सैन्य विकल्पों में शामिल कर लिया है और साथ ही अमेरिका के साथ रक्षा औद्योगिक सहयोग का एक और दरवाजा खोल दिया है। बहरहाल, Javelin सौदे का संदेश दो स्तरों पर है। युद्धक्षेत्र के लिए भारत अपनी infantry को ज्यादा सटीक, मोबाइल और survivable anti-armour क्षमता देना चाहता है; और रणनीतिक स्तर पर वॉशिंगटन के साथ रक्षा संबंध को खरीददार-विक्रेता के रिश्ते से आगे ले जाना चाहता है। अगर co-production की बात जमीन पर उतरती है, तो यही सौदा आने वाले वर्षों में भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी के अगले चरण की शुरुआत साबित हो सकता है। नीरज कुमार दुबे
BJP Social Media Campaign: क्या विरोधियों को ताकत से कुचलेगी Modi Govt?
सोनिया गांधी की किताब में 3 संवेदनशील मुद्दों पर प्रकाशक को आपत्ति, कांग्रेस ने उठाए सवाल
भारत में किताब के प्रकाशन को लेकर पेंगुइन इंडिया के बयान के बाद कांग्रेस नेताओं ने सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर प्रकाशक के फैसले की आलोचना की।
'यह संस्मरण है या उसका सियासीकरण', सोनिया गांधी की किताब पर विवाद को लेकर बोले मुख्तार अब्बास नकवी
'यह संस्मरण है या उसका सियासीकरण', सोनिया गांधी की किताब पर विवाद को लेकर बोले मुख्तार अब्बास नकवी
दिल्ली-एनसीआर में महंगी हुई CNG: ₹3.89 प्रति किग्रा बढ़े दाम, जानें नई दरें
दिल्ली-एनसीआर में सीएनजी की कीमतों में 3.89 रुपये प्रति किलोग्राम की वृद्धि के बाद शनिवार को लोगों ने इस वृद्धि के प्रभाव पर चिंता व्यक्त की और इसे बढ़ती मुद्रास्फीति के बीच मध्यम वर्ग पर एक अतिरिक्त बोझ बताया है।
Kharge 'शुद्धिकरण' पर बवाल! Rahul Gandhi ने Dalit अपमान पर Modi को घेरा
भाजपा में घमासान, जुएल ओराम का बड़ा आरोप- मुझे केंद्रीय मंत्रिमंडल से हटाने की रच रहे साजिश
केंद्रीय मंत्री जुएल ओराम ने भाजपा के कुछ नेताओं पर उन्हें मंत्रिमंडल से हटाने और बदनाम करने की साजिश का आरोप लगाया। उनके ‘हाथ काटने’ वाले बयान पर विपक्ष ने निशाना साधा।
अखिलेश यादव ने मुस्लिम महिलाओं से बंधवाई राखी तो 'घर वापसी' हो गई : नंदकिशोर गुर्जर
अखिलेश यादव ने मुस्लिम महिलाओं से बंधवाई राखी तो 'घर वापसी' हो गई : नंदकिशोर गुर्जर
आंध्र प्रदेश: वाईएसआरसीपी ने मुख्यमंत्री नायडू पर वेलिगोंडा परियोजना का श्रेय 'हड़पने' का आरोप लगाया
आंध्र प्रदेश: वाईएसआरसीपी ने मुख्यमंत्री नायडू पर वेलिगोंडा परियोजना का श्रेय 'हड़पने' का आरोप लगाया
भाजपा की ज्यादतियों से बंगाल में तृणमूल की वापसी सुनिश्चित होगी: ममता बनर्जी
भाजपा की ज्यादतियों से बंगाल में तृणमूल की वापसी सुनिश्चित होगी: ममता बनर्जी
पंजाब यूनिवर्सिटी छात्रसंध चुनाव को लेकर घमासान: एबीवीपी ने 'आप' पर लगाया गंभीर आरोप
पंजाब यूनिवर्सिटी छात्रसंध चुनाव को लेकर घमासान: एबीवीपी ने 'आप' पर लगाया गंभीर आरोप
कर्नाटक : आंतरिक आरक्षण लागू करने को लेकर बीजेपी का सिद्धारमैया पर हमला, 'मगरमच्छ के आंसू' बहाने का आरोप
Mood of the Nation: Gen Z Protest और चंदा चोरी से UP Election हारेगी BJP?
उपराष्ट्रपति ने बच्चों संग तो ओम बिरला ने लाड़ली बहनों संग मनाया त्योहार, नितिन नवीन को महिला कार्यकर्ताओं ने बांधी राखी
विपक्ष को कूटनीति में भी राजनीति नजर आती है, 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम सनातन विरोधी: आरपी सिंह
विपक्ष को कूटनीति में भी राजनीति नजर आती है, 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम सनातन विरोधी: आरपी सिंह
नेपाल बाढ़ त्रासदी में 160 से ज्यादा मौतें, भारत हर संभव मदद के लिए तैयार: संजय निरुपम
नेपाल बाढ़ त्रासदी में 160 से ज्यादा मौतें, भारत हर संभव मदद के लिए तैयार: संजय निरुपम
रक्षाबंधन 2026: एक राखी, अनेक संकल्प
“येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥” जिस रक्षा सूत्र से महाबली राजा बलि को बाँधा गया था, उसी रक्षा-सूत्र से मैं तुम्हें बाँधता हूँ। हे रक्षासूत्र! तुम अडिग रहना, अपने संकल्प से कभी विचलित मत होना। रक्षाबंधन पर धागों पर बंधन एक संकल्प है। वह धागा राखी का नहीं, रिश्तों का होता है। बहन जब भाई की कलाई पर राखी बाँधती है तो वह केवल धागा नहीं बाँधती। वह अपने बचपन को बाँधती है, अपनी स्मृतियों को बाँधती है, अपने विश्वास को बाँधती है। उसकी आँखों में एक मौन प्रार्थना होती है- “भैया! जीवन चाहे जितना बदल जाए, हमारे रिश्ते का यह विश्वास कभी मत बदलना।” और भाई भी जब बहन की ओर देखता है तो उसके मन में एक संकल्प जन्म लेता है- “तुम्हारे जीवन में कोई कठिनाई आए तो मैं तुम्हारे साथ खड़ा रहूँगा।” यही रक्षाबंधन है। भारतीय संस्कृति की सुंदरता यह है कि वह किसी पर्व को केवल व्यक्तिगत संबंध तक सीमित नहीं रखती। वह एक छोटे से पारिवारिक संस्कार को भी व्यापक सामाजिक संदेश में बदल देती है। रक्षा केवल बहन की नहीं करनी है। रक्षा रिश्तों की करनी है। रक्षा संस्कारों की करनी है। रक्षा समाज की करनी है। रक्षा संस्कृति की करनी है। रक्षा राष्ट्र की करनी है। और रक्षा उस प्रकृति की करनी है, जिसके बिना हमारा अस्तित्व ही संभव नहीं। इसे भी पढ़ें: रिश्तों की पवित्रता और सुरक्षा के संकल्प का पर्व रक्षाबंधन हम अक्सर कहते हैं कि देश की रक्षा सैनिक करते हैं। यह सत्य है और इस सत्य के सामने हमारा सिर श्रद्धा से झुक जाता है। सीमा पर खड़ा सैनिक अपने घर की राखी छोड़कर राष्ट्र की रक्षा के लिए तैनात रहता है। वह जानता है कि उसके पीछे करोड़ों परिवार चैन की नींद सो रहे हैं। किसी सैनिक की कलाई पर बँधी राखी में भारत माता की रक्षा का आशीर्वाद भी होता है। कल्पना कीजिए उस बहन की, जो अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधते हुए मन ही मन कहती होगी- “भैया! तुम देश की सीमा पर रहकर लाखों बहनों की रक्षा करना, मैं यहाँ तुम्हारे लौटने की प्रार्थना करूँगी।” यह भाव केवल एक परिवार का नहीं है। यह पूरे राष्ट्र का भाव है। लेकिन राष्ट्र की रक्षा केवल सीमा पर नहीं होती। जब कोई शिक्षक अपने विद्यार्थियों में चरित्र का निर्माण करता है, तब वह राष्ट्र की रक्षा करता है। जब कोई किसान कठिन परिश्रम करके खेत में अन्न उगाता है, तब वह राष्ट्र की रक्षा करता है। जब कोई चिकित्सक ईमानदारी से रोगी का उपचार करता है, तब वह राष्ट्र की रक्षा करता है। जब कोई वैज्ञानिक देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए अनुसंधान करता है, तब वह राष्ट्र की रक्षा करता है। और जब एक सामान्य नागरिक ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाता है, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करता है, कानून का सम्मान करता है और देश की एकता को मजबूत करता है, तब वह भी राष्ट्र की रक्षा करता है। इस रक्षाबंधन पर हमें अपने भीतर एक अदृश्य राखी बाँधनी चाहिए, जो कर्तव्य करने का संकल्प बन सके। हम आधुनिक बनें, विज्ञान और तकनीक में आगे बढ़ें, दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाएँ- यह आवश्यक है। आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों को भूल जाना नहीं है। राखी केवल बाजार से खरीदा हुआ धागा नहीं है। उसके पीछे हजारों वर्षों की सांस्कृतिक चेतना है। वे यह समझें कि भारतीय पर्व जीवन मूल्यों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुँचाने वाले माध्यम हैं। हमारे त्योहार हमें जोड़ते हैं। वे हमें बताते हैं कि जीवन केवल स्वयं के लिए जीने का नाम नहीं है। हमारे पर्व वास्तव में हमारी संस्कृति की जीवित पाठशालाएँ हैं। इसलिए संस्कृति की रक्षा का अर्थ केवल पुरानी परंपराओं को दोहराना नहीं है। संस्कृति की रक्षा का अर्थ है- उसके मूल्यों को अपने जीवन में उतारना। प्रकृति हमें बार-बार संकेत दे रही है कि अब उसकी रक्षा का समय आ गया है। तो क्यों न इस रक्षाबंधन पर एक नई परंपरा शुरू की जाए? एक राखी भाई की कलाई पर और एक राखी वृक्ष की शाखा पर। यदि एक परिवार हर वर्ष एक वृक्ष की जिम्मेदारी ले ले, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए कितनी बड़ी विरासत तैयार हो सकती है। रक्षा का अर्थ अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व है। हर अधिकार के साथ एक उत्तरदायित्व जुड़ा होता है। जिसकी रक्षा करने का संकल्प लेते हैं, उसके प्रति हमारी जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है। एक राखी, अनेक संकल्प। इस बार जब बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधे तो भाई केवल उपहार देने तक सीमित न रहे। दोनों मिलकर कुछ संकल्प लें- माता-पिता का सम्मान करेंगे। परिवार में संवाद बनाए रखेंगे। बुजुर्गों को अकेला नहीं छोड़ेंगे। बच्चों को संस्कार देंगे। जरूरतमंद की सहायता करेंगे। देश की संपत्ति को अपनी संपत्ति समझेंगे। प्रकृति को नुकसान नहीं पहुँचाएँगे। यदि रक्षाबंधन इन संकल्पों का पर्व बन जाए तो समाज की कितनी समस्याएँ अपने आप कम हो सकती हैं। वस्तुएँ कुछ समय बाद पुरानी हो जाती हैं, लेकिन संकल्प जीवनभर साथ रहता है। रक्षाबंधन की राखी कलाई पर बँधती है, लेकिन उसका अर्थ हृदय में उतरना चाहिए। उसकी डोर हमें बचपन से जोड़ती है, परिवार से जोड़ती है, समाज से जोड़ती है, संस्कृति से जोड़ती है और अंततः राष्ट्र से जोड़ती है। यह धागा हमें बताता है कि जीवन में केवल अपने सुख की चिंता करना पर्याप्त नहीं है। इसलिए इस रक्षाबंधन पर एक राखी कलाई पर बाँधिए और एक संकल्प हृदय में। एक रिश्ता बचाइए। एक बुजुर्ग का हाथ थामिए। एक वृक्ष बचाइए। एक जलस्रोत को स्वच्छ रखिए। तभी राखी का धागा सचमुच मजबूत होगा। यही रक्षाबंधन की सार्थकता है। - डॉ. वन्दना सेन पार्वती बाई गोखले विज्ञान महाविद्यालय जीवाजीगंज, लश्कर ग्वालियर म. प्र.
Financial Times Report: Modi के बाद Yogi बनेंगे PM? Amit Shah रेस से बाहर?
नेपाल में ग्लेशियर ढहने से आई विनाशकारी बाढ़ ने सिर्फ हिमालय की नाजुक भौगोलिक संरचना को उजागर नहीं किया है, बल्कि भारत की सीमा से सटे तिब्बत में चीन के निर्माणाधीन 60,000 मेगावाट के मेदोग हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट को लेकर भी खतरे की घंटी तेज कर दी है। नेपाल में सैंकड़ों लोगों की मौत और 750 लोगों के लापता होने की खबरों के बीच अब यह सवाल और गंभीर हो गया है कि दुनिया के सबसे सक्रिय भूकंपीय क्षेत्रों में से एक हिमालय में इतना विशाल बांध आखिर कितना सुरक्षित है। हम आपको बता दें कि शुरुआत में नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र में आई इस आपदा को 4.4 तीव्रता के भूकंप से जोड़कर देखा गया था। लेकिन अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (यूएसजीएस) के नए विश्लेषण ने तस्वीर बदल दी। यूएसजीएस के अनुसार, अतिरिक्त भूकंपीय आंकड़ों और उपग्रह तस्वीरों के अध्ययन से पता चला कि यह भूकंप नहीं था, बल्कि ग्लेशियर के ढहने और उसके बाद मलबे के तेज बहाव से उत्पन्न कंपन थे। ऊंचाई वाले इलाके से टूटकर नीचे आया बर्फ और मलबे का विशाल हिस्सा देखते ही देखते विनाशकारी जलप्रवाह में बदल गया और नेपाल के रसुवा तथा धादिंग जिलों में भारी तबाही मचा दी। इसे भी पढ़ें: 15 दिनों के भीतर दो बार एक मंच पर आएंगे मोदी-पुतिन और शी, ट्रंप की बेचैनी बढ़ी इस आपदा में 133 भारतीय नागरिकों समेत सैकड़ों लोग लापता बताए गए हैं। बड़ी संख्या में कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गए श्रद्धालुओं के भी प्रभावित होने की खबर है। घर, सड़कें और बिजली परियोजनाएं पानी के तेज बहाव में बह गईं। भू-आकृति विशेषज्ञ डेनियल शुगर के आकलन के मुताबिक, ऊंचाई वाले क्षेत्र में ग्लेशियर के खिसककर टूटने और पिघलती बर्फ से बने पानी ने इस भयावह घटना को जन्म दिया। लेकिन नेपाल की यह त्रासदी अब भारत के लिए एक बड़ी चेतावनी के रूप में देखी जा रही है। इसकी वजह है चीन का मेदोग या मोटुओ हाइड्रोपावर स्टेशन, जिसका निर्माण यारलुंग त्सांगपो नदी पर किया जा रहा है। यही नदी भारत में प्रवेश करते ही अरुणाचल प्रदेश में सियांग और आगे असम में ब्रह्मपुत्र कहलाती है। करीब 60 गीगावाट क्षमता वाली यह परियोजना पूरी होने पर दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना बन सकती है। इसके 2033 तक चालू होने का लक्ष्य बताया गया है। परियोजना की अनुमानित लागत 137 अरब डॉलर से 170 अरब डॉलर के बीच है और इसमें यारलुंग त्सांगपो के विशाल मोड़ वाले क्षेत्र में पांच चरणों में जलविद्युत ढांचा विकसित करने की योजना है। सबसे बड़ा सवाल इसकी विशालता नहीं, बल्कि इसका स्थान है। मेदोग परियोजना उस हिमालयी क्षेत्र में बनाई जा रही है जहां भारतीय और यूरेशियाई टेक्टोनिक प्लेटों का टकराव होता है। जुलाई में चीन की सरकारी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण व्यवस्था से जुड़े भूवैज्ञानिकों के एक अध्ययन ने भी परियोजना स्थल के नीचे सक्रिय पाइझेन फॉल्ट होने की बात कही थी। यानी जिस क्षेत्र में धरती की हलचल स्वयं एक स्थायी खतरा है, वहीं दुनिया का सबसे विशाल बांध खड़ा किया जा रहा है। रणनीतिक विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने इसे “वॉटर बम” की संज्ञा देते हुए चेतावनी दी है कि किसी बड़े भूकंप, भूस्खलन, हिमस्खलन या अचानक जलप्रवाह की स्थिति में इसका असर भारत के पूर्वोत्तर और आगे बांग्लादेश तक पड़ सकता है। पूर्व राजदूत राजीव डोगरा ने भी अरुणाचल और असम के लिए कहीं बड़ी तबाही की आशंका जताई है। वहीं भारत की चिंता केवल संभावित बांध दुर्घटना तक सीमित नहीं है। चीन नदी के ऊपरी हिस्से को नियंत्रित करता है। हालांकि ब्रह्मपुत्र के जल का बड़ा हिस्सा भारत में मानसूनी सहायक नदियों से आता है, फिर भी तिब्बत से छोड़े जाने वाले पानी की मात्रा और समय में बड़े बदलाव अरुणाचल और असम के लिए गंभीर समस्या पैदा कर सकते हैं। भारी बारिश के दौरान अचानक बड़ी मात्रा में पानी छोड़ा गया तो बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है, जबकि सूखे दौर में प्रवाह कम होने से कृषि, मत्स्य पालन और स्थानीय समुदाय प्रभावित हो सकते हैं। अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू पहले ही इस परियोजना को अस्तित्व से जुड़ा खतरा बता चुके हैं। भारत ने जवाबी रणनीति के तौर पर सियांग नदी पर 11,000 मेगावाट की अपर सियांग मल्टीपर्पज परियोजना को आगे बढ़ाया है, जिसका एक उद्देश्य ऊपरी हिस्से से आने वाले अचानक जलप्रवाह को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा कवच तैयार करना है। हालांकि इस परियोजना को लेकर अपर सियांग की आदि जनजातीय समुदायों में विस्थापन और पारदर्शिता को लेकर विरोध भी मौजूद है। देखा जाये तो नेपाल की त्रासदी ने पूर्व चेतावनी का एक गंभीर सवाल खड़ा किया। आरोप है कि तिब्बत की ओर से आने वाली इस विशाल जलराशि के बारे में नेपाल को समय पर सूचना नहीं मिली। भारत के लिए भी यह चिंता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चीन और भारत के बीच ऐसा कोई व्यापक जल-साझेदारी समझौता नहीं है, जिसके तहत वास्तविक समय में व्यापक हाइड्रोलॉजिकल जानकारी साझा करना अनिवार्य हो। हिमालय ने नेपाल की बाढ़ के जरिए एक बार फिर बता दिया है कि यहां खतरा केवल भूकंप का नहीं है। ग्लेशियर ढह सकते हैं, पहाड़ टूट सकते हैं, भूस्खलन नदी का रास्ता बदल सकते हैं और देखते ही देखते शांत जलधारा विनाश की दीवार बन सकती है। ऐसे में सक्रिय फॉल्ट लाइन के ऊपर खड़ा हो रहा चीन का मेदोग मेगा डैम केवल इंजीनियरिंग परियोजना नहीं, बल्कि भारत की जल सुरक्षा, पर्यावरण, आपदा प्रबंधन और रणनीतिक सुरक्षा से जुड़ा एक गंभीर प्रश्न है। बहरहाल, नेपाल की तबाही एक स्थानीय आपदा भर नहीं है। यह पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए चेतावनी है, क्योंकि पहाड़ जब करवट लेता है, तो सीमाएं उसकी तबाही को रोक नहीं पातीं। -नीरज कुमार दुबे
फरक्का समझौता को बिहार-झारखंड के लिए अभिशाप नहीं वरदान बनाइए, समझिए कैसे बनेगा?
“फरक्का समझौता बिहार-झारखंड के लिए अभिशाप है” यह कहना एक राजनीतिक व क्षेत्रीय तर्क के रूप में तो समझ में आता है, लेकिन तथ्यात्मक रूप से एक जरूरी फर्क यह भी है कि वास्तविक समस्या केवल 1996 के भारत-बांग्लादेश जल-बंटवारा समझौते की नहीं, बल्कि फरक्का बैराज की जल-प्रवाह व्यवस्था, गाद (silt) जमाव और उससे पैदा हुए नदी-भूगोल की भी है, जिस पर गहन चिंतन मनन आवश्यक है ताकि बिहार को बाढ़ के मामले में 1972 के बाद से ही जिस अप्राकृतिक और अमानवीय परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, उससे मुक्ति मिले। यही नहीं, इस केंद्रीय नीति से बिहार को बाढ़ जनित होने वाली वार्षिक जन-धन की हानि व फसल क्षति और आधारभूत संरचना यानी सड़क/रेल आदि की व्यापक क्षति का वार्षिक मुआवजा मिले, जो कि फरक्का बराज से लाभान्वित होने वाले समूहों से वसूला जाए। चूंकि इस मानव कृत आपदा से यूपी के दो जिले गाजीपुर और बलिया जनपद तक प्रभावित होते हैं। इसलिए मुआवजा उन्हें भी मिलना चाहिए। इसे भी पढ़ें: Mecca Defence Pact के बहाने बदल रहा है Bangladesh का रणनीतिक खेल, भारत को चारों ओर से घेरने की तैयारी! यह बात मैं नहीं, बल्कि इस मामले से जुड़े लोगों ने अपने गहन अनुभवों के द्वारा समय समय पर अभिव्यक्त किया है, जो मेरी स्मृतियों में अब तक सुरक्षित है। वक्त वक्त पर इस पूरे क्षेत्र की बाढ़ आपदा मीडिया रिपोर्टिंग टीम का अंग होने नाते भी इस बारे में विविधता पूर्ण जानकारी मुझे हासिल है। पीड़ित बुजुर्ग खुद बताते आये हैं कि 1972 के बाद बाढ़ आपदा स्थायी हुई है, पहले तो पानी आता और चला जाता, इतना जमता नहीं! मुझे खुशी है कि अपनी प्रभुत्व वाली सत्ता जाने के बाद ही सही लेकिन जनता दल यूनाइटेड को सद्बुद्धि आ गई है और उसके राज्य सभा सदस्य संजय झा इस मामले में मुखर हैं। इसी में राज्य हित भी निहित है। सीधा सवाल है कि आखिर जब केंद्र सरकार बिहार के दूरगामी हितों की रक्षा नहीं करेगी तो फिर कौन करेगा? वो भी तब, जब बिहार-पश्चिम बंगाल में और केंद्र में भी भाजपा/एनडीए गठबंधन की ही सरकार हो? वहीं, इस समझौते से लाभान्वित होने वाला बंगलादेश अब भारत का हितैषी नहीं, बल्कि चीन-पाकिस्तान की प्रतिशोधी भाषा बोलने को अभिशप्त हो! ऐसे में उसे कूटनीतिक पाठ पढ़ाने का भी यही असली मौका है। # जानिए की बिहार के लिए संकट कहाँ है? पहला, गंगा की प्राकृतिक धारा में हस्तक्षेप: फरक्का बैराज 1975 में चालू हुआ। इसका मूल उद्देश्य गंगा से पानी हुगली में मोड़कर कोलकाता बंदरगाह में गाद जमने की समस्या कम करना था। समस्या यह है कि गंगा जैसी अत्यधिक गाद वाली नदी को बैराज से नियंत्रित करने पर ऊपर की ओर sediment deposition और नदी की morphology में बदलाव होता है। शोध में भागलपुर से फरक्का तक के क्षेत्र में 1973–2019 के दौरान नदी के स्वरूप, कटाव और द्वीप/बालू जमाव में बड़े बदलाव दर्ज किए गए हैं; अध्ययन ने फरक्का बैराज को upstream flooding और planform बदलाव की बढ़ी दर से जोड़ा है। दूसरा, बिहार का “बाढ़–कटाव” संकट: गंगा की तलहटी में गाद बढ़ने से नदी की जलधारण क्षमता घट सकती है। एक शोध में कहा गया है कि निचली गंगा के कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर siltation से channel capacity कम हुई है, जिसके कारण अपेक्षाकृत कम discharge पर भी गंभीर बाढ़ हो सकती है; शोध ने फरक्का को नदी की morphology प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण कारकों में शामिल किया है। यही वजह है कि भागलपुर, मुंगेर, कटिहार और आसपास के गंगा-तटीय इलाकों में बाढ़ तथा कटाव को फरक्का के प्रश्न से अलग करके देखना अधूरा होगा—हालाँकि यह कहना भी वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा कि इन जिलों की हर बाढ़ केवल फरक्का के कारण होती है। लेकिन यह हकीकत है कि पश्चिम बंगाल के ऊपरी जिलों में पानी पहुंचाने के लिए जब तक बराज का गेट बंद रखा जाता है तो रुका हुआ पानी पूर्वी उत्तरप्रदेश के दो जिलों तक के जल स्तर को ऊंचा उठा देता है, जो कृत्रिम बाढ़ समझा जाता है। तीसरा, झारखंड पर भी अप्रत्यक्ष असर: राजमहल–साहिबगंज क्षेत्र गंगा के उसी नदी-तंत्र में है। फरक्का के ऊपर नदी के प्रवाह, sediment deposition और channel migration में बदलाव का असर झारखंड के साहिबगंज–राजमहल क्षेत्र की तटीय भूमि और कटाव पर पड़ सकता है। अध्ययन में राजमहल क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण deposition दर्ज किया गया है। # असली राजनीतिक सवाल यह कि पानी किसका? 1996 की गंगा जल बंटवारा संधि में भारत और बांग्लादेश के बीच फरक्का पर जनवरी से मई तक lean season में पानी बांटने का फार्मूला तय किया गया था। यह संधि 30 वर्ष के लिए थी और 2026 में इसकी अवधि समाप्त हो रही है। यहीं बिहार का तर्क ज्यादा गंभीर हो जाता है: सवाल है कि जब गंगा का पानी बिहार से होकर गुजरता है और बाढ़, कटाव तथा गाद का बोझ बिहार झेलता है, तो भविष्य की जल-संधि बनाते समय बिहार की जल-आवश्यकताओं और नदी-प्रबंधन को निर्णायक महत्व क्यों न मिले? मसलन, संधि में फरक्का पर उपलब्ध जल के आधार पर भारत-बांग्लादेश के बीच हिस्सेदारी का फार्मूला है—70,000 क्यूसेक या उससे कम पर 50:50 आदि। लेकिन बिहार की बाढ़, गाद, भूजल, सिंचाई, पेयजल और भविष्य की जल-जरूरत को उसी स्तर पर द्विपक्षीय जल-बंटवारे के केंद्र में नहीं रखा गया। यही वह जगह है जहाँ बिहार को लगता है कि वह नदी का ऊपरी प्रवाह क्षेत्र का हितधारक होते हुए भी निर्णय-प्रक्रिया में पर्याप्त आवाज नहीं रखता। लेकिन यहां पर एक महत्वपूर्ण सावधानी भी बरतनी है। इसे केवल “फरक्का समझौते ने बिहार को बर्बाद कर दिया” कहना अतिशयोक्ति होगी। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार गंगा की अस्थिरता के पीछे प्राकृतिक sediment load, सहायक नदियाँ, नदी की बहुत कम ढाल, जलवायु/वर्षा, upstream water abstraction और मानवीय हस्तक्षेप—कई कारण हैं। फरक्का उनमें एक महत्वपूर्ण कारक है, अकेला कारण नहीं। इसलिए 2026 में बिहार की मांग क्या होनी चाहिए? यक्ष प्रश्न है। मेरे हिसाब से मुद्दा “बांग्लादेश को पानी देना बंद करो” नहीं होना चाहिए, बल्कि “भारत-बांग्लादेश समझौता + बिहार-झारखंड की जल-सुरक्षा + राष्ट्रीय गाद प्रबंधन नीति + गंगा की ecological flow को दृष्टिगत रखते हुए एक समग्र समझौता” होना चाहिए। और इसमें पाँच बातें अनिवार्य होनी चाहिए— एक, बिहार की न्यूनतम जल-आवश्यकता पहले निर्धारित हो। दो, गंगा की गाद के वैज्ञानिक प्रबंधन की राष्ट्रीय नीति बने। तीन, भागलपुर–मुंगेर–साहिबगंज–राजमहल क्षेत्र के कटाव को अंतरराज्यीय/राष्ट्रीय परियोजना माना जला। चार, फरक्का के gate operation का real-time scientific review हो। पांच, भविष्य की भारत-बांग्लादेश संधि में बिहार और झारखंड की संस्थागत भागीदारी हो। यानी असली सवाल “फरक्का रहे या हटे?” से आगे है—“फरक्का के कारण पैदा हुए जल, गाद और बाढ़ के लाभ-हानि का न्यायपूर्ण बंटवारा कौन सुनिश्चित करेगा?” और यही बिहार की सबसे मजबूत दलील बन सकती है। इसलिए फरक्का समझौता को बिहार-झारखंड के लिए अभिशाप नहीं वरदान बनाइए। अगर उपर्युक्त बातों पर गौर करेंगे तो यह असंभव नहीं होगा। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
15 दिनों के भीतर दो बार एक मंच पर आएंगे मोदी-पुतिन और शी, ट्रंप की बेचैनी बढ़ी
भारतीय विदेश मंत्रालय ने आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एससीओ शिखर सम्मेलन में शिरकत करने की पुष्टि करते हुए उनके उज्बेकिस्तान और किर्गिस्तान दौरे के कार्यक्रम के बारे में जानकारी दी जिसके बाद पूरी दुनिया में हलचल-सी मच गयी है। हलचल इसलिए मची है क्योंकि जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग एक बार फिर एक साथ दिखाई देंगे, तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सीने पर पिछले साल की तरह फिर से सांप लोट सकते हैं। पिछली बार चीन के तियानजिन में एससीओ मंच पर इन तीन नेताओं की तस्वीर ने अमेरिकी रणनीतिक हलकों में बेचैनी बढ़ा दी थी। तब पूर्व अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने ट्रंप की टैरिफ नीतियों को भारत-अमेरिका रिश्तों को दशकों पीछे धकेलने वाला कदम बताया था और कहा था कि ऐसी नीतियों ने मोदी को पुतिन और शी के और करीब पहुंचा दिया। अब दृश्य और बड़ा है। पहले मध्य एशिया, फिर नई दिल्ली यानि पहले एससीओ और उसके तुरंत बाद ब्रिक्स। संदेश साफ है कि भारत किसी की रणनीतिक जागीर नहीं है। देखा जाये तो प्रधानमंत्री मोदी की उज्बेकिस्तान यात्रा और किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में 31 अगस्त से 1 सितंबर तक होने वाला एससीओ शिखर सम्मेलन ऐसे समय पर हो रहा है, जब मध्य एशिया वैश्विक शक्ति संघर्ष का नया मैदान बन चुका है। चीन बेल्ट एंड रोड के जरिए अपनी पकड़ बढ़ा रहा है, रूस इस क्षेत्र को अपने पारंपरिक प्रभाव क्षेत्र के रूप में देखता है और अमेरिका भी यहां अपनी मौजूदगी तथा रणनीतिक पहुंच बनाए रखने की कोशिश में है। ऐसे में मोदी की सक्रिय कूटनीति भारत को खेल का महत्वपूर्ण खिलाड़ी बना रही है। इसे भी पढ़ें: दुश्मनों पर दनादन बरसेंगी मिसाइलें, भारत में Private Companies भी बनाएंगी Missiles, Rajnath Singh ने DRDO की Technology Transfer को दी मंजूरी उज्बेकिस्तान इस रणनीति का अहम केंद्र है। मोदी की प्रस्तावित ताशकंद यात्रा व्यापार, रक्षा, निवेश, कनेक्टिविटी, डिजिटल तकनीक, ऊर्जा और महत्वपूर्ण खनिजों जैसे क्षेत्रों में सहयोग को नई गति दे सकती है। पिछले पांच वर्षों में भारत-उज्बेकिस्तान व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और द्विपक्षीय कारोबार लगभग 1.3 अरब डॉलर तक पहुंचने का उल्लेख किया गया है। भारत का निवेश फार्मास्यूटिकल्स, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में फैला है, जबकि भारतीय विश्वविद्यालय भी उज्बेकिस्तान में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। लेकिन इस यात्रा की असली ताकत केवल व्यापार के आंकड़ों में नहीं है। उज्बेकिस्तान भारत की मध्य एशिया रणनीति का महत्वपूर्ण प्रवेश द्वार है। पाकिस्तान द्वारा भूमि मार्ग अवरुद्ध रखने के कारण भारत के सामने संपर्क का प्रश्न लंबे समय से चुनौती बना हुआ है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा यानि आईएनएसटीसी और चाबहार बंदरगाह भारत के लिए सामरिक महत्व रखते हैं। ईरान और पश्चिम एशिया की मौजूदा अस्थिरता ने इन परियोजनाओं की राह कठिन जरूर बनाई है, लेकिन भारत के लिए विकल्प तलाशना अब मजबूरी नहीं, रणनीतिक आवश्यकता है। अफगानिस्तान भी मोदी-मिर्जियोयेव वार्ता का बड़ा मुद्दा हो सकता है। स्थिर अफगानिस्तान के बिना दक्षिण और मध्य एशिया की कनेक्टिविटी, व्यापार और सुरक्षा की कोई भी बड़ी योजना अधूरी है। ताशकंद और नई दिल्ली पुनर्निर्माण, आर्थिक विकास और क्षेत्रीय स्थिरता पर अधिक निकट समन्वय विकसित कर सकते हैं। इसके साथ ही रक्षा सहयोग, ‘दुस्तलिक’ सैन्य अभ्यास, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, विज्ञान-तकनीक और महत्वपूर्ण खनिजों में साझेदारी भारत की मध्य एशिया नीति को नई धार दे सकती है। इसके बाद बिश्केक में एससीओ का मंच मोदी को रूस और चीन समेत प्रमुख यूरेशियाई शक्तियों के साथ सीधे संवाद का अवसर देगा। भारत के लिए एससीओ केवल फोटो-ऑप नहीं है। आतंकवाद, ऊर्जा सुरक्षा, कनेक्टिविटी, आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता, ये सभी भारत के प्रत्यक्ष राष्ट्रीय हित से जुड़े प्रश्न हैं। नई दिल्ली लगातार यह भी रेखांकित करती रही है कि कनेक्टिविटी परियोजनाएं संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करें तथा आतंकवाद के खिलाफ दोहरे मानदंड स्वीकार नहीं किए जा सकते। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू मोदी-पुतिन संबंध हैं। हम आपको बता दें कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर की मॉस्को यात्रा के दौरान पुतिन ने मोदी से एससीओ में मिलने की इच्छा जताई और भारत के लिए उर्वरक आपूर्ति बढ़ाने की बात कही। दोनों देशों के बीच ऊर्जा, व्यापार, परमाणु सहयोग और कृषि जरूरतों से जुड़े रिश्ते लगातार महत्वपूर्ण बने हुए हैं। भारत ने पश्चिमी दबाव के बावजूद अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर रूस के साथ आर्थिक संबंध बनाए रखे हैं और यही मोदी की रणनीतिक स्वायत्तता का सबसे बड़ा प्रमाण है। लेकिन असली भू-राजनीतिक धमाका इसके बाद हो सकता है। 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में पुतिन और शी चिनफिंग की मौजूदगी की संभावना भारत की कूटनीतिक हैसियत को और मजबूत करेगी। यदि मोदी, पुतिन और शी एक ही मंच पर लगातार दो बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में मिलते हैं, तो यह किसी औपचारिक मित्रता की घोषणा नहीं होगी; लेकिन यह जरूर दिखाएगा कि विश्व राजनीति अब एकध्रुवीय निर्देशों पर नहीं चलती। भारत, रूस और चीन के बीच मतभेद मौजूद हैं, विशेषकर भारत-चीन संबंधों में। इसलिए इसे किसी स्थायी त्रिपक्षीय गठबंधन के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। मगर बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था, वैश्विक शासन सुधार, ग्लोबल साउथ की आवाज, ऊर्जा सुरक्षा और वैकल्पिक आर्थिक संस्थाओं के सवाल पर तीनों देशों की बातचीत का प्रभाव अमेरिका और पश्चिमी शक्तियों तक जरूर पहुंचेगा। मोदी की उज्बेकिस्तान से बिश्केक और फिर नई दिल्ली तक फैली यह कूटनीतिक श्रृंखला एक बड़े संदेश का निर्माण करती है। संदेश यह है कि भारत अब मध्य एशिया में अपनी पहुंच बढ़ा रहा है, रूस के साथ पुराने रणनीतिक संबंधों को नए आर्थिक आधार दे रहा है, चीन के साथ प्रतिस्पर्धा और संवाद, दोनों को एक साथ साध रहा है और ब्रिक्स जैसे मंचों के जरिए ग्लोबल साउथ की राजनीति को नई दिशा देने की कोशिश कर रहा है। वॉशिंगटन के लिए संदेश इसलिए असहज हो सकता है, क्योंकि दबाव, टैरिफ और रणनीतिक ध्रुवीकरण की राजनीति भारत को किसी खेमे में बांधने की गारंटी नहीं देती। बहरहाल, मोदी की कूटनीति का मूल मंत्र साफ दिखाई देता है कि जहां भारत का हित, वहीं भारत का हाथ। अगले कुछ सप्ताह में ताशकंद, बिश्केक और नई दिल्ली के मंच शायद यही साबित कर दें कि बदलती विश्व व्यवस्था में भारत अपनी शर्तों पर चाल चलने वाला निर्णायक खिलाड़ी है। -नीरज कुमार दुबे
मराठी अस्मिताबोध की नई अभिव्यक्ति
महाराष्ट्र के ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए कामचलाऊ मराठी भाषा जरूरी किए जाने को लेकर विवाद उठना स्वाभाविक है। यह विवाद बांबे हाईकोर्ट भी पहुंच गया है। महाराष्ट्र सरकार ने इस नियम को लागू करते हुए तर्क दिया है कि इससे यात्रियों और टैक्सी-ऑटो चालकों के बीच भरोसा बढ़ेगा और यात्रियों में सुरक्षा का भाव रहेगा। मोटे तौर पर सरकार की यह दलील बेहतर लगती है, लेकिन जब राज्य की टैक्सियों और ऑटो की संख्या और उनके चालकों पर ध्यान देते हैं तो यह सवाल सिर्फ भाषा का नहीं रह जाता, बल्कि उपराष्ट्रीयता के उभार और उसके बहाने राष्ट्रीयता के विचार को चुनौती का भी हो जाता है। इस सोच का सिरा आगे बढ़ते हुए हिंदी विरोध और प्रकारांतर से पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के प्रवासियों की मुखालफत तक जा पहुंचता है। भारतीय राष्ट्रीयता के समर्थन में ‘विविधता में एकता’ का पाठ हर भारतीय को स्कूली घुट्टी में मिला है। लेकिन जीवन की कठोर राहों पर उतरते हैं तो पता चलता है कि राष्ट्रीयता की असल धारा जितनी गहरे तक हिंदी हृदय प्रदेशों में बहती है, उतनी गैर हिंदीभाषी प्रदेशों में नजर नहीं आती। दिलचस्प यह है कि राष्ट्रीयता के पुरजोर पोषक इन इलाकों को उपहास में कभी बीमारू कहा जाता था। इस पर गोबरपट्टी और गोबरनाडु का विशेषण खास धारा की वैचारिकी ने जो चस्पा कर रखा है। इस सोच की प्रमुख वजह आर्थिक रूप से इन इलाकों का अपेक्षाकृत उपराष्ट्रीयता वाले इलाकों से पिछड़े रहना है। इसी वजह से रोजी-रोटी की खातिर महाराष्ट्र के टैक्सी और ऑटो चालकों में सबसे बड़ी संख्या भदेस माने वाले बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश आदि के प्रवासी शामिल हैं। जाहिर है कि मराठी का कामचलाऊ ज्ञान रखने के नियम का शिकार यही लोग ज्यादा हुए हैं। इससे इनकी ही रोजी-रोटी पर संकट बढ़ा है। इसे भी पढ़ें: Maharashtra में Auto Rickshaw, Taxi Drivers के लिए Marathi Mandatory क्यों की गयी? मराठी सीखने के लिए दबाव क्यों डालना? महाराष्ट्र के ताजा आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक, राज्य में 12 लाख 96 हजार से ज्यादा ऑटो हैं, जबकि करीब पांच लाख टैक्सियां हैं। यहां के परिवहन विभाग के मुताबिक, अकेले ग्रेटर मुंबई इलाके में करीब पांच लाख टैक्सियां और ऑटो रिक्शा चल रहे हैं। इनमें करीब 75 फीसद ऑटो-टैक्सी चालक गैर मराठी और हिंदीभाषी इलाकों के ही हैं। राज्य के दूसरे इलाकों में करीब आधे ऑटो-टैक्सी चालक हिंदीभाषी हैं। महाराष्ट्र ही क्यों, किसी भी राज्य के सेवा क्षेत्र में कार्य करने वाले लोगों को वहां की स्थानीय भाषा आनी चाहिए। उनके रोजाना का काम स्थानीय भाषा के कामचलाऊ ज्ञान से चल सकता है। बड़ा सवाल यह है कि मराठी के कामचलाऊ ज्ञान का पैमाना क्या हो, महाराष्ट्र सरकार का आदेश इस मसले में स्पष्ट नहीं है। विवाद और परेशानी इस वजह से भी है। सर्विस सेक्टर और रेहड़ी-पटरी लगाने वाले अक्सर कामकाज करते-करते स्थानीय भाषा सीख लेते हैं। दिल्ली के कनॉट प्लेस में हथकरघा और दस्तगारी का सामान बेचने वाली गुजराती महिलाएं कम शिक्षित हैं। लेकिन वे हिंदी ही नहीं, अंग्रेजी, जर्मन और स्पेनिश भी धाराप्रवाह बोल लेती हैं। तमिलनाडु को लेकर धारणा है कि वहां घोर हिंदी विरोधी माहौल है। लेकिन वहां के प्रमुख पर्यटन स्थल महाबलीपुरम् में भीख मांगने वाले भी बहुभाषी मिल जाते हैं, जो हिंदीभाषी सैलानियों से हिंदी में भीख मांगते हैं। वहां घूम-घूमकर छोटे-मोटे सामान बेचने वाली लड़कियां भी तकरीबन अनपढ़ हैं, लेकिन वे हिंदी, गुजराती, बांग्ला आदि बोल लेती हैं। चाहे कनॉट प्लेस के फुटपाथ पर दस्तगारी का सामान बेचने वाली गुजराती महिलाएं हों या कोलकाता की गलियों में दुकान लगाने वाले बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग हों, अगर वे अंग्रेजी और बांग्ला आदि बोलते हैं तो इसकी वजह कोई स्कूली शिक्षा नहीं, बल्कि रोजाना का संपर्क और जरूरत है। ऐसा नहीं कि महाराष्ट्र के ऑटो-टैक्सी चालक मराठी का कामचलाऊ ज्ञान या समझ नहीं रखते। यहां ध्यान रखने की बात है कि अपनी माटी से दूर जब कोई ऑटो या टैक्सी चलाने का काम चुनता है तो वह तत्काल सड़क पर नहीं उतरता। वह पहले सड़कों को पहचानता है, उनकी भाषा को समझने की कोशिश करता है। भाषा विज्ञान की नजर से देखें तो मराठी, गुजराती और राजस्थानी ऐसी भाषाएं नहीं है, जिन्हें आम हिंदीभाषी समझ नहीं सकता। ठीक इसी तरह इन भाषा-भाषियों के लिए हिंदी भी ऐसी भाषा नहीं है, जिसे वे न समझ सकें। भाषा को लेकर जब भी कोई विवाद उठता है, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन का एक इंटरव्यू याद आता है। जिसमें उन्होंने अपनी दादी की चारधाम यात्रा का जिक्र किया था। उनकी दादी ने शायद पिछली सदी के दूसरे दशक में तमिलनाडुके पालघाट इलाके के अपने गांव से चारधाम की यात्रा की थी और महीनों बाद सकुशल वापस लौट आई थीं। शेषन ने कहा था कि उनकी दादी तमिल के अलावा कोई अन्य भाषा नहीं जानती थीं, लेकिन उन्हें चारधाम यात्रा से दिक्कत नहीं हुई। सिर्फ शेषन ही नहीं, सदियों से लोग भारत के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक तीर्थ यात्राएं करते रहे हैं। आज तो तकनीक का विस्तार हो गया है, संचार क्रांति हो चुकी है। जब ये सहूलियतें नहीं थीं, तब क्या तीर्थ यात्राएं रूकीं। तब क्या भाषाएं बाधा बनीं। ऐसे में सवाल यह है कि फिर आज भाषा कैसे चुनौती बन सकती है। कम ही लोग स्वीकार करेंगे, लेकिन राज्यों के पुनर्गठन के लिए बनाए गए फजलुर्रहमान आयोग की रिपोर्ट ही भाषायी उपराष्ट्रीयता को बढ़ावा देने वाली रही। आयोग ने भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की सिफारिश की थी। इसी के नजीतन भारतीय उपराष्ट्रीयताओं को अपनी भाषाओं के बहाने अपना वर्चस्व साबित करने का आधार मिल गया। इसी वजह से आए दिन राज्यों में अपनी भाषाओं को लेकर अस्मिताबोध जागता रहता है। इस बोध के निशाने पर अक्सर हिंदीभाषी ही रहते हैं। महाराष्ट्र सरकार में शामिल एकनाथ शिंदे की शिवसेना के मूल में भी मराठी उपराष्ट्रीयता और अस्मिताबोध रहा है। इस अस्मिताबोध को शिवसेना संस्थापक बाला साहब ठाकरे ने पहली अभिव्यक्ति 1960 के दशक में मुंबई में मलयाली भाषा-भाषियों के खिलाफ आंदोलन के जरिए दी और बाद के दिनों में उनके भतीजे राज ठाकरे तो इस अस्मिताबोध के दबंग पैरोकार बनकर उभरे। केंद्र सरकार और बैंकों आदि की नौकरियों के लिए परीक्षा देने मुंबई-नासिक आदि पहुंचे हिंदीभाषी छात्रों को बाकायदा पीटकर इस भाषा बोध को राज ठाकरे के कथित सैनिक दिखाते रहे। वे भूल गए कि बंग-भंग के खिलाफ आंदोलन के दौरान 1905 में मराठी मानुष के पूज्य पुरूष बाल गंगाधर तिलक ने वाराणसी की यात्रा की थी। इस दौरान ‘काशी नागरी प्रचारिणी सभा’ में दिए एक व्याख्यान में उन्होंने पुरजोर तरीके से ‘हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा ‘ घोषित किया था। मराठी अस्मिताबोध के शोर में तिलक की यह आवाज अक्सर खोती रही है। एक खतरा यह भी है कि मराठी के कामचलाऊ ज्ञान की शर्त राज्य के दूसरे धंधे में काम कर रहे लोगों पर भी बाद में लागू हो सकती है। चूंकि उपराष्ट्रीयता वाले इलाकों में अपनी भाषा और संस्कृति का मसला लोगों के मर्म को छूता है, इसलिए राजनीति अक्सर इसे उभारने की कोशिश करती है। मौका देखकर आने वाले दिनों में राज्य में कार्यरत निर्माण मजदूरों आदि पर भी यह शर्त थोपी जा सकती है। इससे निश्चित तौर पर प्रवासी हिंदीभाषियों के लिए संकट पैदा होगा, उससे पलायन भी बढ़ सकता है। जिसकी कीमत राज्य की अर्थव्यवस्था और उद्योग को भी चुकानी पड़ सकती है। इसलिए जरूरी है कि इस मसले पर सर्वमान्य और सर्वस्वीकार्य रास्ता तलाशा जाए। नियमों को बेड़ी नहीं, लोक का सहयोगी होना चाहिए। इस नजरिए से भी इस बारे में विचार होना चाहिए। आखिर में इस भाषा विवाद का एक सिरा देवेंद्र फड़णवीस के राजनीतिक करीयर से भी जुड़ता है। भारतीय जनता पार्टी का एक वर्ग उनमें राष्ट्रीय राजनीति की संभावना देखता है। महाराष्ट्र तक तो उनका मराठी अस्मिताबोध स्वीकार्य हो सकता है, लेकिन जब वे राष्ट्रीय राजनीति में सफल होने की कोशिश करेंगे, अपनी भाषा बोध के बहाने हिंदीभाषियों का विरोध उनकी राह की बाधा बन सकता है। - उमेश चतुर्वेदी लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक हैं..
Yogi Adityanath New Strategy! क्या Gen Z और Women Voters जिताएंगे UP Election?
'बातचीत और हड़ताल साथ-साथ नहीं चल सकते', पंजाब में सरकारी कर्मचारियों के प्रदर्शन पर बोले सीएम भगवंत मान
जम्मू-कश्मीर को लेकर सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। वीडियो में कथित तौर पर भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) की एक महिला कर्मचारी भारत और जम्मू-कश्मीर को लेकर राष्ट्रविरोधी टिप्पणियां करती सुनाई दे रही है। इस मामले की जांच के आदेश दिए गए हैं। इस बीच सोशल मीडिया पर भी यह मामला खासा चर्चा में आ गया है ओर उस महिला की सोच, उसके तर्क और सरकारी पद पर रहते हुए उसके कथित बयानों को लेकर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। हालांकि सबसे पहले यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि वीडियो की प्रामाणिकता, उसमें सुनाई दे रही आवाज और वीडियो में दिख रही महिला की पहचान की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। एफसीआई ने मामले की जांच शुरू की है और कहा है कि संबंधित कर्मचारी को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब मांगा जाएगा। जांच के बाद ही यह तय होगा कि वीडियो में दिख रही महिला वास्तव में एफसीआई की कर्मचारी है या नहीं और आवाज उसी की है या नहीं। जहां तक वायरल वीडियो के कंटेंट की बात है तो आपको बता दें कि वीडियो में महिला यह भी कहती हुई सुनाई देती है कि सरकारी नौकरी करने का मतलब यह नहीं है कि कोई व्यक्ति मुख्यधारा का हिस्सा बन गया है। वह कहती है, ‘‘अगर हम किसी प्रतिरोध आंदोलन का हिस्सा हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि हम इंसान नहीं हैं। हमारी भी जरूरतें होती हैं और उन जरूरतों को पूरा करने के लिए नौकरी की जरूरत पड़ सकती है। अगर अच्छी नौकरी मिलती है, तो हम वो नौकरी करते हैं।’’ महिला ने यह भी कहा कि नौकरी मिलने से ‘‘भारत को लेकर उसके रुख’’ में कोई बदलाव नहीं आएगा। उसने कहा, ‘‘कश्मीर पर भारत का कब्जा अन्यायपूर्ण है और यह अन्यायपूर्ण ही रहेगा।’’ महिला ने पिछले तीन दशकों में कश्मीर में हुई मौत का भी जिक्र किया और कहा, ‘‘हम नौकरी के बदले उनका सौदा नहीं कर सकते।’’ इसे भी पढ़ें: Shaurya Path: Kirana Hills और Skardu को लेकर पूर्व CDS Anil Chauhan के खुलासों से चौंकी दुनिया, Pakistan बात करना चाह रहा था, मगर India... वीडियो की प्रामाणिकता और उसमें दिख रही महिला की पहचान की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है लेकिन अगर जांच में वीडियो सही साबित होता है, तो सवाल सिर्फ एक कर्मचारी के बयान का नहीं रहेगा। सवाल उस मानसिकता का होगा जो भारत की सरकारी व्यवस्था का हिस्सा रहते हुए भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर ही सवाल उठाती दिखाई देती है। वीडियो में कथित तौर पर कहा गया कि कश्मीर पर भारत का कब्जा “अन्यायपूर्ण” है। यहीं से सवालों की लंबी श्रृंखला शुरू होती है। पहला सवाल यह है कि आखिर जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानने से इंकार करने का आधार क्या है? जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, था और रहेगा। यह भारत की संवैधानिक और राष्ट्रीय स्थिति है। सवाल यह भी है कि क्या कश्मीर के इतिहास, जम्मू-कश्मीर के भारत में विधिवत विलय और उसके बाद के संवैधानिक ढांचे को नजरअंदाज कर केवल राजनीतिक नारेबाजी को इतिहास मान लिया जाएगा? सवाल यह भी है कि अगर जम्मू-कश्मीर का भारत में होना “कब्जा” है, तो पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर यानी पीओके पर पाकिस्तान के नियंत्रण को क्या कहा जाएगा? यही वह बुनियादी अंतर है जिसे जानबूझकर धुंधला करने की कोशिश की जाती है। देखा जाये तो भारत का जम्मू-कश्मीर पर कोई “अन्यायपूर्ण कब्जा” नहीं है। असली विवाद उस क्षेत्र का है जिस पर पाकिस्तान ने नियंत्रण कायम कर रखा है। पीओके पर पाकिस्तान का कब्जा ही वह प्रश्न है, जिस पर अक्सर भारत-विरोधी नैरेटिव चुप्पी साध लेता है। ऐसे लोगों से सवाल है कि पीओके में आम लोगों के विरोध प्रदर्शनों, आर्थिक संकट, महंगाई और शासन के खिलाफ उठती आवाजों पर चुप्पी क्यों है? हाल के दिनों में पीओके में बिजली दरों, करों, महंगाई, संसाधनों और राजनीतिक अधिकारों को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध देखने को मिला है। कई मौकों पर प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हिंसक टकराव की खबरें सामने आईं। वहां के लोगों ने पाकिस्तान सरकार और प्रशासन पर उपेक्षा तथा अन्यायपूर्ण दमन के आरोप लगाए लेकिन भारत से सवाल पूछने वालों ने पाकिस्तान से एक भी सवाल नहीं पूछा। जब पीओके के लोग सड़कों पर उतरकर अपने अधिकारों की बात करते हैं, तो मानवाधिकार की चिंता करने वाले कथित बुद्धिजीवी उस समय इतने खामोश क्यों हो जाते हैं? अब वापस उस वायरल वीडियो पर आते हैं। अगर जांच में यह साबित होता है कि वीडियो में बोल रही महिला वास्तव में केंद्र सरकार के अधीन एफसीआई की कर्मचारी है और कथित बयान उसी के हैं, तो सवाल उठता है कि क्या भारत सरकार की नौकरी केवल वेतन लेने का साधन है और भारत के खिलाफ वैचारिक युद्ध छेड़ने का लाइसेंस भी है? भारतीय करदाताओं के पैसे से मिलने वाली तनख्वाह स्वीकार करना और उसी देश की क्षेत्रीय अखंडता को “अन्यायपूर्ण” बताना, क्या यह गंभीर नैतिक विरोधाभास नहीं है? अगर नौकरी केवल “जरूरत” है और विचार भारत-विरोधी ही बने रहेंगे, तो फिर सार्वजनिक पद की जिम्मेदारी का अर्थ क्या है? क्या कोई व्यक्ति सरकारी सेवा के लाभ तो स्वीकार कर सकता है, लेकिन उसी राज्य की संवैधानिक संप्रभुता को खुलकर चुनौती देता रह सकता है? क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह है कि संवैधानिक व्यवस्था के भीतर रहकर उसी व्यवस्था की वैधता को मनमाने ढंग से खारिज कर दिया जाए? क्या सरकारी कर्मचारी के लिए सेवा नियम, आचरण संहिता और संवैधानिक जिम्मेदारियां कोई मायने नहीं रखतीं? क्या भारत से मिलने वाले अवसर स्वीकार करना और फिर भारत को ही “कब्जेदार” बताना वैचारिक ईमानदारी है? अगर भारत वास्तव में उतना ही “अन्यायपूर्ण” है, जैसा वीडियो में कथित तौर पर कहा गया, तो उसी व्यवस्था के तहत मिलने वाली नौकरी, वेतन, सुविधाएं और सुरक्षा स्वीकार करने में कोई नैतिक द्वंद्व क्यों नहीं है? क्या “प्रतिरोध” के नाम पर राष्ट्र की संप्रभुता पर सवाल उठाना स्वतः ही नैतिक रूप से उचित हो जाता है? क्या कश्मीर में पिछले दशकों की हिंसा पर चर्चा करते समय आतंकवाद के शिकार नागरिकों, सुरक्षाबलों और कश्मीरी पंडितों के दर्द को भी समान रूप से याद किया जाता है? कथित बयान देने वाली महिला चूंकि सरकारी पद पर है तो सवाल यह भी उठता है कि क्या किसी व्यक्ति की निजी राजनीतिक राय उसे अपने सार्वजनिक पद से जुड़ी जवाबदेही से मुक्त कर देती है? क्या राष्ट्र की एकता और अखंडता पर सवाल उठाने के बाद भी कोई व्यक्ति केवल “मेरी निजी राय है” कहकर अपनी जिम्मेदारी से बच सकता है? भारत में रहकर, भारत की सरकारी व्यवस्था का हिस्सा बनकर और भारतीय करदाताओं के पैसे से वेतन प्राप्त करते हुए अगर कोई व्यक्ति भारत की संप्रभुता को ही चुनौती देता है, तो क्या देश को उसकी इस सोच पर सवाल पूछने का अधिकार नहीं है? देखा जाये तो यह मामला केवल भावनाओं का नहीं, बल्कि तथ्यों और जवाबदेही का भी है। एफसीआई ने जांच के आदेश दिए हैं और यही उचित प्रक्रिया है। किसी भी व्यक्ति को केवल वायरल वीडियो के आधार पर दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं होगा। लेकिन यदि जांच में वीडियो की प्रामाणिकता और संबंधित कर्मचारी की पहचान की पुष्टि होती है, तो संबंधित संस्था को सेवा नियमों और कानून के दायरे में उचित कार्रवाई करनी ही होगी। वैसे इस मामले को गंभीरता से लेते हुए भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) ने उस वीडियो की जांच के आदेश दिए हैं जिसमें कथित तौर पर निगम की एक महिला कर्मचारी भारत के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करती नजर आ रही है। निगम ने कहा कि सोशल मीडिया पर वायरल इस वीडियो के संबंध में वह कर्मचारी को कारण बताओ नोटिस जारी करेगा। माना जाता है कि महिला एफसीआई की प्रबंधक या गुणवत्ता नियंत्रण अधिकारी है। एफसीआई के महाप्रबंधक आई.के. चौधरी ने कहा कि निगम ने इस मामले को गंभीरता से लिया है। यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि क्या वीडियो में दिख रही महिला, निगम कर्मचारी है और क्या वीडियो क्लिप में सुनाई दे रही आवाज उसी की है। चौधरी ने पत्रकारों से कहा, ‘‘मैं उसका जवाब जानने के लिए कल उसे कारण बताओ नोटिस जारी करूंगा। उसके बाद मामले की पूरी जांच की जाएगी। अगर महिला मान लेती है कि वीडियो उसी का है, या जांच में यह साबित हो जाता है कि वीडियो में वही थी, तो हम उक्त कर्मचारी के खिलाफ सख्त कार्रवाई करेंगे।’’ चौधरी ने बताया कि निगम अपने सभी कर्मचारियों का पुलिस सत्यापन करवाता है। उन्होंने कहा कि अगर जांच में यह साबित हो जाता है कि महिला एफसीआई की कर्मचारी है और उसी ने ये बातें कही हैं, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। हालांकि, चौधरी ने यह भी कहा कि जांच पूरी होने से पहले यह नतीजा निकालना जल्दबाजी होगी कि वीडियो या उसमें सुनाई दे रही आवाज उसी कर्मचारी की है।
सच्चाई vs भ्रम: मनुस्मृति में नारी को लेकर ऐसा लिखा क्या है? जिस पर होता है बवाल
हजार साल पुराना है उनका गुस्सा, हजारों साल पुरानी है उनकी नफरत गोरख पांडे के इन शब्दों को अगर आज के समाज की असलियत कहा जाए तो कोई गलती नहीं होगी। सोचिए एक किताब जिसे कुछ लोग धर्म की बुनियाद मानते हैं और वहीं कुछ लोग उसे सरेआम जलाकर अपना गुस्सा जाहिर करते हैं। हम बात कर रहे हैं प्राचीन भारत के सबसे असरदार और शायद सबसे विवादित ग्रंथ की मनुस्मृति की। आप में से कितने लोगों ने मनुस्मृति को पढ़ा है? आप में से बहुत सारे लोगों ने गीता को पढ़ा होगा। रामचरितमानस को पढ़ा होगा, महाभारत को पढ़ा होगा। कुछ लोगों ने प्राचीन पुस्तकों को जो अलग-अलग पुस्तकें हैं उन्हें पढ़ा होगा। वेदों को पढ़ा होगा और इनसे आपने बहुत कुछ सीखा भी होगा। ऐसी ही एक प्राचीन पुस्तक है जिसे हम कहते हैं मनुस्मृति। राहुल गांधी ने एक बार फिर से मनुस्मृति को अपना निशाना बनाया है। पुणे में छात्रों की गूंज नाम के अपने कार्यक्रम में राहुल गांधी ने छात्रों से बात की थी और इस दौरान राहुल गांधी ने मनुस्मृति में एक श्लोक का जिक्र करते हुए कहा कि कैसे यह किताब महिलाओं की आजादी के खिलाफ है और इस पर हमें शर्म आनी चाहिए। ऐसा राहुल गांधी ने कहा। अब सवाल यह है कि आखिर राहुल गांधी बार-बार मनुस्मृति को ही अपना निशाना क्यों बनाते हैं? इस किताब का पूरा नाम मानव धर्म शास्त्र है। तो आज सबसे पहले आपको मनुस्मृति के बारे में बताते हैं। इसे भी पढ़ें: क्यों ठुकराई PM की कुर्सी? प्रियंका पर राहुल को तरजीह, बच्चन परिवार से क्यों बिगड़े रिश्ते, 10 नवंबर को सोनिया गांधी बड़ा खुलासा करने वाली हैं! दो प्रकार के ग्रंथ देखने को मिलते हैं जब हम भारत में धर्म ग्रंथों की बात करते हैं तो अमूमन शुरुआत में दो प्रकार के ग्रंथ देखने को मिलते हैं। एक जिनको हम श्रुति ग्रंथ कहते हैं जिनको सुना गया समझा गया। एक उनको स्मृति ग्रंथ जिनको सुनने के बाद याद किया गया और फिर उसे लिखा गया। कई बार इनको उनके डिसाइपल्स द्वारा लिखा गया। तो श्रुति के बाद स्मृतियों का जो महत्व है। हिंदू धर्म में या सनातन धर्म की अगर बात करें तो प्राचीन में बहुत सारे ग्रंथ जो थे वो इन्हीं विधियों से होकर आगे बढ़े हैं। वेदों की बात करें या अरण्यकों की बात करें। ब्राह्मस्य की बात करें या उन स्मृतियों की बात करें जिनमें से एक मनुस्मृति है। स्मृतियों की बात करें तो कुल लगभग 18 स्मृति है। अगर हम धर्मशास्त्र की बात करें तो 18 स्मृति है। जैसे मनुस्मृति, याज्ञवल्क स्मृति, पराशर स्मृति, विष्णु स्मृति और बहुत सारी। इनमें से पहली स्मृति मनुस्मृति को कहा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि जो ब्रह्मा थे उन्होंने मनु को ज्ञान दिया। ठीक है? मनु ने यही ज्ञान अपने शिष्य भृगु को दिया और भृगु ने अपने इस ज्ञान को आगे मानवता तक बढ़ाया। शुरुआत में ज्ञान की परंपरा को ऐसे बताया गया है। सृष्टि के पहले इंसान ने लिखी पुस्तक इस किताब में 12 अध्याय हैं और लगभग 2694 श्लोक इस किताब में हैं। हिंदुओं की ऐसी मान्यताएं है कि इस पुस्तक को सृष्टि के पहले इंसान ने लिखा था और उन्होंने ही इसके जरिए मानवता को तमाम तरह के कानून दिए। मतलब जो सृष्टि में पहला मनुष्य है उसने इसे लिखा। इसीलिए इसे मनुस्मृति कहा जाता है। यहां मनु का मतलब है पहला मनुष्य। हालांकि कई विद्वानों का ऐसा मानना है कि यह पुस्तक आज से लगभग 2000 वर्ष पहले यानी 200 ईसा पूर्व से लेकर के के आसपास लिखी गई है और 200 ईसा पूर्व से 200 ईसवी के बीच इसे लिखा गया है। इस ग्रंथ में मनु ने जीवन दर्शन, प्रशासन, समाज की रचना, नीतियां और कानून के बारे में विस्तार से बताया है। यानी समाज को कैसे चलाना है। राजा से लेकर प्रजा तक सबका धर्म क्या होना चाहिए? आचार विचार क्या होना चाहिए? व्यवहार कैसा होना चाहिए? ये सारी बातें इस पुस्तक में बताई गई है। यह जीवन जीने की एक पूरी पद्धति है। ध्यान देने वाली बात यह है कि जिस समय यह पुस्तक लिखी गई तब तक ना तो बाइबल लिखी गई थी और ना ही कुरान लिखी गई थी। शासन और प्रशासन और सामाजिक व्यवस्था में इस पुस्तक का इस्तेमाल ना सिर्फ भारत में बल्कि कंबोडिया और इंडोनेशिया जैसे देशों में भी हुआ जहां पर हिंदू साम्राज्य हुआ करते थे। ब्रिटिश काल में अंग्रेजों ने हिंदू कोड बनाने में इस ग्रंथ का काफी इस्तेमाल किया था। लेकिन आजाद भारत के कानून में हमारे संविधान में इस पुस्तक की कोई जगह नहीं है। इसे भी पढ़ें: Cheeni Kum hai! एथनॉल का असर या त्योहारों का, अचानक क्यों आसमान छूने लगे चीनी के दाम? 10 लाइन में समझें पूरा मामला महिलाओं के पक्ष में भी लिखी गई कई बातें यत्र नार्यस्तु पूजयंते रमंते तत्र देवता। हिंदी में इसका मतलब है जहां महिलाओं का सम्मान होता है वहां देवता निवास करते हैं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि यह पुस्तक आज से लगभग 2000 वर्ष पहले लिखी गई थी। इसे आज की नैतिकता से जज नहीं किया जा सकता। बाइबल दास प्रथा को, स्लेवरी को समर्थन देती है। और कई जानकारों का दावा है कि कुरान में भी कई ऐसी बातें हैं जो महिला विरोधी हैं और इस पर आज भी बहस होती रहती है। यह एक विवाद का विषय है। जबकि ये दोनों ही पुस्तकें मनुस्मृति के कई 100 वर्ष बाद लिखी गई थी। यह किताब दहेज के भी खिलाफ है। और तो और इसमें यह भी कहा गया है कि शूद्रों और महिलाओं को भी धर्म के रास्ते पर चलने का पूरा हक है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में भी जिक्र 2026 के एक फैसले में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक विधवा के गुजारे भत्ते के अधिकार को सही ठहराने के लिए मनुस्मृति का ही हवाला दिया था। ये दिखाता है कि ये महज इतिहास के पन्नों में दबी हुई कोई किताब नहीं है। और ये कोई एक आध बार नहीं हुआ है। 2019 से पहले ही सुप्रीम कोर्ट सात से भी ज्यादा बार अपने फैसलों में मनुस्मृति का जिक्र कर चुका था। अगर हाई कोर्ट्स की बात करें तो वहां तो इसका इस्तेमाल और भी ज्यादा होता रहा है। पहले जलाया फिर महिलाओं को हक दिलाने में श्लोकों का किया इस्तेमाल 25 दिसंबर, 1927 का दिन था जब डॉ. अंबेडकर ने मनुस्मृति का सार्वजनिक दहन किया। अंबेडकर ने पहले से घोषणा कर दी थी कि वह इस हिंदू ग्रंथ को जलाएंगे। जो जगह उन्होंने इसके लिए चुनी वो महाड़ नाम का महाराष्ट्र का तटीय इलाका था, जो कोलाबा (अब रायगढ़) जिले में था। अंबेडकर मनुस्मृति को जातिवादी और पितृसत्तात्मक मानदंडों के खिलाफ मानते थे। बकौल उनके, मनुस्मृति ऐसा हिंदू ग्रंथ है, जो जाति उत्पीड़न को संस्थागत बनाता था। निचली जातियों, विशेषकर दलितों और महिलाओं के शोषण और भेदभाव को उचित ठहराता था। डॉक्टर अंबेडकर ने मनुस्मृति को जलाकर इसका विरोध किया था उन्हीं ने बाद में हिंदू कोड बिल की बहस में महिलाओं को प्रॉपर्टी में हक दिलाने के लिए मनुस्मृति के ही कुछ प्रोग्रेसिव श्लोकों का इस्तेमाल किया। डॉ. बी आर आंबेडकर ने यह तर्क दिया था कि महिलाओं को संपत्ति में अधिकार देने की बात ऋषि मनु जैसे स्मृतिकारों द्वारा कही गई थी। 24 फरवरी 1949 को संविधान सभा की बहस के दौरान उन्होंने कहा था: इसमें कोई संदेह नहीं है कि जिन दो स्मृतिकारों का मैंने उल्लेख किया है—याज्ञवल्क्य और मनु—वे उन 137 स्मृतिकारों में सर्वोच्च स्थान रखते हैं जिन्होंने स्मृतियों की रचना करने का प्रयास किया था। इन दोनों ने ही यह व्यवस्था दी है कि पुत्री एक-चौथाई हिस्से की हकदार है। यह अत्यंत खेदजनक है कि किसी न किसी कारणवश कुरीतियों और प्रथाओं ने इस मूल विधान के प्रभाव को नष्ट कर दिया; अन्यथा हमारी अपनी स्मृतियों के आधार पर भी पुत्री एक-चौथाई हिस्सा पाने की पूरी हकदार होती। उन्होंने आगे कानूनों की तुलना में रीति-रिवाजों और प्रथाओं को प्राथमिकता देने के लिए प्रिवी काउंसिल को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि यदि ऐसा न हुआ होता, तो मनुस्मृति ने वर्षों पहले ही महिलाओं और संपत्ति में उनके उत्तराधिकार के अधिकारों को सशक्त बना दिया होता।

