जंतर-मंतर की सियासी झाड़फूंक: संविधान, राजनीति और सामाजिक न्याय की असली परीक्षा!
नई दिल्ली स्थित ऐतिहासिक धरना-प्रदर्शन स्थल जंतर-मंतर (वोट क्लब के बाद) पर 21 अगस्त 2026 को हुआ ‘आरक्षण हटाओ’ आंदोलन वास्तव में आरक्षण सुधार मुहिम बनकर रह गया। हालांकि इसके सामाजिक मिजाज और जनहितकारी तेवरों ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह घटनाक्रम भारतीय राजनीति के लिए महज एक और धरना नहीं है, बल्कि यह उस असंतोष की राजनीतिक अभिव्यक्ति है जो सरकारी नौकरियों, प्रतियोगी परीक्षाओं और उच्च शिक्षा में अवसरों को लेकर सामान्य वर्ग के एक प्रतिभाशाली हिस्से, खासकर जेन-जी युवाओं में दिखाई दे रहा है। साथ ही प्रौढ़ और बुजुर्ग समाजसेवियों का समर्थन भी उन्हें प्राप्त है। इसलिए जंतर-मंतर की सियासी झाड़फूंक पर गौर फरमाना आवश्यक है, क्योंकि संविधान, राजनीति और सामाजिक न्याय की असली परीक्षा यहीं से शुरू होती है जो कब खत्म होगी, शायद नेताओं को भी नहीं पता, क्योंकि दो नावों की सवारी करने में वे माहिर जो होते हैं। कहना न होगा कि जिस तरह से 21 अगस्त को बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर पहुंचे और अनुमति न मिलने के बावजूद 22 अगस्त को भी प्रदर्शन जारी रहा और दिल्ली पुलिस द्वारा 50 से अधिक लोगों को हिरासत में लिए जाने की रिपोर्ट सामने आई, उसने केंद्र सरकार और पुलिस प्रशासन की पक्षपाती भूमिका का भी पर्दाफाश कर दिया। इसे भी पढ़ें: दिमागी नक्सल विवाद पर P Chidambaram का Kiren Rijiju को करारा जवाब, बोले- 'हमें गर्व है' इससे सामान्य वर्ग के आन्दोलनकारियों, जो मोदी सरकार के प्रबल समर्थक लोगों में शुमार किये जाते हैं, को यूजीसी मुहिम के बाद आरक्षण सुधार मुहिम के रूप में दूसरा बड़ा धक्का लगा। वस्तुतः, प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांग थी कि सरकारी सहायता और आरक्षण का आधार जाति के बजाय आर्थिक वंचना को अधिक महत्व दे। लेकिन यहीं से असली बहस शुरू होती है, वह यह कि- पहला यह कि, जब अपनी सरकार से आरक्षण पर सवाल पूछना अपराध नहीं है तो फिर दिल्ली पुलिस ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर पर अनुमति क्यों नहीं दी? फिर शांतिपूर्ण लोगों पर बल प्रयोग और गिरफ्तारी क्यों की गई? इस जनप्रदर्शन का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि आरक्षण पर असहमति को अपने-आप सामाजिक न्याय-विरोधी मानने के बजाय इसे सार्वजनिक नीति की बहस के रूप में देखने की गुंजाइश दिखाई देती है। यह distinction महत्वपूर्ण है। जैसे आरक्षण की आलोचना करना और वंचित वर्गों के अधिकारों का विरोध करना एक ही बात नहीं है। उसी तरह, आरक्षण का समर्थन करना और आरक्षण व्यवस्था के हर वर्तमान प्रावधान को सही मानना भी एक ही बात नहीं है। यही वह बीच का क्षेत्र है जहां गंभीर पत्रकारिता और नीति-विमर्श होना चाहिए। यद्यपि जंतर-मंतर के आंदोलनों और पत्रकारों से जुड़े घटनाक्रम पर अलग से कतिपय कार्यक्रम भी सामने आया है। इससे उनका व्यापक दृष्टिकोण समझने में मदद मिलती है कि वे आंदोलन को केवल तत्काल राजनीतिक नारे के रूप में नहीं, बल्कि उसके पीछे के सामाजिक और राजनीतिक संदेश के रूप में देखते हैं। दूसरा यह कि आंदोलन की सबसे मजबूत दलील क्या है? आंदोलनकारियों का सबसे मजबूत प्रश्न है: अगर गरीबी सभी जातियों में मौजूद है, तो आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति की मदद केवल उसकी जाति देखकर क्यों तय हो? यह सवाल भावनात्मक होने के साथ-साथ नीतिगत भी है। प्रदर्शन में मेरिट, आर्थिक आधार और आरक्षण नीति पर श्वेत पत्र (White Paper) की मांग उठी। यह मांग सरकार को असहज कर सकती है क्योंकि इससे बहस सीधे आंकड़ों पर आ जाएगी: आरक्षण का वास्तविक लाभ किसे मिला? किन परिवारों को पीढ़ियों से लाभ मिल रहा है? कौन से समुदाय अभी भी प्रतिनिधित्व से बाहर हैं? आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के युवाओं के लिए पर्याप्त अवसर हैं या नहीं? सरकारी नौकरियां इतनी हैं भी या नहीं कि आरक्षण की पूरी बहस को केवल कोटे के प्रश्न तक सीमित किया जा सके? इसलिए White Paper की मांग को केवल आरक्षण-विरोधी नारा मानकर खारिज करना उचित नहीं होगा। तीसरा यह कि, लेकिन आंदोलन की सबसे बड़ी वैचारिक कमजोरी भी यहीं है! सिर्फ गरीबी सामाजिक पिछड़ेपन का पूरा मापदंड नहीं है। किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति बदल सकती है, लेकिन सामाजिक पहचान और उससे जुड़े भेदभाव के अनुभव हमेशा उसी गति से नहीं बदलते। यही आरक्षण समर्थक पक्ष की मूल दलील है। इसलिए यदि आंदोलन यह मान ले कि गरीबी = पिछड़ापन तो उसका तर्क अधूरा रह जाएगा। भारत में आरक्षण केवल गरीबी हटाने की योजना नहीं है, बल्कि इसका संबंध सामाजिक प्रतिनिधित्व और ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों को संस्थागत अवसर देने से भी है। इसीलिए आर्थिक सहायता और आरक्षण को पूरी तरह समानार्थी मानना संवैधानिक और सामाजिक दोनों दृष्टि से समस्या पैदा करता है। चौथा यह कि, चिराग पासवान जैसों की प्रतिक्रिया क्यों महत्वपूर्ण है? गत 22 अगस्त को चिराग पासवान ने आरक्षण को खैरात नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार बताते हुए कहा कि यह किसी आंदोलन के कहने मात्र से समाप्त नहीं हो सकता। राजनीतिक दृष्टि से यह प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण है, क्योंकि यदि एक ओर सामान्य वर्ग के युवाओं में असंतोष बढ़ता है, तो दूसरी ओर SC/ST/OBC राजनीतिक समूहों के लिए आरक्षण केवल सरकारी नीति नहीं बल्कि प्रतिनिधित्व और सामाजिक सुरक्षा का प्रश्न है। इसलिए कोई भी राष्ट्रीय दल सीधे तौर पर एक पक्ष चुनकर दूसरे को खोने का जोखिम नहीं उठा सकता। यही वजह है कि भाजपा सहित सभी दलों के सामने आने वाले समय में कठिन सामाजिक-संतुलन की चुनौती होगी। जबकि वास्तविकता यह है कि इसी आरक्षण की आड़ में कतिपय दलित/आदिवासी परिवार फल फूल रहे हैं और अपने ही वर्ग के वंचित लोगों की हकमारी कर रहे हैं। चूंकि संसद और सुप्रीम कोर्ट अबतक इनके पक्ष में है, इसलिए ये वास्तविक दलितों/आदिवासियों को फलने फूलने के मौके नहीं दिए और इसके लिए मनुवादियों यानी सामान्य वर्ग के लोगों को जिम्मेदार ठहराकर अपना सियासी हित साधते आए हैं। मौजूदा आंदोलन से यह स्थिति भी बदलेगी। पांचवां यह कि, ब्रजेश पाठक का हस्तक्षेप भी राजनीतिक संकेत है। उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने आंदोलनकारी छात्रों के नेता हर्ष दूबे से मुलाकात कर उनकी शिकायतों को आगे पहुंचाने और केंद्रीय मंत्री से बातचीत कराने का आश्वासन दिया। यह छोटा घटनाक्रम नहीं है। इसका अर्थ यह निकाला जा सकता है कि सरकार के भीतर भी यह समझ है कि आंदोलन को केवल ‘आरक्षण विरोध’ कहकर नज़रअंदाज़ करना राजनीतिक रूप से पर्याप्त रणनीति नहीं होगी। संवाद शुरू होना ही इस आंदोलन की पहली राजनीतिक उपलब्धि है। लेकिन संवाद का अर्थ मांगों को स्वीकार करना नहीं है। छठा यह कि, संविधान बनाम आंदोलन: असली सीमा कहां है? यहां सबसे जरूरी सावधानी है। आरक्षण व्यवस्था संविधान, संसद और सुप्रीम कोर्ट के विकसित होते न्यायशास्त्र से जुड़ी हुई है। इसलिए इसे केवल सड़क के आंदोलन से समाप्त या पूरी तरह पुनर्गठित नहीं किया जा सकता। दूसरी तरफ लोकतंत्र में किसी नीति की आलोचना करने के लिए संविधान-विरोधी होना आवश्यक नहीं। यही लोकतांत्रिक संतुलन है: आरक्षण का संवैधानिक अस्तित्व सुरक्षित रहे, लेकिन आरक्षण की नीतियों पर लोकतांत्रिक समीक्षा का अधिकार भी सुरक्षित रहे। इसलिए ‘आरक्षण पर चर्चा ही नहीं हो सकती’ और ‘आरक्षण तुरंत खत्म कर दो’—दोनों अतियां हैं। सातवां यह कि, SC/ST Act को आरक्षण बहस में जोड़ना आंदोलन को कमजोर कर सकता है। जंतर-मंतर के कुछ प्रदर्शनकारियों ने SC/ST Act को समाप्त करने की मांग भी उठाई। राजनीतिक दृष्टि से यह आंदोलन के लिए जोखिम है। क्यों? क्योंकि आरक्षण की समीक्षा पर आर्थिक, प्रशासनिक और प्रतिनिधित्व आधारित बहस हो सकती है। लेकिन SC/ST Act का विषय मुख्यतः अत्याचार, भेदभाव और कानूनी संरक्षण से जुड़ा है। दोनों को एक ही मुद्दा बना देने से आंदोलन का मुख्य प्रश्न—आरक्षण सुधार—एक अलग और अधिक विवादास्पद राजनीतिक लड़ाई में बदल सकता है। यदि आंदोलन व्यापक सामाजिक समर्थन चाहता है तो उसे अपने एजेंडे में स्पष्ट प्राथमिकता रखनी होगी। आठवां यह कि, ‘मेरिट’ की बहस को भी अधिक वैज्ञानिक बनाने की जरूरत है। ‘मेरिट बचाओ’ एक प्रभावी नारा है। लेकिन मेरिट केवल परीक्षा में मिले अंकों का नाम नहीं है। एक गरीब सरकारी स्कूल का विद्यार्थी, जिसके पास महंगी कोचिंग, अंग्रेजी माध्यम, डिजिटल संसाधन और शिक्षित पारिवारिक वातावरण नहीं है, और दूसरी ओर अत्यधिक संसाधन वाले परिवार का विद्यार्थी—दोनों की परीक्षा-तैयारी की परिस्थितियां समान नहीं होतीं। इसलिए भारत को ऐसी नीति चाहिए जो प्रतिस्पर्धा की गुणवत्ता भी बचाए और अवसर की असमानता भी कम करे। यही वास्तविक meritocracy होगी। नौवां यह कि, आंदोलन यदि सफल होना चाहता है तो उसे ‘आरक्षण हटाओ’ से आगे जाना होगा और 'आरक्षण सुधारो' की बात करनी होगी। यही सबसे निर्णायक राजनीतिक बिंदु है। यदि आंदोलन का संदेश केवल “आरक्षण समाप्त करो” रहता है, तो इसका सामाजिक आधार सीमित रहेगा। लेकिन यदि इसका एजेंडा बनता है आरक्षण सुधारो और “समान अवसर + पारदर्शी आरक्षण + वास्तविक वंचित तक लाभ + आर्थिक रूप से कमजोर युवाओं के लिए मजबूत सहायता + गुणवत्तापूर्ण शिक्षा + सरकारी भर्ती में पारदर्शिता” तो इसका प्रभाव बहुत व्यापक हो सकता है। तब यह किसी एक जाति के खिलाफ आंदोलन नहीं बल्कि नीति-सुधार आंदोलन बन सकता है। दसवां यह कि, राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ा खतरा यह है कि भारतीय राजनीति ने लंबे समय से जातीय समूहों को चुनावी गणित की इकाइयों के रूप में देखा है। यह आंदोलन उस गणित में एक नया प्रश्न जोड़ रहा है: क्या आर्थिक रूप से कमजोर लेकिन गैर-आरक्षित युवा भी एक स्वतंत्र राजनीतिक दबाव समूह बन सकता है? यदि उत्तर हां है, तो राजनीतिक दलों को केवल जातीय समीकरणों के आधार पर घोषणापत्र तैयार करना कठिन होगा। उन्हें रोजगार, शिक्षा, परीक्षा प्रणाली, छात्रवृत्ति, कोचिंग, आर्थिक सहायता और आरक्षण के वास्तविक लाभार्थियों पर ठोस नीति देनी पड़ेगी। ग्यारहवां यह कि, क्या आरक्षण समर्थन या आरक्षण विरोध के बीच आरक्षण सुधार की वास्तविक राजनीतिक उपयोगिता सिद्ध की जाएगी। क्योंकि इस दृष्टिकोण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इससे बहस को एक सरल binary से बाहर निकालने की संभावना पैदा होगी। आरक्षण समर्थक बनाम आरक्षण विरोधी के बजाय बहस हो कि सामाजिक न्याय कैसे अधिक न्यायपूर्ण बने? यह प्रश्न ज्यादा कठिन है, लेकिन ज्यादा लोकतांत्रिक भी। क्योंकि संभव है कि वर्तमान व्यवस्था में कुछ ऐसे लोग हों जिन्हें सहायता की जरूरत है लेकिन वे उससे बाहर हैं। और यह भी संभव है कि कुछ ऐसे लोग हों जो ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदाय से आते हैं और आज भी सामाजिक भेदभाव तथा प्रतिनिधित्व की कमी का सामना करते हैं। लिहाजा एक न्यायपूर्ण नीति को दोनों वास्तविकताओं को स्वीकार करना होगा। निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि आरक्षण खत्म करने की नहीं, बल्कि आरक्षण को अधिक न्यायपूर्ण बनाने की बहस होनी चाहिए? जंतर-मंतर का आंदोलन अभी इतना बड़ा नहीं हो गया है कि इसे तत्काल राष्ट्रीय राजनीतिक परिवर्तन का संकेत कहा जाए। लेकिन इसे नजरअंदाज करना भी राजनीतिक भूल होगी। 21–22 अगस्त की भीड़, सोशल मीडिया से जुटाव, हिरासत, मेरिट और आर्थिक आधार की मांग, White Paper की मांग और राजनीतिक नेताओं की प्रतिक्रियाएं बताती हैं कि आरक्षण पर एक नया विमर्श आकार ले रहा है। असल सवाल शायद यह नहीं है कि “आरक्षण रहे या खत्म हो?” बल्कि यह है कि क्या भारत ऐसा सामाजिक न्याय मॉडल बना सकता है जिसमें ऐतिहासिक सामाजिक वंचना का समाधान भी हो, वास्तविक गरीब को उसकी जाति से परे अवसर भी मिले, मेरिट और प्रतिस्पर्धा की गुणवत्ता भी बनी रहे और आरक्षण का लाभ सबसे वंचित व्यक्ति तक पारदर्शी तरीके से पहुंचे?” यदि इस प्रश्न पर राष्ट्रीय सहमति बनाने की कोशिश होती है, तो जंतर-मंतर का यह आंदोलन भारतीय राजनीति के लिए एक क्षणिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि आरक्षण नीति की अगली पीढ़ी पर बहस की शुरुआत साबित हो सकता है। और, सरकार के लिए सबसे समझदार रास्ता होगा—न आंदोलन को दबाना, न उसकी हर मांग स्वीकार करना; बल्कि आंकड़ों के साथ White Paper, विशेषज्ञ संवाद और व्यापक सामाजिक परामर्श शुरू करना। यही लोकतांत्रिक और संवैधानिक रास्ता है। पहले भी यहीं पर कांग्रेसी और समाजवादी सरकारें चूक कीं हैं, और जनाधार बचाने के चक्कर में उन्हें अपनी सरकार तक गंवानी पड़ी है। आज भाजपा भी इसी दुविधा में है, और अगर यही हाल रहा तो बांकीपुर और दतिया उपचुनाव परिणाम की तरह उसकी आने वाली सरकारें भी विफलता प्राप्त करेंगी, क्योंकि जब मूल जनाधार छिटकेगा, तब नीतिगत रूप से हासिल जनाधार की मरूभूमि वाली मृगमरीचिका का पता चलेगा। तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। इसलिए समय रहते ही सावधान हो जाइए। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
Chai Par Sameeksha: नई टीम से Gen Z को साधेगी BJP, क्या Vande Mataram को लेकर बैकफुट पर है Congress?
प्रभासाक्षी के साप्ताहिक कार्यक्रम चाय पर समीक्षा में इस सप्ताह हमने भाजपा की नई टीम और वंदे मातरम विवाद पर चर्चा की। हमेशा की तरह इसमें मौजूद रहे प्रभासाक्षी के संपादक नीरज कुमार दुबे। नीरज दुबे ने बीजेपी की नई टीम को लेकर साफ तौर पर कहा कि यह टीम पार्टी के लिए भविष्य में लगातार काम करेगी। विनोद तावडे के उत्तर प्रदेश के प्रभारी के तौर पर जिम्मेदारी दिए जाने को भी उन्होंने बहुत बड़ा कदम बताया। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि विनोद तावडे योगी आदित्यनाथ और दिल्ली के बीच में एक ब्रिज का काम करेंगे। विनोद तावडे जमीनी नेता है। मीडिया से दूर रहते हैं और अपना काम शांति से भी करते हैं। दुबे ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने संगठन में लंबे समय से चल रही कवायद को अंजाम देते हुए अपनी नई राष्ट्रीय टीम सामने रख दी है। इस टीम में अनुभव, क्षेत्रीय संतुलन, सामाजिक समीकरण और चुनावी जरूरतों का ऐसा मिश्रण तैयार किया गया है, जिसमें पार्टी के पुराने दिग्गजों से लेकर नए चेहरों तक को जिम्मेदारी दी गई है। लेकिन इस पूरी कवायद में दो फैसले राजनीतिक चर्चा के केंद्र में हैं। एक तो अमित मालवीय को आईटी सेल प्रमुख की जिम्मेदारी से बाहर का रास्ता दिखाया गया है, जबकि पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी की राष्ट्रीय महासचिव के तौर पर भाजपा के शीर्ष संगठन में वापसी हुई है। इसे भी पढ़ें: USCIRF बनाम RSS: आरोप, अधिकार-सीमा और भारत-अमेरिका संबंधों की अग्निपरीक्षा उन्होंने कहा कि आईटी और सोशल मीडिया सेल की कमान अब छत्तीसगढ़ के दीपक म्हास्के को दी गई है। वहीं अनिल बलूनी मीडिया प्रभारी की अपनी जिम्मेदारी पर कायम हैं। यानी भाजपा ने डिजिटल मोर्चे पर चेहरे में बदलाव किया है, लेकिन मीडिया प्रबंधन के मौजूदा ढांचे में निरंतरता बनाए रखी है। इस बदलाव को केवल संगठनात्मक फेरबदल मानना मुश्किल है। यह संकेत है कि नितिन नबीन डिजिटल और राजनीतिक नैरेटिव की लड़ाई में नई रणनीति और नए चेहरों के साथ उतरना चाहते हैं। साथ ही चूंकि नितिन नबीन छत्तीसगढ़ में पार्टी के प्रभारी रह चुके हैं ऐसे में वह जानते हैं कि उस राज्य के किस नेता की कार्यक्षमता का उपयोग कहां पर करना पार्टी के लिए ज्यादा फायदेमंद रहेगा। उन्होंने कहा कि 16 राष्ट्रीय सचिवों की सूची में भी व्यापक क्षेत्रीय संतुलन दिखाई देता है। कविता पाटीदार, के. सुरेंद्रन, डॉ. भोला सिंह, डॉ. प्रदीप वर्मा, जगदीश ईश्वरभाई पटेल, आम आदमी पार्टी से भाजपा में आये डॉ. संदीप पाठक और फांगनॉन कोन्याक, संगीता यादव, अनिल एंटनी, डॉ. एम. वेंकटेशन, मनोज तिग्गा, सिद्धार्थ शंभू, डॉ. स्वदेश सिंह, मृगांका देब बर्मन, रोहन गुप्ता और जय प्रकाश को राष्ट्रीय सचिव बनाया गया है। इनमें दक्षिण, पूर्वोत्तर, पूर्वी भारत, हिंदी पट्टी और शहरी राजनीतिक पृष्ठभूमि, सभी को जगह मिली है। नई टीम के अन्य हिस्से भी राजनीतिक संकेत दे रहे हैं। केंद्रीय कार्यालय प्रभारी तरुण चुग और केंद्रीय कार्यालय सचिव महेंद्र पांडे बनाए गए हैं। वन्दे मातरम् विवाद पर उन्होंने कहा कि कांग्रेस अपनी गलतियों से सीख नहीं पा रही है। बार-बार वह बीजेपी को फ्रंट फुट पर आकर बल्लेबाजी करने का मौका दे रही है। वंदे मातरम का विरोध करना साफ तौर पर यह देश के खिलाफ है। नीरज दुबे ने यह भी कहा कि कांग्रेस वोट बैंक की राजनीति कर रही है कांग्रेस एक समुदाय के लोगों के लिए ही आगे बढ़ रही है। यह लोकतंत्र के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं है। जनता सब देख रही है। राहुल गांधी को इस बात को भी समझना होगा कि इस देश में हर वर्ग के लोग हैं और जो भी कानून संसद द्वारा पारित किया जाते हैं। उसका सम्मान करना चाहिए क्योंकि आप संविधान का किताब लेकर लगातार लोगों के बीच जाते हैं।
भारत की कूटनीति इस समय तीन अलग-अलग राजधानियों में एक साथ अपनी बिसात बिछा रही है। मॉस्को में रूस के साथ ऊर्जा, व्यापार और रणनीतिक साझेदारी को नई गति देने की कोशिश; बीजिंग में चीन के साथ सबसे संवेदनशील सीमा विवाद को संभालते हुए रिश्तों को स्थिर करने की कवायद और टोक्यो में जापानी पूंजी, तकनीक और विनिर्माण को भारत की विकास गाथा से जोड़ने का अभियान। विदेश मंत्री एस. जयशंकर, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल की ये यात्राएं बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की बहुस्तरीय रणनीति की तीन परस्पर जुड़ी हुई चालें हैं। जयशंकर का रूस दौरा सबसे पहले मॉस्को यात्रा की बात करें तो आपको बता दें कि जयशंकर की दो दिवसीय रूस यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब भारत पर अमेरिकी टैरिफ और रूसी ऊर्जा खरीद को लेकर दबाव बढ़ा हुआ है। मॉस्को में वह रूस के प्रथम उपप्रधानमंत्री डेनिस मंतुरोव के साथ भारत-रूस अंतर-सरकारी आयोग यानि IRIGC-TEC की 27वीं बैठक की सह-अध्यक्षता कर रहे हैं और विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव से क्षेत्रीय तथा वैश्विक मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं। इसे भी पढ़ें: लोकहित के नाम पर Parliament में हंगामा, हर घंटे ₹1.5 Crore के नुकसान का कौन है जिम्मेदार? हम आपको बता दें कि भारत-रूस व्यापार 2024-25 में रिकॉर्ड 68.7 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है, लेकिन तस्वीर का दूसरा पक्ष यह है कि भारतीय निर्यात केवल 4.88 अरब डॉलर रहा। यानी व्यापार तेजी से बढ़ा है, मगर संतुलन भारत के पक्ष में नहीं है। इसलिए नई दिल्ली अब केवल रूसी तेल खरीदने वाले साझेदार की भूमिका से आगे बढ़कर बाजार पहुंच, निवेश, भुगतान व्यवस्था, लॉजिस्टिक्स और कनेक्टिविटी के सवालों को केंद्र में ला रही है। भारत और रूस ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर, नॉर्दर्न सी रूट और चेन्नई-व्लादिवोस्तोक कॉरिडोर जैसे विकल्पों का महत्व बढ़ जाता है। यह रणनीति दर्शाती है कि भू-राजनीतिक दबाव के बावजूद भारत अपने पुराने, परखे हुए रणनीतिक साझेदार के साथ ऊर्जा, रक्षा, व्यापार और संपर्क के विकल्प खुले रखना चाहता है। यह यात्रा राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की अगले महीने संभावित भारत यात्रा से पहले भी हो रही है, जिससे इसकी राजनीतिक अहमियत और बढ़ जाती है। अजित डोभाल का चीन दौरा उधर, मॉस्को में भारत साझेदारी को मजबूत कर रहा है, तो बीजिंग में उसकी प्राथमिकता सीमा विवाद जैसे संवेदनशील मुद्दों को सुलझाने में लगी हुई है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल 25वें भारत-चीन विशेष प्रतिनिधि संवाद के लिए चीन के दौरे पर हैं, जहां उनकी मुलाकात चीन के विदेश मंत्री वांग यी से होनी है। हम आपको याद दिला दें कि साल 2003 में शुरू किया गया यह तंत्र लगभग 3,488 किलोमीटर लंबे सीमा विवाद के राजनीतिक समाधान के लिए बनाया गया था। 25 दौर की बातचीत के बावजूद अंतिम समाधान दूर है, लेकिन दोनों देश इसे तनाव नियंत्रित करने और संवाद बनाए रखने का महत्वपूर्ण माध्यम मानते हैं। खासकर 2020 के बाद सीमा पर पैदा हुई गंभीर स्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत-चीन संबंधों का भविष्य केवल व्यापार या राजनीतिक संपर्क से तय नहीं होगा। जयशंकर का संदेश भी इसी रणनीतिक सोच को रेखांकित करता है। यानि सीमा पर शांति और स्थिरता, अच्छे संबंधों की पूर्व शर्त है। देखा जाये तो डोभाल की यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब दोनों पक्ष तनाव कम करने और संबंधों को सामान्य बनाने के लिए कुछ कदम उठा रहे हैं, लेकिन सीमा का प्रश्न अब भी निर्णायक है। बातचीत का उद्देश्य केवल विवाद को प्रबंधित करना नहीं, बल्कि उस राजनीतिक जगह को तैयार करना भी है जिसमें भारत और चीन के शीर्ष नेतृत्व के बीच आगे संवाद संभव हो सके। साथ ही डोभाल की यात्रा भी ऐसे समय हो रही है जब चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का अगले महीने भारत का दौरा लगभग तय माना जा रहा है। पीयूष गोयल का जापान दौरा इसके अलावा, तीसरा मोर्चा टोक्यो में खुलता है, जहां पीयूष गोयल 200 सदस्यीय कारोबारी प्रतिनिधिमंडल के साथ जापान पहुंचे हैं। यह प्रतिनिधिमंडल टोक्यो, नागोया और ओसाका में सरकारों और उद्योग जगत के साथ बैठकों के जरिए निवेश, व्यापार और तकनीकी सहयोग को नई दिशा देने की कोशिश करेगा। हम आपको बता दें कि भारत की नजर केवल अधिक जापानी निवेश पर नहीं है। लक्ष्य कहीं बड़ा है। लक्ष्य यह है कि जापानी कंपनियां भारत में केवल बेचें नहीं, बल्कि निर्माण करें, डिजाइन करें, नई तकनीक विकसित करें और भारत को वैश्विक निर्यात केंद्र के रूप में इस्तेमाल करें। सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, उन्नत विनिर्माण और नई प्रौद्योगिकियां इस अभियान के प्रमुख क्षेत्र हैं। हम आपको बता दें कि जापान ने भारत में एक दशक के दौरान 10 ट्रिलियन येन निवेश का लक्ष्य रखा है। भारत अब चाहता है कि इस दशक के अंत तक देश में सक्रिय जापानी कंपनियों की संख्या दोगुनी हो। नागोया की औद्योगिक और ऑटोमोबाइल क्षमता, टोक्यो की वित्तीय एवं तकनीकी ताकत और ओसाका के नवाचार तंत्र के साथ भारत अपने विनिर्माण भविष्य की नई साझेदारी तलाश रहा है। मॉस्को, बीजिंग और टोक्यो की इन तीन यात्राओं को एक साथ देखें तो भारत की रणनीति स्पष्ट दिखाई देती है। रूस से ऊर्जा और रणनीतिक स्वायत्तता; चीन से सीमा तनाव को नियंत्रित करते हुए सुरक्षा संतुलन; और जापान से पूंजी, तकनीक तथा वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी हिस्सेदारी मजबूत करना। यही भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक चुनौती भी है। यानि किसी एक धुरी का हिस्सा बने बिना सभी महत्वपूर्ण धुरियों के साथ अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार संबंध चलाना। दुनिया जब व्यापार युद्धों, टैरिफ, युद्धों, सप्लाई चेन संकट और महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा से गुजर रही है, तब भारत तीन अलग-अलग राजधानियों में तीन अलग भाषाओं में, लेकिन एक ही संदेश के साथ बात कर रहा है। भारत स्पष्ट कर रहा है कि वह साझेदारी करेगा, दबाव में नहीं झुकेगा; संवाद करेगा, लेकिन सुरक्षा से समझौता नहीं करेगा; और निवेश चाहेगा, लेकिन केवल बाजार बनने के लिए नहीं बल्कि वैश्विक विनिर्माण और तकनीकी शक्ति बनने के लिए। बहरहाल, मॉस्को से बीजिंग और टोक्यो तक फैली यह कूटनीतिक त्रिकोणीय चाल इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसका लक्ष्य केवल आज के संकटों को संभालना नहीं, बल्कि 2030 के भारत की आर्थिक, सामरिक और तकनीकी स्थिति तय करना है। -नीरज कुमार दुबे
लोकहित के नाम पर Parliament में हंगामा, हर घंटे ₹1.5 Crore के नुकसान का कौन है जिम्मेदार?
जिस देश में करोड़ों लोगों को साफ पीने का पानी, पर्याप्त बिजली, राशन, स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं मयस्सर नहीं हैं, वहां सिर्फ आम लोगों की भलाई के नाम पर संसद में हंगामा करके अरबों रूपए स्वाह कर दिए जाते हैं। संसद में अब तक मानसून सत्र के दौरान हंगामे और व्यवधान के कारण लोकसभा में 7,023 मिनट का समय बर्बाद हो। अर्थात प्रति मिनट करीब ₹2.5 लाख खर्च का अनुमान हुआ। यह आंकड़ा करीब ₹175 करोड़ बैठता है। देश के लोकतंत्र का मंदिर है संसद, जहां पर जनता की, उनके अधिकारों, मुद्दों की आवाज़ गूंजनी चाहिए। लेकिन वहां अभी तक के मानसून सत्र में सिर्फ शोर सुनाई दिया। विपक्ष का हंगामा कान के पर्दों को फाड़ रहा है। सवाल ये है कि इस शोर का बिल कौन भर रहा है? तो जवाब है—देश की जनता। क्योंकि संसद में हर मिनट हंगामा होता है तो सिर्फ बहस नहीं रुकती, बल्कि करीब ढाई लाख रुपये भी पानी की तरह बहते रहते हैं। संसद के मानसून सत्र के दौरान विपक्ष ने सरकार पर नीट पेपर परीक्षा, राम मंदिर चंदा चोरी जैसे मामलों में गृहमंत्री अमित शाह के बयान को लेकर कई दिनों तक हंगामा किया। जिससे संसद की र्कारवाई बाधित होती रही। संसद में विधायी कामकाज नहीं हो सको। संसद की कार्रवाई कई बार अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गई। सबसे अहम बात ये कि सदन स्थगित होने पर भी ये खर्च रुकता नहीं है। संसद की सुरक्षा, वहां के कर्मचारी, तकनीकी व्यवस्था और पूरा संसदीय तंत्र उसी तरह चलता रहता है। इसलिए जब कार्यवाही बार-बार बाधित होती है, तब करोड़ों रुपये का बोझ सीधे जनता की जेब पर पड़ता है। इसे भी पढ़ें: उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा मानसून सत्र संसद की कार्यवाही एक दिन के लिए अगर स्थगित होती है तो इसके पीछे 9 करोड़ रुपये का घाटा होता है। इस रकम को प्रति घंटे और प्रति मिनट के आधार पर यह प्रति घंटे एक करोड़ पचास लाख यानी डेढ़ करोड़ होती है। यह आंकड़ा इस साल के बजट सत्र के दौरान लोकसभा में पीठासीन स्पीकर जगदंबिका पाल ने दिया था। साल 2014 से लेकर 2024 के आंकड़ों पर गौर करें तो बार-बार सदन के स्थगित होने की वजह से सरकारी तिजोरी का करीब 3300 करोड़ रुपया पूरी तरह बर्बाद हो चुका है। संसद के इस तरह से बार-बार ठप होने पर ना सिर्फ जरूरी काम रुकते हैं, बल्कि लोगों के पैसे पर भी असर पड़ता है। इसी तरह संसद के साल 2025 के मॉनसून सत्र दौरान सांसदों ने देशहित की बजाय अपनी राजनीति में अधिक समय गंवा दिया। लोकसभा में सांसदों को 120 घंटे देश के मुद्दों पर चर्चा करनी थी, लेकिन वास्तव में सिर्फ 37 घंटे ही काम हुआ। अर्थात 83 घंटे बेकार गए। केवल 31% काम हुआ और बाकी 69% समय सांसदों की आपसी राजनीति और हंगामे में बर्बाद हो गया। राज्यसभा का भी यही हाल था। यहां भी 120 घंटे काम होना चाहिए था, लेकिन सिर्फ 47 घंटे ही काम किया गया। मतलब 73 घंटे बर्बाद हो गए। राज्यसभा में भी सांसदों ने सिर्फ 38% काम किया। लोकसभा में 83 घंटे काम नहीं हुआ, जिससे लगभग 124 करोड़ 50 लाख रुपये जनता के पैसे बर्बाद हो गए। वहीं राज्यसभा में 73 घंटे की बर्बादी से करीब 80 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। पिछले मानसून सत्र में दोनों सदनों में मिलाकर कुल 204 करोड़ 50 लाख रुपये बर्बाद हो गए। यह पैसा जनता के काम पर खर्च हो सकता था, लेकिन हंगामे और राजनीति की वजह से व्यर्थ चला गया। संसद के चलने में करोड़ों के इस खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा अर्थात करीब 35 से 40 प्रतिशत खर्च इन्हीं सांसदों के वेतन, भत्तों और सुविधाओं पर होता है जो संसद में खड़े होकर चीखते हैं, हंगामा बरपाते हैं, बिलों को पेश तक नहीं होने दे रहे। इन सांसदों को एक लाख रुपये मासिक वेतन, 70 हजार रुपये निर्वाचन क्षेत्र भत्ता, 60 हजार रुपये कार्यालय और सहायक खर्च दिया जाता है। इसके अलावा दिल्ली आने पर प्रतिदिन 2 हजार रुपये का विशेष भत्ता और यात्रा सुविधाएं भी मिलती हैं। संसद सचिवालय के हजारों कर्मचारियों पर करीब 25 से 30 प्रतिशत खर्च होता है। इसमें प्रशासनिक अधिकारी, रिपोर्टर, ट्रांसलेटर्स, रिसर्च स्टाफ, स्टेनोग्राफर, मार्शल, डेटा एंट्री ऑपरेटर और सफाई कर्मचारियों का वेतन शामिल है। करीब 20 प्रतिशत खर्च संसद की हाई-टेक व्यवस्थाओं पर होता है। बिजली-पानी, संसद टीवी की लाइव ब्रॉडकास्टिंग, हाई-एंड रिकॉर्डिंग सिस्टम, डिजिटल वोटिंग पैनल, साथ में इनका खाना-पीना और रोज छपने वाले सैकड़ों विधायी दस्तावेजों की लागत इसी में आता है। 10 से 15 प्रतिशत खर्च संसद की सुरक्षा व्यवस्था पर होता है। दिल्ली पुलिस, सीआरपीएफ, संसद सुरक्षा सेवा, 24 घंटे चलने वाला सीसीटीवी नेटवर्क, आधुनिक स्कैनर और बायोमेट्रिक सिस्टम, ये सब तब भी चलते रहते हैं जब सदन में काम ठप हो जाता है। मतलब देश के खजाने के खर्च का मीटर लगातार घूमता रहता है। लोकसभा में कार्यवाही स्थगित करने का अधिकार स्पीकर यानी अध्यक्ष के पास होता है। राज्यसभा में यह अधिकार सभापति की कुर्सी पर बैठे उपराष्ट्रपति या उनकी गैरमौजूदगी में बैठक को संचालित कर रहे उपसभापति या पीठासीन अधिकारी के पास होता है। संसद की कार्यवाही स्थगित होने का मतलब है कि सदन की बैठक को कुछ समय के लिए या फिर पूरे दिन के लिए रोक दिया जाए। सदन में व्यवस्था बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होने पर वह अधिकार का प्रयोग कर सकते हैं। सवाल यह भी है कि क्या विपक्ष जानबूझकर हंगामा करता है? लोकतंत्र में विपक्ष का काम सरकार से जवाब मांगना भी होता है। कई बार विपक्ष की तरफ से चर्चा की मांग, जांच की मांग, मंत्री का बयान, प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति को लेकर विरोध किया जाता है। अगर उसकी मांग स्वीकार नहीं होती तो विरोध तेज हो सकता है। वहीं दूसरी तरफ सरकार का कहना होता है कि चर्चा नियमों के अनुसार होनी चाहिए और बाधा होने से जनता का काम रुकता है। इसलिए हर मामले को राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में देखना चाहिए। कई बार विपक्ष आरोप लगाता है कि चर्चा की अनुमति नहीं दी गई, जरूरी मुद्दों पर समय नहीं दिया गया, जवाब नहीं दिया गया। जबकि सरकार का पक्ष होता है कि विपक्ष जानबूझकर कार्यवाही नहीं चलने देता। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस और विपक्षी दल ही संसद में हंगामा करते हैं। जब भाजपा विपक्ष में थी, तब भी यही हाल था। भाजपा के सांसद संसद में जमकर हंगामा करके संसद को ठप्प कर देते थे। सारे दल इस लिहाज से एक जैसे नजर आते हैं। सर्वाधिक आश्चर्य की बात यह है कि संसद में अरबों रुपए बर्बाद करके जो हंगामा किया जाता है, वह देश के लोगों की भलाई के नाम पर होता है। इससे बेहतर तो यही है कि इस धन राशि को सीधे विकास कार्यों में खर्च किया जाता। लगता यही है कि किसी को इस तरह की बर्बादी का अफसोस नहीं है। देश के लोग इस मामले में लाचार बने हुए हैं। किसे दोषी ठहाराएं और किसी सही, लेकिन इतना जरूर है कि यह नौबत देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और आम लोगों के हित में नहीं है। - योगेन्द्र योगी
तारिक रहमान की भारत यात्रा टलने का असल कारण अब धीरे-धीरे सामने आ रहा है। भले ही ढाका इस फैसले के पीछे शेख हसीना की भारत से की गई वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस और उससे बिगड़े कूटनीतिक माहौल का हवाला दे रहा हो, लेकिन इसके पीछे एक बड़ा रणनीतिक समीकरण भी आकार लेता दिख रहा है। संकेत बताते हैं कि तारिक रहमान का ध्यान फिलहाल नई दिल्ली की यात्रा से अधिक बदलते क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और मक्का पैक्ट में बांग्लादेश की संभावित भागीदारी पर केंद्रित है। ‘बांग्लादेश फर्स्ट’ की नीति के तहत ढाका पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब के साथ उभरते इस सुरक्षा ढांचे में अपने लिए संभावनाएं तलाश रहा है। ऐसे में भारत यात्रा को टालना बांग्लादेश की नई विदेश नीति, उसकी रणनीतिक प्राथमिकताओं और दक्षिण एशिया में अपने विकल्पों का दायरा बढ़ाने की कोशिश का भी संकेत माना जा रहा है। ढाका का स्पष्ट संदेश है कि प्रधानमंत्री तारिक रहमान की भारत यात्रा को लेकर कोई जल्दबाजी नहीं है। बांग्लादेशी नेतृत्व का कहना है कि पर्याप्त द्विपक्षीय प्रगति और राष्ट्रीय हितों के अनुरूप समझ बनने पर ही यात्रा का समय तय होगा। दूसरी ओर, भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी संबंधों को “पारस्परिक हित” की कसौटी पर परखने की बात कही है। दोनों पक्षों की भाषा में समानता दिखाई देती है, लेकिन असली प्रश्न यह है कि ‘राष्ट्रीय हित’ की उनकी परिभाषाएं कितनी दूर तक एक-दूसरे से मेल खाती हैं। इसे भी पढ़ें: चौराहे पर बांग्लादेश: बदलाव, अनिश्चितता और नई राह की तलाश हम आपको बता दें कि वर्तमान तनाव के केंद्र में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का भारत में निर्वासन और उनके प्रत्यर्पण का बांग्लादेशी आग्रह है। इसी महीने नई दिल्ली से शेख हसीना की वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस ने ढाका की नाराजगी और बढ़ा दी। बांग्लादेश इसे अपने आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के रूप में देखता है, जबकि भारत ने आयोजन में अपनी भूमिका से इंकार किया है। हसीना के प्रत्यर्पण का मुद्दा दोनों देशों के बीच राजनीतिक विश्वास की परीक्षा बन चुका है। इसी पृष्ठभूमि में रहमान की भारत यात्रा के लिए “अनुकूल वातावरण” बनाने की बात कही जा रही है। लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं होती। असली सामरिक संकेत बांग्लादेश के संभावित मक्का संयुक्त रक्षा समझौते की ओर झुकाव में छिपे हैं। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच हुए इस ढांचे में 'किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमला सभी पर हमला' माने जाने की अवधारणा शामिल है। बांग्लादेशी मंत्रियों ने इसमें शामिल होने की संभावना के प्रति सकारात्मक रुख दिखाते हुए अंतिम निर्णय को राष्ट्रीय हितों से जोड़ा है। यदि ढाका इस व्यवस्था से जुड़ता है, तो दक्षिण एशिया और उसके आसपास के सामरिक समीकरणों में एक नई परत जुड़ सकती है। भारत के लिए चिंता का सबसे महत्वपूर्ण पहलू पाकिस्तान की बढ़ती भूमिका है। 1971 के इतिहास के बाद लंबे समय तक भारत-बांग्लादेश संबंधों में जो सामरिक निकटता रही, उसमें अब स्पष्ट परिवर्तन दिखाई दे रहा है। ढाका ने पाकिस्तान के साथ व्यापार, कूटनीतिक संपर्क और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने की इच्छा जताई है। यदि यह प्रक्रिया मक्का रक्षा ढांचे जैसी किसी व्यापक सुरक्षा संरचना से जुड़ती है, तो भारत को अपनी पूर्वी सीमा के सामरिक परिवेश का नए सिरे से आकलन करना पड़ सकता है। इसके साथ चीन का कारक भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। बांग्लादेश अपनी विदेश नीति को अमेरिका, चीन, पाकिस्तान और अन्य शक्तियों के साथ संतुलित संबंधों की दिशा में विविधतापूर्ण बनाने का प्रयास कर रहा है। बीजिंग के लिए बंगाल की खाड़ी और दक्षिण एशिया में अपनी रणनीतिक उपस्थिति बढ़ाने का अवसर पहले से मौजूद है। ऐसे में यदि भारत-ढाका संवाद कमजोर पड़ता है और बांग्लादेश वैकल्पिक साझेदारों की ओर तेजी से बढ़ता है, तो चीन की आर्थिक और संभावित सामरिक पहुंच भारत की पूर्वी और समुद्री रणनीति के लिए अधिक महत्वपूर्ण चुनौती बन सकती है। देखा जाये तो भारत के सामने चुनौती केवल सीमा सुरक्षा की नहीं है। 4,096 किलोमीटर लंबी भारत-बांग्लादेश सीमा, अवैध आव्रजन, सीमा प्रबंधन और बाड़बंदी जैसे मुद्दे पहले ही संबंधों को प्रभावित कर रहे हैं। ढाका का आरोप है कि भारत बिना पर्याप्त कूटनीतिक सत्यापन के लोगों को सीमा पार भेज रहा है, जबकि भारत अपनी सुरक्षा और आव्रजन चिंताओं को प्रमुखता देता है। फिर भी इस उभरते तनाव को भारत और बांग्लादेश के स्थायी विच्छेद के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। दोनों देश भूगोल से बंधे हैं और उनके आर्थिक, सुरक्षा तथा संपर्क हित गहराई से जुड़े हुए हैं। साथ ही यदि बांग्लादेश मक्का पैक्ट में शामिल होता है, तो सवाल उठता है कि इससे ढाका और चीन के रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा? देखा जाये तो मक्का पैक्ट में तुर्किये की मौजूदगी सबसे महत्वपूर्ण बात है। तुर्किये जहां नाटो का सदस्य और पश्चिमी सुरक्षा ढांचे का हिस्सा है, वहीं चीन के साथ उसके संबंध प्रतिस्पर्धा और सहयोग, दोनों पर टिके हैं। आर्थिक संपर्क, व्यापार और व्यापक यूरेशियाई राजनीति में दोनों के हित कई जगह मिलते हैं, लेकिन उइगर मुद्दे और मध्य एशिया जैसे प्रश्नों पर मतभेद भी मौजूद हैं। इसलिए बांग्लादेश यदि इस तुर्किये-पाकिस्तान-सऊदी सुरक्षा ढांचे में प्रवेश करता है, तो वह चीन-विरोधी खेमे में सीधे शामिल होने की बजाय एक बहुस्तरीय रणनीतिक संतुलन की नीति अपना सकता है। दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तान स्वयं चीन का निकटतम रणनीतिक साझेदार है, जबकि तुर्किये मक्का पैक्ट के माध्यम से अपने रक्षा-औद्योगिक और भू-राजनीतिक प्रभाव का विस्तार चाहता है। ऐसे में ढाका के लिए मक्का पैक्ट और चीन के साथ मजबूत आर्थिक-सामरिक संबंध परस्पर विरोधी होने की बजाय समानांतर विकल्प भी बन सकते हैं। लेकिन यदि इस रक्षा ढांचे का विस्तार किसी ऐसे क्षेत्रीय शक्ति संतुलन की दिशा में होता है, जहां चीन और तुर्किये के हित आमने-सामने आने लगें, तो बांग्लादेश को कठिन कूटनीतिक स्थिति का सामना करना पड़ सकता है। यहां प्रश्न यह भी उठता है कि यदि बांग्लादेश मक्का पैक्ट में शामिल होता है तो भारत पर क्या असर होगा? देखा जाये तो ऐसी स्थिति में भारत की चिंता यह होगी कि कहीं बांग्लादेश किसी औपचारिक या अनौपचारिक बहु-ध्रुवीय सुरक्षा नेटवर्क का हिस्सा बनकर नई दिल्ली की पारंपरिक रणनीतिक बढ़त को सीमित न कर दे। हालांकि यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि ढाका किसी भारत विरोधी गठबंधन का हिस्सा बन जाएगा। फिर भी भारत के लिए संदेश स्पष्ट है कि बांग्लादेश को केवल 1971 की ऐतिहासिक साझेदारी के चश्मे से देखने की बजाय उसे एक स्वतंत्र रणनीतिक शक्ति के रूप में समझना होगा। यदि नई दिल्ली और ढाका के बीच राजनीतिक संवाद कमजोर रहता है, तो पाकिस्तान, चीन और तुर्किये जैसे देशों के लिए वहां अपना प्रभाव बढ़ाने की गुंजाइश स्वाभाविक रूप से बढ़ सकती है। बहरहाल, नई दिल्ली के लिए यह स्पष्ट संकेत है कि ढाका अब पुराने समीकरणों में बंधकर चलने को तैयार नहीं है। भारत को बांग्लादेश के साथ अपने रिश्ते को शेख हसीना के दौर की राजनीतिक निकटता या 1971 की ऐतिहासिक विरासत के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए। यदि भारत और बांग्लादेश के बीच संवाद और विश्वास का अंतराल बढ़ता है, तो उस खाली जगह को भरने के लिए पाकिस्तान, चीन और तुर्किये जैसी बाहरी शक्तियां स्वाभाविक रूप से अधिक सक्रिय होंगी और इसका असर केवल द्विपक्षीय संबंधों पर नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया और बंगाल की खाड़ी के शक्ति संतुलन पर पड़ेगा। -नीरज कुमार दुबे
भारतीय राजनीति में ये सवाल अक्सर पूछा जाता है कि आखिर सोनिया गांधी प्रधानमंत्री क्यों नहीं बनीं? साल 2004 में यूपीए गठबंधन के पास पूर्ण बहुमत होने के बावजूद सोनिया ने पीएम की कुर्सी क्यों ठुकरा दी? सोनिया गांधी ने प्रियंका के बदले राहुल को क्यों राजनीति में आगे किया। जब राहुल को आगे कर ही दिया तो फिर मनमोहन सिंह की सरकार में उन्हें कभी मंत्री क्यों नहीं बनने दिया? सोनिया जब पीएम नहीं बनी तो पहले दावेदार तो प्रणव मुखर्जी थे पर उन्होंने मनमोहन सिंह का नाम क्यों फाइनल करवा दिया? सवाल ये भी पूछा जाता है कि डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री तो बने लेकिन बागडोर सोनिया के ही हाथ में रही। इन सबके बीच में पारिवारिक दोस्त रहे अमिताभ बच्चन से उनके रिश्ते किस बात पर बिगड़े? सोनिया गांधी से जुड़े जितने भी सवाल हैं, उन सभी सवालों से अब पर्दा उठने वाला है। सोनिया गांधी ये वो नाम है जो 80 के दशक से ही भारतीय राजनीति में चर्चा का विषय बना रहा और आज भी है। दरअसल,कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी अपने संस्मरण में निजी जिंदगी से लेकर राजनीति तक के सफर की कहानी बताने जा रही हैं। ये कहानी किसी मीडिया ब्रीफ्रिंग या वीडियो के माध्यम से नहीं नहीं बल्कि अपनी किताब बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ लव के माध्यम से बताइंगी। सोनिया के जीवन पर लिखी किताब 10 नवंबर को वैश्विक स्तर पर ख्याति प्राप्त पब्लिशर अल्फ्रेड ए नोफ के प्रकाशन से जारी होगी। इसमें नेहरू, गांधी परिवार में शादी के बाद का जीवन, राजनीति में प्रवेश और प्रधानमंत्री पद ठुकराने के फैसले जैसे महत्वपूर्ण प्रसंग शामिल हैं। 10 नवंबर को प्रकाशित होने वाली किताब को लेकर सोनिया गांधी कहती हैं कि उनके परिवार के बारे में बहुत कुछ लिखा गया। लेकिन उनके इरादों, काम औऱ मानवीय पहलुओं को उस तरह नहीं समझा गया। कई मायनों में ये किताब उनकी इंसानियत को समर्पित है। जब मैंने राजनीति से कुछ दूरी बनाकर पीछे मुड़कर अपने जीवन को देखा तो मुझे अपनी कहानी में प्यार और वफादारी का एक दागा साफ नजर आया। ये धागा इटली के एक छोटे शहर से बिताए साधारण बचपन से शुरू होकर भारत में राजीव गांधी की पत्नी और इंदिरा गांधी की बहू के रूप में बिताए तक जाता है। इसे भी पढ़ें: Cheeni Kum hai! एथनॉल का असर या त्योहारों का, अचानक क्यों आसमान छूने लगे चीनी के दाम? 10 लाइन में समझें पूरा मामला सोनिया की ताजपोशी और केसरी जबरन पार्टी दफ्तर में नजरबंद सोनिया गांधी ने सक्रिय राजनीति में एंट्री का फैसला किया तो केसरी के ना चाहते हुए भी पार्टी ने सोनिया को पार्टी प्रमुख बना दिया। इसकी भी एक दिल्चस्प कहानी है जब 1997 के आखिर में सोनिया गांधी ने घोषणा की कि वो कांग्रेस के लिए चुनाव प्रचार करेंगी। तब कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी ने सोनिया को कांग्रेस के लिए 'तारणहार' बताते हुए पार्टी में उनका स्वागत तो किया। लेकिन जब सोनिया को कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने की मांग उठी, तब केसरी ने हिचकिचाहट ज़ाहिर की। कहते हैं जिस दिन सोनिया पार्टी अध्यक्ष चुनी गई केसरी को जबरन पार्टी दफ्तर में नजरबंद रखा था। पवार-अनवर-संगमा का विरोध, सोनिया का इस्तीफा शरद पवार, पीए संगमा और तारिक अनवर ने विदेशी होने के कारण सोनिया को पीएम के चेहरे के तौर पर प्रोजेक्ट किए जाने का विरोध किया तो सोनिया ने पार्टी प्रमुख पद से इस्तीफा दे दिया। तीनों बागियों को कांग्रेस से निकाले जाने के बाद सोनिया ने इस्तीफा वापस लिया। इसे भी पढ़ें: जयपुर से लेकर भोपाल और गया से उन्नाव तक...Gen Z तो झांकी थी, पूरी पिक्चर दिखा रहे Gen अल्फा? आखिर क्यों नहीं पीएम बन पाईं सोनिया? 2004 का लोकसभा चुनाव अटल बिहारी वाजपेयी के सामने सोनिया गांधी की राजनीतिक हैसियत बहुत छोटी थी। अटल जी ने देश को इंडिया शाइनिंग का नारा दिया यानी की उनके कार्यकाल की वजह से देश चमक रहा है। ये पॉजिटिव कैंपेन था लेकिन इसका असर नेगेटिव हो गया और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे कद्दावर नेता के लिए एनडीए की सरकार हार गई। किसी ने सोचा भी नहीं था कि सोनिया गांधी अटल बिहारी वाजपेयी के सामने कांग्रेस को जीत दिलाईंगी। उन्हीं के फॉर्मूले पर एनडीए की जगह यूपीए बनेगी। इसके साथ ही उसके अंतर्गत एक गठबंधन की सरकार देश में बनेगी। ये सोनिया गांधी के युग की शुरुआत थी और गांधी परिवार के शीर्ष पर आने की वापसी। जब 2004 में कांग्रेस सरकार बनाने की स्थिति में आई कांग्रेस ही नहीं उसके तमाम सहयोगी दल भी जब यह चाहते थे कि सोनिया गांधी ही प्रधानमंत्री बने, तो फिर उन्होंने ना क्यों कह दिया? ना कहा भी तो प्रधानमंत्री पार्टी की तरफ से कौन होगा? यह तो चुनने का अधिकार उन्हीं के पास था। स सबसे सीनियर प्रणव मुखर्जी थे। अनुभवी थे। फिर सोनिया ने उनकी जगह मनमोहन सिंह का नाम पीएम के लिए आगे क्यों बढ़ाया? क्या इसलिए कि सोनिया को उन पर ज्यादा भरोसा था? उन पर जो सुपर पीएम होने के इल्जाम लगते हैं, उसमें किस हद तक सच्चाई है? प्रियंका के बदले राहुल को क्यों राजनीति में आगे किया जब सोनिया गांधी के सामने उत्तराधिकार की बात आई, उनके सामने दो विकल्प थे। राहुल और प्रियंका। तो सोनिया गांधी ने प्रियंका के बदले राहुल को क्यों आगे किया? वह भी तब जब प्रियंका के बारे में कहा जाता था कि उनमें उनकी दादी इंदिरा गांधी का अक्ष दिखता है। राहुल को हमेशा से ही राजीव का राजनीतिक उत्तराधिकारी मान लिया गया था। या फिर यह सोनिया गांधी का ही फैसला रहा कि राहुल ही आगे पार्टी को लीड करेंगे। अगर सोनिया ने किसी मकाम पर यह तय भी कर लिया कि राहुल ही आगे पार्टी का सारा कामकाज देखेंगे तो जब मौका था मतलब यूपीए की सरकार थी। सोनिया सबसे ताकतवर थी। तो उन्होंने राहुल को कभी मनमोहन सिंह की सरकार में मंत्री क्यों नहीं बनने दिया? जबकि उस वक्त के कई सीनियर नेताओं ने भी यह मांग उनसे की थी। इसे भी पढ़ें: शिखा है, जनेऊ पहनते हैं? PM ने राम के मर्म को अयोध्या में समझाया, वो क्या इंटरव्यूअर्स को समझ नहीं आया, मंदिर का नया CEO ब्राह्मण ही बनेगा? कांग्रेस ही नहीं 544 पन्नों वाली ऑटोबायोग्राफी पर बीजेपी की भी नजर इन सवालों का जवाब उम्मीद की जा रही है कि 10 नवंबर को मिले। कांग्रेस ही नहीं बीजेपी की भी नजर सोनिया गांधी की इस 544 पन्नों वाली ऑटोबायोग्राफी पर है जो अल्फ्रेड ए नो पब्लिशिंग हाउस से छप रही है। अहम बात यह है कि अपने करियर के आखिरी मोड़ पर सोनिया गांधी जो किताब लिख रही हैं उसमें सच्चाई कितनी है और अपनी छवि बेहतर करने की कोशिश कितनी?
आरक्षण विरोधी प्रदर्शन दिल्ली से यूपी तक, देर रात पुलिस की कार्रवाई
आरक्षण नीति और नए यूजीसी नियमों के खिलाफ दिल्ली से लेकर यूपी तक प्रदर्शन तेज हो गया। राजधानी दिल्ली के कनॉट प्लेस आउटर सर्कल पर सैकड़ों लोग जुटे। पुलिस ने देर रात तक दर्जनों प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया
कलकत्ता हाई कोर्ट ने कोलकाता में 'अवैध' निर्माण को गिराने पर लगाई रोक
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हरिद्वार में संतों ने 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' का किया समर्थन, बोले- लोकतंत्र और विकास दोनों होंगे मजबूत
कर्नाटक के मुख्यमंत्री बोले- समानता और भाईचारा हमारे जीवन का अभिन्न अंग होना चाहिए।
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तेलंगाना में ऑटो चालकों से हड़ताल वापस लेने की अपील, किराया बढ़ाने की मांग पर बनेगी समिति: परिवहन मंत्री
यूपी: मुजफ्फरनगर में दलित नाबालिग लड़की के साथ गैंगरेप पर आक्रोश, दो लोग गिरफ्तार
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मोदी सरकार के 12 वर्षों में जम्मू-कश्मीर में लौटी सामान्य स्थिति, शांति और विकास: जितेंद्र सिंह
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खाद्य सुरक्षा नियमों के उल्लंघन पर एफएसएसएआई की सख्त कार्रवाई
नई दिल्ली, भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने रविवार को कहा कि निरीक्षण के दौरान खाद्य सुरक्षा नियमों के गंभीर उल्लंघन और अनुपालन में कमी पाए जाने के बाद उसने दिल्ली और दमन की दो खाद्य कारोबार इकाइयों के खिलाफ कड़ी नियामकीय कार्रवाई की है।
'हाथ में तिरंगा, अंतरिक्ष और 140 करोड़ का सपना हमारा संकल्प', राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस पर पीएम मोदी ने दी शुभकामनाएं
महिलाओं की पहचान खुद से, हिंसा और भेदभाव पर कड़ा सवाल : राहुल गांधी
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने शनिवार को पुणे में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में महिलाओं की आजादी और पितृसत्ता पर खुलकर बात की
इथेनॉल मिलाने के फैसले से आम लोगों को नुकसान और चीनी की सप्लाई में रुकावट: अशोक गहलोत
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Rahul Gandhi Dharna: Pellet Gun मामले में FIR के लिए 8 घंटे, Modi-Shah की बड़ी ग़लती?
महाराष्ट्र में ऑटो रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए मराठी का व्यावहारिक ज्ञान अनिवार्य करने का फैसला अब केवल सरकारी घोषणा नहीं, बल्कि जमीनी कार्रवाई का रूप ले चुका है। राज्यभर में शुरू हुई जांच के पहले ही दिन 1,268 व्यावसायिक यात्री वाहन चालकों मुख्यतः ऑटो और टैक्सी चालकों, को मराठी का पर्याप्त ज्ञान नहीं होने पर नोटिस जारी कर दिया गया। राज्य सरकार इसे यात्रियों की सुविधा, सुरक्षा और महाराष्ट्र की भाषा-संस्कृति से जोड़ रही है, लेकिन इस कार्रवाई ने रोज़गार, प्रवासी चालकों की आजीविका, नियमों की अस्पष्टता और कानूनी वैधता को लेकर गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए हैं। महाराष्ट्र के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक के अनुसार, राज्य में ऑटो और टैक्सी चलाने के लिए मराठी का ‘वर्किंग नॉलेज’ यानी व्यावहारिक ज्ञान अनिवार्य है। राज्य सरकार का तर्क है कि चालकों को रोजमर्रा के कामकाज में यात्रियों से संवाद करना पड़ता है और कई शिकायतें मिली हैं कि कुछ चालक मराठी में यात्रियों की बात, दिशा-निर्देश या सामान्य निर्देश तक नहीं समझ पाते। मंत्री का कहना है कि मराठी का व्यावहारिक ज्ञान केवल नियम पालन का मामला नहीं, बल्कि यात्रियों की सुविधा और सुरक्षा से भी जुड़ा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या भाषा जानना सचमुच यात्री सुरक्षा का प्रश्न है, या फिर सुरक्षा के नाम पर एक ऐसी व्यवस्था लागू की जा रही है जिसकी कसौटियां अभी तक स्पष्ट नहीं हैं? हम आपको याद दिला दें कि राज्य सरकार ने मई में मराठी की बुनियादी जानकारी अनिवार्य करने की घोषणा की थी और गैर-मराठी चालकों के लिए मराठी प्रशिक्षण पाठ्यक्रम शुरू कराया गया। 105 दिनों तक चले अभियान में लगभग 1.65 लाख चालकों को प्रशिक्षण देकर प्रमाणपत्र जारी किए गए। मुंबई में पहले के अभियान में करीब 1.25 लाख चालकों ने भाग लिया था, जिनमें 7,750 चालक परीक्षा में असफल रहे, जबकि 14,000 से अधिक प्रशिक्षण पूरा नहीं कर सके। अब 15 अगस्त तक मराठी सीखने की समयसीमा समाप्त होने के बाद सरकार ने सीधे जांच और कार्रवाई का रास्ता अपनाया है। इसे भी पढ़ें: Maharashtra RTO ने 1499 Auto Taxi चालकों को जारी किया नोटिस, मराठी न जानने पर कार्रवाई राज्यव्यापी जांच के पहले दिन शाम तक 8,217 चालकों का परीक्षण किया गया। इनमें मुंबई महानगर क्षेत्र में 3,995 चालक शामिल थे, जिनमें से 604 को मराठी का पर्याप्त व्यावहारिक ज्ञान नहीं होने पर नोटिस दिया गया। राज्य के बाकी हिस्सों में 4,222 चालकों की जांच हुई और 664 को नोटिस जारी किए गए। यह जांच अभियान 30 सितंबर तक जारी रहेगा। चालकों को एक महीने का समय दिया गया है। यदि वे इसके बाद भी मराठी में संतोषजनक ढंग से जवाब नहीं दे सके, तो उनका बैज तीन महीने के लिए निलंबित किया जा सकता है। इसके बाद उन्हें फिर एक महीने का अवसर मिलेगा। लगातार उल्लंघन की स्थिति में कार्रवाई और कठोर हो सकती है। हम आपको बता दें कि जांच के दौरान चालकों को 16 सवालों के जरिए परखा जा रहा है। इनमें रोजमर्रा की बातचीत से जुड़े वाक्य शामिल हैं, जैसे— “मला CNG भरायचे आहे, थोडे थांबावे लागेल” अर्थात मुझे सीएनजी भरवानी है, थोड़ी देर रुकना होगा; “माझी रिक्षा/टॅक्सी शेअरिंगची आहे” यानी मेरी रिक्शा या टैक्सी शेयरिंग की है; और “मीटर चालू केले आहे” अर्थात मीटर चालू कर दिया है। प्रश्न यात्रियों से गंतव्य पूछने, रास्ता समझने, किराया, मीटर और स्टैंड से जुड़े संवाद पर आधारित हैं। परिवहन विभाग ने जांच की वीडियोग्राफी कराने के भी निर्देश दिए हैं। हम आपको बता दें कि यह प्रशिक्षण कोंकण साहित्य परिषद के माध्यम से कराया गया था और इसका समापन स्वतंत्रता दिवस पर हुआ। राज्य सरकार का दावा है कि उसका उद्देश्य किसी की रोजी-रोटी छीनना नहीं, बल्कि मराठी भाषा और महाराष्ट्र की पहचान व संस्कृति को संरक्षित करना है। यहीं से विवाद का दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण पक्ष शुरू होता है यानि कानून। हम आपको याद दिला दें कि 2017 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने ऑटो रिक्शा परमिट के लिए मराठी दक्षता की एक ऐसी ही शर्त को रद्द कर दिया था। अदालत ने कहा था कि ऑटो रिक्शा ‘मोटर कैब’ की श्रेणी में आते हैं और महाराष्ट्र मोटर व्हीकल्स रूल्स के नियम 24 में भाषा संबंधी प्रावधान सार्वजनिक सेवा वाहन बैज के कुछ मामलों से जुड़ा है, लेकिन मोटर कैब को उसमें विशेष रूप से बाहर रखा गया है। अदालत ने स्पष्ट किया था कि नियम 24 के आधार पर ऑटो रिक्शा कॉन्ट्रैक्ट कैरिज परमिट के लिए मराठी दक्षता अनिवार्य नहीं बनाई जा सकती। अब राज्य सरकार का कहना है कि वर्तमान कार्रवाई मौजूदा नियमों के अनुपालन और संशोधित महाराष्ट्र मोटर व्हीकल्स रूल्स, 1989 के तहत की जा रही है। अधिकारियों का तर्क है कि 2017 का फैसला परमिट से संबंधित था, जबकि मौजूदा व्यवस्था बैज, प्राधिकरण और उनके नवीनीकरण से जुड़ी है। सरकार यह भी कहती है कि व्यावहारिक मराठी ज्ञान की शर्त 1989 से ही नियमों में मौजूद थी, लेकिन उसका कड़ाई से पालन नहीं हुआ। फिर भी सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है, ‘वर्किंग नॉलेज ऑफ मराठी’ की स्पष्ट परिभाषा क्या है? टैक्सी यूनियनों ने आशंका जताई है कि नियमों में यह नहीं बताया गया कि व्यावहारिक ज्ञान का मानक क्या होगा। सेवा सारथी टैक्सी यूनियन के नेता डीएम गोसावी ने चेतावनी दी है कि अस्पष्टता आरटीओ में भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे सकती है। सेवानिवृत्त आरटीओ अधिकारियों का भी कहना है कि संशोधित नियमों में यह स्पष्ट नहीं है कि परीक्षा मौखिक होगी या लिखित, पास होने का मानक क्या होगा और सभी जगह एक जैसी जांच कैसे सुनिश्चित की जाएगी। राज्य सरकार के सामने इसलिए दोहरी चुनौती है। एक ओर उसे राज्य की भाषा और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा करनी है, दूसरी ओर लाखों चालकों, जिनमें बड़ी संख्या प्रवासी और सीमित औपचारिक शिक्षा वाले श्रमिकों की है, उनकी आजीविका भी सुरक्षित रखनी है। रिपोर्टों के मुताबिक, मुंबई में ही 2.8 लाख से अधिक ऑटो रिक्शा और लगभग 20,000 टैक्सी परमिट हैं, जिनसे शिफ्टों में अनुमानित पांच लाख चालक जुड़े हैं। यहां सबसे तीखा सवाल यह है कि क्या राज्य सरकार प्रशिक्षण और सहयोग की नीति को प्राथमिकता देगी या भाषा परीक्षा को लाइसेंस और बैज निलंबन का हथियार बनाएगी? क्या 16 सवालों की परीक्षा वास्तव में किसी चालक की संवाद क्षमता का निष्पक्ष पैमाना है? और सबसे अहम सवाल यह है कि क्या संशोधित नियम अदालत की कसौटी पर टिकेंगे? बहरहाल, मराठी सीखना और उसका सम्मान करना एक बात है, लेकिन किसी की आजीविका को भाषा की ऐसी परीक्षा से जोड़ना, जिसकी परिभाषा और मानक ही स्पष्ट न हों, प्रशासनिक मनमानी का रास्ता भी खोल सकता है। -नीरज कुमार दुबे
चौराहे पर बांग्लादेश: बदलाव, अनिश्चितता और नई राह की तलाश
बांग्लादेश आज अपने इतिहास के एक ऐसे संवेदनशील मोड़ पर खड़ा है, जिसे कूटनीतिक और राजनीतिक विश्लेषक 'चौराहे' का नाम दे रहे हैं। सत्ता के तख्तापलट, व्यापक छात्र आंदोलनों और एक दीर्घकालिक शासन के अचानक अंत के बाद, यह दक्षिण एशियाई राष्ट्र वर्तमान में एक अभूतपूर्व परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। जब कोई देश ऐसे चौराहे पर खड़ा होता है, तो सबसे बड़ा और यक्ष प्रश्न यही उठता है कि 'जाए तो जाए कहां?' क्या यह देश एक पूर्ण, पारदर्शी और समावेशी लोकतंत्र की ओर बढ़ेगा, या फिर यह राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक मंदी और आंतरिक संघर्षों के एक ऐसे चक्रव्यूह में फंस जाएगा जिससे निकलना आने वाले दशकों तक मुश्किल हो जाएगा? यह संपादकीय इसी गंभीर प्रश्न के विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण करता है, जिसमें राजनीतिक पुनर्गठन, प्रशासनिक चुनौतियां, आर्थिक संकट, सामाजिक ताना-बाना और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के जटिल समीकरण शामिल हैं। अगस्त 2024 में शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग सरकार के पतन के बाद, बांग्लादेश ने नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में एक अंतरिम सरकार की स्थापना देखी। इस बदलाव को देश की जनता, विशेषकर युवाओं ने 'दूसरा स्वतंत्रता आंदोलन' या 'सच्ची मुक्ति' का नाम दिया। छात्र आंदोलनों ने जिस तरह एक शक्तिशाली शासन को उखाड़ फेंका, उसने पूरी दुनिया को चौंका दिया। लेकिन सत्ता बदल देना जितना चुनौतीपूर्ण होता है, व्यवस्था को संभालना और एक नई पारदर्शी प्रणाली का निर्माण करना उससे कहीं अधिक जटिल होता है। शुरुआती दौर में जो उत्साह और उम्मीदें थीं, वे धीरे-धीरे प्रशासनिक और व्यावहारिक चुनौतियों के धरातल पर आकर थमती दिखाई दे रही हैं। अंतरिम सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह देश में सामान्य स्थिति कब और कैसे बहाल करे, और एक ऐसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया की शुरुआत करे जो निष्पक्ष, पारदर्शी और सर्वस्वीकार्य हो। जब एक लंबा राजनीतिक ढांचा अचानक ढह जाता है, तो देश में एक बड़ा राजनीतिक शून्य पैदा हो जाता है। बांग्लादेश वर्तमान में इसी शून्यता से जूझ रहा है। अवामी लीग के कमजोर होने के बाद, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और जमात-ए-इस्लामी जैसी पार्टियां राजनीतिक पटल पर फिर से सक्रिय हो गई हैं। इस चौराहे पर खड़ा बांग्लादेश अगर सही दिशा में कदम बढ़ाना चाहता है, तो उसे सबसे पहले अपनी लोकतांत्रिक संस्थाओं को पुनर्जीवित करना होगा। देश में एक ऐसे स्वतंत्र और शक्तिशाली चुनाव आयोग की आवश्यकता है, जिस पर सभी राजनीतिक दलों और आम जनता को पूरा भरोसा हो। अतीत में चुनावों की निष्पक्षता पर लगे दागों को धोना इस नए आयोग की सबसे बड़ी परीक्षा होगी। इसे भी पढ़ें: India Bangladesh Ganga Water Treaty पर Bihar से उठ रहे सवालों का जवाब Modi सरकार को देना ही होगा इसके साथ ही, केवल सरकार बदल देना काफी नहीं है। जब तक पुलिस, न्यायपालिका और नौकरशाही का राजनीतिकरण बंद नहीं होगा, तब तक किसी भी नए लोकतांत्रिक ढांचे की नींव कमजोर ही रहेगी। अंतरिम सरकार ने इसके लिए विभिन्न आयोगों का गठन किया है, लेकिन इन सुधारों को जमीन पर उतारना एक लंबी और कठिन प्रक्रिया है। देश में एक ऐसा राजनीतिक माहौल तैयार करना होगा जहां हर विचारधारा को अपनी बात रखने का मौका मिले, बशर्ते वह लोकतांत्रिक मूल्यों के दायरे में हो। प्रतिशोध की राजनीति को छोड़कर समावेशी राजनीति को अपनाना ही बांग्लादेश को इस चौराहे से सुरक्षित बाहर निकाल सकता है। राजनीतिक उथल-पुथल का सबसे सीधा और गहरा असर किसी भी देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। बांग्लादेश, जो कभी विकास दर के मामले में दक्षिण एशिया का चमकता सितारा माना जाता था, आज गंभीर आर्थिक चुनौतियों से घिरा हुआ है। लंबे समय तक चले कर्फ्यू, हड़तालों, इंटरनेट शटडाउन और कारखानों के बंद रहने के कारण देश की आर्थिक रीढ़ को भारी नुकसान पहुंचा है। बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था का मुख्य स्तंभ उसका रेडीमेड गारमेंट उद्योग है। देश के कुल निर्यात का लगभग 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है और यह लाखों लोगों, विशेषकर महिलाओं को रोजगार देता है। राजनीतिक अस्थिरता के कारण कई विदेशी खरीदारों ने अपने ऑर्डर वियतनाम, भारत और कंबोडिया जैसे देशों की तरफ मोड़ दिए हैं। अगर बांग्लादेश को अपनी अर्थव्यवस्था को बचाना है, तो उसे जल्द से जल्द इन कारखानों में पूर्ण सुरक्षा और निर्बाध उत्पादन सुनिश्चित करना होगा ताकि वैश्विक बाजारों में उसका खोया हुआ भरोसा वापस लौट सके। आर्थिक मोर्चे पर दूसरी बड़ी समस्या देश का विदेशी मुद्रा भंडार है, जो पिछले कुछ समय से लगातार दबाव में है। इसके साथ ही, बैंकिंग क्षेत्र में बड़े पैमाने पर गैर-निष्पादित आस्तियां यानी डूबता हुआ कर्ज एक गंभीर संकट बन चुका है। केंद्रीय बैंक और अंतरिम सरकार वित्तीय अनुशासन लागू करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन जब तक बैंकिंग प्रणाली से भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद को पूरी तरह खत्म नहीं किया जाता, तब तक आर्थिक स्थिरता एक दूर का सपना बनी रहेगी। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक से मिलने वाली वित्तीय सहायता इस समय देश के लिए एक संजीवनी की तरह है, लेकिन इसके साथ आने वाली शर्तें भी देश की आंतरिक नीतियों को प्रभावित कर रही हैं। आम नागरिक के लिए सबसे बड़ी समस्या रसोई का बजट और रोजगार है। आवश्यक वस्तुओं की आसमान छूती कीमतें और दैनिक जीवन का खर्च आम जनता के धैर्य की परीक्षा ले रहा है। छात्र आंदोलन की मुख्य मांग ही रोजगार के समान अवसर और कोटा प्रणाली में सुधार थी। अब जब नई व्यवस्था आ चुकी है, तो युवाओं को रोजगार के वास्तविक अवसर प्रदान करना सरकार के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि युवाओं की उम्मीदें निराशा में बदलीं, तो सामाजिक अशांति का एक नया दौर शुरू हो सकता है। किसी भी देश की प्रगति उसके सामाजिक सद्भाव और आंतरिक सुरक्षा पर टिकी होती है। सत्ता परिवर्तन के बाद के हफ्तों में बांग्लादेश ने कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर भारी शिथिलता देखी। पुलिस थानों पर हमले, पुलिसकर्मियों की अनुपस्थिति और प्रशासनिक पंगुता के कारण देश में एक प्रकार की अराजकता की स्थिति पैदा हो गई थी। हालांकि धीरे-धीरे स्थिति में सुधार हो रहा है, लेकिन पूरी तरह से सुरक्षित माहौल का निर्माण होना अभी बाकी है। इस बदलाव के दौर में बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदू समुदाय, के खिलाफ हिंसा और उनकी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं सामने आईं। हालांकि नागरिक समाज और छात्रों ने इन संपत्तियों की रक्षा के लिए मानव श्रृंखलाएं बनाईं, लेकिन इन घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बांग्लादेश की छवि को प्रभावित किया है। एक धर्मनिरपेक्ष और समावेशी बांग्लादेश का निर्माण तभी संभव है जब हर नागरिक, चाहे उसका धर्म या जाति कुछ भी हो, खुद को पूरी तरह सुरक्षित महसूस करे। इसके अलावा, अतीत के शासकों और उनके समर्थकों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होना स्वाभाविक है, लेकिन यह कार्रवाई न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप होनी चाहिए, न कि प्रतिशोध की भावना से। यदि नई व्यवस्था भी वही गलतियां दोहराती है जो पुरानी व्यवस्था ने की थीं, तो देश में लोकतंत्र का आगमन केवल एक छलावा बनकर रह जाएगा। समाज में शांति और स्थिरता तभी लौट सकती है जब लोगों को यह विश्वास हो कि नई सरकार निष्पक्षता और न्याय के पथ पर चल रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बांग्लादेश एक बेहद महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक चौराहे पर खड़ा है। बंगाल की खाड़ी में अपनी रणनीतिक स्थिति के कारण बांग्लादेश हमेशा से वैश्विक शक्तियों के आकर्षण का केंद्र रहा है। भारत, चीन, संयुक्त राज्य अमेरिका और पश्चिम के देशों के साथ संबंधों को संतुलित करना अंतरिम और आने वाली चुनी हुई सरकार के लिए एक बहुत बड़ी कूटनीतिक परीक्षा होगी। भारत और बांग्लादेश का इतिहास, संस्कृति और भूगोल एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। शेख हसीना के कार्यकाल में दोनों देशों के संबंध अपने सबसे सुनहरे दौर में थे। सत्ता परिवर्तन के बाद, भारत के लिए बांग्लादेश में एक नया कूटनीतिक परिदृश्य सामने आया है। बांग्लादेश की नई सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह भारत के साथ पारस्परिक सम्मान और समानता के आधार पर मजबूत संबंध बनाए रखना चाहती है। दोनों देशों के बीच सीमा सुरक्षा, तीस्ता जल विवाद, व्यापार और पारगमन जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, जिनका समाधान परिपक्व कूटनीति के माध्यम से ही निकाला जा सकता है। भारत के लिए भी यह जरूरी है कि वह बांग्लादेश की जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का सम्मान करे और वहां की नई व्यवस्था के साथ रचनात्मक जुड़ाव बनाए रखे। दूसरी तरफ, चीन बांग्लादेश के बुनियादी ढांचे के विकास में एक बड़ा साझेदार रहा है। वह इस बदलाव के दौर में भी अपने आर्थिक हितों को सुरक्षित रखने की कोशिश कर रहा है। इसके समानांतर, संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय संघ ने बांग्लादेश में लोकतांत्रिक सुधारों और मानवाधिकारों की बहाली का पुरजोर समर्थन किया है। बांग्लादेश को इस बात का ध्यान रखना होगा कि वह महाशक्तियों की आपसी प्रतिस्पर्धा का अखाड़ा न बने, बल्कि अपनी विदेश नीति को देश के आर्थिक और रणनीतिक हितों के अनुरूप संचालित करे। किसी भी एक गुट की तरफ झुकाव देश की संप्रभुता और आर्थिक विकास के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। चौराहे पर बांग्लादेश, जाए तो जाए कहां? इस प्रश्न का उत्तर किसी एक व्यक्ति या एक सरकार के पास नहीं है। इसका उत्तर बांग्लादेश की सामूहिक चेतना, उसके राजनीतिक दलों की परिपक्वता और उसके युवाओं के संकल्प में छिपा है। बांग्लादेश के पास इतिहास रचने और एक नए, समृद्ध व लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में उभरने का यह एक अभूतपूर्व अवसर है। लेकिन इस मार्ग पर चलते हुए उसे अति-राष्ट्रवाद, प्रतिशोध की राजनीति, धार्मिक कट्टरता और आर्थिक कुप्रबंधन के गड्ढों से बचना होगा। इस चौराहे से आगे बढ़ने का केवल एक ही सही रास्ता है: एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करना जहां कानून का शासन सर्वोपरि हो, जहां अर्थव्यवस्था का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे, और जहां हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सुरक्षा की गारंटी मिले। दुनिया उम्मीद और कौतूहल के साथ बांग्लादेश की ओर देख रही है, और यह समय बांग्लादेश के नेतृत्व के लिए अपनी दूरदर्शिता और दृढ़ता साबित करने का है। - अशोक भाटिया, वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार
कश्मीर पर अमेरिकी सुर बदलेः भारत का कद बढ़ा, पाक बेचैन
अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर का 19 अगस्त 2026 को श्रीनगर में दिया गया यह बयान कि जम्मू-कश्मीर “भारत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा” है, सामान्य कूटनीतिक टिप्पणी मानकर नजरअंदाज करने योग्य नहीं है। यह ऐसे समय आया है जब कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान की धारणाओं के बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार नए समीकरण बन रहे हैं। गोर ने जम्मू-कश्मीर की निरन्तर सुधर रही सुरक्षा स्थिति की बात कही और अमेरिकी यात्रा संबंधी परामर्श पर पुनर्विचार के संकेत भी दिए। पाकिस्तान ने इस बयान पर अमेरिका के शीर्ष राजनयिक को तलब कर तीखा विरोध दर्ज कराया। इस पूरे घटनाक्रम को केवल कश्मीर के संदर्भ में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसे भारत-अमेरिका संबंधों में आ रहे व्यापक परिवर्तन, दक्षिण एशिया की बदलती सामरिक संरचना और पाकिस्तान की घटती कूटनीतिक प्रभावशीलता के संदर्भ में समझना अधिक उचित होगा। अमेरिका की कश्मीर नीति में लंबे समय से एक प्रकार की सावधानी रही है। वाशिंगटन सामान्यतः भारत और पाकिस्तान के बीच संवाद तथा शांतिपूर्ण समाधान की बात करता रहा है। अमेरिकी विदेश विभाग की पूर्व घोषित नीति भी जम्मू-कश्मीर में सामान्य स्थिति और राजनीतिक-आर्थिक स्थिरता की वापसी का समर्थन करती रही है। इसलिए गोर का श्रीनगर में जाकर जम्मू-कश्मीर को भारत का “महत्वपूर्ण हिस्सा” कहना निश्चित रूप से भाषा के स्तर पर एक उल्लेखनीय परिवर्तन है। लेकिन इसे अमेरिका की पूरी कश्मीर नीति में तत्काल और औपचारिक परिवर्तन मानना भी जल्दबाजी होगी। किसी राजदूत का बयान और किसी सरकार की औपचारिक नीति में अंतर होता है। फिर भी कूटनीति में शब्दों का अपना महत्व होता है। विशेष रूप से तब, जब वही शब्द उस भूभाग में बोले जाएं जिसे पाकिस्तान दशकों से अंतरराष्ट्रीय विवाद के रूप में प्रस्तुत करता रहा है। इस दृष्टि से गोर का बयान भारत के लिए मनोवैज्ञानिक और कूटनीतिक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण है। इसे भी पढ़ें: अमेरिकी राजदूत सर्जियो गौर की जम्मू-कश्मीर यात्रा ने चीनी-पाकिस्तानी चालों को किया दुरुस्त! इस बयान का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष जम्मू-कश्मीर की बदलती जमीन से जुड़ा है। गोर ने सुरक्षा व्यवस्था में सुधार का उल्लेख करते हुए यात्रा संबंधी अमेरिकी परामर्श में कमी लाने की संभावना जताई है। इसका अर्थ यह है कि वाशिंगटन अब कश्मीर को केवल सुरक्षा संकट या आतंकवाद की दृष्टि से देखने के बजाय पर्यटन, आर्थिक गतिविधियों और सामान्य जनजीवन की संभावनाओं वाले क्षेत्र के रूप में भी देख रहा है। यहीं से भारत-अमेरिका संबंधों की नई रोशनी दिखाई देती है। दोनों देशों के संबंध अब केवल व्यापार या रक्षा तक सीमित नहीं हैं। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव, समुद्री सुरक्षा, प्रौद्योगिकी, ऊर्जा, आपूर्ति-शृंखला और वैश्विक शक्ति-संतुलन जैसे विषयों ने भारत को अमेरिका के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बना दिया है। हालांकि दोनों देशों के बीच व्यापार और शुल्क जैसे मुद्दों पर मतभेद भी मौजूद हैं, फिर भी व्यापक सामरिक साझेदारी अपनी उपयोगिता बनाए हुए है। हाल में अमेरिकी विदेश मंत्री की भारत यात्रा का उद्देश्य भी तनावों के बीच संबंधों को सुदृढ़ करना और व्यापार तथा ऊर्जा सहयोग को आगे बढ़ाना था। इसलिए कश्मीर पर अमेरिकी भाषा को भारत-अमेरिका संबंधों के व्यापक पुनर्संतुलन का हिस्सा मानना अधिक तार्किक होगा। अमेरिका के लिए भारत अब केवल दक्षिण एशिया का एक बड़ा देश नहीं, बल्कि एशिया में शक्ति-संतुलन का प्रमुख आधार है। भारत के लिए भी अमेरिका महत्वपूर्ण है, लेकिन भारत ने अपनी विदेश नीति को किसी एक शक्ति के साथ पूर्ण निर्भरता के बजाय रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित रखा है। यही कारण है कि भारत अमेरिका के साथ साझेदारी बढ़ाते हुए रूस, यूरोप, पश्चिम एशिया और अन्य शक्तियों के साथ भी अपने संबंध बनाए रखता है। कश्मीर के संदर्भ में यह घटनाक्रम पाकिस्तान के लिए निश्चित रूप से असहज करने वाला है। इस्लामाबाद ने गोर के बयान को अस्वीकार करते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर एक विवादित क्षेत्र है और उसका अंतिम निर्धारण होना बाकी है। पाकिस्तान ने इसे अमेरिका की पूर्व स्थिति से विचलन बताते हुए औपचारिक विरोध दर्ज कराया। पाकिस्तान की समस्या यह है कि वह कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी विदेश नीति का केंद्रीय विषय बनाए रखना चाहता है, जबकि विश्व राजनीति की प्राथमिकताएं तेजी से बदल रही हैं। आतंकवाद, आर्थिक स्थिरता, चीन का बढ़ता प्रभाव, पश्चिम एशिया का संकट, समुद्री सुरक्षा और वैश्विक आपूर्ति-शृंखलाएं आज बड़ी शक्तियों की चिंता के केंद्र में हैं। ऐसे वातावरण में केवल कश्मीर के प्रश्न को बार-बार अंतरराष्ट्रीयकरण करने की पाकिस्तानी कोशिशों की प्रभावशीलता सीमित होती जा रही है। भारत ने दूसरी ओर लगातार यह रेखांकित किया है कि जम्मू-कश्मीर से जुड़े विषय भारत की संप्रभुता और द्विपक्षीय संबंधों के दायरे में आते हैं। गोर का श्रीनगर दौरा स्वयं इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि एक प्रमुख अमेरिकी राजनयिक ने जम्मू-कश्मीर की यात्रा की, वहां के निर्वाचित नेतृत्व से मुलाकात की और क्षेत्र की सुरक्षा तथा आर्थिक संभावनाओं पर सकारात्मक टिप्पणी की। यह पाकिस्तान की उस कोशिश के विपरीत है जिसमें वह कश्मीर को केवल विवाद और अस्थिरता के चश्मे से प्रस्तुत करना चाहता है। फिर भी भारत को इस बयान से अत्यधिक उत्साहित होकर यह मान लेने से बचना चाहिए कि अमेरिका ने कश्मीर पर अपनी संपूर्ण नीति बदल दी है। अमेरिका की विदेश नीति परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है और वह भारत तथा पाकिस्तान दोनों के साथ अपने हितों को संतुलित करने की कोशिश करता है। आज भी वाशिंगटन के लिए पाकिस्तान आतंकवाद-रोध, क्षेत्रीय सुरक्षा और अफगानिस्तान सहित कुछ विषयों में उपयोगी साझेदार है। अतः भारत के लिए इस बयान का वास्तविक महत्व किसी औपचारिक अमेरिकी नीति-परिवर्तन से अधिक उस कूटनीतिक वातावरण में है, जिसमें भारत की स्थिति को पहले की तुलना में अधिक गंभीरता से लिया जा रहा है। यहां एक और महत्वपूर्ण बात है। कूटनीति में किसी देश का महत्व केवल इस बात से तय नहीं होता कि कितने देश उसके पक्ष में बयान दे रहे हैं, बल्कि इससे तय होता है कि वैश्विक शक्तियों के हित उसके साथ कितने गहरे जुड़े हैं। आज भारत की आर्थिक क्षमता, विशाल बाजार, तकनीकी सामर्थ्य, लोकतांत्रिक संस्थाएं, युवा शक्ति और सामरिक स्थिति उसे विश्व व्यवस्था का महत्वपूर्ण स्तंभ बनाती हैं। इसी बदलती वास्तविकता का प्रभाव कश्मीर पर भी दिखाई देना स्वाभाविक है। गोर का बयान इसलिए भारत के लिए एक उपलब्धि से अधिक एक संकेत है-संकेत इस बात का कि जम्मू-कश्मीर को लेकर अंतरराष्ट्रीय विमर्श धीरे-धीरे बदल रहा है। पाकिस्तान के लिए यह चेतावनी है कि केवल पुराने नारों और कूटनीतिक दबाव से वह कश्मीर को विश्व राजनीति के केंद्र में नहीं रख सकता और अमेरिका के लिए यह उसके बदलते हितों के अनुरूप संतुलन साधने की कोशिश है। अंततः कश्मीर की स्थायी शांति केवल अंतरराष्ट्रीय बयानों से नहीं, बल्कि लोकतंत्र, विकास, सुरक्षा, जनभागीदारी और सीमा-पार आतंकवाद के अंत से सुनिश्चित होगी। भारत को इस नए कूटनीतिक वातावरण का उपयोग आक्रामक प्रचार के बजाय जिम्मेदार और आत्मविश्वासी राष्ट्र की तरह करना चाहिए। सर्जियो गोर का बयान इस बदलती तस्वीर की एक महत्वपूर्ण झलक है-जहां कश्मीर को लेकर भारत की स्थिति पहले की अपेक्षा अधिक स्पष्ट अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता प्राप्त करती दिखाई दे रही है और पाकिस्तान की कूटनीतिक चुनौती पहले से अधिक कठिन होती जा रही है। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
रेवंत रेड्डी का अमेरिका दौरा रद्द, जेडी वेंस और जोहरान ममदानी से होने वाली मुलाकातों पर उठे सवाल
केंद्र के फैसले के बाद राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि प्रस्तावित अमेरिकी कार्यक्रम में न्यूयॉर्क सिटी के मेयर जोहरान ममदानी और अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस से संभावित मुलाकातों ने मामले को संवेदनशील बना दिया।
भगवंत मान की पत्नी पर गंभीर आरोपों के बाद हमलावर विपक्ष, मांगा पंजाब के मुख्यमंत्री का इस्तीफा
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वंदे मातरम की विरासत की रक्षा के लिए भाजपा ने प्रस्ताव किया पारित, सीडब्ल्यूसी के फैसले की निंदा की
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Rahul Gandhi With Students: युवाओं को साधने की बड़ी रणनीति? | Chhatron Ki Goonj
India Bangladesh Ganga Water Treaty पर Bihar से उठ रहे सवालों का जवाब Modi सरकार को देना ही होगा
1996 की भारत-बांग्लादेश गंगा जल संधि दिसंबर में समाप्त होने वाली है, ऐसे में ढाका नई संधि की मांग तेज कर रहा है और सूखे के मौसम में न्यूनतम जल प्रवाह की गारंटी जैसी शर्त जोड़ना चाहता है, मगर केंद्र और बिहार में सत्तारुढ़ एनडीए के एक प्रमुख घटक जनता दल यूनाइटेड के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने अपने लेख के माध्यम से जो सवाल उठाए हैं, उसने पूरे मामले का नया मोड़ दे दिया है। उनका संदेश साफ है कि भारत को केवल बांग्लादेश के साथ नई संधि पर विचार नहीं करना चाहिए, बल्कि उससे पहले यह तय करना होगा कि बदलती जलवायु, घटते प्रवाह और बढ़ती जरूरतों के बीच गंगा का पानी भारत के अपने राज्यों खासकर बिहार के बीच किस आधार पर बांटा जाएगा। यही वह सवाल है जो 2026 के बाद गंगा की राजनीति को केवल जल बंटवारे का मुद्दा नहीं रहने देता, बल्कि इसे राष्ट्रीय हित, सीमा सुरक्षा, क्षेत्रीय कूटनीति और सामरिक रणनीति के केंद्र में ला खड़ा करता है। दरअसल, ढाका चाहता है कि नई संधि में एक ‘गारंटी क्लॉज’ शामिल हो, जिसके तहत सूखे के मौसम में बांग्लादेश को गंगा के पानी की एक न्यूनतम मात्रा सुनिश्चित की जाए। 1977 के समझौते में इस तरह की गारंटी का प्रावधान था, लेकिन 1996 की संधि में इसे शामिल नहीं किया गया। बांग्लादेश का तर्क है कि जलवायु परिवर्तन, अनिश्चित होते सूखे मौसम के प्रवाह और पानी की घटती उपलब्धता के कारण पुराना फार्मूला अब उसकी जरूरतों और वर्तमान परिस्थितियों को प्रतिबिंबित नहीं करता। इसे भी पढ़ें: Bangladesh PM Tarique Rahman की India visit पर फैसला नहीं, ढाका ने दी सफाई लेकिन ठीक यही तर्क भारत, विशेषकर बिहार के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है। संजय झा का सवाल है कि तीन दशक पुरानी गणना के आधार पर भारत खुद को एक और लंबे अंतरराष्ट्रीय दायित्व में क्यों बांधे? गंगा का अविरल प्रवाह बिहार में कई हिस्सों में टूट रहा है, नदी के चैनल बदल रहे हैं, कई इलाकों में भूजल संकट गहरा रहा है और दूसरी ओर दक्षिण बिहार के सूखा प्रभावित क्षेत्रों के साथ-साथ उत्तर बिहार के बाढ़ग्रस्त इलाके भी पानी की असमानता से जूझ रहे हैं। ऐसे में जब नदी का व्यवहार ही बदल चुका है तो 1996 के आंकड़ों और फार्मूले को भविष्य के लिए स्थायी मान लेना बिहार के हितों पर भारी पड़ सकता है। देखा जाये तो फरक्का पर विवाद इस पूरी बहस का सबसे संवेदनशील केंद्र है। बांग्लादेश लंबे समय से फरक्का बैराज को सूखे मौसम में उसके हिस्से के जल प्रवाह में कमी के लिए जिम्मेदार ठहराता रहा है। वहां की ओर से इसे लेकर तीखी भाषा भी इस्तेमाल की गई है। भारत का पक्ष अलग है। भारत फरक्का को बांध नहीं बल्कि एक डायवर्जन संरचना मानता है, जिसका उद्देश्य गंगा के पानी का एक हिस्सा हुगली नदी प्रणाली की ओर मोड़ना है, जबकि शेष प्रवाह बांग्लादेश की दिशा में आगे बढ़ता है। भारत यह भी कहता रहा है कि जल प्रवाह से जुड़ा डेटा संयुक्त नदी आयोग के माध्यम से साझा किया जाता है। लेकिन अब असली सवाल केवल फरक्का नहीं है। सवाल यह है कि गंगा पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता तय करने से पहले भारत के भीतर गंगा बेसिन वाले राज्यों यानि उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के अधिकारों और जरूरतों का वैज्ञानिक आकलन क्यों नहीं होना चाहिए? यही वह बिंदु है जहां संजय झा की मांग बिहार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। बिहार की आबादी 1996 के मुकाबले काफी बढ़ चुकी है। पीने के पानी, सिंचाई और औद्योगिक जरूरतों का दबाव भी कई गुना बढ़ा है। राज्य को यदि अपनी कृषि, सिंचाई परियोजनाओं और जल प्रबंधन के लिए दीर्घकालिक योजना बनानी है तो उसे पहले से यह पता होना चाहिए कि गंगा बेसिन में उसका वास्तविक और न्यायसंगत हिस्सा कितना है। नई संधि से पहले भारत के भीतर वैज्ञानिक जल आवंटन बिहार के लिए सबसे बड़ा रणनीतिक लाभ हो सकता है। भारत के लिए भी यह केवल बिहार बनाम बांग्लादेश का प्रश्न नहीं है। गंगा भारत और बांग्लादेश के बीच साझा 54 प्रमुख नदियों वाले व्यापक जल संबंधों का हिस्सा है। यदि भारत बिना घरेलू जल संतुलन तय किए बांग्लादेश को न्यूनतम प्रवाह की गारंटी देता है, तो भविष्य में सूखे के गंभीर वर्षों में अपने राज्यों की जरूरतों और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के बीच टकराव पैदा हो सकता है। इसलिए नई संधि का आधार 1950 के दशक या 1990 के दशक के आंकड़े नहीं, बल्कि वर्तमान हाइड्रोलॉजिकल डेटा, जलवायु अनुमान, वास्तविक प्रवाह और समय-समय पर समीक्षा की व्यवस्था होना चाहिए। भारत की संसदीय समिति भी इस दिशा में संकेत दे चुकी है कि संधि के नवीनीकरण पर बातचीत में बिहार और पश्चिम बंगाल की चिंताओं, अपडेटेड जल आंकड़ों और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को शामिल किया जाना चाहिए। इसका अर्थ साफ है कि नई व्यवस्था यदि बनती है तो वह पुराने अंकगणित की कॉपी नहीं हो सकती। दूसरी तरफ, मान लीजिये कि अगर संधि समाप्त हो जाती है और नई संधि नहीं हो पाती तब क्या होगा? ऐसे में संभव है कि बांग्लादेश इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने की कोशिश कर सकता है। ढाका संयुक्त राष्ट्र समेत विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जल अधिकार और सूखे के मौसम में जल संकट का सवाल उठा सकता है। इससे भारत पर कूटनीतिक दबाव बढ़ाने की कोशिश होगी और द्विपक्षीय संबंधों में एक नया तनाव पैदा हो सकता है। बांग्लादेश घरेलू राजनीति में भी गंगा जल को एक संवेदनशील राष्ट्रवादी मुद्दे के रूप में इस्तेमाल कर सकता है। ऐसे में भारत पर इसका असर केवल कूटनीतिक छवि तक सीमित नहीं रहेगा। जल विवाद सीमा पार सहयोग, नदी प्रबंधन, व्यापार और व्यापक भारत-बांग्लादेश संबंधों को प्रभावित कर सकता है। यही कारण है कि नई दिल्ली के लिए सबसे समझदारी भरा रास्ता न तो आंख बंद करके पुरानी संधि का नवीनीकरण है और न ही जल प्रश्न को अनिश्चितता में छोड़ देना। भारत को इस मौके का इस्तेमाल एक मजबूत, आधुनिक और संतुलित जल रणनीति बनाने में करना चाहिए। पहले अपने राज्यों के हितों का वैज्ञानिक निर्धारण, फिर बांग्लादेश के साथ पारदर्शी बातचीत। नई संधि में वास्तविक प्रवाह के आधार पर आवंटन, छोटे समीक्षा चक्र, जलवायु परिवर्तन के अनुसार संशोधन और असाधारण परिस्थितियों के लिए स्पष्ट प्रावधान किए जा सकते हैं। बहरहाल, दिसंबर 2026 की समयसीमा इसलिए केवल एक संधि की समाप्ति नहीं है। यह भारत के सामने अपनी गंगा नीति को नए सिरे से लिखने का अवसर है। और अगर इस बार बिहार के हितों, बदलती जलवायु और राष्ट्रीय जल सुरक्षा को केंद्र में रखकर फैसला हुआ, तो नई व्यवस्था केवल कूटनीतिक समझौता नहीं, बल्कि भारत की दीर्घकालिक सामरिक और जल सुरक्षा की मजबूत नींव बन सकती है। -नीरज कुमार दुबे
दुनिया देखती रह गई, Russia ने India को Nuclear Energy Power बनाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी
पूरी दुनिया में मशहूर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की दोस्ती का एक बड़ा रणनीतिक लाभ भारत को मिलने जा रहा है और यह घटनाक्रम अमेरिका समेत पूरे पश्चिमी जगत के लिए चौंकाने वाला है। हम आपको बता दें कि भारत और रूस के बीच उभरती परमाणु साझेदारी मात्र कोई बिजली उत्पादन का समझौता नहीं है बल्कि यह ऊर्जा सुरक्षा, अत्याधुनिक परमाणु तकनीक, छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों, बड़े परमाणु संयंत्रों और उच्च तकनीकी विनिर्माण के जरिए भारत की सामरिक शक्ति को नई ऊंचाई देने वाला समीकरण बनने जा रही है। देखा जाये तो ऐसे समय में जबकि पश्चिमी देश वैश्विक ऊर्जा और उच्च प्रौद्योगिकी आपूर्ति शृंखलाओं पर अपना प्रभाव बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं, तब भारत और रूस के बीच परमाणु सहयोग का नई दिशा पकड़ना भू-राजनीतिक समीकरणों में एक बड़ा संदेश है। यह साझेदारी भारत को केवल ऊर्जा की अतिरिक्त क्षमता नहीं देगी, बल्कि उसे तकनीकी आत्मनिर्भरता, औद्योगिक विस्तार और रणनीतिक स्वायत्तता की उस स्थिति तक पहुंचाने में मदद कर सकती है, जहाँ नई दिल्ली वैश्विक शक्ति संतुलन में कहीं अधिक मजबूत और निर्णायक भूमिका निभाए। हम आपको बता दें कि भारत के परमाणु क्षेत्र में हाल के नियामकीय बदलावों ने विदेशी परमाणु प्रौद्योगिकी के लिए नए अवसर खोले हैं। लेकिन इसका सबसे बड़ा लाभ उस देश को मिलने की संभावना है, जिसके पास केवल डिजाइन नहीं, बल्कि वास्तविक परिचालन अनुभव भी मौजूद है। रूस इस दौड़ में इसलिए आगे दिखाई देता है क्योंकि उसके पास बड़े परमाणु संयंत्रों के साथ-साथ छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों के संचालन का व्यावहारिक अनुभव है। इसे भी पढ़ें: Vishwakhabram: Putin के Kuril Islands पहुँचते ही भड़क उठीं Sanae Takaichi, Japan-Russia के बीच जोरदार भिड़ंत से दुनिया हैरान SMR तकनीक भारत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। पारंपरिक परमाणु बिजलीघर विशाल निवेश, बड़े भूभाग और लंबी निर्माण अवधि की मांग करते हैं। इसके विपरीत छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर अपेक्षाकृत कम क्षमता वाले, चरणबद्ध तरीके से स्थापित किए जा सकने वाले और विशेष जरूरतों के अनुसार तैनात किए जा सकते हैं। इन्हें दूरदराज के क्षेत्रों, सीमित ग्रिड वाले इलाकों, औद्योगिक क्लस्टरों और ऊर्जा-गहन डेटा सेंटरों के लिए उपयोगी माना जा रहा है। रूस का अकादमिक लोमोनोसोव इस दिशा में विशेष महत्व रखता है। यह एक तैरता हुआ परमाणु ऊर्जा संयंत्र है, जिसमें दो 35 मेगावाट क्षमता के मॉड्यूल हैं और जिसने वाणिज्यिक संचालन के जरिए फ्लोटिंग न्यूक्लियर पावर की व्यवहार्यता प्रदर्शित की है। भारत जैसे विशाल समुद्री तट वाले देश के लिए यह मॉडल केवल तकनीकी जिज्ञासा नहीं, बल्कि एक संभावित रणनीतिक विकल्प है। भविष्य में तटीय औद्योगिक क्षेत्रों, बंदरगाहों, द्वीपीय क्षेत्रों और दूरस्थ इलाकों की ऊर्जा जरूरतों के लिए ऐसी तकनीक अत्यंत उपयोगी हो सकती है। देखा जाये तो भारत-रूस सहयोग का दूसरा बड़ा आधार बड़े परमाणु रिएक्टर हैं। तमिलनाडु का कुडनकुलम परमाणु बिजली संयंत्र इस साझेदारी की सबसे मजबूत मिसाल है। रूस की VVER तकनीक पर आधारित इकाइयों ने दोनों देशों के बीच परमाणु सहयोग को प्रयोगशाला से निकालकर जमीन पर उतारा है। अब नई पीढ़ी के VVER-1200 जैसे उच्च क्षमता वाले रिएक्टरों और भारत में इनके क्रमिक निर्माण की संभावनाओं पर भी चर्चा का विस्तार हो रहा है। देखा जाये तो यहां भारत का सबसे बड़ा लाभ केवल अतिरिक्त बिजली क्षमता नहीं है। यदि रूसी डिजाइन वाले परमाणु संयंत्रों और SMR के उपकरणों का स्थानीयकरण भारत में होता है, तो देश परमाणु ऊर्जा का उपभोक्ता भर नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक परमाणु आपूर्ति शृंखला का हिस्सा बन सकता है। इससे भारतीय कंपनियों को उच्च तकनीकी विनिर्माण, विशेष इस्पात, भारी इंजीनियरिंग, नियंत्रण प्रणालियों और परमाणु उपकरण निर्माण में अवसर मिलेंगे। यही ‘मेक इन इंडिया’ को परमाणु क्षेत्र में वास्तविक गहराई दे सकता है। यहां लागत का प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है। भारत की स्वदेशी दबावयुक्त भारी जल रिएक्टर तकनीक की तुलना में रूसी रिएक्टरों की लागत कुछ अधिक हो सकती है, लेकिन पश्चिमी देशों के कई प्रस्तावित रिएक्टरों की तुलना में रूसी विकल्प अपेक्षाकृत प्रतिस्पर्धी माना जाता है। हम आपको बता दें कि परमाणु ऊर्जा में केवल ईंधन की कीमत निर्णायक नहीं होती; निर्माण अवधि, वित्तपोषण की लागत और परियोजना में होने वाली देरी अंतिम लागत को कई गुना बढ़ा सकती है। इसलिए रूस का अनुभव और क्रमिक निर्माण का मॉडल भारत के लिए आर्थिक रूप से भी आकर्षक हो सकता है। लेकिन इस साझेदारी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका सामरिक निहितार्थ है। ऊर्जा आयात पर निर्भर भारत के लिए परमाणु ऊर्जा स्थिर बेसलोड बिजली उपलब्ध कराने का साधन है। सौर और पवन ऊर्जा के विपरीत परमाणु संयंत्र चौबीसों घंटे बिजली दे सकते हैं। जैसे-जैसे भारत की अर्थव्यवस्था, डेटा अवसंरचना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रक्षा उत्पादन और उन्नत विनिर्माण का विस्तार होगा, बिजली की मांग में भारी वृद्धि होगी। ऐसे में परमाणु ऊर्जा भारत की ऊर्जा सुरक्षा का रणनीतिक स्तंभ बन सकती है। इसके अलावा, रूस के साथ गहरा परमाणु सहयोग भारत को जो बड़ा लाभ देता है वह है रणनीतिक स्वायत्तता। भारत यदि केवल पश्चिमी प्रौद्योगिकी या किसी एक आपूर्ति शृंखला पर निर्भर रहता है, तो भू-राजनीतिक दबाव उसकी ऊर्जा योजनाओं को प्रभावित कर सकते हैं। रूस के साथ सहयोग भारत को विकल्प देता है और बहुध्रुवीय परमाणु साझेदारी की क्षमता बढ़ाता है। साथ ही, भारत अपने स्वदेशी SMR और परमाणु कार्यक्रमों को भी समानांतर रूप से आगे बढ़ा सकता है। देखा जाये तो भारत का लक्ष्य अब केवल अधिक बिजली पैदा करना नहीं होना चाहिए। असली लक्ष्य ऐसी परमाणु क्षमता विकसित करना है, जिसमें विदेशी सहयोग से तकनीक, अनुभव और विनिर्माण क्षमता हासिल करते हुए देश धीरे-धीरे डिजाइन, उत्पादन और आपूर्ति में आत्मनिर्भर बने। रूस के साथ साझेदारी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पुल बन सकती है। बहरहाल, आने वाले वर्षों में भारत-रूस परमाणु सहयोग का असली मूल्य मेगावाट में नहीं, बल्कि उस रणनीतिक क्षमता में मापा जाएगा जो भारत को ऊर्जा-सुरक्षित, तकनीकी रूप से सक्षम और वैश्विक परमाणु उद्योग में अधिक प्रभावशाली बनाएगी। यदि स्थानीयकरण, लागत नियंत्रण, सुरक्षा मानकों और स्वदेशी क्षमता निर्माण के बीच सही संतुलन बनाया गया, तो यह साझेदारी भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ उसकी सामरिक शक्ति को भी नई ऊंचाई दे सकती है। -नीरज कुमार दुबे
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रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह एक निजी लैब के उद्घाटन के लिए आज पहुंचेंगे नोएडा, सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबंद
'चवन्नी' वाले बयान पर घिरे अखिलेश यादव! जयंत चौधरी के समर्थन में उतरीं मायावती, पूरे जाट समाज से माफ़ी की मांग
जयंत चौधरी को लेकर अखिलेश की टिप्पणी पर भड़कीं मायावती, लिखा- सपा गिरगिट की तरह रंग बदल लेती है
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राहुल गांधी सरकार को जवाबदेह बना रहे हैं: उमर
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने दिल्ली में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के विरोध-प्रदर्शन का समर्थन करते हुए कहा कि वह सरकार को जवाबदेह बना रहे हैं
असम में क्यों हो रहा है इतना निवेश
लगातार बढ़ते विदेशी निवेश की वजह से आने वाले औद्योगिक बदलाव के कारण अब असम की वैश्विक पहचान 'चाय से चिप' तक बनाने वाले राज्य की बन रही है. लेकिन ये छवि चिंतामुक्त नहीं है
मेरठ में पुलिस पर मारपीट के आरोपों से गरमाया मामला, DIG सहारनपुर करेंगे जांच
दिग्विजय भाटी का वीडियो वायरल, तत्कालीन SSP अविनाश पांडेय समेत पुलिसकर्मियों पर लगाए गंभीर आरोप; सपा विधायक अतुल प्रधान ने कार्रवाई की मांग की
चुनावी मुद्दों पर आक्रामक हुए राहुल गांधी
कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी इन दिनों एक ओर चुनावी मुद्दों को लेकर आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं, तो दूसरी ओर आगामी विधानसभा चुनावों से पहले विपक्षी गठबंधनों को मजबूत करने की कोशिशों में जुटे हैं
'वंदे मातरम' पर घमासान तेज, भाजपा और कांग्रेस नेता आमने-सामने
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31 दिन बाद पैलेट गन केस में FIR! राहुल गांधी के धरने के बाद दिल्ली पुलिस ने मानी मांग
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भारतीय शेयर बाजार बंद, मेटल और बैंकिंग स्टॉक्स में हुई खरीदारी
मुंबई, भारतीय शेयर बाजार शुक्रवार के कारोबारी सत्र में करीब सपाट बंद हुआ। दिन के अंत में सेंसेक्स 3 अंक की मामूली बढ़त के साथ 77,540.83 और निफ्टी 20.15 अंक या 0.08 प्रतिशत की तेजी के साथ 24,252.00 पर था।
पंजाब में फिर साथ आएंगे अकाली दल-भाजपा, मजीठिया के बयान से गठबंधन की अटकलें तेज
पंजाब में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले अकाली दल और भाजपा के संभावित गठबंधन की अटकलें तेज हैं। बिक्रम मजीठिया और हरसिमरत कौर के बयानों से चर्चा बढ़ी।
एक बंगाली कहावत है - “मायेर स्तबेर अर्धेक ग्रहण, अर्धेक बर्जन, ए कैमन सन्तानेर भक्ति?” मातृभूमि के स्तुति गीत को आधा स्वीकारना और आधा त्यागना, यह किस प्रकार की संतान की भक्ति है? भद्र बंगाल की सौ वर्षों की व्यथा, वेदना ही इस लोकोक्ति रूप में प्रकट हुई है। भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम का शायद ही कोई दूसरा गीत “वन्दे मातरम्” जितना भावात्मक, राजनीतिक और ऐतिहासिक रहा हो। बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय जी की यह रचना केवल साहित्य नहीं अपितु वह स्वदेशी आन्दोलन, क्रांतिकारियों और राष्ट्रीय जागरण का उद्भट उद्घोष बनी थी। 15 अगस्त, 2026 को कांग्रेस के केंद्रीय कार्यालय दिल्ली में कारित घृणित कृत्य से कांग्रेस का इस्लामिक डीएनए पुनः सिद्ध हो गया है। वंदे मातरम् के इस अपमान के समय नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, दशक भर कांग्रेस अध्यक्ष रही सोनिया गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे उपस्थित थे। दुस्साहस और दुर्भाग्य का विषय यह है कि इन तीनों ने ही वंदे मातरम् के अपमान के इस दुष्कृत्य को प्रारंभ किया था। इसे भी पढ़ें: बुरे काम का नतीजा बुरा ही होता है, बाहरी दिल्ली के बेताज बादशाह रहे Sajjan Kumar की सत्ता, सियासत और सजा की कहानी यही संदेश देती है इस दुर्भाग्यजनक घटना के बाद कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ताओं ने देश को स्पष्टीकरण देना प्रारंभ किया कि - “सोनिया गांधी ने वंदे मातरम् का अपमान नहीं किया बल्कि वे बुजुर्ग खड़गे जी को खड़े होने के कारण असहज होता देखकर उनके लिए कुर्सी मंगा रही थी”। यहीं से कांग्रेस नेतृत्व की मूढ़ता, राष्ट्र अनास्था व मुस्लिम तुष्टिकरण के पक्ष में दुराग्रह रखने के चरित्र की पुनरावृत्ति दिखाई पड़ती है। इस घटनाक्रम के अंतरतत्व को समझिए। कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ताओं को अपने नेतृत्व द्वारा ‘वंदे मातरम्’ का यह अपमान बुरा लगा इसलिए ही उन्होंने बिना केंद्र या प्रदेश नेतृत्व के कहे ही इस घटना पर कांग्रेस नेतृत्व का बचाव प्रारंभ कर दिया था। हजारों कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने सोशल मीडिया पर लाखों पोस्ट डाली और कांग्रेस नेतृत्व का बचाव किया। यह ‘वंदे मातरम्’ और ‘मुस्लिम तुष्टिकरण की कांग्रेसी प्रवृत्ति’ के विरोध का प्रतीक था। इस मनोभाव को कांग्रेस के इटालियन नेतृत्व ने समझने का प्रयास ही नहीं किया। कांग्रेस ने इस घटना पर अपने कार्यकर्ताओं की भावनाओं को नहीं समझा तो भी कोई बात नहीं होती। कांग्रेस ने तो अपनी हठधर्मिता, अड़ियलपन, मति मूढ़ता की हद तो तब दिखा दी जब उसने अपनी राष्ट्रीय वर्किंग कमेटी में ‘वंदे मातरम्’ को पूर्ण रूप में नहीं गाने के लिए प्रस्ताव ही पारित कर दिया। ‘वंदे मातरम्’ के हाल ही में किए गए अपराध और अपमान के संदर्भ में कांग्रेस के प्रवक्ता और आधिकारिक व्यक्तव्य जो कह रहे हैं उसमें वे गांधी जी, नेताजी सुभाषचंद्र, गुरुदेव रबिन्द्रनाथ टैगोर आदि का नाम लेते हुए इस गीत के विभाजन को उनकी से हुआ बता रहे हैं। यह एक भ्रमजाल और झूठ का पहाड़ है। गांधी जी तो इस बात के पक्षधर थे कि यह गीत संपूर्ण देश को जोड़ने वाला प्राणतत्त्व है और इसे इसके पूर्ण वैभव के साथ संपूर्णतः स्वीकार किया जाना चाहिए। गांधी जी ने इसके समर्थन में अपनी स्पष्ट राय रखी थी, किंतु जवाहरलाल नेहरू ने तुष्टिकरण की अपनी राजनैतिक कुटिलताओं और प्राथमिकताओं के चलते गांधी जी की एक न चलने दी। इतिहास यह भी है कि, यह दुखद एतिहासिक पृष्ठ रहस्यमयी भी है। रहस्य यह कि - “अंततः वह कौन सी कमजोर नस थी,, जिसके आधार पर नेहरू जी ऐसे निर्णय भी गांधी जी से करवा लेते थे जिनके लिए गांधी जी कभी भी तैयार नहीं थे”। गांधी जी वंदेमातरम् विभाजन हेतु असहमत थे। गांधी जी बंग-भंग हेतु भी सहमत नहीं थे। गांधी जी ने कहा था कि “इस देश का विभाजन मेरी लाश पर होगा”। गांधी जी स्वतंत्रता पश्चात् कांग्रेस को विसर्जित करने हेतु भी संकल्पित थे। गांधी जी ने कहा था कि स्वतंत्रता पश्चात् हम एक बूँद की स्याही लेंगे और यह लिख देंगे - “इस देश में गौहत्या वैसा ही दंड होगा जैसा मानव हत्या के लिए होता है”। स्वच्छता, हिंदी राष्ट्रभाषा, ग्रामवासी भारत आदि हेतु भी गांधी जी प्रतिबद्ध थे। कांग्रेस ने सात दशकों की सत्ता में इन विषयों को त्याज्य रखा। ‘भारत में रामराज स्थापना’ को कांग्रेस का लक्ष्य बनाया था किंतु ‘नेहरू-गांधी कांग्रेस’ मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए श्रीराम को ही कल्पना सिद्ध करने के प्रयास में लग गई। कांग्रेस स्वयं को सेकुलर सिद्ध करने के अनथक प्रयास करने लगी थी और ‘रामेश्वरम् रामसेतु’ के विध्वंस, विनाश, भंजन, खंडन हेतु मशीनें समुद्रतट पर भेज चुकी थी। ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ हेतु कांग्रेस ने न जाने कितने ही कांड इस देश में किया और सतत-निरंतर किए हैं। आश्चर्य और दुस्साहस का विषय यह है कि ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ के लिए देश भर से लताड़े जाने के बाद भी कांग्रेस नेतृत्व इस बात को समझ ही नहीं रहा है। हाँ, कांग्रेस का जमीनी कार्यकर्ता इस बात कोई समझ भी रहा है और वह कांग्रेस की ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ की नीति के विरोध में भी है, तब ही तो ‘कार्यकर्ता बेचारे’ ने सोशल मीडिया पर लाखों की संख्या में आकर यह कहा था कि “सोनिया जी वंदे मातरम् का गान रोक नहीं रही थी बल्कि खड़गे जी के लिए कुर्सी बुला रही थी”। ‘वंदे मातरम्’ और ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ की यह कांग्रेस कार्यकर्ता की नैसर्गिक प्रतिक्रिया थी जिसे कांग्रेस नेतृत्व ने स्वीकार करना चाहिए थे किंतु कांग्रेस ने ‘राम पथ’ को नहीं बल्कि ‘रोम पथ’ को चुना हुआ है। 26 अक्टू.- 1 नव. 1937 की कलकत्ता कांग्रेस कार्यसमिति में ‘वंदे मातरम्’ गान के विभाजन की अनुशंसा और कुछ नहीं बल्कि एक ‘इमोशनल राष्ट्रीय ब्लैक मेल’ था। यह देश विभाजन में अपना हित देखने वाले नेताओं द्वारा निर्मित ‘ब्लैकमेल’ था। आदरणीय बंकिम बाबू ने जब भारतमाता को केवल एक भौगोलिक भू-भाग के रूप में नहीं, बल्कि साक्षात् देवी और जननी के रूप में देखा, तो उनके मानस में 'सोनार बांग्ला' और संपूर्ण भारतवर्ष का एक ऐसा दिव्य चित्र उभर आया, जिसने औपनिवेशिक दास्तां के अंधकार को चीरकर रख दिया। विडंबना, वंचना, विसंगति, विचित्र, यह है कि जिस गीत ने स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों, क्रांतिकारियों और हुतात्माओं को हँसते-हँसते फाँसी के फंदों को जयमाल मान लेने की असीम शक्ति दी, उसी महान कृति को स्वतंत्रता के पश्चात राजनीति और तुष्टिकरण के बवंडर में उलझा दिया गया। मुस्लिम तुष्टिकरण के मकड़जाल ने वंदेमातरम् को कोई एक सौ वर्षों तक, उसके पूर्ण गान से वंचित रखा। प्रश्न यह है कि यदि प्रथम दो छंद पहले से ही कई कांग्रेस सभाओं में प्रचलित थे, तो 1937 में उसे औपचारिक रूप से सीमित करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? वस्तुतः कांग्रेस, मुस्लिम तुष्टिकरण का समायोजन कर रही थी। कांग्रेस द्वारा गांधी जी, गुरुदेव रबिंद्रनाथ व नेताजी की ढाल लेकर ‘वंदे मातरम्’ का विरोध ग़लत है। इतिहासकार एस. मुखर्जी ने अपनी पुस्तक Muslim Politics के पृष्ठ क्र. 53 पर इसे कांग्रेस द्वारा मुसलमानों को संतुष्ट करने के लिए गीत को “mutilate” (अंगभंग) करने जैसा बताया है। इतिहासकार ए. जी. नूरानी ने “Vande Mataram: A Historical Lesson”, Economic and Political Weekly, Vol. 8, 9 जून 1973, पृष्ठ क्र. 1039–1043 में लिखा है कि “वन्दे मातरम् का विभाजन केवल एक पक्ष की कायरता थी”। इतिहासकार सब्यसाची भट्टाचार्य ने भी अपनी पुस्तक Vande Mataram: The Biography of a Song में देश के अनेक अग्रणी मुस्लिम नेताओं द्वारा ‘वंदे मातरम्’ पूर्णतः आनंदपूर्वक गाने की घटनाओं का विस्तृत उल्लेख किया है। यही सत्य है शेष कांग्रेस के झूठ का पहाड़! - डॉ. प्रवीण दाताराम
किशोरों और बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए यूरोप के कई देशों ने पंद्रह या सोलह साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर पाबंदी लगानी शुरू कर दी है। इसका अगुआ होने का श्रेय ऑस्ट्रेलिया को है, जिसने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के इंस्टाग्राम, फेसबुक, टिकटॉक, एक्स यानी ट्विटर और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्मों के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी है। इसी तरह फ्रांस ऐसा कानून बनाने वाला यूरोप का पहला देश हो गया है। वहां की संसद ने पंद्रह साल तक के बच्चों के सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर रोक लगाने का कानून पारित कर दिया है। हालांकि यह कानून खटाई में पड़ गया है। फ्रांस के सर्वोच्च न्यायालय ने इस कानून को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन माना है। अदालत का कहना है कि नाबालिगों पर प्रतिबंध लगाने के चक्कर में यह कानून असल में हर नागरिक पर सोशल मीडिया का उपयोग करने से पहले अपनी उम्र साबित करने का दबाव बनाता है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैंक्रो इस इस कानून के प्रबल समर्थक हैं। अदालत के फैसले के बाद उन्होंने कहा है कि इस कानून को लागू करने के लिए अदालती फैसले के मद्देनजर जरूरी सुधार करके फिर से इसे संसद से पारित कराया जाएगा। फ्रांस के इस फैसले से स्पष्ट है कि वह किशोरों के सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर लगाम लगाने के लिए पीछे नहीं हटने जा रहा है। जिस पश्चिमी दुनिया में सोशल मीडिया का आविष्कार हुआ, जिन्होंने कभी अरब देशों में क्रांति के लिए सोशल मीडिया की सराहना की थी, अब उन्हें ही यह माध्यम अपने ही बच्चों का दुश्मन लगने लगा है। इसकी वजह है, वहां के बच्चों और किशोरों का बिगड़ता मानसिक स्वास्थ्य और पढ़ाई का गिरता स्तर। इसकी वजह से अमेरिका तक में सोशल मीडिया कंपनियों के खिलाफ लोगों में नाराजगी दिख रही है। प्रसिद्ध न्यूज एजेंसी रायटर्स ने आईपोस कंपनी के साथ हाल ही में एक सर्वे किया है। इसमें शामिल 61 फीसद लोगों ने कहा कि सोशल मीडिया कंपनियों पर सरकार को और सख्त निगरानी रखनी चाहिए। इस सर्वे में शामिल 66 प्रतिशत लोग तो 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए उम्र के प्रमाणीकरण की प्रक्रिया लागू करने पर जोर दिया है। वैसे अमेरिका के फ्लोरिडा जैसे कुछ राज्यों में चौदह साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक है। इसे भी पढ़ें: असामाजिक हो रहे सोशल मीडिया का नियमन जरूरी दुनियाभर में बच्चों और किशोंरों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक के लिए उनके मानसिक स्वास्थ्य में आ रही गिरावट और बढ़ते मानसिक तनाव को जिम्मेदार माना जा रहा है। कई शोधों से पता चला है कि लगातार स्क्रीन देखने और सोशल मीडिया के इस्तेमाल से बच्चे दूसरों की लाइफस्टाइल से खुद की तुलना करने लग रहे हैं। इससे उनमें हीन भावना, तनाव और डिप्रेशन बढ़ रहा है। इसकी वजह से उनकी नींद में कमी हो रही है। देर रात तक फोन चलाने के कारण भी बच्चों की सोने की आदत बिगड़ रही है। इससे उनमें चिड़चिड़ाहट बढ़ रही है। जिससे उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ रहा है। जानकारों का मानना है कि सोशल मीडिया ऐप्स का अलगोरिदम ऐसा है, जिससे बच्चे ही नहीं, बड़े भी उसके लत का शिकार हो रहे हैं. इससे वे स्क्रीन के आदी हो रहे हैं। कई बार कम उम्र के बच्चों के सामने आत्महत्या, हिंसा या उम्र के हिसाब से गलत सामग्री भी आती है। वैसे सोशल मीडिया का अलगोरिदम ऐसा है कि नकारात्मक, हिंसा प्रधान और सेक्स से जुड़ी खबरें और दृश्य जल्दी वायरल होते हैं। सोशल मीडिया ट्रोलिंग और अभद्र टिप्पणियों का बड़ा और आसान माध्यम बन गया है। इनकी वजह से बच्चे मानसिक प्रताड़ना का शिकार हो रहे हैं। बच्चों को फंसाने वाले अपराधी उन्हे आसानी से अपना शिकार बना लेते हैं। इसीलिए दुनिया में कई देशों की सरकारें बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर रोक लगाने की तैयारी में हैं। रोक लगाने वालों में इंडोनेशिया भी शामिल हो चुका है, जिसने मार्च 2026 से इसके नियम लागू कर दिए हैं। इनके अनुसार, 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए यूट्यूब, टिकटॉक, फेसबुक और रोब्लॉक्स जैसे हाई-रिस्क प्लेटफॉर्म्स पर पाबंदी लगा दी गई है। इंडोनेशिया की तरह मलयेशिया ने भी ऑनलाइन सुरक्षा अधिनियम के तहत 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट बनाने पर रोक लगा रखी है। संयुक्त अरब अमीरात ने बच्चों के लिए सोशल मीडिया के लिए न्यूनतम उम्र 15 वर्ष तय की है। इससे कम उम्र के बच्चों के अकाउंट बनाने पर यहां पूरी तरह रोक है। यूरोप के देश डेनमार्क में 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया ब्लॉक करने का कानून बन चुका है। बच्चों की उम्र की जांच के लिए सरकार डिजिटल एविडेंस ऐप पर काम कर रही है। इसी तरह ब्रिटेन की सरकार ने भी 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है, जो जनवरी 2027 से प्रभावी होने जा रही है। तुर्की में भी 15 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखने के लिए कानून को मंजूरी मिल चुकी है, जिसे 2026 के अंत तक लागू किया जाना है। चीन में किशोरों के लिए सोशल मीडिया पर पूरी तरह पाबंदी तो नहीं है, लेकिन उनके लिए सख्त माइनर मोड लागू है, जो रात के समय सोशल मीडिया ऐप्स के इस्तेमाल और स्क्रीन टाइम को सीमित करता है। ब्राजील का बाल एवं किशोर डिजिटल कानून 17 मार्च, 2026 से लागू हो चुका है। जिसके तहत 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों को अपने सोशल मीडिया खाते को माता-पिता या कानूनी अभिभावक से जोड़ना अनिवार्य है। इसके अलावा, यह कानून युवाओं के लगातार स्क्रॉल जैसी आदतों पर प्रतिबंध लगाता है। जर्मनी में भी इसी तरह का नियम लागू हो चुका है। स्वीडन समेत कई अन्य देश भी ऐसी तैयारी में हैं। अपने यहां कर्नाटक राज्य भी ऐसे कानून पर काम कर रहा है। जबकि नोएडा के जिला प्रशासन ने स्कूलों में ऑनलाइन के इस्तेमाल को सीमित करने का निर्देश दिया है। विदेशों की तुलना में जरा भारत को देखिए, यहां दिल्ली के जंतर-मंतर पर युवाओं और किशोरों ने जिस तरह अभद्र और अश्लील गालियों का कैमरे के सामने प्रदर्शन किया, उसे सोशल मीडिया के जरिए पूरी दुनिया ने देखा है। दिलचस्प है कि इसे प्रगतिशील बौद्धिकों के एक वर्ग ने समर्थन किया। दो राय नहीं कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल अगर सही तरीके से किया जाए तो उसकी पहुंच और त्वरा समाज को कई तरह के फायदे दिला सकती है। खामियां उजागर करके तंत्र पर दबाव बनाया जा सकता है। लेकिन हमें यह स्वीकार करने की हिचक नहीं होनी चाहिए कि देश में सोशल मीडिया अर्धनग्नता और अश्लीलता का वाहक बनता जा रहा है। इन्फ्लूएंसर बनने, रीच बढ़ाने और लाइक के जरिए कमाई के चक्कर में शरीफ परिवारों की महिलाओं को भी अंग प्रदर्शन से परहेज नहीं रहा। सोशल मीडिया के लिएकोई सेंसर नीति न होने की वजह से सबकी पहुंच किशोरों और बच्चों तक हो रही है। इसलिए भी जरूरी है कि पश्चिम की तरह अपने यहां भी इस पर ध्यान दिया जाए और महामारी बनने से पहले इस पर लगाम लगाने की कोशिश शुरू हो। नियमों का उल्लंघन करने पर सोशल मीडिया कंपनियों पर भारी जुर्माना लगाया जाता है। दिसंबर 2010 में ट्यूनिशिया से शुरू लोकतंत्र समर्थक लहर सोशल मीडिया के इतिहास का निर्णायक बिंदु है। सोशल मीडिया के सहारे यह लहर काहिरा के तहरीर चौक से सीरिया और लीबिया होते हुए समूचे अरब जगत में फैल गई। इतिहास में इस लहर को अरब स्प्रिंग यानी अरब का बसंत और पिंक रिवोल्यूशन या गुलाबी क्रांति के रूप में दर्ज है। अरब देशों में बदलाव लाने की सोच के विस्तार के पीछे सोशल मीडिया को बड़ा जरिया माना गया। लंबे यूरोपीय शासन और शिक्षा-दीक्षा के चलते भारतीय मानस अपनी सांस्कृतिक जड़ों और मूल्यों से कहीं ज्यादा प्रभावित है। इसलिए भारत में सोशल मीडिया पर ऑस्ट्रेलिया और दूसरे पश्चिमी देशों जैसे सवाल नहीं उठे। अगर इन देशों से पहले यहां सवाल उठते तो उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बता दिया जाता। बहरहाल उम्मीद की जानी चाहिए कि हम भी पश्चिमी देशों से सबक लेंगे और अपने यहां के बचपन को स्वस्थ रखने और बचाने की कोशिश जरूर करेंगे। उमेश चतुर्वेदी लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी आज एक प्रदर्शनकारी छात्र साहिल लोचव को साथ लेकर पुलिस अधिकारियों के पास पहुंचे और आरोप लगाया कि जंतर-मंतर पर 20 जुलाई के छात्र आंदोलन के दौरान कथित पेलेट गन कार्रवाई में घायल हुए छात्र की शिकायत पर एफआईआर दर्ज नहीं की जा रही है। पुलिस अधिकारियों से मुलाकात के बाद जब राहुल गांधी संतुष्ट नहीं हुए तो उन्होंने वहीं धरना शुरू कर दिया और संदेश साफ था, “एफआईआर नहीं, तो धरना जारी रहेगा।” यहीं से सवाल उठता है कि राहुल गांधी आखिर किस लड़ाई को लड़ रहे हैं? एक पीड़ित छात्र को न्याय दिलाने की कानूनी लड़ाई, पुलिस कार्रवाई की जवाबदेही तय कराने की लड़ाई, या फिर छात्र राजनीति के उभरते मैदान में अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराने की लड़ाई लड़ रहे हैं? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राहुल गांधी कोई सामान्य प्रदर्शनकारी नहीं हैं। वह देश की लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। उनके पास संसद का मंच है, सरकार को जवाबदेह बनाने की संवैधानिक हैसियत है और पूरे विपक्ष की राजनीतिक आवाज बनने का अवसर भी। फिर कभी प्रधानमंत्री के घर के बाहर तो कभी थाने पहुंचकर धरने पर बैठ जाना क्या उस पद की गरिमा और जिम्मेदारी के अनुरूप राजनीति है? इसे भी पढ़ें: उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा मानसून सत्र धरना देना लोकतंत्र में गलत नहीं है। सरकार और पुलिस के खिलाफ विरोध करना भी विपक्ष का अधिकार है। लेकिन जब देश का नेता प्रतिपक्ष पुलिस स्टेशन की सीढ़ियों पर बैठकर कहे कि जब तक एफआईआर दर्ज नहीं होगी, वह नहीं हटेगा, तब सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या राजनीतिक दबाव ही अब राहुल गांधी की प्राथमिक रणनीति बन गया है? यहां मामला और दिलचस्प इसलिए भी है क्योंकि राहुल गांधी जिस घटना को लेकर धरने पर बैठे, वह घटना अब केवल एक छात्र की शिकायत या पुलिस थाने की कार्रवाई तक सीमित नहीं रह गई है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को हुए छात्र प्रदर्शन और उसके बाद पुलिस कार्रवाई का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। शीर्ष अदालत ने हाल में पुलिस की कथित ज्यादती और बल प्रयोग के आरोपों की जांच के लिए एक हाई-पावर्ड समिति गठित करने का फैसला किया है। साथ ही पुलिस अधिकारियों ने राहुल गांधी को यह भी बताया है कि 20 जुलाई की घटना से जुड़े कई मामले दर्ज हैं और उनकी जांच क्राइम ब्रांच तथा स्पेशल सेल को सौंपी गई है। यानी सवाल यह नहीं है कि साहिल लोचव की शिकायत पर अलग से कार्रवाई होनी चाहिए या नहीं। यदि किसी संज्ञेय अपराध की शिकायत है और कानून के अनुसार एफआईआर बनती है, तो कार्रवाई अवश्य होनी चाहिए। पीड़ित को न्याय मिलना ही चाहिए। लेकिन सवाल राहुल गांधी की राजनीतिक शैली का है। सवाल उठता है कि क्या लोकसभा में विपक्ष के नेता को यह जानकारी नहीं थी कि मामला सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में है? क्या उन्हें नहीं पता था कि घटना की जांच पहले से विभिन्न स्तरों पर चल रही है? और यदि उन्हें यह सब पता था, तो फिर पुलिस स्टेशन के बाहर धरने का राजनीतिक उद्देश्य क्या था? यहीं से इस पूरी कहानी की जड़ तक जाना जरूरी है। सवाल उठता है कि जंतर-मंतर पर आखिर हुआ क्या था? दरअसल, 20 जुलाई को दिल्ली में बड़ी संख्या में छात्र परीक्षा व्यवस्था, कथित पेपर लीक और शिक्षा सुधारों की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे थे। आंदोलन का आयोजन कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP के नेतृत्व में हुआ था और प्रदर्शनकारियों की मांगों में परीक्षा प्रणाली में सुधार तथा शिक्षा से जुड़े सवाल प्रमुख थे। जंतर-मंतर से संसद की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तनाव पैदा हुआ। आरोप लगे कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर अत्यधिक बल प्रयोग किया, लाठीचार्ज किया और पेलेट गन का इस्तेमाल हुआ। कई वीडियो और तस्वीरों के बाद पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठे। राहुल गांधी ने भी इस मुद्दे को जोरदार ढंग से उठाया और बाद में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को सीधे निशाने पर लिया। लेकिन दिल्ली पुलिस का पक्ष बिल्कुल अलग रहा। पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि प्रदर्शन अवैध था और पुलिस ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए अधिकतम संयम बरता। पुलिस का दावा है कि बल का इस्तेमाल हालात बिगड़ने और हिंसा या अव्यवस्था की स्थिति पैदा होने के बाद किया गया। घटना के दौरान पुलिसकर्मियों के घायल होने की बात भी सामने आई थी। यही वजह है कि इस मामले को केवल एकतरफा राजनीतिक नारे में समेटना आसान नहीं है। यदि छात्रों पर अनावश्यक या अनुपातहीन बल प्रयोग हुआ है तो दोषियों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। लेकिन यदि प्रदर्शन के दौरान हिंसा हुई और पुलिसकर्मी भी घायल हुए, तो जांच में उस पक्ष को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। शायद इसी जटिलता के कारण सुप्रीम कोर्ट की जांच समिति का महत्व बढ़ जाता है। इसलिए सवाल उठता है कि ऐसे में राहुल गांधी का धरना क्यों हो रहा है? सवाल उठता है कि क्या यह न्याय के लिए दबाव है, या फिर राजनीतिक दृश्य रचने की कोशिश है? दरअसल, राहुल गांधी की राजनीति में पिछले कुछ समय से एक पैटर्न दिखाई देता है। मुद्दा उठाइए, सरकार पर सीधा हमला कीजिए और फिर सड़क पर उतरकर उस मुद्दे को राजनीतिक प्रतीक में बदल दीजिए। यह रणनीति विपक्षी राजनीति में असरदार हो सकती है, लेकिन नेता प्रतिपक्ष के पद पर बैठे व्यक्ति से सवाल भी बड़ा होता है। सवाल उठता है कि क्या हर मामले में धरना ही अंतिम राजनीतिक हथियार होना चाहिए? कभी प्रधानमंत्री के घर के बाहर धरने की राजनीति और अब पुलिस थाने पहुंचकर एफआईआर की मांग पर बैठ जाना...राहुल गांधी की यह छापामार शैली उन्हें सुर्खियां तो दिलाती है, लेकिन क्या इससे उनकी संस्थागत भूमिका कमजोर नहीं पड़ती? संसद में सरकार से जवाब मांगना, दस्तावेजों के आधार पर आरोप लगाना, संसदीय जांच की मांग करना और न्यायिक प्रक्रिया को मजबूत करना, ये भी नेता प्रतिपक्ष के उतने ही महत्वपूर्ण हथियार हैं। इसके अलावा, एक सवाल यह भी उठता है कि क्या यह छात्रों की राजनीति में राहुल गांधी की अपनी जगह बनाने की कोशिश है? देखा जाये तो इस पूरे घटनाक्रम का राजनीतिक संदर्भ भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कॉकरोच जनता पार्टी विभिन्न राज्यों में स्कूलों की स्थिति, शिक्षा व्यवस्था और छात्रों की समस्याओं को लेकर अभियान चलाकर लगातार सुर्खियां बटोर रही है। जंतर-मंतर का आंदोलन भी इसी व्यापक छात्र असंतोष का हिस्सा बनकर सामने आया था। ऐसे में राहुल गांधी भी शायद यह संदेश देना चाहते हैं कि छात्रों की आवाज उठाने वाला सबसे बड़ा राष्ट्रीय चेहरा वही हैं। साहिल लोचव के साथ पुलिस स्टेशन पहुंचना, उनकी चोटों का मुद्दा उठाना और एफआईआर के लिए धरने पर बैठना, यह सब एक मजबूत राजनीतिक दृश्य भी है। सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी को लगने लगा है कि छात्र राजनीति का यह मैदान उनके हाथ से निकल सकता है? क्या कॉकरोच जनता पार्टी के शिक्षा और स्कूलों से जुड़े अभियान ने राहुल गांधी को यह एहसास कराया है कि केवल संसद में भाषण देना काफी नहीं, बल्कि छात्रों के बीच जाकर अपनी मौजूदगी दर्ज करानी होगी? या फिर यह राहुल गांधी की उस पुरानी राजनीतिक शैली का विस्तार है, जिसमें वह सत्ता के खिलाफ खुद को सीधे संघर्षरत व्यक्ति के रूप में पेश करना चाहते हैं? देखा जाये तो राहुल गांधी को छात्रों के साथ खड़े होने का पूरा अधिकार है। पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाना भी उनका कर्तव्य है। पेलेट गन के कथित इस्तेमाल की निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग भी पूरी तरह वैध राजनीतिक मुद्दा है। लेकिन नेता प्रतिपक्ष की राजनीति केवल धरने की राजनीति नहीं हो सकती। जब सुप्रीम कोर्ट जांच की प्रक्रिया शुरू कर चुका हो, जब पुलिस के अनुसार संबंधित मामलों की जांच क्राइम ब्रांच और स्पेशल सेल कर रही हो, तब राहुल गांधी को यह भी बताना चाहिए कि उनका धरना जांच को किस तरह आगे बढ़ाएगा। अगर अलग शिकायत पर एफआईआर जरूरी है, तो उसे कानूनी प्रक्रिया के तहत दर्ज कराया जाना चाहिए और उस प्रक्रिया की निगरानी की मांग की जानी चाहिए। लेकिन हर बार कैमरों के सामने धरना देकर राजनीतिक दबाव बनाना एक गंभीर सवाल छोड़ जाता है कि क्या राहुल गांधी व्यवस्था से लड़ रहे हैं, या व्यवस्था से लड़ने का दृश्य तैयार कर रहे हैं? राहुल गांधी को समझना होगा कि छात्रों की आवाज बनने के लिए केवल पुलिस थाने की सीढ़ियों पर बैठना काफी नहीं। छात्रों को बेहतर परीक्षा व्यवस्था, मजबूत स्कूल, जवाबदेह संस्थाएं और ठोस शिक्षा नीति चाहिए। राहुल गांधी चाहें तो वह जो सुधार करना चाहते हैं वह कांग्रेस शासित राज्यों में शुरू करवा सकते हैं। राहुल गांधी को समझना होगा कि धरना तस्वीर बनाता है, लेकिन राजनीति की असली परीक्षा तस्वीर के बाद शुरू होती है। - नीरज कुमार दुबे
जिस देश में दिन की शुरुआत सुबह की चाय से होती है, जहां त्यौहार मिठाई के बगैर अधूरे लगते हैं। जहां घर से लेकर दुकान तक चीनी रोजमर्रा की जरूरत है। वहां चीनी की कीमत सिर्फ एक कमोडिटी का रेट नहीं बल्कि घर के बजट का सवाल है। लेकिन इस बीच चीनी के दाम अचानक ऐसे भागे हैं कि बाजार में सवाल सिर्फ यह नहीं कि चीनी कितनी महंगी हुई बल्कि सवाल यह है कि आखिर चीनी इतनी महंगी क्यों हुई? सबसे बड़ा सवाल क्या आने वाले दिनों में इस महंगाई की मिठास और कड़वी होने वाली है? जिस चीनी के दाम कुछ समय पहले तक लगभग ₹45 किलो के आसपास थे उसमें बहुत कम समय में जबरदस्त उछाल आया है। चीनी के दाम बीते 20 दिनों में ₹22 तक की बढ़ोतरी हुई है। हालात तो यहां तक पहुंच गए हैं कि दुनिया भर को चीनी बेचने वाला भारत अब इसके आयात की तैयारी कर रहा है। जमाखोरी रोकने की तरकीबें निकाली जा रही हैं और आपातकालीन स्टॉक को मार्केट में उतारने की तैयारियां की जा रही हैं। ऐसे में आज के एमआरआई में हम चीनी के इसी कड़वे अर्थशास्त्र को डिकोड करेंगे। इसे भी पढ़ें: आजकल सब डायबिटीज के शिकार हो रहे हैं...चीनी की बढ़ती कीमतों पर बिहार सरकार के मंत्री का ये बयान सुना आपने? 1. 12 दिन के भीतर 21% दाम बढ़े सबसे पहले ग्राउंड रियलिटी यानी दामों की बात करते हैं। उपभोक्ता मामलों के विभाग के आंकड़ों के मुताबिक 18 अगस्त 2026 को देश में चीनी का औसत रिटेल दाम 52.3 प्रति किलो था। पिछले साल के मुकाबले 13% ज्यादा। लेकिन यह तो सिर्फ एक सरकारी औसत है। असली कहानी तो गली मोहल्ले की दुकानों पर चल रही है। महज 12 दिन के भीतर यानी 7 अगस्त से लेकर 1920 अगस्त के बीच प्रमुख शहरों में चीनी के दाम 19 से 21% तक बढ़ चुके हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक रिटेल मार्केट में जो चीनी ₹52 किलो बिक रही थी, वह अब ₹62 तक पहुंच गई है। महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिसे चीनी व्यापार के एक बड़े सेंटर के तौर पर जाना जाता है। वहां थोक चीनी के दाम अगस्त की शुरुआत से अब तक करीब 20% बढ़कर ₹5350 प्रति क्विंटल के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए हैं। पंजाब के रिटेल मार्केट में चीनी ₹65 प्रति किलो तक बिक रही है। वहीं मुंबई और भोपाल जैसे शहरों में भी कीमतें 58 से ₹63 प्रति किलो के बीच झूल रही हैं। मार्केट के जानकारों का मानना है कि आगे वाले दिनों में कीमतें और बढ़ सकती हैं। ऐसे में सवाल है कि जिस देश ने 2021-22 में 12 मिलियन टन से ज़्यादा चीनी दुनिया भर में बेची, जो लगातार दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी निर्यातक रहा है, वहां अचानक चीनी कम कैसे पड़ गई? 2. देश में चीनी की मांग और सप्लाई का असली खेल क्या है? भारत में सालाना करीब 2.83 करोड़ टन चीनी की घरेलू मांग रहती है। मौजूदा सीजन में देश 7 लाख टन चीनी का निर्यात भी कर चुका है। ऐसे में मौजूदा उत्पादन का स्तर घरेलू जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ निर्यात की मांग संभालने के लिए नाकाफी साबित हो रहा है, जिससे मांग और आपूर्ति का संतुलन बिगड़ गया है। 3. इथेनॉल की बढ़ती मांग है क्या सबसे बड़ा विलन? भारत ने गन्ने का इस्तेमाल इथेनॉल बनाने में बढ़ा दिया है, क्योंकि वह आयातित कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है और E20 का लक्ष्य हासिल करना चाहता है। सरकार ने हाल के वर्षों में इस मकसद से कई डिस्टिलरी बनाने पर ज़ोर दिया है। ऑल इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन (AIDA) के मुताबिक, इससे इथेनॉल बनाने की क्षमता बढ़कर 2025 के मध्य तक 499 जगहों पर सालाना लगभग 1,822 करोड़ लीटर हो जाएगी। AIDA की ओर से इंडिया टुडे के साथ शेयर किए गए आंकड़ों के अनुसार, इथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल (फीडस्टॉक) में गन्ने की हिस्सेदारी लगभग 30-35% है, जबकि बाकी हिस्सा मक्का और चावल से आता है। इस बदलाव का असर चीनी बाज़ार पर पड़ा है। लखनऊ यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर और कृषि विशेषज्ञ सुधीर पंवार ने इंडिया टुडे को बताया एथेनॉल बनाने के लिए गन्ने का इस्तेमाल दूसरी तरफ़ मोड़ने की वजह से भारत में चीनी की कीमतें बढ़ गई हैं। पंवार का कहना है कि चीनी बाज़ार में इतनी ज़्यादा तंगी नहीं होनी चाहिए थी और उन्हें शक है कि कीमतों में इस उछाल के पीछे उत्पादन के अलावा और भी वजहें हैं। उन्होंने कहा चीनी के लिए बाज़ार का अनुमान इतना बुरा नहीं था, जिससे चीनी का स्टॉक रखने वालों और रिटेलर्स द्वारा बाज़ार में हेरफेर का संकेत मिलता है। उन्होंने आगे कहा, अगर गन्ने को एथेनॉल बनाने के काम में नहीं लगाया जाता, तो कीमतें काबू में रहतीं। उनकी मुख्य चिंता यह है कि भारत की ईंधन नीति खाने-पीने की चीज़ों की कीमतों की कीमत पर नहीं होनी चाहिए। उत्तर प्रदेश योजना आयोग के पूर्व सदस्य पंवार ने बताया, गन्ने को इथेनॉल की ओर मोड़ने का काम चीनी की कीमत पर नहीं होना चाहिए और इससे खाने-पीने की चीज़ों के दाम भी नहीं बढ़ने चाहिए। हमें भारत में गन्ने के उत्पादन और चीनी की ज़रूरतों, साथ ही अंतरराष्ट्रीय हालात और चीनी की कीमतों के सही अनुमान की ज़रूरत है। फसल की बीमारी से सप्लाई की स्थिति पर भी असर पड़ा है। 2025-26 में, खासकर उत्तर प्रदेश में, फसल की बीमारी के कारण गन्ने की उत्पादकता और चीनी की रिकवरी में गिरावट आई। यह तब हुआ जब गन्ने की खेती का रकबा बढ़ा था। द टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई में गन्ने की खेती का रकबा धान, दाल, कपास और तिलहन जैसी अन्य फसलों की तुलना में पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 1.5% ज़्यादा था। इसे भी पढ़ें: चीनी के स्टॉक पर नजर, सरकार ने अपने नोटिफिकेशन में क्या निर्देश दिए हैं? 4. भारत चीनी पर इंपोर्ट ड्यूटी क्यों कम कर रहा है? सरकार की नीति से पता चलता है कि हालात कितनी तेज़ी से बदले हैं। ब्राज़ील के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी निर्यातक देश है। यह 1960 से चीनी का निर्यात कर रहा है और 2021-22 में इसने सबसे ज़्यादा, यानी 12 मिलियन टन से ज़्यादा चीनी का निर्यात किया था। लेकिन देश की निर्यात नीति धीरे-धीरे सख़्त होती गई क्योंकि सरकार ने घरेलू स्तर पर चीनी की उपलब्धता को प्राथमिकता दी। 2025-26 के चीनी सीज़न के लिए, भारत ने लगभग 2 मिलियन मीट्रिक टन का निर्यात कोटा मंज़ूर किया है, जो 2021-22 में निर्यात किए गए 12 मिलियन टन से कहीं कम है। इसके बाद 2026 में भारत ने 13 मई से 30 सितंबर तक चीनी के एक्सपोर्ट पर तुरंत रोक लगा दी। सरकार का मकसद घरेलू सप्लाई को सुरक्षित रखना, कीमतों को कंट्रोल करना और प्रोडक्शन तथा ग्लोबल कमोडिटी मार्केट में अनिश्चितता के लिए तैयारी करना था। यह रोक इसलिए अहम है क्योंकि इससे पहले भारत ने लंबे समय के लिए आम शिपमेंट पर पूरी तरह रोक लगाने के बजाय एक्सपोर्ट पर पाबंदियां, कोटा और मात्रा की सीमाएं तय करने का तरीका अपनाया था। पहले की पाबंदियों के दौरान भी, अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे देशों को छोटे कोटा-आधारित और खास प्राथमिकता वाले शिपमेंट जारी रहे थे। इन उपायों के बावजूद, घरेलू कीमतें लगातार बढ़ती रही हैं। ऑल इंडिया शुगर ट्रेड एसोसिएशन (AISTA) के अनुसार, मौजूदा 2025-26 मार्केटिंग ईयर में फरवरी तक भारत ने 2,01,547 टन चीनी का एक्सपोर्ट किया, जिसमें संयुक्त अरब अमीरात (UAE) सबसे बड़ा डेस्टिनेशन बनकर उभरा। अब, रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकार चीनी पर इंपोर्ट ड्यूटी कम करने के अगले कदम पर विचार कर रही है। इस कदम से लगभग एक दशक में पहली बार विदेश से चीनी भारत आ सकती है, जिससे त्योहारों के मौसम की शुरुआत में घरेलू सप्लाई में आसानी हो सकती है। 5. देश में चीनी का बफर स्टॉक कम हो रहा? रेटिंग एजेंसी इकरा (ICRA) के अनुमान के मुताबिक, सितंबर 2026 तक देश में चीनी का क्लोजिंग स्टॉक घटकर महज 43 लाख टन रह जाने की संभावना है, जो पिछले साल इसी अवधि में 53 लाख टन था। चिंता की बात यह है कि 43 लाख टन का यह बफर स्टॉक देश की सिर्फ दो महीने की घरेलू खपत की भरपाई करने के लिए ही पर्याप्त है। सितंबर 2026 तक देश में क्लोजिंग चीनी स्टॉक घटकर करीब 43 लाख टन रहने का अनुमान। पिछले साल यह स्टॉक 53 लाख टन था, जिसमें करीब 10 लाख टन की गिरावट आई है। 43 लाख टन का यह बफर स्टॉक देश की महज 2 महीने की घरेलू जरूरत के बराबर है। 6. सरकार अचानक चीनी को लेकर क्यों घबराई हुई है? चीनी की कीमतों में यह उछाल रातों-रात नहीं आया है। भारत में चीनी की खुदरा कीमतें 2023 की शुरुआत में लगभग ₹40-45 प्रति किलोग्राम थीं, जो अगस्त 2026 तक बढ़कर ₹50 प्रति किलोग्राम से ज़्यादा हो गईं। हालांकि, राज्यों, चीनी की क्वालिटी और बाज़ार के हिसाब से कीमतों में काफी अंतर होता है। कीमतों में तेज़ी हाल के महीनों में आई है। अगस्त 2026 के मध्य तक, पूरे भारत में चीनी की औसत कीमत लगभग ₹51.7-52.3 प्रति किलोग्राम तक पहुँच गई थी। यह एक महीने में लगभग 7-8% और अगस्त 2025 के मध्य में लगभग ₹46.3 प्रति किलोग्राम की कीमत के मुकाबले साल-दर-साल आधार पर लगभग 12-13% की बढ़ोतरी है। लेकिन त्योहारों के मौसम से ठीक पहले कीमतों में आए इस उछाल ने केंद्र सरकार को कदम उठाने पर मजबूर कर दिया है। इसलिए अधिकारी सिर्फ़ आयात (इंपोर्ट) के बारे में ही नहीं सोच रहे हैं। वे थोक व्यापारियों द्वारा जमा की जा सकने वाली चीनी की मात्रा पर पाबंदी लगाने पर भी विचार कर रहे हैं, ताकि जमाखोरी और स्टॉक जमा करने से कमी और न बढ़े। 7. सरकार ने कीमतें नियंत्रित करने के लिए क्या नियम बनाए हैं? सरकार ने चीनी व्यापारियों और डीलरों पर स्टॉक रखने की सीमा लागू कर दी है। नए नियमों के तहत महीने में 10 मीट्रिक टन से अधिक चीनी का कारोबार करने वाले डीलर 15 दिन से अधिक की खपत का स्टॉक जमा करके नहीं रख सकते। चीनी के आयात को टैक्स फ्री भी कर दिया है। निर्यात पर 30 सितंबर 2026 तक रोक लगा दी है। 8. चीनी संकट को लेकर सरकार को झेलनी पड़ रही राजनीतिक आलोचना चीनी की बढ़ती कीमतों पर अब राजनीतिक विरोध भी शुरू हो गया है। एक्टिविस्ट और टीम भारत के संस्थापक तहसीन पूनावाला ने आरोप लगाया कि गन्ने को एथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़े जाने के कारण यह संकट पैदा हुआ है। इसके साथ ही उन्होंने इस नीति से लाभ उठाने वालों पर भी सवाल खड़े किए हैं। सोशल मीडिया मंच एक्स पर जारी एक वीडियो संदेश में पूनावाला ने कहा कि भारत ने भारी मात्रा में चीनी का निर्यात किया। लेकिन गन्ने को एथेनॉल उत्पादन की तरफ मोड़े जाने से स्थिति ऐसी हो गई कि भारत को निर्यात पर प्रतिबंध लगाना पड़ा। इस फैसले से चीनी के दाम तेजी से बढ़े और अब सरकार चीनी पर आयात शुल्क हटाने की योजना बना रही है। पूनावाला ने यह आरोप भी लगाया कि इस स्थिति से राजनेताओं और उनके परिवारों को फायदा हुआ है। उन्होंने घोषणा की कि उनका संगठन टीम भारत, जो E20 पेट्रोल के तेजी से लागू होने को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहा है और सरकार से बातचीत में जुटा है, 22 और 23 अगस्त को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन और भूख हड़ताल करेगा। सरकार के लिए फिलहाल सबसे तात्कालिक चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि देश के सबसे बड़े त्योहारी खरीदारी सीजन की शुरुआत में यह रोजमर्रा की आवश्यक वस्तु आम जनता की पहुंच से बाहर न हो जाए। हालांकि, इस मामले से जुड़ा व्यापक नीतिगत सवाल अधिकारियों के लिए सुलझाना काफी अधिक चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। 9. चीनी शेयरों में पैसा लगाने वाले निवेशकों के लिए क्या रिस्क है? सबसे बड़ा रिस्क सरकारी दखल है। चीनी के दाम जितने ज्यादा बढ़ेंगे, सरकार कीमतें घटाने के सख्त कदम उठाएगी। इससे मिलों का मार्जिन अचानक घट सकता है। अगर कंपनियों का मार्जिन घटेगा तो शेयरों में आई तेजी गिरावट में बदल सकती है। 10. रॉ शुगर का आयात 1 अक्टूबर तक ड्यूटी फ्री घरेलू बाजार में चीनी की सप्लाई सुधारने और बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाते हुए रॉ-शुगर का आयात टैक्स फ्री कर दिया है। विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) के नोटिफिकेशन के मुताबिक, सरकार ने 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी के ड्यूटी फ्री आयात को मंजूरी दी है। इस फैसले के बाद अब बिना कोई आयात शुल्क चुकाए विदेशों से 10 लाख टन रॉ-शुगर भारत मंगाई जा सकेगी, जिससे स्थानीय बाजारों में चीनी की उपलब्धता बढ़ेगी।
पंजाब विधानसभा चुनावों से पहले राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह ने व्यक्ति-केंद्रित राजनीति पर सवाल उठाते हुए एक बड़ा राजनीतिक सवाल दागा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और पिछले एक दशक की उपलब्धियों को स्वीकार करते हुए कैप्टन ने अंग्रेजी समाचार-पत्र में अपने आलेख के जरिए यह संकेत दिया है कि अब भाजपा और देश की राजनीति को सिर्फ एक नाम और एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द सिमटने की बजाय मजबूत संस्थाओं, जवाबदेही और स्थायी लोकतांत्रिक ढांचे की ओर बढ़ना चाहिए। एक तरह से कैप्टन ने भाजपा को भी सलाह दे डाली है कि मोदी-इज़्म की अगली मंजिल केवल मोदी के नाम पर आगे बढ़ना नहीं, बल्कि ऐसी संस्था-केंद्रित व्यवस्था खड़ी करना होनी चाहिए, जो किसी एक नेता से परे जाकर देश की राजनीतिक और प्रशासनिक ताकत को स्थायी आधार दे सके। अपने आलेख में कैप्टन अमरिंदर सिंह ने साफ तौर पर कहा है कि नरेंद्र मोदी के दौर ने भारतीय राजनीति और शासन की दिशा बदल दी है। उनके अनुसार, मोदी ने भारतीय जनता पार्टी को राजनीति के एक सीमित दायरे से निकालकर देशव्यापी शक्ति में बदला। डिजिटल सार्वजनिक ढांचे, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण, वित्तीय समावेशन, स्वच्छता, आवास, बिजली और बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों में हुए कामों का उल्लेख करते हुए उन्होंने माना कि मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि सरकार की पहुंच और डिलीवरी क्षमता का विस्तार रही है। इसे भी पढ़ें: ‘ऐसे समझौते...’: Harsimrat Badal ने SAD-BJP Alliance की अटकलों को फिर दी हवा, Punjab में होगी वापसी? लेकिन कैप्टन का असली संदेश इससे आगे जाता है। उनका तर्क है कि किसी भी लोकतंत्र की सफलता को केवल एक शक्तिशाली नेता की उपलब्धियों से नहीं मापा जा सकता। मजबूत सरकार और मजबूत नेता महत्वपूर्ण हैं, लेकिन लोकतंत्र की असली मजबूती मजबूत संस्थाओं, जवाबदेही और संवैधानिक संतुलन से आती है। उन्होंने सवाल उठाया कि मोदी-इज़्म की अगली यात्रा आखिर किस दिशा में होगी? क्या वह एक व्यक्ति के नेतृत्व के इर्द-गिर्द सीमित रहेगा या फिर ऐसी संस्थागत व्यवस्था खड़ी करेगा, जो किसी भी व्यक्ति के सत्ता से हटने के बाद भी देश को आगे बढ़ाती रहे? यहीं से कैप्टन अमरिंदर सिंह का आलेख राजनीतिक रूप से और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। भाजपा के वरिष्ठ नेता होते हुए भी उन्होंने संसद की भूमिका, संसदीय समितियों की जांच, संघीय विमर्श, संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता और नागरिक अधिकारों जैसे मुद्दों को खुलकर उठाया है। उनका कहना है कि लोकतंत्र केवल नियमित चुनावों का नाम नहीं है। चुनावी जीत किसी सरकार को जनादेश जरूर देती है, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि सत्ता के इस्तेमाल पर संस्थागत नियंत्रण कितना प्रभावी है। कैप्टन ने विशेष रूप से संसद की समितियों और संसदीय जांच की भूमिका पर जोर दिया है। उनके अनुसार, बड़े फैसलों से पहले गंभीर विचार-विमर्श और समितियों की जांच को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। संघीय ढांचे के सवाल पर भी उनका संकेत साफ है कि केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन तथा संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता लोकतंत्र की दीर्घकालिक मजबूती के लिए जरूरी है। उनका एक और महत्वपूर्ण तर्क कल्याणकारी योजनाओं को लेकर है। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा कि खाद्य सुरक्षा, आवास, छात्रवृत्ति और सामाजिक सुरक्षा जैसी योजनाओं को किसी नेता की उदारता या राजनीतिक उपहार के रूप में नहीं, बल्कि नागरिकों के अधिकार और राज्य के दायित्व के रूप में देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक, जब शासन का आधार व्यक्ति की छवि से आगे बढ़कर संस्थागत अधिकारों और जवाबदेही पर टिकेगा, तभी विकास की प्रक्रिया स्थायी और निष्पक्ष बन सकेगी। आलेख में कैप्टन ने संविधान की मूल अवधारणाओं पर भी अपनी बात रखी है। उनका कहना है कि बहुलतावाद, धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद जैसे शब्दों पर राजनीतिक मतभेद हो सकते हैं, लेकिन संवैधानिक व्यवस्था को केवल राजनीतिक नारों के आधार पर नहीं आंका जा सकता। उनका तर्क है कि समाजवाद का अर्थ निजी क्षेत्र का विरोध या राज्य का पूर्ण नियंत्रण नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक न्याय तथा अवसरों की समानता भी है। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने मोदी सरकार की उपलब्धियों को नकारने की बजाय उन्हें भारत की नई राजनीतिक वास्तविकता का हिस्सा माना है। उनका कहना है कि पिछले एक दशक में भारत ने ऊर्जा, महत्वाकांक्षा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत पहचान हासिल की है। लेकिन उन्होंने यह भी चेताया है कि किसी नेता की ऐतिहासिक सफलता का अंतिम पैमाना केवल उसकी व्यक्तिगत लोकप्रियता या चुनावी जीत नहीं होती। असली कसौटी यह होती है कि उसके बाद देश की संस्थाएं कितनी मजबूत, स्वायत्त और सक्षम बनकर उभरती हैं। यानी, कैप्टन का संदेश सीधे तौर पर मोदी के नेतृत्व को खारिज करने का नहीं, बल्कि उसकी अगली मंजिल तय करने का है। उनका मानना है कि मोदी-इज़्म का अगला चरण व्यक्ति-केंद्रित राजनीति से संस्था-केंद्रित राष्ट्र निर्माण की ओर बढ़ना चाहिए। मजबूत नेतृत्व अपनी जगह जरूरी है, लेकिन उसे संविधान, संसद, न्यायिक एवं संवैधानिक संस्थाओं और नागरिक अधिकारों की मजबूती के साथ आगे बढ़ना होगा। देखा जाये तो पंजाब के चुनावी माहौल में एक वरिष्ठ भाजपा नेता और दो बार के पूर्व मुख्यमंत्री की ओर से उठाया गया यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह केवल पंजाब की राजनीति तक सीमित नहीं है। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपने आलेख के जरिए राष्ट्रीय राजनीति के सामने एक बुनियादी सवाल रखा है कि क्या भारत का अगला विकास चरण केवल मजबूत नेता के भरोसे आगे बढ़ेगा, या फिर ऐसा संस्थागत ढांचा तैयार करेगा जो किसी भी नेता से बड़ा, ज्यादा टिकाऊ और आने वाली पीढ़ियों के लिए अधिक जवाबदेह हो? कुल मिलाकर देखें तो कैप्टन के शब्दों का सार यही है कि भारत को मजबूत नेतृत्व चाहिए, लेकिन उससे भी ज्यादा मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाएं। और शायद यही वह बहस है, जिसे उन्होंने पंजाब चुनावों से पहले अपने आलेख के जरिए राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया है। -नीरज कुमार दुबे
Pellet Gun Controversy: घायल छात्र के लिए Rahul का Dharna, Delhi Police करेगी FIR दर्ज!
Manipur में 'No NRC, No Census' आंदोलन क्यों पकड़ रहा रफ्तार? आखिर क्यों सड़कों पर उतर रही है जनता?
मणिपुर में जनगणना से पहले एनआरसी की मांग को लेकर शुरू हुआ आंदोलन अब बड़ा रूप ले चुका है और राज्य सरकार ही नहीं बल्कि केंद्र सरकार की चिंताएं भी बढ़ती जा रही हैं। मणिपुर में बड़े प्रयासों के बाद शांति स्थापित हुई लेकिन नये आंदोलन के चलते प्रशासन के हाथ पांव फूल रहे हैं और जनगणना प्रशिक्षण का काम कुछ जिलों में रोकना पड़ गया है। देखा जाये तो मणिपुर में ‘नो एनआरसी, नो सेंसस’ का नारा अब केवल जनगणना रोकने की मांग तक सीमित नहीं रह गया है। इसके पीछे विस्थापन, जनसंख्या में बदलाव, भूमि अधिकार, पहचान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर लंबे समय से चली आ रही चिंताएं हैं। तीन साल से अधिक समय से जातीय हिंसा की मार झेल रहे मणिपुर में जनगणना से पहले एनआरसी की मांग अब एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक मुद्दे का रूप ले चुकी है। बताया जा रहा है कि वर्तमान आंदोलन की सबसे बड़ी चिंता 40 हजार से अधिक आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों से जुड़ी है। चुराचांदपुर या मोरेह से विस्थापित कोई मैतेई परिवार आज इम्फाल के राहत शिविर में रह रहा है, तो जनगणना में उसकी वर्तमान स्थिति दर्ज हो सकती है। इसी तरह इम्फाल से विस्थापित कोई कुकी परिवार चुराचांदपुर में गिना जा सकता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या जनगणना मणिपुर की वास्तविक जनसंख्या संरचना दर्ज करेगी या हिंसा और विस्थापन से अस्थायी रूप से बदले भूगोल को? यह चिंता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जनगणना के आंकड़े भविष्य में विकास योजनाओं, संसाधनों के आवंटन, परिसीमन, आरक्षण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को प्रभावित कर सकते हैं। इसे भी पढ़ें: Manipur में 20 से 22 अगस्त तक बंद रहेंगे सभी स्कूल और कॉलेज, सरकार ने जारी किया आदेश इसी पृष्ठभूमि में कैंपेन फॉर जस्ट एंड फेयर डिलिमिटेशन के नेतृत्व में आंदोलन तेज हुआ। 48 घंटे के बंद के दौरान कई घाटी जिलों में सड़कें जाम की गईं, प्रदर्शन हुए और मुख्यमंत्री व गृह मंत्री के पुतले जलाए गए। छात्रों और महिलाओं की भागीदारी ने आंदोलन को व्यापक जनरूप दिया। अब सरकारी कार्यालयों के बहिष्कार का भी ऐलान किया गया है, जबकि आवश्यक सेवाओं को इससे अलग रखा गया है। बढ़ते तनाव के बीच राज्य सरकार ने शिक्षण संस्थानों को तीन दिन के लिए बंद करने का आदेश दिया है। बताया जा रहा है कि आंदोलन की मूल मांग है कि जनगणना से पहले नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स यानी एनआरसी को लागू या अपडेट किया जाए। देखा जाये तो यहां एनआरसी और जनगणना में अंतर समझना जरूरी है। जनगणना का उद्देश्य आबादी की गणना और उसकी सामाजिक-आर्थिक जानकारी जुटाना है, जबकि एनआरसी का संबंध भारतीय नागरिकों की पहचान से है। नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 14ए और 2003 के नियम इसके कानूनी ढांचे से जुड़े हैं। आंदोलन समर्थकों का तर्क है कि पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि राज्य की वैध जनसांख्यिकीय आबादी कौन है, उसके बाद ही नई जनगणना के आंकड़ों को भविष्य के प्रशासनिक और राजनीतिक फैसलों का आधार बनाया जाए। देखा जाये तो मणिपुर में यह मांग नई नहीं है। विधानसभा 2022 और फिर 2024 में एनआरसी लागू करने संबंधी प्रस्ताव पारित कर चुकी है। राज्य जनसंख्या आयोग का गठन भी इसी बहस की पृष्ठभूमि में हुआ। लेकिन सबसे विवादास्पद मुद्दा कट-ऑफ वर्ष का है। कई नागरिक संगठनों की मांग है कि 1951 को आधार बनाया जाए, जबकि राज्य मंत्रिमंडल ने इनर लाइन परमिट के संदर्भ में 1961 को ‘मूल निवासी’ निर्धारण का आधार स्वीकार किया था। यही अंतर अब आंदोलन की राजनीतिक धार को और तेज कर रहा है। जनसांख्यिकीय बदलाव की आशंका के पीछे पुराने आंकड़ों का भी हवाला दिया जा रहा है। हम आपको बता दें कि 1961 में मणिपुर की दशकीय जनसंख्या वृद्धि 35.04 प्रतिशत और 1971 में 37.52 प्रतिशत रही, जबकि 2011 में यह 24.50 प्रतिशत थी। समर्थकों का कहना है कि ऐसे बदलावों की गंभीर जांच होनी चाहिए। हालांकि यह भी उतना ही जरूरी है कि जनसंख्या वृद्धि को सीधे अवैध प्रवास का प्रमाण नहीं मान लिया जाए। हर दावा तथ्यों और प्रमाणों की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। यहीं यह बहस सबसे संवेदनशील हो जाती है। म्यांमार सीमा से लगे मणिपुर में अवैध प्रवास का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहा है। लेकिन कुकी-जो समुदायों के म्यांमार के चिन समुदायों से जातीय संबंध भी हैं। इसलिए पूरे समुदाय को अवैध प्रवास की दृष्टि से देखना न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत हो सकता है, बल्कि पहले से विभाजित समाज में अविश्वास को और गहरा कर सकता है। एनआरसी पर बहस प्रमाणों के आधार पर होनी चाहिए, किसी समुदाय के सामूहिक संदेहीकरण के आधार पर नहीं। उधर, अब 2027 की जनगणना इस विवाद का तात्कालिक केंद्र बन गई है। पहले चरण में सितंबर में हाउस लिस्टिंग प्रस्तावित है, जबकि फरवरी 2027 में जनसंख्या और सामाजिक-आर्थिक विवरण जुटाए जाने हैं। इसी बीच लिलोंग के एसडीओ द्वारा जनगणना प्रशिक्षण कार्यक्रम रद्द किया जाना तनाव कम करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब ज्ञापन, प्रदर्शन और चेतावनियां पहले से मौजूद थीं, तब राजनीतिक संवाद पहले क्यों नहीं शुरू हुआ? इसी बीच विभिन्न समुदायों और संगठनों के नेताओं का एक 10 सदस्यीय दल दिल्ली रवाना हुआ है, ताकि केंद्र के समक्ष एनआरसी और जनगणना का मुद्दा उठाया जा सके। दिल्ली जाना जरूरी हो सकता है, क्योंकि एनआरसी और जनगणना जैसे फैसलों में केंद्र की भूमिका निर्णायक है। लेकिन हर बार स्थानीय संकट के बाद दिल्ली की ओर देखना राजनीतिक नेतृत्व की सीमाओं को भी उजागर करता है। देखा जाये तो जनगणना शासन, विकास और कल्याण के लिए अनिवार्य है। लेकिन यहां सवाल यह है कि क्या लंबे विस्थापन, अधूरी पुनर्वास प्रक्रिया और गहरे जनसांख्यिकीय अविश्वास के बीच की गई जनगणना मणिपुर की सामान्य सामाजिक संरचना का वास्तविक चित्र पेश कर पाएगी? बहरहाल, सरकार को आंदोलन को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानने की बजाय उसके पीछे छिपे विश्वास के संकट को समझना होगा। एक प्रशिक्षण कार्यक्रम रद्द कर देना या दिल्ली में ज्ञापन सौंप देना पर्याप्त नहीं होगा। मणिपुर को तथ्य-आधारित एनआरसी बहस, विस्थापितों की सुरक्षित वापसी, जनगणना की विश्वसनीयता और सभी समुदायों की संवैधानिक सुरक्षा पर गंभीर राजनीतिक संवाद चाहिए। -नीरज कुमार दुबे
राहुल गांधी का धरना आक्रामक सियासी कनेक्ट, विपक्ष और बाकी कांग्रेस को पसंद आयेगा?
Rahul Gandhi aggressive political strategy- राहुल गांधी ने कांग्रेस की विपक्षी राजनीति को आक्रामक रणनीति में बदल दिया है। छात्र आंदोलनों, युवाओं, Gen Z और महिलाओं के मुद्दों को उठाकर वह नई राजनीतिक जमीन तैयार कर रहे हैं। क्या कांग्रेस इस रास्ते पर चलेगी?
पिछले वर्ष जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए चीन जाने वाले थे, तो उन्होंने उससे ठीक पहले जापान का दौरा किया था। 29 और 30 अगस्त 2025 को जापान में वार्षिक भारत-जापान शिखर सम्मेलन में भाग लेने के बाद मोदी सीधे 31 अगस्त से 1 सितंबर तक SCO समिट के लिए चीन के तियानजिन पहुंचे थे। उस समय भी घटनाक्रम का सामरिक संदेश स्पष्ट था कि भारत एशिया की बड़ी शक्तियों के साथ अपने रिश्तों को अलग-अलग खांचों में नहीं, बल्कि अपनी राष्ट्रीय रणनीति के अनुसार आगे बढ़ा रहा है। अब एक बार फिर वैसा ही दिलचस्प और महत्वपूर्ण संयोग सामने आया है। अगले महीने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए भारत आने की संभावना से पहले जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइज़ुमी की भारत यात्रा के दौरान नई दिल्ली और टोक्यो ने रक्षा एवं समुद्री सुरक्षा सहयोग को नई दिशा देने वाले अहम फैसले किए हैं। संदेश को सीधे शब्दों में कहें तो चीन देखता रह गया और भारत ने जापान के साथ हिंद-प्रशांत की सुरक्षा, नौसैनिक सहयोग, रक्षा तकनीक और लॉजिस्टिक्स से जुड़ी साझेदारी को और मजबूत कर लिया। इसे भी पढ़ें: Vishwakhabram: Putin के Kuril Islands पहुँचते ही भड़क उठीं Sanae Takaichi, Japan-Russia के बीच जोरदार भिड़ंत से दुनिया हैरान देखा जाये तो यह केवल एक रक्षा मंत्री की औपचारिक यात्रा नहीं है। पिछले महीने, 1 से 3 जुलाई 2026 के बीच जापान की प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची भी भारत आई थीं। नई दिल्ली में 16वें भारत-जापान वार्षिक शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों देशों ने 10 अरब डॉलर से अधिक के द्विपक्षीय समझौतों और आर्थिक, सामरिक तथा रक्षा सहयोग को आगे बढ़ाने पर सहमति बनाई। अब जापानी रक्षा मंत्री की यात्रा और इसी समय भारत में मौजूद जापान के बड़े निवेशक प्रतिनिधिमंडल ने यह संकेत और मजबूत कर दिया है कि भारत-जापान संबंध अब सुरक्षा और आर्थिक शक्ति के संयुक्त ढांचे में बदल रहे हैं। नई दिल्ली में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और उनके जापानी समकक्ष शिंजिरो कोइज़ुमी के बीच हुई द्विपक्षीय वार्ता की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि समुद्री सुरक्षा सहयोग पर मेमोरेंडम ऑफ अरेंजमेंट (MoA) रही। इसके तहत दोनों देशों की नौसेनाओं के बीच समुद्री गतिविधियों की निगरानी, मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस, सूचनाओं के आदान-प्रदान, खोज एवं बचाव तथा मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (HADR) के क्षेत्र में सहयोग का व्यापक ढांचा तैयार होगा। इस समझौते का महत्व केवल तकनीकी नहीं, बल्कि गहरे सामरिक निहितार्थों वाला है। हिंद महासागर से लेकर पश्चिमी प्रशांत तक समुद्री मार्गों पर नियंत्रण और नौवहन की स्वतंत्रता आज एशिया की सबसे बड़ी रणनीतिक प्रतिस्पर्धाओं में शामिल है। दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर में चीन की बढ़ती आक्रामकता और समुद्री मौजूदगी के बीच भारत और जापान का समुद्री समन्वय मजबूत होना शक्ति संतुलन की राजनीति में महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। देखा जाये तो यह कोई औपचारिक सैन्य गठबंधन की घोषणा नहीं है, लेकिन इसका मतलब साफ है कि भारत और जापान साझा सूचना, बेहतर समुद्री निगरानी, परस्पर लॉजिस्टिक सहयोग और संयुक्त क्षमता निर्माण के जरिए हिंद-प्रशांत में अपनी रणनीतिक पकड़ मजबूत कर रहे हैं। हम आपको बता दें कि भारत-जापान रक्षा सहयोग पिछले एक दशक में लगातार गहराता गया है। 2014 में औपचारिक रूप से स्थापित ‘विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी’ को दोनों देशों के नेतृत्व ने लगातार मजबूत किया। प्रधानमंत्री मोदी की जापान यात्राओं और दोनों देशों के बीच नियमित उच्चस्तरीय संवाद ने इस रिश्ते को नई गति दी। इस साझेदारी की बुनियाद साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और मुक्त एवं खुले हिंद-प्रशांत की समान सोच पर टिकी है। 2014 के बाद हुए रक्षा समझौतों ने सैन्य सहयोग को संस्थागत स्वरूप दिया। 2020 में हुआ पारस्परिक आपूर्ति और सेवाएं समझौता दोनों देशों की सेनाओं के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण साबित हुआ। MILAN और JAIMEX जैसे नौसैनिक अभ्यासों में इस व्यवस्था ने जहाजों और विमानों को अधिक सहज लॉजिस्टिक सहायता उपलब्ध कराने का आधार तैयार किया। साथ ही रक्षा प्रौद्योगिकी में भी दोनों देश अब प्रतीकात्मक सहयोग से आगे निकल चुके हैं। 2024 में औपचारिक रूप से आगे बढ़ा जापान के UNICORN इंटीग्रेटेड कम्युनिकेशन एंटीना सिस्टम का भारतीय नौसेना के लिए सह-विकास, दोनों देशों का पहला संयुक्त रक्षा उपकरण प्रोजेक्ट है। अब नई वार्ता में समुद्री सुरक्षा के साथ-साथ माइन काउंटरमेजर्स, संयुक्त जहाज निर्माण और पारस्परिक शिप रिपेयर सुविधाओं को आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया है। इसके अलावा, भारत की उत्पादन क्षमता और जापान की उच्च तकनीकी विशेषज्ञता को ‘मेक इन इंडिया’ के ढांचे से जोड़ने की कोशिश विशेष महत्व रखती है। इसका अर्थ केवल हथियार खरीदना नहीं, बल्कि भविष्य में संयुक्त उत्पादन, तकनीकी साझेदारी और रक्षा औद्योगिक क्षमता का विस्तार है। साथ ही दोनों देशों के बीच सैन्य अभ्यासों का दायरा भी बढ़ रहा है। धर्म गार्जियन और JAIMEX जैसे अभ्यासों को और व्यापक बनाने पर सहमति बनी है, जबकि वीर गार्जियन-26 एक नए चरण का संकेत है। इस अभ्यास में पहली बार जापानी लड़ाकू विमान भारत में भाग लेंगे। दोनों देशों ने DRDO और जापान की Acquisition, Technology and Logistics Agency (ATLA) के बीच रक्षा अनुसंधान एवं विकास सहयोग गहरा करने और एक डिफेंस इंडस्ट्री फोरम आयोजित करने की योजना पर भी जोर दिया है। इसके अलावा, कूटनीतिक और सामरिक समन्वय को आगे बढ़ाने के लिए इस वर्ष टोक्यो में प्रस्तावित चौथी भारत-जापान विदेश एवं रक्षा मंत्रियों की 2+2 बैठक की तैयारी तेज करने का भी फैसला हुआ है। साथ ही दोनों देश इंडो-पैसिफिक लॉजिस्टिक्स नेटवर्क (IPLN) के जरिए प्राकृतिक आपदाओं के दौरान राहतकर्मियों और जरूरी सामग्री को तेजी से पहुंचाने की क्षमता विकसित कर रहे हैं। देखा जाये तो इस पूरी साझेदारी का एक और महत्वपूर्ण आयाम आर्थिक सुरक्षा है। जापान की Free and Open Indo-Pacific अवधारणा और भारत की MAHASAGAR यानि Mutual and Holistic Advancement for Security and Growth Across Regions पहल के बीच बढ़ती समानता इस रिश्ते को केवल सैन्य दृष्टि से नहीं, बल्कि आपूर्ति श्रृंखला, निवेश, प्रौद्योगिकी और आर्थिक सुरक्षा के स्तर पर भी मजबूत कर रही है। जापानी प्रधानमंत्री की हालिया यात्रा, अरबों डॉलर के समझौते और भारत आए निवेशक प्रतिनिधिमंडल इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा दिखाई देते हैं। देखा जाये तो भारत और जापान का रिश्ता, कोई आज की भू-राजनीति की उपज नहीं है। इसके सांस्कृतिक सूत्र 752 ईस्वी तक जाते हैं, जब भारतीय बौद्ध भिक्षु बोधिसेन ने जापान के नारा स्थित तोदाइजी मंदिर में महान बुद्ध प्रतिमा का अभिषेक किया था। आधुनिक काल में स्वामी विवेकानंद, रवींद्रनाथ टैगोर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और रास बिहारी बोस जैसे व्यक्तित्वों ने दोनों देशों के संबंधों को नई गहराई दी। 1903 में स्थापित जापान-इंडिया एसोसिएशन आज भी जापान की सबसे पुरानी अंतरराष्ट्रीय मैत्री संस्थाओं में से एक है। लेकिन अब इतिहास और रणनीति एक ही दिशा में आगे बढ़ते दिख रहे हैं। पिछले साल मोदी जापान से होकर चीन गए थे; अब चीनी राष्ट्रपति के भारत आने से पहले जापान के साथ रक्षा साझेदारी का नया अध्याय खुला है। जापानी प्रधानमंत्री की यात्रा, विशाल आर्थिक समझौते, निवेशक प्रतिनिधिमंडल और अब रक्षा मंत्री के साथ समुद्री सुरक्षा समझौते, ये घटनाएं अलग-अलग नहीं हैं। इनका सामूहिक संदेश बेहद धारदार है कि भारत किसी एक शक्ति केंद्र की परिधि में नहीं घूम रहा। वह चीन से संवाद भी करेगा, ब्रिक्स और SCO जैसे मंचों पर साथ भी बैठेगा, लेकिन साथ ही जापान जैसे रणनीतिक साझेदारों के साथ हिंद-प्रशांत में अपनी सैन्य, आर्थिक और तकनीकी स्थिति भी मजबूत करता रहेगा। बहरहाल, प्राचीन सांस्कृतिक रिश्तों से लेकर हिंद महासागर और प्रशांत में संयुक्त नौसैनिक अभ्यासों तक, भारत-जापान संबंध अब एक नई रणनीतिक ऊंचाई पर पहुंच चुके हैं। -नीरज कुमार दुबे
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हरियाणा में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) 23 अगस्त को टिफिन महाकुंभ का आयोजन करेगी। यह महाकुंभ राज्य में भाजपा के सभी 27 सांगठनिक जिलों में आयोजित किये जाएंगे
झारखंड कर्मचारी चयन आयोग की संयुक्त स्नातक स्तरीय (सीजीएल) परीक्षा के जरिए की गई नियुक्तियां रद्द किए जाने के विरोध में चयनित अभ्यर्थियों का आंदोलन तेज होता जा रहा है
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अमेरिकी राजदूत सर्जियो गौर की जम्मू-कश्मीर यात्रा ने चीनी-पाकिस्तानी चालों को किया दुरुस्त!
जरा गौर कीजिए, जब चीन अरुणाचल प्रदेश में भारत को आंखें दिखा रहा हो, जब अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर का जम्मू-कश्मीर/लद्दाख पहुंचना और जम्मू-कश्मीर को भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा बताना भारतीय कूटनीति की कितनी बड़ी सफलता है, क्योंकि यह परोक्ष रूप से चीन को संदेश है कि भारत का साथ मिलते ही अमेरिका अन्य एशियाई 'बदमाशों' को रौंद डालेगा। उधर, पाकिस्तान को संदेश है कि इस्लामिक नाटो उसकी सुरक्षा की गारंटी नहीं बनेगा, यदि अमेरिका खुलकर भारत के साथ खड़ा रहेगा। जी हां, अमेरिकी राजदूत की 19–20 अगस्त 2026 की जम्मू-कश्मीर और लद्दाख यात्रा को केवल एक राजनयिक दौरा मानना पर्याप्त नहीं होगा। इसे भी पढ़ें: Sergio Gor के बयान से तिलमिलाये Pakistan ने Trump Administration पर उतारी भड़ास, US Diplomat Natalie Baker को तलब कर थमाया Strong Demarche खासकर श्रीनगर में उनका यह कहना कि जम्मू-कश्मीर “भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा” है और अमेरिकी यात्रा-परामर्श की समीक्षा के संकेत देना, वाशिंगटन के पुराने कश्मीर-संबंधी सार्वजनिक रुख की तुलना में महत्वपूर्ण राजनीतिक-सामरिक संकेत देता है। इससे कई सवाल उपजते हैं, जिनके निहितार्थ को समझना भी जरूरी है:- पहला सवाल है कि क्या वास्तव में अमेरिकी स्टैंड बदल गया है? तो जवाब होगा कि अपेक्षित सावधानी जरूरी है। अभी इसे अमेरिका की औपचारिक कश्मीर-नीति में पूर्ण परिवर्तन कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन राजनयिक भाषा और व्यवहार में बदलाव का संकेत स्पष्ट है। पहले अमेरिकी नीति का सार्वजनिक ढांचा मुख्यतः यह रहा कि कश्मीर भारत-पाकिस्तान के बीच विवादित विषय है और दोनों देशों को बातचीत के माध्यम से समाधान निकालना चाहिए। 2019 के बाद भी अमेरिकी अधिकारियों ने इस मूल स्थिति को बनाए रखा था। इसके विपरीत, गोर ने भारतीय प्रशासित जम्मू-कश्मीर में जाकर उसे “भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा” कहा। पाकिस्तान ने इसे अमेरिकी पारंपरिक रुख से विचलन मानते हुए अमेरिकी प्रभारी राजदूत को तलब कर औपचारिक विरोध दर्ज कराया। इसलिए फिलहाल इसे “नीति परिवर्तन” से अधिक “नीति-संकेत में परिवर्तन” कहना उचित होगा। दूसरा सवाल है कि इस यात्रा का सबसे बड़ा संदेश क्या है? क्या कश्मीर को जमीन पर देखकर आकलन हुआ है? तो जवाब होगा कि गोर का दौरा छह साल से अधिक अंतराल के बाद किसी अमेरिकी राजदूत की कश्मीर यात्रा है। उन्होंने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से मुलाकात की और सुरक्षा व्यवस्था तथा बदलते माहौल का प्रत्यक्ष आकलन किया। यह महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि अमेरिका की कश्मीर संबंधी धारणा अब केवल इस्लामाबाद, नई दिल्ली या अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों पर निर्भर नहीं रह सकती। राजदूत का स्वयं श्रीनगर जाना और फिर सुरक्षा स्थिति पर सकारात्मक टिप्पणी करना वाशिंगटन के नीति-निर्माताओं को एक अलग जमीनी इनपुट देता है। तीसरा सवाल यह है कि Travel Advisory में बदलाव—छोटा दिखने वाला बड़ा संकेत है? तो जवाब होगा कि गोर ने जम्मू-कश्मीर के लिए अमेरिकी यात्रा-परामर्श की समीक्षा के संकेत दिए हैं। अगर आगे अमेरिका अपने मौजूदा “Do Not Travel” स्तर को नीचे करता है, तो इसका असर केवल अमेरिकी पर्यटकों पर नहीं पड़ेगा। यह संदेश जाएगा कि सुरक्षा परिस्थितियों में सुधार हुआ है। सामान्य आर्थिक गतिविधियां बढ़ रही हैं। पर्यटन के लिए क्षेत्र अधिक खुल रहा है। अंतरराष्ट्रीय जोखिम-धारणा बदल रही है। यानी कश्मीर के लिए यह सुरक्षा से पर्यटन और पर्यटन से निवेश की दिशा में सकारात्मक कूटनीतिक संकेत बन सकता है। चौथा सवाल यह है कि क्या यह परिदृश्य पाकिस्तान के लिए बड़ा कूटनीतिक झटका है? तो कहना न होगा कि इस बयान की सबसे तीखी प्रतिक्रिया पाकिस्तान से आई है। इस्लामाबाद ने इसे अपनी दशकों पुरानी कश्मीर कूटनीति के प्रतिकूल माना और अमेरिकी राजनयिक को तलब किया। पाकिस्तान के लिए समस्या सिर्फ गोर का बयान नहीं है, बल्कि समस्या यह है कि यदि अमेरिका जैसा प्रभावशाली देश धीरे-धीरे कश्मीर को “भारत-पाकिस्तान के विवाद” की भाषा से हटाकर “भारत के महत्वपूर्ण हिस्से” की भाषा में संबोधित करने लगे, तो पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक रणनीति कमजोर हो सकती है। पांचवां सवाल यह है कि क्या चीन का कोण भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता? तो जवाब होगा कि गोर का कार्यक्रम केवल श्रीनगर तक सीमित नहीं रहा; वह लद्दाख भी गए। यह समय विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि लद्दाख भारत-चीन सीमा-सुरक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है। इसलिए यात्रा का एक व्यापक संदेश यह भी हो सकता है कि अमेरिका भारत के पश्चिमी और उत्तरी दोनों रणनीतिक मोर्चों को अपने Indo-Pacific और South/Central Asia दृष्टिकोण से देख रहा है। छठा सवाल यह है कि क्या भारत-अमेरिका संबंधों में कश्मीर की भूमिका बदल सकती है? तो कहना न होगा कि यह घटनाक्रम भारत-अमेरिका संबंधों के उस व्यापक पुनर्संतुलन का हिस्सा हो सकता है जिसमेंआतंकवाद के विरुद्ध सहयोग, चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला, हिंद-प्रशांत रणनीति, रक्षा एवं तकनीकी साझेदारी, ऊर्जा एवं व्यापार, और दक्षिण एशिया में भारत की बढ़ती रणनीतिक भूमिका एक-दूसरे से जुड़ रहे हैं। गोर स्वयं भारत में अमेरिकी राजदूत होने के साथ South and Central Asian Affairs के Special Envoy भी हैं। इसलिए उनकी टिप्पणी का महत्व सामान्य राजदूत की टिप्पणी से अधिक माना जा सकता है। सातवां सवाल यह है कि क्या भारत को अति-उत्साहित होने से भी बचना होगा? तो जवाब होगा कि यहां एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक सावधानी बरतनी जरूरी है क्योंकि एक राजदूत का बयान अमेरिकी सरकार की पूरी औपचारिक विदेश नीति का विकल्प नहीं होता। जब तक अमेरिकी विदेश विभाग या व्हाइट हाउस अपनी आधिकारिक नीति में स्पष्ट बदलाव घोषित नहीं करता, तब तक यह कहना कि “अमेरिका ने कश्मीर पर पाकिस्तान को छोड़कर भारत का पक्ष ले लिया है” अतिशयोक्ति होगी। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि अमेरिकी सार्वजनिक कूटनीतिक भाषा में एक उल्लेखनीय बदलाव दिखाई दे रहा है। आठवां सवाल यह है कि सबसे बड़ा रणनीतिक निहितार्थ क्या है? तो जवाब होगा कि मेरे आकलन में इस यात्रा का वास्तविक महत्व चार शब्दों में है: “Narrative → Ground Reality → Policy.” यदि अमेरिका को जमीनी स्तर पर कश्मीर में सुरक्षा, राजनीतिक प्रक्रिया, पर्यटन और आर्थिक सामान्यीकरण दिखाई देता है और उसके आधार पर उसकी यात्रा चेतावनी कम होती है, तो धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव भी बदल सकता है। यही भारत के लिए सबसे बड़ा कूटनीतिक लाभ होगा। निष्कर्षतः, सर्जियो गोर की कश्मीर यात्रा को भारत की कूटनीतिक उपलब्धि के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन इसे अभी अमेरिकी कश्मीर नीति का अंतिम परिवर्तन घोषित करना जल्दबाजी होगी। असली परीक्षा अगले चरण में होगी—क्या Washington अपनी आधिकारिक भाषा बदलेगा, क्या travel advisory घटेगी और क्या भविष्य में अमेरिकी अधिकारी कश्मीर को भारत के आंतरिक प्रशासनिक-सुरक्षा संदर्भ में अधिक स्पष्टता से देखेंगे? अगर इन तीनों प्रश्नों का उत्तर “हाँ” होता है, तो गोर की यह यात्रा दक्षिण एशिया की कूटनीति में एक महत्वपूर्ण turning point सिद्ध हो सकती है। # क्या ईरान में पिटी अमेरिकी भद्द और पाकिस्तान के दोगले रवैये से अचंभित अमेरिका ने ऐसा किया हाँ—इसे एक संभावित कारण के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन निर्णायक कारण कहना अभी जल्दबाजी होगी। उपलब्ध घटनाक्रम को जोड़ें तो अमेरिकी सोच में पाकिस्तान को लेकर विश्वसनीयता का प्रश्न जरूर उभरता है। सवाल है कि क्या ईरान प्रकरण ने अमेरिका को पाकिस्तान को नए नजरिये से देखने पर मजबूर किया? जवाब होगा कि ईरान-अमेरिका संकट में पाकिस्तान ने एक तरफ अमेरिका के साथ संवाद और मध्यस्थता की भूमिका निभाई, जबकि दूसरी तरफ ईरान के प्रति अपनी निकटता और क्षेत्रीय हितों को भी साधता रहा। विशेषज्ञों ने भी पाकिस्तान की निष्पक्ष मध्यस्थ के रूप में विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं—विशेषकर ईरान, अफगानिस्तान और सऊदी अरब से उसके एक साथ जुड़े हितों को देखते हुए। यानी Washington के लिए संदेश यह हो सकता है कि पाकिस्तान को एक भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार की बजाय आवश्यकता पड़ने पर उपयोगी लेकिन स्वार्थ-आधारित साझेदार के रूप में देखना अधिक व्यावहारिक है। लेकिन कश्मीर पर गोर का बयान सिर्फ पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए? मेरे आकलन में नहीं। क्योंकि सर्जियो गोर ने श्रीनगर में जम्मू-कश्मीर को “भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा” कहा और क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था की प्रशंसा करते हुए अमेरिकी Travel Advisory की समीक्षा की बात कही। इसके बाद पाकिस्तान ने अमेरिकी राजनयिक को बुलाकर औपचारिक विरोध दर्ज कराया और कहा कि यह अमेरिकी पारंपरिक कश्मीर-रुख के विपरीत है। इसलिए इसके पीछे कई परतें हो सकती हैं: 1. ईरान: पाकिस्तान की मध्यस्थता और दोहरे हितों से अमेरिकी रणनीतिक संदेह बढ़ा हो। 2. आतंकवाद: अमेरिका के लिए पाकिस्तान की उपयोगिता और विश्वसनीयता का मूल्यांकन फिर से हो रहा हो। 3. भारत: चीन के मुकाबले भारत का रणनीतिक महत्व लगातार बढ़ रहा है। 4. कश्मीर: जमीनी सुरक्षा परिस्थितियों को देखकर अमेरिकी धारणा में बदलाव की शुरुआत हुई हो। 5. पाकिस्तान: Washington अब Islamabad को South Asia का अनिवार्य रणनीतिक केंद्र मानने की बजाय भारत को अधिक महत्व दे रहा हो। सबसे दिलचस्प बात तो यह है कि यह बदलाव ईरान संकट के बाद पाकिस्तान की भूमिका बढ़ने के ठीक उसी दौर में दिखाई दे रहा है। पाकिस्तान ने अमेरिका-ईरान वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभाकर अपनी कूटनीतिक उपयोगिता बढ़ाने की कोशिश की थी। लेकिन यदि उसी समय अमेरिका का शीर्ष राजनयिक भारत में जाकर कहता है कि J&K भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा है, तो यह पाकिस्तान के लिए निश्चित रूप से बड़ा कूटनीतिक झटका है। इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि अमेरिका का संदेश है: “Pakistan may be useful, but India is strategically indispensable.” हालांकि अभी इसे अमेरिकी नीति का औपचारिक परिवर्तन नहीं कहा जा सकता। अगली निर्णायक परीक्षा यह होगी कि Washington अपनी आधिकारिक Kashmir language और Travel Advisory में वास्तव में क्या बदलाव करता है। और एक बड़ा प्रश्न इससे निकलता है—क्या ईरान संकट, पाकिस्तान की कथित दोहरी कूटनीति और चीन की बढ़ती चुनौती ने अमेरिका को अंततः यह समझा दिया है कि दक्षिण एशिया में पाकिस्तान से अधिक भरोसेमंद और दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदार भारत है? यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण यक्ष प्रश्न है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
'वंदे मातरम' विवाद पर अमित शाह का गंभीर आरोप, 'कांग्रेस विभाजन के बीज बोने वाली ऐतिहासिक भूल दोहरा रही'
1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामलों में उम्रकैद की सजा काट रहे सज्जन कुमार का गुरुवार को दिल्ली में निधन हो गया। वह 80 वर्ष के थे। एक समय ग्रामीण और बाहरी दिल्ली की राजनीति के सबसे ताकतवर चेहरों में गिने जाने वाले, जाट समाज में व्यापक जनाधार रखने वाले और राष्ट्रीय राजधानी की सियासत में कांग्रेस की सत्ता का मजबूत स्तंभ रहे सज्जन कुमार की जिंदगी आखिरकार एक ऐसे मोड़ पर खत्म हुई, जिसे उनके राजनीतिक उत्थान और बाद के पतन की पूरी कहानी के रूप में देखा जा सकता है। सत्ता के शिखर से लेकर तिहाड़ जेल तक का उनका सफर इस कड़वे सच की याद दिलाता है कि बुरे काम का अंजाम बुरा ही होता है। हम आपको बता दें कि पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार को तिहाड़ जेल से सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया था, जहां चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। अस्पताल की ओर से उनकी मौत के कारण को लेकर तत्काल कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। सज्जन कुमार अपने जीवन के अंतिम वर्षों में 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामलों में मिली उम्रकैद की सजा काट रहे थे। इसे भी पढ़ें: 1984 दंगा केस में उम्रकैद काट रहे पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार की मौत, दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में तोड़ा दम हम आपको बता दें कि सज्जन कुमार दिल्ली की राजनीति में 1970 के दशक से ही प्रभावशाली चेहरा बनकर उभरे थे। उन्होंने 1977 में पार्षद के रूप में अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की और इसके बाद बाहरी दिल्ली लोकसभा सीट से तीन बार सांसद चुने गए। ग्रामीण दिल्ली और जाट बहुल इलाकों में उनकी पकड़ बेहद मजबूत मानी जाती थी। 1980 के दशक में वह दिल्ली कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल थे। स्थानीय संगठन, ग्रामीण मतदाता और जाट समाज में उनके मजबूत आधार ने उन्हें कांग्रेस की राजनीति का बड़ा खिलाड़ी बना दिया था। एक समय ऐसा था जब बाहरी दिल्ली की राजनीति में सज्जन कुमार का नाम ही सत्ता और प्रभाव का पर्याय माना जाता था। लेकिन जिस राजनीतिक ताकत ने उन्हें दशकों तक प्रभावशाली बनाए रखा, वही ताकत 1984 के सिख विरोधी दंगों के आरोपों और फिर लंबे कानूनी संघर्ष के सामने धीरे-धीरे कमजोर पड़ती चली गई। हम आपको याद दिला दें कि 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके अंगरक्षकों द्वारा हत्या के बाद देश, विशेषकर दिल्ली में सिख विरोधी हिंसा भड़क उठी थी। इसके पीछे ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद पैदा हुई परिस्थितियों को भी महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि के रूप में देखा गया था। दिल्ली में कई दिनों तक हिंसा का भयावह दौर चला था। सिखों के घरों, दुकानों और धार्मिक स्थलों को निशाना बनाया गया था। हजारों लोगों की जान गई। अलग-अलग आकलनों में मृतकों की संख्या अलग रही, लेकिन दिल्ली में 2,700 से अधिक सिखों के मारे जाने की पुष्टि हुई, जबकि देशभर में मृतकों की संख्या 3,000 से अधिक बताई गई। इसी हिंसा से जुड़े कई मामलों में सज्जन कुमार का नाम सामने आया। उन पर हिंसक भीड़ का नेतृत्व करने, लोगों को उकसाने, आपराधिक साजिश और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने जैसे गंभीर आरोप लगे। अगले तीन दशकों से अधिक समय तक उनके खिलाफ मुकदमों का सिलसिला चलता रहा और कई मामलों में उन्हें कभी राहत मिली तो कभी कानूनी शिकंजा कसता गया। सज्जन कुमार के राजनीतिक और कानूनी जीवन का सबसे बड़ा मोड़ 17 दिसंबर 2018 को आया। दिल्ली हाईकोर्ट ने निचली अदालत के 2013 के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें उन्हें बरी कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने सज्जन कुमार को 1984 के दंगों के दौरान दिल्ली के राज नगर पार्ट-1, पालम कॉलोनी में पांच सिखों की हत्या और एक गुरुद्वारे को जलाने से जुड़े मामले में दोषी ठहराया। अदालत ने उन्हें आपराधिक साजिश और हिंसा के लिए उकसाने सहित गंभीर अपराधों का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। अपने फैसले में दिल्ली हाईकोर्ट ने 1984 की सिख विरोधी हिंसा को “मानवता के खिलाफ अपराध” तक करार दिया था। अदालत ने यह भी निर्देश दिया था कि सज्जन कुमार को अपने प्राकृतिक जीवन के शेष समय तक जेल में रहना होगा। यहीं से वह नेता, जो कभी दिल्ली की सत्ता के गलियारों में बेहद प्रभावशाली माना जाता था, तिहाड़ जेल की सलाखों के पीछे पहुंच गया। हम आपको यह भी बता दें कि 1984 के दंगों से जुड़े आरोपों के बावजूद कांग्रेस लंबे समय तक सज्जन कुमार के साथ खड़ी रही। वह पार्टी के बड़े नेताओं में गिने जाते रहे और वर्षों तक पार्टी की राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा बने रहे। हालांकि समय के साथ राजनीतिक दबाव बढ़ता गया। 2009 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर को दिए गए चुनाव टिकट वापस ले लिए थे। इसके बाद सज्जन कुमार धीरे-धीरे पार्टी के भीतर हाशिये पर चले गए। 2018 में दिल्ली हाईकोर्ट से उम्रकैद की सजा मिलने के बाद उन्होंने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। इसके साथ ही कांग्रेस के साथ उनका औपचारिक रिश्ता समाप्त हो गया। जिस पार्टी में वह कभी दिल्ली की राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरों में शामिल थे, उसी पार्टी से उनका राजनीतिक सफर अंततः अलगाव और हाशिये पर खत्म हुआ। साथ ही 2018 की सजा सज्जन कुमार के खिलाफ अंतिम कानूनी कार्रवाई नहीं थी। फरवरी 2025 में दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने उन्हें 1984 के दंगों से जुड़े एक अन्य मामले में भी उम्रकैद की सजा सुनाई। यह मामला सरस्वती विहार क्षेत्र में भीड़ के हमले से जुड़ा था, जिसमें पिता-पुत्र जसवंत सिंह और तरुणदीप सिंह को कथित रूप से जिंदा जलाकर मार दिए जाने का मामला सामने आया था। अभियोजन पक्ष ने सज्जन कुमार के लिए मृत्युदंड की मांग की थी, लेकिन अदालत ने उनकी उम्र और स्वास्थ्य समेत अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई। इस तरह सज्जन कुमार को 1984 की हिंसा से जुड़े अलग-अलग मामलों में एक से अधिक बार उम्रकैद की सजा मिली और वह जीवन के अंतिम समय तक तिहाड़ जेल में ही रहे। साथ ही इस वर्ष जनवरी में सज्जन कुमार को 1984 के दंगों से जुड़े जनकपुरी और विकासपुरी क्षेत्रों के हिंसा भड़काने के आरोप वाले दो अलग-अलग मामलों में दिल्ली की अदालत से बरी कर दिया गया था। लेकिन इन बरी होने के फैसलों से उनकी रिहाई का रास्ता नहीं खुला, क्योंकि वह अन्य मामलों में उम्रकैद की सजा काट रहे थे। उनकी 2018 की दोषसिद्धि और सजा के खिलाफ चुनौती भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित थी। यानी कानूनी लड़ाई के लंबे दौर में कुछ मामलों में उन्हें राहत जरूर मिली, लेकिन 1984 के दंगों से जुड़े अपराधों में हुई दोषसिद्धियों ने उनकी जिंदगी की दिशा पूरी तरह बदल दी। देखा जाये तो सज्जन कुमार का राजनीतिक जीवन भारतीय राजनीति की उन कहानियों में शामिल हो गया है, जहां एक नेता का जनाधार और राजनीतिक प्रभाव लंबे समय तक उसे मजबूत बनाए रखता है, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया अंततः दशकों पुराने मामलों तक पहुंचती है। 1977 में पार्षद से राजनीतिक शुरुआत करने वाला नेता तीन बार लोकसभा पहुंचा। बाहरी दिल्ली में उसका व्यापक जनाधार था, ग्रामीण और जाट बहुल क्षेत्रों में उसकी मजबूत पकड़ थी और वह कांग्रेस की दिल्ली इकाई का बड़ा चेहरा था। लेकिन 1984 की हिंसा का दाग उसके राजनीतिक कद से कहीं ज्यादा भारी साबित हुआ। करीब चार दशक तक चले मुकदमों, राजनीतिक विवादों, जनाक्रोश और कानूनी लड़ाइयों के बाद सज्जन कुमार को उम्रकैद की सजा मिली। कांग्रेस से उनका रिश्ता टूटा, राजनीतिक प्रभाव खत्म हुआ और जीवन के अंतिम वर्ष तिहाड़ जेल में बीते। देखा जाये तो 80 वर्ष की उम्र में उनका निधन उस दौर का अंत है, जिसमें सज्जन कुमार कभी बाहरी दिल्ली की राजनीति के सबसे शक्तिशाली नेताओं में गिने जाते थे। लेकिन उनकी अंतिम पहचान एक ऐसे पूर्व कांग्रेस सांसद की बन गई, जो 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामलों में दोषी ठहराए जाने के बाद उम्रकैद की सजा काट रहा था। सज्जन कुमार की कहानी सत्ता के शिखर से जेल की सलाखों तक पहुंचने की कहानी है। यह उस राजनीतिक प्रभाव की भी कहानी है, जो वर्षों तक कायम रहा, और उस न्यायिक संघर्ष की भी, जिसने दशकों बाद अपना फैसला सुनाया। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि सत्ता कितनी भी बड़ी क्यों न हो, समय और कानून के सामने उसका प्रभाव हमेशा कायम नहीं रहता। सज्जन कुमार का जीवन और अंत इसी कड़वे सच की एक बड़ी राजनीतिक कहानी बनकर दर्ज हो गया। -नीरज कुमार दुबे
One Day One University Program: Gen Z Protest से घबराई Modi सरकार, मंत्री बनाएंगे Reels!
राहुल गांधी का बड़ा दावा- पीएम मोदी का शासन आखिरी दौर में, उत्तराधिकारी की तलाश शुरू
सीडब्ल्यूसी बैठक में राहुल गांधी ने पीएम नरेंद्र मोदी के राजनीतिक भविष्य को लेकर बड़ा दावा किया। खरगे ने शिक्षा, रोजगार, राम मंदिर ट्रस्ट और चीन सीमा मुद्दे पर सरकार को घेरा।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत की अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन यात्रा शुरू होने से ठीक पहले अमेरिकी संस्था यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम (USCIRF) ने एक बार फिर भारत, भाजपा और आरएसएस को निशाने पर लिया है। 25 अगस्त से शुरू होने वाली भागवत की प्रस्तावित तीन देशों की यात्रा से पहले आयोग ने न केवल आरएसएस नेताओं को अमेरिका में “हाई-लेवल मीटिंग्स” और कूटनीतिक सम्मान नहीं देने की मांग की, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता के कथित उल्लंघनों के लिए जिम्मेदार पाए जाने वाले आरएसएस सदस्यों पर प्रतिबंध लगाने तक की वकालत कर दी। USCIRF के अध्यक्ष और पाकिस्तानी-अमेरिकी चिकित्सक आसिफ महमूद तथा आयुक्त जीन मिल्स के बयानों को आयोग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर साझा किया। महमूद ने आरएसएस को सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी का वैचारिक अभिभावक बताते हुए उसके संबद्ध संगठनों पर धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमलों के आरोप लगाए। वहीं जीन मिल्स ने कहा कि आरएसएस नेताओं को, भले ही वे भारतीय सरकार से जुड़े हों, उच्चस्तरीय मुलाकातें या कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं दिया जाना चाहिए। मिल्स ने कहा कि इसकी बजाय अमेरिका को उन लोगों पर प्रतिबंध लगाने पर ध्यान देना चाहिए, जिन्हें धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन का जिम्मेदार माना जाता है। इसे भी पढ़ें: भारतीय परंपराओं में निहित है संवाद, संवाद से ही होता है समाधान देखा जाये तो यह कोई अचानक आया बयान नहीं है। मार्च में जारी अपनी वार्षिक रिपोर्ट में भी USCIRF ने भारत को धार्मिक स्वतंत्रता के मामले में कठघरे में खड़ा करते हुए आरएसएस और भारत की खुफिया एजेंसी RAW तक के खिलाफ लक्षित अमेरिकी प्रतिबंधों की सिफारिश की थी। इनमें संपत्ति फ्रीज करने और अमेरिका में प्रवेश प्रतिबंध जैसे कदम शामिल करने की बात कही गई। यह आयोग बार-बार भारत को “कंट्री ऑफ पर्टिकुलर कंसर्न” यानी CPC घोषित करने की सिफारिश करता रहा है। यह एक ऐसा वर्गीकरण है, जिसमें चीन और उत्तर कोरिया जैसे देशों को भी शामिल किया जाता है। वहीं भारत ने USCIRF की इस रिपोर्ट और उसके आरोपों को सिरे से खारिज किया था। विदेश मंत्रालय ने इसे “विकृत और चयनात्मक तस्वीर” पेश करने वाला दस्तावेज बताया था, जो संदिग्ध स्रोतों और वैचारिक आख्यानों पर आधारित है। यह भी महत्वपूर्ण है कि USCIRF एक अमेरिकी संघीय सरकारी निकाय जरूर है, लेकिन उसकी भूमिका केवल सलाहकारी है और उसकी सिफारिशें बाध्यकारी नहीं हैं। यही कारण है कि आयोग की लगातार कठोर सिफारिशों के बावजूद अमेरिकी प्रशासन ने भारत को CPC घोषित करने या आरएसएस अथवा RAW पर प्रतिबंध लगाने जैसी मांगों को स्वीकार नहीं किया है। इसके विपरीत, अमेरिका और भारत के बीच रणनीतिक, रक्षा, तकनीकी और भू-राजनीतिक साझेदारी लगातार विस्तार पाती रही है। दूसरी ओर, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की आगामी यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर चुका है। अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन में स्थानीय भारतीय संगठनों और प्रवासी संस्थाओं के निमंत्रण पर होने वाली इस यात्रा के दौरान भागवत भारतीय मूल के लोगों और विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों से संवाद करेंगे। यहीं से USCIRF के ताजा हमले के राजनीतिक और वैचारिक संदर्भ पर सवाल खड़े होते हैं। आखिर जिस संगठन ने लगभग एक शताब्दी में भारत के सामाजिक जीवन में अपनी गहरी उपस्थिति बनाई, सेवा, शिक्षा, आपदा राहत, सामाजिक संगठन और राष्ट्रीय चेतना के क्षेत्र में विशाल स्वयंसेवी नेटवर्क खड़ा किया, उसके प्रमुख की प्रवासी भारतीयों से मुलाकात को पहले ही संदेह और प्रतिबंध की भाषा में क्यों देखा जा रहा है? देखा जाये तो आरएसएस को केवल राजनीतिक चश्मे से देखना ही उसकी सबसे बड़ी गलत व्याख्या है। देशभर में स्वयंसेवकों का व्यापक सामाजिक और सेवा कार्य, प्राकृतिक आपदाओं में राहत अभियान, शिक्षा एवं सामाजिक उत्थान से जुड़े प्रयास और राष्ट्रहित को केंद्र में रखने वाली उसकी संगठनात्मक परंपरा उसके लंबे सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। यही व्यापक सामाजिक आधार और प्रवासी भारतीय समाज के बीच बढ़ती स्वीकार्यता संभवतः उन समूहों को असहज करती है, जो भारत की राजनीति और समाज को केवल धार्मिक उत्पीड़न की एक पूर्वनिर्धारित कहानी के जरिए देखना चाहते हैं। इसके अलावा, USCIRF के दस्तावेजों और बयानों पर नजर डालें तो भाजपा और आरएसएस के खिलाफ उसका नफरत भरा रुख स्पष्ट दिखाई देता है। यह आयोग भाजपा और आरएसएस के संस्थागत संबंधों को “भेदभाव के माहौल” से जोड़ता रहा है और नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), धर्मांतरण विरोधी कानूनों तथा गोहत्या निषेध से जुड़े प्रावधानों को भी इसी व्यापक राजनीतिक ढांचे के हिस्से के रूप में प्रस्तुत कर चुका है। साथ ही इस आयोग की ओर से भारत के लोकतांत्रिक, संवैधानिक और न्यायिक ढांचे को उसके अपने संदर्भ में समझने की बजाय हर नीति और कानूनी कार्रवाई को धार्मिक उत्पीड़न के पूर्वनिर्धारित फ्रेम में फिट करने की कोशिश की जाती है। उदाहरण के लिए भारत CAA को पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में धार्मिक उत्पीड़न झेलने वाले अल्पसंख्यकों के लिए तेज नागरिकता प्रक्रिया वाला मानवीय कानून बताता है। लेकिन USCIRF इसे लगातार घरेलू अल्पसंख्यकों के अधिकारों को प्रभावित करने वाले उपकरण के रूप में पेश करता रहा है। इसी तरह दंगों, आतंकवाद या वित्तीय अपराध जैसे गंभीर मामलों में आरोपित व्यक्तियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई अथवा अदालतों द्वारा जमानत से इंकार को भी कई बार “धार्मिक अल्पसंख्यकों के मनमाने उत्पीड़न” की भाषा में पेश किया जाता है। इस दृष्टिकोण में भारत की स्वतंत्र न्यायपालिका, बहुस्तरीय अपील व्यवस्था और संवैधानिक प्रक्रिया को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता। दूसरी ओर, भारत सरकार और कई भारतीय-अमेरिकी संगठनों ने USCIRF के रवैये पर दोहरे मापदंडों का सवाल भी उठाया है। सवाल उठाया गया है कि यह आयोग भारत को धार्मिक स्वतंत्रता पर लगातार उपदेश देता है, लेकिन अमेरिका और कनाडा में हिंदू मंदिरों पर तोड़फोड़, आगजनी, भारतीय मूल के लोगों के खिलाफ घृणा अपराधों और संगठित धमकी की घटनाओं पर खामोश रहता है। यही नहीं, इस आयोग के नेतृत्व की पृष्ठभूमि को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। साथ ही USCIRF की रिपोर्टिंग, स्रोत चयन और निष्कर्षों में लगातार दिखाई देने वाले पैटर्न इसकी निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न उठाते हैं। बहरहाल, USCIRF भले ही मोहन भागवत की विदेश यात्रा से पहले प्रतिबंधों, कूटनीतिक बहिष्कार और आरएसएस के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर कितना भी शोर मचाता रहे, लेकिन जमीनी तस्वीर इससे अलग दिखाई दे रही है। अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन में रह रहे संघ से जुड़े स्वयंसेवक और भारतीय समुदाय के लोग अपने सरसंघचालक के स्वागत को उत्सुक नजर आ रहे हैं और उनके मार्गदर्शक संबोधन को सुनने के लिए आतुर हैं। संघ के शताब्दी वर्ष में मोहन भागवत की यह यात्रा वैश्विक भारतीय समाज के साथ संवाद का अवसर बन रही है। ऐसे में आलोचकों और USCIRF की ओर से उठाया जाने वाला विरोध का शोर, प्रवासी भारतीयों और स्वयंसेवकों के उत्साह तथा व्यापक जनसंपर्क के बीच दबकर रह जाने की संभावना है। -नीरज कुमार दुबे
जयपुर से लेकर भोपाल और गया से उन्नाव तक...Gen Z तो झांकी थी, पूरी पिक्चर दिखा रहे Gen अल्फा?
कहीं क्लॉस रूम में पंखा नहीं चलता, कहीं पीने का पानी नहीं है। कहीं टॉयलेट इस्तेमाल करने लायक नहीं है। कहीं शिक्षक नहीं है तो कहीं मिड-डे मील में कीड़े मिलने की शिकायत है। अब इन सब के खिलाफ स्कूलों के बच्चे आवाज उठा रहे हैं। जेन जी के बाद अब जेन एल्फा भी अपने हक के लिए सड़कों पर उतरते दिख रहे हैं। बीते कुछ हफ्तों में देश के कई राज्यों से स्कूल-कॉलेज के बच्चों के प्रदर्शन की तस्वीर सामने आ रही है। इन प्रोटेस्ट में एक कहानी राजस्थान के जयपुर की है, जहां मूक-बधिर छात्रों ने प्रदर्शन किया और सरकार ने एक्शन भी लिया। वहीं उत्तर प्रदेश में तो जेन एल्फा ने विधायक का काफिला तक रोक दिया।इन सभी जगहों पर मुद्दे अलग-अलग थे। स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को बुनियादी सुविधाओं के लिए आखिर सड़क पर क्यों उतरना पड़ रहा है? जेन जी के दौर में शिक्षा और परीक्षाओं को लेकर बड़े-बड़े विरोध देखने को मिले। अब जेन एल्फा भी उसी रास्ते पर आगे बढ़ते दिख रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि यह बच्चे छोटे हैं, स्कूल में हैं, लेकिन अपनी मांग को लेकर बिल्कुल साफ हैं। इसे भी पढ़ें: CJI के बाद अब PM मोदी के बयान ने कौन सी नई पार्टी बनवा दी, दनादन जुड़ गए लाखों लोग, कॉकरोच जैसा क्रेज! स्कूल जाने के लिए पक्की सड़क की मांग को लेकर बच्चे कलेक्ट्रेट पहुंचे 11 अगस्त को, उत्तर प्रदेश के हमीरपुर ज़िले की चंदू पुर ग्राम पंचायत के छात्र और ग्रामीण तिरंगा यात्रा के ज़रिए लगभग 5 किलोमीटर दूर अपने स्थानीय कलेक्ट्रेट पहुंचे। बच्चों ने अपने स्कूल तक जाने के लिए पक्की सड़क की मांग की। उन्होंने कहा कि उन्हें कीचड़ से होकर गुज़रना पड़ता है, खासकर बारिश के मौसम में और आज़ादी के बाद से इस इलाके में कोई पक्की सड़क नहीं बनी है। वे ज़िला मजिस्ट्रेट के दफ़्तर के गेट पर बैठ गए और कहा कि जब तक काम शुरू नहीं होगा, वे वहीं डटे रहेंगे। प्रशासन ने बताया कि सड़क बनाने का प्रोजेक्ट, जिसकी लागत लगभग 1 करोड़ रुपये आंकी गई है, कई सालों से अटका हुआ था। एक अधिकारी ने बताया कि वन विभाग से NOC मिल गई है और प्रस्ताव सरकार को भेज दिया गया है; मंज़ूरी मिलने के बाद टेंडर निकाला जाएगा। हालांकि, हमीरपुर के इस विरोध-प्रदर्शन ने बच्चों के इस आंदोलन से जुड़ा एक अहम सवाल भी खड़ा कर दिया। यह आंदोलन कितना बच्चों की अपनी पहल है और कितना उनके आस-पास के बड़ों की वजह से हो रहा है? हमीरपुर के ADM ने आरोप लगाया कि कुछ असामाजिक तत्व बच्चों को आगे करके इस मामले को तूल दे रहे हैं।हालांकि, प्रदर्शनकारी सड़क का काम शुरू करने की मांग करते रहे। इसे भी पढ़ें: शिखा है, जनेऊ पहनते हैं? PM ने राम के मर्म को अयोध्या में समझाया, वो क्या इंटरव्यूअर्स को समझ नहीं आया, मंदिर का नया CEO ब्राह्मण ही बनेगा? यूपी, एमपी, महाराष्ट्र, बिहार और राजस्थान में नई पीढ़ी का विरोध-प्रदर्शन 28 जुलाई को उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में भी कुछ ऐसा ही हुआ। किशनपुर कस्बे के सर्वोदय इंटर कॉलेज के करीब 1,500 छात्र अपनी क्लास से बाहर निकल आए और कॉलेज की सुविधाओं के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन किया। उनकी मांगों में सही डेस्क और बेंच, टॉयलेट, पीने का पानी, मिड-डे मील और लाइब्रेरी व कंप्यूटर लैब जैसी सुविधाओं की कमी को दूर करना शामिल था। स्कूल प्रशासन को झुकना पड़ा। अधिकारियों ने कहा कि मांगों को पूरा किया जाएगा, जिसमें हर क्लास में चार पंखे लगाना, बिजली की वायरिंग ठीक करना और मिड-डे मील की व्यवस्था करना शामिल है। बच्चे बुनियादी सुविधाओं की मांग कर रहे थे, और लगभग हर जगह यही पैटर्न देखने को मिला। बिहार में गया के सिमुआरा मिडिल स्कूल के करीब 40-50 छात्र SDM से सीधे बात करने के लिए लगभग चार किलोमीटर पैदल चलकर उनके ऑफिस पहुंचे। जूनियर अधिकारियों से नहीं, बल्कि सीधे बड़े अधिकारी से। उनकी शिकायतों में खाने लायक मिड-डे मील देना, गंदे टॉयलेट की सफाई, क्लास में पंखे, टूटी बेंच बदलना और खराब हैंडपंप की मरम्मत करवाना शामिल था। प्रशासन ने जांच के आदेश दिए और हेडमास्टर को शिकायतों को दूर करने के लिए समय-सीमा दी। राजस्थान के बाड़मेर में, छात्रों ने टीचर की खाली पोस्ट को लेकर सरकारी स्कूलों के गेट पर ताला लगा दिया। यह विरोध तब तक जारी रहा जब तक ज़िला शिक्षा अधिकारी ने छात्रों को भरोसा नहीं दिलाया कि तुरंत तीन टीचर तैनात किए जाएंगे। जालौर में भी छात्रों ने टीचर की कमी को लेकर इसी तरह विरोध किया। मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में एक रेजिडेंशियल स्कूल के छात्रों ने मेस के खाने की क्वालिटी को लेकर विरोध किया। उनका आरोप था कि दाल और सब्ज़ी में बार-बार कीड़े मिल रहे थे। वहीं, महाराष्ट्र में छात्रों ने टॉयलेट, पानी की सप्लाई और टीचर के स्कूल न आने को लेकर विरोध किया। कई छात्रों ने बोर्ड परीक्षा से पहले टीचर की मांग की। अलग-अलग राज्य, लेकिन बुनियादी सुविधाओं के लिए एक जैसा संघर्ष। जेन अल्फा अपने शिक्षण संस्थानों को जवाब देने के लिए मजबूर करने के वास्ते एकजुटता का इस्तेमाल कर रहे हैं। वे शिकायत करने के पारंपरिक तरीके से आगे बढ़कर अपनी समस्याओं को सड़कों पर ला रहे हैं। डेफ एंड म्यूट के छात्रों ने किया प्रदर्शन जयपुर के सरकारी सेठ आनंदी लाल पोदार हायर सेकेंडरी स्कूल फॉर डेफ एंड म्यूट के छात्रों ने स्कूल की बदहाल हालत के खिलाफ प्रदर्शन किया। बच्चों की शिकायतें सिर्फ एक दो नहीं थी। स्कूल के टॉयलेट खराब थे। पीने के पानी में दिक्कत थी। की बिल्डिंग की हालत जजर थी और कई दूसरी बुनियादी सुविधाएं भी ठीक नहीं थी। स्टूडेंट्स ने साइन लैंग्वेज के जरिए अपनी बात रखी और सोशल मीडिया में इस प्रोटेस्ट से जुड़े कई वीडियो भी वायरल हुए। स्कूल में 12वीं तक के छात्र पढ़ते हैं। यहां 17 क्लासरूम्स हैं। 592 छात्र हैं और शिक्षकों के 76 पद मंजूर हैं। लेकिन बच्चों की शिकायत थी कि स्कूल की हालत लगातार खराब होती जा रही है। टॉयलेट इतने खराब थे कि उनका इस्तेमाल करना भी मुश्किल हो गया था। पीने के पानी की व्यवस्था भी ठीक नहीं थी। स्कूल की दीवारों और क्लासरूम में दरारें थी जिससे बच्चों की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े हो रहे थे। स्कूल बस भी खराब हालत में थी। सफाई के नाम पर जगह-जगह कचरा पड़ा था। मामला सामने आने के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के प्रतिनिधि स्कूल पहुंचे। इसे भी पढ़ें: सिर के बदले सिर! कौन है जनरल रेजाई, जिसे मोजतबा ने बनाया ईरान का 'सिक्योरिटी बॉस' हमीरपुर, उन्नाव के बाद अब बस्ती में रोका एलएलए का काफिला उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में 28 जुलाई को करीब 1500 स्टूडेंट्स स्कूल से बाहर निकल आए। किशनपुर के सर्वोदय इंटर कॉलेज में छठी से 12वीं तक के छात्रों ने 5 से 6 घंटे तक धरना दिया। उनकी शिकायत थी कि क्लासरूम में बिजली और पंखे नहीं है। कहीं पंखों से करंट लगने की शिकायत है। डेस्क बेंच कम है। टॉयलेट गंदे हैं। पीने का पानी सुरक्षित नहीं है। मिड डे मील तय मेन्यू के हिसाब से नहीं मिलता और स्कूल में लाइब्रेरी, कंप्यूटर लैब और खेल की सुविधाएं भी नहीं है। प्रिंसिपल ने बाद में ज्यादातर मांगे मानने की बात कही। यूपी के ही पीलीभीत के जवाहर नवोदय विद्यालय में भी 10वीं और 11वीं और साथ ही साथ 12वीं के छात्रों ने प्रदर्शन किया। हमीरपुर, उन्नाव के बाद अब बस्ती में MLA का काफिला स्कूली बच्चों ने रोक लिया. बच्चों ने विधायक से जर्जर सड़क बनवाने की मांग की। इस पर विधायक ने अफसरों से बात कर जल्द ही सड़क बनवाने का आश्वासन देकर शांत कराया है। जेन ज़ी से सीख रही है जेन अल्फा हाल के इन विरोध-प्रदर्शनों में हिस्सा लेने वाले अधिकांश बच्चे इतने छोटे हैं कि उन्हें अभी वोट देने का अधिकार भी नहीं है। उनके पास कोई औपचारिक राजनीतिक ताकत नहीं है। वे किसी चुनाव के जरिए सरकार नहीं बदल सकते और ज्यादातर मामलों में, जिन संस्थानों के खिलाफ वे खड़े हैं, उन पर भी उनका प्रभाव बेहद सीमित है। इसके बावजूद, उन्होंने प्रभाव डालने का एक नया जरिया विजिबिलिटी का ढूंढ निकाला है और इसे असरदार बनाने के लिए सोशल मीडिया उनका सबसे मजबूत हथियार बनकर उभरा है। सड़क पर तख्तियां थामे मार्च करते या किसी सरकारी दफ्तर के बाहर धरने पर बैठे स्कूली बच्चों के समूह को नजरअंदाज करना प्रशासन के लिए बेहद मुश्किल हो जाता है, खासकर तब जब इन प्रदर्शनों के वीडियो इंटरनेट पर तेजी से वायरल होने लगते हैं। ये बच्चे जेन ज़ी को बिल्कुल इसी तौर-तरीके और भाषा का इस्तेमाल करते हुए देखकर बड़े हो रहे हैं, और ऐसा लगता है कि जेन अल्फा ने यह सबक वक्त से पहले ही सीख लिया है। सड़क की मांग को लेकर कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन कर रहे बच्चों का वीडियो री-शेयर करते हुए सीजेपी (CJP) प्रदर्शन के नेताओं में से एक, सौरव दास ने लिखा शाबाश जेन अल्फा! हमें यही करने की जरूरत है अपने भविष्य की जिम्मेदारी खुद संभालना। जेन अल्फा की मांगें क्यों अहम हैं उनकी मांगों से कुछ खास बातें भी पता चलती हैं। पहले की पीढ़ियों के छात्र अक्सर खराब इंफ्रास्ट्रक्चर, टीचरों की कमी, सुविधाओं की कमी और अनियमित सेवाओं को रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा मानकर स्वीकार कर लेते थे। आज विरोध करने वाले बच्चे क्लासरूम में पंखे न होने, टीचर न होने और स्कूल तक सड़क न होने जैसी चीज़ों को सामान्य मानने को तैयार नहीं हैं। वे ऐसे भारत में बड़े हो रहे हैं जहाँ फ़ोन पर ही यह जानकारी मिल जाती है कि दूसरी जगहों पर चीज़ें कैसे काम करती हैं। वे देख सकते हैं कि वे किन चीज़ों से वंचित रह रहे हैं, और इसीलिए, 'अल्फा' पीढ़ी में गुस्सा है। इन बच्चों के आस-पास मौजूद बड़े लोग ज़ाहिर तौर पर इनमें से कुछ विरोध-प्रदर्शनों को आकार देंगे। लेकिन इससे जेन अल्फा की शिकायतें कम वास्तविक नहीं हो जातीं।
सोशल मीडिया पर इस समय एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें एक महिला पर्यटक भारतीय सेना के जवानों के साथ बहस कर रही है और खुद को “Gen-Z” बताकर सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दे रही है। शायद इस महिला को पता नहीं कि सीमा पर खड़े सैनिक की ड्यूटी कोई पर्यटन सेवा नहीं है और राष्ट्रीय सुरक्षा कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है जिसे किसी पर्यटक की सुविधा, बहस या अधिकारों के नाम पर दरकिनार कर दिया जाए। साथ ही वीडियो में महिला खुद को “Gen-Z” बताते हुए यह कहती सुनाई देती है कि वह “यह बकवास बर्दाश्त नहीं करेगी।” यहां सवाल यह उठता है कि क्या किसी पीढ़ी का टैग राष्ट्रीय सुरक्षा प्रोटोकॉल से ऊपर हो सकता है? बताया जा रहा है कि वायरल वीडियो में दिखी घटना कारगिल सेक्टर के एक संवेदनशील हाई-एल्टीट्यूड चेक पोस्ट की है, जहां पर्यटकों के एक समूह को प्रतिबंधित दिशा में आगे बढ़ने से रोका गया। बताया जा रहा है कि संबंधित क्षेत्र में प्रवेश के लिए आवश्यक अनुमति और सुरक्षा नियम लागू थे। एक अन्य विवरण में इसे मिनामार्ग या मिनीमार्ग चेक पोस्ट के पास अस्थायी सड़क प्रतिबंध से जुड़ा बताया गया है। वीडियो में दिख रही तस्वीर बेहद स्पष्ट है। एक तरफ शांत रहकर सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन कराने की कोशिश करता जवान और दूसरी तरफ अपनी यात्रा, दूरी और अधिकारों का हवाला देकर बहस करता पर्यटक समूह। इसे भी पढ़ें: Sergio Gor के बयान से तिलमिलाये Pakistan ने Trump Administration पर उतारी भड़ास, US Diplomat Natalie Baker को तलब कर थमाया Strong Demarche महिला पर्यटक का यह तर्क कि “हम Gen-Z हैं, हम यह सब बर्दाश्त नहीं करेंगे”, दरअसल उस मानसिकता को उजागर करता है जिसमें व्यक्तिगत सुविधा को व्यवस्था और सुरक्षा से ऊपर मान लिया जाता है। Gen-Z होना न कोई विशेष सुरक्षा पास है, न ही यह कानून और राष्ट्रीय सुरक्षा प्रोटोकॉल को चुनौती देने का लाइसेंस है। सेना यह नहीं देखती कि सामने खड़ा व्यक्ति किस पीढ़ी का है; उसे यह देखना होता है कि सीमा सुरक्षित रहे, कोई संदिग्ध गतिविधि न हो और कोई नागरिक अनजाने में किसी खतरे की जद में न पहुंच जाए। देखा जाये तो कारगिल और नियंत्रण रेखा के आसपास के इलाके सामान्य पर्यटन स्थल नहीं हैं। यह वही संवेदनशील भूभाग है जहां भारत ने युद्ध का सामना किया है, जहां घुसपैठ और आतंकी गतिविधियों का इतिहास रहा है और जहां मौसम, दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियां तथा सैन्य गतिविधियां हर समय सुरक्षा की अलग चुनौतियां पैदा करती हैं। ऐसे में सड़क बंद होना, आवाजाही नियंत्रित होना, चेकिंग होना या किसी क्षेत्र में प्रवेश के लिए अनुमति मांगना कोई “एंटी-टूरिस्ट” रवैया नहीं, बल्कि एक जरूरी सुरक्षा व्यवस्था है। सेना और सुरक्षा एजेंसियों को वहां इसलिए तैनात रहना पड़ता है क्योंकि सीमावर्ती इलाकों में खतरे केवल दिखाई देने वाले नहीं होते। कई बार खुफिया सूचना के आधार पर तलाशी या घेराबंदी की जरूरत पड़ सकती है। कभी सैन्य काफिले की आवाजाही होती है, कभी खराब मौसम या भूस्खलन के कारण रास्ता असुरक्षित हो जाता है और कभी किसी संभावित खतरे को देखते हुए नागरिकों की आवाजाही अस्थायी रूप से रोकी जाती है। ऐसे निर्णय किसी एक पर्यटक को परेशान करने के लिए नहीं, बल्कि दर्जनों या सैकड़ों लोगों की जान बचाने के लिए लिए जाते हैं। बर्फीली चोटियों, दुर्गम सड़कों और हर वक्त मौजूद संभावित खतरे के बीच जवान इसलिए तैनात है ताकि देश के नागरिक सुरक्षित रहें और पर्यटन जैसी सामान्य गतिविधियां भी संभव हो सकें। ऐसे में किसी पर्यटक का जवानों से यह पूछना कि रास्ता आखिर क्यों बंद किया गया है, हर परिस्थिति में उचित नहीं कहा जा सकता, क्योंकि सुरक्षा बलों के पास मौजूद खुफिया जानकारी, किसी विशेष इनपुट या चल रहे ऑपरेशन का कारण सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। कई बार एक मामूली-सा खुलासा भी सुरक्षा अभियान और जवानों की जान को जोखिम में डाल सकता है। देश पुलवामा में सुरक्षा बलों के काफिले पर हुए आतंकी हमले की भयावहता देख चुका है और पहलगाम में पर्यटकों को निशाना बनाकर किए गए आतंकी हमले की त्रासदी भी झेल चुका है। ऐसे अनुभव साफ बताते हैं कि संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा को लेकर एक छोटी-सी चूक कितनी भारी पड़ सकती है। इसलिए पर्यटकों को यह समझना होगा कि जब सेना या सुरक्षा बल किसी रास्ते को बंद करते हैं या आगे बढ़ने से रोकते हैं, तो हर निर्णय के पीछे की वजह कैमरे के सामने बताना संभव नहीं होता। ऐसे में जवान से बहस करना, वीडियो बनाकर उस पर अनावश्यक प्रतिबंध लगाने का आरोप लगाना या सुरक्षा व्यवस्था पर सवालिया निशान खड़ा करना केवल असंवेदनशीलता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की गंभीरता को न समझ पाने का उदाहरण है। सुरक्षा के मामले में सहयोग और धैर्य ही समझदारी है, क्योंकि कई बार जिस खतरे को आम नागरिक देख नहीं सकता, उसे रोकने के लिए ही जवान वहां खड़ा होता है। साथ ही वायरल हो रहे वीडियो में पर्यटक समूह के कुछ सदस्य यह कहते भी दिखाई देते हैं कि वे सैकड़ों किलोमीटर दूर से वहां पहुंचे हैं। लेकिन ऐसे लोगों को समझना होगा कि लंबी यात्रा किसी प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश का अधिकारपत्र नहीं बन जाती। यदि किसी क्षेत्र के लिए परमिट जरूरी है तो पहले उसकी जानकारी लेना और नियमों का पालन करना पर्यटक की जिम्मेदारी है। विशेष रूप से लद्दाख और अन्य संरक्षित सीमावर्ती क्षेत्रों में नियम परिस्थितियों और सुरक्षा स्थिति के अनुसार बदल सकते हैं। सैन्य प्रतिष्ठानों, चेक पोस्टों और रणनीतिक स्थानों पर फोटोग्राफी या वीडियोग्राफी भी प्रतिबंधित हो सकती है। इस पूरे प्रकरण का सबसे चिंताजनक पहलू वह भाषा और रवैया है, जिसमें सुरक्षा व्यवस्था को व्यक्तिगत अधिकारों के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश दिखाई देती है। लोकतंत्र में सवाल पूछने का अधिकार है, लेकिन संवेदनशील सैन्य चौकी पर ऑपरेशन या सुरक्षा प्रतिबंध के दौरान बहस करके आदेश बदलवाने का अधिकार किसी को नहीं है। संसद, टैक्स या किसी पीढ़ी का नाम लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा की जरूरतों को चुनौती देना न तो लोकतंत्र को मजबूत करता है और न ही नागरिक अधिकारों की रक्षा करता है। दूसरी ओर, सोशल मीडिया पर इस वीडियो को लेकर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली जोकि स्वाभाविक है। लोगों ने महिला पर्यटक और उसके साथियों के रवैये को अहंकारी और गैर-जिम्मेदाराना बताया है। “Gen-Z” वाली टिप्पणी पर मीम्स भी बन रहे हैं, लेकिन इस घटना को केवल मनोरंजन के रूप में देखने की बजाय इससे एक गंभीर सबक लेने की जरूरत है। कैमरे के सामने हंगामा करके वायरल होना आसान है, लेकिन सीमा की सुरक्षा में एक छोटी-सी चूक की कीमत कितनी बड़ी हो सकती है, इसका अंदाजा वहां तैनात जवान को हमसे कहीं बेहतर है। यह चेतावनी केवल उस महिला पर्यटक के लिए नहीं, बल्कि उन सभी लोगों के लिए है जो सोशल मीडिया की लोकप्रियता, व्यक्तिगत सुविधा या पीढ़ीगत पहचान के नाम पर सुरक्षा नियमों को हल्के में लेते हैं। राष्ट्र की सुरक्षा किसी हैशटैग, नारे या वायरल वीडियो के हिसाब से नहीं चल सकती। सीमा पर तैनात सैनिक को अपना काम करने दीजिए। यदि रास्ता बंद है तो रुकिए, यदि अनुमति चाहिए तो परमिट लीजिए और यदि सुरक्षा बल वापस लौटने को कहें तो सहयोग कीजिए। देखा जाये तो इस घटना ने एक जरूरी संदेश जरूर दे दिया है कि यात्रा का अधिकार जिम्मेदारी के साथ आता है और राष्ट्रीय सुरक्षा के सामने व्यक्तिगत सुविधा का कोई दावा नहीं चल सकता। सीमा की हकीकत को सभी को समझना होगा। जेन जी हो या कोई भी हो, वर्दी का सम्मान कीजिए, प्रोटोकॉल का पालन कीजिए और याद रखिए, जवान आपकी आजादी रोकने के लिए नहीं, आपकी सुरक्षा और देश की सीमाओं की रक्षा के लिए वहां खड़े हैं। -नीरज कुमार दुबे
सर्जियो गोर के एक बयान ने पाकिस्तान को ऐसा झटका दिया कि इस्लामाबाद ट्रंप प्रशासन पर बुरी तरह भड़क उठा। अमेरिका के भारत में राजदूत और दक्षिण व मध्य एशिया के विशेष दूत सर्जियो गोर ने श्रीनगर पहुंचकर जम्मू-कश्मीर को भारत का “महत्वपूर्ण हिस्सा” क्या बताया, पाकिस्तान की वर्षों पुरानी कूटनीतिक पटकथा ही हिल गई। प्रतिक्रिया इतनी तीखी थी कि पाकिस्तान ने अमेरिकी चार्जे डी'अफेयर्स नताली बेकर को विदेश मंत्रालय तलब कर बाकायदा “स्ट्रॉन्ग डिमार्श” थमा दिया और गोर के बयान को “गैर-जिम्मेदाराना” करार दे डाला। सवाल यह है कि आखिर गोर के शब्दों में ऐसा क्या था जिसने पाकिस्तान को सीधे अमेरिका से भिड़ने के लिए मजबूर कर दिया? दरअसल, श्रीनगर दौरे पर पहुंचे गोर ने साफ कहा, “यह भारत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और मैं यहां पहली बार आया हूं।” उन्होंने जम्मू-कश्मीर की खूबसूरती की तारीफ की, मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से मुलाकात की और कहा कि अमेरिका जम्मू-कश्मीर के लिए अपनी ट्रैवल एडवाइजरी की समीक्षा कर सकता है। गोर ने यह भी माना कि केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने क्षेत्र को अधिक सुरक्षित बनाने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इसके बाद उनका डल झील में शिकारा की सवारी करना केवल पर्यटन कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक मजबूत प्रतीकात्मक संदेश भी बन गया। अमेरिका का शीर्ष राजनयिक जम्मू-कश्मीर की जमीन पर खुले तौर पर भारत की संप्रभुता के अनुरूप भाषा बोल रहा था और क्षेत्र को संभावित रूप से अमेरिकी पर्यटकों के लिए सुरक्षित गंतव्य के रूप में देख रहा था। इसे भी पढ़ें: पाकिस्तान पर India का Bulldozer Action, Delhi में Pakistan High Commission के बाहर बने अवैध ढांचे ध्वस्त यही बात पाकिस्तान को सबसे ज्यादा चुभी। इस्लामाबाद ने तुरंत पुराना राग छेड़ते हुए जम्मू-कश्मीर को “अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त विवादित क्षेत्र” बताया और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों तथा “कश्मीरी लोगों की आकांक्षाओं” का हवाला दिया। पाकिस्तान का आरोप था कि गोर की टिप्पणी अमेरिका की पुरानी स्थिति के विपरीत है। यानी जिस वाशिंगटन से पाकिस्तान दशकों से कश्मीर पर अंतरराष्ट्रीय दखल, मध्यस्थता और भारत पर दबाव की उम्मीद लगाए बैठा था, उसी अमेरिकी प्रशासन के एक प्रमुख प्रतिनिधि ने श्रीनगर में जाकर ऐसी भाषा बोल दी जिसने इस्लामाबाद की कूटनीतिक बेचैनी बढ़ा दी। इस घटनाक्रम का सामरिक महत्व बेहद बड़ा है। भारत लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और इससे जुड़ा कोई भी लंबित मुद्दा भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय है। भारत ने तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को हमेशा खारिज किया है। इसके उलट पाकिस्तान का पूरा प्रयास कश्मीर को लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जीवित विवाद के रूप में पेश करने का रहा है। गोर का “इंपॉर्टेंट पार्ट ऑफ इंडिया” वाला बयान, यदि वाशिंगटन की व्यापक नीति में किसी बदलाव का संकेत साबित होता है, तो यह पाकिस्तान की इसी रणनीति पर सीधा प्रहार होगा। हालांकि यहां कूटनीतिक सावधानी भी जरूरी है। पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने इस बयान को महत्वपूर्ण बताया है, लेकिन यह संभावना भी जताई कि गोर अपने औपचारिक निर्देशों से आगे निकल गए हों और पाकिस्तान को शांत करने के लिए अमेरिका बाद में अपना पुराना रुख दोहरा सकता है। यही कारण है कि भारत के लिए केवल एक बयान को अंतिम अमेरिकी नीति परिवर्तन मान लेना जल्दबाजी होगी। फिर भी, यह टिप्पणी उस पृष्ठभूमि में बेहद मायने रखती है जिसमें अमेरिका के पिछले रुख में अक्सर “कश्मीरी लोगों की इच्छाओं” जैसी भाषा दिखाई देती रही है और स्वयं डोनाल्ड ट्रंप कई मौकों पर कश्मीर पर मध्यस्थता की पेशकश कर चुके हैं। लेकिन इस पूरे विवाद का एक दूसरा और शायद ज्यादा दिलचस्प रणनीतिक पहलू पाकिस्तान की गोर से सीधी भिड़ंत है। गोर दक्षिण और मध्य एशिया के विशेष दूत भी हैं और उनके दायरे में पाकिस्तान भी आता है। ऐसे में पाकिस्तान ने जिस तीखे तरीके से उन्हें निशाने पर लिया है, उससे गोर के लिए पाकिस्तान संबंधी कूटनीतिक भूमिका और मुश्किल हो सकती है। सिब्बल ने भी इसी ओर इशारा करते हुए कहा कि पाकिस्तान ने गोर पर जिस तरह हमला किया है, उससे वह नाराज हो सकते हैं और यह भारत के लिए अच्छी बात है। इसका सीधा लाभ यह हो सकता है कि अमेरिका-पाकिस्तान समीकरण में पैदा होने वाली खटास वाशिंगटन को दक्षिण एशिया में अपनी प्राथमिकताओं पर नए सिरे से विचार करने के लिए प्रेरित करे। पाकिस्तान लंबे समय से अमेरिकी मध्यस्थता की उम्मीद पर कश्मीर नैरेटिव को अंतरराष्ट्रीय बनाने की कोशिश करता रहा है। लेकिन अगर ट्रंप प्रशासन के प्रभावशाली चेहरे के साथ ही उसका टकराव गहराता है, तो इस्लामाबाद की वाशिंगटन लॉबिंग कमजोर पड़ सकती है और भारत के लिए अमेरिका के साथ रणनीतिक संवाद को मजबूत करने की गुंजाइश बढ़ सकती है। हम आपको यह भी बता दें कि दक्षिण एशिया विशेषज्ञ माइकल कुगेलमैन ने भी गोर की टिप्पणी को भारत-अमेरिका संबंधों को सुधारने की दिशा में मददगार बताया है। उन्होंने कहा है कि दिल्ली आने के बाद गोर भारत के साथ रिश्तों को सुधारने के लक्ष्य पर काम कर रहे हैं और यह बयान उस प्रयास को निश्चित रूप से मजबूती दे सकता है। हालांकि उन्होंने यह चेतावनी भी दी कि यदि यह वास्तव में अमेरिकी नीति का संकेत है, तो यह वर्षों पुराने अमेरिकी रुख से अलग होगा और पाकिस्तान के साथ दोबारा मजबूत हो रहे संबंधों को प्रभावित कर सकता है। साथ ही गोर के दौरे का आर्थिक और सुरक्षा संबंधी संदेश भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। अमेरिका फिलहाल जम्मू-कश्मीर के लिए “लेवल-4: डू नॉट ट्रैवल” एडवाइजरी बनाए हुए है, जो अंतरराष्ट्रीय पर्यटन के लिए बड़ी बाधा रही है। पिछले वर्ष पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद सुरक्षा चिंताएं और बढ़ी थीं। अब गोर का यह कहना कि अमेरिकी प्रशासन ट्रैवल चेतावनी को कम करने की संभावना पर विचार करेगा, जम्मू-कश्मीर के लिए बड़ा अवसर बन सकता है। यदि एडवाइजरी में ढील मिलती है तो इसका संदेश केवल पर्यटकों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति पर अमेरिकी भरोसे का अंतरराष्ट्रीय संकेत होगा। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी गोर के साथ पर्यटन, बागवानी और नई अर्थव्यवस्था जैसे क्षेत्रों में जम्मू-कश्मीर और अमेरिका के बीच संबंधों को व्यापक और गहरा करने पर चर्चा की। ऐसे समय में जब पर्यटन से हजारों परिवारों की रोजी-रोटी जुड़ी है और पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती भी अमेरिकी ट्रैवल एडवाइजरी की समीक्षा की मांग कर चुकी हैं, किसी संभावित बदलाव का आर्थिक असर व्यापक हो सकता है। कुल मिलाकर, श्रीनगर में सर्जियो गोर का दौरा पाकिस्तान के लिए सिर्फ एक कूटनीतिक झटका नहीं, बल्कि उसके वर्षों पुराने कश्मीर नैरेटिव पर सीधा प्रहार है। पाकिस्तान ने अमेरिकी अधिकारी को तलब कर अपनी नाराजगी तो दर्ज करा दी, लेकिन इस आक्रामक प्रतिक्रिया ने यह भी साफ कर दिया कि गोर के शब्द इस्लामाबाद को कितनी गहराई तक चुभे हैं। अब नजर इस बात पर रहेगी कि क्या ट्रंप प्रशासन गोर की टिप्पणी को आगे की नीति में बदलता है या पाकिस्तान को शांत करने के लिए पुराने अमेरिकी रुख की ओर लौटता है। लेकिन फिलहाल इतना तय है कि श्रीनगर से निकला यह संदेश भारत के लिए रणनीतिक, कूटनीतिक और आर्थिक, तीनों मोर्चों पर संभावित लाभ का दरवाजा खोलता है, जबकि पाकिस्तान के सामने सवाल यह खड़ा कर देता है कि अमेरिका से भिड़कर उसने अपनी ही कूटनीतिक जमीन तो और कमजोर नहीं कर ली है।
उपराष्ट्रपति ने मावीरन ओंडिवीरन के बलिदान दिवस और राजीव गांधी की जयंती पर दी श्रद्धांजलि
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तमिलनाडु के वेदारण्यम के नमक उत्पादक वार्षिक लक्ष्य के करीब पहुंचे, गर्मी से उत्पादन में हुई वृद्धि
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झारखंड की शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा, 'जेएसएससी और जेपीएससी को लेकर सरकार का फैसला साहसिक'
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चेन्नई पहुंचे अमित शाह, आज करेंगे परिषद बैठक की अध्यक्षता
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह बुधवार रात चेन्नई पहुंचे, जहां वह गुरुवार को चेन्नई के निकट कोवलम में आयोजित होने वाली दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद (सदर्न जोनल काउंसिल) की 31वीं बैठक की अध्यक्षता करेंगे
राजस्थान नगर निकाय चुनाव घोषित, 9 और 11 को मतदान
राजस्थान में नगर निकाय चुनावों का इंतजार खत्म हो गया है। राज्य निर्वाचन आयोग ने बुधवार को राज्य में होने वाले नगर निकाय चुनावों की घोषणा कर दी। चुनाव दो चरणों में 9 और 11 सितंबर को कराए जाएं
लोकसभा सीटें अगले 25 साल तक स्थिर- कांग्रेस ने परिसीमन पर रखा स्पष्ट रुख
कांग्रेस ने परिसीमन को लेकर स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा है कि लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों की संख्या अगले 25 वर्षों तक नहीं बढ़ाई जानी चाहिए और इन्हीं सीटों में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण दिया जाना चाहिए
महाराष्ट्र में धर्मांतरण विरोधी कानून पर सपा और कांग्रेस ने जताई आपत्ति
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गोवा: विश्व फोटोग्राफी दिवस पर सम्मान समारोह, सीएम सावंत बोले- तस्वीर सबकुछ कहती है...
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अखिलेश यादव के वार पर जयंत चौधरी का संयमित पलटवार, पश्चिमी यूपी की राजनीति में नया उबाल
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी का नाम लिए बिना ऐसा तंज कसा है जिसकी गूंज सीधे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सियासी मैदान तक पहुंच गई। अखिलेश ने कहा, “कहां-कहां से आ गए थे, चवन्नी का रुपया बना दिया, फिर भी…”। दरअसल अखिलेश ने अपने इस बयान के जरिये पुराने साथी को राजनीति में आगे बढ़ाने का दावा किया और फिर साथी द्वारा उन्हें छोड़ देने पर अपनी शिकायत दर्ज कराई लेकिन इस दौरान उनके जो तेवर रहे उसने पश्चिमी यूपी की सियासत को गर्मा दिया है। रालोद कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आये हैं और अखिलेश यादव के पुतले फूंक रहे हैं। यही नहीं, रालोद प्रमुख जयंत चौधरी ने भी अखिलेश पर पलटवार करते हुए दर्शा दिया है कि एक्शन का रिएक्शन तत्काल होगा। हालांकि अखिलेश के तंज पर जयंत चौधरी ने पलटवार तल्खी की बजाय बेहद नपे-तुले अंदाज में किया। उन्होंने कहा, “वो अपनी बात कहें तो अच्छा है। उनके साथ खड़े होने वाले हर सहयोगी… इस तरह की बयानबाजी से सोचने को मजबूर हो रहे हैं।” जयंत ने आगे कहा, “लोकतंत्र है, यहां जनता सबको बनाती है और सबको बिगाड़ती है।” जब उनसे पूछा गया कि अखिलेश उन्हें इतना क्यों याद कर रहे हैं, तो उन्होंने गेंद वापस अखिलेश के पाले में डालते हुए कहा, “ये तो आप लोग उनसे जाकर पूछिए।” दरअसल, यह सिर्फ दो नेताओं की निजी राजनीतिक नोकझोंक नहीं है। इसके पीछे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बदलते जातीय और गठबंधन समीकरण की पूरी पटकथा पढ़ी जा सकती है। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा और रालोद ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। इस गठबंधन में जाट-मुस्लिम समीकरण को साधने की कोशिश साफ दिखाई दी थी। अखिलेश यादव ने जयंत चौधरी को राज्यसभा भेजने में भी भूमिका निभाई। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले पूर्व प्रधानमंत्री और जयंत के दादा चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न मिलने के बाद रालोद ने एनडीए का दामन थाम लिया। अब जयंत भाजपा नेतृत्व वाले गठबंधन का हिस्सा हैं और केंद्र सरकार में राज्यमंत्री हैं। यही बदलाव अखिलेश के मौजूदा हमले को राजनीतिक धार देता है। सपा प्रमुख लगातार पीडीए यानि पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के सामाजिक समीकरण को मजबूत करने की कोशिश में हैं। पश्चिमी यूपी में उनकी चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि यहां सपा का पारंपरिक मुस्लिम-यादव आधार पूर्वांचल या मध्य यूपी की तरह निर्णायक नहीं रहा है। ऐसे में गुर्जर, दलित, अन्य पिछड़ी जातियों और गैर-जाट मतदाताओं को जोड़ना सपा की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। जयंत चौधरी का रालोद इस गणित में छोटी पार्टी जरूर है, लेकिन पश्चिमी यूपी में उसका प्रभाव उसके चुनावी आंकड़ों से कहीं ज्यादा राजनीतिक वजन रखता है। जाट समुदाय में चौधरी चरण सिंह की विरासत और रालोद की पकड़ अब भी गठबंधन राजनीति के लिए अहम है। भाजपा के साथ जयंत की मौजूदगी एनडीए को पश्चिमी यूपी में जाट समर्थन को साधने का अतिरिक्त आधार देती है। यही कारण है कि अखिलेश का “चवन्नी” वाला तंज महज पुरानी दोस्ती का हिसाब नहीं, बल्कि नए सामाजिक समीकरणों की जंग भी माना जा रहा है। दिलचस्प यह है कि अखिलेश ने हाल में अपने नेताओं-कार्यकर्ताओं को चुनावी समय में सोच-समझकर बयान देने की नसीहत दी थी, ताकि भाजपा को कोई राजनीतिक लाभ न मिले। इसके तुरंत बाद जयंत पर निशाना साधना बताता है कि सियासी प्राथमिकताएं कभी-कभी रणनीतिक संयम पर भारी पड़ जाती हैं। उधर, जयंत ने तीखा पलटवार करने की बजाय संयम चुना। शायद इसलिए कि वह अखिलेश के बनाए जाट बनाम गैर-जाट नैरेटिव में फंसना नहीं चाहते। उनकी सौम्य प्रतिक्रिया का संदेश भी उतना ही राजनीतिक है। इसका अर्थ यह है कि रालोद अब सपा के साथ नहीं बल्कि एनडीए के साथ ही अपना भविष्य देख रहा है। बहरहाल, “चवन्नी” और “रुपया” की यह लड़ाई असल में पश्चिमी यूपी की उस सियासी तिजोरी की लड़ाई है, जिसकी चाबी जाट, मुस्लिम, दलित, गुर्जर और अन्य पिछड़े मतदाताओं के हाथ में है। देखा जाये तो चुनावी राजनीति में सवाल यह नहीं कि किसने किसे रुपया बनाया; असली सवाल यह है कि जनता की नजर में अब कौन कितने का है। -नीरज कुमार दुबे
झारखंड में नियुक्ति घोटाले की सीबीआई जांच हो, 'बड़ी मछ्ली' को बचाने की कोशिश: दीपक प्रकाश
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नवीन पटनायक ने एमएमडीआर संशोधन बिल का किया विरोध, कहा-ओडिशा की वित्तीय स्वायत्तता को होगा नुकसान
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कोलकाता के होटल में आग लगने से 9 की मौत, भाजपा नेता ने फायर सेफ्टी पर उठाए सवाल
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राजस्थान: कांग्रेस के 'पंचायत टास्क फोर्स' का गठन, युवाओं को 50 प्रतिशत प्रतिनिधित्व देने की तैयारी
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Rahul Gandhi's Big Shift: क्या Modi-Shah के लिए शुरू हुई असली चुनौती?
सेंसेक्स 325 अंक फिसला, गिरावट के साथ बंद हुआ भारतीय शेयर बाजार
मुंबई, भारतीय शेयर बाजार बुधवार के कारोबारी सत्र में गिरावट के साथ बंद हुआ। दिन के अंत में सेंसेक्स 325.78 अंक या 0.42 प्रतिशत की गिरावट के साथ 76,909.68 और निफ्टी 76.60 अंक या 0.32 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 24,078.30 पर था।
Mahipal Singh Exclusive: Delhi से Nagpur तक सबको पता था? Ram Mandir चंदा चोरी का सबसे बड़ा खुलासा!
सिविल ड्रेस में किन लोगों ने छात्रों पर हमला किया था, इसकी जांच होनी चाहिए : रोहित पवार
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क्विक-कॉमर्स कंपनी जेप्टो ने फ्री डिलीवरी पाने के लिए न्यूनतम ऑर्डर मूल्य (मिनिमम ऑर्डर वैल्यू) बढ़ा दिया है। कंपनी ने सामान्य समय में इसे 149 रुपए से बढ़ाकर 199 रुपए कर दिया है, जबकि अधिक मांग (पीक डिमांड) के दौरान यह सीमा 299 रुपए तक पहुंच रही है। इस बदलाव के साथ जेप्टो की फ्री डिलीवरी नीति अब प्रतिस्पर्धी कंपनियों ब्लिंकिट और इंस्टामार्ट के समान स्तर पर आ गई है।
सपा सांसद अवधेश प्रसाद का दावा, यूपी विधानसभा चुनाव 2027 में 50 सीटें भी नहीं जीत पाएगी भाजपा
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भाजपा ने कहा था- 'ना खाएंगे, ना खाने देंगे', लेकिन भ्रष्टाचार पर कोई एक्शन नहीं लिया गया : रोहित पवार
सत्येंद्र जैन की गिरफ्तारी पंजाब चुनाव से पहले बीजेपी की साजिश, शाह ने दबाव डाला: केजरीवाल
आम आदमी पार्टी ने एंटी-करप्शन ब्रांच द्वारा सत्येंद्र जैन की गिरफ्तारी को पंजाब चुनावों से ठीक पहले पार्टी को कमजोर करने की बीजेपी की साजिश करार दिया है। इधर, केजरीवाल ने कहा है 'अमित शाह जी बतायें कि उन्होंने जाँच एजेंसी पर दबाव डालकर सत्येन्द्र जैन को क्यों गिरफ़्तार करवाया'।
वैश्विक दवाब से सोने-चांदी के दाम गिरे, सिल्वर करीब 2 प्रतिशत फिसला
मुंबई, वैश्विक बाजारों से मिले कमजोर संकेतों के बीच बुधवार को घरेलू सर्राफा और वायदा बाजार में सोने-चांदी की कीमतों में तेज गिरावट दर्ज की गई। बढ़ते अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और वैश्विक स्तर पर सुरक्षित निवेश की बदलती धारणा के कारण कीमती धातुओं पर दबाव बना हुआ है, जिसका असर मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर भी साफ दिखाई दिया, जहां सोना 1.54 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम से नीचे फिसल गया, जबकि चांदी 2.30 लाख रुपए प्रति किलोग्राम के स्तर से नीचे आ गई।
भारत की शौर्य गाथा से संबंधित डॉक्यूमेंट्री सामने आते ही पाकिस्तान की नींद उड़ गयी है, इसलिए वह रात दो बजे बयान जारी कर अपनी भड़ास निकाल रहा है। हम आपको बता दें कि डिस्कवरी की दो कड़ियों वाली डॉक्यूमेंट्री “Declassified: Operation Sindoor” ने ऑपरेशन सिंदूर के उन पहलुओं को सामने रखा है, जिनसे पाकिस्तान का आधिकारिक नैरेटिव सीधे टकराता है। 15 अगस्त की रात रिलीज हुई इस डॉक्यूमेंट्री में भारतीय सैन्य और सुरक्षा प्रतिष्ठान के शीर्ष अधिकारियों ने पहली बार विस्तार से बताया है कि मई 2025 के भारत-पाकिस्तान सैन्य टकराव के दौरान फैसले कैसे लिए गए, पाकिस्तान की मिसाइल चुनौती का जवाब कैसे दिया गया और भारतीय हथियारों ने किस तरह लक्ष्य भेदे। सबसे बड़ा खुलासा 10 मई की रात करीब 1:30 बजे का है। राष्ट्रीय सुरक्षा विश्लेषक नितिन गोखले के अनुसार पाकिस्तान ने दिल्ली की ओर एक हाई-स्पीड मिसाइल दागी, जिसे हरियाणा के सिरसा के ऊपर भारतीय वायु रक्षा ने रोक दिया। इसके बाद भारत ने अपना अंतिम और सबसे तीखा जवाबी हमला शुरू किया। भारतीय रक्षा मंत्रालय पहले ही बता चुका था कि उस रात पाकिस्तान ने भारतीय वायुसेना के ठिकानों, सेना के गोला-बारूद डिपो, हवाई अड्डों और सैन्य छावनियों को मिसाइलों, ड्रोन, रॉकेट और लंबी दूरी के हथियारों से निशाना बनाने की कोशिश की थी। सिरसा में गिरी मिसाइल का मलबा अगले दिन खेतों में दिखाई दिया था और उपलब्ध रिपोर्टों में इसे बराक-8 वायु रक्षा प्रणाली से रोके जाने की बात सामने आई थी। यहीं से भारतीय सेना और भारतीय सैन्य तकनीक की असली ताकत सामने आती है। पाकिस्तान ने जिस हमले से भारत को दबाव में लाने की कोशिश की, वही हमला उसके लिए पलटवार की शुरुआत बन गया। डॉक्यूमेंट्री के अनुसार इस चरण में भारतीय वायुसेना को पूरी जिम्मेदारी दी गई और ब्रह्मोस क्रूज मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया। इसके बाद पाकिस्तान के एयरफील्ड, रडार प्रतिष्ठान और कमांड-एंड-कंट्रोल केंद्र भारतीय हमलों की जद में आ गए। रफीकी, सुक्कुर, रहीम यार खान और नूर खान जैसे एयरबेस शुरुआती हमलों में निशाना बने, जबकि सरगोधा, भोलारी और जैकबाबाद समेत अन्य ठिकानों पर दूसरी लहर में कार्रवाई हुई। कुछ ही घंटों में पाकिस्तान के 11 सैन्य ठिकानों पर हमला किए जाने की बात डॉक्यूमेंट्री में सामने आती है। भारतीय वायुसेना के एयर मार्शल अवधेश भारती ने इस कार्रवाई की रणनीति को साफ शब्दों में बताते हुए कहा कि उद्देश्य सीमित और नियंत्रित रहते हुए पाकिस्तान को यह संदेश देना था कि भारत जब चाहे, वहां तक पहुंच सकता है और पाकिस्तान के पास उसका प्रभावी जवाब नहीं है। वरिष्ठ भारतीय अधिकारियों ने पाकिस्तानी एयरबेसों पर रनवे, हैंगर और खड़े विमानों को हुए नुकसान का भी उल्लेख किया। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ द्वारा मई 2025 के अंत में विभिन्न स्थानों, जिसमें रावलपिंडी एयरपोर्ट भी शामिल था, पर भारतीय मिसाइल और ब्रह्मोस हमलों से हुए नुकसान को स्वीकार करने का भी दस्तावेजी संदर्भ मौजूद है। और फिर आता है भारतीय हथियारों का वह अध्याय, जिसने पाकिस्तान के दावों की हवा निकालने का काम किया। एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने बताया कि भारत ने करीब 1,200 किलोमीटर लंबे मोर्चे पर और पाकिस्तान की सीमा के भीतर लगभग 200 किलोमीटर तक कार्रवाई की तथा भारतीय हथियार अपने निर्धारित लक्ष्यों तक पहुंच रहे थे। ब्रह्मोस-ए क्रूज मिसाइल इस कार्रवाई के केंद्र में थी। एपी सिंह के अनुसार इसकी अत्यधिक गति के कारण इसे रोक पाना कठिन होता है और इससे होने वाला नुकसान अपेक्षाकृत कहीं अधिक होता है। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि यह भारत का स्वदेशी हथियार है। यानी पाकिस्तान के लिए समस्या सिर्फ यह नहीं कि भारत ने हमला किया। समस्या यह है कि भारत ने अपनी बनाई मिसाइलों और अपनी सैन्य क्षमता के दम पर हमला किया और उसके बाद पाकिस्तान को बातचीत का रास्ता तलाशना पड़ा। डॉक्यूमेंट्री के अनुसार भारतीय हमलों के कुछ ही घंटों बाद पाकिस्तान की तरफ से नई दिल्ली से संपर्क साधने की कोशिशें शुरू हो गईं। पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से संपर्क किया और रुबियो ने भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर से बात की। भारत ने किसी तीसरे देश की मध्यस्थता स्वीकार करने की बजाय साफ कहा कि पाकिस्तान का डीजीएमओ निर्धारित सैन्य संचार चैनल के जरिए भारतीय डीजीएमओ से संपर्क करे। आखिरकार बातचीत हुई और पाकिस्तान की तरफ से संघर्षविराम की मांग सामने आई। भारतीय डीजीएमओ लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई के अनुसार पाकिस्तानी डीजीएमओ ने कहा कि “इतनी ब्रह्मोस मिसाइलें” लगने के बाद भारत को अब संतुष्ट हो जाना चाहिए और लड़ाई रोक देनी चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने भी बताया कि जब पाकिस्तान ने बार-बार कहा कि “अब बहुत हो चुका”, तब भारत ने संघर्षविराम के अनुरोध को स्वीकार किया। 10 मई शाम 5:30 बजे तक सैन्य कार्रवाई रोकने पर सहमति बनी। यही वह तथ्य है जो पाकिस्तान के मौजूदा नैरेटिव को सबसे ज्यादा असहज करता है। क्योंकि अब पाकिस्तान की तरफ से कहानी यह बनाई जा रही है कि उसने भारतीय आक्रमण को विफल कर दिया और भारत को नुकसान उठाना पड़ा। पाकिस्तानी सेना के मीडिया विंग आईएसपीआर ने डॉक्यूमेंट्री को “बॉलीवुड शैली” का प्रचार बताते हुए दावा किया है कि भारत सैन्य विफलता को सफलता के रूप में पेश कर रहा है। उसने विमान गिराने, भारतीय नुकसान और कथित पाकिस्तानी जवाबी कार्रवाई के दावे भी दोहराए। लेकिन सवाल सीधा है कि अगर पाकिस्तान वास्तव में निर्णायक स्थिति में था तो भारतीय हमलों के बाद उसके अधिकारियों को नई दिल्ली से संपर्क की इतनी जल्दबाजी क्यों थी? अगर भारतीय ब्रह्मोस और अन्य हथियारों ने कोई गंभीर प्रभाव नहीं डाला, तो पाकिस्तान के डीजीएमओ ने संघर्षविराम की मांग क्यों की? हम आपको बता दें कि पाकिस्तान के आईएसपीआर ने डॉक्यूमेंट्री पर “तथ्यों को रंगने”, “प्रचार” और “इतिहास को अपनी पसंद के रंगों में लिखने” जैसे आरोप लगाए हैं। लेकिन भारतीय पक्ष का जवाब इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। अजित डोभाल का संदेश बिल्कुल स्पष्ट है कि भारत की उदारता, संयम और सहनशीलता को कमजोरी समझने की भूल नहीं की जानी चाहिए। भारत जोखिम उठा सकता है और जरूरत पड़ने पर जोरदार प्रहार कर सकता है। देखा जाये तो यही ऑपरेशन सिंदूर का सबसे बड़ा संदेश है। भारत ने केवल जवाब नहीं दिया; उसने यह दिखाया कि वह कहां, कब और कितनी ताकत से जवाब देना है, यह खुद तय कर सकता है। बराक-8 ने आसमान में आती चुनौती को रोका, ब्रह्मोस ने पाकिस्तान के सैन्य ठिकानों तक पहुंचकर अपनी मारक क्षमता दिखाई और भारतीय सशस्त्र बलों ने पूरे अभियान को नियंत्रित तरीके से अंजाम दिया। पाकिस्तान चाहे इसे “प्रचार” कहे, “बॉलीवुड” कहे या अपनी सुविधा के मुताबिक “मार्का-ए-हक” नाम दे लेकिन डॉक्यूमेंट्री ने पहली बार भारतीय सैन्य नेतृत्व की जुबानी ऑपरेशन सिंदूर के कई अहम अध्याय दुनिया के सामने रख दिए हैं। और शायद यही सच पाकिस्तान को सबसे ज्यादा चुभ रहा है। भारत ने मैदान में जो ताकत दिखाई थी; उसकी शौर्यगाथा कैमरे के जरिए दुनिया के सामने है जबकि पाकिस्तान की आधी रात की बेचैनी दर्शा रही है कि उसे पड़ी मार कितनी गहरी थी।
सोनिया गांधी क्यों नहीं बनीं प्रधानमंत्री? अब खुद बताएंगी पूरी कहानी, किताब में अपनों को खोने से लेकर राजनीति तक के किस्से
तेजस्वी के मार्च को लेकर एनडीए के नेताओं ने कहा- 'करियर बचाओ मार्च'
तेजस्वी के मार्च को लेकर एनडीए के नेताओं ने कहा- 'करियर बचाओ मार्च'
पीएम केयर्स फंड में 8,452 करोड़ रुपये का बैलेंस, खर्च को लेकर कांग्रेस ने सरकार से पूछा सवाल
पीएम केयर्स फंड की ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार 31 मार्च 2025 तक 8,452.07 करोड़ रुपये का बैलेंस था। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने फंड के सीमित इस्तेमाल और पारदर्शिता पर सवाल उठाए।
Vande Mataram Row: क्या 'वंदे मातरम्' हिंदू राष्ट्र की वकालत करता है? | Kharge vs BJP

