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जन सुराज पार्टी के संस्थापक व मशहूर चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार नीरज कुमार को लगभग 19 हजार वोटों से तगड़ी शिकस्त देकर न केवल चुनाव जीता, बल्कि राजनीतिक पंडितों को भी चौंका दिया। प्रशांत किशोर की यह जीत केवल एक सीट की जीत नहीं मानी जा रही, बल्कि बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखी जा रही है। ऐसा इसलिए कि प्रशांत किशोर ने भाजपा के तीन दशक से अधिक पुराने गढ़ में अकल्पनीय जीत दर्ज की है और अपनी जन सुराज पार्टी को पहली बड़ी चुनावी सफलता दिलाई है। हालांकि, एक उपचुनाव के परिणाम के आधार पर पूरे राज्य के चुनाव के जनादेश का संकेत मान लेना एक बड़ी सियासी गलतफहमी होगी। फिर भी, उनकी यह जीत कई कारणों से महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि जन सुराज पार्टी के सुप्रीमो प्रशांत किशोर ने बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में भाजपा उम्मीदवार नीरज कुमार को 18,953 वोटों के भारी अंतर से हराया है। इसे भी पढ़ें: Core Vote Bank पाला बदलने पर यूँ ही मजबूर नहीं होता, ये बात BJP को समझ आ गयी होगी लिहाजा, बांकीपुर उपचुनाव का सबसे बड़ा संदेश यह है कि, बिहार की राजनीति अब केवल एनडीए बनाम महागठबंधन की दोध्रुवीय प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि जन सुराज ने स्वयं को एक संभावित तीसरे विकल्प के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। दूसरा बड़ा संदेश यह कि, जनसुराज पार्टी की नई जीत जहाँ भाजपा नीत एनडीए के लिए इस अकल्पनीय पराजय के बाद संगठन और रणनीति की समीक्षा का गहरा अवसर पैदा करता है। वाकई प्रशांत किशोर की जीत भाजपा के लिए स्पष्ट चेतावनी भी है, क्योंकि बांकीपुर जैसी भाजपा की पारंपरिक सीट का उसके हाथ से एक झटके में निकल जाने से यह साफ संकेत मिलता है कि चुनाव जीतने के लिए केवल संगठनात्मक मजबूती ही पर्याप्त नहीं है; बल्कि स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवार, सामाजिक समीकरण और मतदाता की अपेक्षाएं भी निर्णायक हो सकते हैं। तीसरा बड़ा संदेश यह कि, इस अकल्पनीय जीत से जन सुराज पार्टी को राजनीतिक वैधता मिली है। अब जन सुराज को केवल एक अभियान नहीं, बल्कि चुनाव जीतने में सक्षम राजनीतिक दल के रूप में देखा जाएगा। वाकई जिस चुनौती भरे सियासी परिदृश्य में प्रशांत किशोर ने अपनी जीत का परचम लहराया है और भाजपा के लंबे समय से सुरक्षित माने जाने वाले बांकीपुर के गढ़ में 30 साल बाद ही सही, पर सेंध लगा डाली है; वह नवोदित पार्टी के लिए एक अहम उपलब्धि है। इससे भाजपा का मनोबल टूटने के पुष्ट संकेत मिले हैं। चौथा बड़ा संदेश यह कि, जन सुराज पार्टी की पहली चुनावी जीत का सेहरा खुद पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर के सिर पर ही बंधा है और वो अपना पहला चुनाव लड़कर ही विधायक बनकर विधान सभा पहुंच चुके हैं, जिससे बिहार की राजनीति में नई हलचल पैदा करने के उनके मिशन को काफी बल मिला है। यही वजह है कि प्रशांत किशोर की नई भूमिका की चर्चा अब शुरू हो चुकी है, क्योंकि चुनावी रणनीतिकार से विधायक बनने के बाद उन्हें विधानसभा के भीतर अपनी राजनीति और वैकल्पिक नीतियों को सीधे प्रस्तुत करने का अवसर मिलेगा। पांचवां बड़ा संदेश यह कि, जहाँ तक 2026 में हुए बांकीपुर बिहार विधानसभा उप चुनाव के मनोवैज्ञानिक प्रभाव की बात है तो यह परिणाम जन सुराज पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाएगा और आगामी चुनावों में उम्मीदवारों व समर्थकों को आकर्षित कर सकता है। चूंकि वर्ष 2025 के विधानसभा चुनावों में शुरुआती धमाल मचाने के बाद प्रशांत किशोर की रणछोड़ रणनीतिकार और बुजदिल राजनेता वाली जो छवि बनी थी, अब उससे उन्हें मुक्ति मिली है और वह एक जुझारू राजनेता के रूप में उभरे हैं। छठा बड़ा संदेश यह कि, जन सुराज पार्टी और प्रशांत किशोर के इस सियासी उभार से एक नई युवा और शहरी राजनीति के संकेत मिले हैं, क्योंकि चुनाव प्रचार में रोजगार, शिक्षा और सुशासन जैसे मुद्दों पर विशेष जोर दिया गया। इस प्रकार यदि यह रुझान अन्य क्षेत्रों में भी दिखता है, तो इससे बिहार की चुनावी राजनीति में मुद्दा-आधारित प्रतिस्पर्धा और मजबूत हो सकती है। सातवां बड़ा संदेश यह कि, विपक्षी राजनीति भी अब एक नई करवट लेगी। उसे एक नया सकारात्मक विकल्प मिलेगा। बांकीपुर उपचुनाव में जिस तरह से राजद नीत महागठबंधन का वोट बैंक जनसुराज की ओर यकायक शिफ्ट हुआ, यह उसके समक्ष भी अपने जनाधार को मजबूत बनाए रखने की एक तगड़ी चुनौती समुपस्थित करता है। इससे राजद और महागठबंधन के सामने भी अब एक नई चुनौती खड़ी होगी, क्योंकि यदि जन सुराज पार्टी आगे भी विपक्षी मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करती है, तो इससे राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के लिए विपक्ष का निर्विवाद केंद्र बने रहना कठिन हो सकता है। ऐसा इसलिए भी कि बांकीपुर में राजद तीसरे स्थान पर रही। आठवां बड़ा संदेश यह कि, बिहार जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील प्रांत में भाजपा की यह पराजय उसके नेताओं की आपसी रस्साकशी का निराशाजनक परिणाम तो है ही, लेकिन उलजुलूल समीकरणों को साधने की उसकी राजनीतिक फितरत, और इसके चक्कर में बिगड़ैल बोलों पर बरती गई रणनीतिक खामोशी का यह साइड इफ़ेक्ट्स भी समझा जा सकता है। यह घटनाक्रम पुनः भाजपा को खुली नसीहत देता है कि यदि बनावटी 'ओबीसी राजनीति' के चक्कर में वह अपनी मूल राजनीतिक सवर्ण सियासी पूंजी भी न गंवा बैठे, जो कि कांग्रेस की ऐसी ही क्षुद्र सियासत से आजिज आकर भाजपा की ओर 1990 के दशक में शिफ्ट हुआ था, और अब विकल्प मिलते ही भाजपा की क्षुद्र सियासी चाल को भी नया राजनीतिक पाठ पढ़ाने पर आमादा दिखता है। नवां बड़ा संदेश यह कि, बिहार में सत्ता मिलते ही नवभाजपाइयों यानी राजद से भाजपा में आए नागमणि जैसे सामाजिक विषधर नेताओं ने राष्ट्रवाद और हिंदुत्व को धत्ता बताकर बैकवर्ड-फॉरवर्ड की जो लोहियावादी सियासत परवान चढ़ानी चाही, उसका साइड इफेक्ट्स भी बांकीपुर उपचुनाव में दिखा है। क्योंकि भरत तिवारी एनकाउंटर को जातिवादी नजरिए से देखना और वैसी ही गोलबंदी को परोक्ष शह देकर बैकफुट पर लौटने से सवर्णों के बीच गलत संदेश गया है। इसलिए भाजपा के ओबीसी-दलित नेताओं को धुर सवर्ण विरोधी मानसिकता से बचना होगा, अन्यथा प्रतिक्रिया वश सवर्ण यदि ओबीसी की राजद और दलितों की लोजपा रामविलास को सियासी शह दे देंगे तो भाजपा के ओबीसी-दलित नेता न घर के रहेंगे, न घाट के। दसवां बड़ा राजनीतिक संदेश और स्वाभाविक सवाल यह है कि भाजपा के 'पैराशूट' राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन द्वारा खाली की गई इस प्रतिष्ठित सीट पर बीजेपी चुनाव कैसे और क्यों हारी? क्या इसके पीछे भी उसकी कोई बड़ी रणनीति है या फिर अपने बड़े नेताओं के खिलाफ हुई भितरघात की वजह से भाजपा को यह शर्मनाक पराजय झेलनी पड़ी। चूंकि ऐसा माना जाता है कि कोई भी सत्ताधारी पार्टी प्रायः उपचुनाव नहीं हारती है, इसलिए यदि भाजपा हारी है तो इससे भी कई बड़े सवाल उपजते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या बांकीपुर में हुई चुनावी हार भाजपा उम्मीदवार नीरज कुमार की हार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, पूर्वमुख्यमंत्री नीतीश कुमार, और बड़बोले केंद्रीय मंत्री गण चिराग पासवान, जीतनराम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा की संयुक्त हार है, क्योंकि सबने एक दूसरे के साथ सियासी घात-प्रतिघात किया है, ताकि सूबाई राजनीति में गठबंधन साथियों की प्रासंगिकता बनी रहे। इस नजरिए से यह एनडीए के उन सूबाई सहयोगियों की भी हार है जो भाजपा के आधार वोट बैंक से अपने चुनाव दर चुनाव तो जीतते हैं, और फिर जीत के बाद मंत्री बनकर भी भाजपा के ही कोर सवर्ण वोटर्स को चिढ़ाने वाली (राजद/कॉंग्रेस वाली) भड़काऊ टिप्पणी शुरू कर देते हैं, जिस पर भाजपा की खामोशी उसकी ओबीसी-दलित परस्त राजनीति के समक्ष घुटने टेकते प्रतीत होती है। इससे उसका प्रतिबद्ध सवर्ण कैडर इधर उधर भागने के विकल्प ढूंढता है और वह मिलते ही भाजपा को उसकी असली सियासी औकात समझा देता है। बहरहाल, हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि महज एक उपचुनाव के परिणाम से आप पूरे बिहार विधानसभा चुनाव 2030 का पूर्वानुमान नहीं लगा सकते; बल्कि इसके व्यापक निष्कर्ष के लिए आगे के संसदीय आम चुनाव 2029 के चुनावी रुझानों को भी देखना समझना दिलचस्प होगा। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
बांकीपुर का परिणाम बदलते जनमत का संकेत, सिद्धिविनायक मामले की जांच हो: महेश तापसे
बांकीपुर का परिणाम बदलते जनमत का संकेत, सिद्धिविनायक मामले की जांच हो: महेश तापसे
जनता का विश्वास खो चुकी है भाजपा, दतिया की जीत बदलाव का संकेत: उमंग सिंघार
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देश में घटती जनसंख्या और बांझपन बड़ी चुनौती, राष्ट्रीय विमर्श जरूरी: सुधाकर सिंह
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कलकत्ता हाई कोर्ट ने बंगाल के सरकारी अस्पतालों में मरीजों के खाने के लिए ज्यादा बजट आवंटन पर लगी रोक हटाई
भगोड़ों पर मोदी सरकार का बड़ा एक्शन! 7 साल में 275 अपराधी भारत लाए गए, अमित शाह ने किया बड़ा खुलासा
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एमएसएमई क्षेत्र को मिला बढ़ावा
नई दिल्ली, मंगलवार को जारी एक आधिकारिक बयान के अनुसार, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय (एमएसएमई) की सस्टेनेबल जीरो डिफेक्ट जीरो इफेक्ट (जेडईडी) सर्टिफिकेशन योजना के तहत अब तक करीब 9.49 लाख एमएसएमई पंजीकृत हो चुके हैं।
लगातार तेजी के बाद फिर गिरा बाजार
मुंबई, वैश्विक बाजारों के मिले-जुले संकेतों के चलते हफ्ते के दूसरे कारोबारी दिन मंगलवार को भारतीय शेयर बाजार गिरावट के साथ लाल निशान में बंद हुआ।
गुजरात : सरकार ने आदिवासी मरीजों के लिए अंग प्रत्यारोपण और रोबोटिक सर्जरी से जुड़ा लिया अहम फैसला
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मुंबई, भारतीय शेयर बाजार के लिए बाजार नियामक सेबी द्वारा लागू किया गया नया प्राइस डिस्कवरी सिस्टम सीएएस (क्लोजिंग ऑक्शन सेशन) चुनौती बन गया है।
बिहार को बेहतर नेतृत्व चाहिए, बांकीपुर का जनादेश यही संदेश देता है: प्रशांत किशोर
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राजस्थान कांग्रेस में फिर छिड़ी हाईकमान की बहस, धारीवाल के बयान से गहलोत-पायलट में गुटबाजी आई सामने
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उदयनिधि की गिरफ्तारी की डीएमके यूथ विंग ने की आलोचना, सरकार पर लगाया विपक्ष की आवाज दबाने का आरोप
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मध्य प्रदेश: दतिया उपचुनाव में मिली हार की होगी समीक्षा, भाजपा ने बनाई जांच समिति
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गोदरेज प्रॉपर्टीज में 85 प्रतिशत की बड़ी गिरावट
नई दिल्ली, देश की प्रमुख रियल एस्टेट कंपनी गोदरेज प्रॉपर्टीज ने मंगलवार को वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) के नतीजे जारी किए।
बांकीपुर सीट हारने के बाद गिरिराज सिंह बोले, हो सकता है कि हमसे कुछ गलतियां हुई हों
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हंगामे और विरोध के बीच लोकसभा से पारित हुआ विनियोग विधेयक
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'जुबान बिगड़ी हुई थी उदयनिधि की'... तो CM विजय ने घर से ही उठवा लिया, अब मिला शेर को सवा शेर
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कांग्रेस का आरोप, जवाब से बच रही सरकार इसलिए नहीं चल पा रही संसद
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एनडीए सांसदों का केजरीवाल पर तंज, कहा-'केजरीवाल ई20 फ्यूल पॉलिसी पर कर रहे राजनीति'
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अभिनेत्री तृषा को लेकर उदयनिधि स्टालिन की टिप्पणी पर घमासान, वाइको, सीपीआई (एम) और भाजपा ने की निंदा
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बेंगलुरु को डीप-टेक्नोलॉजी का ग्लोबल हब बनाएगा कर्नाटक: डीके शिवकुमार
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पूर्व राज्यपाल डॉ. डीवाई पाटिल के निधन पर पीएम मोदी समेत कई नेताओं ने जताया शोक
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हिरासत मामले में उदयनिधि स्टालिन को हाईकोर्ट से बड़ी राहत, पुलिस को पूछताछ के बाद रिहाई के निर्देश
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राम मंदिर प्रकरण पर विपक्ष फैला रहा भ्रम, एसआईटी जांच में साधु-संतों की भूमिका नहीं मिली : मुख्यमंत्री योगी
जम्मू-कश्मीर में फाइनेंशियल फ्रॉड बढ़े, 2025-26 के दौरान 193.49 करोड़ रुपये के स्कैम रिकॉर्ड हुए
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लगातार हंगामे के कारण लोकसभा की कार्यवाही बुधवार सुबह 11 बजे तक स्थगित
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मदरसों में बेहतर शिक्षा मिले, आतंकी गतिविधियां न हों : एनडीए नेता
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आईआईएमयूएन का लक्ष्य युवाओं को 'भारत' और वैश्विक सोच से जोड़ना: ऋषभ शाह
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सरकार चाहती है लोग पांच किलो राशन के लिए कतारों में खड़े रहें और इससे ज्यादा सोच न सकें: सपा
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एनडीए अपनी कमियों का पता लगाने के लिए करेगा आत्म-मूल्यांकनः शाइना एनसी
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राम मंदिर चढ़ावा चोरी और जमीन सौदों पर सपा सांसदों का प्रदर्शन, संसद में चर्चा की मांग
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डीएलएफ का रेवेन्यू 53 प्रतिशत में गिरावट
मुंबई, देश की प्रमुख रियल एस्टेट कंपनी डीएलएफ लिमिटेड को वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में राजस्व (रेवेन्यू) के मोर्चे पर बड़ा झटका लगा है।
बिहार में जिस सीट पर प्रशांत किशोर की जीत हुई है, यह वो सीट है जिसको लेकर दबी जुबान में अक्सर बीजेपी वाले कहते थे कि यहां कुत्ता बिल्ली भी चुनाव लड़ा देंगे तो वो जीत जाएगा। और वो गलत नहीं कहते थे। हां, क्योंकि यह बांकीपुर था। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का अपना घर जिस सीट से वह एक दो बार नहीं लगातार पांच बार जीते थे और यहीं से जीतकर वह दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी के अध्यक्ष बन गए। 15 साल से यहां कमल का बटन लगातार दब रहा था और नतीजा पहले से ही लिखा था और ताना उस आदमी को मारा जा रहा था जिसने 243 सीटों पर लड़कर शून्य जीता था। जिसको लेकर बिहार में मीम भी वायरल हुए थे। प्रशांत तब खुलकर कहते थे कि मैं मरा नहीं हूं अभी अभी जिंदा हूं। अभी मैं मरा नहीं हूं। अभी नहीं मरा हूं। जब मर जाऊंगा तो फिर लिखना अभी मरा नहीं हूं। अब इस लाइन का मतलब समझ में आ रहा है। पटना के गिनती वाले हॉल में राउंड द राउंड वही मजाक भारी पड़ता गया जैसे पंचायत में आपको याद होगा। विधायक जी हार गए थे और सामने वाली पार्टी जीत गई थी। प्रशांत किशोर के समर्थक भी वैसे ही डांस कर रहे हैं। कह रहे हैं कि आज सावन के सोमवार के दिन बाबा का आशीर्वाद मिल गया। पीके ने केवल एक सीट का चुनाव नहीं जीता है। बांकीपुर बीजेपी की प्रतिष्ठा से जुड़ी सी और 1995 से ये सीट बीजेपी के पास रही थी। पहले पटना वेस्ट और फिर 2008 के परिसीमन के बाद बांकीपुर से पांच बार नितिन और उससे पहले उनके पिता नवीन प्रसाद सिन्हा तीन बार इस सीट से विधायक रहे। प्रशांत किशोर ने इस सिलसिले को तोड़ दिया है। बिहार के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर की जीत ने देश की राजनीति में एक नए ट्रेंड को रेखांकित किया है। भले ही प्रशांत किशोर, चंद्रशेखर आजाद (आजाद समाज पार्टी), असदुद्दीन ओवैसी (AIMIM) और जयराम महतो (JLKM) जैसे नेता अपनी-अपनी पार्टियों के अकेले सांसद या विधायक हों, लेकिन संसद और विधानसभाओं से लेकर जनता के बीच इनकी आवाज और राजनीतिक प्रभाव किसी बड़ी पार्टी से कम नहीं है। ऐसे में आइए जानते हैं कि कैसे एकल राजनीतिक चेहरे अपने मुद्दों, सोशल मीडिया पकड़ और बेबाक नेतृत्व के दम पर पारंपरिक बहुदलीय व्यवस्था के बीच अपनी एक मजबूत और असरदार पहचान बना रहे हैं। इसे भी पढ़ें: उपचुनाव नतीजों पर Priyanka Gandhi बोलीं, भाजपा से ऊब चुके हैं लोग प्यादे से वजीर को मात देने वाला दांव हुआ फेल पटना का दिल है बांकीपुर गांधी मैदान से सटा इलाका पढ़े लिखे लोग दुकानदार नौकरी पेशा वो इलाका जहां शाम को चाय की दुकान पर राजनीति उबलती है और वोट हमेशा एक तरफ गिरता है। 2010 से यहां एक ही चेहरा जीतता है नितिन नवीन सफेद कुर्ता माथे तिलक पटना की गलियों में जाना पहचाना आदमी और उससे पहले उनके पिताजी यही जीतते थे यानी यह सीट पार्टी के लिए सीट थोड़ी थी घर की बैठक थी कि यहां यहां तो हम जीते यहां कौन सा टेंशन है? फिर हुआ यह कि नितिन नवीन की किस्मत अचानक से उछाल मार दी गई। पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया। राज्यसभा चले गए और फिर पीछे ये सीट खाली। भाजपा तो ये मान के बैठी थी कि भाई घर है हमारा। 15 साल का रिकॉर्ड है। जीत पक्की है। बीजेपी ने प्रशांत किशोर के विरुद्ध एक मंडल कार्यकर्ता नीरज कुमार सिन्हा को उम्मीदवार बनाया। बीजेपी के रणनीतिकार बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पंक्ति को अर्थ देने की कोशिश की- चौराहे पर लुटता चीर, प्यादे से पिट गया वजीर...! वर्ष 2025 विधानसभा के चुनावी जंग में बुरी तरह पिटे प्रशांत किशोर के लिए बांकीपुर किसी कोरामीन से कम नहीं। बीजेपी की रणनीति थी कि एक साधारण कार्यकर्ता से प्रशांत किशोर को पराजित कर उनकी आखिरी उम्मीद को ध्वस्त किया जाए। इसे भी पढ़ें: BJP अध्यक्ष नितिन नवीन ने Bankipur और Datia उपचुनाव नतीजों पर कही यह बात चंद्रशेखर आज़ाद किशोर से पहले, भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद 2024 के लोकसभा चुनावों में अपनी पार्टी 'आज़ाद समाज पार्टी (कांशीराम)' के टिकट पर उत्तर प्रदेश की नगीना सीट से सांसद चुने गए थे। उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार को 1.51 लाख वोटों से हराया था। 38 वर्षीय आज़ाद, जो दलितों के एक प्रमुख नेता हैं, ने 2022 में गोरखपुर अर्बन सीट से यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ अपना पहला चुनाव लड़ा था, लेकिन वे हार गए और उन्हें सिर्फ़ 3% वोट मिले। सांसद चुने जाने के बाद, आज़ाद संसद के अंदर और बाहर दलितों और मुसलमानों की एक बड़ी आवाज़ बनकर उभरे हैं। उन्हें लोकसभा में अलग-अलग मुद्दों पर बहस में हिस्सा लेने का समय मिलता है, साथ ही संसद के बाहर अपने आंदोलन के दौरान उन्हें सांसद का प्रोटोकॉल भी मिलता है। मध्य प्रदेश के दतिया विधानसभा उपचुनाव में उनकी पार्टी के उम्मीदवार दामोदर यादव तीसरे स्थान पर रहे। सोमवार को घोषित नतीजों में कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने बीजेपी के आशुतोष तिवारी को 6,016 वोटों से हराया, जबकि दामोदर को 22,527 वोट मिले। इसे भी पढ़ें: Prashant Kishor का BJP पर तंज: 30 साल का किला सिर्फ 30 दिनों में ढहा जयराम महतो जयराम महतो, जिन्हें 'टाइगर' के नाम से भी जाना जाता है, झारखंड विधानसभा में अपनी पार्टी 'झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा' (JLKM) के अकेले विधायक हैं। उन्होंने 2024 का लोकसभा चुनाव गिरिडीह से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर लड़ा था और उन्हें 3.47 लाख वोट मिले थे। इसके बाद, नवंबर 2024 के विधानसभा चुनावों से पहले चुनाव आयोग ने JLKM को मान्यता दी, जिसमें वे डुर्मी सीट से चुने गए। उन्होंने बेरमो से भी चुनाव लड़ा था, लेकिन वहां वे दूसरे स्थान पर रहे। 31 साल के महतो OBC कुडमी समुदाय के उभरते हुए नेता हैं और झारखंड के युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हैं। सोशल मीडिया पर उनके वीडियो को बहुत ज़्यादा लोग देखते हैं। इन वीडियो में वे राजनीतिक जागरूकता, राजनीतिक नेताओं द्वारा जमा की गई संपत्ति, लोगों की गरीबी और इस बात पर बात करते हैं कि कैसे झारखंड में बाहरी लोगों को सरकारी नौकरियां मिलती हैं। अपने चुनावी नामांकन हलफनामे में उन्होंने YouTube को अपनी आय का स्रोत बताया था। महतो, आज़ाद और किशोर में एक आम बात यह है कि वे अपनी-अपनी पार्टियों के युवा संस्थापक हैं और उन्होंने बदलाव और न्याय तथा नई राजनीति के अपने एजेंडे से लोगों के बीच अपनी पहचान बनाई है। इसे भी पढ़ें: Prashant Kishor ने Bankipur में BJP के 35 साल के गढ़ को ध्वस्त किया, Jan Suraaj की ऐतिहासिक जीत असदुद्दीन ओवैसी AIMIM के प्रमुख और हैदराबाद से पांच बार सांसद रहे 57 वर्षीय असदुद्दीन ओवैसी लोकसभा में अपनी पार्टी के अकेले सदस्य हैं। देश में मुसलमानों की एक अहम आवाज़ के तौर पर उभरने के कारण उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। वे संसद और दूसरे सार्वजनिक मंचों पर बड़े राष्ट्रीय मुद्दे उठाने के लिए जाने जाते हैं, जिनमें मुस्लिम समुदाय से जुड़े मुद्दे भी शामिल हैं। हालांकि AIMIM एक पुरानी पार्टी है, लेकिन ओवैसी ने इसके विस्तार की अगुवाई की है। अब तेलंगाना, बिहार और महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में पार्टी के कई विधायक और पार्षद हैं।
रूस के प्रमुख बैंक स्बरबैंक ने किया शानदार प्रदर्शन
नई दिल्ली, दुनिया की 500 सबसे बड़ी कंपनियों की प्रतिष्ठित फॉर्च्यून ग्लोबल 500 रैंकिंग में रूस के प्रमुख बैंक स्बरबैंक ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 64वां स्थान हासिल किया है।
भारत ने चीन से सटी अपनी सबसे संवेदनशील सीमाओं में से एक पर सामरिक बढ़त हासिल करने की दिशा में एक और बड़ा कदम बढ़ाया है। केंद्र सरकार ने उत्तर बंगाल में खुनिया मोड़ (चालसा) से जलढाका तक 17 किलोमीटर लंबी नई रेलवे लाइन को मंजूरी दी है, जिस पर करीब 272 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। पहली नजर में यह परियोजना उत्तर बंगाल के डुआर्स क्षेत्र में पर्यटन और स्थानीय संपर्क बढ़ाने की पहल लग सकती है, लेकिन इसके पीछे कहीं अधिक गहरे सामरिक और रणनीतिक निहितार्थ छिपे हैं। यह रेलवे लाइन भारत-चीन-भूटान त्रि-जंक्शन के करीब स्थित उस इलाके तक पहुंच मजबूत करेगी, जो डोकलाम विवाद के कारण वर्षों से राष्ट्रीय सुरक्षा का केंद्र बना हुआ है। रेल मंत्रालय से स्वीकृत इस परियोजना के तहत प्रस्तावित रेलवे लाइन चालसा के निकट खुनिया मोड़ से शुरू होकर जलपाईगुड़ी और कालिम्पोंग के वन क्षेत्रों से गुजरते हुए जलढाका तक पहुंचेगी। रेलवे और पश्चिम बंगाल वन विभाग मानसून के बाद इस परियोजना का संयुक्त सर्वेक्षण शुरू करेंगे। अधिकारियों के अनुसार, इसका उद्देश्य सीमावर्ती और दुर्गम इलाकों तक बेहतर पहुंच, पर्यटन को बढ़ावा देना तथा सामरिक बुनियादी ढांचे को मजबूत करना है। इसे भी पढ़ें: India-China Relation क्या वाकई सुधर रहे हैं? चीन में रह रहे भारतीयों ने चौंकाने वाला सच उजागर किया है! दरअसल, जलढाका नदी का महत्व केवल भौगोलिक नहीं बल्कि रणनीतिक भी है। यह नदी सिक्किम के कुपुप (बितांग) झील से निकलती है, जो जेलेप ला दर्रे के निकट और डोकलाम त्रि-जंक्शन के बेहद करीब स्थित है। यही कारण है कि नदी के समानांतर रेलवे लाइन विकसित करने की योजना को मात्र एक परिवहन परियोजना नहीं, बल्कि सीमा क्षेत्रों में भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक तैयारी के रूप में देखा जा रहा है। इस परियोजना का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि भारतीय रेलवे पहले से ही चालसा से सीमावर्ती क्षेत्रों की ओर लगभग 200 किलोमीटर लंबी एक रणनीतिक रेलवे लाइन की संभावनाओं पर काम कर रहा है। नई 17 किलोमीटर की लाइन उसी व्यापक रणनीतिक दृष्टि का पहला महत्वपूर्ण चरण मानी जा रही है। यदि भविष्य में यह नेटवर्क आगे बढ़ता है तो भारत की सैन्य और नागरिक दोनों प्रकार की आवाजाही सीमा के बेहद करीब तक पहले की तुलना में कहीं अधिक तेज, सुरक्षित और प्रभावी हो सकेगी। देखा जाये तो डोकलाम का सामरिक महत्व किसी परिचय का मोहताज नहीं है। वर्ष 2017 में यहीं 73 दिनों तक भारत और चीन की सेनाएं आमने-सामने खड़ी रहीं थीं। चीन भूटान के दावे वाले क्षेत्र में सड़क निर्माण कर रहा था, जिसे रोकने के लिए भारतीय सेना ने हस्तक्षेप किया था। भारत और भूटान के बीच सुरक्षा सहयोग के तहत नई दिल्ली ने स्पष्ट किया था कि डोकलाम में यथास्थिति बदलने की किसी भी कोशिश का असर भारत की सुरक्षा, विशेषकर सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर पड़ेगा। अंततः चीन को पीछे हटना पड़ा, लेकिन उसके बाद से उपग्रह तस्वीरों और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में यह सामने आता रहा है कि चीन ने डोकलाम और उसके आसपास के क्षेत्रों में सड़कें, सैन्य ढांचे, गांव और अन्य आधारभूत संरचनाएं लगातार विकसित की हैं। ऐसे समय में भारत द्वारा सीमा के समीप रेलवे अवसंरचना का विस्तार स्पष्ट संकेत देता है कि नई दिल्ली अब केवल सैन्य तैनाती के भरोसे नहीं, बल्कि मजबूत लॉजिस्टिक नेटवर्क के जरिए भी सामरिक संतुलन स्थापित करना चाहती है। किसी भी संभावित संकट की स्थिति में सैनिकों, हथियारों, रसद और राहत सामग्री को तेजी से सीमा तक पहुंचाने में रेलवे की भूमिका सड़क मार्ग की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी होती है। यही कारण है कि आधुनिक युद्ध और सीमा सुरक्षा में रेलवे को रणनीतिक शक्ति का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। साथ ही इस परियोजना को सिक्किम में निर्माणाधीन शिवोक-रंगपो रेलवे लाइन के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। केंद्र सरकार की योजना भविष्य में इस लाइन को नाथू ला दर्रे तक विस्तारित करने की है। यदि ऐसा होता है तो उत्तर-पूर्व और पूर्वी हिमालयी सीमाओं पर चीन के सामने भारत का यह दूसरा बड़ा रणनीतिक रेल कॉरिडोर होगा। इससे भारत की पूर्वी सीमा पर सैन्य तैयारियों और आपूर्ति श्रृंखला को नई मजबूती मिलेगी। बहरहाल, यह स्पष्ट है कि जलढाका रेलवे परियोजना सिर्फ 17 किलोमीटर की रेल लाइन नहीं है। यह उत्तर बंगाल में विकास, पर्यटन और सीमावर्ती क्षेत्रों के आर्थिक सशक्तिकरण का माध्यम तो बनेगी ही, साथ ही चीन की लगातार बढ़ती सीमा अवसंरचना के जवाब में भारत की बदलती रणनीतिक सोच का भी सशक्त प्रतीक साबित होगी। संदेश स्पष्ट है कि भारत अब सीमा पर केवल निगरानी नहीं, बल्कि मजबूत बुनियादी ढांचे के जरिए दीर्घकालिक सामरिक बढ़त सुनिश्चित करने की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ा चुका है। -नीरज कुमार दुबे
यूपी विधानसभा में 59019 करोड़ रुपये का अनुपूरक बजट पेश, ऊर्जा-उद्योग और स्वास्थ्य पर बड़ा दांव
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जनता के मुद्दों पर दतिया ने लगाई मुहर : जीतू पटवारी
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बस्ती की घटना को लेकर ओम प्रकाश राजभर का अखिलेश यादव पर तीखा हमला
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एनडीए की 'मंगल मिलन' बैठक में विकास, रोजगार और संसद की कार्यवाही पर जोर, विपक्ष पर लगाए बाधा डालने के आरोप
Core Vote Bank पाला बदलने पर यूँ ही मजबूर नहीं होता, ये बात BJP को समझ आ गयी होगी
राजनीति में कोई भी दल जब किसी क्षेत्र को अपना अभेद्य किला और वहां के मतदाताओं को अपना स्थायी वोट बैंक मानकर निश्चिंत हो जाता है, तभी उसकी पराजय की पटकथा लिखनी शुरू हो जाती है। लोकतंत्र में जनता किसी की बंधक नहीं होती। वह सत्ता देती भी है और उसी सत्ता के अहंकार को ध्वस्त भी करती है। बिहार के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव ने इसी लोकतांत्रिक सच को एक बार फिर स्थापित कर दिया है। तीन दशक से अधिक समय तक भाजपा के सबसे सुरक्षित गढ़ माने जाने वाले बांकीपुर में जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर की जीत मात्र एक उम्मीदवार की जीत नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक मानसिकता की हार है जो यह मान बैठी थी कि कुछ सीटें और कुछ वोट हमेशा के लिए उसके नाम लिखे जा चुके हैं। बांकीपुर का जनादेश इसलिए अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि यह किसी साधारण विधानसभा क्षेत्र का चुनाव नहीं था। यह वही इलाका है जहां मुख्यमंत्री आवास, राजभवन, विधानसभा, सचिवालय और सत्ता के तमाम केंद्र मौजूद हैं। भाजपा का प्रदेश मुख्यालय भी यहीं है। लंबे समय से यह सीट भाजपा के राजनीतिक वर्चस्व का प्रतीक रही है। ऐसे में यहां मिली हार सिर्फ सीट गंवाने की घटना नहीं, बल्कि सत्ता के आत्मविश्वास पर जनता का करारा प्रहार है। इसे भी पढ़ें: Prashant Kishor का BJP पर तंज: 30 साल का किला सिर्फ 30 दिनों में ढहा सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस परिणाम के बाद भाजपा के भीतर भी आत्ममंथन शुरू हो गया है। पार्टी के कई नेताओं का मानना है कि इस चुनाव ने सबसे बड़ा संदेश यह दिया है कि कोर वोट बैंक भी अब स्थायी नहीं रहा। जिस मतदाता को वर्षों तक पार्टी का अटूट समर्थक माना जाता था, उसने इस बार अपना रुख बदलकर बता दिया कि लोकतंत्र में समर्थन किसी दल की जागीर नहीं होता। मतदाता अब काम, व्यवहार और नेतृत्व की शैली के आधार पर फैसला करेगा, न कि केवल पुराने राजनीतिक रिश्तों के आधार पर। यह भी स्वीकार किया जा रहा है कि सत्ता का आत्मविश्वास कई बार अहंकार में बदल जाता है और यही चुनावी हार की सबसे बड़ी वजह बनता है। चुनाव प्रचार के दौरान जिस तरह कुछ नेताओं के बयान सामने आए, उन्होंने भी यह संदेश दिया कि पार्टी अपने गढ़ को लेकर अत्यधिक आश्वस्त थी। लेकिन जनता ने मतदान के जरिए यह बता दिया कि किसी भी मतदाता को हल्के में लेने की कीमत राजनीतिक दलों को चुकानी पड़ सकती है। इस हार के पीछे केवल विपक्ष की रणनीति नहीं, बल्कि भाजपा के भीतर की बेचैनी भी चर्चा का विषय बनी। उम्मीदवार चयन से लेकर संगठनात्मक बदलाव तक कई फैसलों को लेकर असंतोष की बातें सामने आईं। राज्य की सरकार में नेतृत्व परिवर्तन के बाद पार्टी के अंदर जिस तरह की खींचतान दिखाई दी, उसका असर भी चुनावी परिणामों में झलकता नजर आया। यह संदेश भी साफ है कि मजबूत संगठन होने का दावा तभी तक प्रभावी है, जब तक कार्यकर्ता और स्थानीय नेतृत्व स्वयं को सम्मानित महसूस करे। मध्य प्रदेश के दतिया उपचुनाव ने भी लगभग यही कहानी दोहराई। भाजपा के लिए यह हार केवल कांग्रेस की जीत नहीं थी, बल्कि उसके सबसे प्रभावशाली नेताओं में रहे राज्य के पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा के राजनीतिक प्रभाव पर भी सवाल खड़े कर गई। स्थानीय स्तर पर लंबे समय से चली आ रही गुटबाजी, टिकट वितरण को लेकर नाराजगी और मिश्रा समर्थक संगठनात्मक ढांचे का पूरी तरह सक्रिय न हो पाना भाजपा पर भारी पड़ा। दूसरी ओर कांग्रेस ने स्थानीय असंतोष, बेरोजगारी, पलायन, खाद की कमी और कथित प्रशासनिक दबंगई जैसे मुद्दों को चुनाव का केंद्र बनाया। पार्टी ने चुनाव को सरकार के पक्ष या विपक्ष की लड़ाई बनाने के बजाय स्थानीय जनभावनाओं से जोड़ा और उसी का लाभ उठाया। साफ है कि मतदाताओं ने यहां भी यह संकेत दिया कि किसी एक नेता की राजनीतिक पकड़ या पुराने प्रभाव के भरोसे चुनाव नहीं जीते जा सकते। वहीं बांकीपुर का संदेश केवल भाजपा तक सीमित नहीं है। यह उतनी ही बड़ी चेतावनी राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (यू) और देश के अन्य राजनीतिक दलों के लिए भी है। वर्षों से बिहार की राजनीति जातीय समीकरणों और परंपरागत वोट बैंकों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन इस उपचुनाव ने संकेत दिया है कि मतदाता अब नए विकल्पों को भी मौका देने के लिए तैयार है। यदि कोई दल यह मानकर चल रहा है कि कोई विशेष जाति, वर्ग या क्षेत्र हमेशा उसके साथ रहेगा, तो बांकीपुर का परिणाम उस भ्रम को तोड़ने के लिए पर्याप्त है। बांकीपुर में प्रशांत किशोर की जीत का महत्व भी केवल एक सीट जीतने तक सीमित नहीं है। इस परिणाम ने यह संकेत दिया है कि बिहार की राजनीति में वर्षों से हावी जातीय ध्रुवीकरण के बीच अब विकास, शिक्षा, रोजगार, भ्रष्टाचार और पलायन जैसे मुद्दों के लिए भी राजनीतिक जगह बन रही है। भाजपा के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले शहरी गढ़ में जीत हासिल कर प्रशांत किशोर ने यह साबित किया कि यदि कोई राजनीतिक दल पारंपरिक वोट बैंक की राजनीति से आगे बढ़कर जनता के वास्तविक सरोकारों को लगातार उठाता है, तो वह स्थापित दलों के लिए चुनौती बन सकता है। यह जीत भाजपा के लिए सत्ता के अहंकार के खिलाफ चेतावनी है तो राजद के लिए भी संदेश है कि भाजपा विरोधी राजनीति पर उसका एकाधिकार अब निर्विवाद नहीं रहा। यानी यह परिणाम बिहार की राजनीति में एक नए राजनीतिक विकल्प के उभरने का संकेत भी देता है। यही कारण है कि प्रशांत किशोर की जीत को केवल एक चुनावी सफलता के रूप में नहीं देखा जा रहा। इसे बिहार की राजनीति में एक नए राजनीतिक हस्तक्षेप के रूप में भी देखा जा रहा है। पिछली बार उन्हें चुनावी सफलता भले नहीं मिली थी, लेकिन उन्होंने शिक्षा, रोजगार, भ्रष्टाचार और पलायन जैसे मुद्दों को राजनीतिक बहस के केंद्र में लाने का प्रयास किया था। अब बांकीपुर की जीत ने उन मुद्दों को राजनीतिक वैधता भी प्रदान कर दी है। इस जीत का सबसे बड़ा प्रतीकात्मक महत्व यही है कि यह भाजपा के सबसे मजबूत माने जाने वाले शहरी गढ़ में हासिल हुई। इससे यह संकेत भी मिला कि यदि कोई तीसरी राजनीतिक ताकत जनता के बीच विश्वसनीय विकल्प बनती है, तो बिहार की परंपरागत द्विध्रुवीय राजनीति का समीकरण बदल सकता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि बिहार इस समय नेतृत्व परिवर्तन और राजनीतिक पुनर्संरचना के दौर से गुजर रहा है। एक ओर पुराने राजनीतिक चेहरे अपने प्रभाव को बनाए रखने की कोशिश में हैं, वहीं दूसरी ओर नई राजनीति की मांग भी लगातार मजबूत होती दिखाई दे रही है। ऐसे समय में बांकीपुर का परिणाम आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों के लिए एक मनोवैज्ञानिक संकेत बन गया है। बहरहाल, भारतीय राजनीति लंबे समय तक कोर वोट बैंक की अवधारणा पर टिकी रही है। हर दल अपने कुछ सामाजिक समूहों और क्षेत्रों को अपनी स्थायी राजनीतिक पूंजी मानता रहा। लेकिन बदलते समय का मतदाता अब खुद को किसी दल की स्थायी संपत्ति मानने को तैयार नहीं है। वह सत्ता बदलने से भी नहीं हिचकता और नए चेहरे को मौका देने से भी नहीं डरता। बांकीपुर का जनादेश इसी बदलती राजनीतिक चेतना का सबसे सशक्त उदाहरण है। यह परिणाम बताता है कि लोकतंत्र में जनता अंतिम निर्णायक है। वह किसी भी दल को जितना ऊपर उठा सकती है, उतनी ही तेजी से उसे जमीन पर भी ला सकती है। एक सच्चाई सभी को समझनी होगी कि लोकतंत्र में कोई किला हमेशा के लिए अभेद्य नहीं होता और कोई वोट बैंक हमेशा के लिए किसी का नहीं होता। -नीरज कुमार दुबे
डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य बोले-मदरसे से शिक्षा प्राप्त करने वालों की सोच आतंकवादी जैसी
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सोने और चांदी में तेजी के साथ कारोबार
मुंबई, सोने और चांदी दोनों कीमती धातुओं में करीब एक प्रतिशत की बढ़त देखी गई।
बांकीपुर उपचुनाव में भाजपा की हार पर विपक्ष का तंज, कहा-'भाजपा जनता को हल्के में न ले'
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कर्नाटक कैबिनेट में नागेंद्र की वापसी पर भाजपा ने राहुल गांधी पर कसा तंज, कहा-दागदार नेता को दिया इनाम
बांकीपुर उपचुनाव में भाजपा की हार पर सपा का तंज, कहा- 2027 में यूपी में भी होगा बदलाव
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राज्यसभा में हंगामा जारी, फिर नहीं चल सका प्रश्नकाल
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शिक्षाविद और पूर्व राज्यपाल डॉ. डीवाई पाटिल का निधन, एकनाथ शिंदे और सुप्रिया सुले ने जताया शोक
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पेपर लीक पर हरियाणा के सीएम सैनी ने विपक्ष को घेरा, कांग्रेस को पुरानी व्यवस्थाओं की याद दिलाई
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मुख्यमंत्री विजय और तृषा के खिलाफ टिप्पणी करने पर उदयनिधि स्टालिन को हिरासत में लिया गया
मुख्यमंत्री विजय और तृषा के खिलाफ टिप्पणी करने पर उदयनिधि स्टालिन को हिरासत में लिया गया
टीवीके के राष्ट्रीय प्रवक्ता ने एनसीडब्ल्यू से की शिकायत, तंजावुर में नेता प्रतिपक्ष के बयान पर आपत्ति
असम के सीएम ने बाढ़ प्रभावित इलाकों का किया दौरा, प्रभावित लोगों को दिया पुनर्वास का भरोसा
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केरल : 'बस के पैसे नहीं, पर बच्चा प्राइवेट स्कूल में पढ़ता है': मंत्री सी.पी. जॉन के बयान पर उठे सवाल
दक्षिण कोरिया में बड़ा बदलाव, अभियोजकों से छीना जांच का अधिकार
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यूपी : राम मंदिर चढ़ावा विवाद पर चर्चा की मांग को लेकर विधानसभा में हंगामा, कार्यवाही स्थगित
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'राम मंदिर के विरोध में थी कांग्रेस', चढ़ावा विवाद पर रिजिजू का खड़गे को जवाब
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विपक्ष के हंगामे के बीच लोकसभा की कार्यवाही दोपहर 2 बजे तक स्थगित
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मंत्री पद न मिलने के बावजूद, मैं पार्टी के फैसले के साथ: एमएलसी राजन्ना
मंत्री पद न मिलने के बावजूद, मैं पार्टी के फैसले के साथ: एमएलसी राजन्ना
एक्ट्रेस तृषा पर स्टालिन के डबल मीनिंग कमेंट से मचा बवाल, TVK बोली - 'गिरफ्तार करो....'
एक्ट्रेस तृषा पर स्टालिन के डबल मीनिंग कमेंट से मचा बवाल,TVK बोली - 'गिरफ्तार करो....'
हमें और ज्यादा मेहनत की जरूरत, बांकीपुर उपचुनाव के नतीजों पर बोले एनडीए नेता
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तमिलनाडु में 13 साल बाद ऑटो-रिक्शा के किराए में होगा संशोधन, यूनियनों ने सौंपे ज्ञापन
तमिलनाडु में 13 साल बाद ऑटो-रिक्शा के किराए में होगा संशोधन, यूनियनों ने सौंपे ज्ञापन
उत्तर प्रदेश सरकार आज 50 से 70 हजार करोड़ रुपये का अनुपूरक बजट पेश करेगी। विधानसभा में विपक्ष ने राम मंदिर चढ़ावा, शिक्षक भर्ती और NEET पेपर लीक जैसे मुद्दों पर प्रदर्शन किया।
केरल: बाढ़ से मरने वालों की संख्या 21 हुई, छह लापता; आईएमडी ने भारी बारिश का अलर्ट जारी किया
केरल: बाढ़ से मरने वालों की संख्या 21 हुई, छह लापता; आईएमडी ने भारी बारिश का अलर्ट जारी किया
पीएम आवास की ओर प्रस्तावित मार्च पर रोक की मांग, सैकड़ों वकीलों ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर को सौंपा ज्ञापन
विपक्ष नहीं चलने दे रहा सदन; जेपीएससी परीक्षा पर नहीं दे रहा जवाब : संबित पात्रा
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'कर्नाटक और झारखंड के मुद्दे पर चुप्पी क्यों...' पेपर लीक मामले में बीजेपी का कांग्रेस पर बड़ा हमला
'कर्नाटक और झारखंड के मुद्दे पर चुप्पी क्यों...' पेपर लीक मामले में बीजेपी का कांग्रेस पर बड़ा हमला
एनडीए की मंगल मिलन बैठक जारी, मानसून सत्र के अंतिम चरण पर चर्चा होने की संभावना
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अपने पहले बजट में शिक्षा के क्षेत्र में बड़े बदलावों की घोषणा कर सकती है तमिलनाडु सरकार
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केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा का पूर्वोत्तर दौरा, बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की करेंगे समीक्षा
विजय सरकार के पहले बजट से पहले टीवीके विधायक आज पार्टी मुख्यालय में करेंगे बैठक
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दतिया और बांकीपुर उपचुनावों के नतीजों के बाद यशोधरा राजे सिंधिया ने 'आत्म-मंथन' की बात कही
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एनडीए संसदीय दल की 'मंगल मिलन' बैठक, मॉनसून सत्र की रणनीति पर होगी चर्चा
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संसद में हंगामे के आसार: विपक्ष ने बनाई सरकार को घेरने की रणनीति
। संसद के मानसून सत्र का तीसरा हफ्ता चल रहा है और आज यानी मंगलवार को भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव तेज रहने की उम्मीद है
महाराष्ट्र : सरकारी सेवाएं अब डिजिटल-फर्स्ट होंगी, दफ्तरों के चक्कर लगाने की जरूरत खत्म
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‘सीनियर नेताओं को दरकिनार किया जा रहा है’: कर्नाटक कैबिनेट विस्तार से कांग्रेस में नाराजगी
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लोकसभा में सांसद हनुमान बेनीवाल ने मानगढ़ धाम को 'राष्ट्रीय स्मारक' का दर्जा देने की मांग की
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