क्या ईरान का मध्यम वर्ग गरीबी के दलदल में धंस रहा है?
युद्ध के दौर में ईरान के आम परिवारों का बजट बिगड़ गया है. कारोबार ठप्प हो रहे हैं और यह डर गहराने लगा है कि लाखों मध्यमवर्गीय परिवार तेजी से गरीबी रेखा के पार जा सकते हैं. ईरान में रहने वाली गृहिणी मीना के लिए अब युद्ध का मतलब हवाई हमले या सैन्य बयानों से नहीं है. अब वह युद्ध को इस बात से समझती हैं कि उनके परिवार की खाने की मेज से क्या-क्या चीजें गायब हो गई हैं. उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, पिछले साल जब से युद्ध शुरू हुआ है, हम हर दिन और गरीब होते जा रहे हैं. सच कहूं तो मुझे याद नहीं कि मैंने आखिरी बार रेड मीट कब खरीदा था. हमने उसकी जगह चिकन लेना शुरू किया, लेकिन अब चिकन भी एक लग्जरी बन गया है. हम अब पैसे बचाने के बारे में नहीं सोचते. हम सिर्फ किराया देने और खाना खरीदने के बारे में सोचते हैं.” होर्मुज का बैकअप प्लान तैयार करने के लिए बेचैन खाड़ी देश अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) का अनुमान है कि इस साल ईरान की अर्थव्यवस्थामें 5.4 फीसदी की गिरावट आएगी, जबकि महंगाई दर लगभग 69 फीसदी तक पहुंचने की उम्मीद है. विश्व बैंक ने भी चेतावनी दी है कि युद्ध, कमजोर व्यापार और लंबे समय से बनी अनिश्चितता देश की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित कर रही है. ईरान युद्ध से संकट पैदा नहीं हुआ बल्कि बढ़ा स्वीडन में रहने वाले अर्थशास्त्री अहमद अलावी के मुताबिक, ईरान युद्धने देश के आर्थिक संकट को पैदा नहीं किया, बल्कि उसे बहुत ज्यादा बढ़ा दिया है. उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, जब ईरान इस संघर्ष में शामिल हुआ, तब वहां महंगाई दर पहले से ही 40 फीसदी से ज्यादा थी. मुद्रा कमजोर हो रही थी, बजट घाटा बना हुआ था, और सालों से प्रतिबंध लगे हुए थे.” उन्होंने आगे बताया, युद्ध ने एक बाहरी झटके की तरह काम किया. बुनियादी ढांचे को पहुंचा नुकसान, होर्मुज जलडमरूमध्य से व्यापार में रुकावट, इंटरनेट का बंद होना और महंगाई तेज होने की बढ़ती आशंकाओं ने लोगों की खरीदारी की ताकत के खत्म होने की गति को और तेज कर दिया.” अलावी सरकारी आंकड़ों की ओर इशारा करते हैं जिनसे पता चलता है कि सालाना महंगाई दर 66 फीसदी और साल-दर-साल महंगाई दर 88 फीसदी के करीब पहुंच गई है. खाने-पीने की चीजों की कीमतें और भी तेजी से बढ़ी हैं. ब्रेड और अनाज की कीमतों में लगभग 140 फीसदी, मीट और पोल्ट्री में 135 फीसदी, डेयरी उत्पादों में 116 फीसदी से ज्यादा और खाने के तेल में 200 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है. कई परिवारों के लिए इन आंकड़ों का मतलब है, कम मीट खरीदना, इलाज टालना और पैसे बचाने की योजना छोड़ देना. गरीबी की चपेट में आए लगभग 40 लाख ईरानी अर्थशास्त्रियों का कहना है कि परिवार अक्सर सबसे पहले यात्रा और कपड़ों पर होने वाले खर्च में कटौती करते हैं. हालांकि महंगाई जब बनी रहती है तो यह कटौती खाने-पीने, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा तक भी पहुंच जाती है. इससे मध्यम आय वाले परिवारों पर दबाव बढ़ जाता है, जो कभी खुद को आर्थिक रूप से सुरक्षित मानते थे. अलावी का कहना है कि कम आय वाले परिवारों पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है, लेकिन उनका तर्क है कि मध्यम वर्ग भी तेजी से इन्हीं दबावों का सामना कर रहा है, कई वेतनभोगी कर्मचारी और पेंशनभोगी पहली बार गरीबी रेखा से नीचे आ गए हैं, क्योंकि उनकी आय महंगाई के हिसाब से नहीं बढ़ी है.” उनका अनुमान है कि संघर्ष तेज होने के बाद से 35 से 45 लाख और ईरानी गरीबी की चपेट में आ गए हैं. इससे गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की कुल संख्या 4 करोड़ से ज्यादा हो गई है. अनिश्चितता के कारण कारोबार पर दबाव ईरान के निजी क्षेत्र भी दबाव महसूस कर रहे हैं. ईरान के एक व्यापारी मोर्तेजा का कहना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य से शिपिंग मुश्किल होने के बाद क्षेत्रीय व्यापार के रास्ते तेजी से बदले. उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, दुबई के सप्लायरों की कमी से बने खालीपन को भरने के लिए चीन ने तेजी से कदम उठाए. खाड़ी देशों के उलट, चीन मध्य एशिया के रेल नेटवर्क के जरिए भी सामान भेज सकता है, जिससे वह समुद्री रास्ते से जुड़े जोखिमों और देरी से बच जाता है.” उनका मानना है कि इन जमीनी रास्तों का बढ़ता महत्व एक वजह थी कि अमेरिका ने तुर्कमेनिस्तान से लगी ईरान की सीमा के पास रेलवे लाइन को निशाना बनाया. हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की जा सकी. इसके बावजूद, मोर्तेजा का कहना है कि इस बदलाव से ईरानी व्यापारियों को कोई खास फायदा नहीं हुआ है. वह कहते हैं, रियाल की गिरती कीमत और आसमान छूती महंगाई ने बाजार को आगे बढ़ने से रोक दिया है. व्यापारी लगातार अनिश्चितता के माहौल में जी रहे हैं, क्योंकि विदेशी मुद्रा की दरें लगभग हर दिन बदल जाती हैं. जो सामान हमने कम कीमतों पर खरीदा और बेचा था, अब उसे फिर से दुकान में लाने के लिए बहुत ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है और वह भी तब, जब ग्राहकों के पास उन्हें खरीदने की क्षमता बची हो.” मोर्तेजा के लिए, अनिश्चितता सबसे बड़ी बाधा बन गई है. उन्होंने कहा, तनाव जारी रहने के कारण, सच कहूं तो मुझे ईरान में कारोबार करने का कोई स्पष्ट भविष्य नजर नहीं आता है.” क्या सरकार इस असर को कम कर सकती है? दुनिया भर में तेल की कीमतें ज्यादा होने के बावजूद, अलावी का कहना है कि ईरान को इससे कोई खास फायदा होने की उम्मीद नहीं है, क्योंकि प्रतिबंधों, निर्यात पर रोक और परिवहन की ज्यादा लागत की वजह से उसकी तेल से होने वाली कमाई सीमित बनी हुई है. उनका तर्क है कि सब्सिडी, कीमतों पर नियंत्रण और विदेशी मुद्रा बाजार में दखल जैसे सरकारी उपायों से कुछ हद तक तुरंत राहत तो मिल सकती है, लेकिन इनसे असल समस्याओं का समाधान होने की उम्मीद कम ही है. वह कहते हैं, भरोसा बहाल किए बिना, प्रतिबंधों को कम किए बिना और ढांचागत समस्याओं को हल किए बिना, ये नीतियां स्थायी समाधान के बजाय केवल अल्पकालिक उपाय ही बनी रहेंगी.” अनिश्चितता की लागत अलावी का कहना है कि अनिश्चितता खुद आर्थिक सुधार में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक बन गई है. उनके मुताबिक, कई व्यवसाय निवेश में देरी कर रहे हैं क्योंकि उन्हें भविष्य की आर्थिक स्थितियों पर बहुत कम भरोसा है. साथ ही, परिवार खर्च करने को लेकर ज्यादा सावधानी बरत रहे हैं, क्योंकि उन्हें आशंका है कि कीमतें बढ़ती रहेंगी और उनकी कमाई की वैल्यू और गिर जाएगी. उनका कहना है कि युद्ध से हुए भौतिक नुकसान की भरपाई करने में जितना समय लगेगा, उससे ज्यादा वक्त निवेशकों, कारोबारियों और आम ग्राहकों के बीच भरोसा फिर से कायम करने में लगेगा. अलावी का मानना है कि जब तक महंगाई कम नहीं होती, एक्सचेंज रेट स्थिर नहीं होता और व्यापार की स्थिति में सुधार नहीं होता, तब तक कई परिवार आर्थिक दबाव में रहेंगे, भले ही सैन्य तनाव कम हो जाए. भविष्य की बात करें, तो उनका मानना है कि अगर मौजूदा हालात ऐसे ही बने रहे, तो लोगों के रहन-सहन का स्तर और भी ज्यादा गिर जाएगा. उनका कहना है कि और भी ज्यादा परिवार प्रोटीन वाले खाने, स्वास्थ्य सेवाओं और बच्चों की पढ़ाई के खर्च में कटौती करने को मजबूर होंगे. जबकि, दुकानें-कारोबार बंद होने और बेरोजगारी बढ़ने का सिलसिला जारी रह सकता है. मीना कहती हैं, हम अब भविष्य के बारे में बात नहीं करते. हम बस यही उम्मीद करते हैं कि अगले महीने का किराया भर सकें.”
जेएसएससी‑सीजीएल रद्द - 2000 से ज्यादा अभ्यर्थियों की नौकरी पर संकट
झारखंड सरकार द्वारा जेएसएससी-सीजीएल परीक्षा रद्द किए जाने के फैसले के बाद इस परीक्षा के जरिए चयनित होकर विभिन्न पदों पर कार्यरत अभ्यर्थियों में नाराजगी फैल गई
आबकारी केस: हाई कोर्ट ने केजरीवाल-सिसोदिया को सीबीआई की याचिका पर जवाब देने के लिए दिया और समय
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छात्र आंदोलन की जीत - जेएसएससी‑सीजीएल परीक्षा रद्द, सरकार झुकी
झारखंड में 24 दिनों से चल रहे छात्र आंदोलन के बीच हेमंत सोरेन सरकार ने आंदोलनकारियों की सबसे बड़ी मांग मानते हुए वर्ष 2024 में आयोजित जेएसएससी-सीजीएल परीक्षा को रद्द करने का फैसला किया है
दिल्ली भाजपा ने नितिन नवीन की तिरंगे के साथ फर्जी तस्वीर को लेकर पुलिस में दर्ज कराई शिकायत
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उत्तर प्रदेश की सत्ता में इंडिया गठबंधन के लिए 27 साल तक कोई वैकेंसी नहीं : मुख्तार अब्बास नकवी
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तृणमूल छात्र विंग स्थापना दिवस पर रैली करने की अनुमति के लिए कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंची
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कर्नाटक: रिजर्व फॉरेस्ट में शिकारियों के 'एनकाउंटर' मामले पर भाजपा ने प्रदेश सरकार से जांच की मांग की
दिल्ली पुलिस ने ग्वालियर से 'आप' नेता को किया गिरफ्तार, दलित सहयोगी की संपत्ति पर कब्जा का आरोप
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डॉ. हेमांग जोशी बने भाजपा युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष, गुजरात के तीन नेताओं को राष्ट्रीय टीम में मिली अहम जिम्मेदारी
नितिन नबीन की बहुप्रतीक्षित टीम का आज आखिरकार ऐलान हो ही गया। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने संगठन में लंबे समय से चल रही कवायद को अंजाम देते हुए अपनी नई राष्ट्रीय टीम सामने रख दी है। इस टीम में अनुभव, क्षेत्रीय संतुलन, सामाजिक समीकरण और चुनावी जरूरतों का ऐसा मिश्रण तैयार किया गया है, जिसमें पार्टी के पुराने दिग्गजों से लेकर नए चेहरों तक को जिम्मेदारी दी गई है। लेकिन इस पूरी कवायद में दो फैसले राजनीतिक चर्चा के केंद्र में हैं। एक तो अमित मालवीय को आईटी सेल प्रमुख की जिम्मेदारी से बाहर का रास्ता दिखाया गया है, जबकि पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी की राष्ट्रीय महासचिव के तौर पर भाजपा के शीर्ष संगठन में वापसी हुई है। हम आपको बता दें कि आईटी और सोशल मीडिया सेल की कमान अब छत्तीसगढ़ के दीपक म्हास्के को दी गई है। वहीं अनिल बलूनी मीडिया प्रभारी की अपनी जिम्मेदारी पर कायम हैं। यानी भाजपा ने डिजिटल मोर्चे पर चेहरे में बदलाव किया है, लेकिन मीडिया प्रबंधन के मौजूदा ढांचे में निरंतरता बनाए रखी है। इस बदलाव को केवल संगठनात्मक फेरबदल मानना मुश्किल है। यह संकेत है कि नितिन नबीन डिजिटल और राजनीतिक नैरेटिव की लड़ाई में नई रणनीति और नए चेहरों के साथ उतरना चाहते हैं। साथ ही चूंकि नितिन नबीन छत्तीसगढ़ में पार्टी के प्रभारी रह चुके हैं ऐसे में वह जानते हैं कि उस राज्य के किस नेता की कार्यक्षमता का उपयोग कहां पर करना पार्टी के लिए ज्यादा फायदेमंद रहेगा। इसे भी पढ़ें: PM Modi का नई BJP टीम पर पूरा भरोसा, बोले- संगठन और जनसेवा पर दें ध्यान इसके अलावा, स्मृति ईरानी की वापसी इस टीम का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश है। उन्हें उत्तर प्रदेश का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है। आक्रामक राजनीतिक शैली, संसदीय अनुभव और विपक्ष के खिलाफ मुखर राजनीतिक लड़ाई के लिए पहचाने जाने वाली स्मृति ईरानी को संगठन के शीर्ष स्तर पर लाना बताता है कि भाजपा उत्तर प्रदेश जैसे निर्णायक राज्य में राजनीतिक सक्रियता को और धार देना चाहती है। राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है। उनके साथ तीरथ सिंह रावत, राम माधव, बैजयंत पांडा, डी. पुरंदेश्वरी, रेखा वर्मा, वर्षाबेन नरेंद्रभाई दोशी, डॉ. भारती प्रवीण पवार, मनप्रीत सिंह बादल, लाल सिंह आर्य, एम. नागराजा, प्रो. तारिक मंसूर और डॉ. मधुचंद्र कर को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली है। छह महिला उपाध्यक्षों की मौजूदगी से महिला प्रतिनिधित्व का संदेश भी स्पष्ट है। इसके अलावा, राष्ट्रीय महासचिवों की टीम में विनोद तावड़े, सुनील बंसल, बिप्लब कुमार देब, स्मृति ईरानी, डॉ. सतीश पूनिया, गजेंद्र पटेल, हरीश द्विवेदी और संजय भाटिया शामिल हैं। संगठन के स्तर पर बीएल संतोष राष्ट्रीय महासचिव संगठन बने हुए हैं, जबकि शिवप्रकाश और सौदान सिंह को राष्ट्रीय संयुक्त महासचिव संगठन की जिम्मेदारी मिली है। इसका अर्थ है कि नबीन ने संगठन की अनुभवी मशीनरी को बनाए रखते हुए राजनीतिक मोर्चे पर अपनी टीम को विस्तार दिया है। साथ ही 16 राष्ट्रीय सचिवों की सूची में भी व्यापक क्षेत्रीय संतुलन दिखाई देता है। कविता पाटीदार, के. सुरेंद्रन, डॉ. भोला सिंह, डॉ. प्रदीप वर्मा, जगदीश ईश्वरभाई पटेल, आम आदमी पार्टी से भाजपा में आये डॉ. संदीप पाठक और फांगनॉन कोन्याक, संगीता यादव, अनिल एंटनी, डॉ. एम. वेंकटेशन, मनोज तिग्गा, सिद्धार्थ शंभू, डॉ. स्वदेश सिंह, मृगांका देब बर्मन, रोहन गुप्ता और जय प्रकाश को राष्ट्रीय सचिव बनाया गया है। इनमें दक्षिण, पूर्वोत्तर, पूर्वी भारत, हिंदी पट्टी और शहरी राजनीतिक पृष्ठभूमि, सभी को जगह मिली है। नई टीम के अन्य हिस्से भी राजनीतिक संकेत दे रहे हैं। केंद्रीय कार्यालय प्रभारी तरुण चुग और केंद्रीय कार्यालय सचिव महेंद्र पांडे बनाए गए हैं। नॉर्थ-ईस्ट कोऑर्डिनेटर की जिम्मेदारी डॉ. संबित पात्रा और संयुक्त कोऑर्डिनेटर की जिम्मेदारी राजीव बब्बर को दी गई है। सभी सेल्स के समन्वय की कमान विष्णु दत्त शर्मा को मिली है, जबकि ऋतुराज सिन्हा और विष्णु वर्धन रेड्डी संयुक्त समन्वयक होंगे। मोर्चों की कमान भी सामाजिक और चुनावी विस्तार को ध्यान में रखकर तय की गई है। युवा मोर्चा के अध्यक्ष डॉ. हेमंग जोशी, महिला मोर्चा की अध्यक्ष रूप कुमारी चौधरी, ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष अमरपाल मौर्य, किसान मोर्चा के अध्यक्ष बंसीलाल गुर्जर, एससी मोर्चा के अध्यक्ष शिवेश कुमार राम, एसटी मोर्चा के अध्यक्ष डॉ. मन्नालाल रावत और अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष कुंवर बसीत अली बनाए गए हैं। इससे भाजपा ने समाज के अलग-अलग वर्गों के बीच संगठनात्मक पहुंच को मजबूत करने की कोशिश की है। वित्तीय मोर्चे पर केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल को राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष और राजस्थान के राजेश मंगल को संयुक्त कोषाध्यक्ष बनाया गया है। पीयूष गोयल के प्रशासनिक और आर्थिक अनुभव का लाभ संगठन के वित्तीय प्रबंधन को मिल सकता है। पीयूष गोयल पहले भी पार्टी के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष रह चुके हैं। यहां सवाल यह है कि अब देखना यह होगा कि 'एक व्यक्ति एक पद' के सिद्धांत को महत्व देने वाली भाजपा क्या पीयूष गोयल से केंद्रीय मंत्री का पद छोड़ने को कहती है या फिर वह दोनों पदों पर बने रहेंगे? कुल मिलाकर नितिन नबीन की टीम का संदेश साफ है कि भाजपा अब संगठन को केवल पदाधिकारियों की सूची के रूप में नहीं, बल्कि चुनावी मशीनरी के रूप में कसना चाहती है। राम माधव की रणनीतिक समझ, वसुंधरा राजे का जनाधार, स्मृति ईरानी की आक्रामक राजनीतिक शैली, सुनील बंसल का संगठनात्मक अनुभव, पीयूष गोयल की प्रशासनिक क्षमता और दक्षिण-पूर्वोत्तर से आए नेताओं का क्षेत्रीय अनुभव पार्टी के लिए अलग-अलग मोर्चों पर उपयोगी साबित हो सकता है। लेकिन असली चुनौती भी यहीं से शुरू होती है। अलग-अलग क्षमताओं और महत्वाकांक्षाओं वाले नेताओं को एक सूत्र में बांधना, राज्यों में गुटबाजी को नियंत्रित करना, डिजिटल नैरेटिव को विपक्ष के हमलों के सामने प्रभावी बनाना, संगठन और सरकार के बीच तालमेल कायम रखना और आगामी चुनावों में इन नियुक्तियों के जरिये साधे गये सामाजिक समीकरणों को वास्तविक वोटों में बदलना आसान नहीं होगा। नितिन नबीन ने टीम चुन ली है; अब इस टीम को परिणाम देने वाली राजनीतिक ताकत में बदलना उनकी सबसे बड़ी परीक्षा होगी। -नीरज कुमार दुबे
आखिर जन सुराज पार्टी और लोजपा रामविलास के बीच पक रही सियासी खिचड़ी के निहितार्थ क्या हैं? समझिए
बिहार में जन सुराज पार्टी के नवनिर्वाचित विधायक प्रशांत किशोर और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान के बीच जो राजनीतिक खिचड़ी पकने की चर्चा है, वह उत्तरप्रदेश की राजनीति से अभिप्रेरित है। चूंकि प्रशांत किशोर मशहूर चुनावी रणनीतिकार भी हैं और लगभग सभी प्रमुख पार्टियों के रणनीतिक घाटों की पानी का स्वाद चख चुके हैं, इसलिए उनसे जुड़ी इस आशय की चर्चा भी अनायास नहीं है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सामाजिक न्याय क्रांति और मंडल बनाम कमंडल की मतलबी राजनीति की कड़ी में जहां उत्तरप्रदेश में चार-चार बार दलित नेत्री सुश्री मायावती को मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला और उनकी बहुजन समाज पार्टी तीन बार गठबंधन के तहत और एक बार पूर्ण बहुमत से यूपी की सत्ता में आई। लेकिन बिहार में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद, जदयू के हुक्मरान नीतीश कुमार ने लोजपा के राम विलास पासवान और उनके पुत्र चिराग पासवान को कभी पूर्ण रूप से उभरने ही नहीं दिया और गठबंधन में भी कमजोर बनाए रखा। यही वजह है कि बिहार में नए जमाने की राजनीति के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने चिराग पासवान के साथ गठबंधन की सम्भवनाओं को हवा दिलवाकर बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, जनता दल यूनाइटेड के सुप्रीमो नीतीश कुमार और राष्ट्रीय जनता दल नेता तेजस्वी यादव के समक्ष एक तगड़ी चुनौती पेश करने की अपनी मंशा उजागर कर दी है। चिराग पासवान जिस तरह से खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हनुमान करार देते हैं, इससे उनकी भी बेचैनी बढ़ेगी हो। यह ठीक है कि जन सुराज पार्टी और लोजपा रामविलास के बीच किसी औपचारिक गठबंधन की सार्वजनिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है। लेकिन अगस्त 2026 की ताजा राजनीतिक हलचल को देखें तो दोनों के बीच संभावित सियासी तालमेल की चर्चा को महज अफवाह मानकर खारिज करना भी जल्दबाजी होगी। क्योंकि हाल की रिपोर्टों में दोनों के करीब आने और भाजपा-राजद से अलग एक संभावित धुरी की चर्चा सामने आई है। इससे एनडीए की राजनीति में चिराग पासवान का रुतबा बढ़ना भी स्वाभाविक है। फिर भी यदि चिराग पासवान को दलित मुख्यमंत्री बनाने के स्वप्न प्रशांत किशोर यदि दिखाते हैं, या फिर उपमुख्यमंत्री पद का भी सियासी चारा डालते हैं तो मिशन 2029 के संसदीय चुनाव और 2030 के विधानसभा चुनावों को लेकर एनडीए और महागठबंधन के हाथपांव फूलना स्वाभाविक है। इसे भी पढ़ें: Prashant Kishor ने Bihar विधानसभा में ली शपथ, बोले- यह मेरे लिए गर्व और जिम्मेदारी का पल आइए अब यह समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर इस मनोवांछित सियासी खिचड़ी में क्या-क्या पक रहा है? और इसके राजनीतिक स्वाद के मिजाज से इसके क्या क्या मायने हो सकते हैं- पहला, लोजपा युवराज चिराग पासवान के लिए यह NDA के भीतर दबाव की राजनीति हो सकती है, क्योंकि चिराग पासवान पहले भी सीट बंटवारे और NDA के भीतर अपनी राजनीतिक हैसियत को लेकर स्वतंत्र रुख दिखाते रहे हैं। 2025 में भी उनके प्रशांत किशोर से संभावित संपर्क की खबरें सामने आई थीं। इसलिए सियासत में हर खुली हुई सम्भवनाओं और उससे बनने बिगड़ने वाली हवा से इंकार नहीं किया जा सकता है। दूसरा, जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर के लिए लोजपा रामविलास प्रमुख चिराग पासवान एक महत्वपूर्ण सामाजिक-पॉलिटिकल पुल हो सकते हैं। ऐसा इसलिए कि जन सुराज अपने को BJP और RJD—दोनों से अलग विकल्प के रूप में स्थापित करना चाहता है। अब बांकीपुर में किशोर की जीत ने उन्हें सिर्फ आंदोलनकारी नहीं, बल्कि क्षेत्रीय चुनावी ताकत के रूप में भी स्थापित किया है। तीसरा, सबसे दिलचस्प संभावना है—'माइनस BJP, माइनस RJD' राजनीति। यानी कि ताजा राजनीतिक चर्चाओं में इसी तरह के पुनर्संयोजन की संभावना उठ रही है। इसका अर्थ होगा कि चिराग पासवान अपना दलित/पासवान प्रभाव और जन सुराज पार्टी अपना युवा, गैर-पारंपरिक तथा शहरी-मध्यवर्गीय आधार जोड़ने की कोशिश करे। दोनों ने यदि रणनीतिक रूप से सवर्णों को तरजीह दी तो भाजपा/कांग्रेस के लिए यह किसी झटके की तरह होगा। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि दोनों की राजनीतिक जरूरतें अलग अलग हैं। चाहे चिराग पासवान हों या प्रशांत किशोर, दोनों अपना स्वतंत्र राजनीतिक स्पेस बढ़ाना चाहते हैं, साथ ही खुद को तीसरे विकल्प के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। जहां चिराग पासवान NDA में रहते हुए अपना bargaining power बढ़ाना चाहते हैं, वहीं प्रशांत किशोर BJP और RJD दोनों से दूरी दिखाना चाहते हैं। इस बात में कोई दो राय नही कि उत्तरप्रदेश के जाटवों के वोट बैंक के तरह ही बिहार में भी पासवान वोट का मजबूत आधार है, जबकि प्रशांत किशोर युवा, शिक्षित और बदलाव चाहने वाले मतदाताओं पर जोर देते हैं। वह संगठन और चुनावी नेटवर्क के कार्यसाधक हैं। उनमें नया राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने और अभियान चलाने की अद्भुत क्षमता है। लिहाजा यहीं से असली सवाल पैदा होता है—क्या चिराग NDA के भीतर रहकर जन सुराज से तालमेल करेंगे, या भविष्य में कोई व्यापक वैकल्पिक मोर्चा बनेगा? अलबत्ता, इन चर्चाओं में एक और बड़ा संकेत निहित है। वह यह कि प्रशांत किशोर अब केवल विधानसभा की राजनीति तक सीमित नहीं दिख रहे, बल्कि जन सुराज की नजर विधान परिषद के चुनावी क्षेत्रों पर भी बताई जा रही है। यानी संगठन को लगातार चुनावी मशीनरी में बदलने की कोशिश हो रही है। दूसरी ओर चिराग पासवान ने भी हाल के दिनों में ऐसे मुद्दे उठाए हैं जिन पर सरकार/NDA के भीतर असहजता पैदा हो सकती है। उदाहरण के लिए, उन्होंने गत दिनों बिहार की शराबबंदी नीति की प्रभावशीलता पर खुलकर सवाल उठाया। यानी दोनों के बीच संभावित तालमेल का आधार केवल जातीय गणित नहीं, बल्कि 'एंटी-एस्टैब्लिशमेंट' और 'नया विकल्प' का राजनीतिक नैरेटिव भी बन सकता है। मगर सबसे बड़ी अड़चन भी यही है। खासकर प्रशांत किशोर की राजनीति का मूल दावा ही है कि वे पारंपरिक राजनीतिक दलों के गठजोड़ से अलग व्यवस्था खड़ी करेंगे। 2025 में उन्होंने चिराग के साथ गठबंधन की संभावना को सार्वजनिक रूप से नकारते हुए कहा था कि उनका गठबंधन जनता के साथ है। इसलिए यदि आज दोनों के बीच नजदीकी बढ़ती है, तो इसे सीधा चुनावी गठबंधन मानने के बजाय 'रणनीतिक संवाद' समझना ज्यादा उचित होगा। मेरी नजर में असली खेल के दृष्टिगत 2026 का गठबंधन कम और 2029–30 की जमीन तैयार करने की कवायद ज्यादा हो सकती है। वाकई यदि चिराग + जन सुराज साथ आते हैं तो बिहार में तीन ध्रुव उभर सकते हैं:- पहला, NDA बनाम RJD; दूसरा, महागठबंधन बनाम जन सुराज–LJP(RV जैसा वैकल्पिक ध्रुव। और यदि इस तीसरे ध्रुव में पप्पू यादव, उपेंद्र कुशवाहा या दूसरे छोटे सामाजिक आधार वाले नेता भी किसी रूप में जुड़ते हैं, तो बिहार की पारंपरिक दो-ध्रुवीय राजनीति के लिए यह गंभीर चुनौती बन सकती है। इस परिस्थिति में सामान्य जातियों के वोटबैंक का महत्व और अधिक बढ़ जाएगा। क्योंकि यूपी में भी ओबीसी सियासत से ब्राह्मण परेशान होकर मायावती के साथ हो लिए थे। कुछ ऐसा ही उभार बिहार में भी नजर आ रहा है, खासकर सोशल मीडिया पर सवर्ण विरोधी पोस्टों की बाढ़। फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण संकेत यही है कि दोनों की तरफ से औपचारिक गठबंधन की घोषणा नहीं हुई है। इसलिए 'खिचड़ी पक रही है' कहना राजनीतिक संकेतों के लिहाज से उचित है, लेकिन 'खिचड़ी तैयार हो गई है' कहना अभी तथ्यात्मक रूप से जल्दबाजी होगी। शायद वह बीरबल की खिचड़ी न बन जाए। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
प्रधानमंत्री मोदी का लालकिले से 'विकसित भारत' का संकल्प
ऐतिहासिक लालकिले की प्राचीर केवल पत्थरों की एक संरचना नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र भारत के उतार-चढ़ाव, उसकी आकांक्षाओं, उसकी नियति और उसके सामूहिक संकल्पों की मूक गवाह रही है। हर वर्ष 15 अगस्त को इस प्राचीर से देश के प्रधानमंत्री जब राष्ट्र को संबोधित करते हैं, तो वह केवल एक औपचारिक भाषण नहीं होता, बल्कि वह आने वाले समय के लिए देश का नीतिगत और वैचारिक रोडमैप होता है। स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी ऐतिहासिक प्राचीर से वर्ष 2047 तक भारत को एक 'विकसित राष्ट्र' बनाने का जो अटूट संकल्प दोहराया है, वह देश की समकालीन राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज के लिए एक युगांतकारी मोड़ है। 'विकसित भारत' का यह विजन महज़ एक राजनीतिक नारा नहीं है, बल्कि यह 140 करोड़ नागरिकों की सामूहिक चेतना को जगाने और उन्हें राष्ट्र निर्माण के एक महायज्ञ में आहुति देने के लिए प्रेरित करने वाला एक व्यापक राष्ट्रीय दर्शन है। जब हम इस विराट संकल्प की बात करते हैं, तो हमें इसके ऐतिहासिक संदर्भ और प्रासंगिकता को गहराई से समझना होगा। भारत ने लगभग दो सदियों तक औपनिवेशिक दासता और आर्थिक शोषण का दंश झेला है। 1947 में जब देश स्वतंत्र हुआ, तब हमारी अर्थव्यवस्था जर्जर थी, साक्षरता दर दयनीय थी और अकाल तथा गरीबी जैसी बुनियादी चुनौतियां हमारे सामने थीं। शुरुआती दशकों में भारत का मुख्य ध्यान आत्मनिर्भरता और बुनियादी अस्तित्व की रक्षा पर था। हमने खाद्यान्न संकट से निपटने के लिए हरित क्रांति की, अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए सैन्य तंत्र को मजबूत किया और धीरे-धीरे एक ठोस औद्योगिक आधार तैयार किया। आज, स्वतंत्रता के इस दौर में, भारत उस स्थिति से बहुत आगे निकल चुका है और अब हम केवल एक अस्तित्व बनाए रखने वाले देश नहीं हैं, बल्कि हम वैश्विक पटल पर एक नई दिशा तय करने वाले राष्ट्र बन चुके हैं। यह संकल्प इस बात का प्रतीक है कि अब भारत अपनी विकासशील छवि के खोल को तोड़कर वैश्विक शक्तियों की अग्रिम पंक्ति में खड़े होने के लिए पूरी तरह तैयार है। 2047 का वर्ष इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमारी स्वतंत्रता का शताब्दी वर्ष होगा, और कोई भी राष्ट्र अपनी स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होने पर दुनिया के सामने अपनी सफलता का क्या प्रमाण प्रस्तुत करता है, यही उसका वास्तविक ऐतिहासिक मूल्यांकन होता है। इस व्यापक संकल्प को धरातल पर उतारने के लिए देश के चार प्रमुख वर्गों को विकास का मुख्य केंद्र बिंदु बनाया गया है, जिन्हें युवा, महिला, किसान और गरीब के रूप में रेखांकित किया गया है। इन चारों स्तंभों के समग्र सशक्तिकरण के बिना किसी भी विकसित समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। भारत आज दुनिया का सबसे युवा देश है और हमारी जनसांख्यिकीय लाभांश हमारी सबसे बड़ी ताकत है। विकसित भारत का सपना तभी सच हो सकता है जब इस युवा ऊर्जा को सही दिशा, उत्कृष्ट शिक्षा और वैश्विक स्तर का कौशल मिले। देश में स्टार्टअप इकोसिस्टम का तेजी से विस्तार और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से शिक्षा को रोजगारोन्मुख बनाना इसी दिशा में उठाए गए बड़े कदम हैं। इसके साथ ही, विकसित भारत का दूसरा अनिवार्य पहलू महिलाओं का सशक्तिकरण और उनके नेतृत्व में होने वाला विकास है। जब तक देश की आधी आबादी आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से पूरी तरह सक्रिय नहीं होगी, तब तक विकास की रफ्तार अधूरी रहेगी। सेनाओं में महिलाओं की भागीदारी से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होती महिलाओं की बढ़ती संख्या इस बात का प्रमाण है कि वे अब नीति निर्धारण के केंद्र में आ रही हैं। इसी तरह, भारत की आत्मा आज भी गांवों में बसती है और हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि है। विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए कृषि क्षेत्र में तकनीकी सुधार, आधुनिक खेती को बढ़ावा और वैश्विक कृषि आपूर्ति श्रृंखला में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाना आवश्यक है। किसान जब पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर आधुनिक कृषि-उद्यमी बनेगा, तभी ग्रामीण भारत समृद्ध होगा। अंत में, अंत्योदय की भावना के अनुरूप समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुंचना चाहिए, क्योंकि किसी भी राष्ट्र को तब तक विकसित नहीं कहा जा सकता जब तक कि बहुआयामी गरीबी का पूरी तरह उन्मूलन न हो जाए और हर नागरिक को सम्मानजनक जीवन स्तर न मिल जाए। इसे भी पढ़ें: PM Modi का नई BJP टीम पर पूरा भरोसा, बोले- संगठन और जनसेवा पर दें ध्यान आर्थिक मोर्चे पर, भारत आज दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और शीर्ष वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं की ओर अग्रसर है। लेकिन विकसित देश बनने के लिए हमें केवल सकल घरेलू उत्पाद के आकार को ही नहीं बढ़ाना है, बल्कि प्रति व्यक्ति आय और नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में भी गुणात्मक सुधार करना होगा। इसके लिए विनिर्माण और आत्मनिर्भरता पर विशेष बल देना आवश्यक है। 'मेक इन इंडिया' अभियान के तहत भारत आज मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग, रक्षा उत्पादन और इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में एक वैश्विक केंद्र के रूप में उभर रहा है। रक्षा क्षेत्र में, जहां कभी हम पूरी तरह आयातों पर निर्भर थे, आज हम स्वदेशी अत्याधुनिक सैन्य उपकरणों का निर्माण कर रहे हैं और उनका निर्यात भी बढ़ा रहे हैं। भारतीय कॉर्पोरेट जगत को अब वैश्विक कंपनियों की तर्ज पर अपनी क्षमता का विस्तार करना होगा ताकि भारतीय ब्रांड दुनिया भर के बाजारों में अग्रणी भूमिका निभा सकें। इसके साथ ही, देश के बुनियादी ढांचे का कायाकल्प किया जा रहा है। आधुनिक रेलवे, एक्सप्रेसवे का विस्तृत नेटवर्क, जलमार्गों का विकास और हवाई अड्डों का आधुनिकीकरण देश की लॉजिस्टिक्स लागत को कम करने और व्यापार को सुगम बनाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। एक मजबूत और आधुनिक बुनियादी ढांचा ही विकसित भारत की ठोस नींव बनेगा, जो देश के औद्योगिक विकास को नई गति प्रदान करेगा। तकनीक और नवाचार के इस युग में जो देश अग्रणी रहेगा, वही दुनिया के भविष्य को दिशा देगा। भारत ने डिजिटल क्षेत्र में जो क्रांति की है, उसने दुनिया के विकसित देशों को भी अचंभित किया है। हमारा डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और डिजिटल लेनदेन की व्यवस्था आज वैश्विक स्तर पर एक मिसाल बन चुकी है। भारत ने यह सिद्ध कर दिया है कि वह केवल तकनीक का उपभोक्ता नहीं है, बल्कि वह विश्व को सस्ती, सुरक्षित और समावेशी तकनीक देने वाला प्रदाता भी है। विज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में बढ़ता निवेश इस विजन को और स्पष्ट करता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर मिशन, क्वांटम कंप्यूटिंग, अंतरिक्ष अनुसंधान और ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में भारत का बढ़ता कदम यह दर्शाता है कि हम भविष्य की तकनीकों के मामले में दुनिया के अग्रणी देशों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं। तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर और संप्रभु होना विकसित भारत की एक अनिवार्य शर्त है, जो हमें वैश्विक मंच पर एक अद्वितीय पहचान दिलाएगी। संकल्प जितना विराट होता है, उसकी राह की चुनौतियां भी उतनी ही कठिन होती हैं। विकसित भारत के मार्ग में कई आंतरिक और बाह्य चुनौतियां हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। देश की आर्थिक प्रगति के साथ-साथ क्षेत्रीय और सामाजिक असमानता को पाटना एक बड़ी चुनौती है। विकास का लाभ समाज के हर वर्ग और देश के हर कोने तक समान रूप से पहुंचना चाहिए। इसके अलावा, भारत को पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच एक कुशल संतुलन बनाना होगा। जलवायु परिवर्तन के खतरों को देखते हुए नवीकरणीय ऊर्जा को अपनाना और सतत विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करना युद्धस्तर पर आवश्यक है। प्रशासनिक स्तर पर, हमारी व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और नागरिक-अनुकूल बनना होगा, क्योंकि लालफीताशाही और भ्रष्टाचार विकास की गति को धीमा करते हैं। वैश्विक मोर्चे पर, वर्तमान समय की भू-राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक व्यवधान भी हमारे सामने चुनौतियां खड़ी करते हैं, जिनसे निपटने के लिए भारत को अपनी कूटनीतिक कुशलता और आंतरिक आर्थिक सुदृढ़ता को निरंतर मजबूत बनाए रखना होगा। इस पूरे महायज्ञ में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका देश के नागरिकों की है। कोई भी देश केवल सरकार की नीतियों, बजट या घोषणाओं से विकसित नहीं बनता। सरकार मार्ग प्रशस्त कर सकती है, बुनियादी ढांचा दे सकती है, लेकिन उस पर चलकर देश को आगे ले जाने का काम नागरिकों के सामूहिक प्रयासों से ही संभव होता है। विकसित भारत का संकल्प तब तक अधूरा है जब तक देश का हर नागरिक अपने कर्तव्यों के प्रति पूरी तरह सजग नहीं होता। चाहे वह करों का ईमानदारी से भुगतान करना हो, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना हो, पर्यावरण को बचाना हो, या फिर अपने-अपने कार्यक्षेत्र में पूर्ण ईमानदारी और उत्कृष्टता के साथ योगदान देना हो—ये सभी नागरिक प्रयास मिलकर एक विशाल राष्ट्रीय शक्ति का निर्माण करते हैं। जब देश के नागरिक 'राष्ट्र प्रथम' की भावना को अपने जीवन का मूल मंत्र बना लेंगे, तो भारत की प्रगति को कोई रोक नहीं पाएगा। निष्कर्षतः विकसित भारत का संकल्प केवल आर्थिक आंकड़ों या ऊंची इमारतों तक सीमित नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ एक ऐसे भारत का निर्माण करना है जो आर्थिक रूप से समृद्ध हो, तकनीकी रूप से अग्रणी हो, सामाजिक रूप से समरस और न्यायपूर्ण हो, और सांस्कृतिक रूप से अपनी समृद्ध जड़ों से जुड़ा हुआ हो। यह एक ऐसे भारत का सपना है जहां हर नागरिक को समान अवसर, उत्कृष्ट शिक्षा और स्वास्थ्य सुरक्षा मिले। लालकिले की प्राचीर से गूंजा यह संकल्प देश के लिए एक महान आह्वान है। आने वाले दो दशक भारत के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष होने जा रहे हैं। यदि हम सब मिलकर पूरी निष्ठा और राष्ट्रीय गौरव की भावना के साथ इस संकल्प के प्रति समर्पित हो जाएं, तो निश्चित रूप से वर्ष 2047 में जब भारत अपनी स्वतंत्रता की शताब्दी मना रहा होगा, तब वह विश्व पटल पर एक परम वैभवशाली, समर्थ और विकसित राष्ट्र के रूप में स्थापित होगा। अशोक भाटिया, वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार
उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा मानसून सत्र
संसदीय मर्यादाओं का क्षरण कब तक? आखिर कब हम संसद के एक-एक मिनट का उपयोग करने की पात्रता विकसित करेंगे? आजादी की 80वीं वर्षगांठ की आयोजना से पूर्व भारत में संसद का मानसून सत्र जिस निराशाजनक स्थिति, नाउम्मीदी और उपेक्षापूर्ण स्थितियां के साथ संपन्न हुआ, वह केवल किसी एक दल, सरकार या विपक्ष की विफलता नहीं है, बल्कि हमारी संसदीय संस्कृति के सामने खड़ा एक गंभीर प्रश्नचिह्न है। 25 दिनों तक चले इस सत्र में तीखी राजनीतिक बहस के बजाय हंगामा, नारेबाजी, गतिरोध और कार्यवाही बाधित करने की प्रवृत्ति अधिक प्रभावी रही। प्रश्न यह नहीं है कि सत्ता पक्ष सही था या विपक्ष, प्रश्न यह है कि क्या हमारी संसद अपने मूल दायित्व-जनता के प्रश्नों पर गंभीर विमर्श, सरकार की जवाबदेही और राष्ट्रहित में कानून निर्माण को पूरा कर पा रही है? इस सत्र के आंकड़े स्वयं बहुत कुछ कह रहे हैं। लोकसभा की उत्पादकता बमुश्किल 19 प्रतिशत रही, जबकि राज्यसभा में लगभग 39 प्रतिशत काम हो पाया। लोकसभा में एक भी दिन प्रश्नकाल पूरा नहीं हो सका। यह स्थिति इसलिए अधिक चिंताजनक है क्योंकि प्रश्नकाल संसद की आत्मा माना जाता है। देश की जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों को सरकार से प्रश्न पूछने और सरकार को उनका उत्तर देने का अवसर ही यदि सदन में उपलब्ध न हो, तो लोकतंत्र की जवाबदेही किस रास्ते से सुनिश्चित होगी? 28 जुलाई को लोकसभा में अपेक्षाकृत ठीक काम हुआ, जबकि राज्यसभा में भी केवल कुछ दिन ही सार्थक कार्यवाही हो सकी। शेष समय का बड़ा हिस्सा राजनीतिक टकराव की भेंट चढ़ गया। संसद केवल ईंट-पत्थर से बनी इमारत नहीं है। वह भारत की सामूहिक चेतना का सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच है। वहां देश के करोड़ों नागरिकों की आकांक्षाएं, समस्याएं और सपने पहुंचते हैं। किसान, मजदूर, विद्यार्थी, महिला, व्यापारी, युवा, गरीब और वंचित वर्ग-सभी की आवाज संसद के माध्यम से राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनती है। इसलिए संसद का एक मिनट भी केवल सांसद का समय नहीं होता, वह देश की जनता के धन, विश्वास और लोकतांत्रिक अधिकार का समय होता है। संसद का प्रत्येक व्यर्थ गया मिनट वास्तव में जनता के विश्वास से घटा हुआ एक मिनट है। दुर्भाग्य यह है कि संसद में हंगामा अब अपवाद नहीं, बल्कि संसदीय राजनीति का लगभग नियमित हथियार बनता जा रहा है। मुद्दे उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है, सरकार को घेरना विपक्ष का दायित्व है और असहमति लोकतंत्र की शक्ति है, लेकिन असहमति को संवाद में बदलने के बजाय कार्यवाही रोक देना लोकतंत्र को मजबूत नहीं करता। विरोध की भी एक मर्यादा होती है। यदि विपक्ष अपनी बात रखने के लिए सदन को चलने ही न दे और सत्ता पक्ष विपक्ष की आवाज सुनने की बजाय राजनीतिक बहुमत को ही पर्याप्त समझे, तो दोनों मिलकर संसदीय लोकतंत्र की आत्मा को कमजोर करते हैं। इसे भी पढ़ें: Lok Sabha में मात्र 19% और Rajya Sabha में 39.17% हो सका कामकाज, Parliament के कामकाज का रिपोर्ट कार्ड देखकर खुद तय कीजिये सांसद पास हुए या फेल! इस सत्र में कुछ घटनाएं इस गिरावट को और स्पष्ट करती हैं। लोकसभा अध्यक्ष ने सत्र के समापन पर पारंपरिक समापन भाषण नहीं दिया। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस द्वारा लोकसभा अध्यक्ष के साथ होने वाली चाय पार्टी का बहिष्कार किया जाना भी केवल एक कार्यक्रम का बहिष्कार नहीं माना जा सकता। यह सदन के भीतर बढ़ती राजनीतिक कटुता का संकेत है। लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, मनभेद लोकतंत्र के लिए घातक हैं। संसद में बहस के बाद हाथ मिलाने की संस्कृति विकसित होनी चाहिए, बहस के बाद दूरी बढ़ाने की नहीं। इस मानसून सत्र को नीट-यूजी पेपर लीक, जंतर-मंतर छात्र आंदोलन, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग और राम मंदिर में दान चोरी जैसे मुद्दों के लिए भी याद किया जाएगा। जंतर-मंतर पर हुई हिंसा के बाद विपक्ष केंद्रीय गृहमंत्री से जवाब मांग रहा था। जब सत्र के अंतिम दिनों में गृहमंत्री जवाब देने को तैयार हुए तो विपक्ष द्वारा उनका वक्तव्य सुनने से इनकार करना संसदीय विवेक की कसौटी पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। यदि विपक्ष को सरकार के जवाब से असहमति थी, तो उसे सुनकर तथ्यात्मक प्रतिवाद करना अधिक प्रभावी लोकतांत्रिक रास्ता होता। संसद में जवाब सुनने से इनकार करना प्रश्न का समाधान नहीं, प्रश्न को अनुत्तरित छोड़ना है। यह भी सच है कि तमाम गतिरोध के बीच संसद ने कुछ महत्वपूर्ण काम किए। विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक यानी एफसीआरए को सरकार ने विरोध के बीच संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा। सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 दोनों सदनों में पारित हुआ, जिसका उद्देश्य परीक्षाओं में अनुचित साधनों पर अंकुश लगाना और दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करना है। बैंकिंग रिकॉर्ड को नए डिजिटल ढांचे से जोड़ने, जन्म-मृत्यु के विलंबित पंजीकरण को अधिक कठोर बनाने तथा अन्य विधायी एवं प्रशासनिक सुधारों की दिशा में भी कदम उठे। केरल का नाम विधिवत केरलम किए जाने का निर्णय भी इसी सत्र का हिस्सा रहा। ये उपलब्धियां बताती हैं कि यदि संसद चले तो कम समय में भी महत्वपूर्ण काम संभव है। लेकिन सवाल फिर वही है-जब संसद चल सकती है तो उसे बार-बार रोकने की आवश्यकता क्यों पड़ती है? क्या हम यह भूल गए हैं कि लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव जीतना नहीं है? लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ है-विचारों का सम्मान, असहमति की स्वीकार्यता, संवाद की निरंतरता और निर्णय प्रक्रिया में जनता की भागीदारी। सत्ता पक्ष को यह समझना होगा कि बहुमत उसे शासन करने का अधिकार देता है, लेकिन विपक्ष को सुनने से मुक्त नहीं करता। दूसरी ओर विपक्ष को यह स्वीकार करना होगा कि विरोध का अधिकार संसद को निष्क्रिय करने का अधिकार नहीं है। अतीत में हमारी संसदीय परंपरा ने अनेक कठिन दौर देखे हैं। तीखी बहसें हुईं, वैचारिक संघर्ष हुए, सरकारों की आलोचना हुई, लेकिन संसद को संवाद का मंच बनाए रखने की कोशिश होती रही। आज आवश्यकता है कि हम उस परंपरा को पुनर्जीवित करें। राजनीतिक दलों को अपने भीतर यह आत्ममंथन करना होगा कि क्या वे जनता के बीच जाकर यह कह सकते हैं कि हमने संसद में आपके प्रश्नों के लिए उपलब्ध समय का पूरा उपयोग किया? क्या कोई सांसद गर्व से कह सकता है कि उसने अपने कार्यकाल के प्रत्येक संसदीय अवसर को राष्ट्रहित में लगाया? संसद में हंगामा करना आसान है, लेकिन संसद चलाना चरित्र, संयम और लोकतांत्रिक परिपक्वता मांगता है। नारे लगाने के लिए ऊर्जा चाहिए, लेकिन तथ्यपूर्ण बहस के लिए अध्ययन चाहिए। माइक के सामने खड़े होने के लिए राजनीतिक उत्साह चाहिए, लेकिन कानून बनाने के लिए दूरदृष्टि चाहिए। कार्यवाही रोकने के लिए संख्या पर्याप्त हो सकती है, लेकिन राष्ट्र निर्माण के लिए विवेक, धैर्य और संवाद आवश्यक है। आजादी के 80वें वर्ष की ओर बढ़ते भारत के लिए यह आत्ममंथन का समय है। हमने विज्ञान, अर्थव्यवस्था, तकनीक और वैश्विक प्रतिष्ठा के अनेक क्षेत्रों में बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं। लेकिन क्या हमारी राजनीतिक संस्थाएं भी उसी गति से परिपक्व हुई हैं? क्या हम संसदीय प्रणाली को इतना सशक्त बना पाए हैं कि संसद के एक-एक मिनट का अधिकतम उपयोग कर सकें? क्या हम अपनी असहमति को इतनी गरिमा दे पाए हैं कि विरोध भी हो और संवाद भी बना रहे? क्या हम सत्ता को इतनी विनम्रता और विपक्ष को इतना विवेक दे पाए हैं कि दोनों मिलकर लोकतंत्र को मजबूत करें? इन प्रश्नों के उत्तर केवल संसद भवन के भीतर नहीं खोजे जाने चाहिए। राजनीतिक दलों के नेतृत्व, सांसदों, संसदीय कार्यप्रणाली और अंततः हम नागरिकों-सभी को इस पर विचार करना होगा। जनता को भी यह प्रश्न पूछना चाहिए कि उसका प्रतिनिधि संसद में कितनी बार उपस्थित रहा, कितने प्रश्न पूछे, कितनी बहसों में भाग लिया और राष्ट्र के लिए क्या सार्थक योगदान दिया। लोकतंत्र केवल पांच वर्ष में एक बार वोट देने से मजबूत नहीं होता, लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब जनता अपने प्रतिनिधियों से निरंतर जवाब मांगती है। हंगामा किसी दल की विजय नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की सामूहिक पराजय है। संसद चलेगी तो प्रश्न पूछे जाएंगे, प्रश्न पूछे जाएंगे तो सरकार जवाब देगी, जवाब मिलेगा तो नीतियों की समीक्षा होगी और सार्थक कानून बनेंगे। यही लोकतंत्र की जीवन-धारा है। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
कलकत्ता हाई कोर्ट ने 'फर्जी हस्ताक्षर' मामले में अभिषेक बनर्जी को मिली अंतरिम सुरक्षा बढ़ाई
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नितिन नबीन की नई टीम में स्मृति ईरानी की नियुक्ति को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अमेठी की पूर्व सांसद और केंद्रीय मंत्री रह चुकीं ईरानी को पार्टी संगठन में महासचिव की जिम्मेदारी दी गई है। वह राष्ट्रीय स्तर पर संगठन के कामकाज में अहम भूमिका निभाएंगी।
Dimagi Naxal Controversy: PM Modi का दांव उलटा पड़ा, क्या पीछे हटेगी सरकार?
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चिदंबरम की भारत और विकास विरोधी मानसिकता उनके हर फैसले में साफ झलकती है। कभी उन्हें डिजिटल इंडिया से समस्या हुई कभी उन्होंने भगवा आतंक का नैरेटिव गढ़ा।
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झारखंड छात्र आंदोलन पर कांग्रेस का समर्थन, बोली-जायज मांगों का जल्द हो समाधान
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केरल वंदे मातरम विवाद: राजीव चंद्रशेखर के आरोपों पर सीपीएम नेता का पलटवार, किया राज्य सरकार का बचाव
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सीएम भूपेंद्र पटेल सैन फ्रांसिस्को पहुंचे, 'वाइब्रेंट गुजरात 2027' से पहले निवेशकों से करेंगे मुलाकात
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नई दिल्ली, भारत के प्रमुख ऑफिस मार्केट्स में 2026 की दूसरी तिमाही में किराए में 10 प्रतिशत तक की वृद्धि देखने को मिली है। इस दौरान स्पेस की मांग भी 10 मिलियन स्क्वायर फीट के आसपास रही है। यह जानकारी सोमवार को जारी एक रिपोर्ट में दी गई।
अन्नामलाई का मोदी सरकार पर निशाना: 'गुजरात-केंद्रित विकास व निवेश-इवेंट नहीं चलेगा'
तमिलनाडु बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष के. अन्नामलाई ने पार्टी छोड़ने के बाद अब मोदी सरकार पर आरोप लगाया है कि एक ही राज्य में अवसर पैदा करना भारत के विकास का मॉडल नहीं हो सकता। सभी एआई कंपनियों से लेकर कॉमनवेल्थ गेम्स तक गुजरात में जा रहे हैं।
Dimaagi Naxal Controversy: युवाओं का आंदोलन, क्या फिर फंसी Modi सरकार? | Janadesh Charcha
'कांग्रेस कितने भी प्रमाण दें, देशभक्त नहीं हो सकते', 'वंदे मातरम' विवाद पर भाजपा सांसद ने बोला हमला
'कांग्रेस कितने भी प्रमाण दें, देशभक्त नहीं हो सकते', 'वंदे मातरम' विवाद पर भाजपा सांसद ने बोला हमला
देश की प्रतिष्ठित कानून यूनिवर्सिटियों के छात्रों की ओर से सीजेआई सूर्यकांत का बढ़ता विरोध हर किसी को चौंका रहा है क्योंकि देश के इतिहास में ऐसा घटनाक्रम पहले कभी देखने में नहीं आया। हम आपको बता दें कि हैदराबाद की NALSAR से उठी छात्रों की असहमति अब बेंगलुरु की NLSIU तक पहुंच गई है और देखते ही देखते यह मामला एक दीक्षांत समारोह के मुख्य अतिथि के विरोध से कहीं बड़ा बन गया है। इस समय स्थिति यह है कि कानून यूनिवर्सिटियों के छात्र अब सीधे उन संस्थाओं और पदों की भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं, जिन्हें कानून और न्याय की व्यवस्था का प्रहरी माना जाता है। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में CJI सूर्यकांत को लेकर छात्रों की नाराजगी, BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा की विवादित कार्रवाई और उसके बाद छात्रों के पक्ष में खड़ी होती कानून की युवा पीढ़ी है। सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि दीक्षांत समारोह में कौन आएगा, बल्कि यह है कि क्या असहमति जताने वाले कानून के छात्रों को अपनी आवाज उठाने की कीमत अपने भविष्य से चुकानी पड़ेगी? हम आपको याद दिला दें कि विवाद की शुरुआत NALSAR के छात्रों की उस आपत्ति से हुई, जिसमें उन्होंने विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को मुख्य अतिथि बनाए जाने पर असहमति जताई। छात्रों की नाराजगी का संबंध 20 जुलाई को संसद की ओर हुए छात्रों के मार्च और उस दौरान कथित पुलिस ज्यादती से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई से था। छात्रों ने CJI की अध्यक्षता वाली पीठ के रुख को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी। हालांकि बाद में उन्हीं मामलों में अदालत ने छात्रों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई पर रोक लगाई, वीडियो और CCTV फुटेज सुरक्षित रखने को कहा और स्वतंत्र जांच जैसे विकल्पों पर भी विचार किया। इसे भी पढ़ें: Manan Kumar Mishra कौन हैं? NALSAR विवाद और CJP कैंपेन से सुर्खियों में BCI चेयरमैन इस बीच CJI सूर्यकांत ने स्वयं स्पष्ट कर दिया कि उन्होंने NALSAR का निमंत्रण स्वीकार ही नहीं किया था। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने निमंत्रण स्वीकार नहीं किया तो उनके वहां जाने का सवाल ही नहीं उठता। यानी जिस विवाद ने इतना बड़ा रूप ले लिया, उसमें CJI की ओर से मुख्य अतिथि बनने की सहमति ही नहीं थी। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। असली तूफान तब आया जब इस छात्र विरोध में बार काउंसिल ऑफ इंडिया यानी BCI कूद पड़ा। 13 अगस्त को BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा ने राज्य बार काउंसिलों को निर्देश दिया कि NALSAR के 2026 बैच के छात्रों का अधिवक्ता के रूप में नामांकन अगले आदेश तक रोक दिया जाए। BCI ने यह कदम उन छात्रों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान की जांच का हवाला देते हुए उठाया था। लेकिन यह आदेश कुछ ही घंटों में कानूनी बिरादरी और छात्रों के बीच भारी विरोध का कारण बन गया। सवाल उठा कि आखिर कुछ छात्रों के विरोध के जवाब में उनकी पूरी कक्षा के भविष्य को ही अधर में कैसे डाला जा सकता है? विरोध बढ़ा तो BCI को पीछे हटना पड़ा। संशोधित आदेश में कहा गया कि अधिकांश छात्र निर्दोष हैं और कुछ लोगों के कथित आचरण के लिए पूरी कक्षा को दंडित नहीं किया जा सकता। बाद में मनन कुमार मिश्रा ने छात्रों से माफी भी मांगी। उन्होंने कहा कि उनके किसी शब्द या पत्र से छात्रों की भावनाएं आहत हुई हों तो उन्हें इसका खेद है और छात्रों की भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए। लेकिन माफी के बाद भी सबसे बड़ा सवाल वहीं खड़ा रहा कि क्या BCI को ऐसा आदेश देने का अधिकार था? यही वह बिंदु है जहां मामला महज विवाद से निकलकर कानून के दायरे में पहुंचता है। Advocates Act, 1961 के तहत BCI का काम कानूनी शिक्षा के मानक तय करना, अधिवक्ताओं के पेशेवर आचरण को नियंत्रित करना, अनुशासनात्मक व्यवस्था और राज्य बार काउंसिलों की निगरानी करना है। लेकिन अधिवक्ताओं के रूप में नामांकन राज्य बार काउंसिलों के अधिकार क्षेत्र में आता है। ऐसे में NALSAR के छात्रों का नामांकन रोकने का निर्देश BCI के अधिकार-क्षेत्र की सीमा को लेकर गंभीर सवाल खड़ा करता है। यहीं से विवाद ने एक नया रूप लिया। बेंगलुरु के NLSIU के छात्रों और पूर्व छात्रों ने NALSAR के छात्रों के समर्थन में मोर्चा खोल दिया। 165 स्नातक छात्रों, 409 वर्तमान छात्रों और 128 पूर्व छात्रों सहित 700 से अधिक लोगों ने संयुक्त बयान जारी किया। उन्होंने NALSAR के छात्रों और शिक्षकों के प्रति बिना शर्त समर्थन जताते हुए अपने विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में CJI सूर्यकांत और BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा की उपस्थिति पर भी आपत्ति दर्ज कर दी। NLSIU के छात्रों ने BCI से सार्वजनिक और बिना शर्त माफी की मांग की। उन्होंने छात्रों और शिक्षकों की पहचान बताने के निर्देश को “विच-हंट” बताते हुए कहा कि ऐसी कार्रवाई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर डर पैदा कर सकती है। उनका तर्क है कि संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को अपनी बात कहने का अधिकार देता है और किसी वैधानिक संस्था की शक्ति का इस्तेमाल असहमति दबाने के लिए नहीं किया जा सकता। छात्रों ने BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा के पुराने बयानों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने प्रदर्शनकारी छात्रों को लेकर उनकी कथित टिप्पणियों का हवाला देते हुए कहा कि इस तरह की भाषा ने कानूनी संस्थाओं में भरोसे को नुकसान पहुंचाया है। दूसरी ओर, मनन कुमार मिश्रा ने अब छात्रों को देश के सबसे जागरूक और विवेकशील युवाओं में बताते हुए कहा है कि शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का हिस्सा है और छात्रों को अपने फैसले स्वतंत्र रूप से लेने चाहिए। इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू शायद यही है कि कानून पढ़ने वाले छात्र अब केवल कानून के दर्शक नहीं बने रहना चाहते। वे उस कानून को अपने ऊपर लागू होते हुए भी देख रहे हैं और उसी के आधार पर सवाल भी पूछ रहे हैं। NALSAR से NLSIU तक पहुंची यह आवाज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आज के ये छात्र ही कल के वकील, वरिष्ठ अधिवक्ता, शिक्षक और न्यायाधीश होंगे। यदि कानून के संस्थानों से जुड़े सवालों पर सवाल उठाना ही अनुशासनहीनता मान लिया जाएगा, तो लोकतंत्र में असहमति की जगह कहां बचेगी? उधर, BCI के लिए भी यह घटना आत्ममंथन का अवसर है। जिस संस्था पर देश में कानूनी पेशे के स्तर और अनुशासन को बनाए रखने की जिम्मेदारी है, उससे यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वह अपनी हर कार्रवाई को स्पष्ट वैधानिक अधिकार और संस्थागत प्रक्रिया के आधार पर ही करे। NALSAR प्रकरण ने दिखा दिया है कि कानून की सबसे बड़ी ताकत उसका अधिकार नहीं, बल्कि उस अधिकार का संयमित और न्यायपूर्ण इस्तेमाल है। फिलहाल तस्वीर साफ है। एक तरफ देश की कानूनी व्यवस्था के शीर्ष पद हैं, दूसरी तरफ देश की प्रतिष्ठित कानून यूनिवर्सिटियों के छात्र। और इन छात्रों का संदेश भी उतना ही साफ है कि पद बड़ा हो सकता है, लेकिन संविधान उससे बड़ा है; संस्था शक्तिशाली हो सकती है, लेकिन कानून उससे ऊपर है। -नीरज कुमार दुबे
पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने अपने ही देश की हिंदू आबादी को लेकर ऐसा बयान दिया है, जिसने पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों की स्थिति और वहां की तथाकथित धार्मिक सहिष्णुता के दावों पर फिर से बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। हम आपको बता दें कि स्वतंत्रता दिवस समारोह से जुड़े एक कार्यक्रम में जरदारी ने भारत और पाकिस्तान की तुलना करते हुए पाकिस्तान में रहने वाले हिंदुओं को लेकर ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया, जिसे लेकर तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। सबसे सख्त पलटवार मशहूर लेखक और गीतकार जावेद अख्तर ने किया है। जरदारी ने कहा कि भारत और पाकिस्तान को लेकर दोनों देशों का नजरिया अलग है। उन्होंने कहा कि भारत 'अखंड भारत' की सोच रखता है, जबकि पाकिस्तान एक मुस्लिम देश है। इसके बाद उन्होंने पाकिस्तान की हिंदू आबादी का जिक्र करते हुए कहा कि वहां मुसलमान 3-4 प्रतिशत हिंदू आबादी को 'टॉलरैट' यानी 'सहन' करते हैं। जरदारी ने यह दावा भी किया कि पाकिस्तान में हिंदू उतने ही स्वतंत्र और सुरक्षित हैं, जितने वे कहीं और हो सकते हैं। उन्होंने यहां तक कह दिया कि पाकिस्तान के हिंदू भारत की बजाय पाकिस्तान के साथ रहना ज्यादा पसंद करेंगे। इसे भी पढ़ें: पाकिस्तानी राष्ट्रपति Asif Ali Zardari का दावा- Pakistan में हिंदू सुरक्षित और भारत से ज्यादा यहीं रहना करते हैं पसंद देखा जाये तो यहीं जरदारी के बयान की सबसे बड़ी विडंबना सामने आती है। जिस देश के राष्ट्रपति को अपने नागरिकों की बराबरी, सुरक्षा और सम्मान की बात करनी चाहिए, वही राष्ट्रपति अल्पसंख्यक समुदाय के लिए 'हम उन्हें सहते हैं' जैसी भाषा इस्तेमाल करता दिखाई दे रहा है। देखा जाये तो सवाल सिर्फ एक शब्द का नहीं है। सवाल उस मानसिकता का है जिसमें किसी देश के नागरिकों के अधिकारों को उनके धर्म के आधार पर बहुसंख्यक समुदाय की 'सहनशीलता' से जोड़ दिया जाता है। जरदारी का बयान इसलिए भी निशाने पर है क्योंकि उनके आधिकारिक बयानों में पाकिस्तान को अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने वाला देश बताया जाता रहा है। अगस्त 2025 में अल्पसंख्यक दिवस के मौके पर जरदारी ने संविधान के तहत सभी नागरिकों को समान अधिकार देने, धार्मिक भेदभाव के खिलाफ खड़े होने और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की प्रतिबद्धता जताई थी। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि संवैधानिक बराबरी और सार्वजनिक मंच पर 'हम हिंदुओं को सहते हैं', इन दोनों में से पाकिस्तान की असली सोच कौन-सी है? दूसरी ओर, जरदारी के बयान पर जावेद अख्तर ने बिना किसी लाग-लपेट के सीधा हमला किया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति कहते हैं कि उनके देश में 3-4 प्रतिशत हिंदू आबादी को 'टॉलरैट' किया जाता है। इसके बाद अख्तर ने जरदारी के पुराने चर्चित उपनाम 'Mr Ten Percent' को पकड़ते हुए ऐसा तंज कसा, जिसने पूरे बयान को और ज्यादा राजनीतिक रूप से विस्फोटक बना दिया। जावेद अख्तर ने कहा कि वह समझ सकते हैं कि जरदारी हमेशा से उन लोगों के प्रति असंवेदनशील रहे हैं जो '10 प्रतिशत से कम' हैं। यह एक सीधा और बेहद धारदार व्यंग्य था। जरदारी के 'Mr Ten Percent' उपनाम को उनके हिंदुओं के '3-4 प्रतिशत' वाले बयान से जोड़कर अख्तर ने एक ही वार में उनकी संवेदनशीलता और नैतिकता दोनों पर सवाल खड़ा कर दिया। हम आपको बता दें कि 'Mr Ten Percent' उपनाम जरदारी पर लगे पुराने भ्रष्टाचार के आरोपों से जुड़ा रहा है। 1980 और 1990 के दशक में उन पर सरकारी परियोजनाओं और कारोबारी सौदों में 10 प्रतिशत कमीशन मांगने के आरोप लगाए गए थे। जरदारी ने इन आरोपों से इंकार किया था, लेकिन यह उपनाम लंबे समय तक उनकी राजनीतिक पहचान से जुड़ा रहा। अख्तर ने इसी पुराने संदर्भ को जरदारी के मौजूदा बयान के साथ जोड़कर उन्हें कठघरे में खड़ा कर दिया। वैसे भी जावेद अख्तर की यह प्रतिक्रिया कोई अचानक पैदा हुआ आक्रोश भी नहीं है। वह लंबे समय से पाकिस्तान की आतंकवाद और भारत विरोधी नीतियों पर खुलकर बोलते रहे हैं। पिछले वर्ष मुंबई में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा था कि भारत ने पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने के लिए सांस्कृतिक और दूसरे स्तरों पर प्रयास किए, लेकिन पाकिस्तान की तरफ से रिश्ते सुधारने के लिए ठोस प्रयास नहीं हुए। उन्होंने सीमा पार आतंकवाद और आतंकियों को पनाह देने के मुद्दे पर भी पाकिस्तान को घेरा था। इसके अलावा, जरदारी के बयान ने एक पुराने सवाल को फिर जिंदा कर दिया है कि क्या पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के अधिकार वास्तव में नागरिक अधिकार हैं या बहुसंख्यक समाज की 'मेहरबानी'? अगर हिंदुओं को इसलिए 'स्वतंत्र' बताया जा रहा है क्योंकि बहुसंख्यक उन्हें 'सहन' करते हैं, तो फिर बराबरी का दावा खोखला ही नजर आता है। और यही वह बिंदु है जहां जावेद अख्तर का पलटवार जरदारी के बयान से कहीं आगे निकल जाता है। उन्होंने सिर्फ एक राष्ट्रपति के शब्दों पर आपत्ति नहीं जताई, बल्कि उस सोच पर चोट की जिसमें अल्पसंख्यकों के अधिकारों को बहुसंख्यक की सहनशीलता से तौला जाता है। बहरहाल, जरदारी के लिए यह बयान महज एक भाषण की पंक्ति हो सकती है, लेकिन अख्तर ने उसी पंक्ति को आईना बना दिया। '3-4 प्रतिशत' हिंदुओं को 'सहन' करने का दावा करने वाले पाकिस्तान के राष्ट्रपति को जवाब देते हुए उन्होंने '10 प्रतिशत' वाले तंज से यह संदेश साफ कर दिया कि नागरिक अधिकार किसी बहुसंख्यक की दया नहीं होते।
आज से शुरू होगा आंध्र विधानसभा सत्र - किसानों और राजधानी परियोजना पर चर्चा
आंध्र प्रदेश विधानसभा का मानसून सत्र सोमवार से शुरू होगा। इस दौरान एल नीनो के प्रभाव, किसानों से जुड़े मुद्दों और अमरावती राजधानी परियोजना के कामों की प्रगति सहित कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा होने की संभावना है।
शहज़ाद पूनावाला ने दूसरी बार इस्तीफा भेजा, आग्रह किया- स्वीकार करें
शहज़ाद पूनावाला का पहला इस्तीफा बीजेपी ने नामंजूर कर दिया था। अब उन्होंने फिर से यह कहते हुए इस्तीफा भेजा है कि वे निजी क्षेत्र में जाना चाहते हैं, उनकी कुछ मजबूरियां भी हैं। शहज़ाद ने प्रवक्ता और पार्टी दोनों से इस्तीफा दिया है।
यूजीसी‑नेट पेपर दोबारा होंगे, अंग्रेज़ी, कॉमर्स और समाजशास्त्र की नई परीक्षा
राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) ने यूजीसी-नेट जून 2026 परीक्षा के अंग्रेजी, कॉमर्स और समाजशास्त्र विषयों के पेपर दोबारा कराने का फैसला किया है। इन तीनों प्रश्नपत्रों में तथ्यात्मक, टाइपिंग, अनुवाद और भाषा संबंधी कई गंभीर गलतियां पाए जाने के बाद एनटीए ने यह निर्णय लिया है।
मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने मध्य प्रदेश के यूसीसी कानून को बताया संविधान विरोधी, कहा- मुसलमान मानने को बाध्य नहीं
पश्चिम बंगाल : ममता बनर्जी ने पूर्व तृणमूल विधायक आशीष बनर्जी के निधन पर दुख जताया
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ड्यूटी के दौरान जान गंवाने वाले कॉन्स्टेबल के परिवार को सीएम विजय ने 30 लाख की आर्थिक मदद की घोषणा की
आशीष बनर्जी की आत्महत्या के पीछे हो सकता है 'ब्लैकमेल का दबाव': सीएम सुवेंदु अधिकारी
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राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान का पूरा सम्मान किया जाना चाहिए: सीजेपी प्रवक्ता आशुतोष रांका
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'दिमागी नक्सल' वाले बयान पर भाजपा ने कांग्रेस को घेरा, चिदंबरम पर नक्सलियों के बचाव करने का लगाया आरोप
ब्राह्मण चेहरों के अभाव में बसपा 2027 में कैसे साधेगी सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला?
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वंदे मातरम विवाद पर सोनिया माफी मांगें- शाह; अपनी नाकामियों से भटका रहे गृहमंत्री- कांग्रेस
अमित शाह ने सोनिया गांधी पर स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान 'वंदे मातरम' का अपमान करने का आरोप लगाया है। जवाब में कांग्रेस ने कहा, 'डॉ. आंबेडकर का अपमान करने वाला आदमी अपने साहिब की भारी विफलताओं से ध्यान भटकाने के लिए कांग्रेस से माफी की मांग कर रहा है।'
पश्चिम बंगाल: कांग्रेस नेता और बेटे की हत्या में टीएमसी से जुड़ी महिला पंचायत प्रधान समेत 3 गिरफ्तार
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राहुल गांधी ने की पुणे में 'छात्रों की गूंज' की घोषणा- 'अब लड़कियां बोलेंगी, देश सुनेगा'
राहुल गांधी ने कहा, 'मुझे हर एक युवा पर गर्व है - खासकर उन लड़कियों पर, जिन्हें बीजेपी के गुंडों की बदसलूकी, गाली-गलौज और हिंसा का सामना करना पड़ा, यहां तक कि उन्हें प्रधानमंत्री से माफी मांगने के लिए मजबूर किया गया। लेकिन अब उनकी आवाज़ दबाई नहीं जा सकेगी।'
कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम बोले- 'मुझे दिमागी नक्सल होने पर गर्व'
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'दिमाग़ी नक्सल' से कैसे निपटेंगे PM Modi? Strategy against Gen Z? | The Daily Show
'कश्मीर से तमिलनाडु तक मां भारती की आजादी का था लक्ष्य', उपराष्ट्रपति ने 80वें स्वतंत्रता दिवस पर दिया खास संदेश
12 साल में भारत ने पकड़ी नई रफ्तार, अब 140 देशवासियों के संकल्प और सामर्थ्य को रोकना नामुमकिन: पीएम मोदी
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राहुल गांधी की बढ़ीं मुश्किलें! अमित शाह के खिलाफ बयान पर विशेषाधिकार हनन का नोटिस, 28 अगस्त तक देना होगा जवाब
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आत्मनिर्भरता से विकसित भारत की ओर आजादी की उड़ान
15 अगस्त भारत के राष्ट्रीय जीवन का वह गौरवपूर्ण दिन है, जब हमारी धरती ने पराधीनता की लंबी रात के बाद स्वतंत्रता का सूर्य देखा था। 2026 में हम स्वतंत्रता का 80वां दिवस मना रहे हैं। यह केवल अतीत के गौरव को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि यह आत्ममंथन करने का भी समय है कि जिन सपनों के लिए असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना सर्वस्व न्योछावर किया था, उन सपनों को हमने कितना साकार किया और अब 2047 में स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष तक भारत को कैसा बनाना है। 1947 ने हमें राजनीतिक स्वतंत्रता दी थी, लेकिन 2047 का लक्ष्य हमें आर्थिक, सामाजिक, तकनीकी, सामरिक और नैतिक रूप से आत्मनिर्भर एवं विकसित भारत बनाने का है। स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं है। स्वतंत्रता तब सार्थक होगी, जब प्रत्येक नागरिक भय, अभाव, अशिक्षा, बेरोजगारी, भेदभाव और अवसरों की असमानता से मुक्त हो। जब व्यक्ति अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी समझे, जब लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने और सरकार बनाने की प्रक्रिया न रहकर जनकल्याण का माध्यम बने, जब राजनीति में सेवा, सार्वजनिक जीवन में शुचिता और समाज में संवेदना प्रतिष्ठित हो। आजादी की पहली पीढ़ी ने देश को गुलामी से मुक्त किया था; आज की पीढ़ी को देश को निर्भरता, पिछड़ेपन और आत्महीनता से मुक्त करना है। पिछले वर्षों में भारत की यात्रा में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से बार-बार देश को आत्मनिर्भरता, नवाचार और युवाशक्ति का मंत्र दिया है। 2025 के स्वतंत्रता दिवस संबोधन में उन्होंने विशेष रूप से युवा वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, प्रतिभाशाली युवाओं और शोधकर्ताओं का आह्वान करते हुए पूछा कि भारत अपने लड़ाकू विमानों के लिए जेट इंजन स्वयं क्यों नहीं बना सकता। उन्होंने सेमीकंडक्टर से लेकर अंतरिक्ष, जैव-प्रौद्योगिकी और रक्षा तक भारतीय प्रतिभा को अपनी क्षमता के बल पर आगे बढ़ने का आग्रह किया। उन्होंने युवाओं के विचारों को रोकने के बजाय उन्हें अवसर देने और उनके नवाचार को राष्ट्रनिर्माण से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। यह बदलाव केवल भाषणों तक सीमित नहीं है। आज छोटे शहरों, कस्बों और गांवों से निकलने वाली प्रतिभाएं स्टार्टअप, अंतरिक्ष, खेल, विज्ञान, डिजिटल तकनीक और विनिर्माण के क्षेत्र में नई पहचान बना रही हैं। प्रधानमंत्री ने लाल किले से यह भी रेखांकित किया है कि भारत के युवाओं ने देश को दुनिया के अग्रणी स्टार्टअप इकोसिस्टम में स्थान दिलाया है और अनेक छोटे शहरों तथा ग्रामीण क्षेत्रों के युवा नई तकनीकी संभावनाओं को जन्म दे रहे हैं। इसे भी पढ़ें: स्वतंत्रता के 79 वर्ष: उपलब्धियों का उत्सव, आत्ममंथन का अवसर आत्मनिर्भर भारत इसी बदलती मानसिकता का परिणाम है। आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया से कट जाना नहीं, बल्कि दुनिया के साथ बराबरी से खड़े होकर अपने सामर्थ्य के आधार पर प्रतिस्पर्धा करना है। भारत अब केवल आयात करने वाला विशाल बाजार नहीं रहना चाहता; वह निर्माण करने, नवाचार करने और दुनिया को निर्यात करने वाला देश बन रहा है। मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, फार्मा, रक्षा उपकरण, अंतरिक्ष तकनीक और डिजिटल सेवाओं में भारत की क्षमता लगातार बढ़ी है। गैर-पेट्रोलियम वस्तुओं के निर्यात ने भी नए रिकॉर्ड बनाए हैं, जबकि सेवाओं के क्षेत्र में भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक शक्ति लगातार मजबूत हुई है। आत्मनिर्भरता की सबसे प्रभावशाली तस्वीर रक्षा क्षेत्र में दिखाई देती है। कभी भारत विश्व के बड़े हथियार आयातकों में गिना जाता था, लेकिन अब स्वदेशी उत्पादन और रक्षा निर्यात दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत के रक्षा निर्यात ने 38,424 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड स्तर हासिल किया, जो पिछले वर्ष के 23,622 करोड़ रुपये से 62.66 प्रतिशत अधिक है। यह परिवर्तन बताता है कि भारत अब केवल अपनी सुरक्षा आवश्यकताओं को पूरा करने की दिशा में आगे नहीं बढ़ रहा, बल्कि विश्व के देशों को रक्षा सामग्री उपलब्ध कराने की क्षमता भी अर्जित कर रहा है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत ने गोला-बारूद, हथियार, उप-प्रणालियां, प्रणालियां और महत्वपूर्ण पुर्जे लगभग 80 देशों तक पहुंचाए हैं। 2013-14 में रक्षा निर्यात महज 686 करोड़ रुपये था, जो 2024-25 में 23,622 करोड़ रुपये तक पहुंच गयाकृअर्थात एक दशक में लगभग 34 गुना वृद्धि। यह ‘मेक इन इंडिया’ से ‘मेक फॉर द वर्ल्ड’ की यात्रा का सशक्त प्रमाण है। लेकिन आत्मनिर्भर भारत की असली परीक्षा केवल अर्थव्यवस्था और तकनीक में नहीं है। हमें ऐसा भारत बनाना है जो आत्मनिर्भर होने के साथ आत्मसंयमी भी हो, शक्तिशाली होने के साथ संवेदनशील भी हो और आधुनिक होने के साथ अपनी संस्कृति एवं नैतिक जड़ों से जुड़ा भी हो। महात्मा गांधी, भगवान महावीर और भगवान बुद्ध ने हमें बताया था कि विकास का अंतिम लक्ष्य मनुष्य की गरिमा और समाज में शांति है। यदि तकनीक बढ़ती जाए लेकिन मनुष्यता घटती जाए, यदि संपन्नता बढ़े लेकिन संवेदना कम हो जाए, यदि अधिकारों की मांग बढ़े लेकिन कर्तव्यबोध समाप्त हो जाए तो स्वतंत्रता अधूरी ही रहेगी। हमारे सामने आज भी गरीबी, बेरोजगारी, असमानता, भ्रष्टाचार, सामाजिक तनाव, हिंसा, पर्यावरण संकट और डिजिटल असमानता जैसी चुनौतियां हैं। इसलिए स्वतंत्रता दिवस केवल उपलब्धियों का उत्सव नहीं, बल्कि कमियों को पहचानकर उन्हें दूर करने का संकल्प भी है। हमें ऐसी नागरिक संस्कृति विकसित करनी होगी जिसमें सत्य, शुचिता, सहिष्णुता, अनुशासन, परस्पर सम्मान और राष्ट्रहित सर्वाेपरि हों। लोकतंत्र की मजबूती केवल संसद या सरकार से नहीं होती; वह नागरिक के चरित्र से होती है। लोकतंत्र को मजबूत संसद के साथ मजबूत समाज और जिम्मेदार नागरिक भी चाहिए। आज का भारत विश्व की युवा शक्ति का महत्वपूर्ण केंद्र है। 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य मूलतः युवाओं का लक्ष्य है, क्योंकि आज का युवा ही 2047 के भारत का नेतृत्व करेगा। प्रधानमंत्री ने ‘विकसित भारत/2047 रू वॉइस ऑफ यूथ’ पहल के माध्यम से युवाओं को केवल भविष्य के लाभार्थी नहीं, बल्कि परिवर्तन के एजेंट के रूप में सामने रखा है। इसीलिए 2026 के स्वतंत्रता दिवस अभियान का केंद्र भी युवाओं को एक मजबूत, आत्मनिर्भर, नवाचारी और भविष्य के लिए तैयार भारत के निर्माण से जोड़ना है। सरकारी ‘माय भारत’ पहल में युवाओं की भागीदारी को विशेष महत्व दिया गया है। 2047 की यात्रा में हमें युवाओं से केवल नौकरी पाने की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए; उन्हें रोजगार देने वाला, समस्या का समाधान खोजने वाला, नवाचार करने वाला और समाज का नेतृत्व करने वाला बनाना होगा। शिक्षा को डिग्री से कौशल, कौशल से रोजगार और रोजगार से उद्यमिता की ओर ले जाना होगा। गांव का युवा भी अंतरिक्ष में अवसर देखे, छोटे शहर की बेटी भी विज्ञान और तकनीक में विश्वस्तरीय पहचान बनाए, किसान का बेटा भी एग्रीटेक उद्यमी बने और सामान्य परिवार का युवा भी स्टार्टअप के माध्यम से हजारों लोगों के लिए रोजगार पैदा करेकृयही नए भारत की तस्वीर है। आजादी की पहली लड़ाई में युवाओं ने अपने प्राणों की आहुति देकर भारत को स्वतंत्र बनाया था। 2047 के भारत की लड़ाई में युवाओं को ज्ञान, नवाचार, चरित्र, परिश्रम और राष्ट्रभावना को अपना हथियार बनाना होगा। यदि 1947 की पीढ़ी ने पूछा थाकृ‘भारत को आजाद कैसे कराएं?’, तो आज की पीढ़ी को पूछना होगा-‘भारत को दुनिया का विकसित, समर्थ, शांतिपूर्ण और नैतिक नेतृत्व करने वाला राष्ट्र कैसे बनाएं?’स्वतंत्रता की सार्थकता इसी प्रश्न के उत्तर में छिपी है। हमें ऐसा भारत बनाना है जहां विकास की चमक के साथ मानवीयता की रोशनी भी हो; जहां विज्ञान आगे बढ़े तो संस्कार भी साथ चलें; जहां अर्थव्यवस्था मजबूत हो तो समाज भी समरस हो; जहां भारत अपनी सुरक्षा के लिए किसी पर निर्भर न हो और विश्व की शांति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाए। आज जब तिरंगा लाल किले की प्राचीर पर लहराएगा, तब हमें केवल यह नहीं कहना चाहिए कि भारत स्वतंत्र है, बल्कि यह संकल्प भी लेना चाहिए कि हम इस स्वतंत्रता को अधिक सार्थक, अधिक जिम्मेदार और अधिक जनकल्याणकारी बनाएंगे। 2047 का विकसित भारत सरकार का अकेला सपना नहीं, 140 करोड़ भारतीयों का सामूहिक संकल्प होना चाहिए। प्रधानमंत्री ने भी 2047 को नागरिकों के सपनों और संकल्पों से जोड़ते हुए स्पष्ट किया है कि विकसित भारत का निर्माण प्रत्येक भारतीय की भागीदारी से होगा। आजादी के अमृत से लेकर स्वतंत्रता के 80वें पड़ाव तक भारत ने लंबी यात्रा तय की है। अब अगला पड़ाव केवल आर्थिक शक्ति बनना नहीं, बल्कि विश्वास, विवेक, विज्ञान, संस्कार और सामर्थ्य से सम्पन्न भारत बनना है। शहीदों ने हमें स्वतंत्र भारत सौंपा था; अब हमारी जिम्मेदारी है कि हम आने वाली पीढ़ी को एक ऐसा भारत सौंपें जिस पर उसे गर्व हो। ’यही स्वतंत्रता का नया आयाम है, यही 2047 की ओर बढ़ते भारत का संकल्प है और यही हमारे तिरंगे के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।’ - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
स्वतंत्रता के 79 वर्ष: उपलब्धियों का उत्सव, आत्ममंथन का अवसर
15 अगस्त भारत की आत्मा, स्वाभिमान और सामूहिक संकल्प का उत्सव है। यह वह ऐतिहासिक क्षण है, जब सदियों की पराधीनता के बाद भारत ने स्वतंत्रता का अमृत प्राप्त किया और लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित एक नए युग की शुरुआत की। स्वतंत्रता के 79 वर्षों की इस यात्रा में भारत ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं, अनेक चुनौतियों का सामना किया है और अनेक ऐसे कीर्तिमान स्थापित किए हैं, जिन पर प्रत्येक भारतीय गर्व कर सकता है। आज जब पूरा देश तिरंगे के सम्मान में एकजुट होकर स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, तब यह अवसर केवल उपलब्धियों का उत्सव मनाने का ही नहीं बल्कि आत्ममंथन और भविष्य के संकल्प का भी है। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यह अपने आप में एक ऐसी उपलब्धि है, जिसकी मिसाल दुनिया में बहुत कम मिलती है। विविध भाषाओं, संस्कृतियों, धर्मों और परंपराओं से समृद्ध इस देश ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को न केवल सफलतापूर्वक अपनाया बल्कि उसे लगातार सशक्त भी बनाया। करोड़ों मतदाता नियमित रूप से चुनावों में भाग लेते हैं, सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण होता है और संविधान सर्वोच्च मार्गदर्शक के रूप में देश को दिशा देता है। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है। स्वतंत्रता के बाद भारत ने विकास की जिस यात्रा का आरंभ किया था, वह आज वैश्विक स्तर पर एक नई पहचान बना चुकी है। कभी खाद्यान्न संकट से जूझने वाला देश आज दुनिया के सबसे बड़े कृषि उत्पादकों में शामिल है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत ने उल्लेखनीय उपलब्धियां अर्जित की हैं। अंतरिक्ष अनुसंधान में भारतीय वैज्ञानिकों ने सीमित संसाधनों के बावजूद ऐसे कीर्तिमान स्थापित किए हैं, जिन्होंने पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया है। चंद्रयान और आदित्य जैसे मिशनों ने सिद्ध कर दिया है कि भारत केवल उपभोक्ता राष्ट्र नहीं बल्कि ज्ञान और नवाचार का नेतृत्व करने वाला देश बन रहा है। इसे भी पढ़ें: भारत स्वतंत्रता दिवस: रक्षा-उत्पादन विकास की राह पर तेज़ दौड़ डिजिटल क्रांति ने लोकतंत्र को नई शक्ति प्रदान की है। आज सरकारी सेवाएं डिजिटल माध्यम से लोगों तक पहुंच रही हैं। डिजिटल भुगतान, आधार, यूपीआई, ऑनलाइन शिक्षा, टेलीमेडिसिन और ई-गवर्नेंस जैसी व्यवस्थाओं ने शासन को अधिक पारदर्शी, तेज और नागरिक-केंद्रित बनाया है। ग्रामीण भारत भी डिजिटल परिवर्तन का सहभागी बन रहा है। यह परिवर्तन केवल तकनीकी नहीं बल्कि लोकतंत्र को अधिक सहभागी और उत्तरदायी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। भारत की आर्थिक यात्रा भी प्रेरणादायक रही है। आज देश विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। स्टार्टअप संस्कृति, नवाचार, विनिर्माण, हरित ऊर्जा, सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे क्षेत्रों में भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। युवाओं की ऊर्जा, महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और उद्यमिता की नई संस्कृति विकसित भारत की मजबूत नींव तैयार कर रही है। निश्चित रूप से यह भी स्वीकार करना होगा कि लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित नहीं होता। उसकी वास्तविक सफलता तब मानी जाती है, जब संसद, विधानसभाएं, न्यायपालिका, मीडिया और नागरिक समाज अपनी-अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों का पूरी गंभीरता से निर्वहन करें। संसदीय बहसें जितनी सार्थक होंगी, नीतियां उतनी ही प्रभावी बनेंगी। स्वस्थ संवाद, रचनात्मक विपक्ष, जवाबदेह सरकार और जागरूक नागरिक, इन्हीं चार स्तंभों पर लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती निर्भर करती है। आज भारत अनेक नई चुनौतियों का भी सामना कर रहा है। तेजी से बदलती वैश्विक परिस्थितियां, जलवायु परिवर्तन, साइबर सुरक्षा, सामाजिक समरसता, रोजगार, शिक्षा की गुणवत्ता और तकनीकी परिवर्तन जैसे विषय हमारे सामने हैं। इन चुनौतियों का समाधान केवल सरकारों से नहीं बल्कि समाज की सामूहिक भागीदारी से संभव है। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब नागरिक केवल अधिकारों की बात न करें बल्कि अपने कर्तव्यों के प्रति भी समान रूप से सजग रहें। आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक मतभेद लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर रहें। विचारों का संघर्ष लोकतंत्र की शक्ति है लेकिन व्यक्तिगत कटुता और संस्थाओं के प्रति अविश्वास उसकी कमजोरी बन सकते हैं। संसद और विधानसभाएं केवल राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के मंच नहीं बल्कि जनहित के सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्थान हैं। इनकी गरिमा बनाए रखना सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की समान जिम्मेदारी है। लोकतंत्र की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण आधार नागरिकों का चरित्र होता है। यदि समाज ईमानदारी, अनुशासन, संवेदनशीलता और राष्ट्रहित को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है तो लोकतांत्रिक संस्थाएं भी स्वतः सुदृढ़ होती हैं। भ्रष्टाचार, हिंसा, सामाजिक वैमनस्य और असहिष्णुता जैसी चुनौतियों का समाधान केवल कानून से नहीं, नैतिक जागरूकता और सामाजिक उत्तरदायित्व से भी संभव है। स्वतंत्रता दिवस हमें उन लाखों ज्ञात-अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों की याद दिलाता है, जिन्होंने बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के अपना सर्वस्व राष्ट्र के लिए समर्पित कर दिया। उनका सपना केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं था बल्कि ऐसा भारत बनाना था, जहां समान अवसर, सामाजिक न्याय, शिक्षा, वैज्ञानिक सोच, आर्थिक समृद्धि और मानवीय गरिमा प्रत्येक नागरिक को उपलब्ध हो। आज विकसित भारत-2047 का संकल्प उसी स्वप्न का आधुनिक विस्तार है। भारत आज दुनिया में शांति, लोकतंत्र, सह-अस्तित्व और वसुधैव कुटुम्बकम के संदेश के साथ आगे बढ़ रहा है। वैश्विक मंचों पर उसकी बढ़ती प्रतिष्ठा, आर्थिक क्षमता, वैज्ञानिक उपलब्धियां और सांस्कृतिक विरासत इस बात का प्रमाण हैं कि भारत केवल अपने लिए नहीं बल्कि पूरी मानवता के लिए सकारात्मक भूमिका निभाने की क्षमता रखता है। स्वतंत्रता के 79 वर्षों की यात्रा हमें यह विश्वास दिलाती है कि चुनौतियां चाहे कितनी भी बड़ी हों, भारत ने हर कठिन दौर को अवसर में बदलने की क्षमता दिखाई है। यही हमारी लोकतांत्रिक शक्ति है और यही हमारी राष्ट्रीय पहचान। आज आवश्यकता केवल इतनी है कि हम संविधान के आदर्शों, लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रहित को अपने व्यक्तिगत हितों से ऊपर रखें। यदि प्रत्येक नागरिक अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करे, प्रत्येक जनप्रतिनिधि जनसेवा को सर्वोच्च प्राथमिकता दे और प्रत्येक संस्था अपनी संवैधानिक मर्यादा का पालन करे तो विकसित, समृद्ध, सुरक्षित और आत्मनिर्भर भारत का सपना निश्चित रूप से साकार होगा। इस स्वतंत्रता दिवस पर आइए, हम केवल आजादी का उत्सव न मनाएं बल्कि एक नए भारत के निर्माण का संकल्प भी लें, ऐसा भारत, जो लोकतांत्रिक मूल्यों में और अधिक मजबूत हो, वैज्ञानिक दृष्टि में अग्रणी हो, सामाजिक समरसता का प्रतीक हो और विश्व समुदाय के लिए प्रेरणा का स्रोत बने। यही स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी और यही आजादी के वास्तविक अर्थ को सार्थक करने का सर्वोत्तम मार्ग भी। - योगेश कुमार गोयल (लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)
भारत स्वतंत्रता दिवस: रक्षा-उत्पादन विकास की राह पर तेज़ दौड़
विकासशील भारत अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, यह राष्ट्रीय स्तर पर आत्मनिरीक्षण और आगे की सोच का प्रतीक है। रक्षा उत्पादन का क्षेत्र इसकी आत्मनिर्भरता और रणनीतिक ऑटोनॉमी का एक अहम स्तंभ बनकर उभरा है। मिलिट्री हार्डवेयर के एक बड़े आयातक से एक भरोसेमंद डिफेंस निर्यातक बनने का सफर भारत की बढ़ती क्षमताओं और रणनीतिक दूरदर्शिता का सबूत है। यह बदलाव सिर्फ एक आर्थिक या टेक्नोलॉजिकल उपलब्धि नहीं है; यह असल में नेशनल सिक्योरिटी, जियोपॉलिटिकल स्टैंडिंग और ग्लोबल स्टेज पर ज़्यादा असरदार भूमिका निभाने की इच्छा से जुड़ा है। पिछले कुछ दशकों में, खासकर हाल के सालों में रक्षा उत्पादन में जो तरक्की हुई है, वह एक मजबूत स्वदेशी डिफेंस इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम बनाने की सोची-समझी कोशिश को दिखाती है। यह लेख भारत के रक्षा-उत्पादन विकास की खास बातों पर गहराई से बात करेगा, क्योंकि यह अपने 80वें स्वतंत्रता दिवस के करीब पहुंच रहा है, इसकी ग्रोथ को आगे बढ़ाने वाले कई वजहों को देखेगा, और उन रुकावटों की बारीकी से जांच करेगा जो इसकी पूरी क्षमता को चुनौती दे रही हैं। रक्षा उत्पादन डेवलपमेंट की खास बातें भारत के रक्षा उत्पादनके माहौल में एक बड़ा बदलाव आया है, जो विदेशी डिजाइनों की असेंबली और लाइसेंस्ड प्रोडक्शन से आगे बढ़कर स्वदेशी इनोवेशन और मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा दे रहा है। कई खास बातें इस तरक्की को दिखाती हैं। इसे भी पढ़ें: जानिए, आखिर दिल्ली क्यों रहती है आतंकियों के निशाने पर? वायुसेना के संदर्भ में, एडवांस्ड प्लेटफॉर्म और सिस्टम का विकास स्वदेशी टेक्नोलॉजी में एक बड़ी छलांग दिखाता है। लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एल सी ए) तेजस, एक मल्टी-रोल फाइटर जेट, इसका एक बड़ा उदाहरण है। दशकों के विकास के बाद, तेजस इंडियन एयर फोर्स के साथ स्क्वाड्रन सर्विस में शामिल हो गया है और इसे एक्सपोर्ट करने पर विचार किया जा रहा है, जो भारत की एडवांस्ड फाइटर एयरक्राफ्ट डिजाइन करने, डेवलप करने और बनाने की क्षमता को दिखाता है। इसी तरह, पांचवीं पीढ़ी के फाइटर, एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (ए एम सी ए) का विकास चल रहा है, जिसका मकसद भारत को ऐसी एडवांस क्षमताओं वाले चुनिंदा देशों के ग्रुप में जगह दिलाना है। नेवल डिफेंस के क्षेत्र में काफी तरक्की हुई है। भारत ने आई एन एस विक्रांत जैसे स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर को सफलतापूर्वक डेवलप और डिप्लॉय किया है, जो पहला स्वदेशी रूप से डिजाइन और बनाया गया एयरक्राफ्ट कैरियर है। यह उपलब्धि भारत को दुनिया भर में एक खास जगह दिलाती है, जो इसकी व्यापक नेवल शिपबिल्डिंग क्षमताओं को दिखाती है। इसके अलावा, स्कॉर्पीन क्लास (फ्रांस के नेवल ग्रुप के साथ मिलकर बनाया गया लेकिन इसमें काफी भारतीय कंटेंट है) और एडवांस्ड पारंपरिक पनडुब्बियों पर फोकस करने वाला आने वाला P75I प्रोजेक्ट सहित सबमरीन का स्वदेशी विकास, पानी के नीचे की लड़ाई में बढ़ती आत्मनिर्भरता को दिखाता है। एडवांस्ड स्वदेशी हथियारों और सेंसर से लैस डिस्ट्रॉयर, फ्रिगेट और ऑफशोर पेट्रोल वेसल का कंस्ट्रक्शन, भारतीय नेवी की ऑपरेशनल पहुंच और टेक्नोलॉजिकल बढ़त को और मजबूत करता है। थल सेना के लिए स्वदेशीकरण में काफी बढ़ोतरी देखी गई है। अर्जुन जैसे मेन बैटल टैंक (एम बी टी) का प्रोडक्शन, हालांकि शुरुआती विकास में चुनौतियों का सामना कर रहा था, लेकिन अब एक मज़बूत प्लैटफ़ॉर्म बन गया है। इससे भी ज़्यादा ज़रूरी बात यह है कि मॉडर्न आर्टिलरी सिस्टम, जिसमें धनुष टोड आर्टिलरी गन और के9 वज्र-T (भारत में लाइसेंस के तहत बनाया गया एक साउथ कोरियन डिज़ाइन) शामिल हैं, के लिए ज़ोर ने इंडियन आर्मी की फायरपावर को बेहतर बनाया है। कलाश्निकोव ए के-203 (भारत में बनी) जैसी देसी असॉल्ट राइफलों का विकास, और अगली पीढ़ी के इन्फेंट्री कॉम्बैट व्हीकल और आर्मर्ड पर्सनल कैरियर के लिए भविष्य के प्रोजेक्ट, ज़मीनी सेना को स्टेट-ऑफ़-द-आर्ट हथियारों से लैस करने के कमिटमेंट को दिखाते हैं। मिसाइल और रॉकेट का क्षेत्र भारत के लिए लगातार ताकत का क्षेत्र रहा है। इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (आई सी बी एम) की अग्नि सीरीज़, पृथ्वी शॉर्ट-रेंज बैलिस्टिक मिसाइल, आकाश सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम, और ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल (रूस के साथ एक जॉइंट वेंचर) का विकास और इंडक्शन मिसाइल टेक्नोलॉजी में भारत की एडवांस्ड क्षमताओं को दिखाता है। ये सिस्टम ज़रूरी रणनीतिक रोकथाम और हमला करने की क्षमता देते हैं। वर्टिकल टेक-ऑफ और लैंडिंग (वी टी ओ एल) मिसाइलों और हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी का चल रहा विकास, मिसाइल युद्ध में सबसे आगे रहने की भारत की इच्छा का और संकेत देता है। इलेक्ट्रॉनिक्स और कम्युनिकेशन सेक्टर में स्वदेशीकरण की तरफ़ काफ़ी ज़ोर देखा गया है। रोहिणी और स्वाति जैसे एडवांस्ड रडार सिस्टम से लेकर इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सुइट्स और सुरक्षित कम्युनिकेशन सिस्टम तक, भारतीय कंपनियां तेज़ी से ज़रूरी कंपोनेंट्स और सबसिस्टम डेवलप और प्रोड्यूस कर रही हैं। इससे विदेशी सप्लायर्स पर निर्भरता कम होती है और रक्षा नेटवर्क के अंदर साइबर सिक्योरिटी बढ़ती है। आखिर में, निजी रक्षा क्षेत्र का विकास एक उल्लेखनीय घटनाक्रम है। ऐतिहासिक रूप से सरकारी कंपनियों का दबदबा रहने के बाद, भारत ने अब निजी क्षेत्र की भागीदारी को सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया है। लार्सन एंड टुब्रो, टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड और महिंद्रा रक्षा सिस्टम्स जैसी कंपनियाँ महत्वपूर्ण खिलाड़ी के रूप में उभर रही हैं और विभिन्न रक्षा प्लेटफॉर्म और पुर्जों के डिज़ाइन, विकास और निर्माण में योगदान दे रही हैं। इससे इस क्षेत्र में गतिशीलता, प्रतिस्पर्धा और नवाचार आया है। विकास के कारक भारत के रक्षा उत्पादन की प्रभावशाली प्रगति रणनीतिक, आर्थिक और राजनीतिक कारकों के मेल से प्रेरित है। ये कारक आपस में जुड़े हुए हैं और एक-दूसरे को मज़बूत करते हैं, जिससे निरंतर विकास के लिए अनुकूल माहौल बनता है। (a) सबसे महत्वपूर्ण कारक रणनीतिक स्वायत्तता हासिल करने और विदेशी सैन्य उपकरणों पर निर्भरता कम करने की अटूट प्रतिबद्धता है। तेज़ी से बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य में, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक मज़बूत स्वदेशी रक्षा औद्योगिक आधार का होना बहुत ज़रूरी है। यह सुनिश्चित करता है कि भारत अन्य देशों की नीतियों या रणनीतिक हितों के दबाव में आए बिना अपनी रक्षा ज़रूरतों को पूरा कर सके। आत्मनिर्भरता की यह कोशिश भारत की विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा सिद्धांत का एक मुख्य आधार है। (b) बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण की ज़रूरत ने उन्नत रक्षा उपकरणों की निरंतर माँग पैदा की है। सीमा विवाद, क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियाँ और विश्वसनीय प्रतिरोध बनाए रखने की ज़रूरत के कारण लगातार अपग्रेड और आधुनिक प्लेटफॉर्म खरीदने की आवश्यकता होती है। यह माँग घरेलू उत्पादन के लिए एक शक्तिशाली प्रोत्साहन का काम करती है, जिससे निवेश और तकनीकी विकास को बढ़ावा मिलता है। (c) 'मेक इन इंडिया' पहल और स्वदेशीकरण के लिए सरकार की नीतिगत कोशिशें, जो 'रक्षा उत्पादन और निर्यात प्रोत्साहन नीति' (डी पी ई पी पी) जैसी योजनाओं में शामिल हैं, महत्वपूर्ण गति प्रदान करती हैं। 'रक्षा खरीद प्रक्रिया' (डी ए पी) जैसी नीतियां स्वदेशी डिज़ाइन और निर्मित उत्पादों को प्राथमिकता देती हैं और कुछ श्रेणियों को विशेष रूप से घरेलू खरीद के लिए आरक्षित करती हैं। उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में रक्षा कॉरिडोर की स्थापना समर्पित विनिर्माण केंद्र बनाने की दिशा में एक ठोस कदम है। (d) आर्थिक विकास और रोज़गार सृजन के लिए रक्षा विनिर्माण को एक प्रमुख क्षेत्र के रूप में पहचानना एक और महत्वपूर्ण कारक है। रक्षा उद्योग का उच्च गुणक प्रभाव (मल्टीप्लायर इफ़ेक्ट) होता है, जो डिज़ाइन, इंजीनियरिंग, विनिर्माण और अनुसंधान एवं विकास में कुशल रोज़गार के अवसर पैदा करता है। रक्षा उपकरणों के निर्यात से मूल्यवान विदेशी मुद्रा भी प्राप्त होती है, जिससे अर्थव्यवस्था को और बढ़ावा मिलता है। (e) रक्षा औद्योगिक कॉरिडोर की स्थापना और सार्वजनिक-निजी भागीदारी को बढ़ावा देने से रक्षा विनिर्माण के लिए अधिक अनुकूल इकोसिस्टम तैयार हुआ है। ये कॉरिडोर इंफ्रास्ट्रक्चर, वित्तीय प्रोत्साहन और आसान रेगुलेटरी माहौल देते हैं, जिससे स्थापित कंपनियां और स्टार्टअप दोनों आकर्षित होते हैं। प्राइवेट सेक्टर की बढ़ती भागीदारी से तेज़ी, इनोवेशन और दक्षता आती है, जो डिफेंस पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स (डी पी एस यू) की क्षमताओं को और बेहतर बनाती है। (f) इनोवेशन को बढ़ावा देने के लिए डिफेंस रिसर्च एंड विकास ऑर्गनाइज़ेशन ( डी आर डी ओ ) जैसे संस्थानों और एकेडमिक सहयोग से चल रही रिसर्च और विकास (आर एंड डी ) कोशिशें बहुत ज़रूरी हैं। आर एंड डी में निवेश और साथ ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स और साइबर वॉरफेयर जैसी नई तकनीकों को अपनाने पर ध्यान देने से यह पक्का होता है कि भारत की रक्षा क्षमताएं अत्याधुनिक बनी रहें। रक्षा उत्पादों के लिए बढ़ता एक्सपोर्ट मार्केट विकास का एक बड़ा मौका देता है। भारतीय कंपनियां ग्लोबल मंच पर अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन कर रही हैं और मित्र देशों को पेट्रोल बोट और हल्के लड़ाकू विमानों से लेकर मिसाइल और सर्विलांस ड्रोन तक के सिस्टम एक्सपोर्ट कर रही हैं। यह एक्सपोर्ट अभियान न केवल रेवेन्यू पैदा करता है, बल्कि भारतीय रक्षा उत्पादों की क्वालिटी और कॉम्पिटिटिवनेस को भी साबित करता है। विकास में चुनौतियां काफी प्रगति और मज़बूत प्रेरक कारकों के बावजूद, कई रुकावटें भारत की रक्षा उत्पादन क्षमता को पूरी तरह से हासिल करने में बाधा डाल रही हैं। विकास को तेज़ करने और सही मायने में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए इन चुनौतियों से निपटना ज़रूरी है। (a) सबसे बड़ी रुकावटों में से एक है ज़रूरी कंपोनेंट्स और सब-सिस्टम के लिए आयात पर लगातार निर्भरता। हालांकि भारत ने बड़े प्लेटफॉर्म बनाने में काफी प्रगति की है, लेकिन खास इलेक्ट्रॉनिक्स, सेंसर, इंजन और कुछ कच्चे माल के लिए सप्लाई चेन अक्सर विदेशी स्रोतों पर निर्भर रहती है। यह निर्भरता जियोपॉलिटिकल संकट या सप्लाई में रुकावट के समय कमज़ोरी पैदा कर सकती है और लागत-प्रभावशीलता पर असर डाल सकती है। (b) नौकरशाही की रुकावटें और जटिल रेगुलेटरी माहौल अक्सर खरीद प्रक्रिया और प्रोजेक्ट को पूरा करने में देरी करते हैं। मंज़ूरी की लंबी प्रक्रियाएं, कई स्तरों पर क्लीयरेंस और जोखिम से बचने की संस्कृति इनोवेशन को रोक सकती है और शामिल करने में देरी कर सकती है। नई तकनीकों का असर ग्लोबल मार्केट में भारतीय कंपनियों की कॉम्पिटिटिवनेस पर भी पड़ता है। (c) आर एंड डी के लिए पर्याप्त फंडिंग की कमी और लैब में हुए इनोवेशन को कमर्शियल तौर पर सफल प्रोडक्ट्स में बदलने की चुनौतियां चिंता का विषय बनी हुई हैं। हालांकि डी आर डी ओ अहम भूमिका निभाता है, लेकिन बेसिक रिसर्च के लिए फंडिंग की मात्रा और इंडस्ट्री तक टेक्नोलॉजी को असरदार ढंग से पहुंचाने के तरीकों को मजबूत करने की ज़रूरत है। एक मज़बूत इनोवेशन इकोसिस्टम बनाने के लिए एकेडेमिया, रिसर्च संस्थानों और इंडस्ट्री के बीच बेहतर सहयोग की भी ज़रूरत है। (d) स्किल्ड वर्कफोर्स की कमी, खासकर डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग के खास क्षेत्रों में, एक बड़ी चुनौती है। डिफेंस इंडस्ट्री को खास तकनीकों में माहिर इंजीनियरों, टेक्नीशियनों और रिसर्चर्स की ज़रूरत होती है। इस कमी को पूरा करने और क्वालिफाइड लोगों की लगातार सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए खास एजुकेशनल प्रोग्राम और वोकेशनल ट्रेनिंग पहलों की ज़रूरत है। (e) अच्छी तरह से विकसित स्वदेशी डिफेंस इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम की कमी, खासकर खास मटीरियल, ज़रूरी अलॉय और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग तकनीकों जैसे क्षेत्रों में, एक रुकावट बनी हुई है। ऐसे इकोसिस्टम के विकास के लिए लंबे समय के निवेश और रणनीतिक योजना की ज़रूरत होती है, जिसमें अक्सर बड़े मैन्युफैक्चरर्स और छोटे व मध्यम आकार के उद्यमों (एस एम ई) के बीच आपसी सहयोग शामिल होता है। (f) पूरी इंडस्ट्री में क्वालिटी एश्योरेंस और स्टैंडर्डाइजेशन के मुद्दे पर लगातार ध्यान देने की ज़रूरत है। यह सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि स्वदेशी रूप से बने कंपोनेंट्स और सिस्टम कड़े इंटरनेशनल क्वालिटी स्टैंडर्ड्स को पूरा करें, ताकि घरेलू ऑपरेशनल प्रभावशीलता और एक्सपोर्ट मार्केट में पैठ बनाई जा सके। (g) स्वदेशी उत्पादन की लागत-प्रभावशीलता कभी-कभी एक चुनौती हो सकती है। नए प्लेटफॉर्म के लिए शुरुआती विकास लागत ज़्यादा हो सकती है, और बड़े पैमाने पर उत्पादन के फायदे हमेशा हासिल नहीं हो पाते, खासकर खास प्रोडक्ट्स के लिए। इससे इम्पोर्टेड विकल्पों की तुलना में यूनिट कॉस्ट ज़्यादा हो सकती है, जिसके लिए सरकारी समर्थन और रणनीतिक दीर्घकालिक खरीद योजनाओं की ज़रूरत होती है। राजनीतिक इच्छाशक्ति और लगातार पॉलिसी लागू करना बहुत ज़रूरी है। हालांकि अक्सर पॉलिसीज़ लाई जाती हैं, लेकिन लंबे समय तक उन्हें लगातार और असरदार ढंग से लागू करना निवेशकों का भरोसा बनाने और डिफेंस इंडस्ट्री के लिए स्थिर विकास की राह बनाने के लिए बहुत ज़रूरी है। निष्कर्ष भारतीय रक्षा उत्पादन में हुई तरक्की आत्मनिर्भरता और रणनीतिक स्वायत्तता की ओर उसकी यात्रा का एक अहम पहलू है। स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर और फाइटर जेट से लेकर एडवांस्ड मिसाइल सिस्टम और तेज़ी से बढ़ते प्राइवेट डिफेंस सेक्टर तक की मुख्य बातें, तकनीकी क्षमता और मैन्युफैक्चरिंग कौशल में एक ज़बरदस्त उछाल को दिखाती हैं। इस विकास के मुख्य कारण राष्ट्रीय सुरक्षा की ज़रूरतें, सरकार का स्वदेशीकरण और आर्थिक विकास पर ज़ोर, और रक्षा उत्पादों की बढ़ती वैश्विक मांग हैं। हालाँकि, अभी भी कई बड़ी चुनौतियाँ हैं, जैसे कि आयातित पुर्ज़ों पर निर्भरता, नौकरशाही की जटिलताएँ, आर एंड डी के लिए फंड की कमी, कुशल कर्मचारियों की कमी, और एक मज़बूत औद्योगिक इकोसिस्टम की ज़रूरत। इन चुनौतियों से निपटने के लिए लगातार नीतिगत प्रतिबद्धता, रिसर्च और इनोवेशन में ज़्यादा निवेश, और सरकार, इंडस्ट्री और एकेडेमिया के बीच बेहतर सहयोग बहुत ज़रूरी होगा। आने वाले कुछ दशक भारत को एक बड़े वैश्विक रक्षा निर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने, उसकी रणनीतिक आज़ादी सुनिश्चित करने और उसकी आर्थिक समृद्धि में बड़ा योगदान देने के लिए बहुत महत्वपूर्ण होंगे। आगे का रास्ता इनोवेशन, क्वालिटी और रणनीतिक साझेदारियों पर लगातार ध्यान देने की मांग करता है, ताकि क्षमता को एक ठोस रक्षा निर्माण पावरहाउस में बदला जा सके। - प्रोफ़ेसर (डॉ.) डी.के. पांडे विज़िटिंग सीनियर फ़ेलो, सेंटर फ़ॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज़, एडजंक्ट प्रोफ़ेसर, राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय, सलाहकार, एकेडमिक काउंसिल, फ़ॉरेन पॉलिसी स्कूल और GNOIT, पूर्व एसोसिएट डीन, SoB, गलगोटिया विश्वविद्यालय।
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भारतीय परंपराओं में निहित है संवाद, संवाद से ही होता है समाधान
हाल ही में संघ प्रमुख श्री मोहन भागवत ने जेन जी से बातचीत की पहल की, इस प्रकार का संवाद नया नहीं हैं बल्कि हमारी भारतीय ज्ञान परंपरा का हिस्सा रहा है जो जीवन से जुड़ी सत्य को उजागर करता है। आज की युवा हमारी पीढ़ी जैसी नहीं बल्कि उससे थोड़ी अलग है वह आदेश नहीं, बल्कि तर्क, प्रश्न और संवाद चाहती है। जेन जी तर्क तो करते हैं लेकिन उसके साथ ही ये भारतीय संस्कृति, परिवार, सामाजिक उत्तरदायित्व और वसुधैव कुटुम्बकम् जैसे मूल्यों का भी सम्मान करते हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा में संवाद का सर्वोच्च स्थान है। यहां गुरु शिष्य पर अपनी बात थोपता नहीं, बल्कि प्रश्नों के द्वारा उसकी शंका का समाधान कर उसे निर्णय लेने की स्वतंत्रता प्रदान करता है। इस प्रकार उदाहरणों में नचिकेता–यम संवाद और श्रीकृष्ण–अर्जुन संवाद विशेष रूप से विख्यात है। नेता-छात्र संवाद भारतीय संस्कृति एवं परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण भाग रहा है। हमारी भारतीय ज्ञान परंपरा में देश के नेतृत्वकर्ताओं, सम्राटों, ऋषियों, गुरुओं एवं युवा शिष्यों, छात्रों के मध्य संवाद को समाज के निर्माण का मुख्य आधार माना गया है। इसे भी पढ़ें: भागवत की नजरों में जेन-जी आंदोलन का दृष्टिकोण जेन-जी के साथ डिक्टेशन के बजाय डिस्कशन को प्राथमिकता देते हुए संघ प्रमुख ने संवाद का मार्ग चुना। यह पहल न केवल युवा पीढ़ी के विचारों, प्रश्नों और आकांक्षाओं को समझने की आवश्यकता को रेखांकित करती है, बल्कि भारत की उस प्राचीन संवाद-परंपरा की पुनर्प्रतिष्ठा भी करती है, जिसमें संवाद को सामाजिक जीवन का आधार माना गया है। आज जब भारत विकसित राष्ट्र की दिशा में आगे बढ़ रहा है, युवाओं के साथ संवाद की यह परंपरा उनके ऊर्जा, नवाचार और दृष्टि को राष्ट्र-निर्माण से जोड़ने में महती भूमिका निभा सकती है। भारतीय ज्ञान परंपरा में संवाद केवल वार्तालाप नहीं है, अपितु सत्य की खोज, आपसी मतभेदों का समाधान एवं ज्ञान के आदान-प्रदान का जरिया रहा है। उपनिषदों में वर्णित गुरु-शिष्य के मध्य संवाद, भगवद्गीता में श्रीकृष्ण एवं अर्जुन का संवाद तथा बौद्ध-जैन परंपराओं की शास्त्रार्थ परंपरा इसका अनोखा उदाहरण है जो हमें दो पीढ़ियों की बीच हुए संवाद की महत्ता बताते हैं। हमारी भारतीय परंपरा का मूल मंत्र है वादे वादे जायते तत्त्वबोधः, अर्थात संवाद से ही सत्य का बोध होता है। मोहन भागवत का जेन जी से संवाद इसी परंपरा को वर्तमान में आगे बढ़ाने का प्रयास है, जिसमें युवाओं के साथ सम्मानपूर्ण, तर्कपूर्ण और खुले संवाद के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक मूल्यों को जोड़ने की बात कही गई है। नचिकेता–यम संवाद भारतीय ज्ञान परंपरा में एक प्रमुख संवाद है। नचिकेता की उम्र आज की जेन अल्फा पीढ़ी के बराबर की थी जब बालक नचिकेता एवं यमराज के मध्य संवाद के द्वारा आत्मा, ब्रह्म, मोक्ष और जीवन के सत्य पर विस्तृत बातचीत हुई। इस संवाद की विशेषता यह रही है कि यहां गुरु ने प्रश्न पूछने से नहीं रोका बल्कि जिज्ञासा का सम्मान किया, तर्क एवं विवेचन द्वारा विश्लेषण कर उत्तर दिया। सत्य को कृत्रिम न कर उसे स्वयं समझने का अवसर प्रदान किया। इसी प्रकार करुक्षेत्र की रणभूमि में श्रीकृष्ण एवं अर्जुन का संवाद भारतीय ज्ञान परंपरा में जीवन से जुड़े सत्यों का विश्लेषण करने में विशेष महत्ता रखता है। गीता के उपदेश के उपरांत श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि सभी तथ्यों पर विचार कर अपनी इच्छानुसार सब कुछ करो। यह भारतीय संवाद परंपरा का सर्वोच्च आदर्श है। इसमें श्रीकृष्ण ने निर्णय अर्जुन पर छोड़ दिया। उन्हें ज्ञान दिया, तर्क दिया, मार्गदर्शन दिया, परंतु निर्णय की स्वतंत्रता लेने की स्वतंत्रता नहीं छीनी। इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया। विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥ (गीता 18.63) प्रश्न पूछना दोष नहीं, ज्ञान का प्रारंभ है। गुरु का कार्य आदेश देना नहीं, मार्गदर्शन करना है। संवाद का उद्देश्य किसी पर विचार थोपना नहीं, सत्य का बोध कराना है। अंतिम निर्णय व्यक्ति की विवेकपूर्ण स्वतंत्रता पर छोड़ा जाता है। इसी कारण नचिकेता–यम संवाद और श्रीकृष्ण–अर्जुन संवाद भारतीय ज्ञान परंपरा में आदर्श माने जाते हैं। आज के संदर्भ में भी जब युवाओं से संवाद की बात होती है, तो उसका आशय यही है कि उनकी जिज्ञासाओं का सम्मान किया जाए, तर्कपूर्ण चर्चा हो और उन्हें सोच-समझकर स्वयं निर्णय लेने का अवसर दिया जाए। इसके अलावा चाणक्य एवं चंद्रगुप्त का संवाद भी भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां चाणक्य एक दूरदर्शी शिक्षक और नेता के रूप में युवा छात्र चंद्रगुप्त का मार्गदर्शन कर उन्हें अखंड भारत का सम्राट बनाया। विवेकानंद भी हमेशा युवाओं से सीधा संवाद करते थे ताकि उनमें राष्ट्रप्रेम की भावना जागृत हो और वह राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाए। हमारी भारतीय संस्कृति में संवाद अर्थहीन नहीं है अपितु अपने अंदर महत्वपूर्ण मूल्यों को समाहित किए हुए। इनमें विनय एवं बड़ों के प्रति सम्मान विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। हमारी भारतीय संस्कृति छात्रों को हमेशा विनयशीलता एवं गुरुजनों के प्रति आदर करना सीखाती है। साथ ही अपने गुरुजनों की बातों को धैर्यपूर्वक सुनना छात्रों का गुण माना जाता है। यह संवाद कभी अर्थहीन नहीं होते। इनका उद्देश्य किसी को हराना नहीं, बल्कि सत्य और सही मार्ग को खोजना होता है। भारतीय ज्ञान परंपरा में वर्णित संवादों के अपने लोकतांत्रिक मूल्य हैं। संवाद के परंपरागत मार्ग हमारे लोकतंत्र और जीवंत होता है। वर्तमान के युवा ही भविष्य के नेता होते हैं, यह संवाद उन्हें इस जिम्मेदारी का अहसास कराता है। - प्रज्ञा पाण्डेय
जानिए, आखिर दिल्ली क्यों रहती है आतंकियों के निशाने पर?
आपको पता होगा कि 15 अगस्त और 26 जनवरी के मौके पर यानी राष्ट्रीय पर्वों दिल्ली अक्सर पाक परस्त आतंकियों के निशाने पर रहती है! ऐसा खुफिया जानकारियों से भी पता चलता है। ऐसा इसलिए कि नई दिल्ली सिर्फ भारत की राजधानी नहीं, बल्कि भारत की राजनीतिक, संवैधानिक और प्रतीकात्मक शक्ति का सबसे बड़ा केंद्र है। चूंकि राष्ट्रीय पर्व—15 अगस्त तथा 26 जनवरी—आतंकियों के लिए इसी प्रतीकात्मक महत्व को भुनाने और इसमें भागीदारी जताने वालों के बीच अधिकतम भयावह माहौल पैदा करने का षड्यंत्र रचा जाता है, इसलिए खुफिया व सुरक्षा एजेंसियां चौकस हो जाती हैं। दरअसल, इस अहम मौके पर जगह जगह उमड़ने वाली भीड़ के बीच आतंकियों द्वारा अपने नापाक इरादों को पूरे करने के अवसर के रूप में देखा जाता है और इसी उद्देश्य से वो अमन-चैन के दुश्मन बन जाते हैं। भला हो एनआईए, खुफिया एजेंसियों और दिल्ली पुलिस का जो समय रहते ही उनके नापाक इरादों को ध्वस्त कर देती हैं। इस समय यह सवाल और गंभीर है, क्योंकि 13 अगस्त 2026 को सामने आई संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट ने नवंबर 2025 के Red Fort आतंकी हमले को AQIS (Al-Qaeda in the Indian Subcontinent) से आधिकारिक रूप से जोड़ा है। इसे भी पढ़ें: Taliban के 5 साल के राज में कितना बदला Afghanistan? बंदूकधारियों की Diplomacy देखकर दुनिया हैरान आइए, अब उन वजहों की चर्चा करते हैं जिनकी वजह से दिल्ली आतंकियों के निशाने पर रहती है:- पहला, दिल्ली पर हमला यानी पूरे भारत को संदेश: आतंकी संगठन केवल जान-माल का नुकसान नहीं चाहते, बल्कि उनका असली लक्ष्य अक्सर भय, प्रचार और राजनीतिक संदेश पैदा करना होता है। चूंकि दिल्ली में संसद, राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री कार्यालय, सुप्रीम कोर्ट, मंत्रालय, विदेशी दूतावास और राष्ट्रीय स्मारक जैसे संस्थान हैं। इसलिए यहां घटी हुई छोटी सी घटना का भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव बहुत बड़ा हो सकता है। दूसरा, राष्ट्रीय पर्वों पर प्रतीकात्मक मूल्य बढ़ जाता है कई गुना: 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री का राष्ट्र को संबोधन और 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस समारोह—ये दोनों भारत की राजकीय संप्रभुता और राष्ट्रीय एकता के सबसे बड़े सार्वजनिक प्रतीक हैं। इसीलिए सुरक्षा एजेंसियां वर्षों से मानती रही हैं कि Independence Day समारोह आतंकियों और उग्रवादी संगठनों के लिए “attractive target” हो सकते हैं। यानी आतंकियों की गणित कुछ ऐसी होती है: सामान्य दिन का हमला → स्थानीय/क्षेत्रीय खबर, लेकिन राष्ट्रीय पर्व के दिन दिल्ली में हमला → अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां + राष्ट्रीय मनोवैज्ञानिक प्रभाव + सरकार की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल। तीसरा, भीड़ और VVIP मौजूदगी: राष्ट्रीय समारोहों में हजारों लोग, VVIP/VIP, सुरक्षा बल, मीडिया और देश-विदेश के प्रतिनिधि मौजूद होते हैं। 15 अगस्त 2026 के Red Fort समारोह के लिए भी सुरक्षा व्यवस्था बेहद व्यापक है और दिल्ली में प्रवेश, यातायात, मेट्रो तथा संवेदनशील क्षेत्रों पर विशेष प्रतिबंध लगाए गए हैं। आतंकी संगठनों के लिए भीड़ का अर्थ होता है कि एक छोटी कोशिश भी बड़े पैमाने पर अफरा-तफरी पैदा कर सकती है। चौथा, लाल किला स्वयं एक असाधारण प्रतीक है: लाल किला केवल ऐतिहासिक इमारत नहीं है। 15 अगस्त को प्रधानमंत्री का तिरंगा फहराना उसे आधुनिक भारतीय राष्ट्र-राज्य के सबसे शक्तिशाली प्रतीकों में बदल देता है। इसीलिए Red Fort पहले भी आतंकवादी लक्ष्य रहा है। दिसंबर 2000 में वहां आतंकी हमला हुआ था। और नवंबर 2025 का हमला इस खतरे की आधुनिक अभिव्यक्ति था। अब संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में AQIS का नाम सामने आना इस पूरे मामले को और गंभीर बनाता है। पांचवां, दिल्ली की एक और कमजोरी—बहुत बड़ा और खुला महानगरीय क्षेत्र: यह केवल Red Fort की सुरक्षा का प्रश्न नहीं है, बल्कि दिल्ली-NCR में रेलवे स्टेशन, मेट्रो नेटवर्क, बाजार, बस अड्डे, धार्मिक एवं पर्यटन स्थल, सरकारी संस्थान, भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक स्थान और बहुत बड़ी संख्या में हैं। इसलिए किसी आतंकी संगठन के लिए केवल मुख्य समारोह को निशाना बनाना ही जरूरी नहीं होता। समारोह के आसपास किसी दूसरे संवेदनशील स्थान पर घटना करके भी भय का वातावरण बनाया जा सकता है। इसी कारण इस बार रेलवे हब और अन्य महत्वपूर्ण स्थानों पर भी निगरानी बढ़ाई गई है। छठा, राष्ट्रीय पर्व इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि सुरक्षा व्यवस्था पहले से दिखाई देती है: यह एक दिलचस्प विरोधाभास है। 15 अगस्त और 26 जनवरी पर सुरक्षा सबसे ज्यादा होती है—लेकिन उसी कारण सुरक्षा की तैनाती, रास्ते, समारोह का स्थान और समय जैसी बहुत-सी चीजें सार्वजनिक रूप से ज्ञात भी होती हैं। इसलिए सुरक्षा एजेंसियां केवल समारोह स्थल की सुरक्षा नहीं करतीं, बल्कि पूरे शहर में layered security बनाती हैं। इस साल दिल्ली पुलिस ने बड़े पैमाने पर पुलिस बल, CCTV, ड्रोन, वाहन जांच और अन्य निगरानी उपाय बढ़ाए हैं। सातवां, असली खतरा सिर्फ “बड़ा हमला” नहीं है: आज आतंकवाद की रणनीति भी बदल रही है। बड़े संगठित समूहों के बजाय छोटे, बिखरे हुए सेल, स्थानीय मददगार, डिजिटल संपर्क और कम लागत वाले हमले ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। UN की हालिया रिपोर्ट में भी AQIS के बारे में छोटे और बिखरे हुए नेटवर्क तथा क्षेत्रीय लॉजिस्टिक/वित्तीय नेटवर्क की चिंता व्यक्त की गई है। इसका मतलब है कि केवल Red Fort की अभेद्य सुरक्षा पर्याप्त नहीं है। Intelligence + cyber monitoring + financial tracking + border intelligence + local policing + community intelligence—इन सभी को जोड़ना पड़ेगा। लेकिन एक महत्वपूर्ण बात यह है कि अक्सर यह कहना सही नहीं होगा कि “हर 15 अगस्त या 26 जनवरी को दिल्ली पर हमला होने वाला है।” राष्ट्रीय पर्वों के आसपास सुरक्षा एजेंसियों द्वारा खतरे की आशंका को गंभीरता से लेना एक precautionary security doctrine है। 2026 में भी हाई अलर्ट और व्यापक सुरक्षा व्यवस्था इसी सावधानी का हिस्सा है। लेकिन नवंबर 2025 के Red Fort हमले और अब UN की AQIS attribution के बाद यह जरूर कहा जा सकता है कि दिल्ली के प्रतीकात्मक स्थलों को लेकर आतंकवादी संगठनों की रुचि को केवल काल्पनिक खतरा मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। # समझिए सबसे बड़ा सवाल और जानिए जवाब मेरे विचार से असली प्रश्न यह नहीं है कि “आतंकी दिल्ली को क्यों चुनते हैं?” बल्कि असली प्रश्न यह है कि- क्या भारत की राजधानी को केवल राष्ट्रीय पर्वों पर ही नहीं, बल्कि वर्ष के 365 दिनों में ऐसी बहुस्तरीय सुरक्षा मिल रही है जिसमें आतंकियों की योजना बनने से पहले ही उसका पता चल जाए? क्योंकि आतंकवाद के खिलाफ सबसे बड़ी जीत हमला होने के बाद हमलावर पकड़ना नहीं, बल्कि हमला होने से पहले साजिश को तोड़ देना है।0और 2026 में दिल्ली के संदर्भ में यही सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा चुनौती है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
राहुल गांधी के 'हग डिप्लोमेसी' वाले तंज पर BJP का पलटवार! इंदिरा गांधी का वीडियो शेयर कर दिया करारा जवाब
भक्ति कर दरिया में डाल...7000 मीट्रिक टन कचरा छोड़ किसने हरिद्वार को कूड़ाद्वार बना डाला?
भारत का कैलेंडर 12 महीने उनमें से एक महीना सावन मोटा-मोटी बारिश का महीना तभी तो इस पर गाना भी बना है सावन का महीना पवन करे शोर। सावन का महीना भगवान शिव का महीना माना जाता है इसलिए इस महीने शिवभक्त निकलते हैं एक यात्रा पर। 28 दिन की यात्रा यानि 4 हफ्ते में चार सोमवार सोमवार के व्रत की कोशिश रहती है कि उनकी यात्रा मंडे के दिन शिव मंदिर पहुंचे सावन के सोमवार को कावड़ यात्रा सबसे ज्यादा एक्टिव रहती है। लेकिन इतनी बड़ी धार्मिक यात्रा का असर सिर्फ घाटों और सड़कों पर दिखने वाली भीड़ तक सीमित नहीं रहता। कुछ ही दिनों के लिए किसी भी शहर की पॉपुलेशन अचानक कई गुना बढ़ जाए तो उसके रोड्स, पार्किंग, टॉयलेट, सैनिटेशन और वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम हर चीज की कैपेसिटी टेस्ट होती है। 30 जुलाई 2026 से शुरू हुई इस साल की कावड़ यात्रा 11 अगस्त को खत्म हुई। करीब 14 दिनों तक हरिद्वार में करोड़ों कावड़ यात्री पहुंचे और उनके लौटने के बाद शहर के सामने अब एक नई चुनौती हजारों टन वेस्ट को साफ करना है। सावन में 4 करोड़ शिव भक्त हरिद्वार पहुंचे थे। मतलब एक छोटा सा कुंभ। गंगा जी से जल लेने। घाट पर कमरे बने थे माताओं बहनों के कपड़े बदलने के लिए। जब सफाई की गई तो उसके अंदर जानते हैं क्या निकला? पेशाब भरी बोतलें। अब हरकी पैड़ी पर जो लोग झाड़ू लेकर वहां सफाई कर रहे हैं, कूड़े के पहाड़ को दिखा रहे हैं। हमें उनके दुख दर्द को भी समझना पड़ेगा। हालत यह हो गई कि निगम के अपने कर्मचारी कम पड़ गए। इतना कूड़ा था। हजार कर्मचारी बाहर से बुलाने पड़े। इसे भी पढ़ें: Bareilly में कांवड़ यात्रियों की ट्रैक्टर-ट्रॉली पलटी, 1 की मौत और 24 लोग घायल हुए कावड़ यात्रा की कहानी कुछ मान्यताओं के अनुसार भगवान राम पहले कावड़िया थे उन्होंने बिहार के सुल्तानगंज से कांवड़ में गंगाजल भर बाबाधाम यानि बैजनाथ में शिवलिंग का जलाभिषेक किया था पुराणों में यह कहानी भी आती है कि समुद्र मंथन से निकले विष को जब भगवान शिव अपने कंठ में धारण कर लिया तो उसके प्रभावों को दूर करने के लिए देवताओं ने भगवान शिव पर पवित्र नदियों का जल चढ़ाया तभी से गंगाजल लाकर सावन में शपथ समर्पित करने का ऑपरेशन शुरू हुआ। एक अन्य कहानी ये भी है कि शिव भक्त रावण ने विशेष शिव को राहत देने के लिए कांवड़ में जल भरकर पर जो कि यूपी में है के पुरा महादेव शिवमंदिर में शिवजी का जलाभिषेक किया इसके बाद कावड़ यात्रा की शुरुआत हुई तीसरी कहानी कुछ जगह वाले कहानी रिपीट होती है मगर करता के व्यक्ति के साथ मंदिर और जल चढ़ाना सेम लेकिन रावण की जगह पर उस राम जो जलाभिषेक के लिए गढ़मुक्तेश्वर में बह रही गंगा नदी से जल लाए। एक कहानी त्रेता युग वाली कहानी भगवान राम वाला यह होता है तथा योग उसमें अपने दृष्टिहीन माता-पिता को तीर्थ यात्रा कराने के लिए श्रवण कुमार हिमाचल के ऊना क्षेत्र से मायापुर हरिद्वार में गंगा स्नान करवाने लाइफ है इसके लिए उन्होंने एक कावड़ बनाई और अपने माता-पिता को उसमें बिठाया माता-पिता को स्नान करवाने के बाद वापसी में अपने साथ गंगा जल ले आए यहीं से कावड़ यात्रा की शुरुआत हुई। 7000 से 8000 मेट्रिक टन वेस्ट मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस साल करीब 4.8 करोड़ कावड़ यात्री हरिद्वार पहुंचे। वहीं यात्रा खत्म होने के बाद करीब 7000 से 8000 मेट्रिक टन वेस्ट होने की बात सामने आई है। अब सवाल यह है कि आखिर इतना कचरा आया कहां से? क्या इसका एक बड़ा कारण किसी शहर की कैपेसिटी से कई गुना ज्यादा लोगों का कुछ ही दिनों में वहां पहुंचना है या फिर इसमें लोगों के सिविक सेंस की भी भूमिका है? अगर पिछले कुछ सालों का डाटा देखें तो हरिद्वार में कावड़ यात्रियों की संख्या लगातार बढ़ी है। 2023 में करीब 4.07 करोड़, 2024 में 4.14 करोड़ और 2025 में करीब 4.52 करोड़ कावड़ यात्री यहां पहुंचे थे। इस साल यह संख्या बढ़कर करीब 4.8 करोड़ बताई जा रही है। यानी फुटफॉल लगातार बढ़ रहा है और जैसे-जैसे फुटफॉल बढ़ता है, वैसे-वैसे शहर के इंफ्रास्ट्रक्चर पर प्रेशर भी बढ़ता है। इस साल के वेस्ट आंकड़े को लेकर मीडिया रिपोर्ट्स में अलग-अलग नंबर्स मिलते हैं। इंडिया टुडे ने म्यनिसिपल ऑफिशियल के हवाले से करीब 7000 मेट्रिक टन वेस्ट कलेक्ट होने की बात कही है। वहीं टाइम्स ऑफ इंडिया ने हरिद्वार म्यनिसिपल कॉरपोरेशन के नंदन कुमार के हवाले से करीब 8000 मेट्रिक टन वेस्ट कलेक्ट होने की रिपोर्ट की है। 8000 मेट्रिक टन कचरा यानी करीब 80 लाख किलो कचरा। नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा यानी एनएमसीजी के वेस्ट मैनेजमेंट फ्रेमवर्क में भी सोर्स सेग्रगेशन, कलेक्शन, ट्रांसपोर्टेशन और डेजिग्नेटेड डिस्पोजेबल पर जोर दिया गया है। लेकिन इस साल की कावड़ यात्रा के दौरान कलेक्ट हुए करीब 7000 से 8000 टन वेस्ट का कितना हिस्सा रिसाइकल हुआ, कितना प्रोसेस हुआ और कितना डिस्पोजल के लिए भेजा गया, इसका डिटेल ब्रेकअप फिलहाल पब्लिक नहीं किया गया है। इसे भी पढ़ें: Delhi Rain: बारिश और कांवड़ यात्रा से कई सड़कों पर लगा जाम, AQI रहा 78 आखिर इतना कचरा आया कहां से? मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक क्लीनअप के दौरान बड़ी मात्रा में प्लास्टिक शीट्स, डिस्कारेड और गंदे कपड़े, प्लास्टिक बॉटल्स, स्लीपर्स और कुछ दूसरे तरह का कचरा मिला। कुछ रिपोर्ट्स में फूड वेस्ट और रोटन फूड का भी जिक्र है। वहीं कुछ चेंजिंग रूम्स में ऐसी बॉटल्स मिलने की बात सामने आई जिन्हें रिपोर्ट्स में यूरिन कंटेनिंग बॉटल्स बताया गया है। यानी यहां सिर्फ प्लास्टिक का कचरा नहीं था। लोगों के इस्तेमाल के बाद छोड़े गए कपड़े, फुटवेयर, बॉटल्स, खानेपीने से जुड़ा वेस्ट और दूसरी डिस्कारेड चीजें भी क्लीन अप का हिस्सा थी। कुछ जगहों पर यह कचरा सिर्फ रोड्स या मार्केट तक सीमित नहीं था। यानी जिस इलाके में इतनी बड़ी संख्या में लोग कुछ दिनों तक लगातार आते-जाते रहे, वहां हर तरफ सैनिटेशन सिस्टम पर प्रेशर पड़ा। हरिद्वार म्यनिसिपल कॉरपोरेशन के मुताबिक इस वेस्ट में प्लास्टिक शीट्स, डिस्कारेड कपड़े और दूसरे मटेरियल शामिल थे और सफाई पूरे कावड़ मेला एरिया में की गई थी। हर साल का रिवाज बन गया हम मां गंगा कहते हैं और उसी के किनारे पन्नी फेंकते, कपड़ा फेंकते, कूड़ा कचरा, खाने, टिफिन, चप्पल। यह भक्ति नहीं हो सकती है। यहां पर फिर यह संदेह उठता है कि यह गलत हरकत क्यों है? और यह हमें सिखाया क्यों नहीं जाता कि हमें अपनी मां गंगा को गंदा नहीं करना है। और यह पहली बार नहीं हुआ है। पिछले साल भी मेले के बाद करीब इतना ही कूड़ा यहां पर था 7000 टन। उसके पहले भी यही था। यानी यह इस बार हुआ हादसा नहीं है। यह हमारे यहां हर साल का रिवाज बन गया है। जापान में मैच के बाद स्टैंड्स में नहीं छोड़ी गंदगी फीफा विश्व कप 2026 में जापान ने अपना पहला मुकाबला नीदरलैंड्स के खिलाफ खेला। ग्रुप एफ का यह मुकाबला 2-2 से ड्रॉ रहा। नीदरलैंड्स के खिलाफ मैच की आखिरी सीटी बजने बाद जापान के फैंस ने स्टैंड्स में मौजूद कचड़ा उठाना शुरू कर दिया। बाहर निकलने से पहले ब्लू बैग में फैंस ने वहां मौजूद कचड़ा उठा लिया। सोशल मीडिया इसका फोटो और वीडियो काफी तेजी से वायरल हो रहा है। इस काम के लिए दुनिया भर में जापान की तारीफ हुई। मतलब जापान में थैली लेकर आते हैं कि अपना कचरा समेटेंगे और वो तो मैच देखने गए थे। कोई पूजा पाठ करने नहीं आते। लेकिन हम और आप मां गंगा से आशीर्वाद लेने आते हैं। उसके बाद भी वहां कचरा फैला कर आते हैं। याद कीजिए 2019 का प्रयागराज कुंभ करोड़ों लोग आए और उसी कुंभ में प्रधानमंत्री ने झुककर सफाई कर्मियों के पैर छुए थे। क्यों? क्योंकि वह सफाई का मतलब समझ रहे थे। यह समझना पड़ेगा कि शिव भी कौन थे भगवान भोलेनाथ कौन थे आप कथा याद कीजिए मां गंगा आसमान से उतरी पूरी की पूरी पूरे वेग से धरती कांप जाती संभाला किसने था भगवान शिव ने जटा में एक बूंद नीचे नहीं गिरने दी समुद्र मंथन में जहर निकला कोई नहीं पी रहा था वह भी भगवान शिव ने संभाला कंठ में रख लिया। यानी भगवान भोलेनाथ की पूरी कहानी संभालने की है। और हम और आप शिव जी के भक्त। हम अपनी पन्नी नहीं संभाल पाते, टिफिन नहीं संभाल पाते, अपने कपड़े नहीं संभाल पाते और पेशाब करके बोतल रख दिए गए। जिस गंगा से करोड़ों लोग आस्था के साथ जल लेने आते हैं, उसके किनारे कचरा ना छोड़ना भी उसी आस्था और जिम्मेदारी का हिस्सा होना चाहिए। क्योंकि इतनी बड़ी गैदरिंग्स को संभालने के लिए सिर्फ ज्यादा रोड्स, ज्यादा टॉयलेट्स या ज्यादा सैनिटेशन वर्कर्स नहीं चाहिए। एक तरफ मजबूत प्लानिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए तो दूसरी तरफ रिस्पांसिबल पब्लिक बिहेवियर। 1000 सफाई कर्मचारी बाहर से बुलाए अब कूड़े को ज्वालापुर स्थित सराय में कूड़ा ट्रीटमेंट प्लांट में रीसाइकिल के लिए भेजा जा रहा है। यहां से कूड़ा अलग-अलग करके आगे प्राइवेट कंपनियों को बेचा जाएगा और कुछ के कपड़े बनाए जाएंगे। नगर निगम दिन-रात अभियान चलाकर सफाई में जुटा है। सफाईकर्मियों का समूह सबसे पहले घाटों पर सफाई कर रहा है। पिछले साल करीब 4 करोड़ 52 लाख कांवड़िए जल लेकर गए थे। तब 8 हजार मीट्रिक टन कूड़ा गंगा घाटों से हटाया गया था। नगर निगम, नगर पालिका, नगर पंचायत, जिला पंचायत और सभी ग्राम पंचायतों के अधिकारियों को अपने-अपने क्षेत्रों में युद्धस्तर पर सफाई अभियान चलाने के आदेश दिए गए हैं। नियमित कर्मचारियों के अलावा 1000 आउटसोर्स सफाई कर्मचारियों और 80 से ज्यादा वाहनों को कूड़ा परिवहन में लगाया गया।
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चंद्रशेखरन के उत्तराधिकारी का चयन टाटा समूह के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। टाटा संस समूह की प्रमुख कंपनियों और रणनीतिक फैसलों में केंद्रीय भूमिका निभाती है।
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पाकिस्तान आज यानि 14 अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, लेकिन प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के सामने सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि वह खुलकर जश्न कैसे मनाएं क्योंकि उनके देश में चारों ओर से चुनौतियां बढ़ती ही जा रही हैं। पाकिस्तान के हालात इस समय ऐसे हैं कि आर्थिक, कूटनीतिक और सामाजिक तौर पर विफल हो चुके देश में आजादी का जश्न सरकार भले मना रही है लेकिन आम जनता त्राहि त्राहि कर रही है। ऐसे में जनता को उम्मीदें देने की बजाय प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने एक बार फिर भारत के खिलाफ खोखली धमकियों का ऐलान कर अवाम का ध्यान भटकाने का प्रयास किया है। हम आपको बता दें कि शहबाज शरीफ ने भारत को निशाना बनाते हुए पानी के मुद्दे पर ‘सीधा जवाब’ देने की धमकी दी है। स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर उनका यह बयान पाकिस्तान की पुरानी भारत विरोधी राजनीति की याद दिलाता है, जहां घर के बिगड़ते हालात से ध्यान हटाने के लिए भारत के खिलाफ बयानबाजी को हथियार बनाया जाता है। शहबाज शरीफ ने कहा कि सिंधु नदी के पानी की ‘हर बूंद’ पाकिस्तान की रेड लाइन है और अगर भारत ‘सही रास्ते’ पर नहीं आया तो उसे सीधा जवाब दिया जाएगा। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि पाकिस्तान की संप्रभुता और सुरक्षा को चुनौती मिली तो मई 2025 की सैन्य झड़प से भी कड़ा जवाब दिया जाएगा। यानी अपने नागरिकों के सवालों का जवाब देने की बजाय इस्लामाबाद फिर दिल्ली को गीदड़ भभकी देकर अपनी ताकत का प्रदर्शन करना चाहता है। इसे भी पढ़ें: Partition Horrors Remembrance Day I 1947 में लिए गये Congress के गलत फैसले की कीमत आज भी चुका रहा है भारत विडंबना देखिए कि जिस पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भारत को ‘शांति का दुश्मन’ बता रहे हैं, उसी पाकिस्तान के भीतर शांति और स्थिरता का संकट गहराता जा रहा है। बलूचिस्तान में पाकिस्तान की सत्ता के खिलाफ असंतोष इतना बढ़ा है कि स्वतंत्रता दिवस को ‘ब्लैक डे’ के रूप में मनाने की अपील तक सामने आई है। बलूच नेताओं ने काले झंडे और काली पट्टियां लगाई हैं। सुराब क्षेत्र में पाकिस्तानी सैन्य कार्रवाई में नागरिकों के हताहत होने से असंतोष और भड़का गया है। बलूच कार्यकर्ताओं के मुताबिक सैन्य कार्रवाई में बच्चों समेत बड़ी संख्या में नागरिक मारे गए या घायल हुए। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने आबादी वाले इलाकों में हवाई हमलों और नागरिकों की मौत पर सवाल उठाए हैं। बलूचिस्तान और इस्लामाबाद के बीच अविश्वास की खाई बेहद गहरी हो चुकी है। जिस देश का एक हिस्सा उसके स्वतंत्रता दिवस को ही ‘ब्लैक डे’ कह रहा हो, उसके प्रधानमंत्री का भारत को धमकाना खोखली ताकत का प्रदर्शन ही अधिक लगता है। यही नहीं, पश्चिमोत्तर पाकिस्तान का हाल भी शरीफ सरकार के दावों की पोल खोलता है। खैबर पख्तूनख्वा में स्वात के कबाल पुलिस स्टेशन के पास आत्मघाती हमले में 17 लोगों की मौत और 27 के घायल होने की खबर सामने आई है। मृतकों में सात पुलिसकर्मी भी शामिल थे। हमला उस समय हुआ जब लोग क्षेत्र की बिगड़ती कानून-व्यवस्था के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। यानी पाकिस्तान अपने ही शहरों में आतंक और असुरक्षा से जूझ रहा है और फिर भी उसकी सत्ता को भारत के खिलाफ बयानबाजी में राजनीतिक लाभ दिखाई देता है। पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर भी बेचैनी से गुजर रहा है। वहां राजनीतिक प्रतिनिधित्व और अन्य मांगों को लेकर विरोध प्रदर्शनों, झड़पों, बल प्रयोग, इंटरनेट बंदी और हालिया विधानसभा चुनावों की निष्पक्षता को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। रावलाकोट में सुरक्षा बलों की गोलीबारी में लोगों के घायल होने की बात भी सामने आई। भारत के विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान पर मानवाधिकार उल्लंघनों के लिए अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही की मांग करते हुए कहा है कि असंतोष का जवाब ‘गोलियों, ब्लैकआउट और दमन’ से दिया गया। वहीं राजनीतिक मोर्चे पर भी पाकिस्तान की हालत कम विस्फोटक नहीं है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान जेल में हैं और उनके बेटों ने आरोप लगाया है कि परिवार, डॉक्टरों और वकीलों को सात महीने से उनसे मिलने की अनुमति नहीं दी गई। इमरान खान और उनके समर्थक लंबे समय से अपने खिलाफ मामलों को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताते रहे हैं। विपक्ष के सबसे प्रमुख चेहरे की लगातार कैद और उनकी पार्टी पर कार्रवाई ने पाकिस्तान की लोकतांत्रिक साख पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। ऐसे में शहबाज शरीफ की ‘हर बूंद रेड लाइन’ वाली धमकी पाकिस्तान की शक्ति का प्रमाण कम और उसकी बेचैनी का संकेत ज्यादा है। पाकिस्तान को समझना होगा कि बलूचिस्तान में असंतोष, खैबर पख्तूनख्वा में आतंक, पीओजेके में विरोध, राजनीतिक दमन के आरोप और आर्थिक-सामाजिक दबाव, इन सबका समाधान भारत को धमकी देने से नहीं होगा। उधर, नई दिल्ली का संदेश सीधा है कि आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते। भारत का स्पष्ट रुख है कि सीमा पार आतंकवाद को पाकिस्तान जब तक विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय तरीके से बंद नहीं करता, तब तक संधि अपने पुराने स्वरूप में नहीं चल सकती। पाकिस्तान को यह भी समझना होगा कि धमकियों से भारत की नीति नहीं बदलेगी। पाकिस्तान को पहले अपने घर की आग बुझानी होगी, अपने नागरिकों को सुरक्षा देनी होगी और सीमा पार आतंकवाद पर निर्णायक कार्रवाई करनी होगी। वरना स्वतंत्रता दिवस के मंच से दी गई उसकी दहाड़ इतिहास में ताकत की आवाज नहीं, एक ऐसे देश की खोखली हुंकार के रूप में दर्ज होगी जो अपने भीतर की दरारों से आंखें चुराकर भारत को डराने की कोशिश कर रहा है।
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18 अगस्त तक अल्टीमेटम, समाधान नहीं तो होगी महापंचायत : भारतीय किसान यूनियन
संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर भारतीय किसान यूनियन के नेतृत्व में ग्रेटर नोएडा में किसानों ने विशाल बाइक तिरंगा यात्रा निकाली
1947 का भारत विभाजन इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक है। लाखों लोग अपने घर-परिवार, जमीन-जायदाद छोड़ने पर मजबूर हुए, लाखों लोगों की हत्या हुई और करोड़ों लोग विस्थापन की त्रासदी से जूझे। यह एक ऐसा स्थायी घाव था, जो आज भी भारत के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक ताने-बाने को प्रभावित करता है। देखा जाये तो कांग्रेस के तत्कालीन नेताओं ने अंग्रेजों द्वारा पेश किए गए विभाजन के प्रस्ताव को स्वीकार कर ऐतिहासिक भूल की थी, जिसकी कीमत देश आज भी चुका रहा है। 14 अगस्त को मनाया जाने वाला विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस इसी त्रासदी की मानवीय कीमत को याद करने का अवसर है। भारत सरकार ने 2021 में इस दिवस की घोषणा की थी। इसका उद्देश्य केवल उन लोगों को श्रद्धांजलि देना नहीं है, जिन्होंने जान गंवाई या अपना घर छोड़ा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह समझाना भी है कि सांप्रदायिक नफरत, हिंसा और राजनीतिक विभाजन किस भयावह परिणाम तक पहुंच सकते हैं। इसे भी पढ़ें: World Organ Donation Day 2026: अंगदान की संस्कृति ही मानवता को नई दिशा दे सकती है हम आपको याद दिला दें कि 1947 में विभाजन के समय पंजाब और बंगाल सबसे बुरी तरह प्रभावित क्षेत्रों में रहे। परिवार बिछड़े, गांव और संपत्तियां सीमा के दो हिस्सों में बंट गईं और लाखों लोगों को अचानक अनिश्चित भविष्य की ओर पलायन करना पड़ा। विभाजन के कारणों को लेकर इतिहास में अलग-अलग व्याख्याएं देखने को मिलती हैं। मुस्लिम लीग की दो-राष्ट्र सिद्धांत की राजनीति, पाकिस्तान नामक अलग देश की मांग, सांप्रदायिक तनाव और ब्रिटिश औपनिवेशिक नीति इसके प्रमुख संदर्भ रहे। 3 जून 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन ने विभाजन योजना की घोषणा की और इसके बाद रैडक्लिफ आयोग ने भारत-पाकिस्तान की सीमा निर्धारित की। सीमाएं इतनी तेजी से खींची गईं कि लाखों लोग अपनी जमीन, पहचान और सुरक्षा को लेकर असमंजस में पड़ गए। यहीं से कांग्रेस नेतृत्व के फैसले पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। कांग्रेस ने मुस्लिम लीग की मांग और ब्रिटिश जल्दबाजी के सामने विभाजन स्वीकार करके उस विचार को अप्रत्यक्ष मान्यता दी कि हिंदू और मुस्लिम एक साथ नहीं रह सकते। वहीं विभाजन समर्थक इतिहासकारों का कहना है कि उस समय व्यापक हिंसा, राजनीतिक गतिरोध और ब्रिटिश सत्ता की वापसी की जल्दबाजी के बीच एकीकृत भारत को बनाए रखना अत्यंत कठिन हो चुका था। इसलिए यह बहस आज भी जारी है कि क्या विभाजन टाला जा सकता था या वह उस समय की परिस्थितियों का लगभग अपरिहार्य परिणाम बन चुका था। विभाजन की राजनीतिक कीमत के साथ इसकी भू-राजनीतिक कीमत भी सामने आई। पाकिस्तान के अस्तित्व ने भारत के पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों में नई सुरक्षा चुनौतियां पैदा कीं। कश्मीर विवाद ने 1947 के बाद भारत-पाकिस्तान संबंधों को स्थायी तनाव में बदल दिया। इसके बाद 1947-48, 1965, 1971 और 1999 के युद्ध हुए तथा सीमा पार आतंकवाद लंबे समय तक राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौती बना रहा। पाकिस्तान के साथ स्थायी सुरक्षा तनाव ने भारत के संसाधनों पर भी अतिरिक्त दबाव डाला और रक्षा व्यय का बड़ा हिस्सा इस चुनौती से निपटने में लगा। महात्मा गांधी का दृष्टिकोण भी इस पूरी कहानी को एक अलग नैतिक आयाम देता है। वह धर्म के आधार पर देश के विभाजन के विरोधी थे और ऐसी स्वतंत्रता चाहते थे, जिसमें शांति, सद्भाव और समानता हो। 15 अगस्त 1947 को उनका दिल्ली के सत्ता-केंद्रित समारोहों में शामिल नहीं होना इसी पीड़ा की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाता है क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि वह मानते थे कि यह वह ‘पूर्ण स्वतंत्रता’ नहीं थी जिसके लिए उन्होंने सत्याग्रह और असहयोग आंदोलनों की अगुवाई की थी। साथ ही, इतिहास गवाह है कि अंग्रेजों ने जिन देशों में विभाजन कराया उनमें भारत का विभाजन ही सबसे रक्तरंजित रहा। लाखों जानें गईं, करोड़ों लोग बेघर हुए और पीढ़ियों तक घाव ताजा रहे। यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब कांग्रेस का तत्कालीन नेतृत्व अंग्रेजों की चाल और उनकी ‘फूट डालो, राज करो’ नीति को भली-भांति समझता था, तब भी उन्होंने विभाजन का खुलकर विरोध क्यों नहीं किया था? क्या यह राजनीतिक थकान थी, साम्प्रदायिक हिंसा के दबाव में लिया गया समझौता था? या फिर सत्ता तक शीघ्र पहुंचने की अधीरता थी? जो भी कारण रहे हों, उनका परिणाम आज भी भारत भुगत रहा है। देखा जाये तो इतिहास के उस मोड़ पर लिया गया निर्णय न केवल तत्कालीन पीढ़ी के लिए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी स्थायी संकट का कारण बन गया। बहरहाल, 79 साल बाद भी विभाजन के सवाल खत्म नहीं हुए हैं। कश्मीर, सीमा पार आतंकवाद, रक्षा बोझ, सामाजिक अविश्वास और राजनीतिक ध्रुवीकरण जैसे मुद्दे इस इतिहास की लंबी छाया की याद दिलाते हैं। लेकिन इसका सबसे बड़ा सबक यही है कि राजनीतिक फैसलों के परिणाम केवल तत्कालीन पीढ़ी तक सीमित नहीं रहते। इसलिए 14 अगस्त का विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस केवल शोक का दिन नहीं, बल्कि आत्ममंथन का दिन भी है। साथ ही उन लाखों लोगों को नमन करने का दिन भी है जिन्होंने अपनी जान, घर और पहचान खोई; और यह संकल्प लेने का दिन भी है कि इतिहास की त्रासदियों को दोहराने की बजाय उनसे सीख लेकर भारत की एकता, सामाजिक सद्भाव और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को और मजबूत किया जाए। -नीरज कुमार दुबे
'आंदोलन आपका अधिकार, लेकिन इसके पीछे की ताकत पहचानिए', झारखंड प्रोटेस्ट पर बोले जेएमएम प्रवक्ता
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ऑटो सेक्टर की बिक्री रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंची
नई दिल्ली, भारत में ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री पूरी रफ्तार से भाग रही है और जुलाई में बिक्री अब तक के सबसे उच्चतम स्तर पर रही है।
BJP top leadership's silence in Loksabha, क्या ध्वस्त हुई PM Modi और Shah की Image?
संसद का मॉनसून सत्र पूरी तरह बर्बाद हो गया जिसके चलते कई सवाल उठे हैं। सबसे पहला सवाल यह है कि क्या यही संसदीय लोकतंत्र है, जहां संसद का पूरा सत्र ही हंगामे की भेंट चढ़ जाए? सवाल उठता है कि विपक्ष का काम सरकार को घेरना है या सदन को ही ठप कर देना? 20 जुलाई से शुरू हुआ मानसून सत्र 13 अगस्त को खत्म हो गया, लेकिन सवाल यह है कि इस पूरे सत्र में बहस कितनी हुई और हंगामा कितना? सवाल उठता है कि संसद में नारे लगना ज्यादा जरूरी है या जनता के मुद्दों पर सवाल-जवाब होना जरूरी है? सवाल उठता है कि जब सरकार जवाब देने को तैयार थी, तो विपक्ष ने संसद चलने क्यों नहीं दी? आंकड़ों को देखें तो राज्यसभा की उत्पादकता महज 39.17 प्रतिशत रही और सभापति के अनुसार सदन में कुल 37 घंटे 49 मिनट ही काम हो सका। वहीं लोकसभा की उत्पादकता करीब 19 प्रतिशत रही। क्या यह प्रतिशत किसी परीक्षा के लिहाज से सामान्य पास प्रतिशत भी माना जाएगा? जो Gen Z युवा सड़कों पर उतरकर अपने सवाल और अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे थे, क्या वे यह नहीं देख रहे होंगे कि देश की संसद में कामकाज का स्तर आखिर कैसा है? सवाल उठ रहा है कि सांसदों को जनता ने संसद में बहस, सवाल और जवाब के लिए भेजा था या वेल में नारे लगाने के लिए? इसे भी पढ़ें: संसदीय-गतिरोध से नहीं चलेगा लोकतंत्र, संवाद ही है समाधान सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या विपक्ष यह भूल गया कि संसद सरकार को जवाबदेह बनाने का सबसे बड़ा मंच है? अगर सरकार छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के मुद्दे पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के जवाब के लिए तैयार थी, तो विपक्ष ने सदन को चलने क्यों नहीं दिया? क्या राम मंदिर में कथित चढ़ावा चोरी, छात्रों पर कार्रवाई और प्रधानमंत्री से माफी की मांग को एक साथ जोड़कर सदन को अनिश्चितकाल तक बाधित करना ही लोकतांत्रिक संघर्ष का तरीका है? क्या विपक्ष सरकार को जवाब देने के लिए मजबूर करना चाहता था या सरकार को जवाब देने का मौका ही नहीं देना चाहता था? क्या जनता यह नहीं जानना चाहती थी कि छात्रों पर कार्रवाई क्यों हुई? क्या राम मंदिर से जुड़े आरोपों पर सरकार से जवाब नहीं मांगा जाना चाहिए था? क्या प्रधानमंत्री और गृह मंत्री से सवाल पूछने का अधिकार विपक्ष का नहीं है? लेकिन क्या विपक्ष ने हंगामा करके खुद ही वह मंच नहीं गंवा दिया, जहां उसके सवाल देश के सामने दर्ज हो सकते थे? अगर सरकार जवाब देने को तैयार थी, तो फिर विपक्ष ने सरकार को वॉकओवर क्यों दिया? क्या संसद में बैठे हर सांसद के क्षेत्र की अपनी समस्याएं नहीं हैं? क्या बेरोजगारी, सड़क, रेल, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों और स्थानीय विकास से जुड़े सवाल पूछने का अधिकार सांसदों को नहीं है? जब प्रश्नकाल ही नहीं हुआ, शून्यकाल भी नहीं हो सका, तो क्या हजारों-लाखों मतदाताओं की आवाज सदन के भीतर दब नहीं गई? अपने क्षेत्र की समस्याओं को उठाने की तैयारी के साथ रोज सदन में आने वाले सांसदों से पूछा जाना चाहिए कि उनके संसदीय अधिकारों के इस्तेमाल का अवसर उनसे आखिर किसने छीना? राज्यसभा में 285 तारांकित प्रश्न पूछे जाने थे, शून्यकाल में 380 विषय और विशेष उल्लेख के जरिए 380 मुद्दे उठाए जाने थे, लेकिन क्या यह लोकतंत्र की विडंबना नहीं कि इनमें से केवल 16 प्रश्न, 52 शून्यकाल के विषय और 93 विशेष उल्लेख ही सदन में लिए जा सके? क्या बाकी सवाल पूछने वाले सांसदों और उन सवालों के जवाब की प्रतीक्षा कर रही जनता को इसका हिसाब नहीं मिलना चाहिए? और सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सांसदों के लिए भी ‘नो वर्क, नो पे’ का सिद्धांत नहीं होना चाहिए? अगर कोई कर्मचारी काम नहीं करता तो वेतन और जवाबदेही का सवाल उठता है, ऐसे में जनता के पैसे से चलने वाली संसद में लगातार व्यवधान डालने वालों पर ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं होनी चाहिए? क्या सांसदों को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वे सदन को चलने न दें और फिर भी अपने कार्यकाल का पूरा लाभ लेते रहें? हंगामे के बीच विधेयक पारित हुए, लेकिन क्या विपक्ष खुद से पूछेगा कि अगर वह संसद चलने देता तो इन विधेयकों पर और विस्तृत चर्चा नहीं हो सकती थी? लोक परीक्षा कानून में संशोधन, न्यायाधिकरण सुधार, केरल के नाम परिवर्तन, सहकारी विकास निगम, बैंककार बही साक्ष्य और खान एवं खनिज से जुड़े विधेयकों पर व्यापक बहस होती तो क्या जनता को इनके प्रभाव और प्रावधानों की अधिक स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती? क्या लोकतंत्र में विधेयक पास होना ही पर्याप्त है या यह भी जरूरी नहीं कि विपक्ष अपनी आपत्तियां सदन के रिकॉर्ड पर दर्ज कराए? सरकार कह रही है कि 12 विधेयक पारित हुए, लेकिन बहस और चर्चा के लिहाज से सत्र सफल नहीं रहा, तो क्या यह सत्ता पक्ष के लिए भी आत्ममंथन का विषय नहीं होना चाहिए? क्या सरकार को यह सुनिश्चित नहीं करना चाहिए कि महत्वपूर्ण विधेयक पर्याप्त चर्चा के बाद ही पारित हों? और क्या विपक्ष को यह नहीं समझना चाहिए कि चर्चा रोककर वह सरकार को ही नहीं, खुद को भी कमजोर करता है? एफसीआरए संशोधन विधेयक को विस्तृत समीक्षा और सुझावों के लिए संयुक्त समिति के पास भेजा गया, तो क्या यह प्रमाण नहीं कि संसदीय प्रक्रिया में असहमति के लिए रास्ते मौजूद हैं? फिर हर मुद्दे का रास्ता हंगामा क्यों? क्या विरोध का अर्थ सदन बंद करना है या बहस को और धारदार बनाना? और क्या संसद सत्र से पहले राहुल गांधी के विदेश दौरों को लेकर उठने वाले सवालों का जवाब भी सार्वजनिक विमर्श में नहीं आना चाहिए? क्या विपक्ष के सबसे बड़े नेता की संसद के प्रति उपस्थिति और सक्रियता पर सवाल पूछना गलत है? क्या विपक्ष यह बताएगा कि संसद के महत्वपूर्ण सत्रों से पहले उसकी राजनीतिक रणनीति क्या होती है और क्या जनता को इसका स्पष्ट जवाब नहीं मिलना चाहिए? क्या विपक्ष अराजकता की ऐसी स्थिति की ओर बढ़ रहा है, जहां सरकार को काम ही न करने दिया जाए? क्या सत्ता पक्ष भी इस गतिरोध को तोड़ने के लिए पर्याप्त राजनीतिक पहल नहीं कर सकता था? क्या दोनों पक्षों की जिम्मेदारी नहीं थी कि टकराव के बीच भी संसद को चलाया जाता? और अगर दोनों पक्ष विफल रहे, तो इसकी कीमत कौन चुकाएगा? सांसद या वही जनता, जिसके टैक्स के पैसे से संसद चलती है? क्या लोकतंत्र का अर्थ सिर्फ बहुमत से कानून बनाना है? क्या लोकतंत्र का अर्थ सिर्फ विरोध करना है? क्या लोकतंत्र का असली अर्थ सवाल पूछना, जवाब सुनना, तर्क देना, असहमति दर्ज करना और फिर निर्णय तक पहुंचना नहीं है? अगर प्रश्नकाल नहीं होगा, शून्यकाल नहीं होगा, बहस नहीं होगी और विधेयक हंगामे के बीच पारित होंगे, तो फिर संसद और राजनीतिक अखाड़े में फर्क क्या रह जाएगा? अंत में एक बार फिर सवाल उठता है कि क्या यही संसदीय लोकतंत्र है? और अगर नहीं, तो सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों कब अपनी-अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करेंगे? सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों को मिलकर यह सोचना होगा कि संसदीय लोकतंत्र में जनता का विश्वास कैसे कायम रखा जाए। आखिर संसद की हर बैठक पर देश के लाखों-करोड़ों रुपये खर्च होते हैं और जब जनता अपनी आंखों के सामने सदनों को बार-बार हंगामे और व्यवधान के कारण ठप होते देखती है, तो उसके मन में सवाल उठना स्वाभाविक है कि उसके पैसे और उसके जनादेश का कितना सम्मान हो रहा है। अगर यही तस्वीर लगातार बनी रही, तो कहीं आम जनता का भरोसा संसदीय लोकतंत्र की पूरी व्यवस्था से ही न डिग जाए? -नीरज कुमार दुबे
Shravan Garg Analysis: Rahul Gandhi के हमलों से हिल गई Modi Govt, क्या अगले 3 साल चला पाएंगे सरकार?
राहुल गांधी ने मंच पर की पीएम मोदी की मिमिक्री- 'विदेश नीति जबरन गले मिलने से नहीं चलती'
राहुल गांधी ने कहा, 'पीएम मोदी को यह ख्याल कहां से आया कि विदेश नीति का मतलब जबरदस्ती गले मिलना है।' इसके बाद राहुल संदीप दीक्षित की ओर दौड़े और उन्हें गले लगा लिया। वे शायद पीएम मोदी के चर्चित गले मिलने के अंदाज की नकल कर रहे थे।
भुगतान क्षेत्र में हुआ 5.8 अरब डॉलर का निवेश
नई दिल्ली, भारत के भुगतान क्षेत्र में 2021 से अब तक 371 घोषित इक्विटी फंडिंग राउंड के जरिए करीब 5.8 अरब डॉलर का निवेश आया है।
बोफोर्स कांडः एक झूठ के शापित होने का सच
एक झूठ के बल पर खड़ा हुआ बोफोर्स कांड सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद अब फाइलों में बंद हो गया। केस चालीस साल चला। इस पर 250 करोड़ रूपये व्यय हुए। इतना सब होने और चालीस साल की जीतोड़ कवायद के बाद भी बोफार्स खरीद में रिश्वत लेने की सच्चाई सामने नही आई। केस तो खत्म हो गया किंतु यह ये नहीं हो पाया कि इस प्रकरण में रिश्वत ली गई या नहीं। कोर्ट के केस खारिज करने के बाद भी रिश्वत लेने का आरोप आज भी अपनी जगह खड़ा है। इस कांड का पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी एवं अन्य आरोपियों के माथे पर लगा बेइमानी का दाग कभी खत्म नहीं हो पाएगा? क्या उनके परिवार माथे पर लगे इस कलंक से मुक्त हो पाएंगे? क्या उनके परिवार के सम्मान की हुई क्षति की कभी पूर्ति हो सकेगी? पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह के बार−बार बोले जाने वाले बोफोर्स खारीद में रिश्वत ने जनता के मन में तक जमाये झूठ के कारण राजीव गांधी से जनता दूर हो गई और उन्हें अपनी सरकार तक गंवानी पड़ी। सुप्रीम कोर्ट ने हिंदुजा ब्रदर्स को बरी करने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के 2005 के फैसले के खिलाफ दायर अंतिम अपील को भी खारिज कर दिया है। इसके साथ ही भारत के सबसे चर्चित और लंबे समय तक चलने वाले भ्रष्टाचार के मामलों में से एक बोफोर्स कांड का कानूनी अध्याय हमेशा के लिए बंद हो गया है। मामले में जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस विनोद के. चंद्रन की बेंच ने याचिकाकर्ता अधिवक्ता की स्थगन की मांग को ठुकराते हुए मामले की आखिरी याचिका को खारिज कर दिया। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने भी इस मामले में अपील की थी। इस अपील को भी सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में ही देरी के आधार पर खारिज कर दिया था। 1986 में हुए इस रक्षा सौदे का विवाद लगभग 40 साल तक अदालतों और भारतीय राजनीति के केंद्र में रहा और अंत में समाप्त हो गया। इसे भी पढ़ें: खड़गे की रैली के बाद 'शुद्धिकरण' पर बवाल: Priyanka Gandhi ने पूछा - यह कैसी Politics? पूरा मामला 24 मार्च 1986 को भारत सरकार और स्वीडिश कंपनी एबी बोफोर्स के बीच हुए 1,437 करोड़ रुपये के उस समझौते से जुड़ा है। इसके तहत भारतीय सेना के लिए 400 हॉवित्जर तोपें खरीदी जानी थीं। साल 1987 में स्वीडिश रेडियो ने यह सनसनीखेज खुलासा किया कि इस सौदे को हासिल करने के लिए भारतीय राजनेताओं और रक्षा अधिकारियों को अवैध कमीशन दिए गए थे। इस खुलासे ने भारतीय राजनीति में तहलका मचा दिया था। कांग्रेस छोड़ने के बाद, विश्वनाथ प्रताप (वीपी) सिंह ने खुद को एक 'ईमानदार नेता' (मिस्टर क्लीन) के रूप में स्थापित किया। उन्होंने राष्ट्रीय मोर्चा (जनता दल) का गठन किया। 1989 के लोकसभा चुनाव अभियान के दौरान वीपी सिंह अपनी रैलियों में बेहद आक्रामक रहे। वह अक्सर मंचों से अपनी जेब से एक सफेद पर्ची निकालकर लहराते थे। उनका दावा था कि उस पर्ची पर बोफोर्स घोटाले के पुख्ता सबूत, दलाली की रकम पाने वालों के नाम और राजीव गांधी के कथित स्विस बैंक खातों के नंबर लिखे हैं। कथित स्विस बैंक खातों के नंबर लिखे हैं। इस आक्रामक अभियान ने जनता के बीच राजीव गांधी सरकार के खिलाफ भारी आक्रोश पैदा किया। बोफोर्स घोटाले को मुख्य चुनावी मुद्दा बनाकर वीपी सिंह ने विपक्ष को एकजुट किया। इस आक्रामक अभियान ने जनता के बीच राजीव गांधी सरकार के खिलाफ भारी आक्रोश पैदा किया। उनकी बेइंतहा छवि खराब की। राजीव गांधी सरकार पर गंभीर सवाल उठे और 1989 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी की हार का इसे एक बड़ा कारण माना गया। प्रधानमंत्री बनते ही वीपी सिंह ने बोफोर्स कंपनी पर भारत के साथ भविष्य के किसी भी रक्षा सौदे के लिए प्रतिबंध लगा दिया। उन्होंने मामले की जांच के लिए अधिकारियों की एक विशेष टीम भी गठित की। भारी वादों और दावों के बावजूद, झूठ के बल पर बनी वीपी सिंह की सरकार केवल 11 महीने चली। सकार बनने के बाद वीपी सिंह 11 महीने की आपनी सरकार के कार्यकाल में कोई भी सबेत नही दे सके। स्विस बैंक का खाता भी नही बता पाए। ये सरकार राजीव गांधी के खिलाफ सीधे तौर पर कोई ठोस कानूनी सबूत पेश नहीं कर सकी। आलोचकों का कहना है कि चुनावी रैलियों में जिस पर्ची का दावा किया गया था, उसका सच कभी पूरी तरह सामने नहीं आ सका। स्विस रेडियो की एक घोषणा और वीवी सिंह द्वारा बार−बार रिश्वत खाने के लगाए आरोप ने इस महत्वपूर्ण शस्त्र सौदे को नुकसान पंहुचाया। इस पर प्रतिबंध लगाया। यही बोफोर्स तोप कारगिल युद्ध में सबसे मारक शस्त्र बनी। अगर ये सौदा रद्द न होता तो देश की सेना और ज्यादा मजबूत होतीं। एक बात और इस तरह के आरोप लगाने के बाद अधिकारी और ज्यादा सचेत हो जाते हैं। वे देश और सेना के लिए महत्वपूर्ण और अतिआवश्यक उपकरण भी लेते बचते हैं। इन कांड की सीबीआई ने जांच की। सीबीआई ने जनवरी 1990 में एफआईआर दर्ज की। अक्तूबर 2000 में दायर की गई सप्लीमेंट्री चार्जशीट में हिंदुजा बंधुओं (श्रीचंद, गोपीचंद और प्रकाश हिंदुजा) का नाम भी शामिल किया गया था। दिल्ली हाईकोर्ट ने 31 मई 2005 को अपने फैसले में हिंदुजा ब्रदर्स और स्वीडिश फर्म एबी बोफोर्स के खिलाफ चल रही सभी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया था। साथ ही, हाईकोर्ट ने सीबीआई की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए यह भी टिप्पणी की थी कि इस जांच पर सरकारी खजाने के करीब 250 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस मामले के लंबे खिंचने पर हैरानी जताई। जब याचिकाकर्ता के वकील ने कुछ मृत प्रतिवादियों के नाम हटाने के लिए चार हफ्ते का समय मांगा, तो जस्टिस पारदीवाला ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा, 'हिंदुजा ब्रदर्स और सीबीआई को लेकर यह सब क्या चल रहा है? सभी कार्यवाही रद्द हो चुकी हैं, यह क्या है? कितने साल बीत चुके हैं?' वहीं, वकील द्वारा यह याद दिलाने पर कि यह सौदा 1986 में हुआ था, बेंच ने स्पष्ट कर दिया कि अब इस मामले में और देरी या सुनवाई की कोई गुंजाइश नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के इस अंतिम निर्णय के साथ ही बोफोर्स पे-ऑफ केस से जुड़ी सभी कानूनी लड़ाइयां अब आधिकारिक रूप से समाप्त हो गई हैं। इस विवाद के कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार को भारी राजनीतिक नुकसान हुआ। वर्ष 1989 के आम चुनावों में कांग्रेस पार्टी की हार का इसे एक प्रमुख कारण माना गया। इस मामले में ओत्तावियो क्वात्रोची और हिंदुजा बंधुओं जैसे नाम लंबे समय तक कानूनी और राजनीतिक बहसों का केंद्र रहे। लगभग चार दशकों तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद, न्यायालय ने इस मामले से जुड़ी आखिरी याचिकाओं को खारिज कर दिया। स्विस सरकार द्वारा कराई जांच भी आरोप सिद्ध नही कर सकी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अब ये केस सदा−सदा के लिए बंद हो गया। एक आरोप की जांच पर सीबीआई ने 250 करोड़ के आसपास व्यय किए। न्यायालय का लंबा समय बरबाद किया। न्यायालय भी केस का सच नही बता पाया। 40 साल चले केस में भी यह ये नहीं हुआ कि बोफार्स खरीद में रिश्वत ली गई या नहीं। इस सबके बाबजूद आरोप तो आज भी वैसा ही खड़ा है, जैसा पहले था। 40 साल में यह आरोप अखबार और फाइलों के लाखों पन्नों पर छप गया। जनता में मन में यह धारणा इतनी पक्की हो गई, कि ये कभी खत्म नहीं होगी। आने वाली पीढ़ियों तक इसे नहीं भूल पाएंगी। क्या आरोपी परिवारों के भंग हुए सम्मान की भरपाई हो पाएगी। यदि आरोप न आता तो हो सकता था कि राजीव गांधी की सरकार और चलती। बोफार्स कांड बंद हो गया किंतु राजीव गांधी और उनके तथा अन्यों के परिवार के माथे पर एक बार−बार बोले जाने वाले झूठ के बल पर लगा रिश्वतखोरी का कलंक कभी खत्म हो पाएगा? कभी नहीं। हिटलर ने कहा था कि एक झूठ का बार−बार बोलिए, वह सच बन जाएगा। ऐसा ही इस बोफोर्स कांड में हुआ। बोफार्स की खरीद में रिश्वतखोरी का आरोप इतनी बार लगा कि यह हिटलर का सच बन गया। - अशोक मधुप (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
Modi ने माहौल ही बदल डाला, Red Corridor से Red Carpet पर Ramp Walk करने लगीं पूर्व नक्सली महिलाएं
रेड कॉरिडोर पर चलने वाले कदम अब रेड कार्पेट पर अपने जलवे बिखेर रहे हैं। कभी नक्सलियों की साथी रहने के दौरान हाथों में बंदूक थामकर बस्तर के घने जंगलों में भटकने वाली महिलाएं अब उसी आत्मविश्वास के साथ रैंप पर चल रही हैं, जहां उनके स्वागत में गोलियों की आवाज नहीं, तालियों की गड़गड़ाहट सुनाई दे रही है। रायपुर में राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर आयोजित ट्राइबल फैशन शो में पूर्व महिला माओवादियों ने हाथ से बुने परिधानों में रैंप वॉक कर एक ऐसी तस्वीर पेश की, जिसकी कुछ साल पहले कल्पना भी मुश्किल थी। यह सिर्फ फैशन शो नहीं था, बल्कि बंदूक से मुख्यधारा, हिंसा से विकास और भय से आत्मविश्वास तक बस्तर की बदलती कहानी का जीवंत प्रतीक था। कभी बस्तर के जंगलों में हथियार उठाकर चलने वाली इन महिलाओं ने आत्मसमर्पण के बाद हिंसा का रास्ता छोड़ा और समाज में लौटने का फैसला किया। आज इनमें से कई महिलाएं सामाजिक संगठनों के साथ काम कर रही हैं, नई आजीविका तलाश रही हैं और उन अवसरों को हासिल कर रही हैं, जो कभी उनके लिए दूर की बात थे। रैंप पर उनका आत्मविश्वास इस बात का संकेत है कि पुनर्वास केवल हथियार छीन लेने का नाम नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन का रास्ता खोलने की प्रक्रिया है। इसे भी पढ़ें: Modi-Yogi ने 'Mission 2027' को सफल बनाने के लिए कसी कमर, कई BJP MLAs के टिकट पर लटकी तलवार! इस आयोजन का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो लोगों ने भी इसे बस्तर के बदलते चेहरे की असाधारण तस्वीर बताया। कई यूजर्स ने कहा कि कुछ वर्ष पहले तक ऐसी तस्वीर की कल्पना करना भी कठिन था। किसी ने इसे सशक्तिकरण का वास्तविक रूप बताया तो किसी ने सवाल उठाया कि ऐसी कहानियों को व्यापक प्रचार क्यों नहीं मिलता। दरअसल, रैंप पर चलती ये महिलाएं उस बदलाव की प्रतिनिधि हैं, जो दशकों तक वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित इलाकों में धीरे-धीरे जमीन पर आकार ले रहा है। बस्तर में बदलाव की सबसे बड़ी तस्वीर खेल के मैदानों से भी सामने आई है। बस्तर ओलंपिक 2025 में 3.91 लाख से अधिक खिलाड़ियों का पंजीयन हुआ। इससे भी महत्वपूर्ण यह रहा कि 700 से अधिक आत्मसमर्पित नक्सली और हिंसा से प्रभावित ग्रामीण ‘नियो बात’ यानी ‘नया रास्ता’ टीम के तहत खेलों में शामिल हुए। महिलाओं और बेटियों की भागीदारी भी लगभग तीन गुना बढ़ी। यानी जिन इलाकों में कभी बंदूकों की गूंज सुनाई देती थी, वहां अब खेलों की तालियां सुनाई दे रही हैं। शिक्षा के मोर्चे पर भी बदलाव साफ दिखाई देता है। माओवादियों द्वारा ध्वस्त या बंद कराए गए कई स्कूल फिर खुले हैं और जंगलों के बीच बच्चों की पढ़ाई दोबारा शुरू हुई है। आदिवासी युवाओं को बेहतर अवसर देने के लिए 259 एकलव्य मॉडल आवासीय स्कूल, 46 आईटीआई और 49 कौशल विकास केंद्र स्थापित किए जा चुके हैं। राज्य सरकार अब विकास को बस्तर के आखिरी छोर तक पहुंचाने पर जोर दे रही है। ‘नियद नेल्लानार’ योजना के तहत सुरक्षा बलों के कैंपों को ‘सेवा डेरा’ के रूप में इस्तेमाल कर ग्रामीणों तक राशन, बिजली, पानी और स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाई जा रही हैं। ‘हर गांव रोशन’ जैसी पहलों के जरिए इंद्रावती टाइगर रिजर्व जैसे दुर्गम इलाकों के 70 से अधिक गांवों तक पहली बार बिजली और सोलर लाइटिंग पहुंची है। डिस्ट्रिक्ट मिनरल फंड की राशि से आदिवासी गांवों में पक्के मकान और बुनियादी ढांचा विकसित किया जा रहा है। साथ ही कनेक्टिविटी भी इस बदलाव की रीढ़ बन रही है। बस्तर के दुर्गम इलाकों में 11 हजार किलोमीटर से अधिक सड़कों और 1,300 से ज्यादा मोबाइल टावरों का विस्तार हुआ है। इससे ग्रामीण बाजारों, प्रशासन और देश-दुनिया से जुड़ रहे हैं। उधर, माओवाद के कमजोर पड़ने के बाद सुरक्षा बल अब जंगलों में छिपे आईईडी को भी नष्ट कर रहे हैं और ‘आईईडी मुक्त पंचायत’ की दिशा में काम हो रहा है। इस बदलते माहौल की पुष्टि राजनीतिक स्तर पर भी हो रही है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने केंद्रीय ग्रामीण विकास एवं कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान से मुलाकात कर बस्तर में सड़क संपर्क बढ़ाने के लिए केंद्रीय योजनाओं के मानकों में विशेष छूट की मांग की है। उनका कहना है कि चार-पांच दशकों के बाद बस्तर माओवाद के प्रभाव से बाहर निकलने की स्थिति में पहुंचा है, लेकिन दूर-दराज बिखरी आबादी के कारण सामान्य जनसंख्या आधारित नियमों के तहत सड़क निर्माण में दिक्कत आती है। अब चुनौती है कि शांति को स्थायी विकास में बदला जाए। सबसे प्रतीकात्मक बदलाव तिरंगे को लेकर है। बस्तर संभाग के 92 से अधिक ऐसे सुदूर गांवों में स्वतंत्रता के बाद पहली बार राष्ट्रीय ध्वज शान से फहराया गया है। साथ ही पुनर्वास नीति 2025 के तहत आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों को घर, जमीन, मासिक सहायता और रोजगार के अवसर देकर मुख्यधारा में सम्मानजनक जीवन की राह दी जा रही है। बहरहाल, बस्तर की कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां बदलाव केवल सुरक्षा बलों की सफलता की कहानी नहीं है। यह उस सामाजिक परिवर्तन की कहानी है, जिसमें बंदूक की जगह खेल, जंगल के डर की जगह स्कूल, अलगाव की जगह सड़क और हिंसा की जगह रोजगार ने लेना शुरू किया है। साथ ही जिस छत्तीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों को कभी ‘रेड कॉरिडोर’ के नाम से जाना जाता था, वहां अब रेड कार्पेट पर आत्मविश्वास से चलती पूर्व महिला माओवादियों की तस्वीर यही संदेश दे रही है कि राज्य का भविष्य अब भय नहीं, बल्कि शांति, सम्मान और संभावनाओं के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है। -नीरज कुमार दुबे
क्या भारत अब वैश्विक टेक कंपनियों के लिए ‘नियम मानो या रास्ता छोड़ो’ वाला संदेश दे रहा है?
भारत सरकार ने इंस्टाग्राम, वाट्सएप और फेसबुक का संचालन करने वाली कंपनी मेटा की मनमानी को अब नियंत्रित करने का निर्णय लिया है। इसी के दृष्टिगत उसे यह चेतावनी भी दी है कि उसे भारतीय कानूनों का पालन करना ही होगा। यही नहीं, सरकार ने मेटा से अपने एल्गोरिदम को लेकर भी जवाब तलब किया है। इसका तात्पर्य है कि अब मेटा को यह सुनिश्चित करना होगा कि इस सरकारी निर्देश का वास्तव में पालन हो, क्योंकि मेटा अथवा अन्य इंटरनेट मीडिया कंपनियां एलगोरिदम का मनमाना उपयोग करती हैं। एआइ के आगमन के बाद उनके लिए ऐसा करना और आसान हो गया है। इसलिए सवाल उठने लगे हैं कि क्या भारत अब वैश्विक टेक कंपनियों के लिए ‘नियम मानो या रास्ता छोड़ो’ वाला संदेश दे रहा है? इसे भी पढ़ें: असामाजिक हो रहे सोशल मीडिया का नियमन जरूरी वस्तुतः वैश्विक इंटरनेट कंपनियां एक विशेष एजेंडे का प्रचार-प्रसार करती हैं। अब इंटरनेट मीडिया कंपनियां यह सुनिश्चित कर रही हैं कि लोग क्या देखें और क्या नहीं? मसलन, ऐसा करके वे लोगों के स्वस्थ चिंतन को प्रभावित कर रही हैं। चिंताजनक पहलू यह है कि यह सब काम प्रायः संकीर्ण अंतर्राष्ट्रीय उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जाता है ताकि भारतीय हित प्रभावित होता रहे और कम्पनियों के लिए लाभदायक स्थिति निर्मित होती रहे। यह एक तथ्य है कि इंटरनेट कंपनियां कई देशों में चुनावों को प्रभावित करने का काम कर चुकी हैं। वे ऐसा भारत में भी कर चुकी हैं और इसका पता कैंब्रिज एनालिटिका मामले से चलता है। वैसे तो इंटरनेट मीडिया कंपनियां अपने को- 'सोशल मीडिया' कहती हैं, लेकिन सच यह है कि वे असामाजिक और अराजक तत्वों को भी प्रोत्साहन प्रदान करती हैं। वे ध्रुवीकरण के साथ ही सामाजिक विभाजन की खाई भी चौड़ी कर रही हैं। अलबत्ता, कई बार वे अपने गलत इरादों की पूर्ति करती हुई पाई गई हैं। पहले हर बार वे माफी मांगकर बच निकलती हैं। लेकिन इस बार भारत सरकार ने उनकी नकेल कसी है। लिहाजा सरकार को अब केवल माफी से संतुष्ट नहीं होना चाहिए, बल्कि यदि कोई इंटरनेट मीडिया कंपनी अनुचित कार्य करती पाई जाए तो उसे वैसे ही कठोर दंड का भागीदार बनाया जाना चाहिए जैसे अनेक पश्चिमी देश समय-समय पर बनाते हैं और उन पर भारी जुर्माना लगाते हैं। अभी हाल में अमेरिका ने मेटा पर भारी जुर्माना लगाया। इसके दृष्टिगत भारत सरकार ने भी, हाल में मेटा ने प्रधानमंत्री मोदी के वीडियो को हटाने को लेकर जो माफी मांगी, उसे खारिज कर उचित ही किया। दरअसल, समस्या केवल यह नहीं कि मेटा ने किसी खास एजेंडे के तहत शरारतपूर्ण ढंग से प्रधानमंत्री के वीडियो को हटाया, बल्कि यह भी है कि उसने यह माना कि उसके प्लेटफार्म पर बाल यौन शोषण से जुड़े कंटेंट के साथ-साथ डीपफेक वीडियो को बढ़ावा दिया गया। यह भी स्वीकारा कि उसने पैसे लेकर हानिकारक सामग्री को बढ़ावा दिया। मसलन, ये सब ऐसी हरकतें हैं, जिनके लिए मेटा अथवा अन्य इंटरनेट कंपनियों को जवाबदेह बनाना अनिवार्य है। अब यह सही समय है कि भारत सरकार मेटा एवं अन्य इंटरनेट मीडिया कंपनियों को जवाबदेह बनाने के साथ ही इस पर भी विचार करे कि आखिर विदेशी इंटरनेट मीडिया कंपनियों पर निर्भर रहना कहां तक उचित है? चूंकि सोशल मीडिया दुनिया भर में लोगों को लती/बीमार भी बना रही हैं, इसलिए इनकी बढ़ती प्रवृत्ति पर पुनर्विचार की जरूरत तो है ही! इसी के मद्देनजर भारत सरकार की ताजा चेतावनी को लिया जाना चाहिए, जिसका का तत्काल कारण Meta/Facebook द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो कुछ समय के लिए Facebook से हटाया जाना है। लिहाजा, सरकार ने Meta की यह सफाई कि वीडियो गलती से हट गया था, स्वीकार नहीं की और कहा कि मामला अभी “सुलझा हुआ” नहीं है। # आखिर सरकार ने Meta को क्यों चेताया? ऐसे में सीधा सवाल है कि आखिर सरकार ने Meta को क्यों चेताया? वस्तुतः इसके मुख्यतः चार कारण सामने आए हैं: पहला, PM मोदी के वीडियो को हटाना — जुलाई 2026 में प्रधानमंत्री का युवाओं से जुड़ा वीडियो अस्थायी रूप से Facebook से हट गया। Meta ने इसे operational error बताया, लेकिन सरकार ने स्पष्टीकरण को संतोषजनक नहीं माना। दूसरा, भारतीय कानून बनाम Meta की global policy — सरकार का स्पष्ट संदेश है कि भारत में काम करने वाली Meta को अपनी वैश्विक नीतियों से ऊपर भारतीय कानूनों और नियामकीय निर्देशों का पालन करना होगा। तीसरा, Deepfake और AI-generated misinformation — सरकार ने Meta से algorithms और content-moderation व्यवस्था मजबूत करने, deepfake/propaganda को तेजी से पहचानने तथा अधिक प्रभावी takedown mechanism बनाने को कहा है। चौथा, Safe-harbour का दबाव — संसदीय IT समिति के अध्यक्ष निशिकांत दुबे ने चेतावनी दी कि नियमों के अनुपालन में गंभीर चूक होने पर Meta को IT Act की धारा 79 के तहत मिलने वाली safe-harbour सुरक्षा पर सवाल उठ सकता है। # इन आधा दर्जन विवादों में सबसे गंभीर मामला कौन-सा है? मेरे आकलन में 2021 WhatsApp Privacy Policy विवाद और उसके परिणामस्वरूप CCI की ₹213.14 करोड़ की कार्रवाई सबसे महत्वपूर्ण नियामकीय मामला है। CCI ने पाया कि WhatsApp ने अपनी dominant position का इस्तेमाल करते हुए यूजर डेटा संग्रह/शेयरिंग के संबंध में प्रतिस्पर्धा कानून का उल्लंघन किया; बाद में मामला न्यायिक चुनौती तक गया। लेकिन 2026 का नया टकराव अलग प्रकृति का है। अब सवाल सिर्फ privacy या competition का नहीं, बल्कि Meta के algorithm, content moderation, AI/deepfake, राजनीतिक सामग्री और भारतीय संप्रभु नियमन का बनता जा रहा है। यही वजह है कि सरकार का संदेश मूलतः यह है: “भारत में कारोबार करना है तो Meta को भारतीय कानून और भारतीय नियामकीय व्यवस्था के अनुसार चलना होगा।” यही वजह है कि भारत में केंद्र सरकार और अमेरिकी टेक कंपनी Meta के बीच टकराव अब केवल सोशल मीडिया कंटेंट या यूजर प्राइवेसी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इससे भी आगे बढ़ चुका है। खासकर 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के Facebook वीडियो को अस्थायी रूप से प्रतिबंधित किए जाने के बाद पैदा हुआ विवाद इस रिश्ते को एक नए और अधिक संवेदनशील दौर में ले गया है, जो भारत-अमेरिका सम्बन्धों में जारी उतार-चढ़ाव की चुगली करने को काफी है। भले ही Meta ने इसे “operational error” बताया और वीडियो बहाल कर दिया। लेकिन भारत सरकार ने इसे केवल तकनीकी गलती मानने से इनकार किया। बाद में Meta के वैश्विक अधिकारियों ने भारत सरकार के सामने माफी भी मांगी। फिर भी यह सवाल इसलिए बड़ा है कि क्या भारत में डिजिटल प्लेटफॉर्म अब केवल निजी कंपनियां हैं या वे सार्वजनिक जीवन और लोकतांत्रिक विमर्श को प्रभावित करने वाली ‘डिजिटल संस्थाएं’ भी बन चुकी हैं? # Meta बनाम भारत सरकार: 2018 से 2026 तक विवादों की पूरी कहानी आइए जानते हैं चरणबद्ध रूप से बढ़े टकराव के बारे में विस्तार से, ताकि आप समझ सकें कि गंगा-यमुना में कितना पानी बह चुका है:- पहला, 2021: WhatsApp Privacy Policy से शुरू हुआ बड़ा टकराव भारत में Meta और केंद्र सरकार के बीच सबसे गंभीर विवादों में एक WhatsApp की 2021 Privacy Policy थी। जिसके मार्फ़त WhatsApp ने अपनी नई नीति के तहत उपयोगकर्ताओं के डेटा को Meta की दूसरी कंपनियों के साथ साझा करने की व्यवस्था को लेकर सुनियोजित विवाद खड़ा किया। तब आलोचना यह हुई थी कि उपयोगकर्ता के पास वास्तविक विकल्प सीमित था—नीति स्वीकार करें या WhatsApp का इस्तेमाल छोड़ दें। यही मामला आगे चलकर Competition Commission of India यानी CCI तक पहुंचा। तब जाकर नवंबर 2024 में CCI ने Meta और WhatsApp पर ₹213.14 करोड़ का भारी भरकम जुर्माना लगाया और डेटा शेयरिंग के संबंध में भी कई कड़े निर्देश दिए। इस मामले में मूल प्रश्न यह था कि— क्या किसी अत्यधिक प्रभावशाली डिजिटल प्लेटफॉर्म को अपनी बाजार-स्थिति का इस्तेमाल करके उपयोगकर्ता से ऐसी शर्तें स्वीकार कराने का अधिकार है जिन्हें वह वास्तविक रूप से अस्वीकार नहीं कर सकता? दूसरा, 2024-26 में यह मामला अदालत तक पहुंचा Meta और WhatsApp ने CCI के आदेश को अदालत में चुनौती दी। मामला NCLAT और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने भी WhatsApp और Meta की डेटा नीति को लेकर कड़े सवाल उठाए और नागरिकों की निजता के अधिकार पर गंभीर चिंता जताई। इससे यह स्पष्ट हुआ कि भारत में Meta के सामने केवल सरकार नहीं, बल्कि नियामकीय और न्यायिक संस्थाओं की संयुक्त निगरानी भी बढ़ रही है। तीसरा, जुलाई 2026: Instagram पर बाल शोषण सामग्री के विज्ञापन जुलाई 2026 में Meta के लिए एक और गंभीर संकट आया। वह यह कि Instagram पर Child Sexual Exploitative and Abuse Material (CSEAM) से संबंधित कथित paid advertisements की रिपोर्ट सामने आई। इसके बाद राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने जांच शुरू की और सरकार ने Meta को सामग्री हटाने तथा स्पष्टीकरण देने को कहा। यह मामला इसलिए अत्यंत गंभीर है क्योंकि यहां सवाल केवल “content moderation” का नहीं, बल्कि Meta के विज्ञापन और algorithmic monitoring तंत्र की विश्वसनीयता का है। चौथा, जुलाई 2026: प्रधानमंत्री मोदी का Facebook वीडियो इसके बाद आया सबसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील विवाद। जिसके अंतर्गत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक Facebook वीडियो, जिसमें वे युवाओं और NEET से जुड़े मुद्दे पर बात कर रहे थे, कुछ समय के लिए Facebook पर उपलब्ध नहीं रहा। हालांकि, जब प्रशासन सक्रिय हुआ तो Meta ने बाद में स्वीकार किया कि वीडियो गलती से हटाया गया था और उसे बहाल कर दिया गया। लेकिन सरकार ने इस स्पष्टीकरण को पर्याप्त नहीं माना। जिसके बाद Meta के अधिकारियों को सरकार के सामने जवाब देना पड़ा और मामला संसदीय IT समिति तक पहुंच गया। समिति ने Meta के शीर्ष नेतृत्व से माफी की मांग तक की और safe-harbour protection पर सवाल उठाए। लिहाजा, यहां से विवाद का स्वरूप ही बदल गया। क्योंकि अब सवाल था कि—अगर Meta का algorithm या moderation system भारत के प्रधानमंत्री की सामग्री को गलती से भी प्रतिबंधित कर सकता है, तो क्या भारत की डिजिटल संप्रभुता वास्तव में विदेशी कंपनियों के algorithm के हाथ में है? पांचवां, Deepfake और AI ने विवाद को और गंभीर बनाया 2026 में सरकार ने Meta से deepfake, misinformation और propaganda से निपटने के लिए अपने algorithms और content-moderation व्यवस्था को मजबूत करने को कहा है। क्योंकि सरकार की चिंता यह है कि AI के दौर में किसी नेता, संस्था या व्यक्ति का नकली वीडियो कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। इसलिए सरकार अब केवल “हटाओ” नहीं कह रही, बल्कि Meta से बेहतर detection system, तेज response और compliance roadmap की अपेक्षा कर रही है। छठा, WhatsApp और डेटा: विवाद अभी खत्म नहीं हुआ WhatsApp का मामला भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। CCI की कार्रवाई के बाद डेटा शेयरिंग और उपयोगकर्ता की सहमति का प्रश्न अभी भी न्यायिक विमर्श का हिस्सा है। सुप्रीम कोर्ट में Meta और WhatsApp की चुनौती पर भी सुनवाई हुई है। इसलिए यह कहना गलत होगा कि 2021 का विवाद केवल अतीत की बात है। वास्तव में वह विवाद आज के डेटा-सॉवरेनिटी और डिजिटल संप्रभुता के विमर्श की नींव बन चुका है। # असली लड़ाई Meta बनाम सरकार से कहीं बड़ी है! इस पूरे विवाद को केवल “मोदी का वीडियो हटाने” तक सीमित करना शायद सही नहीं होगा। असल संघर्ष तीन स्तरों पर है- पहला — डेटा पर नियंत्रण यानी भारतीय नागरिकों का डेटा किसके नियंत्रण में रहेगा? दूसरा — algorithm पर नियंत्रण यानी भारत में क्या दिखेगा, क्या नहीं दिखेगा और कौन-सी सामग्री कितने लोगों तक पहुंचेगी—इसका निर्णय भारतीय कानून करेगा या अमेरिका में बैठे technology teams के algorithms? तीसरा — डिजिटल संप्रभुता यानी क्या भारत अपने लोकतांत्रिक विमर्श की सुरक्षा के लिए विदेशी टेक कंपनियों को अपने नियमों के अनुसार चलने के लिए बाध्य कर सकता है? भारत सरकार का वर्तमान रुख स्पष्ट रूप से इसी तीसरे प्रश्न की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। # Safe Harbour: सरकार का सबसे बड़ा हथियार? भारत में social-media intermediaries को कुछ परिस्थितियों में उपयोगकर्ताओं द्वारा पोस्ट की गई सामग्री के लिए कानूनी सुरक्षा मिलती है। इसे सामान्यतः safe harbour कहा जाता है। यही कारण है कि संसदीय समिति द्वारा Meta की इस सुरक्षा पर सवाल उठाना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि किसी बड़े प्लेटफॉर्म की कानूनी सुरक्षा कमजोर होती है तो उसके ऊपर user-generated content को लेकर कहीं अधिक जिम्मेदारी आ सकती है। इसलिए Meta के लिए भारत सरकार की चेतावनी केवल राजनीतिक बयान नहीं है—यह व्यावसायिक और कानूनी जोखिम भी है। # भारत ने Meta को क्या संदेश दिया? भारत का संदेश मोटे तौर पर यह है: “Global company होने का अर्थ यह नहीं कि भारत में Global rules भारतीय कानून से ऊपर हो जाएंगे।” और यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश है। Meta ने हालिया विवाद में माफी मांगकर तत्काल संकट को टाल दिया है। Reuters के अनुसार Meta के Chief Global Affairs Officer Joel Kaplan ने PM मोदी के वीडियो को प्रतिबंधित किए जाने को operational error बताते हुए भारत से माफी मांगी। लेकिन इससे मूल प्रश्न समाप्त नहीं होता। # सवाल है कि अब आगे क्या? आने वाले वर्षों में भारत और Meta के बीच तीन मुद्दे निर्णायक रहेंगे— डेटा + AI + डिजिटल अभिव्यक्ति। भारत दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल बाजारों में है। WhatsApp और Instagram जैसे प्लेटफॉर्म करोड़ों भारतीयों के रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा हैं। इसलिए सरकार के सामने भी संतुलन की चुनौती है। एक तरफ उसे नागरिकों की निजता, बच्चों की सुरक्षा, चुनावी प्रक्रिया और राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा करनी है। दूसरी तरफ उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि नियमन के नाम पर डिजिटल अभिव्यक्ति और स्वतंत्र विमर्श पर अनावश्यक सरकारी नियंत्रण न बढ़े। यही वह बिंदु है जहां Meta बनाम भारत सरकार का विवाद आने वाले समय में “कंटेंट मॉडरेशन” से आगे बढ़कर “डिजिटल संप्रभुता बनाम वैश्विक टेक शक्ति” का बड़ा राजनीतिक विमर्श बन सकता है। और शायद यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा निहितार्थ है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
Modi and Shah in Parliament for minutes! क्या विपक्ष के सवालों से डर गए?
मैन्युफैक्चरिंग जीवीए वित्त वर्ष 10 प्रतिशत की सीएजीआर से बढ़ा
नई दिल्ली, केंद्र सरकार ने बुधवार को कहा कि संशोधित सीरीज के अनुसार, वित्त वर्ष 2022-23 से वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान स्थिर कीमतों पर मैन्युफैक्चरिंग जीवीए 10.88 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) से बढ़ा है।
मानसून सत्र के दौरान डरी-सहमी थी सरकार- कांग्रेस; राहुल के अहंकार से सत्र बर्बाद: बीजेपी
कांग्रेस ने कहा कि इस मानसून सत्र में 4 बिल नहीं आ पाए, जो विपक्ष की बड़ी उपलब्धि है। बीजेपी ने दो तिहाई बहुमत के लिए बहुत कोशिश की, पर परिसीमन बिल पास नहीं हो पाया। इधर, बीजेपी ने कहा कि राहुल गांधी के अहंकार से सत्र बर्बाद हुआ।

