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क्या था माओ का 5 फिंगर प्लान, जिसे फॉलो करते हुए जिनपिंग बढ़ा सकते हैं भारत की टेंशन

1958 का वो दौर, जब बीजिंग के तियानमेन स्क्वायर से माओ त्से-तुंग ने भारत की सीमाओं पर अपने विस्तारवादी मंसूबों की पहली लकीर खींची थी। माओ ने तिब्बत को चीन के दाहिने हाथ की हथेली बताया और लद्दाख, नेपाल, सिक्किम, भूटान व अरुणाचल प्रदेश को उसकी पाँच उंगलियां। उन्होंने साफ लफ्जों में कहा था कि ये पाँचों इलाके या तो भारत के कब्जे में हैं या उसके सीधे असर मे और इन्हें 'आजाद' कराकर चीन की हथेली से दोबारा जोड़ना बीजिंग का ऐतिहासिक धर्म है। एक ऐसा खतरनाक और अघोषित ब्लूप्रिंट, जिसे चीन ने कभी किसी सरकारी दस्तावेज में दर्ज तो नहीं किया, लेकिन 1962 की जंग से लेकर डोकलाम और गालवान घाटी की हिंसक झड़पों तक भारत को घेरने की हर चीनी चाल के पीछे इसी 'फाइव फिंगर्स ऑफ तिब्बत पॉलिसी' का साया रहा है। आज जब ड्रैगन हमारी सीमाओं पर आँखें दिखा रहा है, तो सवाल उठता है कि क्या चीन आज भी माओ के उसी 68 साल पुराने सपने को पूरा करने की साजिश रच रहा है? आज हम एमआरआई स्कैन करेंगे चीन की उसी सबसे बड़ी और सबसे पुरानी उस गुप्त रणनीति से, जो भारत की संप्रभुता के लिए आज भी सबसे बड़ा खतरा बनी हुई है। इसे भी पढ़ें: भुखमरी, कंगाली और दिवालीयपन के बावजूद पाकिस्तान आया नंबर-1, भारत 13वें नंबर पर, लेकिन किसमें? PPA की रिपोर्ट ने क्या दावा किया अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबनसिरी जिले के ताक्सिंग इलाके से बेहद चिंताजनक खबर सामने आई है। क्षेत्रीय दल पीपल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल (PPA) की एक फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया है कि चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने भारतीय सैनिकों को ताक्सिंग के रणनीतिक और अहम पेट्रोलिंग पॉइंट्स तक जाने से रोक दिया है। इतना ही नहीं, 'द अरुणाचल टाइम्स' की रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्व मंत्री और PPA के मुख्य सलाहकार काहफा बेंगिया की अगुवाई वाली चार सदस्यीय टीम ने जब 10 जुलाई को ताक्सिंग का दौरा किया, तो पाया कि एलएसी (LAC) के पास भारतीय चरवाहों और स्थानीय शिकारियों के पारंपरिक इलाकों पर चीनी सेना धीरे-धीरे अपना अवैध कब्जा बढ़ा रही है। एएनआई की रिपोर्ट के अनुसार, अरुणाचल प्रदेश में चीन की ओर से कोई धीरे-धीरे कब्ज़ा नहीं हो रहा है, जैसा कि कुछ सोशल मीडिया पोस्ट में दावा किया गया है। रिपोर्ट में भारत-चीन सीमा विवाद के इतिहास और 'लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल' (एलएसी) पर गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए उठाए जा रहे कदमों का भी ज़िक्र किया गया है। एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन ऐतिहासिक रूप से अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा करता रहा है और इस इलाके को दक्षिणी तिब्बत कहता है। यह दावा 1960 में भारत-चीन सीमा वार्ता के दौरान किया गया था, जब चीन ने कथित तौर पर मौजूदा राज्य के लगभग 69,000 वर्ग किलोमीटर इलाके पर अपना दावा जताया था। इसे भी पढ़ें: हो गया खेल! भारत को रोककर खुद रूसी तेल खरीद रहा अमेरिका? चीन को भारत ने एक बार फिर दो टुक जवाब दिया अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन को भारत ने एक बार फिर दो टुक जवाब दिया है। भारत ने यह साफ कर दिया है कि अरुणाचल प्रदेश पर उसका रुख बिल्कुल स्पष्ट और साथ ही चीन के किसी भी दावे या आपत्ति से जमीन पर मौजूद हकीकत नहीं बदलने वाली। तो हुआ यह है कि चीन ने अरुणाचल प्रदेश की 27 जगहों को भारत के नक्शे में आधिकारिक तौर पर दिखाने पर आपत्ति जताई थी। लेकिन भारत ने साफ कर दिया है कि चीन की इस आपत्ति से अरुणाचल प्रदेश की स्थिति पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। मंगलवार 11 अगस्त को विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न और अटूट हिस्सा है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि इस हकीकत को कोई नहीं बदल सकता। अरुणाचल प्रदेश भारत का एक अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है और यह एक प्रकार से एक स्वय सिद्ध तथ्य भी है और कोई भी चीज इस निर्वाद निर्विवाद वास्तविकता को बदल नहीं सकता। दरअसल विवाद की शुरुआत तब हुई जब भारत ने अरुणाचल प्रदेश के 27 जगहों और दूसरे ज्योग्राफिकल फीचर्स को उनके आधिकारिक नामों के साथ अपने सरकारी नक्शे में दर्ज किया। इसके एक दिन बाद चीन ने अपनी आपत्ति जताई। चीन अरुणाचल प्रदेश को जांगनान यानी कि साउथ तिब्बत कहता है। बीजिंग का दावा है कि यह इलाका चीन का हिस्सा है। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गो जियाकुन ने भारत के इस कदम को गैरकानूनी बताया। उन्होंने अरुणाचल प्रदेश को तथाकथित अरुणाचल प्रदेश कहते हुए कहा कि जगहों के नाम बदलने या तय करने से चीन का दावा नहीं बदलेगा। भारत हमेशा से चीन के इस दावे को खारिज करता रहा है। इस बार भी भारत ने साफ-साफ कहा कि चीन की आपत्ति से अरुणाचल प्रदेश के स्टेटस पर कोई असर नहीं पड़ेगा। अब सवाल यह है कि भारत ने आखिर इन 27 जगहों को आधिकारिक नक्शे में दर्ज क्यों किया है? सरकार की तरफ से कहा गया है कि इसका मकसद बॉर्डर को फिर से तय करना नहीं है। बस इन जगहों की सही पहचान और सही नाम सरकारी नक्शे में दर्ज करना है ताकि लोगों को कभी भी इन जगहों के बारे में सही जानकारी मिल सके। तो क्या भारत और चीन के बीच इस मुद्दे पर सिर्फ बयानबाजी ही चल रही है? ऐसा नहीं है। दोनों देशों के बीच सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए बातचीत भी जारी है। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक 6 अगस्त को नई दिल्ली में भारत चीन सीमा मामलों पर काम करने वाले वर्किंग मैकेनिज्म फॉर कंसल्टेशन एंड कोऑर्डिनेशन यानी कि डब्ल्यूएमसीसी की 36वीं बैठक हुई। इसमें एलएसी यानी कि लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल की स्थिति, बॉर्डर मैनेजमेंट, सीमा के बंटवारे से जुड़े मुद्दों और दोनों देशों के बीच बॉर्डर पर सहयोग पर चर्चा हुई। भारत ने इस बैठक में भी साफ कहा कि सीमा पर शांति और स्थिरता दोनों देशों के रिश्तों को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी है। माओ का फाइव फ‍िंगर प्‍लान क्‍या है? 1949 के बाद कम्युनिस्ट पार्टी दुनिया को अलग नजरिए से देखती है। कम्युनिस्ट पार्टी चाइना के जितने भी प्रेसिडेंट बने हैं सब महत्वाकांक्षी रहे हैं। ये महत्वाकांक्षी लोग ये चाहते हैं कि हमारा कब्जा बना रहे। पूरी दुनिया में अलग-अलग क्षेत्रों पर कब्जा करना चाहते हैं तो ठीक उसी वजह से क्या होता है कि संबंध बिगड़ने लग जाते हैं। 1949 में चीनी गणराज्य के फाउंडर नेता माओ से तुंग ने कहा कि हथेली और पांच उंगलियों को चीन को कब्जे में कर लेना चाहिए यहीं से चीन की पड़ोसियों के प्रति नीति बदल गई। दरअसल माओ से तुंग ने कहा था कि हथेली और पांच उंगलियों पर कब्जा कर लेना चाहिए तो इसमें शामिल क्या-क्या है इस पे भी नजर डालनी जरूरी हो जाता है। दरअसल तिब्बत जिसको इसने शुरुआत में ही अपने कब्जे में ले लिया था तो उसे ये कहता है कि ये हमारी हथेली है वहीं इसके आसपास की अलग-अलग ट्रीटज को ये कहता है कि ये हमारी पांच उंगलियां हैं। तो तिब्बत इसकी हथेली हुई इसके अलावा पांच उंगलियों में लद्दाख, नेपाल, सिक्किम, भूटान और अरुणाचल प्रदेश शामिल है। अगर इन पांचों उंगलियों को समझे तो हमें यह भी पता लगता है कि तीन हिस्से भारत की मुख्य भूमि में शामिल है जिनके ऊपर चाइना की सीधी नजर है। लद्दाख में पहले अक्साई चीन बसा हुआ है अब अक्साई चीन के वजह से हम देखते हैं कि पहले ही दिक्कतें हैं और अभी भी वो लद्दाख को लेकर के अपनी मंशा छोड़ता नहीं है। अरुणाचल प्रदेश को पहले ही कहता है कि वो अरुणाचल प्रदेश नहीं है बल्कि जांग नान है और ये चीन का हिस्सा है। तो ये स्थिति है तो इस प्रकार से ये इसकी हथेली और पांच उंगलियां बन जाती है। इन इलाकों को 'आजाद' कराना या उन पर अपना प्रभाव जमाना चीन का रणनीतिक कर्तव्य माना जाता है।

प्रभासाक्षी 12 Aug 2026 3:57 pm

असामाजिक हो रहे सोशल मीडिया का नियमन जरूरी

दिल्ली में बीस जुलाई को काकरोच जनता पार्टी के संसद मार्च के दौरान हुई हिंसा और 23 जुलाई को प्रधानमंत्री मोदी के जेन जी के संबोधन की वीडियो फेसबुक और इंस्टाग्राम से हटाए जाने के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बहुत चर्चा में हैं। चर्चा से ज्यादा उनकी भूमिका कहीं ज्यादा विमर्श के केंद्र में है। इसमें दो राय नहीं कि दुनियाभर में जो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ज्यादा प्रचलन में हैं, उनमें से ज्यादातर विदेशी हैं। जाहिर है कि वे उन जगहों के कानूनों और सांस्कृतिक परंपराओं से ज्यादा संचालित हैं, जहां उनके मुख्यालय हैं। इसलिए अपने व्यापक हितों के लिए वे अपने प्रचलन वाले देशों की परंपराओं और संस्कृतियों को सवालों के घेरे में लाने, उसका उपहास उड़ाने और उन्हें तार-तार करने वाला अलगोरिदम उन्होंने विकसित कर रखा है। जिसका खामियाजा तीसरी दुनिया के देश और वहां की सांस्कृतिक परंपराएं उठा रही हैं। सोशल मीडिया को लोकतंत्र के बड़े मंच के रूप में 17 दिसंबर 2010 को ट्यूनिशिया के सिटी बौजिज शहर में फलों का ठेला लगाने वाले मोहम्मद बोआजीजी की आत्महत्या के बाद हुए उबाल के बाद देखा जाने लगा। म्यूनिसिपल कर्मचारियों की सख्ती के चलते क्षुब्ध बोआजीजी ने खुद पर पेट्रोल डालकर आग लगा ली। किसी ने इस घटना को सोशल मीडिया पर डाल दिया। सोशल मीडिया के तत्कालीन अलगोरिदम ने इस घटना को इस रूप में प्रस्तुत किया कि समूचे अरब जगत में उबाल आ गया। नागरिक अधिकारों की स्थापना और लोकतंत्र की बहाली की मांग को लेकर अरब देशों की जनता सड़कों पर उतर आई। इसका ही नतीजा मिस्र की राजधानी काहिरा के तहरीर चौक पर दिखा। जहां महीनों तक लोग जमे रहे और वहां के राष्ट्रपति को इस्तीफा देना पड़ा। यह आग सीरिया, यमन और लीबिया तक जा पहुंची। वहां के पारंपरिक शासकों के खिलाफ लोगों का दबा हुआ गुस्सा निकला और कई जगह सत्ताएं बदल गईं। भारत में भी इसके ही कुछ महीनों बाद अन्ना हजारे को आगे रखकर एक आंदोलन छेड़ा गया। जिसकी परिणति आम आदमी पार्टी के रूप में हुई और वह दिल्ली की सत्ता पर काबिज हुई। फिर पंजाब में भी उसने पैठ बना ली। इसे भी पढ़ें: NEET-UG विवाद के बाद बदला PM Modi का अंदाज़, Gen Z को Influencers और 'Shortcuts' की होड़ से बचने की दी सलाह इन घटनाओं को याद करना इसलिए जरूरी है कि इन सबके पीछे सोशल मीडिया के जरिए त्वरित गति से फैलाई गई सूचनाओं का हाथ सबसे ज्यादा रहा। तब सोशल मीडिया को लोकतंत्र के लिए जरूरी बताया गया। सोशल मीडिया के बारे में कहा गया कि लोकतंत्र में सबकी आवाज पहुंचाने और उन्हें मौका देने का यह बड़ा माध्यम है। इसे लोकतंत्र के वाजिब और जरूरी औजार के रूप में भी मान्यता मिली। लेकिन बीतते वक्त के साथ पता चल रहा है कि जिसे हम सोशल मीडिया कहते हैं, वह लोकतंत्र के लिए जितना जरूरी है, उससे कहीं ज्यादा अनसोशल यानी असामाजिक भी है। यह ठीक है कि सोशल मीडिया के जरिए व्यवस्था की अंधी सुरंग में खो रही आवाजों को मौका मिलता है। लेकिन यह उतना ही सच है कि इस माध्यम ने लोगों की नजर का पानी उतार दिया है। लोग अब लिहाज करना भूल गए हैं। सोशल मीडिया पर अगर किसी की बात पसंद नहीं आती तो उसे खुलेआम गालियां दी जा सकती हैं। उसके चरित्र पर आक्षेप लगाया जा सकता है। उसका चरित्र हनन किया जा सकता है। चाहे वह व्यक्ति सामाजिक जीवन में कितना ही प्रतिष्ठित क्यों न हो, उसकी उम्र चाहे जितनी भी बड़ी क्यों ना हो। सोशल मीडिया मंचों ने अपना अलगोरिदम भी ऐसा विकसित किया है, जो अच्छी बातों, सामाजिक चिंतन और बेहतर कल की बातों को ज्यादा तवज्जो नहीं देखा। एक तरह से कहें तो वह इसकी अनदेखी ही करता है। लेकिन जैसे ही किसी को कोई गाली देता है, किसी के चरित्र का बेवजह ही हनन करता है, किसी का घटिया कार्टून बनाता है, सोशल मीडिया का अलगोरिदम उसे फैलाने में द्रुत गति से जुट जाता है। सोशल मीडिया ने अब तक पर्दे के पीछे रही नंगई को भी उजागर कर दिया है। आज रील्स के चक्कर में अधनंगे और कई बार करीब-करीब नग्न फोटोग्राफ और वीडियो तक जारी किए जा रहे हैं। भले ही अपने परिवारों में महिलाएँ और युवतियां सलीके से रहती हों, लेकिन सोशल मीडिया पर प्रसिद्धि पाने और उसके जरिए कुछ कमाने के चक्कर में अपने शील और अपनी लज्जा को भी बेपर्दा कर रही हैं। सोशल मीडिया कितना असमाजिक हो चुका है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसका अलगोरिदम अश्लीलता को बढ़ावा देता है, लेकिन शील और लज्जा की बात को अपने मंच के किसी कोने में डाल देता है। कह सकते हैं कि वर्चुअल स्पेस के किसी अंधेरे कोने में उसे गुम कर देता है। तीन साल पहले प्यू रिसर्च सेंटर ने 19 विकसित अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों में सोशल मीडिया को लेकर एक शोध किया था। उसके मुताबिक, आम नागरिकों की नजर में सोशल मीडिया राजनीतिक जीवन के लिए रचनात्मक और विनाशकारी दोनों है। इस अध्ययन में शामिल देशों में, औसतन 57 प्रतिशत लोगों ने माना कि सोशल मीडिया लोकतंत्र के लिए अच्छा है, लेकिन इसे बिनाशकारी मानने वालों की संख्या भी कम नहीं रही। करीब 35 प्रतिशत से ज्यादा लोगों का का कहना था कि सोशल मीडिया विनाशकारी साबित हो रहा है। सिर्फ 34 प्रतिशत अमेरिकियों ने ही सोशल मीडिया को लोकतंत्र के लिए लाभकारी माना, जबकि 64 फीसद का कहना था कि इसने नकारात्मक प्रभाव ज्यादा डाला है। हाल ही में जेन जी से चर्चा के दौरान संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी सोशल मीडिया को लेकर अपने विचार व्यक्त किए। उसमें उन्होंने कहा है कि यदि सोशल मीडिया पर उनके कारण दस लाख लोग कोई गलत निर्णय लेते हैं, तो उसकी जिम्मेदारी मेरी भी है। सोशल मीडिया पर सकारात्मक, उपयोगी और समाजहित की सामग्री साझा करनी चाहिए। सोशल मीडिया पर केवल प्रामाणिक स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर ही विश्वास करना चाहिए। जेन-ज़ी में भी यह विवेक विकसित होना चाहिए कि क्या सही है और क्या नहीं। वरिष्ठ पीढ़ी की भी जिम्मेदारी है कि वह नई पीढ़ी का मार्गदर्शन करे तथा उन्हें सही और गलत के बीच अंतर समझाए। सोशल मीडिया का अनसोशल चेहरा और मंच आर्थिक कमाई का जरिया भी है। नंगई, हिंसा और व्यभिचार-अतिचार की कहानियां, दृश्य, वीडियो और फोटो को वायरल करने में उसका कोई सानी नहीं है। इस बहाने इसे प्रसारित करने वाले को सोशल मीडिया मंच आर्थिक कमाई भी कराते हैं। और तो और, वे खुद भी ऐसी घटनाओं, दृश्यों को प्रसारित-प्रचारित और वायरल करने के लिए बड़ी रकम लेते हैं। संसदीय समिति के सामने फेसबुक और इंस्टाग्राम की संचालक कंपनी मेटा के अधिकारियों ने माना है कि काकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के दौरान गाली, हिंसा आदि को बढ़ावा देने के लिए पैसे भी लिए थे। इन कोशिशों का मकसद भारत में व्यापक पैमाने पर लोगों को उत्तेजित करके अराजकता फैलाना था। इस लिहाज से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म राष्ट्रों के अंदरूनी मामलों में लोकतंत्र की रक्षा के मुखौटे के पीछे से दखल भी दे रहे हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनौती भी दे रहे हैं। वक्त आ गया है कि इनके नियमन के लिए कठोर कानून बनाए जाएं। जिसके तहत उन्हें अभिव्यक्ति के अधिकार को बढ़ावा देने की व्यवस्था तो हो, लेकिन इसकी आड़ में अराजकता फैलाने की छूट नहीं। - उमेश चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार

प्रभासाक्षी 12 Aug 2026 3:30 pm

International Youth Day 2026: युवा शक्ति को मिले दिशा, सपनों को मिले उड़ान

युवा केवल उम्र की एक अवस्था नहीं, बल्कि ऊर्जा, साहस, कल्पना, परिवर्तन और नवसृजन की चेतना का नाम है। जिस समाज की युवा शक्ति जाग्रत, संवेदनशील और रचनात्मक होती है, वह समाज परिवर्तन की नई इबारत लिखता है। इसके विपरीत जब युवा ऊर्जा दिशाहीन हो जाती है तो वही शक्ति हिंसा, नशे, उग्रवाद, अपराध, निराशा और विध्वंस का कारण बन सकती है। इसलिए आज दुनिया के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि युवा क्या कर रहे हैं, बल्कि यह है कि उनकी विराट ऊर्जा को किस दिशा में लगाया जा रहा है। इसी चिंतन को वैश्विक स्तर पर महत्व देने के लिए संयुक्त राष्ट्र प्रतिवर्ष 12 अगस्त को अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस मनाता है। वर्ष 2000 से इस दिवस का आयोजन शुरू हुआ। इस वर्ष का विषय है-‘विभिन्न परिस्थितियाँ, साझा आकांक्षाएँ।’ यह विषय आज की युवा पीढ़ी की वास्तविकता को बहुत गहराई से अभिव्यक्त करता है। दुनिया के युवाओं की परिस्थितियाँ भिन्न हैं। कहीं गरीबी और बेरोजगारी है, कहीं युद्ध और असुरक्षा, कहीं शिक्षा के अवसरों की कमी है, कहीं तकनीकी असमानता और पर्यावरण संकट है, लेकिन इन सबके बीच उनकी आकांक्षाएँ आश्चर्यजनक रूप से समान हैं। वे सम्मानजनक जीवन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सार्थक रोजगार, सुरक्षा, मानसिक सुख-शांति, निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी और बेहतर भविष्य चाहते हैं। दुनिया की सरकारों को यह समझना होगा कि युवा केवल चुनाव के समय याद आने वाला मतदाता नहीं है। वह राष्ट्र की नीति-निर्माण प्रक्रिया का सक्रिय भागीदार है। जिस युवा के जीवन को प्रभावित करने वाले निर्णय लिये जाते हैं, उसकी आवाज उन निर्णयों में कितनी शामिल है, यह लोकतंत्र की गुणवत्ता का भी महत्वपूर्ण पैमाना है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का प्रस्ताव 2250 युवाओं को शांति निर्माण और हिंसा की रोकथाम में महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में स्वीकार करता है। यह स्वीकारोक्ति इस बात का प्रमाण है कि युवा समस्या नहीं, बल्कि समाधान की शक्ति हैं। आज आवश्यकता है कि हर देश में ऐसी प्रभावी व्यवस्था बने, जिसमें विद्यार्थी, उद्यमी, किसान, वैज्ञानिक, कलाकार, खिलाड़ी और सामाजिक कार्यकर्ता युवा सीधे नीति-निर्माताओं से संवाद कर सकें। केवल युवाओं पर योजनाएँ बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि युवाओं के साथ योजनाएँ बनाना आवश्यक है। भारत की सबसे बड़ी शक्तियों में उसकी युवा आबादी भी है। भारत के युवाओं ने अनेक बार सिद्ध किया है कि उनमें केवल नौकरी पाने की आकांक्षा नहीं, बल्कि कुछ नया करने की बेचैनी भी है। विज्ञान, खेल, तकनीक, उद्यमिता, कला, साहित्य और सामाजिक सेवा से लेकर अनेक क्षेत्रों में भारतीय युवा अपनी प्रतिभा का परिचय दे रहे हैं। स्वामी विवेकानन्द ने भारत के पुनर्निर्माण में युवा शक्ति की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण माना था। उनका विश्वास था कि जाग्रत, चरित्रवान और संकल्पवान युवा राष्ट्र की दिशा बदल सकता है। डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने भी युवाओं के सपनों को भारत के भविष्य से जोड़ा। उनके चिंतन का मूल संदेश था कि बड़े सपने देखो, ज्ञान अर्जित करो और उन सपनों को कर्म में बदलो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भी भारत के विकास विमर्श में युवा शक्ति, नवाचार, कौशल, उद्यमिता और आत्मनिर्भरता को विशेष महत्व दिया जा रहा है। लेकिन अब अगला चरण इससे आगे जाने का है। युवा को योजनाओं का लाभार्थी नहीं, बल्कि विकास का सह-निर्माता बनाना होगा। इसे भी पढ़ें: International Youth Day 2026: 12 अगस्त को ही क्यों मनाते हैं International Youth Day? जानें इसका History और महत्व युवा दिवस की सार्थकता तब होगी जब 12 अगस्त के बाद भी युवा के जीवन में कोई सकारात्मक परिवर्तन दिखाई दे। क्यों न इस वर्ष प्रत्येक शहर में युवा स्वप्न संवाद आयोजित हों, जिसमें युवा लिखें कि वे अपने देश को अगले दस वर्षों में कैसा देखना चाहते हैं। उन सपनों को केवल कागज पर न रखा जाए, बल्कि सरकार, उद्योग, शिक्षण संस्थान और सामाजिक संस्थाएँ मिलकर उनमें से व्यवहारिक योजनाओं को धरातल पर उतारें। प्रत्येक युवा कोई एक उपयोगी कौशल सीखे और समाज के लिए कोई एक जिम्मेदारी स्वीकार करे। प्रत्येक जिले में ऐसे युवा नवाचार केंद्र स्थापित हों, जहाँ स्थानीय समस्याओं के समाधान के लिए युवा अपनी प्रतिभा और रचनात्मकता का उपयोग कर सकें। आज युवा शक्ति के सामने सबसे गंभीर चुनौतियों में नशा, डिजिटल लत, हिंसक प्रवृत्तियाँ, मानसिक तनाव, बेरोजगारी और उद्देश्यहीनता हैं। नशे का फैलता जाल केवल व्यक्ति को नहीं, परिवार और राष्ट्र की उत्पादक शक्ति को भी कमजोर करता है। युवाओं को केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि नशा मत करो, बल्कि उन्हें जीवन का ऐसा उद्देश्य देना होगा कि नशे की आवश्यकता ही महसूस न हो। खेल, योग, ध्यान, कला, साहित्य, सेवा, उद्यमिता और सामाजिक गतिविधियों से युवाओं को जोड़ना होगा। खाली समय को रचनात्मक समय में बदलना नशामुक्ति की सबसे प्रभावी सामाजिक रणनीति हो सकती है। आज की युवा पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के बीच संवाद की कमी भी एक चुनौती है। बुजुर्ग अनुभव के प्रतीक हैं और युवा ऊर्जा के। अनुभव यदि ऊर्जा से नहीं जुड़ेगा तो वह जड़ हो सकता है और ऊर्जा यदि अनुभव से नहीं जुड़ेगी तो दिशाहीन हो सकती है। इसलिए आवश्यकता है अंतरपीढ़ी संवाद की। परिवारों, संस्थाओं और सरकारों को ऐसा वातावरण बनाना होगा जिसमें युवा नई सोच प्रस्तुत करें और वरिष्ठ पीढ़ी अपने अनुभव से उनका मार्गदर्शन करे। अनुभव और ऊर्जा का यह समन्वय राष्ट्र निर्माण की बड़ी शक्ति बन सकता है। आज दुनिया के अनेक हिस्सों में युवा आंदोलन हो रहे हैं। युवाओं की आवाज सत्ता और व्यवस्था तक पहुँच रही है। भारत में भी समय-समय पर युवाओं ने अपनी आकांक्षाओं और असंतोष को आंदोलन का रूप दिया है। लेकिन युवा आंदोलन की सबसे बड़ी सफलता तब होगी जब वह केवल विरोध की आवाज न रहकर विकल्प की आवाज बने। युवा कहे कि हमें केवल शिकायत नहीं करनी, समाधान भी देना है। हमें केवल रोजगार नहीं चाहिए, रोजगार सृजित करने की क्षमता भी चाहिए। हमें केवल अधिकार नहीं चाहिए, हम जिम्मेदारियाँ भी निभाएँगे। हम केवल सत्ता बदलने नहीं, व्यवस्था को बेहतर बनाने आए हैं। यही युवा आंदोलन की नई परिभाषा हो सकती है। यौवन अपने आप में उपलब्धि नहीं है। युवकत्व चेतना की अवस्था है। चेहरे पर जवानी हो और विचारों में जड़ता हो तो यौवन अधूरा है। ऊर्जा हो लेकिन दिशा न हो तो वही ऊर्जा संकट बन सकती है। इसलिए आज की युवा पीढ़ी को दो चीजों की सबसे अधिक आवश्यकता है-जोश और होश। जोश उसे ऊँचा उड़ाए और होश उसे सही दिशा दे। जोश उसे सपने दिखाए और विवेक उन सपनों को यथार्थ में बदले। जोश उसे संघर्ष करना सिखाए और करुणा उसे मनुष्य से जोड़े। स्वामी विवेकानन्द की प्रेरणा, सुकरात की प्रश्नाकुलता, महात्मा गांधी की करुणा और डॉ. कलाम के सपनों का समन्वय आज के युवा के व्यक्तित्व में होना चाहिए। दुनिया के युवाओं से यह कहना आसान है कि बड़े सपने देखो, लेकिन केवल सपने देखने के लिए कहना पर्याप्त नहीं है। सपनों को आकार देने के लिए अवसरों की संरचना भी करनी होगी। अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस 2026 का विषय हमें एक महत्वपूर्ण सत्य बताता है कि हमारी परिस्थितियाँ अलग हो सकती हैं, लेकिन हमारी आकांक्षाएँ साझा हैं। भारत का युवा अवसर चाहता है, अफ्रीका का युवा शिक्षा और रोजगार चाहता है, युद्धग्रस्त क्षेत्र का युवा शांति चाहता है, द्वीपीय देशों का युवा सुरक्षित पर्यावरण चाहता है और तकनीकी दुनिया का युवा समान अवसर चाहता है। अर्थात दुनिया के युवा अलग-अलग भाषाएँ बोलते हैं, अलग संस्कृतियों में रहते हैं, लेकिन उनके सपनों की भाषा बहुत कुछ समान है। इसलिए आज दुनिया को युवा शक्ति को नियंत्रित करने से अधिक उस पर विश्वास करने की जरूरत है। आइए इस अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस पर हम केवल युवाओं को बधाई न दें, बल्कि उन्हें अवसर दें-अपनी बात कहने का, अपनी प्रतिभा दिखाने का, निर्णय लेने का और राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने का। सरकारें युवाओं की सुनें, परिवार उनके सपनों को समझें, शिक्षण संस्थान उनकी प्रतिभा को पहचानें, समाज उनके प्रयोगों को अवसर दे और युवा स्वयं अपने भीतर के सामर्थ्य को पहचानें। क्योंकि राष्ट्र का भविष्य केवल संसदों, सरकारी कार्यालयों या योजनाओं की फाइलों में नहीं लिखा जाता, वह युवाओं की आँखों में पल रहे सपनों में लिखा जाता है। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

प्रभासाक्षी 12 Aug 2026 3:20 pm

प्रियंका गांधी का केंद्र सरकार पर हमला, बोलीं- ‘क्या हम चुपचाप बैठे रहें?’

प्रियंका गांधी ने छात्र प्रदर्शन पर कथित पुलिस कार्रवाई को लेकर सरकार पर निशाना साधा और गृह मंत्री अमित शाह से जवाबदेही की मांग की। संसद में इस मुद्दे पर गतिरोध जारी है।

देशबन्धु 12 Aug 2026 1:16 pm

विपक्ष के विरोध पर अमित शाह की दो टूक, बोले- कल 3 बजे सभी सवालों का दूंगा जवाब

संसद के मानसून सत्र में जारी गतिरोध के बीच गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि वह गुरुवार दोपहर 3 बजे विपक्ष के सभी सवालों का जवाब देंगे।

देशबन्धु 12 Aug 2026 12:44 pm

गृह मंत्री को सदन में बताना होगा कि छात्रों पर कैसे चलीं कील वाली लाठियां और पैलेट गन : प्रमोद तिवारी

गृह मंत्री को सदन में बताना होगा कि छात्रों पर कैसे चलीं कील वाली लाठियां और पैलेट गन : प्रमोद तिवारी

समाचार नामा 12 Aug 2026 12:25 pm

'आजाद' होते ही Balochistan बोला, Thank You Hindustan, Republic of Balochistan को मान्यता देने की भारत से की माँग

सोशल मीडिया इस समय ऐसे वीडियोज से भरा पड़ा है, जिनमें बलूचिस्तान के लोग अपनी आजादी का जश्न मनाते हुए नजर आ रहे हैं। 11 अगस्त को बलूचिस्तान के स्वतंत्रता दिवस के तौर पर मनाए गए कार्यक्रमों के बीच बलूच अलगाववादी नेतृत्व ने अब अपने अभियान को एक नया राजनीतिक मोड़ देने की कोशिश भी की है। बलूच नेता मीर यार बलूच ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से “रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान” को स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने की अपील की है। साथ ही भारत की ओर से पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्रों में मानवाधिकारों के उल्लंघन को लेकर उठाई गई आवाज की खुलकर सराहना की है। मीर यार बलूच ने एक्स पर जारी अपने संदेश में भारतीय मीडिया का विशेष रूप से आभार जताया। उनका कहना था कि भारतीय मीडिया ने 11 अगस्त को बलूचिस्तान में मनाए गए स्वतंत्रता दिवस को प्रमुखता से उठाया। उन्होंने विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल के उस बयान का भी स्वागत किया, जिसमें पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर और उसके नियंत्रण वाले अन्य क्षेत्रों में गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों के लिए पाकिस्तान को जवाबदेह ठहराने की जरूरत पर जोर दिया गया था। हालांकि जायसवाल ने बलूचिस्तान का सीधे तौर पर उल्लेख नहीं किया था, लेकिन बलूच नेतृत्व ने भारत के इस व्यापक मानवाधिकार रुख को अपने पक्ष में महत्वपूर्ण संकेत के तौर पर पेश किया है। इसे भी पढ़ें: Jan Gan Man: 'आजादी' का जश्न मनाते हुए झूम उठा पूरा Balochistan ! बीच-बीच में बाधा डाल रहा है Pakistan यही वह बिंदु है जो इस पूरे घटनाक्रम को केवल बलूचिस्तान के भीतर चल रहे अलगाववादी आंदोलन से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बना देता है। बलूच नेतृत्व अब अपने आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय वैधता दिलाने की दिशा में ले जाने का दावा कर रहा है। उसके संदेश में संयुक्त राष्ट्र, आसियान, अफ्रीकी संघ, इस्लामिक सहयोग संगठन और यूरोपीय देशों से बलूचिस्तान के पक्ष में आवाज उठाने की अपील की गई है। संगठन का दावा है कि अब लड़ाई केवल स्वतंत्रता दिवस मनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वतंत्रता की कानूनी, राजनीतिक, कूटनीतिक और नैतिक मान्यता हासिल करने की है। बलूच नेतृत्व ने 11 अगस्त की तारीख को भी ऐतिहासिक आधार देने की कोशिश की है। उसका दावा है कि ब्रिटिश शासन के अंत और भारतीय उपमहाद्वीप के विभाजन से ठीक पहले 11 अगस्त 1947 को बलूचिस्तान ने स्वतंत्रता की घोषणा की थी। इसी ऐतिहासिक दावे को आधार बनाकर मौजूदा अभियान को अंतरराष्ट्रीय मान्यता की लड़ाई बताया जा रहा है। हालांकि पाकिस्तान और अंतरराष्ट्रीय समुदाय बलूचिस्तान की स्वतंत्रता के इस दावे को मान्यता नहीं देते और बलूचिस्तान को पाकिस्तान का एक प्रांत माना जाता है। वैसे इस अभियान का अगला चरण और भी महत्वपूर्ण है। बलूच समूह ने दावा किया है कि भविष्य के स्वतंत्र राष्ट्र के लिए विदेश नीति, रक्षा, अर्थव्यवस्था, राजनीति और कूटनीति से जुड़े ढांचे तैयार किए जा रहे हैं। उसने पासपोर्ट, अपनी मुद्रा, मीडिया संस्थानों, व्यापारिक संस्थाओं और विदेशों में राजनयिक मिशनों की तैयारी का भी दावा किया है। साथ ही अलग-अलग बलूच राजनीतिक धाराओं को एकजुट करने की कोशिश की बात कही गई है। बलूच नेतृत्व ने पाकिस्तान पर दमन का भी गंभीर आरोप लगाया है। उसके मुताबिक 50 हजार से अधिक बलूच लोग अब भी यातना केंद्रों में अमानवीय परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं। बलूचों ने जबरन गुमशुदगी, हिरासत और लक्षित हत्याओं जैसे मुद्दों को भी उठाया है। बलूचों के समूह ने यह भी आरोप लगाया कि स्वतंत्रता दिवस समारोह रोकने के लिए मोबाइल और इंटरनेट सेवाएं बंद की गईं, सैन्य छावनियों और पुलिस प्रतिष्ठानों के आसपास खाइयां खोदी गईं तथा ड्रोन, हेलीकॉप्टर और सैन्य विमानों से निगरानी की गई। रणनीतिक रूप से देखें तो बलूचिस्तान पाकिस्तान के लिए बेहद संवेदनशील भूभाग है। क्षेत्रफल के लिहाज से यह पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है और प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध माना जाता है। बलूच नेतृत्व का दावा है कि स्वतंत्र बलूचिस्तान अपने संसाधनों के जरिये स्वास्थ्य, शिक्षा और मानवीय सहायता के क्षेत्र में योगदान दे सकता है। यही संसाधन, भौगोलिक स्थिति और लंबे समय से जारी विद्रोह इसे पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा के साथ-साथ क्षेत्रीय भू-राजनीति का भी अहम मुद्दा बनाते हैं। भारत के लिए इसका रणनीतिक महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि बलूचिस्तान का मुद्दा पाकिस्तान के उस नैरेटिव को चुनौती देता है, जिसमें वह जम्मू-कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार उठाता रहा है। बलूच नेतृत्व का भारत की मीडिया और विदेश मंत्रालय के बयानों को अपने पक्ष में उद्धृत करना पाकिस्तान पर कूटनीतिक दबाव बढ़ाने की कोशिश है। हालांकि भारत की ओर से बलूचिस्तान की स्वतंत्रता को मान्यता देने की कोई घोषणा इन स्रोतों में नहीं है। बहरहाल, बलूचिस्तान में चल रहा संघर्ष अब केवल बंदूक और सुरक्षा बलों के बीच की लड़ाई नहीं रह गया है। यह इतिहास, मानवाधिकार, संसाधनों, अंतरराष्ट्रीय मान्यता और सूचना युद्ध, इन सभी मोर्चों पर लड़ी जा रही लड़ाई बनता जा रहा है। और जिस तरह बलूच नेतृत्व भारत का सार्वजनिक रूप से आभार जता रहा है, उससे साफ है कि वह इस संघर्ष को पाकिस्तान की सीमाओं से बाहर निकालकर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मैदान में ले जाना चाहता है।

प्रभासाक्षी 12 Aug 2026 11:50 am

Nepal ने खो दिये Sugauli Treaty के Original Document ! अब भारत के साथ कैसे सुलझायेगा सीमा विवाद?

लो कर लो बात! सीमा विवाद को लेकर भारत पर लगातार सवाल उठाने वाला नेपाल खुद उस ऐतिहासिक दस्तावेज की मूल प्रति नहीं ढूंढ़ पा रहा है, जिसके आधार पर उसकी सीमाओं की बुनियाद तैयार हुई थी। नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने संसद में स्वीकार किया है कि सरकार को यह तक स्पष्ट जानकारी नहीं है कि 1816 की सुगौली संधि की आधिकारिक मूल प्रति उसके पास मौजूद है या नहीं। राष्ट्रीय अभिलेखागार में कुछ संबंधित दस्तावेज होने की जानकारी जरूर है, लेकिन वे वास्तविक आधिकारिक संधियां हैं या उनकी प्रतियां, इसकी पुष्टि नहीं हो सकी है। यह खुलासा ऐसे समय हुआ है जब भारत और नेपाल के बीच लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी को लेकर विवाद फिर सुर्खियों में है। दरअसल, भारत और चीन के बीच लिपुलेख व्यापार मार्ग को फिर खोलने पर सहमति के बाद नेपाल ने इन क्षेत्रों पर अपना दावा दोहराया है। लेकिन अब सवाल यह है कि जिस ऐतिहासिक संधि को सीमा निर्धारण की बुनियादी कड़ी माना जाता है, उसकी मूल प्रति ही नेपाल के रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं है, तो उसके सीमा संबंधी दावों की ऐतिहासिक और दस्तावेजी मजबूती को किस आधार पर परखा जाए? इसे भी पढ़ें: India Neighborhood First policy: बांग्लादेश से लेकर नेपाल तक भारत का बड़ा गेम, पलटा पासा ! क्या है सुगौली संधि? सुगौली संधि नेपाल और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुई वह ऐतिहासिक संधि थी, जिसने 1814-16 के एंग्लो-नेपाल युद्ध का अंत किया और नेपाल की क्षेत्रीय सीमाओं तथा ब्रिटिश भारत के साथ उसके संबंधों को बड़े पैमाने पर निर्धारित किया। यह संधि 2 दिसंबर 1815 को हुई और 4 मार्च 1816 को इसकी औपचारिक पुष्टि हुई। युद्ध में पराजय के बाद नेपाल को बड़े भूभाग से अपने दावे छोड़ने पड़े और उसकी पश्चिमी सीमा के निर्धारण में महाकाली नदी की महत्वपूर्ण भूमिका बनी। इसी संधि को आगे चलकर नेपाल और ब्रिटिश भारत के बीच सीमा-व्यवस्था की आधारभूत कड़ी माना गया। यही कारण है कि सुगौली संधि की मूल प्रति का गायब होना महज किसी पुराने कागज का गुम होना नहीं है। यह एक ऐसा दस्तावेज है, जिसका सीधा संबंध सीमा, संप्रभुता और ऐतिहासिक भूगोल से जुड़ा है। खासकर तब, जब नेपाल आज उसी ऐतिहासिक सीमा-व्यवस्था के आधार पर लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी पर अपना दावा करता है। मामला सिर्फ सुगौली संधि तक सीमित नहीं सबसे गंभीर पहलू यह है कि नेपाल में ऐतिहासिक संधियों के मूल दस्तावेजों की उपलब्धता को लेकर सवाल पहली बार नहीं उठे हैं। 2016 में भारत-नेपाल संबंधों की समीक्षा के लिए गठित प्रबुद्ध व्यक्तियों के समूह की चर्चाओं के दौरान 1950 की भारत-नेपाल शांति एवं मैत्री संधि की मूल प्रति खोजने की कोशिश की गई, लेकिन वह भी नहीं मिली। बाद में संसदीय जांच में सुगौली संधि और 1950 की संधि, दोनों की मूल प्रतियां नेपाल में नहीं मिलने की बात सामने आई। 2019 में तत्कालीन विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञवाली ने भी कहा था कि मंत्रालय के पास दोनों संधियों की प्रतियां हैं, लेकिन यह सुनिश्चित करने के लिए फोरेंसिक जांच जरूरी है कि वे मूल दस्तावेज हैं या नहीं। नेपाल ने भारत और ब्रिटेन में उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेजों और नक्शों को भी तलाशने की बात कही थी। यानी सवाल केवल यह नहीं कि दस्तावेज कहां हैं, बल्कि यह भी है कि नेपाल के पास मौजूद प्रतियां कितनी प्रामाणिक हैं। सीमा दावे की कमजोर कड़ी वैसे इससे यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि नेपाल का हर सीमा दावा स्वतः गलत हो जाता है। सीमा विवादों का निर्धारण केवल किसी एक मूल दस्तावेज से नहीं होता; ऐतिहासिक नक्शे, नदी की वास्तविक धारा, प्रशासनिक नियंत्रण, पुराने सरकारी रिकॉर्ड और अन्य अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज भी महत्वपूर्ण होते हैं। लेकिन नेपाल के लिए समस्या यह है कि जिस ऐतिहासिक संधि को वह अपनी सीमा-व्यवस्था के संदर्भ में महत्वपूर्ण मानता है, उसकी मूल प्रति के अस्तित्व पर ही उसकी सरकार स्पष्ट नहीं है। यही तथ्य उसके आक्रामक सीमा-रुख पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यदि नेपाल के पास मूल संधि उपलब्ध नहीं है और उसे अपनी प्रतियों की प्रामाणिकता तक फोरेंसिक तरीके से जांचनी पड़ रही है, तो सीमा विवाद पर निर्णायक और एकतरफा ऐतिहासिक दावे करना निश्चित रूप से कठिन हो जाता है। इस पूरे घटनाक्रम का सामरिक महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि लिपुलेख क्षेत्र भारत, नेपाल और चीन, तीनों के लिए संवेदनशील भौगोलिक क्षेत्र है। दिलचस्प बात यह है कि इसी तनाव के बीच नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने भारतीय राजदूत नवीन श्रीवास्तव से मुलाकात कर दोनों देशों के “ऐतिहासिक संबंधों” को मजबूत करने और साझा हितों में सहयोग बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया। वहीं सुगौली संधि की मूल प्रति नहीं मिलने संबंधी नेपाली विदेश मंत्री के बयान पर भारत ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि दोनों देशों के लंबित मुद्दों को मौजूदा राजनयिक माध्यमों से सुलझाया जा सकता है। बहरहाल, नेपाल यदि सीमा विवाद को वास्तव में ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर सुलझाना चाहता है, तो उसे सबसे पहले अपने अभिलेखों की स्थिति साफ करनी होगी। सुगौली संधि की मूल प्रति कहां है, मौजूद है या नहीं, और उसके पास उपलब्ध प्रतियां कितनी प्रामाणिक हैं, इन सवालों का जवाब देना जरूरी होगा। क्योंकि सीमा का फैसला नारों और राजनीतिक दावों से नहीं, प्रमाणित दस्तावेजों और स्थापित तथ्यों से होता है और फिलहाल, सुगौली संधि की मूल प्रति को लेकर नेपाल की अपनी स्वीकारोक्ति उसके दावे की विश्वसनीयता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न जरूर खड़ा करती है।

प्रभासाक्षी 12 Aug 2026 11:26 am

टीएमसी के बैंक खातों को फ्रीज करने से जुड़ी याचिका पर कलकत्ता हाईकोर्ट करेगा सुनवाई

टीएमसी के बैंक खातों को फ्रीज करने से जुड़ी याचिका पर कलकत्ता हाईकोर्ट करेगा सुनवाई

समाचार नामा 12 Aug 2026 11:25 am

रांची में धरनास्थल पर अंधेरे में पहुंची पुलिस, भाजपा नेताओं का आरोप- 'छात्रों को जबरन हटाने की हुई कोशिश'

रांची में धरनास्थल पर अंधेरे में पहुंची पुलिस, भाजपा नेताओं का आरोप- 'छात्रों को जबरन हटाने की हुई कोशिश'

समाचार नामा 12 Aug 2026 8:32 am

विक्रम साराभाई की जयंती : भाजपा नेताओं की श्रद्धांजलि, विज्ञान और अनुसंधान में योगदान को सराहा

नई दिल्ली, 12 अगस्त (आईएएनएस)। महान भौतिक विज्ञानी, उद्योगपति, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की नींव रखने और देश में परमाणु ऊर्जा के विकास में अहम भूमिका निभाने वाले डॉ. विक्रम अंबालाल साराभाई की जयंती पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला सहित कई भाजपा नेताओं ने याद करते हुए नमन किया है।

समाचार नामा 12 Aug 2026 7:42 am

'भारत के युवा सिर्फ कल के नेता नहीं, आज के राष्ट्र-निर्माता भी', अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस पर कई नेताओं ने दी शुभकामनाएं

'भारत के युवा सिर्फ कल के नेता नहीं, आज के राष्ट्र-निर्माता भी', अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस पर कई नेताओं ने दी शुभकामनाएं

समाचार नामा 12 Aug 2026 7:41 am

'वंदे मातरम' पर विवाद बेवजह, यह स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरणा रहा है : श्रीराज नायर

'वंदे मातरम' पर विवाद बेवजह, यह स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरणा रहा है : श्रीराज नायर

समाचार नामा 11 Aug 2026 11:36 pm

झारखंड में छात्रों पर पुलिस कार्रवाई निंदनीय, ऐसी क्रूरता नहीं होनी चाहिए: अभिजीत दिपके

झारखंड में छात्रों पर पुलिस कार्रवाई निंदनीय, ऐसी क्रूरता नहीं होनी चाहिए: अभिजीत दिपके

समाचार नामा 11 Aug 2026 10:40 pm

फर्जी खबरों के जरिए भाजपा को कमजोर करने की साजिश, नहीं होंगे कामयाब: राजीव चंद्रशेखर

फर्जी खबरों के जरिए भाजपा को कमजोर करने की साजिश, नहीं होंगे कामयाब: राजीव चंद्रशेखर

समाचार नामा 11 Aug 2026 6:33 pm

राहुल गांधी ने छात्रों के मुद्दे पर दिखाया दोहरा रवैया : हेमंत खंडेलवाल

राहुल गांधी ने छात्रों के मुद्दे पर दिखाया दोहरा रवैया : हेमंत खंडेलवाल

समाचार नामा 11 Aug 2026 6:31 pm

फिच ने भारत की ‘बीबीबी-’ रेटिंग को रखा बरकरार

नई दिल्ली, वैश्विक रेटिंग एजेंसी फिच ने मंगलवार को भारत की दीर्घकालिक जारीकर्ता डिफॉल्ट रेटिंग को ‘बीबीबी-’ पर स्थिर आउटलुक के साथ बरकरार रखा और अल्पकालिक जारीकर्ता डिफॉल्ट रेटिंग को ‘एफ3’ पर कायम रखा।

देशबन्धु 11 Aug 2026 4:42 pm

कांग्रेस हाईकमान की बातचीत के बाद जल्द होगा मंत्रालय का बंटवारा : शिवराज तंगदागी

कांग्रेस हाईकमान की बातचीत के बाद जल्द होगा मंत्रालय का बंटवारा : शिवराज तंगदागी

समाचार नामा 11 Aug 2026 2:43 pm

'कॉकरोच' टिप्पणी वाले पीआईएल पर सुप्रीम कोर्ट का नोटिस, 10 सितंबर को होगी सुनवाई

'कॉकरोच' टिप्पणी वाले पीआईएल पर सुप्रीम कोर्ट का नोटिस, 10 सितंबर को होगी सुनवाई

समाचार नामा 11 Aug 2026 2:34 pm

झारखंडः छात्रों पर लाठीचार्ज के विरोध में भाजपा का प्रदर्शन, कहा-सरकार ने पार की जुल्म और बर्बरता की हदें

झारखंडः छात्रों पर लाठीचार्ज के विरोध में भाजपा का प्रदर्शन, कहा-सरकार ने पार की जुल्म और बर्बरता की हदें

समाचार नामा 11 Aug 2026 2:33 pm

सिर के बदले सिर! कौन है जनरल रेजाई, जिसे मोजतबा ने बनाया ईरान का 'सिक्योरिटी बॉस'

आंख के बदले आंख नहीं सिर के बदले सिर काटा जाएगा और अमेरिका को पूरी तरह खाड़ी छोड़नी पड़ेगी। अमेरिका को यह खुली चेतावनी देने वाले और यह ऐलान करने वाले कि जंग सिर्फ और सिर्फ ईरान की शर्तों पर खत्म होगी। मेजर जनरल मोहसीन रिजाई एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में हैं। रिजाई ने साफ कहा था कि इस बार ईरान का जवाब सिर्फ जैसे को तैसा वाला नहीं होगा बल्कि उससे भी कहीं आगे जाएगा। और अब इस बेहद आक्रामक सैन्य रणनीतिकार को ईरान में एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी सौंप दी गई। सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनई द्वारा सैन्य सलाहकार नियुक्त किए जाने के बाद अब उन्हें देश की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल में सुप्रीम लीडर का आधिकारिक प्रतिनिधि बनाया गया है। कौन है मोहसीन रिजाई और क्यों कांपता है उनसे पश्चिमी देश मिडिल ईस्ट में बढ़ते भारी तनाव और अमेरिका इसराइल के साथ जारी इस महासंग्राम के बीच मेजर जनरल मोहसिन रिजाई की यह नई नियुक्ति बेहद रणनीतिक मानी जा रही है। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी देश की सबसे अहम संस्था सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल में सुप्रीम लीडर के प्रतिनिधि के रूप में रिजाई अब ईरान की विदेशी सैन्य और सुरक्षा नीतियों के सीधे रणनीतिकार होंगे। यह फैसला ऐसे वक्त में आया। जब ईरान अपनी रक्षात्मक नीति छोड़कर आरपार के मूड में नजर आ रहा है। मोहसीन रिजाई ईरान की सत्ता व्यवस्था के सबसे अनुभवी और प्रभावशाली कट्टरपंथी चेहरों में गिने जाते हैं। 1979 की ईरानी क्रांति से पहले वे इस्लामी गोरिल्ला संगठनों के साथ जुड़े रहे। क्रांति के बाद उन्होंने रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉप्स यानी आईआरजीसी की खुफिया शाखा बनाई और 20 सितंबर 1981 को महज 27 साल की उम्र में वे आईआरजीसी के कमांडर इन चीफ बन गए। ईरान इराक युद्ध के दौरान पूरे 8 साल तक उन्होंने मोर्चे पर रहकर सेना की कमान संभाली थी। 16 साल तक किया आईआरजीसी का नेतृत्व करीब 16 साल तक आईआरजीसी का नेतृत्व भी किया था। 1986 में वे ईरान के सुप्रीम डिफेंस काउंसिल के भी सदस्य रहे हैं। 1997 में सैन्य कमान छोड़ने के बाद रिजाई राजनीतिक और देश की नीतियों को गढ़ने में लग गए। वे लगातार देश के राष्ट्रपति चुनाव की रेस में रहे। साल 2009, 2013 और 2021 चुनाव में इब्राहिम रही के बाद करीब 34 लाख वोटों के साथ वे दूसरे स्थान पर रहे। सैन्य मामलों के अलावा रिजाई अर्थशास्त्र और सरकारी नीतियों पर भी मजबूत पकड़ रखते हैं। वे 2021 से 2023 तक ईरान के उपराष्ट्रपति रहे हैं और फिलहाल एक्सपीडिएंसी डिसर्नमेंट काउंसिल के सदस्य होने के साथ-साथ सुप्रीम काउंसिल फॉर इकोनमिक कोऑर्डिनेशन के सचिव का पद भी संभाल रहे हैं। जानकारों का मानना है कि रजाई जैसे अनुभवी और बेहद सख्त मिजाज जनरल को सुरक्षा परिषद में सर्वोच्च प्रतिनिधि नियुक्त करने का मतलब साफ है। ईरान अब पश्चिमी ताकतों के सामने झुकने के मूड में बिल्कुल नहीं। रिजाई ना केवल सैन्य मोर्चे की बारियों को समझते हैं बल्कि आर्थिक पाबंदियों के निपटने और रणनीतिक समझ रखने में महारत हैं। इसे भी पढ़ें: ईरान के डर से अपना एयरफोर्स-1 विमान छोड़-छाड़ झट से ली सीक्रेट फ्लाइट, Turkey से गुप्त तरीके से भागे ट्रंप? मोजतबा ने अपने घेरे को कैसे किया मजबूत 28 फरवरी 2026 को अमेरिकी-इजराइली हमलों में अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद सत्ता संभालने वाले नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई ने शुरुआती हमलों में घायल होने के बावजूद अपने भरोसेमंद प्रतिनिधियों के जरिए काम करते हुए सेना और सुरक्षा तंत्र पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली है। इसी रणनीतिक फेरबदल के तहत उन्होंने ईरान-इराक युद्ध के अनुभवी रेजाई को अपने शीर्ष सैन्य गुट में शामिल किया है, वहीं आर्म्ड फोर्सेज जनरल स्टाफ (AFGS) प्रमुख मेजर जनरल अली अब्दुल्लाही अलियाबादी को AFGS और 'खातम ओल-अंबिया' (KOACH) का विलय पूरा करने के निर्देश दिए हैं ताकि नियमित सेना (आर्तेश) और IRGC के बीच का मतभेद खत्म हो सके। अमेरिकी-इजराइली हमलों में पूर्व IRGC प्रमुख मोहम्मद पाकपूर और AFGS प्रमुख अब्दुल रहीम मूसावी जैसे शीर्ष कमांडरों के मारे जाने के बाद, अब अहमद वहीदी, अलियाबादी और रेजाई मिलकर इस संकट के दौर में ईरान के केंद्रीय कमान नेटवर्क को पूरी तरह स्थिर और सुचारू करने में जुटे हैं। इसे भी पढ़ें: ईरान की 300 अरब डॉलर की मांग पर Trump का तीखा पलटवार, कहा- मारे गए लोगों के लिए हर्जाना दे Tehran ईरान-अमेरिका शांति समझौते में क्या ताज़ा जानकारी है? रेज़ाई की नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब तेहरान होर्मुज़ जलडमरूमध्य के आसपास बहुत अहम और जोखिम भरे घटनाक्रमों से निपट रहा है। यह समुद्र का एक संकरा रास्ता है जहाँ से दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत पेट्रोलियम गुज़रता है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने सप्ताहांत में कहा कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर एक रेगुलेटेड शिपिंग कॉरिडोर बनाने के लिए मस्कट की मध्यस्थता में हो रही बातचीत एक समझौते के बहुत करीब है। हालाँकि, अरागची ने वाशिंगटन के साथ सीधी बातचीत की संभावना को साफ तौर पर खारिज कर दिया और अमेरिका पर कुछ समय के लिए हुए अंतरिम समझौता ज्ञापन (MOU) का उल्लंघन करने का आरोप लगाया। तेहरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को बिना किसी रोक-टोक के कमर्शियल तेल की आवाजाही के लिए पूरी तरह से फिर से खोलने पर सहमत होने से पहले पाँच स्पष्ट शर्तें रखी हैं। क्या है ये शर्तें नौसैनिक घेराबंदी से राहत: ईरान के कमर्शियल और तेल-निर्यात करने वाले बंदरगाहों पर लगी अमेरिकी नौसैनिक घेराबंदी को तुरंत खत्म करना। सैनिकों की वापसी: फारस की खाड़ी इलाके से अमेरिकी आक्रामक सैन्य साधनों (assets) को वापस बुलाना। प्रतिबंध हटाना: 2025-2026 के संघर्ष के दौरान फिर से लगाए गए या बढ़ाए गए आर्थिक और ऊर्जा प्रतिबंधों से बड़ी राहत। संपत्ति को फ्रीज़-मुक्त करना: विदेशी बैंकों में रखी ईरान की सरकारी वित्तीय संपत्तियों को पूरी तरह से जारी करना। युद्ध का हर्जाना: युद्ध के दौरान ईरान के आम नागरिकों और ऊर्जा से जुड़े बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान के लिए औपचारिक वित्तीय मुआवज़ा। पश्चिम एशिया के हालात कैसे हैं? रेज़ाई की नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब क्षेत्र में कई मोर्चों पर संघर्ष चल रहा है, जिसमें क्षेत्रीय सहयोगी, प्रॉक्सी और पड़ोसी खाड़ी देश शामिल हैं। पड़ोसी देश इराक में, संघीय अधिकारियों ने ईरानी समर्थित मिलिशिया की गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए कदम उठाने शुरू कर दिए हैं, ताकि इराकी धरती पर और जवाबी हमले न हों। इराकी खुफिया अधिकारियों ने इस महीने की शुरुआत में सऊदी सुरक्षा प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की और सऊदी क्षेत्र को निशाना बनाने वाले ड्रोन और मिसाइल हमलों को रोकने का वादा किया। यह सुरक्षा सहयोग 2 अगस्त को हुए ड्रोन हमले के बाद हुआ है, जिसका आरोप हथियार छोड़ने का विरोध करने वाले कट्टरपंथी इराकी मिलिशिया गुटों पर लगा था — इस हमले में बगदाद के उत्तर में कैंप ताजी में अमेरिका द्वारा दिए गए गोला-बारूद का भंडार नष्ट हो गया था। खुफिया विश्लेषकों का मानना ​​है कि यह हमला मिलिशिया के कट्टरपंथियों द्वारा इराकी सैन्य उपकरणों को नष्ट करने की कोशिश थी, जिनका इस्तेमाल गैर-सरकारी सशस्त्र समूहों के खिलाफ किया जा सकता था। दक्षिणी अरब में हूथी बलों और रॉयल सऊदी सशस्त्र बलों के बीच छोटे-मोटे संघर्ष भी फिर से शुरू हो गए हैं। खबरों के अनुसार, सऊदी अरब नौसैनिक और सीमित ज़मीनी अभियानों की तैयारी को अंतिम रूप दे रहा है, जिनका मकसद रेड सी (लाल सागर) में शिपिंग लेन को सुरक्षित करना और अपने पश्चिमी तट पर सऊदी कच्चे तेल के निर्यात में हूथी द्वारा पैदा की जा रही बाधाओं को खत्म करना है। अब ईरान के लिए आगे क्या? सैन्य फैसलों के साथ-साथ, देश की अर्थव्यवस्था को बचाए रखना भी ईरान के नेतृत्व के लिए एक ज़रूरी प्राथमिकता बनी हुई है। सरकारी मीडिया ने पुष्टि की है कि पेज़ेशकियन ने खामेनेई के साथ एक लंबी बैठक की, जिसमें देश के सैन्य बजट, विदेशी मुद्रा भंडार और ऊर्जा आवंटन की समीक्षा की गई। सरकारी टेलीविज़न ने बताया कि इस बातचीत का मुख्य मकसद संसाधन जुटाना, रियाल और ऊर्जा पर होने वाले खर्च को संभालना और विदेशी साझेदारों के साथ आपातकालीन आर्थिक सहयोग स्थापित करना था, क्योंकि देश उस स्थिति से गुज़र रहा है जिसे सरकारी मीडिया तीसरा थोपा गया युद्ध बताता है।

प्रभासाक्षी 11 Aug 2026 2:16 pm

‘इस बार वोट हाथी को, अपने पुराने साथी को', आकाश आनंद के नये नारे ने उड़ा दी UP में सारे राजनीतिक दलों की नींद

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में जो लोग बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को हल्के में लेकर चल रहे थे, उन्हें अब अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है। बसपा के राष्ट्रीय संयोजक आकाश आनंद चुनावी मैदान में पूरी ताकत के साथ उतर चुके हैं और उनकी सभाओं में उमड़ रही भीड़, खासकर युवाओं की मौजूदगी, पार्टी के लिए नई उम्मीद पैदा कर रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी आकाश आनंद ने बसपा की रैलियों में बड़ी भीड़ आकर्षित की थी, हालांकि इसका चुनावी परिणाम पार्टी के लिए शून्य रहा। लेकिन लोकसभा और विधानसभा चुनावों के मुद्दे अलग होते हैं और इसी अंतर को समझते हुए आकाश आनंद इस बार बसपा के लिए जमीन तैयार करने में जुटे हैं। पिछले दिनों बसपा के भीतर हुई राजनीतिक उठापटक और संगठनात्मक चुनौतियों के बीच आकाश आनंद का यह आक्रामक अभियान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा महज एक सीट पर सिमट गई थी। ऐसे में आगामी विधानसभा चुनाव बसपा और खुद आकाश आनंद के लिए राजनीतिक अस्तित्व तथा प्रभाव की बड़ी परीक्षा माना जा रहा है। इसे भी पढ़ें: ब्राह्मण वोट बैंक के लिए योगी और अखिलेश आमने-सामने, अखिलेश के 'PD मतलब पंडित' वाले बयान ने बिछाई नई सियासी बिसात हम आपको बता दें कि सोमवार को हाथरस के सादाबाद विधानसभा क्षेत्र में पार्टी प्रत्याशी अविन शर्मा के समर्थन में आयोजित कार्यकर्ता सम्मेलन में आकाश आनंद ने योगी आदित्यनाथ सरकार पर रोजगार, शिक्षा और कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर तीखे हमले किए। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार से पिछले दस वर्षों के कामकाज का हिसाब मांगा जाना चाहिए। आनंद का आरोप था कि सरकार ने अपनी कमियों को छिपाने के लिए पिछले एक दशक में विज्ञापनों पर 7,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए। युवाओं के मुद्दे को केंद्र में रखते हुए उन्होंने दावा किया कि राज्य में चार लाख से अधिक सरकारी पद खाली पड़े हैं और कई प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाएं हुई हैं। उनका कहना था कि यदि विज्ञापन पर खर्च होने वाली रकम का इस्तेमाल परीक्षाओं और रोजगार के लिए किया जाता तो बड़ी संख्या में युवाओं को सरकारी नौकरियां मिल सकती थीं। आनंद ने रोजगार के सरकारी आंकड़ों पर भी सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि सप्ताह में एक दिन नाश्ता बेचने या सड़क किनारे ठेला लगाने वाले व्यक्ति को भी रोजगार के आंकड़ों में शामिल कर दिया जाता है। शिक्षा व्यवस्था पर हमला बोलते हुए आनंद ने दावा किया कि प्रदेश में 25 हजार से अधिक सरकारी स्कूल बंद किए गए हैं। उन्होंने झांसी मेडिकल कॉलेज में शिशुओं की मौत का भी जिक्र किया और सरकार से शिक्षा तथा स्वास्थ्य व्यवस्था पर जवाब मांगा। विकास परियोजनाओं की गुणवत्ता पर भी उन्होंने सवाल उठाए। उन्होंने लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि उद्घाटन के एक महीने के भीतर ही उसके कुछ हिस्सों में सड़क धंसने लगी। साथ ही उन्होंने मायावती सरकार के कार्यकाल में बने यमुना एक्सप्रेसवे को भी उदाहरण के तौर पर सामने रखा। कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर आनंद ने अपराध और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सरकार को घेरा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ वाली छवि पर भी उन्होंने तंज कसा और पूछा कि सरकार के दावों के बावजूद अपराध तथा महिला सुरक्षा की वास्तविक स्थिति क्या है। आकाश आनंद का हमला केवल भाजपा तक सीमित नहीं रहा। कांग्रेस पर निशाना साधते हुए उन्होंने भाजपा और कांग्रेस को ‘एक ही सिक्के के दो पहलू’ करार दिया। उनका आरोप था कि कांग्रेस संविधान और डॉ. भीमराव आंबेडकर की विचारधारा की बात करती है, लेकिन जिन राज्यों में वह सत्ता में है, वहां भी कई मामलों में वही नीतियां अपनाती है जिनके लिए वह भाजपा पर हमला करती है। समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव भी उनके निशाने पर रहे। आनंद ने सपा के PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फॉर्मूले पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि यह फॉर्मूला बदलता रहता है। उन्होंने अखिलेश यादव और राहुल गांधी को ‘अंकल’ कहकर सभा में माहौल भी हल्का किया। अखिलेश को लेकर उन्होंने कहा कि वह 30 साल के हैं जबकि अखिलेश 50 के, इसलिए उन्हें ‘भैया’ नहीं बल्कि ‘अंकल’ कहना स्वाभाविक है। हालांकि आनंद के भाषण का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश युवाओं और सत्ता परिवर्तन को लेकर था। दिल्ली समेत देश के विभिन्न हिस्सों में हुए Gen Z के प्रदर्शनों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि युवाओं का सड़क पर उतरना गलत नहीं है, लेकिन केवल भाषण और प्रदर्शन से व्यवस्था नहीं बदलती। उनके मुताबिक एक व्यक्ति को हटाकर दूसरे व्यक्ति को लाने से न नीति बदलती है, न प्रक्रिया और न ही अधिकारी। आनंद ने कहा कि वास्तविक बदलाव के लिए सरकार और सत्ता में बैठे लोगों को बदलना होगा। उन्होंने इस संदर्भ में कांशीराम और मायावती की राजनीति का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों नेताओं ने हमेशा बहुजन समाज को सत्ता हासिल करने और अपना भविष्य स्वयं लिखने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने युवाओं को आरक्षण के खिलाफ बनाए जा रहे कथित प्रचार से भी सावधान किया। आनंद ने कहा कि आरक्षण गरीबी हटाने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता दूर करने का संवैधानिक माध्यम है। उन्होंने अपने समर्थकों से आगामी विधानसभा चुनाव को अधिकारों की लड़ाई का अवसर मानते हुए सक्रिय होने की अपील की। इसी रणनीति के तहत आनंद ने नया नारा भी दिया, ‘इस बार वोट हाथी को, अपने पुराने साथी को’। साथ ही उन्होंने मतदाताओं से मायावती को पांचवीं बार मुख्यमंत्री बनाने की अपील की। साफ है कि बसपा इस बार चुनावी लड़ाई को केवल सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक आधार की वापसी की लड़ाई बनाना चाहती है। आकाश आनंद की आक्रामकता और युवाओं की भीड़ ने इस लड़ाई में फिलहाल एक नई हलचल जरूर पैदा कर दी है। अब देखना यह होगा कि रैलियों में दिखाई दे रहा यह उत्साह वोटों में कितना बदलता है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 11 Aug 2026 2:01 pm

एम्फी डेटा: म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री में आया शुद्ध निवेश

नई दिल्ली, जुलाई में म्यूचुअल फंड स्कीम्स में 2.35 लाख करोड़ रुपए का शुद्ध निवेश (नेट इन्फ्लो) दर्ज किया गया।

देशबन्धु 11 Aug 2026 1:32 pm

कीमती धातुओं ने पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से पकड़ी रफ्तार

नई दिल्ली, अमेरिका और ईरान के बीच लगातार बढ़ते तनाव के बीच हफ्ते के दूसरे कारोबारी दिन मंगलवार को घरेलू कमोडिटी मार्केट में कीमती धातुओं की कीमतों (सोने-चांदी) में तेजी देखने को मिली।

देशबन्धु 11 Aug 2026 12:54 pm

विपक्षी सांसदों ने चढ़ावा चोर और परीक्षा को लेकर सरकार पर कसा तंज, कहा- परीक्षा और राम मंदिर मुद्दे एक ही सिक्के के दो पहलू

विपक्षी सांसदों ने चढ़ावा चोर और परीक्षा को लेकर सरकार पर कसा तंज, कहा- परीक्षा और राम मंदिर मुद्दे एक ही सिक्के के दो पहलू

समाचार नामा 11 Aug 2026 12:09 pm

संसद में हंगामा जारी, लोकसभा-राज्यसभा की कार्यवाही स्थगित; अमित शाह पेश करेंगे दो अहम विधेयक

संसद के मानसून सत्र के 17वें दिन हंगामे के कारण लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही स्थगित हो गई। अमित शाह दो अहम विधेयक पेश करेंगे।

देशबन्धु 11 Aug 2026 11:27 am

RAW Chief Parag Jain के Dhaka में कदम रखते ही Pakistani ISI की बढ़ गयी बेचैनी, Bangladesh पर पैनी नजर रख रहा है India

रॉ चीफ पराग जैन के ढाका पहुंचने की खबर सुनते ही पाकिस्तानी आईएसआई के पांव तले जमीन खिसक गयी है। हम आपको बता दें कि बांग्लादेश में पाकिस्तान की बढ़ती सक्रियता और ढाका के सैन्य व खुफिया तंत्र से उसके बढ़ते संपर्क के बीच भारत की खुफिया एजेंसी के प्रमुख का वहां पहुंचना बेहद अहम माना जा रहा है। भले ही इस यात्रा को नियमित सुरक्षा संवाद बताया जा रहा हो, लेकिन इसका समय और मौजूदा क्षेत्रीय हालात इसे खास बना देते हैं। भारत साफ तौर पर बांग्लादेश के बदलते राजनीतिक और सुरक्षा समीकरण पर नजर रख रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक रॉ प्रमुख पराग जैन रविवार को चार सदस्यीय भारतीय प्रतिनिधिमंडल के साथ ढाका पहुंचे। यह यात्रा बांग्लादेश की खुफिया एजेंसी डीजीएफआई के निमंत्रण पर हुई। सोमवार को जैन ने प्रधानमंत्री तारिक रहमान के रक्षा मामलों के सलाहकार ब्रिगेडियर जनरल (सेवानिवृत्त) डॉ. एकेएम शम्सुल इस्लाम से मुलाकात की। भारतीय दल ने बांग्लादेश के अन्य कानून-प्रवर्तन एजेंसियों के प्रमुखों और गृह मंत्री सलाहुद्दीन अहमद से भी मुलाकात की। इसे भी पढ़ें: क्या 'इस्लामिक नाटो' से भारत की कूटनीतिक चुनौतियां बढ़ेंगी? कहीं अमेरिका व चीन की इसके पीछे कोई परोक्ष चाल तो नहीं? इस दौरे का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि पिछले करीब डेढ़ साल में पाकिस्तान के सैन्य और खुफिया अधिकारियों ने ढाका के चक्कर तेजी से बढ़ाए हैं। जनवरी 2025 में आईएसआई प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल असीम मलिक की ढाका यात्रा दशकों बाद किसी पाकिस्तानी खुफिया प्रमुख की ऐसी पहली यात्रा बताई गई थी। इसके बाद बांग्लादेशी सैन्य प्रतिनिधिमंडल ने रावलपिंडी जाकर पाकिस्तानी सेना प्रमुख असीम मुनीर समेत वायुसेना और नौसेना के प्रमुखों से मुलाकात की। अक्टूबर 2025 में पाकिस्तान के तत्कालीन ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी प्रमुख जनरल साहिर शमशाद मिर्जा के चार दिवसीय ढाका दौरे के बाद पाकिस्तान हाई कमीशन में आईएसआई की एक विशेष सेल बनाए जाने की रिपोर्ट भी सामने आई। इसी बीच, भारत के नए हाई कमिश्नर दिनेश त्रिवेदी की प्रधानमंत्री तारिक रहमान से मुलाकात भी बेहद अहम है। रहमान ने भारत के साथ रिश्ते सुधारने के लिए ‘अनुकूल माहौल’ बनाने की जरूरत बताई और ढाका ने भारत से पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण की प्रक्रिया तेज करने की मांग दोहराई। हालांकि नई दिल्ली ने कहा है कि वह प्रत्यर्पण अनुरोध को कानूनी और न्यायिक प्रक्रियाओं के तहत देख रहा है। हम आपको बता दें कि यह मुलाकात ऐसे वक्त हुई जब शेख हसीना ने दिल्ली से वर्चुअल माध्यम से सार्वजनिक रूप से अपनी पहली बड़ी राजनीतिक प्रतिक्रिया दी और दिसंबर में बांग्लादेश लौटने का दावा किया। उन्होंने 2024 के सत्ता परिवर्तन को सुनियोजित घटनाक्रम बताया तथा अवामी लीग के नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ हिंसा और दमन के गंभीर आरोप लगाए। जवाब में ढाका ने शेख हसीना को भारत से ऐसा मंच मिलने पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की और इसे बांग्लादेश की संप्रभुता के लिए अपमानजनक बताया। हालांकि भारत ने स्पष्ट किया कि कार्यक्रम एक निजी संस्था ने आयोजित किया था और सरकार की इसमें कोई भूमिका नहीं थी। इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी रणनीतिक चिंता पाकिस्तान की बढ़ती मौजूदगी है। विशेषज्ञों के हवाले से रिपोर्ट में दावा किया गया है कि आईएसआई ने बांग्लादेश में क्षेत्रीय स्तर के कार्यालय जैसी संरचनाएं स्थापित करने की कोशिश की है। साथ ही पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच कराची-चटगांव सीधी समुद्री सेवा बहाल हुई, सीधी वाणिज्यिक उड़ानों का रास्ता खुला और राजनयिकों तथा सैन्य अधिकारियों के लिए वीजा-मुक्त व्यवस्था पर सहमति बनी। भारत के लिए यह इसलिए गंभीर है क्योंकि दोनों देशों के बीच करीब 4,000 किलोमीटर लंबी सीमा है। यदि बांग्लादेश में कट्टरपंथी या विदेशी खुफिया नेटवर्क गहराई से जड़ें जमाते हैं तो इसका सीधा असर पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा, सीमा प्रबंधन, अवैध घुसपैठ, हथियार और आतंकी नेटवर्क पर पड़ सकता है। हालांकि रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि फिलहाल भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की ओर से बांग्लादेश को आतंकवादी खतरे के रूप में लेकर कोई सार्वजनिक ‘रेड फ्लैग’ सामने नहीं आया है। यहीं रॉ प्रमुख की ढाका यात्रा का सामरिक महत्व सामने आता है। भारत संभवतः बांग्लादेश को किसी एक खेमे में धकेलने की बजाय उसके सुरक्षा तंत्र के साथ प्रत्यक्ष संवाद बनाए रखना चाहता है। देखा जाये तो भारत के लिए बांग्लादेश को नजरअंदाज करना संभव भी नहीं है। भौगोलिक निकटता, व्यापार, कनेक्टिविटी, चिकित्सा सुविधाएं और विकास सहयोग दोनों देशों को एक-दूसरे से जोड़े रखते हैं। दिल्ली बांग्लादेश का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और बांग्लादेश भारत से विकास सहायता पाने वाला सबसे बड़ा लाभार्थी भी है। लेकिन चुनौती सिर्फ सुरक्षा की नहीं, बांग्लादेश की आंतरिक दिशा की भी है। रिपोर्ट में विशेषज्ञों ने सेना और राजनीति में बढ़ते इस्लामी प्रभाव, जमात-ए-इस्लामी की वापसी और पाकिस्तान के साथ बढ़ते संपर्क को लेकर चिंता जताई है। दूसरी ओर, बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था भी उस दौर से गुजर रही है जिसमें शेख हसीना के समय की तेज आर्थिक वृद्धि, मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और बढ़ती प्रति व्यक्ति आय के मुकाबले नई परिस्थितियां अधिक अनिश्चित दिखाई देती हैं। ऐसे में रॉ चीफ का ढाका पहुंचना एक स्पष्ट रणनीतिक संदेश है कि दिल्ली बांग्लादेश के घटनाक्रम को दूर बैठकर नहीं देख रही। पाकिस्तान की आईएसआई हो या कट्टरपंथी नेटवर्क, भारत अपनी पूर्वी सीमा के बदलते सुरक्षा समीकरण पर सीधी नजर रख रहा है। अब असली परीक्षा तारिक रहमान सरकार की है कि वह ढाका को पाकिस्तान का मोहरा बनने देती है या भारत के साथ सुरक्षा, विकास और रणनीतिक हितों का संतुलित रास्ता चुनती है।

प्रभासाक्षी 11 Aug 2026 11:21 am

बिहार : तेजस्वी यादव ने उर्दू, अरबी-फारसी शिक्षकों के स्थानांतरण पर उठाए सवाल, लंबित वेतन भुगतान की मांग

बिहार : तेजस्वी यादव ने उर्दू, अरबी-फारसी शिक्षकों के स्थानांतरण पर उठाए सवाल, लंबित वेतन भुगतान की मांग

समाचार नामा 11 Aug 2026 10:26 am

मनमोहन सिंह पर SC के फैसले के बाद सोनिया गांधी का मोदी सरकार पर हमला, बोलीं- इतिहास उनकी ईमानदारी के लिए याद रखेगा

सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को शांत, सरल और प्रभावशाली प्रधानमंत्रियों में से एक बताते हुए कहा कि इतिहास उन्हें सम्मान के साथ याद करेगा। उन्होंने दावा किया कि पूर्व प्रधानमंत्री के खिलाफ लंबे समय तक एक सुनियोजित अभियान चलाया गया, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उस अभियान का अंत हो गया है।

देशबन्धु 11 Aug 2026 9:45 am

मध्य प्रदेश के राजगढ़ में उफनते नाले में बही वैन, 9 लोगों की मौत

मध्य प्रदेश के राजगढ़ में उफनते नाले में बही वैन, 9 लोगों की मौत

समाचार नामा 10 Aug 2026 10:28 pm

सिर्फ सैलरी देखकर बैंक नहीं देता लोन, इन 4 चीजों की भी होती है जांच; आवेदन से पहले जरूर जानें

अक्सर यह माना जाता है कि अच्छी सैलरी होने पर बैंक आसानी से लोन मंजूर कर देगा। हालांकि, वास्तविकता इससे अलग है। बैंक किसी आवेदक की सिर्फ मासिक आय नहीं देखते, बल्कि उसकी पूरी वित्तीय स्थिति का आकलन करते हैं।

देशबन्धु 10 Aug 2026 8:35 pm

आंध्र प्रदेश 2027 तक जमीन का दोबारा सर्वे पूरा करेगा

आंध्र प्रदेश 2027 तक जमीन का दोबारा सर्वे पूरा करेगा

समाचार नामा 10 Aug 2026 8:26 pm

'आप' के 22 विधायकों के घरों के सामने भाजपा का विरोध प्रदर्शन, हर्ष मल्होत्रा ने किया नेतृत्व

'आप' के 22 विधायकों के घरों के सामने भाजपा का विरोध प्रदर्शन, हर्ष मल्होत्रा ने किया नेतृत्व

समाचार नामा 10 Aug 2026 8:24 pm

दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष ने कचरा और आवारा पशुओं से जुड़े मुद्दों को एमसीडी की विशेष समिति को भेजा

दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष ने कचरा और आवारा पशुओं से जुड़े मुद्दों को एमसीडी की विशेष समिति को भेजा

समाचार नामा 10 Aug 2026 8:00 pm

राहुल गांधी ने छात्रों के खिलाफ बल प्रयोग को बताया गलत, झारखंड सरकार से की यह अपील

राहुल गांधी ने सोमवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर पोस्ट कर झारखंड में प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर कथित पुलिस कार्रवाई पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि छात्रों के खिलाफ बल का इस्तेमाल करना गलत है।

देशबन्धु 10 Aug 2026 7:32 pm

केरल में वंदे मातरम् को लेकर संग्राम! पूरा गीत गाने के निर्देश पर कांग्रेस बोली - ‘गोली मार दो लेकिन…’

केरल में वंदे मातरम् को लेकर संग्राम! पूरा गीत गाने के निर्देश पर कांग्रेस बोली - ‘गोली मार दो लेकिन…’

समाचार नामा 10 Aug 2026 6:30 pm

ममता बनर्जी के काफिले पर हमला 'सुनियोजित साजिश', टीएमसी ने भाजपा पर लगाया आरोप

ममता बनर्जी के काफिले पर हमला 'सुनियोजित साजिश', टीएमसी ने भाजपा पर लगाया आरोप

समाचार नामा 10 Aug 2026 6:28 pm

अफसरों जिम्मेदार ठहराने से होगा समस्याओं का समाधान

देश की सरकारों के पास हर समस्या का एक लाइलाज रामबाण इलाज यह है कि किसी समस्या की गहराई के उपचार के बजाए कानून बना दिया जाए। सरकारें हर समस्या का इलाज व्यवहारिक धरातल पर नहीं बल्कि कानून में ढूंढने की आदी हो चुकी हैं। देश में हर क्षेत्र में एक के बाद एक नए कानून बनाए जा रहे हैं, किन्तु समस्याएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। जितने भी नए कानून बनाए जा रहे हैं, या पुराने कानूनों मे संशोधन किया जा रहा, उसका सारा भार देश के आम लोगों पर ही डाला जा रहा है। इन काूननों में कहीं लापरवाही बरतने या अनदेखी के लिए देश के आला अफसर जिम्मेदार नहीं हैं। आजादी से लेकर आज तक ऐसा कोई कानून केंद्र या किसी राज्य ने नहीं बनाया है कि यदि कोई घटना—दुर्घटना या कांड होगा तो उसके लिए सीधे अफसर भी जिम्मेदार माने जाएंगे। संशोधित केंद्रीय पेपर लीक कानून में अनुचित साधनों का इस्तेमाल करने पर कम से कम 5 वर्ष और अधिकतम 10 वर्ष तक की सजा होगी। अधिकतम जुर्माना 10 लाख रुपये से बढ़ाकर 50 लाख रुपये कर दिया गया है। संगठित अपराधों में 7 से 10 वर्ष तक की सजा और 10 करोड़ रुपये तक जुर्माने का प्रावधान किया गया है। पेपर लीक का नया केंद्रीय कानून बनाने के बावजूद झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) परीक्षा में पेपर लीक और अनियमितताएं हुईं। इस मामले में अब तक 11 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है और जेपीएससी के चेयरमैन एल. खियांगटे ने इस्तीफा भी दे दिया। केंद्र सरकार के बनाए पेपर लीक परीक्षा कानून देश में एक अगस्त से अस्तित्व मे आ चुका है। इसके बावजूद देश में भर्ती परीक्षाओं के पेपर लीक मामले थम नहीं रहे हैं। इसे भी पढ़ें: जंतर-मंतर पर Students के लिए आवाज, झारखंड में छात्रों पर हुए लाठीचार्ज पर चुप्पी, वाह क्या दोगलापन है! राजस्थान में अप्रैल 2022 में एंटी पेपर लीक एक्ट लागू किया गया। गुजरात में मार्च 2023 से सख्त नकल और पेपर लीक विरोधी कानून लागू। उत्तराखंड में वर्ष 2023 में प्रतियोगी परीक्षा अध्यादेश/कानून लागू किया गया। झारखंड में वर्ष 2023 में अनुचित साधनों की रोकथाम के लिए अधिनियम बनाया गया। हरियाणा में सितंबर 2021 से प्रभावी कानून लागू है। इसी तरह असम, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, अरुणाचल प्रदेश, ओडिशा और आंध्र प्रदेश आदि राज्यों में भी अलग-अलग वर्षों में इससे जुड़े कड़े कानूनी प्रावधान या अधिनियम बनाए जा चुके हैं। केंद्र और इतने राज्यों में पेपर लीक कानून के बाद भी पेपर लीक की घटनाएं थम नहीं रही है। पेपर लीक की तरह देश में बलात्कार के मामलों में बेहद कठोर कानून बनाए गए थे। बलात्कार और इसके साथ हत्या के मामलों में फांसी तक का प्रावधान किया गया है। 2012 में दिल्ली में एक छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार और हत्या के दोषी चार भारतीय पुरुषों को फांसी दे दी गई थी। निर्भया बलात्कार हत्याकांड से लोगों में आक्रोश फैल गया था और भारत में बलात्कार विरोधी नए कानून बनाए गए। आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2018 के तहत 12 साल से कम उम्र की बच्चियों के बलात्कार में मृत्युदंड का प्रावधान किया गया। गैंग रेप में न्यूनतम सजा 20 साल से आजीवन की गई। इतने कठोर कानून के लागू होने के बावजूद देश में बलात्कार—हत्या के मामले बढ़ते चले गए। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के मुताबिक देश के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में साल 2023 में 31,982 महिलाओं के साथ बलात्कार के मामले दर्ज हुए। इससे जाहिर है कि नए कठोर कानूनों का अपराधियों को कोई भय नहीं है। ये कानून महज कागज का पुलिन्दा साबित हो रहे हैं। यही भ्रष्टाचार का भी हाल है। देश में भ्रष्टाचार रोकने के लिए कठोर कानून बने हुए हैं, इसके बावजूद देश से भ्रष्टाचार खत्म होना तो दूर बल्कि कम तक नहीं हो सका। आए दिन कहीं न कहीं भ्रष्टाचार की खबरें आती रहती हैं। भ्रष्टाचार खत्म नहीं करने के लिए कभी किसी अफसर को जिम्मेदार नहीं माना गया। बेशक उनके विभाग का ही कोई भ्रष्टाचारी क्यों न पकड़ा जाए। आज तक जितने भी कानून बनाए गए हैं, उसमें अफसरों की जिम्मेदारी कहीं भी तय नहीं की गई। मसलन सड़क पर गडढा होने से यदि कोई सड़क दुर्घटना होती है या फिर बगैर अग्नि सुरक्षा उपायों के संचालित किसी व्यवसायिक भवन में अग्नि दुर्घटना होती है तो इसके निगरानी करने वाले अफसर जिम्मेदार ठहराए जाएंगे, ऐसा कोई कानून नहीं बना है। यही प्रमुख वजह है कि चाहे पेपर लीक हों या किसी तरह का बड़ा हादसा, कानूनों को सख्त कर दिया जाता है, किन्तु जिम्मेदार अधिकारियों की जिम्मेदारी तय नहीं की जाती। इसका बड़ा उदाहरण मेलों, धार्मिक स्थलों पर होने वाले आयोजनों में भगदड़ के दौरान होने वाली मौतें हैं। ऐसा शायद ही कोई साल जाता होगा, जब ऐसे हादसे नहीं होते होंगे। ऐसे हादसों में अब तक देश भर में हजारों लोगों की मौत हो चुकी है। इसके बावजूद अफसरों की ज्मिमेदारी तय नहीं की गई। ऐसा कोई कानून नहीं बनाया गया कि ऐसे आयोजनों में हादसों के लिए सीधे अफसर जिम्मेदार ठहराएं जाएंगे, उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलेगा और उन्हे जेल की सजा भुगतनी पड़ेगी। अफसरों की लापरवाही से हुए हादसों और इससे बच निकलने का बड़ा उदाहरण राजस्थान का है। जहां दो साल पहले स्कूल की छत्त गिरने से 10 से ज्यादा बच्चों की मौत हो गई, इसके बाद भी स्कूल की छत्त गिरने या दीवार गिरने के हादसे होते रहे, किन्तु एक भी अफसर को आपराधिक आरोपी नहीं माना गया। किसी पर एफआईआर दर्ज नहीं हुई। पुलिस ने आईएएस अफसर तो दूर बल्कि शिक्षा विभाग के किसी अफसर के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की। राजस्थान सहित देश के लाखों सरकारी स्कूलों की इमारतों की हालत खस्ता है। सरकारों के पास इतना बजट ही नहीं है कि इतना रखरखाव किया जा सके। यह निश्चित है कि चुनी हुई सरकारें लंबे अर्से तक देश के लोगों की आंखों में धूल नहीं झौंक सकती, उन्हें कानून बनाने के साथ ही धरातल पर समस्याओं का समाधान ढूंढना होगा। देश में बुनियादी सुविधाओं की पहुंच आम नागरिकों तक बढ़ानी होगी। इसकी कमी से हर साल बिजली, पानी, सड़क, स्कूल, अस्पताल के अभाव जैसे मुद्दों पर धरने, प्रदर्शन, आंदोलन होते हैं, किन्तु इनका स्थायी समाधान नहीं होता। सरकारों की हालत 'खेत खाए गदहा और मार खाए जुलहा' जैसी है। जब तक सरकारें और जिम्मेदार अफसर अपनी जिम्मेदारी से भागते रहेंगे। ऐसी समस्याओं का समाधान नहीं होगा, बेशक कितने भी नए कानून बन जाएं। - योगेन्द्र योगी

प्रभासाक्षी 10 Aug 2026 3:59 pm

Chai Par Sameeksha: Punjab Politics में शुरू हुआ गजब का खेल, उधर संसद में चल रहा है आंकड़ों का गेम

प्रभासाक्षी के साप्ताहिक कार्यक्रम चाय पर समीक्षा में इस सप्ताह हमने पंजाब की राजनीति और संसद में चल रहे हंगामे पर चर्चा की। हमेशा की तरह इस कार्यक्रम में मौजूद रहे प्रभासाक्षी के संपादक नीरज कुमार दुबे। पंजाब को लेकर हमने नीरज दुबे पूछा। नीरज दुबे ने कहा कि पंजाब में फिलहाल के घटनाक्रमों पर नजर डालें तो कई चीजें एक साथ चल रही है। सबसे पहले उन्होंने कहा कि हमने देखा कि सुखबीर बादल जो कि शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष हैं, उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात होती है। इसके बाद इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि क्या एक बार फिर से पंजाब में अकाली दल और भाजपा एक साथ आ सकती है। उन्होंने कहा कि दोनों दलों में पुराना गठबंधन रहा है। हालांकि, किसान आंदोलन के समय दोनों अलग-अलग हुए थे। लेकिन अब ऐसा लगता है कि अकाली दल को यह समझ में आ गया है कि बिना गठबंधन उसे फायदा होने वाले नहीं है। इसलिए शायद अब भाजपा के साथ एक बार फिर से समीकरण को बैठाने की कोशिश की जा रही है। नीरज दुबे ने कहा कि पंजाब की परिस्थितियों को देखें तो ग्रामीण क्षेत्रों में बीजेपी के लिए स्थितियां अभी भी अनुकूल नहीं है। यहां पर अकाली दल मजबूत है। दूसरी ओर अकाली दल को बीजेपी की वजह से शहरी वोट मिल जाते हैं। ऐसे में दोनों गठबंधनों के लिए यह पहले कारगर हुआ करता था। एक बार फिर से कुछ इसी तरीके की उम्मीद की जा रही है। प्रकाश सिंह बादल के निधन के बाद अकाली दल की स्थितियां सामान्य नहीं है। पार्टी में टूट भी हुई। सुखबीर सिंह बादल पर बेअदबी का आरोप भी लगा। तो ऐसे कई मामले हुए जो कि अकाली दल के लिए काफी चुनौतियां लेकर आई। हालांकि अब अकाली दल अपने खोए हुए जनाधार को वापस पाना चाहता है और शायद इसी वजह से भाजपा के साथ एक बार गठबंधन की फिर से चर्चा तेज हो गई है। इसे भी पढ़ें: Punjab में रोजगार स्थिति पर श्वेत पत्र लाए AAP सरकार: SAD नेता Daljit Singh Cheema कांग्रेस को लेकर नीरज कुमार दुबे ने कहा कि भले ही राहुल गांधी कैप्टन अमरिंदर सिंह को लेकर अच्छी बातें कर रहे हैं लेकिन अमरिंदर सिंह ने कह दिया है कि वह भाजपा के साथ है और आगे भी रहेंगे। इसके साथ ही उन्होंने कांग्रेस के भीतर मचे घमासान पर भी बड़ी बात कही। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के लिए स्थितियां अनुकूल दिखाई नहीं दे रही है। कांग्रेस आज से तीन-चार महीने पहले पंजाब में सत्ता के करीब दिखाई दे रही थी क्योंकि आम आदमी पार्टी का कुछ खास प्रदर्शन नहीं रहा है। लेकिन अब कांग्रेस के भीतर आपस में ही गुटबाजी शुरू हो गई है। चरणजीत सिंह चन्नी और वहां के प्रदेश अध्यक्ष राजा वरिंग के बीच लगातार आर पार चल रहा है। भूपेश बघेल प्रभारी के तौर पर आज तक सफल नहीं हो पाए हैं। ऐसे में पंजाब में कितने सफल होंगे इस पर सब की निगाहें रहने वाली है। संसद को लेकर नीरज कुमार दुबे ने साफ तौर पर कहा कि सरकार पूरी तरीके से डीलिमिटेशन बिल को लेकर आगे बढ़ रही है। लगातार अमित शाह इसी को लेकर बैठक कर रहे हैं। विपक्ष उन पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। इसी वजह से विपक्ष उनके बयान की मांग कर रहा है। हालांकि सरकार इसको लेकर बहुत ज्यादा प्रेशर में नहीं है। सरकार को जो बिल जरूरी लग रहे हैं, उसे वह पास कर ले रही है। हालांकि, लोकतंत्र के लिए बिल्कुल अच्छी चीज नहीं है। बिना बहस के कोई बिल पास हो जाए यह ठीक नहीं लगता। इसीलिए सरकार डीलिमिटेशन बिल और महिला आरक्षण बिल को लेकर एक सहमति बनाने की कोशिश कर रही है ताकि एक अच्छा संदेश जाए। हमने देखा किस तरीके से सरकार की ओर से कांग्रेस नेताओं से संपर्क किया गया। हालांकि कांग्रेस नेता अभी भी अपने रुख पर अड़े हुए हैं। देखना है कि अगले सप्ताह में किस तरीके से संसद में कार्यवाही हमें देखने को मिलती है।

प्रभासाक्षी 10 Aug 2026 3:56 pm

झारखंड प्रोटेस्ट क्रैकडाउन पर राहुल ने सोरेन सरकार को कटघरे में खड़ा किया:- ‘छात्रों पर बल प्रयोग गलत’

जेएमएम के नेतृत्व वाली हेमंत सोरेन सरकार में शामिल कांग्रेस ने सोमवार को रांची में प्रदर्शन करने वाले छात्रों के ख़िलाफ़ पुलिस कार्रवाई की कड़ी आलोचना की है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने साफ़ तौर पर कहा कि बातचीत से ही समाधान निकल सकता है, हिंसा से नहीं।

सत्य हिंदी 10 Aug 2026 3:09 pm

फिर शुरू होगा 'कैश' वाला जमाना! UPI पेमेंट पर आपको नहीं देना होगा चार्ज, लेकिन क्या मर्चेंट ट्रांजैक्शन का असर ग्राहकों पर पड़ सकता है?

चाय की टपरी पर 5 रुपये की कटिंग से लेकर बड़े-बड़े मॉल्स में हज़ारों का सामान खरीदने तक'स्कैन किया और पे किया'ये अब हमारे आम दिन चर्या का हिस्सा बन चुका है। आज सब्जी की रेहड़ी वाला भी छुट्टे पैसे मांगने की जगह सीधा क्यूआर कोड (QR Code) आगे बढ़ा देता है। डिजिटल इंडिया ने हमारी जेब से कैश का झंझट तो खत्म कर दिया, लेकिन क्या यह आराम अब ज़्यादा दिन का मेहमान नहीं है? भारत फिर से कैश वाले ज़माने में लौट रहा है! भारत-पे के पूर्व को-फाउंडर अशनीर ग्रोवर ने सोशल मीडिया पर ऐसा ही कुछ दावा करके पूरे देश में खलबली मचा दी है। सुनने में अजीब ज़रूर लगेगा, पर जिस रफ्तार से नियम बदल रहे हैं और पेमेंट्स पर पेंच फंस रहे हैं, वो दिन दूर नहीं जब आपको अपनी जेब में फिर से गांधी जी के नोटों की गड्डी सजानी पड़ जाए! क्या सच में मुफ़्त यूपीआई का ज़माना जाने वाला है? क्या आपके गूगल पे, फोनपे और पेटीएम से अब पैसे कटने वाले हैं या फिर यह सिर्फ दुकानदारों का नया सिरदर्द है? आइए, यूपीआई पर चार्ज के इस पूरे गणित का पर्दाफाश करते हैं! एमडीआर आखिर होता क्या है? जब आप किसी दुकान पर कार्ड या डिजीटल पेमेंट से पैसा देते हैं तो पेमेंट सिस्टम को चलाने वाली कंपनियों और बैंकों को एक फीस मिलती है। इसी फीस को एमडीआर यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट कहा जाता है। फिलहाल यूपीआई पूरी तरह फ्री है। इसका मतलब है कि बैंकों और कंपनियों को इसे चलाने के लिए अपनी जेब से पैसा खर्च करना पड़ता है। इस पूरे विवाद की जड़ में है टैक्सेशन एंड अदर लॉ अमेंडमेंट बिल 2026। 6 अगस्त 2026 को लोकसभा में हंगामे के बीच बगैर चर्चा ध्वनि मत से इस बिल को पारित किया गया। यह बिल पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम एक्ट 2007 में संशोधन करता है। अब तक कानून यह था कि यूपीआई और रुपए डेबिट कार्ड के जरिए होने वाले भुगतान पर कोई भी बैंक या सर्विस प्रोवाइडर कोई शुल्क माने एमडीआर नहीं वसूल कर सकता है। पुराने कानून की धारा 10 ए स्पष्ट रूप से बैंकों को ऐसे चार्ज लगाने से रोकती थी। लेकिन नए संशोधन ने सरकार को यह अधिकार दे दिया है कि वह भविष्य में नोटिफिकेशन के जरिए यह तय कर सकें कि किन डिजिटल पेमेंट मोड पर शुल्क लगाया जा सकता है और किन्हें मुफ्त रखा जाना चाहिए। आसान भाषा में कहें तो अब तक जो कानूनी गारंटी थी कि यूपीआई मुफ्त रहेगा वो खत्म हो गई है। लोकसभा पास कर चुकी है बिल वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पिछले हफ्ते लोकसभा में टैक्सेशन एंड अदर लॉज ( अमेंडमेंट) बिल 2026 पेश किया था, जिसे लोकसभा पास कर चुकी है। यह बिल सरकार को UPI और रूपे कार्ड से होने वाले ट्रांजैक्शंस पर जीरो MDR की व्यवस्था में बदलाव करने का कानूनी आधार देता है। अभी बैंक और पेमेंट सर्विस देने वाली कंपनियां यूपीआईऔर रूपे डेबिट कार्ड के जरिए पेमेंट के लिए यूजर्स से कोई चार्ज नहीं ले सकती हैं। मंत्रालय ने बयान में कहा, 'इस बिल के संसद से पास होने के बाद UPI और अन्य सेवाओं पर NPCI की अध्यक्षता वाली कमिटी तय करेगी कि कोई एमडीआर लगेगा या नहीं। सरकार ने साफ की तस्वीर सरकार यह स्पष्ट रूप से बताना चाहती है कि यूजर्स के लिए कोई चार्ज नहीं होगा। पेमेंट करने वाले उपभोक्ताओं पर कोई ट्रांजैक्शन चार्ज नहीं लगेगा। सभी पर्सन टु पर्सन ट्रांजैक्शन भी बिना किसी चार्ज के होते रहेंगे। मर्चेंट्स के बारे में मंत्रालय ने कहा कि एमडीआर चार्जेज जब भी लागू होंगे, ये कुछ ही मर्चेट ट्रांजैक्शंस पर लगेंगे। संशोधन की जरूरत क्यों पड़ी? मंत्रालय ने कहा कि हकीकत में यह संशोधन इस बात का प्रावधान करने के लिए है, जिससे यूपीआई लंबे समय तक चलता रहे, टेक्नॉलजी बेहतर हो सके और जो भी जोखिम उभरे, उनका अच्छी तरह से सामना किया जा सके। मंत्रालय ने कहा कि यूपीआई से बढ़ते लेनदेन को देखते हुए साइबर सिक्योरिटी और इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने की जरूरत है। साथ ही, ज्यादा कंपनिया अपना कामकाज बढ़ा सकें, इसके लिए प्रतिस्पर्द्धा बढ़ाने की जरूरत भी है। इसके लिए आत्मनिर्भर रेवेन्यू मॉडल की जरूरत है। आरबीआई गवर्नर ने भी दिलाया भरोसा आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने इस मुद्दे पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा पेमेंट जैसे पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश जरूरी है और इसके लिए किसी ना किसी को तो पेमेंट करना ही होगा। हमारे सामने आसान विकल्प है। या तो आम जनता टैक्स के जरिए इसके लिए पेमेंट करें या फिर यूजर पे मॉडल को अपनाते हुए मर्चेंट डिस्काउंट रेट एमडीआर लागू करें। अभी सरकार हमारे लिए संशोधन ला रही है। लागत का पेमेंट तो किसी ना किसी को करना ही होगा। द हिंदू में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार सरकारी आंकड़े कहते हैं कि सरकार ने पेमेंट कंपनियों को नुकसान से बचाने के लिए अब तक लगभग 11349 करोड़ की सब्सिडी दी है। लेकिन यूपीआई का दायरा इतना बढ़ गया है कि अब सरकार के लिए हर साल हजारों करोड़ की सब्सिडी देना मुश्किल हो रहा है। जुलाई 2026 में ही यूपीआई ने 23.6 अरब ट्रांजैक्शन किए जिनकी कीमत 29.9 ट्रिलियन थी। इतनी बड़ी व्यवस्था को सुरक्षित रखने के लिए भारी निवेश की जरूरत है। बाहरी दबाव वाला दावा कितना सही? इस पूरे फैसले पर कांग्रेस ने सवाल उठाए हैं। 6 अगस्त को कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने एक लंबा चौड़ा ट्वीट किया जिसमें दावा किया कि मोदी सरकार द्वारा लाया गया'टैक्सेशन एंड अदर लॉज़ (अमेंडमेंट) बिल, 2026 उस वैधानिक गारंटी को समाप्त कर देता है जो अब तक यूपीआई लेने देन को शुल्क मुफ्त बनाए हुए था।उन्होंने कहा था कि 'यह कदम अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि की 2026 की उस रिपोर्ट के बाद उठाया गया है, जिसमें यूपीआई और RuPay के शुल्क-मुक्त होने की आलोचना की गई थी और आरोप लगाया गया था कि उन्होंने Visa और मास्टरकार्ड जैसे अमेरिकी पेमेंट प्लेटफॉर्मों को बाजार से बाहर कर दिया है। क्या सरकार अपने अच्छे मित्र डॉनल्ड ट्रंप के दबाव में डिजिटल भुगतान क्षेत्र को अमेरिकी कपनियों के लिए खोलना चाहती है? इस आरोप पर मंत्रालय ने कहा यह आधारहीन, पूरी तरह झूठ और गुमराह करने वाली बात है। वित्त मंत्री ने कहा कि एमडीआर का पैसा ग्राहकों से नहीं बल्कि मर्चेंट से लिया जाता है। इससे बैंक और फिनटेक कंपनियां यूपीआई की तकनीक, सुरक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर पर ज्यादा निवेश कर सकेंगी जिसका फायदा सभी यूपीआई यूज़र्स को मिलेगा। मर्चेंट ट्रांजक्शन का असर आखिरकार ग्राहकों पर पड़ सकता है? जयराम रमेश ने इसका जवाब दिया। उनका कहना है कि सरकार भले ही यह कह रही हो कि एमडीआर दुकानदार से लिया जाएगा। ग्राहक से नहीं लेकिन इसका असर आखिरकार ग्राहकों पर ही पड़ सकता है। उनका तर्क है कि दुकानदार अपनी लागत निकालने के लिए सामान की कीमत बढ़ा सकते हैं या अलग-अलग पेमेंट तरीकों के लिए अलग-अलग कीमत रख सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि मर्चेंट सिर्फ बड़े कारोबारी नहीं होते। इसमें छोटे दुकानदार, किराना स्टोर और रे पटरी वाले भी शामिल हैं। यानी अगर कोई चार्ज आया तो उसका असर छोटे कारोबारियों पर भी पड़ सकता है। यानी सरकार और विपक्ष के बीच असली सवाल यही है कि अगर भविष्य में यूपीआई और एमडीआर आता है तो उसका बोझ आखिर किस पर पड़ेगा?

प्रभासाक्षी 10 Aug 2026 2:38 pm

न्यूजलॉन्ड्री वाला अभिनंदन सेखरी करता है कर्मचारियों से दुर्व्यवहार: पूर्व इंटर्न ने बताई ‘ऑफिस के अंदर की बात’, स

न्यूजलॉन्ड्री के पूर्व इंटर्न का कहना है कि अभिनंदन सेखरी कर्मचारियों के साथ दुर्व्यवहार करते थे, लेकिन कोई विरोध नहीं कर पाता था। गालियाँ देना वहाँ आम बात थी।

ऑप इंडिया 10 Aug 2026 2:24 pm

गजब है Russia से India तक Train चलाने का प्रस्ताव, रूट मैप देखकर Modi-Putin की रणनीति के कायल हो जाएंगे

पश्चिम एशिया में जारी अस्थिरता और समुद्री व्यापार मार्गों पर बढ़ते जोखिम के बीच रूस ने भारत के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को एक नई दिशा देने वाला बड़ा प्रस्ताव सामने रखा है। रूस के उप प्रधानमंत्री मरात खुसनुलिन ने मॉस्को से हिंद महासागर तक सीधे रेल संपर्क की संभावनाएं तलाशने की बात कही है। उन्होंने कहा है कि बोस्फोरस और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे रणनीतिक समुद्री मार्गों पर बढ़ते जोखिमों को देखते हुए रूस और भारत के बीच वैकल्पिक जमीनी संपर्क विकसित करना जरूरी हो गया है। रूसी समाचार एजेंसी TASS के हवाले से खुसनुलिन ने कहा कि तुर्कमेनिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के रास्ते भारत तक पहुंचने वाले विकल्पों पर विचार किया जा सकता है और भारत तक पहुंच उपलब्ध कराने वाला कोई भी विकल्प स्वीकार्य होगा। देखा जाये तो यह प्रस्ताव केवल रेलवे लाइन बिछाने की सामान्य योजना नहीं है। इसके पीछे बदलती वैश्विक भू-राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार मार्गों की विश्वसनीयता और रूस-भारत के बीच लंबे समय से चली आ रही रणनीतिक दोस्ती का बड़ा आयाम छिपा है। खास तौर पर ऐसे समय में जब पश्चिम एशिया के संघर्ष ने दुनिया को यह दिखा दिया है कि किसी एक समुद्री चोकपॉइंट पर अत्यधिक निर्भरता वैश्विक व्यापार के लिए कितनी बड़ी कमजोरी बन सकती है। इसे भी पढ़ें: मोदी हैं कि मानते नहीं...ट्रंप 100% टैरिफ वाला बिल लाते रह गए, इधर जिगरी रूस से तेल के बाद अब क्या लाने की तैयारी में भारत? होर्मुज संकट ने बढ़ाई वैकल्पिक रास्ते की जरूरत रूस के इस प्रस्ताव को समझने के लिए मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों को देखना जरूरी है। 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल की ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के बाद पश्चिम एशिया में तनाव तेजी से बढ़ा। ईरान की जवाबी मिसाइल और ड्रोन कार्रवाइयों के बाद फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री यातायात पर गंभीर असर पड़ा। रिपोर्टों के मुताबिक होर्मुज से होकर गुजरने वाला वैश्विक तेल व्यापार का करीब पांचवां हिस्सा प्रभावित हुआ। हम आपको बता दें कि होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है और यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में शामिल है। इसी तरह तुर्किये के नियंत्रण वाला बोस्फोरस जलडमरूमध्य काला सागर को मरमारा सागर से जोड़ता है। ऐसे समुद्री ‘चोकपॉइंट’ किसी भी संकट की स्थिति में अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकते हैं। यही वजह है कि मॉस्को अब समुद्री मार्गों के साथ-साथ वैकल्पिक स्थलीय व्यापार नेटवर्क विकसित करने पर जोर दे रहा है। भारत इस योजना के केंद्र में क्यों? इस प्रस्ताव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि रूस ने संभावित रेल मार्ग के अंतिम गंतव्य के रूप में भारत को विशेष महत्व दिया है। यह संयोग नहीं है। भारत और रूस पहले से ही International North-South Transport Corridor (INSTC) के प्रमुख साझेदार हैं। लगभग 7200 किलोमीटर लंबा यह बहु-माध्यमीय कॉरिडोर रूस को ईरान और भारत से जोड़ने की महत्वाकांक्षी परियोजना है। इसमें रेल, सड़क और समुद्री परिवहन का संयोजन शामिल है। मौजूदा व्यवस्था में रूस से आने वाला माल कजाखस्तान और तुर्कमेनिस्तान होते हुए ईरान पहुंच सकता है। वहां से रेल नेटवर्क के जरिए बंदर अब्बास जैसे बंदरगाहों तक और फिर समुद्री रास्ते से भारत भेजा जा सकता है। पूर्वी शाखा में कजाखस्तान-तुर्कमेनिस्तान-ईरान मार्ग की भूमिका महत्वपूर्ण है। इस लिहाज से रूसी उप प्रधानमंत्री खुसनुलिन का प्रस्ताव बिल्कुल शून्य से शुरू होने वाली परियोजना नहीं, बल्कि मौजूदा कनेक्टिविटी ढांचे को और आगे बढ़ाने की सोच है। लक्ष्य यह हो सकता है कि आने वाले समय में रूस और भारत के बीच माल ढुलाई को ज्यादा तेज, भरोसेमंद और बहुविकल्पीय बनाया जाए। अभी ‘मॉस्को से भारत’ सीधी ट्रेन नहीं हालांकि इस खबर ने यात्रियों और रेलवे प्रेमियों की कल्पना को जरूर हवा दी है, लेकिन फिलहाल इसे मॉस्को से दिल्ली या मुंबई तक चलने वाली सीधी यात्री ट्रेन समझना जल्दबाजी होगी। अभी तक रूस या भारत की ओर से इस तरह की यात्री सेवा या पर्यटन केंद्रित ट्रेन की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। रूसी उप प्रधानमंत्री के प्रस्ताव का मूल उद्देश्य फ्रेट, लॉजिस्टिक्स और रणनीतिक कनेक्टिविटी है। वैसे भी यात्री सेवा शुरू करने में कई व्यावहारिक अड़चनें होंगी जैसे कई देशों के वीजा, अलग-अलग रेल गेज, सीमा और सुरक्षा जांच, विभिन्न देशों के रेलवे के बीच समय-सारिणी का तालमेल तथा यात्री सुविधाओं का अभाव। लेकिन भविष्य की संभावना को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता। यदि कॉरिडोर स्थिर, सुरक्षित और आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनता है तो बाद में यात्री रेल सेवा की संभावना तलाशना संभव होगा। ऐसी ट्रेन यूरेशिया के विशाल भूभाग, मध्य एशिया और ऐतिहासिक सिल्क रूट के शहरों को जोड़ने वाली असाधारण यात्रा बन सकती है। भारत के लिए बड़ा रणनीतिक लाभ वैसे रूस के इस प्रस्ताव का सबसे बड़ा फायदा भारत को कनेक्टिविटी की रणनीतिक विविधता के रूप में मिल सकता है। भारत की विदेश और आर्थिक नीति लंबे समय से यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रही है कि उसकी व्यापारिक आपूर्ति किसी एक मार्ग या एक देश पर निर्भर न रहे। इसलिए रूस से भारत तक मजबूत स्थलीय नेटवर्क बनने पर भारतीय कारोबारियों को रूसी बाजार तक पहुंच का एक वैकल्पिक रास्ता मिलेगा। इससे मशीनरी, ऊर्जा संसाधन, उर्वरक, धातु, कृषि उत्पाद और अन्य वस्तुओं की आवाजाही अधिक लचीली हो सकती है। दूसरा बड़ा लाभ समय और लागत का हो सकता है। INSTC का मूल उद्देश्य भी पारंपरिक समुद्री मार्गों की तुलना में माल परिवहन को तेज और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना है। पूर्ण रूप से विकसित नेटवर्क भारत-रूस व्यापार को नई गति दे सकता है। एक और सबसे महत्वपूर्ण लाभ ऊर्जा सुरक्षा है। होर्मुज जैसी किसी एक संवेदनशील समुद्री पट्टी पर निर्भरता कम होने से भारत वैश्विक संकटों के दौरान अपनी आपूर्ति श्रृंखला को ज्यादा प्रभावी ढंग से संभाल सकता है। पाकिस्तान वाला रास्ता सबसे कठिन कड़ी हालांकि प्रस्तावित मार्ग में पाकिस्तान का नाम आना इसे रणनीतिक रूप से बेहद दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण बनाता है। रूस ने संभावित विकल्पों में तुर्कमेनिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान का उल्लेख किया है। लेकिन भारत-पाकिस्तान संबंधों की मौजूदा जटिलताओं को देखते हुए इस रास्ते को तत्काल व्यवहार्य मानना कठिन होगा। यही कारण है कि भारत के लिए ईरान और मध्य एशिया के रास्ते विकसित होने वाले वैकल्पिक नेटवर्क अधिक व्यावहारिक महत्व रखते हैं। चीन के लिए भी बदलता समीकरण इस परियोजना का एक व्यापक भू-राजनीतिक प्रभाव चीन पर भी पड़ सकता है। चीन ने वर्षों से Belt and Road Initiative के जरिए यूरेशिया में अपनी परिवहन और आर्थिक पहुंच बढ़ाई है। इसके मुकाबले भारत-रूस समर्थित INSTC और उससे जुड़े नए रेल नेटवर्क यूरेशिया में एक वैकल्पिक आर्थिक गलियारा मजबूत कर सकते हैं। भारत को इससे यह अवसर मिलेगा कि वह चीन केंद्रित कनेक्टिविटी मॉडल के समानांतर अपना प्रभाव क्षेत्र विकसित करे। मध्य एशिया, ईरान और रूस के साथ भारत के आर्थिक संबंधों को भी इससे मजबूती मिल सकती है। रूस-भारत की दोस्ती का नया आर्थिक अध्याय सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह प्रस्ताव भारत और रूस के रिश्तों को केवल रक्षा और ऊर्जा सहयोग तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उन्हें कनेक्टिविटी और व्यापार की नई धुरी पर ले जाता है। रूस के लिए भारत हिंद महासागर तक पहुंच का महत्वपूर्ण द्वार है, जबकि भारत के लिए रूस यूरेशिया के विशाल बाजार तक पहुंच का प्रमुख साझेदार है। इसलिए दोनों देशों के हित इस परियोजना में स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे से जुड़ते हैं। देखा जाये तो बदलती दुनिया में समुद्री रास्तों पर जोखिम बढ़ रहे हैं और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं लगातार नए झटकों का सामना कर रही हैं। ऐसे में रूस का मॉस्को से हिंद महासागर तक रेल संपर्क का विचार भले ही अभी शुरुआती चरण में हो, लेकिन इसकी रणनीतिक दिशा बेहद स्पष्ट है। यानि व्यापार के लिए सिर्फ एक रास्ते पर निर्भर मत रहिए, विकल्पों का ऐसा नेटवर्क तैयार कीजिए जिसे संकट भी आसानी से बाधित न कर सके। बहरहाल, भारत के लिए यह सिर्फ रूस तक पहुंचने वाली रेल लाइन नहीं होगी। यह यूरेशिया से हिंद महासागर तक भारत की रणनीतिक पहुंच, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापारिक स्वायत्तता और वैश्विक कनेक्टिविटी को मजबूत करने वाला संभावित नया गलियारा बन सकती है। और अगर भारत-रूस की पुरानी मित्रता इस परियोजना को राजनीतिक इच्छाशक्ति और आर्थिक निवेश का आधार देती है, तो आने वाले वर्षों में यह कॉरिडोर एशिया की बदलती भू-आर्थिक तस्वीर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 10 Aug 2026 2:20 pm

हिंदी मीडियम से पढ़ाई, रेत पर रिसर्च और मशहूर वैज्ञानिक संग काम: अब भारतीय प्रोफेसर दीपक धर को मिला वो डिराक मेडल, जि

भारतीय वैज्ञानिक प्रोफेसर दीपक धर को स्टैटिस्टिकल मैकेनिक्स में योगदान के लिए 2026 का डिराक मेडल मिला, इससे पहले पद्म भूषण पा चुके हैं।

ऑप इंडिया 10 Aug 2026 2:16 pm

कॉन्ग्रेस का चहेता था रेपिस्ट तरुण तेजपाल: सोनिया गाँधी उसे बचाना चाहती थीं, कपिल सिब्बल ने दिए थे तहलका को ₹5 लाख डो

रेप के दोषी तहलका के पूर्व प्रमुख तरण तेजपाल की मदद के लिए कॉन्ग्रेस सामने आई थी। तहलका पत्रिका की शुरुआत में कपिल सिब्बल ने 5 लाख रुपए दान किए थे।

ऑप इंडिया 10 Aug 2026 1:15 pm

राजनीति से ऊपर किसान और युवा, पीएम मोदी के सामने रखेंगे महाराष्ट्र के मुद्दे : एनसीपी (एसपी) सांसद

राजनीति से ऊपर किसान और युवा, पीएम मोदी के सामने रखेंगे महाराष्ट्र के मुद्दे : एनसीपी (एसपी) सांसद

समाचार नामा 10 Aug 2026 12:23 pm

Modi-Yogi ने 'Mission 2027' को सफल बनाने के लिए कसी कमर, कई BJP MLAs के टिकट पर लटकी तलवार!

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट अब साफ सुनाई देने लगी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले सप्ताहांत दिल्ली दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन से मुलाकात कर उत्तर प्रदेश के चुनावी समीकरण और रणनीति पर चर्चा की। प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद योगी ने इसे ‘सुशासन के मार्ग पर लगातार आगे बढ़ने’ के लिए प्रेरणा देने वाला बताया, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस मुलाकात को सिर्फ शिष्टाचार भेंट के तौर पर नहीं देखा जा रहा। दिल्ली में शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात के साथ ही उत्तर प्रदेश भाजपा ने संगठन को चुनावी मोड में डालते हुए नई नियुक्तियों का ऐलान कर दिया है। पार्टी ने छह संगठनात्मक क्षेत्रों और विभिन्न मोर्चों के प्रभारियों की घोषणा की है। नई टीम में करीब 60 फीसदी नए चेहरों को जगह दी गई है। साफ है कि भाजपा अब मिशन 2027 को केवल नारों तक सीमित रखने की बजाय बूथ से लेकर विधानसभा क्षेत्र तक संगठन को सक्रिय करने की तैयारी में है। इसे भी पढ़ें: PM Modi ने 'भारत छोड़ो आंदोलन' के वीरों को किया याद, साहस को बताया हर भारतीय की प्रेरणा नई व्यवस्था में प्रदेश महामंत्री दिलीप पटेल को अवध, अभिजात मिश्रा को गोरखपुर, प्रदेश उपाध्यक्ष रमेश सिंह को काशी और गीता शाक्य को बृज क्षेत्र की जिम्मेदारी दी गई है। राम प्रताप चौहान को पश्चिम तथा शंकर लोधी को कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र का प्रभारी बनाया गया है। भाजपा ने इस बार सात की जगह आठ प्रदेश महामंत्री बनाए हैं। इसमें राजेश चौधरी को युवा मोर्चा, संजय राय को ओबीसी मोर्चा, धर्मेंद्र सिंह को अनुसूचित मोर्चा, कामेश्वर सिंह को महिला मोर्चा, प्रियंका रावत को अनुसूचित जनजाति मोर्चा, देवेश कोरी को अल्पसंख्यक मोर्चा और शंकर गिरि को किसान मोर्चे की जिम्मेदारी दी गई है। यह बदलाव महज संगठनात्मक फेरबदल नहीं माना जा रहा। भाजपा की रणनीति साफ तौर पर हर सामाजिक वर्ग और हर क्षेत्र में अपनी राजनीतिक पकड़ को चुनाव से पहले मजबूत करने की दिखाई दे रही है। मोर्चों और क्षेत्रीय समितियों के जरिए पार्टी अपने संदेश को गांव और बूथ तक पहुंचाने की तैयारी में है। नौ अगस्त से शुरू हुई तिरंगा यात्रा को भी इसी व्यापक जनसंपर्क अभियान की कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। लखनऊ में आयोजित तिरंगा यात्रा में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी ने भाजपा के चुनावी सक्रियता के संकेत और मजबूत कर दिए हैं। अब टिकट पर भाजपा का ‘परफॉर्मेंस टेस्ट’ संगठन के बाद अगला बड़ा सवाल उम्मीदवारों का है। पार्टी के भीतर विधानसभा सीटों पर संभावित उम्मीदवारों को लेकर शुरुआती मंथन आरम्भ हो चुका है। खास तौर पर मौजूदा विधायकों का रिपोर्ट कार्ड तैयार कराया जा रहा है। उनके कामकाज, क्षेत्र में सक्रियता और जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता का आकलन सर्वे के जरिए किए जाने की बात सामने आ रही है। यानी सिर्फ विधायक होना टिकट की गारंटी नहीं होगा। जिस विधायक के खिलाफ स्थानीय स्तर पर नाराजगी होगी या जिसका प्रदर्शन कमजोर माना जाएगा, उसके स्थान पर नया चेहरा उतारने का विकल्प खुला रहेगा। भाजपा इस बार युवाओं को बड़ी संख्या में मौका देने की तैयारी में बताई जा रही है और इनमें महिलाओं की भी महत्वपूर्ण हिस्सेदारी हो सकती है। यही वजह है कि आने वाले महीनों में कई मौजूदा विधायकों के टिकट पर संशय बना रह सकता है। इसी बीच भाजपा के भीतर एक और दिलचस्प सवाल उठ रहा है। एक-दो लोकसभा सांसद विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा जता रहे हैं, जबकि कुछ सांसद अपने परिजनों के लिए टिकट मांग रहे हैं। ऐसे में भाजपा के सामने परिवारवाद से खुद को दूर रखने की चुनौती भी होगी। एनडीए में सीटों का ‘गणित’ भी आसान नहीं उम्मीदवारों के साथ ही एनडीए के भीतर सीट बंटवारे का सवाल भी जल्द महत्वपूर्ण होने वाला है। भाजपा के सहयोगी दलों को मोटे तौर पर अपने संभावित हिस्से का अंदाजा पहले से है, लेकिन पिछली बार चुनाव बाद एनडीए में शामिल हुए सुभासपा प्रमुख ओम प्रकाश राजभर के साथ सीटों को लेकर औपचारिक बातचीत अहम होगी। राजभर की पार्टी पहले ही ज्यादा सीटों पर अपनी दावेदारी के संकेत देती रही है। एनडीए के दूसरे सहयोगी भी अपनी राजनीतिक ताकत के आधार पर अधिक सीटों के लिए मोलभाव करना चाह रहे हैं। ऐसे में भाजपा के सामने चुनौती यह होगी कि सहयोगियों को पर्याप्त राजनीतिक स्पेस देते हुए अपनी सीटों और संगठनात्मक वर्चस्व में संतुलन कैसे कायम रखा जाए। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन पहले ही साफ कर चुके हैं कि भाजपा 2027 का चुनाव एनडीए सहयोगियों के साथ लड़ेगी और गठबंधन को मजबूत रखते हुए सत्ता में वापसी का लक्ष्य है। योगी के चेहरे पर ही दांव सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भाजपा ने नेतृत्व को लेकर कोई भ्रम नहीं छोड़ा है। नितिन नबीन पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि 2027 के विधानसभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ ही भाजपा का चेहरा होंगे और पार्टी उनके नेतृत्व में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने के लक्ष्य के साथ मैदान में उतरेगी। यही वजह है कि योगी भी सत्ता में हैट्रिक लगाकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में नया इतिहास रचने के लिए पूरी ताकत झोंकते दिखाई दे रहे हैं। देखा जाये तो भाजपा के लिए यह चुनाव केवल सरकार बचाने की लड़ाई नहीं बल्कि योगी मॉडल को जनादेश दिलाने की परीक्षा भी है। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी लगातार पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक राजनीति के जरिए भाजपा को चुनौती देने की कोशिश कर रही है। ऐसे में भाजपा भी संगठन में ओबीसी, दलित, महिला, युवा और किसान मोर्चों को सक्रिय करके सामाजिक समीकरणों को साधने की तैयारी में है। चुनावी राजनीति जैसे-जैसे गर्म होगी, संवेदनशील मुद्दों पर भाजपा और विपक्ष के बीच टकराव भी बढ़ने के आसार हैं। नवरात्रि से बढ़ेगा ‘मोदी फैक्टर’ भाजपा की रणनीति केवल संगठन और टिकट तक सीमित नहीं रहने वाली। बताया जा रहा है कि शारदीय नवरात्रि से उत्तर प्रदेश में केंद्रीय मंत्रियों के दौरे बढ़ाए जाएंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भी राज्य में अधिक से अधिक कार्यक्रम कराने की योजना है। यानी आने वाले महीनों में यूपी भाजपा का चुनावी अभियान संगठन, सरकार और केंद्रीय नेतृत्व, तीनों मोर्चों पर एक साथ दिखाई देगा। देखा जाये तो राजनीतिक संदेश बिल्कुल स्पष्ट है कि भाजपा 2027 की लड़ाई को समय से पहले शुरू करना चाहती है। संगठन में नए चेहरों की एंट्री, विधायकों का रिपोर्ट कार्ड, संभावित टिकटों पर सर्वे, युवाओं और महिलाओं को अवसर, एनडीए में सीटों का गणित और मोदी-योगी की जोड़ी को केंद्र में रखकर अभियान, इन सभी कड़ियों को जोड़ें तो भाजपा की चुनावी रणनीति की तस्वीर सामने आती है। अब असली परीक्षा यह होगी कि भाजपा अपने संगठनात्मक अनुशासन और सामाजिक समीकरणों को कितनी कुशलता से वोट में बदल पाती है। विपक्ष की पीडीए राजनीति के सामने भाजपा का सामाजिक विस्तार कितना असरदार साबित होता है, सहयोगी दल कितनी सीटों पर संतुष्ट होते हैं और मौजूदा विधायकों में कितनों को दोबारा मौका मिलता है, इन सवालों के जवाब आने वाले महीनों में उत्तर प्रदेश की चुनावी पटकथा तय करेंगे। फिलहाल इतना तय है कि योगी के दिल्ली दौरे और भाजपा की नई संगठनात्मक नियुक्तियों के साथ उत्तर प्रदेश में मिशन-2027 की उलटी गिनती तेज हो चुकी है। अब लखनऊ से लेकर दिल्ली तक हर राजनीतिक कदम की निगाह 2027 के लखनऊ पर होगी। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 10 Aug 2026 11:44 am

ममता बनर्जी के काफिले पर हमले के बाद सियासत गरम, शुभेंदु अधिकारी बोले- ‘वहां BJP का कोई नहीं था’

ममता बनर्जी के हलीशहर दौरे के दौरान काफिले के विरोध के बाद बंगाल की राजनीति गरमा गई। शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि मौके पर BJP का कोई कार्यकर्ता नहीं था।

देशबन्धु 10 Aug 2026 9:40 am

लोकसभा स्पीकर सहित कई नेताओं ने पूर्व राष्ट्रपति डॉ. वी.वी. गिरि की जयंती पर अर्पित की श्रद्धांजलि

लोकसभा स्पीकर सहित कई नेताओं ने पूर्व राष्ट्रपति डॉ. वी.वी. गिरि की जयंती पर अर्पित की श्रद्धांजलि

समाचार नामा 10 Aug 2026 8:31 am

दिल्ली विधानसभा में आज दूसरी बैठक: मानसून सत्र का अहम दिन

दिल्ली विधानसभा के आठवें सत्र के छठे सेशन की दूसरी बैठक सोमवार को होगी। इसमें मानसून सत्र के लिए बिजनेस एडवाइजरी कमिटी द्वारा मंजूर किए गए तीन बिलों में से कुछ बिल पेश किए जा सकते हैं।

देशबन्धु 10 Aug 2026 7:40 am

छात्र आंदोलन : आज विधानसभा घेराव, रांची में जुटने छात्र

झारखंड में भर्ती परीक्षाओं में कथित धांधली और पेपर लीक के खिलाफ चल रहे छात्र आंदोलन के बीच छात्रों ने 10 अगस्त को विधानसभा घेराव का ऐलान किया गया है

देशबन्धु 10 Aug 2026 7:00 am

झारखंड: परीक्षा अनियमितताओं की सीआईडी ​​जांच के बीच 3 जेपीएससी सदस्यों ने इस्तीफा दिया

झारखंड: परीक्षा अनियमितताओं की सीआईडी जांच के बीच 3 जेपीएससी सदस्यों ने इस्तीफा दिया

समाचार नामा 9 Aug 2026 10:24 pm

भाजपा मुद्दों से ध्यान भटका रही, पीडीए की बढ़ती ताकत से घबराई सरकार: अवधेश प्रसाद

भाजपा मुद्दों से ध्यान भटका रही, पीडीए की बढ़ती ताकत से घबराई सरकार: अवधेश प्रसाद

समाचार नामा 9 Aug 2026 10:23 pm

तमिलनाडु: कार्ति चिदंबरम ने लोकसभा सीटों में वृद्धि के खिलाफ चेतावनी दी

तमिलनाडु: कार्ति चिदंबरम ने लोकसभा सीटों में वृद्धि के खिलाफ चेतावनी दी

समाचार नामा 9 Aug 2026 10:19 pm

पंजाब बीजेपी प्रमुख बोले-'विधानसभा चुनावों की रणनीति बनाने के लिए नितिन नवीन के साथ हुई बैठक'

पंजाब बीजेपी प्रमुख बोले-'विधानसभा चुनावों की रणनीति बनाने के लिए नितिन नवीन के साथ हुई बैठक'

समाचार नामा 9 Aug 2026 8:16 pm

भारत छोड़ो दिवस: सांसद बांसुरी स्वराज और भाजपा नेताओं ने स्वतंत्रता सेनानियों व शहीदों को दी श्रद्धांजलि

भारत छोड़ो दिवस: सांसद बांसुरी स्वराज और भाजपा नेताओं ने स्वतंत्रता सेनानियों व शहीदों को दी श्रद्धांजलि

समाचार नामा 9 Aug 2026 7:26 pm

पार्टी सांसदों के पीएम मोदी से मुलाकात पर नसीम सिद्दीकी बोले- शरद पवार सेक्युलर नेता, एनडीए में नहीं होंगे शामिल

पार्टी सांसदों के पीएम मोदी से मुलाकात पर नसीम सिद्दीकी बोले- शरद पवार सेक्युलर नेता, एनडीए में नहीं होंगे शामिल

समाचार नामा 9 Aug 2026 6:23 pm

‘आपको जवाब देना होगा’, छात्रों पर पुलिस कार्रवाई को लेकर राहुल गांधी का पीएम मोदी और अमित शाह पर हमला

राहुल गांधी ने छात्रों पर 20 जुलाई की पुलिस कार्रवाई को लेकर पीएम मोदी और अमित शाह पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि सरकार को छात्रों के मुद्दे पर जवाब देना होगा।

देशबन्धु 9 Aug 2026 5:30 pm

युवाओं को गुमराह करने और बेरोजगारी के लिए राहुल गांधी और कांग्रेस जिम्मेदारः रामकृपाल यादव

युवाओं को गुमराह करने और बेरोजगारी के लिए राहुल गांधी और कांग्रेस जिम्मेदारः रामकृपाल यादव

समाचार नामा 9 Aug 2026 4:35 pm

त्रिपुरा विलेज कमेटी चुनावों के लिए आदिवासी सहयोगियों के साथ चुनावी रणनीति बनाएगी भाजपा

त्रिपुरा विलेज कमेटी चुनावों के लिए आदिवासी सहयोगियों के साथ चुनावी रणनीति बनाएगी भाजपा

समाचार नामा 9 Aug 2026 4:30 pm

परिसीमन से सीमावर्ती राज्यों को हो सकता है नुकसान, गंभीरता से समीक्षा होनी चाहिए: मनीष तिवारी

परिसीमन से सीमावर्ती राज्यों को हो सकता है नुकसान, गंभीरता से समीक्षा होनी चाहिए: मनीष तिवारी

समाचार नामा 9 Aug 2026 2:27 pm

पश्चिम बंगाल के सभी सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में आरजी कर पीड़िता की याद में रखा गया 2 मिनट का मौन

पश्चिम बंगाल के सभी सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में आरजी कर पीड़िता की याद में रखा गया 2 मिनट का मौन

समाचार नामा 9 Aug 2026 2:23 pm

तमिलनाडु के मंत्री निर्मल कुमार की अपील, परिसीमन के खिलाफ सभी पार्टी हों एकजुट

तमिलनाडु के मंत्री निर्मल कुमार की अपील, परिसीमन के खिलाफ सभी पार्टी हों एकजुट

समाचार नामा 9 Aug 2026 1:36 pm

पीएम मोदी ने 'भारत छोड़ो आंदोलन' के नायकों को किया याद, बोले- 'उनका साहस हमेशा बना रहेगा भारतीयों के लिए प्रेरणा'

पीएम मोदी ने 'भारत छोड़ो आंदोलन' के नायकों को किया याद, बोले- 'उनका साहस हमेशा बना रहेगा भारतीयों के लिए प्रेरणा'

समाचार नामा 9 Aug 2026 8:25 am

Chhatron Ki Goonj क्या वोटों की गूंज में परिवर्तित होगी? पर-नाना नेहरू और दादा फिरोज की धरती Prayagraj से Rahul Gandhi कितना असर छोड़ पाये?

राहुल गांधी का प्रयागराज आकर छात्रों से संवाद करना अपने आप में कोई असामान्य राजनीतिक घटना नहीं है। लोकतंत्र में विपक्ष के नेता का युवाओं के बीच जाना, उनकी समस्याएं सुनना और सरकार से सवाल पूछना बिल्कुल स्वाभाविक है। लेकिन राजनीति में किसी कार्यक्रम का समाचार बन जाना और उसका चुनावी प्रभाव पैदा करना, ये दो बिल्कुल अलग बातें हैं। यही अंतर उत्तर प्रदेश की राजनीति के संदर्भ में राहुल गांधी के प्रयागराज कार्यक्रम ‘छात्रों की गूंज’ को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। कांग्रेस ने इस कार्यक्रम को पेपर लीक, बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं और युवाओं की समस्याओं के खिलाफ एक बड़े अभियान के रूप में पेश किया है। प्रयागराज का चयन भी प्रतीकात्मक है, क्योंकि यह देश के प्रमुख शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षा केंद्रों में गिना जाता है। कांग्रेस का दावा है कि वह छात्रों की आवाज को राष्ट्रीय स्तर पर उठाना चाहती है। लेकिन यहां पहला राजनीतिक सवाल खड़ा होता है कि क्या प्रयागराज में छात्रों की एक बड़ी सभा को पूरे उत्तर प्रदेश के युवा मतदाताओं के राजनीतिक रुझान का संकेत मान लिया जाए? इसे भी पढ़ें: संसदीय-गतिरोध से नहीं चलेगा लोकतंत्र, संवाद ही है समाधान देखा जाये तो राजनीति में भीड़ और वोट के बीच संगठन नाम की एक चीज होती है। किसी नेता के कार्यक्रम में हजारों लोग आ सकते हैं, सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हो सकते हैं और मीडिया में कई घंटे तक बहस हो सकती है, लेकिन विधानसभा चुनाव 403 सीटों पर लड़ा जाता है। वहां उम्मीदवार चाहिए, स्थानीय नेतृत्व चाहिए, बूथ स्तर का संगठन चाहिए, चुनाव प्रबंधन चाहिए और सबसे महत्वपूर्ण, ऐसा स्थायी मतदाता आधार चाहिए जो मतदान के दिन पार्टी के साथ खड़ा हो। यहीं कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती दिखाई देती है। हम आपको याद दिला दें कि 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को केवल दो सीटें मिली थीं और उसका वोट शेयर लगभग 2.33 प्रतिशत रहा था। यह आंकड़ा किसी सामान्य चुनावी उतार-चढ़ाव का नहीं, बल्कि राज्य में कांग्रेस के संगठनात्मक पतन का संकेत था। हां, 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में उल्लेखनीय वापसी की। कांग्रेस ने छह लोकसभा सीटें जीतीं और उसका प्रदर्शन 2022 की तुलना में स्पष्ट रूप से बेहतर हुआ। लेकिन इस सफलता का कारण समाजवादी पार्टी का कांग्रेस के साथ INDIA गठबंधन में शामिल होना था। दोनों दलों ने मिलकर चुनाव लड़ा और विपक्षी वोटों का एक बड़ा हिस्सा एकजुट हुआ। इसलिए 2024 के परिणाम को सीधे-सीधे कांग्रेस के स्वतंत्र उत्तर प्रदेश जनाधार का प्रमाण मानना राजनीतिक रूप से जल्दबाजी होगी। और यही सवाल 2027 के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। अगर कांग्रेस वास्तव में उत्तर प्रदेश में अपने दम पर इतनी मजबूत हो चुकी है, तो फिर उसके अपने ही सांसदों और नेताओं को समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन जल्द तय करने की जरूरत क्यों महसूस हो रही है? अभी एक दिन पहले ही तमाम समाचार रिपोर्टों में कांग्रेस के उत्तर प्रदेश के सांसदों द्वारा 2027 के चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन को जल्द अंतिम रूप देने की मांग सामने आई है। साथ ही, प्रदेश कांग्रेस के भीतर गठबंधन को लेकर मतभेदों की खबरें भी आती रही हैं। इसलिए राहुल गांधी से एक सीधा सवाल पूछा जा सकता है कि अगर कांग्रेस का अपना जनाधार इतना मजबूत है, तो 2027 में उसे समाजवादी पार्टी के सहारे की जरूरत क्यों है? वैसे यह सवाल गठबंधन के खिलाफ नहीं है। गठबंधन लोकतांत्रिक राजनीति का सामान्य हिस्सा है। लेकिन तब 2024 की सफलता को कांग्रेस की अकेले की ताकत बताना भी उचित नहीं होगा। यदि सफलता गठबंधन की संयुक्त ताकत से आई है, तो उसका श्रेय भी ईमानदारी से साझा करना होगा। यही कारण है कि प्रयागराज का ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन इसे 2027 के चुनाव की दिशा बदल देने वाला कार्यक्रम मानने के लिए अभी बहुत कुछ साबित होना बाकी है। कांग्रेस को यह बताना होगा कि प्रयागराज की सभा के बाद वह कितने छात्रों को अपने साथ जोड़ पाती है। कितने जिलों में उसका छात्र संगठन सक्रिय है? कितने विधानसभा क्षेत्रों में उसका मजबूत स्थानीय संगठन है? कितनी सीटों पर वह अपने दम पर चुनाव लड़ने की वास्तविक स्थिति में है? और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि क्या छात्रों के मुद्दे को लेकर उसका अभियान चुनाव तक लगातार जमीन पर दिखाई देगा या यह भी दूसरे राजनीतिक अभियानों की तरह कुछ दिनों की सुर्खियों तक सीमित रह जाएगा? साथ ही कांग्रेस को यह भी बताना चाहिए कि राहुल गांधी अब तक छात्रों की गूंज के जितने कार्यक्रम कर चुके हैं उसमें उमड़ी भीड़ में से कितने लोगों ने कांग्रेस की सदस्यता ली? यहां एक और महत्वपूर्ण बात है। कांग्रेस के लिए युवाओं और छात्रों का मुद्दा उठाना राजनीतिक रूप से स्वाभाविक है, लेकिन केवल सरकार की आलोचना करने से कोई पार्टी युवाओं का स्थायी राजनीतिक विकल्प नहीं बन जाती। छात्रों को भाषण नहीं, समाधान चाहिए। उन्हें समय पर परीक्षा चाहिए, पारदर्शी भर्ती चाहिए, पेपर लीक से सुरक्षा चाहिए, परिणाम और नियुक्ति में अनावश्यक देरी से मुक्ति चाहिए और ऐसी शिक्षा चाहिए जो उन्हें रोजगार के योग्य बनाए। इसलिए कांग्रेस से सवाल है कि वह केवल यह नहीं बताए कि सरकार ने क्या गलत किया, बल्कि यह भी बताए कि कांग्रेस सत्ता में होती तो क्या अलग करती? कांग्रेस को सिर्फ सरकार की आलोचना करने की बजाय बताना चाहिए कि पेपर लीक रोकने के लिए उसका मॉडल क्या है? परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही कैसे तय होगी? भर्ती कैलेंडर को कानूनी या प्रशासनिक रूप से कैसे सुनिश्चित किया जाएगा? परीक्षा और परिणाम के बीच समय सीमा क्या होगी? और अगर किसी परीक्षा में अनियमितता साबित होती है तो छात्रों के नुकसान की भरपाई का उसका मॉडल क्या होगा? इसके अलावा, सरकार पर सवालों की बौछार कर रही कांग्रेस से भी उसकी ऐतिहासिक राजनीतिक जिम्मेदारी पर सवाल पूछा जाना चाहिए। देश और उत्तर प्रदेश में लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली पार्टी आज शिक्षा व्यवस्था की हर समस्या पर इस तरह बोल नहीं सकती जैसे उसका इस व्यवस्था के निर्माण और उसकी कमियों से कोई संबंध ही नहीं रहा। इसलिए असली सवाल यह है कि “कांग्रेस ने दशकों तक देश और उत्तर प्रदेश में शासन किया। अगर आज शिक्षा व्यवस्था में इतनी गंभीर कमियां हैं, तो क्या कांग्रेस अपने लंबे शासन की ऐतिहासिक जिम्मेदारी स्वीकार करती है?” कांग्रेस से यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि “अगर उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह विफल है, जैसा कांग्रेस अपने राजनीतिक अभियान में बताती है, तो स्वतंत्र ASER के आंकड़ों में पिछले वर्षों में कई बुनियादी learning outcomes में सुधार कैसे दिखाई दे रहा है?” देखा जाये तो प्रयागराज में राहुल गांधी का कार्यक्रम इसलिए राजनीतिक रूप से दिलचस्प है क्योंकि यह केवल छात्र संवाद नहीं है। कांग्रेस स्वयं इसे 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले युवाओं के बीच अपनी जगह बनाने के प्रयास के रूप में देख रही है। लेकिन कांग्रेस के लिए चुनौती यह है कि छात्र और युवा मतदाता एकसमान राजनीतिक समूह नहीं हैं। किसी परीक्षा में पेपर लीक से नाराज छात्र जरूरी नहीं कि उसी कारण से विधानसभा चुनाव में किसी खास पार्टी को वोट दे। बेरोजगारी एक बड़ा मुद्दा हो सकती है, लेकिन उसके साथ कानून-व्यवस्था, जातीय समीकरण, कल्याणकारी योजनाएं, स्थानीय उम्मीदवार, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की लोकप्रियता, महिला मतदाता, किसान और क्षेत्रीय मुद्दे भी चुनावी व्यवहार को प्रभावित करते हैं। इसलिए ‘छात्रों की गूंज’ को 2027 के चुनाव का निर्णायक संकेत मान लेना जल्दबाजी होगी। हम आपको यह भी याद दिला दें कि दो-तीन महीने पहले कांग्रेस ने रायबरेली में भी एक बड़ी जनसभा की थी और उसमें राहुल गांधी ने बड़ी हुंकार भरी थी लेकिन क्या उससे यूपी में कोई राजनीतिक समीकरण बना या बिगड़ा? राहुल गांधी का प्रयागराज कार्यक्रम कांग्रेस को मीडिया की सुर्खियां दे सकता है। छात्रों के बीच राजनीतिक चर्चा पैदा कर सकता है। सरकार पर दबाव भी बना सकता है। लेकिन इससे अपने आप यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि इससे उत्तर प्रदेश का चुनावी गणित बदल गया है। 2027 का उत्तर प्रदेश चुनाव किसी एक सभा, किसी एक भाषण या किसी एक नेता की लोकप्रियता से तय नहीं होगा। वह बूथ पर तय होगा, विधानसभा क्षेत्र के सामाजिक समीकरणों पर तय होगा, स्थानीय उम्मीदवारों की स्वीकार्यता पर तय होगा और सबसे बढ़कर इस बात पर तय होगा कि कौन-सा गठबंधन किस वोट को वास्तविक मतदान में बदल पाता है। इसलिए मुद्दा यह नहीं है कि “प्रयागराज के कार्यक्रम का क्या राजनीतिक असर होगा?” मुद्दा यह है कि 403 विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस का संगठन कितना बड़ा है? और कांग्रेस के पास शिक्षा और रोजगार से जुड़ी समस्याओं का अपना ठोस व समयबद्ध समाधान क्या है? साथ ही प्रयागराज के चयन को केवल छात्रों के मुद्दे तक सीमित करके देखना भी शायद पूरी तस्वीर नहीं होगी। इसके पीछे पूर्वांचल की राजनीति में कांग्रेस की अपनी पुरानी राजनीतिक स्मृतियों को फिर से सक्रिय करने और उस भूगोल में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश भी देखी जा सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 2014 में वाराणसी को अपनी संसदीय राजनीति का प्रमुख आधार बनाया था और उसके बाद पूर्वांचल राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आया। वाराणसी और प्रयागराज स्टेशनों के बीच मात्र एक जंक्शन की दूरी है। ऐसे में प्रयागराज का चयन पूर्वांचल के राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र में एक प्रतीकात्मक जवाब देने की कोशिश के रूप में भी देखा जा सकता है। एक तरफ मोदी का वाराणसी, दूसरी तरफ नेहरू-गांधी परिवार की इलाहाबाद-प्रयागराज की ऐतिहासिक स्मृति। साथ ही यह संयोग भी महत्वपूर्ण है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने इलाहाबाद सीट 40 साल बाद वापस जीती थी। कांग्रेस के उज्ज्वल रमण सिंह ने भाजपा के नीरज त्रिपाठी को 58,795 मतों से हराया था और 1984 में अमिताभ बच्चन की जीत के बाद पहली बार कांग्रेस इस सीट पर लौटी। उल्लेखनीय है कि जवाहरलाल नेहरू इलाहाबाद की फूलपुर संसदीय सीट से चुनाव लड़ते थे। इसके साथ ही प्रयागराज में नेहरू परिवार से जुड़ी स्मृतियां जैसे कि आनंद भवन और स्वराज भवन आदि हैं और राहुल गांधी के दादा फिरोज जहांगीर गांधी की कब्र भी यहीं है। बहरहाल, प्रयागराज के सफल कार्यक्रम के बाद अब सवाल यह है कि क्या यह विरासत आज के युवा मतदाता को उसी तरह राजनीतिक रूप से आंदोलित कर सकती है जैसे वह कांग्रेस के पुराने दौर में करती थी? -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 8 Aug 2026 9:00 pm

महिला आरक्षण पर बदले सियासी समीकरण! इस विपक्षी पार्टी ने किया BJP का समर्थन, रिजिजू ने कही बड़ी बात

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समाचार नामा 8 Aug 2026 8:36 pm

2027 के चुनाव में सपा के साथ रहेंगे, अखिलेश यादव बनेंगे मुख्यमंत्री: बाबू सिंह कुशवाहा

2027 के चुनाव में सपा के साथ रहेंगे, अखिलेश यादव बनेंगे मुख्यमंत्री: बाबू सिंह कुशवाहा

समाचार नामा 8 Aug 2026 8:19 pm

नशे के विरुद्ध एक अभियान

देश को नक्सलवाद-माओवाद के आतंक से मुक्ति दिलाने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने दो नये अहम अभियान प्रारंभ किये हैं- पहला, भारत को घुसपैठियों से मुक्त करना तथा दूसरा है, युवाओं को नशे की लत से मुक्ति दिलाना। भारत के किशोरों तथा युवाओं को हर प्रकार के नशे से मुक्ति दिलाने के लिए 2 अगस्त 2026 को प्रधानमंत्री मोदी ने “नशा मुक्त युवा, विकसित भारत संकल्प अभियान“ का प्रारंभ करते हुए एक वीडियो संदेश जारी किया है। अपने सन्देश में प्रधानमंत्री मोदी ने कहाकि जो युवा नशे से लड़कर बाहर निकलते हैं वे कमजोर नहीं, बल्कि असली योद्धा होते हैं। समाज को उनका सम्मान करना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि भारत में ड्रग्स की सप्लाई दुश्मन देशों की आतंकी साजिश का ही एक हिस्सा है। दुश्मन देश भारतीय युवाओं को नशे के जाल में धकेलना चाहते हैं ताकि भारत कभी भी एक सशक्त एवं विकसित देश के रूप में स्थापित न हो सके। इस साजिश को हम सबको मिलकर नाकाम करना होगा। विकसित भारत का लक्ष्य तभी पूरा होगा जब देश का युवा शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होने के साथ ही नशे से भी दूर रहेगा। अगले 100 सप्ताह तक हर रविवार को कला, संस्कृति, खेल और अन्य गतिविधियों के माध्यम से नशामुक्ति का संदेश देश भर में पहुंचाया जाएगा। नशे की लत युवाओं के सपनों और परिवार दोनों को ही तोड़ देती है। नशा केवल व्यक्ति या परिवार को ही नहीं बल्कि राष्ट्र की ताकत को भी कमजोर करता है। इसे भी पढ़ें: संसदीय-गतिरोध से नहीं चलेगा लोकतंत्र, संवाद ही है समाधान इस अभियान का उद्देश्य युवाओं को नशे से दूर रहने के लिए प्रेरित करना और उन्हें अपने समाज में बदलाव लाने के लिए आगे बढ़ाना है। प्रत्येक रविवार को देशभर में अलग-अलग कार्यक्रम होंगे जिसमें वॉकाथन और दौड़, खेल प्रतियोगिताएं,योग और ध्यान सत्र, सांस्कृतिक कार्यक्रम, नुक्कड़ नाटक, नशा विरोधी जागरूकता अभियान, चर्चा और संवाद कार्यक्रम, पेंटिग्स व आर्ट्स प्रतियोगिताएं तथा सामुदायिक सहभागिता कार्यक्रम आयोजित किये जाएंगे। यह अभियन 125 से अधिक आध्यात्मिक,सामाजिक तथा सरकारी संगठनों के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है। ब्रहमकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय, आर्ट ऑफ़ लिविंग, गायत्री परिवार, इस्कॉन से लेकर माताअमृतानंदमयी मठ जैसे संगठन इस अभियान से जुड़ कर कार्य कर रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का वैचारिक संगठन विश्व हिंदू परिषद पहले से ही व्यापक स्तर पर नशामुक्ति अभियान चला रहा है। युवाओं में नशे के विरुद्ध जागरूकता लाने के साथ ही गृहमंत्री अमित शाह ने भी नशे की जड़ों पर प्रहार करने का युद्ध छेड़ रखा हैं। ड्रग्स माफियाओं पर कार्रवाई कई गुना बढ़ गई है। तस्करी करके बड़ी मात्रा में विदेशों से आने वाली ड्रग्स की जब्ती बंदरगाहों तथा एयरपोर्ट्स की जा रही है और उसे नष्ट किया जा रहा है। वर्ष 2021 में 2988 किलो हेरेाइन, 2022 में 927 किलो गांजा, 2023 में 122 किलो मेफेड्रोन, 2024 में 770 किलो मेथाफाटेमाइन और 2026 में फिर 522 किलो गांजा बरामद किया जा चुका है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के अनुसार 2020 से मई 2025 तक तक 116 बड़े मामलों में कार्रवाई करते हुए 1,09,318 किलोग्राम नशीले पदार्थ जब्त किए गए हैं और उनको नष्ट किया गया है। वर्तामन समय में नशे का सबसे बड़ा केन्द्र पंजाब तथा पूर्वोत्तर के कई छोटे राज्य हैं। विदेशी आतंकी संगठनों द्वारा जम्मू-कश्मीर व पूर्वोत्तर के युवाओं को नशे की लत में धकेलने का प्रयास लगातार किया जा रहा है हैं। अपने कुत्सित प्रयासों को सफल बनाने के लिये ये लोग स्थानीय स्तर के अपराधियों व बिगडैल युवाओं का सहारा लेते हैं। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पंजाब में नशे के संकट पर चिंता जताते हुए कहा था कि नशा राज्य के अस्तित्व पर खतरा बन सकता है। संगठित गिरोहों की जांच में पुलिस प्रशासन के साथ ही अदालत को भी सतर्क रहना होगा। भारत में ड्रग्स की खेप कई रास्तों से आती है। बांग्लादेश-पाकिस्तान तथा नेपाल सीमा से ड्रग्स आसानी से आ-जा रहा है। गुजरात के समुद्री तट से भी नशे का कारोबार कंटेनर और समुद्री मार्ग से चलता आ रहा है हालांकि, सरकार के प्रयासों से कुछ रोकथाम हुई है किंतु खतरा बरकरार है। म्यामांर से भी ड्रग्स की तस्करी हो रही है। यही नहीं छोटे-छोटे देश मलेशिया, सिंगापुर, थाईलैंड, मालदीव, हांगकांग सहित तमाम देशों से ड्रग्स की सप्लाई अनेक प्रकार से हो रही है। पाक परस्त आतंकी संगठन ड्रोन आदि के माध्यम से सीमावर्ती क्षेत्रों में ड्रग्स, हथियार व धन को गिराते रहते हैं। इस प्रकार नशे की सप्लाई अनेक तरीकों से होती है और उन्हें भारत के किशोरों तथा युवाओं तक विभिन्न तरीकों से पहुंचाया जाता है। वर्ष 2025 में एम्स के सर्वे में पाया गया कि 11 से 14 वर्ष की उम्र में ही किशोर नशीले पदार्थों के संपर्क मे आ गए थे। इन विषम परिस्थितियों को देखते हुए यह वृहद अभियान प्रारंभ किया गया है। नशे से आतंकवाद को पनपने में बहुत मदद मिलाती है इसलिए, यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन के बाद 28 हजार से अधिक स्थानों पर एक करोड़ से अधिक युवाओं ने भाग लिया और एक साथ नशा मुक्त भारत की शपथ ली। नशामुक्ति का यह अभियान राजनीति से दूर रहकर चलना चाहिए तभी भारत के किशोर, युवा और परिवार तथा बहन-बेटियां सुरक्षित जीवन जी सकेंगी और वर्ष-2047 तक भारत विकसित भारत बनकर उभर सकेगा। - मृत्युंजय दीक्षित

प्रभासाक्षी 8 Aug 2026 4:35 pm

राघव चड्ढा की पीएम मोदी से मुलाकात, पंजाब चुनाव से पहले मिलेगी बड़ी जिम्मेदारी? बढ़ी सियासी हलचल

राघव चड्ढा ने पीएम मोदी से मुलाकात की और तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा कीं। पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले उनकी संभावित बड़ी भूमिका को लेकर सियासी अटकलें तेज हैं।

देशबन्धु 8 Aug 2026 4:17 pm

शिवभक्तों की कांवड़ यात्रा को सकुशल संपन्न करवाना बहुत बड़ी चुनौती!

देवाधिदेव भगवान महादेव के प्रिय श्रावण मास में मां गंगा के जल से अपने आराध्य भगवान भोलेनाथ के जलाभिषेक के लिए दिल्ली और आसपास स्थित विभिन्न राज्यों के शिवभक्तों का उत्तराखंड से कांवड़ लाने के लिए अब तांता लगना शुरू हो गया है। इस बार तो कांवड़ यात्रा के शुरुआती दिनों में ही शिवभक्तों की भारी भीड़ सड़कों पर नज़र आने लगी है। कांवड यात्रा के मद्देनजर ही उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश के विभिन्न जनपदों, दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान आदि में शिवभक्तों की सुरक्षा के सिस्टम ने बेहद ही चाक-चौबंद व्यवस्था की है। शिवभक्तों के लिए रेलवे, परिवहन, विधुत विभाग आदि ने भी विशेष तैयारियां की हैं। सिस्टम ने पवित्र श्रावण मास में देवाधिदेव भगवान महादेव के करोड़ों शिवभक्तों को शांतिपूर्ण व भक्तिमय वातावरण में सकुशल कांवड़ यात्रा करवाने के लिए सुरक्षा, भोजन, पेयजल, चिकित्सा आदि व्यवस्था की बड़े पैमाने पर तैयारियां की है। कांवड़ यात्रा को सकुशल संपन्न करवाने के लिए उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा व राजस्थान आदि का पुलिस-प्रशासन दिन-रात एक करके अपने पूरे दल-बल के साथ सड़कों पर उतरकर के धरातल पर व्यवस्था बनाने में जुटा हुआ है। हालांकि पुलिस-प्रशासन को इस वर्ष कांवड़ियों की संख्या में भारी इज़ाफ़ा होने की उम्मीद है। ऐसी स्थिति में विशेषकर उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश के पुलिस-प्रशासन के ऊपर पर एक तरफ तो कांवड़ियों के लिए विभिन्न आवश्यक व्यवस्था बनाने की चुनौती है, वहीं दूसरी तरफ़ चाक-चौबंद सुरक्षा व्यवस्था करने कि अहम जिम्मेदारी है। वैसे भी उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव का वर्ष होने के चलते वहां के सिस्टम के सामने भगवान शिव की भक्ति के वातावरण को बनाएं रखने की बड़ी चुनौती खड़ी है। हालांकि यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देशों पर सिस्टम के द्वारा जिस तरह से उत्तर प्रदेश में शिवभक्त कांवड़ियों का सेवाभाव के साथ पलक-पांवड़े बिछाकर के स्वागत किया जाता है और कांवड़ियों को किसी प्रकार की कोई असुविधा ना हो इसका विशेष ध्यान रखा जाता है, इस स्थिति ने पिछले कई सालों से शिवभक्त कांवड़ियों की संख्या में भारी इज़ाफ़ा करने का कार्य कर दिया है। जिसके चलते कांवड़ियों की सुरक्षा के लिए धरातल पर एक बेहद फुलप्रूफ व्यवस्था बनाते हुए चाक-चौबंद व्यवस्था करना चुनौती पूर्ण कार्य बन गया है। हर वर्ष की तरह ही कांवड़ यात्रा में पुलिस-प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह लाखों शिवभक्तों के बीच छिपे हुए चंद अराजकता फैलाने वाले हुड़दंगियों व नशेड़ियों की कैसे पहचान करें। हालांकि उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड के पुलिस-प्रशासन के पास भक्तों की भारी भीड़ को नियंत्रण करने व उनके लिए समुचित व्यवस्था करने का दशकों पुराना लंबा अनुभव है, जिस अनुभव के ही बलबूते पर ही इन राज्यों का सरकारी अमला हर वर्ष ऐसे मेलों में उत्पन्न विकट से भी विकट परिस्थितियों से भी आसानी से निपट लेता है। लेकिन इस बार तो शुरूआती दिनों से ही शिवभक्त कांवड़ियों की भारी भीड़ उमड़ती नज़र आ रही है, बड़ी संख्या में ही कांवड़िए मां गंगा का दिव्य जल लेकर के अपने गंतव्य स्थल की तरफ़ वापस चल दिए और एक-एक दिन के साथ ही शिवभक्त कांवड़ियों की यह संख्या तेज़ी से बढ़ती जा रही है। वहीं उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में कुछ हुड़दंगियों के द्वारा बवाल किये जाने की भी घटनाएं भी सामने आने लगी हैं। जिसके चलते ही उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश में शुरूआती दौर के दिनों में ही कांवड़ यात्रा मार्ग के अधिकांश रास्तों पर ट्रैफिक डायवर्ट करते हुए बहुत सारी जगहों पर ट्रैफिक को वन-वे तक भी करना पड़ गया है, हालांकि ऐसा करने से लोगों को काफ़ी असुविधा भी हो रही है, लेकिन पुलिस-प्रशासन के पास इसके अलावा कोई विकल्प अभी तो मौजूद नहीं है। इसे भी पढ़ें: मेरठ में CM Yogi ने कांवड़ियों पर बरसाए फूल, बोले- 4 से 5 करोड़ शिव भक्तों के आने की उम्मीद वैसे भी हमारे प्यारे देश में जिस तरह का माहौल चल रहा है, उस स्थिति में शिवभक्त कांवड़ियों की सुरक्षा की पूरी व्यवस्था को चाक-चौबंद करने के लिए ट्रैफिक डायवर्ट व वन-वे करने की यह व्यवस्था सिस्टम का बेहद जरूरी कदम है। इसलिए ही उत्तराखंड से लेकर के कांवड़ यात्रा के पूरे मार्ग पर अब चप्पे-चप्पे पर होमगार्ड, ट्रैफिक पुलिस, पुलिस, पीएसी, आरएएफ, एटीएस आदि तक का बेहद ही सख्त पहरा नज़र आने लग गया है। गंगा घाटों पर एनडीआरएफ, एसडीआरएफ व गोताखोरों की टीम दल-बल के साथ तैनात हैं, कांवड़ यात्रा मार्ग पर जगह-जगह अग्निशमन विभाग के जांबाजों, जिला प्रशासन की टीम, चिकित्सा विभाग की टीम, नगर निगम, नगर पालिका परिषद जिला पंचायत व ग्राम पंचायत आदि के कर्मचारियों, अधिकारियों ने चौबीस घंटे मोर्चा संभाल रखा है। वहीं पुलिस-प्रशासन के आला अधिकारी स्वयं पूरी टीम के साथ सड़कों पर उतरे हुए हैं और हर व्यवस्था को स्वयं परखने का कार्य कर रहे हैं। कांवड़ यात्रा मार्ग पर किसी भी तरह का कोई भी विवाद खड़ा होने पर पुलिस-प्रशासन तुरंत सूझबूझ से मामले को शांत कराते हुए, दोषियों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्यवाही करते हुए माहौल को सामान्य करने का कार्य बखूबी कर रहा है। सरकार व सिस्टम कांवड़ यात्रा के दौरान किसी भी तरह की कोई लापरवाही व कोई भी चूक बिल्कुल भी नहीं चाहता है। बेहतर व्यवस्था बनाने के लिए सख्ती का आलम यह हो गया है कि गाजियाबाद तक में भी 29 जुलाई से ही भारी वाहनों के लिए कांवड़ यात्रा मार्ग को बंद करते हुए रास्ते के बहुत सारे कट बंद कर दिए है और कांवड़ियों की सुरक्षा के लिए रास्ते वन-वे करने की युद्ध स्तर पर तैयारियां चल रही हैं। वैसे कांवड़ यात्रा के दौरान हर वर्ष ही क्षेत्रवासियों को असुविधाओं का सामना करना पड़ता है। लेकिन अलग कांवड़ यात्रा मार्ग ना होने से पुलिस-प्रशासन के पास कम से कम फिलहाल तो अन्य कोई विकल्प उपलब्ध नहीं है। कांवड़ यात्रा में सुरक्षा व्यवस्था का आलम देखें तो गाजियाबाद जनपद में ही, पुलिस कमिश्नर जे. रविंद्र गौड़, जिलाधिकारी रविंद्र कुमार मांदड, नगरायुक्त विक्रमादित्य सिंह मलिक, मुख्य अग्निशमन अधिकारी राहुल पाल व अन्य सभी आवश्यक विभागों के मुखिया अपनी पूरी टीम के साथ चौबीसों घंटे मुस्तैद खड़े हुए नज़र आते हैं। कांवड़ियों की सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर पुलिस कमिश्नर जे. रविंद्र गौड़ ने जनपद में पड़ने वाले करीब 80 किलोमीटर लंबे कांवड़ यात्रा मार्ग को बीटों में विभाजित करके अधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपी दी हैं। उन्होंने स्थाई कंट्रोल रूम, मुख्य कंट्रोल रूम, सब कंट्रोल रूम और अस्थाई कंट्रोल रूम बनाए हैं। कांवड़ यात्रा मार्ग को लाइट व सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में रखा गया है। सुरक्षा के दृष्टिकोण से जगह-जगह पुलिस ने बैरियर लगाए गए हैं। सार्वजनिक घोषणा प्रणाली बनाई गई है, रियल टाइम मॉनिटरिंग के अनुसार व्यवस्था बनाने की तैयारी। सुरक्षा के मद्देनजर नियमित रूप से डॉग स्कवायड, बम निरोधक दस्ता और लोकल इंटेलीजेंस की टीम के साथ पुलिस चेकिंग अभियान चलाते हुए, कांवड़ यात्रा को सकुशल संपन्न करवाने में दिन-रात व्यस्त है। पीआरवी एवं चीता मोबाइलों को कांवड़ यात्रा मार्ग पर लगाया गया है। घाटों पर एनडीआरएफ, एसडीआरएफ व गोताखोरों की टीम तैनात की गयी हैं। दमकल की गाड़ियां विभिन्न स्थानों पर तैनात हैं, चिकित्सकों व पैरा मेडिकल स्टाफ की टीम तैनात हैं, एंबुलेंस तैनात हैं, पथ-प्रकाश की समुचित व्यवस्था की गयी है, पेयजल की व्यवस्था की गयी है। जिलाधिकारी रविंद्र कुमार मांदड ने कांवड़ यात्रा को सुरक्षित और सुव्यवस्थित बनाने के लिए 6 कंट्रोल रूम और 2 विशेष हेल्पलाइन शुरू की हैं। 11 जोनल, 24 सेक्टर और 108 सब मजिस्ट्रेट तैनात किए गए हैं। कांवड़ यात्रा मार्ग पर लगें शिविरों की अनुमति देते समय ही आग से बचाव हेतु अग्निरोधी यंत्र, रेत की बाल्टी एवं पानी का ड्रम आदि रखवाने के लिए शिविर आयोजकों को निर्देशित किया गया है। कांवड़ शिविरों में विद्युत सुरक्षा उपायों के किये जाने का निर्देश दिए गए हैं। कांवड़ मार्ग के निकट कोई नया बखेड़ा खड़ा ना हो इसके लिए मीट, मछली और अंडा आदि की दुकानों को बंद करवा दिया गया है, शराब की दुकानों को ढंक दिया गया गया है। किसी प्रकार की कोई दुर्घटना ना घट जाये इसलिए कांवड़ की ऊंचाई 10 फुट एवं चौड़ाई 12 फुट तक रखने के निर्देश दिए गए है। डाक कांवड़ में मानकों के अनुसार म्यूजिक सिस्टम पर 75 डेसीबेल तक का ही शोर मान्य है, इस तरह की चाक-चौबंद व्यवस्था उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश के पूरे कांवड़ यात्रा मार्ग के सभी जनपदों में की गई है। हालांकि पुलिस-प्रशासन के द्वारा की गयी बेहद चाक-चौबंद व्यवस्था के बाद भी कांवड़ यात्रा मार्ग पर आने वाले दिनों किसी भी तरह से माहौल खराब करने वाले लोगों से निपटने की एक बड़ी चुनौती खड़ी है। क्योंकि यात्रा के दौरान कांवड़ छूने, कांवड़ के वाहनों से टकराने आदि छुटपुट बातों का बतंगड़ ना बने उससे निपटना बड़ा चुनौतीपूर्ण है। वैसे भी पिछले कुछ वर्षों से देश में जिस तेज़ी से धैर्य व छोटे-बड़े की शर्म, आपसी भाईचारा और सामाजिक समरसता, आपसी सहयोग का भाव दिन-प्रतिदिन बहुत तेज़ी से कम होता जा रहा है, कांवड़ यात्रा मार्ग में इसका प्रभाव अब वर्ष दर वर्ष स्पष्ट रूप से नज़र आने लगा है। जिसके चलते ही अब तो बिना सिर-पैर के विवाद भी कांवड़ यात्रा में बहुत बड़ी चुनौती पैदा करने लग गए हैं। हालांकि कांवड़ यात्रा को सकुशल संपन्न कराने के लिए उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश आदि में पुलिस-प्रशासन जबरदस्त ढंग से सक्रिय है और देवाधिदेव भगवान महादेव की कृपा से इस वर्ष भी कांवड़ यात्रा दिव्य, अलौकिक, यादगार बन कर के सकुशल संपन्न होगी। - दीपक कुमार त्यागी अधिवक्ता, स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 8 Aug 2026 3:29 pm

UPI के जरिए होने वाले डिजिटल भुगतान पर लग सकता है MDR चार्ज, SBI चेयरमैन ने कही यह बात

UPI पर संभावित चार्ज को लेकर पैदा हुई आशंकाओं के बीच पेमेंट्स काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) ने स्पष्ट किया है कि ग्राहकों के लिए UPI भुगतान मुफ्त बना रहेगा। छोटे कारोबारियों को भी डिजिटल पेमेंट स्वीकार करने के लिए कोई शुल्क नहीं देना होगा।

देशबन्धु 8 Aug 2026 1:47 pm

आ गई बुरी खबर! भारत पर फूटने ही वाला है ट्रंप का 100% टैरिफ वाला बम, 10 प्वाइंट में इसके असर को समझें

भारत पर 100 % टैरिफ वाला बिल, यूएस सेनट से पारित हुआ है। भारत समेत 5 देश ऐसे हैं, जहां पर 100 % टैरिफ वाला बिल, यूएस में पास हो गया है। रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 % टैरिफ अब यूएस लगाएगा। 31 अगस्त को यूएस हाउस ओफ रिप्रेजेंटेटिव में रखा जाएगा, लेकिन अमेरिकी सीनेट से ये पारित हो गया है। 86 जो सीनेट के सदस्य हैं, यानि संसद उन्हों ने इसके समर्थन में वोट किया। इसके पारित होने के बाद पांच देशों के खिलाफ 100 % तक का टैरिफ लगाया जा सकता है। हालांकि कि ये पूरा अधिकार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को होगा, लेकिन अगर ये बिल पारित हो जाता है, तो भारत और वैसे देश जो रूस से सबसे अधिक मात्रा में तेल आयात करते हैं, उन पर संकट पैदा हो सकता है।लेकिन ये पूरा अधिकार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को होगा, लेकिन भारत के लिए ये ऐसा बिल है, जो आने वाले वक्त में भारत को मुश्किलों में डाल सकते हैं। इसे भी पढ़ें: Strait of Hormuz पर Iran-Oman के बीच ऐतिहासिक समझौता, US Sanctions के बीच क्या बदलेगी दुनिया की सूरत? यह विधेयक (Bill) क्या है? अमेरिकी सेनेट ने 86-11 के भारी बहुमत से लिंडसे ओ. ग्राहम सेंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026 पारित किया है। इस द्विपक्षीय विधेयक का नाम दिवंगत रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम के नाम पर रखा गया है, जो इसके मुख्य वास्तुकारों में से एक थे। बिल का मुख्य उद्देश्य रूस और ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाना और उन देशों पर शिकंजा कसना जो मॉस्को (रूस) के साथ बड़े पैमाने पर ऊर्जा व्यापार जारी रखे हुए हैं। यह कानून अमेरिकी राष्ट्रपति को उन देशों से आयात होने वाले सामानों पर 100% तक का सीमा शुल्क लगाने का अधिकार देता है, जो रूसी तेल या प्राकृतिक गैस के दुनिया के शीर्ष 5 खरीदारों में शामिल हैं। इस विधेयक में और कौन से प्रतिबंध प्रस्तावित हैं? यह विधेयक सिर्फ रूसी तेल खरीदारों पर शुल्क लगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कई अन्य कठोर प्रतिबंध शामिल हैं। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, वरिष्ठ राजनीतिक और सैन्य अधिकारियों, और कुलीन वर्गों पर सीधे प्रतिबंध। रूस के बैंकों, वित्तीय संस्थानों और युद्ध प्रयासों को वित्तपोषित करने वाली संस्थाओं पर पाबंदी। रूस द्वारा मौजूदा प्रतिबंधों से बचने और तेल निर्यात से कमाई जारी रखने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले पुराने और दूसरे देशों के झंडे वाले तेल टैंकरों पर प्रतिबंधों का विस्तार। इसके तहत ईरान के ऊर्जा और हथियार क्षेत्रों पर प्रतिबंधों को आगे बढ़ाया गया है। रूस की अर्थव्यवस्था और उसके सैन्य अभियान को मिलने वाली फंडिंग को रोकना। इसे भी पढ़ें: Iran के पास कभी नहीं होंगे Nuclear Weapons, बातचीत से गिरेंगे Oil Prices, जेडी वेंस का दावा भारत के सामने जल्द क्या चुनौती आ सकती है? यदि यह विधेयक पूरी तरह से कानून बनता है, तो राष्ट्रपति के पास शीर्ष 5 रूसी तेल खरीदारों से अमेरिका आने वाले सामानों पर 100% शुल्क लगाने की शक्ति होगी। भारत और चीन दुनिया में रूसी कच्चे तेल के सबसे बड़े खरीदारों में से हैं। इस कानून की संरचना ऐसे की गई है कि देशों को अमेरिका के साथ व्यापार बनाए रखने और रूस से सस्ता तेल खरीदने में से किसी एक को चुनना पड़े। डार्लीन ग्राहम (दिवंगत सीनेटर की बहन) ने कहा कि यह विधेयक रूस की अर्थव्यवस्था को संभाले रखने वाले प्रमुख देशों को एक सरल लेकिन महत्वपूर्ण विकल्प चुनने के लिए मजबूर करता है – अमेरिका के साथ व्यापार करने का विकल्प या रूस से सस्ता तेल खरीदने का विकल्प। भारत चर्चा में क्यों है? 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से भारत ने रियायती दरों पर रूसी कच्चा तेल खरीदना काफी बढ़ा दिया है। रूस पहले भारत के लिए तेल का कोई बड़ा सप्लायर नहीं था, लेकिन मॉस्को और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू होने और यूरोप द्वारा रूसी कच्चा तेल खरीदना बंद करने के बाद, यह भारत के लिए भारी छूट पर उपलब्ध हो गया। इस बदलाव से भारतीय रिफाइनरों को कच्चे तेल की लागत कम करने और ग्लोबल एनर्जी मार्केट में रुकावटों के बावजूद सप्लाई सुनिश्चित करने में मदद मिली है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से शिपिंग में रुकावटों के बीच रूसी तेल पर निर्भरता और भी महत्वपूर्ण हो गई है, क्योंकि इन रुकावटों ने मध्य पूर्व से ऊर्जा की सप्लाई को प्रभावित किया है। नई दिल्ली ने बार-बार कहा है कि उसकी ऊर्जा खरीद राष्ट्रीय हित, ऊर्जा सुरक्षा और किफायती व भरोसेमंद सप्लाई सुनिश्चित करने की ज़रूरत से तय होती है। भारत पहले से ही टैरिफ़ के दबाव का सामना कर रहा है यह प्रस्तावित कानून तब आया है जब वाशिंगटन पहले ही रूस से तेल खरीदने के लिए भारत पर अतिरिक्त शुल्क लगा चुका है। हालाँकि, पहले उठाए गए कदमों से भारतीय रिफाइनर रूस से कच्चा तेल खरीदने से तुरंत नहीं रुके। मध्य पूर्व में चल रहे संघर्ष से ऊर्जा बाज़ार प्रभावित हो रहे हैं और इस क्षेत्र से होने वाली सप्लाई को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है, ऐसे में भारतीय रिफाइनरों के लिए रूसी कच्चा तेल एक महत्वपूर्ण स्रोत बना हुआ है। एक रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, अकेले जून 2026 में भारत का रूसी तेल का आयात 34% बढ़ गया। अमेरिका ने 100% टैरिफ लगा दिया तो क्या होगा? अगर बड़े पैमाने पर 100% टैरिफ लगाया जाता है, तो अमेरिकी इंपोर्टर्स के लिए भारतीय सामान काफी महंगे हो जाएंगे। इसका असर खास तौर पर इंजीनियरिंग के सामान, फार्मास्यूटिकल्स, केमिकल्स, टेक्सटाइल्स और ऑटो पार्ट्स जैसे एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड सेक्टर पर पड़ सकता है। अगर भारतीय प्रोडक्ट्स काफी महंगे हो जाते हैं, तो अमेरिकी खरीदार दूसरे देशों में वैकल्पिक सप्लायर्स की तलाश कर सकते हैं। नतीजतन, भारतीय एक्सपोर्टर्स को कम डिमांड, कम मार्जिन या कॉम्पिटिटिव बने रहने के लिए अतिरिक्त लागत का कुछ हिस्सा खुद उठाने की ज़रूरत का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे टैरिफ का खतरा भारतीय कंपनियों को अपने एक्सपोर्ट मार्केट में विविधता लाने और पॉलिसी बनाने वालों पर वाशिंगटन के साथ बातचीत करने का दबाव बढ़ाने के लिए भी प्रेरित कर सकता है। कुछ अमेरिकी सांसद क्यों इसके विरोध में हैं? हालांकि बिल को सीनेट का भारी समर्थन मिला, लेकिन कुछ सांसदों ने ट्रंप को टैरिफ लगाने के लिए व्यापक अधिकार देने पर चिंता जताई है। आलोचकों का तर्क है कि टैरिफ से अमेरिकी कंज्यूमर्स और बिज़नेस के लिए लागत बढ़ सकती है, ऐसे समय में जब परिवारों को पहले से ही रहने-सहने के ऊंचे खर्चों का सामना करना पड़ रहा है। सीनेटर रॉन वाइडेन ने कहा कि अमेरिका में ऐसे लोग हैं जो आर्थिक रूप से बहुत मुश्किल हालात (आर्थिक तंगी) से गुज़र रहे हैं। रिपब्लिकन सीनेटर रैंड पॉल और वाइडेन द्वारा नए टैरिफ अधिकार को हटाने के लिए लाए गए एक संशोधन को सीनेट ने खारिज कर दिया। सीनेटर राफेल वार्नॉक, जिन्होंने टैरिफ प्रावधानों पर चिंता जताई थी, ने कहा कि उन्हें ट्रंप प्रशासन से सुरक्षा उपायों के बारे में लिखित आश्वासन मिला है। वार्नॉक ने कहा हमें पुतिन की आक्रामकता पर रोक लगाने और इस राष्ट्रपति के टैरिफ सिस्टम पर रोक लगाने के बीच चुनाव नहीं करना चाहिए। अगर ट्रंप अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल करते हैं, तो हम उन्हें कोर्ट में देखेंगे। विधेयक में ईरान को भी निशाना क्यों बनाया गया है? यह विधेयक ईरान सेंक्शन एक्ट ऑफ 1996 की अवधि को बढ़ाकर 2031 तक करने का प्रस्ताव रखता है। इसका मुख्य उद्देश्य ईरान के ऊर्जा क्षेत्र पर आर्थिक दबाव बनाए रखना है। यह विधेयक वॉशिंगटन (अमेरिका) के दो सबसे बड़े भू-राजनीतिक विरोधियों रूस और ईरान को एक साथ निशाना बनाता है। छूट किसे और कैसे मिल सकती है? विधेयक में कुछ शर्तों के तहत देशों को प्रतिबंधों या टैरिफ से छूट देने का प्रावधान है। जैसे यदि कोई देश रूस के कुल प्राकृतिक गैस निर्यात का 15% से कम आयात करता है और रूसी ऊर्जा पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए कदम उठा रहा है, तो वह छूट का पात्र हो सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति के पास यह अधिकार होगा कि यदि उन्हें लगता है कि ऐसा करना अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है, तो वे किसी भी देश पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों या शुल्कों को टाल या माफ कर सकते हैं। आगे क्या होगा? सेनेट से पारित होने के बाद यह विधेयक अब अमेरिकी संसद के निचले सदन 'हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स' में जाएगा। अगस्त के अंत में जब सांसद छुट्टियों से वापस लौटेंगे, तब इस पर विचार होने की संभावना है। इस बिल को कानून बनने और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के पास हस्ताक्षर के लिए भेजने से पहले निचले सदन द्वारा पास किया जाना अनिवार्य है। इसका मतलब है कि नया टैरिफ लागू होने से पहले अभी भी एक महत्वपूर्ण विधायी और राजनयिक प्रक्रिया बाकी है।

प्रभासाक्षी 8 Aug 2026 1:14 pm

अगर भारत-पाक युद्ध हुआ तो क्या India के खिलाफ अपनी सेना उतारेंगे Turkey और Saudi Arabia?

नाटो के भीतर जब अमेरिका और उसके सहयोगियों के बीच भरोसे की दरारें गहरी हो रही हैं, ठीक उसी समय पश्चिम एशिया में एक नया शक्ति-केंद्र खड़ा करने की कोशिश शुरू हो गई है। मक्का में तुर्किये, सऊदी अरब और पाकिस्तान ने ऐसा रक्षा समझौता किया है, जिसकी सबसे अहम लाइन में साफ कहा गया है कि तीनों में से किसी एक पर हमला हुआ तो उसे तीनों पर हमला माना जाएगा। यही वह बिंदु है, जो इस समझौते को सामान्य सैन्य सहयोग से उठाकर एक संभावित नए क्षेत्रीय सुरक्षा गठबंधन में बदल देता है। हालांकि इसे अभी आधिकारिक तौर पर ‘सुन्नी नाटो’ कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन इसके भीतर उसकी बुनियादी तस्वीर जरूर दिखाई देने लगी है। देखा जाये तो मक्का में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन का एक मंच पर आना अपने आप में बड़ा संदेश है। खास बात यह है कि यह समझौता ऐसे समय हुआ है जब पश्चिम एशिया पहले ही ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव की आग में झुलस रहा है। सऊदी अरब पर ईरान और उसके सहयोगी संगठनों के हमलों का खतरा है। पाकिस्तान अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है और तुर्किये पश्चिम एशिया में अपनी भूमिका लगातार बढ़ा रहा है। यानी तीनों देश एक-दूसरे की जरूरत बन गए हैं। इसे भी पढ़ें: Iran ने Saudi Arabia, पाकिस्तान और Turkey के रक्षा समझौते को बताया बेअसर क्यों हुआ त्रि-पक्षीय समझौता? वर्तमान हालात को देखें तो सऊदी को चाहिए सुरक्षा, पाकिस्तान को पैसा और तुर्किये को ताकत, इसलिए तीनों एक साथ आ गये हैं। हालांकि इस गठजोड़ को समझने के लिए तीनों देशों के हितों को अलग-अलग देखना होगा। सबसे पहले सऊदी अरब की बात करें तो उसके सामने सबसे बड़ा सवाल सुरक्षा का है। दशकों तक रियाद ने अमेरिकी सुरक्षा छाते पर भरोसा किया। लेकिन अब सऊदी नेतृत्व यह मानकर चल रहा है कि बदलती अमेरिकी नीति में किसी एक बाहरी शक्ति पर पूरी तरह निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है। ईरान और उसके सहयोगियों की मिसाइल तथा ड्रोन क्षमता ने इस खतरे को और वास्तविक बना दिया है। ऐसे में सऊदी अरब ने अपना सुरक्षा कवच चौड़ा करना शुरू किया है। पाकिस्तान उसके लिए स्वाभाविक साझेदार है। पाकिस्तानी सेना दशकों से सऊदी सुरक्षा बलों को प्रशिक्षण देती रही है और हाल के महीनों में पाकिस्तान ने सऊदी अरब में सैनिकों, लड़ाकू विमानों, ड्रोन और वायु रक्षा प्रणालियों की मौजूदगी भी बढ़ाई है। वहीं पाकिस्तान की जरूरत बिल्कुल दूसरी है। आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान को सऊदी अरब से निवेश और आर्थिक मदद चाहिए, जबकि तुर्किये से रक्षा तकनीक और सैन्य सहयोग चाहिए। बदले में पाकिस्तान अपनी सेना और परमाणु क्षमता को मुस्लिम दुनिया की सुरक्षा में सबसे बड़ा सैन्य योगदान बताकर अपनी भू-राजनीतिक अहमियत बढ़ाना चाहता है। वहीं तुर्किये की बात करें तो एर्दोगन लंबे समय से अपने देश को सिर्फ नाटो का सदस्य नहीं, बल्कि मुस्लिम दुनिया की एक स्वतंत्र शक्ति के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। तुर्किये के पास अत्याधुनिक ड्रोन, रक्षा उद्योग और बड़ी सैन्य ताकत है। पाकिस्तान के साथ उसका रक्षा सहयोग पहले ही तेजी से बढ़ चुका है। यह गठबंधन किसके खिलाफ है? अब सवाल उठता है कि यह गठबंधन किसके खिलाफ है? इस सवाल का जवाब हालांकि तीनों देशों ने नहीं में दिया है। तुर्किये ने साफ कहा है कि समझौता रक्षात्मक है, यह किसी खास देश या संगठन को निशाना नहीं बनाता और दूसरे क्षेत्रीय देशों के लिए भी खुला है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सिर्फ दस्तावेज की भाषा नहीं देखी जाती, टाइमिंग भी देखी जाती है। और इस समझौते की टाइमिंग बहुत कुछ कहती है क्योंकि इस समय ईरान और सऊदी अरब के बीच तनाव चरम पर है। ईरान समर्थित हूती, इराकी मिलिशिया और अन्य समूहों की गतिविधियों ने खाड़ी देशों की सुरक्षा चिंता बढ़ाई है। दूसरी तरफ इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष ने पूरे क्षेत्र को बारूद के ढेर में बदल दिया है। इसलिए यह समझौता भले ही ईरान का नाम न ले, लेकिन ईरान के लिए इसका संदेश साफ है कि सऊदी अरब अब अकेला नहीं है। ईरान की बढ़ेंगी मुश्किलें वहीं इस समझौते के बाद ईरान के लिए नई चुनौती खड़ी हो गयी है। तेहरान अब तक पश्चिम एशिया में अपने प्रभाव का बड़ा हिस्सा सहयोगी और प्रॉक्सी संगठनों के नेटवर्क के जरिए कायम करता रहा है। लेकिन यदि सऊदी अरब को पाकिस्तान की सैन्य क्षमता और तुर्किये की रक्षा तकनीक का समर्थन मिलने लगे तो क्षेत्रीय समीकरण बदल सकते हैं। यही कारण है कि मक्का समझौते को ईरान के खिलाफ सीधा सैन्य गठबंधन नहीं होते हुए भी ईरान के लिए रणनीतिक चुनौती जरूर माना जा सकता है। इजराइल-अमेरिका को भी संदेश दिलचस्प बात यह है कि इस गठबंधन का एक और बड़ा संदेश इजरायल के लिए भी है। पश्चिम एशिया में जिस ‘सुन्नी धुरी’ की चर्चा लंबे समय से होती रही है, वह अब सिर्फ राजनीतिक अवधारणा नहीं रहना चाहती। साथ ही यह अमेरिका के लिए भी खतरे की घंटी है और यह समझौता वाशिंगटन के लिए भी सुखद खबर नहीं है। दरअसल सऊदी अरब और तुर्किये दोनों अमेरिकी सुरक्षा व्यवस्था के पुराने साझेदार हैं। लेकिन यदि यही देश अपनी सुरक्षा के लिए अलग क्षेत्रीय सैन्य ढांचा बनाने लगें तो इसका अर्थ साफ है कि अमेरिकी सुरक्षा छतरी पर भरोसा कम हो रहा है। यही इस समझौते का सबसे बड़ा दीर्घकालिक रणनीतिक अर्थ हो सकता है। सुन्नी नाटो सिर्फ कल्पना है या हकीकत? इसके अलावा, यदि मक्का मॉडल सफल होता है और उसमें दूसरे सुन्नी देश शामिल होते हैं, तो पश्चिम एशिया में अमेरिका के नेतृत्व वाली सुरक्षा व्यवस्था के समानांतर एक क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचा खड़ा हो सकता है। सवाल उठता है कि इसमें और कौन-से देश शामिल हो सकते हैं? इसके जवाब में कतर, मिस्र, संयुक्त अरब अमीरात और सीरिया जैसे देशों के नाम संभावित सदस्य के रूप में सामने आ रहे हैं। हालांकि यह भी एक तथ्य है कि यूएई की कई क्षेत्रीय मुद्दों पर सऊदी अरब और तुर्किये से अलग नीति रही है। साथ ही मिस्र भी किसी ऐसे सैन्य गठबंधन में फंसना नहीं चाहेगा जो उसे सीधे किसी क्षेत्रीय युद्ध में धकेल दे। वहीं सीरिया अपनी युद्धोत्तर परिस्थितियों से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा है। इसलिए ‘सुन्नी नाटो’ का विस्तार संभव जरूर है, लेकिन आसान नहीं है। त्रि-पक्षीय समझौते का भारत पर क्या होगा असर? अब सवाल यह है कि इस रक्षा समझौते का भारत पर क्या असर पड़ेगा और अगर भारत-पाकिस्तान के बीच फिर सैन्य टकराव हुआ तो क्या तुर्किये और सऊदी अरब पाकिस्तान के साथ खड़े होंगे और भारत के खिलाफ युद्ध लड़ेंगे? देखा जाये तो भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता पाकिस्तान की बढ़ती रणनीतिक क्षमता है। तुर्किये पहले से ही पाकिस्तान का करीबी सैन्य साझेदार है और कश्मीर से लेकर रक्षा सहयोग तक उसका रुख भारत के लिए चिंता का विषय रहा है। 2025 के भारत-पाकिस्तान सैन्य टकराव में भी अंकारा ने खुलकर पाकिस्तान का समर्थन किया था। ऐसे में भविष्य में पाकिस्तान को तुर्किये से ड्रोन, हथियार, तकनीक, खुफिया सहयोग और सैन्य सहायता का अधिक संगठित समर्थन मिल सकता है। हालांकि सऊदी अरब को तुर्किये के साथ एक ही नजर से देखना सही नहीं होगा क्योंकि रियाद के पाकिस्तान से गहरे रक्षा संबंध जरूर हैं, लेकिन भारत भी उसके लिए ऊर्जा, व्यापार, निवेश और रणनीतिक सहयोग का अहम साझेदार है। इसलिए भारत-पाकिस्तान संघर्ष की स्थिति में तुर्किये का पाकिस्तान के पक्ष में खुलकर खड़ा होना ज्यादा संभावित है, जबकि सऊदी अरब के लिए सीधे भारत के खिलाफ युद्ध में उतरना आसान नहीं होगा। वह पाकिस्तान को राजनीतिक, आर्थिक या सीमित सैन्य-लॉजिस्टिक मदद दे सकता है, लेकिन मक्का समझौते की मौजूदा सार्वजनिक भाषा से यह नहीं कहा जा सकता कि पाकिस्तान पर हमले की स्थिति में सऊदी और तुर्किये अपने आप भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ देंगे। यही वजह है कि भारत के लिए असली चिंता इस समझौते की ‘सामूहिक युद्ध’ वाली भाषा से ज्यादा पाकिस्तान को मिलने वाली संभावित अतिरिक्त सैन्य और रणनीतिक ताकत है। पाकिस्तान का विरोधाभास हालांकि इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान का सबसे बड़ा विरोधाभास भी सबके सामने आया है। जिस देश की अपनी सीमाओं पर लगातार तनाव है, जिसे अफगानिस्तान सीमा पर संघर्ष का सामना करना पड़ रहा है, जिसके बलूचिस्तान प्रांत ने आजादी का ऐलान कर दिया है, जिसके अवैध कब्जे वाले पीओके में विद्रोह और दमन तेज होता जा रहा है, वह देश अब मुस्लिम दुनिया की सामूहिक सुरक्षा का प्रहरी बनने की भूमिका तलाश रहा है। देखा जाये तो पाकिस्तान के आंतरिक संकटों के बीच यह समझौता उसके लिए अपनी अंतरराष्ट्रीय प्रासंगिकता दिखाने का अवसर भी बन गया है। कई सवालों के जवाब समय देगा वैसे मक्का समझौते की असली परीक्षा तब होगी जब तीनों में से किसी एक पर वास्तविक सैन्य हमला होगा। अगर सऊदी अरब पर हूती या किसी अन्य ईरान समर्थित समूह का बड़ा हमला होता है, तो क्या पाकिस्तान और तुर्किये युद्ध में उतरेंगे? अगर पाकिस्तान पर हमला होता है, तो क्या सऊदी अरब और तुर्किये सैनिक भेजेंगे? और अगर भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध होता है, तो क्या रियाद अपने भारत संबंधों को दांव पर लगाकर इस्लामाबाद के साथ खड़ा होगा? इन सवालों का जवाब अभी किसी के पास नहीं है। लेकिन एक बात साफ है कि मक्का में सिर्फ एक समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हुए हैं। पश्चिम एशिया में शक्ति के नए समीकरण की नींव रखी गई है। बहरहाल, नाटो की छतरी के नीचे मतभेद बढ़ रहे हैं और उसी समय मुस्लिम दुनिया के तीन देश अपनी सुरक्षा को एक-दूसरे से जोड़ रहे हैं। अभी इसे ‘सुन्नी नाटो’ कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन यदि इसमें दूसरे देश जुड़ते हैं, संयुक्त सैन्य अभ्यास बढ़ते हैं, खुफिया और हथियार सहयोग संस्थागत होता है और ‘एक पर हमला, सभी पर हमला’ सिर्फ कागज की लाइन न रहकर वास्तविक सैन्य नीति बन जाती है, तो आने वाले वर्षों में पश्चिम एशिया का नक्शा बदल सकता है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 8 Aug 2026 1:03 pm

राहुल गांधी के बयान पर खुश हुए किरेन रिजिजू, महिला आरक्षण बिल को लेकर मांगा बिना शर्त समर्थन

राहुल गांधी के महिला स्वतंत्रता वाले बयान पर किरेन रिजिजू ने कांग्रेस से महिला आरक्षण बिल के बिना शर्त समर्थन की मांग की। राहुल गांधी ने कानून लागू करने पर सवाल उठाए।

देशबन्धु 8 Aug 2026 11:55 am

'हर घर तिरंगा अभियान' को लेकर तैयार त्रिपुरा, 9 अगस्त से देशभक्ति से जुड़े होंगे कार्यक्रम

देशभर में चलाए जाने वाले 'हर घर तिरंगा 2026' अभियान को लेकर त्रिपुरा में तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। अधिकारियों ने शुक्रवार को बताया कि इस अभियान का उद्देश्य लोगों में राष्ट्रीय ध्वज के प्रति सम्मान बढ़ाना, स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि देना और देशभक्ति की भावना को मजबूत करना है।

देशबन्धु 8 Aug 2026 7:00 am

तमिलनाडु बजट को भाजपा ने बताया 'दृष्टिहीन', कावेरी पर सर्वदलीय बैठक का किया समर्थन

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की तमिलनाडु इकाई के मुख्य प्रवक्ता नारायणन तिरुपति ने राज्य बजट की कड़ी आलोचना करते हुए इसे दृष्टिहीन करार दिया

देशबन्धु 8 Aug 2026 6:50 am

गुजरात सरकार ने राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय समारोहों की मेजबानी करने वाले जिलों के लिए विकास अनुदान दोगुना किया

मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व वाली गुजरात सरकार ने गांधीनगर के बाहर राज्य-स्तरीय गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस और गुजरात राज्य स्थापना दिवस समारोहों की मेजबानी करने वाले जिलों के लिए विकास अनुदान दोगुना कर दिया है।

देशबन्धु 8 Aug 2026 4:30 am

मणिपुर: मुख्यमंत्री खेमचंद ने हथकरघा क्षेत्र में महिलाओं की अहम भूमिका की सराहना की

मणिपुर के मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह ने कहा कि राज्य के हथकरघा क्षेत्र में महिलाएं सबसे आगे हैं, यहां लगभग 95 प्रतिशत हथकरघा उत्पादक महिलाएं हैं और बाकी पांच प्रतिशत पुरुष हैं।

देशबन्धु 8 Aug 2026 4:10 am

कर्नाटक: उडुपी में पूर्व ग्राम पंचायत अध्यक्ष की गोली मारकर हत्या

कर्नाटक के उडुपी जिले में जाने-माने बिजनेसमैन और मुदारांगडी ग्राम पंचायत के पूर्व अध्यक्ष डेविड डिसूजा की मोटरसाइकिल सवार अज्ञात हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी।

देशबन्धु 8 Aug 2026 3:30 am

‘दाल में काला नहीं, पूरी दाल ही काली’, E20 को लेकर राहुल गांधी ने सरकार पर साधा निशाना, देखे वीडियो

‘दाल में काला नहीं, पूरी दाल ही काली’, E20 को लेकर राहुल गांधी ने सरकार पर साधा निशाना, देखे वीडियो

समाचार नामा 7 Aug 2026 7:45 pm

कर्नाटक भाजपा ने 'नेशनल हैंडलूम डे' मनाया, पीएम मोदी सरकार को दिया श्रेय

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समाचार नामा 7 Aug 2026 6:24 pm

दुष्कर्म मामले में तरुण तेजपाल दोषी करार, प्रदीप भंडारी ने कहा- 'महिलाओं को कांग्रेस जवाब दे'

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समाचार नामा 7 Aug 2026 5:59 pm

भाजपा ने अनंतनाग जिले के नौ पदाधिकारियों को तत्काल प्रभाव से किया निलंबित

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समाचार नामा 7 Aug 2026 4:31 pm

ब्रिक्स वेव्स बाजार 2026 हुआ शुरू

मुंबई, भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के तहत मुंबई में गुरुवार से ब्रिक्स वेव्स बाजार 2026 का शुभारंभ हुआ।

देशबन्धु 7 Aug 2026 2:31 pm

मोहन भागवत का युवाओं से संवाद राष्ट्र निर्माण की दिशा में अहम कदम: सतीश महाना

मोहन भागवत का युवाओं से संवाद राष्ट्र निर्माण की दिशा में अहम कदम: सतीश महाना

समाचार नामा 7 Aug 2026 2:25 pm

PM मोदी-सुखबीर बादल की मुलाकात से पंजाब की राजनीति में हलचल, 2027 चुनाव से पहले फिर साथ आएंगे भाजपा-अकाली दल?

पंजाब में 2027 का विधानसभा चुनाव बेहद दिलचस्प होने की संभावना है। राज्य में आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, भाजपा और शिरोमणि अकाली दल प्रमुख राजनीतिक ताकतों के रूप में चुनाव मैदान में उतर सकते हैं। यदि भाजपा और अकाली दल के बीच दोबारा गठबंधन होता है, तो इसका असर चुनावी गणित पर पड़ सकता है।

देशबन्धु 7 Aug 2026 2:24 pm

FCRA Bill पर हल्ला मचा रहे विपक्षी दलों और ईसाई संगठनों को मार्को रुबियो का बयान सुनना चाहिए

केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) संशोधन विधेयक को लेकर देश में तो इस समय व्यापक बहस छिड़ी ही हुई है, साथ ही इसकी गूंज अमेरिका तक सुनाई दे रही है। दिलचस्प बात यह है कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो पहले स्वयं यह कह चुके हैं कि किसी भी देश में विदेशी फंड से संचालित संस्थाओं को वहां की संप्रभु सरकार के समानांतर व्यवस्था नहीं चलानी चाहिए और उन्हें मेजबान देश के कानूनों का सम्मान करना चाहिए। इसके बावजूद अमेरिकी सांसद राइली मूर भारत के प्रस्तावित कानून की आलोचना कर रहे हैं। दूसरी ओर, मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात के बाद स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार ने उन्हें आश्वस्त किया है कि प्रस्तावित संशोधन को पूर्व प्रभाव (रेट्रोस्पेक्टिव) से लागू नहीं किया जाएगा। इन घटनाक्रमों के बीच मोदी सरकार का स्पष्ट संदेश है कि विदेशी धन प्राप्त करने वाले संगठनों के संचालन में पारदर्शिता, जवाबदेही और भारतीय कानूनों का पालन सर्वोच्च प्राथमिकता रहेगा। हम आपको बता दें कि केंद्र सरकार के आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में एफसीआरए के तहत पंजीकृत सक्रिय संगठनों की संख्या घटी है, लेकिन विदेशी चंदे का प्रवाह बना हुआ है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2024-25 में 16,200 संगठनों को लगभग 22,963 करोड़ रुपये का विदेशी योगदान प्राप्त हुआ। वहीं बड़ी संख्या में ऐसे संगठनों के एफसीआरए लाइसेंस निरस्त या समाप्त भी किए गए हैं। सरकार का कहना है कि केवल वैध पंजीकरण रखने वाले संगठनों को ही विदेशी धन प्राप्त करने और उसका उपयोग करने का अधिकार होना चाहिए। इसे भी पढ़ें: संसद में सत्ता-विपक्ष की टकरार! Kharge के दावे पर Kiren Rijiju का तीखा वार हम आपको बता दें कि सरकार द्वारा लाए गए संशोधन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यदि किसी संस्था का एफसीआरए पंजीकरण समाप्त हो जाता है, रद्द हो जाता है, नवीनीकृत नहीं होता या संस्था स्वयं उसे छोड़ देती है, तो विदेशी धन से निर्मित परिसंपत्तियों के प्रबंधन के लिए एक नामित प्राधिकरण की व्यवस्था की जाएगी। यदि बाद में संस्था का पंजीकरण बहाल हो जाता है तो संबंधित संपत्तियां और अप्रयुक्त विदेशी योगदान वापस कर दिए जाएंगे। यदि ऐसा नहीं होता, तो कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी। केंद्र सरकार का तर्क है कि यह व्यवस्था किसी नए अधिकार का सृजन नहीं, बल्कि पहले से मौजूद प्रावधानों को अधिक स्पष्ट और व्यवस्थित बनाने का प्रयास है। वहीं प्रस्तावित संशोधन को लेकर कुछ चर्च संगठनों ने आशंकाएं भी व्यक्त की हैं। उनका कहना है कि कानून की कुछ धाराएं अत्यधिक कठोर हैं और उन्हें संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजा जाना चाहिए। इसी उद्देश्य से विभिन्न चर्च संगठनों के प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की और अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं। वहीं मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने अमित शाह के साथ बैठक के बाद कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री ने स्पष्ट आश्वासन दिया है कि प्रस्तावित संशोधन को पूर्व प्रभाव से लागू नहीं किया जाएगा। हम आपको यह भी बता दें कि केंद्र सरकार ने इन आशंकाओं का विस्तार से जवाब भी दिया है। सरकार का कहना है कि प्रस्तावित कानून किसी विशेष धर्म, समुदाय या विचारधारा को निशाना नहीं बनाता। एफसीआरए के प्रावधान सभी विदेशी चंदा प्राप्त करने वाले संगठनों पर समान रूप से लागू होते हैं। केंद्र सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि किसी धार्मिक स्थल से जुड़ी संपत्ति का मामला आता है तो उसके धार्मिक स्वरूप को कानूनन सुरक्षित रखा जाएगा। साथ ही, नामित प्राधिकरण के आदेश अंतिम नहीं होंगे और उनके विरुद्ध न्यायालय में अपील का अधिकार भी उपलब्ध रहेगा। उधर, इस पूरे विवाद का अंतरराष्ट्रीय पहलू भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। अमेरिकी सांसद राइली मूर ने आरोप लगाया कि यह कानून चर्चों और ईसाई संस्थाओं के खिलाफ है। हालांकि स्वयं अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने पिछले वर्ष यह कहा था कि विदेशी सहायता कार्यक्रम मेजबान देशों की सरकारों के समानांतर नहीं चलने चाहिए और विदेशी वित्तपोषित संस्थाओं को संबंधित देश की नीतियों और कानूनों के अनुरूप काम करना चाहिए। यही कारण है कि भारत के संदर्भ में उठ रही आलोचना पर दोहरे मापदंड का प्रश्न भी सामने आया है। देखा जाये तो लोकतंत्र में किसी भी कानून पर बहस और समीक्षा का अधिकार सभी को है, लेकिन भारत की संप्रभुता और राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हैं। यदि कोई संगठन विदेशी चंदे के सहारे पूरी पारदर्शिता और भारतीय कानूनों का पालन करते हुए जनकल्याण का कार्य करता है, तो उसके लिए इस कानून से घबराने का कोई कारण नहीं होना चाहिए। इसके विपरीत, जिन संस्थाओं या तत्वों ने विदेशी धन का उपयोग नियमों से इतर गतिविधियों, अपारदर्शी वित्तीय लेन-देन या भारत में अस्थिरता और अशांति फैलाने के प्रयासों के लिए किया है, उनके लिए स्वाभाविक रूप से चिंता की स्थिति पैदा हो सकती है क्योंकि प्रस्तावित संशोधन निगरानी, जवाबदेही और कानूनी अनुपालन को और मजबूत करने का प्रयास करता है। मोदी सरकार का कहना है कि यह कानून किसी धर्म या समुदाय को लक्षित नहीं करता, बल्कि विदेशी अंशदान के नियमन और पारदर्शिता के लिए समान रूप से लागू होगा। ऐसे में यदि विदेशी फंडिंग के नाम पर नियमों की अनदेखी करने वालों की मुश्किलें बढ़ती हैं, तो इसे कानून के दायरे में जवाबदेही सुनिश्चित करने की प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए। बहरहाल, संसद में होने वाली चर्चा के बाद कानून का अंतिम स्वरूप तय होगा, लेकिन यह स्पष्ट है कि विदेशी धन के उपयोग पर प्रभावी निगरानी और राष्ट्रीय हितों की रक्षा किसी भी संप्रभु राष्ट्र की वैध जिम्मेदारी है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 7 Aug 2026 2:17 pm