झारखंड: परीक्षा अनियमितताओं की सीआईडी जांच के बीच 3 जेपीएससी सदस्यों ने इस्तीफा दिया
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पिछले 2 साल में राजनांदगांव को मिले 267 करोड़, संस्कारधानी को बनाएंगे स्वच्छ-सुंदर: उपमुख्यमंत्री अरुण साव
भाजपा मुद्दों से ध्यान भटका रही, पीडीए की बढ़ती ताकत से घबराई सरकार: अवधेश प्रसाद
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तमिलनाडु: कार्ति चिदंबरम ने लोकसभा सीटों में वृद्धि के खिलाफ चेतावनी दी
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पंजाब बीजेपी प्रमुख बोले-'विधानसभा चुनावों की रणनीति बनाने के लिए नितिन नवीन के साथ हुई बैठक'
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भारत छोड़ो दिवस: सांसद बांसुरी स्वराज और भाजपा नेताओं ने स्वतंत्रता सेनानियों व शहीदों को दी श्रद्धांजलि
राहुल गांधी ने छात्रों पर 20 जुलाई की पुलिस कार्रवाई को लेकर पीएम मोदी और अमित शाह पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि सरकार को छात्रों के मुद्दे पर जवाब देना होगा।
युवाओं को गुमराह करने और बेरोजगारी के लिए राहुल गांधी और कांग्रेस जिम्मेदारः रामकृपाल यादव
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त्रिपुरा विलेज कमेटी चुनावों के लिए आदिवासी सहयोगियों के साथ चुनावी रणनीति बनाएगी भाजपा
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झारखंड छात्र आंदोलन में कॉन्ग्रेस-NSUI को घुसाने की कोशिश। प्रदर्शनकारियों ने सरकार पर आंदोलन को बाँटकर कमजोर करने की कोशिश का आरोप लगाया है।
परिसीमन से सीमावर्ती राज्यों को हो सकता है नुकसान, गंभीरता से समीक्षा होनी चाहिए: मनीष तिवारी
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पश्चिम बंगाल के सभी सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में आरजी कर पीड़िता की याद में रखा गया 2 मिनट का मौन
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तमिलनाडु के मंत्री निर्मल कुमार की अपील, परिसीमन के खिलाफ सभी पार्टी हों एकजुट
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पीएम मोदी ने 'भारत छोड़ो आंदोलन' के नायकों को किया याद, बोले- 'उनका साहस हमेशा बना रहेगा भारतीयों के लिए प्रेरणा'
महिला आरक्षण पर बदले सियासी समीकरण! इस विपक्षी पार्टी ने किया BJP का समर्थन, रिजिजू ने कही बड़ी बात
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2027 के चुनाव में सपा के साथ रहेंगे, अखिलेश यादव बनेंगे मुख्यमंत्री: बाबू सिंह कुशवाहा
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देश को नक्सलवाद-माओवाद के आतंक से मुक्ति दिलाने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने दो नये अहम अभियान प्रारंभ किये हैं- पहला, भारत को घुसपैठियों से मुक्त करना तथा दूसरा है, युवाओं को नशे की लत से मुक्ति दिलाना। भारत के किशोरों तथा युवाओं को हर प्रकार के नशे से मुक्ति दिलाने के लिए 2 अगस्त 2026 को प्रधानमंत्री मोदी ने “नशा मुक्त युवा, विकसित भारत संकल्प अभियान“ का प्रारंभ करते हुए एक वीडियो संदेश जारी किया है। अपने सन्देश में प्रधानमंत्री मोदी ने कहाकि जो युवा नशे से लड़कर बाहर निकलते हैं वे कमजोर नहीं, बल्कि असली योद्धा होते हैं। समाज को उनका सम्मान करना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि भारत में ड्रग्स की सप्लाई दुश्मन देशों की आतंकी साजिश का ही एक हिस्सा है। दुश्मन देश भारतीय युवाओं को नशे के जाल में धकेलना चाहते हैं ताकि भारत कभी भी एक सशक्त एवं विकसित देश के रूप में स्थापित न हो सके। इस साजिश को हम सबको मिलकर नाकाम करना होगा। विकसित भारत का लक्ष्य तभी पूरा होगा जब देश का युवा शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होने के साथ ही नशे से भी दूर रहेगा। अगले 100 सप्ताह तक हर रविवार को कला, संस्कृति, खेल और अन्य गतिविधियों के माध्यम से नशामुक्ति का संदेश देश भर में पहुंचाया जाएगा। नशे की लत युवाओं के सपनों और परिवार दोनों को ही तोड़ देती है। नशा केवल व्यक्ति या परिवार को ही नहीं बल्कि राष्ट्र की ताकत को भी कमजोर करता है। इसे भी पढ़ें: संसदीय-गतिरोध से नहीं चलेगा लोकतंत्र, संवाद ही है समाधान इस अभियान का उद्देश्य युवाओं को नशे से दूर रहने के लिए प्रेरित करना और उन्हें अपने समाज में बदलाव लाने के लिए आगे बढ़ाना है। प्रत्येक रविवार को देशभर में अलग-अलग कार्यक्रम होंगे जिसमें वॉकाथन और दौड़, खेल प्रतियोगिताएं,योग और ध्यान सत्र, सांस्कृतिक कार्यक्रम, नुक्कड़ नाटक, नशा विरोधी जागरूकता अभियान, चर्चा और संवाद कार्यक्रम, पेंटिग्स व आर्ट्स प्रतियोगिताएं तथा सामुदायिक सहभागिता कार्यक्रम आयोजित किये जाएंगे। यह अभियन 125 से अधिक आध्यात्मिक,सामाजिक तथा सरकारी संगठनों के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है। ब्रहमकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय, आर्ट ऑफ़ लिविंग, गायत्री परिवार, इस्कॉन से लेकर माताअमृतानंदमयी मठ जैसे संगठन इस अभियान से जुड़ कर कार्य कर रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का वैचारिक संगठन विश्व हिंदू परिषद पहले से ही व्यापक स्तर पर नशामुक्ति अभियान चला रहा है। युवाओं में नशे के विरुद्ध जागरूकता लाने के साथ ही गृहमंत्री अमित शाह ने भी नशे की जड़ों पर प्रहार करने का युद्ध छेड़ रखा हैं। ड्रग्स माफियाओं पर कार्रवाई कई गुना बढ़ गई है। तस्करी करके बड़ी मात्रा में विदेशों से आने वाली ड्रग्स की जब्ती बंदरगाहों तथा एयरपोर्ट्स की जा रही है और उसे नष्ट किया जा रहा है। वर्ष 2021 में 2988 किलो हेरेाइन, 2022 में 927 किलो गांजा, 2023 में 122 किलो मेफेड्रोन, 2024 में 770 किलो मेथाफाटेमाइन और 2026 में फिर 522 किलो गांजा बरामद किया जा चुका है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के अनुसार 2020 से मई 2025 तक तक 116 बड़े मामलों में कार्रवाई करते हुए 1,09,318 किलोग्राम नशीले पदार्थ जब्त किए गए हैं और उनको नष्ट किया गया है। वर्तामन समय में नशे का सबसे बड़ा केन्द्र पंजाब तथा पूर्वोत्तर के कई छोटे राज्य हैं। विदेशी आतंकी संगठनों द्वारा जम्मू-कश्मीर व पूर्वोत्तर के युवाओं को नशे की लत में धकेलने का प्रयास लगातार किया जा रहा है हैं। अपने कुत्सित प्रयासों को सफल बनाने के लिये ये लोग स्थानीय स्तर के अपराधियों व बिगडैल युवाओं का सहारा लेते हैं। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पंजाब में नशे के संकट पर चिंता जताते हुए कहा था कि नशा राज्य के अस्तित्व पर खतरा बन सकता है। संगठित गिरोहों की जांच में पुलिस प्रशासन के साथ ही अदालत को भी सतर्क रहना होगा। भारत में ड्रग्स की खेप कई रास्तों से आती है। बांग्लादेश-पाकिस्तान तथा नेपाल सीमा से ड्रग्स आसानी से आ-जा रहा है। गुजरात के समुद्री तट से भी नशे का कारोबार कंटेनर और समुद्री मार्ग से चलता आ रहा है हालांकि, सरकार के प्रयासों से कुछ रोकथाम हुई है किंतु खतरा बरकरार है। म्यामांर से भी ड्रग्स की तस्करी हो रही है। यही नहीं छोटे-छोटे देश मलेशिया, सिंगापुर, थाईलैंड, मालदीव, हांगकांग सहित तमाम देशों से ड्रग्स की सप्लाई अनेक प्रकार से हो रही है। पाक परस्त आतंकी संगठन ड्रोन आदि के माध्यम से सीमावर्ती क्षेत्रों में ड्रग्स, हथियार व धन को गिराते रहते हैं। इस प्रकार नशे की सप्लाई अनेक तरीकों से होती है और उन्हें भारत के किशोरों तथा युवाओं तक विभिन्न तरीकों से पहुंचाया जाता है। वर्ष 2025 में एम्स के सर्वे में पाया गया कि 11 से 14 वर्ष की उम्र में ही किशोर नशीले पदार्थों के संपर्क मे आ गए थे। इन विषम परिस्थितियों को देखते हुए यह वृहद अभियान प्रारंभ किया गया है। नशे से आतंकवाद को पनपने में बहुत मदद मिलाती है इसलिए, यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन के बाद 28 हजार से अधिक स्थानों पर एक करोड़ से अधिक युवाओं ने भाग लिया और एक साथ नशा मुक्त भारत की शपथ ली। नशामुक्ति का यह अभियान राजनीति से दूर रहकर चलना चाहिए तभी भारत के किशोर, युवा और परिवार तथा बहन-बेटियां सुरक्षित जीवन जी सकेंगी और वर्ष-2047 तक भारत विकसित भारत बनकर उभर सकेगा। - मृत्युंजय दीक्षित
अकाली दल का बड़ा ऐलान, महिला आरक्षण और परिसीमन बिल का करेगा समर्थन; भाजपा से गठबंधन के संकेत तेज
अकाली दल ने महिला आरक्षण और परिसीमन बिल के समर्थन का ऐलान किया है। सुखबीर बादल की पीएम मोदी से मुलाकात के बाद भाजपा-अकाली गठबंधन की अटकलें तेज हो गई हैं।
राघव चड्ढा की पीएम मोदी से मुलाकात, पंजाब चुनाव से पहले मिलेगी बड़ी जिम्मेदारी? बढ़ी सियासी हलचल
राघव चड्ढा ने पीएम मोदी से मुलाकात की और तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा कीं। पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले उनकी संभावित बड़ी भूमिका को लेकर सियासी अटकलें तेज हैं।
शिवभक्तों की कांवड़ यात्रा को सकुशल संपन्न करवाना बहुत बड़ी चुनौती!
देवाधिदेव भगवान महादेव के प्रिय श्रावण मास में मां गंगा के जल से अपने आराध्य भगवान भोलेनाथ के जलाभिषेक के लिए दिल्ली और आसपास स्थित विभिन्न राज्यों के शिवभक्तों का उत्तराखंड से कांवड़ लाने के लिए अब तांता लगना शुरू हो गया है। इस बार तो कांवड़ यात्रा के शुरुआती दिनों में ही शिवभक्तों की भारी भीड़ सड़कों पर नज़र आने लगी है। कांवड यात्रा के मद्देनजर ही उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश के विभिन्न जनपदों, दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान आदि में शिवभक्तों की सुरक्षा के सिस्टम ने बेहद ही चाक-चौबंद व्यवस्था की है। शिवभक्तों के लिए रेलवे, परिवहन, विधुत विभाग आदि ने भी विशेष तैयारियां की हैं। सिस्टम ने पवित्र श्रावण मास में देवाधिदेव भगवान महादेव के करोड़ों शिवभक्तों को शांतिपूर्ण व भक्तिमय वातावरण में सकुशल कांवड़ यात्रा करवाने के लिए सुरक्षा, भोजन, पेयजल, चिकित्सा आदि व्यवस्था की बड़े पैमाने पर तैयारियां की है। कांवड़ यात्रा को सकुशल संपन्न करवाने के लिए उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा व राजस्थान आदि का पुलिस-प्रशासन दिन-रात एक करके अपने पूरे दल-बल के साथ सड़कों पर उतरकर के धरातल पर व्यवस्था बनाने में जुटा हुआ है। हालांकि पुलिस-प्रशासन को इस वर्ष कांवड़ियों की संख्या में भारी इज़ाफ़ा होने की उम्मीद है। ऐसी स्थिति में विशेषकर उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश के पुलिस-प्रशासन के ऊपर पर एक तरफ तो कांवड़ियों के लिए विभिन्न आवश्यक व्यवस्था बनाने की चुनौती है, वहीं दूसरी तरफ़ चाक-चौबंद सुरक्षा व्यवस्था करने कि अहम जिम्मेदारी है। वैसे भी उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव का वर्ष होने के चलते वहां के सिस्टम के सामने भगवान शिव की भक्ति के वातावरण को बनाएं रखने की बड़ी चुनौती खड़ी है। हालांकि यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देशों पर सिस्टम के द्वारा जिस तरह से उत्तर प्रदेश में शिवभक्त कांवड़ियों का सेवाभाव के साथ पलक-पांवड़े बिछाकर के स्वागत किया जाता है और कांवड़ियों को किसी प्रकार की कोई असुविधा ना हो इसका विशेष ध्यान रखा जाता है, इस स्थिति ने पिछले कई सालों से शिवभक्त कांवड़ियों की संख्या में भारी इज़ाफ़ा करने का कार्य कर दिया है। जिसके चलते कांवड़ियों की सुरक्षा के लिए धरातल पर एक बेहद फुलप्रूफ व्यवस्था बनाते हुए चाक-चौबंद व्यवस्था करना चुनौती पूर्ण कार्य बन गया है। हर वर्ष की तरह ही कांवड़ यात्रा में पुलिस-प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह लाखों शिवभक्तों के बीच छिपे हुए चंद अराजकता फैलाने वाले हुड़दंगियों व नशेड़ियों की कैसे पहचान करें। हालांकि उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड के पुलिस-प्रशासन के पास भक्तों की भारी भीड़ को नियंत्रण करने व उनके लिए समुचित व्यवस्था करने का दशकों पुराना लंबा अनुभव है, जिस अनुभव के ही बलबूते पर ही इन राज्यों का सरकारी अमला हर वर्ष ऐसे मेलों में उत्पन्न विकट से भी विकट परिस्थितियों से भी आसानी से निपट लेता है। लेकिन इस बार तो शुरूआती दिनों से ही शिवभक्त कांवड़ियों की भारी भीड़ उमड़ती नज़र आ रही है, बड़ी संख्या में ही कांवड़िए मां गंगा का दिव्य जल लेकर के अपने गंतव्य स्थल की तरफ़ वापस चल दिए और एक-एक दिन के साथ ही शिवभक्त कांवड़ियों की यह संख्या तेज़ी से बढ़ती जा रही है। वहीं उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में कुछ हुड़दंगियों के द्वारा बवाल किये जाने की भी घटनाएं भी सामने आने लगी हैं। जिसके चलते ही उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश में शुरूआती दौर के दिनों में ही कांवड़ यात्रा मार्ग के अधिकांश रास्तों पर ट्रैफिक डायवर्ट करते हुए बहुत सारी जगहों पर ट्रैफिक को वन-वे तक भी करना पड़ गया है, हालांकि ऐसा करने से लोगों को काफ़ी असुविधा भी हो रही है, लेकिन पुलिस-प्रशासन के पास इसके अलावा कोई विकल्प अभी तो मौजूद नहीं है। इसे भी पढ़ें: मेरठ में CM Yogi ने कांवड़ियों पर बरसाए फूल, बोले- 4 से 5 करोड़ शिव भक्तों के आने की उम्मीद वैसे भी हमारे प्यारे देश में जिस तरह का माहौल चल रहा है, उस स्थिति में शिवभक्त कांवड़ियों की सुरक्षा की पूरी व्यवस्था को चाक-चौबंद करने के लिए ट्रैफिक डायवर्ट व वन-वे करने की यह व्यवस्था सिस्टम का बेहद जरूरी कदम है। इसलिए ही उत्तराखंड से लेकर के कांवड़ यात्रा के पूरे मार्ग पर अब चप्पे-चप्पे पर होमगार्ड, ट्रैफिक पुलिस, पुलिस, पीएसी, आरएएफ, एटीएस आदि तक का बेहद ही सख्त पहरा नज़र आने लग गया है। गंगा घाटों पर एनडीआरएफ, एसडीआरएफ व गोताखोरों की टीम दल-बल के साथ तैनात हैं, कांवड़ यात्रा मार्ग पर जगह-जगह अग्निशमन विभाग के जांबाजों, जिला प्रशासन की टीम, चिकित्सा विभाग की टीम, नगर निगम, नगर पालिका परिषद जिला पंचायत व ग्राम पंचायत आदि के कर्मचारियों, अधिकारियों ने चौबीस घंटे मोर्चा संभाल रखा है। वहीं पुलिस-प्रशासन के आला अधिकारी स्वयं पूरी टीम के साथ सड़कों पर उतरे हुए हैं और हर व्यवस्था को स्वयं परखने का कार्य कर रहे हैं। कांवड़ यात्रा मार्ग पर किसी भी तरह का कोई भी विवाद खड़ा होने पर पुलिस-प्रशासन तुरंत सूझबूझ से मामले को शांत कराते हुए, दोषियों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्यवाही करते हुए माहौल को सामान्य करने का कार्य बखूबी कर रहा है। सरकार व सिस्टम कांवड़ यात्रा के दौरान किसी भी तरह की कोई लापरवाही व कोई भी चूक बिल्कुल भी नहीं चाहता है। बेहतर व्यवस्था बनाने के लिए सख्ती का आलम यह हो गया है कि गाजियाबाद तक में भी 29 जुलाई से ही भारी वाहनों के लिए कांवड़ यात्रा मार्ग को बंद करते हुए रास्ते के बहुत सारे कट बंद कर दिए है और कांवड़ियों की सुरक्षा के लिए रास्ते वन-वे करने की युद्ध स्तर पर तैयारियां चल रही हैं। वैसे कांवड़ यात्रा के दौरान हर वर्ष ही क्षेत्रवासियों को असुविधाओं का सामना करना पड़ता है। लेकिन अलग कांवड़ यात्रा मार्ग ना होने से पुलिस-प्रशासन के पास कम से कम फिलहाल तो अन्य कोई विकल्प उपलब्ध नहीं है। कांवड़ यात्रा में सुरक्षा व्यवस्था का आलम देखें तो गाजियाबाद जनपद में ही, पुलिस कमिश्नर जे. रविंद्र गौड़, जिलाधिकारी रविंद्र कुमार मांदड, नगरायुक्त विक्रमादित्य सिंह मलिक, मुख्य अग्निशमन अधिकारी राहुल पाल व अन्य सभी आवश्यक विभागों के मुखिया अपनी पूरी टीम के साथ चौबीसों घंटे मुस्तैद खड़े हुए नज़र आते हैं। कांवड़ियों की सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर पुलिस कमिश्नर जे. रविंद्र गौड़ ने जनपद में पड़ने वाले करीब 80 किलोमीटर लंबे कांवड़ यात्रा मार्ग को बीटों में विभाजित करके अधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपी दी हैं। उन्होंने स्थाई कंट्रोल रूम, मुख्य कंट्रोल रूम, सब कंट्रोल रूम और अस्थाई कंट्रोल रूम बनाए हैं। कांवड़ यात्रा मार्ग को लाइट व सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में रखा गया है। सुरक्षा के दृष्टिकोण से जगह-जगह पुलिस ने बैरियर लगाए गए हैं। सार्वजनिक घोषणा प्रणाली बनाई गई है, रियल टाइम मॉनिटरिंग के अनुसार व्यवस्था बनाने की तैयारी। सुरक्षा के मद्देनजर नियमित रूप से डॉग स्कवायड, बम निरोधक दस्ता और लोकल इंटेलीजेंस की टीम के साथ पुलिस चेकिंग अभियान चलाते हुए, कांवड़ यात्रा को सकुशल संपन्न करवाने में दिन-रात व्यस्त है। पीआरवी एवं चीता मोबाइलों को कांवड़ यात्रा मार्ग पर लगाया गया है। घाटों पर एनडीआरएफ, एसडीआरएफ व गोताखोरों की टीम तैनात की गयी हैं। दमकल की गाड़ियां विभिन्न स्थानों पर तैनात हैं, चिकित्सकों व पैरा मेडिकल स्टाफ की टीम तैनात हैं, एंबुलेंस तैनात हैं, पथ-प्रकाश की समुचित व्यवस्था की गयी है, पेयजल की व्यवस्था की गयी है। जिलाधिकारी रविंद्र कुमार मांदड ने कांवड़ यात्रा को सुरक्षित और सुव्यवस्थित बनाने के लिए 6 कंट्रोल रूम और 2 विशेष हेल्पलाइन शुरू की हैं। 11 जोनल, 24 सेक्टर और 108 सब मजिस्ट्रेट तैनात किए गए हैं। कांवड़ यात्रा मार्ग पर लगें शिविरों की अनुमति देते समय ही आग से बचाव हेतु अग्निरोधी यंत्र, रेत की बाल्टी एवं पानी का ड्रम आदि रखवाने के लिए शिविर आयोजकों को निर्देशित किया गया है। कांवड़ शिविरों में विद्युत सुरक्षा उपायों के किये जाने का निर्देश दिए गए हैं। कांवड़ मार्ग के निकट कोई नया बखेड़ा खड़ा ना हो इसके लिए मीट, मछली और अंडा आदि की दुकानों को बंद करवा दिया गया है, शराब की दुकानों को ढंक दिया गया गया है। किसी प्रकार की कोई दुर्घटना ना घट जाये इसलिए कांवड़ की ऊंचाई 10 फुट एवं चौड़ाई 12 फुट तक रखने के निर्देश दिए गए है। डाक कांवड़ में मानकों के अनुसार म्यूजिक सिस्टम पर 75 डेसीबेल तक का ही शोर मान्य है, इस तरह की चाक-चौबंद व्यवस्था उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश के पूरे कांवड़ यात्रा मार्ग के सभी जनपदों में की गई है। हालांकि पुलिस-प्रशासन के द्वारा की गयी बेहद चाक-चौबंद व्यवस्था के बाद भी कांवड़ यात्रा मार्ग पर आने वाले दिनों किसी भी तरह से माहौल खराब करने वाले लोगों से निपटने की एक बड़ी चुनौती खड़ी है। क्योंकि यात्रा के दौरान कांवड़ छूने, कांवड़ के वाहनों से टकराने आदि छुटपुट बातों का बतंगड़ ना बने उससे निपटना बड़ा चुनौतीपूर्ण है। वैसे भी पिछले कुछ वर्षों से देश में जिस तेज़ी से धैर्य व छोटे-बड़े की शर्म, आपसी भाईचारा और सामाजिक समरसता, आपसी सहयोग का भाव दिन-प्रतिदिन बहुत तेज़ी से कम होता जा रहा है, कांवड़ यात्रा मार्ग में इसका प्रभाव अब वर्ष दर वर्ष स्पष्ट रूप से नज़र आने लगा है। जिसके चलते ही अब तो बिना सिर-पैर के विवाद भी कांवड़ यात्रा में बहुत बड़ी चुनौती पैदा करने लग गए हैं। हालांकि कांवड़ यात्रा को सकुशल संपन्न कराने के लिए उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश आदि में पुलिस-प्रशासन जबरदस्त ढंग से सक्रिय है और देवाधिदेव भगवान महादेव की कृपा से इस वर्ष भी कांवड़ यात्रा दिव्य, अलौकिक, यादगार बन कर के सकुशल संपन्न होगी। - दीपक कुमार त्यागी अधिवक्ता, स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक
UPI के जरिए होने वाले डिजिटल भुगतान पर लग सकता है MDR चार्ज, SBI चेयरमैन ने कही यह बात
UPI पर संभावित चार्ज को लेकर पैदा हुई आशंकाओं के बीच पेमेंट्स काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) ने स्पष्ट किया है कि ग्राहकों के लिए UPI भुगतान मुफ्त बना रहेगा। छोटे कारोबारियों को भी डिजिटल पेमेंट स्वीकार करने के लिए कोई शुल्क नहीं देना होगा।
योगी सरकार UP के सभी यूनिवर्सिटी-कॉलेजों में नशा विरोधी अभियान शुरू करने जा रही। रोज नशे के खिलाफ शपथ होगी और पदार्थों की ब्रिकी पर रोक होगी।
अगर भारत-पाक युद्ध हुआ तो क्या India के खिलाफ अपनी सेना उतारेंगे Turkey और Saudi Arabia?
नाटो के भीतर जब अमेरिका और उसके सहयोगियों के बीच भरोसे की दरारें गहरी हो रही हैं, ठीक उसी समय पश्चिम एशिया में एक नया शक्ति-केंद्र खड़ा करने की कोशिश शुरू हो गई है। मक्का में तुर्किये, सऊदी अरब और पाकिस्तान ने ऐसा रक्षा समझौता किया है, जिसकी सबसे अहम लाइन में साफ कहा गया है कि तीनों में से किसी एक पर हमला हुआ तो उसे तीनों पर हमला माना जाएगा। यही वह बिंदु है, जो इस समझौते को सामान्य सैन्य सहयोग से उठाकर एक संभावित नए क्षेत्रीय सुरक्षा गठबंधन में बदल देता है। हालांकि इसे अभी आधिकारिक तौर पर ‘सुन्नी नाटो’ कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन इसके भीतर उसकी बुनियादी तस्वीर जरूर दिखाई देने लगी है। देखा जाये तो मक्का में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन का एक मंच पर आना अपने आप में बड़ा संदेश है। खास बात यह है कि यह समझौता ऐसे समय हुआ है जब पश्चिम एशिया पहले ही ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव की आग में झुलस रहा है। सऊदी अरब पर ईरान और उसके सहयोगी संगठनों के हमलों का खतरा है। पाकिस्तान अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है और तुर्किये पश्चिम एशिया में अपनी भूमिका लगातार बढ़ा रहा है। यानी तीनों देश एक-दूसरे की जरूरत बन गए हैं। इसे भी पढ़ें: Iran ने Saudi Arabia, पाकिस्तान और Turkey के रक्षा समझौते को बताया बेअसर क्यों हुआ त्रि-पक्षीय समझौता? वर्तमान हालात को देखें तो सऊदी को चाहिए सुरक्षा, पाकिस्तान को पैसा और तुर्किये को ताकत, इसलिए तीनों एक साथ आ गये हैं। हालांकि इस गठजोड़ को समझने के लिए तीनों देशों के हितों को अलग-अलग देखना होगा। सबसे पहले सऊदी अरब की बात करें तो उसके सामने सबसे बड़ा सवाल सुरक्षा का है। दशकों तक रियाद ने अमेरिकी सुरक्षा छाते पर भरोसा किया। लेकिन अब सऊदी नेतृत्व यह मानकर चल रहा है कि बदलती अमेरिकी नीति में किसी एक बाहरी शक्ति पर पूरी तरह निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है। ईरान और उसके सहयोगियों की मिसाइल तथा ड्रोन क्षमता ने इस खतरे को और वास्तविक बना दिया है। ऐसे में सऊदी अरब ने अपना सुरक्षा कवच चौड़ा करना शुरू किया है। पाकिस्तान उसके लिए स्वाभाविक साझेदार है। पाकिस्तानी सेना दशकों से सऊदी सुरक्षा बलों को प्रशिक्षण देती रही है और हाल के महीनों में पाकिस्तान ने सऊदी अरब में सैनिकों, लड़ाकू विमानों, ड्रोन और वायु रक्षा प्रणालियों की मौजूदगी भी बढ़ाई है। वहीं पाकिस्तान की जरूरत बिल्कुल दूसरी है। आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान को सऊदी अरब से निवेश और आर्थिक मदद चाहिए, जबकि तुर्किये से रक्षा तकनीक और सैन्य सहयोग चाहिए। बदले में पाकिस्तान अपनी सेना और परमाणु क्षमता को मुस्लिम दुनिया की सुरक्षा में सबसे बड़ा सैन्य योगदान बताकर अपनी भू-राजनीतिक अहमियत बढ़ाना चाहता है। वहीं तुर्किये की बात करें तो एर्दोगन लंबे समय से अपने देश को सिर्फ नाटो का सदस्य नहीं, बल्कि मुस्लिम दुनिया की एक स्वतंत्र शक्ति के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। तुर्किये के पास अत्याधुनिक ड्रोन, रक्षा उद्योग और बड़ी सैन्य ताकत है। पाकिस्तान के साथ उसका रक्षा सहयोग पहले ही तेजी से बढ़ चुका है। यह गठबंधन किसके खिलाफ है? अब सवाल उठता है कि यह गठबंधन किसके खिलाफ है? इस सवाल का जवाब हालांकि तीनों देशों ने नहीं में दिया है। तुर्किये ने साफ कहा है कि समझौता रक्षात्मक है, यह किसी खास देश या संगठन को निशाना नहीं बनाता और दूसरे क्षेत्रीय देशों के लिए भी खुला है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सिर्फ दस्तावेज की भाषा नहीं देखी जाती, टाइमिंग भी देखी जाती है। और इस समझौते की टाइमिंग बहुत कुछ कहती है क्योंकि इस समय ईरान और सऊदी अरब के बीच तनाव चरम पर है। ईरान समर्थित हूती, इराकी मिलिशिया और अन्य समूहों की गतिविधियों ने खाड़ी देशों की सुरक्षा चिंता बढ़ाई है। दूसरी तरफ इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष ने पूरे क्षेत्र को बारूद के ढेर में बदल दिया है। इसलिए यह समझौता भले ही ईरान का नाम न ले, लेकिन ईरान के लिए इसका संदेश साफ है कि सऊदी अरब अब अकेला नहीं है। ईरान की बढ़ेंगी मुश्किलें वहीं इस समझौते के बाद ईरान के लिए नई चुनौती खड़ी हो गयी है। तेहरान अब तक पश्चिम एशिया में अपने प्रभाव का बड़ा हिस्सा सहयोगी और प्रॉक्सी संगठनों के नेटवर्क के जरिए कायम करता रहा है। लेकिन यदि सऊदी अरब को पाकिस्तान की सैन्य क्षमता और तुर्किये की रक्षा तकनीक का समर्थन मिलने लगे तो क्षेत्रीय समीकरण बदल सकते हैं। यही कारण है कि मक्का समझौते को ईरान के खिलाफ सीधा सैन्य गठबंधन नहीं होते हुए भी ईरान के लिए रणनीतिक चुनौती जरूर माना जा सकता है। इजराइल-अमेरिका को भी संदेश दिलचस्प बात यह है कि इस गठबंधन का एक और बड़ा संदेश इजरायल के लिए भी है। पश्चिम एशिया में जिस ‘सुन्नी धुरी’ की चर्चा लंबे समय से होती रही है, वह अब सिर्फ राजनीतिक अवधारणा नहीं रहना चाहती। साथ ही यह अमेरिका के लिए भी खतरे की घंटी है और यह समझौता वाशिंगटन के लिए भी सुखद खबर नहीं है। दरअसल सऊदी अरब और तुर्किये दोनों अमेरिकी सुरक्षा व्यवस्था के पुराने साझेदार हैं। लेकिन यदि यही देश अपनी सुरक्षा के लिए अलग क्षेत्रीय सैन्य ढांचा बनाने लगें तो इसका अर्थ साफ है कि अमेरिकी सुरक्षा छतरी पर भरोसा कम हो रहा है। यही इस समझौते का सबसे बड़ा दीर्घकालिक रणनीतिक अर्थ हो सकता है। सुन्नी नाटो सिर्फ कल्पना है या हकीकत? इसके अलावा, यदि मक्का मॉडल सफल होता है और उसमें दूसरे सुन्नी देश शामिल होते हैं, तो पश्चिम एशिया में अमेरिका के नेतृत्व वाली सुरक्षा व्यवस्था के समानांतर एक क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचा खड़ा हो सकता है। सवाल उठता है कि इसमें और कौन-से देश शामिल हो सकते हैं? इसके जवाब में कतर, मिस्र, संयुक्त अरब अमीरात और सीरिया जैसे देशों के नाम संभावित सदस्य के रूप में सामने आ रहे हैं। हालांकि यह भी एक तथ्य है कि यूएई की कई क्षेत्रीय मुद्दों पर सऊदी अरब और तुर्किये से अलग नीति रही है। साथ ही मिस्र भी किसी ऐसे सैन्य गठबंधन में फंसना नहीं चाहेगा जो उसे सीधे किसी क्षेत्रीय युद्ध में धकेल दे। वहीं सीरिया अपनी युद्धोत्तर परिस्थितियों से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा है। इसलिए ‘सुन्नी नाटो’ का विस्तार संभव जरूर है, लेकिन आसान नहीं है। त्रि-पक्षीय समझौते का भारत पर क्या होगा असर? अब सवाल यह है कि इस रक्षा समझौते का भारत पर क्या असर पड़ेगा और अगर भारत-पाकिस्तान के बीच फिर सैन्य टकराव हुआ तो क्या तुर्किये और सऊदी अरब पाकिस्तान के साथ खड़े होंगे और भारत के खिलाफ युद्ध लड़ेंगे? देखा जाये तो भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता पाकिस्तान की बढ़ती रणनीतिक क्षमता है। तुर्किये पहले से ही पाकिस्तान का करीबी सैन्य साझेदार है और कश्मीर से लेकर रक्षा सहयोग तक उसका रुख भारत के लिए चिंता का विषय रहा है। 2025 के भारत-पाकिस्तान सैन्य टकराव में भी अंकारा ने खुलकर पाकिस्तान का समर्थन किया था। ऐसे में भविष्य में पाकिस्तान को तुर्किये से ड्रोन, हथियार, तकनीक, खुफिया सहयोग और सैन्य सहायता का अधिक संगठित समर्थन मिल सकता है। हालांकि सऊदी अरब को तुर्किये के साथ एक ही नजर से देखना सही नहीं होगा क्योंकि रियाद के पाकिस्तान से गहरे रक्षा संबंध जरूर हैं, लेकिन भारत भी उसके लिए ऊर्जा, व्यापार, निवेश और रणनीतिक सहयोग का अहम साझेदार है। इसलिए भारत-पाकिस्तान संघर्ष की स्थिति में तुर्किये का पाकिस्तान के पक्ष में खुलकर खड़ा होना ज्यादा संभावित है, जबकि सऊदी अरब के लिए सीधे भारत के खिलाफ युद्ध में उतरना आसान नहीं होगा। वह पाकिस्तान को राजनीतिक, आर्थिक या सीमित सैन्य-लॉजिस्टिक मदद दे सकता है, लेकिन मक्का समझौते की मौजूदा सार्वजनिक भाषा से यह नहीं कहा जा सकता कि पाकिस्तान पर हमले की स्थिति में सऊदी और तुर्किये अपने आप भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ देंगे। यही वजह है कि भारत के लिए असली चिंता इस समझौते की ‘सामूहिक युद्ध’ वाली भाषा से ज्यादा पाकिस्तान को मिलने वाली संभावित अतिरिक्त सैन्य और रणनीतिक ताकत है। पाकिस्तान का विरोधाभास हालांकि इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान का सबसे बड़ा विरोधाभास भी सबके सामने आया है। जिस देश की अपनी सीमाओं पर लगातार तनाव है, जिसे अफगानिस्तान सीमा पर संघर्ष का सामना करना पड़ रहा है, जिसके बलूचिस्तान प्रांत ने आजादी का ऐलान कर दिया है, जिसके अवैध कब्जे वाले पीओके में विद्रोह और दमन तेज होता जा रहा है, वह देश अब मुस्लिम दुनिया की सामूहिक सुरक्षा का प्रहरी बनने की भूमिका तलाश रहा है। देखा जाये तो पाकिस्तान के आंतरिक संकटों के बीच यह समझौता उसके लिए अपनी अंतरराष्ट्रीय प्रासंगिकता दिखाने का अवसर भी बन गया है। कई सवालों के जवाब समय देगा वैसे मक्का समझौते की असली परीक्षा तब होगी जब तीनों में से किसी एक पर वास्तविक सैन्य हमला होगा। अगर सऊदी अरब पर हूती या किसी अन्य ईरान समर्थित समूह का बड़ा हमला होता है, तो क्या पाकिस्तान और तुर्किये युद्ध में उतरेंगे? अगर पाकिस्तान पर हमला होता है, तो क्या सऊदी अरब और तुर्किये सैनिक भेजेंगे? और अगर भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध होता है, तो क्या रियाद अपने भारत संबंधों को दांव पर लगाकर इस्लामाबाद के साथ खड़ा होगा? इन सवालों का जवाब अभी किसी के पास नहीं है। लेकिन एक बात साफ है कि मक्का में सिर्फ एक समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हुए हैं। पश्चिम एशिया में शक्ति के नए समीकरण की नींव रखी गई है। बहरहाल, नाटो की छतरी के नीचे मतभेद बढ़ रहे हैं और उसी समय मुस्लिम दुनिया के तीन देश अपनी सुरक्षा को एक-दूसरे से जोड़ रहे हैं। अभी इसे ‘सुन्नी नाटो’ कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन यदि इसमें दूसरे देश जुड़ते हैं, संयुक्त सैन्य अभ्यास बढ़ते हैं, खुफिया और हथियार सहयोग संस्थागत होता है और ‘एक पर हमला, सभी पर हमला’ सिर्फ कागज की लाइन न रहकर वास्तविक सैन्य नीति बन जाती है, तो आने वाले वर्षों में पश्चिम एशिया का नक्शा बदल सकता है। -नीरज कुमार दुबे
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मुंबई, भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के तहत मुंबई में गुरुवार से ब्रिक्स वेव्स बाजार 2026 का शुभारंभ हुआ।
मोहन भागवत का युवाओं से संवाद राष्ट्र निर्माण की दिशा में अहम कदम: सतीश महाना
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FCRA Bill पर हल्ला मचा रहे विपक्षी दलों और ईसाई संगठनों को मार्को रुबियो का बयान सुनना चाहिए
केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) संशोधन विधेयक को लेकर देश में तो इस समय व्यापक बहस छिड़ी ही हुई है, साथ ही इसकी गूंज अमेरिका तक सुनाई दे रही है। दिलचस्प बात यह है कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो पहले स्वयं यह कह चुके हैं कि किसी भी देश में विदेशी फंड से संचालित संस्थाओं को वहां की संप्रभु सरकार के समानांतर व्यवस्था नहीं चलानी चाहिए और उन्हें मेजबान देश के कानूनों का सम्मान करना चाहिए। इसके बावजूद अमेरिकी सांसद राइली मूर भारत के प्रस्तावित कानून की आलोचना कर रहे हैं। दूसरी ओर, मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात के बाद स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार ने उन्हें आश्वस्त किया है कि प्रस्तावित संशोधन को पूर्व प्रभाव (रेट्रोस्पेक्टिव) से लागू नहीं किया जाएगा। इन घटनाक्रमों के बीच मोदी सरकार का स्पष्ट संदेश है कि विदेशी धन प्राप्त करने वाले संगठनों के संचालन में पारदर्शिता, जवाबदेही और भारतीय कानूनों का पालन सर्वोच्च प्राथमिकता रहेगा। हम आपको बता दें कि केंद्र सरकार के आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में एफसीआरए के तहत पंजीकृत सक्रिय संगठनों की संख्या घटी है, लेकिन विदेशी चंदे का प्रवाह बना हुआ है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2024-25 में 16,200 संगठनों को लगभग 22,963 करोड़ रुपये का विदेशी योगदान प्राप्त हुआ। वहीं बड़ी संख्या में ऐसे संगठनों के एफसीआरए लाइसेंस निरस्त या समाप्त भी किए गए हैं। सरकार का कहना है कि केवल वैध पंजीकरण रखने वाले संगठनों को ही विदेशी धन प्राप्त करने और उसका उपयोग करने का अधिकार होना चाहिए। इसे भी पढ़ें: संसद में सत्ता-विपक्ष की टकरार! Kharge के दावे पर Kiren Rijiju का तीखा वार हम आपको बता दें कि सरकार द्वारा लाए गए संशोधन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यदि किसी संस्था का एफसीआरए पंजीकरण समाप्त हो जाता है, रद्द हो जाता है, नवीनीकृत नहीं होता या संस्था स्वयं उसे छोड़ देती है, तो विदेशी धन से निर्मित परिसंपत्तियों के प्रबंधन के लिए एक नामित प्राधिकरण की व्यवस्था की जाएगी। यदि बाद में संस्था का पंजीकरण बहाल हो जाता है तो संबंधित संपत्तियां और अप्रयुक्त विदेशी योगदान वापस कर दिए जाएंगे। यदि ऐसा नहीं होता, तो कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी। केंद्र सरकार का तर्क है कि यह व्यवस्था किसी नए अधिकार का सृजन नहीं, बल्कि पहले से मौजूद प्रावधानों को अधिक स्पष्ट और व्यवस्थित बनाने का प्रयास है। वहीं प्रस्तावित संशोधन को लेकर कुछ चर्च संगठनों ने आशंकाएं भी व्यक्त की हैं। उनका कहना है कि कानून की कुछ धाराएं अत्यधिक कठोर हैं और उन्हें संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजा जाना चाहिए। इसी उद्देश्य से विभिन्न चर्च संगठनों के प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की और अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं। वहीं मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने अमित शाह के साथ बैठक के बाद कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री ने स्पष्ट आश्वासन दिया है कि प्रस्तावित संशोधन को पूर्व प्रभाव से लागू नहीं किया जाएगा। हम आपको यह भी बता दें कि केंद्र सरकार ने इन आशंकाओं का विस्तार से जवाब भी दिया है। सरकार का कहना है कि प्रस्तावित कानून किसी विशेष धर्म, समुदाय या विचारधारा को निशाना नहीं बनाता। एफसीआरए के प्रावधान सभी विदेशी चंदा प्राप्त करने वाले संगठनों पर समान रूप से लागू होते हैं। केंद्र सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि किसी धार्मिक स्थल से जुड़ी संपत्ति का मामला आता है तो उसके धार्मिक स्वरूप को कानूनन सुरक्षित रखा जाएगा। साथ ही, नामित प्राधिकरण के आदेश अंतिम नहीं होंगे और उनके विरुद्ध न्यायालय में अपील का अधिकार भी उपलब्ध रहेगा। उधर, इस पूरे विवाद का अंतरराष्ट्रीय पहलू भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। अमेरिकी सांसद राइली मूर ने आरोप लगाया कि यह कानून चर्चों और ईसाई संस्थाओं के खिलाफ है। हालांकि स्वयं अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने पिछले वर्ष यह कहा था कि विदेशी सहायता कार्यक्रम मेजबान देशों की सरकारों के समानांतर नहीं चलने चाहिए और विदेशी वित्तपोषित संस्थाओं को संबंधित देश की नीतियों और कानूनों के अनुरूप काम करना चाहिए। यही कारण है कि भारत के संदर्भ में उठ रही आलोचना पर दोहरे मापदंड का प्रश्न भी सामने आया है। देखा जाये तो लोकतंत्र में किसी भी कानून पर बहस और समीक्षा का अधिकार सभी को है, लेकिन भारत की संप्रभुता और राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हैं। यदि कोई संगठन विदेशी चंदे के सहारे पूरी पारदर्शिता और भारतीय कानूनों का पालन करते हुए जनकल्याण का कार्य करता है, तो उसके लिए इस कानून से घबराने का कोई कारण नहीं होना चाहिए। इसके विपरीत, जिन संस्थाओं या तत्वों ने विदेशी धन का उपयोग नियमों से इतर गतिविधियों, अपारदर्शी वित्तीय लेन-देन या भारत में अस्थिरता और अशांति फैलाने के प्रयासों के लिए किया है, उनके लिए स्वाभाविक रूप से चिंता की स्थिति पैदा हो सकती है क्योंकि प्रस्तावित संशोधन निगरानी, जवाबदेही और कानूनी अनुपालन को और मजबूत करने का प्रयास करता है। मोदी सरकार का कहना है कि यह कानून किसी धर्म या समुदाय को लक्षित नहीं करता, बल्कि विदेशी अंशदान के नियमन और पारदर्शिता के लिए समान रूप से लागू होगा। ऐसे में यदि विदेशी फंडिंग के नाम पर नियमों की अनदेखी करने वालों की मुश्किलें बढ़ती हैं, तो इसे कानून के दायरे में जवाबदेही सुनिश्चित करने की प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए। बहरहाल, संसद में होने वाली चर्चा के बाद कानून का अंतिम स्वरूप तय होगा, लेकिन यह स्पष्ट है कि विदेशी धन के उपयोग पर प्रभावी निगरानी और राष्ट्रीय हितों की रक्षा किसी भी संप्रभु राष्ट्र की वैध जिम्मेदारी है। -नीरज कुमार दुबे
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पहली तिमाही में बेहतर रहे भारतीय कंपनियों के नतीजे
नई दिल्ली, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में भारतीय कंपनियों के नतीजे उम्मीद से बेहतर रहे हैं।
मध्य प्रदेश में शुरू होगा 6 महीने का जन विश्वास अभियान, जनता के बीच जाएंगे मंत्री-अधिकारी
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राजेंद्र माथुर- विचारों की पत्रकारिता के नायक
राजेंद्र माथुर की पूरी जीवन यात्रा एक साधारण आम आदमी की कथा है। वे इतने साधारण हैं कि असाधारण लगने लगते हैं। उन्होंने जो कुछ पाया, एकाएक नहीं पाया; संघर्ष से पाया, नियमित लेखन से पाया और अपनी रचनाशीलता से पाया। इसी संघर्ष की वृत्ति ने उन्हें असाधारण पत्रकार और संपादक बना दिया। राजेंद्र माथुर का पत्रकारीय व्यक्तित्व इस बात से तय होता है कि आखिर उनके लेखन में विचारों की गहराई कितनी है। अपने अखबार को ऊंचाइयों पर ले जाने का उनका संकल्प कितना गहरा है और हमारे समय के प्रश्नों के जवाब तलाशने तथा नए सवाल खड़े करने की कितनी प्रश्नाकुलता संबंधित व्यक्ति में है। राजेंद्र माथुर का संपादकीय और पत्रकारीय व्यक्तित्व इस बात की गवाही देता है कि वे असहज प्रश्नों से मुंह नहीं चुराते, बल्कि उनसे दो-दो हाथ करते हैं। वे सवालों से जूझते हैं और उनके सही एवं प्रासंगिक उत्तर तलाशने की कोशिश करते हैं। वे सही मायने में पत्रकारिता में विचारों के एक ऐसे प्रतीक पुरुष बनकर सामने आए, जिन्होंने अपने लेखन के माध्यम से एक बौद्धिक उत्तेजना का सृजन किया और हिंदी को एक ऐसी भाषा तथा विराट अनुभव-संसार दिया, जिसकी प्रतीक्षा में वह सालो से खड़ी थी। इस मायने में राजेंद्र माथुर की उपस्थिति अपने समय में एक कद्दावर पत्रकार-संपादक की मौजूदगी है। वरिष्ठ पत्रकार श्री सूर्यकांत बाली के मुताबिक,“माथुर साहब जैसा बोलते थे, वैसा ही लिखते थे। वे धाराप्रवाह, विचार-परिपूर्ण और रूपक-अलंकृत बोलते थे, तो धाराप्रवाह, विचार-परिपूर्ण और रूपक-अलंकृत लिखते भी थे।” ऐसे में कहा जा सकता है कि राजेंद्र माथुर के पत्रकारीय एवं संपादकीय व्यक्तित्व में एक बौद्धिक आकर्षण दिखता है। उनके लेखन में भारत-जिज्ञासा, भारत-अनुराग और भारत-स्वप्न पूरी समग्रता में प्रकट होते हैं। वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने लिखा है कि “राजेंद्र माथुर में बौद्धिकता और सच्चरित्रता का असाधारण संगम था, इसीलिए वे हिंदी पत्रकारिता में शिखर स्थान पा सके। वे असाधारण शैलीकार थे। अंग्रेजी साहित्य के प्राध्यापक होने के बावजूद उनकी हिंदी लेखन शैली बिंब-प्रधान थी। उनके मुहावरे अपने होते थे। उनमें अभिव्यंजना की अद्भुत शक्ति थी। हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में वे एक शैलीकार के रूप में याद किए जाएंगे।” इसे भी पढ़ें: अब शिवाजी, चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह जैसे लोग क्यों नहीं मिलते? राजेंद्र माथुर एक श्रेष्ठ संपादक थे। उनकी उपस्थिति ही 'नईदुनिया' और 'नवभारत टाइम्स' को एक ऐसा समाचार पत्र बनाने में सफल हुई, जिस पर हिंदी पत्रकारिता को नाज है। 'नवभारत टाइम्स' में श्री माथुर के सहयोगी रहे श्री विष्णु खरे ने लिखा है कि, “राजेंद्र माथुर महान संपादक होने का अभिनय करने की कोई जरूरत महसूस नहीं करते थे। दरअसल, लिबास से लेकर बोलचाल तक उनकी कोई बनावटी शैली या लहजा नहीं था; वे अपने मामूलीकरण में विश्वास करते थे, वैशिष्ट्य में नहीं। उनकी संपादकीय आदेशों या हुक्मों से नहीं, एक गुणात्मक तथा नैतिक विकिरण से चलती” राजेंद्र माथुर का पत्रकारीय व्यक्तित्व बेहद प्रेरक था। आज की पत्रकारिता और मीडिया संस्थानों में घुस आई तमाम बुराइयों से उनका व्यक्तित्व एकदम अलग था। संपादक की जैसी शास्त्रीय परिभाषाएं बताई गई हैं, श्री माथुर उन पर पूरी तरह फिट बैठते हैं। उनके समकक्ष पत्रकारों की राय में, जिस समय वे दिल्ली में 'नवभारत टाइम्स' जैसे बड़े अखबार के संपादक थे, वे सत्ता के लाभ उठा सकते थे। आज की पत्रकारिता में जिस तरह पत्रकार एवं संपादक सत्ता से लाभ लेकर मंत्री से लेकर राज्यसभा की सीटें ले रहे हैं, श्री माथुर भी ऐसे प्रलोभनों के पास जा सकते थे। किंतु उन्होंने तमाम चर्चाओं के बीच इससे खुद को बचाया। पत्रकार विष्णु खरे अपने लेख में इस बात की पुष्टि भी करते हैं। सही मायने में राजेंद्र माथुर एक ऐसे संपादक के रूप में सामने आते हैं, जिन्होंने अपने पत्रकारीय व्यक्तित्व को वह ऊंचाई दी जिसके लिए पीढ़ियां उन्हें याद कर रही हैं। उनके पत्रकारीय व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खूबी हिंदी पत्रकारिता को लेकर उनकी चिंताएं हैं। वे हिंदी पत्रकारिता के एक ऐसे संपादक थे, जो लगातार यह सोचते रहे कि हिंदी पत्रकारिता का विचार-दारिद्र्य कैसे दूर किया जाए और कैसे हिंदी में एक संपूर्ण अखबार निकले तथा उसे व्यापक लोकस्वीकृति भी मिल सके। 'नवभारत टाइम्स' के कार्यकारी संपादक रहे स्व. सुरेंद्र प्रताप सिंह ने उनकी इन चिंताओं को निकटता से देखा था। वे लिखते हैं, “माथुर साहब का गहन इतिहास-बोध, शुद्ध श्रद्धा और उससे उत्पन्न गरिमामय अतीत की मरीचिका पर आधारित हिंदी पत्रकारिता की कमजोर आधारभूमि के बारे में उन्हें बार-बार सचेत करता रहता था। वे भूतकाल के वायवीय स्वर्णिम अतीत में जीने वाले नहीं थे। वे स्वप्नदर्शी थे और अपने सपनों की उदात्तता के साथ उन्होंने कभी किसी प्रकार का समझौता नहीं किया। हिंदी पत्रकारिता का वर्तमान परिदृश्य उन्हें बार-बार विचलित तो कर देता था, लेकिन एक कुशल अभियात्री की तरह उन्होंने अपने जहाज की दिशा को क्षणिक प्रलोभनों के लिए किसी अन्य रास्ते पर डालने के बारे में क्षणिक विचार भी नहीं किया।” उनके पत्रकारीय व्यक्तित्व की विशिष्टता यह भी है कि वे अंग्रेजी के प्राध्यापक और विद्वान होने के बावजूद अपने लेखन की भाषा के नाते हिंदी को चुनते हैं। हिंदी उनकी सांसों में बसती थी। हिंदी पत्रकारिता को नई जमीन तोड़ने के लिए प्रेरित करने और हिंदी लेखकों एवं पत्रकारों की एक पूरी पीढ़ी का निर्माण करने का काम श्री माथुर जीवन भर करते रहे। इंदौर से लेकर दिल्ली तक उनकी पूरी यात्रा में एक भारत-प्रेम, भारत-बोध और हिंदी-प्रेम साफ नजर आता है। शायद इसी के चलते वे देश की पत्रकारिता को एक नई और सही दिशा देने में सफल रहे। श्री मधुसूदन आनंद लिखते हैं, “माथुर साहब ने अंग्रेजी में एम.ए. किया था और अंग्रेजी भाषा पर उनकी पकड़ अंग्रेजी पत्रकारों को भी विस्मय में डालती थी। लेकिन उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को चुना, तो शायद इसलिए कि वे अपनी बात अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना चाहते थे। अगर यह कहा जाए कि हिंदी पत्रकारों की एक पीढ़ी माथुर साहब को पढ़कर पली और बढ़ी है, तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। उनके असामयिक निधन के बाद 'नवभारत टाइम्स' को देश के दूर-दूर के इलाकों से हजारों पत्र प्राप्त हुए थे। ये वे पाठक थे, जो उनके उत्कट राष्ट्र-प्रेम, समाज के प्रति उनके सरोकारों, इतिहास की अतल गहराइयों से अनमोल तथ्य ढूंढ कर लाने के उनके सामर्थ्य और शालीन भाषा में राजनेताओं की खिंचाई करने के उनके साहस पर मुग्ध थे।” उनके व्यक्तित्व की एक बड़ी विशेषता थी, जिसे उनके सहयोगी रहे सूर्यकांत बाली इन शब्दों में रेखांकित करते हैं,“हमारे प्रधान संपादक को कोई पांचवां काम आता है, इस पर तो मुझे पूरा शक है: बस सोचना, पढ़ना, बतियाना और लिखना, उनकी सारी दुनिया इन चार कामों में सिमट चुकी थी।” श्री माथुर के व्यक्तित्व पर यह एक मुकम्मल टिप्पणी है, जो बताती है कि वे किस तरह के पत्रकार-संपादक थे। उनका पत्रकारीय व्यक्तित्व इसीलिए एक अलग किस्म की आभा के साथ सामने आता है, जिसमें एक बौद्धिक तेज और आकर्षण निरंतर दिखता है। उनके पत्रकारीय व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे एक ऐसे लेखक-संपादक के तौर पर सामने आते हैं, जो पूर्णकालिक पत्रकार थे। वे किसी साहित्य की परंपरा से आने वाले संपादक नहीं थे। अतः उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को साहित्यकार-संपादकों द्वारा दी गई भाषा और उसके मुहावरों से अलग एक अनूठी पत्रकारीय भाषा का अनुभव दिया। हिंदी को संवाद, संचार और सूचना की भाषा बनाने में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। सही मायने में वे एक ऐसे संपादक और लेखक के रूप में सामने आते हैं, जिन्होंने बहुत से अनछुए विषयों को हिंदी के अनुभव का विषय बनाया, जिन पर पहले अंग्रेजी के पत्रकारों का एकाधिकार माना जाता था। उन्होंने भावनाओं से ऊपर विचार और बौद्धिकता को महत्व दिया। इसके चलते हिंदी को एक नई भाषा, एक नया अनुभव और अभिव्यक्ति का एक नया संबल मिला। उनकी बौद्धिकता ने हिंदी पत्रकारिता को अंग्रेजी अखबारों के सामने सम्मान से खड़े होने लायक बनाया, जिससे हिंदी पत्रकारिता ने एक नया आत्मविश्वास और नई ऊर्जा हासिल की। आज हिंदी पत्रकारिता पर जिस तरह बाजारवादी ताकतों का दबाव गहरा रहा है, ऐसे समय में राजेंद्र माथुर के बहाने हिंदी पत्रकारिता की पड़ताल एक आवश्यक विमर्श बन गई है। शायद उनकी स्मृति के बहाने हम कुछ ऐसे रास्ते तलाश पाएं, जो हमें इस कठिन समय में अपने मूल्यों के साथ काम करने का हौसला दे सकें। - प्रो.संजय द्विवेदी (लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)
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बिहार सरकार ने एमएसएमई के लिए अलग निदेशालय बनाया, पहली बार छोटे उद्योगों की चिंता : श्याम सुंदर भीमसरिया
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सीबीआई की कार्रवाई, 2021 बंगाल चुनाव के बाद हिंसा में हुई हत्या के मामले में घोषित अपराधी गिरफ्तार
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सदन का वॉकआउट करके कांग्रेस खुद को पहुंचा रही नुकसान, सरकार चर्चा के लिए तैयार : किरेन रिजिजू
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पश्चिम बंगाल में मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने पर सियासत, इमाम बोले- बनाया जा रहा दबाव
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बिहार में राहुल गांधी और अन्य विपक्षी सांसदों के खिलाफ अदालत में शिकायत दर्ज
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दिल्ली विधानसभा स्पीकर ने मानसून सत्र से पहले सुरक्षा व्यवस्था का लिया जायजा
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संसद नहीं चलने देना विपक्ष की साजिश, सरकार हर मुद्दे पर बहस के लिए तैयार : भाजपा
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राजस्थान के मुख्यमंत्री विधानसभा सत्र से पहले दिल्ली पहुंचे, गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की
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प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री की अनुपस्थिति से सदन का संचालन बाधित हो रहा : कांग्रेस
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नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश में भूस्खलन: राहुल गांधी, प्रियंका-खड़गे ने घायलों के जल्द स्वस्थ होने की कामना की
तमिलनाडु ने धान किसानों की सुरक्षा के लिए 34.72 करोड़ रुपए की बीज सब्सिडी शुरू की
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लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे पर दरारें: परियोजना निदेशक बर्खास्त, निर्माण एजेंसी को कारण बताओ नोटिस जारी
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कॉकरोच जनता पार्टी ने 'क्या बोलती जनता?' राष्ट्रव्यापी अभियान की घोषणा की
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भारत-चीन सीमा की अपुष्ट तस्वीरें वायरल, आधिकारिक स्रोतों पर ही भरोसा करने की अपील
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गोंडा में बृजभूषण शरण सिंह की 'सत्यमेव जयते रैली', बोले- साजिश के तहत बदनाम किया गया
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कलकत्ता हाई कोर्ट ने सीबीआई को आरजी कर केस में नई जांच में तेजी लाने का निर्देश दिया
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भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों का आरोप, मिनी यूनिट्स की प्रमुख सेवाओं में कटौती कर रहा बीएमएचआरसी
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भाजपा ने संसद में व्यवधान उत्पन्न करने के लिए खड़गे और राहुल गांधी की आलोचना की
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मौलाना साजिद रशीदी का आदर्श ओसामा बिन लादेन रहा होगा: मिथिलेश तिवारी
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'एनसीपीआई में सभी एकजुट, देशहित में करेंगे काम', एनडीए की बैठक पर बोले यूसुफ पठान
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महाराष्ट्र: मनोज जरांगे ने कुनबी प्रमाणपत्र रद्द करने को लेकर राज्य सरकार पर साजिश का आरोप लगाया
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केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू की राहुल गांधी से बात, परिसीमन विधेयक के लिए मांगा समर्थन
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अमरावती, 6 अगस्त (आईएएनएस)। जनसेना के राज्यसभा सांसद लिंगमनेनी रमेश ने आंध्र प्रदेश में दो नए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) स्तर के संस्थानों की स्थापना की मांग की है। उन्होंने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को पत्र लिखकर राज्य में तृतीयक स्वास्थ्य सेवाओं के ढांचे को मजबूत करने के लिए हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया।
इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल में भारत का प्रदर्शन उम्मीद से कहीं बेहतर रहा। भारत ने 13 स्वर्ण, 17 रजत और 9 कांस्य सहित कुल 39 पदक जीते। वह पदक तालिका में चौथे नंबर पर रहा। पहली नजर में यह प्रदर्शन बर्मिंघम 2022 के 61 पदक से कमजोर दिख सकता है, लेकिन आंकड़े अलग कहानी बताते हैं। इस बार ग्लासगो में सिर्फ 10 खेल शामिल थे, जबकि बर्मिंघम में 19 खेल खेले गए थे। बैडमिंटन, कुश्ती, शूटिंग, हॉकी, टेबल टेनिस और क्रिकेट जैसे खेल ग्लासगो गेम्स का हिस्सा नहीं थे, जिनसे 2022 में भारत को 30 पदक मिले थे। इसके अलावा भारत ने 210 खिलाड़ियों की जगह सिर्फ 123 खिलाड़ियों का दल भेजा। इनमें से 38 खिलाड़ी पदक जीतकर लौटे, यानी सफलता की दर 31 प्रतिशत रही। बर्मिंघम में यह आंकड़ा 29 प्रतिशत था। ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल शुरू होने से पहले भारतीय ओलंपिक संघ और विभिन्न खेल महासंघों की आंतरिक रिपोर्ट में भारत को 6 स्वर्ण समेत 31 पदक मिलने का अनुमान लगाया गया था। भारतीय खिलाड़ियों ने अनुमान से दोगुना से भी ज्यादा स्वर्ण जीते। कुल पदक में भी आगे निकल गए। ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल में भारत का सबसे सफल खेल बॉक्सिंग रहा। 14 मुक्केबाजों के दल में से 10 खिलाड़ी पदक जीतकर लौटे। इसमें 7 स्वर्ण और 3 रजत शामिल रहे। यानी 71 प्रतिशत मेडल कन्वर्जन रेट। बर्मिंघम 2022 में यह आंकड़ा 58 प्रतिशत था। पदक वितरण समारोह के दौरान सात बार भारत का राष्ट्रगान बजना न सिर्फ ग्लासगो में मौजूद भारतीय दर्शकों के लिए गर्व का पल था, बल्कि इस बात का सबूत भी था कि इस गैर-पारंपरिक खेल को गांवों और छोटे कस्बों तक ले जाने की पहल काफी हद तक सफल रही है। भारतीय बॉक्सरों के प्रदर्शन की जितनी भी प्रशंसा की जाए वो कम है। इसे भी पढ़ें: राष्ट्रमंडल खेल 2026: चुनौतियों के बीच चमका भारत जूडो में भारत ने पहली बार राष्ट्रमंडल खेल इतिहास में स्वर्ण जीता। अस्मिता डे और हर्ष सिंह ने स्वर्ण जीता। यामिनी मौर्य ने रजत और उन्नति शर्मा ने कांस्य जीतकर कुल चार पदक भारत की झोली में डाले। हालांकि 14 सदस्यीय भारतीय टीम के दो खिलाड़ी अरुण कुमार और तुलिका मान डोपिंग के कारण बाहर हो गए। इसी तरह, एथलीटों और पैरा-एथलीटों ने 16 पदक जीते। इनमें से कुछ ने तो नए राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी बनाए। वेटलिफ्टर्स ने आठ और पदक जीते। इन पदकों में ओलंपियन मीराबाई चानू का जीता हुआ एक स्वर्ण पदक भी शामिल था, जिससे उन्होंने स्वर्ण पदकों की हैट्रिक पूरी की; मणिपुर की इस एथलीट ने इससे पहले 2018 गोल्ड कोस्ट और 2022 बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेल में भी स्वर्ण पदक जीता था। असल में, मीराबाई चानू की शानदार कामयाबी के बावजूद, भारतीय वेटलिफ्टरों का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा। इस निराशा की एक वजह यह है कि डोपिंग के आरोपों के कारण कम से कम दो भारतीय वेटलिफ्टरों की एंट्री वापस लेनी पड़ी। छह अन्य खिलाड़ी—कड़ी टक्कर न होने के बावजूद—लड़ने के जज़्बे की कमी या तकनीकी गलतियों की वजह से स्वर्ण पदक जीतने का मौका चूक गए। एथलेटिक्स ने भारत को 10 पदक दिलाए, लेकिन एक भी स्वर्ण नहीं आया। नीरज चोपड़ा रजत जीत सके। उनके साथ डेब्यू कर रहे यशवीर सिंह ने कांस्य जीता। गुलवीर सिंह ने 10 हजार मीटर में सिल्वर और 5 हजार मीटर रेस में कांस्य जीतकर इतिहास रचा। गुलवीर एक ही कॉमनवेल्थ गेम्स में एथलेटिक्स में दो पदक जीतने वाले वह भारत के पहले खिलाड़ी भी बनें। तेजस्विन शंकर ने डेकाथलन में भारत का पहला राष्ट्रमंडल पदक दिलाया। सरवेश कुशारे, श्रीशंकर, प्रवीण चित्रावेल और सीमा कालीरामना भी पदक जीतने में सफल रहे। हालांकि स्प्रिंट और रिले टीम से बड़ी उम्मीदें थीं, वह खाली हाथ रही। इसमें कोई दो राय नहीं है कि मोदी सरकार के 12 वर्षों के शासन में देश में खेलों का संस्थागत विकास तेजी से हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बार यह दोहराया है कि खेल देश में एकता बढ़ाने, युवाओं को प्रेरित करने और भारत को एक आत्मविश्वासी और उभरती हुई वैश्विक ताकत के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। उनकी यह सोच कार्यों में भी दिखाई देती है, जैसे कि ‘खेलो इंडिया’और ‘टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम यानी टॉप्स’ जैसे प्रमुख कार्यक्रमों के माध्यम से। इन पहलों ने देश में खेलों की पूरी व्यवस्था को नया रूप दिया है और भारत को खेलकूद के प्रति समर्पित एक राष्ट्र बना दिया है। इन योजनाओं के कारण भारतीय खिलाड़ियों को बेहतर वित्तीय सहायता, आधुनिक प्रशिक्षण और अंतरराष्ट्रीय स्तर का एक्सपोजर मिला है, जिसके परिणामस्वरूप ओलंपिक, पैरालंपिक, कॉमनवेल्थ और एशियाई खेलों में भारत का प्रदर्शन लगातार सुधरा है। नई प्रतिभाओं को पदक जीतने वाले खिलाड़ी में बदलने में 'खेलो इंडिया' कार्यक्रम की अहम भूमिका रही है। इस कार्यक्रम के तहत अब तक 2781 से अधिक खिलाड़ियों को प्रशिक्षण, उपकरण, चिकित्सा देखभाल और वित्तीय सहायता दी गई है। सरकार ने खेलो इंडिया योजना पर 36,441 करोड़ रुपये का भारी निवेश मंजूर किया है। वर्ष 2026-31 के लिए संशोधित खेलो इंडिया योजना को मंजूरी दी है। राष्ट्रीय खेल महासंघों को मजबूत बनाने के लिए बड़े पैमाने पर वित्तीय सहायता दी जा रही है। देश के दूर-दराज और ग्रामीण इलाकों से भी उभरती प्रतिभाओं को खोजा जा रहा है। स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण और मार्गदर्शन की सुविधाएं देने के लिए देशभर में 1041 खेलो इंडिया केंद्र स्थापित किए गए हैं। इसके साथ ही, 32 खेलो इंडिया सेंटर ऑफ एक्सीलेंस और 301 खेल अकादमियों को मान्यता दी गई है, जिससे खेलों का पूरा इकोसिस्टम और मजबूत हुआ है। खेलो इंडिया सीओई में खिलाड़ियों को विशेषज्ञ कोचिंग, पोषण और उच्चस्तरीय प्रशिक्षण की सुविधा दी जा रही है। मोदी सरकार की इन पहलों का जमीन पर जबरदस्त असर भी दिख रहा है। 2022 एशियाई खेलों में भारत के 42 पदकों में से 124 पदक विजेता 'खेलो इंडिया' से प्रशिक्षित खिलाड़ी थे। वहीं पेरिस 2024 ओलंपिक में खेलो इंडिया के 28 खिलाड़ियों ने देश का प्रतिनिधित्व किया था। 'खेलो इंडिया' के खिलाड़ियों ने अब तक करीब 6000 राष्ट्रीय रिकॉर्ड और 1400 अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाए हैं, जो भारत के जमीनी स्तर के खेलकूद के कार्यक्रमों की प्रगति को दर्शाता है। कोच और खेल विशेषज्ञ मानते हैं कि कॉन्टिनेंटल या ग्लोबल इवेंट्स में प्रतियोगिता का स्तर कहीं ज्यादा होता है। ऐसे में किसी एथलीट या खिलाड़ी की काबिलियत और कड़ी मेहनत की असली परीक्षा एशियन गेम्स या ओलंपिक्स में होती है। हालांकि कॉमनवेल्थ गेम्स में जीते गए मेडल का महत्व कम नहीं आंका जाना चाहिए। इस बार युवा खिलाड़ियों ने दिखाया है कि भारत का खेल भविष्य पहले से कहीं ज्यादा उज्ज्वल दिख रहा है, कई खेलों में नई पीढ़ी के टैलेंटेड एथलीट सुर्खियां बटोर रहे हैं। राष्ट्रमंडल खेल जैसी प्रतियोगिता में किए गए प्रदर्शन को आम तौर पर भविष्य में सुधार के पैमाने और अपनी खूबियों व कमियों के आकलन के तौर पर देखा जाता है। राष्ट्रमंडल खेल के बाद अब भारतीय खिलाड़ियों की नजर एशियन गेम्स में दमदार प्रदर्शन करने पर है। 20 वें एशियाई खेल का आगाज 19 सितंबर से जापान के नागोया में होग। भारत इस बार हांग्जो 2022 के अपने ऐतिहासिक 107 पदकों के रिकॉर्ड को तोड़ने के इरादे से मैदान में उतरेगा। इसीलिए भारतीय खिलाड़ियों को राष्ट्रमंडल खेल में अपने प्रदर्शन पर गर्व करते हुए एशियन गेम्स में पेश आने वाली चुनौतियों के हिसाब से बिना एक भी पल गवाएं तैयारियां शुरू कर देनी चाहिए। क्योंकि जब विदेशी धरती पर तिरंगा लहराता है और जन-गण-मन गूंजता है, तो वह पल केवल एक खिलाड़ी की जीत नहीं, बल्कि पूरे देश का गौरव बन जाता है। - डॉ. आशीष वशिष्ठ (स्वतंत्र पत्रकार) लखनऊ, उत्तर प्रदेश (भारत)
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भारत को क्लीन एनर्जी टेक्नोलॉजी का ग्लोबल प्रोड्यूसर बनना चाहिए: एचडी कुमारस्वामी
नई दिल्ली, 6 अगस्त (आईएएनएस)। केंद्रीय इस्पात और भारी उद्योग मंत्री एचडी कुमारस्वामी ने गुरुवार को कहा कि भारत को क्लीन एनर्जी टेक्नोलॉजी का ग्लोबल प्रोड्यूसर बनना चाहिए। ऐसा इसलिए है, क्योंकि तेजी से बदलती दुनिया में किसी देश की ताकत सिर्फ एनर्जी रिसोर्स तक पहुंच से तय नहीं होती, बल्कि भविष्य को चलाने वाली टेक्नोलॉजी के लिए मैन्युफैक्चरिंग, इनोवेशन और मजबूत सप्लाई चेन बनाने की उसकी क्षमता से तय होती है।

