...

'कॉकरोच जनता पार्टी' का दावा- 'लहरा दो तिरंगा' अभियान सफल, संस्थापक अभिजीत दिपके हिरासत में

'कॉकरोच जनता पार्टी' का दावा- 'लहरा दो तिरंगा' अभियान सफल, संस्थापक अभिजीत दिपके हिरासत में

समाचार नामा 16 Oct 2026 11:56 pm

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु 23 अक्टूबर को पहुंचेंगी बस्तर, ऐतिहासिक 'मुरिया दरबार' में होंगी शामिल

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु 23 अक्टूबर को पहुंचेंगी बस्तर, ऐतिहासिक 'मुरिया दरबार' में होंगी शामिल

समाचार नामा 16 Oct 2026 8:33 pm

गुजरात के मुख्यमंत्री ने प्रदर्शनों के पीछे ‘सत्ता परिवर्तन’ का एजेंडा होने का आरोप लगाया

गुजरात के मुख्यमंत्री ने प्रदर्शनों के पीछे ‘सत्ता परिवर्तन’ का एजेंडा होने का आरोप लगाया

समाचार नामा 16 Oct 2026 8:07 pm

कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उन्माद और वैश्विक बाजार की चिंता

कृत्रिम बुद्धिमत्ता को इक्कीसवीं सदी की सबसे प्रभावशाली तकनीकी उपलब्धियों में गिना जा रहा है। चिकित्सा, शिक्षा, कृषि, उद्योग, संचार और प्रशासन तक इसका विस्तार नई संभावनाओं के द्वार खोल रहा है। बड़ी कंपनियां इस तकनीक को विकसित करने और अपने कारोबार में शामिल करने के लिए भारी धनराशि खर्च कर रही हैं। लेकिन जब किसी नई तकनीक के प्रति उम्मीदें बहुत तेजी से बढ़ती हैं, तब उसके साथ जुड़े आर्थिक जोखिम भी बढ़ने लगते हैं। 15 अक्टूबर 2026 को वैश्विक शेयर बाजारों में दिखाई दी उथल-पुथल ने इसी प्रश्न को सामने ला दिया है कि क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता में किया जा रहा विशाल निवेश भविष्य में अपेक्षित लाभ दे पाएगा। रॉयटर्स की रिपोर्टों के अनुसार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में गिरावट के बीच निवेशकों ने सरकारी बांड जैसे अपेक्षाकृत सुरक्षित निवेश साधनों की ओर रुख किया। दक्षिण कोरिया का शेयर बाजार विशेष रूप से प्रभावित हुआ। वहां प्रमुख शेयर सूचकांक कोस्पी 7.57 प्रतिशत गिरकर 5,554.22 पर बंद हुआ। कारोबार के दौरान गिरावट इतनी तेज थी कि कुछ समय के लिए व्यापार रोकना पड़ा। सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स और एसके हाइनिक्स जैसी प्रमुख अर्धचालक कंपनियों के शेयरों में भी भारी गिरावट दर्ज की गई। जापान का शेयर बाजार भी इस वैश्विक दबाव से अछूता नहीं रहा। इन घटनाओं ने स्पष्ट कर दिया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़ी कंपनियों में निवेशकों की दिलचस्पी के साथ-साथ उनकी आशंकाएं भी बढ़ रही हैं। इसे भी पढ़ें: OpenAI में जासूसी के खुलासे से हड़कंप! AI ने पकड़ा अपना ही इंजीनियर Abdulrahman Alfozan, Silicon Valley में मचा घमासान इस गिरावट के पीछे केवल शेयरों की कीमतों में पहले आई तेजी नहीं थी। इसके साथ अमेरिका में महंगाई के अपेक्षा से अधिक बने रहने और ब्याज दरों को लेकर बढ़ती अनिश्चितता का भी संबंध था। जब ब्याज दरें ऊंची रहती हैं, तब कंपनियों के लिए कर्ज लेना महंगा हो जाता है। भविष्य में मिलने वाले लाभ का वर्तमान मूल्य भी कम हो सकता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में अनेक कंपनियां ऐसे उपकरणों और प्रतिष्ठानों पर भारी धनराशि खर्च कर रही हैं, जिनसे वास्तविक आय प्राप्त होने में कई वर्ष लग सकते हैं। इसलिए महंगे कर्ज और अनिश्चित लाभ का मेल निवेशकों के लिए चिंता का विषय बन गया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता का आधुनिक ढांचा तैयार करना साधारण काम नहीं है। इसके लिए अत्यंत शक्तिशाली संगणक, उन्नत अर्धचालक चिपें, विशाल आंकड़ा केंद्र, निरंतर बिजली आपूर्ति और प्रभावी शीतलन प्रणालियां चाहिए। इन सबके निर्माण और संचालन में भारी पूंजी लगती है। कंपनियां इस उम्मीद में निवेश कर रही हैं कि आने वाले वर्षों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मांग तेजी से बढ़ेगी और उनके द्वारा तैयार की गई संगणना क्षमता का पर्याप्त उपयोग होगा। लेकिन यदि मांग अनुमान से कम रही या ग्राहकों ने अपेक्षित धनराशि खर्च नहीं की, तो कंपनियों के लिए अपने निवेश से पर्याप्त लाभ कमाना कठिन हो सकता है। अमेरिकी कंपनी कोरवीव का उदाहरण इस चिंता को समझने में मदद करता है। यह कंपनी कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़ी संगणना सेवाएं उपलब्ध कराती है। रॉयटर्स की 15 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी पर लगभग 50 अरब डॉलर का कर्ज है। उसके शेयरों में लगातार गिरावट आई और उसके कुछ बांडों पर मिलने वाला प्रतिफल भी बहुत बढ़ गया। इससे निवेशकों ने कंपनी की वित्तीय क्षमता और कर्ज चुकाने की योग्यता पर सवाल उठाए। दूसरी ओर, कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने कर्मचारियों को भरोसा दिलाया कि उसके पास भविष्य में आय देने वाले अनुबंधों का बड़ा भंडार है। यहां समझने वाली बात यह है कि भविष्य के अनुबंधों का बड़ा मूल्य होना और समय पर पर्याप्त नकदी प्राप्त होना अलग-अलग बातें हैं। किसी कंपनी को कर्मचारियों के वेतन, बिजली, उपकरणों, ब्याज और ऋण की किस्तों का भुगतान लगातार करना पड़ता है। यदि आय आने में देरी होती है, तो अच्छे अनुबंध होने के बावजूद वित्तीय दबाव पैदा हो सकता है। इसके विपरीत, यदि मांग मजबूत रहती है और कंपनी अपने अनुबंधों को वास्तविक आय में बदल पाती है, तो भारी निवेश लाभदायक भी साबित हो सकता है। इसलिए किसी कंपनी के शेयरों में गिरावट को उसके कारोबार के समाप्त होने का प्रमाण मानना उचित नहीं है। इस घटनाक्रम ने सरकारी बांडों की भूमिका को भी फिर चर्चा में ला दिया है। जब निवेशकों को शेयर बाजार में अधिक जोखिम दिखाई देता है, तब वे अपनी पूंजी का कुछ हिस्सा सरकारी प्रतिभूतियों में लगाते हैं। इससे इन बांडों की मांग बढ़ सकती है और उनकी कीमतों में तेजी आ सकती है। सामान्यतः बांड की कीमत और उससे मिलने वाला प्रतिफल विपरीत दिशा में चलते हैं। 15 अक्टूबर को वैश्विक बाजारों में सरकारी बांडों की ओर बढ़ते रुझान को इसी संदर्भ में देखा गया। हालांकि सरकारी बांड भी ब्याज दरों में बदलाव से प्रभावित होते हैं, इसलिए उन्हें हर परिस्थिति में पूरी तरह जोखिममुक्त नहीं माना जा सकता। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता का वर्तमान विस्तार किसी आर्थिक बुलबुले का रूप ले रहा है। आर्थिक बुलबुले की स्थिति तब बन सकती है, जब किसी परिसंपत्ति का बाजार मूल्य उसकी वास्तविक कमाई और दीर्घकालीन संभावनाओं से बहुत आगे निकल जाए। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में कुछ कंपनियों के ऊंचे मूल्यांकन, भारी कर्ज और भविष्य की आय को लेकर अनिश्चितता ने इस आशंका को बढ़ाया है। फिर भी पूरे उद्योग को एक ही दृष्टि से देखना उचित नहीं होगा। कुछ कंपनियों के पास पर्याप्त नकदी, मजबूत ग्राहक आधार और विविध कारोबार हैं, जबकि कुछ कंपनियां विस्तार के लिए लगातार कर्ज पर निर्भर हैं। दोनों की वित्तीय स्थिति और जोखिम अलग-अलग हैं। इसका भारत पर भी प्रभाव पड़ सकता है। वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बढ़ने पर विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से भी पूंजी निकाल सकते हैं। इससे शेयरों की कीमतों और रुपये में उतार-चढ़ाव बढ़ने की आशंका रहती है। दूसरी ओर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विस्तार से भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों के लिए नई संभावनाएं भी पैदा हो सकती हैं। आंकड़ा प्रबंधन, तकनीकी सेवाओं, साइबर सुरक्षा और व्यावसायिक प्रक्रियाओं को अधिक प्रभावी बनाने के क्षेत्र में भारतीय कंपनियां महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। लेकिन इन अवसरों का लाभ उठाने के लिए कौशल विकास, अनुसंधान, बिजली की उपलब्धता और तकनीकी ढांचे में निवेश जरूरी होगा। भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े प्रतिष्ठानों का विस्तार करते समय भी वित्तीय अनुशासन का ध्यान रखना होगा। केवल भविष्य की मांग के अनुमान पर भारी कर्ज लेकर विशाल आंकड़ा केंद्र तैयार करना जोखिमपूर्ण हो सकता है। निवेश का आधार वास्तविक ग्राहक मांग, संभावित आय और दीर्घकालीन आर्थिक उपयोगिता होनी चाहिए। सरकार और उद्योग को यह भी देखना होगा कि इन प्रतिष्ठानों की बिजली तथा पानी की जरूरतें किस प्रकार पूरी की जाएंगी और उनका पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ेगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता में मौजूदा उथल-पुथल तकनीकी विकास के विरुद्ध कोई प्रमाण नहीं है। यह संभव है कि आने वाले वर्षों में यह तकनीक उद्योगों की उत्पादकता बढ़ाए, नई सेवाओं को जन्म दे और आर्थिक गतिविधियों का स्वरूप बदल दे। लेकिन किसी तकनीक की उपयोगिता और उससे जुड़ी कंपनियों के शेयरों का उचित मूल्यांकन दो अलग प्रश्न हैं। तकनीकी प्रगति अपने आप में इस बात की गारंटी नहीं देती कि हर निवेशक को लाभ होगा या प्रत्येक कंपनी सफल रहेगी। अंततः कृत्रिम बुद्धिमत्ता का भविष्य केवल शक्तिशाली संगणकों और अरबों डॉलर के निवेश से तय नहीं होगा। उसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह समाज और अर्थव्यवस्था की वास्तविक समस्याओं का कितना प्रभावी समाधान करती है, उससे कितनी टिकाऊ आय पैदा होती है और कंपनियां अपने खर्च तथा कर्ज का प्रबंधन कितनी जिम्मेदारी से करती हैं। तकनीकी महत्वाकांक्षा आवश्यक है, लेकिन उसके साथ विवेकपूर्ण निवेश और वित्तीय अनुशासन भी उतने ही जरूरी हैं। वैश्विक बाजार की मौजूदा चिंता इसी संतुलन की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

प्रभासाक्षी 16 Oct 2026 6:10 pm

भारतीय शेयर बाजार लगातार दूसरे दिन बढ़त के साथ बंद

मुंबई, भारतीय शेयर बाजार शुक्रवार के कारोबारी सत्र में लगातार दूसरे दिन मजबूती के साथ बंद हुआ। दिन के अंत में सेंसेक्स 413.66 अंक या 0.56 प्रतिशत की तेजी के साथ 74,729.27 और निफ्टी 148.80 अंक या 0.65 प्रतिशत की मजबूती के साथ 23,146.15 पर था।

देशबन्धु 16 Oct 2026 4:46 pm

घने जंगल, जयपुर राजघराना और तिरंगा मार्च: किसके हक की थी वो जमीन जहां आज है CP का सेंट्रल पार्क?

एसआईआर में गड़बड़ी को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग को लेकर लगातार कॉकरोच जनता पार्टी प्रदर्शन कर रही है। इसी क्रम में 16 अक्टूबर की शाम 4:00 बजे दिल्ली के कनोट प्लेस के सेंट्रल पार्क पर कॉकरोच जनता पार्टी लहरा दो तिरंगा मार्च का ऐलान किया। दरअसल कॉकरोच जनता पार्टी ने आवाह्वन किया कि तमाम लोग बड़ी संख्या में यहां इस सेंट्रल पार्क पर इकट्ठा होकर के तिरंगा लहराएं। सौरभ दास और आशुतोष रांका अपने समर्थकों के साथ जंतर-मंतर पहुंचे थे। उन्होंने वहां पर तिरंगा लहराया था और आरोप है कि इसी कारण आशुतोष रांका और जो सौरभ दास थे उनको दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया और पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। इसी को लेकर के सीजेपी ने लहरा दो तिरंगा का आह्वन किया। लेकिन सेंट्रल पार्क दो दिनों के लिए बंद है। दरअसल एनडीएमसी ने 16 अक्टूबर और 17 अक्टूबर को प्रशासनिक कारणों की वजह से इस सेंट्रल पार्क को आम जनता के लिए बंद कर दिया। यानी कि कोई भी शख्स यहां सेंट्रल पार्क में इकट्ठा नहीं हो सकता है। लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी ने आवाह्वन किया है कि बड़ी संख्या में लोग कनोट प्लेस में इस सेंट्रल पार्क पर पहुंचे और तिरंगा लहराएं। इसके अलावा जो लोग दूसरे शहरों में रह रहे हैं वो लोग भी तिरंगा लहराएं। सुरक्षा बढ़ा दी गई है। दिल्ली के कमर्शियल सेंटर की पहचान बनने वाले सफेद खंभों वाले गलियारों और लग्जरी ब्रांड के शोरूमों के आने से बहुत पहले, कनॉट प्लेस और इसका मशहूर सेंट्रल पार्क छोटे-छोटे गांवों से भरा एक ऊबड़-खाबड़ जंगल हुआ करता था। आज, यह जगह अक्सर बड़े सार्वजनिक आयोजनों, राजनीतिक रैलियों और कड़ी सुरक्षा के बीच ट्रैफिक डायवर्जन की वजह से सुर्खियों में रहती है। कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके द्वारा आयोजित तिरंगा मार्च से पहले यह जगह फिर चर्चा में आ गई। बबूल और झाड़ियों से भरा, वन्यजीवों वाला वह इलाका आखिर कैसे लुटियंस दिल्ली के धड़कते केंद्र में बदल गया? इसका जवाब एक सदी तक चले व्यापक शहरी बदलाव में छिपा है। इसे भी पढ़ें: Connaught Place में CJP के मार्च से पहले हलचल, Abhijeet Dipke के घर पहुंची पुलिस कैसे शुरू हुआ पूरा मामला 20 जुलाई 2026 दिल्ली का जंतरमंतर छात्रों और सीजेपी सपोर्टर्स की भीड़ संसद की ओर बढ़ी। चलो संसद का आह्वान था। मांग थी पेपर लीक्स के चलते केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा। एक तरफ प्रदर्शनकारी थे। दूसरी तरफ दल बल के साथ दिल्ली पुलिस। खबर आई कि इंटरनेट बंद कर दिया गया है। फिर जो कुछ हुआ वह पूरे देश ने देखा। पुलिस की बर्बरता प्रदर्शनकारियों पर डंडे के रूप में बरसी। अब तारीख आगे बढ़ाई है। करीब 3 महीने बाद 10 अक्टूबर 2026 एक बार फिर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की तैयारी थी। इस बार सवालों के घेरे में मुख्य चुनाव आयुक्त और इलेक्शन कमीशन रहा। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग पर गंभीर सवाल उठे हैं। जड़ एसआईआर रही सवाल गंभीर थे। सत्तारूढ़ दल पर चुनाव आयोग के डिफेंस में उतरने के आरोप लगे। जबकि चुनाव आयोग एक इंडिपेंडेंट कॉन्स्टिट्यूशनल इंस्टीट्यूशन है। वो खुद पर उठाए जा रहे सवालों के तथ्यात्मक जवाब देने में सक्षम है। मामला हल्के में निपटा दिया गया। विपक्ष समेत सीजेपी ने चीफ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग रख दी। सीजेपी ने 10 अक्टूबर को प्रोटेस्ट भी बुला लिया। लेकिन इस मर्तबा दिल्ली पुलिस की तैयारी इतनी तगड़ी थी कि जंतर-मंतर पर परिंदा भी पर नहीं मार पाया। बीएएनएस की धारा 163 लगा दी। 35,000 से ज्यादा सुरक्षाकर्मी सड़कों पर तैनात थे। ट्रेनें कैंसिल कर दी गई। दिल्ली की लगभग हर पांच में से एक मेट्रो स्टेशन को बंद कर दिया गया। इंटरनेट भी बंद कर दिया गया। सीजेपी की लीडरशिप को प्लेन से ही डिटेन कर लिया गया। जो लोग कनाड प्लेस पहुंचे उन्हें भी पुलिस ने उठा लिया। इसे भी पढ़ें: Supreme Court पहुंची व्यापारियों की याचिका, Dipke का दावा- Peaceful Protest से नहीं रुकता व्यापार सौरव-आशुतोष पर लगे ये आरोप सौरव दास और आशुतोष रांका पर बेल बॉन्ड तोड़ने का आरोप लगा है। 10 अक्टूबर को सौरव दास, आशुतोष रांका और अभिजीत दीपके को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया था। इन तीनों को कोर्ट ने 50-50 हजार मुचकले पर रिहा किया गया था। इसके साथ ही शर्त रखी गई थी। तीनों को एक साल तक शांति बनाए रखनी थी, ऐसा कोई काम नहीं करना था, जिससे शांति भंग हो करने का बॉन्ड साइन करवाया गया था। सौरव और आशुतोष पर ये बॉन्ड तोड़ने का आरोप लगा है। बता दें 10 अक्टूबर को सौरव, आशुतोष और दीपके को दिल्ली पुलिस के हिरासत में लेने के बाद प्रदर्शन को अजिंक्य शिंदे ने लीड किया था। गिरफ्तारी के बाद दोनों को ही 5 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया सभी पांचों गेट बंद राजीव चौक मेट्रो स्टेशन के ठीक ऊपर स्थित सेंट्रल पार्क 41,500 वर्ग मीटर में फैला हुआ है। इसमें चार जलाशय (water bodies), 350 सीटों की क्षमता वाला एक एम्फीथिएटर और 207 फीट ऊंचे पोल पर लगा विशालकाय भारतीय तिरंगा मौजूद है। इस पार्क की देखरेख NDMC का बागवानी विभाग करता है। नाम न छापने की शर्त पर NDMC के एक अधिकारी ने बताया कि नागरिक निकाय को उच्च अधिकारियों से पार्क बंद करने के निर्देश मिले हैं। अधिकारी ने आगे कहा कि पार्क के सभी पांचों गेट बंद रहेंगे। पार्क का एम्फीथिएटर अक्सर सरकारी कार्यक्रमों, सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजनों के लिए बुक रहता है, वहीं इसका हरा-भरा परिसर बड़ी संख्या में लोगों खासकर सप्ताहांतपर को अपनी ओर आकर्षित करता है। अधिकारी ने प्रदर्शन के दौरान लोगों को पार्क में घुसने से रोकने की चुनौतियों का भी जिक्र किया, क्योंकि इसकी चारदीवारी की रेलिंग काफी नीची (लगभग तीन से चार फीट ऊंची) है। अधिकारी ने कहा हमें उच्च अधिकारियों से पार्कों को बंद करने के निर्देश मिले थे। पार्क के पांचों गेट बंद रखे जाएंगे। यह विशाल ध्वज पार्क के कोने पर, इनर-सर्कल रोड से कुछ ही फीट की दूरी पर लगा है। अधिकारी ने बताया कि लोगों को ध्वज के पास जाने से रोकना मुश्किल हो सकता है, और ऐसी स्थिति को संभालना पुलिस की कानून-व्यवस्था से जुड़ी जिम्मेदारी होगी। यह विशाल ध्वज पार्क के कोने पर, इनर-सर्कल रोड से कुछ ही फीट की दूरी पर स्थित है। इसे भी पढ़ें: कार्यकर्ताओं की समस्याएं सीधे सुनेंगे पार्टी नेता, BJP दफ्तर में शुरू हुई जन सुनवाई हाई कोर्ट में सुनवाई 15 अक्टूबर को दिल्ली हाई कोर्ट ने CJP के तिरंगा मार्च पर सुनवाई की थी। इस दौरान अदालत ने मार्च पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पुलिस से कहा था कि गतिविधियों को नियंत्रित और व्यवस्थित बनाए रखने के लिए हरसंभव कदम उठाए जाएं। वहीं, याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया था कि कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क के बीचों-बीच आंदोलन आयोजित किया गया है, जबकि यह जगह प्रदर्शन के लिए नहीं है। इसे देखते हुए व्यापारियों ने अपनी दुकानें बंद करना शुरू कर दिया है। इस वजह से प्रदर्शन पर रोक लगाना बेहद जरूरी है। शिकारगाहों और गांवों से लेकर शाही ज़मीन तक 20वीं सदी की शुरुआत में, आज के कनॉट प्लेस वाला इलाका घनी झाड़ियों से भरा एक ग्रामीण क्षेत्र था, जो तीतरों और जंगली जानवरों का ठिकाना हुआ करता था। इस इलाके में मुख्य रूप से जयसिंहपुरा और राजा का बाज़ार जैसे गांव आते थे। यह ज़मीन जयपुर के शासकों की थी, जो उन्हें मुगल बादशाह मुहम्मद शाह द्वारा सवाई जय सिंह द्वितीय को दिए गए एक अनुदान (जागीर) के रूप में मिली थी। इस इलाके में कुछ प्राचीन और महत्वपूर्ण जगहें थीं, जिनमें ऐतिहासिक हनुमान मंदिर और जंतर-मंतर वेधशाला प्रमुख हैं। पुरानी दिल्ली (शाहजहानाबाद) के निवासी अक्सर मंगलवार के दिन इस जंगली इलाके से होकर गुज़रते थे, जिसका एकमात्र मकसद हनुमान मंदिर के दर्शन करना होता था। अंग्रेजों का विस्तार और कनॉट प्लेस का जन्म जब ब्रिटिश प्रशासन ने 1912 में दिल्ली का विस्तार करने का फैसला किया, तो उन्होंने जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की। इसे पूरा होने में एक दशक से ज्यादा का समय लगा और 1925 तक जाकर यह काम पूरा हुआ। जयसिंहपुरा के निवासियों को करोल बाग और पहाड़गंज की तरफ स्थानांतरित कर दिया गया। इस भव्य कमर्शियल मार्केट का निर्माण 1929 में शुरू हुआ और 1933 में पूरा हुआ। आर्किटेक्ट रॉबर्ट टोर रसेल द्वारा डिज़ाइन किए गए इस मार्केट को दो मंजिला 'जॉर्जियन' आर्किटेक्चर शैली में बनाया गया था, जिसमें दो संकेंद्रित (एक-दूसरे के अंदर बने) वृत्त शामिल थे। इस कॉम्प्लेक्स का नाम 'कनॉट प्लेस' और 'कनॉट सर्कस' रखा गया। यह नाम प्रिंस आर्थर, जो 'ड्यूक ऑफ कनॉट एंड स्ट्रैथर्न' (महारानी विक्टोरिया के तीसरे बेटे) थे, के सम्मान में रखा गया था। शुरुआत में यह जगह अपनी खुली किताबों की दुकानों, फुटपाथ पर सामान बेचने वालों, मशहूर कॉफी हाउसों और 'वेंगर्स जैसे जाने-माने भोजनालयों के लिए मशहूर थी। बाद में, स्थानीय स्तर पर इसे अनौपचारिक रूप से 'राजीव चौक' और 'इंदिरा चौक' कहा जाने लगा। सेंट्रल पार्क की कहानी क्या है कनॉट प्लेस (CP) के बीचों-बीच स्थित सेंट्रल पार्क का इतिहास बेहद दिलचस्प रहा है। आज हम जिस आधुनिक सेंट्रल पार्क को देखते हैं, उसका वर्तमान स्वरूप साल 2006 में तैयार हुआ था, लेकिन एक सार्वजनिक स्थल और पार्क के रूप में इसकी मौजूदगी दशकों पुरानी है। शुरुआती दौर में कनॉट प्लेस के केंद्र में लोगों के बैठने, टहलने और मिलने-जुलने के लिए एक खुला हरा-भरा मैदान हुआ करता था। वहां एक फव्वारा और पास में ही मशहूर कॉफी हाउस मौजूद था। बाद में जब भूमिगत पालिका बाजार का निर्माण हुआ, तब भी पार्क का अस्तित्व ऊपर बना रहा। साल 2001 में दिल्ली मेट्रो के विस्तार और राजीव चौक स्टेशन के निर्माण के लिए यह जमीन DMRC (दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन) को सौंप दी गई। मेट्रो का भूमिगत निर्माण कार्य पूरा होने के बाद DMRC ने इसके ठीक ऊपर लगभग 27,000 वर्ग मीटर के विशाल क्षेत्र में एक नया और खूबसूरत पार्क विकसित किया, जिसे 2006 में आम जनता के लिए खोल दिया गया। इस नए पार्क को हरा-भरा बनाने के लिए लगभग 700 पेड़ और 2,750 झाड़ियां लगाई गईं, जिनमें सफेद चंपा, रॉयल पाम, गुलमोहर, पिंक तबेबुइया, बॉटल ब्रश, इंडियन लॉरेल और अशोक जैसे सदाबहार पेड़ शामिल थे। पार्क के आकर्षण को बढ़ाने के लिए इसमें 4 जल निकाय (water bodies), 21 फव्वारे और एक खूबसूरत वॉटरफॉल तैयार किया गया। इसके अलावा, सांस्कृतिक और कलात्मक कार्यक्रमों के आयोजन के लिए लगभग 500 दर्शकों की क्षमता वाला एक खुला एम्फीथिएटर भी बनाया गया। इस पार्क में कुल 9 प्रवेश द्वार हैं, जिनमें से 2 गेट सीधे राजीव चौक मेट्रो स्टेशन से जुड़ते हैं।

प्रभासाक्षी 16 Oct 2026 2:41 pm

नेहा बोरा ने 'बांग्लादेश की जेनजी क्रांति' को बताया प्रेरणा, भड़के सीएम योगी, मुख्यमंत्री धामी ने भी घेरा

नेहा बोरा ने 'बांग्लादेश की जेनजी क्रांति' को बताया प्रेरणा, भड़के सीएम योगी, मुख्यमंत्री धामी ने भी घेरा

समाचार नामा 16 Oct 2026 2:04 pm

सरकार ने सोने-चांदी के ड्यूटी ड्रॉबैक दरों में की कटौती

नई दिल्ली, केंद्र सरकार ने सोने और चांदी के आभूषणों तथा अन्य कीमती धातु उत्पादों के निर्यात पर मिलने वाली ड्यूटी ड्रॉबैक दरों में कटौती कर दी है।

देशबन्धु 16 Oct 2026 1:38 pm

भोजन की बर्बादी से निपटने की वैश्विक चुनौती?

भोजन मूलभूत आवश्यकताओं के अलावा, प्रत्येक इंसान का बुनियादी अधिकार भी है। भोजन अनमोल है जिसका सम्मान करना सभी का कर्तव्य है। आज ‘विश्व खाद्य दिवस’ है जो सालाना 16 अक्टूबर को पूरे संसार में इस मकसद से मनाया जाता है कि अन्न की बर्बादी को रोकने के लिए जनमानस को जागरूक किया जाए। नवंबर 1979 को संयुक्त राष्ट् के खाद्य एवं कृषि संगठन के 20वें सम्मेलन में खाद्य दिवस को मनाने का निर्णय हुआ जिसका पहली बार आयोजन वर्ष 1981 में हुआ। दुनिया में भूख से बढ़ते कुपोषण पर नियंत्रण को ध्यान में रखकर संयुक्त राष्ट्र ने वैश्विक संघों को चेताया था। ये दिवस इस बात पर ज्यादा जोर देता है कि हमें थाली में उतना ही भोजन परोसना चाहिए, जितने की पेट को जरूरत हो। ज्यादा भोजन लेंगे तो निश्चित रूप से बर्बाद ही होगा। फूड इंडेक्स पर यूएनईपी-2024 की रिपोर्ट के मुताबिक हिंदुस्तान में सालाना करीब 7.8 करोड़ टन भोजन बर्बाद होता है, जिसका औसत लगभग 21.4 करोड़ किलोग्राम प्रतिदिन आंका गया। विश्व खाद दिवस-2025 की थीम थी ‘बेहतर भोजन और बेहतर भविष्य साथ-साथ’ जो एग्रीफूड सिस्टम को बदलने में वैश्विक सहयोग की शक्ति को उजागर करती है। भोजन बर्बादी की समस्या संसार में बड़ी आफत के रूप में उभरी है। ऐसे तमाम मुल्क हैं जहां अन्न का उत्पादन शून्य है और दूसरे देशों के उत्पाद-भोजन पर ही निर्भर हैं, बावजूद इसके बेहताशा भोजन बर्बाद करते हैं। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण की ‘फूडवेस्टाइज इंडेक्स रिपोर्ट-2026’ सामने आई जिसमें दुनिया भर में 1.05 अरब टन भोजन बर्बाद होता बताया गया जिससे नई किस्म की न सिर्फ बीमारियां-वायरस फैले, बल्कि पर्यावरण भी दूषित हुआ। भारत में पिछले 10 वर्षों में अन्न उत्पादन 90 मिलियन मीट्रिक टन पिछले एक दशक से ज्यादा हुआ है। धरती पर मात्र भारत ही एक ऐसा मुल्क है जो करीब 76 देशों को विभिन्न किस्म का अन्न सप्लाई करता है जिसमें चीनी, दालें, चावल, मखाने, सरसों और सब्जियां प्रमुख रूप से शामिल हैं। इसे भी पढ़ें: छात्रः सपनों की उड़ान से सृजन की पहचान तक तमाम ऐसे इस्लामिक देश हैं जो भारत में उत्पादित बासमती चावल ही पसंद करते हैं। ईरान-ईराक में चावल की सप्लाई सिर्फ भारत से ही होती है। अन्न निर्यात के लिहाज से भारत विश्व का बड़ा बाजार बनकर इस समय उभरा है। संसार में भारत दूध और बाजरे के निर्माण में नंबर वन पायदान है। वर्ष 2014 के बाद से हिंदुस्तान शहद, अंडे, मछलियां और फल-सब्जियों के उत्पादन में दूसरे स्थान पर काबिज हुआ है। जबकि, कभी चौथे स्थान पर हुआ करता था। भूखे सोना विकसित संसार के माथे पर कलंक जैसा है। भूख के आंकड़े आज भी डरावने हैं। संसार का एक बड़ा इंसानी हिस्सा अभी भी रात में भूखे पेट सोता है। जबकि, रोजाना जितनी भोजन की बर्बादी होती है, थालियों में खाने को व्यर्थ करके लोग फेंक देते हैं, अगर ऐसा ना किया जाए, तो भूखे सोने वालों के आंकड़ों में कमी लाई जा सकती है। भोजन की बर्बादी से न केवल अन्न और धन का नुकसान होता है, बल्कि पानी, बिजली और अन्नदाताओं की सालाना मेहनत भी बेकार होती है। इससे पर्यावरण पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। भूख से निपटने के लिए वैश्विक स्तर पर सभी देशों को चेताना होगा। भूख और अन्न बर्बादी के नियंत्रण पर भारत जैसी पहल अन्य देशों को भी करनी होगी। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम-2013 से प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना, पीएम पोषण योजना, अंत्योदय अन्न योजना, राइस फोर्टिफिकेशन और प्राइस स्अेबिलाइजेशन फंड जैसी प्रमुख पहले भारत की खाद्य और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता को सुदृढ़ कर रही हैं। भारत में 80 करोड़ लोग मुफत अन्न वितरण योजना के लाभार्थी हैं, इसलिए सरकार का प्रयास है कि कोई भी व्यक्ति भूखे पेट नहीं सोए। लेकिन भोजन की बर्बादी भारत में भी कम नहीं है। आंकड़े इस समस्या के गवाह हैं। विश्व खाद्य दिवस संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन की स्थापना का प्रतीक है जिसे पहली बार औपचारिक रूप से 1981 में ‘भोजन सर्वप्रथम’ विषय वस्तु के साथ मनाया गया था। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1984 में इस दिवस को मान्यता दी जिसके बाद एक साथ 150 देशों का समूह बना, जो सामूहिक प्रयासों से भूख और अन्न बर्बादी से लड़ाई लड़ रहे हैं। हालांकि, सफलता उतनी नहीं मिली, जितनी उम्मीदें लगाई गईं थीं। बहरहाल, आज का दिन खाद्य सुरक्षा, पोषण टिकाउ, कृषि पद्वतियों के विषय में ना सिर्फ जागरूक करता है, बल्कि सुरक्षित, पर्याप्त और पौष्टिक भोजन की उपलब्धता में आने वाली चुनौतियों से लड़ने की सीख भी देता है। भोजन मानव जीवन का आधार है। स्वास्थ्य विकास और कल्याण के लिए अत्यंत आवश्यक भी। हालांकि, दुख तब होता है जब खाद्य उत्पादन में वैश्विक प्रगति के बाद भी असंख्य लोग अभी भी भूख और कुपोषण का सामना कर रहे हैं। भोजन पर सभी का मौलिक अधिकार है, जिसे कोई नहीं छीन सकता। भोजन हीन इंसान को भोजन उपलब्ध करवाना प्रत्येक हुकूमत का पहला कर्तव्य होता है। - डॉ. रमेश ठाकुर सदस्य, राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान (NIPCCD), भारत सरकार!

प्रभासाक्षी 16 Oct 2026 1:20 pm

पंजाब में नशे का तांडवः वर्दी बनी त्रासदी

पंजाब की धरती कभी शौर्य, पराक्रम, मेहनत, उद्यमशीलता और जीवटता के लिए जानी जाती थी। इसी मिट्टी के नौजवानों ने देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दी और खेतों में पसीना बहाकर देश का अन्न भंडार भरा। लेकिन आज उसी पंजाब की पहचान नशे के बढ़ते कारोबार, युवाओं की बर्बादी और ड्रग्स माफिया के बढ़ते प्रभाव से जुड़ती जा रही है। यह केवल एक राज्य की सामाजिक त्रासदी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, शासन-व्यवस्था और राजनीतिक इच्छाशक्ति की गंभीर परीक्षा है। जिस पंजाब के युवाओं के हाथों में कभी तलवार, हल और तिरंगा शोभा देते थे, वहां आज नशे ने अनेक हाथों को बेबस और अनेक परिवारों को बदहवास कर दिया है। विडंबना देखिए कि नशे के कारोबार पर अंकुश लगाने की जिम्मेदारी जिन पुलिसकर्मियों की है, यदि उन्हीं के घर से करोड़ों रुपये की हेरोइन बरामद होने की खबर सामने आती है, तो यह व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है। पंजाब में एक पुलिस कांस्टेबल के घर से कथित तौर पर 40 करोड़ रुपये की हेरोइन बरामद होने का मामला इसी सड़ांध की ओर संकेत करता है। यह घटना महज एक आपराधिक प्रकरण नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न है, जिसमें अपराध रोकने के लिए नियुक्त व्यक्ति ही कथित तौर पर अपराध के संदेह के घेरे में आ जाए। यह तो वही स्थिति हुई कि ‘बाड़ ही खेत को खाने लगे’, तो फसल की रखवाली कौन करेगा? जिस पुलिस के कंधों पर नशा तस्करों को पकड़ने का दायित्व है, यदि उसी व्यवस्था के भीतर ऐसे तत्व पनपने लगें, तो आम नागरिक का भरोसा डगमगाना स्वाभाविक है। इस मामले में निष्पक्ष जांच, दोषियों की पहचान और कठोर कानूनी कार्रवाई जरूरी है। किसी व्यक्ति को केवल आरोप के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन वर्दी की आड़ में अपराध करने वाले किसी भी व्यक्ति को कानून से बचने का अवसर भी नहीं मिलना चाहिए। पंजाब में नशे का कारोबार अब गलियों, गांवों और कस्बों तक अपनी जड़ें फैला चुका है। कभी नशे की समस्या को सीमावर्ती क्षेत्रों या शहरी युवाओं तक सीमित माना जाता था, लेकिन आज सिंथेटिक ड्रग्स सहित विभिन्न मादक पदार्थों की उपलब्धता ने संकट को और व्यापक बना दिया है। युवा पीढ़ी का एक हिस्सा नशे की गिरफ्त में आकर अपना स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और भविष्य गंवा रहा है। कहीं मां की गोद सूनी हो रही है, कहीं वृद्ध पिता के बुढ़ापे का सहारा छिन रहा है और कहीं परिवार का कमाऊ सदस्य नशे की लत के कारण स्वयं अपने परिजनों पर बोझ बन रहा है। ‘घर का चिराग ही घर में अंधेरा कर दे’, इससे बड़ी विडंबना क्या होगी! नशे की लत केवल व्यक्ति को नहीं तोड़ती, बल्कि पूरे परिवार और सामाजिक ताने-बाने को भीतर तक खोखला कर देती है। इस संकट की गंभीरता सरकारी आंकड़ों और पुलिस की कार्रवाइयों से भी समझी जा सकती है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार दस महीनों में पंजाब पुलिस ने 10,524 तस्करों को गिरफ्तार किया, जिनमें 153 बड़े ऑपरेटर शामिल थे। इस दौरान 790 किलोग्राम हेरोइन, 860 किलोग्राम अफीम और अन्य मादक पदार्थों के साथ 13 करोड़ रुपये से अधिक की ड्रग मनी जब्त की गई तथा नशे के कारोबार से जुड़ी 208 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति पर कार्रवाई की गई। ये आंकड़े कार्रवाई के पैमाने को अवश्य दर्शाते हैं, लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठाते हैं कि इतनी बड़ी मात्रा में नशीले पदार्थ आखिर राज्य में पहुंच कैसे रहे हैं? इतनी गिरफ्तारियों और जब्ती के बावजूद यदि नशे की उपलब्धता और लत पर निर्णायक अंकुश नहीं लग रहा, तो स्पष्ट है कि समस्या की जड़ें गहरी हैं। ‘मर्ज बढ़ता गया, ज्यों-ज्यों दवा की’ जैसी स्थिति से बचने के लिए गिरफ्तारियों की संख्या से आगे बढ़कर नशे की आपूर्ति, वित्तीय नेटवर्क और राजनीतिक संरक्षण की पड़ताल करनी होगी। इसे भी पढ़ें: Kejriwal की हरी झंडी के बाद Congress-CJP में हुई दोस्ती! क्या पंजाब चुनाव मिलकर लड़ेंगे कांग्रेस और AAP? पाकिस्तान से लगी पंजाब की लगभग 553 किलोमीटर लंबी सीमा इस चुनौती को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ती है। ड्रोन के माध्यम से नशीले पदार्थों और हथियारों की तस्करी की आशंकाएं सीमा प्रबंधन को और जटिल बनाती हैं। वर्ष 2026 में अब तक पंजाब की सीमा से 183 ड्रोन जब्त किए जाने का उल्लेख इस खतरे की गंभीरता को रेखांकित करता है। सीमा पार से संचालित तस्करी के नेटवर्क पर प्रहार करना आवश्यक है, लेकिन सारी जिम्मेदारी बाहरी ताकतों पर डालकर राज्य के भीतर की कमजोरियों से आंखें नहीं मूंदी जा सकतीं। यदि स्थानीय तस्कर, संगठित गिरोह और भ्रष्ट तंत्र मिलकर काम कर रहे हों, तो सीमा पर कड़ी निगरानी के साथ-साथ भीतर भी कठोर कार्रवाई करनी होगी। ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ करने वाली जांच ही बता सकती है कि इस काले कारोबार में कौन मोहरा है, कौन खिलाड़ी और कौन पर्दे के पीछे बैठा सूत्रधार। आम आदमी पार्टी की पंजाब सरकार ने नशामुक्ति और तस्करों के विरुद्ध कार्रवाई को लेकर अनेक दावे किए हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये दावे जमीन पर उतना परिवर्तन ला पाए हैं, जिसकी अपेक्षा पंजाब की जनता ने की थी? सत्ता में आने से पहले नशे के विरुद्ध निर्णायक लड़ाई के वादे करना आसान है, लेकिन उस लड़ाई को परिणाम तक पहुंचाना राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक ईमानदारी और निरंतर जवाबदेही मांगता है। यदि नशे की उपलब्धता बनी हुई है, युवा लगातार इसकी गिरफ्त में आ रहे हैं और तस्करी के नेटवर्क बार-बार सक्रिय हो जाते हैं, तो सरकार की रणनीति और उसके क्रियान्वयन पर सवाल उठना स्वाभाविक है। केवल छापेमारी, गिरफ्तारी और घोषणाओं से नशामुक्त पंजाब का सपना साकार नहीं होगा। सरकार की सफलता का वास्तविक पैमाना यह होना चाहिए कि नशे की आपूर्ति कितनी घटी, कितने युवा उपचार के बाद सामान्य जीवन में लौटे और बड़े तस्करों तथा उनके संरक्षकों के विरुद्ध कितनी प्रभावी कार्रवाई हुई। नशे के खिलाफ लड़ाई में पुलिस सुधार, आधुनिक तकनीक, सीमा सुरक्षा और वित्तीय जांच के साथ-साथ नशामुक्ति केंद्रों, मनोवैज्ञानिक परामर्श, रोजगार और पुनर्वास पर भी समान ध्यान देना होगा। नशे के शिकार युवाओं को केवल अपराधी मानकर खारिज करना समाधान नहीं है, उन्हें उपचार, सहारा और सम्मानजनक जीवन में लौटने का अवसर देना भी जरूरी है। गांवों में जनभागीदारी, स्कूल-कॉलेजों में जागरूकता और परिवारों की सक्रिय भूमिका इस अभियान को जनांदोलन का स्वरूप दे सकती है। साथ ही, पुलिस और राजनीतिक तंत्र में किसी भी स्तर पर संरक्षण देने वालों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। पंजाब को नशे की गिरफ्त से निकालना केवल सरकार का नहीं, पूरे समाज का दायित्व है, लेकिन नेतृत्व की पहली जवाबदेही सरकार की ही है। जब कानून के रखवाले ही संदेह के घेरे में आने लगें और करोड़ों की हेरोइन की बरामदगी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़े करे, तब आत्ममंथन टालना आत्मघाती होगा। ‘लकीर पीटने’ के बजाय अब निर्णायक परिणाम देने का समय है। पंजाब को खोखले नारों नहीं, कठोर कार्रवाई, पारदर्शी जांच और जवाबदेह शासन की जरूरत है। नशा माफिया की जड़ें उखाड़ने के लिए राजनीतिक संरक्षण की दीवारें तोड़नी होंगी और कानून का भय हर अपराधी तक पहुंचाना होगा। अन्यथा नशे का यह तांडव पंजाब की युवा शक्ति को ही नहीं, देश की सामाजिक और राष्ट्रीय सुरक्षा को भी गंभीर क्षति पहुंचाता रहेगा। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

प्रभासाक्षी 16 Oct 2026 12:13 pm

सैटेलाइट कम्युनिकेशन में प्रतिस्पर्धा का स्वागत है, भारत के कानून सभी पर समान रूप से लागू: रिलायंस

मुंबई, रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल) ने शुक्रवार को कहा कि भारत में सैटेलाइट संचार क्षेत्र के लिए बनाए गए नियम घरेलू और विदेशी सभी कंपनियों पर समान रूप से लागू होते हैं।

देशबन्धु 16 Oct 2026 11:20 am

Delhi CJP Rally:तिरंगा लहराने के लिए जेल जाने को तैयार’, रैली से पहले अभिजीत दीपके का बयान

Delhi CJP Rally:तिरंगा लहराने के लिए जेल जाने को तैयार’, रैली से पहले अभिजीत दीपके का बयान

समाचार नामा 16 Oct 2026 10:46 am

Protest Update: सुबह 4 बजे NSUI कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया, संसद मार्ग थाने के बाहर रातभर चला धरना

Protest Update: सुबह 4 बजे NSUI कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया, संसद मार्ग थाने के बाहर रातभर चला धरना

समाचार नामा 16 Oct 2026 8:30 am

'हे जगदंबिके! संसार में भला ऐसा कौन-सा शब्द है, जो आपकी स्तुति नहीं है', पीएम मोदी ने साझा किया सुभाषित

'हे जगदंबिके! संसार में भला ऐसा कौन-सा शब्द है, जो आपकी स्तुति नहीं है', पीएम मोदी ने साझा किया सुभाषित

समाचार नामा 16 Oct 2026 8:27 am

'लहरा दो तिरंगा' मार्च से पहले दिल्ली हाई अलर्ट पर, कनॉट प्लेस बना छावनी

सीजेपी द्वारा आयोजित किए जा रहे 'लहरा दो तिरंगा' मार्च से पहले राजधानी दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत कर दिया गया है

देशबन्धु 16 Oct 2026 7:40 am

आज सेंट्रल पार्क में प्रदर्शन की अनुमति नहीं, धारा 163 लागू : दिल्ली पुलिस

कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में 16 अक्टूबर को प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर दिल्ली पुलिस ने अपना पक्ष रखा है। पुलिस उपायुक्त और पीएमएमसी की डीसीपी नेहा यादव ने कहा कि सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को देखते हुए इलाके में पहले से ही निषेधाज्ञा लागू है और लोगों से अपील है कि वे गैरकानूनी जमावड़े का हिस्सा न बनें।

देशबन्धु 16 Oct 2026 7:20 am

राजीव चौक मामले में FIR को लेकर NSUI का प्रदर्शन, विनोद जाखड़ समेत कार्यकर्ता धरने पर बैठे

दिल्ली के राजीव चौक (कनॉट प्लेस) पर NSUI की छात्राओं के साथ कथित पुलिस बर्बरता के मामले में FIR दर्ज करने की मांग को लेकर संगठन ने संसद मार्ग थाने के बाहर प्रदर्शन किया। NSUI का आरोप है कि घटना के 24 घंटे से अधिक समय बीत जाने के बावजूद पुलिस ने अब तक FIR दर्ज नहीं की है

देशबन्धु 16 Oct 2026 12:03 am

SIR विवाद के बीच चुनाव आयोग की नई तैयारी, 17 राज्यों में मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण होगा

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर जारी राजनीतिक विवाद के बीच चुनाव आयोग ने 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में विशेष सारांश पुनरीक्षण (SSR) कराने का फैसला किया है

देशबन्धु 15 Oct 2026 10:29 pm

परविंदर सिंह झोटा की हत्या ने पंजाब सरकार की पोल खोली: फतेह जंग सिंह बाजवा

परविंदर सिंह झोटा की हत्या ने पंजाब सरकार की पोल खोली: फतेह जंग सिंह बाजवा

समाचार नामा 15 Oct 2026 6:26 pm

अतर सिंह भड़ाना हत्याकांड के दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा: गृह राज्य मंत्री जवाहर सिंह

अतर सिंह भड़ाना हत्याकांड के दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा: गृह राज्य मंत्री जवाहर सिंह

समाचार नामा 15 Oct 2026 5:45 pm

'देश का माहौल खराब करने की साजिश', नेहा बोरा पर भड़के बृजभूषण शरण सिंह

'देश का माहौल खराब करने की साजिश', नेहा बोरा पर भड़के बृजभूषण शरण सिंह

समाचार नामा 15 Oct 2026 5:12 pm

राहुल गांधी पर टिप्पणी को लेकर घिरीं भाजपा पार्षद श्रीलेखा, केरल के गृह मंत्री ने माफी मांगने को कहा

राहुल गांधी पर टिप्पणी को लेकर घिरीं भाजपा पार्षद श्रीलेखा, केरल के गृह मंत्री ने माफी मांगने को कहा

समाचार नामा 15 Oct 2026 4:14 pm

भारत में यात्री वाहनों की थोक बिक्री 21.8 प्रतिशत बढ़कर 4.54 लाख यूनिट्स रही: सियाम

नई दिल्ली, भारत में घरेलू स्तर पर यात्री वाहनों की थोक बिक्री सितंबर में सालाना आधार पर 21.8 प्रतिशत बढ़कर 4,54,574 यूनिट्स हो गई है।

देशबन्धु 15 Oct 2026 3:33 pm

ज्ञानेश कुमार के इस्तीफा की मांग, विपक्ष का हठ और संस्थाओं की साख

भारतीय लोकतंत्र का सबसे मजबूत खंभा उसकी निष्पक्ष चुनाव प्रणाली रही है। वैश्विक पटल पर जब भी भारत की लोकतांत्रिक परिपक्वता की मिसाल दी जाती है, तो निर्वाचन सदन यानी भारत निर्वाचन आयोग की भूमिका को अग्रिम पंक्ति में रखा जाता है। किंतु, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर वर्तमान में जो अभूतपूर्व राजनीतिक और संवैधानिक गतिरोध पैदा हुआ है, उसने इस प्रतिष्ठित संस्था की निष्पक्षता को इतिहास के सबसे गंभीर दोराहे पर ला खड़ा किया है। देश की राजनीति इस समय इस सवाल को लेकर सुलग रही है कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा मांगना कांग्रेस और समूचे विपक्ष की एक सैद्धांतिक लड़ाई है, या फिर यह उनकी सोची-समझी राजनीतिक विवशता और नैरेटिव सेट करने की मजबूरी का हिस्सा है? केरल विधानसभा द्वारा देश के इतिहास में पहली बार किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए प्रस्ताव पारित करना और कांग्रेस द्वारा सड़कों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मोर्चा खोलना यह दर्शाता है कि यह विवाद महज एक प्रशासनिक विसंगति नहीं, बल्कि एक गहरे राजनीतिक संग्राम का रूप ले चुका है। इस विवाद की शुरुआत 'द इंडियन एक्सप्रेस' की एक खोजी रिपोर्ट से हुई, जिसने निर्वाचन आयोग के भीतर के बंद दरवाजों के मतभेदों को सार्वजनिक कर दिया। रिपोर्ट के अनुसार, मतदाता सूची के व्यापक पुनरीक्षण यानी 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' को लेकर आयोग के भीतर ही गहरा बिखराव था। दावा किया गया कि अन्य दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने पिछले 10 महीनों में मतदाता सूची से नाम हटाने, नए नाम जोड़ने और डेटा प्रबंधन की प्रक्रियाओं पर करीब 14 बार औपचारिक और लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं। लोकतंत्र का स्थापित नियम और सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस यह स्पष्ट करती हैं कि निर्वाचन आयोग में कोई भी निर्णय बहुमत या सर्वसम्मति से होना चाहिए। विपक्ष का सीधा आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अन्य आयुक्तों की चिंताओं और आपत्तियों को दरकिनार करते हुए एकतरफा फैसले लिए। जब किसी संवैधानिक संस्था के भीतर ही इस स्तर का आंतरिक असंतोष और अविश्वास सतह पर आ जाए, तो उसकी साख पर उंगलियां उठना स्वाभाविक है। इसे भी पढ़ें: Kejriwal की हरी झंडी के बाद Congress-CJP में हुई दोस्ती! क्या पंजाब चुनाव मिलकर लड़ेंगे कांग्रेस और AAP? विपक्ष के इस उग्र आंदोलन के केंद्र में 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' की प्रक्रिया है। इस कवायद के तहत देश के 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूचियों से लगभग 13.30 करोड़ नामों को हटा दिया गया है, जो भारत के कुल मतदाता वर्ग का लगभग 13 प्रतिशत है। चुनाव आयोग का तर्क है कि यह प्रक्रिया बोगस, दोहरे और अपात्र मतदाताओं को हटाने तथा सूची को शुद्ध करने के लिए की गई वैधानिक प्रशासनिक कार्रवाई है। इसके विपरीत, कांग्रेस के संगठन महासचिव के.सी. वेणुगोपाल और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी इसे कृत्रिम हेरफेर और वोट चोरी की संज्ञा दे रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया के जरिए जानबूझकर एक निश्चित वर्ग और विपक्ष के पारंपरिक झुकाव वाले मतदाताओं के नाम काटे गए हैं ताकि आगामी चुनावों के परिणामों को प्रभावित किया जा सके। राहुल गांधी का दिल्ली की सड़कों पर प्रदर्शन, police द्वारा उन्हें हिरासत में लिया जाना और शशि थरूर जैसे नेताओं द्वारा संसद में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग लाने की चेतावनी यह स्पष्ट करती है कि विपक्ष इस मुद्दे को तार्किक परिणति तक ले जाने के लिए आमादा है। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प और सूक्ष्म पहलू यह है कि आखिर कांग्रेस ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे पर इस कदर क्यों अड़ी है? क्या ज्ञानेश कुमार का पद से हट जाना ही इस समस्या का अंतिम समाधान है? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस आक्रामक रुख के पीछे कांग्रेस की रणनीतिक और राजनीतिक मजबूरियां छिपी हुई हैं। लगातार चुनावी चुनौतियों और कई राज्यों में सत्ता से बाहर रहने के बाद, कांग्रेस के लिए अपने कार्यकर्ताओं के भीतर यह विश्वास जगाना जरूरी है कि उनकी वैचारिक या सांगठनिक कमजोरी के कारण पराजय नहीं हो रही है। ज्ञानेश कुमार पर सीधा और तीखा हमला करके राहुल गांधी देश के मानस में यह नैरेटिव सेट करने में सफल हो रहे हैं कि हम चुनाव मैदान में परास्त नहीं हो रहे, बल्कि सरकारी मशीनरी और चुनाव आयोग के तंत्र का दुरुपयोग करके हमें जानबूझकर हरवाया जा रहा है। यदि भविष्य में ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दे देते हैं, तो विपक्ष इसे अपनी बहुत बड़ी नैतिक जीत बताएगा और यह साबित करने की कोशिश करेगा कि पूरी चुनावी प्रक्रिया ही दूषित थी। इसके साथ ही, विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' के भीतर समय-समय पर क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस के बीच वैचारिक और सीटों के बंटवारे को लेकर अंतर्विरोध उभरते रहते हैं। ऐसे समय में भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक साझा, राष्ट्रीय और भावनात्मक रूप से संवेदनशील मुद्दे की आवश्यकता होती है। 'मतदाता के अधिकार' और 'वोट की चोरी' एक ऐसा संवेदनशील विषय है, जिस पर वामपंथी दलों, तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक और आम आदमी पार्टी समेत पूरा विपक्ष आंख मूंदकर एक सुर में खड़ा हो सकता है। कांग्रेस के लिए इस आंदोलन का नेतृत्व करना गठबंधन के भीतर अपनी धुरी वाली भूमिका को बनाए रखने की विवशता भी है। इसके अतिरिक्त, राहुल गांधी ने 2023 में पारित उस कानून (मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023) की धारा 16 को विशेष रूप से निशाने पर लिया है, जो चुनाव आयुक्तों को उनकी सेवा के दौरान और बाद में किसी भी कानूनी जांच या अदालती कार्यवाही से पूर्ण उन्मुक्ति (ब्लैकेट इम्युनिटी) प्रदान करता है। विशेषज्ञों ने भी सवाल उठाए हैं कि ऐसा संरक्षण तो राष्ट्रपति या सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को भी प्राप्त नहीं है। कांग्रेस इस सुरक्षा कवच को लोकतांत्रिक जवाबदेही के सिद्धांत के खिलाफ बताकर सरकार की मंशा पर सीधे सवाल उठा रही है। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और सरकार ने विपक्ष के इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए इसे 'हार के डर से पैदा हुई हताशा' करार दिया है। भाजपा का तर्क है कि चुनाव आयोग एक बहु-सदस्यीय संस्था है, जहां विचारों की भिन्नता और आंतरिक आपत्तियां एक स्वस्थ और जीवंत लोकतंत्र का प्रमाण हैं, न कि किसी साजिश का हिस्सा। लाखों बूथ लेवल अधिकारियों द्वारा घर-घर जाकर किए गए सत्यापन को 'वोट चोरी' कहना उन जमीनी कर्मचारियों के परिश्रम का अपमान है। इसके अलावा, संवैधानिक दृष्टिकोण से देखें तो मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाना कोई सरल खेल नहीं है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जैसे सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश को (यानी संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से महाभियोग प्रस्ताव पारित करके)। वर्तमान संसद के संख्या बल को देखते हुए विपक्ष के लिए महाभियोग को तार्किक परिणति तक पहुंचाना व्यावहारिक रूप से असंभव है। इसके बावजूद, यदि विपक्ष सड़कों पर पुतले फूंक रहा है और संसद ठप करने की चेतावनी दे रहा है, तो उसका लक्ष्य ज्ञानेश कुमार को हटाना कम, बल्कि उनके बहाने सरकार को जन-अदालत में कटघरे में खड़ा करना ज्यादा है। अब यह गंभीर और संवेदनशील विवाद देश की सर्वोच्च अदालत की चौखट पर पहुंच चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त को तत्काल निलंबित करने के अंतरिम आदेश से तो इनकार कर दिया है, लेकिन केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। माननीय अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि आयोग के भीतर आम सहमति या बहुमत के नियमों की अनदेखी कर एकतरफा फैसले लेने के साक्ष्य मिलते हैं, तो न्यायालय उन फैसलों की समीक्षा करने या उन्हें वापस लेने पर विचार कर सकता है। यह रुख इस बात का संकेत है कि न्यायपालिका इस संस्था की आंतरिक लोकतांत्रिक प्रक्रिया को लेकर गंभीर है। अंततः, लोकतंत्र केवल संख्याओं, बहुमत के आंकड़ों या संसद की सीटों का जोड़-घटाव नहीं है। लोकतंत्र की आत्मा देश की संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता और उन संस्थाओं के प्रति आम नागरिक के अटूट विश्वास में बसती है। यदि मुख्य चुनाव आयुक्त और मतदाता सूची की पूरी प्रक्रिया ही हर चुनाव से पहले संदेह के कोहरे में घिर जाएगी, तो जनता का इस पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था से ही भरोसा उठ जाएगा। ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा भले ही कांग्रेस के लिए चुनावी नैरेटिव की एक 'मजबूरी' हो, लेकिन चुनाव आयोग की आंतरिक शुचिता और पारदर्शिता को बहाल करना भारतीय लोकतंत्र की 'महती आवश्यकता' है। इस राजनीतिक संग्राम का निपटारा सड़कों के कोलाहल या राजनीतिक पुतले फूंकने से नहीं, बल्कि देश की सर्वोच्च अदालत में साक्ष्यों और संवैधानिक मर्यादाओं के दायरे में ही होना चाहिए, ताकि निर्वाचन आयोग की धवल चादर पर लगा यह दाग साफ हो सके। अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार

प्रभासाक्षी 15 Oct 2026 2:34 pm

बिहार : सीएम सम्राट ने किया 'रबी महाअभियान' का शुभारंभ, कहा- वैज्ञानिक खेती से बढ़ेगी किसानों की आय

बिहार : सीएम सम्राट ने किया 'रबी महाअभियान' का शुभारंभ, कहा- वैज्ञानिक खेती से बढ़ेगी किसानों की आय

समाचार नामा 15 Oct 2026 2:20 pm

नालंदा में शराब तस्करों के हमले में सिपाही की मौत पर भड़के पप्पू यादव, बोले- 'बिहार में सब भगवान भरोसे'

नालंदा में शराब तस्करों के हमले में सिपाही की मौत पर भड़के पप्पू यादव, बोले- 'बिहार में सब भगवान भरोसे'

समाचार नामा 15 Oct 2026 2:15 pm

मध्य प्रदेश में मामा Vs मुख्यमंत्री की जंग तेज! शिवराज सिंह चौहान के तीखे तेवर से राज्य की राजनीति गर्माई

मध्य प्रदेश की सियासत में इन दिनों फिर वही पुराना सवाल सिर उठाने लगा है कि क्या सूबे की राजनीति में शिवराज सिंह चौहान का दखल अब भी उतना ही दमदार है, या मुख्यमंत्री मोहन यादव अपनी अलग लकीर खींचने में जुटे हैं? ऊपर से सब कुछ भाजपा के अनुशासित कुनबे जैसा दिखता है, लेकिन बुधनी के कोसमी गांव से लेकर किसानों की मूंग खरीदी और लाड़ली बहना योजना तक, कुछ ऐसे मामले सामने आए हैं, जिन्होंने भोपाल के सियासी गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है। उल्लेखनीय है कि ताजा चिंगारी सीहोर जिले के कोसमी गांव से उठी है। यह वही इलाका है, जहां शिवराज सिंह चौहान की बरसों पुरानी राजनीतिक जमीन रही है। गांव में आदिवासी परिवारों के मकान हटाए जाने, फसलों को नुकसान पहुंचने और कुओं को मिट्टी से भरने की शिकायतों पर शिवराज ने अपनी ही पार्टी की सरकार के अधिकारियों को कठघरे में खड़ा कर दिया। उनका रुख साफ था कि सरकार किसी की भी हो, गरीब और आदिवासी परिवारों के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए। उन्होंने अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की और मुख्यमंत्री मोहन यादव से बात करने की बात कही। इसे भी पढ़ें: अपनी ही पार्टी की मध्य प्रदेश सरकार के खिलाफ Shivraj Singh Chouhan ने क्यों खोला मोर्चा? Madhya Pradesh BJP में सब ठीक है? देखा जाये तो राजनीति में बात सिर्फ इतनी नहीं है कि किसी गांव में मकान टूटे और एक नेता ने नाराजगी जता दी। सवाल यह है कि शिवराज ने यह आवाज उस सरकार के खिलाफ उठाई है, जिसके मुखिया उनकी ही पार्टी के मुख्यमंत्री हैं। मोहन यादव ने भी मामले को हल्के में नहीं लिया। उन्होंने मुख्य सचिव से जांच कराने और प्रभावित परिवारों के लिए अस्थायी आवास तथा भोजन की व्यवस्था करने की बात कही। दूसरी तरफ, कलेक्टर की रिपोर्ट में वन भूमि पर अतिक्रमण और सागौन के पौधों को नुकसान पहुंचाने के आरोप सामने आए। यानी मामला केवल सियासी बयानबाजी का नहीं, बल्कि वन संरक्षण, प्रशासनिक कार्रवाई और आदिवासी परिवारों के अधिकारों का भी है। लेकिन मध्य प्रदेश की राजनीति में हर घटना का एक स्थानीय और एक राजनीतिक अर्थ होता है। कोसमी का मामला इसलिए भी चर्चा में है, क्योंकि शिवराज ने जिस इलाके में लंबे समय तक अपनी राजनीतिक पकड़ बनाई, वहीं की घटना पर उनका इस तरह सामने आना कई सवाल खड़े करता है। सवाल उठ रहा है कि क्या यह केवल अपने पुराने मतदाताओं के प्रति जवाबदेही है, या इसके पीछे भोपाल की सत्ता के साथ तालमेल का कोई बड़ा सवाल भी छिपा है? इस कहानी का दूसरा सिरा लाड़ली बहना योजना से भी जुड़ता है। शिवराज की राजनीति की पहचान बनी इस योजना ने प्रदेश में महिलाओं के बीच उनकी अलग छवि बनाई। अब मुख्यमंत्री मोहन यादव की ओर से योजना के खर्च को भारी बताने वाली टिप्पणी ने पुरानी राजनीतिक विरासत और मौजूदा सरकार की आर्थिक प्राथमिकताओं पर बहस छेड़ दी है। शिवराज के लिए यह योजना महज सरकारी खर्च का हिसाब नहीं, उनकी राजनीतिक पहचान का भी हिस्सा है। वहीं, मौजूदा सरकार के सामने बजट, दूसरी योजनाओं और विकास कार्यों के बीच संतुलन बैठाने की चुनौती है। तीसरा मोर्चा किसानों का है। मूंग की खरीदी को लेकर जब किसान परेशान हुए, तब केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर खरीद तेज करने की मांग की। राज्य सरकार को आखिरकार खरीदी बढ़ाने की मांग पर सहमति देनी पड़ी। देखा जाये तो यहां भी तस्वीर दिलचस्प है। केंद्र में मंत्री शिवराज, राज्य में मुख्यमंत्री मोहन यादव और बीच में किसान, जिनकी फसल और भुगतान का सवाल सीधे सरकार की जवाबदेही से जुड़ा है। शिवराज का हस्तक्षेप किसानों के लिए मददगार हो सकता है, लेकिन राजनीतिक तौर पर यह राज्य सरकार पर दबाव भी बनाता है। यही वजह है कि शिवराज बनाम मोहन की चर्चा बार-बार लौट आती है। एक तरफ शिवराज हैं, जिनकी पहचान लंबे मुख्यमंत्री कार्यकाल, जनकल्याणकारी योजनाओं और प्रदेश के गांव-गांव में बने पुराने संपर्कों से जुड़ी है। दूसरी तरफ मोहन यादव हैं, जिन्हें अपनी सरकार की नीतियों, प्रशासनिक फैसलों और नेतृत्व की अलग पहचान स्थापित करनी है। दोनों की भूमिकाएं अलग हैं, मगर प्रदेश की राजनीति में उनका असर एक-दूसरे से पूरी तरह अलग नहीं किया जा सकता। फिर भी, हर मतभेद को मुख्यमंत्री की कुर्सी की लड़ाई मान लेना जल्दबाजी होगी। भाजपा में संगठन का अपना अनुशासन और केंद्रीय नेतृत्व की भूमिका है। अभी तक सामने आई घटनाएं प्रशासन, किसान नीति और राजनीतिक विरासत पर मतभेद दिखाती हैं; मगर वे किसी औपचारिक सत्ता-संघर्ष को साबित नहीं करतीं। फिलहाल मध्य प्रदेश की राजनीति का असली इम्तिहान बयानों से आगे होगा। कोसमी की जांच में क्या कार्रवाई होती है, प्रभावित परिवारों को क्या राहत मिलती है, लाड़ली बहना योजना को लेकर राज्य सरकार क्या फैसला करती है और किसानों की खरीदी व्यवस्था कितनी दुरुस्त होती है, इन सवालों के जवाब ही आगे की तस्वीर साफ करेंगे। बहरहाल, भोपाल की सियासत में मामा शिवराज की हुंकार अब भी गूंज रही है, तो मुख्यमंत्री मोहन यादव भी अपने फैसलों से सत्ता पर अपनी पकड़ और नेतृत्व की लकीर खींचने में जुटे हैं। दोनों के बीच सियासी खिंचाव की आहट साफ सुनाई दे रही है, लेकिन इसे खुली जंग का नाम देना अभी जल्दबाजी होगी। असली तस्वीर तब खुलेगी जब यह सामने आये कि कोसमी के मामले में सरकार के कदम क्या होते हैं, लाड़ली बहना योजना पर क्या रुख अपनाया जाता है और किसानों के सवाल पर किसका पलड़ा भारी पड़ता है। क्योंकि मध्य प्रदेश की राजनीति में सियासी इरादे सिर्फ बयानों से जाहिर नहीं होते, उनका असली रंग फैसलों में दिखता है। भोपाल में फिलहाल बयान गूंज रहे हैं, लेकिन निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि अगली चाल कौन चलता है और बाजी किस करवट बैठती है? -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 15 Oct 2026 12:56 pm

अंकिता भंडारी केस पर राहुल गांधी का केंद्र पर हमला, बोले- पीड़ितों की आवाज दबाना सरकार की पहचान

अंकिता भंडारी के माता-पिता को हिरासत में लिए जाने पर राहुल गांधी ने केंद्र सरकार पर निशाना साधा। परिवार ने सीबीआई जांच पूरी होने तक दुष्यंत कुमार गौतम की राज्यपाल नियुक्ति पर रोक लगाने की मांग की है।

देशबन्धु 15 Oct 2026 12:32 pm

OpenAI में जासूसी के खुलासे से हड़कंप! AI ने पकड़ा अपना ही इंजीनियर Abdulrahman Alfozan, Silicon Valley में मचा घमासान

दुनिया को AI की ताकत दिखाने वाली अमेरिकी कंपनी OpenAI के अपने दफ्तर में ही जासूसी का सनसनीखेज मामला सामने आया है। इस खबर के सामने आते ही सैन फ्रांसिस्को से लेकर सिलिकॉन वैली तक हड़कंप मच गया है। दरअसल, कंपनी के एक इंजीनियर पर आरोप है कि उसने बड़े अधिकारियों की गुप्त बातचीत रिकॉर्ड करने के लिए कमरे में छिपकर एक डिवाइस लगा दिया। मामला खुला तो OpenAI ने अपने ही AI की मदद से आरोपी का सुराग खोज निकाला और बात FBI तक पहुंच गई। उधर, Apple पर भी आरोप लगे हैं कि उसके पास OpenAI के 100 से ज्यादा गोपनीय दस्तावेज पहुँचे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि AI की दुनिया में आखिर कौन किसके राज चुरा रहा है? सवाल यह भी है कि क्या तकनीक की इस जंग में कंपनियों के सबसे बड़े रहस्य भी सुरक्षित नहीं रहे? टॉयलेट पेपर के पीछे छिपा था जासूसी का कथित उपकरण अमेरिकी जांच एजेंसियों के अनुसार, OpenAI के सैन फ्रांसिस्को कार्यालय में 30 सितंबर को सुरक्षा जांच के दौरान एक अंगूठे के आकार का रिकॉर्डिंग डिवाइस मिला। इसे एक कॉन्फ्रेंस रूम में टीवी के पीछे USB पोर्ट में लगाया गया था और कथित तौर पर टॉयलेट पेपर से छिपाया गया था, ताकि सामान्य जांच में इसका पता न चले। जांच में सामने आए विवरणों के मुताबिक, डिवाइस में माइक्रोफोन, अलग किया जा सकने वाला कैमरा सेंसर और माइक्रोएसडी स्टोरेज जैसी सुविधाएं थीं। इसमें रिकॉर्डिंग को सुरक्षित रखने के लिए एन्क्रिप्शन और डेटा ट्रांसफर की क्षमता होने की भी बात कही गई है। बताया गया कि यह कमरा OpenAI के अधिकारियों की उन बैठकों के लिए इस्तेमाल होता था, जिनमें कंपनी की अत्याधुनिक AI तकनीक, भविष्य के उत्पादों, कारोबारी रणनीति और संभावित साझेदारियों पर चर्चा होती थी। अमेरिकी जांच एजेंसी FBI के मुताबिक, डिवाइस को लगभग 28 सितंबर को लगाया गया था। हालांकि, उसकी सामग्री एन्क्रिप्टेड होने के कारण रिकॉर्डिंग तक पहुंच नहीं बन सकी। इसे भी पढ़ें: OpenAI के बैठक कक्ष में गुप्त रिकॉर्डिंग डिवाइस लगाने पर इंजीनियर गिरफ्तार AI ने ही खोज निकाला कथित आरोपी का सुराग इस मामले में सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया, जब OpenAI ने बताया कि उसने डिवाइस को समझने और उसके स्रोत का पता लगाने के लिए अपने AI मॉडल्स का इस्तेमाल किया। कंपनी के मुताबिक, इस विश्लेषण से उसे उस कर्मचारी की पहचान करने में मदद मिली, जिसने डिवाइस लगाया था। अमेरिकी अधिकारियों ने 35 वर्षीय सऊदी नागरिक अब्दुलरहमान अलफोजान को 9 अक्टूबर को गिरफ्तार किया। वह OpenAI में इंजीनियरिंग लीड के रूप में काम कर चुका था और जुलाई 2025 में कंपनी से जुड़ा था। वह अमेरिका का स्थायी निवासी भी बताया गया है। साथ ही अभियोजन पक्ष के आरोप इससे भी आगे जाते हैं। जांचकर्ताओं का दावा है कि अलफोजान ने कंपनी की इमारतों, मीटिंग रूम, बैठकों के कैलेंडर और अधिकारियों की गतिविधियों से जुड़ी जानकारी जुटाने के लिए एक प्रोडक्टिविटी टूल का इस्तेमाल किया। आरोप है कि 24 से 30 सितंबर के बीच उसने अपनी पत्नी से जुड़े AI चैटबॉट अकाउंट पर रिकॉर्डिंग डिवाइस बनाने, लगाने, छिपाने और दूर से संचालित करने से संबंधित सवाल भी पूछे। शिकायत में CCTV फुटेज का भी उल्लेख है। जांचकर्ताओं के मुताबिक, कुछ मौकों पर अलफोजान को उस कॉन्फ्रेंस रूम के आसपास देखा गया, जहां जाने या बैठक में शामिल होने की उसे अनुमति नहीं थी। पांच अक्टूबर की फुटेज में कथित तौर पर उसे टीवी के पीछे देखते हुए दिखाया गया। उसी दिन दूसरे कमरे में छोड़े गए एक बैग की तलाशी के दौरान सुरक्षा कर्मियों को एक अन्य एन्क्रिप्टेड रिकॉर्डिंग डिवाइस मिलने का भी दावा किया गया है। अलफोजान पर इलेक्ट्रॉनिक उपकरण के जरिए मौखिक बातचीत को अवैध रूप से रिकॉर्ड करने या ऐसा करने का प्रयास करने का आरोप है। बताया जा रहा है कि दोषी पाए जाने पर उसे पांच साल तक की जेल, 2.5 लाख डॉलर का जुर्माना और तीन साल तक निगरानी में रिहाई की सजा हो सकती है। OpenAI का दावा: डेटा चोरी का सबूत नहीं उधर, इतने गंभीर आरोपों के बावजूद OpenAI ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल उसे ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है कि आरोपी ने कंपनी के मॉडल वेट्स, सोर्स कोड या ग्राहकों के डेटा तक अनुचित पहुंच बनाई अथवा उन्हें बाहर भेजा। कंपनी ने मामला FBI को सौंपने और जांच में सहयोग करने की बात कही है। FBI निदेशक काश पटेल ने इसे अमेरिकी AI नवाचार की सुरक्षा से जुड़ा महत्वपूर्ण मामला बताया है। वहीं अब्दुलरहमान अलफोजान का पेशेवर अनुभव भी ध्यान खींचता है। वह इससे पहले Meta, Microsoft और SAP जैसी कंपनियों में काम कर चुका है। वह MIT से कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग की डिग्रीधारी बताया गया है और निवेश फर्म Raed Ventures से भी जुड़ा है। Apple और OpenAI की जंग में 100 से ज्यादा फाइलों का विवाद उधर, Apple के साथ चल रहे कानूनी विवाद ने इस पूरे घटनाक्रम को और दिलचस्प बना दिया है। OpenAI का आरोप है कि उसका एक पूर्व कर्मचारी कंपनी के उत्पाद से जुड़ी 100 से अधिक फाइलें अपने निजी अकाउंट पर भेजने के बाद Apple के वरिष्ठ अधिकारियों के सामने उस उत्पाद का प्रेजेंटेशन दे चुका था। हालांकि, Apple ने इन आरोपों को खारिज किया है। OpenAI की ओर से अदालत में दाखिल याचिका के मुताबिक, Apple में नौकरी करने पहुंचे उसके एक पूर्व कर्मचारी ने 100 से अधिक फाइलें अपने निजी अकाउंट पर भेजी थीं। आरोप है कि उसने बाद में अपने उत्पाद से जुड़ी प्रस्तुति Apple के वरिष्ठ नेतृत्व के सामने दी। OpenAI को आशंका है कि उसकी गोपनीय जानकारी अब Apple के भीतर मौजूद हो सकती है और कंपनी के इंजीनियर इसका इस्तेमाल अपने आगामी उत्पादों को विकसित करने में कर सकते हैं। हालांकि Apple ने कहा है कि उसके पास पूर्व नियोक्ताओं की गोपनीय जानकारी के इस्तेमाल को रोकने के लिए नीतियां और प्रक्रियाएं हैं तथा उसकी जांच में अब तक OpenAI की फाइलें Apple के सर्वरों पर नहीं मिली हैं। Apple के वकीलों ने यह भी कहा कि OpenAI द्वारा बताए गए दो निजी फोन नंबर उस कर्मचारी के Apple कार्य-संबंधी नंबर से मेल नहीं खाते। Apple के अनुसार, उसे कथित प्रेजेंटेशन की जानकारी भी नहीं थी और उसने OpenAI से अतिरिक्त विवरण मांगे थे। कंपनी का आरोप है कि OpenAI ने जवाब देने के बजाय अदालत का रुख किया। हम आपको यह भी बता दें कि OpenAI की ओर से Apple के पूर्व कर्मचारियों द्वारा गोपनीय जानकारी ले जाने के आरोपों को भी पहले खारिज किया जा चुका है। इस बीच, अदालत ने Apple को अपने कुछ पूर्व कर्मचारियों के डिजिटल उपकरणों से डेटा जुटाने और तीन लोगों से निर्धारित समय से पहले पूछताछ करने की अनुमति दी है। इनमें पूर्व वरिष्ठ सिस्टम इंजीनियर चांग लियू और iPhone तथा Apple Watch के डिजाइन से जुड़े रहे पूर्व उपाध्यक्ष टैंग येव टैन शामिल हैं। मुकदमे की सुनवाई अक्टूबर 2027 में होने की संभावना है, हालांकि OpenAI ने जून 2027 तक तैयार होने की बात कही है। देखा जाये तो इन दोनों मामलों में अभी कई सवाल अनुत्तरित हैं। रिकॉर्डिंग डिवाइस से कोई संवेदनशील जानकारी बाहर गई या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है। इसी तरह Apple के पास OpenAI की गोपनीय जानकारी पहुंचने के आरोप भी अभी साबित नहीं हुए हैं। बहरहाल, एक बात साफ है। AI की दुनिया में जंग अब सिर्फ सबसे ताकतवर मॉडल बनाने की नहीं, बल्कि एक-दूसरे के तकनीकी राज हथियाने और अपने रहस्यों को बचाने की भी है। किसके पास कितनी उन्नत तकनीक है, कौन अगली बड़ी छलांग लगाने वाला है और किसकी गोपनीय जानकारी किसके हाथ लग रही है, इन्हीं सवालों के बीच दुनिया की दिग्गज टेक कंपनियां आमने-सामने हैं। हैरानी देखिए, जिस AI को इंसानी दिमाग की सबसे जटिल पहेलियां सुलझाने के लिए बनाया गया, वही अब जासूसी के सुराग खोजने और साजिशों का पर्दाफाश करने में जुटा है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब तकनीक के महारथी ही एक-दूसरे के राज तलाशने में लगे हों, तो इस डिजिटल महायुद्ध में आखिर किसके रहस्य सुरक्षित हैं और किसकी अगली चाल पहले ही बेनकाब हो जाएगी? -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 15 Oct 2026 11:56 am

तिरंगा यात्रा या राजनीतिक प्रदर्शन? भाजपा ने विपक्ष को घेरा

भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता आरपी सिंह ने तिरंगा यात्रा के नाम पर सियासी प्रदर्शन और जंतर-मंतर पर अड़े विपक्ष को कानून का आइना दिखाया।

देशबन्धु 15 Oct 2026 7:20 am

SIR विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में आज बड़ी सुनवाई, राहुल गांधी की याचिका पर टिकी नजरें

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चल रहे विवाद के बीच आज सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई होने जा रही है

देशबन्धु 15 Oct 2026 7:09 am

कांग्रेस और 'आप' की नूरा-कुश्ती सब जानते हैं, प्रॉक्सी टीम से देश के कानून को तोड़ने की कोशिश: शाजिया इल्मी

कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के विरोध प्रदर्शन के तरीके पर भाजपा नेता शाजिया इल्मी ने निशाना साधा। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी और कांग्रेस एवं कॉकरोच जनता पार्टी यानी आम आदमी पार्टी के बीच चल रही नूरा-कुश्ती किसी से छिपी नहीं है, लेकिन प्रोटेस्ट के नाम पर तिरंगे का इस्तेमाल कर कानून तोड़ने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती।

देशबन्धु 15 Oct 2026 5:54 am

बागी विधायकों पर अखिलेश का तंज, बोले सदस्यता की पर्ची से ज्यादा कुछ नहीं मिला

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) के तीन बागी विधायकों के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होने के बाद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने उन पर तीखा तंज कसा

देशबन्धु 14 Oct 2026 11:10 pm

जेएनयू यौन उत्पीड़न मामला: एनसीडब्ल्यू प्रमुख से मिला भाजपा का प्रतिनिधिमंडल, सांसद के खिलाफ कार्रवाई की मांग

जेएनयू यौन उत्पीड़न मामला: एनसीडब्ल्यू प्रमुख से मिला भाजपा का प्रतिनिधिमंडल, सांसद के खिलाफ कार्रवाई की मांग

समाचार नामा 14 Oct 2026 8:23 pm

उत्तर प्रदेश में नामांकन की चुनौतियां, 'अयोध्या चैलेंज' और राजनैतिक भविष्य का शंखनाद

भारतीय राजनीति का यह एक सर्वमान्य और समय-सिद्ध सिद्धांत है कि दिल्ली का रास्ता लखनऊ के गलियारों से होकर ही गुजरता है। उत्तर प्रदेश न केवल देश का सबसे बड़ा राज्य है, बल्कि यह वह राजनैतिक कुरुक्षेत्र भी है जहां राष्ट्रीय स्तर के बड़े-बड़े सियासी सूरमाओं का भाग्य तय होता है। वर्ष 2026 के इस उत्तरार्ध में कदम रखते ही प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर सरगर्मियां अपने चरम पर पहुंच चुकी हैं और संपूर्ण राज्य एक बार फिर एक बड़े लोकतांत्रिक उत्सव और उसकी जटिलताओं के मुहाने पर खड़ा है। किसी भी चुनाव प्रक्रिया का सबसे पहला, महत्वपूर्ण और प्रशासनिक रूप से संवेदनशील पड़ाव नामांकन होता है, जो केवल एक कानूनी या प्रशासनिक औपचारिकता मात्र नहीं है, बल्कि यह किसी भी राजनैतिक दल की सांगठनिक शक्ति, आंतरिक अनुशासन और जमीनी रणनीति का लिटमस टेस्ट है। इस प्रक्रिया में आने वाली चुनौतियां न केवल चुनाव आयोग और प्रशासन के धैर्य की परीक्षा लेती हैं, बल्कि यह विभिन्न राजनैतिक दलों के अस्तित्व और उनकी साख से भी जुड़ी होती हैं। इस बार, यह नामांकन प्रक्रिया सिर्फ कागजी कार्यवाहियों तक सीमित नहीं है, बल्कि सूबे के दो सबसे बड़े दिग्गजों—मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव—के बीच सीधे 'नामांकन चैलेंज' के रूप में तब्दील हो चुकी है, जिसने उत्तर प्रदेश की सियासत में एक अभूतपूर्व भूचाल ला दिया है। इस राजनैतिक रस्साकशी की शुरुआत तब हुई जब समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अयोध्या का दौरा किया और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी पर तीखा तंज कसते हुए दावा किया कि सपा द्वारा उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद भाजपा सर्वे पर सर्वे करा रही है और उसे अयोध्या में खड़ा करने के लिए कोई उपयुक्त प्रत्याशी ही नहीं मिल रहा है। अखिलेश ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सीधे चुनौती दे डाली कि अगर उन्हें अपनी लोकप्रियता और विकास कार्यों पर इतना ही भरोसा है, तो वे खुद आगामी विधानसभा चुनाव में अयोध्या सीट से मैदान में उतरकर दिखाएं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस चुनौती को न सिर्फ स्वीकार किया, बल्कि इसे एक कदम आगे बढ़ाते हुए अखिलेश यादव को ही कटघरे में खड़ा कर दिया और एक सार्वजनिक कार्यक्रम में साफ शब्दों में कहा कि अगर दम है तो अखिलेश भी अयोध्या से चुनाव लड़ें और वे भी लड़ेंगे, दोनों आमने-सामने नामांकन दाखिल कर एक बार अपनी किस्मत आजमा लें ताकि मामला हमेशा के लिए तय हो जाए। योगी के इस सीधे प्रहार पर अखिलेश यादव ने भी तुरंत प्रतिक्रिया दी और इस सीधे मुकाबले को यह कहते हुए टालने की कोशिश की कि भाजपा को हराने के लिए उनका एक युवा 'पीडीए' प्रहरी ही काफी है। इस जुबानी जंग ने यह साफ कर दिया है कि आगामी चुनावों में नामांकन का दौर कितना हाई-वोल्टेज होने वाला है और दोनों खेमों द्वारा एक-दूसरे की घेराबंदी का यह सबसे आक्रामक रूप है। इसे भी पढ़ें: UP Congress में कुर्सी की लड़ाई जूते-चप्पल तक आई, Ajay Rai ने BJP में वापसी की टिकट कटाई! किसी भी राजनैतिक दल के लिए चुनाव की घोषणा के बाद नामांकन का चरण सबसे अधिक तनावपूर्ण और आंतरिक संघर्षों से भरा होता है क्योंकि टिकटों की घोषणा से लेकर नामांकन पत्र दाखिल करने के अंतिम मिनट तक दलों के भीतर जो उथल-पुथल मचती है, वह सांगठनिक ढांचे को हिलाकर रख देती है। टिकट न मिलने से नाराज कार्यकर्ताओं और नेताओं का विद्रोह उत्तर प्रदेश की राजनीति का एक कड़वा और अपरिवर्तनीय सच है, जहां नामांकन के ठीक पहले पाला बदलना, रातों-रात प्रतिद्वंद्वी पार्टी की सदस्यता ले लेना, निर्दलीय पर्चा दाखिल कर देना या अपनी ही पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार का खेल बिगाड़ने के लिए किसी डमी प्रत्याशी को खड़ा कर देना सबसे बड़ा सांगठनिक चैलेंज बन जाता है। भारतीय जनता पार्टी जैसी कैडर-आधारित पार्टी हो या समाजवादी पार्टी जैसी मजबूत क्षेत्रीय ताकत, आंतरिक असंतोष को दबाना और रूठे हुए नेताओं को मनाना इस समय दोनों ही खेमों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है, और जब बड़े नेता एक-दूसरे को सीधे नामांकन की चुनौती दे रहे हों, तो जमीनी कार्यकर्ताओं को अनुशासित रखना और अधिक मुश्किल हो जाता है। इसके साथ ही, चुनाव आयोग ने हाल के वर्षों में नामांकन पत्रों की स्क्रूटनी और हलफनामों की समीक्षा को अत्यधिक कड़ा कर दिया है, जिसके तहत शपथ पत्र में अपनी संपत्ति, आपराधिक इतिहास, शैक्षणिक योग्यता और वित्तीय देनदारियों का रत्ती भर भी गलत विवरण देना पूरे नामांकन को निरस्त करा सकता है, जैसा कि हाल ही में संपन्न हुए राज्यसभा और विधान परिषद द्विवार्षिक चुनावों के दौरान कुछ निर्दलीय व छोटे दलों के उम्मीदवारों के पर्चे खारिज होने से साबित भी हो चुका है। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल, सघन आबादी और राजनैतिक रूप से संवेदनशील राज्य में नामांकन के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखना जिला प्रशासनों और police महकमे के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होता क्योंकि कलेक्ट्रेट और कमिश्नरी कार्यालयों के बाहर का दृश्य अक्सर राजनैतिक शक्ति प्रदर्शन का अखाड़ा बन जाता है। नामांकन दाखिल करने जाते समय उम्मीदवारों द्वारा भारी भीड़ जुटाना, अपनी ताकत का अहसास कराना और गाड़ियों के लंबे काफिले ले जाना एक आम चलन बन चुका है, जिसके कारण चुनाव आयोग के कड़े नियमों के बावजूद कलेक्ट्रेट परिसर के बाहर समर्थकों का हुजूम नियंत्रित करना पुलिस के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द साबित होता है और इस दौरान आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के मामले सबसे ज्यादा दर्ज होते हैं। उत्तर प्रदेश के कई जिले राजनैतिक और सामाजिक रूप से अत्यधिक संवेदनशील माने जाते हैं, जहां नामांकन के दौरान प्रतिद्वंद्वी गुटों के बीच झड़प, नारेबाजी और कभी-कभी हिंसक टकराव की आशंका बनी रहती है, जिससे निपटने के लिए प्रशासन को चप्पे-चप्पे पर सीसीटीवी कैमरों, ड्रोन कैमरों और भारी संख्या में प्रांतीय सशस्त्र कांस्टेबुलरी तथा अर्धसैनिक बलों की तैनाती करनी पड़ती है ताकि पूरी नामांकन प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो सके। इस चुनावी माहौल में डिजिटल तकनीक जहां एक वरदान है, वहीं यह प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती भी बनकर उभरी है क्योंकि हाल के हफ्तों में सोशल मीडिया पर उत्तर प्रदेश में पंचायत और स्थानीय निकायों के चुनावों के नामांकन और तारीखों को लेकर कई फर्जी और भ्रामक खबरें प्रसारित की गईं, जिनका खंडन करना और जनता के बीच सही सूचना पहुंचाना राज्य निर्वाचन आयोग के लिए एक अतिरिक्त प्रशासनिक चुनौती बन गया है। वास्तव में, योगी और अखिलेश के बीच छिड़ा यह नामांकन युद्ध आगामी महासमर की नींव रख रहा है और वर्तमान में जो भी सांगठनिक फेरबदल या राजनैतिक बयानबाजी हो रही है, वह मुख्य चुनाव के मद्देनजर ही की जा रही है, जिसमें सभी प्रमुख दलों के सामने अपनी-अपनी विशिष्ट चुनौतियां हैं। लगातार दो बार राज्य की सत्ता पर काबिज रहने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा के सामने सत्ता विरोधी लहर को कम करने और नए चेहरों को मौका देने की चुनौती होगी, और जब विधानसभा चुनाव के वास्तविक नामांकन शुरू होंगे, तब मौजूदा विधायकों के टिकट काटने या बदलने पर जो आंतरिक असंतोष पैदा होगा, उसे संभालना पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और योगी आदित्यनाथ के लिए सबसे बड़ा इम्तिहान होगा। दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी पिछले कुछ समय से अपने 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के साथ खुद को री-ब्रांड कर रही है, और अखिलेश यादव के लिए चुनौती यह होगी कि वे टिकट वितरण और नामांकन के समय इस सामाजिक समीकरण को जमीन पर कैसे उतारते हैं तथा अयोध्या जैसी प्रतीकात्मक और हाई-प्रोफाइल सीट पर योगी आदित्यनाथ की सीधी चुनौती का सामना करने के लिए वे अपने मौजूदा घोषित प्रत्याशी पर भरोसा बनाए रखते हैं या खुद मैदान में उतरकर इस राजनैतिक जुए को खेलने का साहस दिखाते हैं। नामांकन की प्रक्रिया लोकतंत्र के भव्य भवन की वह पहली ईंट है, जिस पर पूरे चुनाव की शुचिता, विश्वसनीयता और पारदर्शिता टिकी होती है और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में, जहां की राजनीति जाति, धर्म, क्षेत्रीयता, बाहुबल और धनबल के अत्यधिक जटिल ताने-बाने से बुनी गई है, वहां नामांकन को निर्विघ्न और निष्पक्ष बनाना एक युगांतकारी कार्य है। योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव के बीच का 'अयोध्या नामांकन चैलेंज' यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि उत्तर प्रदेश का आगामी चुनाव किसी भी सामान्य चुनाव से अलग, एक वैचारिक और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की लड़ाई बनने जा रहा है। चुनौतियां चाहे राजनैतिक दलों के भीतर टिकटों को लेकर मचे घमासान की हों, कलेक्ट्रेट के बाहर कानून-व्यवस्था की हों, या फिर दोनों शीर्ष नेताओं के बीच आमने-सामने के मुकाबले की हों—इन सबका समाधान केवल और केवल सख्त प्रशासनिक इच्छाशक्ति, चुनाव आयोग की निष्पक्षता और राजनैतिक दलों की लोकतांत्रिक परिपक्वता में ही निहित है। उत्तर प्रदेश की जागरूक जनता नामांकन के इस शोर-शराबे, रैलियों के शक्ति प्रदर्शन और शीर्ष नेताओं की इस राजनैतिक जंग के बीच हर उम्मीदवार के हलफनामे, उसके आचरण और उसकी पार्टी की नीति का बहुत सूक्ष्मता से मूल्यांकन कर रही है और आने वाले महीनों में यह देखना अत्यंत दिलचस्प होगा कि देश का यह सबसे बड़ा राजनैतिक सूबा इन चुनौतियों से पार पाकर किस तरह एक नए राजनैतिक भविष्य की इबारत लिखता है और क्या 'अयोध्या' वास्तव में इस महामुकाबले का मुख्य केंद्र बिंदु बनती है। - अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार

प्रभासाक्षी 14 Oct 2026 6:01 pm

Kejriwal की हरी झंडी के बाद Congress-CJP में हुई दोस्ती! क्या पंजाब चुनाव मिलकर लड़ेंगे कांग्रेस और AAP?

दिल्ली के जंतर-मंतर पर तिरंगा लहराने, छात्रों की गिरफ्तारी और विरोध-प्रदर्शन के अधिकार को लेकर छिड़ा विवाद अब महज कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रह गया है। इसके मंच पर देश की सियासत का एक नया नाटक भी आकार लेने लगा है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं की गिरफ्तारी पर जिस अंदाज में आवाज बुलंद की है, उससे साफ है कि विपक्ष अब इस आंदोलन को अपने बड़े राजनीतिक अभियान से जोड़ने की कोशिश में है। सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी को अचानक CJP के आंदोलन में लोकतंत्र की नई उम्मीद दिखाई देने लगी है, या फिर इसके पीछे चुनाव आयोग, मतदाता सूची और भाजपा के खिलाफ विपक्षी मोर्चे को मजबूत करने की रणनीति काम कर रही है? हम आपको बता दें कि राहुल गांधी ने सोशल मीडिया मंच X पर कहा कि जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान तिरंगा लहराना कोई अपराध नहीं है और ऐसा करने पर युवाओं को जेल में डालना कायरता है। उन्होंने छात्रों, युवाओं, पत्रकारों और INDIA गठबंधन का जिक्र करते हुए दावा किया कि अलग-अलग बैनर के बावजूद सबकी लड़ाई संवैधानिक अधिकारों की मांग करना ही है। उनका संदेश था कि जंतर-मंतर जनता का है और उसे वापस हासिल किया जाएगा। इसे भी पढ़ें: अनियंत्रित भीड़ को 'शिव बारात' की उपमा देकर राहुल गांधी ने हिंदू भावनाओं को पहुँचाई ठेस! देखा जाये तो बात सुनने में दमदार है। आखिर लोकतंत्र में विरोध की आवाज को जगह मिलनी ही चाहिए। लेकिन राजनीति में केवल भाषण नहीं, उसके पीछे की टाइमिंग भी बहुत कुछ कहती है। राहुल गांधी का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि CJP के आंदोलन को लेकर कांग्रेस का रुख अब तक इतना खुला और स्पष्ट नहीं था। सवाल उठता है कि पहले दूरी, अब दोस्ती क्यों? हम आपको याद दिला दें कि परीक्षाओं में गड़बड़ी और पेपर लीक के खिलाफ जुलाई में CJP ने जंतर-मंतर पर 17 दिनों तक प्रदर्शन किया था। सोशल मीडिया पर इस संगठन की चर्चा बढ़ी, लेकिन कांग्रेस के बड़े नेताओं ने शुरुआत में उससे दूरी बनाए रखी। पार्टी का जोर अपने अभियानों ‘छात्रों की गूंज’ और ‘वोट चोरी' पर रहा। संदेश साफ था कि पेपर लीक और मतदाता सूची की कथित अनियमितताओं जैसे मुद्दों पर कांग्रेस पहले से लड़ाई लड़ रही है। यानी आंदोलन का मुद्दा वही था, लेकिन मंच अलग-अलग थे। कांग्रेस अपनी राजनीतिक जमीन पर किसी दूसरे संगठन को ज्यादा जगह देने के मूड में नहीं दिख रही थी। देखा जाये तो विपक्ष की राजनीति में मुद्दों से ज्यादा महत्वपूर्ण कई बार यह हो जाता है कि मुद्दे का श्रेय किसे मिलेगा। इसके बाद, 10 अक्टूबर को CJP ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े मुद्दों पर प्रदर्शन का आह्वान किया, लेकिन कांग्रेस उससे दूर रही। 12 अक्टूबर को जब विपक्षी दलों ने अपना मार्च निकाला, तब CJP भी उस कार्यक्रम से अलग रही। एक ही मुद्दे पर अलग-अलग प्रदर्शन विपक्ष की एकजुटता के दावों पर सवाल खड़े कर रहे थे। अब राहुल गांधी का कहना है कि कोई समानांतर प्रदर्शन नहीं है, बल्कि लड़ाई एक ही है। यही वह राजनीतिक मोड़ है, जहां कांग्रेस ने CJP के आंदोलन को अपने व्यापक विपक्षी अभियान से जोड़ने का संकेत दिया है। CJP के नेताओं सौरव दास और अभिषेक रांका को जंतर-मंतर में अनधिकृत प्रवेश के आरोप में गिरफ्तार किए जाने और पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के बाद विपक्ष ने सरकार पर हमला तेज कर दिया है। पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के सांसद अभिषेक बनर्जी ने तिरंगा लहराने पर भारतीयों की गिरफ्तारी को लेकर भाजपा पर निशाना साधा और भारत को ‘पाकिस्तानाइज्ड’ करने का आरोप लगाया। वहीं, CPI(ML) के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने जंतर-मंतर को जनता का प्रदर्शन स्थल बताते हुए गिरफ्तारी और हिरासत को अनुचित करार दिया। विपक्ष का तर्क है कि जब नागरिक अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन करना चाहते हैं, तो उन्हें पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। दूसरी तरफ, किसी भी प्रदर्शन के मामले में प्रशासन को प्रवेश, सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़े नियमों का हवाला देने का अधिकार होता है। साथ ही इस विवाद का एक और अहम पहलू है। सरकार के जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल के रूप में समाप्त करने के फैसले के बाद विपक्ष इसे जनता के विरोध के अधिकार से जोड़ रहा है। ऐसे में जंतर-मंतर अब राजनीतिक प्रतीक बनता जा रहा है। इसके अलावा, राहुल गांधी की राजनीति में एक बड़ी चुनौती लंबे समय से यही रही है कि अलग-अलग मुद्दों पर उठने वाली आवाजों को एक साझा राजनीतिक अभियान में कैसे बदला जाए? CJP के साथ खड़े होने का उनका फैसला इसी दिशा में एक कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है। छात्रों का असंतोष, पेपर लीक का मुद्दा, मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों के आरोप और प्रदर्शन के अधिकार का सवाल, इन सबको एक सूत्र में पिरोकर कांग्रेस भाजपा के खिलाफ व्यापक मोर्चा तैयार करना चाहती है। लेकिन यहां एक पेचीदा सवाल भी है। यदि कांग्रेस पहले से इन मुद्दों पर आंदोलन कर रही थी, तो CJP के साथ खड़े होने में इतनी देर क्यों हुई? और अगर लड़ाई वास्तव में एक ही है, तो 10 और 12 अक्टूबर को अलग-अलग प्रदर्शन क्यों हुए? इन सवालों का जवाब केवल बयानबाजी से नहीं मिलेगा। विपक्ष को यह साबित करना होगा कि उसकी एकजुटता केवल राजनीतिक सुविधा का गठजोड़ नहीं, बल्कि मुद्दों पर आधारित साझा प्रतिबद्धता है। दूसरी ओर, सरकार को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रदर्शन स्थलों और प्रशासनिक नियमों के नाम पर नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकार अनावश्यक रूप से बाधित न हों। इस पूरे सियासी घटनाक्रम में एक दिलचस्प पहलू आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल का भी है। CJP को अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक उपज माना जाता रहा है और आम आदमी पार्टी का उसके आंदोलनों के प्रति समर्थन भी इस चर्चा को हवा देता है। ऐसे में राहुल गांधी का अचानक CJP के साथ खुलकर खड़ा होना कई सियासी सवाल पैदा करता है। क्या यह महज लोकतांत्रिक अधिकारों के समर्थन का मामला है, या इसके पीछे विपक्षी राजनीति की कोई बड़ी बिसात बिछाई जा रही है? क्या CJP के बहाने कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच जमी सियासी बर्फ पिघलाने की कोशिश हो रही है? और क्या इसे अरविंद केजरीवाल की INDIA गठबंधन में संभावित वापसी के संकेत के तौर पर भी देखा जाना चाहिए? सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि पंजाब में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी एक-दूसरे के प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं। ऐसे में अगर दिल्ली के राजनीतिक मंच पर दोनों के बीच नजदीकी बढ़ती है, तो पंजाब की सियासत में इसका क्या असर पड़ेगा? क्या दोनों दल एक तरफ राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ साझा रणनीति बनाने और दूसरी तरफ पंजाब में एक-दूसरे को चुनौती देने का दोहरा खेल खेलेंगे? देखा जाये तो भारतीय राजनीति में अक्सर सार्वजनिक मंचों पर दिखने वाली एकजुटता भविष्य के राजनीतिक समीकरणों की जमीन भी तैयार करती है। ऐसे में राहुल गांधी का CJP के समर्थन में उतरना केवल एक आंदोलन के पक्ष में दिया गया बयान है या कांग्रेस और केजरीवाल के बीच नए सियासी संवाद की शुरुआत, इस पर निगाहें बनी रहेंगी। बहरहाल, राहुल गांधी का CJP के समर्थन में उतरना कांग्रेस की रणनीति में बदलाव का संकेत है। यह कदम विपक्ष को एक साझा मंच देने की कोशिश भी हो सकता है और भाजपा के खिलाफ राजनीतिक बढ़त हासिल करने का अवसर भी क्योंकि भारतीय राजनीति में दोनों संभावनाएं एक साथ मौजूद रहती हैं। साथ ही तिरंगा किसी एक पार्टी की जागीर नहीं, संविधान किसी एक गठबंधन की संपत्ति नहीं और जंतर-मंतर किसी एक संगठन की निजी जमीन नहीं है। यदि विपक्ष सचमुच जनता के अधिकारों की लड़ाई लड़ना चाहता है, तो उसे विश्वसनीय संघर्ष करना होगा। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 14 Oct 2026 5:47 pm

चिप उद्योग के भविष्य पर भारत में होगी वैश्विक चर्चा: आईएसआईजी समिट

नई दिल्ली, इंटरनेशनल सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री ग्रुप (आईएसआईजी) 3-4 नवंबर को राष्ट्रीय राजधानी में 'आईएसआईजी एग्जीक्यूटिव समिट इंडिया 2026' का आयोजन करेगा।

देशबन्धु 14 Oct 2026 4:56 pm

पॉलीकैब इंडिया में शेयर 5 प्रतिशत तक लुढ़के

नई दिल्ली, पॉलीकैब इंडिया के शेयरों में बुधवार को गिरावट देखने को मिली और यह 5 प्रतिशत तक फिसल गया।

देशबन्धु 14 Oct 2026 2:30 pm

ईरान जैसा 'अंडरग्राउंड चक्रव्यूह', जिसके आगे बंकर-बस्टर भी फेल, भारत के इस फैसले ने मचाया चीन पाकिस्तान में तांडव,देखती रह गई दुनिया

भारत अब चीन पाकिस्तान की नकेल कस रहा है। इस बार सिर्फ सीमा पर नहीं बल्कि समुद्र मिसाइल और वैश्विक व्यापार तीनों मोर्चों पर एक ऐसा खेल शुरू हो चुका है जिसकी गूंज बीजिंग से लेकर इस्लामाबाद तक साफ सुनाई दे रही है। भारतीय सीमाओं पर अगले तीन साल में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के लिए बड़े स्तर पर तैयारियां की जा रही हैं। वहीं, चीन और पाकिस्तान से लगी सीमाओं पर अब जमीन के नीचे सैन्य अड्‌डे बनाने की तैयारी है। भारतीय सेना चीन (लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल) और पाकिस्तान (लाइन ऑफ़ कंट्रोल) के साथ अपनी संवेदनशील सीमाओं पर ज़मीन के नीचे बने शेल्टर, गहरी सुरंगों और मज़बूत स्टोरेज साइट्स का एक बड़ा नेटवर्क बना रही है। इसका मुख्य मकसद फ्रंटलाइन पर तैनात सैनिकों, भारी गोला-बारूद, ईंधन के भंडार और अहम हथियारों जैसे आर्टिलरी गन, एयर डिफेंस सिस्टम और मिसाइल बैटरी को दुश्मन की सटीक मिसाइलों, लोइटरिंग म्यूनिशन (कामिकेज़ ड्रोन) और भारी हवाई हमलों से सुरक्षित रखना है। सेना इस रणनीति को फ़ोर्स-प्रिज़र्वेशन (सेना को सुरक्षित रखने) की मुख्य योजना मानती है। ऑपरेशन सिंदूर, यूक्रेन-रूस और अमेरिका-ईरान युद्ध में मिसाइलों, ड्रोन और बंकर बस्टर बमों के इस्तेमाल को देखते हुए यह फैसला किया गया है। आधुनिक, टेक्नोलॉजी पर आधारित युद्ध में आगे की चौकियों को दुश्मन के शुरुआती ज़बरदस्त हमले के लिए खुला छोड़ने के बजाय, यह तरीका यह पक्का करता है कि लड़ाई के लिए ज़रूरी अहम साधन सुरक्षित रहें। इस युद्ध-क्षमता को सुरक्षित रखने से ज़मीनी टुकड़ियों को दुश्मन के भारी हमलों की शुरुआती लहर से बचने, उस झटके को सहने और तुरंत निर्णायक जवाबी हमला करने की क्षमता बनाए रखने में मदद मिलती है। इसे भी पढ़ें: Nepal Flood: गोरखा में सेना ने 200 से अधिक लोगों को सुरक्षित निकाला उत्तर में 19 प्रोजेक्ट सेना की नॉर्दर्न कमांड, जो जम्मू-कश्मीर और लद्दाख की देखरेख करती है, ने अपने इलाके में सुरक्षित अंडरग्राउंड (ज़मीन के नीचे) सुविधाएं बनाने के लिए 19 अलग-अलग प्रोजेक्ट शुरू किए हैं। हर साइट को वहां की ज़मीन की स्थिति और उसके काम के हिसाब से डिज़ाइन किया जाएगा। इसे भी पढ़ें: Delhi CAPF Deployment | दिल्ली में बड़े बवाल की आशंका! दिल्ली पुलिस ने की 20 अक्टूबर तक CAPF की तैनाती बढ़ाने की मांग, छावनी में तब्दील होगी राजधानी इन सुविधाओं का इस्तेमाल इन कामों के लिए किया जाएगा मिलिट्री इक्विपमेंट स्टोर करना: ज़रूरी हथियारों और सामान को दुश्मन की गोलीबारी से सुरक्षित रखना। गोला-बारूद स्टोर करना: गोला-बारूद के स्टॉक को मिसाइल और ड्रोन हमलों से बचाना। ट्रेनिंग की ज़रूरतें: सुरक्षित माहौल में ट्रेनिंग गतिविधियों में मदद करना। कमांड ने अगस्त में इन प्रोजेक्ट्स के लिए टेंडर जारी किए थे। जो कंपनियां इस काम में दिलचस्पी रखती हैं, वे 7 नवंबर तक अपनी बोलियां (बिड) भेज सकती हैं। इसे भी पढ़ें: एक से बढ़कर एक हथियार से भारत को लैस कर रहा रूस, SU-57 के बाद अब T-72 टैंक की बारी आर्मी कमांडर ने क्या कहा नॉर्दर्न कमांड के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ, लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा ने 9 अक्टूबर को सोसाइटी ऑफ़ इंडियन डिफेंस मैन्युफैक्चरर्स (SIDM) के सालाना सेशन में इस प्लान के बारे में बात की। उन्होंने कहा कि इन प्रोजेक्ट्स के लिए खरीद की प्रक्रिया पारदर्शी और सभी के लिए निष्पक्ष होगी। उन्होंने यह भी कहा कि सेना चाहती है कि ज़्यादा से ज़्यादा कंपनियाँ इसमें हिस्सा लें, जिनमें माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइज़ेज़ (MSMEs) भी शामिल हों। सेना ज़मीन के नीचे क्यों जा रही है? आधुनिक युद्ध तेज़ी से बदल रहे हैं। लंबी दूरी की मिसाइलें और सटीक निशाना लगाने वाले हथियार अब ज़मीन पर मौजूद लक्ष्यों को बहुत सटीकता से निशाना बना सकते हैं। इससे खुले बेस, गोला-बारूद के भंडार और खड़े किए गए उपकरण आसानी से निशाने पर आ सकते हैं। ज़मीन के नीचे बनी जगहें कहीं बेहतर सुरक्षा देती हैं। ये सेना को तब भी काम करते रहने में मदद कर सकती हैं जब दुश्मन लंबे समय तक और ज़ोरदार हमले करे। भारतीय सेना की ज़मीन के नीचे बनी नई सुविधाओं को मिसाइल हमलों, मोर्टार की गोलाबारी और हवाई हमलों से सुरक्षित रहने के लिए बनाया गया है। सेना ने पश्चिम एशिया में हाल के युद्धों और 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान अपने अनुभव से सबक सीखा है। यह मई 2025 में पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर में आतंकी ठिकानों के ख़िलाफ़ भारत की सैन्य कार्रवाई थी। योजना बनाने वालों ने ईरान के ज़मीन के नीचे बनी सुरंगों और मिसाइल शहरों के बड़े नेटवर्क का भी अध्ययन किया है, जिसने लंबे हवाई हमलों के दौरान उसे अपने हथियारों को सुरक्षित रखने में मदद की थी। सबसे ज़बरदस्त हमलों का सामना करने के लिए तैयारी आर्मी ने एक्सपर्ट्स से बातचीत करने और आज के दौर के युद्धक्षेत्र की ज़रूरतों को समझने के बाद इन शेल्टर (सुरक्षित ठिकानों) के लिए अलग-अलग डिज़ाइन तैयार किए हैं। इन विकल्पों में शामिल हैं: प्री-फ़ैब्रिकेटेड स्ट्रक्चर: पहले से तैयार यूनिट जिन्हें तेज़ी से लगाया जा सकता है। ज़मीन के नीचे बनी सुविधाएँ: सामान रखने और सुरक्षा के लिए ज़मीन के नीचे बनाए गए शेल्टर। बहुत गहरी गुफ़ाएँ: चट्टानों को काटकर बनाई गई बहुत गहरी जगहें जो सबसे ज़बरदस्त हमलों को भी झेल सकती हैं। ये स्ट्रक्चर भारी बमबारी, तोपखाने की गोलाबारी और यहाँ तक कि बंकर-बस्टर हथियारों का भी सामना करने के लिए बनाए गए हैं। बंकर-बस्टर को इस तरह डिज़ाइन किया गया है कि फटने से पहले यह ज़मीन में गहराई तक जा सके। पूर्व में भी काम चल रहा है सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा के लिए पूर्व में भी इसी तरह की कोशिशें चल रही हैं। पश्चिम बंगाल में ज़मीन की इस संकरी पट्टी को अक्सर चिकन नेक कहा जाता है; यह अपनी सबसे संकरी जगह पर सिर्फ़ 20 से 22 किलोमीटर चौड़ी है। यह भारत के बाकी हिस्सों और पूर्वोत्तर राज्यों के बीच ज़मीन का मुख्य संपर्क मार्ग है, जो इसे देश के सबसे संवेदनशील इलाकों में से एक बनाता है। यहाँ बनाई जा रही ज़मीन के नीचे की सुविधाओं का इस्तेमाल कमांड और कंट्रोल, लॉजिस्टिक्स और सुरक्षित स्टोरेज के लिए किया जा सकता है। इससे सेना को इस इलाके में अहम ऑपरेशन जारी रखने में मदद मिलेगी, भले ही उस पर हमला हो जाए। BRO ड्रोन बंकर बना रहा है बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइज़ेशन (BRO) कुछ अग्रिम ठिकानों पर ज़मीन के नीचे बंकर भी बना रहा है। ये बंकर कॉम्बैट ड्रोन और दूसरे कीमती उपकरणों की सुरक्षा करेंगे। सुरक्षा कारणों से इन जगहों की जानकारी साझा नहीं की गई है। युद्ध लड़ने के तरीके में बदलाव यह कदम सैन्य सोच में एक बड़े बदलाव को दिखाता है। आज सेनाएँ न सिर्फ़ हमले पर, बल्कि बचाव और सुरक्षा पर भी ध्यान देती हैं। ज़मीन के नीचे अच्छी तरह से बनाए गए ठिकाने दुश्मन की गोलाबारी से जोखिम कम कर सकते हैं, लड़ने की क्षमता को सुरक्षित रख सकते हैं और सैनिकों को लंबे समय तक डटे रहने में मदद कर सकते हैं। भारत की सीमाएँ उत्तर और पूर्व दोनों तरफ़ लंबी और मुश्किल हैं। ज़मीन के नीचे बने शेल्टर का यह नया नेटवर्क भविष्य के किसी भी संघर्ष में सेना को सुरक्षित और तैयार रखने में अहम भूमिका निभा सकता है। जम्मू-कश्मीर में तीन साल में बनेंगे 5,000 अतिरिक्त बंकर जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती इलाकों में पिछले आठ वर्षों के दौरान नागरिकों की सुरक्षा के लिए करीब 10,000 बंकर बनाए गए हैं। अब सरकार ने अगले तीन वर्षों में 5,000 और बंकर बनाने की योजना तैयार की है। इसकी प्रक्रिया शुरू हो गई है। लंबी लड़ाई में सेना को दुश्मन पर मिलेगी बढ़त आधुनिक युद्ध में सैन्य ठिकानों को बचाए रखना दुश्मन पर हमला करने जितना ही जरूरी है। अग्रिम मोचों के पास सुरक्षित रसद भंडार होने से लंबी लड़ाई में सेना की आपूर्ति और जवाबी कार्रवाई की क्षमता भी बनी रहेगी। इससे दुश्मन के लिए एक ही हमले में भारत की सैन्य क्षमता को नुकसान पहुंचाना मुश्किल होगा। हालांकि, हिमालय में निर्माण की ऊंची लागत, भौगोलिक चुनौतियां और भारी उपकरणों की ढुलाई बड़ी मुश्किलें हैं। चीन के इलाके में पठारी जमीन अपेक्षाकृत समतल होने से उसे निर्माण में बढ़त मिलती है। भारत को प्रीफैब्रिकेटेड स्टील बंकर जैसी आधुनिक तकनीकों पर ध्यान देना होगा, ताकि दुर्गम इलाकों में भी कम समय में मजबूत और सुरक्षित ठिकाने तैयार किए जा सकें।

प्रभासाक्षी 14 Oct 2026 2:29 pm

'प्रधानमंत्री से लेकर सिपाही तक को दिलाएंगे सजा', प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोले राहुल गांधी

'प्रधानमंत्री से लेकर सिपाही तक को दिलाएंगे सजा', प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोले राहुल गांधी

समाचार नामा 14 Oct 2026 2:18 pm

पीएम मोदी के जनसेवा के 25 साल पूरे होने पर अभिनंदन प्रस्ताव, महाराष्ट्र कैबिनेट ने किसानों के लिए भी बड़ी घोषणा

पीएम मोदी के जनसेवा के 25 साल पूरे होने पर अभिनंदन प्रस्ताव, महाराष्ट्र कैबिनेट ने किसानों के लिए भी बड़ी घोषणा

समाचार नामा 14 Oct 2026 2:13 pm

108 मुफ्त एम्बुलेंस कर्मचारियों की हड़ताल की चेतावनी प्रशासनिक विफलता : भाजपा

108 मुफ्त एम्बुलेंस कर्मचारियों की हड़ताल की चेतावनी प्रशासनिक विफलता : भाजपा

समाचार नामा 14 Oct 2026 1:25 pm

Narendra Modi की सियासत के 25 साल: Indian Politics में कैसे स्थापित हुआ 'मोदी मार्ग'?

सात अक्टूबर 2001 को नरेंद्र मोदी ने जब गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, तब कोई नहीं सोच रहा था कि मोदी एक साल का भी कार्यकाल पूरा कर पाएंगे। राजनीतिक जानकारों और गुजरात के लोगों की इस सोच के पीछे कुछ खास वजहें भी थीं। मोदी के गुजरात का सरदार बनने से पहले के पांच वर्षों में राज्य में एक-एक करके चार मुख्यमंत्री आए और चले गए थे। मोदी राज्य के किसी ताकतवर जाति समुदाय से भी नहीं हैं और सबसे बड़ी बात कि मुख्यमंत्री बनने से पहले उन्होंने कोई चुनाव भी नहीं लड़ा था। हां, पर्दे के पीछे की राजनीति के मंजे हुए खिलाड़ी के तौर पर वे स्थापित थे। इतना ही नहीं, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर राज्यों के बीजेपी प्रभारी के रूप में भी अपनी सियासी समझ का भी वे लोहा मनवा चुके थे। लेकिन वक्त के साथ, मोदी ने सभी आशंकाओं को ना सिर्फ खारिज कर दिया है, बल्कि चौथाई सदी तक लगातार सत्ता का केंद्र बिंदु रहने वाले वाली शख्सियत भी बन चुके हैं। इसके पहले मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता ज्योति बसु के नाम देश में सबसे लंबे समय यानी करीब 23 साल सत्ता संभालने का रिकॉर्ड था। मोदी उस रिकॉर्ड से भी काफी आगे बढ़ चुके हैं। हाल के दिनों में एक वरिष्ठ हिंदी पत्रकार मोदी मार्ग की अवधारणा देकर आलोचनाओं के केंद्र में हैं। मोदी मार्ग की चर्चा हो तो वामपंथी तो सांड़ की तरह भड़केंगे ही, वे समाजवादी भी वरिष्ठ पत्रकार के आलोचक हो गए हैं, जो कभी उनके सहयोगी रहे या वे उनके साथी रहे। बेशक मोदी मार्ग की इन दिनों आलोचना हो रही है, लेकिन आने वाले दिनों में जब नरेंद्र मोदी का अपना और उनके दौर के भारत का इतिहास लिखा जाएगा, निश्चित तौर पर मोदी मार्ग या मोदीत्व की अवधारणा को भी स्वीकार किया जाएगा। किसी शख्सियत के जरिए शुरू पंथ या वैचारिक धारा को उसके जीवन काल में सर्व मान्यता और स्वीकार्यता कम ही मिल पाती है। लेकिन जब वही शख्सियत इतिहास की धारा में विलीन हो जाती है, तो उसकी दिखाई राहों को पंथ का दर्जा मिलने लगता है। गांधी बेशक अपनी जिंदगी में ही महात्मा के रूप में स्थापित हो चुके थे, लेकिन उनके कई प्रयोगों की उसी तरह आलोचनाएं होती रहीं, जैसे आज मोदी के वैचारिक विरोधी उनके तमाम कदमों की कटु आलोचनामें लीन रहते हैं। वैसे भी लोकतांत्रिकक दौर के भारतीय समाज की एक धारा रही है। शुरू में वह पदधारकों का शुरू में स्वागत करता है, बाद में उसका विरोधी हो जाता है। लेकिन वही शख्सियत जब इतिहास में समाहित हो जाती है, कुछ अपवादों को छोड़ समाज उसका घोर प्रशंसक हो जाता है। बीजेपी की ही राजनीति का उदाहरण इस संदर्भ में ले सकते हैं। एक दौर में बीजेपी विरोधियों की नजर में अटल उदार थे, जबकि आडवाणी कट्टर। लिहाजा आडवाणी लगातार विरोधियों के निशाने पर रहे। लेकिन जैसे ही अटल युग की समाप्ति हुई और मोदी युग की ओर बीजेपी बढ़ चली, आडवाणी उन्हीं विरोधियों की नजर में आदर के पात्र होते गए और मोदी के कटु आलोचकों की संख्या बढ़ती गई। कुछ इसी अंदाज में कह सकते हैं कि आने वाले दिनों में भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में कोई अन्य नेता उभरा तो हो सकता है कि मोदी बीजेपी विरोधियों की नजर में ही प्रशंसा का पात्र बन जाएं और बीजेपी का भावी नेता आडवाणी और मोदी की तरह आलोचनाओं के केंद्र में आ जाए। सत्ता की राजनीति में मोदी की यात्रा पर निगाह डालते हैं तो उनकी सबसे बड़ी चुनौती खुद की स्वीकार्यता बढ़ाना रही। जिस तरह चौथाई सदी से वे सत्ता के केंद्र में हैं, उसे देख कह सकते हैं कि इसमें वे कामयाब रहे हैं। इतना ही नहीं, वे सबसे ज्यादा समय तक सत्ता को खुद के इर्द-गिर्द केंद्रीकृत करने में भी सफल रहे हैं। आज भारत की केंद्रीय सत्ता ही नहीं, भारतीय जनता पार्टी का संगठन भी उन्हीं के इर्द-गिर्द केंद्रित है और उन्हीं से शक्ति ग्रहण करता है। इसे भी पढ़ें: ढ़ाई दशक के सख्त फैसलों ने बनाया मोदी को मोदी यह मोदी का दुर्भाग्य रहा कि उनके गुजरात की सत्ता संभालने के महज छह महीने बाद ही राज्य को गोधरा कांड के चलते भयानक सांप्रदायिक दंगों का सामना करना पड़ा। गुजरात सरकार की रिपोर्ट के अनुसार इन दंगों में 1044 लोगों के मारे गए , जबकि 2548 लोग घायल हुए थे। इसके अलावा 223 लोग लापता बताए गए। दंगों के सात साल बीतने के बाद सरकार के ही अनुसार, लापता लोगों की संख्या कुछ बढ़ गई। इन दंगों के बाद नरेंद्र मोदी विशेषकर कांग्रेस और वामपंथी दलों के निशाने पर आ गए। देश के वामपंथी सोच से प्रभावित स्वयंसेवी संगठनों ने उनके खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर मोर्चा खोल दिया। एक तरह से मोदी को राजनीतिक घृणा का पात्र बनाने की कोशिश की गई। उनके चरित्र हनन तक की कोशिशें हुईं। गुजरात दंगों के साथ ही इशरत जहां मुठभेड़ कांड को लेकर उनके खिलाफ सीबीआई जांच हुई। सीबीआई के समक्ष बतौर मुख्यमंत्री पूछताछ के लिए उन्हें कई बार घंटों तक उपस्थिति जतानी पड़ी और बतौर मुख्यमंत्री उन्हें घंटों तक सीबीआई के अच्छे-बुरे सवालों का सामना करना पड़ा। गुजरात दंगों के दाग के चलते एक दौर में उन्हें अमेरिका ने वीजा देने से इनकार कर दिया। इस बिंदु पर देखें तो मोदी का जीवट व्यक्तित्व उभरता है। कह सकते हैं कि तिरस्कार और आलोचनाओं से वे ताकत ग्रहण करते हैं, कुछ-कुछ मिथकीय पात्र बालि की तरह। जिस तरह बालि के सामने आए उसके विरोधियों की आधी ताकत बालि में ही समाहित हो जाती थी, मोदी कुछ उसी तरह विरोधियों की आलोचनाओं से ताकत ग्रहण करते हैं और अपनी राह बनाते रहते हैं। तीखे और अपमानजनक विरोध से जीवट से जीवट वाली शख्सियतें टूट जाती हैं, मोदी की ना सिर्फ कटु आलोचना हुई या हो रही है, उन्हें सार्वजनिक मंचों से घटिया, अश्लील और फूहड़ गालियां दी जा रही हैं। अतीत में उन्हें चरित्र हनन की सीमा तक बदनाम करने की कोशिशें हुईं। लेकिन मोदी रूके नहीं। कभी पर्दे के पीछे से राजनीति करने वाले मोदी लगातार आगे बढ़ते रहे। गुजरात में जब चीजें पटरी पर आनी शुरू हुईं तो उन्होंने राज्य के विकास को लेकर अपना मॉडल पेश किया। जिसे कालांतर में देश ने उसे ‘गुजरात मॉडल’ के नाम से जाना। ‘गुजरात मॉडल’ के विकास और इस विकास की गति को बनाए रखने के लिए प्रवासियों और निवेशकर्ताओं को लुभाने के लिए उन्होंने ‘वायव्रेंट गुजरात’ नाम से आयोजन शुरू किए। जिसे देखते ही देखते राज्य की जनता ने तो अपनाया ही, प्रवासियों ने भी हाथोंहाथ लिया। इसी का असर रहा कि जिस राज्य में महज पांच साल में चार मुख्यमंत्री आए और गए, उसी राज्य में मोदी ने साढ़े बारह साल से अधिक वक्त तक सत्ता संभालने का रिकॉर्ड बनाया। 2012 के विधानसभा चुनाव के दौरान उनकी ख्याति राज्य से बाहर की सीमाओं तक पैठ बना चुकी थी या बना रही थी। इसका ही नतीजा रहा कि 2012 के गुजरात विधानसभा चुनावों के वक्त राष्ट्रीय मीडिया के एक हिस्से ने मोदी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार कर लिया। तब कहा जा रहा था कि गुजरात इस बार सिर्फ अपने मुख्यमंत्री का ही नहीं, बल्कि देश के भावी प्रधानमंत्री का भी चुनाव कर रहा है। मोदी की राजनीतिक यात्रा जातिवादी राजनीति का जवाब भी है। कांग्रेस के प्रथम परिवार, नीतीश कुमार और ममता बनर्जी को छोड़ दें तो आज के ज्यादातर बड़े राजनेता कहीं न कहीं सिर्फ अपनी जातियों के नेता हैं या उनकी राजनीतिक बुनियाद का आधार उनकी जाति है। लेकिन मोदी की लोकप्रियता में उनकी जाति का कोई आधार नहीं है। मोदी ने अपने लंबे शासन काल में ढरों उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन मोटे तौर पर देखें तो उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि भारत की वैश्विक मंच पर बदली छवि। उनके शासनकाल में भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि में सुधार हुआ है। मोदी ने आर्थिक मोर्चे पर देश को बहुत गति दी है। मोदी कहते हैं कि उनकी नजर में सिर्फ चार जातियां हैं, महिला, युवा, गरीब और किसान। मोदी के लंबे शासन काल में इन चारों ही वर्गों का ध्यान ठीक से रखने की कोशिशें बढ़ी हैं। भारत दुनिया की चौथी बड़ी आर्थिक महाशक्ति अगर बन चुका है, तो इसके पीछे उनका नजरिया भी है। कृषि में साढ़े चार प्रतिशत सालाना की विकास दर हासिल की जा चुकी है, बीजेपी के एजेंडे के तहत अयोध्या में राममंदिर बन चुका है, कश्मीर को अलग-थलग करने वाले संविधान के विशेष अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाया जा चुका है। मोदी के शासनकाल की उपलब्धियों को गिनाने बैठें तो पूरी रात गुजर जाएगी। बस मोटे तौर पर कह सकते हैं कि मोदी राज में देश ने अपना खोया गौरव हासिल करने की दिशा में एक मजबूत कदम जरूर बढ़ाया है। उमेश चतुर्वेदी लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक हैं..

प्रभासाक्षी 14 Oct 2026 12:57 pm

एसआईआर को लेकर विपक्ष पर शायना एनसी का तंज, कहा-2029 की हार का बहाना अभी से तलाश रहे राहुल गांधी

एसआईआर को लेकर विपक्ष पर शायना एनसी का तंज, कहा-2029 की हार का बहाना अभी से तलाश रहे राहुल गांधी

समाचार नामा 14 Oct 2026 12:35 pm

CJP Members Arrested: दिल्ली पुलिस ने कॉकरोच जनता पार्टी के 3 सदस्यों को किया गिरफ्तार, जंतर-मंतर प्रदर्शन से जुड़ा मामला

CJP Members Arrested: दिल्ली पुलिस ने कॉकरोच जनता पार्टी के 3 सदस्यों को किया गिरफ्तार, जंतर-मंतर प्रदर्शन से जुड़ा मामला

समाचार नामा 14 Oct 2026 7:45 am

जागरण मंच और किसान संघ के संस्थापक दत्तोपंत ठेंगड़ी की पुण्यतिथि पर गडकरी समेत कई बड़े नेताओं ने दी श्रद्धांजलि

जागरण मंच और किसान संघ के संस्थापक दत्तोपंत ठेंगड़ी की पुण्यतिथि पर गडकरी समेत कई बड़े नेताओं ने दी श्रद्धांजलि

समाचार नामा 14 Oct 2026 7:38 am

तिरंगा लहराने पर हिरासत? CJP ने दिल्ली पुलिस पर लगाए गंभीर आरोप

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट के जरिए कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं

देशबन्धु 14 Oct 2026 7:37 am

भारत-कनाडा रिश्तों को नई उड़ान, एयर इंडिया और कनाडा के बीच बड़ी चर्चा

भारतीय मूल के कनाडाई अंतरराष्ट्रीय व्यापार मंत्री मनिंदर सिद्धू ने दिल्ली में एयर इंडिया के चीफ कमर्शियल ऑफिसर (सीसीओ) निपुण अग्रवाल से मुलाकात की

देशबन्धु 14 Oct 2026 7:20 am

मध्य प्रदेश: सीएम मोहन यादव कल लाडली बहना योजना की 41वीं किस्त हस्तांतरित करेंगे

मध्य प्रदेश: सीएम मोहन यादव कल लाडली बहना योजना की 41वीं किस्त हस्तांतरित करेंगे

समाचार नामा 13 Oct 2026 11:41 pm

कांग्रेस मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन के दौरान भाजपा महिला कार्यकर्ताओं के साथ बदसलूकी: बांसुरी स्वराज

कांग्रेस मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन के दौरान भाजपा महिला कार्यकर्ताओं के साथ बदसलूकी: बांसुरी स्वराज

समाचार नामा 13 Oct 2026 10:26 pm

बंगाल में तृणमूल के पूर्व विधायक को बड़ी राहत, जबरन वसूली मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट ने दी सशर्त अंतरिम जमानत

बंगाल में तृणमूल के पूर्व विधायक को बड़ी राहत, जबरन वसूली मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट ने दी सशर्त अंतरिम जमानत

समाचार नामा 13 Oct 2026 10:19 pm

एलडीएफ और यूडीएफ ने सुगाथन के खिलाफ मिला लिया हाथ: केरल भाजपा

एलडीएफ और यूडीएफ ने सुगाथन के खिलाफ मिला लिया हाथ: केरल भाजपा

समाचार नामा 13 Oct 2026 10:18 pm

दिल्ली के एलजी टीएस संधू ने विश्वविद्यालयों को दिया सुझाव, बेहतर नतीजों के लिए पीपीपी मॉडल अपनाएं

दिल्ली के एलजी टीएस संधू ने विश्वविद्यालयों को दिया सुझाव, बेहतर नतीजों के लिए पीपीपी मॉडल अपनाएं

समाचार नामा 13 Oct 2026 8:40 pm

गांधीनगर नगर निगम चुनाव: बीजेपी का दबदबा कायम, कांग्रेस का प्रदर्शन सुधरा, 'आप' का नहीं खुला खाता

गांधीनगर नगर निगम चुनाव: बीजेपी का दबदबा कायम, कांग्रेस का प्रदर्शन सुधरा, 'आप' का नहीं खुला खाता

समाचार नामा 13 Oct 2026 6:23 pm

'दंगे और डर फैलाना ही एकमात्र उपलब्धि', पार्टी की योजनाओं का श्रेय लेने पर भाजपा ने सपा को घेरा

'दंगे और डर फैलाना ही एकमात्र उपलब्धि', पार्टी की योजनाओं का श्रेय लेने पर भाजपा ने सपा को घेरा

समाचार नामा 13 Oct 2026 6:14 pm

चुनाव आयोग के अधिकारियों को नहीं, मतदाता सूची की नीति बदलिए

किसी भी लोकतंत्र की मजबूती के लिए पारदर्शी, विश्वसनीय और समावेशी मतदाता सूची जरूरी है। लेकिन भारत के नेताओं और नौकरशाहों के गठजोड़ ने इसे एक हास्यास्पद विषय बना दिया है। यदि प्रत्येक व्यक्ति के जन्मभूमि पर ही मतदाता पहचान पत्र बना दिया जाए, और उसके पलायन के बावजूद उसका स्थाई नंबर नहीं बदलने दिया जाए, तो इससे बहुत सारे गड़बड़ झाले को रोका जा सकता है। इसे आधार कार्ड से लिंक करने पर व्यक्ति की वास्तविक पहचान भी सुनिश्चित होती है। लेकिन हमारी नौकरशाही ऐसा कभी नहीं होने देगी। भारत में राजनीतिक कारणों से जितने पाकिस्तानियों और बांग्लादेशियों के मतदाता पहचान पत्र बनाए गए, उसके लिए तत्कालीन बीएलओ, एसडीएम और डीएम के अलावा राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि जिम्मेदार नहीं हैं, तो कौन है? क्या कभी इस लापरवाही की जिम्मेदारी सुनिश्चित करने की कोशिश की गई? इनकी जमीनी लापरवाहियों या राजनीतिक पक्षपात के लिए इन्हें कड़ी सजा मिलनी चाहिए, न कि राज्य के मुख्य चुनाव आयुक्त और केंद्रीय मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ अनर्गल आरोप लगाए जाने चाहिए। इसे भी पढ़ें: सुप्रीम कटघरे में अब CEC को मुकदमों से बचाने वाला 'अभयदान', क्या है धारा-16 का 'कवच' जिस पर SC करेगा सुनवाई? एडॉल्फ हिटलर ने कहा था कि यदि तुम एक झूठ को सौ बार दोहराओगे तो वह लोगों को सच लगने लगेगा। जिन नेताओं ने अल्पसंख्यकों की आड़ में, झुग्गी-झोपड़ियों की आड़ में गलत मतदाता पहचान पत्र बनवा लिए, जब एसआईआर में ये पकड़ में आने लगे तो विपक्ष का बेचैन होना स्वाभाविक है। चाहे कांग्रेस हो भाजपा हो या क्षेत्रीय दल, अब इस खेल में सभी पारंगत दिख रहे हैं। यदि नौकरशाही तभी इस खेल को पकड़ लेती तो आज चुनाव आयोग को इतनी कड़ी मशक्कत नहीं करनी पड़ती। इस पूरे खेल में ग्राम पंचायत, नगर पंचायत, नगरपालिका, नगर निगम, विधानसभा और लोकसभा की मतदाता सूची में जो गड़बड़झाला है, उसे भी यदि समय रहते नहीं रोका गया, तो मतदाताओं को न्याय मिल पाएगा, इस बात की कोई गारंटी नहीं है। क्योंकि हर चुनाव में मतदाता सूची बदल जाना राजनीतिक व प्रशासनिक खेल नहीं तो क्या है? हर चुनाव के वक्त कुछ ऐसे वास्तविक लोग मिल जाएंगे, जिनके नाम ही मतदाता सूची से गायब मिलेंगे। आखिर इस लापरवाही के लिए सरकारी अधिकारियों की जिम्मेदारी कौन सुनिश्चित करेगा। इस बात में कोई दो राय नहीं कि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति मतदाता के मताधिकार में निहित है। यह अधिकार तभी सार्थक है, जब प्रत्येक पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची में दर्ज हो और कोई अपात्र व्यक्ति गलत तरीके से उसमें शामिल न रहे। इसलिए मतदाता सूची तैयार करने, उसमें संशोधन करने और उसकी शुद्धता सुनिश्चित करने की प्रक्रिया लोकतांत्रिक व्यवस्था का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि कोई अधिकारी इसमें लापरवाही बरतता पाया जाता है तो उसके लिए भी सख्त सजा का प्रावधान हो। जब भी मतदाता सूची में गड़बड़ियों, नाम कटने, दोहरी प्रविष्टियों अथवा पात्र मतदाताओं के छूट जाने की शिकायतें सामने आती हैं, तो चुनाव आयोग के अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका पर सवाल उठने लगते हैं। लेकिन क्या हर समस्या के लिए मैदानी स्तर पर काम करने वाले अधिकारियों व राजनीतिक कार्यकर्ताओं को जिम्मेदार ठहराना उचित है? या हमें उन नीतियों, नियमों और प्रक्रियाओं की समीक्षा करनी चाहिए, जिनके तहत मतदाता सूची तैयार की जाती है? नए मतदाताओं के नाम जोड़ना और मृतकों के नाम डिलीट करना चुनाव आयोग की वार्षिक जिम्मेदारी है। इस हेतु हर वर्ष अभियान चलाया जाता है। सवाल है कि अधिकारियों की जवाबदेही के साथ नीतिगत सुधार भी जरूरी है। इसके लिए संसद को भी सचेष्ट होना पड़ेगा। मतदाता सूची तैयार करने का काम व्यापक और संवेदनशील है। इसमें करोड़ों नागरिकों के विवरण का सत्यापन, नए मतदाताओं का पंजीकरण, मृत व्यक्तियों के नाम हटाना, स्थानांतरित नागरिकों के विवरण का अद्यतन और दोहरी प्रविष्टियों की पहचान जैसे अनेक कार्य शामिल होते हैं। यदि इन प्रक्रियाओं में त्रुटियां होती हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। जानबूझकर लापरवाही, पक्षपात या नियमों के उल्लंघन के प्रमाण मिलने पर संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए। लेकिन प्रत्येक प्रशासनिक त्रुटि को केवल कर्मचारियों की विफलता मान लेना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। यह भी देखना होगा कि निर्धारित समयसीमा व्यावहारिक है या नहीं, उपलब्ध संसाधन पर्याप्त हैं या नहीं, सत्यापन की प्रक्रिया कितनी सरल है और नागरिकों को अपनी शिकायतों के समाधान के लिए कितनी आसानी से अवसर मिलता है। सवाल है कि मतदाता सूची की नीति में किन बदलावों की जरूरत है? पहला, प्रत्येक पात्र नागरिक का नाम जोड़ने की प्राथमिकता। मतदाता सूची की शुद्धता का अर्थ केवल गलत नाम हटाना नहीं, बल्कि प्रत्येक पात्र नागरिक को सूची में शामिल करना भी है। किसी पात्र मतदाता का नाम हटने या दर्ज न होने से उसके मताधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए नाम हटाने की प्रक्रिया में उचित सूचना, सत्यापन और अपना पक्ष रखने का अवसर सुनिश्चित किया जाना चाहिए। दूसरा, नाम काटने की प्रक्रिया पारदर्शी हो। किसी मतदाता का नाम सूची से हटाने के लिए स्पष्ट नियम, सत्यापन योग्य आधार और निर्धारित प्रक्रिया होनी चाहिए। नागरिक को, जहां नियमों के तहत आवश्यक हो, प्रस्तावित कार्रवाई की सूचना और आपत्ति दर्ज कराने का अवसर मिलना चाहिए। केवल तकनीकी रिकॉर्ड या अपूर्ण जानकारी के आधार पर किसी पात्र मतदाता का अधिकार प्रभावित नहीं होना चाहिए। तीसरा, मृत और स्थानांतरित मतदाताओं के मामलों में सावधानी जरूरी है। मृत व्यक्तियों के नाम हटाना और स्थायी रूप से स्थानांतरित मतदाताओं के रिकॉर्ड को अद्यतन करना आवश्यक है। लेकिन एक ही नाम, समान आयु या मिलते-जुलते पते के आधार पर किसी व्यक्ति को गलत तरीके से सूची से बाहर नहीं किया जाना चाहिए। पहचान और निवास के सत्यापन के लिए विश्वसनीय प्रक्रिया जरूरी है। चौथा, तकनीक का उपयोग हो, लेकिन मानवीय सत्यापन के साथ जरूरी है। डिजिटल डेटाबेस, ऑनलाइन आवेदन और स्वचालित प्रणाली मतदाता सूची को बेहतर बनाने में सहायक हो सकते हैं। हालांकि, तकनीकी गड़बड़ी, डेटा में विसंगति या गलत मिलान की स्थिति में मानवीय समीक्षा और सुधार का अवसर उपलब्ध होना चाहिए। तकनीक नागरिकों की सुविधा बढ़ाए, उनके अधिकारों में बाधा न बने। पांचवां, शिकायत निवारण की प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित हो। नाम जुड़वाने, संशोधन कराने या गलत तरीके से नाम हटाए जाने की शिकायतों के लिए सरल और समयबद्ध व्यवस्था होनी चाहिए। नागरिकों को आवेदन की स्थिति जानने, निर्णय का कारण समझने और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार अपील करने की सुविधा मिलनी चाहिए। छठा, अधिकारियों को पर्याप्त संसाधन और प्रशिक्षण मिलना चाहिए। मतदाता सूची तैयार करने वाले कर्मचारियों पर यदि सीमित समय में अत्यधिक काम का दबाव है, तो त्रुटियों की आशंका बढ़ सकती है। इसलिए पर्याप्त कर्मचारी, व्यावहारिक समयसीमा, स्पष्ट दिशा-निर्देश और उचित प्रशिक्षण भी नीतिगत सुधार का हिस्सा होने चाहिए। सबसे बड़ी बात यह कि राजनीतिक विवाद से ऊपर उठकर समीक्षा हो। मतदाता सूची का मुद्दा अक्सर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय बन जाता है। एक पक्ष नामों को हटाए जाने पर सवाल उठाता है, तो दूसरा पक्ष सूची की शुद्धता और दोहरी प्रविष्टियों को समाप्त करने की आवश्यकता पर जोर देता है। इन दोनों चिंताओं की निष्पक्ष जांच जरूरी है। न तो हर नाम हटाए जाने को गलत मानना उचित है और न ही प्रत्येक कार्रवाई को स्वतः सही मान लेना। महत्वपूर्ण यह है कि हर निर्णय के पीछे स्पष्ट आधार हो, नियम सभी पर समान रूप से लागू हों और शिकायतों का समाधान प्रमाणों के आधार पर किया जाए। मतदाता सूची की विश्वसनीयता केवल चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं है। यह नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों और चुनावी प्रक्रिया पर जनता के भरोसे से जुड़ा विषय है। सवाल है कि अब आगे का रास्ता क्या है? तो जवाब यही होगा कि मतदाता सूची की नीति की नियमित समीक्षा की जानी चाहिए। इसमें राजनीतिक दलों, नागरिक समाज, चुनाव संबंधी विशेषज्ञों और आम मतदाताओं से सुझाव लिए जा सकते हैं। नाम जोड़ने और हटाने के आंकड़े, शिकायतों की स्थिति तथा उनके निस्तारण की जानकारी उचित गोपनीयता और कानूनी सीमाओं के भीतर सार्वजनिक की जानी चाहिए। साथ ही, मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए कि कोई पात्र नागरिक अनावश्यक प्रशासनिक बाधाओं के कारण अपने मताधिकार से वंचित न हो और सूची की शुद्धता भी बनी रहे। यदि किसी के पास वैध मतदाता पहचान पत्र है, लेकिन मतदाता सूची से उनका नाम नदारत है तो ऐसे व्यक्तियों को वोट डालने का अधिकार मिलना चाहिए। वस्तुतः चुनाव आयोग के अधिकारियों की जवाबदेही जरूरी है, लेकिन जवाबदेही का अर्थ केवल दोष तय करना नहीं, बल्कि व्यवस्था की कमियों को दूर करना भी है। यदि नियम जटिल हैं, प्रक्रियाएं अस्पष्ट हैं या संसाधन अपर्याप्त हैं, तो केवल अधिकारियों को बदलने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए ऐसी मतदाता सूची चाहिए, जिसमें प्रत्येक पात्र नागरिक का नाम हो, प्रत्येक गलत प्रविष्टि को निष्पक्ष प्रक्रिया से सुधारा जाए और किसी का मताधिकार मनमाने ढंग से प्रभावित न हो। इसलिए मूल प्रश्न यही है—क्या हम हर विवाद के बाद अधिकारियों पर कार्रवाई तक सीमित रहेंगे, या ऐसी पारदर्शी, जवाबदेह और नागरिक-अनुकूल नीति बनाएंगे, जिससे गलतियों की संभावना ही कम हो जाए? मतदाता सूची की नीति में सुधार लोकतंत्र के प्रति जनता का विश्वास मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 13 Oct 2026 4:33 pm

राहुल के सुरक्षाकर्मियों ने सीएम शिवकुमार को मारा धक्का, भाजपा बोली-'वरिष्ठों का कोई सम्मान नहीं'

राहुल के सुरक्षाकर्मियों ने सीएम शिवकुमार को मारा धक्का, भाजपा बोली-'वरिष्ठों का कोई सम्मान नहीं'

समाचार नामा 13 Oct 2026 4:26 pm

कर्नाटक स्टिंग ऑपरेशन विवाद: सिद्दारमैया ने खटखटाया कोर्ट का दरवाजा, भाजपा का कांग्रेस पर धोखा देने का आरोप

कर्नाटक स्टिंग ऑपरेशन विवाद: सिद्दारमैया ने खटखटाया कोर्ट का दरवाजा, भाजपा का कांग्रेस पर धोखा देने का आरोप

समाचार नामा 13 Oct 2026 4:03 pm

UP Congress में कुर्सी की लड़ाई जूते-चप्पल तक आई, Ajay Rai ने BJP में वापसी की टिकट कटाई!

उत्तर प्रदेश की राजनीति में कब कौन किस पाले में चला जाए, इसकी गारंटी न दिल्ली दे सकती है, न लखनऊ का कोई सियासी पंडित। अब कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अजय राय को लेकर भी यही सवाल उठने लगा है कि क्या वह एक बार फिर भाजपा का दामन थाम सकते हैं? सवाल उठ रहा है कि जिस नेता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वाराणसी में बार-बार चुनौती दी, क्या वही नेता अब कांग्रेस में अपनी सियासी जमीन खिसकती देख पुराने घर की ओर लौटने का रास्ता तलाश रहे हैं? फिलहाल यह अटकल है। लेकिन प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी छिनने, नए नेतृत्व से तनातनी और लखनऊ कांग्रेस दफ्तर में जूते-चप्पल चलने के बाद इन चर्चाओं को हवा जरूर मिल गई है। वैसे कहावत है कि घर का भेदी लंका ढाए, लेकिन यूपी कांग्रेस का हाल देखिए, यहां लंका ढहाने के लिए विपक्ष को मशक्कत करने की जरूरत ही क्या है, जब अपने ही लोग एक-दूसरे से दो-दो हाथ करने को तैयार बैठे हों! हम आपको बता दें कि अजय राय को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाकर आराधना मिश्रा 'मोना' को जिम्मेदारी सौंप दी गई। नई व्यवस्था में इमरान मसूद को भी कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली। मगर संगठन में बदलाव का यह फैसला पुराने नेतृत्व और उसके समर्थकों के बीच सहज रूप से स्वीकार नहीं हुआ। अजय राय की नाराजगी की एक वजह यह भी बताई जा रही है कि उन्हें हटाने के तरीके से वह असहज थे। उन्हें लगता है कि उनकी भूमिका और राजनीतिक हैसियत को नजरअंदाज किया गया। इसे भी पढ़ें: 'यादवों की गुलामी छोड़ो', Asaduddin Owaisi ने Akhilesh Yadav पर सीधा हमला बोलते हुए UP के Muslims से कर दिया बड़ा आह्वान देखा जाये तो यूपी की राजनीति में पद केवल नाम के आगे लगने वाला तमगा नहीं होता। उसके साथ समर्थकों की फौज, टिकट की दावेदारी, संगठन पर पकड़ और भविष्य की सियासी संभावनाएं भी जुड़ी होती हैं। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी से उतरना किसी नेता के लिए महज जिम्मेदारी बदलना नहीं, अपने प्रभाव का हिसाब-किताब भी होता है। यही वजह है कि अब चर्चा चल रही है कि कांग्रेस उन्हें गुजरात जैसे किसी दूसरे राज्य में संगठनात्मक जिम्मेदारी देकर मनाने की कोशिश कर सकती है। दूसरी तरफ भाजपा में वापसी की संभावना भी सियासी गलियारों में तैर रही है। उल्लेखनीय है कि अजय राय 1996 से 2009 तक भाजपा में रहे और उसके टिकट पर तीन बार विधायक चुने गए थे। दूसरी ओर, लखनऊ के कांग्रेस मुख्यालय में जो हुआ, वह महज दो नेताओं के समर्थकों की कहासुनी मानकर टाल देने वाला मामला नहीं है। आराधना मिश्रा के पदभार ग्रहण समारोह के दौरान अजय राय और ममता चौधरी से जुड़े गुट आमने-सामने आ गए। विवाद रास्ता देने और अध्यक्ष को लेकर हुई टिप्पणी से शुरू हुआ बताया गया, लेकिन देखते ही देखते मामला धक्का-मुक्की और जूते-चप्पल तक पहुंच गया था। देखा जाये तो इस घटना ने यूपी कांग्रेस की एक पुरानी बीमारी को फिर उजागर कर दिया है। पार्टी में कार्यकर्ताओं से ज्यादा नेताओं की फौज दिखाई देती है। हर नेता को अपना खेमा चाहिए, हर खेमे को अपनी हैसियत चाहिए और हर हैसियत को संगठन में अपनी हिस्सेदारी चाहिए। सवाल यह है कि जब पार्टी कार्यालय में ही नेतृत्व की इज्जत और अनुशासन की हिफाजत नहीं हो पा रही, तो गांव-कस्बों में संगठन खड़ा करने की जिम्मेदारी कौन निभाएगा? एक ओर चुनाव सामने हैं दूसरी ओर ऐसे वक्त पर अगर पदभार ग्रहण समारोह में जूते चल रहे हैं, तो टिकट बंटवारे, जिला अध्यक्षों की नियुक्ति और चुनावी गठबंधन के वक्त यह खींचतान किस मुकाम पर पहुंचेगी इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है। यह आशंका निराधार नहीं है कि जैसे-जैसे 2027 का विधानसभा चुनाव नजदीक आएगा, कांग्रेस की गुटबाजी और जूतम-पैजार बढ़ सकती है। आने वाले दिनों में टिकट के दावेदार बढ़ेंगे, पदों की खींचतान तेज होगी और हर नेता अपने समर्थकों के साथ ताकत दिखाने की कोशिश करेगा। अगर कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने अभी से अनुशासन की स्पष्ट लक्ष्मण रेखा नहीं खींची, तो चुनावी तैयारी से ज्यादा ऊर्जा आपसी हिसाब चुकता करने में खर्च हो सकती है। साथ ही इस पूरे विवाद को केवल अजय राय बनाम नए नेतृत्व की लड़ाई बताकर खत्म नहीं किया जा सकता। ममता चौधरी ने आरोप लगाया है कि उनके साथ अभद्रता हुई और उन्हें धमकाया गया। उन्होंने अजय राय पर दलित विरोधी व्यवहार का आरोप भी लगाया है। दूसरी ओर, अजय राय ने भी ममता चौधरी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने पांच सदस्यीय जांच समिति बनाई है। इसकी कमान पूर्व प्रदेश अध्यक्ष बृजलाल खाबरी को दी गई है। समिति में अभिषेक दत्त, अब्दुल हन्नान, रवि वर्मा और शमीना शफीक भी शामिल हैं। देखा जाये तो यहां कांग्रेस नेतृत्व के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ पार्टी को नेताओं के बीच अनुशासन कायम करना है, दूसरी तरफ महिला और दलित कार्यकर्ताओं की शिकायतों को निष्पक्षता से सुनना है। यदि किसी नेता के प्रभाव के कारण शिकायत दबती है, तो संगठन के भीतर बराबरी और सम्मान के दावों पर सवाल उठेंगे। और यदि जांच से पहले ही किसी को दोषी ठहरा दिया जाता है, तो निष्पक्ष प्रक्रिया पर सवाल खड़े होंगे। साथ ही अजय राय की नाराजगी का एक पहलू समाजवादी पार्टी के साथ कांग्रेस के रिश्तों से भी जुड़ा बताया जा रहा है। पार्टी के भीतर ऐसी चर्चा है कि अखिलेश यादव के साथ बेहतर तालमेल बैठाने की कवायद में प्रदेश नेतृत्व बदलने का फैसला लिया गया। अजय राय के समाजवादी पार्टी के साथ रिश्ते सहज नहीं रहे, जबकि प्रमोद तिवारी और आराधना मिश्रा को गठबंधन के लिहाज से अपेक्षाकृत सुविधाजनक माना जाता है। इसके अलावा, सोमवार को दिल्ली में राहुल गांधी के आह्वान पर निकले कांग्रेस के विरोध मार्च में अजय राय की गैरमौजूदगी ने भी अटकलों को हवा दी। जब प्रदेश में संगठनात्मक बदलाव के बाद नाराजगी खुलकर सामने आ रही हो और पूर्व अध्यक्ष राष्ट्रीय कार्यक्रम से दूर रहें, तो सवाल उठना लाजिमी है कि मामला सिर्फ पद का है या राजनीतिक भविष्य का भी। हालांकि अजय राय के सामने पिंडरा विधानसभा सीट का अपना सियासी हिसाब भी है। वह वहां से अपनी दावेदारी को लेकर सक्रिय रहना चाहते हैं। ऐसे में गुजरात की जिम्मेदारी स्वीकार करना, यूपी में अपनी जमीन पर ध्यान देना या किसी दूसरे राजनीतिक विकल्प पर विचार करना, इन संभावनाओं के बीच उनकी अगली चाल पर सबकी नजर रहेगी। साथ ही यूपी कांग्रेस के सामने संकट केवल अजय राय की नाराजगी का नहीं है। संकट उस संगठनात्मक संस्कृति का है, जिसमें पद बदलते ही पुराने और नए नेतृत्व के बीच अविश्वास सिर उठाने लगता है। यदि हर बदलाव को प्रतिष्ठा की लड़ाई बना दिया जाएगा, तो संगठन का विस्तार कैसे होगा? और यदि हर असहमति समर्थकों की भिड़ंत में बदल जाएगी, तो आम कार्यकर्ता अपनी जगह कहां तलाशेगा? उत्तर प्रदेश में चुनावी राजनीति केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस, बयानबाजी और बड़े नेताओं की तस्वीरों से नहीं चलती। बूथ पर कार्यकर्ता चाहिए, गांव में भरोसा चाहिए और टिकट न मिलने पर भी संगठन के साथ खड़े रहने की राजनीतिक संस्कृति चाहिए। पार्टी कार्यालय में जूते-चप्पल चलना इसी कसौटी पर कांग्रेस के सामने असहज सवाल खड़ा करता है। बहरहाल, अजय राय भाजपा में लौटेंगे या कांग्रेस उन्हें कोई नई जिम्मेदारी देकर रोक लेगी, इसका जवाब आने वाला वक्त देगा। लेकिन कांग्रेस नेतृत्व के लिए इससे भी बड़ा सवाल है कि क्या वह नेताओं की महत्वाकांक्षाओं के बीच संगठन को बचा पाएगा? क्योंकि यूपी की सियासत में चुनाव से पहले नाराजगी कोई नई बात नहीं। नई बात तब होगी, जब कोई पार्टी अपने नेताओं को यह समझा सके कि संगठन की कुर्सी निजी जागीर नहीं और पार्टी कार्यालय अखाड़ा नहीं होता। कांग्रेस ने अगर अनुशासन को कायम करने के लिए तत्काल कदम नहीं उठाये तो 2027 की चुनावी बिसात बिछने तक कांग्रेस में विरोधियों से मुकाबले की तैयारी कम और अपनों से हिसाब बराबर करने की कवायद ज्यादा दिखाई दे सकती है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 13 Oct 2026 4:03 pm

राहुल गांधी के आरोपों पर बोले पीयूष गोयल, कांग्रेस ने तो CEC को मंत्री-राज्यपाल बनाया था

गोयल ने कहा कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने से पहले कांग्रेस को अपने शासनकाल के रिकॉर्ड पर नजर डालनी चाहिए। उनके मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने चुनाव आयोग को स्वतंत्र और स्वायत्त तरीके से काम करने का अवसर दिया है।

देशबन्धु 13 Oct 2026 3:48 pm

सुप्रीम कटघरे में अब CEC को मुकदमों से बचाने वाला 'अभयदान', क्या है धारा-16 का 'कवच' जिस पर SC करेगा सुनवाई?

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और भारत के चुनाव आयोग (ECI) को नोटिस जारी किया है। यह नोटिस एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की उस याचिका पर जारी किया गया है जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के पालन के दौरान किए गए कार्यों के लिए दी गई कानूनी छूट (सिविल और आपराधिक कार्यवाही से सुरक्षा) को चुनौती दी गई है। इस मामले को कोर्ट में पहले से लंबित याचिकाओं के साथ जोड़ दिया गया है और 29 अक्टूबर को उन याचिकाओं के साथ ही इस पर भी सुनवाई होनी है। इस चुनौती का मुख्य आधार 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023' की धारा 16 है। इस प्रावधान के अनुसार, अदालतें किसी मौजूदा या पूर्व CEC या चुनाव आयुक्त के खिलाफ़ उनके आधिकारिक कर्तव्यों के पालन (या पालन करने के दावे) के दौरान किए गए किसी काम या कही गई किसी बात के लिए दीवानी या आपराधिक कार्यवाही शुरू या जारी नहीं रख सकतीं। इस चुनौती से देश के शीर्ष चुनाव अधिकारियों को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा के दायरे पर सवाल उठते हैं और यह भी कि क्या ऐसी छूट जवाबदेही और कानून के शासन के संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप है। विरोध से संशोधन तक: कैसे बनी धारा 16? जब सरकार ने 10 अगस्त 2023 को राज्यसभा में 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) विधेयक, 2023' पेश किया, तो इस कानून की चारों ओर आलोचना हुई। इस विधेयक से नियुक्तियों के मामले में सरकार को जो बेहिसाब दबदबा मिलने वाला था, उसके अलावा एक बात पर ज़ोरदार बहस हुई: यह विधेयक CEC और ECs को वेतन, भत्ते और सेवा की अन्य शर्तों के मामले में कैबिनेट सेक्रेटरी के बराबर लाने की कोशिश कर रहा था; जबकि पहले वे सुप्रीम कोर्ट के जजों के बराबर के स्तर पर थे। विपक्षी दलों ने उस बराबरी के दर्जे का मुद्दा उठाया जो CEC और ECs को सुप्रीम कोर्ट के जजों के बराबर मिला हुआ था, और जिसे प्रस्तावित कानून खत्म करना चाहता था। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों ने 16 सितंबर 2023 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक संयुक्त पत्र लिखकर चिंता जताई कि इस कदम से EC की प्रतिष्ठा और अधिकार कम होंगे और यह संकेत जाएगा कि CEC और ECs सिर्फ़ नौकरशाहों के बराबर हैं, उनसे बेहतर नहीं, जिससे नौकरशाही से उनके स्वतंत्र होने की धारणा पर बुरा असर पड़ेगा। आलोचना के बाद, सरकार ने बिल को कुछ समय के लिए रोक दिया और 2023 के शीतकालीन सत्र में कुछ अहम बदलावों के साथ इसे चर्चा और पास कराने के लिए पेश किया। 12 दिसंबर 2023 को, केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने राज्यसभा में बिल पर बहस शुरू करते हुए कहा कि सरकार बिल की धारा 15 में एक संशोधन ला रही है। इसका मकसद CEC और ECs को सैलरी और सर्विस की शर्तों के मामले में सुप्रीम कोर्ट के जजों के बराबर लाना है। उन्होंने सदन को बिल में एक और संशोधन के बारे में भी बताया, जो धारा 15A को जोड़ना था। इससे उन्हें बिना किसी रुकावट और आज़ादी से अपने काम करने में मदद मिलेगी। यह बिल 12 दिसंबर 2023 को राज्यसभा से और 21 दिसंबर 2023 को लोकसभा से पास हुआ। इसे 28 दिसंबर 2023 को राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिली। धारा 15A, 2023 के कानून में धारा 16 के तौर पर शामिल हुई। यह धारा अभी चर्चा में है, खासकर उस बड़े विवाद की वजह से जो CEC ज्ञानेश कुमार के कथित तौर पर एकतरफा फैसलों को लेकर खड़ा हुआ है। ये फैसले चुनावी रोल के बहुत विवादित 'स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न' (SIR) को कराने से जुड़े थे। 1. CEC एक्ट की धारा 16 ज्ञानेश कुमार को क्या सुरक्षा देती है? धारा 16 मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक काम करते समय किए गए, या कथित तौर पर किए गए कामों के लिए सिविल और आपराधिक कार्यवाही से सुरक्षा देती है। यह सुरक्षा उनके पद छोड़ने के बाद भी बनी रहती है। 2. क्या CEC के तौर पर लिए गए फैसलों के लिए ज्ञानेश कुमार पर मुकदमा चलाया जा सकता है? धारा 16 अदालतों को किसी सरकारी काम से जुड़ी सिविल या आपराधिक कार्यवाही पर विचार करने या उसे जारी रखने से रोकती है। सुप्रीम कोर्ट इस सुरक्षा के दायरे पर विचार कर रहा था; इस लेख में इस बात पर कोई अंतिम फैसला नहीं बताया गया है कि क्या कुमार पर मुकदमा चलाया जा सकता है। 3. विपक्षी पार्टियां ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई क्यों चाहती हैं? विपक्षी पार्टियों का आरोप है कि उन्होंने मतदाता सूची के 'स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न' (विशेष गहन संशोधन) के संबंध में एकतरफा फैसले लिए। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अन्य चुनाव आयुक्तों ने उन फैसलों और आदेशों पर आपत्ति जताई थी, जिनके बारे में उन्हें जानकारी नहीं थी। 4. क्या CEC एक्ट चुनाव आयुक्तों को जजों की तुलना में ज़्यादा सुरक्षा देता है? सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि धारा 16 के तहत जजों को मिलने वाली सुरक्षा से ज़्यादा कानूनी सुरक्षा मिल सकती है। लेख में बताया गया है कि जजेज़ (प्रोटेक्शन) एक्ट के तहत सरकार या कोर्ट के पास जजों के खिलाफ़ कुछ कार्रवाई करने का अधिकार सुरक्षित रहता है, जबकि CEC एक्ट में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। 5. क्या सुप्रीम कोर्ट ने धारा 16 की वैधता पर कोई फ़ैसला सुनाया है? कोर्ट ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, CEC और दूसरे चुनाव आयुक्तों को नोटिस जारी किया है। इसमें धारा 16 पर किसी अंतिम फ़ैसले की बात नहीं कही गई है। इससे पहले 5 अक्तूबर 2026 को सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने 2023 के कानून के तहत चुनाव आयुक्तों की मिली कानूनी सुरक्षा को लेकर कहा कि यह तो संवैधानिक कोर्ट के जजों को भी प्राप्त नहीं है। सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर)को लेकर कथित मनमाने फैसले को लेकर डाली गई याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच की तरफ से ये गंभीर मौखिक टिप्पणी की गई थी। न्यायाधीश (संरक्षण) अधिनियम, 1985 (The Judges (Protection) Act, 1985) क्या है? केंद्र सरकार, राज्य सरकार, भारत के सर्वोच्च न्यायालय, किसी उच्च न्यायालय या किसी अन्य सक्षम प्राधिकारी को उस समय लागू किसी भी कानून के तहत किसी व्यक्ति (जो न्यायाधीश रहा हो या वर्तमान में न्यायाधीश हो) के खिलाफ उचित कार्रवाई (चाहे वह दीवानी, आपराधिक, विभागीय कार्यवाही या किसी अन्य रूप में हो) करने का अधिकार बना रहेगा। यह प्रावधान (कार्रवाई की छूट देने वाली यह धारा) CEC अधिनियम (मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम) में मौजूद नहीं है। इसे भी पढ़ें: 'फ़ोन ज़ब्त, वकील से मिलने की इजाज़त नहीं': दास और रांका को हिरासत में लिए जाने के बाद दिल्ली पुलिस पर CJP के आरोप CEC और ECs की नियुक्ति कैसे होती है? संविधान का अनुच्छेद 324 चुनावों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण की ज़िम्मेदारी भारत के चुनाव आयोग (ECI) को सौंपता है। अनुच्छेद 324(2) के अनुसार, संसद द्वारा बनाए गए किसी भी कानून के अधीन रहते हुए, राष्ट्रपति CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करते हैं। कई दशकों तक, संसद ने इन नियुक्तियों की प्रक्रिया तय करने वाला कोई कानून नहीं बनाया था। इसके कारण सुप्रीम कोर्ट के सामने यह सवाल उठा कि जब ECI के सदस्यों की नियुक्ति कार्यपालिका (सरकार) करती है, तो ECI की आज़ादी को कैसे बचाया जा सकता है। मार्च 2023 में, सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की संविधान पीठ ने 'अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ' मामले में अपना फ़ैसला सुनाया। अनूप बरनवाल मामला क्या था? जनवरी 2015 में अनूप बरनवाल ने एक जनहित याचिका (PIL) दायर की। उनका तर्क था कि ECI के सदस्यों की नियुक्ति की व्यवस्था असंवैधानिक है। उस समय, नियुक्तियाँ करने का अधिकार कार्यपालिका के पास था। PIL में कहा गया था कि समय के साथ ECI की आज़ादी कम हुई है। इसमें कोर्ट से अपील की गई कि वह ECI में नियुक्तियों के लिए एक स्वतंत्र, कॉलेजियम जैसी व्यवस्था बनाने का निर्देश दे। संविधान पीठ ने कहा कि जब तक संसद अनुच्छेद 324(2) के तहत कोई कानून नहीं बनाती, तब तक चुनाव आयोग में नियुक्तियां तीन सदस्यों वाली एक समिति की सिफारिश पर की जाएंगी। इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल होंगे। अदालत ने कहा कि यह व्यवस्था तब तक लागू रहेगी जब तक संसद इस विषय पर कोई कानून नहीं बना लेती। CEC को कैसे हटाया जा सकता है? संविधान CEC को पद से हटाने के मामले में काफी सुरक्षा देता है। अनुच्छेद 324(5) के अनुसार, CEC को पद से उसी तरह और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जैसे सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है। इसका मतलब है कि CEC को केवल साबित हो चुके दुर्व्यवहार या अक्षमता के आधार पर और सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने के लिए तय संसदीय प्रक्रिया के ज़रिए ही हटाया जा सकता है। संसद के दोनों सदनों में ज़रूरी विशेष बहुमत से पास होना चाहिए। संसद द्वारा प्रस्ताव पास किए जाने के बाद ही राष्ट्रपति CEC को हटाने का आदेश जारी कर सकते हैं। इसकी प्रक्रिया 'जजेज़ (इन्क्वायरी) एक्ट, 1968' में बताई गई है। दूसरे चुनाव आयुक्तों को मिलने वाली सुरक्षा अलग है। आर्टिकल 324(5) के तहत, किसी चुनाव आयुक्त या क्षेत्रीय आयुक्त को CEC की सिफ़ारिश के बिना उनके पद से नहीं हटाया जा सकता। इसे भी पढ़ें: Piyush Goyal ने Rahul Gandhi से पूछे 10 सवाल, वोट चोरी पर सबूत देने की दी चुनौती क्या CEC को गिरफ़्तार किया जा सकता है? इससे संबंधित प्रावधान 2023 के अधिनियम की धारा 16 है। यह धारा किसी भी ऐसे व्यक्ति को अदालत में दीवानी या आपराधिक कार्यवाहियों से सुरक्षा प्रदान करती है, जो CEC या चुनाव आयुक्त रहा हो या वर्तमान में हो। बशर्ते वह कृत्य, बात या शब्द उसने अपने आधिकारिक कर्तव्य या कार्य के निर्वहन के दौरान किया या कहा हो। यह प्रावधान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सुरक्षा उन व्यक्तियों तक भी बढ़ाता है जो CEC या चुनाव आयुक्त हैं या कभी रहे थे। हालांकि, धारा 16 स्पष्ट रूप से यह नहीं कहती कि CEC को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। यह केवल यह कहती है कि अदालतें इस धारा के दायरे में आने वाले आचरण के संबंध में कोई दीवानी या आपराधिक कार्यवाही स्वीकार या जारी नहीं रखेंगी। इस धारा में गिरफ्तारी (Arrest), जांच (Investigation) या पुलिस हिरासत (Police Custody) जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया गया है। इसलिए, इसे गिरफ्तारी से सीधी या पूर्ण छूट नहीं कहा जा सकता। इसके अलावा, यह सुरक्षा केवल उन्हीं कृत्यों से जुड़ी है जो आधिकारिक कर्तव्यों या कार्यों के निर्वहन के दौरान किए गए हों। 2023 से पहले क्या व्यवस्था थी? पुराना कानून (1991 का एक्ट): 2023 से पहले चुनाव आयोग Act, 1991 से संचालित होता था। इस 1991 के कानून में आयुक्तों के खिलाफ कोर्ट केस या आपराधिक कार्रवाई पर रोक लगाने वाली ऐसी कोई 'धारा 16' या कोई इम्युनिटी क्लॉज नहीं था। सामान्य लोक सेवकों वाला नियम (CrPC धारा 197): पहले चुनाव आयुक्तों को अन्य सरकारी अफसरों की तरह ही माना जाता था।उन पर आधिकारिक ड्यूटी से जुड़े मामले में केस चलाने के लिए CrPC की धारा 197 के तहत सरकार की पूर्व अनुमति की जरूरत होती थी। यानी कोर्ट जाने पर पूरी तरह कानूनी रोक नहीं थी, सिर्फ सरकार की मंजूरी की शर्त थी। संविधान (अनुच्छेद 324):सविधान ने CEC को केवल पद से हटाने की सुरक्षा दी थी कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह महाभियोग जैसी प्रक्रिया से ही हटाया जा सकता है। लेकिन संविधान के तहत उन्हें राष्ट्रपति या राज्यपाल (अनुच्छेद 361) की तरह मुकदमों से कानूनी छूट नहीं दी गई थी। 2023 के कानून ने क्या बदल दिया? 2023 के नए एक्ट की धारा 16 में साफ लिख दिया गया कि CEC या ECs द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्य के दौरान किए गए किसी भी काम या फैसले के खिलाफ अदालत कोई भी सिविल या क्रिमिनल केस स्वीकार ही नहीं करेगी।

प्रभासाक्षी 13 Oct 2026 3:40 pm

छत्तीसगढ़ दौरे के दौरान बस्तर के दशहरा उत्सव में शामिल होंगी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु

छत्तीसगढ़ दौरे के दौरान बस्तर के दशहरा उत्सव में शामिल होंगी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु

समाचार नामा 13 Oct 2026 3:14 pm

एआई बूम ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को बांटा: आईएमएफ

वॉशिंगटन, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने मंगलवार को कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) में तेजी से बढ़ रहे निवेश और मध्य पूर्व में जारी युद्ध के कारण दुनिया की अर्थव्यवस्था दो हिस्सों में बंटती नजर आ रही है।

देशबन्धु 13 Oct 2026 2:20 pm

'संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाना राहुल गांधी की आदत', इंडिया ब्लॉक के प्रदर्शन पर एनडीए नेताओं का पलटवार

'संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाना राहुल गांधी की आदत', इंडिया ब्लॉक के प्रदर्शन पर एनडीए नेताओं का पलटवार

समाचार नामा 13 Oct 2026 2:16 pm

'बिमोल अकोइजम संसद में रहने लायक नहीं', जेएनयू कांड को लेकर राष्ट्रपति से मिलेंगी भाजपा की महिला सांसद

'बिमोल अकोइजम संसद में रहने लायक नहीं', जेएनयू कांड को लेकर राष्ट्रपति से मिलेंगी भाजपा की महिला सांसद

समाचार नामा 13 Oct 2026 2:04 pm

राहुल गांधी को महादेव के बारे में कुछ नहीं पता, इसी कारण राजनीतिक तमाशे को 'शिव तांडव' से जोड़ा : राम कदम

राहुल गांधी को महादेव के बारे में कुछ नहीं पता, इसी कारण राजनीतिक तमाशे को 'शिव तांडव' से जोड़ा : राम कदम

समाचार नामा 13 Oct 2026 2:00 pm

चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्ष की याचिका पर कांग्रेस नेता बोले-'लोकतंत्र की रक्षा के लिए जारी रहेगा संघर्ष'

चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्ष की याचिका पर कांग्रेस नेता बोले-'लोकतंत्र की रक्षा के लिए जारी रहेगा संघर्ष'

समाचार नामा 13 Oct 2026 1:53 pm

आन्दोलन वही, जो सार्थक मुद्दा, दिशा एवं भरोसे से जुड़ा हो

लोकतंत्र में असहमति उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी जीवंतता का प्रमाण है। सरकार से सवाल पूछना, नीतियों का विरोध करना और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाना नागरिक स्वतंत्रता का अनिवार्य हिस्सा है। लेकिन लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा केवल इस बात से नहीं होती कि विरोध करने की कितनी स्वतंत्रता है, बल्कि इससे भी होती है कि उस स्वतंत्रता का उपयोग किस उद्देश्य, किस भाषा और किस पद्धति से किया जा रहा है। किसी आंदोलन का मुद्दा कितना ही महत्त्वपूर्ण क्यों न हो, यदि उसका नेतृत्व दिशाहीन हो जाए, भाषा उत्तेजक बन जाए और पद्धति हिंसा अथवा अराजकता की ओर बढ़ने लगे, तो उसका नैतिक आधार कमजोर पड़ने लगता है। इसलिए आज देश के सामने प्रश्न केवल आंदोलनों का नहीं, बल्कि उनके चरित्र, विश्वसनीयता और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व का भी है। दिल्ली में हाल के विरोध प्रदर्शनों और उन पर प्रशासन की सख्ती के बाद सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप ने एक बार फिर लोकतंत्र की सीमाओं और संभावनाओं पर बहस छेड़ दी है। एक ओर शांतिपूर्ण विरोध नागरिकों का अधिकार है, तो दूसरी ओर सार्वजनिक व्यवस्था, नागरिक सुरक्षा और कानून का पालन सुनिश्चित करना शासन का दायित्व है। इन दोनों के बीच संतुलन ही संवैधानिक लोकतंत्र की पहचान है। न तो सरकार को कानून-व्यवस्था के नाम पर नागरिक स्वतंत्रताओं के अनावश्यक दमन की छूट दी जा सकती है और न ही आंदोलनकारियों को लोकतांत्रिक अधिकारों की आड़ में सार्वजनिक जीवन को बाधित करने का असीमित अधिकार प्राप्त है। संविधान अधिकार देता है, लेकिन उन अधिकारों के साथ उत्तरदायित्व भी जोड़ता है। आज सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि जनांदोलनों की दिशा कौन तय कर रहा है? क्या आंदोलन वास्तव में जनसमस्याओं के समाधान के लिए खड़े हो रहे हैं, अथवा जनता के असंतोष को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का साधन बनाया जा रहा है? यह प्रश्न किसी एक दल या संगठन तक सीमित नहीं है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, सामाजिक संगठन हों या जनसमूह, सभी को अपने आचरण की कसौटी संविधान, नैतिकता और जनहित को बनाना चाहिए। लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। वह सरकार की नीतियों पर सवाल उठाता है, कमियों को सामने लाता है और जनहित के मुद्दों को राजनीतिक विमर्श में स्थान देता है। लेकिन विपक्ष का दायित्व केवल विरोध करना नहीं, बल्कि वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत करना भी है। यदि हर असहमति को सत्ता के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष में बदलने का प्रयास किया जाए, हर प्रशासनिक निर्णय को राजनीतिक षड्यंत्र बताया जाए और प्रत्येक जनसमस्या को व्यापक अव्यवस्था का प्रतीक बना दिया जाए, तो वास्तविक मुद्दे शोर में खोने लगते हैं। इसी तरह सरकार भी यदि आलोचना को शत्रुता समझने लगे, तो लोकतांत्रिक संवाद की संभावनाएं संकुचित हो जाती हैं। इसे भी पढ़ें: प्रदर्शन भी होगा, आवाजाही भी चलेगी! Delhi Protest Case में Supreme Court के अहम निर्देश आंदोलन की साख उसके मूल उद्देश्य एवं भरोसे से बनती है। जिस मुद्दे को लेकर लोग एकत्र होते हैं, उसकी स्पष्टता, तथ्यात्मक प्रामाणिकता और समाधान की दिशा आंदोलन की विश्वसनीयता निर्धारित करती है। जब मूल प्रश्न पीछे छूट जाता है और राजनीतिक दलों की प्रतिस्पर्धा, व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाएं अथवा वैचारिक टकराव केंद्र में आ जाते हैं, तब आंदोलन की ऊर्जा बिखरने लगती है। जनसमर्थन जुटाना और जनविश्वास अर्जित करना दो अलग-अलग बातें हैं। भीड़ किसी क्षणिक आक्रोश का परिणाम हो सकती है, लेकिन जनविश्वास निरंतर नैतिक आचरण और रचनात्मक कार्यों से अर्जित होता है। भारत का लोकतांत्रिक इतिहास इस संदर्भ में अनेक महत्त्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है। वर्ष 1974 का छात्र आंदोलन और लोकनायक जयप्रकाश नारायण का नेतृत्व बताता है कि जनाक्रोश को रचनात्मक परिवर्तन की शक्ति में कैसे बदला जा सकता है। बिहार के छात्रों ने भ्रष्टाचार, महंगाई और शासन संबंधी समस्याओं के विरुद्ध आवाज उठाई थी। जयप्रकाश नारायण ने इस असंतोष को व्यापक सामाजिक और राजनीतिक सुधारों की दिशा देने का प्रयास किया। आज के आंदोलनों को इस ऐतिहासिक अनुभव से सीखना चाहिए। किसी भी आंदोलन की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितनी सड़कें बंद हुईं, कितने लोग एकत्र हुए या कितने दिनों तक विरोध चला। उसकी सफलता का वास्तविक पैमाना यह होना चाहिए कि उसने किस समस्या का समाधान प्रस्तुत किया, जनजीवन में क्या सकारात्मक परिवर्तन लाया और समाज में संवैधानिक चेतना को कितना मजबूत किया। वर्तमान समय में इंटरनेट मीडिया ने जनमत निर्माण की प्रक्रिया को पूरी तरह बदल दिया है। अब कोई घटना कुछ ही मिनटों में व्यापक बहस का विषय बन सकती है। यह लोकतंत्र के लिए एक महत्त्वपूर्ण अवसर है, क्योंकि इससे आम नागरिकों को अपनी बात रखने और प्रशासन से जवाब मांगने का मंच मिला है। लेकिन यही माध्यम भ्रामक सूचनाओं, अधूरे तथ्यों, भावनात्मक अभियानों और अपुष्ट आरोपों को भी तेजी से प्रसारित कर सकता है। हैशटैग, वायरल वीडियो और ऑनलाइन समर्थन अपने आप में किसी आंदोलन की नैतिक प्रामाणिकता का प्रमाण नहीं हैं। किसी आरोप की गंभीरता का निर्धारण उसके प्रमाणों से होना चाहिए, उसकी लोकप्रियता से नहीं। यदि आंदोलनकारी तथ्यों की पुष्टि किए बिना आरोप लगाते हैं, तो वे अपने ही उद्देश्य को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसी प्रकार प्रशासन का दायित्व है कि वह आलोचनात्मक आवाजों को केवल इसलिए संदिग्ध न माने कि वे सरकार के विरुद्ध हैं। पारदर्शिता, तथ्यपरक संवाद और निष्पक्ष जांच ही अविश्वास को दूर करने के प्रभावी उपाय हैं। आज युवाओं के पास डिजिटल तकनीक, नवाचार, उद्यमिता और सामाजिक सहभागिता के अनेक अवसर हैं। उनकी ऊर्जा केवल विरोध तक सीमित न रहे, बल्कि समाधान निर्माण में भी लगे। भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन हो तो पारदर्शिता के व्यावहारिक उपाय सामने आएं, चुनावी सुधारों की मांग हो तो प्रमाण आधारित सुझाव प्रस्तुत किए जाएं, प्रशासनिक अन्याय का प्रश्न हो तो कानूनी और संस्थागत रास्तों को मजबूत किया जाए। विरोध की सार्थकता तब बढ़ती है, जब वह किसी बेहतर व्यवस्था की कल्पना और निर्माण का आधार बनता है। जनांदोलनों के संदर्भ में विदेशी शक्तियों की भूमिका पर भी चर्चा होती रही है। यह स्वाभाविक है कि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में राष्ट्रीय हितों, बाहरी प्रभावों और सूचना के प्रवाह को लेकर सतर्कता बरती जाए। लेकिन इस विषय पर भी भावनाओं अथवा आशंकाओं के बजाय प्रमाणों के आधार पर बात होनी चाहिए। किसी आंदोलन में सरकार की आलोचना होने मात्र से उसे विदेशी षड्यंत्र का हिस्सा नहीं कहा जा सकता। उसी प्रकार यदि किसी गतिविधि में विदेशी वित्तपोषण, भ्रामक प्रचार अथवा अनुचित हस्तक्षेप के विश्वसनीय प्रमाण मिलते हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। राष्ट्रीय एकता और अखंडता की रक्षा केवल कठोर प्रशासनिक कार्रवाई से नहीं होती। वह नागरिकों के विश्वास, संस्थाओं की निष्पक्षता, न्याय की उपलब्धता और शासन की पारदर्शिता से मजबूत होती है। देश की आलोचना और देश के प्रति शत्रुता में अंतर समझना आवश्यक है। सरकार की किसी नीति का विरोध करना राष्ट्रविरोध नहीं है, जैसे राष्ट्रीय हित की चिंता करना किसी नागरिक की लोकतांत्रिक स्वतंत्रता को सीमित करने का औचित्य नहीं बन सकता। अंततः लोकतंत्र की शक्ति न तो केवल सत्ता में निहित है और न ही केवल सड़क पर उतरने वाली भीड़ में। उसकी वास्तविक शक्ति नागरिक विवेक, संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और समाज की संवाद करने की क्षमता में है। किसी भी आंदोलन को स्वयं से तीन प्रश्न अवश्य पूछने चाहिए-क्या हमारा मुद्दा तथ्यपरक और जनहितकारी है? क्या हमारी पद्धति लोकतांत्रिक और अहिंसक है? क्या हमारे प्रयास से समस्या का समाधान निकलेगा या समाज में विभाजन और अविश्वास बढ़ेगा? केवल मुद्दा सही होना पर्याप्त नहीं है, उसके लिए सही नेतृत्व, सही भाषा, सही पद्धति और सही लक्ष्य भी आवश्यक हैं। आंदोलन का उद्देश्य केवल किसी व्यवस्था को चुनौती देना नहीं, बल्कि उससे बेहतर व्यवस्था के निर्माण में योगदान करना होना चाहिए। जो आंदोलन समाज को विवेक, अनुशासन, न्याय और रचनात्मकता की दिशा देता है, वही इतिहास में स्थायी स्थान प्राप्त करता है। भारत का भविष्य ऐसे ही लोकतांत्रिक चिंतन में सुरक्षित है, जहां असहमति को सम्मान मिले, सत्ता जवाबदेह रहे, विपक्ष रचनात्मक बने और राष्ट्रहित का अर्थ नागरिक स्वतंत्रता तथा संवैधानिक मर्यादा के समन्वय में खोजा जाए। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

प्रभासाक्षी 13 Oct 2026 1:22 pm

IMF का अनुमान: भारत की GDP ग्रोथ 7% रहेगी, दुनिया की आर्थिक रफ्तार से दोगुने से ज्यादा

IMF ने भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान वित्त वर्ष 2026-27 के लिए बढ़ाकर 7% किया। जानिए वैश्विक विकास दर, AI निवेश और अर्थव्यवस्था के सामने मौजूद चुनौतियां।

देशबन्धु 13 Oct 2026 10:30 am

संजय सिंह की कोर्ट में बढ़ी टेंशन! गवाही पूरी, अब 17 अक्टूबर को होगी आर-पार की बहस

उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर जिले में आदर्श आचार संहिता उल्लंघन के मामले में आम आदमी पार्टी (आप) सांसद संजय सिंह समेत 12 आरोपियों के खिलाफ विचाराधीन केस में गवाही पूरी हो गई है

देशबन्धु 13 Oct 2026 7:40 am

दुर्गा पूजा से पहले पश्चिम बंगाल में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल, 4 आईएएस अधिकारियों का तबादला

दुर्गा पूजा से पहले पश्चिम बंगाल में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल, 4 आईएएस अधिकारियों का तबादला

समाचार नामा 13 Oct 2026 12:00 am

'EVM खराब है तो सरकार भी छोड़ो'... राहुल गांधी पर हिमंता बिस्वा सरमा का बड़ा हमला

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को चुनौती दी कि अगर उन्हें वाकई लगता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव सुनिश्चित नहीं कर सकते, तो वे विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों की सरकारों से इस्तीफा मांगें और चुनाव बहिष्कार की घोषणा करें।

देशबन्धु 12 Oct 2026 11:13 pm

SIR पर महासंग्राम! राहुल गांधी विपक्षी फौज के साथ Supreme Court पहुंचे, चुनाव आयोग पर बड़ा हमला

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है

देशबन्धु 12 Oct 2026 11:01 pm

'सीजेआई के पास इंडिया गठबंधन से मिलने का समय नहीं', सपा प्रवक्ता अमीक जामेई का दावा

'सीजेआई के पास इंडिया गठबंधन से मिलने का समय नहीं', सपा प्रवक्ता अमीक जामेई का दावा

समाचार नामा 12 Oct 2026 10:24 pm

'देश में अराजकता फैलाना विपक्ष का लक्ष्य', राहुल गांधी के मार्च पर भाजपा नेता का आरोप

'देश में अराजकता फैलाना विपक्ष का लक्ष्य', राहुल गांधी के मार्च पर भाजपा नेता का आरोप

समाचार नामा 12 Oct 2026 9:58 pm

'देश को टकराव नहीं, विवेक और समाधान चाहिए', सीजेपी के प्रदर्शन पर स्वामी चिदानंद सरस्वती

'देश को टकराव नहीं, विवेक और समाधान चाहिए', सीजेपी के प्रदर्शन पर स्वामी चिदानंद सरस्वती

समाचार नामा 12 Oct 2026 6:56 pm

ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर गांधी मैदान से राजभवन तक मार्च: संदीप सौरव

ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर गांधी मैदान से राजभवन तक मार्च: संदीप सौरव

समाचार नामा 12 Oct 2026 6:27 pm

मध्य प्रदेश: मुख्यमंत्री मोहन यादव का स्कूली बच्चों से संवाद

मध्य प्रदेश: मुख्यमंत्री मोहन यादव का स्कूली बच्चों से संवाद

समाचार नामा 12 Oct 2026 6:12 pm

पेयजल के बिना कैसे पूरा होगा विकसित भारत का सपना

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने सार्वजनिक जीवन के 25 साल पूरे होने पर आयोजित कार्यक्रम को एक घंटे तक संबोधित करते हुए कहा कि जब तक भारत विकसित नहीं होता, तब तक न थकूंगा, न रुकूंगा। इस नारे का 19 बार जिक्र किया। उन्होंने कहा कि भारत को 2047 तक हर हालत में विकसित देश बनाना है। निश्चित तौर पर भारत को विकसित देश बनना ही चाहिए। सवाल यह है कि क्या तब तक भारत के करोड़ों लोग प्यासे रहेंगे। उन्हें पर्याप्त और शुद्ध पानी के लिए क्या भारत के विकसित होने तक इंतजार करना पड़ेगा। क्या देश के लोगों की प्यास और दूषित पेयजल से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं को तब तक के लिए रोका जा सकता है। विकसित भारत का सपना देखने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन इससे पहले केंद्र और राज्यों की सरकारों का यह खुलासा करना चाहिए कि देश के लोगों को गुणवत्तायुक्त पर्याप्त पीने का पानी कब तक उपलब्ध हो जाएगा। इसके लिए देश की राष्ट्रीय नीति क्या है। इस मुद्दे पर कोई बोलने को तैयार नहीं है। इस बारे में चर्चा करते ही देश के विकास और विकसित भारत के सपने पर सवालिया निशान लग जाते हैं। देश के सत्तारुढ़ दलों और विपक्षी दलों के नेता ऐसे जमीनी जरूरतों के मुद्दों से मुंह चुराते हैं। पेयजल जैसी समस्याओं से निपटने के लिए सरकारों के पास दूरदृष्टि और योजनाएं नहीं हैं। यदि लगातार एक या दो बार देश में मानसून मेहरबान न हो तो देश में पीने के पानी का हाहाकार मचने लगता है। इसे भी पढ़ें: Maharashtra Drought: सूखा प्रभावित क्षेत्रों के लिए 8 महीने की योजना बनाएगी सरकार, केंद्र से मांगेगी राहत देश में पेयजल संकट अभी से गहराने लगा, जबकि अभी मानसून की विदाई हुई है। महाराष्ट्र में राज्य सरकार ने 16 अक्टूबर से सभी शहरी और ग्रामीण स्थानीय निकायों में कम से कम 10 प्रतिशत जल कटौती लागू करने का निर्णय लिया है। राज्य के जालना जिले में बांध में केवल 2 प्रतिशत पानी बचा है। नौबत यहां तक आ गई है कि प्रशासन को पानी की चोरी रोकने के लिए पुलिस और राजस्व विभाग की टीमों के साथ रात में भी निगरानी और गश्त करनी पड़ रही है। इस बार मानसून में बारिश की करीब 12—13 प्रतिशत की कमी के कारण देश के दूसरे राज्यों की हालत भी महाराष्ट्र जैसी होने से इंकार नहीं किया जा सकता। देश के कई राज्यों में कम बारिश का असर अब जलाशयों पर दिख रहा है। 1 अक्टूबर तक देश के प्रमुख जलाशयों में 71.84% पानी था। पिछले साल इसी समय यह 90.31% था, जबकि सामान्य स्तर 81.79% है। अर्थात इस बार जलाशयों में पानी पिछले साल के मुकाबले काफी कम है। देशभर में इस बार का मानसून 13वां सबसे सूखा सीजन रहा। पिछले 11 सालों में यह सबसे कम बारिश वाला मानसून रहा है। हालांकि, सीजन खत्म होने से पहले हुई तेज बारिश के कारण बारिश की कमी में 2.5% का सुधार हुआ। मानसून-2026 सीजन सामान्य से 12.6% कम बारिश के साथ खत्म हुआ। देश के 43% जिलों में 20 से 72% तक कम बारिश हुई। सबसे ज्यादा पंजाब में 41% कम बारिश हुई। राजस्थान में करीब 22% कमी दर्ज की गई। इनके अलावा 9 राज्यों में भी औसत से कम बारिश हुई। पूर्वी भारत में ओडिशा में सामान्य से 30% ज्यादा बारिश हुई, जबकि बारिश के लिए प्रसिद्ध पूर्वोत्तर राज्यों में इस साल 1901 के बाद सबसे कम बारिश दर्ज की गई। पानी की कमी का असर महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, राजस्थान और तमिलनाडु में ज्यादा दिख रहा है। कई इलाकों में खेती के लिए पानी कम पड़ रहा है और फसलों को भी नुकसान हो रहा है। आजादी के साठ वर्षो के बाद भी देश की एक तिहाई जनता को पीने के लिए स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है। शायद यही कारण है कि प्रतिवर्ष जल जनित बीमारियों के चलते 15 लाख बच्चे काल के गाल में समा जाते है और काम के अनगिनत घंटों का नुकसान होता है। समस्या यह है कि केंद्र एवं राज्य सरकारें पेयजल संकट को दूर करने के लिए गंभीर नहीं, जबकि वे इससे परिचित है कि आने वाले समय में पानी के लिए युद्ध छिड़ सकते है। भारत में पेयजल संकट बढ़ती आबादी और कृषि की जरूरतों के कारण भी गंभीर होता जा रहा है। करीब 65-70 प्रतिशत जल कृषि कार्यो में खप जाता है। इसके अतिरिक्त उद्योगों के संचालन में भी जल का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। विडंबना यह है कि न तो उद्योग एवं कृषि क्षेत्र को अपनी आवश्यकता भर पानी उपलब्ध हो पा रहा है और न ही आम आदमी को। हमारे देश में जल संकट जब-तब गंभीर रूप ले लेता है। बात चाहे कावेरी जल विवाद के कारण तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच की तनातनी की हो अथवा यमुना जल के बंटवारे को लेकर दिल्ली एवं हरियाणा के बीच की, ऐसे विवाद लगातार बढ़ते जा रहे है। अब तो जल बंटवारे को लेकर राजनीति भी होने लगी है और एक प्रांत के लोगों को दूसरे प्रांत के लोगों के समक्ष खड़ा करने में संकोच नहीं किया जा रहा है। इन दिनों होगेंक्काल पेयजल परियोजना को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच यही हो रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार देश के 60 करोड़ लोग पानी की किल्लत से जूझ रहे हैं जबकि 16 करोड़ लोग गंदा पानी पी रहे हैं। शुद्ध पानी के लिए सरकार करोड़ों-अरबों रुपये खर्च कर रही है, लेकिन हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। देश के करीब 9 राज्यों में पानी की गुणवत्ता खराब है। नीति आयोग की कंपोजिट वॉटर मैनेजमेंट इंडेक्स रिपोर्ट में बताया गया कि भारत में पानी की वजह से हर साल दो लाख लोगों की मौत हो रही है। साल 2030 तक ये स्‍थ‍िति‍ और विकराल हो जाएगी जब देश की लगभग 40 फीसदी आबादी के सामने पानी का संकट होगा। विकसित भारत के 2047 के लक्ष्य तक देश में पेयजल की हालत का तो आकलन ही नहीं किया गया है। यूनाइटेड स्टेट्स जियोलॉजिकल सर्वे के वैश्विक स्तर पर कुल पानी की सालाना निकासी या खपत के मामले में भारत पहले पायदान नंबर-1 पर है। अत्यधिक आबादी और कृषि (सिंचाई) के कारण सबसे आगे है। वैश्विक जल गुणवत्ता सूचकांक में भारत 122 देशों में से 120वें स्थान पर है। सुरक्षित पेयजल और जल गुणवत्ता के मामले में भारत की गिनती दुनिया के सबसे निचले स्तर के देशों में होती है। पेयजल से लेकर जल संरक्षण की योजनाओं पर अत्यंत शिथिलता बरती जा रही है। दो वर्ष पूर्व आम बजट में ऐसी योजनाओं के लिए तमाम प्रावधान किए गए थे, लेकिन इस बजट में वे सिरे से गायब है। देश को विकसित राष्ट्र बनाने में जल संसाधन का उतना ही महत्व है जितना ऊर्जा और अन्य साधनों का। जब तक ऐसी बुनियादी सुविधाओं का समाधान नहीं होगा, तब तक विकसित राष्ट्र का सपना एक छलावा ही साबित होगा। - योगेन्द्र योगी

प्रभासाक्षी 12 Oct 2026 5:45 pm

भाजपा सांसद ने खुले पत्र के जरिए सपा प्रमुख से पूछे सवाल, समाजवादी आंदोलन के कार्यकर्ताओं को हिस्सेदारी देने पर मांगा जवाब

भाजपा सांसद ने खुले पत्र के जरिए सपा प्रमुख से पूछे सवाल, समाजवादी आंदोलन के कार्यकर्ताओं को हिस्सेदारी देने पर मांगा जवाब

समाचार नामा 12 Oct 2026 5:24 pm

भारत में सितंबर में खुदरा महंगाई 5.54 प्रतिशत रही

नई दिल्ली, भारत में सितंबर 2026 में खुदरा महंगाई सालाना आधार पर बढ़कर 5.54 प्रतिशत (प्रोविजनल) हो गई है।

देशबन्धु 12 Oct 2026 4:45 pm