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आरक्षण पर तेजस्वी यादव का BJP-NDA पर हमला, बोले- बड़े पदों पर SC-ST-OBC की हिस्सेदारी इतनी कम क्यों?

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समाचार नामा 2 Sep 2026 8:30 am

'निर्माण स्थलों पर सुरक्षा में लापरवाही बर्दाश्त नहीं', केरल मंत्री पीके बशीर का सख्त संदेश

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समाचार नामा 1 Sep 2026 11:27 pm

एलजी टीएस संधू ने 'वेस्ट-टू-वेल्थ' मॉडल अपनाने का आह्वान किया

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समाचार नामा 1 Sep 2026 9:19 pm

राम मंदिर ट्रस्ट विवाद पर विहिप की डैमेज कंट्रोल की कवायद, केंद्रीय सलाहकार ने संतों से की मुलाकात,

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समाचार नामा 1 Sep 2026 8:25 pm

'डेड इकोनॉमी' विवाद पर कांग्रेस नेता राकेश सिन्हा का पलटवार, बोले-जीडीपी आंकड़ों से नहीं छिपेगी जमीनी हकीकत

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समाचार नामा 1 Sep 2026 8:10 pm

'लोगों की बात सुनें, नियमों का पालन करें और काम की क्वालिटी सुनिश्चित करें', गुजरात सीएम की पंचायत प्रतिनिधियों से अपील

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समाचार नामा 1 Sep 2026 8:01 pm

भाजपा का 'बल्लारी चलो' मार्च: येदियुरप्पा ने कर्नाटक सरकार को उखाड़ फेंकने का लिया संकल्प

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समाचार नामा 1 Sep 2026 6:21 pm

'शुक्र है हम बिना वीजा के गोरखपुर जा सकते हैं', रवि किशन के 'स्पेन' वाले बयान पर चंद्रशेखर का तंज

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समाचार नामा 1 Sep 2026 6:11 pm

SCO के मंच से चीन और पाकिस्तान को एक साथ धोकर मोदी ने दुनिया की वाहवाही लूट ली

एससीओ शिखर सम्मेलन में वैसे तो सभी सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने अपने अपने संबोधन में तमाम तरह के मुद्दे उठाये लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन में शामिल मुद्दों की विविधता और सबको साथ लेकर चलने के जज्बे ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। साथ ही तमाम अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक भी यह देखकर हैरान हैं कि कैसे मोदी ने मंच पर साथ मौजूद चीन के राष्ट्रपति और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को जबरदस्त तरीके से घेर लिया। हम आपको बता दें कि शहबाज शरीफ के सामने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को कठघरे में खड़ा किया तो वहीं संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सवाल पर चीन को भी आड़े हाथ लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आतंकवाद पर मोदी ने दो टूक कहा कि जो देश आतंकियों को पनाह देते हैं और आतंकवाद को अपनी नीति के औजार के रूप में इस्तेमाल करते हैं, उन्हें स्पष्ट संदेश दिया जाना चाहिए कि आतंक कभी किसी की रणनीतिक संपत्ति नहीं बन सकता। वहीं कनेक्टिविटी के नाम पर संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से समझौते को अस्वीकार करते हुए उन्होंने चीन को भी साफ संदेश दिया। किर्गिज गणराज्य की राजधानी बिश्केक में 31 अगस्त से 1 सितंबर तक आयोजित 26वें शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन में भारत ने अपनी मौजूदगी को महज औपचारिक भागीदारी तक सीमित नहीं रखा। प्रधानमंत्री मोदी ने एससीओ के 25 वर्षों की यात्रा को अगले 25 वर्षों की दिशा तय करने के अवसर में बदलते हुए भारत का स्पष्ट एजेंडा सामने रखा। सिक्योरिटी, कनेक्टिविटी और अपॉर्च्युनिटी के जरिये मोदी का संदेश था कि अब केवल घोषणाओं और संवाद से काम नहीं चलेगा, बल्कि सहयोग को ठोस परिणामों में बदलना होगा। इसे भी पढ़ें: BRICS 2026: क्या विस्तार के बाद Global Economy की दिशा बदल पाएगा भारत? 11 देशों के Leaders पर टिकी नजरें प्रधानमंत्री के भाषण का सबसे धारदार हिस्सा आतंकवाद पर था। उन्होंने कहा कि आतंकवाद मानवता के लिए गंभीर चुनौती है और इसके खिलाफ कार्रवाई केवल घटना के बाद प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। आतंकवादी वित्तपोषण, भर्ती, कट्टरपंथ, सुरक्षित ठिकानों और पूरे आतंकी तंत्र को ध्वस्त करना होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि मोदी ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में किसी भी प्रकार के दोहरे मापदंड को स्वीकार करने से साफ इंकार किया। यह संदेश ऐसे मंच से आया, जहां पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ स्वयं मौजूद थे। भारत की कूटनीतिक उपलब्धि यहीं समाप्त नहीं हुई। एससीओ के 25 वर्ष पूरे होने पर स्वीकार की गई बिश्केक डिक्लेरेशन ने क्षेत्रीय सुरक्षा और आतंकवाद जैसे मुद्दों पर भारत की प्राथमिकताओं को मजबूती दी। घोषणा और शिखर सम्मेलन के अन्य फैसलों में आतंकवाद, उग्रवाद, संगठित अपराध तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय खतरों से निपटने के लिए सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया गया। सुरक्षा चुनौतियों और खतरों से निपटने के लिए यूनिवर्सल सेंटर संबंधी नियमों को मंजूरी देना सदस्य देशों के बीच समन्वय और सूचना आदान-प्रदान को मजबूत करने वाला कदम है। भारत के लिए विशेष महत्व की बात यह भी रही कि अंग्रेजी को एससीओ के संस्थागत ढांचे में शामिल करने की दिशा में प्रगति हुई। साथ ही भारत द्वारा आगे बढ़ाई गई कई पहलों जैसे- एससीओ सिविलाइजेशन डायलॉग फोरम, यंग साइंटिस्ट फोरम और यंग ऑथर्स कॉन्क्लेव को भी बिश्केक डिक्लेरेशन में स्थान मिला। यह संकेत है कि भारत अब एससीओ में केवल सुरक्षा संबंधी चिंताएं उठाने वाला देश नहीं, बल्कि संगठन के बौद्धिक, सांस्कृतिक और संस्थागत भविष्य को आकार देने वाला सक्रिय साझेदार बन रहा है। मोदी ने अपनी विदेश नीति की व्यापक सोच को भी भाषण में स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि यूरेशिया की सुरक्षा और शांति का संबंध अफगानिस्तान की स्थिरता से जुड़ा है और भारत वहां विकास तथा मानवीय सहायता जारी रखेगा। पश्चिम एशिया के संघर्षों का उदाहरण देते हुए उन्होंने आगाह किया कि आज की दुनिया में किसी एक क्षेत्र का युद्ध उसी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। उसका असर ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर पड़ता है, जिसका सबसे अधिक बोझ ग्लोबल साउथ को उठाना पड़ता है। इसलिए भारत का स्पष्ट मत है कि युद्धों और तनावों का समाधान रणभूमि पर नहीं, बल्कि संवाद और कूटनीति से होना चाहिए। प्रधानमंत्री ने नशे के कारोबार को भी क्षेत्रीय सुरक्षा का गंभीर खतरा बताया। उन्होंने कहा कि मादक पदार्थों की तस्करी केवल अपराध नहीं, बल्कि युवा पीढ़ी और क्षेत्रीय स्थिरता पर हमला है। इस संदर्भ में एससीओ के तहत सुरक्षा, संगठित अपराध, सूचना सुरक्षा और नारकोटिक्स से निपटने के लिए बनाए जा रहे केंद्रों को प्रभावी और त्वरित कार्रवाई का माध्यम बनाने पर जोर दिया गया। इस तरह आतंकवाद और नार्को-टेररिज्म के खिलाफ भारत की चिंता को व्यापक एससीओ एजेंडे से जोड़ने में सफलता मिली। कनेक्टिविटी पर भी मोदी का संदेश उतना ही स्पष्ट और कूटनीतिक रूप से अहम था। भारत बाजारों को जोड़ने, व्यापार बढ़ाने और विकास के नए रास्ते खोलने वाली सभी पहल का समर्थन करता है, लेकिन ऐसी किसी भी परियोजना के लिए सदस्य देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान अनिवार्य है। प्रधानमंत्री का यह संदेश चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड पहल और विशेष रूप से चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) के संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिसका एक हिस्सा पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (पीओके) से होकर गुजरता है। भारत लंबे समय से इस परियोजना का विरोध करता रहा है और इसे अपनी संप्रभुता का उल्लंघन मानता है। ऐसे में मोदी ने बिना किसी देश या परियोजना का नाम लिए एससीओ मंच से साफ कर दिया कि कनेक्टिविटी और विकास के नाम पर किसी देश की क्षेत्रीय अखंडता से समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता। साथ ही उन्होंने सड़क, रेल और हवाई संपर्क बढ़ाने के अलावा कस्टम प्रक्रियाओं को सरल बनाने, डिजिटल दस्तावेजीकरण को बढ़ावा देने और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। तीसरे स्तंभ यानि अपॉर्च्युनिटी के जरिए मोदी ने एससीओ सहयोग को आम लोगों से जोड़ने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि सफलता का वास्तविक पैमाना यह होना चाहिए कि युवाओं के लिए कितने अवसर बने, उद्यमियों के लिए कितने नए बाजार खुले, किसानों को तकनीक से कितना लाभ मिला और नागरिकों का जीवन कितना बेहतर हुआ। मोदी ने जोर दिया कि एससीओ सहयोग केवल सरकारों तक सीमित नहीं, बल्कि पीपुल-ड्रिवन पार्टनरशिप बनना चाहिए। इसी दिशा में भारत इस वर्ष पहले एससीओ सिविलाइजेशन डायलॉग फोरम की मेजबानी करेगा। इसके अलावा, शिखर सम्मेलन के इतर प्रधानमंत्री की द्विपक्षीय मुलाकातों ने भी भारत की सक्रिय कूटनीति को मजबूत किया। ताजिकिस्तान के राष्ट्रपति इमोमाली रहमोन के साथ विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा हुई, जबकि लाओस के राष्ट्रपति थोंगलून सिसौलिथ के साथ द्विपक्षीय संबंधों और संपर्क को मजबूत करने पर बातचीत हुई। ये मुलाकातें बताती हैं कि बहुपक्षीय मंचों पर भारत की रणनीति केवल भाषण देने की नहीं, बल्कि समानांतर रूप से द्विपक्षीय संबंधों का नेटवर्क मजबूत करने की भी है। बहरहाल, बिश्केक एससीओ समिट में मोदी ने आतंकवाद पर पाकिस्तान को घेरा, दोहरे मापदंडों को चुनौती दी, संप्रभुता आधारित कनेक्टिविटी का सिद्धांत दोहराया और भारत की सांस्कृतिक व युवा-केंद्रित पहलों को एससीओ के एजेंडे में स्थापित किया। उनका संदेश साफ था कि “शेयर्ड जियोग्राफी” को “शेयर्ड अपॉर्च्युनिटीज” में बदलना होगा, विजन को परिणामों में और सरकार-केंद्रित सहयोग को जन-केंद्रित साझेदारी में परिवर्तित करना होगा। कुल मिलाकर, बिश्केक से भारत ने यही संकेत दिया है कि बदलते यूरेशियाई समीकरणों में वह एजेंडा तय करने वाला देश बन चुका है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 1 Sep 2026 6:09 pm

केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान को जान से मारने की धमकी, गृह मंत्रालय से सुरक्षा बढ़ाने की मांग

केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान को जान से मारने की धमकी, गृह मंत्रालय से सुरक्षा बढ़ाने की मांग

समाचार नामा 1 Sep 2026 5:58 pm

न्यूयॉर्क में मोहन भागवत का संदेश- “E Pluribus Unum” से “वसुधैव कुटुम्बकम्” तक

न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का भाषण सुनकर अमेरिका की एक प्रचलित कहावत स्मरण हो आई “E Pluribus Unum”, “ई प्लूरिबस यूनम” अर्थात् ‘अनेक से एक’। भागवत जी ने अनेक ऐसे बिंदु चिह्नित किए जहाँ, “वसुधैव कुटुम्बकम्” और अमेरिकी “E Pluribus Unum” परस्पर पूरक और पर्याय सिद्ध होते हैं। सबसे बड़ी बात, उनका संदेश केवल अमेरिका में बसे भारतीयों के लिए नहीं था; उसमें भारत, भारतीयता, विविधता, सह-अस्तित्व और विश्व-मानवता के प्रति एक व्यापक दृष्टि का विकास क्रम था। भागवत जी ने अपने प्रबोधन में विविधता को भारत की शक्ति बताया। उन्होंने कहा कि भारत की एकता विविधताओं से सजती है और विविधता में केवल परस्पर एडजस्ट करना पर्याप्त नहीं है, विविधता को स्वीकार कर उसे सम्मान और संरक्षण भी देना होगा। यही भारतीय दर्शन है। धार्मिक, नस्लीय और सांस्कृतिक ध्रुवीकरण के चक्र फँसे वर्तमान विश्व हेतु यही आवश्यक है। मोहनराव जी के न्यूयॉर्क उद्बोधन से निकला सबसे महत्वपूर्ण संदेश हिंदू-मुस्लिम संबंधों पर स्पष्ट वक्तव्य था। उन्होंने दो टूक उस सोच को नकारा कि भारत में मुसलमानों के लिए कोई स्थान नहीं है। उन्होंने हिंदू और मुस्लिम समाज को साझा पूर्वजों से जोड़ते हुए “same DNA” की बात भी दोहराई। इसे भी पढ़ें: मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा: भारतीय चिंतन की सार्थक प्रस्तुति भारतीय-अमेरिकी समुदाय आज अमेरिका के सर्वाधिक सफल और प्रभावी प्रवासी समुदाय में से एक है। उसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध और अनेक भाषाई-सांस्कृतिक समूह शामिल हैं। यदि भारतीय मूल के लोग अपनी भारतीय पहचान को किसी एक धार्मिक पहचान तक सीमित न करके एक साझा सभ्यतागत पहचान के रूप में देखते हैं, तो अमेरिकी समाज में भारतीय समुदाय की एकता और प्रभाव दोनों बढ़ सकते हैं। भागवत का संदेश अमेरिका में भारतीय मूल की नई पीढ़ी के लिए विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है। पहली पीढ़ी के प्रवासी प्रायः भारत से भावनात्मक रूप से जुड़े रहते हैं, जबकि दूसरी और तीसरी पीढ़ी अमेरिकी सामाजिक परिवेश में पली-बढ़ी है। उनके सामने प्रश्न रहता है कि वे अपनी भारतीय सांस्कृतिक पहचान को अमेरिकी नागरिकता के साथ किस प्रकार संतुलित करें। भागवत का दृष्टिकोण इस प्रश्न का सकारात्मक उत्तर देता है, अमेरिका के प्रति पूर्ण निष्ठा और भारत की सभ्यतागत विरासत के प्रति सम्मान एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। ‘अपनी कर्मभूमि के प्रति निष्ठावान रहो’ विदेशी भूमि पर जाकर अपनों से यह कहने का सामर्थ्य, साहस और सहजता एक स्वयंसेवक या ‘संघ विचार’ के पास ही हो सकती है। यह विचार भारतीय-अमेरिकी समुदाय को “Hyphenated Identity” की समस्या से मुक्ति देकर एक आत्मविश्वासी नागरिक की पहचान देता है। मोहन भागवत जी के कहे पर चलें तो अमेरिकी भारतीय युवा श्रेष्ठ अमेरिकी होते हुए भी अपनी भारतीय जड़ों पर गर्व कर सकते हैं। भागवतजी ने भारतीयता को केवल धार्मिक आग्रह के रूप में नहीं बल्कि साझा सांस्कृतिक और मानवीय विरासत के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया। विश्व में अमेरिका अब एक सर्वाधिक विविधता भरा समाज बन गया है। अमेरीका को सौजन्यशाली विविधता देने में भारत का सबसे बड़ा योगदान है। अमेरिका में बसे अनेक प्रकार के भारतीय समुदाय आज अमेरिकी समाज को एक इंद्रधनुष का रूप देते हैं। यह हमारे लिए गौरान्वित करने वाला विषय है। भारतीय-अमेरिकी समुदाय अमेरिका की अर्थव्यवस्था, तकनीक, चिकित्सा, शिक्षा, उद्यमिता और सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण योगदान देता है। यदि इस समुदाय में सांस्कृतिक आत्मविश्वास और सामाजिक समरसता बढ़ती है तो उसका लाभ अमेरिकी समाज को भी मिलेगा। संघ प्रमुख ने भारतीय संस्कृति के प्रत्येक के रूप में तीन शब्द कहे “Acceptance, Respect and Protection”। उनके भाषण से यह पुनः सिद्ध हुआ कि ‘सहिष्णुता’ ‘Tolerance’ भारतीय शब्द है ही नहीं। भारतीयता का मूल स्वर है स्वीकार्यता। ‘सहिष्णुता’ ‘Tolerance’ से तो अहम् व्यक्त होता है। ‘सहिष्णुता’ शब्द से स्वर आता है कि “तुम मुझे पसंद नहीं किंतु फिर भी तुम यहाँ रह लो”। Acceptance और Respect का अर्थ है, सभी समुदाय को स्वीकारता हूँ और उनका सम्मान करता हूँ। सरसंघचालक के न्यूयार्क प्रवास के विषय में जोहरान ममदानी तो मध्ययुगीन मुस्लिम सिद्ध हो गए हैं। जोहरान ममदानी ने अप्रासंगिक बातें करके न्यूयार्क के मेयर पद की गरिमा को ही ध्वस्त कर दिया। ममदानी को पता ही नहीं कि भारत का दृष्टिकोण “Pluralistic” और “Secular republic” से बहुत आगे बढ़कर “वयं राष्ट्रे जागृयाम” का है। जिस प्रकार के शब्द ममदानी ने कहे हैं, उससे तो लगता है वे अपनी दिमागी हालत की चिंता करें, भारत की नहीं। यदि ममदानी के मूल्य लोकतांत्रिक नहीं हैं। वे इस कार्यक्रम के निजी स्थान, सार्वजनिक स्थान, कार्यक्रम रोकने जैसे शब्दों को प्रयोग करके ‘फासिस्ट’ और ‘मध्ययुगीन मुस्लिम’ सिद्ध हो गए हैं। जोहरान ममदानी ने अमेरिका के नागरिक और न्यूयार्क के मेयर की गरिमा के विरुद्ध जाकर यह व्यक्त किया कि यदि उनके पास अधिकार होते तो वे संघ प्रमुख को न्यूयार्क में भाषण ही नहीं देने देते। इससे अधिक शर्मनाक और वैचारिक निर्धनता भला और क्या हो सकती है। सरसंघचालक जी के भाषण के पूर्व ही “Exclusionary” जैसे शब्दों का प्रयोग करने वाले ममदानी इस भाषण के बाद अब वैचारिक रूप से कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं रह गए हैं। न्यूयॉर्क के मेयर से नहीं किंतु ममदानी के घर जाकर आज उनसे प्रश्न किया जाना चाहिए कि वे अमेरिकी लोकतांत्रिक विचारों से इतने भिन्न क्यों हैं? और यदि वे न्यूयार्क नगर की सभ्यता, संस्कृति और सहजता को आत्मसात नहीं कर पा रहें हैं तो वे मेयर पद पर टिके ही क्यों हैं? जोहरान ममदानी ने तो न्यूयार्क में “Free Speech” के अधिकार पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया है। भागवत जी के न्यूयॉर्क भाषण ने हिंदुत्व, हिंदू संस्कृति, भारतीय सभ्यता, भारतीय सर्वसमावेशिकता, सर्व स्पर्शिता को बड़ी सहजता से स्थापित किया है। यद्यपि यह पहले भी स्थापित ही थी किंतु अब इसे एक नया आयाम मिल गया है। भारत के संदर्भ में अमेरिका में एक नए विमर्श का आरम्भ है, भागवत जी का यह वैचारिक प्रबोधन। “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति”, “वसुधैव कुटुम्बकम्” और विविधता में एकता की परंपरा को मैडिसन स्क्वेयर से पुनर्परिभाषित करने हेतु मोहन राव जी का अभिनंदन कर रहा है ‘अमेरिकी भारतीय’ समुदाय। अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करने का अर्थ दूसरे की पहचान से घृणा करना नहीं है, यह सिद्ध करने हेतु भी वे अभिनन्दनीय हैं। अमेरिका कहावत “E Pluribus Unum”, अर्थात् ‘अनेक से एक’, को स्थापित करता और भारतीयता के मूल से जोड़ता यह संघ संवाद एक अद्भुत सार्थकता, स्वीकार्यता, सहजता व सामुदायिकता के भाव को जन्म देता है। कहना ही होगा कि यदि शिकागो से अमेरिका और समूचे विश्व को स्वामी विवेकानंद जी ने एक वैचारिक माला दी थी तो मोहन राव जी भागवत ने इस ‘विवेकानंद माला’ का पुनर्जाप ही किया है। - डॉ. प्रवीण दाताराम

प्रभासाक्षी 1 Sep 2026 5:56 pm

सपाट बंद हुआ शेयर बाजार, आईटी शेयरों में दिखी खरीदी

मुंबई, भारतीय शेयर बाजार मंगलवार के कारोबारी सत्र में करीब सपाट बंद हुआ। दिन के अंत में सेंसेक्स 12.99 अंक या 0.02 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 76,944.28 और निफ्टी 24.60 अंक या 0.10 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 24,055.80 पर था।

देशबन्धु 1 Sep 2026 5:14 pm

मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा: भारतीय चिंतन की सार्थक प्रस्तुति

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत की अगस्त 2026 की अमेरिका यात्रा को केवल प्रवासी भारतीयों के एक कार्यक्रम तक सीमित करके देखना उसके व्यापक अर्थ को छोटा करना होगा। न्यूयार्क में 29 अगस्त को आयोजित ‘एक विश्व, एक मानवता’ कार्यक्रम में उनका संबोधन ऐसे समय हुआ, जब संघ को लेकर भारत ही नहीं, विदेशों में भी अनेक धारणाएं, आरोप और पूर्वाग्रह सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बने हुए हैं। ऐसे वातावरण में भागवत ने जिस प्रकार विविधता, संवाद, सेवा, सह-अस्तित्व और मानवीय एकात्मता को केंद्र में रखा, उसने संघ की विचारधारा को उसके समर्थकों के लिए ही नहीं, बल्कि वैश्विक समाज के सामने भी एक अलग दृष्टि से प्रस्तुत किया। यह यात्रा इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि संघ अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है और उसके विचार अब भारत की सीमाओं से बाहर भी व्यापक चर्चा का विषय बन रहे हैं। भागवत का अमेरिका जाना वस्तुतः संघ के विचार को प्रत्यक्ष संवाद के माध्यम से समझाने का अवसर बना। संघ के बारे में भारत में लंबे समय से दो विपरीत धारणाएं दिखाई देती रही हैं। एक पक्ष उसे भारतीय संस्कृति, राष्ट्रभावना, सेवा और सामाजिक संगठन की विराट शक्ति मानता है, जबकि दूसरा पक्ष उसके विचारों को संकीर्ण धार्मिक राजनीति से जोड़कर देखता है। कांग्रेस सहित विभिन्न विपक्षी दलों ने समय-समय पर संघ और उसके विचारों पर गंभीर राजनीतिक प्रश्न उठाए हैं। अमेरिका में भी कार्यक्रम से पहले कुछ संगठनों और राजनीतिक व्यक्तियों ने भागवत की यात्रा और संघ की विचारधारा पर आपत्तियां व्यक्त कीं। ऐसे माहौल में किसी संस्था की वास्तविक छवि केवल आरोप-प्रत्यारोप से नहीं बनती, वह संवाद से बनती है। यही इस यात्रा का सबसे बड़ा महत्व है। भागवत ने अपने विचार विरोधियों पर आक्रमण करके नहीं, बल्कि भारतीय चिंतन की व्याख्या करके सामने रखे। इससे संघ को लेकर बनी धारणाओं पर बहस का एक नया आधार तैयार हुआ। न्यूयार्क में भागवत के वक्तव्य का सबसे अधिक चर्चित पक्ष उनका हिंदू-मुस्लिम संबंधों पर स्पष्ट कथन रहा। उन्होंने कहा कि यदि कोई हिंदू यह मानता है कि भारत में मुसलमानों के लिए स्थान नहीं होना चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रह सकता। यह कथन राजनीतिक नारे से अधिक महत्वपूर्ण इसलिए है कि इसमें हिंदुत्व की उनकी व्याख्या को सामाजिक समावेश के साथ जोड़ा गया है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि सत्य एक है और उसे समझने तथा व्यक्त करने के मार्ग अलग-अलग हो सकते हैं। भारतीय परंपरा की यही विशेषता है कि वह मतभिन्नता को अस्तित्व के संकट के रूप में नहीं, बल्कि सत्य की विविध अभिव्यक्तियों के रूप में देखने की क्षमता रखती है। यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है-यदि हिंदुत्व का अर्थ भारत की सांस्कृतिक चेतना है, तो क्या वह किसी समुदाय को भारत से बाहर कर सकता है? भागवत का उत्तर स्पष्ट रूप से नकारात्मक दिखाई देता है। उनका कथन हिंदुत्व की उस व्याख्या को सामने रखता है, जिसमें भारतीयता किसी एक पूजा-पद्धति की बपौती नहीं, बल्कि साझा सांस्कृतिक विरासत है। इसे भी पढ़ें: Prabhasakshi NewsRoom: Muslims पर Bhagwat के बयान के बाद BJP ने Rajasthan में 8 मुसलमानों को थमाए टिकट, UP में भी दिखेगा बदलाव! भागवत ने अमेरिका में भारत की विविधता को उसकी कमजोरी नहीं, शक्ति बताया। उनके अनुसार विविधता और एकता भारत के स्वभाव में ही अंतर्निहित हैं। भारत में भाषा, जाति, पंथ, पूजा-पद्धति और परंपराओं की असंख्य धाराएं हैं, फिर भी इन्हें एक साझा सभ्यतागत चेतना जोड़ती रही है। यह संदेश आज के विश्व के लिए अत्यंत प्रासंगिक है। अनेक देशों में धार्मिक पहचान, नस्लीय भेद, सांस्कृतिक असहमति और राजनीतिक ध्रुवीकरण सामाजिक तनाव बढ़ा रहे हैं। ऐसे समय भारत का अनुभव यह बताता है कि भिन्नताओं को मिटाना आवश्यक नहीं, उन्हें सम्मान देकर भी एकता स्थापित की जा सकती है। यही विचार भागवत के संबोधन को सामान्य राजनीतिक भाषण से ऊपर उठाता है। उनका आग्रह था कि विविधता को स्वीकार ही नहीं, सम्मान और संरक्षण भी मिलना चाहिए। संघ की सार्वजनिक छवि का एक बड़ा हिस्सा राजनीतिक विमर्श से निर्मित हुआ है, जबकि संघ स्वयं को सामाजिक संगठन और सेवा-आधारित सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में प्रस्तुत करता रहा है। भागवत ने अमेरिका में भी सेवा, सामाजिक समरसता और संवाद को परिवर्तन का आधार बताया। यही वह बिंदु है जहां संघ की छवि को केवल चुनावी राजनीति के चश्मे से देखने की सीमा सामने आती है। किसी संगठन को समझने के लिए उसके राजनीतिक प्रभाव के साथ उसकी सामाजिक गतिविधियों, सेवा-कार्य, संगठनात्मक संस्कृति और वैचारिक आधार को भी देखना आवश्यक है। भागवत की यात्रा ने कम से कम इतना अवसर अवश्य दिया कि संघ को उसके अपने शब्दों और उसके सरसंघचालक की प्रत्यक्ष व्याख्या के आधार पर सुना जाए। अमेरिका में बसे भारतीयों से भागवत ने एक संतुलित संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जिस देश में वे रह रहे हैं, वह उनकी कर्मभूमि है और वहां के प्रति उनकी निष्ठा तथा दायित्व सर्वोपरि हैं। साथ ही भारत उनकी जन्मभूमि है, जिससे उन्हें मानवीय मूल्यों और सांस्कृतिक संस्कारों की विरासत मिली है। यह दृष्टि प्रवासी भारतीयों के सामने पहचान के संघर्ष के बजाय पहचान के समन्वय का मार्ग रखती है। अपनी जड़ों से जुड़े रहना और जिस समाज में रह रहे हैं उसके प्रति पूर्ण निष्ठा रखना-दोनों एक साथ संभव हैं। यही भारतीय संस्कृति की उदारता है। यह भी तथ्य है कि भागवत के कार्यक्रम का अमेरिका में विरोध हुआ और संघ की विचारधारा को लेकर तीखी आलोचनाएं सामने आईं। लेकिन लोकतांत्रिक समाज में किसी विचार का उत्तर उसे दबाकर नहीं, उसके साथ संवाद करके दिया जाता है। इस दृष्टि से यह यात्रा संघ के लिए भी एक परीक्षा थी। भागवत ने विरोध का उत्तर आक्रामक भाषा में देने के बजाय एकात्मता, मानवता और सह-अस्तित्व की बात की। यही इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है। आलोचक उनके शब्दों और संघ के व्यवहार के बीच अंतर का प्रश्न उठा रहे हैं, समर्थक इसे संघ के मूल विचारों की स्पष्ट अभिव्यक्ति मान रहे हैं। इस बहस का अंतिम निर्णय समय और व्यवहार करेगा, लेकिन इतना निश्चित है कि बहस अब अधिक प्रत्यक्ष और वैश्विक हो गई है। मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा को संघ की छवि पर वर्षों से चले आ रहे विवाद का अंतिम उत्तर मानना अतिशयोक्ति होगी। किंतु इसे एक महत्वपूर्ण मोड़ अवश्य कहा जा सकता है। जिन लोगों ने संघ को केवल राजनीतिक आरोपों और विरोधी व्याख्याओं के माध्यम से जाना है, उन्हें पहली बार इतने बड़े वैश्विक मंच पर उसके शीर्ष नेतृत्व की विचार-दृष्टि को सीधे सुनने का अवसर मिला। यह यात्रा संघ के लिए एक उजाला इसलिए बनी है कि इसमें प्रतिरक्षा की भाषा कम और आत्मविश्वास की भाषा अधिक दिखाई दी। इसमें यह कहने का प्रयास था कि भारतीयता किसी के निषेध से नहीं, सबके सम्मान से मजबूत होती है, हिंदुत्व किसी समुदाय के बहिष्कार से नहीं, मानवता की एकात्म दृष्टि से सार्थक होता है और भारत की शक्ति उसकी समानता में नहीं, उसकी विविधताओं के बीच बनी रहने वाली सांस्कृतिक एकता में है। आज विश्व को केवल आर्थिक शक्ति, सैन्य शक्ति और तकनीकी प्रगति की आवश्यकता नहीं है। उसे ऐसा जीवन-दर्शन भी चाहिए जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ सके। भागवत के अमेरिकी संबोधन में भारत की इसी भूमिका की कल्पना दिखाई दी-एक ऐसा भारत जो अपनी परंपरा के बल पर विश्व को सह-अस्तित्व, संवाद और एकात्मता का रास्ता दिखा सके। मोहन भागवत की यह यात्रा इसलिए स्मरणीय रहेगी कि उसने संघ के बारे में चल रही बहस को भारत की सीमाओं से निकालकर विश्व के सार्वजनिक विमर्श में पहुंचा दिया। अब संघ की पहचान केवल उसके विरोधियों के आरोपों या समर्थकों के दावों से नहीं, बल्कि उसके विचार, उसके व्यवहार और समाज के साथ उसके संवाद से तय होगी। अंततः किसी विचारधारा की सबसे बड़ी शक्ति उसका प्रचार नहीं, उसका आचरण होता है। अमेरिका की धरती से भागवत ने जो संदेश दिया है, उसकी वास्तविक कसौटी भारत की धरती पर सामाजिक समरसता, सेवा, संवाद और सह-अस्तित्व के रूप में दिखाई देगी। यदि यह संदेश व्यवहार में उतरता है, तो यह केवल संघ की छवि को नहीं, भारत की वैश्विक सांस्कृतिक प्रतिष्ठा को भी नई ऊंचाई दे सकता है। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

प्रभासाक्षी 1 Sep 2026 4:33 pm

तेलंगाना भाजपा अध्यक्ष रामचंदर राव हैदराबाद में गिरफ्तार, नलगोंडा जाने से रोका

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समाचार नामा 1 Sep 2026 3:24 pm

सीएम भूपेंद्र पटेल ने 7.8 प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ की तारीफ की, पीएम मोदी ने 'स्वदेशी' को बढ़ावा देने पर दिया जोर

सीएम भूपेंद्र पटेल ने 7.8 प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ की तारीफ की, पीएम मोदी ने 'स्वदेशी' को बढ़ावा देने पर दिया जोर

समाचार नामा 1 Sep 2026 2:38 pm

भारत- जीएसटी संग्रह अगस्त में बढ़कर 2 लाख करोड़ रुपए रहा

नई दिल्ली, भारत का सकल वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह अगस्त 2026 में सालाना आधार पर 14.8 प्रतिशत बढ़कर 1,99,853 करोड़ रुपए हो गया है, जो कि पिछले साल समान अवधि में 1,74,116 करोड़ रुपए था। यह जानकारी मंगलवार को जारी किए गए सरकारी डेटा में दी गई।

देशबन्धु 1 Sep 2026 2:38 pm

BRICS 2026: क्या विस्तार के बाद Global Economy की दिशा बदल पाएगा भारत? 11 देशों के Leaders पर टिकी नजरें

12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली का भारत मंडपम 18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने जा रहा है। वर्ष 2006 में बने इस समूह के 20 साल पूरे होने के मौके पर आयोजित यह बैठक बेहद अहम है। दुनिया की 45 प्रतिशत से ज्यादा आबादी और करीब 30 फीसदी वैश्विक अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधित्व करने वाला यह मंच आज एक ताकतवर गुट बन चुका है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब वैश्विक नेताओं की मेजबानी करेंगे, तो भारत के सामने कई कूटनीतिक चुनौतियां होंगी। बदलते वैश्विक व्यापार नियमों और पश्चिम एशिया के संकट के बीच नई दिल्ली के लिए यह अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखने, 'ग्लोबल साउथ' की आवाज बनने और ब्रिक्स को पश्चिमी-विरोधी धड़े में तब्दील होने से बचाने का एक बड़ा इम्तिहान होगा। इसे भी पढ़ें: ब्रिक्स सम्मेलन के कारकेड रिहर्सल से दिल्ली की 35 से अधिक सड़कों पर मंगलवार को बदलेगा ट्रैफिक ब्रिक्स 2026 क्यों ऐतिहासिक है? भारत ने इस साल 1 जनवरी को ब्राज़ील से ब्रिक्स की बारी-बारी से मिलने वाली अध्यक्षता औपचारिक रूप से संभाली। अध्यक्षता की आधिकारिक थीम - मज़बूती, इनोवेशन, सहयोग और सस्टेनेबिलिटी के लिए निर्माण से प्रेरित होकर, नई दिल्ली ने अपनी अध्यक्षता को मानवता सर्वोपरि की भावना पर आधारित, इंसान-केंद्रित नज़रिए के इर्द-गिर्द तैयार किया है। नेताओं का यह दो-दिन का शिखर सम्मेलन, साल भर चले एक बड़े डिप्लोमैटिक अभियान का नतीजा है। भारत की अध्यक्षता में, देश भर के 25 शहरों में 350 से ज़्यादा मंत्री-स्तरीय, वर्किंग-ग्रुप और ट्रैक-टू बैठकें हुईं। इन तैयारियों में तीन मुख्य पहलू शामिल थे: राजनीतिक और सुरक्षा सहयोग, आर्थिक और वित्तीय गवर्नेंस, और सांस्कृतिक व लोगों के बीच आपसी आदान-प्रदान। इनसे पहले हुई अहम बैठकों में मई में नई दिल्ली में ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक और अगस्त में पुणे में ब्रिक्स इन्फॉर्मेशन एंड कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजीज़ (ICT) ट्रैक की बैठक शामिल हैं। नई दिल्ली का यह शिखर सम्मेलन इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि यह इस ग्रुप के औपचारिक रूप से ब्रिक्स+ में विस्तार के बाद नेताओं का पहला पूर्ण-स्तरीय शिखर सम्मेलन है। ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ़्रीका जैसे संस्थापक सदस्यों के अलावा, अब मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया भी इसके सदस्य बन गए हैं। सम्मेलन के विस्तारित सत्रों में कई आमंत्रित सदस्य और क्षेत्रीय अध्यक्ष भी हिस्सा लेंगे जिनमें BIMSTEC, ASEAN, अफ़्रीकी संघ और खाड़ी सहयोग परिषद के नेता शामिल हैं। इसे भी पढ़ें: Sleeper Bus में Teenager से Gangrape! Rahul Gandhi का सरकारों पर वार, कहा- पर्दे बस में नहीं, नाकामियों पर हैं गैर-पश्चिमी, पश्चिमी-विरोधी नहीं: भारत की रणनीतिक पहचान जब भारतीय राजनयिक शिखर सम्मेलन के घोषणा-पत्र को अंतिम रूप दे रहे हैं, तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती वैचारिक है। 11 सदस्यों वाले इस बड़े समूह में इस बात को लेकर बुनियादी मतभेद हैं कि ब्रिक्स को कैसा होना चाहिए। मॉस्को और बीजिंग ब्रिक्स को पश्चिमी दबदबे को चुनौती देने, G7 के प्रभुत्व का मुकाबला करने और पश्चिमी प्रभाव से मुक्त एक वैकल्पिक आर्थिक ढांचा तैयार करने के लिए एक मुख्य भू-राजनीतिक साधन के रूप में देखते हैं। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग लगातार इस बात पर ज़ोर देते रहे हैं कि इस समूह में पश्चिमी प्रतिबंधों और सुरक्षा गठबंधनों का मुकाबला करने की क्षमता है। इसके विपरीत, भारत इस बात को नहीं मानता कि ब्रिक्स को पश्चिमी-विरोधी टकराव वाले गठबंधन के तौर पर काम करना चाहिए। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बार-बार नई दिल्ली का रुख स्पष्ट किया है: ब्रिक्स गैर-पश्चिमी है, पश्चिमी-विरोधी नहीं। भारत का रणनीतिक हित इस बात में है कि वह ब्रिक्स (BRICS) का इस्तेमाल मौजूदा ग्लोबल संस्थाओं जैसे यूनाइटेड नेशंस, इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड और वर्ल्ड बैंक — में सुधार लाने के लिए करे, न कि उन्हें खत्म करके ध्रुवीकृत और कोल्ड-वॉर जैसे गुटों में बंटी दुनिया बनाए। संतुलन बनाने की इस कोशिश में भारत की एक खास स्थिति है: वह अकेला ऐसा देश है जो ब्रिक्स और क्वाड्रिलैटरल सिक्योरिटी डायलॉग (Quad) जिसमें अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया भी शामिल हैं दोनों का सक्रिय सदस्य है। एक तरफ भारत इंडो-पैसिफिक समुद्री सुरक्षा, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और डिफेंस सप्लाई चेन के मामलों में वॉशिंगटन और यूरोप की राजधानियों के साथ मिलकर काम करता है, तो दूसरी तरफ वह नई दिल्ली में रूस, चीन और ईरान के साथ भी एक ही मेज पर बैठता है। बड़ी ताकतों के बीच संतुलन: बीजिंग, मॉस्को और वॉशिंगटन इस समिट की मेज़बानी करने के लिए नई दिल्ली को दुनिया की बड़ी ताकतों के साथ जटिल द्विपक्षीय मतभेदों को संभालना होगा और साथ ही बहुपक्षीय नतीजों की दिशा में भी आगे बढ़ना होगा। चीन के साथ समीकरण सैन्य बातचीत के बाद 'लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल' (LAC) पर धीरे-धीरे सेना पीछे हटने के बावजूद, भारत और चीन के बीच बुनियादी तनाव अभी भी बना हुआ है। आर्थिक प्रतिस्पर्धा, सीमा सुरक्षा और दक्षिण एशिया में बीजिंग का बढ़ता प्रभाव, दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित कर रहे हैं। ब्रिक्स (BRICS) के संदर्भ में, भारत इस बात को लेकर सतर्क है कि चीन इस बड़े हुए समूह का इस्तेमाल अपनी क्षेत्रीय पहलों को आगे बढ़ाने या ब्रिक्स को बीजिंग की विदेश नीति के लक्ष्यों का समर्थन करने वाला मंच बनाने के लिए न करे।

प्रभासाक्षी 1 Sep 2026 1:54 pm

Jan Gan Man: Manusmriti को पढ़े बिना ही उसके पीछे क्यों पड़ गये हैं Rahul Gandhi? हर मुद्दे में जाति का कोण क्यों ढूँढ़ने लगी है Congress?

कांग्रेस नेता राहुल गांधी लगातार ऐसे मुद्दों को उठा रहे हैं, जिनके जरिए वह दलितों, पिछड़ों, महिलाओं और युवाओं के बीच एक नया सामाजिक गठजोड़ तैयार करना चाहते हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या देश को आगे ले जाने की राजनीति अतीत के विवादों को लगातार कुरेदकर होगी, या भविष्य के भारत की चुनौतियों का समाधान खोजकर? राहुल गांधी के हालिया बयानों और राजनीतिक गतिविधियों से यह संकेत मिलता है कि कांग्रेस अब एक नए सामाजिक समीकरण पर काम कर रही है। उनकी राजनीति का निशाना दलित, ओबीसी, महिलाएं, जेन-जी और अल्पसंख्यक हैं। पुणे के कार्यक्रम में महिलाओं के अधिकारों पर बात करते हुए राहुल गांधी ने पितृसत्ता को चुनौती देने की बात की और आरएसएस तथा भाजपा पर “मनुस्मृति की मानसिकता” रखने का आरोप लगाया। इसे भी पढ़ें: PM Modi Instagram New Reel | 'झूठ की गूंज' 7.8% की इकोनॉमिक ग्रोथ को नहीं छिपा सकती, इंस्टाग्राम पर PM मोदी का राहुल गांधी पर तंज देखा जाये तो महिलाओं की सुरक्षा, शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता और निर्णय लेने की क्षमता जैसे मुद्दे निस्संदेह महत्वपूर्ण हैं। इन पर जितनी गंभीर चर्चा हो, उतना बेहतर है। लेकिन सवाल यह है कि महिलाओं के आधुनिक अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए क्या हर बार हजारों वर्ष पुराने ग्रंथों को राजनीतिक कठघरे में खड़ा करना आवश्यक है? राहुल गांधी ने पुणे में महिलाओं से संवाद किया। उन्होंने महिलाओं की सुरक्षा, शिक्षा, आर्थिक कठिनाइयों और स्वतंत्र निर्णय लेने की समस्याओं को सुना। यह लोकतांत्रिक राजनीति का स्वाभाविक और स्वागतयोग्य हिस्सा है। लेकिन इसी विमर्श में मनुस्मृति को प्रमुख राजनीतिक हथियार बनाना एक अलग राजनीतिक संदेश देता है। साथ ही ऐसा लगता है कि राहुल गांधी मनुस्मृति का मुद्दा उठाकर दलित समाज तक भी पहुंच बनाना चाहते हैं। इसका ऐतिहासिक कारण भी है। 1927 में डॉ. बीआर आंबेडकर ने मनुस्मृति का दहन किया था और जातिगत भेदभाव तथा असमानता के विरुद्ध संघर्ष को एक मजबूत वैचारिक आधार दिया था। राहुल गांधी संभवतः इसी ऐतिहासिक स्मृति और वर्तमान के कथित असंतोष को एक साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। यानी महिला अधिकारों का मुद्दा, दलित अस्मिता का प्रश्न और जातिगत न्याय की राजनीति, तीनों को एक साझा राजनीतिक नैरेटिव में पिरोने का प्रयास हो रहा है। लेकिन यहां राहुल गांधी की राजनीति पर गंभीर सवाल उठता है। क्या हर सामाजिक समस्या का समाधान जाति के चश्मे से ही खोजा जाएगा? भारत आज 21वीं सदी की तीसरे दशक में है। देश कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष तकनीक, डिजिटल अर्थव्यवस्था, आधुनिक शिक्षा, रोजगार, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे समय में राजनीति का मुख्य प्रश्न यह होना चाहिए कि भारत अगले 25 वर्षों में दुनिया की अग्रणी शक्ति कैसे बनेगा? लेकिन राहुल गांधी की राजनीति बार-बार समाज को उसके पुराने जातीय खांचों में वापस ले जाती दिखाई देती है। ऐसे में कानूनविद और भारत के विधि आयोग के पूर्व सदस्य तहिर महमूद की टिप्पणी महत्वपूर्ण हो जाती है। महमूद का कहना है कि मनुस्मृति जैसे प्राचीन ग्रंथों को उनके ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए। केवल औपनिवेशिक काल में किए गए अंग्रेजी अनुवादों के आधार पर उनकी अंतिम व्याख्या कर देना उचित नहीं है। हम आपको बता दें कि महिलाओं के संबंध में मनुस्मृति के उस प्रसिद्ध श्लोक को अक्सर उद्धृत किया जाता है, जिसमें बचपन में पिता, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र द्वारा महिला की “रक्षा” की बात कही गई है। आधुनिक दृष्टि से यह व्यवस्था निश्चित रूप से महिलाओं की पूर्ण व्यक्तिगत स्वतंत्रता के विचार से मेल नहीं खाती। लेकिन तहिर महमूद का तर्क है कि इसमें प्रयुक्त संस्कृत शब्दों और उनके अनुवाद को लेकर गंभीर मतभेद हैं। उनके अनुसार, “रक्षा” का अर्थ केवल नियंत्रण नहीं, बल्कि सुरक्षा और संरक्षण भी हो सकता है। दरअसल, औपनिवेशिक दौर के कुछ शाब्दिक अनुवादों ने यह धारणा मजबूत की कि मनुस्मृति महिलाओं को स्वतंत्रता के योग्य ही नहीं मानती। महमूद का तर्क है कि इसे दूसरे दृष्टिकोण से भी समझा जा सकता है कि महिला को जीवन के किसी भी चरण में असुरक्षित या बेसहारा नहीं छोड़ा जाना चाहिए। इस व्याख्या से सहमत होना या असहमत होना अलग बात है, लेकिन एक तथ्य महत्वपूर्ण है कि प्राचीन संस्कृत ग्रंथों की व्याख्या कोई टीवी डिबेट की तात्कालिक राजनीतिक बहस नहीं है। यह भाषा, इतिहास, समाज और विधि की गंभीर विशेषज्ञता का विषय है। किसी एक श्लोक को संदर्भ से काटकर पूरे ग्रंथ का अंतिम फैसला सुना देना बौद्धिक दृष्टि से भी उचित नहीं है। हम आपको बता दें कि तहिर महमूद ने एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है। उनके अनुसार, मनुस्मृति और अन्य धर्मशास्त्रों को सामान्य रूप से “हिंदू कानून” कहना भी काफी हद तक ब्रिटिश शासनकाल की वर्गीकरण पद्धति का परिणाम है। जिस दौर में ये ग्रंथ लिखे गए, उस समय आज जैसी आधुनिक धार्मिक पहचान और कानूनी व्यवस्था मौजूद नहीं थी। महमूद का तर्क है कि जिस प्रकार रोमन कानून को केवल “ईसाई कानून” नहीं कहा जाता, उसी तरह प्राचीन भारतीय कानूनी और सामाजिक ग्रंथों को भी केवल आधुनिक धार्मिक पहचान के संकीर्ण दायरे में नहीं बांधा जाना चाहिए। यह दृष्टिकोण विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि औपनिवेशिक शासन ने भारत को समझने के लिए कई कठोर श्रेणियां बनाई थीं। अंग्रेजों ने हिंदू, मुस्लिम, जाति, कानून और समुदाय की ऐसी परिभाषाएं बनाईं, जिन्हें बाद में भारतीय राजनीति ने भी अपना लिया। विडंबना यह है कि आज भी कई राजनीतिक बहसें उन्हीं औपनिवेशिक व्याख्याओं के आधार पर चल रही हैं। यहां कोई भ्रम नहीं होना चाहिए कि भारत, भारतीय संविधान से चलता है। संविधान सर्वोपरि है। समानता, स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय और महिलाओं के अधिकार आधुनिक भारत की मूल संवैधानिक प्रतिबद्धताएं हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि संविधान की सर्वोच्चता सिद्ध करने के लिए भारत के हर प्राचीन ग्रंथ और पूरी ऐतिहासिक विरासत को राजनीतिक खलनायक बना दिया जाए। प्राचीन ग्रंथों में ऐसी अनेक बातें हो सकती हैं जो आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं हैं। उन्हें आधुनिक कानून नहीं बनाया जा सकता और न ही बनाया जाना चाहिए। समाज बदलता है, कानून बदलते हैं और मूल्यों की व्याख्या भी बदलती है। लेकिन किसी प्राचीन ग्रंथ की आलोचना और उस ग्रंथ को राजनीतिक हथियार बनाकर वर्तमान समाज में विभाजन पैदा करने में अंतर है। देखा जाये तो राहुल गांधी की सबसे बड़ी राजनीतिक समस्या शायद यही है कि वह हर महत्वपूर्ण प्रश्न में जातिगत कोण खोजने लगते हैं। जाति जनगणना हो, आरक्षण हो, दलित प्रतिनिधित्व हो या अब मनुस्मृति, उनकी राजनीति का केंद्रीय संदेश लगभग एक ही है कि भारत की हर समस्या का मूल जाति व्यवस्था में खोजिए। इसमें कोई दो राय नहीं कि जातिगत भेदभाव भारत की एक वास्तविक और गंभीर सामाजिक समस्या रही है और जहां भी भेदभाव है, उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन जातिगत अन्याय को समाप्त करने का रास्ता क्या जाति की राजनीतिक पहचान को लगातार और मजबूत करना है? राहुल गांधी को यह समझना होगा कि पुराने घावों की चर्चा और इतिहास की आलोचना जरूरी हो सकती है, लेकिन देश का भविष्य केवल अतीत के मुकदमे लड़कर नहीं बनाया जा सकता। मनुस्मृति पर बहस हो सकती है। उसके विवादित प्रावधानों की आलोचना भी हो सकती है। लेकिन उसकी व्याख्या इतिहास, भाषा और सामाजिक संदर्भ की गंभीर समझ के साथ होनी चाहिए, न कि हर चुनावी मौसम में उसे जातीय और धार्मिक ध्रुवीकरण के राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाए। भारत का संविधान सर्वोपरि है। लेकिन संविधान की भावना यही भी है कि देश समानता और आधुनिकता की ओर बढ़े, न कि लगातार जातियों और ऐतिहासिक विवादों के बीच उलझा रहे। देश को आगे बढ़ाने के लिए पुराने सामाजिक बंधनों से मुक्त होना होगा। सवाल यह है कि राहुल गांधी भारत को उस दिशा में ले जाना चाहते हैं या फिर हर मुद्दे में जाति, मनुस्मृति और अतीत का कोण खोजकर देश को उसी राजनीतिक बहस में उलझाए रखना चाहते हैं। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 1 Sep 2026 12:57 pm

FSSAI की सख्त कार्रवाई के बाद Zomato का बड़ा कदम: 'एनालॉग डेयरी' उत्पादों से बने खान-पान की बिक्री पर लगाई रोक

फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म जोमैटो ने सोमवार को कहा कि उसने अपने प्लेटफॉर्म पर लिस्टेड रेस्टोरेंट द्वारा एनालॉग डेयरी उत्पादों से बनी डिश बेचने के मामले में 'जीरो-टॉलरेंस' पॉलिसी अपनाई है और ऐसे सभी खाद्य पदार्थों को प्लेटफॉर्म से हटा दिया है।

देशबन्धु 1 Sep 2026 12:31 pm

भारत की जीडीपी ग्रोथ पर एनडीए नेता बोले- 'मोदी सरकार जो कहती है, वो करके दिखाती है'

भारत की जीडीपी ग्रोथ पर एनडीए नेता बोले- 'मोदी सरकार जो कहती है, वो करके दिखाती है'

समाचार नामा 1 Sep 2026 12:25 pm

राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर को प्रियांक खड़गे ने बताया राजनीति से प्रेरित, भाजपा ने किया पलटवार

राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर को प्रियांक खड़गे ने बताया राजनीति से प्रेरित, भाजपा ने किया पलटवार

समाचार नामा 1 Sep 2026 12:21 pm

बिश्केक में पीएम मोदी की 'कार डिप्लोमेसी': राष्ट्रपति पुतिन के साथ एक ही गाड़ी में किया सफर

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से बिश्केक में मुलाकात की। इस मुलाकात के दौरान दोनों नेताओं के बीच द्विपक्षीय बैठक हुई, जहां भारत-रूस संबंधों, यूक्रेन युद्ध और विश्व में शांति स्थापित करने को लेकर चर्चा हुई। इस बीच पीएम मोदी की 'कार डिप्लोमेसी' भी देखने को मिली।

देशबन्धु 1 Sep 2026 7:30 am

नीट प्रदर्शनकारियों पर दर्ज FIR रद्द करने की मांग, सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई आज

सुप्रीम कोर्ट आज उस याचिका पर सुनवाई करेगा जिसमें दिल्ली पुलिस ने नीट पेपर लीक के विरोध प्रदर्शनों में शामिल छात्रों के खिलाफ दर्ज 13 एफआईआर को रद्द करने की अनुमति मांगी है

देशबन्धु 1 Sep 2026 7:07 am

जर्मन मानते हैं, देश पर अमेरिकी प्रभाव बढ़ा

जर्मनी में किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार 67 प्रतिशत नागरिकों का मानना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के बाद अमेरिकी राजनीतिक घटनाक्रमों का जर्मनी पर प्रभाव बढ़ गया है

देशबन्धु 1 Sep 2026 12:28 am

8.86 एकड़ जमीन घोटाले में हेमंत सोरेन ने हाई कोर्ट में दायर की क्रिमिनल रिवीजन याचिका, ईडी कोर्ट के आदेश को दी चुनौती

8.86 एकड़ जमीन घोटाले में हेमंत सोरेन ने हाई कोर्ट में दायर की क्रिमिनल रिवीजन याचिका, ईडी कोर्ट के आदेश को दी चुनौती

समाचार नामा 31 Aug 2026 11:56 pm

पंजाब के भूजल स्तर में बढ़ोतरी, भाखड़ा बांध पूरी तरह सुरक्षित: मंत्री बरिंदर गोयल

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समाचार नामा 31 Aug 2026 11:33 pm

पीएम के 'मन की बात' में जिक्र के बाद चिकमगलूर में तेजी से बढ़ रही एवोकाडो की खेती

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समाचार नामा 31 Aug 2026 11:30 pm

अखिलेश यादव के आरोपों पर संजय निषाद का पलटवार, 'अपराधी की कोई जाति नहीं होती'

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समाचार नामा 31 Aug 2026 11:18 pm

कर्नाटक के मंत्री बसवराज रायरेड्डी इस्लाम वाले बयान पर माफी क्यों मांगें: एसटी हसन

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समाचार नामा 31 Aug 2026 8:17 pm

Chai Par Sameeksha: UP में किसे मिलेगा जाटों का साथ? Rahul Gandhi की 2024 वाली रणनीति!

प्रभासाक्षी की साप्ताहिक कार्यक्रम चाय पर समीक्षा में इस सप्ताह हमने भाजपा की सोशल मीडिया पर सक्रियता और राहुल गांधी द्वारा लगाए गए आरोपों पर चर्चा की। साथ ही साथ उत्तर प्रदेश की जाट पॉलिटिक्स पर भी हमने प्रभासाक्षी के संपादक नीरज कुमार दुबे से सवाल पूछे। भाजपा में हुए बदलाव और सोशल मीडिया पर सक्रियता को लेकर नीरज कुमार दुबे ने कहा कि हाल में ही देखे तो दिल्ली में जो प्रोटेस्ट हुआ, अगर वह इतना कामयाब हुआ तो उसमें सोशल मीडिया का बड़ा हाथ था। यही कारण है कि भाजपा ने भी अपने सोशल मीडिया टीम में बड़े बदलाव किए हैं और उसका असर अब हमें लगातार देखने को मिल रहा है। उन्होंने कहा कि बीजेपी सोशल मीडिया के जरिए युवाओं तक अपनी पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है ताकि उन्हें बताया जा सके कि मोदी सरकार में क्या काम हुए हैं और उससे पहले क्या स्थितियां थी। नीरज दुबे ने कहा कि हाल के दिनों में देखें तो भाजपा सोशल मीडिया पर पिछड़ती हुई दिखाई दे रही थी जिसका फायदा विपक्षी दल भी खूब उठा रहे थे। लेकिन अब भाजपा ने समय को ध्यान में रखते हुए बड़े बदलाव को करने के बाद एक आक्रामक नीति अपनाने की ओर बढ़ रही है। दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में सिंगर अंकित बालियान के मर्डर के बाद से जारी जाट राजनीति पर भी नीरज दुबे से सवाल पूछा। नीरज दुबे ने कहा कि अखिलेश यादव हर कीमत पर उत्तर प्रदेश चुनाव को जाति पर ले जाना चाहते हैं जबकि भाजपा इसे हिंदुत्व पर रखना चाहती हैं। इसे भी पढ़ें: 22000 करोड़ का कर्ज लिया और सिर्फ 6.5 करोड़ की वापसी? लोन माफी के आरोपों के बीच Essel Group के Subhash Chandra ने खुद खोला पूरा राज नीरज दुबे ने कहा कि यह सभी को पता है कि उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार की सबसे बड़ी कामयाबी वहां की कानून व्यवस्था है। यही कारण है कि अंकित बालियान मर्डर केस को उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था को जोड़ा जा रहा है। साथ ही साथ अखिलेश यादव जाट वोटो को साधने की कोशिश कर रही कर रहे हैं। उन्हें पता है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनका कुछ खास जनाधार नहीं है। मुसलमान वोट उनको मिल जाएंगे लेकिन जब तक मुसलमान के साथ किसी और समुदाय का वोट उन्हें ना मिले, तब तक वह कामयाब नहीं हो सकते हैं और इसीलिए वह जाट समुदाय को साधने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जयंत चौधरी जाट समुदाय के बड़े नेता है और उन पर निशाना साधकर अखिलेश यादव ने बड़ी गलती कर दी थी। शायद इस वजह से अब इस मुद्दे को वह जाट समाज से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि किसी की अगर हत्या होती है वह दुखद है और सरकार आरोपियों को हर हाल में सामने लाएगी और न्याय के कटघरे में खड़ा करेगी। राहुल गांधी के द्वारा शुद्धिकरण को लेकर लगाए जा रहे आरोपों पर नीरज दुबे ने कहा कि राहुल गांधी काफी दिनों के बाद यह मुद्दा उठा रहे हैं। सवाल यह भी है कि वह इतने दिनों तक क्या कर रहे थे। उन्होंने कहा कि आरोप लगाना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन अगर उनके आरोप में दम है तो उनके कार्यकर्ता खुद क्यों नहीं गए एफआईआर दर्ज कराने। नीरज दुबे ने कहा कि विपक्ष को फिलहाल कोई बड़ा मुद्दा नहीं मिल रहा है इसलिए वह हर मामले को जाति का रंग देना चाहती है ताकि चुनाव में फायदा हो सके। उत्तर प्रदेश उत्तराखंड में चुनाव होने हैं। इसी को लेकर राहुल गांधी 2024 वाला माहौल बना रहे हैं। लेकिन इस बार वह कामयाब होंगे इसकी संभावना बेहद कम है।

प्रभासाक्षी 31 Aug 2026 6:16 pm

बिहार के ‘सहयोग मॉडल’ से बाकि राज्यों को भी सीखने की जरूरत

क्या किसी सरकारी स्कूल या हॉस्टल में गंदा पानी, खराब खाना या बिजली की किल्लत जैसी रोजमर्रा की समस्याओं का समाधान 30 दिन के भीतर पाना संभव है?...जहां देश के अधिकांश राज्यों में छात्र ऐसी बुनियादी सुविधाओं के लिए महीनों प्रशासनिक चक्कर काटने या सड़कों पर उतरने को मजबूर होते हैं, वहीं बिहार सरकार ने एक पारदर्शी ऑनलाइन व्यवस्था से इस धारणा को बदलने की कोशिश की है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी द्वारा शुरू की गई इस नई पहल ने छात्र शिकायतों के निपटारे का एक ऐसा मॉडल पेश किया है, जिसकी गूंज अब देश भर में सुनाई दे रही है। छात्रों की शिकायतें अक्सर लंबे समय तक अनसुलझी रहती हैं, इसकी बड़ी वजह प्रशासनिक प्रक्रिया की जटिलता है। किसी छात्र को हॉस्टल की सफाई, भोजन की गुणवत्ता, बिजली-पानी या फीस से जुड़ी दिक्कत होने पर पहले वार्डन, फिर प्रिंसिपल और जरूरत पड़ने पर जिला शिक्षा कार्यालय तक जाना पड़ता है। इस प्रक्रिया में न तो कोई तय समयसीमा होती है और न ही स्पष्ट जवाबदेही तय होती है, जिस वजह से छोटी शिकायतें भी हफ्तों-महीनों तक लंबित रह जाती हैं। इसे भी पढ़ें: “मखाना: भारत के पारंपरिक उत्पाद से वैश्विक सुपरफूड बनने का स्वर्णिम सफर” बिहार सरकार के विद्यार्थी सहयोग पोर्टल की खासियत यह है कि शिकायत दर्ज कराने के लिए दो अलग कैटेगरी बनाई गई हैं — पहली, शैक्षणिक संस्थान यानी विद्यालय, महाविद्यालय या विश्वविद्यालय से संबंधित विद्यार्थियों के लिए, और दूसरी, छात्रावास यानी हॉस्टल में रहने वाले विद्यार्थियों के लिए। पोर्टल के होमपेज पर ही यह दोनों विकल्प दिए गए हैं, जिससे छात्र सही कैटेगरी चुनकर सीधे संबंधित फॉर्म तक पहुंच जाता है। कैटेगरी चुनने के बाद छात्र के सामने एक सीधा-सादा फॉर्म खुलता है, जिसमें नाम, लिंग, पिता का नाम, जन्म तिथि और मोबाइल नंबर जैसी बुनियादी जानकारी भरनी होती है। ईमेल आईडी को वैकल्पिक रखा गया है, ताकि जिन छात्रों के पास ईमेल नहीं है वे भी शिकायत दर्ज करा सकें, जबकि मोबाइल नंबर को ओटीपी से वेरिफाई किया जाता है ताकि हर शिकायत असली छात्र की ओर से ही दर्ज हो। पोर्टल पर छात्रों के लिए तीन सुविधाएं दी गई हैं। शिकायत दर्ज कराने का विकल्प हॉस्टल सुविधाओं, भोजन, स्वच्छता, सुरक्षा और बिजली से जुड़ी समस्याओं के लिए है। इसके अलावा छात्र व्यवस्था सुधारने से जुड़े अपने सुझाव भी साझा कर सकते हैं, और सबसे अहम बात यह कि एक बार शिकायत दर्ज करने के बाद छात्र उसकी मौजूदा स्थिति और उस पर हुई कार्रवाई को ट्रैक भी कर सकता है। पोर्टल पर सबसे ज्यादा दर्ज होने वाली शिकायतों को भोजन, पेयजल, बिजली, शौचालय-सफाई, सुरक्षा, बुनियादी ढांचे और इंटरनेट जैसी कैटेगरी में पहले से बांटा गया है, जिससे शिकायत सीधे संबंधित विभाग तक पहुंचती है और निपटारे में देरी नहीं होती। पोर्टल पर दर्ज हर शिकायत का 30 दिनों के भीतर निपटारा सुनिश्चित करने की व्यवस्था की गई है। समाधान के बाद संबंधित छात्र को लिखित रूप से इसकी सूचना भी दी जाती है, ताकि यह साफ रहे कि उसकी शिकायत पर वाकई कार्रवाई हुई है। जिला प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि शिकायतकर्ता छात्र-छात्राओं की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखी जाएगी, जिससे छात्र बिना किसी डर के अपनी बात रख सकें। जिन छात्रों के पास ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराने की सुविधा नहीं है, उनके लिए टोल-फ्री हेल्पलाइन नंबर 1100 भी उपलब्ध कराया गया है। पोर्टल का मकसद छात्रों की शैक्षणिक, परीक्षा, छात्रावास, छात्रवृत्ति और अन्य संस्थागत समस्याओं का पारदर्शी और जवाबदेह तरीके से समाधान करना है। सरकारी पोर्टल और हेल्पलाइन की घोषणाएं आमतौर पर होती रहती हैं, लेकिन इनमें से ज्यादातर व्यवहार में उतनी असरदार साबित नहीं होतीं। लेकिन बिहार सरकार की अब तक की कोशिशों को देखें तो ऐसा लगता है कि सरकार गंभीरता से छात्रों की समस्याओं को सुनने की ओर अग्रसर है। इस पोर्टल की खासियत है कि इसमें एक जवाबदेही तंत्र भी जोड़ा गया है — तय समयसीमा में शिकायत का समाधान न होने पर संबंधित अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई का भी प्रावधान रखा गया है, जिससे यह सिर्फ कागजी व्यवस्था बनकर नहीं रह जाती। पोर्टल के साथ-साथ सरकार ने हर महीने सहयोग शिविर आयोजित करने की व्यवस्था भी बनाई है, जिनमें मंत्री, विधायक, सांसद और संबंधित अधिकारी सीधे स्कूल-कॉलेजों में जाकर छात्रों से बातचीत करेंगे। इन शिविरों में मिलने वाली शिकायतों और सुझावों को भी उसी पोर्टल पर दर्ज कर ट्रैक किया जाता है, जिससे पूरा सिस्टम एक जगह जुड़ा रहता है। यह व्यवस्था खासकर उन इलाकों में उपयोगी मानी जा रही है, जहां छात्र ऑनलाइन माध्यम के बजाय सीधी बातचीत में ज्यादा सहज महसूस करते हैं। जिन राज्यों में छात्र आंदोलन और कैंपस में असंतोष की घटनाएं सामने आती रही हैं, उनके लिए बिहार का यह मॉडल कुछ स्पष्ट संकेत देता है। शिकायत निवारण तंत्र तभी प्रभावी होता है जब उसमें तय समयसीमा और जवाबदेही दोनों शामिल हों। शिकायत और छात्रावास की समस्याओं को अलग-अलग कैटेगरी में बांटने और फॉर्म को आसान रखने से समाधान की रफ्तार तेज होती है, जबकि स्टेटस ट्रैक करने की सुविधा से छात्रों को भरोसा रहता है कि उनकी बात पर वाकई काम हो रहा है। साथ ही, सिर्फ डिजिटल पोर्टल पर निर्भर रहने के बजाय हेल्पलाइन और जमीनी शिविर जैसे विकल्प भी जरूरी हैं, ताकि हर वर्ग का छात्र इस व्यवस्था से जुड़ सके। शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए बड़ी घोषणाओं के साथ-साथ जमीनी क्रियान्वयन भी उतना ही जरूरी है। बिहार का अनुभव यह दिखाता है कि अगर शिकायत निवारण तंत्र में पारदर्शिता, आसान प्रोसेस और जवाबदेही तय की जाए, तो नतीजे भी सामने आते हैं। अब देखना यह होगा कि अन्य राज्य इस मॉडल से कितना सीखते हैं और अपने यहां इसे किस रूप में लागू करते हैं। - संजीव कुमार मिश्र

प्रभासाक्षी 31 Aug 2026 6:02 pm

“मखाना: भारत के पारंपरिक उत्पाद से वैश्विक सुपरफूड बनने का स्वर्णिम सफर”

भारत में सदियों से व्रत-त्योहारों और पारंपरिक खान-पान का हिस्सा रहा मखाना अब महज एक साधारण खाद्य पदार्थ नहीं रह गया है, बल्कि यह दुनिया भर में स्वास्थ्य और पोषण के प्रति जागरूक लोगों की पहली पसंद बनकर एक वैश्विक सुपरफूड के रूप में उभर रहा है। फॉक्स नट्स, कमल गट्टा या वैज्ञानिक नाम युरीअल फेरोक्स (Euryale ferox) के नाम से जाना जाने वाला यह प्राकृतिक उपहार अपनी अद्वितीय न्यूट्रिशनल प्रोफाइल, कम कैलोरी और समृद्ध स्वास्थ्य लाभों के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजारों में धूम मचा रहा है। भारतीय कृषि एवं बागवानी क्षेत्र में मखाने ने हाल के वर्षों में जो छलांग लगाई है, वह न केवल भारत की पारंपरिक कृषि शक्ति को दर्शाती है बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, किसान कल्याण और निर्यात संवर्धन के क्षेत्र में भी एक नए स्वर्णिम युग का सूत्रपात कर रही है। भारत दुनिया भर में मखाना उत्पादन में एकछत्र वर्चस्व रखता है और वैश्विक आपूर्ति का अधिकांश हिस्सा अकेले भारत से आता है। देश में मखाने के उत्पादन में लगातार ऐतिहासिक वृद्धि देखने को मिल रही है। उत्पादन में इस उल्लेखनीय उछाल के साथ-साथ उत्पादकता के मोर्चे पर भी देश ने अभूतपूर्व प्रगति की है। प्रति हेक्टेयर उपज में हुई यह वृद्धि वैज्ञानिक खेती, उन्नत किस्म के बीजों और किसानों की कड़ी मेहनत का प्रत्यक्ष परिणाम है। भारत में मखाने के इस विशाल साम्राज्य का मुख्य केंद्र बिहार राज्य है, जो देश के कुल मखाना उत्पादन में सबसे बड़ा योगदान देता है। उत्तर बिहार के दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, कटिहार, पूर्णिया और सहरसा जैसे मिथिलांचल के जिले मखाना खेती के गढ़ माने जाते हैं। यहाँ की भौगोलिक परिस्थितियाँ, उथले पानी के तालाब, दलदली भूमि और अनुकूल आर्द्र जलवायु मखाने के पौधे के विकास के लिए अत्यंत आदर्श वातावरण प्रदान करती हैं। बिहार के अलावा पश्चिम बंगाल, असम और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में भी मखाने की खेती का दायरा तेजी से फैल रहा है। मखाने का भौगोलिक महत्व इस बात से भी सिद्ध होता है कि बिहार के मखाने को भौगोलिक संकेत यानी जीआई टैग प्राप्त हो चुका है, जिसने इसकी अंतरराष्ट्रीय प्रामाणिकता और पहचान को एक नया आयाम दिया है। इसे भी पढ़ें: फरक्का समझौता को बिहार-झारखंड के लिए अभिशाप नहीं वरदान बनाइए, समझिए कैसे बनेगा? आधुनिक दुनिया में जब स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता चरम पर है और लोग प्रसंस्कृत अथवा जंक फूड के विकल्पों की तलाश कर रहे हैं, तब मखाना एक बेहतरीन प्राकृतिक और पौष्टिक विकल्प बनकर उभरा है। मखाने में प्रचुर मात्रा में उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन, घुलनशील और अघुलनशील फाइबर तथा जटिल कार्बोहाइड्रेट्स पाए जाते हैं। इसके साथ ही यह मैग्नीशियम, पोटैशियम, फास्फोरस, कैल्शियम और आयरन जैसे आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरपूर होता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें सोडियम की मात्रा बेहद कम होती है, यह पूरी तरह से वसा-मुक्त और कोलेस्ट्रॉल-मुक्त होता है, तथा इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स भी काफी कम होता है। इन विशेषताओं के कारण यह मधुमेह रोगियों, हृदय रोगियों, उच्च रक्तचाप से पीड़ित व्यक्तियों और वजन कम करने की इच्छा रखने वालों के लिए एक आदर्श आहार माना जाता है। इसमें मौजूद शक्तिशाली एंटी-ऑक्सीडेंट्स असमय बुढ़ापे को रोकने और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने में सहायक होते हैं। शाकाहारी और वीगन जीवनशैली अपनाने वाले लोगों के लिए मखाना प्रोटीन का एक अत्यंत सुलभ और स्वस्थ स्रोत बनकर उभरा है। मखाने की यात्रा खेत के दलदल से निकलकर डाइनिंग टेबल तक पहुँचने में कई जटिल और श्रमसाध्य चरणों से होकर गुजरती है, जो इसकी संपूर्ण मूल्य श्रृंखला का निर्माण करती है। इसकी प्रक्रिया प्राथमिक और द्वितीयक दो स्तरों पर होती है। प्राथमिक स्तर पर किसान और मजदूर बेहद विषम परिस्थितियों में पानी के भीतर उतरकर तालाब की तलहटी से मखाने के कटीले बीजों की कटाई और संग्रहण करते हैं। इसके बाद इन बीजों को साफ किया जाता है और धूप में सुखाया जाता है। इसके पश्चात द्वितीयक प्रसंस्करण शुरू होता है, जिसमें सूखे बीजों को मिट्टी या लोहे की कड़ाही में उच्च तापमान पर भुना जाता है। भुनाई के तुरंत बाद लकड़ी के हथौड़ों से मारकर बीजों को फोड़ा जाता है, जिससे उनके भीतर का सफेद और हल्का गुदा बाहर आ जाता है और हमें हमारा परिचित पॉप्ड मखाना प्राप्त होता है। इसके बाद मखाने की ग्रेडिंग, साइजिंग, पॉलिशिंग और पैकेजिंग की जाती है। मखाने के आकार और सफेदी के आधार पर उसकी बाजार कीमत तय होती है, जहाँ बड़े आकार के मखाने को प्रीमियम श्रेणी में रखा जाता है। वैश्विक बाजार में भारत का मखाना अपनी गुणवत्ता और विशिष्टता के बल पर तेजी से अपनी पैठ बना रहा है। भारत हर वर्ष अपने कुल मखाना उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा दुनिया के विभिन्न देशों में निर्यात करता है। भारत के मखाना निर्यात का एक बड़ा हिस्सा विकसित देशों में जाता है, जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश प्रमुख हैं। ये देश भारत से बड़े पैमाने पर मखाना आयात करते हैं। इसके अतिरिक्त यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और मध्य पूर्व के देशों में भी 'क्लीन-लेबल' और 'प्लांट-बेस्ड सुपरफूड' के रूप में भारतीय मखाने की मांग दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। फ्लेवर्ड मखाना, जैसे चीज़ी, रोस्टेड, पेरी-पेरी और मखाना पाउडर के रूप में मूल्य संवर्धित उत्पाद अंतरराष्ट्रीय उपभोक्ताओं को अत्यधिक आकर्षित कर रहे हैं। मखाना क्षेत्र के इस विशाल सामर्थ्य और रणनीतिक महत्व को पहचानते हुए भारत सरकार ने इसके सर्वांगीण विकास के लिए कई दूरगामी और संरचनात्मक पहल की हैं। मखाने के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने, आधुनिक प्रसंस्करण तकनीक लाने और किसानों की आय में बढ़ोतरी करने के उद्देश्य से सरकार ने विशेष योजनाओं को स्वीकृति प्रदान की है। यह महत्वाकांक्षी प्रयास वैज्ञानिक अनुसंधान, उच्च गुणवत्ता वाले बीजों की सुलभता, किसानों के कौशल विकास, कटाई के बाद के नुकसान को रोकने, स्वचालित पॉपिंग और ग्रेडिंग मशीनों की स्थापना, ब्रांडिंग, विपणन और निर्यात संवर्धन पर विशेष रूप से केंद्रित हैं। इन योजनाओं के माध्यम से देश भर के हजारों किसान सीधे तौर पर लाभान्वित हो रहे हैं। इसके अलावा राष्ट्रीय स्तर पर मखाना बोर्ड के गठन की घोषणा ने इस क्षेत्र को संस्थागत मजबूती प्रदान करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। जैसे-जैसे वैश्विक स्तर पर मखाने की मांग बढ़ रही है, घरेलू बाजार में भी इसके मूल्य और व्यावसायिक परिदृश्य में क्रांतिकारी बदलाव देखे जा रहे हैं। घरेलू स्तर पर मखाना बाजार अत्यंत तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है और आने वाले समय में भारत का मखाना उद्योग एक विशाल वित्तीय आकार ले लेगा। इस बढ़ती मांग के चलते मखाने की कीमतों में भी भारी उछाल आया है, जिससे किसानों और व्यापारियों के लिए यह फसल अत्यधिक लाभदायक सिद्ध हो रही है। पारंपरिक रूप से उपेक्षित रहने वाला यह क्षेत्र अब एफएमसीजी कंपनियों, स्टार्टअप्स और कृषि-उद्यमियों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है। आधुनिक पैकेजिंग, संगठित खुदरा श्रृंखलाओं और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स ने मखाने को दूर-दराज के इलाकों तक पहुँचा दिया है। हालाँकि इस अपार सफलता के बावजूद मखाना क्षेत्र के सामने कई चुनौतियाँ भी विद्यमान हैं। पारंपरिक तालाब आधारित खेती में शारीरिक श्रम की अत्यधिक आवश्यकता होती है और पानी के अंदर से बीज निकालना बेहद कठिन काम है, जिससे श्रम की कमी एक बड़ी बाधा बनती जा रही है। इसके अलावा प्राथमिक प्रसंस्करण का पारंपरिक और अमशीनीकृत होना, भंडारण की अपर्याप्त सुविधा और मूल्य श्रृंखला में बिचौलियों का प्रभाव किसानों के मुनाफे को प्रभावित करता है। इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए कृषि अनुसंधान संस्थानों द्वारा मखाने की खेत आधारित वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। पारंपरिक गहराई वाले तालाबों के बजाय समतल खेतों में निश्चित मात्रा में पानी भरकर मखाने की खेती करने की तकनीक विकसित की गई है, जिससे उत्पादकता में अभूतपूर्व वृद्धि की जा सकती है। संक्षेप में, मखाना भारत की कृषि-संस्कृति, पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक बाजार की आवश्यकताओं का एक अनूठा और सफल संगम बन चुका है। तालाबों के कीचड़ से निकलकर दुनिया भर के सुपरमार्केट्स और अंतरराष्ट्रीय डाइनिंग टेबल्स तक पहुँचने की मखाने की यह यात्रा भारत की कृषि-समृद्धि की एक नई गाथा लिख रही है। रिकॉर्ड उत्पादन और बढ़ती उत्पादकता यह सिद्ध करती है कि भारत न केवल उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर है, बल्कि दुनिया की पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम है। सरकारी योजनाओं के समर्थन, वैज्ञानिक तकनीकों के समावेश, बुनियादी ढाँचे के सुदृढ़ीकरण और निर्यात के नए अवसरों के साथ मखाना क्षेत्र भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने और भारतीय उत्पादों को वैश्विक पटल पर स्थापित करने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। - डॉ. दीपक कोहली, पर्यावरणविद ,वरिष्ठ विज्ञान लेखक, विशेष सचिव, उत्तर प्रदेश सचिवालय 5/104, विपुल खंड, गोमती नगर, लखनऊ- 226010

प्रभासाक्षी 31 Aug 2026 5:57 pm

नेपाल की त्रासदी से भारत को सबक लेने की जरूरत

नेपाल में 26 अगस्त 2026 को आई विनाशकारी बाढ़ और हिमस्खलन ने एक बार फिर यह कठोर सत्य सामने ला दिया है कि प्रकृति के साथ खिलवाड़ और पहाड़ों की संवेदनशीलता की अनदेखी मानव सभ्यता के लिए कितनी भारी पड़ सकती है। भोटेकोशी नदी तंत्र में ग्लेशियर के बड़े हिस्से के टूटने, बर्फ-पत्थरों के विशाल मलबे के नीचे आने और नदी के प्रवाह में अस्थायी अवरोध बनने के बाद अचानक बाढ़ का जो रौद्र एवं भयावह रूप सामने आया, उसने नेपाल और चीन के तिब्बती क्षेत्र में भारी तबाही मचाई। 29 अगस्त तक उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार नेपाल में 579 और तिब्बत में 5 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है तथा लगभग 2,482 लोग लापता बताए जा रहे हैं। हजारों लोगों को बचाया गया है, लेकिन दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों और लगातार बने नए खतरे के कारण राहत एवं बचाव कार्य अभी भी चुनौतीपूर्ण हैं। यह घटना केवल नेपाल की प्राकृतिक त्रासदी नहीं है, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए भविष्य का भयावह संकेत है। प्रारंभिक वैज्ञानिक आकलन बताते हैं कि ग्लेशियर का हिस्सा टूटकर नीचे गिरा, जिससे बर्फ, चट्टान, मिट्टी और मलबे का विशाल प्रवाह पैदा हुआ। इसने नदी के प्रवाह को अवरुद्ध किया और बाद में जमा पानी तथा मलबे के दबाव से अचानक विनाशकारी बाढ़ आई। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे घटनाक्रम को केवल सामान्य बाढ़ कहना भूल होगी, यह ग्लेशियर, भूस्खलन, मलबा-प्रवाह और नदी-बाढ़ जैसे अनेक खतरों के एक साथ सक्रिय होने वाली ‘बहु-आपदा’ का उदाहरण है। इस त्रासदी का सबसे बड़ा संदेश जलवायु परिवर्तन से जुड़ा है। हिमालय केवल बर्फ से ढकी पर्वतमाला नहीं, बल्कि एशिया की जल-सुरक्षा का आधार है। तापमान बढ़ने के साथ ग्लेशियर तेजी से पीछे हट रहे हैं और अनेक नई ग्लेशियर झीलें बन रही हैं। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट के अनुसार हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में लगभग 25,000 ग्लेशियर झीलें हैं और बढ़ता तापमान ग्लेशियर झीलों के फटने यानी (जीएलओएफ) के जोखिम को बढ़ा रहा है। नेपाल में 1920 के दशक से अब तक 90 से अधिक ग्लेशियर झील विस्फोट बाढ़ दर्ज की जा चुकी हैं। इसलिए यह मान लेना उचित नहीं होगा कि नेपाल की घटना का एकमात्र कारण ग्लोबल वार्मिंग ही है। भूकंपीय गतिविधियां, भूगर्भीय अस्थिरता, अत्यधिक वर्षा, हिमस्खलन और प्राकृतिक ढलानों की कमजोरी भी महत्वपूर्ण कारक हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन इन जोखिमों को बढ़ाने वाली पृष्ठभूमि अवश्य तैयार कर रहा है। गर्म होता हिमालय ग्लेशियरों और पर्वतीय भूभाग को अस्थिर कर रहा है, जिससे ऐसी घटनाओं की संभावित तीव्रता और व्यापकता बढ़ सकती है। वैज्ञानिकों ने भी इस बात पर सावधानी बरती है कि किसी एक घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन का परिणाम घोषित करने के बजाय दीर्घकालिक जलवायु और भूगर्भीय बदलावों को साथ देखकर समझना चाहिए। इसे भी पढ़ें: तबाही से 90 दिन पहले चीन-नेपाल के बीच क्या हुआ था? जलप्रलय का मिनट-दर-मिनट का पूरा घटनाक्रम नेपाल की घटना भारत के लिए भी गहरी चेतावनी है। इस चेतावनी से सीख लेने की जरूरत है। उत्तराखंड की केदारनाथ त्रासदी, 2021 की ऋषिगंगा आपदा और हिमालयी राज्यों में बार-बार आने वाली बाढ़, भूस्खलन एवं बादल फटने की घटनाएं पहले ही बता चुकी हैं कि पहाड़ों की सहनशीलता असीमित नहीं है। हिमालय में सड़कें, सुरंगें, जलविद्युत परियोजनाएं, होटल, बस्तियां और अन्य निर्माण आवश्यकताओं को पूरा करने के नाम पर तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या इनके लिए पर्वतीय पर्यावरण की वहन क्षमता का पर्याप्त आकलन हो रहा है? विकास जरूरी है, मगर ऐसा विकास जो पहाड़ों को खोखला करके ही संभव हो, अंततः मानव जीवन और स्वयं विकास दोनों के लिए संकट बन सकता है। आज सबसे बड़ी आवश्यकता ‘आपदा के बाद राहत’ से आगे बढ़कर ‘आपदा से पहले तैयारी’ की है। अत्याधुनिक सैटेलाइट निगरानी, ड्रोन, रडार, नदी सेंसर, ग्लेशियर और ग्लेशियर झीलों की निरंतर निगरानी तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित पूर्वानुमान प्रणालियों को हिमालयी क्षेत्र में व्यापक स्तर पर विकसित करना होगा। शुरुआती चेतावनी प्रणाली केवल राजधानी या प्रशासनिक केंद्र तक सीमित न रहे, बल्कि पहाड़ के अंतिम गांव तक मोबाइल संदेश, सायरन, रेडियो और स्थानीय स्वयंसेवी तंत्र के माध्यम से पहुंचे। नेपाल में वर्तमान त्रासदी के बाद भी एक और संभावित झील के फटने की आशंका ने स्पष्ट कर दिया है कि एक आपदा समाप्त होते ही दूसरी आपदा का खतरा पैदा हो सकता है। नदियां राजनीतिक सीमाओं को नहीं पहचानतीं। भोटेकोशी जैसी सीमापार नदी प्रणालियों के लिए नेपाल, चीन, भारत और अन्य हिमालयी देशों के बीच वास्तविक समय में जल-प्रवाह, वर्षा, भूस्खलन, ग्लेशियर झील और हिमस्खलन संबंधी सूचनाओं का आदान-प्रदान आवश्यक है। किसी एक देश के पास उपलब्ध महत्वपूर्ण चेतावनी दूसरे देश के नागरिकों की जान बचा सकती है। अतः हिमालय के लिए एक साझा क्षेत्रीय आपदा-पूर्व चेतावनी नेटवर्क विकसित किया जाना चाहिए। भारत को इस दिशा में अपने हिमालयी राज्यों के लिए अलग ‘माउंटेन सेफ्टी पॉलिसी’ पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क या सुरंग बनाने से पहले भूगर्भीय जोखिम, जलधाराओं के प्राकृतिक मार्ग, भूस्खलन की संभावना और स्थानीय पारिस्थितिकी का वैज्ञानिक मूल्यांकन अनिवार्य होना चाहिए। अंधाधुंध वृक्ष कटाई, नदी किनारे अनियोजित निर्माण, पहाड़ों की अनावश्यक कटाई और पर्यटन के नाम पर अत्यधिक दबाव को नियंत्रित करना होगा। स्थानीय समुदायों को आपदा प्रबंधन की पहली पंक्ति बनाना होगा, क्योंकि किसी भी संकट में सबसे पहले वही लोग प्रभावित होते हैं और वही सबसे पहले सहायता भी कर सकते हैं। दुनिया को जापान, स्विट्जरलैंड और अन्य पर्वतीय देशों से आपदा-प्रबंधन, भवन सुरक्षा, पूर्व चेतावनी और स्थानीय प्रशिक्षण की तकनीक सीखनी चाहिए। हिमालय को केवल पर्यटन और आर्थिक विकास का क्षेत्र मानना अब पर्याप्त नहीं है इसे एक जीवित, संवेदनशील और अत्यंत नाजुक पारिस्थितिक तंत्र के रूप में देखना होगा। प्रकृति को नियंत्रित करने की मनुष्य की महत्वाकांक्षा जितनी बढ़ेगी, प्रकृति का प्रतिरोध भी उतना ही भयावह हो सकता है। नेपाल की त्रासदी इसलिए केवल शोक मनाने का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का क्षण है। हमें यह समझना होगा कि पहाड़ों को जीतना नहीं, उनके साथ जीना सीखना होगा। विकास की गति को प्रकृति की क्षमता के अनुरूप करना, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करना, वैज्ञानिक चेतावनियों को गंभीरता से लेना और सीमापार सहयोग बढ़ाना ही भविष्य की राह है। यदि इस त्रासदी से भारत और दुनिया ने समय रहते सबक ले लिया, तो नेपाल में बहा हुआ पानी केवल विनाश की कहानी नहीं रहेगा, वह आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित रखने की चेतावनी और नई पर्यावरणीय चेतना का संदेश भी बनेगा। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

प्रभासाक्षी 31 Aug 2026 5:51 pm

हिंदू ध्रुवीकरण के मुकाबले ‘सम्मान की राजनीति’ को Congress बना रही नया हथियार

हिंदू ध्रुवीकरण के मुकाबले ‘सम्मान की राजनीति’ को Congress बना रही नया हथियार

समाचार नामा 31 Aug 2026 4:44 pm

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के ''अमेरिकी सम्बोधन' के अंतर्राष्ट्रीय सामाजिक कूटनीतिक मायने

आधुनिक भारत का सामाजिक चाणक्य समझे जाने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत एक असाधारण व्यक्तित्व के स्वामी हैं, क्योंकि उन्होंने भाजपा के 'गाबाज' नेतृत्व को बदलवाकर कांग्रेसियों/समाजवादियों को उनके ही राजनीतिक पीच पर 2014 में जो सियासी शिकस्त दिलवाई, उससे आम भारतीयों की राजनीतिक सोच ही बदल गई। फलसफा यह निकला कि आज भारत के जर्रे-जर्रे में भगवा ध्वज शान से लहरा रहा है और आरएसएस-भाजपा खुद SC-ST-OBC-EWS का हिमायती बन चुकी है, ताकि देशद्रोही सियासत के लिए कोई सामाजिक स्पेस ही न छोड़ी जाए। इससे सवर्ण बुद्धिजीवियों में हलचल जरूर है, लेकिन जो व्यक्ति भगवान परशुराम को 'लकड़हारा यानी 'बढ़ई जाति' से जोड़कर एक नया 'ओबीसी ब्राह्मण दर्शन' पैदा कर चुका हो, उसकी 'चाणक्य नीति' और 'श्रीरामजी आदर्श नीति' का आप सहज ही अंदाजा लगा सकते हैं। इसे भी पढ़ें: 'हमने किसी देश पर कब्ज़ा नहीं किया, न ही धर्म बदला', टोरंटो में मोहन भागवत ने भारत के 'यूनिवर्सल DNA' पर की बात | Mohan Bhagwat Toronto Speech पूरी दुनिया ने देखा कि एक मुस्लिम अमेरिकी महापौर (न्यूयॉर्क) ममदानी के विरोध के बावजूद मोहन भागवत सात समंदर पार अमेरिका पहुंचे और 29 अगस्त 2026 को न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में जो संबोधन दिया, वह केवल प्रवासी भारतीयों को संबोधित भाषण नहीं था, बल्कि इसे RSS के शताब्दी-वर्ष में हिंदुत्व की वैश्विक प्रस्तुति और भारत की सांस्कृतिक कूटनीति (वसुधैव कुटुम्बकम) के एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में पढ़ा जा सकता है। जिस प्रकार से मोहन भागवत ने वहां “एक विश्व–एक मानवता”, विविधता में एकता, मानवता और प्रवासी भारतीयों की जिम्मेदारी पर जो जोर दिया, वह यदि अगले 100 सालों में विश्व का सांस्कृतिक नक्शा बदल दे तो आपको हैरत में नहीं पड़ना चाहिए। क्योंकि कहा ही गया है कि अग्रसोचि सदा सुखी। इससे 100 साल पहले के आरएसएस और 100 बाद के आरएसएस की जो झलक उनकी इस यात्रा गत सम्बोधन में मिलती है, वह इस प्रकार है:- पहला, सबसे बड़ा संदेश है हिंदुत्व की वैश्विक री-ब्रांडिंग: भागवत ने अमेरिका में यह रेखांकित किया कि हिंदुत्व मुस्लिम-विरोधी विचार नहीं है और यदि कोई हिंदू यह मानता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए तो वह वास्तविक अर्थ में हिंदू नहीं है। अंतरराष्ट्रीय श्रोता के लिए इसका महत्व बहुत बड़ा है। RSS की पश्चिमी छवि लंबे समय से Hindu nationalism, majoritarianism और minority rights की बहस से जुड़ी रही है। ऐसे में भागवत ने उसी विचारधारा को pluralism, diversity और universal humanity की भाषा में प्रस्तुत करने का प्रयास किया। इसे एक तरह की वैचारिक कूटनीति (ideological diplomacy) कहा जा सकता है। दूसरा, अमेरिका को दिया गया दूसरा संदेश है “भारतीय बनो, लेकिन अमेरिकी भी रहो”: भागवत ने भारतीय-अमेरिकी समुदाय से अपनी karmabhoomi यानी अमेरिका के प्रति निष्ठा और योगदान की बात कही। इसका अर्थ है कि RSS की वैश्विक परियोजना केवल भारत के बाहर बसे हिंदुओं को संगठित करना नहीं, बल्कि उन्हें स्थानीय समाज में प्रभावशाली और जिम्मेदार नागरिक रहते हुए भारतीय सभ्यतागत पहचान से जोड़ना भी है। यह मॉडल भविष्य में अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और अन्य पश्चिमी देशों में भारतीय diaspora की राजनीतिक-सामाजिक शक्ति को बढ़ा सकता है। तीसरा, “भारत की विविधता” को अमेरिका में प्रस्तुत करना—बहुत सोचा-समझा संदेश: अमेरिका स्वयं को pluralistic society मानता है। भागवत ने इसी अमेरिकी संवेदनशीलता से संवाद करते हुए कहा कि America = pluralism and, Bharat = unity in diversity. उन्होंने कहा कि विविधता भारत के DNA में है और उसे स्वीकारना व सम्मानित करना चाहिए। यह महज सांस्कृतिक कथन नहीं है। यह भारत की soft power narrative को अमेरिका के राजनीतिक-सांस्कृतिक विमर्श के अनुरूप ढालने का प्रयास भी है। चौथा, लेकिन अमेरिका ने इसे एकतरफा स्वीकार नहीं किया: यहीं इस यात्रा का दूसरा और अधिक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय पहलू सामने आता है। भागवत के कार्यक्रम से पहले ही New York Mayor Zohran Mamdani ने RSS की विचारधारा को लेकर आपत्ति जताई थी। अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग USCIRF ने तो RSS से जुड़े लोगों पर targeted sanctions और भागवत का visa revoke करने जैसी सिफारिशें तक की थीं। भारत ने इन आरोपों को पक्षपातपूर्ण बताया है। यानी भागवत अमेरिका में जिस “inclusive Hinduism” को प्रस्तुत कर रहे थे, अमेरिकी आलोचकों का एक वर्ग RSS के भारतीय रिकॉर्ड और minority rights को उसके ठीक विपरीत देखता है। इससे उनकी अमेरिकी यात्रा का एक अनपेक्षित परिणाम भी हुआ: वह यह कि RSS अब केवल भारतीय राजनीति का विषय नहीं रहा; वह अमेरिकी public discourse में भी India, religion, democracy और minority rights की बहस का हिस्सा बन गया है। पांचवां, भारत-अमेरिका संबंधों के लिए क्या अर्थ?: सरकार-से-सरकार कूटनीति से अलग एक नया people-to-people / diaspora-to-politics channel मजबूत होता दिख रहा है। अमेरिका में भारतीय मूल की आबादी आर्थिक, तकनीकी और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली है। यदि RSS इस समुदाय में अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक स्वीकार्यता बढ़ाता है तो उसका असर भविष्य मेंअमेरिकी राजनीति में India-related lobbying, भारत की image-building, Hindu-American organisations, भारत-अमेरिका strategic relationship, धार्मिक स्वतंत्रता और minority-rights debates पर पड़ सकता है। छठा, सबसे दिलचस्प बदलाव: “हिंदू राष्ट्र” से “विश्व मानवता” तक: आपके पिछले सवाल से इसे जोड़ें तो सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यही है। भागवत की वैचारिक भाषा में एक trajectory दिखाई देती है: हिंदू संगठन → हिंदू राष्ट्र → सामाजिक समरसता → विश्वगुरु → “One World, One Humanity” न्यूयॉर्क में उन्होंने कहा कि RSS की दृष्टि दुनिया को एक परिवार/एक मानवता के रूप में देखने की है। इसलिए इसे “विश्व विजय” कहना शायद अतिशयोक्ति होगा; लेकिन भारतीय सभ्यतागत विचार को वैश्विक वैचारिक प्रभाव में बदलने की कोशिश कहना अधिक सटीक है। सातवां, और यही सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है: भागवत के अमेरिकी भाषण ने RSS के सामने एक नई कसौटी खड़ी कर दी है: यदि हिंदुत्व वास्तव में विविधता, मानव-एकता और मुसलमानों सहित सभी समुदायों की बराबर जगह को स्वीकार करता है, तो क्या यही सिद्धांत भारत के घरेलू सामाजिक-राजनीतिक व्यवहार में भी उसी स्पष्टता से दिखाई देगा? इसी प्रश्न को लेकर भारत में विपक्ष ने उनके अमेरिकी वक्तव्य पर सवाल उठाए हैं—आलोचकों ने इसे “doublespeak” तक कहा है। मेरे आकलन में अमेरिकी भाषण का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय मायना यही है: RSS पहली बार इतने बड़े वैश्विक मंच पर अपने को केवल Hindu organisation के रूप में नहीं, बल्कि मानवता, विविधता और वैश्विक सामाजिक व्यवस्था के बारे में एक वैकल्पिक सभ्यतागत विचार देने वाली संस्था के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। और यदि यह रणनीति आगे ब्रिटेन, कनाडा और अन्य देशों में भी जारी रहती है, तो RSS की शताब्दी के बाद का दशक भारत के भीतर वैचारिक प्रभाव से आगे बढ़कर वैश्विक वैचारिक प्रभाव की प्रतिस्पर्धा का दशक बन सकता है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 31 Aug 2026 4:44 pm

राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर पर भड़की मध्य प्रदेश कांग्रेस कांग्रेस, कहा- कार्रवाई शुद्धिकरण कराने वालों पर होनी चाहिए

राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर पर भड़की मध्य प्रदेश कांग्रेस कांग्रेस, कहा- कार्रवाई शुद्धिकरण कराने वालों पर होनी चाहिए

समाचार नामा 31 Aug 2026 4:39 pm

वित्त वर्ष 27 में भारत की रियल जीडीपी वृद्धि दर 7-7.2 प्रतिशत रहने की उम्मीद

नई दिल्ली, भारत की रियल जीडीपी वृद्धि दर वित्त वर्ष 27 में 7-7.2 प्रतिशत के बीच रहने की उम्मीद है।

देशबन्धु 31 Aug 2026 4:28 pm

Uzbekistan ने क्या India को धोखा दे दिया? जब Modi से हाथ मिला रहे थे Mirziyoyev, उसी समय Tashkent में क्यों उतर रहे थे China के J-10 Fighter Jet?

एक तरफ उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शौकत मिर्जियोयेव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ गले मिल रहे थे, भारत के साथ दीर्घकालिक यूरेनियम आपूर्ति का ऐलान हो रहा था और दूसरी तरफ उसी उज्बेकिस्तान की धरती पर चीन के J-10CE लड़ाकू विमान उतर रहे थे। यही है नई दुनिया की राजनीति, जहां मुस्कुराहटों के पीछे हित हैं, समझौतों के पीछे शक्ति है और दोस्ती की असली कीमत रणनीतिक क्षमता से तय होती है। भारत को इस तस्वीर को सिर्फ एक रक्षा सौदे के रूप में देखने की भूल नहीं करनी चाहिए। मध्य एशिया में चीन अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए सिर्फ सड़कें और निवेश नहीं, अब लड़ाकू विमान भी भेज रहा है। हम आपको बता दें कि उज्बेक वायुसेना ने चीन के चेंगदू एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन के J-10CE मल्टीरोल लड़ाकू विमानों की पहली खेप हासिल कर ली है। पाकिस्तान के बाद उज्बेकिस्तान इस चीनी लड़ाकू विमान को संचालित करने वाला दूसरा विदेशी देश बन गया है। रिपोर्टों के अनुसार उज्बेकिस्तान ने 24 J-10CE विमानों का ऑर्डर दिया है और इसमें कम से कम छह विमान देश को मिल चुके हैं। ये विमान उज्बेकिस्तान के 35वें स्वतंत्रता दिवस से ठीक पहले पहुंचे। सवाल उठता है कि चीन आखिर मध्य एशिया के आसमान में अपनी सैन्य मौजूदगी क्यों बढ़ाना चाहता है? इसे भी पढ़ें: Modi-Putin ने दुनिया को दिया बड़ा संदेश, भारत के आसमान को मिलेंगी 5 और S-400 Triumf, जमीन पर Indo-Russian AK-203 Sher Rifles मचाएंगी तहलका उल्लेखनीय है कि J-10CE कोई साधारण विमान नहीं है। चीन इसे अपनी एयरोस्पेस ताकत के प्रतीक के रूप में पेश करता है। ‘विगोरस ड्रैगन’ नाम वाला यह लड़ाकू विमान आधुनिक AESA रडार, इन्फ्रारेड सर्च एंड ट्रैक सिस्टम और उन्नत एवियोनिक्स से लैस है। इसके पास लंबी दूरी की हवा से हवा में मार करने वाली PL-15 मिसाइल है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तानी विमानों द्वारा इस्तेमाल की गई ऐसी मिसाइलों से जुड़े अवशेष पंजाब के खेतों में मिलने की खबरों ने भारतीय सुरक्षा प्रतिष्ठान का ध्यान इस चीनी हथियार प्रणाली की ओर खींचा था। साथ ही चीनी संस्करणों में PL-17 जैसी अत्यंत लंबी दूरी की मिसाइल भी शामिल है, जिसकी घोषित रेंज 400 किलोमीटर से अधिक है। ऐसी मिसाइलों का उद्देश्य लड़ाकू विमानों के पीछे छिपे बड़े रणनीतिक प्लेटफॉर्म जैसे AEW&CS और हवाई ईंधन भरने वाले विमान, आदि को निशाना बनाना होता है। यानी चीन केवल फाइटर जेट नहीं बेच रहा। वह हथियार, सेंसर, प्रशिक्षण, रखरखाव और भविष्य की सैन्य निर्भरता का पूरा पैकेज बेच रहा है। यही चीन की असली रणनीति है। वैसे J-10CE चीन का सबसे आधुनिक लड़ाकू विमान नहीं है। वह भूमिका J-20 जैसे स्टील्थ विमानों की है। लेकिन निर्यात बाजार में J-10CE कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हथियार साबित हो सकता है। एक इंजन वाला यह विमान अपेक्षाकृत कम लागत में आधुनिक रडार, मिसाइल और एवियोनिक्स उपलब्ध कराता है। हालांकि इसकी सीमाएं भी हैं। ट्विन-इंजन विमानों की तुलना में कम रेंज, सिंगल-इंजन सर्वाइवलिटी का जोखिम, रूसी इंजनों पर पुरानी निर्भरता और रडार पर अधिक दृश्यता इसे अत्याधुनिक विमानों की अपेक्षा कमजोर बनाती हैं। लेकिन सस्ता और आधुनिक विकल्प तलाश रहे देशों के लिए ये कमियां ज्यादा मायने नहीं रखतीं। हम आपको बता दें कि पाकिस्तान के पास करीब 20 J-10 विमान हैं, जबकि चीनी वायुसेना के पास 600 से अधिक बताए जाते हैं। अब उज्बेकिस्तान भी इस क्लब में शामिल हो गया है। बांग्लादेश भी इस विमान को हासिल करने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। अगर बांग्लादेश भी J-10CE खरीदता है, तो भारत के आसपास और व्यापक क्षेत्र में चीनी लड़ाकू विमानों की मौजूदगी बढ़ सकती है। इसलिए यह भारत के लिए चिंता की बात भी है। हालांकि रिपोर्टें यह भी कहती हैं कि चीन के रक्षा निर्यात में वैश्विक स्तर पर गिरावट आई है। SIPRI के अनुसार वैश्विक हथियार खरीद बढ़ने के बावजूद चीन की बाजार हिस्सेदारी घटी है। यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप में हथियारों की मांग विस्फोटक रूप से बढ़ी, लेकिन चीन इस बाजार का बड़ा लाभ नहीं उठा पाया। चीन के रक्षा निर्यात का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान पर केंद्रित रहा है। ऐसे में उज्बेकिस्तान का सौदा चीन के लिए व्यापार के साथ-साथ मध्य एशिया में सैन्य दरवाजा खोलने का मौका है। उधर, भारत-उज्बेकिस्तान के संबंधों की बात करें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उज्बेक राष्ट्रपति मिर्जियोयेव ने दीर्घकालिक यूरेनियम आपूर्ति व्यवस्था स्थापित करने की घोषणा की है। देखा जाये तो भारत के लिए यह मामूली समझौता नहीं है। भारत अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता का विस्तार कर रहा है और इसके लिए विश्वसनीय यूरेनियम आपूर्ति बेहद महत्वपूर्ण है। इसलिए उज्बेकिस्तान के साथ यह व्यवस्था सीधे भारत की ऊर्जा सुरक्षा और दीर्घकालिक रणनीतिक स्वायत्तता से जुड़ती है। प्रधानमंत्री मोदी की उज्बेकिस्तान यात्रा के दौरान उन्हें देश के सर्वोच्च राजकीय सम्मान ‘ओली दर्जाली दोस्तलिक’ से भी सम्मानित किया गया। दोनों नेताओं का गर्मजोशी से मिलना और गले लगना भारत-उज्बेकिस्तान संबंधों की बढ़ती निकटता का स्पष्ट संदेश था। लेकिन राष्ट्रहित की राजनीति में भावनाओं के लिए कोई जगह नहीं होती। उज्बेकिस्तान भारत का साझेदार हो सकता है, लेकिन वह चीन से हथियार भी खरीदेगा। क्योंकि ताशकंद अपनी विदेश नीति अपने राष्ट्रीय हित के हिसाब से चलाएगा। भारत भी यही कर रहा है मगर अब और भी ज्यादा आक्रामक तरीके से इसे करना होगा। देखा जाये तो भारत दशकों तक मध्य एशिया के साथ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों की बात करता रहा है। लेकिन अब मुकाबला इतिहास का नहीं, हार्ड पावर का है। चीन निवेश लेकर आता है, इंफ्रास्ट्रक्चर लेकर आता है और अब आधुनिक हथियार लेकर भी पहुंच रहा है। नई दिल्ली को समझना होगा कि केवल दोस्ती, सम्मेलन और सांस्कृतिक रिश्ते पर्याप्त नहीं हैं। जहां चीन फाइटर जेट बेच रहा है, वहां भारत को भी अपनी रक्षा क्षमता लेकर पहुंचना होगा। भारत के पास ब्रह्मोस जैसी मिसाइलें हैं, तेजस जैसे लड़ाकू विमान हैं, आकाश जैसी वायु रक्षा प्रणाली है और तेजी से विकसित होता रक्षा उद्योग है। भारत को मध्य एशिया में रक्षा निर्यात, संयुक्त उत्पादन, सैन्य प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग को अपनी विदेश नीति का केंद्रीय हथियार बनाना होगा। भारत को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि मध्य एशिया पूरी तरह चीनी सैन्य उपकरणों, स्पेयर पार्ट्स और तकनीकी सहायता पर निर्भर न हो जाए। क्योंकि एक बार कोई देश किसी रक्षा प्लेटफॉर्म के इकोसिस्टम में फंसता है तो उसके साथ दशकों की निर्भरता जुड़ जाती है। यही चीन की सबसे खतरनाक रणनीतिक ताकत है। आज विमान बिकता है, कल मिसाइल बिकती है। फिर प्रशिक्षण आता है, रखरखाव आता है, स्पेयर पार्ट्स आते हैं और अंततः सैन्य रिश्तों की ऐसी जंजीर बन जाती है जिसे तोड़ना आसान नहीं होता। देखा जाये तो उज्बेकिस्तान का J-10CE सौदा भारत के खिलाफ कोई सीधा सैन्य मोर्चा नहीं है। लेकिन इसे नजरअंदाज करना रणनीतिक भूल होगी। चीन मध्य एशिया में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है और भारत को इसका जवाब केवल बयानबाजी से नहीं, बल्कि आर्थिक, तकनीकी और सैन्य शक्ति से देना होगा। ताशकंद का यह पूरा घटनाक्रम भारत के सामने नई सच्चाई रखता है। एक तरफ मोदी के साथ यूरेनियम की साझेदारी है। दूसरी तरफ चीन के साथ फाइटर जेट की डील है। यानी मैदान खुला है और मुकाबला जारी है। भारत के लिए संदेश साफ है कि मध्य एशिया में जगह किसी की विरासत से तय नहीं होगी, बल्कि उसकी ताकत से तय होगी। चीन वहां पहुंच चुका है। अब भारत को सिर्फ पहुंचना नहीं है, भारत को अपनी मौजूदगी इतनी मजबूत करनी होगी कि मध्य एशिया की रणनीतिक राजनीति में नई दिल्ली को नजरअंदाज करना किसी भी देश के लिए संभव न रहे। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 31 Aug 2026 3:21 pm

राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर पर बोले राम कृपाल यादव, कहा-परेशान हैं राहुल, भविष्य नहीं दिख रहा

राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर पर बोले राम कृपाल यादव, कहा-परेशान हैं राहुल, भविष्य नहीं दिख रहा

समाचार नामा 31 Aug 2026 1:28 pm

Modi-Putin ने दुनिया को दिया बड़ा संदेश, भारत के आसमान को मिलेंगी 5 और S-400 Triumf, जमीन पर Indo-Russian AK-203 Sher Rifles मचाएंगी तहलका

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की एससीओ शिखर सम्मेलन में होने वाली मुलाकात से ठीक पहले भारत-रूस रक्षा साझेदारी से जुड़ी दो बड़ी तस्वीरें सामने आई हैं। एक तरफ रूस ने भारत को पांच और एस-400 ट्रायम्फ स्क्वाड्रन देने के लिए 50 हजार करोड़ रुपये से अधिक का प्रस्ताव सौंप दिया है, तो दूसरी तरफ अमेठी के कोरवा में भारतीय सेना के नए ‘शेर’ यानी एके-203 की पूरी तरह स्वदेशी यात्रा निर्णायक पड़ाव पर पहुंच गई है। इस तरह एक ओर मिसाइल कवच भारत के आसमान को अभेद्य बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है और दूसरी तरफ राइफल सीमा पर खड़े सैनिक के हाथ को और मजबूत बना रही है। हम आपको बता दें कि रूस का प्रस्ताव रक्षा मंत्रालय को मिल चुका है और उस पर प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के बाद मार्च 2026 में पांच अतिरिक्त एस-400 स्क्वाड्रन खरीदने को मंजूरी दी थी। इनकी तैनाती पश्चिमी और पूर्वी मोर्चों पर किए जाने की संभावना है, जिससे भारत की लंबी दूरी की वायु रक्षा क्षमता और मजबूत होगी। मौजूदा एस-400 बेड़े के लिए 280 से अधिक अतिरिक्त मिसाइलें भी खरीदी जा रही हैं, ताकि इंटरसेप्टर का पर्याप्त भंडार बना रहे। इसे भी पढ़ें: डोभाल की कूटनीति और भारत-चीन संबंधों की नई करवट हम आपको बता दें कि एस-400 केवल एक मिसाइल प्रणाली नहीं, बल्कि भारत की बहुस्तरीय वायु रक्षा का बेहद महत्वपूर्ण लंबी दूरी वाला हिस्सा है। यह लड़ाकू विमानों, रणनीतिक विमानों, क्रूज मिसाइलों और अन्य हवाई लक्ष्यों को पहचानने, ट्रैक करने और निशाना बनाने में सक्षम है। अलग-अलग इंटरसेप्टर मिसाइलों के कारण यह विभिन्न ऊंचाइयों और दूरियों पर खतरे से निपट सकता है। इसकी कुछ मिसाइलें लगभग 400 किलोमीटर तक के लक्ष्य को निशाना बना सकती हैं। कई लक्ष्यों को एक साथ ट्रैक और एंगेज करने की क्षमता इसे एयरबेस, कमांड सेंटर और अन्य महत्वपूर्ण सैन्य प्रतिष्ठानों की सुरक्षा के लिए खास बनाती है। हम आपको याद दिला दें कि भारत ने 2018 में पांच एस-400 स्क्वाड्रन का मूल समझौता किया था। इनमें चार की डिलीवरी हो चुकी है, जबकि पांचवें और अंतिम स्क्वाड्रन के नवंबर 2026 तक आने की उम्मीद है। नए पांच स्क्वाड्रन की डिलीवरी समझौते पर हस्ताक्षर के करीब तीन साल बाद शुरू होने की संभावना है। इस तरह भारत अब सिर्फ तात्कालिक जरूरत ही पूरी नहीं कर रहा, बल्कि आने वाले वर्षों के लिए देश की एयर-डिफेंस छतरी का दायरा भी बढ़ा रहा है। लेकिन आसमान की सुरक्षा के साथ जमीन पर सैनिक के हाथ में मौजूद हथियार भी उतना ही निर्णायक है। यहीं अमेठी का एके-203 ‘शेर’ कहानी का दूसरा और ज्यादा आत्मनिर्भर चेहरा सामने लाता है। कोरवा स्थित इंडो-रशियन राइफल्स प्राइवेट लिमिटेड में बन रही एके-203 पूरी तरह भारतीय कलपुर्जों और सामग्री से बनी है। हालांकि यह रूसी डिजाइन को भारतीय क्षमता में बदलने की करीब एक दशक लंबी यात्रा है। इस परियोजना के लिए रूस से लगभग 90 हजार पन्नों का तकनीकी दस्तावेज मिला था। कोविड महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण तकनीक का हस्तांतरण प्रभावित हुआ और अंतिम टेक्नोलॉजी पैकेज 2024 में मिला। अगस्त 2023 में कोरवा में बनी पहली राइफल में भारतीय सामग्री की हिस्सेदारी करीब 5 प्रतिशत थी, दिसंबर 2024 में यह 15 प्रतिशत हुई और अगस्त 2026 तक सभी 50 प्रमुख तथा लगभग 180 छोटे कलपुर्जे भारत में बनने लगे। इस स्वदेशीकरण की असली चुनौती सिर्फ असेंबली नहीं थी। विशेष स्टील मिश्रधातुओं, स्प्रिंग, इंजीनियरिंग प्लास्टिक, कंपोजिट, कोटिंग और सटीक रासायनिक संरचना वाली धातुओं को भारतीय स्तर पर विकसित करना पड़ा। इसके लिए एडवांस्ड वेपन्स एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड और अडानी डिफेंस सिस्टम्स एंड टेक्नोलॉजीज समेत भारतीय औद्योगिक साझेदारों ने सप्लायर नेटवर्क तैयार किया। टीमों ने देशभर में करीब 76 सब-वेंडरों का निरीक्षण किया, जिनमें लगभग आधे उत्तर प्रदेश, खासकर कानपुर और लखनऊ क्षेत्र में हैं। अब कोरवा में करीब 76 तरह के परीक्षण करने वाली अपनी प्रयोगशाला है। हर राइफल को स्वीकार किए जाने से पहले करीब 70 राउंड फायर किए जाते हैं, जिनमें दो हाई-प्रेशर राउंड सामान्य से करीब 50 प्रतिशत अधिक दबाव पैदा करते हैं। पहली पूरी तरह भारतीय एके-203 ने लगातार 3,000 राउंड की फायरिंग परीक्षा भी सफलतापूर्वक पूरी की। साथ ही सेना के परीक्षण के लिए 100 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री वाली 10 राइफलें तैयार की जा रही हैं। बताया जा रहा है कि अब तक करीब 70 हजार राइफलें सेना को दी जा चुकी हैं। अप्रैल 2027 से उत्पादन क्षमता एक राइफल हर 100 सेकंड तक पहुंचाने का लक्ष्य है। कंपनी को 1.5 लाख से अधिक राइफलों की संभावित मांग के संकेत मिल चुके हैं और आगे निर्यात तथा कलाश्निकोव श्रेणी के अन्य हथियारों की दिशा में भी संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। बहरहाल, रणनीतिक संदेश साफ है कि भारत अब केवल हथियार खरीदने वाला देश नहीं रहना चाहता, बल्कि तकनीक को आत्मसात कर अपनी रक्षा औद्योगिक क्षमता खड़ी कर रहा है। एस-400 भारत की दूर से आने वाले हवाई खतरे को रोकने की क्षमता बढ़ाता है, जबकि पूरी तरह स्वदेशी एके-203 युद्ध के सबसे बुनियादी स्तर पर सैनिक की आत्मनिर्भरता मजबूत करता है। यही संयोजन भारत की बदलती सैन्य शक्ति की असली तस्वीर है। यानि आसमान में मजबूत सुरक्षा कवच और जमीन पर भारतीय हाथों से बना ‘शेर’।

प्रभासाक्षी 31 Aug 2026 11:30 am

'वेलिगोंडा प्रोजेक्ट का विजन और विकास वाईएसआर का था', वाईएसआरसीपी का सीएम नायडू पर हमला

'वेलिगोंडा प्रोजेक्ट का विजन और विकास वाईएसआर का था', वाईएसआरसीपी का सीएम नायडू पर हमला

समाचार नामा 30 Aug 2026 8:40 pm

'2028 में कांग्रेस की सरकार बनी तो खत्म कर देंगे यूसीसी', मध्य प्रदेश में विपक्ष के नेता उमंग सिंघार

'2028 में कांग्रेस की सरकार बनी तो खत्म कर देंगे यूसीसी', मध्य प्रदेश में विपक्ष के नेता उमंग सिंघार

समाचार नामा 30 Aug 2026 7:25 pm

‘शुद्धिकरण’ विवाद पर प्रकाश आंबेडकर का राहुल गांधी पर निशाना, पूछा- ‘एक्शन’ कब होगा?

‘शुद्धिकरण’ विवाद पर प्रकाश आंबेडकर का राहुल गांधी पर निशाना, पूछा- ‘एक्शन’ कब होगा?

समाचार नामा 30 Aug 2026 6:37 pm

विजया रहाटकर ने महिलाओं को ‘जीरो एफआईआर’ दर्ज कराने के अधिकार के बारे में बताया

विजया रहाटकर ने महिलाओं को ‘जीरो एफआईआर’ दर्ज कराने के अधिकार के बारे में बताया

समाचार नामा 30 Aug 2026 6:31 pm

तमिलनाडु में जल्द सस्ता मिलेगा प्याज

चेन्नई, खुदरा कीमतों में वृद्धि के कारण राज्य भर में आम लोगों के बजट पर दबाव पड़ने के बाद, तमिलनाडु का सहकारी क्षेत्र राशन की दुकानों के माध्यम से रियायती कीमतों पर प्याज बेचने की तैयारी कर रहा है।

देशबन्धु 30 Aug 2026 5:17 pm

अखिलेश यादव का बड़ा एलान, भाजपा राज में बंद 26 हजार स्कूलों को फिर खोलेगी सपा सरकार

अखिलेश यादव ने ऐलान किया कि सपा सरकार बनने पर भाजपा शासन में बंद किए गए करीब 26 हजार स्कूलों को फिर खोला जाएगा। उन्होंने रोजगार, भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था को लेकर भाजपा पर निशाना साधा।

देशबन्धु 30 Aug 2026 5:07 pm

'बहुत ही सुखद', सीएम सुवेंदु अधिकारी ने 'मन की बात' में उत्तम कुमार का जिक्र करने के लिए पीएम मोदी का किया धन्यवाद

'बहुत ही सुखद', सीएम सुवेंदु अधिकारी ने 'मन की बात' में उत्तम कुमार का जिक्र करने के लिए पीएम मोदी का किया धन्यवाद

समाचार नामा 30 Aug 2026 4:26 pm

वीसीके ने तमिलनाडु सरकार के पॉलिसी नोट से पेरियार और अंबेडकर का नाम हटाए जाने पर उठाए सवाल

वीसीके ने तमिलनाडु सरकार के पॉलिसी नोट से पेरियार और अंबेडकर का नाम हटाए जाने पर उठाए सवाल

समाचार नामा 30 Aug 2026 2:41 pm

मोहन भागवत के 'हिंदू-मुस्लिम' वाले बयान का भाजपा नेताओं ने किया समर्थन, कहा- यही भारत की असली पहचान

मोहन भागवत के 'हिंदू-मुस्लिम' वाले बयान का भाजपा नेताओं ने किया समर्थन, कहा- यही भारत की असली पहचान

समाचार नामा 30 Aug 2026 2:16 pm

सीएम योगी बोले- लखनऊ छावनी बनेगी ‘मॉडल छावनी', राजधानी में विरासत के साथ आधुनिकता का संगम

सीएम योगी बोले- लखनऊ छावनी बनेगी ‘मॉडल छावनी', राजधानी में विरासत के साथ आधुनिकता का संगम

समाचार नामा 30 Aug 2026 2:07 pm

मन की बात: पीएम मोदी ने एवोकाडो की खेती का किया जिक्र, कहा - 'इनोवेटिव किसानों ने कमाई की ढूंढ ली नई रेसिपी'

मन की बात: पीएम मोदी ने एवोकाडो की खेती का किया जिक्र, कहा - 'इनोवेटिव किसानों ने कमाई की ढूंढ ली नई रेसिपी'

समाचार नामा 30 Aug 2026 12:22 pm

तारीख पर तारीख की प्रवृत्ति में बदलनी होगी, 5 साल से पुराने राजस्व मामलों का हो निस्तारण: सीएम योगी

तारीख पर तारीख की प्रवृत्ति में बदलनी होगी, 5 साल से पुराने राजस्व मामलों का हो निस्तारण: सीएम योगी

समाचार नामा 29 Aug 2026 11:25 pm

मसाला ब्रांड्स पर FSSAI का बड़ा एक्शन! एवरेस्ट और बांधानी हींग की बिक्री पर लगा बैन, गरम और चिकन मसाले में भी मिली गड़बड़ी।

भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने गुणवत्ता मानकों का उल्लंघन पाए जाने पर एवरेस्ट फ़ूड प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड की सभी वैरिएंट वाली कंपाउंडेड हींग की बिक्री पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगा दिया है। यह कार्रवाई खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 के तहत जारी निषेध आदेश के माध्यम से की गई है। एफएसएसएआई ने इसी मामले में मेसर्स लालजी गोधू एंड कंपनी के खिलाफ भी कार्रवाई करते हुए उसकी कंपाउंडेड हींग के निर्माण और बिक्री पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है।

देशबन्धु 29 Aug 2026 7:09 pm

राहुल गांधी राजनीतिक फायदे के लिए जातीय उन्माद फैलाने की कोशिश कर रहे: सुबोध उनियाल

राहुल गांधी राजनीतिक फायदे के लिए जातीय उन्माद फैलाने की कोशिश कर रहे: सुबोध उनियाल

समाचार नामा 29 Aug 2026 6:27 pm

बंगाल: एंटाली पुलिस स्टेशन पर विरोध प्रदर्शन के लिए भाजपा ने सुदीप राम को निलंबित किया

बंगाल: एंटाली पुलिस स्टेशन पर विरोध प्रदर्शन के लिए भाजपा ने सुदीप राम को निलंबित किया

समाचार नामा 29 Aug 2026 6:24 pm

भागवत की न्यूयॉर्क यात्रा: आर्थिक निवेश, सांस्कृतिक कूटनीति और वैश्विक संघ नेटवर्क का विस्तार

आरएसएस प्रमुख डॉ. मोहन भागवत की न्यूयॉर्क यात्रा समकालीन वैश्विक परिदृश्य, भारत-अमेरिका संबंधों के रणनीतिक भविष्य और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सांस्कृतिक कूटनीति की बदलती दिशा के दृष्टिकोण से एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी घटनाक्रम है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर आयोजित इस वैश्विक संपर्क कार्यक्रम का उद्देश्य केवल प्रवासी भारतीयों से संवाद करना मात्र नहीं है, बल्कि यह उभरती हुई वैश्विक व्यवस्था में भारत की वैचारिक, दार्शनिक और आर्थिक ताकत को एक साथ रेखांकित करने का एक सुनियोजित प्रयास है। अगस्त 2026 में हो रही इस उच्च-स्तरीय यात्रा के बहुआयामी प्रभाव हैं, जो पारंपरिक कूटनीति के दायरों से बहुत आगे निकल जाते हैं। इस दौरे के प्रभाव को मुख्य रूप से तीन बड़े स्तंभों के माध्यम से समझा जा सकता है, जिसमें पहला अमेरिकी कॉर्पोरेट जगत के दिग्गजों और उद्यम पूंजीपतियों के साथ भविष्य की तकनीकों पर हुआ गंभीर आर्थिक विमर्श है, दूसरा वैश्विक स्तर पर प्रसिद्ध मैडिसन स्क्वायर गार्डन में भारतीय प्रवासियों का ऐतिहासिक सांस्कृतिक समागम है, और तीसरा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस यात्रा को लेकर पैदा हुए वैचारिक अंतर्विरोध और तीखे राजनीतिक विरोध प्रदर्शन हैं। इन सभी पहलुओं का एक साथ मिलकर विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि आधुनिक भारत के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने वाला यह संगठन अब वैश्विक स्तर पर देश की छवि, नीतियों और अंतरराष्ट्रीय विमर्श को प्रभावित करने के लिए किस प्रकार अपनी रणनीतियों का विस्तार कर रहा है। इस पूरी यात्रा का सबसे पहला और आर्थिक रूप से अत्यंत व्यावहारिक पड़ाव न्यूयॉर्क में वैश्विक कॉर्पोरेट जगत के शीर्ष अधिकारियों, नीति-निर्माताओं और उद्यम पूंजीपतियों के साथ आयोजित एक विशेष गोलमेज बैठक थी । इस संवाद के दौरान पारंपरिक द्विपक्षीय व्यापार के स्थापित ढांचों से आगे बढ़कर पूरी तरह से भविष्य की उन्नत प्रौद्योगिकियों यानी डीप-टेक पर ध्यान केंद्रित किया गया। इस उच्च-स्तरीय बैठक में दूरसंचार क्षेत्र के आधुनिकीकरण, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में निजी निवेश की संभावनाओं, स्वच्छ ऊर्जा के वैश्विक लक्ष्यों और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसी अत्याधुनिक विधाओं में भारत-अमेरिका के बीच सहयोग पर गहराई से विमर्श हुआ। डॉ. मोहन भागवत ने वैश्विक निवेशकों के सामने भारत को एक विश्वसनीय, लोकतांत्रिक, कानून सम्मत और विकासोन्मुख वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में मजबूती से प्रस्तुत किया। इस चर्चा के दौरान अमेरिकी निवेशकों ने भारत के विशाल बाजार और उसकी बढ़ती आर्थिक क्षमता की सराहना तो की, लेकिन साथ ही उन्होंने राज्य स्तर पर आने वाली प्रशासनिक और विनियामक बाधाओं पर अपनी व्यावहारिक चिंताएं भी साझा कीं। निवेशकों का मुख्य तर्क यह था कि यदि भारत को चीन के एक मजबूत और सुरक्षित विकल्प के रूप में वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के केंद्र में आना है, तो भूमि अधिग्रहण, जटिल कर संरचनाओं और स्थानीय स्तर पर फैक्ट्रियां स्थापित करने से जुड़ी प्रक्रियाओं को और अधिक सरल व पारदर्शी बनाना होगा, ताकि प्रशासनिक देरी के बिना निवेश धरातल पर उतर सके। इसी बैठक में सिलिकॉन वैली की जानी-मानी निवेश भागीदार आशा जडेजा मोटवानी जैसी हस्तियों ने भागवत के इस विचार का पुरजोर समर्थन किया कि भारत की युवा जनसांख्यिकी आज दुनिया की सबसे बड़ी ताकत है, और भारतीय युवा न केवल अपने देश के विकास के इंजन हैं बल्कि वे पूरी दुनिया में सकारात्मक और तकनीकी बदलावों के सबसे बड़े संवाहक बनकर उभर रहे हैं । इसे भी पढ़ें: USCIRF बनाम RSS: आरोप, अधिकार-सीमा और भारत-अमेरिका संबंधों की अग्निपरीक्षा इस तीन दिवसीय दौरे का दूसरा और दृश्य रूप से सबसे भव्य पहलू न्यूयॉर्क के ऐतिहासिक और दुनिया भर में प्रसिद्ध मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित होने वाला 'यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन' है । रक्षाबंधन के पावन सांस्कृतिक अवसर पर आयोजित होने वाले इस विशाल समागम में पूरे अमेरिका महाद्वीप से 5,000 से अधिक विशिष्ट भारतीय प्रवासियों और सैकड़ों सांस्कृतिक, दार्शनिक व आध्यात्मिक संगठनों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति सुनिश्चित की गई । इस भव्य आयोजन के पीछे बहुत गहरे भू-राजनीतिक और सामाजिक निहितार्थ छिपे हुए हैं, क्योंकि इस पूरे उत्सव का मूल दर्शन भारतीय संस्कृति के कालजयी विचार 'वसुधैव कुटुंबकम' यानी पूरी दुनिया एक परिवार है, के सार्वभौमिक सिद्धांत पर आधारित है। ऐसे दौर में जब पूरा विश्व भू-राजनीतिक संघर्षों, युद्धों, वैचारिक ध्रुवीकरण और गंभीर जलवायु संकटों से जूझ रहा है, मैडिसन स्क्वायर गार्डन जैसे अत्यधिक प्रभावशाली पश्चिमी मंच से सर्वसमावेशी, बहुसांस्कृतिक और अंतरधार्मिक एकता का संदेश देना भारत की उस 'विश्व-मित्र' वाली छवि को वैश्विक जनमानस में स्थापित करता है जो सभी के कल्याण की कामना करती है। यह आयोजन अमेरिकी समाज, वहां की अर्थव्यवस्था, विज्ञान और राजनीति में शीर्ष पदों पर आसीन भारतीय प्रवासियों की एकजुटता और उनकी जनसांख्यिकीय व आर्थिक शक्ति का भी एक बहुत बड़ा प्रदर्शन है , जिसकी उपेक्षा कोई भी अमेरिकी सरकार या नीति-निर्माता नहीं कर सकता। इसके अतिरिक्त, इस कार्यक्रम के माध्यम से संघ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने खिलाफ बने पुराने नैरेटिव को तोड़ने और पश्चिमी दुनिया के सामने खुद को एक वैश्विक, समावेशी और परोपकारी दार्शनिक आंदोलन के रूप में पेश करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठा रहा है। इस ऐतिहासिक यात्रा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी आयाम प्रवासी भारतीयों के बीच संघ की अंतरराष्ट्रीय शाखाओं, विशेष रूप से हिंदू स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों पर पड़ने वाला प्रभाव है। डॉ. भागवत की इस उपस्थिति ने अमेरिका, कनाडा और यूरोपीय देशों में सक्रिय एचएसएस के नेटवर्क को एक नई ऊर्जा और दिशा प्रदान की है। भारत से बाहर रहने वाले हिंदुओं को अपनी संस्कृति, जड़ों और मूल्यों से जोड़े रखने में हिंदू स्वयंसेवक संघ दशकों से मूक भाव से काम कर रहा है, लेकिन इस स्तर के शीर्ष नेतृत्व के प्रवास ने इन गतिविधियों को मुख्यधारा की वैश्विक चर्चा में ला खड़ा किया है। इस यात्रा के बाद विदेशों में चल रही संघ की साप्ताहिक और मासिक 'बालगोकुलम' जैसी गतिविधियों में तेजी आने की संभावना है, जहां प्रवासी परिवारों की नई पीढ़ी को भारतीय दर्शन, योग और नेतृत्व क्षमता के संस्कार दिए जाते हैं। एचएसएस के माध्यम से प्रवासी भारतीय केवल सांस्कृतिक रूप से ही संगठित नहीं हो रहे हैं, बल्कि वे अमेरिकी समाज में परोपकार, आपदा प्रबंधन और स्थानीय सामुदायिक सेवा के कार्यों में भी अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं। संघ प्रमुख ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि विदेशों में रहने वाले स्वयंसेवकों का यह दायित्व है कि वे अपनी कर्मभूमि (अमेरिका) के प्रति पूरी तरह वफादार और अनुशासित रहते हुए अपनी मातृभूमि (भारत) के सांस्कृतिक गौरव को अक्षुण्ण रखें। यह रणनीतिक मार्गदर्शन आने वाले समय में पश्चिमी देशों में भारतीय प्रवासियों को एक ऐसे सुदृढ़ सामाजिक समूह के रूप में स्थापित करेगा, जो वैश्विक स्तर पर भारत विरोधी दुष्प्रचार का मुकाबला करने और भारत के पक्ष में एक सकारात्मक जनमत तैयार करने में अधिक सक्षम होगा। सकारात्मक आर्थिक संवाद और सांस्कृतिक महाकुंभ के समानांतर, इस यात्रा का वह अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक विवाद और विरोध प्रदर्शन भी एक अनिवार्य पहलू है जिसने न्यूयॉर्क की राजनीति को गरमाए रखा । डॉ. भागवत की इस हाई-प्रोफाइल उपस्थिति का अमेरिकी मानवाधिकार लॉबी, कुछ नागरिक अधिकार संगठनों और स्थानीय राजनेताओं द्वारा तीखा विरोध किया गया है । उदाहरण के तौर पर, न्यू यॉर्क शहर के पहले भारतीय-अमेरिकी मेयर ज़ोहरान ममदानी ने सार्वजनिक रूप से इस आयोजन और संघ की विचारधारा पर अपनी गहरी वैचारिक असहमति व्यक्त की , हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह एक निजी संस्था द्वारा आयोजित कार्यक्रम है, इसलिए नगर प्रशासन के पास इसे रोकने का कोई विधिक आधार नहीं है । इसके साथ ही 'हिंदूस फॉर ' और 'इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल' जैसे कई मुखर संगठनों ने न्यू यॉर्क सिटी हॉल के बाहर और डिजिटल मंचों पर व्यापक विरोध अभियान चलाए , जिनका यह आरोप था कि संघ का मूल वैचारिक दर्शन भारत के बहुलवादी ढांचे को प्रभावित करता है, और इस तरह के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित मंचों पर संघ प्रमुख को स्थान मिलने से संगठन को वह वैश्विक वैधता और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है जिसके वे विरोधी हैं । इस पूरे विवाद को तब और राजनीतिक हवा मिली जब 'अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर अमेरिकी आयोग' की पुरानी आलोचनात्मक रिपोर्टों का हवाला देकर विरोधी समूहों ने वीज़ा और सुरक्षा संबंधी मुद्दों पर अमेरिकी प्रशासन पर दबाव बनाने का प्रयास किया , जिसे भारत के विदेश मंत्रालय ने हमेशा की तरह पूरी तरह से पूर्वाग्रह से ग्रसित और पक्षपातपूर्ण मानकर खारिज कर दिया। इन तीखे विरोधों, तकनीकी चुनौतियों और सुरक्षा चिंताओं के बावजूद, इस यात्रा की निर्बाध निरंतरता और इसे मिल रहा भारी समर्थन यह अकाट्य रूप से सिद्ध करता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज वैश्विक विमर्श और अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीति के केंद्र में एक ऐसी अपरिहार्य शक्ति बन चुका है, जिसे अब वैश्विक मंचों पर नजरअंदाज कर पाना संभव नहीं है । भागवत की यह न्यूयॉर्क यात्रा केवल एक पारंपरिक प्रवास नहीं है, बल्कि यह भविष्य के भारत-अमेरिका संबंधों के इतिहास में एक नया वैचारिक और रणनीतिक अध्याय जोड़ने वाली घटना है। जहाँ एक तरफ इस यात्रा ने अमेरिकी कॉर्पोरेट जगत के साथ सीधा संवाद स्थापित करके भारत में भविष्य की उन्नत तकनीकों और सुरक्षित निवेश के लिए विश्वास का एक नया माहौल तैयार किया है, वहीं दूसरी तरफ मैडिसन स्क्वायर गार्डन के मंच से 'वसुधैव कुटुंबकम' के दर्शन की गूंज ने भारत की सांस्कृतिक कूटनीति को वैश्विक मंच पर एक नई ऊंचाई प्रदान की है। विरोध और समर्थन के इन वैश्विक अंतर्विरोधों के बीच, यह दौरा स्पष्ट रूप से दिखाता है कि आधुनिक भारत की वैश्विक आकांक्षाओं को पूरा करने और दुनिया के सामने भारत का सकारात्मक पक्ष रखने में अब देश के प्रमुख सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन भी राजनयिक चैनलों के समानांतर एक बेहद प्रभावशाली और महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, जिसके दूरगामी आर्थिक और सामाजिक परिणाम आने वाले समय में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होंगे। अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार

प्रभासाक्षी 29 Aug 2026 5:34 pm

संकट में Nepal के काम India ही आया, Kathmandu को China की 'दोस्ती' का सच आखिरकार समझ आया

नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ ने सिर्फ सैकड़ों जिंदगियां नहीं लील लीं, बल्कि हिमालयी क्षेत्र की राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा और पड़ोसी देशों के रिश्तों का एक बेहद महत्वपूर्ण आईना भी सामने रख दिया है। बुधवार को नेपाल-तिब्बत सीमा के आसपास ग्लेशियर के ढहने और उसके बाद मलबे के साथ आए भयावह जलप्रवाह ने रसुवा, नुवाकोट और आसपास के इलाकों में भारी तबाही मचाई। सड़कें, पुल, मकान और जलविद्युत परियोजनाएं बह गईं। इस आपदा ने नेपाल की बिजली व्यवस्था को भी ऐसा झटका दिया कि अब वही नेपाल, जो मानसून में भारत को बिजली बेचता है, जरूरत पड़ने पर भारत से बिजली मांग सकता है। यही इस त्रासदी का सबसे बड़ा विडंबनापूर्ण पहलू है। नेपाल की करीब 4,300 मेगावाट की स्थापित बिजली क्षमता में 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी जलविद्युत की है। बाढ़ ने करीब 13 जलविद्युत संयंत्रों और एक सौर परियोजना को प्रभावित किया और लगभग 360 मेगावाट उत्पादन क्षमता पर असर पड़ा। भारत को बिजली देने वाला 14 मेगावाट का देविघाट संयंत्र भी इसकी चपेट में आया। 26 अगस्त को बाढ़ के दिन भारत नेपाल से एक समय में 963.4 मेगावाट तक बिजली ले रहा था, लेकिन अगले ही दिन बिजली आपूर्ति लगभग आधी रह गई। इसे भी पढ़ें: Nepal Flood में 600 से ज्यादा मौतें, जीवित बचे लोगों ने सुनाई आपदा से जंग की दास्तान और अब तस्वीर उलट सकती है। आमतौर पर गर्मियों में भारत नेपाल से बिजली खरीदता है और सर्दियों में, जब नेपाल की जलविद्युत उत्पादन क्षमता घटती है, भारत नेपाल को बिजली देता है। लेकिन इस बार आपदा ने परिस्थितियां ऐसी बना दी हैं कि मानसून के इसी मौसम में भारत को नेपाल की मदद के लिए बिजली निर्यात करनी पड़ सकती है। दोनों देशों के बीच पहले से ही 1,000 मेगावाट की आयात-निर्यात क्षमता है, जिसे बढ़ाकर 1,400 मेगावाट से अधिक करने पर सहमति भी बन चुकी है। लेकिन बिजली से बड़ी कहानी भरोसे की है। आपदा तिब्बत से लगे इलाके में शुरू हुई। उपलब्ध वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार इसका संबंध ग्लेशियर के ढहने और भारी मलबे के नदी में आने से है। चीन ने यह आपदा पैदा की या नहीं, इसका जवाब तो वैज्ञानिक ही देंगे लेकिन आम लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि हिमालय के इस संवेदनशील भूभाग में सीमा के दोनों ओर होने वाली गतिविधियों, बुनियादी ढांचे और आपदा-प्रबंधन को लेकर भारत, नेपाल और चीन के बीच पारदर्शिता कितनी है? हालात इतने गंभीर थे कि तिब्बत की ओर एक नए ‘बैरियर लेक’ के बनने और उसके टूटने की आशंका ने नेपाल में फिर खतरे की घंटी बजा दी। इसी संकट में भारत और चीन के रवैये का फर्क नेपाल के सामने साफ दिखाई देता है। बाढ़ के कुछ ही घंटों के भीतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह से बात की और हरसंभव मानवीय सहायता का भरोसा दिया। उसी रात भारतीय वायुसेना का C-130J विमान हिंडन से काठमांडू पहुंचा और 10 टन राहत सामग्री तथा जरूरी दवाइयां भेजी गईं। इसके बाद राहत सामग्री की कुल मात्रा 47 टन से अधिक हो गई। भारत ने 24 घंटे काम करने वाला नियंत्रण कक्ष और हेल्पलाइन भी सक्रिय की। नेपाल के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और जनता जिस तरह भारत का शुक्रिया कर रहे हैं उससे उनका भारत के प्रति विश्वास भी परिलक्षित हो रहा है। देखा जाये तो यही अंतर है, मुसीबत में कौन आपके साथ खड़ा होता है और कौन सिर्फ सीमा के उस पार मौजूद रहता है। नेपाल के लिए यह समय किसी देश के पक्ष में राजनीतिक नारा लगाने का नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हित को ठंडे दिमाग से देखने का है। भारत से नेपाल का रिश्ता सिर्फ बिजली खरीदने-बेचने का नहीं है। खुली सीमा, गहरे सामाजिक रिश्ते, व्यापार, रोजगार, धार्मिक यात्राएं और रोजमर्रा की मानवीय आवाजाही दोनों देशों को असाधारण रूप से जोड़ती है। जब नेपाल में संकट आया तो भारत ने इन रिश्तों को कागज पर नहीं, जमीन और आसमान पर साबित किया। शायद नेपाल को इस संकट में एक पुरानी बात नए सिरे से समझ आई होगी, दोस्त वही नहीं जो सामान्य दिनों में साथ दिखे, दोस्त वह है जो आपदा में सबसे पहले पहुंच जाए। और चीन के साथ संबंधों को लेकर भी काठमांडू को यह तय करना होगा कि रणनीतिक साझेदारी का अर्थ केवल बड़े-बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट और निवेश नहीं है। असली साझेदारी संकट के समय दिखाई देती है। भारत और चीन के बीच नेपाल को किसी एक को चुनने की मजबूरी नहीं होनी चाहिए, लेकिन नेपाल यह जरूर देख सकता है कि उसके लिए कौन-सा पड़ोसी भरोसे का स्थायी आधार है। बहरहाल, इस बाढ़ ने नेपाल की बिजली व्यवस्था को झकझोर दिया है, लेकिन शायद इससे भी बड़ा संदेश उसकी विदेश नीति के लिए आया है। हिमालय ने एक बार फिर याद दिलाया है कि नक्शे पर सबसे नजदीक पड़ोसी ही संकट की घड़ी में सबसे उपयोगी पड़ोसी भी साबित हो सकता है। नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 29 Aug 2026 5:00 pm

निकाय चुनाव से ठीक पहले BJP में बगावत! पूर्व जिला महामंत्री राकेश भाटी ने थामा हाथ का साथ!

निकाय चुनाव से ठीक पहले BJP में बगावत! पूर्व जिला महामंत्री राकेश भाटी ने थामा हाथ का साथ!

समाचार नामा 29 Aug 2026 4:36 pm

वैश्विक तनावों के बीच बाजार में गिरावट

मुंबई, वैश्विक ब्याज दरों की दिशा को लेकर बनी अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव और निवेशकों की सतर्कता के बीच भारतीय शेयर बाजार ने लगातार तीसरे सप्ताह गिरावट दर्ज की।

देशबन्धु 29 Aug 2026 4:13 pm

सरकार ने शुरू की केंद्रीय बजट की तैयारियां

नई दिल्ली, केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2027-28 के केंद्रीय बजट की तैयारियां औपचारिक रूप से शुरू कर दी हैं।

देशबन्धु 29 Aug 2026 4:06 pm

भारत के हाथ आया Javelin हथियार, अब दुश्मनों के टैंकों की खैर नहीं! America से हुआ बड़ा रक्षा सौदा

भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग अब सिर्फ हथियार खरीदने तक सीमित नहीं रह गया है। भारतीय सेना द्वारा अमेरिकी Javelin एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल सिस्टम की खरीद के लिए Letter of Offer and Acceptance (LOA) पर हस्ताक्षर इस बदलते रिश्ते का एक महत्वपूर्ण संकेत है। अमेरिकी दूतावास ने इसे भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी को अधिक गहरा, सक्षम और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाने वाला कदम बताया है। खास बात यह है कि इस समझौते के साथ भविष्य में दोनों देशों के रक्षा उद्योगों के बीच सह-उत्पादन यानी co-production की संभावनाओं का रास्ता भी खुला है। Javelin की खासियत केवल यह नहीं है कि वह एक आधुनिक एंटी-टैंक मिसाइल है। यह एक man-portable, fire-and-forget प्रणाली है, यानी सैनिक मिसाइल दागने के बाद लक्ष्य पर लगातार नजर बनाए रखने के लिए उसी स्थान पर मौजूद रहने को मजबूर नहीं होता। यही क्षमता युद्धक्षेत्र में सैनिकों की survivability बढ़ाती है। अमेरिकी दूतावास के मुताबिक Javelin भारी बख्तरबंद वाहनों के अलावा कई दूसरे battlefield targets को भी निशाना बना सकती है और अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों में इस्तेमाल की जा सकती है। तेज engagement और उसके बाद तुरंत position बदलने की क्षमता इसे infantry के लिए खास तौर पर उपयोगी बनाती है। इसे भी पढ़ें: Shaurya Path: Kirana Hills और Skardu को लेकर पूर्व CDS Anil Chauhan के खुलासों से चौंकी दुनिया, Pakistan बात करना चाह रहा था, मगर India... भारत के लिए यह जरूरत अचानक पैदा नहीं हुई है। भारतीय सेना करीब 2009 से ही आधुनिक तीसरी पीढ़ी की anti-tank guided missile प्रणाली की तलाश में रही है। जरूरत ऐसी मिसाइल की थी जो हल्की हो, सटीक हो और fire-and-forget क्षमता से लैस हो, ताकि पुरानी wire-guided प्रणालियों की सीमाओं से बाहर निकला जा सके। लेकिन तकनीक हस्तांतरण, लागत, खरीद प्रक्रिया और बाद में स्वदेशी विकास पर जोर जैसी वजहों से आधुनिक ATGM की तलाश लंबे समय तक खिंचती रही। यही वजह है कि Javelin का मौजूदा सौदा केवल एक और विदेशी हथियार खरीद के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह भारतीय सेना की तत्काल operational जरूरत और दीर्घकालिक रक्षा औद्योगिक रणनीति के बीच एक पुल बन सकता है। अमेरिकी दूतावास ने साफ तौर पर कहा है कि LOA पर हस्ताक्षर के बाद भारत Javelin system का ग्राहक बन गया है और यह समझौता दोनों देशों के रक्षा उद्योगों के बीच भविष्य के सहयोग के लिए दरवाजा खोलता है। यानी असली रणनीतिक महत्व मिसाइलों की संख्या से कहीं आगे है। देखा जाये तो इस सौदे का सामरिक महत्व भी बेहद स्पष्ट है। भारत को ऐसे युद्धक्षेत्र में अपनी infantry की anti-armour क्षमता मजबूत करनी है जहां बख्तरबंद वाहनों के खिलाफ तेजी से प्रतिक्रिया और सटीक प्रहार महत्वपूर्ण हो जाते हैं। Javelin की portability का अर्थ है कि इसे अग्रिम मोर्चे पर तैनात सैनिक अपेक्षाकृत लचीले ढंग से इस्तेमाल कर सकते हैं। Fire-and-forget क्षमता सैनिक को launch के बाद तुरंत reposition करने की सुविधा देती है। ऐसे में missile केवल दुश्मन के armour को निशाना बनाने का साधन नहीं रहती, बल्कि छोटे infantry units की tactical flexibility बढ़ाने वाला हथियार बन जाती है। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों की दिशा का है। अमेरिकी राजदूत Sergio Gor ने कहा है कि यह समझौता अमेरिकी समर्थन की गहराई को दिखाता है और दोनों देशों के रक्षा उद्योगों के लिए नए अवसर पैदा करता है। वॉशिंगटन की नजर में भारत केवल हथियारों का खरीदार नहीं, बल्कि भविष्य के defence industrial cooperation का साझेदार भी बन सकता है। अमेरिकी दूतावास ने दोनों देशों के defence industrial bases को मजबूत करने की संभावना पर विशेष जोर दिया है। देखा जाये तो यहीं से इस सौदे का रणनीतिक महत्व बढ़ जाता है। भारत एक ओर अपनी सैन्य क्षमता को तेजी से आधुनिक बनाना चाहता है, वहीं दूसरी ओर रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में यदि Javelin के क्षेत्र में co-production की संभावना वास्तविक औद्योगिक साझेदारी में बदलती है, तो भारत को केवल तैयार हथियार हासिल करने की बजाय अमेरिकी defence technology और manufacturing ecosystem के साथ अधिक गहरा जुड़ाव मिल सकता है। यह भारत के लिए लंबी अवधि में अधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी। हालांकि एक बात अभी साफ नहीं है कि भारत कितने Javelin systems खरीद रहा है और इस खरीद की कुल कीमत कितनी है। अमेरिकी दूतावास और रक्षा मंत्रालय ने इन विवरणों को सार्वजनिक नहीं किया है। इसलिए इस सौदे को तत्काल बड़े पैमाने की anti-tank क्षमता में बदलाव मानना जल्दबाजी होगी। फिलहाल इसकी सबसे बड़ी अहमियत यह है कि भारत ने Javelin को अपने सैन्य विकल्पों में शामिल कर लिया है और साथ ही अमेरिका के साथ रक्षा औद्योगिक सहयोग का एक और दरवाजा खोल दिया है। बहरहाल, Javelin सौदे का संदेश दो स्तरों पर है। युद्धक्षेत्र के लिए भारत अपनी infantry को ज्यादा सटीक, मोबाइल और survivable anti-armour क्षमता देना चाहता है; और रणनीतिक स्तर पर वॉशिंगटन के साथ रक्षा संबंध को खरीददार-विक्रेता के रिश्ते से आगे ले जाना चाहता है। अगर co-production की बात जमीन पर उतरती है, तो यही सौदा आने वाले वर्षों में भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी के अगले चरण की शुरुआत साबित हो सकता है। नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 29 Aug 2026 4:02 pm

सोनिया गांधी की किताब में 3 संवेदनशील मुद्दों पर प्रकाशक को आपत्‍ति, कांग्रेस ने उठाए सवाल

भारत में किताब के प्रकाशन को लेकर पेंगुइन इंडिया के बयान के बाद कांग्रेस नेताओं ने सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर प्रकाशक के फैसले की आलोचना की।

देशबन्धु 29 Aug 2026 2:35 pm

दिल्ली-एनसीआर में महंगी हुई CNG: ₹3.89 प्रति किग्रा बढ़े दाम, जानें नई दरें

दिल्ली-एनसीआर में सीएनजी की कीमतों में 3.89 रुपये प्रति किलोग्राम की वृद्धि के बाद शनिवार को लोगों ने इस वृद्धि के प्रभाव पर चिंता व्यक्त की और इसे बढ़ती मुद्रास्फीति के बीच मध्यम वर्ग पर एक अतिरिक्त बोझ बताया है।

देशबन्धु 29 Aug 2026 1:34 pm

भाजपा में घमासान, जुएल ओराम का बड़ा आरोप- मुझे केंद्रीय मंत्रिमंडल से हटाने की रच रहे साजिश

केंद्रीय मंत्री जुएल ओराम ने भाजपा के कुछ नेताओं पर उन्हें मंत्रिमंडल से हटाने और बदनाम करने की साजिश का आरोप लगाया। उनके ‘हाथ काटने’ वाले बयान पर विपक्ष ने निशाना साधा।

देशबन्धु 29 Aug 2026 12:06 pm

Jadavpur University में Azadi के नारे लगाने वालों पर भड़के Suvendu Adhikari, बोले इस बीमारी की दवा और इलाज जानता हूं

पश्चिम बंगाल का जादवपुर विश्वविद्यालय एक समय देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में गिना जाता था, लेकिन आज कैंपस से ज्ञान, शोध और अकादमिक विमर्श की बजाय ‘आजादी’ के नारे और विवादित राजनीतिक गतिविधियों की खबरें सुर्खियां बन रही हैं। यहां सवाल उस मानसिकता का है जो भारत में रहते हुए भारत से ही ‘आजादी’ की मांग करने तक पहुंच जाती है। देखा जाए तो ‘कश्मीर मांगे आजादी’ जैसे उद्घोष और माओवादी नेता किशनजी के समर्थन में लिखे नारों ने एक बेहद असहज सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर विश्वविद्यालय के भीतर किस तरह की राजनीति और किस तरह की मानसिकता को जगह दी जा रही है? ऐसे लोगों को लेकर पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का रुख बिल्कुल स्पष्ट और सख्त है। उन्होंने दो टूक अंदाज में कहा है कि वे इस ‘बीमारी’ को जानते हैं और इसकी ‘दवा और इलाज’ भी जानते हैं। इसे भी पढ़ें: Suvendu Adhikari ने फुटपाथ वाली महिला को दिया आवास का भरोसा, TMC पर साधा निशाना देखा जाए तो जादवपुर की घटना ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि विश्वविद्यालयों को वैचारिक स्वतंत्रता का केंद्र बनाए रखा जाए या ऐसी राजनीति का अखाड़ा बनने दिया जाए, जो धीरे-धीरे पूरे अकादमिक माहौल को विषाक्त कर देती है। यह सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि ‘आजादी’ शब्द अपने आप में समस्या नहीं है। लोकतंत्र में हर नागरिक को अपनी बात कहने, असहमति जताने और सरकार की आलोचना करने का अधिकार है। लेकिन जब ‘आजादी’ का नारा भारत की संप्रभुता और अखंडता पर सवाल उठाने वाले नारों के साथ जुड़ता है, तब उसे महज छात्र राजनीति या वैचारिक असहमति कहकर टाल देना भी उचित नहीं होगा। जादवपुर में उठे नारों के संदर्भ में यही सबसे बड़ा प्रश्न है कि आखिर किससे और किस चीज से आजादी मांगी जा रही है? शुभेंदु अधिकारी ने इसी सवाल को बेहद तीखे अंदाज में उठाया है। विश्वविद्यालय के बाहर करीब दस हजार लोगों की मौजूदगी में ‘वंदे मातरम्’ कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि शिक्षा परिसरों में इस तरह के नारे बंद होने चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि जिस आजादी के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस, खुदीराम बोस, भगत सिंह, मातंगिनी हाजरा और अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना जीवन बलिदान कर दिया, उस आजादी को हासिल किए दशकों बीत चुके हैं। शुभेंदु अधिकारी के इस कड़े रुख की तारीफ इसलिए होनी चाहिए कि उन्होंने उस असहज सवाल को उठाने का साहस किया है जिसे अक्सर राजनीतिक शुद्धता के नाम पर दबा दिया जाता है। विश्वविद्यालय विचारों की प्रयोगशाला हो सकता है, लेकिन वह राष्ट्र-विरोधी हिंसक विचारधाराओं का सुरक्षित अड्डा नहीं बन सकता। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और देश की अखंडता को चुनौती देने के बीच एक स्पष्ट रेखा है। उस रेखा को जानबूझकर धुंधला करना लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा नहीं, बल्कि उनका दुरुपयोग है। सबसे चिंता की बात यह है कि जादवपुर की घटना को अलग-थलग घटना मानकर छोड़ देना वास्तविक समस्या से आंखें मूंदना होगा। देश के कई विश्वविद्यालयों में पिछले वर्षों में ऐसे नारे और ऐसी राजनीति कैंपस के अकादमिक वातावरण पर भारी पड़ी है। जेएनयू हो, हैदराबाद विश्वविद्यालय हो या दूसरे परिसरों में उभरे अतिवादी छात्र राजनीतिक संघर्ष हों, जब विश्वविद्यालय में पढ़ाई से ज्यादा पहचान की राजनीति, वैचारिक ध्रुवीकरण, हिंसक टकराव और उकसाऊ नारों को महत्व मिलने लगता है तो अंततः सबसे बड़ा नुकसान छात्रों की शिक्षा और संस्थान की प्रतिष्ठा को होता है। जादवपुर को लेकर शुभेंदु अधिकारी ने इसी संदर्भ में जेएनयू और उस्मानिया विश्वविद्यालय का उदाहरण देते हुए कैंपस को ‘सुधारने’ की बात कही है। यहां एक और सवाल पूछा जाना चाहिए। जो लोग हर मुद्दे पर ‘आजादी’ का नारा लगाते हैं, क्या वे देश के संविधान, लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों को भी उसी गंभीरता से स्वीकार करते हैं? क्या उन्हें उन सैनिकों की चिंता है जो देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए शहीद हो जाते हैं? क्या उन्हें उन नागरिकों की चिंता है जो आतंकवाद का शिकार होते हैं? और यदि उनकी लड़ाई अन्याय के खिलाफ है तो वह लड़ाई विश्वविद्यालय की कक्षाओं, शोध और लोकतांत्रिक बहस के जरिए क्यों नहीं लड़ी जाती? बेशक, सरकार या मुख्यमंत्री को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि वैध असहमति को दबाया न जाए। किसी छात्र को केवल विचार रखने के कारण देशद्रोही करार देना भी लोकतांत्रिक रास्ता नहीं है। लेकिन यही सिद्धांत दूसरी तरफ भी लागू होना चाहिए कि विचारधारा के नाम पर देश की संप्रभुता और अखंडता को चुनौती देने वाले नारों को भी ‘छात्र अधिकार’ का कवच नहीं मिल सकता। देखा जाए तो जादवपुर का सवाल इसलिए सिर्फ एक विश्वविद्यालय का सवाल नहीं है। यह उस दिशा का सवाल है जिसमें देश के विश्वविद्यालय आगे बढ़ेंगे। क्या वे ज्ञान, शोध, तर्क और राष्ट्रनिर्माण के केंद्र बनेंगे या राजनीतिक कट्टरता के अखाड़े? शुभेंदु अधिकारी ने कम से कम इस बहस को सामने लाने का काम किया है। अब जरूरत है कि विश्वविद्यालय प्रशासन भी साफ करे कि कैंपस में विचारों की आजादी होगी, लेकिन हिंसा, धमकी और देश की अखंडता के खिलाफ उकसावे के लिए कोई आजादी नहीं होगी। बहरहाल, आखिर विश्वविद्यालय वह जगह है जहां आने वाली पीढ़ियां देश का भविष्य लिखती हैं। वहां अगर ‘आजादी’ का अर्थ भारत से आजादी तक पहुंचने लगे, तो सवाल नारे लगाने वालों से पूछा ही जाना चाहिए कि जिस देश ने आपको बोलने की आजादी दी, आखिर उसी देश से आपको किस आजादी की तलाश है?

प्रभासाक्षी 29 Aug 2026 11:43 am

अखिलेश यादव ने मुस्लिम महिलाओं से बंधवाई राखी तो 'घर वापसी' हो गई : नंदकिशोर गुर्जर

अखिलेश यादव ने मुस्लिम महिलाओं से बंधवाई राखी तो 'घर वापसी' हो गई : नंदकिशोर गुर्जर

समाचार नामा 28 Aug 2026 10:27 pm

आंध्र प्रदेश: वाईएसआरसीपी ने मुख्यमंत्री नायडू पर वेलिगोंडा परियोजना का श्रेय 'हड़पने' का आरोप लगाया

आंध्र प्रदेश: वाईएसआरसीपी ने मुख्यमंत्री नायडू पर वेलिगोंडा परियोजना का श्रेय 'हड़पने' का आरोप लगाया

समाचार नामा 28 Aug 2026 9:49 pm

भाजपा की ज्यादतियों से बंगाल में तृणमूल की वापसी सुनिश्चित होगी: ममता बनर्जी

भाजपा की ज्यादतियों से बंगाल में तृणमूल की वापसी सुनिश्चित होगी: ममता बनर्जी

समाचार नामा 28 Aug 2026 8:21 pm

पंजाब यूनिवर्सिटी छात्रसंध चुनाव को लेकर घमासान: एबीवीपी ने 'आप' पर लगाया गंभीर आरोप

पंजाब यूनिवर्सिटी छात्रसंध चुनाव को लेकर घमासान: एबीवीपी ने 'आप' पर लगाया गंभीर आरोप

समाचार नामा 28 Aug 2026 8:17 pm

उपराष्ट्रपति ने बच्चों संग तो ओम बिरला ने लाड़ली बहनों संग मनाया त्योहार, नितिन नवीन को महिला कार्यकर्ताओं ने बांधी राखी

उपराष्ट्रपति ने बच्चों संग तो ओम बिरला ने लाड़ली बहनों संग मनाया त्योहार, नितिन नवीन को महिला कार्यकर्ताओं ने बांधी राखी

समाचार नामा 28 Aug 2026 4:19 pm

विपक्ष को कूटनीति में भी राजनीति नजर आती है, 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम सनातन विरोधी: आरपी सिंह

विपक्ष को कूटनीति में भी राजनीति नजर आती है, 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम सनातन विरोधी: आरपी सिंह

समाचार नामा 27 Aug 2026 10:11 pm

नेपाल बाढ़ त्रासदी में 160 से ज्यादा मौतें, भारत हर संभव मदद के लिए तैयार: संजय निरुपम

नेपाल बाढ़ त्रासदी में 160 से ज्यादा मौतें, भारत हर संभव मदद के लिए तैयार: संजय निरुपम

समाचार नामा 27 Aug 2026 6:06 pm

रक्षाबंधन 2026: एक राखी, अनेक संकल्प

“येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥” जिस रक्षा सूत्र से महाबली राजा बलि को बाँधा गया था, उसी रक्षा-सूत्र से मैं तुम्हें बाँधता हूँ। हे रक्षासूत्र! तुम अडिग रहना, अपने संकल्प से कभी विचलित मत होना। रक्षाबंधन पर धागों पर बंधन एक संकल्प है। वह धागा राखी का नहीं, रिश्तों का होता है। बहन जब भाई की कलाई पर राखी बाँधती है तो वह केवल धागा नहीं बाँधती। वह अपने बचपन को बाँधती है, अपनी स्मृतियों को बाँधती है, अपने विश्वास को बाँधती है। उसकी आँखों में एक मौन प्रार्थना होती है- “भैया! जीवन चाहे जितना बदल जाए, हमारे रिश्ते का यह विश्वास कभी मत बदलना।” और भाई भी जब बहन की ओर देखता है तो उसके मन में एक संकल्प जन्म लेता है- “तुम्हारे जीवन में कोई कठिनाई आए तो मैं तुम्हारे साथ खड़ा रहूँगा।” यही रक्षाबंधन है। भारतीय संस्कृति की सुंदरता यह है कि वह किसी पर्व को केवल व्यक्तिगत संबंध तक सीमित नहीं रखती। वह एक छोटे से पारिवारिक संस्कार को भी व्यापक सामाजिक संदेश में बदल देती है। रक्षा केवल बहन की नहीं करनी है। रक्षा रिश्तों की करनी है। रक्षा संस्कारों की करनी है। रक्षा समाज की करनी है। रक्षा संस्कृति की करनी है। रक्षा राष्ट्र की करनी है। और रक्षा उस प्रकृति की करनी है, जिसके बिना हमारा अस्तित्व ही संभव नहीं। इसे भी पढ़ें: रिश्तों की पवित्रता और सुरक्षा के संकल्प का पर्व रक्षाबंधन हम अक्सर कहते हैं कि देश की रक्षा सैनिक करते हैं। यह सत्य है और इस सत्य के सामने हमारा सिर श्रद्धा से झुक जाता है। सीमा पर खड़ा सैनिक अपने घर की राखी छोड़कर राष्ट्र की रक्षा के लिए तैनात रहता है। वह जानता है कि उसके पीछे करोड़ों परिवार चैन की नींद सो रहे हैं। किसी सैनिक की कलाई पर बँधी राखी में भारत माता की रक्षा का आशीर्वाद भी होता है। कल्पना कीजिए उस बहन की, जो अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधते हुए मन ही मन कहती होगी- “भैया! तुम देश की सीमा पर रहकर लाखों बहनों की रक्षा करना, मैं यहाँ तुम्हारे लौटने की प्रार्थना करूँगी।” यह भाव केवल एक परिवार का नहीं है। यह पूरे राष्ट्र का भाव है। लेकिन राष्ट्र की रक्षा केवल सीमा पर नहीं होती। जब कोई शिक्षक अपने विद्यार्थियों में चरित्र का निर्माण करता है, तब वह राष्ट्र की रक्षा करता है। जब कोई किसान कठिन परिश्रम करके खेत में अन्न उगाता है, तब वह राष्ट्र की रक्षा करता है। जब कोई चिकित्सक ईमानदारी से रोगी का उपचार करता है, तब वह राष्ट्र की रक्षा करता है। जब कोई वैज्ञानिक देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए अनुसंधान करता है, तब वह राष्ट्र की रक्षा करता है। और जब एक सामान्य नागरिक ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाता है, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करता है, कानून का सम्मान करता है और देश की एकता को मजबूत करता है, तब वह भी राष्ट्र की रक्षा करता है। इस रक्षाबंधन पर हमें अपने भीतर एक अदृश्य राखी बाँधनी चाहिए, जो कर्तव्य करने का संकल्प बन सके। हम आधुनिक बनें, विज्ञान और तकनीक में आगे बढ़ें, दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाएँ- यह आवश्यक है। आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों को भूल जाना नहीं है। राखी केवल बाजार से खरीदा हुआ धागा नहीं है। उसके पीछे हजारों वर्षों की सांस्कृतिक चेतना है। वे यह समझें कि भारतीय पर्व जीवन मूल्यों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुँचाने वाले माध्यम हैं। हमारे त्योहार हमें जोड़ते हैं। वे हमें बताते हैं कि जीवन केवल स्वयं के लिए जीने का नाम नहीं है। हमारे पर्व वास्तव में हमारी संस्कृति की जीवित पाठशालाएँ हैं। इसलिए संस्कृति की रक्षा का अर्थ केवल पुरानी परंपराओं को दोहराना नहीं है। संस्कृति की रक्षा का अर्थ है- उसके मूल्यों को अपने जीवन में उतारना। प्रकृति हमें बार-बार संकेत दे रही है कि अब उसकी रक्षा का समय आ गया है। तो क्यों न इस रक्षाबंधन पर एक नई परंपरा शुरू की जाए? एक राखी भाई की कलाई पर और एक राखी वृक्ष की शाखा पर। यदि एक परिवार हर वर्ष एक वृक्ष की जिम्मेदारी ले ले, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए कितनी बड़ी विरासत तैयार हो सकती है। रक्षा का अर्थ अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व है। हर अधिकार के साथ एक उत्तरदायित्व जुड़ा होता है। जिसकी रक्षा करने का संकल्प लेते हैं, उसके प्रति हमारी जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है। एक राखी, अनेक संकल्प। इस बार जब बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधे तो भाई केवल उपहार देने तक सीमित न रहे। दोनों मिलकर कुछ संकल्प लें- माता-पिता का सम्मान करेंगे। परिवार में संवाद बनाए रखेंगे। बुजुर्गों को अकेला नहीं छोड़ेंगे। बच्चों को संस्कार देंगे। जरूरतमंद की सहायता करेंगे। देश की संपत्ति को अपनी संपत्ति समझेंगे। प्रकृति को नुकसान नहीं पहुँचाएँगे। यदि रक्षाबंधन इन संकल्पों का पर्व बन जाए तो समाज की कितनी समस्याएँ अपने आप कम हो सकती हैं। वस्तुएँ कुछ समय बाद पुरानी हो जाती हैं, लेकिन संकल्प जीवनभर साथ रहता है। रक्षाबंधन की राखी कलाई पर बँधती है, लेकिन उसका अर्थ हृदय में उतरना चाहिए। उसकी डोर हमें बचपन से जोड़ती है, परिवार से जोड़ती है, समाज से जोड़ती है, संस्कृति से जोड़ती है और अंततः राष्ट्र से जोड़ती है। यह धागा हमें बताता है कि जीवन में केवल अपने सुख की चिंता करना पर्याप्त नहीं है। इसलिए इस रक्षाबंधन पर एक राखी कलाई पर बाँधिए और एक संकल्प हृदय में। एक रिश्ता बचाइए। एक बुजुर्ग का हाथ थामिए। एक वृक्ष बचाइए। एक जलस्रोत को स्वच्छ रखिए। तभी राखी का धागा सचमुच मजबूत होगा। यही रक्षाबंधन की सार्थकता है। - डॉ. वन्दना सेन पार्वती बाई गोखले विज्ञान महाविद्यालय जीवाजीगंज, लश्कर ग्वालियर म. प्र.

प्रभासाक्षी 27 Aug 2026 4:39 pm

Vanakkam Poorvottar: एक Water Bomb भारत के बगल में भी रख रहा है China, Brahmaputra पर बन रहा China Motuo Hydropower Project ला सकता है आपदा

नेपाल में ग्लेशियर ढहने से आई विनाशकारी बाढ़ ने सिर्फ हिमालय की नाजुक भौगोलिक संरचना को उजागर नहीं किया है, बल्कि भारत की सीमा से सटे तिब्बत में चीन के निर्माणाधीन 60,000 मेगावाट के मेदोग हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट को लेकर भी खतरे की घंटी तेज कर दी है। नेपाल में सैंकड़ों लोगों की मौत और 750 लोगों के लापता होने की खबरों के बीच अब यह सवाल और गंभीर हो गया है कि दुनिया के सबसे सक्रिय भूकंपीय क्षेत्रों में से एक हिमालय में इतना विशाल बांध आखिर कितना सुरक्षित है। हम आपको बता दें कि शुरुआत में नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र में आई इस आपदा को 4.4 तीव्रता के भूकंप से जोड़कर देखा गया था। लेकिन अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (यूएसजीएस) के नए विश्लेषण ने तस्वीर बदल दी। यूएसजीएस के अनुसार, अतिरिक्त भूकंपीय आंकड़ों और उपग्रह तस्वीरों के अध्ययन से पता चला कि यह भूकंप नहीं था, बल्कि ग्लेशियर के ढहने और उसके बाद मलबे के तेज बहाव से उत्पन्न कंपन थे। ऊंचाई वाले इलाके से टूटकर नीचे आया बर्फ और मलबे का विशाल हिस्सा देखते ही देखते विनाशकारी जलप्रवाह में बदल गया और नेपाल के रसुवा तथा धादिंग जिलों में भारी तबाही मचा दी। इसे भी पढ़ें: 15 दिनों के भीतर दो बार एक मंच पर आएंगे मोदी-पुतिन और शी, ट्रंप की बेचैनी बढ़ी इस आपदा में 133 भारतीय नागरिकों समेत सैकड़ों लोग लापता बताए गए हैं। बड़ी संख्या में कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गए श्रद्धालुओं के भी प्रभावित होने की खबर है। घर, सड़कें और बिजली परियोजनाएं पानी के तेज बहाव में बह गईं। भू-आकृति विशेषज्ञ डेनियल शुगर के आकलन के मुताबिक, ऊंचाई वाले क्षेत्र में ग्लेशियर के खिसककर टूटने और पिघलती बर्फ से बने पानी ने इस भयावह घटना को जन्म दिया। लेकिन नेपाल की यह त्रासदी अब भारत के लिए एक बड़ी चेतावनी के रूप में देखी जा रही है। इसकी वजह है चीन का मेदोग या मोटुओ हाइड्रोपावर स्टेशन, जिसका निर्माण यारलुंग त्सांगपो नदी पर किया जा रहा है। यही नदी भारत में प्रवेश करते ही अरुणाचल प्रदेश में सियांग और आगे असम में ब्रह्मपुत्र कहलाती है। करीब 60 गीगावाट क्षमता वाली यह परियोजना पूरी होने पर दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना बन सकती है। इसके 2033 तक चालू होने का लक्ष्य बताया गया है। परियोजना की अनुमानित लागत 137 अरब डॉलर से 170 अरब डॉलर के बीच है और इसमें यारलुंग त्सांगपो के विशाल मोड़ वाले क्षेत्र में पांच चरणों में जलविद्युत ढांचा विकसित करने की योजना है। सबसे बड़ा सवाल इसकी विशालता नहीं, बल्कि इसका स्थान है। मेदोग परियोजना उस हिमालयी क्षेत्र में बनाई जा रही है जहां भारतीय और यूरेशियाई टेक्टोनिक प्लेटों का टकराव होता है। जुलाई में चीन की सरकारी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण व्यवस्था से जुड़े भूवैज्ञानिकों के एक अध्ययन ने भी परियोजना स्थल के नीचे सक्रिय पाइझेन फॉल्ट होने की बात कही थी। यानी जिस क्षेत्र में धरती की हलचल स्वयं एक स्थायी खतरा है, वहीं दुनिया का सबसे विशाल बांध खड़ा किया जा रहा है। रणनीतिक विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने इसे “वॉटर बम” की संज्ञा देते हुए चेतावनी दी है कि किसी बड़े भूकंप, भूस्खलन, हिमस्खलन या अचानक जलप्रवाह की स्थिति में इसका असर भारत के पूर्वोत्तर और आगे बांग्लादेश तक पड़ सकता है। पूर्व राजदूत राजीव डोगरा ने भी अरुणाचल और असम के लिए कहीं बड़ी तबाही की आशंका जताई है। वहीं भारत की चिंता केवल संभावित बांध दुर्घटना तक सीमित नहीं है। चीन नदी के ऊपरी हिस्से को नियंत्रित करता है। हालांकि ब्रह्मपुत्र के जल का बड़ा हिस्सा भारत में मानसूनी सहायक नदियों से आता है, फिर भी तिब्बत से छोड़े जाने वाले पानी की मात्रा और समय में बड़े बदलाव अरुणाचल और असम के लिए गंभीर समस्या पैदा कर सकते हैं। भारी बारिश के दौरान अचानक बड़ी मात्रा में पानी छोड़ा गया तो बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है, जबकि सूखे दौर में प्रवाह कम होने से कृषि, मत्स्य पालन और स्थानीय समुदाय प्रभावित हो सकते हैं। अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू पहले ही इस परियोजना को अस्तित्व से जुड़ा खतरा बता चुके हैं। भारत ने जवाबी रणनीति के तौर पर सियांग नदी पर 11,000 मेगावाट की अपर सियांग मल्टीपर्पज परियोजना को आगे बढ़ाया है, जिसका एक उद्देश्य ऊपरी हिस्से से आने वाले अचानक जलप्रवाह को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा कवच तैयार करना है। हालांकि इस परियोजना को लेकर अपर सियांग की आदि जनजातीय समुदायों में विस्थापन और पारदर्शिता को लेकर विरोध भी मौजूद है। देखा जाये तो नेपाल की त्रासदी ने पूर्व चेतावनी का एक गंभीर सवाल खड़ा किया। आरोप है कि तिब्बत की ओर से आने वाली इस विशाल जलराशि के बारे में नेपाल को समय पर सूचना नहीं मिली। भारत के लिए भी यह चिंता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चीन और भारत के बीच ऐसा कोई व्यापक जल-साझेदारी समझौता नहीं है, जिसके तहत वास्तविक समय में व्यापक हाइड्रोलॉजिकल जानकारी साझा करना अनिवार्य हो। हिमालय ने नेपाल की बाढ़ के जरिए एक बार फिर बता दिया है कि यहां खतरा केवल भूकंप का नहीं है। ग्लेशियर ढह सकते हैं, पहाड़ टूट सकते हैं, भूस्खलन नदी का रास्ता बदल सकते हैं और देखते ही देखते शांत जलधारा विनाश की दीवार बन सकती है। ऐसे में सक्रिय फॉल्ट लाइन के ऊपर खड़ा हो रहा चीन का मेदोग मेगा डैम केवल इंजीनियरिंग परियोजना नहीं, बल्कि भारत की जल सुरक्षा, पर्यावरण, आपदा प्रबंधन और रणनीतिक सुरक्षा से जुड़ा एक गंभीर प्रश्न है। बहरहाल, नेपाल की तबाही एक स्थानीय आपदा भर नहीं है। यह पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए चेतावनी है, क्योंकि पहाड़ जब करवट लेता है, तो सीमाएं उसकी तबाही को रोक नहीं पातीं। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 27 Aug 2026 3:23 pm

फरक्का समझौता को बिहार-झारखंड के लिए अभिशाप नहीं वरदान बनाइए, समझिए कैसे बनेगा?

“फरक्का समझौता बिहार-झारखंड के लिए अभिशाप है” यह कहना एक राजनीतिक व क्षेत्रीय तर्क के रूप में तो समझ में आता है, लेकिन तथ्यात्मक रूप से एक जरूरी फर्क यह भी है कि वास्तविक समस्या केवल 1996 के भारत-बांग्लादेश जल-बंटवारा समझौते की नहीं, बल्कि फरक्का बैराज की जल-प्रवाह व्यवस्था, गाद (silt) जमाव और उससे पैदा हुए नदी-भूगोल की भी है, जिस पर गहन चिंतन मनन आवश्यक है ताकि बिहार को बाढ़ के मामले में 1972 के बाद से ही जिस अप्राकृतिक और अमानवीय परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, उससे मुक्ति मिले। यही नहीं, इस केंद्रीय नीति से बिहार को बाढ़ जनित होने वाली वार्षिक जन-धन की हानि व फसल क्षति और आधारभूत संरचना यानी सड़क/रेल आदि की व्यापक क्षति का वार्षिक मुआवजा मिले, जो कि फरक्का बराज से लाभान्वित होने वाले समूहों से वसूला जाए। चूंकि इस मानव कृत आपदा से यूपी के दो जिले गाजीपुर और बलिया जनपद तक प्रभावित होते हैं। इसलिए मुआवजा उन्हें भी मिलना चाहिए। इसे भी पढ़ें: Mecca Defence Pact के बहाने बदल रहा है Bangladesh का रणनीतिक खेल, भारत को चारों ओर से घेरने की तैयारी! यह बात मैं नहीं, बल्कि इस मामले से जुड़े लोगों ने अपने गहन अनुभवों के द्वारा समय समय पर अभिव्यक्त किया है, जो मेरी स्मृतियों में अब तक सुरक्षित है। वक्त वक्त पर इस पूरे क्षेत्र की बाढ़ आपदा मीडिया रिपोर्टिंग टीम का अंग होने नाते भी इस बारे में विविधता पूर्ण जानकारी मुझे हासिल है। पीड़ित बुजुर्ग खुद बताते आये हैं कि 1972 के बाद बाढ़ आपदा स्थायी हुई है, पहले तो पानी आता और चला जाता, इतना जमता नहीं! मुझे खुशी है कि अपनी प्रभुत्व वाली सत्ता जाने के बाद ही सही लेकिन जनता दल यूनाइटेड को सद्बुद्धि आ गई है और उसके राज्य सभा सदस्य संजय झा इस मामले में मुखर हैं। इसी में राज्य हित भी निहित है। सीधा सवाल है कि आखिर जब केंद्र सरकार बिहार के दूरगामी हितों की रक्षा नहीं करेगी तो फिर कौन करेगा? वो भी तब, जब बिहार-पश्चिम बंगाल में और केंद्र में भी भाजपा/एनडीए गठबंधन की ही सरकार हो? वहीं, इस समझौते से लाभान्वित होने वाला बंगलादेश अब भारत का हितैषी नहीं, बल्कि चीन-पाकिस्तान की प्रतिशोधी भाषा बोलने को अभिशप्त हो! ऐसे में उसे कूटनीतिक पाठ पढ़ाने का भी यही असली मौका है। # जानिए की बिहार के लिए संकट कहाँ है? पहला, गंगा की प्राकृतिक धारा में हस्तक्षेप: फरक्का बैराज 1975 में चालू हुआ। इसका मूल उद्देश्य गंगा से पानी हुगली में मोड़कर कोलकाता बंदरगाह में गाद जमने की समस्या कम करना था। समस्या यह है कि गंगा जैसी अत्यधिक गाद वाली नदी को बैराज से नियंत्रित करने पर ऊपर की ओर sediment deposition और नदी की morphology में बदलाव होता है। शोध में भागलपुर से फरक्का तक के क्षेत्र में 1973–2019 के दौरान नदी के स्वरूप, कटाव और द्वीप/बालू जमाव में बड़े बदलाव दर्ज किए गए हैं; अध्ययन ने फरक्का बैराज को upstream flooding और planform बदलाव की बढ़ी दर से जोड़ा है। दूसरा, बिहार का “बाढ़–कटाव” संकट: गंगा की तलहटी में गाद बढ़ने से नदी की जलधारण क्षमता घट सकती है। एक शोध में कहा गया है कि निचली गंगा के कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर siltation से channel capacity कम हुई है, जिसके कारण अपेक्षाकृत कम discharge पर भी गंभीर बाढ़ हो सकती है; शोध ने फरक्का को नदी की morphology प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण कारकों में शामिल किया है। यही वजह है कि भागलपुर, मुंगेर, कटिहार और आसपास के गंगा-तटीय इलाकों में बाढ़ तथा कटाव को फरक्का के प्रश्न से अलग करके देखना अधूरा होगा—हालाँकि यह कहना भी वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा कि इन जिलों की हर बाढ़ केवल फरक्का के कारण होती है। लेकिन यह हकीकत है कि पश्चिम बंगाल के ऊपरी जिलों में पानी पहुंचाने के लिए जब तक बराज का गेट बंद रखा जाता है तो रुका हुआ पानी पूर्वी उत्तरप्रदेश के दो जिलों तक के जल स्तर को ऊंचा उठा देता है, जो कृत्रिम बाढ़ समझा जाता है। तीसरा, झारखंड पर भी अप्रत्यक्ष असर: राजमहल–साहिबगंज क्षेत्र गंगा के उसी नदी-तंत्र में है। फरक्का के ऊपर नदी के प्रवाह, sediment deposition और channel migration में बदलाव का असर झारखंड के साहिबगंज–राजमहल क्षेत्र की तटीय भूमि और कटाव पर पड़ सकता है। अध्ययन में राजमहल क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण deposition दर्ज किया गया है। # असली राजनीतिक सवाल यह कि पानी किसका? 1996 की गंगा जल बंटवारा संधि में भारत और बांग्लादेश के बीच फरक्का पर जनवरी से मई तक lean season में पानी बांटने का फार्मूला तय किया गया था। यह संधि 30 वर्ष के लिए थी और 2026 में इसकी अवधि समाप्त हो रही है। यहीं बिहार का तर्क ज्यादा गंभीर हो जाता है: सवाल है कि जब गंगा का पानी बिहार से होकर गुजरता है और बाढ़, कटाव तथा गाद का बोझ बिहार झेलता है, तो भविष्य की जल-संधि बनाते समय बिहार की जल-आवश्यकताओं और नदी-प्रबंधन को निर्णायक महत्व क्यों न मिले? मसलन, संधि में फरक्का पर उपलब्ध जल के आधार पर भारत-बांग्लादेश के बीच हिस्सेदारी का फार्मूला है—70,000 क्यूसेक या उससे कम पर 50:50 आदि। लेकिन बिहार की बाढ़, गाद, भूजल, सिंचाई, पेयजल और भविष्य की जल-जरूरत को उसी स्तर पर द्विपक्षीय जल-बंटवारे के केंद्र में नहीं रखा गया। यही वह जगह है जहाँ बिहार को लगता है कि वह नदी का ऊपरी प्रवाह क्षेत्र का हितधारक होते हुए भी निर्णय-प्रक्रिया में पर्याप्त आवाज नहीं रखता। लेकिन यहां पर एक महत्वपूर्ण सावधानी भी बरतनी है। इसे केवल “फरक्का समझौते ने बिहार को बर्बाद कर दिया” कहना अतिशयोक्ति होगी। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार गंगा की अस्थिरता के पीछे प्राकृतिक sediment load, सहायक नदियाँ, नदी की बहुत कम ढाल, जलवायु/वर्षा, upstream water abstraction और मानवीय हस्तक्षेप—कई कारण हैं। फरक्का उनमें एक महत्वपूर्ण कारक है, अकेला कारण नहीं। इसलिए 2026 में बिहार की मांग क्या होनी चाहिए? यक्ष प्रश्न है। मेरे हिसाब से मुद्दा “बांग्लादेश को पानी देना बंद करो” नहीं होना चाहिए, बल्कि “भारत-बांग्लादेश समझौता + बिहार-झारखंड की जल-सुरक्षा + राष्ट्रीय गाद प्रबंधन नीति + गंगा की ecological flow को दृष्टिगत रखते हुए एक समग्र समझौता” होना चाहिए। और इसमें पाँच बातें अनिवार्य होनी चाहिए— एक, बिहार की न्यूनतम जल-आवश्यकता पहले निर्धारित हो। दो, गंगा की गाद के वैज्ञानिक प्रबंधन की राष्ट्रीय नीति बने। तीन, भागलपुर–मुंगेर–साहिबगंज–राजमहल क्षेत्र के कटाव को अंतरराज्यीय/राष्ट्रीय परियोजना माना जला। चार, फरक्का के gate operation का real-time scientific review हो। पांच, भविष्य की भारत-बांग्लादेश संधि में बिहार और झारखंड की संस्थागत भागीदारी हो। यानी असली सवाल “फरक्का रहे या हटे?” से आगे है—“फरक्का के कारण पैदा हुए जल, गाद और बाढ़ के लाभ-हानि का न्यायपूर्ण बंटवारा कौन सुनिश्चित करेगा?” और यही बिहार की सबसे मजबूत दलील बन सकती है। इसलिए फरक्का समझौता को बिहार-झारखंड के लिए अभिशाप नहीं वरदान बनाइए। अगर उपर्युक्त बातों पर गौर करेंगे तो यह असंभव नहीं होगा। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 27 Aug 2026 3:18 pm

15 दिनों के भीतर दो बार एक मंच पर आएंगे मोदी-पुतिन और शी, ट्रंप की बेचैनी बढ़ी

भारतीय विदेश मंत्रालय ने आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एससीओ शिखर सम्मेलन में शिरकत करने की पुष्टि करते हुए उनके उज्बेकिस्तान और किर्गिस्तान दौरे के कार्यक्रम के बारे में जानकारी दी जिसके बाद पूरी दुनिया में हलचल-सी मच गयी है। हलचल इसलिए मची है क्योंकि जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग एक बार फिर एक साथ दिखाई देंगे, तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सीने पर पिछले साल की तरह फिर से सांप लोट सकते हैं। पिछली बार चीन के तियानजिन में एससीओ मंच पर इन तीन नेताओं की तस्वीर ने अमेरिकी रणनीतिक हलकों में बेचैनी बढ़ा दी थी। तब पूर्व अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने ट्रंप की टैरिफ नीतियों को भारत-अमेरिका रिश्तों को दशकों पीछे धकेलने वाला कदम बताया था और कहा था कि ऐसी नीतियों ने मोदी को पुतिन और शी के और करीब पहुंचा दिया। अब दृश्य और बड़ा है। पहले मध्य एशिया, फिर नई दिल्ली यानि पहले एससीओ और उसके तुरंत बाद ब्रिक्स। संदेश साफ है कि भारत किसी की रणनीतिक जागीर नहीं है। देखा जाये तो प्रधानमंत्री मोदी की उज्बेकिस्तान यात्रा और किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में 31 अगस्त से 1 सितंबर तक होने वाला एससीओ शिखर सम्मेलन ऐसे समय पर हो रहा है, जब मध्य एशिया वैश्विक शक्ति संघर्ष का नया मैदान बन चुका है। चीन बेल्ट एंड रोड के जरिए अपनी पकड़ बढ़ा रहा है, रूस इस क्षेत्र को अपने पारंपरिक प्रभाव क्षेत्र के रूप में देखता है और अमेरिका भी यहां अपनी मौजूदगी तथा रणनीतिक पहुंच बनाए रखने की कोशिश में है। ऐसे में मोदी की सक्रिय कूटनीति भारत को खेल का महत्वपूर्ण खिलाड़ी बना रही है। इसे भी पढ़ें: दुश्मनों पर दनादन बरसेंगी मिसाइलें, भारत में Private Companies भी बनाएंगी Missiles, Rajnath Singh ने DRDO की Technology Transfer को दी मंजूरी उज्बेकिस्तान इस रणनीति का अहम केंद्र है। मोदी की प्रस्तावित ताशकंद यात्रा व्यापार, रक्षा, निवेश, कनेक्टिविटी, डिजिटल तकनीक, ऊर्जा और महत्वपूर्ण खनिजों जैसे क्षेत्रों में सहयोग को नई गति दे सकती है। पिछले पांच वर्षों में भारत-उज्बेकिस्तान व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और द्विपक्षीय कारोबार लगभग 1.3 अरब डॉलर तक पहुंचने का उल्लेख किया गया है। भारत का निवेश फार्मास्यूटिकल्स, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में फैला है, जबकि भारतीय विश्वविद्यालय भी उज्बेकिस्तान में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। लेकिन इस यात्रा की असली ताकत केवल व्यापार के आंकड़ों में नहीं है। उज्बेकिस्तान भारत की मध्य एशिया रणनीति का महत्वपूर्ण प्रवेश द्वार है। पाकिस्तान द्वारा भूमि मार्ग अवरुद्ध रखने के कारण भारत के सामने संपर्क का प्रश्न लंबे समय से चुनौती बना हुआ है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा यानि आईएनएसटीसी और चाबहार बंदरगाह भारत के लिए सामरिक महत्व रखते हैं। ईरान और पश्चिम एशिया की मौजूदा अस्थिरता ने इन परियोजनाओं की राह कठिन जरूर बनाई है, लेकिन भारत के लिए विकल्प तलाशना अब मजबूरी नहीं, रणनीतिक आवश्यकता है। अफगानिस्तान भी मोदी-मिर्जियोयेव वार्ता का बड़ा मुद्दा हो सकता है। स्थिर अफगानिस्तान के बिना दक्षिण और मध्य एशिया की कनेक्टिविटी, व्यापार और सुरक्षा की कोई भी बड़ी योजना अधूरी है। ताशकंद और नई दिल्ली पुनर्निर्माण, आर्थिक विकास और क्षेत्रीय स्थिरता पर अधिक निकट समन्वय विकसित कर सकते हैं। इसके साथ ही रक्षा सहयोग, ‘दुस्तलिक’ सैन्य अभ्यास, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, विज्ञान-तकनीक और महत्वपूर्ण खनिजों में साझेदारी भारत की मध्य एशिया नीति को नई धार दे सकती है। इसके बाद बिश्केक में एससीओ का मंच मोदी को रूस और चीन समेत प्रमुख यूरेशियाई शक्तियों के साथ सीधे संवाद का अवसर देगा। भारत के लिए एससीओ केवल फोटो-ऑप नहीं है। आतंकवाद, ऊर्जा सुरक्षा, कनेक्टिविटी, आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता, ये सभी भारत के प्रत्यक्ष राष्ट्रीय हित से जुड़े प्रश्न हैं। नई दिल्ली लगातार यह भी रेखांकित करती रही है कि कनेक्टिविटी परियोजनाएं संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करें तथा आतंकवाद के खिलाफ दोहरे मानदंड स्वीकार नहीं किए जा सकते। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू मोदी-पुतिन संबंध हैं। हम आपको बता दें कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर की मॉस्को यात्रा के दौरान पुतिन ने मोदी से एससीओ में मिलने की इच्छा जताई और भारत के लिए उर्वरक आपूर्ति बढ़ाने की बात कही। दोनों देशों के बीच ऊर्जा, व्यापार, परमाणु सहयोग और कृषि जरूरतों से जुड़े रिश्ते लगातार महत्वपूर्ण बने हुए हैं। भारत ने पश्चिमी दबाव के बावजूद अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर रूस के साथ आर्थिक संबंध बनाए रखे हैं और यही मोदी की रणनीतिक स्वायत्तता का सबसे बड़ा प्रमाण है। लेकिन असली भू-राजनीतिक धमाका इसके बाद हो सकता है। 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में पुतिन और शी चिनफिंग की मौजूदगी की संभावना भारत की कूटनीतिक हैसियत को और मजबूत करेगी। यदि मोदी, पुतिन और शी एक ही मंच पर लगातार दो बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में मिलते हैं, तो यह किसी औपचारिक मित्रता की घोषणा नहीं होगी; लेकिन यह जरूर दिखाएगा कि विश्व राजनीति अब एकध्रुवीय निर्देशों पर नहीं चलती। भारत, रूस और चीन के बीच मतभेद मौजूद हैं, विशेषकर भारत-चीन संबंधों में। इसलिए इसे किसी स्थायी त्रिपक्षीय गठबंधन के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। मगर बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था, वैश्विक शासन सुधार, ग्लोबल साउथ की आवाज, ऊर्जा सुरक्षा और वैकल्पिक आर्थिक संस्थाओं के सवाल पर तीनों देशों की बातचीत का प्रभाव अमेरिका और पश्चिमी शक्तियों तक जरूर पहुंचेगा। मोदी की उज्बेकिस्तान से बिश्केक और फिर नई दिल्ली तक फैली यह कूटनीतिक श्रृंखला एक बड़े संदेश का निर्माण करती है। संदेश यह है कि भारत अब मध्य एशिया में अपनी पहुंच बढ़ा रहा है, रूस के साथ पुराने रणनीतिक संबंधों को नए आर्थिक आधार दे रहा है, चीन के साथ प्रतिस्पर्धा और संवाद, दोनों को एक साथ साध रहा है और ब्रिक्स जैसे मंचों के जरिए ग्लोबल साउथ की राजनीति को नई दिशा देने की कोशिश कर रहा है। वॉशिंगटन के लिए संदेश इसलिए असहज हो सकता है, क्योंकि दबाव, टैरिफ और रणनीतिक ध्रुवीकरण की राजनीति भारत को किसी खेमे में बांधने की गारंटी नहीं देती। बहरहाल, मोदी की कूटनीति का मूल मंत्र साफ दिखाई देता है कि जहां भारत का हित, वहीं भारत का हाथ। अगले कुछ सप्ताह में ताशकंद, बिश्केक और नई दिल्ली के मंच शायद यही साबित कर दें कि बदलती विश्व व्यवस्था में भारत अपनी शर्तों पर चाल चलने वाला निर्णायक खिलाड़ी है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 27 Aug 2026 3:14 pm

मराठी अस्मिताबोध की नई अभिव्यक्ति

महाराष्ट्र के ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए कामचलाऊ मराठी भाषा जरूरी किए जाने को लेकर विवाद उठना स्वाभाविक है। यह विवाद बांबे हाईकोर्ट भी पहुंच गया है। महाराष्ट्र सरकार ने इस नियम को लागू करते हुए तर्क दिया है कि इससे यात्रियों और टैक्सी-ऑटो चालकों के बीच भरोसा बढ़ेगा और यात्रियों में सुरक्षा का भाव रहेगा। मोटे तौर पर सरकार की यह दलील बेहतर लगती है, लेकिन जब राज्य की टैक्सियों और ऑटो की संख्या और उनके चालकों पर ध्यान देते हैं तो यह सवाल सिर्फ भाषा का नहीं रह जाता, बल्कि उपराष्ट्रीयता के उभार और उसके बहाने राष्ट्रीयता के विचार को चुनौती का भी हो जाता है। इस सोच का सिरा आगे बढ़ते हुए हिंदी विरोध और प्रकारांतर से पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के प्रवासियों की मुखालफत तक जा पहुंचता है। भारतीय राष्ट्रीयता के समर्थन में ‘विविधता में एकता’ का पाठ हर भारतीय को स्कूली घुट्टी में मिला है। लेकिन जीवन की कठोर राहों पर उतरते हैं तो पता चलता है कि राष्ट्रीयता की असल धारा जितनी गहरे तक हिंदी हृदय प्रदेशों में बहती है, उतनी गैर हिंदीभाषी प्रदेशों में नजर नहीं आती। दिलचस्प यह है कि राष्ट्रीयता के पुरजोर पोषक इन इलाकों को उपहास में कभी बीमारू कहा जाता था। इस पर गोबरपट्टी और गोबरनाडु का विशेषण खास धारा की वैचारिकी ने जो चस्पा कर रखा है। इस सोच की प्रमुख वजह आर्थिक रूप से इन इलाकों का अपेक्षाकृत उपराष्ट्रीयता वाले इलाकों से पिछड़े रहना है। इसी वजह से रोजी-रोटी की खातिर महाराष्ट्र के टैक्सी और ऑटो चालकों में सबसे बड़ी संख्या भदेस माने वाले बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश आदि के प्रवासी शामिल हैं। जाहिर है कि मराठी का कामचलाऊ ज्ञान रखने के नियम का शिकार यही लोग ज्यादा हुए हैं। इससे इनकी ही रोजी-रोटी पर संकट बढ़ा है। इसे भी पढ़ें: Maharashtra में Auto Rickshaw, Taxi Drivers के लिए Marathi Mandatory क्यों की गयी? मराठी सीखने के लिए दबाव क्यों डालना? महाराष्ट्र के ताजा आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक, राज्य में 12 लाख 96 हजार से ज्यादा ऑटो हैं, जबकि करीब पांच लाख टैक्सियां हैं। यहां के परिवहन विभाग के मुताबिक, अकेले ग्रेटर मुंबई इलाके में करीब पांच लाख टैक्सियां और ऑटो रिक्शा चल रहे हैं। इनमें करीब 75 फीसद ऑटो-टैक्सी चालक गैर मराठी और हिंदीभाषी इलाकों के ही हैं। राज्य के दूसरे इलाकों में करीब आधे ऑटो-टैक्सी चालक हिंदीभाषी हैं। महाराष्ट्र ही क्यों, किसी भी राज्य के सेवा क्षेत्र में कार्य करने वाले लोगों को वहां की स्थानीय भाषा आनी चाहिए। उनके रोजाना का काम स्थानीय भाषा के कामचलाऊ ज्ञान से चल सकता है। बड़ा सवाल यह है कि मराठी के कामचलाऊ ज्ञान का पैमाना क्या हो, महाराष्ट्र सरकार का आदेश इस मसले में स्पष्ट नहीं है। विवाद और परेशानी इस वजह से भी है। सर्विस सेक्टर और रेहड़ी-पटरी लगाने वाले अक्सर कामकाज करते-करते स्थानीय भाषा सीख लेते हैं। दिल्ली के कनॉट प्लेस में हथकरघा और दस्तगारी का सामान बेचने वाली गुजराती महिलाएं कम शिक्षित हैं। लेकिन वे हिंदी ही नहीं, अंग्रेजी, जर्मन और स्पेनिश भी धाराप्रवाह बोल लेती हैं। तमिलनाडु को लेकर धारणा है कि वहां घोर हिंदी विरोधी माहौल है। लेकिन वहां के प्रमुख पर्यटन स्थल महाबलीपुरम् में भीख मांगने वाले भी बहुभाषी मिल जाते हैं, जो हिंदीभाषी सैलानियों से हिंदी में भीख मांगते हैं। वहां घूम-घूमकर छोटे-मोटे सामान बेचने वाली लड़कियां भी तकरीबन अनपढ़ हैं, लेकिन वे हिंदी, गुजराती, बांग्ला आदि बोल लेती हैं। चाहे कनॉट प्लेस के फुटपाथ पर दस्तगारी का सामान बेचने वाली गुजराती महिलाएं हों या कोलकाता की गलियों में दुकान लगाने वाले बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग हों, अगर वे अंग्रेजी और बांग्ला आदि बोलते हैं तो इसकी वजह कोई स्कूली शिक्षा नहीं, बल्कि रोजाना का संपर्क और जरूरत है। ऐसा नहीं कि महाराष्ट्र के ऑटो-टैक्सी चालक मराठी का कामचलाऊ ज्ञान या समझ नहीं रखते। यहां ध्यान रखने की बात है कि अपनी माटी से दूर जब कोई ऑटो या टैक्सी चलाने का काम चुनता है तो वह तत्काल सड़क पर नहीं उतरता। वह पहले सड़कों को पहचानता है, उनकी भाषा को समझने की कोशिश करता है। भाषा विज्ञान की नजर से देखें तो मराठी, गुजराती और राजस्थानी ऐसी भाषाएं नहीं है, जिन्हें आम हिंदीभाषी समझ नहीं सकता। ठीक इसी तरह इन भाषा-भाषियों के लिए हिंदी भी ऐसी भाषा नहीं है, जिसे वे न समझ सकें। भाषा को लेकर जब भी कोई विवाद उठता है, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन का एक इंटरव्यू याद आता है। जिसमें उन्होंने अपनी दादी की चारधाम यात्रा का जिक्र किया था। उनकी दादी ने शायद पिछली सदी के दूसरे दशक में तमिलनाडुके पालघाट इलाके के अपने गांव से चारधाम की यात्रा की थी और महीनों बाद सकुशल वापस लौट आई थीं। शेषन ने कहा था कि उनकी दादी तमिल के अलावा कोई अन्य भाषा नहीं जानती थीं, लेकिन उन्हें चारधाम यात्रा से दिक्कत नहीं हुई। सिर्फ शेषन ही नहीं, सदियों से लोग भारत के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक तीर्थ यात्राएं करते रहे हैं। आज तो तकनीक का विस्तार हो गया है, संचार क्रांति हो चुकी है। जब ये सहूलियतें नहीं थीं, तब क्या तीर्थ यात्राएं रूकीं। तब क्या भाषाएं बाधा बनीं। ऐसे में सवाल यह है कि फिर आज भाषा कैसे चुनौती बन सकती है। कम ही लोग स्वीकार करेंगे, लेकिन राज्यों के पुनर्गठन के लिए बनाए गए फजलुर्रहमान आयोग की रिपोर्ट ही भाषायी उपराष्ट्रीयता को बढ़ावा देने वाली रही। आयोग ने भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की सिफारिश की थी। इसी के नजीतन भारतीय उपराष्ट्रीयताओं को अपनी भाषाओं के बहाने अपना वर्चस्व साबित करने का आधार मिल गया। इसी वजह से आए दिन राज्यों में अपनी भाषाओं को लेकर अस्मिताबोध जागता रहता है। इस बोध के निशाने पर अक्सर हिंदीभाषी ही रहते हैं। महाराष्ट्र सरकार में शामिल एकनाथ शिंदे की शिवसेना के मूल में भी मराठी उपराष्ट्रीयता और अस्मिताबोध रहा है। इस अस्मिताबोध को शिवसेना संस्थापक बाला साहब ठाकरे ने पहली अभिव्यक्ति 1960 के दशक में मुंबई में मलयाली भाषा-भाषियों के खिलाफ आंदोलन के जरिए दी और बाद के दिनों में उनके भतीजे राज ठाकरे तो इस अस्मिताबोध के दबंग पैरोकार बनकर उभरे। केंद्र सरकार और बैंकों आदि की नौकरियों के लिए परीक्षा देने मुंबई-नासिक आदि पहुंचे हिंदीभाषी छात्रों को बाकायदा पीटकर इस भाषा बोध को राज ठाकरे के कथित सैनिक दिखाते रहे। वे भूल गए कि बंग-भंग के खिलाफ आंदोलन के दौरान 1905 में मराठी मानुष के पूज्य पुरूष बाल गंगाधर तिलक ने वाराणसी की यात्रा की थी। इस दौरान ‘काशी नागरी प्रचारिणी सभा’ में दिए एक व्याख्यान में उन्होंने पुरजोर तरीके से ‘हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा ‘ घोषित किया था। मराठी अस्मिताबोध के शोर में तिलक की यह आवाज अक्सर खोती रही है। एक खतरा यह भी है कि मराठी के कामचलाऊ ज्ञान की शर्त राज्य के दूसरे धंधे में काम कर रहे लोगों पर भी बाद में लागू हो सकती है। चूंकि उपराष्ट्रीयता वाले इलाकों में अपनी भाषा और संस्कृति का मसला लोगों के मर्म को छूता है, इसलिए राजनीति अक्सर इसे उभारने की कोशिश करती है। मौका देखकर आने वाले दिनों में राज्य में कार्यरत निर्माण मजदूरों आदि पर भी यह शर्त थोपी जा सकती है। इससे निश्चित तौर पर प्रवासी हिंदीभाषियों के लिए संकट पैदा होगा, उससे पलायन भी बढ़ सकता है। जिसकी कीमत राज्य की अर्थव्यवस्था और उद्योग को भी चुकानी पड़ सकती है। इसलिए जरूरी है कि इस मसले पर सर्वमान्य और सर्वस्वीकार्य रास्ता तलाशा जाए। नियमों को बेड़ी नहीं, लोक का सहयोगी होना चाहिए। इस नजरिए से भी इस बारे में विचार होना चाहिए। आखिर में इस भाषा विवाद का एक सिरा देवेंद्र फड़णवीस के राजनीतिक करीयर से भी जुड़ता है। भारतीय जनता पार्टी का एक वर्ग उनमें राष्ट्रीय राजनीति की संभावना देखता है। महाराष्ट्र तक तो उनका मराठी अस्मिताबोध स्वीकार्य हो सकता है, लेकिन जब वे राष्ट्रीय राजनीति में सफल होने की कोशिश करेंगे, अपनी भाषा बोध के बहाने हिंदीभाषियों का विरोध उनकी राह की बाधा बन सकता है। - उमेश चतुर्वेदी लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक हैं..

प्रभासाक्षी 27 Aug 2026 3:06 pm