अमेरिकी राजदूत सर्जियो गौर की जम्मू-कश्मीर यात्रा ने चीनी-पाकिस्तानी चालों को किया दुरुस्त!
जरा गौर कीजिए, जब चीन अरुणाचल प्रदेश में भारत को आंखें दिखा रहा हो, जब अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर का जम्मू-कश्मीर/लद्दाख पहुंचना और जम्मू-कश्मीर को भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा बताना भारतीय कूटनीति की कितनी बड़ी सफलता है, क्योंकि यह परोक्ष रूप से चीन को संदेश है कि भारत का साथ मिलते ही अमेरिका अन्य एशियाई 'बदमाशों' को रौंद डालेगा। उधर, पाकिस्तान को संदेश है कि इस्लामिक नाटो उसकी सुरक्षा की गारंटी नहीं बनेगा, यदि अमेरिका खुलकर भारत के साथ खड़ा रहेगा। जी हां, अमेरिकी राजदूत की 19–20 अगस्त 2026 की जम्मू-कश्मीर और लद्दाख यात्रा को केवल एक राजनयिक दौरा मानना पर्याप्त नहीं होगा। इसे भी पढ़ें: Sergio Gor के बयान से तिलमिलाये Pakistan ने Trump Administration पर उतारी भड़ास, US Diplomat Natalie Baker को तलब कर थमाया Strong Demarche खासकर श्रीनगर में उनका यह कहना कि जम्मू-कश्मीर “भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा” है और अमेरिकी यात्रा-परामर्श की समीक्षा के संकेत देना, वाशिंगटन के पुराने कश्मीर-संबंधी सार्वजनिक रुख की तुलना में महत्वपूर्ण राजनीतिक-सामरिक संकेत देता है। इससे कई सवाल उपजते हैं, जिनके निहितार्थ को समझना भी जरूरी है:- पहला सवाल है कि क्या वास्तव में अमेरिकी स्टैंड बदल गया है? तो जवाब होगा कि अपेक्षित सावधानी जरूरी है। अभी इसे अमेरिका की औपचारिक कश्मीर-नीति में पूर्ण परिवर्तन कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन राजनयिक भाषा और व्यवहार में बदलाव का संकेत स्पष्ट है। पहले अमेरिकी नीति का सार्वजनिक ढांचा मुख्यतः यह रहा कि कश्मीर भारत-पाकिस्तान के बीच विवादित विषय है और दोनों देशों को बातचीत के माध्यम से समाधान निकालना चाहिए। 2019 के बाद भी अमेरिकी अधिकारियों ने इस मूल स्थिति को बनाए रखा था। इसके विपरीत, गोर ने भारतीय प्रशासित जम्मू-कश्मीर में जाकर उसे “भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा” कहा। पाकिस्तान ने इसे अमेरिकी पारंपरिक रुख से विचलन मानते हुए अमेरिकी प्रभारी राजदूत को तलब कर औपचारिक विरोध दर्ज कराया। इसलिए फिलहाल इसे “नीति परिवर्तन” से अधिक “नीति-संकेत में परिवर्तन” कहना उचित होगा। दूसरा सवाल है कि इस यात्रा का सबसे बड़ा संदेश क्या है? क्या कश्मीर को जमीन पर देखकर आकलन हुआ है? तो जवाब होगा कि गोर का दौरा छह साल से अधिक अंतराल के बाद किसी अमेरिकी राजदूत की कश्मीर यात्रा है। उन्होंने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से मुलाकात की और सुरक्षा व्यवस्था तथा बदलते माहौल का प्रत्यक्ष आकलन किया। यह महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि अमेरिका की कश्मीर संबंधी धारणा अब केवल इस्लामाबाद, नई दिल्ली या अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों पर निर्भर नहीं रह सकती। राजदूत का स्वयं श्रीनगर जाना और फिर सुरक्षा स्थिति पर सकारात्मक टिप्पणी करना वाशिंगटन के नीति-निर्माताओं को एक अलग जमीनी इनपुट देता है। तीसरा सवाल यह है कि Travel Advisory में बदलाव—छोटा दिखने वाला बड़ा संकेत है? तो जवाब होगा कि गोर ने जम्मू-कश्मीर के लिए अमेरिकी यात्रा-परामर्श की समीक्षा के संकेत दिए हैं। अगर आगे अमेरिका अपने मौजूदा “Do Not Travel” स्तर को नीचे करता है, तो इसका असर केवल अमेरिकी पर्यटकों पर नहीं पड़ेगा। यह संदेश जाएगा कि सुरक्षा परिस्थितियों में सुधार हुआ है। सामान्य आर्थिक गतिविधियां बढ़ रही हैं। पर्यटन के लिए क्षेत्र अधिक खुल रहा है। अंतरराष्ट्रीय जोखिम-धारणा बदल रही है। यानी कश्मीर के लिए यह सुरक्षा से पर्यटन और पर्यटन से निवेश की दिशा में सकारात्मक कूटनीतिक संकेत बन सकता है। चौथा सवाल यह है कि क्या यह परिदृश्य पाकिस्तान के लिए बड़ा कूटनीतिक झटका है? तो कहना न होगा कि इस बयान की सबसे तीखी प्रतिक्रिया पाकिस्तान से आई है। इस्लामाबाद ने इसे अपनी दशकों पुरानी कश्मीर कूटनीति के प्रतिकूल माना और अमेरिकी राजनयिक को तलब किया। पाकिस्तान के लिए समस्या सिर्फ गोर का बयान नहीं है, बल्कि समस्या यह है कि यदि अमेरिका जैसा प्रभावशाली देश धीरे-धीरे कश्मीर को “भारत-पाकिस्तान के विवाद” की भाषा से हटाकर “भारत के महत्वपूर्ण हिस्से” की भाषा में संबोधित करने लगे, तो पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक रणनीति कमजोर हो सकती है। पांचवां सवाल यह है कि क्या चीन का कोण भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता? तो जवाब होगा कि गोर का कार्यक्रम केवल श्रीनगर तक सीमित नहीं रहा; वह लद्दाख भी गए। यह समय विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि लद्दाख भारत-चीन सीमा-सुरक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है। इसलिए यात्रा का एक व्यापक संदेश यह भी हो सकता है कि अमेरिका भारत के पश्चिमी और उत्तरी दोनों रणनीतिक मोर्चों को अपने Indo-Pacific और South/Central Asia दृष्टिकोण से देख रहा है। छठा सवाल यह है कि क्या भारत-अमेरिका संबंधों में कश्मीर की भूमिका बदल सकती है? तो कहना न होगा कि यह घटनाक्रम भारत-अमेरिका संबंधों के उस व्यापक पुनर्संतुलन का हिस्सा हो सकता है जिसमेंआतंकवाद के विरुद्ध सहयोग, चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला, हिंद-प्रशांत रणनीति, रक्षा एवं तकनीकी साझेदारी, ऊर्जा एवं व्यापार, और दक्षिण एशिया में भारत की बढ़ती रणनीतिक भूमिका एक-दूसरे से जुड़ रहे हैं। गोर स्वयं भारत में अमेरिकी राजदूत होने के साथ South and Central Asian Affairs के Special Envoy भी हैं। इसलिए उनकी टिप्पणी का महत्व सामान्य राजदूत की टिप्पणी से अधिक माना जा सकता है। सातवां सवाल यह है कि क्या भारत को अति-उत्साहित होने से भी बचना होगा? तो जवाब होगा कि यहां एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक सावधानी बरतनी जरूरी है क्योंकि एक राजदूत का बयान अमेरिकी सरकार की पूरी औपचारिक विदेश नीति का विकल्प नहीं होता। जब तक अमेरिकी विदेश विभाग या व्हाइट हाउस अपनी आधिकारिक नीति में स्पष्ट बदलाव घोषित नहीं करता, तब तक यह कहना कि “अमेरिका ने कश्मीर पर पाकिस्तान को छोड़कर भारत का पक्ष ले लिया है” अतिशयोक्ति होगी। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि अमेरिकी सार्वजनिक कूटनीतिक भाषा में एक उल्लेखनीय बदलाव दिखाई दे रहा है। आठवां सवाल यह है कि सबसे बड़ा रणनीतिक निहितार्थ क्या है? तो जवाब होगा कि मेरे आकलन में इस यात्रा का वास्तविक महत्व चार शब्दों में है: “Narrative → Ground Reality → Policy.” यदि अमेरिका को जमीनी स्तर पर कश्मीर में सुरक्षा, राजनीतिक प्रक्रिया, पर्यटन और आर्थिक सामान्यीकरण दिखाई देता है और उसके आधार पर उसकी यात्रा चेतावनी कम होती है, तो धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव भी बदल सकता है। यही भारत के लिए सबसे बड़ा कूटनीतिक लाभ होगा। निष्कर्षतः, सर्जियो गोर की कश्मीर यात्रा को भारत की कूटनीतिक उपलब्धि के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन इसे अभी अमेरिकी कश्मीर नीति का अंतिम परिवर्तन घोषित करना जल्दबाजी होगी। असली परीक्षा अगले चरण में होगी—क्या Washington अपनी आधिकारिक भाषा बदलेगा, क्या travel advisory घटेगी और क्या भविष्य में अमेरिकी अधिकारी कश्मीर को भारत के आंतरिक प्रशासनिक-सुरक्षा संदर्भ में अधिक स्पष्टता से देखेंगे? अगर इन तीनों प्रश्नों का उत्तर “हाँ” होता है, तो गोर की यह यात्रा दक्षिण एशिया की कूटनीति में एक महत्वपूर्ण turning point सिद्ध हो सकती है। # क्या ईरान में पिटी अमेरिकी भद्द और पाकिस्तान के दोगले रवैये से अचंभित अमेरिका ने ऐसा किया हाँ—इसे एक संभावित कारण के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन निर्णायक कारण कहना अभी जल्दबाजी होगी। उपलब्ध घटनाक्रम को जोड़ें तो अमेरिकी सोच में पाकिस्तान को लेकर विश्वसनीयता का प्रश्न जरूर उभरता है। सवाल है कि क्या ईरान प्रकरण ने अमेरिका को पाकिस्तान को नए नजरिये से देखने पर मजबूर किया? जवाब होगा कि ईरान-अमेरिका संकट में पाकिस्तान ने एक तरफ अमेरिका के साथ संवाद और मध्यस्थता की भूमिका निभाई, जबकि दूसरी तरफ ईरान के प्रति अपनी निकटता और क्षेत्रीय हितों को भी साधता रहा। विशेषज्ञों ने भी पाकिस्तान की निष्पक्ष मध्यस्थ के रूप में विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं—विशेषकर ईरान, अफगानिस्तान और सऊदी अरब से उसके एक साथ जुड़े हितों को देखते हुए। यानी Washington के लिए संदेश यह हो सकता है कि पाकिस्तान को एक भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार की बजाय आवश्यकता पड़ने पर उपयोगी लेकिन स्वार्थ-आधारित साझेदार के रूप में देखना अधिक व्यावहारिक है। लेकिन कश्मीर पर गोर का बयान सिर्फ पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए? मेरे आकलन में नहीं। क्योंकि सर्जियो गोर ने श्रीनगर में जम्मू-कश्मीर को “भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा” कहा और क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था की प्रशंसा करते हुए अमेरिकी Travel Advisory की समीक्षा की बात कही। इसके बाद पाकिस्तान ने अमेरिकी राजनयिक को बुलाकर औपचारिक विरोध दर्ज कराया और कहा कि यह अमेरिकी पारंपरिक कश्मीर-रुख के विपरीत है। इसलिए इसके पीछे कई परतें हो सकती हैं: 1. ईरान: पाकिस्तान की मध्यस्थता और दोहरे हितों से अमेरिकी रणनीतिक संदेह बढ़ा हो। 2. आतंकवाद: अमेरिका के लिए पाकिस्तान की उपयोगिता और विश्वसनीयता का मूल्यांकन फिर से हो रहा हो। 3. भारत: चीन के मुकाबले भारत का रणनीतिक महत्व लगातार बढ़ रहा है। 4. कश्मीर: जमीनी सुरक्षा परिस्थितियों को देखकर अमेरिकी धारणा में बदलाव की शुरुआत हुई हो। 5. पाकिस्तान: Washington अब Islamabad को South Asia का अनिवार्य रणनीतिक केंद्र मानने की बजाय भारत को अधिक महत्व दे रहा हो। सबसे दिलचस्प बात तो यह है कि यह बदलाव ईरान संकट के बाद पाकिस्तान की भूमिका बढ़ने के ठीक उसी दौर में दिखाई दे रहा है। पाकिस्तान ने अमेरिका-ईरान वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभाकर अपनी कूटनीतिक उपयोगिता बढ़ाने की कोशिश की थी। लेकिन यदि उसी समय अमेरिका का शीर्ष राजनयिक भारत में जाकर कहता है कि J&K भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा है, तो यह पाकिस्तान के लिए निश्चित रूप से बड़ा कूटनीतिक झटका है। इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि अमेरिका का संदेश है: “Pakistan may be useful, but India is strategically indispensable.” हालांकि अभी इसे अमेरिकी नीति का औपचारिक परिवर्तन नहीं कहा जा सकता। अगली निर्णायक परीक्षा यह होगी कि Washington अपनी आधिकारिक Kashmir language और Travel Advisory में वास्तव में क्या बदलाव करता है। और एक बड़ा प्रश्न इससे निकलता है—क्या ईरान संकट, पाकिस्तान की कथित दोहरी कूटनीति और चीन की बढ़ती चुनौती ने अमेरिका को अंततः यह समझा दिया है कि दक्षिण एशिया में पाकिस्तान से अधिक भरोसेमंद और दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदार भारत है? यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण यक्ष प्रश्न है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
कर्नाटक: कॉलेज के प्रिंसिपल पर 'वंदे मातरम' के नारे रोकने के आरोप में मामला दर्ज
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'वंदे मातरम' विवाद पर अमित शाह का गंभीर आरोप, 'कांग्रेस विभाजन के बीज बोने वाली ऐतिहासिक भूल दोहरा रही'
1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामलों में उम्रकैद की सजा काट रहे सज्जन कुमार का गुरुवार को दिल्ली में निधन हो गया। वह 80 वर्ष के थे। एक समय ग्रामीण और बाहरी दिल्ली की राजनीति के सबसे ताकतवर चेहरों में गिने जाने वाले, जाट समाज में व्यापक जनाधार रखने वाले और राष्ट्रीय राजधानी की सियासत में कांग्रेस की सत्ता का मजबूत स्तंभ रहे सज्जन कुमार की जिंदगी आखिरकार एक ऐसे मोड़ पर खत्म हुई, जिसे उनके राजनीतिक उत्थान और बाद के पतन की पूरी कहानी के रूप में देखा जा सकता है। सत्ता के शिखर से लेकर तिहाड़ जेल तक का उनका सफर इस कड़वे सच की याद दिलाता है कि बुरे काम का अंजाम बुरा ही होता है। हम आपको बता दें कि पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार को तिहाड़ जेल से सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया था, जहां चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। अस्पताल की ओर से उनकी मौत के कारण को लेकर तत्काल कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। सज्जन कुमार अपने जीवन के अंतिम वर्षों में 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामलों में मिली उम्रकैद की सजा काट रहे थे। इसे भी पढ़ें: 1984 दंगा केस में उम्रकैद काट रहे पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार की मौत, दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में तोड़ा दम हम आपको बता दें कि सज्जन कुमार दिल्ली की राजनीति में 1970 के दशक से ही प्रभावशाली चेहरा बनकर उभरे थे। उन्होंने 1977 में पार्षद के रूप में अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की और इसके बाद बाहरी दिल्ली लोकसभा सीट से तीन बार सांसद चुने गए। ग्रामीण दिल्ली और जाट बहुल इलाकों में उनकी पकड़ बेहद मजबूत मानी जाती थी। 1980 के दशक में वह दिल्ली कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल थे। स्थानीय संगठन, ग्रामीण मतदाता और जाट समाज में उनके मजबूत आधार ने उन्हें कांग्रेस की राजनीति का बड़ा खिलाड़ी बना दिया था। एक समय ऐसा था जब बाहरी दिल्ली की राजनीति में सज्जन कुमार का नाम ही सत्ता और प्रभाव का पर्याय माना जाता था। लेकिन जिस राजनीतिक ताकत ने उन्हें दशकों तक प्रभावशाली बनाए रखा, वही ताकत 1984 के सिख विरोधी दंगों के आरोपों और फिर लंबे कानूनी संघर्ष के सामने धीरे-धीरे कमजोर पड़ती चली गई। हम आपको याद दिला दें कि 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके अंगरक्षकों द्वारा हत्या के बाद देश, विशेषकर दिल्ली में सिख विरोधी हिंसा भड़क उठी थी। इसके पीछे ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद पैदा हुई परिस्थितियों को भी महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि के रूप में देखा गया था। दिल्ली में कई दिनों तक हिंसा का भयावह दौर चला था। सिखों के घरों, दुकानों और धार्मिक स्थलों को निशाना बनाया गया था। हजारों लोगों की जान गई। अलग-अलग आकलनों में मृतकों की संख्या अलग रही, लेकिन दिल्ली में 2,700 से अधिक सिखों के मारे जाने की पुष्टि हुई, जबकि देशभर में मृतकों की संख्या 3,000 से अधिक बताई गई। इसी हिंसा से जुड़े कई मामलों में सज्जन कुमार का नाम सामने आया। उन पर हिंसक भीड़ का नेतृत्व करने, लोगों को उकसाने, आपराधिक साजिश और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने जैसे गंभीर आरोप लगे। अगले तीन दशकों से अधिक समय तक उनके खिलाफ मुकदमों का सिलसिला चलता रहा और कई मामलों में उन्हें कभी राहत मिली तो कभी कानूनी शिकंजा कसता गया। सज्जन कुमार के राजनीतिक और कानूनी जीवन का सबसे बड़ा मोड़ 17 दिसंबर 2018 को आया। दिल्ली हाईकोर्ट ने निचली अदालत के 2013 के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें उन्हें बरी कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने सज्जन कुमार को 1984 के दंगों के दौरान दिल्ली के राज नगर पार्ट-1, पालम कॉलोनी में पांच सिखों की हत्या और एक गुरुद्वारे को जलाने से जुड़े मामले में दोषी ठहराया। अदालत ने उन्हें आपराधिक साजिश और हिंसा के लिए उकसाने सहित गंभीर अपराधों का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। अपने फैसले में दिल्ली हाईकोर्ट ने 1984 की सिख विरोधी हिंसा को “मानवता के खिलाफ अपराध” तक करार दिया था। अदालत ने यह भी निर्देश दिया था कि सज्जन कुमार को अपने प्राकृतिक जीवन के शेष समय तक जेल में रहना होगा। यहीं से वह नेता, जो कभी दिल्ली की सत्ता के गलियारों में बेहद प्रभावशाली माना जाता था, तिहाड़ जेल की सलाखों के पीछे पहुंच गया। हम आपको यह भी बता दें कि 1984 के दंगों से जुड़े आरोपों के बावजूद कांग्रेस लंबे समय तक सज्जन कुमार के साथ खड़ी रही। वह पार्टी के बड़े नेताओं में गिने जाते रहे और वर्षों तक पार्टी की राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा बने रहे। हालांकि समय के साथ राजनीतिक दबाव बढ़ता गया। 2009 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर को दिए गए चुनाव टिकट वापस ले लिए थे। इसके बाद सज्जन कुमार धीरे-धीरे पार्टी के भीतर हाशिये पर चले गए। 2018 में दिल्ली हाईकोर्ट से उम्रकैद की सजा मिलने के बाद उन्होंने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। इसके साथ ही कांग्रेस के साथ उनका औपचारिक रिश्ता समाप्त हो गया। जिस पार्टी में वह कभी दिल्ली की राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरों में शामिल थे, उसी पार्टी से उनका राजनीतिक सफर अंततः अलगाव और हाशिये पर खत्म हुआ। साथ ही 2018 की सजा सज्जन कुमार के खिलाफ अंतिम कानूनी कार्रवाई नहीं थी। फरवरी 2025 में दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने उन्हें 1984 के दंगों से जुड़े एक अन्य मामले में भी उम्रकैद की सजा सुनाई। यह मामला सरस्वती विहार क्षेत्र में भीड़ के हमले से जुड़ा था, जिसमें पिता-पुत्र जसवंत सिंह और तरुणदीप सिंह को कथित रूप से जिंदा जलाकर मार दिए जाने का मामला सामने आया था। अभियोजन पक्ष ने सज्जन कुमार के लिए मृत्युदंड की मांग की थी, लेकिन अदालत ने उनकी उम्र और स्वास्थ्य समेत अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई। इस तरह सज्जन कुमार को 1984 की हिंसा से जुड़े अलग-अलग मामलों में एक से अधिक बार उम्रकैद की सजा मिली और वह जीवन के अंतिम समय तक तिहाड़ जेल में ही रहे। साथ ही इस वर्ष जनवरी में सज्जन कुमार को 1984 के दंगों से जुड़े जनकपुरी और विकासपुरी क्षेत्रों के हिंसा भड़काने के आरोप वाले दो अलग-अलग मामलों में दिल्ली की अदालत से बरी कर दिया गया था। लेकिन इन बरी होने के फैसलों से उनकी रिहाई का रास्ता नहीं खुला, क्योंकि वह अन्य मामलों में उम्रकैद की सजा काट रहे थे। उनकी 2018 की दोषसिद्धि और सजा के खिलाफ चुनौती भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित थी। यानी कानूनी लड़ाई के लंबे दौर में कुछ मामलों में उन्हें राहत जरूर मिली, लेकिन 1984 के दंगों से जुड़े अपराधों में हुई दोषसिद्धियों ने उनकी जिंदगी की दिशा पूरी तरह बदल दी। देखा जाये तो सज्जन कुमार का राजनीतिक जीवन भारतीय राजनीति की उन कहानियों में शामिल हो गया है, जहां एक नेता का जनाधार और राजनीतिक प्रभाव लंबे समय तक उसे मजबूत बनाए रखता है, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया अंततः दशकों पुराने मामलों तक पहुंचती है। 1977 में पार्षद से राजनीतिक शुरुआत करने वाला नेता तीन बार लोकसभा पहुंचा। बाहरी दिल्ली में उसका व्यापक जनाधार था, ग्रामीण और जाट बहुल क्षेत्रों में उसकी मजबूत पकड़ थी और वह कांग्रेस की दिल्ली इकाई का बड़ा चेहरा था। लेकिन 1984 की हिंसा का दाग उसके राजनीतिक कद से कहीं ज्यादा भारी साबित हुआ। करीब चार दशक तक चले मुकदमों, राजनीतिक विवादों, जनाक्रोश और कानूनी लड़ाइयों के बाद सज्जन कुमार को उम्रकैद की सजा मिली। कांग्रेस से उनका रिश्ता टूटा, राजनीतिक प्रभाव खत्म हुआ और जीवन के अंतिम वर्ष तिहाड़ जेल में बीते। देखा जाये तो 80 वर्ष की उम्र में उनका निधन उस दौर का अंत है, जिसमें सज्जन कुमार कभी बाहरी दिल्ली की राजनीति के सबसे शक्तिशाली नेताओं में गिने जाते थे। लेकिन उनकी अंतिम पहचान एक ऐसे पूर्व कांग्रेस सांसद की बन गई, जो 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामलों में दोषी ठहराए जाने के बाद उम्रकैद की सजा काट रहा था। सज्जन कुमार की कहानी सत्ता के शिखर से जेल की सलाखों तक पहुंचने की कहानी है। यह उस राजनीतिक प्रभाव की भी कहानी है, जो वर्षों तक कायम रहा, और उस न्यायिक संघर्ष की भी, जिसने दशकों बाद अपना फैसला सुनाया। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि सत्ता कितनी भी बड़ी क्यों न हो, समय और कानून के सामने उसका प्रभाव हमेशा कायम नहीं रहता। सज्जन कुमार का जीवन और अंत इसी कड़वे सच की एक बड़ी राजनीतिक कहानी बनकर दर्ज हो गया। -नीरज कुमार दुबे
राहुल गांधी का बड़ा दावा- पीएम मोदी का शासन आखिरी दौर में, उत्तराधिकारी की तलाश शुरू
सीडब्ल्यूसी बैठक में राहुल गांधी ने पीएम नरेंद्र मोदी के राजनीतिक भविष्य को लेकर बड़ा दावा किया। खरगे ने शिक्षा, रोजगार, राम मंदिर ट्रस्ट और चीन सीमा मुद्दे पर सरकार को घेरा।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत की अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन यात्रा शुरू होने से ठीक पहले अमेरिकी संस्था यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम (USCIRF) ने एक बार फिर भारत, भाजपा और आरएसएस को निशाने पर लिया है। 25 अगस्त से शुरू होने वाली भागवत की प्रस्तावित तीन देशों की यात्रा से पहले आयोग ने न केवल आरएसएस नेताओं को अमेरिका में “हाई-लेवल मीटिंग्स” और कूटनीतिक सम्मान नहीं देने की मांग की, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता के कथित उल्लंघनों के लिए जिम्मेदार पाए जाने वाले आरएसएस सदस्यों पर प्रतिबंध लगाने तक की वकालत कर दी। USCIRF के अध्यक्ष और पाकिस्तानी-अमेरिकी चिकित्सक आसिफ महमूद तथा आयुक्त जीन मिल्स के बयानों को आयोग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर साझा किया। महमूद ने आरएसएस को सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी का वैचारिक अभिभावक बताते हुए उसके संबद्ध संगठनों पर धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमलों के आरोप लगाए। वहीं जीन मिल्स ने कहा कि आरएसएस नेताओं को, भले ही वे भारतीय सरकार से जुड़े हों, उच्चस्तरीय मुलाकातें या कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं दिया जाना चाहिए। मिल्स ने कहा कि इसकी बजाय अमेरिका को उन लोगों पर प्रतिबंध लगाने पर ध्यान देना चाहिए, जिन्हें धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन का जिम्मेदार माना जाता है। इसे भी पढ़ें: भारतीय परंपराओं में निहित है संवाद, संवाद से ही होता है समाधान देखा जाये तो यह कोई अचानक आया बयान नहीं है। मार्च में जारी अपनी वार्षिक रिपोर्ट में भी USCIRF ने भारत को धार्मिक स्वतंत्रता के मामले में कठघरे में खड़ा करते हुए आरएसएस और भारत की खुफिया एजेंसी RAW तक के खिलाफ लक्षित अमेरिकी प्रतिबंधों की सिफारिश की थी। इनमें संपत्ति फ्रीज करने और अमेरिका में प्रवेश प्रतिबंध जैसे कदम शामिल करने की बात कही गई। यह आयोग बार-बार भारत को “कंट्री ऑफ पर्टिकुलर कंसर्न” यानी CPC घोषित करने की सिफारिश करता रहा है। यह एक ऐसा वर्गीकरण है, जिसमें चीन और उत्तर कोरिया जैसे देशों को भी शामिल किया जाता है। वहीं भारत ने USCIRF की इस रिपोर्ट और उसके आरोपों को सिरे से खारिज किया था। विदेश मंत्रालय ने इसे “विकृत और चयनात्मक तस्वीर” पेश करने वाला दस्तावेज बताया था, जो संदिग्ध स्रोतों और वैचारिक आख्यानों पर आधारित है। यह भी महत्वपूर्ण है कि USCIRF एक अमेरिकी संघीय सरकारी निकाय जरूर है, लेकिन उसकी भूमिका केवल सलाहकारी है और उसकी सिफारिशें बाध्यकारी नहीं हैं। यही कारण है कि आयोग की लगातार कठोर सिफारिशों के बावजूद अमेरिकी प्रशासन ने भारत को CPC घोषित करने या आरएसएस अथवा RAW पर प्रतिबंध लगाने जैसी मांगों को स्वीकार नहीं किया है। इसके विपरीत, अमेरिका और भारत के बीच रणनीतिक, रक्षा, तकनीकी और भू-राजनीतिक साझेदारी लगातार विस्तार पाती रही है। दूसरी ओर, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की आगामी यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर चुका है। अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन में स्थानीय भारतीय संगठनों और प्रवासी संस्थाओं के निमंत्रण पर होने वाली इस यात्रा के दौरान भागवत भारतीय मूल के लोगों और विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों से संवाद करेंगे। यहीं से USCIRF के ताजा हमले के राजनीतिक और वैचारिक संदर्भ पर सवाल खड़े होते हैं। आखिर जिस संगठन ने लगभग एक शताब्दी में भारत के सामाजिक जीवन में अपनी गहरी उपस्थिति बनाई, सेवा, शिक्षा, आपदा राहत, सामाजिक संगठन और राष्ट्रीय चेतना के क्षेत्र में विशाल स्वयंसेवी नेटवर्क खड़ा किया, उसके प्रमुख की प्रवासी भारतीयों से मुलाकात को पहले ही संदेह और प्रतिबंध की भाषा में क्यों देखा जा रहा है? देखा जाये तो आरएसएस को केवल राजनीतिक चश्मे से देखना ही उसकी सबसे बड़ी गलत व्याख्या है। देशभर में स्वयंसेवकों का व्यापक सामाजिक और सेवा कार्य, प्राकृतिक आपदाओं में राहत अभियान, शिक्षा एवं सामाजिक उत्थान से जुड़े प्रयास और राष्ट्रहित को केंद्र में रखने वाली उसकी संगठनात्मक परंपरा उसके लंबे सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। यही व्यापक सामाजिक आधार और प्रवासी भारतीय समाज के बीच बढ़ती स्वीकार्यता संभवतः उन समूहों को असहज करती है, जो भारत की राजनीति और समाज को केवल धार्मिक उत्पीड़न की एक पूर्वनिर्धारित कहानी के जरिए देखना चाहते हैं। इसके अलावा, USCIRF के दस्तावेजों और बयानों पर नजर डालें तो भाजपा और आरएसएस के खिलाफ उसका नफरत भरा रुख स्पष्ट दिखाई देता है। यह आयोग भाजपा और आरएसएस के संस्थागत संबंधों को “भेदभाव के माहौल” से जोड़ता रहा है और नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), धर्मांतरण विरोधी कानूनों तथा गोहत्या निषेध से जुड़े प्रावधानों को भी इसी व्यापक राजनीतिक ढांचे के हिस्से के रूप में प्रस्तुत कर चुका है। साथ ही इस आयोग की ओर से भारत के लोकतांत्रिक, संवैधानिक और न्यायिक ढांचे को उसके अपने संदर्भ में समझने की बजाय हर नीति और कानूनी कार्रवाई को धार्मिक उत्पीड़न के पूर्वनिर्धारित फ्रेम में फिट करने की कोशिश की जाती है। उदाहरण के लिए भारत CAA को पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में धार्मिक उत्पीड़न झेलने वाले अल्पसंख्यकों के लिए तेज नागरिकता प्रक्रिया वाला मानवीय कानून बताता है। लेकिन USCIRF इसे लगातार घरेलू अल्पसंख्यकों के अधिकारों को प्रभावित करने वाले उपकरण के रूप में पेश करता रहा है। इसी तरह दंगों, आतंकवाद या वित्तीय अपराध जैसे गंभीर मामलों में आरोपित व्यक्तियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई अथवा अदालतों द्वारा जमानत से इंकार को भी कई बार “धार्मिक अल्पसंख्यकों के मनमाने उत्पीड़न” की भाषा में पेश किया जाता है। इस दृष्टिकोण में भारत की स्वतंत्र न्यायपालिका, बहुस्तरीय अपील व्यवस्था और संवैधानिक प्रक्रिया को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता। दूसरी ओर, भारत सरकार और कई भारतीय-अमेरिकी संगठनों ने USCIRF के रवैये पर दोहरे मापदंडों का सवाल भी उठाया है। सवाल उठाया गया है कि यह आयोग भारत को धार्मिक स्वतंत्रता पर लगातार उपदेश देता है, लेकिन अमेरिका और कनाडा में हिंदू मंदिरों पर तोड़फोड़, आगजनी, भारतीय मूल के लोगों के खिलाफ घृणा अपराधों और संगठित धमकी की घटनाओं पर खामोश रहता है। यही नहीं, इस आयोग के नेतृत्व की पृष्ठभूमि को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। साथ ही USCIRF की रिपोर्टिंग, स्रोत चयन और निष्कर्षों में लगातार दिखाई देने वाले पैटर्न इसकी निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न उठाते हैं। बहरहाल, USCIRF भले ही मोहन भागवत की विदेश यात्रा से पहले प्रतिबंधों, कूटनीतिक बहिष्कार और आरएसएस के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर कितना भी शोर मचाता रहे, लेकिन जमीनी तस्वीर इससे अलग दिखाई दे रही है। अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन में रह रहे संघ से जुड़े स्वयंसेवक और भारतीय समुदाय के लोग अपने सरसंघचालक के स्वागत को उत्सुक नजर आ रहे हैं और उनके मार्गदर्शक संबोधन को सुनने के लिए आतुर हैं। संघ के शताब्दी वर्ष में मोहन भागवत की यह यात्रा वैश्विक भारतीय समाज के साथ संवाद का अवसर बन रही है। ऐसे में आलोचकों और USCIRF की ओर से उठाया जाने वाला विरोध का शोर, प्रवासी भारतीयों और स्वयंसेवकों के उत्साह तथा व्यापक जनसंपर्क के बीच दबकर रह जाने की संभावना है। -नीरज कुमार दुबे
सोशल मीडिया पर इस समय एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें एक महिला पर्यटक भारतीय सेना के जवानों के साथ बहस कर रही है और खुद को “Gen-Z” बताकर सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दे रही है। शायद इस महिला को पता नहीं कि सीमा पर खड़े सैनिक की ड्यूटी कोई पर्यटन सेवा नहीं है और राष्ट्रीय सुरक्षा कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है जिसे किसी पर्यटक की सुविधा, बहस या अधिकारों के नाम पर दरकिनार कर दिया जाए। साथ ही वीडियो में महिला खुद को “Gen-Z” बताते हुए यह कहती सुनाई देती है कि वह “यह बकवास बर्दाश्त नहीं करेगी।” यहां सवाल यह उठता है कि क्या किसी पीढ़ी का टैग राष्ट्रीय सुरक्षा प्रोटोकॉल से ऊपर हो सकता है? बताया जा रहा है कि वायरल वीडियो में दिखी घटना कारगिल सेक्टर के एक संवेदनशील हाई-एल्टीट्यूड चेक पोस्ट की है, जहां पर्यटकों के एक समूह को प्रतिबंधित दिशा में आगे बढ़ने से रोका गया। बताया जा रहा है कि संबंधित क्षेत्र में प्रवेश के लिए आवश्यक अनुमति और सुरक्षा नियम लागू थे। एक अन्य विवरण में इसे मिनामार्ग या मिनीमार्ग चेक पोस्ट के पास अस्थायी सड़क प्रतिबंध से जुड़ा बताया गया है। वीडियो में दिख रही तस्वीर बेहद स्पष्ट है। एक तरफ शांत रहकर सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन कराने की कोशिश करता जवान और दूसरी तरफ अपनी यात्रा, दूरी और अधिकारों का हवाला देकर बहस करता पर्यटक समूह। इसे भी पढ़ें: Sergio Gor के बयान से तिलमिलाये Pakistan ने Trump Administration पर उतारी भड़ास, US Diplomat Natalie Baker को तलब कर थमाया Strong Demarche महिला पर्यटक का यह तर्क कि “हम Gen-Z हैं, हम यह सब बर्दाश्त नहीं करेंगे”, दरअसल उस मानसिकता को उजागर करता है जिसमें व्यक्तिगत सुविधा को व्यवस्था और सुरक्षा से ऊपर मान लिया जाता है। Gen-Z होना न कोई विशेष सुरक्षा पास है, न ही यह कानून और राष्ट्रीय सुरक्षा प्रोटोकॉल को चुनौती देने का लाइसेंस है। सेना यह नहीं देखती कि सामने खड़ा व्यक्ति किस पीढ़ी का है; उसे यह देखना होता है कि सीमा सुरक्षित रहे, कोई संदिग्ध गतिविधि न हो और कोई नागरिक अनजाने में किसी खतरे की जद में न पहुंच जाए। देखा जाये तो कारगिल और नियंत्रण रेखा के आसपास के इलाके सामान्य पर्यटन स्थल नहीं हैं। यह वही संवेदनशील भूभाग है जहां भारत ने युद्ध का सामना किया है, जहां घुसपैठ और आतंकी गतिविधियों का इतिहास रहा है और जहां मौसम, दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियां तथा सैन्य गतिविधियां हर समय सुरक्षा की अलग चुनौतियां पैदा करती हैं। ऐसे में सड़क बंद होना, आवाजाही नियंत्रित होना, चेकिंग होना या किसी क्षेत्र में प्रवेश के लिए अनुमति मांगना कोई “एंटी-टूरिस्ट” रवैया नहीं, बल्कि एक जरूरी सुरक्षा व्यवस्था है। सेना और सुरक्षा एजेंसियों को वहां इसलिए तैनात रहना पड़ता है क्योंकि सीमावर्ती इलाकों में खतरे केवल दिखाई देने वाले नहीं होते। कई बार खुफिया सूचना के आधार पर तलाशी या घेराबंदी की जरूरत पड़ सकती है। कभी सैन्य काफिले की आवाजाही होती है, कभी खराब मौसम या भूस्खलन के कारण रास्ता असुरक्षित हो जाता है और कभी किसी संभावित खतरे को देखते हुए नागरिकों की आवाजाही अस्थायी रूप से रोकी जाती है। ऐसे निर्णय किसी एक पर्यटक को परेशान करने के लिए नहीं, बल्कि दर्जनों या सैकड़ों लोगों की जान बचाने के लिए लिए जाते हैं। बर्फीली चोटियों, दुर्गम सड़कों और हर वक्त मौजूद संभावित खतरे के बीच जवान इसलिए तैनात है ताकि देश के नागरिक सुरक्षित रहें और पर्यटन जैसी सामान्य गतिविधियां भी संभव हो सकें। ऐसे में किसी पर्यटक का जवानों से यह पूछना कि रास्ता आखिर क्यों बंद किया गया है, हर परिस्थिति में उचित नहीं कहा जा सकता, क्योंकि सुरक्षा बलों के पास मौजूद खुफिया जानकारी, किसी विशेष इनपुट या चल रहे ऑपरेशन का कारण सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। कई बार एक मामूली-सा खुलासा भी सुरक्षा अभियान और जवानों की जान को जोखिम में डाल सकता है। देश पुलवामा में सुरक्षा बलों के काफिले पर हुए आतंकी हमले की भयावहता देख चुका है और पहलगाम में पर्यटकों को निशाना बनाकर किए गए आतंकी हमले की त्रासदी भी झेल चुका है। ऐसे अनुभव साफ बताते हैं कि संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा को लेकर एक छोटी-सी चूक कितनी भारी पड़ सकती है। इसलिए पर्यटकों को यह समझना होगा कि जब सेना या सुरक्षा बल किसी रास्ते को बंद करते हैं या आगे बढ़ने से रोकते हैं, तो हर निर्णय के पीछे की वजह कैमरे के सामने बताना संभव नहीं होता। ऐसे में जवान से बहस करना, वीडियो बनाकर उस पर अनावश्यक प्रतिबंध लगाने का आरोप लगाना या सुरक्षा व्यवस्था पर सवालिया निशान खड़ा करना केवल असंवेदनशीलता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की गंभीरता को न समझ पाने का उदाहरण है। सुरक्षा के मामले में सहयोग और धैर्य ही समझदारी है, क्योंकि कई बार जिस खतरे को आम नागरिक देख नहीं सकता, उसे रोकने के लिए ही जवान वहां खड़ा होता है। साथ ही वायरल हो रहे वीडियो में पर्यटक समूह के कुछ सदस्य यह कहते भी दिखाई देते हैं कि वे सैकड़ों किलोमीटर दूर से वहां पहुंचे हैं। लेकिन ऐसे लोगों को समझना होगा कि लंबी यात्रा किसी प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश का अधिकारपत्र नहीं बन जाती। यदि किसी क्षेत्र के लिए परमिट जरूरी है तो पहले उसकी जानकारी लेना और नियमों का पालन करना पर्यटक की जिम्मेदारी है। विशेष रूप से लद्दाख और अन्य संरक्षित सीमावर्ती क्षेत्रों में नियम परिस्थितियों और सुरक्षा स्थिति के अनुसार बदल सकते हैं। सैन्य प्रतिष्ठानों, चेक पोस्टों और रणनीतिक स्थानों पर फोटोग्राफी या वीडियोग्राफी भी प्रतिबंधित हो सकती है। इस पूरे प्रकरण का सबसे चिंताजनक पहलू वह भाषा और रवैया है, जिसमें सुरक्षा व्यवस्था को व्यक्तिगत अधिकारों के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश दिखाई देती है। लोकतंत्र में सवाल पूछने का अधिकार है, लेकिन संवेदनशील सैन्य चौकी पर ऑपरेशन या सुरक्षा प्रतिबंध के दौरान बहस करके आदेश बदलवाने का अधिकार किसी को नहीं है। संसद, टैक्स या किसी पीढ़ी का नाम लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा की जरूरतों को चुनौती देना न तो लोकतंत्र को मजबूत करता है और न ही नागरिक अधिकारों की रक्षा करता है। दूसरी ओर, सोशल मीडिया पर इस वीडियो को लेकर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली जोकि स्वाभाविक है। लोगों ने महिला पर्यटक और उसके साथियों के रवैये को अहंकारी और गैर-जिम्मेदाराना बताया है। “Gen-Z” वाली टिप्पणी पर मीम्स भी बन रहे हैं, लेकिन इस घटना को केवल मनोरंजन के रूप में देखने की बजाय इससे एक गंभीर सबक लेने की जरूरत है। कैमरे के सामने हंगामा करके वायरल होना आसान है, लेकिन सीमा की सुरक्षा में एक छोटी-सी चूक की कीमत कितनी बड़ी हो सकती है, इसका अंदाजा वहां तैनात जवान को हमसे कहीं बेहतर है। यह चेतावनी केवल उस महिला पर्यटक के लिए नहीं, बल्कि उन सभी लोगों के लिए है जो सोशल मीडिया की लोकप्रियता, व्यक्तिगत सुविधा या पीढ़ीगत पहचान के नाम पर सुरक्षा नियमों को हल्के में लेते हैं। राष्ट्र की सुरक्षा किसी हैशटैग, नारे या वायरल वीडियो के हिसाब से नहीं चल सकती। सीमा पर तैनात सैनिक को अपना काम करने दीजिए। यदि रास्ता बंद है तो रुकिए, यदि अनुमति चाहिए तो परमिट लीजिए और यदि सुरक्षा बल वापस लौटने को कहें तो सहयोग कीजिए। देखा जाये तो इस घटना ने एक जरूरी संदेश जरूर दे दिया है कि यात्रा का अधिकार जिम्मेदारी के साथ आता है और राष्ट्रीय सुरक्षा के सामने व्यक्तिगत सुविधा का कोई दावा नहीं चल सकता। सीमा की हकीकत को सभी को समझना होगा। जेन जी हो या कोई भी हो, वर्दी का सम्मान कीजिए, प्रोटोकॉल का पालन कीजिए और याद रखिए, जवान आपकी आजादी रोकने के लिए नहीं, आपकी सुरक्षा और देश की सीमाओं की रक्षा के लिए वहां खड़े हैं। -नीरज कुमार दुबे
सर्जियो गोर के एक बयान ने पाकिस्तान को ऐसा झटका दिया कि इस्लामाबाद ट्रंप प्रशासन पर बुरी तरह भड़क उठा। अमेरिका के भारत में राजदूत और दक्षिण व मध्य एशिया के विशेष दूत सर्जियो गोर ने श्रीनगर पहुंचकर जम्मू-कश्मीर को भारत का “महत्वपूर्ण हिस्सा” क्या बताया, पाकिस्तान की वर्षों पुरानी कूटनीतिक पटकथा ही हिल गई। प्रतिक्रिया इतनी तीखी थी कि पाकिस्तान ने अमेरिकी चार्जे डी'अफेयर्स नताली बेकर को विदेश मंत्रालय तलब कर बाकायदा “स्ट्रॉन्ग डिमार्श” थमा दिया और गोर के बयान को “गैर-जिम्मेदाराना” करार दे डाला। सवाल यह है कि आखिर गोर के शब्दों में ऐसा क्या था जिसने पाकिस्तान को सीधे अमेरिका से भिड़ने के लिए मजबूर कर दिया? दरअसल, श्रीनगर दौरे पर पहुंचे गोर ने साफ कहा, “यह भारत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और मैं यहां पहली बार आया हूं।” उन्होंने जम्मू-कश्मीर की खूबसूरती की तारीफ की, मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से मुलाकात की और कहा कि अमेरिका जम्मू-कश्मीर के लिए अपनी ट्रैवल एडवाइजरी की समीक्षा कर सकता है। गोर ने यह भी माना कि केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने क्षेत्र को अधिक सुरक्षित बनाने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इसके बाद उनका डल झील में शिकारा की सवारी करना केवल पर्यटन कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक मजबूत प्रतीकात्मक संदेश भी बन गया। अमेरिका का शीर्ष राजनयिक जम्मू-कश्मीर की जमीन पर खुले तौर पर भारत की संप्रभुता के अनुरूप भाषा बोल रहा था और क्षेत्र को संभावित रूप से अमेरिकी पर्यटकों के लिए सुरक्षित गंतव्य के रूप में देख रहा था। इसे भी पढ़ें: पाकिस्तान पर India का Bulldozer Action, Delhi में Pakistan High Commission के बाहर बने अवैध ढांचे ध्वस्त यही बात पाकिस्तान को सबसे ज्यादा चुभी। इस्लामाबाद ने तुरंत पुराना राग छेड़ते हुए जम्मू-कश्मीर को “अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त विवादित क्षेत्र” बताया और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों तथा “कश्मीरी लोगों की आकांक्षाओं” का हवाला दिया। पाकिस्तान का आरोप था कि गोर की टिप्पणी अमेरिका की पुरानी स्थिति के विपरीत है। यानी जिस वाशिंगटन से पाकिस्तान दशकों से कश्मीर पर अंतरराष्ट्रीय दखल, मध्यस्थता और भारत पर दबाव की उम्मीद लगाए बैठा था, उसी अमेरिकी प्रशासन के एक प्रमुख प्रतिनिधि ने श्रीनगर में जाकर ऐसी भाषा बोल दी जिसने इस्लामाबाद की कूटनीतिक बेचैनी बढ़ा दी। इस घटनाक्रम का सामरिक महत्व बेहद बड़ा है। भारत लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और इससे जुड़ा कोई भी लंबित मुद्दा भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय है। भारत ने तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को हमेशा खारिज किया है। इसके उलट पाकिस्तान का पूरा प्रयास कश्मीर को लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जीवित विवाद के रूप में पेश करने का रहा है। गोर का “इंपॉर्टेंट पार्ट ऑफ इंडिया” वाला बयान, यदि वाशिंगटन की व्यापक नीति में किसी बदलाव का संकेत साबित होता है, तो यह पाकिस्तान की इसी रणनीति पर सीधा प्रहार होगा। हालांकि यहां कूटनीतिक सावधानी भी जरूरी है। पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने इस बयान को महत्वपूर्ण बताया है, लेकिन यह संभावना भी जताई कि गोर अपने औपचारिक निर्देशों से आगे निकल गए हों और पाकिस्तान को शांत करने के लिए अमेरिका बाद में अपना पुराना रुख दोहरा सकता है। यही कारण है कि भारत के लिए केवल एक बयान को अंतिम अमेरिकी नीति परिवर्तन मान लेना जल्दबाजी होगी। फिर भी, यह टिप्पणी उस पृष्ठभूमि में बेहद मायने रखती है जिसमें अमेरिका के पिछले रुख में अक्सर “कश्मीरी लोगों की इच्छाओं” जैसी भाषा दिखाई देती रही है और स्वयं डोनाल्ड ट्रंप कई मौकों पर कश्मीर पर मध्यस्थता की पेशकश कर चुके हैं। लेकिन इस पूरे विवाद का एक दूसरा और शायद ज्यादा दिलचस्प रणनीतिक पहलू पाकिस्तान की गोर से सीधी भिड़ंत है। गोर दक्षिण और मध्य एशिया के विशेष दूत भी हैं और उनके दायरे में पाकिस्तान भी आता है। ऐसे में पाकिस्तान ने जिस तीखे तरीके से उन्हें निशाने पर लिया है, उससे गोर के लिए पाकिस्तान संबंधी कूटनीतिक भूमिका और मुश्किल हो सकती है। सिब्बल ने भी इसी ओर इशारा करते हुए कहा कि पाकिस्तान ने गोर पर जिस तरह हमला किया है, उससे वह नाराज हो सकते हैं और यह भारत के लिए अच्छी बात है। इसका सीधा लाभ यह हो सकता है कि अमेरिका-पाकिस्तान समीकरण में पैदा होने वाली खटास वाशिंगटन को दक्षिण एशिया में अपनी प्राथमिकताओं पर नए सिरे से विचार करने के लिए प्रेरित करे। पाकिस्तान लंबे समय से अमेरिकी मध्यस्थता की उम्मीद पर कश्मीर नैरेटिव को अंतरराष्ट्रीय बनाने की कोशिश करता रहा है। लेकिन अगर ट्रंप प्रशासन के प्रभावशाली चेहरे के साथ ही उसका टकराव गहराता है, तो इस्लामाबाद की वाशिंगटन लॉबिंग कमजोर पड़ सकती है और भारत के लिए अमेरिका के साथ रणनीतिक संवाद को मजबूत करने की गुंजाइश बढ़ सकती है। हम आपको यह भी बता दें कि दक्षिण एशिया विशेषज्ञ माइकल कुगेलमैन ने भी गोर की टिप्पणी को भारत-अमेरिका संबंधों को सुधारने की दिशा में मददगार बताया है। उन्होंने कहा है कि दिल्ली आने के बाद गोर भारत के साथ रिश्तों को सुधारने के लक्ष्य पर काम कर रहे हैं और यह बयान उस प्रयास को निश्चित रूप से मजबूती दे सकता है। हालांकि उन्होंने यह चेतावनी भी दी कि यदि यह वास्तव में अमेरिकी नीति का संकेत है, तो यह वर्षों पुराने अमेरिकी रुख से अलग होगा और पाकिस्तान के साथ दोबारा मजबूत हो रहे संबंधों को प्रभावित कर सकता है। साथ ही गोर के दौरे का आर्थिक और सुरक्षा संबंधी संदेश भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। अमेरिका फिलहाल जम्मू-कश्मीर के लिए “लेवल-4: डू नॉट ट्रैवल” एडवाइजरी बनाए हुए है, जो अंतरराष्ट्रीय पर्यटन के लिए बड़ी बाधा रही है। पिछले वर्ष पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद सुरक्षा चिंताएं और बढ़ी थीं। अब गोर का यह कहना कि अमेरिकी प्रशासन ट्रैवल चेतावनी को कम करने की संभावना पर विचार करेगा, जम्मू-कश्मीर के लिए बड़ा अवसर बन सकता है। यदि एडवाइजरी में ढील मिलती है तो इसका संदेश केवल पर्यटकों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति पर अमेरिकी भरोसे का अंतरराष्ट्रीय संकेत होगा। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी गोर के साथ पर्यटन, बागवानी और नई अर्थव्यवस्था जैसे क्षेत्रों में जम्मू-कश्मीर और अमेरिका के बीच संबंधों को व्यापक और गहरा करने पर चर्चा की। ऐसे समय में जब पर्यटन से हजारों परिवारों की रोजी-रोटी जुड़ी है और पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती भी अमेरिकी ट्रैवल एडवाइजरी की समीक्षा की मांग कर चुकी हैं, किसी संभावित बदलाव का आर्थिक असर व्यापक हो सकता है। कुल मिलाकर, श्रीनगर में सर्जियो गोर का दौरा पाकिस्तान के लिए सिर्फ एक कूटनीतिक झटका नहीं, बल्कि उसके वर्षों पुराने कश्मीर नैरेटिव पर सीधा प्रहार है। पाकिस्तान ने अमेरिकी अधिकारी को तलब कर अपनी नाराजगी तो दर्ज करा दी, लेकिन इस आक्रामक प्रतिक्रिया ने यह भी साफ कर दिया कि गोर के शब्द इस्लामाबाद को कितनी गहराई तक चुभे हैं। अब नजर इस बात पर रहेगी कि क्या ट्रंप प्रशासन गोर की टिप्पणी को आगे की नीति में बदलता है या पाकिस्तान को शांत करने के लिए पुराने अमेरिकी रुख की ओर लौटता है। लेकिन फिलहाल इतना तय है कि श्रीनगर से निकला यह संदेश भारत के लिए रणनीतिक, कूटनीतिक और आर्थिक, तीनों मोर्चों पर संभावित लाभ का दरवाजा खोलता है, जबकि पाकिस्तान के सामने सवाल यह खड़ा कर देता है कि अमेरिका से भिड़कर उसने अपनी ही कूटनीतिक जमीन तो और कमजोर नहीं कर ली है।
CM थलापति विजय का बड़ा बयान: 'सारे सबूत मेरे पास हैं...', आखिर किसे दी खुलासे की धमकी?
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उपराष्ट्रपति ने मावीरन ओंडिवीरन के बलिदान दिवस और राजीव गांधी की जयंती पर दी श्रद्धांजलि
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तमिलनाडु के वेदारण्यम के नमक उत्पादक वार्षिक लक्ष्य के करीब पहुंचे, गर्मी से उत्पादन में हुई वृद्धि
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झारखंड की शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा, 'जेएसएससी और जेपीएससी को लेकर सरकार का फैसला साहसिक'
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चेन्नई पहुंचे अमित शाह, आज करेंगे परिषद बैठक की अध्यक्षता
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह बुधवार रात चेन्नई पहुंचे, जहां वह गुरुवार को चेन्नई के निकट कोवलम में आयोजित होने वाली दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद (सदर्न जोनल काउंसिल) की 31वीं बैठक की अध्यक्षता करेंगे
राजस्थान नगर निकाय चुनाव घोषित, 9 और 11 को मतदान
राजस्थान में नगर निकाय चुनावों का इंतजार खत्म हो गया है। राज्य निर्वाचन आयोग ने बुधवार को राज्य में होने वाले नगर निकाय चुनावों की घोषणा कर दी। चुनाव दो चरणों में 9 और 11 सितंबर को कराए जाएं
महाराष्ट्र में धर्मांतरण विरोधी कानून पर सपा और कांग्रेस ने जताई आपत्ति
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गोवा: विश्व फोटोग्राफी दिवस पर सम्मान समारोह, सीएम सावंत बोले- तस्वीर सबकुछ कहती है...
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कलकत्ता हाई कोर्ट ने जनगणना में शिक्षकों की ड्यूटी पर फैसला सुरक्षित रखा
कलकत्ता हाई कोर्ट ने जनगणना में शिक्षकों की ड्यूटी पर फैसला सुरक्षित रखा
अखिलेश यादव के वार पर जयंत चौधरी का संयमित पलटवार, पश्चिमी यूपी की राजनीति में नया उबाल
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी का नाम लिए बिना ऐसा तंज कसा है जिसकी गूंज सीधे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सियासी मैदान तक पहुंच गई। अखिलेश ने कहा, “कहां-कहां से आ गए थे, चवन्नी का रुपया बना दिया, फिर भी…”। दरअसल अखिलेश ने अपने इस बयान के जरिये पुराने साथी को राजनीति में आगे बढ़ाने का दावा किया और फिर साथी द्वारा उन्हें छोड़ देने पर अपनी शिकायत दर्ज कराई लेकिन इस दौरान उनके जो तेवर रहे उसने पश्चिमी यूपी की सियासत को गर्मा दिया है। रालोद कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आये हैं और अखिलेश यादव के पुतले फूंक रहे हैं। यही नहीं, रालोद प्रमुख जयंत चौधरी ने भी अखिलेश पर पलटवार करते हुए दर्शा दिया है कि एक्शन का रिएक्शन तत्काल होगा। हालांकि अखिलेश के तंज पर जयंत चौधरी ने पलटवार तल्खी की बजाय बेहद नपे-तुले अंदाज में किया। उन्होंने कहा, “वो अपनी बात कहें तो अच्छा है। उनके साथ खड़े होने वाले हर सहयोगी… इस तरह की बयानबाजी से सोचने को मजबूर हो रहे हैं।” जयंत ने आगे कहा, “लोकतंत्र है, यहां जनता सबको बनाती है और सबको बिगाड़ती है।” जब उनसे पूछा गया कि अखिलेश उन्हें इतना क्यों याद कर रहे हैं, तो उन्होंने गेंद वापस अखिलेश के पाले में डालते हुए कहा, “ये तो आप लोग उनसे जाकर पूछिए।” दरअसल, यह सिर्फ दो नेताओं की निजी राजनीतिक नोकझोंक नहीं है। इसके पीछे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बदलते जातीय और गठबंधन समीकरण की पूरी पटकथा पढ़ी जा सकती है। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा और रालोद ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। इस गठबंधन में जाट-मुस्लिम समीकरण को साधने की कोशिश साफ दिखाई दी थी। अखिलेश यादव ने जयंत चौधरी को राज्यसभा भेजने में भी भूमिका निभाई। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले पूर्व प्रधानमंत्री और जयंत के दादा चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न मिलने के बाद रालोद ने एनडीए का दामन थाम लिया। अब जयंत भाजपा नेतृत्व वाले गठबंधन का हिस्सा हैं और केंद्र सरकार में राज्यमंत्री हैं। यही बदलाव अखिलेश के मौजूदा हमले को राजनीतिक धार देता है। सपा प्रमुख लगातार पीडीए यानि पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के सामाजिक समीकरण को मजबूत करने की कोशिश में हैं। पश्चिमी यूपी में उनकी चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि यहां सपा का पारंपरिक मुस्लिम-यादव आधार पूर्वांचल या मध्य यूपी की तरह निर्णायक नहीं रहा है। ऐसे में गुर्जर, दलित, अन्य पिछड़ी जातियों और गैर-जाट मतदाताओं को जोड़ना सपा की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। जयंत चौधरी का रालोद इस गणित में छोटी पार्टी जरूर है, लेकिन पश्चिमी यूपी में उसका प्रभाव उसके चुनावी आंकड़ों से कहीं ज्यादा राजनीतिक वजन रखता है। जाट समुदाय में चौधरी चरण सिंह की विरासत और रालोद की पकड़ अब भी गठबंधन राजनीति के लिए अहम है। भाजपा के साथ जयंत की मौजूदगी एनडीए को पश्चिमी यूपी में जाट समर्थन को साधने का अतिरिक्त आधार देती है। यही कारण है कि अखिलेश का “चवन्नी” वाला तंज महज पुरानी दोस्ती का हिसाब नहीं, बल्कि नए सामाजिक समीकरणों की जंग भी माना जा रहा है। दिलचस्प यह है कि अखिलेश ने हाल में अपने नेताओं-कार्यकर्ताओं को चुनावी समय में सोच-समझकर बयान देने की नसीहत दी थी, ताकि भाजपा को कोई राजनीतिक लाभ न मिले। इसके तुरंत बाद जयंत पर निशाना साधना बताता है कि सियासी प्राथमिकताएं कभी-कभी रणनीतिक संयम पर भारी पड़ जाती हैं। उधर, जयंत ने तीखा पलटवार करने की बजाय संयम चुना। शायद इसलिए कि वह अखिलेश के बनाए जाट बनाम गैर-जाट नैरेटिव में फंसना नहीं चाहते। उनकी सौम्य प्रतिक्रिया का संदेश भी उतना ही राजनीतिक है। इसका अर्थ यह है कि रालोद अब सपा के साथ नहीं बल्कि एनडीए के साथ ही अपना भविष्य देख रहा है। बहरहाल, “चवन्नी” और “रुपया” की यह लड़ाई असल में पश्चिमी यूपी की उस सियासी तिजोरी की लड़ाई है, जिसकी चाबी जाट, मुस्लिम, दलित, गुर्जर और अन्य पिछड़े मतदाताओं के हाथ में है। देखा जाये तो चुनावी राजनीति में सवाल यह नहीं कि किसने किसे रुपया बनाया; असली सवाल यह है कि जनता की नजर में अब कौन कितने का है। -नीरज कुमार दुबे
झारखंड में नियुक्ति घोटाले की सीबीआई जांच हो, 'बड़ी मछ्ली' को बचाने की कोशिश: दीपक प्रकाश
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नवीन पटनायक ने एमएमडीआर संशोधन बिल का किया विरोध, कहा-ओडिशा की वित्तीय स्वायत्तता को होगा नुकसान
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राजस्थान: कांग्रेस के 'पंचायत टास्क फोर्स' का गठन, युवाओं को 50 प्रतिशत प्रतिनिधित्व देने की तैयारी
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सेंसेक्स 325 अंक फिसला, गिरावट के साथ बंद हुआ भारतीय शेयर बाजार
मुंबई, भारतीय शेयर बाजार बुधवार के कारोबारी सत्र में गिरावट के साथ बंद हुआ। दिन के अंत में सेंसेक्स 325.78 अंक या 0.42 प्रतिशत की गिरावट के साथ 76,909.68 और निफ्टी 76.60 अंक या 0.32 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 24,078.30 पर था।
ईडी को मिली होगी ठोस जानकारी, तभी हुई आज़म खान के ठिकानों पर कार्रवाई: मौलाना शहाबुद्दीन
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Mahipal Singh Exclusive: Delhi से Nagpur तक सबको पता था? Ram Mandir चंदा चोरी का सबसे बड़ा खुलासा!
सिविल ड्रेस में किन लोगों ने छात्रों पर हमला किया था, इसकी जांच होनी चाहिए : रोहित पवार
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क्विक-कॉमर्स कंपनी जेप्टो ने फ्री डिलीवरी पाने के लिए न्यूनतम ऑर्डर मूल्य (मिनिमम ऑर्डर वैल्यू) बढ़ा दिया है। कंपनी ने सामान्य समय में इसे 149 रुपए से बढ़ाकर 199 रुपए कर दिया है, जबकि अधिक मांग (पीक डिमांड) के दौरान यह सीमा 299 रुपए तक पहुंच रही है। इस बदलाव के साथ जेप्टो की फ्री डिलीवरी नीति अब प्रतिस्पर्धी कंपनियों ब्लिंकिट और इंस्टामार्ट के समान स्तर पर आ गई है।
सपा सांसद अवधेश प्रसाद का दावा, यूपी विधानसभा चुनाव 2027 में 50 सीटें भी नहीं जीत पाएगी भाजपा
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भाजपा ने कहा था- 'ना खाएंगे, ना खाने देंगे', लेकिन भ्रष्टाचार पर कोई एक्शन नहीं लिया गया : रोहित पवार
वैश्विक दवाब से सोने-चांदी के दाम गिरे, सिल्वर करीब 2 प्रतिशत फिसला
मुंबई, वैश्विक बाजारों से मिले कमजोर संकेतों के बीच बुधवार को घरेलू सर्राफा और वायदा बाजार में सोने-चांदी की कीमतों में तेज गिरावट दर्ज की गई। बढ़ते अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और वैश्विक स्तर पर सुरक्षित निवेश की बदलती धारणा के कारण कीमती धातुओं पर दबाव बना हुआ है, जिसका असर मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर भी साफ दिखाई दिया, जहां सोना 1.54 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम से नीचे फिसल गया, जबकि चांदी 2.30 लाख रुपए प्रति किलोग्राम के स्तर से नीचे आ गई।
भारत की शौर्य गाथा से संबंधित डॉक्यूमेंट्री सामने आते ही पाकिस्तान की नींद उड़ गयी है, इसलिए वह रात दो बजे बयान जारी कर अपनी भड़ास निकाल रहा है। हम आपको बता दें कि डिस्कवरी की दो कड़ियों वाली डॉक्यूमेंट्री “Declassified: Operation Sindoor” ने ऑपरेशन सिंदूर के उन पहलुओं को सामने रखा है, जिनसे पाकिस्तान का आधिकारिक नैरेटिव सीधे टकराता है। 15 अगस्त की रात रिलीज हुई इस डॉक्यूमेंट्री में भारतीय सैन्य और सुरक्षा प्रतिष्ठान के शीर्ष अधिकारियों ने पहली बार विस्तार से बताया है कि मई 2025 के भारत-पाकिस्तान सैन्य टकराव के दौरान फैसले कैसे लिए गए, पाकिस्तान की मिसाइल चुनौती का जवाब कैसे दिया गया और भारतीय हथियारों ने किस तरह लक्ष्य भेदे। सबसे बड़ा खुलासा 10 मई की रात करीब 1:30 बजे का है। राष्ट्रीय सुरक्षा विश्लेषक नितिन गोखले के अनुसार पाकिस्तान ने दिल्ली की ओर एक हाई-स्पीड मिसाइल दागी, जिसे हरियाणा के सिरसा के ऊपर भारतीय वायु रक्षा ने रोक दिया। इसके बाद भारत ने अपना अंतिम और सबसे तीखा जवाबी हमला शुरू किया। भारतीय रक्षा मंत्रालय पहले ही बता चुका था कि उस रात पाकिस्तान ने भारतीय वायुसेना के ठिकानों, सेना के गोला-बारूद डिपो, हवाई अड्डों और सैन्य छावनियों को मिसाइलों, ड्रोन, रॉकेट और लंबी दूरी के हथियारों से निशाना बनाने की कोशिश की थी। सिरसा में गिरी मिसाइल का मलबा अगले दिन खेतों में दिखाई दिया था और उपलब्ध रिपोर्टों में इसे बराक-8 वायु रक्षा प्रणाली से रोके जाने की बात सामने आई थी। यहीं से भारतीय सेना और भारतीय सैन्य तकनीक की असली ताकत सामने आती है। पाकिस्तान ने जिस हमले से भारत को दबाव में लाने की कोशिश की, वही हमला उसके लिए पलटवार की शुरुआत बन गया। डॉक्यूमेंट्री के अनुसार इस चरण में भारतीय वायुसेना को पूरी जिम्मेदारी दी गई और ब्रह्मोस क्रूज मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया। इसके बाद पाकिस्तान के एयरफील्ड, रडार प्रतिष्ठान और कमांड-एंड-कंट्रोल केंद्र भारतीय हमलों की जद में आ गए। रफीकी, सुक्कुर, रहीम यार खान और नूर खान जैसे एयरबेस शुरुआती हमलों में निशाना बने, जबकि सरगोधा, भोलारी और जैकबाबाद समेत अन्य ठिकानों पर दूसरी लहर में कार्रवाई हुई। कुछ ही घंटों में पाकिस्तान के 11 सैन्य ठिकानों पर हमला किए जाने की बात डॉक्यूमेंट्री में सामने आती है। भारतीय वायुसेना के एयर मार्शल अवधेश भारती ने इस कार्रवाई की रणनीति को साफ शब्दों में बताते हुए कहा कि उद्देश्य सीमित और नियंत्रित रहते हुए पाकिस्तान को यह संदेश देना था कि भारत जब चाहे, वहां तक पहुंच सकता है और पाकिस्तान के पास उसका प्रभावी जवाब नहीं है। वरिष्ठ भारतीय अधिकारियों ने पाकिस्तानी एयरबेसों पर रनवे, हैंगर और खड़े विमानों को हुए नुकसान का भी उल्लेख किया। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ द्वारा मई 2025 के अंत में विभिन्न स्थानों, जिसमें रावलपिंडी एयरपोर्ट भी शामिल था, पर भारतीय मिसाइल और ब्रह्मोस हमलों से हुए नुकसान को स्वीकार करने का भी दस्तावेजी संदर्भ मौजूद है। और फिर आता है भारतीय हथियारों का वह अध्याय, जिसने पाकिस्तान के दावों की हवा निकालने का काम किया। एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने बताया कि भारत ने करीब 1,200 किलोमीटर लंबे मोर्चे पर और पाकिस्तान की सीमा के भीतर लगभग 200 किलोमीटर तक कार्रवाई की तथा भारतीय हथियार अपने निर्धारित लक्ष्यों तक पहुंच रहे थे। ब्रह्मोस-ए क्रूज मिसाइल इस कार्रवाई के केंद्र में थी। एपी सिंह के अनुसार इसकी अत्यधिक गति के कारण इसे रोक पाना कठिन होता है और इससे होने वाला नुकसान अपेक्षाकृत कहीं अधिक होता है। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि यह भारत का स्वदेशी हथियार है। यानी पाकिस्तान के लिए समस्या सिर्फ यह नहीं कि भारत ने हमला किया। समस्या यह है कि भारत ने अपनी बनाई मिसाइलों और अपनी सैन्य क्षमता के दम पर हमला किया और उसके बाद पाकिस्तान को बातचीत का रास्ता तलाशना पड़ा। डॉक्यूमेंट्री के अनुसार भारतीय हमलों के कुछ ही घंटों बाद पाकिस्तान की तरफ से नई दिल्ली से संपर्क साधने की कोशिशें शुरू हो गईं। पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से संपर्क किया और रुबियो ने भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर से बात की। भारत ने किसी तीसरे देश की मध्यस्थता स्वीकार करने की बजाय साफ कहा कि पाकिस्तान का डीजीएमओ निर्धारित सैन्य संचार चैनल के जरिए भारतीय डीजीएमओ से संपर्क करे। आखिरकार बातचीत हुई और पाकिस्तान की तरफ से संघर्षविराम की मांग सामने आई। भारतीय डीजीएमओ लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई के अनुसार पाकिस्तानी डीजीएमओ ने कहा कि “इतनी ब्रह्मोस मिसाइलें” लगने के बाद भारत को अब संतुष्ट हो जाना चाहिए और लड़ाई रोक देनी चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने भी बताया कि जब पाकिस्तान ने बार-बार कहा कि “अब बहुत हो चुका”, तब भारत ने संघर्षविराम के अनुरोध को स्वीकार किया। 10 मई शाम 5:30 बजे तक सैन्य कार्रवाई रोकने पर सहमति बनी। यही वह तथ्य है जो पाकिस्तान के मौजूदा नैरेटिव को सबसे ज्यादा असहज करता है। क्योंकि अब पाकिस्तान की तरफ से कहानी यह बनाई जा रही है कि उसने भारतीय आक्रमण को विफल कर दिया और भारत को नुकसान उठाना पड़ा। पाकिस्तानी सेना के मीडिया विंग आईएसपीआर ने डॉक्यूमेंट्री को “बॉलीवुड शैली” का प्रचार बताते हुए दावा किया है कि भारत सैन्य विफलता को सफलता के रूप में पेश कर रहा है। उसने विमान गिराने, भारतीय नुकसान और कथित पाकिस्तानी जवाबी कार्रवाई के दावे भी दोहराए। लेकिन सवाल सीधा है कि अगर पाकिस्तान वास्तव में निर्णायक स्थिति में था तो भारतीय हमलों के बाद उसके अधिकारियों को नई दिल्ली से संपर्क की इतनी जल्दबाजी क्यों थी? अगर भारतीय ब्रह्मोस और अन्य हथियारों ने कोई गंभीर प्रभाव नहीं डाला, तो पाकिस्तान के डीजीएमओ ने संघर्षविराम की मांग क्यों की? हम आपको बता दें कि पाकिस्तान के आईएसपीआर ने डॉक्यूमेंट्री पर “तथ्यों को रंगने”, “प्रचार” और “इतिहास को अपनी पसंद के रंगों में लिखने” जैसे आरोप लगाए हैं। लेकिन भारतीय पक्ष का जवाब इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। अजित डोभाल का संदेश बिल्कुल स्पष्ट है कि भारत की उदारता, संयम और सहनशीलता को कमजोरी समझने की भूल नहीं की जानी चाहिए। भारत जोखिम उठा सकता है और जरूरत पड़ने पर जोरदार प्रहार कर सकता है। देखा जाये तो यही ऑपरेशन सिंदूर का सबसे बड़ा संदेश है। भारत ने केवल जवाब नहीं दिया; उसने यह दिखाया कि वह कहां, कब और कितनी ताकत से जवाब देना है, यह खुद तय कर सकता है। बराक-8 ने आसमान में आती चुनौती को रोका, ब्रह्मोस ने पाकिस्तान के सैन्य ठिकानों तक पहुंचकर अपनी मारक क्षमता दिखाई और भारतीय सशस्त्र बलों ने पूरे अभियान को नियंत्रित तरीके से अंजाम दिया। पाकिस्तान चाहे इसे “प्रचार” कहे, “बॉलीवुड” कहे या अपनी सुविधा के मुताबिक “मार्का-ए-हक” नाम दे लेकिन डॉक्यूमेंट्री ने पहली बार भारतीय सैन्य नेतृत्व की जुबानी ऑपरेशन सिंदूर के कई अहम अध्याय दुनिया के सामने रख दिए हैं। और शायद यही सच पाकिस्तान को सबसे ज्यादा चुभ रहा है। भारत ने मैदान में जो ताकत दिखाई थी; उसकी शौर्यगाथा कैमरे के जरिए दुनिया के सामने है जबकि पाकिस्तान की आधी रात की बेचैनी दर्शा रही है कि उसे पड़ी मार कितनी गहरी थी।
सोनिया गांधी क्यों नहीं बनीं प्रधानमंत्री? अब खुद बताएंगी पूरी कहानी, किताब में अपनों को खोने से लेकर राजनीति तक के किस्से
तेजस्वी के मार्च को लेकर एनडीए के नेताओं ने कहा- 'करियर बचाओ मार्च'
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पीएम केयर्स फंड में 8,452 करोड़ रुपये का बैलेंस, खर्च को लेकर कांग्रेस ने सरकार से पूछा सवाल
पीएम केयर्स फंड की ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार 31 मार्च 2025 तक 8,452.07 करोड़ रुपये का बैलेंस था। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने फंड के सीमित इस्तेमाल और पारदर्शिता पर सवाल उठाए।
Vande Mataram Row: क्या 'वंदे मातरम्' हिंदू राष्ट्र की वकालत करता है? | Kharge vs BJP
कावेरी विवाद पर राष्ट्रपति से गुहार - तमिलनाडु किसान संगठन 4 सितंबर को दिल्ली में
नेशनल साउथ इंडियन रिवर्स इंटरलिंकिंग फार्मर्स एसोसिएशन के राज्य अध्यक्ष पी. अय्याकन्नू ने मंगलवार को कहा कि संगठन ने अगले महीने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से मिलने का अनुरोध किया है
CJP संसद मार्च पर जांच- सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज की अगुवाई में आज बनेगी कमेटी
सुप्रीम कोर्ट ने आज संसद मार्च के दौरान पुलिस की कार्रवाई की जांच के लिए एक हाई-पावर कमेटी बनाने का फैसला किया है
‘दिमागी नक्सली’ यानी सियासी तापमान ब़ढ़ाने वाले शब्द
लालकिले की प्राचीर से होने वाले प्रधानमंत्री के सालाना संबोधन पर चर्चाएं और बहसें होना कोई नई बात नहीं है। लेकिन इस बार प्रधानमंत्री द्वारा प्रयुक्त दो शब्दों ‘दिमागी नक्सल’ ने चर्चाओं की तासीर बढ़ा दी है। ऐसा नहीं कि इन शब्दों के संजीदापन को प्रधानमंत्री नहीं जानते होंगे। प्रधानमंत्री द्वारा इन शब्दों के प्रयोग के पीछे दो वजहे साफ नजर आती हैं। दरअसल इस बहाने प्रधानमंत्री देश के उस वर्ग की तरफ दिलाना चाहते हैं, जिसकी नजर में उनकी और उनकी सरकार का हर कदम गलत और दकियानूसी है। दूसरी वजह, अपने समर्थकों और पार्टी कार्यकर्ताओं को नए उत्साह से भरना है, जो हालिया कुछ घटनाओं से किंचित निराश हैं। लालकिले की प्राचीर से देश के संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने जो कहा, उस पर एक बार फिर ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, 21वीं सदी में यह बहुत ज़रूरी है कि हम दशकों पुरानी उन चुनौतियों को खत्म करें, जिन्होंने देश को पीछे रखा है। नक्सलवाद और माओवाद ने लाखों युवाओं का भविष्य बर्बाद कर दिया है। उन्होंने अनगिनत माताओं के युवा बेटों को छीन लिया और देश भर के परिवारों के सपनों को चकनाचूर कर दिया। लगभग चार दशकों तक, नक्सलवाद ने भारत के बड़े हिस्सों और उसकी आबादी के एक बड़े हिस्से को अपनी गिरफ्त में रखा, बंदूक के दम पर शासन किया और संविधान की धज्जियां उड़ाईं। आज हथियारों वाले नक्सल से बड़ी चुनौती दिमागी नक्सली ज्यादा खतरनाक हैं, इससे देश को बचाना होगा। इसे भी पढ़ें: प्रधानमंत्री मोदी का लालकिले से 'विकसित भारत' का संकल्प कभी देश के एक तिहाई हिस्से को लाल गलियारे के रूप में जाना जाता था। कभी माओवादियों और नक्सलियों की समानांतर सत्ता नेपाल से लेकर आंध्र प्रदेश तक समानांतर सत्ता चलती थी। उनके प्रभाव वाले क्षेत्रों कों ‘ पशुपति से तिरूपति तक ’ के नाम से जाना जाता था। देश का गृहमंत्रालय की कमान संभालने के बाद अमित शाह ने 31 मार्च तक देश को लाल गलियारे से मुक्त कराने का वादा किया था। अमित शाह की दोहरी रणनीति के चलते यह गलियारा अब नक्सली हिंसा और आतंक से मुक्त हो चुका है। इसे संयोग कहें या कुछ और, जिस वक्त लाल किले से प्रधानमंत्री देश को संबोधित कर रहे थे, उसी वक्त लाल गलियारे वाले उड़ीसा के मलकानगिरी और छत्तीसगढ़ के बस्तर के कई गांवों में पहली बार तिरंगा लहरा रहा था। उन तिरंगों को सलामी देने वालों में वे लोग भी भारतीय संविधान के तहत हासिल पुलिस या होमगार्ड की वर्दी में शामिल थे, जो हाल के दिनों तो इन इलाकों में भारतीय संविधान को नहीं मानते थे, जिनका मानना था कि सत्ता बारूद से निकलती है। अब भी उनके हाथों में बंदूकें हैं, जिनके ट्रिगर पर अब भी उनकी ही उंगलियां हैं,लेकिन अब वे भारतीय संविधान की मर्यादा से बंध चुकी हैं। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में इस बदलाव को रेखांकित किया है, लेकिन उन्हें आशंका है कि समाज के विशेषकर बौद्धिक वर्ग में जो नक्सलवादी मानस के लोग हैं, उनसे निबटना आसान नहीं है। वैसे दिमागी नक्सली कोई नए शब्द नहीं है। करीब दशक भर पहले फिल्मकार विवेक अग्निहोत्री ने इसी तरह अर्बन नक्सली शब्द का इस्तेमाल किया था। तब से वामपंथी हिंसा का विरोधी मानस इन शब्दों का खुलकर प्रयोग करता रहा है। वह मानता रहा है कि देश में जब भी अराजक परिस्थितियां बनती हैं, उसके पीछे अर्बन नक्सलियों की ही सोच काम करती है। कह सकते हैं कि दिमागी नक्सली शब्द ने उन्हीं शब्दों को नई पहचान दे दी है। देश का अधिसंख्य बौद्धिक समाज शायद ही इससे इत्तेफाक रखता हो, लेकिन अतीत में यह वर्ग ‘दबाव समूह’ के रूप में काम करता रहा है। छह अप्रैल 2020 को दंतेवाड़ा में घात लगाकर नक्सलियों ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के 75 और छत्तीसगढ़ पुलिस के एक सवाल को बारूदी सुरंगों से उड़ा दिया था। इस घटना के बाद देश का बड़ा वर्ग सदमे में था। तत्कालीन मनमोहन सरकार ने नक्सलियों को सबक सिखाने के लिए सैनिक कार्रवाई करने की ठान ली थी। उस दौरान भी दिमागी नक्सलियों को विश्वविद्यालयों और दूसरे संस्थानों में चिन्हित करने की प्रक्रिया चली थी। लेकिन शहरों में वामपंथी उग्रवाद के समर्थक लोगों के प्रबल विरोध के चलते मनमोहन सरकार सैनिक कार्रवाई से पीछे हट गयी थी। हालाकि इस घटना के तीन साल एक महीने बाद 25 मई 2013 को छत्तीसगढ़ की झीरम घाटी में घात लगाकर नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ कांग्रेस के तकरीबन समूचे नेतृत्व को उड़ा दिया था। भुक्तभोगी होने के बावजूद कांग्रेस की अगुआई वाली केंद्रीय सरकार ने नक्सलियों को नेस्तनाबूद करने के लिए न तो ठोस रणनीति बना सकी और न ही रोक लगाने में कामयाब हुई। वह सिर्फ 'रोकथाम' की रणनीति पर चलती रही, लेकिन अमित शाह ने इसे बदलकर 'पूरी तरह खत्म करने' की रणनीति को अपनाया। इसके तहत, 'वामपंथी उग्रवाद’ के प्रति 'ज़ीरो टॉलरेंस' नीति बनाई गई। देश को नक्सल मुक्त करने के राष्ट्रीय लक्ष्य के तहत संवाद, सुरक्षा और समन्वय पर जोर दिया। खुफिया जानकारी पर आधारित ऑपरेशन किए जाने लगे। केंद्रीय और राज्य बलों के बीच बेहतर तालमेल बनाया गया और जरूरत के हिसाब से वित्तीय मदद के लिए खजाना खोला गया। इसके साथ ही मुख्यधारा में लौटने वाले नक्सलियों के पुनर्वास की व्यवस्था को भी जारी रखा गया। खुफिया जानकारी ही थी, कि बसवराजू, पतिराम मांझी, गणेश उइके और मिलिंद तेलतुंबडे जैसे कई बड़े माओवादी नेताओं को सुरक्षा बलों ने घेर कर ढेर कर दिया। सुरक्षा बलों के लगातार दबाव के चलते छत्तीसगढ़, तेलंगाना और महाराष्ट्र में बड़े पैमाने पर आत्मसमर्पण हुए। इसका असर जल्द दिखने लगा। नक्सली हिंसा में 56 फीसद और जवानों की मौतों में 75 फीसद की कमी आई। आम नागरिकों के शिकार बनने की घटनाओं में भी 70 प्रतिशत की कमी आई। इसके चलते नक्सल-प्रभावित ज़िलों की संख्या 2014 के 126 की तुलना में 2026 में घटकर सिर्फ एक जिले तक सीमित हो गई है। सुरक्षा और विकास की साझी रणनीति के तहत सुरक्षा अभियानों के साथ-साथ पुलिसिंग, कनेक्टिविटी, वित्तीय समावेश और आजीविका में लगातार निवेश किया, गया। इसके तहत 2014 के बाद नक्सली इलाकों में 594 थाने, 408 नए सुरक्षा कैंप और 12,211 किलोमीटर लंबी सड़कें बनाई गईं। इससे वामपंथी उग्रवाद प्रभावित इलाक़ों में राज्य की मौजूदगी बढ़ी। वामपंथी उग्रवाद प्रभावित इलाकों में संचार कनेक्टिविटी, बैंकिंग ढांचा, डाकघर,आईटीआई, कौशल विकास केंद्र और पुनर्वास नीतियों का जमकर विस्तार किया गया। इससे आर्थिक अवसर पैदा हुए और पूर्व माओवादी कैडरों को मुख्यधारा में लौटने के लिए प्रोत्साहन मिला। लालकिले की प्राचीर से अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने इसे अपनी सरकार की उपलब्धि के रूप में गिनाया भी। हाल ही में सफल माने जा रहे काकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में पीछे से वामपंथी उग्रवाद समर्थक ताकतों के हाथ की चर्चाएं रहीं। बीस जुलाई के संसद मार्च के दिन हुई हिंसा के पीछे दिल्ली पुलिस पेशेवर अपराधियों के साथ ही वामपंथी संगठनों के हाथ को भी मान रही है। सरकार का मानना है कि हथियार बंद नक्सलियों को पहचानना और उनका मुकाबला आसान है, बनिस्बत समाज के बीच उनकी जैसी मानसिकता का सामना आसान नहीं है। वैसे विपक्षी दलों को एतराज है कि इस बहाने प्रधानमंत्री और उनकी सरकार का विरोध करने वालों को दिमागी नक्सली कहकर किनारे करने की कोशिश होगी। उनका तर्क है कि इसके जरिए लोकतंत्र की खासियत ‘लोकतांत्रिक विरोध’ के अधिकार को भी बाधित किया जा सकता है। फिर लोकतंत्र का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने जिस तरह इन शब्दों को लेकर सरकार पर जवाबी हमला बोला है, उससे साफ है कि आने वाले दिनों में ये दोनों शब्द चर्चा में ही नहीं रहेंगे, बल्कि सियासी तापमान को बढ़ाए रखने का बड़ा जरिया होंगे। - उमेश चतुर्वेदी लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं..
Ram Mandir Loot Controversy: Yogi Govt's SIT under question, क्या किंगपिन को बचाने की कोशिश?
Patna Raj Bhavan March: Lalu Yadav का आह्वान, जंतर-मंतर जैसा होगा बिहार में छात्र आंदोलन?
जंतर मंतर पुलिस बर्बरताः राहुल का रिजिजू को जवाब- दिमाग से खाली लोग... अपनी ग़लती नहीं दिखती
जंतर मंतर पर पुलिस बर्बरता की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी बनाएगी। लेकिन केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू दिल्ली पुलिस की तारीफें कर रहे हैं। इस पर राहुल गांधी ने कहा कि देश के बच्चों से झूठ मत बोलिए। उनके पास आँखें हैं और याददाश्त भी।
निफ्टी कंपनियों के मुनाफे की औसत वृद्धि दर 18 प्रतिशत पर रही
मुंबई, निफ्टी में शामिल कंपनियों के मुनाफे की औसत वृद्धि दर वित्त वर्ष 27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में सालाना आधार पर 18 प्रतिशत रही है।
सोने और चांदी की कीमतों में तेजी
मुंबई, सोने और चांदी की कीमतों में सोमवार के सत्र में तेजी देखी गई। इससे दोनों कीमती धातुओं का दाम करीब 1,800 रुपए बढ़ गया है।
Gyanesh Kumar की तारीफ कर Donald Trump ने भारत में विपक्षी दलों की 'बेचैनी' और बढ़ा दी है
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत की चुनाव व्यवस्था और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की तारीफ कर भारतीय राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। ट्रंप ने भारत में मतदाता पहचान की अनिवार्यता और विशाल स्तर पर चुनाव कराने की क्षमता का हवाला देते हुए अमेरिका में कड़े मतदाता पहचान नियम लागू करने की अपनी मुहिम को फिर हवा दी है। लेकिन इस बयान का असर केवल अमेरिका तक सीमित रहने वाला नहीं है। भारत में यह बयान चुनाव आयोग पर विपक्ष के आरोपों और सत्ता पक्ष की राजनीतिक रणनीति के बीच पहले से चल रही जंग को और तेज कर सकता है। हम आपको बता दें कि ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच ट्रूथ सोशल पर कहा कि ज्ञानेश कुमार ने अमेरिकी प्रशासन से पूछा था कि वैध फोटो पहचान पत्र के बिना अमेरिका में चुनाव कैसे हो सकते हैं? उन्होंने भारत के पिछले आम चुनाव में करीब 64 करोड़ 60 लाख मतदाताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि डाक से मतदान करने वालों की संख्या एक प्रतिशत से भी कम रही और मतदाताओं के लिए वैध फोटो पहचान पत्र जरूरी था। इसके साथ ही उन्होंने अमेरिका में मतदाता पहचान और नागरिकता से जुड़े कड़े नियम लागू करने वाले 'सेव अमेरिका अधिनियम' को पारित करने की मांग दोहराई। इसे भी पढ़ें: Donald Trump ने की भारतीय चुनाव प्रणाली की तारीफ़, भारत की तर्ज पर अमेरिका में भी लागू हो 'SAVE अमेरिका एक्ट' ट्रंप का तर्क है कि मतदाता की पहचान और नागरिकता की कड़ी जांच चुनाव की विश्वसनीयता बढ़ा सकती है। हम आपको बता दें कि इस प्रस्तावित कानून में संघीय चुनावों के लिए पंजीकरण के समय नागरिकता का दस्तावेज, मतदान केंद्र पर फोटो पहचान और डाक से मतदान पर कड़े प्रतिबंध जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। अमेरिका में इस अधिनियम के विरोधियों का तर्क है कि गैर नागरिकों द्वारा चुनावी धोखाधड़ी बहुत दुर्लभ है और कठोर दस्तावेजी नियम उन पात्र मतदाताओं के लिए मुश्किल पैदा कर सकते हैं जिनके पास पासपोर्ट या जन्म प्रमाण पत्र आसानी से उपलब्ध नहीं है। इस बीच, भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने ट्रंप के बयान का समर्थन करते हुए कहा है कि भारत के पिछले चुनाव में 64.6 करोड़ मतदाताओं के लिए पहचान पत्र की अनिवार्यता इस बात का मजबूत उदाहरण है कि अमेरिका को भी सेव अमेरिका अधिनियम लागू करना चाहिए। दूसरी ओर, ट्रंप के बयान के बाद भारत में राजनीति गरमा गयी है। सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी ट्रंप के बयान को विपक्ष के चुनाव संबंधी आरोपों के खिलाफ मजबूत राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है। सत्ता पक्ष का यह भी तर्क है कि दुनिया का एक प्रमुख नेता भारत की विशाल चुनावी व्यवस्था और मतदाता पहचान प्रणाली को उदाहरण के रूप में देख रहा है। वहीं ट्रंप के बयान के बाद विपक्ष के मतदाता सूची में गड़बड़ी, बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित किए जाने और वोट चोरी जैसे आरोपों को हवा निकलती नजर आ रही है। ट्रंप की ओर से ज्ञानेश कुमार की प्रशंसा भारत में विपक्षी दलों को इसलिए भी नहीं पच रही क्योंकि वह संसद में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने के अलावा उनके खिलाफ तमाम राजनीतिक आरोपों से लेकर निजी आक्षेप तक लगा चुके हैं। बदले हालात में विपक्ष यह तर्क दे रहा है कि किसी विदेशी नेता की प्रशंसा से भारत के भीतर चुनाव आयोग को लेकर उठे सवाल खत्म नहीं होते। विपक्ष विशेष गहन पुनरीक्षण यानि एसआईआर की कवायद और मतदाता सूचियों में कथित विसंगतियों को लेकर अपने आरोपों पर भी कायम है। उधर, ज्ञानेश कुमार की सार्वजनिक छवि अब दो बिल्कुल विपरीत खेमों में बंटी दिखाई दे रही है। सत्ता समर्थक और तटस्थ वर्ग उन्हें ऐसी चुनावी व्यवस्था के संचालक के रूप में देख रहा है जिसकी विशालता और तकनीकी क्षमता दुनिया के लिए उदाहरण है। वहीं आलोचक अब भी कह रहे हैं कि अंतरराष्ट्रीय प्रशंसा घरेलू विवादों को मिटा नहीं सकती। वैसे भारतीय चुनाव आयोग पर हमलावर रहने वाले विपक्षी दलों को यह समझना होगा कि अपनी हार के कारणों पर मंथन करने की बजाय भारतीय चुनाव आयोग पर ही सारा ठीकरा फोड़ देने से उन्हें सफलता नहीं मिलेगी। भारतीय निर्वाचन आयोग की पूरी दुनिया में साख है जोकि विपक्ष के राजनीतिक आरोपों से खराब नहीं होगी। भारत की चुनावी ताकत का वैश्विक पहलू बेहद महत्वपूर्ण है। भारतीय चुनाव आयोग के अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण और लोकतांत्रिक प्रबंधन कार्यक्रमों के जरिए सौ से अधिक देशों के चुनाव अधिकारियों को मतदाता पंजीकरण, मतदान केंद्र प्रबंधन, महिला भागीदारी और सुरक्षित तकनीक के प्रशिक्षण का लाभ मिला है। भारतीय चुनाव आयुक्तों ने अतीत में कंबोडिया, यूगोस्लाविया, नामीबिया तथा अन्य तमाम देशों में चुनावी व्यवस्थाओं में भी सहायता की है। यही नहीं, भारत की इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों और फोटो पहचान आधारित व्यवस्था को भी कई विकासशील देशों ने उपयोगी माना है। साथ ही संयुक्त राष्ट्र की ओर से अक्सर विभिन्न देशों में चुनाव के दौरान भारतीय निर्वाचन आयोग के अधिकारियों को पर्यवेक्षक बनाकर भेजा जाता है जोकि गौरव की बात है। बहरहाल, एक ओर दुनिया भारत के चुनाव मॉडल को लोकतंत्र की ताकत मान रही है, दूसरी ओर देश के भीतर उसी व्यवस्था पर सबसे तीखा सियासी हमला जारी है। आने वाले समय में असली लड़ाई केवल मतदाता पहचान की नहीं होगी, बल्कि इस सवाल की होगी कि चुनाव आयोग पर जनता का भरोसा किसके तर्क से बनेगा और किसके आरोप से टूटेगा। -नीरज कुमार दुबे
‘दिमाग़ी नक्सल’ के शोर में असली सवाल गुम क्यों? शिक्षा सुधार की जगह बदनामी की राजनीति क्यों
Dimaagi Naxal PM Modi:‘दिमाग़ी नक्सल’ के नए राजनीतिक शब्द के बीच असली सवाल शिक्षा और युवाओं के भविष्य का है। वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष का सवाल है कि क्या बदनामी की राजनीति से छात्र आंदोलन का जवाब दिया जा सकता है?
क्या ईरान का मध्यम वर्ग गरीबी के दलदल में धंस रहा है?
युद्ध के दौर में ईरान के आम परिवारों का बजट बिगड़ गया है. कारोबार ठप्प हो रहे हैं और यह डर गहराने लगा है कि लाखों मध्यमवर्गीय परिवार तेजी से गरीबी रेखा के पार जा सकते हैं. ईरान में रहने वाली गृहिणी मीना के लिए अब युद्ध का मतलब हवाई हमले या सैन्य बयानों से नहीं है. अब वह युद्ध को इस बात से समझती हैं कि उनके परिवार की खाने की मेज से क्या-क्या चीजें गायब हो गई हैं. उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, पिछले साल जब से युद्ध शुरू हुआ है, हम हर दिन और गरीब होते जा रहे हैं. सच कहूं तो मुझे याद नहीं कि मैंने आखिरी बार रेड मीट कब खरीदा था. हमने उसकी जगह चिकन लेना शुरू किया, लेकिन अब चिकन भी एक लग्जरी बन गया है. हम अब पैसे बचाने के बारे में नहीं सोचते. हम सिर्फ किराया देने और खाना खरीदने के बारे में सोचते हैं.” होर्मुज का बैकअप प्लान तैयार करने के लिए बेचैन खाड़ी देश अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) का अनुमान है कि इस साल ईरान की अर्थव्यवस्थामें 5.4 फीसदी की गिरावट आएगी, जबकि महंगाई दर लगभग 69 फीसदी तक पहुंचने की उम्मीद है. विश्व बैंक ने भी चेतावनी दी है कि युद्ध, कमजोर व्यापार और लंबे समय से बनी अनिश्चितता देश की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित कर रही है. ईरान युद्ध से संकट पैदा नहीं हुआ बल्कि बढ़ा स्वीडन में रहने वाले अर्थशास्त्री अहमद अलावी के मुताबिक, ईरान युद्धने देश के आर्थिक संकट को पैदा नहीं किया, बल्कि उसे बहुत ज्यादा बढ़ा दिया है. उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, जब ईरान इस संघर्ष में शामिल हुआ, तब वहां महंगाई दर पहले से ही 40 फीसदी से ज्यादा थी. मुद्रा कमजोर हो रही थी, बजट घाटा बना हुआ था, और सालों से प्रतिबंध लगे हुए थे.” उन्होंने आगे बताया, युद्ध ने एक बाहरी झटके की तरह काम किया. बुनियादी ढांचे को पहुंचा नुकसान, होर्मुज जलडमरूमध्य से व्यापार में रुकावट, इंटरनेट का बंद होना और महंगाई तेज होने की बढ़ती आशंकाओं ने लोगों की खरीदारी की ताकत के खत्म होने की गति को और तेज कर दिया.” अलावी सरकारी आंकड़ों की ओर इशारा करते हैं जिनसे पता चलता है कि सालाना महंगाई दर 66 फीसदी और साल-दर-साल महंगाई दर 88 फीसदी के करीब पहुंच गई है. खाने-पीने की चीजों की कीमतें और भी तेजी से बढ़ी हैं. ब्रेड और अनाज की कीमतों में लगभग 140 फीसदी, मीट और पोल्ट्री में 135 फीसदी, डेयरी उत्पादों में 116 फीसदी से ज्यादा और खाने के तेल में 200 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है. कई परिवारों के लिए इन आंकड़ों का मतलब है, कम मीट खरीदना, इलाज टालना और पैसे बचाने की योजना छोड़ देना. गरीबी की चपेट में आए लगभग 40 लाख ईरानी अर्थशास्त्रियों का कहना है कि परिवार अक्सर सबसे पहले यात्रा और कपड़ों पर होने वाले खर्च में कटौती करते हैं. हालांकि महंगाई जब बनी रहती है तो यह कटौती खाने-पीने, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा तक भी पहुंच जाती है. इससे मध्यम आय वाले परिवारों पर दबाव बढ़ जाता है, जो कभी खुद को आर्थिक रूप से सुरक्षित मानते थे. अलावी का कहना है कि कम आय वाले परिवारों पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है, लेकिन उनका तर्क है कि मध्यम वर्ग भी तेजी से इन्हीं दबावों का सामना कर रहा है, कई वेतनभोगी कर्मचारी और पेंशनभोगी पहली बार गरीबी रेखा से नीचे आ गए हैं, क्योंकि उनकी आय महंगाई के हिसाब से नहीं बढ़ी है.” उनका अनुमान है कि संघर्ष तेज होने के बाद से 35 से 45 लाख और ईरानी गरीबी की चपेट में आ गए हैं. इससे गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की कुल संख्या 4 करोड़ से ज्यादा हो गई है. अनिश्चितता के कारण कारोबार पर दबाव ईरान के निजी क्षेत्र भी दबाव महसूस कर रहे हैं. ईरान के एक व्यापारी मोर्तेजा का कहना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य से शिपिंग मुश्किल होने के बाद क्षेत्रीय व्यापार के रास्ते तेजी से बदले. उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, दुबई के सप्लायरों की कमी से बने खालीपन को भरने के लिए चीन ने तेजी से कदम उठाए. खाड़ी देशों के उलट, चीन मध्य एशिया के रेल नेटवर्क के जरिए भी सामान भेज सकता है, जिससे वह समुद्री रास्ते से जुड़े जोखिमों और देरी से बच जाता है.” उनका मानना है कि इन जमीनी रास्तों का बढ़ता महत्व एक वजह थी कि अमेरिका ने तुर्कमेनिस्तान से लगी ईरान की सीमा के पास रेलवे लाइन को निशाना बनाया. हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की जा सकी. इसके बावजूद, मोर्तेजा का कहना है कि इस बदलाव से ईरानी व्यापारियों को कोई खास फायदा नहीं हुआ है. वह कहते हैं, रियाल की गिरती कीमत और आसमान छूती महंगाई ने बाजार को आगे बढ़ने से रोक दिया है. व्यापारी लगातार अनिश्चितता के माहौल में जी रहे हैं, क्योंकि विदेशी मुद्रा की दरें लगभग हर दिन बदल जाती हैं. जो सामान हमने कम कीमतों पर खरीदा और बेचा था, अब उसे फिर से दुकान में लाने के लिए बहुत ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है और वह भी तब, जब ग्राहकों के पास उन्हें खरीदने की क्षमता बची हो.” मोर्तेजा के लिए, अनिश्चितता सबसे बड़ी बाधा बन गई है. उन्होंने कहा, तनाव जारी रहने के कारण, सच कहूं तो मुझे ईरान में कारोबार करने का कोई स्पष्ट भविष्य नजर नहीं आता है.” क्या सरकार इस असर को कम कर सकती है? दुनिया भर में तेल की कीमतें ज्यादा होने के बावजूद, अलावी का कहना है कि ईरान को इससे कोई खास फायदा होने की उम्मीद नहीं है, क्योंकि प्रतिबंधों, निर्यात पर रोक और परिवहन की ज्यादा लागत की वजह से उसकी तेल से होने वाली कमाई सीमित बनी हुई है. उनका तर्क है कि सब्सिडी, कीमतों पर नियंत्रण और विदेशी मुद्रा बाजार में दखल जैसे सरकारी उपायों से कुछ हद तक तुरंत राहत तो मिल सकती है, लेकिन इनसे असल समस्याओं का समाधान होने की उम्मीद कम ही है. वह कहते हैं, भरोसा बहाल किए बिना, प्रतिबंधों को कम किए बिना और ढांचागत समस्याओं को हल किए बिना, ये नीतियां स्थायी समाधान के बजाय केवल अल्पकालिक उपाय ही बनी रहेंगी.” अनिश्चितता की लागत अलावी का कहना है कि अनिश्चितता खुद आर्थिक सुधार में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक बन गई है. उनके मुताबिक, कई व्यवसाय निवेश में देरी कर रहे हैं क्योंकि उन्हें भविष्य की आर्थिक स्थितियों पर बहुत कम भरोसा है. साथ ही, परिवार खर्च करने को लेकर ज्यादा सावधानी बरत रहे हैं, क्योंकि उन्हें आशंका है कि कीमतें बढ़ती रहेंगी और उनकी कमाई की वैल्यू और गिर जाएगी. उनका कहना है कि युद्ध से हुए भौतिक नुकसान की भरपाई करने में जितना समय लगेगा, उससे ज्यादा वक्त निवेशकों, कारोबारियों और आम ग्राहकों के बीच भरोसा फिर से कायम करने में लगेगा. अलावी का मानना है कि जब तक महंगाई कम नहीं होती, एक्सचेंज रेट स्थिर नहीं होता और व्यापार की स्थिति में सुधार नहीं होता, तब तक कई परिवार आर्थिक दबाव में रहेंगे, भले ही सैन्य तनाव कम हो जाए. भविष्य की बात करें, तो उनका मानना है कि अगर मौजूदा हालात ऐसे ही बने रहे, तो लोगों के रहन-सहन का स्तर और भी ज्यादा गिर जाएगा. उनका कहना है कि और भी ज्यादा परिवार प्रोटीन वाले खाने, स्वास्थ्य सेवाओं और बच्चों की पढ़ाई के खर्च में कटौती करने को मजबूर होंगे. जबकि, दुकानें-कारोबार बंद होने और बेरोजगारी बढ़ने का सिलसिला जारी रह सकता है. मीना कहती हैं, हम अब भविष्य के बारे में बात नहीं करते. हम बस यही उम्मीद करते हैं कि अगले महीने का किराया भर सकें.”
जेएसएससी‑सीजीएल रद्द - 2000 से ज्यादा अभ्यर्थियों की नौकरी पर संकट
झारखंड सरकार द्वारा जेएसएससी-सीजीएल परीक्षा रद्द किए जाने के फैसले के बाद इस परीक्षा के जरिए चयनित होकर विभिन्न पदों पर कार्यरत अभ्यर्थियों में नाराजगी फैल गई
आबकारी केस: हाई कोर्ट ने केजरीवाल-सिसोदिया को सीबीआई की याचिका पर जवाब देने के लिए दिया और समय
आबकारी केस: हाई कोर्ट ने केजरीवाल-सिसोदिया को सीबीआई की याचिका पर जवाब देने के लिए दिया और समय
छात्र आंदोलन की जीत - जेएसएससी‑सीजीएल परीक्षा रद्द, सरकार झुकी
झारखंड में 24 दिनों से चल रहे छात्र आंदोलन के बीच हेमंत सोरेन सरकार ने आंदोलनकारियों की सबसे बड़ी मांग मानते हुए वर्ष 2024 में आयोजित जेएसएससी-सीजीएल परीक्षा को रद्द करने का फैसला किया है
दिल्ली भाजपा ने नितिन नवीन की तिरंगे के साथ फर्जी तस्वीर को लेकर पुलिस में दर्ज कराई शिकायत
दिल्ली भाजपा ने नितिन नवीन की तिरंगे के साथ फर्जी तस्वीर को लेकर पुलिस में दर्ज कराई शिकायत
उत्तर प्रदेश की सत्ता में इंडिया गठबंधन के लिए 27 साल तक कोई वैकेंसी नहीं : मुख्तार अब्बास नकवी
उत्तर प्रदेश की सत्ता में इंडिया गठबंधन के लिए 27 साल तक कोई वैकेंसी नहीं : मुख्तार अब्बास नकवी
बिप्लब देब बने भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव, पूर्वोत्तर के दो अन्य नेताओं को भी मिली अहम जिम्मेदारी
बिप्लब देब बने भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव, पूर्वोत्तर के दो अन्य नेताओं को भी मिली अहम जिम्मेदारी
कर्नाटक: रिजर्व फॉरेस्ट में शिकारियों के 'एनकाउंटर' मामले पर भाजपा ने प्रदेश सरकार से जांच की मांग की
दिल्ली पुलिस ने ग्वालियर से 'आप' नेता को किया गिरफ्तार, दलित सहयोगी की संपत्ति पर कब्जा का आरोप
दिल्ली पुलिस ने ग्वालियर से 'आप' नेता को किया गिरफ्तार, दलित सहयोगी की संपत्ति पर कब्जा का आरोप
डॉ. हेमांग जोशी बने भाजपा युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष, गुजरात के तीन नेताओं को राष्ट्रीय टीम में मिली अहम जिम्मेदारी
नितिन नबीन की बहुप्रतीक्षित टीम का आज आखिरकार ऐलान हो ही गया। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने संगठन में लंबे समय से चल रही कवायद को अंजाम देते हुए अपनी नई राष्ट्रीय टीम सामने रख दी है। इस टीम में अनुभव, क्षेत्रीय संतुलन, सामाजिक समीकरण और चुनावी जरूरतों का ऐसा मिश्रण तैयार किया गया है, जिसमें पार्टी के पुराने दिग्गजों से लेकर नए चेहरों तक को जिम्मेदारी दी गई है। लेकिन इस पूरी कवायद में दो फैसले राजनीतिक चर्चा के केंद्र में हैं। एक तो अमित मालवीय को आईटी सेल प्रमुख की जिम्मेदारी से बाहर का रास्ता दिखाया गया है, जबकि पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी की राष्ट्रीय महासचिव के तौर पर भाजपा के शीर्ष संगठन में वापसी हुई है। हम आपको बता दें कि आईटी और सोशल मीडिया सेल की कमान अब छत्तीसगढ़ के दीपक म्हास्के को दी गई है। वहीं अनिल बलूनी मीडिया प्रभारी की अपनी जिम्मेदारी पर कायम हैं। यानी भाजपा ने डिजिटल मोर्चे पर चेहरे में बदलाव किया है, लेकिन मीडिया प्रबंधन के मौजूदा ढांचे में निरंतरता बनाए रखी है। इस बदलाव को केवल संगठनात्मक फेरबदल मानना मुश्किल है। यह संकेत है कि नितिन नबीन डिजिटल और राजनीतिक नैरेटिव की लड़ाई में नई रणनीति और नए चेहरों के साथ उतरना चाहते हैं। साथ ही चूंकि नितिन नबीन छत्तीसगढ़ में पार्टी के प्रभारी रह चुके हैं ऐसे में वह जानते हैं कि उस राज्य के किस नेता की कार्यक्षमता का उपयोग कहां पर करना पार्टी के लिए ज्यादा फायदेमंद रहेगा। इसे भी पढ़ें: PM Modi का नई BJP टीम पर पूरा भरोसा, बोले- संगठन और जनसेवा पर दें ध्यान इसके अलावा, स्मृति ईरानी की वापसी इस टीम का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश है। उन्हें उत्तर प्रदेश का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है। आक्रामक राजनीतिक शैली, संसदीय अनुभव और विपक्ष के खिलाफ मुखर राजनीतिक लड़ाई के लिए पहचाने जाने वाली स्मृति ईरानी को संगठन के शीर्ष स्तर पर लाना बताता है कि भाजपा उत्तर प्रदेश जैसे निर्णायक राज्य में राजनीतिक सक्रियता को और धार देना चाहती है। राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है। उनके साथ तीरथ सिंह रावत, राम माधव, बैजयंत पांडा, डी. पुरंदेश्वरी, रेखा वर्मा, वर्षाबेन नरेंद्रभाई दोशी, डॉ. भारती प्रवीण पवार, मनप्रीत सिंह बादल, लाल सिंह आर्य, एम. नागराजा, प्रो. तारिक मंसूर और डॉ. मधुचंद्र कर को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली है। छह महिला उपाध्यक्षों की मौजूदगी से महिला प्रतिनिधित्व का संदेश भी स्पष्ट है। इसके अलावा, राष्ट्रीय महासचिवों की टीम में विनोद तावड़े, सुनील बंसल, बिप्लब कुमार देब, स्मृति ईरानी, डॉ. सतीश पूनिया, गजेंद्र पटेल, हरीश द्विवेदी और संजय भाटिया शामिल हैं। संगठन के स्तर पर बीएल संतोष राष्ट्रीय महासचिव संगठन बने हुए हैं, जबकि शिवप्रकाश और सौदान सिंह को राष्ट्रीय संयुक्त महासचिव संगठन की जिम्मेदारी मिली है। इसका अर्थ है कि नबीन ने संगठन की अनुभवी मशीनरी को बनाए रखते हुए राजनीतिक मोर्चे पर अपनी टीम को विस्तार दिया है। साथ ही 16 राष्ट्रीय सचिवों की सूची में भी व्यापक क्षेत्रीय संतुलन दिखाई देता है। कविता पाटीदार, के. सुरेंद्रन, डॉ. भोला सिंह, डॉ. प्रदीप वर्मा, जगदीश ईश्वरभाई पटेल, आम आदमी पार्टी से भाजपा में आये डॉ. संदीप पाठक और फांगनॉन कोन्याक, संगीता यादव, अनिल एंटनी, डॉ. एम. वेंकटेशन, मनोज तिग्गा, सिद्धार्थ शंभू, डॉ. स्वदेश सिंह, मृगांका देब बर्मन, रोहन गुप्ता और जय प्रकाश को राष्ट्रीय सचिव बनाया गया है। इनमें दक्षिण, पूर्वोत्तर, पूर्वी भारत, हिंदी पट्टी और शहरी राजनीतिक पृष्ठभूमि, सभी को जगह मिली है। नई टीम के अन्य हिस्से भी राजनीतिक संकेत दे रहे हैं। केंद्रीय कार्यालय प्रभारी तरुण चुग और केंद्रीय कार्यालय सचिव महेंद्र पांडे बनाए गए हैं। नॉर्थ-ईस्ट कोऑर्डिनेटर की जिम्मेदारी डॉ. संबित पात्रा और संयुक्त कोऑर्डिनेटर की जिम्मेदारी राजीव बब्बर को दी गई है। सभी सेल्स के समन्वय की कमान विष्णु दत्त शर्मा को मिली है, जबकि ऋतुराज सिन्हा और विष्णु वर्धन रेड्डी संयुक्त समन्वयक होंगे। मोर्चों की कमान भी सामाजिक और चुनावी विस्तार को ध्यान में रखकर तय की गई है। युवा मोर्चा के अध्यक्ष डॉ. हेमंग जोशी, महिला मोर्चा की अध्यक्ष रूप कुमारी चौधरी, ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष अमरपाल मौर्य, किसान मोर्चा के अध्यक्ष बंसीलाल गुर्जर, एससी मोर्चा के अध्यक्ष शिवेश कुमार राम, एसटी मोर्चा के अध्यक्ष डॉ. मन्नालाल रावत और अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष कुंवर बसीत अली बनाए गए हैं। इससे भाजपा ने समाज के अलग-अलग वर्गों के बीच संगठनात्मक पहुंच को मजबूत करने की कोशिश की है। वित्तीय मोर्चे पर केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल को राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष और राजस्थान के राजेश मंगल को संयुक्त कोषाध्यक्ष बनाया गया है। पीयूष गोयल के प्रशासनिक और आर्थिक अनुभव का लाभ संगठन के वित्तीय प्रबंधन को मिल सकता है। पीयूष गोयल पहले भी पार्टी के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष रह चुके हैं। यहां सवाल यह है कि अब देखना यह होगा कि 'एक व्यक्ति एक पद' के सिद्धांत को महत्व देने वाली भाजपा क्या पीयूष गोयल से केंद्रीय मंत्री का पद छोड़ने को कहती है या फिर वह दोनों पदों पर बने रहेंगे? कुल मिलाकर नितिन नबीन की टीम का संदेश साफ है कि भाजपा अब संगठन को केवल पदाधिकारियों की सूची के रूप में नहीं, बल्कि चुनावी मशीनरी के रूप में कसना चाहती है। राम माधव की रणनीतिक समझ, वसुंधरा राजे का जनाधार, स्मृति ईरानी की आक्रामक राजनीतिक शैली, सुनील बंसल का संगठनात्मक अनुभव, पीयूष गोयल की प्रशासनिक क्षमता और दक्षिण-पूर्वोत्तर से आए नेताओं का क्षेत्रीय अनुभव पार्टी के लिए अलग-अलग मोर्चों पर उपयोगी साबित हो सकता है। लेकिन असली चुनौती भी यहीं से शुरू होती है। अलग-अलग क्षमताओं और महत्वाकांक्षाओं वाले नेताओं को एक सूत्र में बांधना, राज्यों में गुटबाजी को नियंत्रित करना, डिजिटल नैरेटिव को विपक्ष के हमलों के सामने प्रभावी बनाना, संगठन और सरकार के बीच तालमेल कायम रखना और आगामी चुनावों में इन नियुक्तियों के जरिये साधे गये सामाजिक समीकरणों को वास्तविक वोटों में बदलना आसान नहीं होगा। नितिन नबीन ने टीम चुन ली है; अब इस टीम को परिणाम देने वाली राजनीतिक ताकत में बदलना उनकी सबसे बड़ी परीक्षा होगी। -नीरज कुमार दुबे
आखिर जन सुराज पार्टी और लोजपा रामविलास के बीच पक रही सियासी खिचड़ी के निहितार्थ क्या हैं? समझिए
बिहार में जन सुराज पार्टी के नवनिर्वाचित विधायक प्रशांत किशोर और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान के बीच जो राजनीतिक खिचड़ी पकने की चर्चा है, वह उत्तरप्रदेश की राजनीति से अभिप्रेरित है। चूंकि प्रशांत किशोर मशहूर चुनावी रणनीतिकार भी हैं और लगभग सभी प्रमुख पार्टियों के रणनीतिक घाटों की पानी का स्वाद चख चुके हैं, इसलिए उनसे जुड़ी इस आशय की चर्चा भी अनायास नहीं है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सामाजिक न्याय क्रांति और मंडल बनाम कमंडल की मतलबी राजनीति की कड़ी में जहां उत्तरप्रदेश में चार-चार बार दलित नेत्री सुश्री मायावती को मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला और उनकी बहुजन समाज पार्टी तीन बार गठबंधन के तहत और एक बार पूर्ण बहुमत से यूपी की सत्ता में आई। लेकिन बिहार में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद, जदयू के हुक्मरान नीतीश कुमार ने लोजपा के राम विलास पासवान और उनके पुत्र चिराग पासवान को कभी पूर्ण रूप से उभरने ही नहीं दिया और गठबंधन में भी कमजोर बनाए रखा। यही वजह है कि बिहार में नए जमाने की राजनीति के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने चिराग पासवान के साथ गठबंधन की सम्भवनाओं को हवा दिलवाकर बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, जनता दल यूनाइटेड के सुप्रीमो नीतीश कुमार और राष्ट्रीय जनता दल नेता तेजस्वी यादव के समक्ष एक तगड़ी चुनौती पेश करने की अपनी मंशा उजागर कर दी है। चिराग पासवान जिस तरह से खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हनुमान करार देते हैं, इससे उनकी भी बेचैनी बढ़ेगी हो। यह ठीक है कि जन सुराज पार्टी और लोजपा रामविलास के बीच किसी औपचारिक गठबंधन की सार्वजनिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है। लेकिन अगस्त 2026 की ताजा राजनीतिक हलचल को देखें तो दोनों के बीच संभावित सियासी तालमेल की चर्चा को महज अफवाह मानकर खारिज करना भी जल्दबाजी होगी। क्योंकि हाल की रिपोर्टों में दोनों के करीब आने और भाजपा-राजद से अलग एक संभावित धुरी की चर्चा सामने आई है। इससे एनडीए की राजनीति में चिराग पासवान का रुतबा बढ़ना भी स्वाभाविक है। फिर भी यदि चिराग पासवान को दलित मुख्यमंत्री बनाने के स्वप्न प्रशांत किशोर यदि दिखाते हैं, या फिर उपमुख्यमंत्री पद का भी सियासी चारा डालते हैं तो मिशन 2029 के संसदीय चुनाव और 2030 के विधानसभा चुनावों को लेकर एनडीए और महागठबंधन के हाथपांव फूलना स्वाभाविक है। इसे भी पढ़ें: Prashant Kishor ने Bihar विधानसभा में ली शपथ, बोले- यह मेरे लिए गर्व और जिम्मेदारी का पल आइए अब यह समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर इस मनोवांछित सियासी खिचड़ी में क्या-क्या पक रहा है? और इसके राजनीतिक स्वाद के मिजाज से इसके क्या क्या मायने हो सकते हैं- पहला, लोजपा युवराज चिराग पासवान के लिए यह NDA के भीतर दबाव की राजनीति हो सकती है, क्योंकि चिराग पासवान पहले भी सीट बंटवारे और NDA के भीतर अपनी राजनीतिक हैसियत को लेकर स्वतंत्र रुख दिखाते रहे हैं। 2025 में भी उनके प्रशांत किशोर से संभावित संपर्क की खबरें सामने आई थीं। इसलिए सियासत में हर खुली हुई सम्भवनाओं और उससे बनने बिगड़ने वाली हवा से इंकार नहीं किया जा सकता है। दूसरा, जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर के लिए लोजपा रामविलास प्रमुख चिराग पासवान एक महत्वपूर्ण सामाजिक-पॉलिटिकल पुल हो सकते हैं। ऐसा इसलिए कि जन सुराज अपने को BJP और RJD—दोनों से अलग विकल्प के रूप में स्थापित करना चाहता है। अब बांकीपुर में किशोर की जीत ने उन्हें सिर्फ आंदोलनकारी नहीं, बल्कि क्षेत्रीय चुनावी ताकत के रूप में भी स्थापित किया है। तीसरा, सबसे दिलचस्प संभावना है—'माइनस BJP, माइनस RJD' राजनीति। यानी कि ताजा राजनीतिक चर्चाओं में इसी तरह के पुनर्संयोजन की संभावना उठ रही है। इसका अर्थ होगा कि चिराग पासवान अपना दलित/पासवान प्रभाव और जन सुराज पार्टी अपना युवा, गैर-पारंपरिक तथा शहरी-मध्यवर्गीय आधार जोड़ने की कोशिश करे। दोनों ने यदि रणनीतिक रूप से सवर्णों को तरजीह दी तो भाजपा/कांग्रेस के लिए यह किसी झटके की तरह होगा। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि दोनों की राजनीतिक जरूरतें अलग अलग हैं। चाहे चिराग पासवान हों या प्रशांत किशोर, दोनों अपना स्वतंत्र राजनीतिक स्पेस बढ़ाना चाहते हैं, साथ ही खुद को तीसरे विकल्प के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। जहां चिराग पासवान NDA में रहते हुए अपना bargaining power बढ़ाना चाहते हैं, वहीं प्रशांत किशोर BJP और RJD दोनों से दूरी दिखाना चाहते हैं। इस बात में कोई दो राय नही कि उत्तरप्रदेश के जाटवों के वोट बैंक के तरह ही बिहार में भी पासवान वोट का मजबूत आधार है, जबकि प्रशांत किशोर युवा, शिक्षित और बदलाव चाहने वाले मतदाताओं पर जोर देते हैं। वह संगठन और चुनावी नेटवर्क के कार्यसाधक हैं। उनमें नया राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने और अभियान चलाने की अद्भुत क्षमता है। लिहाजा यहीं से असली सवाल पैदा होता है—क्या चिराग NDA के भीतर रहकर जन सुराज से तालमेल करेंगे, या भविष्य में कोई व्यापक वैकल्पिक मोर्चा बनेगा? अलबत्ता, इन चर्चाओं में एक और बड़ा संकेत निहित है। वह यह कि प्रशांत किशोर अब केवल विधानसभा की राजनीति तक सीमित नहीं दिख रहे, बल्कि जन सुराज की नजर विधान परिषद के चुनावी क्षेत्रों पर भी बताई जा रही है। यानी संगठन को लगातार चुनावी मशीनरी में बदलने की कोशिश हो रही है। दूसरी ओर चिराग पासवान ने भी हाल के दिनों में ऐसे मुद्दे उठाए हैं जिन पर सरकार/NDA के भीतर असहजता पैदा हो सकती है। उदाहरण के लिए, उन्होंने गत दिनों बिहार की शराबबंदी नीति की प्रभावशीलता पर खुलकर सवाल उठाया। यानी दोनों के बीच संभावित तालमेल का आधार केवल जातीय गणित नहीं, बल्कि 'एंटी-एस्टैब्लिशमेंट' और 'नया विकल्प' का राजनीतिक नैरेटिव भी बन सकता है। मगर सबसे बड़ी अड़चन भी यही है। खासकर प्रशांत किशोर की राजनीति का मूल दावा ही है कि वे पारंपरिक राजनीतिक दलों के गठजोड़ से अलग व्यवस्था खड़ी करेंगे। 2025 में उन्होंने चिराग के साथ गठबंधन की संभावना को सार्वजनिक रूप से नकारते हुए कहा था कि उनका गठबंधन जनता के साथ है। इसलिए यदि आज दोनों के बीच नजदीकी बढ़ती है, तो इसे सीधा चुनावी गठबंधन मानने के बजाय 'रणनीतिक संवाद' समझना ज्यादा उचित होगा। मेरी नजर में असली खेल के दृष्टिगत 2026 का गठबंधन कम और 2029–30 की जमीन तैयार करने की कवायद ज्यादा हो सकती है। वाकई यदि चिराग + जन सुराज साथ आते हैं तो बिहार में तीन ध्रुव उभर सकते हैं:- पहला, NDA बनाम RJD; दूसरा, महागठबंधन बनाम जन सुराज–LJP(RV जैसा वैकल्पिक ध्रुव। और यदि इस तीसरे ध्रुव में पप्पू यादव, उपेंद्र कुशवाहा या दूसरे छोटे सामाजिक आधार वाले नेता भी किसी रूप में जुड़ते हैं, तो बिहार की पारंपरिक दो-ध्रुवीय राजनीति के लिए यह गंभीर चुनौती बन सकती है। इस परिस्थिति में सामान्य जातियों के वोटबैंक का महत्व और अधिक बढ़ जाएगा। क्योंकि यूपी में भी ओबीसी सियासत से ब्राह्मण परेशान होकर मायावती के साथ हो लिए थे। कुछ ऐसा ही उभार बिहार में भी नजर आ रहा है, खासकर सोशल मीडिया पर सवर्ण विरोधी पोस्टों की बाढ़। फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण संकेत यही है कि दोनों की तरफ से औपचारिक गठबंधन की घोषणा नहीं हुई है। इसलिए 'खिचड़ी पक रही है' कहना राजनीतिक संकेतों के लिहाज से उचित है, लेकिन 'खिचड़ी तैयार हो गई है' कहना अभी तथ्यात्मक रूप से जल्दबाजी होगी। शायद वह बीरबल की खिचड़ी न बन जाए। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
प्रधानमंत्री मोदी का लालकिले से 'विकसित भारत' का संकल्प
ऐतिहासिक लालकिले की प्राचीर केवल पत्थरों की एक संरचना नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र भारत के उतार-चढ़ाव, उसकी आकांक्षाओं, उसकी नियति और उसके सामूहिक संकल्पों की मूक गवाह रही है। हर वर्ष 15 अगस्त को इस प्राचीर से देश के प्रधानमंत्री जब राष्ट्र को संबोधित करते हैं, तो वह केवल एक औपचारिक भाषण नहीं होता, बल्कि वह आने वाले समय के लिए देश का नीतिगत और वैचारिक रोडमैप होता है। स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी ऐतिहासिक प्राचीर से वर्ष 2047 तक भारत को एक 'विकसित राष्ट्र' बनाने का जो अटूट संकल्प दोहराया है, वह देश की समकालीन राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज के लिए एक युगांतकारी मोड़ है। 'विकसित भारत' का यह विजन महज़ एक राजनीतिक नारा नहीं है, बल्कि यह 140 करोड़ नागरिकों की सामूहिक चेतना को जगाने और उन्हें राष्ट्र निर्माण के एक महायज्ञ में आहुति देने के लिए प्रेरित करने वाला एक व्यापक राष्ट्रीय दर्शन है। जब हम इस विराट संकल्प की बात करते हैं, तो हमें इसके ऐतिहासिक संदर्भ और प्रासंगिकता को गहराई से समझना होगा। भारत ने लगभग दो सदियों तक औपनिवेशिक दासता और आर्थिक शोषण का दंश झेला है। 1947 में जब देश स्वतंत्र हुआ, तब हमारी अर्थव्यवस्था जर्जर थी, साक्षरता दर दयनीय थी और अकाल तथा गरीबी जैसी बुनियादी चुनौतियां हमारे सामने थीं। शुरुआती दशकों में भारत का मुख्य ध्यान आत्मनिर्भरता और बुनियादी अस्तित्व की रक्षा पर था। हमने खाद्यान्न संकट से निपटने के लिए हरित क्रांति की, अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए सैन्य तंत्र को मजबूत किया और धीरे-धीरे एक ठोस औद्योगिक आधार तैयार किया। आज, स्वतंत्रता के इस दौर में, भारत उस स्थिति से बहुत आगे निकल चुका है और अब हम केवल एक अस्तित्व बनाए रखने वाले देश नहीं हैं, बल्कि हम वैश्विक पटल पर एक नई दिशा तय करने वाले राष्ट्र बन चुके हैं। यह संकल्प इस बात का प्रतीक है कि अब भारत अपनी विकासशील छवि के खोल को तोड़कर वैश्विक शक्तियों की अग्रिम पंक्ति में खड़े होने के लिए पूरी तरह तैयार है। 2047 का वर्ष इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमारी स्वतंत्रता का शताब्दी वर्ष होगा, और कोई भी राष्ट्र अपनी स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होने पर दुनिया के सामने अपनी सफलता का क्या प्रमाण प्रस्तुत करता है, यही उसका वास्तविक ऐतिहासिक मूल्यांकन होता है। इस व्यापक संकल्प को धरातल पर उतारने के लिए देश के चार प्रमुख वर्गों को विकास का मुख्य केंद्र बिंदु बनाया गया है, जिन्हें युवा, महिला, किसान और गरीब के रूप में रेखांकित किया गया है। इन चारों स्तंभों के समग्र सशक्तिकरण के बिना किसी भी विकसित समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। भारत आज दुनिया का सबसे युवा देश है और हमारी जनसांख्यिकीय लाभांश हमारी सबसे बड़ी ताकत है। विकसित भारत का सपना तभी सच हो सकता है जब इस युवा ऊर्जा को सही दिशा, उत्कृष्ट शिक्षा और वैश्विक स्तर का कौशल मिले। देश में स्टार्टअप इकोसिस्टम का तेजी से विस्तार और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से शिक्षा को रोजगारोन्मुख बनाना इसी दिशा में उठाए गए बड़े कदम हैं। इसके साथ ही, विकसित भारत का दूसरा अनिवार्य पहलू महिलाओं का सशक्तिकरण और उनके नेतृत्व में होने वाला विकास है। जब तक देश की आधी आबादी आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से पूरी तरह सक्रिय नहीं होगी, तब तक विकास की रफ्तार अधूरी रहेगी। सेनाओं में महिलाओं की भागीदारी से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होती महिलाओं की बढ़ती संख्या इस बात का प्रमाण है कि वे अब नीति निर्धारण के केंद्र में आ रही हैं। इसी तरह, भारत की आत्मा आज भी गांवों में बसती है और हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि है। विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए कृषि क्षेत्र में तकनीकी सुधार, आधुनिक खेती को बढ़ावा और वैश्विक कृषि आपूर्ति श्रृंखला में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाना आवश्यक है। किसान जब पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर आधुनिक कृषि-उद्यमी बनेगा, तभी ग्रामीण भारत समृद्ध होगा। अंत में, अंत्योदय की भावना के अनुरूप समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुंचना चाहिए, क्योंकि किसी भी राष्ट्र को तब तक विकसित नहीं कहा जा सकता जब तक कि बहुआयामी गरीबी का पूरी तरह उन्मूलन न हो जाए और हर नागरिक को सम्मानजनक जीवन स्तर न मिल जाए। इसे भी पढ़ें: PM Modi का नई BJP टीम पर पूरा भरोसा, बोले- संगठन और जनसेवा पर दें ध्यान आर्थिक मोर्चे पर, भारत आज दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और शीर्ष वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं की ओर अग्रसर है। लेकिन विकसित देश बनने के लिए हमें केवल सकल घरेलू उत्पाद के आकार को ही नहीं बढ़ाना है, बल्कि प्रति व्यक्ति आय और नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में भी गुणात्मक सुधार करना होगा। इसके लिए विनिर्माण और आत्मनिर्भरता पर विशेष बल देना आवश्यक है। 'मेक इन इंडिया' अभियान के तहत भारत आज मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग, रक्षा उत्पादन और इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में एक वैश्विक केंद्र के रूप में उभर रहा है। रक्षा क्षेत्र में, जहां कभी हम पूरी तरह आयातों पर निर्भर थे, आज हम स्वदेशी अत्याधुनिक सैन्य उपकरणों का निर्माण कर रहे हैं और उनका निर्यात भी बढ़ा रहे हैं। भारतीय कॉर्पोरेट जगत को अब वैश्विक कंपनियों की तर्ज पर अपनी क्षमता का विस्तार करना होगा ताकि भारतीय ब्रांड दुनिया भर के बाजारों में अग्रणी भूमिका निभा सकें। इसके साथ ही, देश के बुनियादी ढांचे का कायाकल्प किया जा रहा है। आधुनिक रेलवे, एक्सप्रेसवे का विस्तृत नेटवर्क, जलमार्गों का विकास और हवाई अड्डों का आधुनिकीकरण देश की लॉजिस्टिक्स लागत को कम करने और व्यापार को सुगम बनाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। एक मजबूत और आधुनिक बुनियादी ढांचा ही विकसित भारत की ठोस नींव बनेगा, जो देश के औद्योगिक विकास को नई गति प्रदान करेगा। तकनीक और नवाचार के इस युग में जो देश अग्रणी रहेगा, वही दुनिया के भविष्य को दिशा देगा। भारत ने डिजिटल क्षेत्र में जो क्रांति की है, उसने दुनिया के विकसित देशों को भी अचंभित किया है। हमारा डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और डिजिटल लेनदेन की व्यवस्था आज वैश्विक स्तर पर एक मिसाल बन चुकी है। भारत ने यह सिद्ध कर दिया है कि वह केवल तकनीक का उपभोक्ता नहीं है, बल्कि वह विश्व को सस्ती, सुरक्षित और समावेशी तकनीक देने वाला प्रदाता भी है। विज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में बढ़ता निवेश इस विजन को और स्पष्ट करता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर मिशन, क्वांटम कंप्यूटिंग, अंतरिक्ष अनुसंधान और ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में भारत का बढ़ता कदम यह दर्शाता है कि हम भविष्य की तकनीकों के मामले में दुनिया के अग्रणी देशों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं। तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर और संप्रभु होना विकसित भारत की एक अनिवार्य शर्त है, जो हमें वैश्विक मंच पर एक अद्वितीय पहचान दिलाएगी। संकल्प जितना विराट होता है, उसकी राह की चुनौतियां भी उतनी ही कठिन होती हैं। विकसित भारत के मार्ग में कई आंतरिक और बाह्य चुनौतियां हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। देश की आर्थिक प्रगति के साथ-साथ क्षेत्रीय और सामाजिक असमानता को पाटना एक बड़ी चुनौती है। विकास का लाभ समाज के हर वर्ग और देश के हर कोने तक समान रूप से पहुंचना चाहिए। इसके अलावा, भारत को पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच एक कुशल संतुलन बनाना होगा। जलवायु परिवर्तन के खतरों को देखते हुए नवीकरणीय ऊर्जा को अपनाना और सतत विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करना युद्धस्तर पर आवश्यक है। प्रशासनिक स्तर पर, हमारी व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और नागरिक-अनुकूल बनना होगा, क्योंकि लालफीताशाही और भ्रष्टाचार विकास की गति को धीमा करते हैं। वैश्विक मोर्चे पर, वर्तमान समय की भू-राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक व्यवधान भी हमारे सामने चुनौतियां खड़ी करते हैं, जिनसे निपटने के लिए भारत को अपनी कूटनीतिक कुशलता और आंतरिक आर्थिक सुदृढ़ता को निरंतर मजबूत बनाए रखना होगा। इस पूरे महायज्ञ में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका देश के नागरिकों की है। कोई भी देश केवल सरकार की नीतियों, बजट या घोषणाओं से विकसित नहीं बनता। सरकार मार्ग प्रशस्त कर सकती है, बुनियादी ढांचा दे सकती है, लेकिन उस पर चलकर देश को आगे ले जाने का काम नागरिकों के सामूहिक प्रयासों से ही संभव होता है। विकसित भारत का संकल्प तब तक अधूरा है जब तक देश का हर नागरिक अपने कर्तव्यों के प्रति पूरी तरह सजग नहीं होता। चाहे वह करों का ईमानदारी से भुगतान करना हो, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना हो, पर्यावरण को बचाना हो, या फिर अपने-अपने कार्यक्षेत्र में पूर्ण ईमानदारी और उत्कृष्टता के साथ योगदान देना हो—ये सभी नागरिक प्रयास मिलकर एक विशाल राष्ट्रीय शक्ति का निर्माण करते हैं। जब देश के नागरिक 'राष्ट्र प्रथम' की भावना को अपने जीवन का मूल मंत्र बना लेंगे, तो भारत की प्रगति को कोई रोक नहीं पाएगा। निष्कर्षतः विकसित भारत का संकल्प केवल आर्थिक आंकड़ों या ऊंची इमारतों तक सीमित नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ एक ऐसे भारत का निर्माण करना है जो आर्थिक रूप से समृद्ध हो, तकनीकी रूप से अग्रणी हो, सामाजिक रूप से समरस और न्यायपूर्ण हो, और सांस्कृतिक रूप से अपनी समृद्ध जड़ों से जुड़ा हुआ हो। यह एक ऐसे भारत का सपना है जहां हर नागरिक को समान अवसर, उत्कृष्ट शिक्षा और स्वास्थ्य सुरक्षा मिले। लालकिले की प्राचीर से गूंजा यह संकल्प देश के लिए एक महान आह्वान है। आने वाले दो दशक भारत के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष होने जा रहे हैं। यदि हम सब मिलकर पूरी निष्ठा और राष्ट्रीय गौरव की भावना के साथ इस संकल्प के प्रति समर्पित हो जाएं, तो निश्चित रूप से वर्ष 2047 में जब भारत अपनी स्वतंत्रता की शताब्दी मना रहा होगा, तब वह विश्व पटल पर एक परम वैभवशाली, समर्थ और विकसित राष्ट्र के रूप में स्थापित होगा। अशोक भाटिया, वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार
उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा मानसून सत्र
संसदीय मर्यादाओं का क्षरण कब तक? आखिर कब हम संसद के एक-एक मिनट का उपयोग करने की पात्रता विकसित करेंगे? आजादी की 80वीं वर्षगांठ की आयोजना से पूर्व भारत में संसद का मानसून सत्र जिस निराशाजनक स्थिति, नाउम्मीदी और उपेक्षापूर्ण स्थितियां के साथ संपन्न हुआ, वह केवल किसी एक दल, सरकार या विपक्ष की विफलता नहीं है, बल्कि हमारी संसदीय संस्कृति के सामने खड़ा एक गंभीर प्रश्नचिह्न है। 25 दिनों तक चले इस सत्र में तीखी राजनीतिक बहस के बजाय हंगामा, नारेबाजी, गतिरोध और कार्यवाही बाधित करने की प्रवृत्ति अधिक प्रभावी रही। प्रश्न यह नहीं है कि सत्ता पक्ष सही था या विपक्ष, प्रश्न यह है कि क्या हमारी संसद अपने मूल दायित्व-जनता के प्रश्नों पर गंभीर विमर्श, सरकार की जवाबदेही और राष्ट्रहित में कानून निर्माण को पूरा कर पा रही है? इस सत्र के आंकड़े स्वयं बहुत कुछ कह रहे हैं। लोकसभा की उत्पादकता बमुश्किल 19 प्रतिशत रही, जबकि राज्यसभा में लगभग 39 प्रतिशत काम हो पाया। लोकसभा में एक भी दिन प्रश्नकाल पूरा नहीं हो सका। यह स्थिति इसलिए अधिक चिंताजनक है क्योंकि प्रश्नकाल संसद की आत्मा माना जाता है। देश की जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों को सरकार से प्रश्न पूछने और सरकार को उनका उत्तर देने का अवसर ही यदि सदन में उपलब्ध न हो, तो लोकतंत्र की जवाबदेही किस रास्ते से सुनिश्चित होगी? 28 जुलाई को लोकसभा में अपेक्षाकृत ठीक काम हुआ, जबकि राज्यसभा में भी केवल कुछ दिन ही सार्थक कार्यवाही हो सकी। शेष समय का बड़ा हिस्सा राजनीतिक टकराव की भेंट चढ़ गया। संसद केवल ईंट-पत्थर से बनी इमारत नहीं है। वह भारत की सामूहिक चेतना का सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच है। वहां देश के करोड़ों नागरिकों की आकांक्षाएं, समस्याएं और सपने पहुंचते हैं। किसान, मजदूर, विद्यार्थी, महिला, व्यापारी, युवा, गरीब और वंचित वर्ग-सभी की आवाज संसद के माध्यम से राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनती है। इसलिए संसद का एक मिनट भी केवल सांसद का समय नहीं होता, वह देश की जनता के धन, विश्वास और लोकतांत्रिक अधिकार का समय होता है। संसद का प्रत्येक व्यर्थ गया मिनट वास्तव में जनता के विश्वास से घटा हुआ एक मिनट है। दुर्भाग्य यह है कि संसद में हंगामा अब अपवाद नहीं, बल्कि संसदीय राजनीति का लगभग नियमित हथियार बनता जा रहा है। मुद्दे उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है, सरकार को घेरना विपक्ष का दायित्व है और असहमति लोकतंत्र की शक्ति है, लेकिन असहमति को संवाद में बदलने के बजाय कार्यवाही रोक देना लोकतंत्र को मजबूत नहीं करता। विरोध की भी एक मर्यादा होती है। यदि विपक्ष अपनी बात रखने के लिए सदन को चलने ही न दे और सत्ता पक्ष विपक्ष की आवाज सुनने की बजाय राजनीतिक बहुमत को ही पर्याप्त समझे, तो दोनों मिलकर संसदीय लोकतंत्र की आत्मा को कमजोर करते हैं। इसे भी पढ़ें: Lok Sabha में मात्र 19% और Rajya Sabha में 39.17% हो सका कामकाज, Parliament के कामकाज का रिपोर्ट कार्ड देखकर खुद तय कीजिये सांसद पास हुए या फेल! इस सत्र में कुछ घटनाएं इस गिरावट को और स्पष्ट करती हैं। लोकसभा अध्यक्ष ने सत्र के समापन पर पारंपरिक समापन भाषण नहीं दिया। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस द्वारा लोकसभा अध्यक्ष के साथ होने वाली चाय पार्टी का बहिष्कार किया जाना भी केवल एक कार्यक्रम का बहिष्कार नहीं माना जा सकता। यह सदन के भीतर बढ़ती राजनीतिक कटुता का संकेत है। लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, मनभेद लोकतंत्र के लिए घातक हैं। संसद में बहस के बाद हाथ मिलाने की संस्कृति विकसित होनी चाहिए, बहस के बाद दूरी बढ़ाने की नहीं। इस मानसून सत्र को नीट-यूजी पेपर लीक, जंतर-मंतर छात्र आंदोलन, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग और राम मंदिर में दान चोरी जैसे मुद्दों के लिए भी याद किया जाएगा। जंतर-मंतर पर हुई हिंसा के बाद विपक्ष केंद्रीय गृहमंत्री से जवाब मांग रहा था। जब सत्र के अंतिम दिनों में गृहमंत्री जवाब देने को तैयार हुए तो विपक्ष द्वारा उनका वक्तव्य सुनने से इनकार करना संसदीय विवेक की कसौटी पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। यदि विपक्ष को सरकार के जवाब से असहमति थी, तो उसे सुनकर तथ्यात्मक प्रतिवाद करना अधिक प्रभावी लोकतांत्रिक रास्ता होता। संसद में जवाब सुनने से इनकार करना प्रश्न का समाधान नहीं, प्रश्न को अनुत्तरित छोड़ना है। यह भी सच है कि तमाम गतिरोध के बीच संसद ने कुछ महत्वपूर्ण काम किए। विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक यानी एफसीआरए को सरकार ने विरोध के बीच संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा। सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 दोनों सदनों में पारित हुआ, जिसका उद्देश्य परीक्षाओं में अनुचित साधनों पर अंकुश लगाना और दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करना है। बैंकिंग रिकॉर्ड को नए डिजिटल ढांचे से जोड़ने, जन्म-मृत्यु के विलंबित पंजीकरण को अधिक कठोर बनाने तथा अन्य विधायी एवं प्रशासनिक सुधारों की दिशा में भी कदम उठे। केरल का नाम विधिवत केरलम किए जाने का निर्णय भी इसी सत्र का हिस्सा रहा। ये उपलब्धियां बताती हैं कि यदि संसद चले तो कम समय में भी महत्वपूर्ण काम संभव है। लेकिन सवाल फिर वही है-जब संसद चल सकती है तो उसे बार-बार रोकने की आवश्यकता क्यों पड़ती है? क्या हम यह भूल गए हैं कि लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव जीतना नहीं है? लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ है-विचारों का सम्मान, असहमति की स्वीकार्यता, संवाद की निरंतरता और निर्णय प्रक्रिया में जनता की भागीदारी। सत्ता पक्ष को यह समझना होगा कि बहुमत उसे शासन करने का अधिकार देता है, लेकिन विपक्ष को सुनने से मुक्त नहीं करता। दूसरी ओर विपक्ष को यह स्वीकार करना होगा कि विरोध का अधिकार संसद को निष्क्रिय करने का अधिकार नहीं है। अतीत में हमारी संसदीय परंपरा ने अनेक कठिन दौर देखे हैं। तीखी बहसें हुईं, वैचारिक संघर्ष हुए, सरकारों की आलोचना हुई, लेकिन संसद को संवाद का मंच बनाए रखने की कोशिश होती रही। आज आवश्यकता है कि हम उस परंपरा को पुनर्जीवित करें। राजनीतिक दलों को अपने भीतर यह आत्ममंथन करना होगा कि क्या वे जनता के बीच जाकर यह कह सकते हैं कि हमने संसद में आपके प्रश्नों के लिए उपलब्ध समय का पूरा उपयोग किया? क्या कोई सांसद गर्व से कह सकता है कि उसने अपने कार्यकाल के प्रत्येक संसदीय अवसर को राष्ट्रहित में लगाया? संसद में हंगामा करना आसान है, लेकिन संसद चलाना चरित्र, संयम और लोकतांत्रिक परिपक्वता मांगता है। नारे लगाने के लिए ऊर्जा चाहिए, लेकिन तथ्यपूर्ण बहस के लिए अध्ययन चाहिए। माइक के सामने खड़े होने के लिए राजनीतिक उत्साह चाहिए, लेकिन कानून बनाने के लिए दूरदृष्टि चाहिए। कार्यवाही रोकने के लिए संख्या पर्याप्त हो सकती है, लेकिन राष्ट्र निर्माण के लिए विवेक, धैर्य और संवाद आवश्यक है। आजादी के 80वें वर्ष की ओर बढ़ते भारत के लिए यह आत्ममंथन का समय है। हमने विज्ञान, अर्थव्यवस्था, तकनीक और वैश्विक प्रतिष्ठा के अनेक क्षेत्रों में बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं। लेकिन क्या हमारी राजनीतिक संस्थाएं भी उसी गति से परिपक्व हुई हैं? क्या हम संसदीय प्रणाली को इतना सशक्त बना पाए हैं कि संसद के एक-एक मिनट का अधिकतम उपयोग कर सकें? क्या हम अपनी असहमति को इतनी गरिमा दे पाए हैं कि विरोध भी हो और संवाद भी बना रहे? क्या हम सत्ता को इतनी विनम्रता और विपक्ष को इतना विवेक दे पाए हैं कि दोनों मिलकर लोकतंत्र को मजबूत करें? इन प्रश्नों के उत्तर केवल संसद भवन के भीतर नहीं खोजे जाने चाहिए। राजनीतिक दलों के नेतृत्व, सांसदों, संसदीय कार्यप्रणाली और अंततः हम नागरिकों-सभी को इस पर विचार करना होगा। जनता को भी यह प्रश्न पूछना चाहिए कि उसका प्रतिनिधि संसद में कितनी बार उपस्थित रहा, कितने प्रश्न पूछे, कितनी बहसों में भाग लिया और राष्ट्र के लिए क्या सार्थक योगदान दिया। लोकतंत्र केवल पांच वर्ष में एक बार वोट देने से मजबूत नहीं होता, लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब जनता अपने प्रतिनिधियों से निरंतर जवाब मांगती है। हंगामा किसी दल की विजय नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की सामूहिक पराजय है। संसद चलेगी तो प्रश्न पूछे जाएंगे, प्रश्न पूछे जाएंगे तो सरकार जवाब देगी, जवाब मिलेगा तो नीतियों की समीक्षा होगी और सार्थक कानून बनेंगे। यही लोकतंत्र की जीवन-धारा है। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
भारत में पाकिस्तानियों को मिल गई नागरिकता?
किसी पाकिस्तानी को आज के दौर में हिंदुस्तान में बसाना, उन्हें पनाह देना या फिर नागरिकता देनी वाली बात, शायद ही किसी के गले उतरे? बसाना तो दूर, ऐसा सोचना मात्र भी, सूरज का पूरब की जगह पश्चिम से निकलने जैसा माना जाएगा। पर, यह कोरी कल्पना पिछले दिनों हकीकत में तब्दील हुई। भारत में 56 साल पहले आए पाकिस्तानियों को नागरिकता दी गई है। वह भी एकाध लोगों को नहीं, बल्कि हजारों को। सरकार ने पिछले महीने बकायदा एक रंगारंग कार्यक्रम कर, ढोल-नगाड़े बजाकर विस्थापित पाकिस्तानियों को नागरिकता प्रमाण पत्र बांटे। ताज्जुब यह भी है कि ऐसा चमत्कार हुकूमत ने ऐसे माहौल में किया, जब समूचे भारत में विभिन्न देशों के घुसपैठियों को निकालकर उन्हें खदेड़ने का अभियान केंद्रीय व राज्य स्तरों पर छिड़ा हो। इस अभियान की बानगी हमने हाल में संपन्न हुए पांच राज्यों के विधाानसभा चुनाव के दौरान भी देखा। जब दो बॉर्डर राज्य, असम और पश्चिम बंगाल, का चुनाव इसी मसले के इर्दगिर्द घूमा। घुसपैठियों के अलावा भारत में कुछ वर्षों से एनआरसी और सीएए का भी शोर है। बावजूद इसके सरकार ने पाकिस्तानियों को नागरिकता देने का बड़ा जाखिम उठाया। सरकार ने यह कदम क्यों उठाया? हालांकि, इस फैसले के सियासी मायने बहुतेरे हैं, जिसकी तस्वीर आने वाले दिनों में दिखाई भी देगी। सरकार ने विस्थापितों को नागरिकता हिंदुस्तान के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में दी है। जिले का नाम है पीलीभीत जो नेपाल बॉर्डर से एकदम सटा हुआ है जिसकी पहचान बांसुरी निमार्ण के अलावा तराई क्षेत्र के लिए भी प्रसिद्ध है। पीलीभीत को मिनी पंजाब भी कहते हैं। प्राकृतिक सौंदर्य से लबरेज, जैव-विविधता के अलावा विश्व प्रसिद्ध टाइगर रिजर्व तो है ही, धान की पैदावार के लिए भी जिला पूरे प्रदेश में विख्यात है। सरकार ने जिन परिवारों को बसाने का फैसला किया है उनमें बंगाली हिन्दू, बौद्ध, जैन और सिख शामिल हैं। भारत के नक्शे में देखें, तो पीलीभीत हिंदुस्तान के एक अलहदे छोर पर बसा है जहां करीब पांच दशक से भी ज्यादा पहले पाकिस्तान से आए विस्थापित लोग बस गए थे। तभी, से वह विभिन्न सरकारों से नागरिकता मांगते आए हैं। सरकारी कागजों के मुताबिक पूर्वी पाकिस्तान से वर्ष 1959 से 1971 के बीच पाकिस्तान से पीड़ित होकर कुछेक परिवार भारत आए थे। शुरूआत में यह परिवार कई राज्यों में भटकते रहे, कहीं ठिकाना नहीं मिला। आखिरकार उन्हें बाद में यही जिला मुफीद लगा। पीलीभीत के अलावा कुछ नागरिकता रामपुर और बिजनौर में बसे विस्थापितों को भी दी गई है। इसे भी पढ़ें: 'हिंदुओं को किसी तरह सहन कर रहे हैं पाकिस्तान के मुसलमान', Zardari के इस बयान पर भड़के Javed Akhtar, Pakistan President को दिखाया आईना पीलीभीत के जिस क्षेत्र में यह परिवार रहते आए हैं वह जगह कभी विरान होती थी। इन लोगों ने इसे रहने लायक बनाया और उबड़खाबड़ जगहों पर मेहनत करके उसे खेतीबाड़ी के लिए तैयार किया। आज इस क्षेत्र में अच्छी फसलें उगती हैं। सभी के पास कागजी दस्तावेजों के रूप में भारतीय आधार कार्ड, पैन कार्ड, राशन कार्ड इत्यादि पहले से मौजूद हैं। साथ ही लंबे वक्त से मतदान भी करते आए हैं। लेकिन नागरिकता और मालिकाना हक से वंचित थे, जिसे मौजूदा योगी सरकार ने पूरा कर दिया। ये परिवार पीलीभीत जिले के अमरिया, न्यूरिया, शारदा डैम की तलहटी सहित आसपास के क्षेत्रों में बसे हैं। सरकार ने उन्हें खेती और आवास के लिए जमीन तो पहले से दी हुई हैं। लेकिन मालिकाना हैसियत नहीं दी, जिसके लिए यह लोग दशकों जद्दोजहद कर रहे थे। प्रत्येक चुनावों में इनसे के झूठा आश्वासन हुआ। पूर्ववर्ती बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी की सरकारों ने भी इनको नागरिकता दिलवाने का दिलासा दिया। पर, कुछ राजनैतिक अड़चनों के चलते वादा पूरा नही ंकर पाए। बीते 2022 के विधानसभा चुनाव में इनके साथ वादा किया गया था, जिसे अब पूरा किया गया। प्रदेश सरकार की पहल पर सभी पीड़ित परिवारों को सूचीबद्ध करके नागरिकता और मालिकाना के प्रमाण बांटे गए हैं। नागरिकता करीब 2500 परिवारों को दी गई हैं जिनकी कुल संख्या 15 हजार के आसपार है। ऐसा करके सरकार ने शायद विपक्षी दलों को बड़ा सियासी मुद्दा बैठे-बिठाए थमा दिया है। ये लोग वर्ष 1960 से 1975 के बीच धार्मिक प्रताड़ना के चलते पूर्वी बंगालादेश जो अब पूर्वी पाकिस्तान का हिस्सा है, से भारत आए थे और उत्तर प्रदेश के तराई के जिले पीलीभीत में आकर बसे। ये क्षेत्र पीलीभीत जिले की कलीनगर व पूरनपुर तहसीलों में आते हैं जहां ये करीब 25-26 गांवों में बसे हैं। पिछले महीने 29 जून को सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का जिले में दौरा हुआ जिसमें मुख्यमंत्री ने इनको ना सिर्फ नागरिकता के प्रमाण पत्र बांटे, बल्कि मालिकाना हक के सरकारी कागज भी दिए। यह फैसला चुनाव के ऐन वक्त लिया गया। प्रदेश में मात्र 6-7 महीनों बाद विधानसभा के चुनाव होने हैं। इसलिए सरकार के इस निर्णय पर प्रदेश की राजनीति जमकर गर्माई हुई है। विपक्षी पार्टियों ने सीधे-सीधे एक बड़े वोटबैंक को साधने का आरोप मौजूदा सरकार पर लगाया है। पाकिस्तानी विस्थापियों को बसाने का यह पहला चरण है, अभी दूसरा चरण शेष है। 35 हजार लोग और हैं जो बहराईच, बाराबंकी, गोंडा, लखीमपुर, बिजनौर जैसे जिलों में बसे हैं। सभी को चिंहित किया जा चुका है, अगले कुछ महीनों बाद इन्हें भी मुकम्मल नागरिकता देने का फैसला हो चुका है। सरकारी आंकड़ों की माने तो प्रदेश के करीब सात-आठ जिलों में कुल 55 हजार विस्थापित पाकिस्तानियों की आबादी है, इनमें प्रत्येक वर्ष तेजी से इजाफा भी हो रहा है। 56 वर्ष पहले धार्मिक प्रताड़ना के रूप में मात्र 12 हजार 380 लोग आए थे। आबादी बढ़ाने के पीछे इनका मकसद था कि बढ़ी आबादी से सरकारों को वोटिंग का लालच देकर किसी भी दल पर दबाव बना सकेंगे। कमोबेश, हुआ भी वैसा ही। अपने योजनाओं में यह लोग आज सफल हुए हैं। - डॉ. रमेश ठाकुर सदस्य, राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान (NIPCCD), भारत सरकार!
आपदा के दौरान गुजरात के किसानों, मछुआरों के लिए जीवन रक्षक बना एनडीएमए का 'सचेत' ऐप
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पूंजी बाजार-बॉन्ड मार्केट : रिपोर्ट बोली- मजबूत भविष्य के लिए टैक्स सुधार जरूरी
मुंबई, पूंजीगत बाजारों को मजबूत, बॉन्ड मार्केट की पहुंच को बढ़ाने और वित्तीय लागत को कम करने के लिए भारत को बड़े टैक्स सुधार लागू करने होंगे। यह जानकारी रविवार को जारी रिपोर्ट में दी गई।
नितिन नबीन की नई टीम में स्मृति ईरानी की नियुक्ति को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अमेठी की पूर्व सांसद और केंद्रीय मंत्री रह चुकीं ईरानी को पार्टी संगठन में महासचिव की जिम्मेदारी दी गई है। वह राष्ट्रीय स्तर पर संगठन के कामकाज में अहम भूमिका निभाएंगी।
Dimagi Naxal Controversy: PM Modi का दांव उलटा पड़ा, क्या पीछे हटेगी सरकार?
PM Modi के 'दिमागी नक्सल' पर भारी बवाल! CJI SuryaKant के काकरोच बयान जैसा हाल?
झारखंड छात्र आंदोलन पर कांग्रेस का समर्थन, बोली-जायज मांगों का जल्द हो समाधान
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टीईटी विवाद: अपनी शिकायतें केंद्र तक ले जाने पर 5 शिक्षकों को सस्पेंड करने के लिए जगन ने चंद्रबाबू नायडू की आलोचना की
केरल वंदे मातरम विवाद: राजीव चंद्रशेखर के आरोपों पर सीपीएम नेता का पलटवार, किया राज्य सरकार का बचाव
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बेंगलुरु बना सबसे महंगा : भारत के प्रमुख ऑफिस मार्केट्स में किराया 10% तक बढ़ा
नई दिल्ली, भारत के प्रमुख ऑफिस मार्केट्स में 2026 की दूसरी तिमाही में किराए में 10 प्रतिशत तक की वृद्धि देखने को मिली है। इस दौरान स्पेस की मांग भी 10 मिलियन स्क्वायर फीट के आसपास रही है। यह जानकारी सोमवार को जारी एक रिपोर्ट में दी गई।
अन्नामलाई का मोदी सरकार पर निशाना: 'गुजरात-केंद्रित विकास व निवेश-इवेंट नहीं चलेगा'
तमिलनाडु बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष के. अन्नामलाई ने पार्टी छोड़ने के बाद अब मोदी सरकार पर आरोप लगाया है कि एक ही राज्य में अवसर पैदा करना भारत के विकास का मॉडल नहीं हो सकता। सभी एआई कंपनियों से लेकर कॉमनवेल्थ गेम्स तक गुजरात में जा रहे हैं।
Dimaagi Naxal Controversy: युवाओं का आंदोलन, क्या फिर फंसी Modi सरकार? | Janadesh Charcha
'कांग्रेस कितने भी प्रमाण दें, देशभक्त नहीं हो सकते', 'वंदे मातरम' विवाद पर भाजपा सांसद ने बोला हमला
'कांग्रेस कितने भी प्रमाण दें, देशभक्त नहीं हो सकते', 'वंदे मातरम' विवाद पर भाजपा सांसद ने बोला हमला
देश की प्रतिष्ठित कानून यूनिवर्सिटियों के छात्रों की ओर से सीजेआई सूर्यकांत का बढ़ता विरोध हर किसी को चौंका रहा है क्योंकि देश के इतिहास में ऐसा घटनाक्रम पहले कभी देखने में नहीं आया। हम आपको बता दें कि हैदराबाद की NALSAR से उठी छात्रों की असहमति अब बेंगलुरु की NLSIU तक पहुंच गई है और देखते ही देखते यह मामला एक दीक्षांत समारोह के मुख्य अतिथि के विरोध से कहीं बड़ा बन गया है। इस समय स्थिति यह है कि कानून यूनिवर्सिटियों के छात्र अब सीधे उन संस्थाओं और पदों की भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं, जिन्हें कानून और न्याय की व्यवस्था का प्रहरी माना जाता है। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में CJI सूर्यकांत को लेकर छात्रों की नाराजगी, BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा की विवादित कार्रवाई और उसके बाद छात्रों के पक्ष में खड़ी होती कानून की युवा पीढ़ी है। सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि दीक्षांत समारोह में कौन आएगा, बल्कि यह है कि क्या असहमति जताने वाले कानून के छात्रों को अपनी आवाज उठाने की कीमत अपने भविष्य से चुकानी पड़ेगी? हम आपको याद दिला दें कि विवाद की शुरुआत NALSAR के छात्रों की उस आपत्ति से हुई, जिसमें उन्होंने विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को मुख्य अतिथि बनाए जाने पर असहमति जताई। छात्रों की नाराजगी का संबंध 20 जुलाई को संसद की ओर हुए छात्रों के मार्च और उस दौरान कथित पुलिस ज्यादती से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई से था। छात्रों ने CJI की अध्यक्षता वाली पीठ के रुख को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी। हालांकि बाद में उन्हीं मामलों में अदालत ने छात्रों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई पर रोक लगाई, वीडियो और CCTV फुटेज सुरक्षित रखने को कहा और स्वतंत्र जांच जैसे विकल्पों पर भी विचार किया। इसे भी पढ़ें: Manan Kumar Mishra कौन हैं? NALSAR विवाद और CJP कैंपेन से सुर्खियों में BCI चेयरमैन इस बीच CJI सूर्यकांत ने स्वयं स्पष्ट कर दिया कि उन्होंने NALSAR का निमंत्रण स्वीकार ही नहीं किया था। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने निमंत्रण स्वीकार नहीं किया तो उनके वहां जाने का सवाल ही नहीं उठता। यानी जिस विवाद ने इतना बड़ा रूप ले लिया, उसमें CJI की ओर से मुख्य अतिथि बनने की सहमति ही नहीं थी। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। असली तूफान तब आया जब इस छात्र विरोध में बार काउंसिल ऑफ इंडिया यानी BCI कूद पड़ा। 13 अगस्त को BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा ने राज्य बार काउंसिलों को निर्देश दिया कि NALSAR के 2026 बैच के छात्रों का अधिवक्ता के रूप में नामांकन अगले आदेश तक रोक दिया जाए। BCI ने यह कदम उन छात्रों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान की जांच का हवाला देते हुए उठाया था। लेकिन यह आदेश कुछ ही घंटों में कानूनी बिरादरी और छात्रों के बीच भारी विरोध का कारण बन गया। सवाल उठा कि आखिर कुछ छात्रों के विरोध के जवाब में उनकी पूरी कक्षा के भविष्य को ही अधर में कैसे डाला जा सकता है? विरोध बढ़ा तो BCI को पीछे हटना पड़ा। संशोधित आदेश में कहा गया कि अधिकांश छात्र निर्दोष हैं और कुछ लोगों के कथित आचरण के लिए पूरी कक्षा को दंडित नहीं किया जा सकता। बाद में मनन कुमार मिश्रा ने छात्रों से माफी भी मांगी। उन्होंने कहा कि उनके किसी शब्द या पत्र से छात्रों की भावनाएं आहत हुई हों तो उन्हें इसका खेद है और छात्रों की भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए। लेकिन माफी के बाद भी सबसे बड़ा सवाल वहीं खड़ा रहा कि क्या BCI को ऐसा आदेश देने का अधिकार था? यही वह बिंदु है जहां मामला महज विवाद से निकलकर कानून के दायरे में पहुंचता है। Advocates Act, 1961 के तहत BCI का काम कानूनी शिक्षा के मानक तय करना, अधिवक्ताओं के पेशेवर आचरण को नियंत्रित करना, अनुशासनात्मक व्यवस्था और राज्य बार काउंसिलों की निगरानी करना है। लेकिन अधिवक्ताओं के रूप में नामांकन राज्य बार काउंसिलों के अधिकार क्षेत्र में आता है। ऐसे में NALSAR के छात्रों का नामांकन रोकने का निर्देश BCI के अधिकार-क्षेत्र की सीमा को लेकर गंभीर सवाल खड़ा करता है। यहीं से विवाद ने एक नया रूप लिया। बेंगलुरु के NLSIU के छात्रों और पूर्व छात्रों ने NALSAR के छात्रों के समर्थन में मोर्चा खोल दिया। 165 स्नातक छात्रों, 409 वर्तमान छात्रों और 128 पूर्व छात्रों सहित 700 से अधिक लोगों ने संयुक्त बयान जारी किया। उन्होंने NALSAR के छात्रों और शिक्षकों के प्रति बिना शर्त समर्थन जताते हुए अपने विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में CJI सूर्यकांत और BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा की उपस्थिति पर भी आपत्ति दर्ज कर दी। NLSIU के छात्रों ने BCI से सार्वजनिक और बिना शर्त माफी की मांग की। उन्होंने छात्रों और शिक्षकों की पहचान बताने के निर्देश को “विच-हंट” बताते हुए कहा कि ऐसी कार्रवाई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर डर पैदा कर सकती है। उनका तर्क है कि संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को अपनी बात कहने का अधिकार देता है और किसी वैधानिक संस्था की शक्ति का इस्तेमाल असहमति दबाने के लिए नहीं किया जा सकता। छात्रों ने BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा के पुराने बयानों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने प्रदर्शनकारी छात्रों को लेकर उनकी कथित टिप्पणियों का हवाला देते हुए कहा कि इस तरह की भाषा ने कानूनी संस्थाओं में भरोसे को नुकसान पहुंचाया है। दूसरी ओर, मनन कुमार मिश्रा ने अब छात्रों को देश के सबसे जागरूक और विवेकशील युवाओं में बताते हुए कहा है कि शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का हिस्सा है और छात्रों को अपने फैसले स्वतंत्र रूप से लेने चाहिए। इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू शायद यही है कि कानून पढ़ने वाले छात्र अब केवल कानून के दर्शक नहीं बने रहना चाहते। वे उस कानून को अपने ऊपर लागू होते हुए भी देख रहे हैं और उसी के आधार पर सवाल भी पूछ रहे हैं। NALSAR से NLSIU तक पहुंची यह आवाज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आज के ये छात्र ही कल के वकील, वरिष्ठ अधिवक्ता, शिक्षक और न्यायाधीश होंगे। यदि कानून के संस्थानों से जुड़े सवालों पर सवाल उठाना ही अनुशासनहीनता मान लिया जाएगा, तो लोकतंत्र में असहमति की जगह कहां बचेगी? उधर, BCI के लिए भी यह घटना आत्ममंथन का अवसर है। जिस संस्था पर देश में कानूनी पेशे के स्तर और अनुशासन को बनाए रखने की जिम्मेदारी है, उससे यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वह अपनी हर कार्रवाई को स्पष्ट वैधानिक अधिकार और संस्थागत प्रक्रिया के आधार पर ही करे। NALSAR प्रकरण ने दिखा दिया है कि कानून की सबसे बड़ी ताकत उसका अधिकार नहीं, बल्कि उस अधिकार का संयमित और न्यायपूर्ण इस्तेमाल है। फिलहाल तस्वीर साफ है। एक तरफ देश की कानूनी व्यवस्था के शीर्ष पद हैं, दूसरी तरफ देश की प्रतिष्ठित कानून यूनिवर्सिटियों के छात्र। और इन छात्रों का संदेश भी उतना ही साफ है कि पद बड़ा हो सकता है, लेकिन संविधान उससे बड़ा है; संस्था शक्तिशाली हो सकती है, लेकिन कानून उससे ऊपर है। -नीरज कुमार दुबे
पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने अपने ही देश की हिंदू आबादी को लेकर ऐसा बयान दिया है, जिसने पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों की स्थिति और वहां की तथाकथित धार्मिक सहिष्णुता के दावों पर फिर से बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। हम आपको बता दें कि स्वतंत्रता दिवस समारोह से जुड़े एक कार्यक्रम में जरदारी ने भारत और पाकिस्तान की तुलना करते हुए पाकिस्तान में रहने वाले हिंदुओं को लेकर ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया, जिसे लेकर तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। सबसे सख्त पलटवार मशहूर लेखक और गीतकार जावेद अख्तर ने किया है। जरदारी ने कहा कि भारत और पाकिस्तान को लेकर दोनों देशों का नजरिया अलग है। उन्होंने कहा कि भारत 'अखंड भारत' की सोच रखता है, जबकि पाकिस्तान एक मुस्लिम देश है। इसके बाद उन्होंने पाकिस्तान की हिंदू आबादी का जिक्र करते हुए कहा कि वहां मुसलमान 3-4 प्रतिशत हिंदू आबादी को 'टॉलरैट' यानी 'सहन' करते हैं। जरदारी ने यह दावा भी किया कि पाकिस्तान में हिंदू उतने ही स्वतंत्र और सुरक्षित हैं, जितने वे कहीं और हो सकते हैं। उन्होंने यहां तक कह दिया कि पाकिस्तान के हिंदू भारत की बजाय पाकिस्तान के साथ रहना ज्यादा पसंद करेंगे। इसे भी पढ़ें: पाकिस्तानी राष्ट्रपति Asif Ali Zardari का दावा- Pakistan में हिंदू सुरक्षित और भारत से ज्यादा यहीं रहना करते हैं पसंद देखा जाये तो यहीं जरदारी के बयान की सबसे बड़ी विडंबना सामने आती है। जिस देश के राष्ट्रपति को अपने नागरिकों की बराबरी, सुरक्षा और सम्मान की बात करनी चाहिए, वही राष्ट्रपति अल्पसंख्यक समुदाय के लिए 'हम उन्हें सहते हैं' जैसी भाषा इस्तेमाल करता दिखाई दे रहा है। देखा जाये तो सवाल सिर्फ एक शब्द का नहीं है। सवाल उस मानसिकता का है जिसमें किसी देश के नागरिकों के अधिकारों को उनके धर्म के आधार पर बहुसंख्यक समुदाय की 'सहनशीलता' से जोड़ दिया जाता है। जरदारी का बयान इसलिए भी निशाने पर है क्योंकि उनके आधिकारिक बयानों में पाकिस्तान को अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने वाला देश बताया जाता रहा है। अगस्त 2025 में अल्पसंख्यक दिवस के मौके पर जरदारी ने संविधान के तहत सभी नागरिकों को समान अधिकार देने, धार्मिक भेदभाव के खिलाफ खड़े होने और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की प्रतिबद्धता जताई थी। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि संवैधानिक बराबरी और सार्वजनिक मंच पर 'हम हिंदुओं को सहते हैं', इन दोनों में से पाकिस्तान की असली सोच कौन-सी है? दूसरी ओर, जरदारी के बयान पर जावेद अख्तर ने बिना किसी लाग-लपेट के सीधा हमला किया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति कहते हैं कि उनके देश में 3-4 प्रतिशत हिंदू आबादी को 'टॉलरैट' किया जाता है। इसके बाद अख्तर ने जरदारी के पुराने चर्चित उपनाम 'Mr Ten Percent' को पकड़ते हुए ऐसा तंज कसा, जिसने पूरे बयान को और ज्यादा राजनीतिक रूप से विस्फोटक बना दिया। जावेद अख्तर ने कहा कि वह समझ सकते हैं कि जरदारी हमेशा से उन लोगों के प्रति असंवेदनशील रहे हैं जो '10 प्रतिशत से कम' हैं। यह एक सीधा और बेहद धारदार व्यंग्य था। जरदारी के 'Mr Ten Percent' उपनाम को उनके हिंदुओं के '3-4 प्रतिशत' वाले बयान से जोड़कर अख्तर ने एक ही वार में उनकी संवेदनशीलता और नैतिकता दोनों पर सवाल खड़ा कर दिया। हम आपको बता दें कि 'Mr Ten Percent' उपनाम जरदारी पर लगे पुराने भ्रष्टाचार के आरोपों से जुड़ा रहा है। 1980 और 1990 के दशक में उन पर सरकारी परियोजनाओं और कारोबारी सौदों में 10 प्रतिशत कमीशन मांगने के आरोप लगाए गए थे। जरदारी ने इन आरोपों से इंकार किया था, लेकिन यह उपनाम लंबे समय तक उनकी राजनीतिक पहचान से जुड़ा रहा। अख्तर ने इसी पुराने संदर्भ को जरदारी के मौजूदा बयान के साथ जोड़कर उन्हें कठघरे में खड़ा कर दिया। वैसे भी जावेद अख्तर की यह प्रतिक्रिया कोई अचानक पैदा हुआ आक्रोश भी नहीं है। वह लंबे समय से पाकिस्तान की आतंकवाद और भारत विरोधी नीतियों पर खुलकर बोलते रहे हैं। पिछले वर्ष मुंबई में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा था कि भारत ने पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने के लिए सांस्कृतिक और दूसरे स्तरों पर प्रयास किए, लेकिन पाकिस्तान की तरफ से रिश्ते सुधारने के लिए ठोस प्रयास नहीं हुए। उन्होंने सीमा पार आतंकवाद और आतंकियों को पनाह देने के मुद्दे पर भी पाकिस्तान को घेरा था। इसके अलावा, जरदारी के बयान ने एक पुराने सवाल को फिर जिंदा कर दिया है कि क्या पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के अधिकार वास्तव में नागरिक अधिकार हैं या बहुसंख्यक समाज की 'मेहरबानी'? अगर हिंदुओं को इसलिए 'स्वतंत्र' बताया जा रहा है क्योंकि बहुसंख्यक उन्हें 'सहन' करते हैं, तो फिर बराबरी का दावा खोखला ही नजर आता है। और यही वह बिंदु है जहां जावेद अख्तर का पलटवार जरदारी के बयान से कहीं आगे निकल जाता है। उन्होंने सिर्फ एक राष्ट्रपति के शब्दों पर आपत्ति नहीं जताई, बल्कि उस सोच पर चोट की जिसमें अल्पसंख्यकों के अधिकारों को बहुसंख्यक की सहनशीलता से तौला जाता है। बहरहाल, जरदारी के लिए यह बयान महज एक भाषण की पंक्ति हो सकती है, लेकिन अख्तर ने उसी पंक्ति को आईना बना दिया। '3-4 प्रतिशत' हिंदुओं को 'सहन' करने का दावा करने वाले पाकिस्तान के राष्ट्रपति को जवाब देते हुए उन्होंने '10 प्रतिशत' वाले तंज से यह संदेश साफ कर दिया कि नागरिक अधिकार किसी बहुसंख्यक की दया नहीं होते।
बीजेपी संगठन में बड़ा फेरबदल: स्मृति ईरानी और राम माधव की वापसी, अमित मालवीय की छुट्टी
बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन की नई टीम में स्मृति ईरानी को राष्ट्रीय महासचिव और राम माधव को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है, जबकि अमित मालवीय को आईटी सेल प्रमुख के पद से हटा दिया गया है।
आज से शुरू होगा आंध्र विधानसभा सत्र - किसानों और राजधानी परियोजना पर चर्चा
आंध्र प्रदेश विधानसभा का मानसून सत्र सोमवार से शुरू होगा। इस दौरान एल नीनो के प्रभाव, किसानों से जुड़े मुद्दों और अमरावती राजधानी परियोजना के कामों की प्रगति सहित कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा होने की संभावना है।
यूजीसी‑नेट पेपर दोबारा होंगे, अंग्रेज़ी, कॉमर्स और समाजशास्त्र की नई परीक्षा
राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) ने यूजीसी-नेट जून 2026 परीक्षा के अंग्रेजी, कॉमर्स और समाजशास्त्र विषयों के पेपर दोबारा कराने का फैसला किया है। इन तीनों प्रश्नपत्रों में तथ्यात्मक, टाइपिंग, अनुवाद और भाषा संबंधी कई गंभीर गलतियां पाए जाने के बाद एनटीए ने यह निर्णय लिया है।
मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने मध्य प्रदेश के यूसीसी कानून को बताया संविधान विरोधी, कहा- मुसलमान मानने को बाध्य नहीं
पश्चिम बंगाल : ममता बनर्जी ने पूर्व तृणमूल विधायक आशीष बनर्जी के निधन पर दुख जताया
पश्चिम बंगाल : ममता बनर्जी ने पूर्व तृणमूल विधायक आशीष बनर्जी के निधन पर दुख जताया
ड्यूटी के दौरान जान गंवाने वाले कॉन्स्टेबल के परिवार को सीएम विजय ने 30 लाख की आर्थिक मदद की घोषणा की
आशीष बनर्जी की आत्महत्या के पीछे हो सकता है 'ब्लैकमेल का दबाव': सीएम सुवेंदु अधिकारी
आशीष बनर्जी की आत्महत्या के पीछे हो सकता है 'ब्लैकमेल का दबाव': सीएम सुवेंदु अधिकारी
राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान का पूरा सम्मान किया जाना चाहिए: सीजेपी प्रवक्ता आशुतोष रांका
राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान का पूरा सम्मान किया जाना चाहिए: सीजेपी प्रवक्ता आशुतोष रांका
भारत को 2047 तक विकसित बनाने के लिए 10 ट्रिलियन डॉलर की जीडीपी का लक्ष्य रखना जरूरी : रिपोर्ट
भारत को 2047 तक विकसित बनाने के लिए 10 ट्रिलियन डॉलर की जीडीपी का लक्ष्य रखना जरूरी : रिपोर्ट
'दिमागी नक्सल' वाले बयान पर भाजपा ने कांग्रेस को घेरा, चिदंबरम पर नक्सलियों के बचाव करने का लगाया आरोप
ब्राह्मण चेहरों के अभाव में बसपा 2027 में कैसे साधेगी सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला?
ब्राह्मण चेहरों के अभाव में बसपा 2027 में कैसे साधेगी सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला?
वंदे मातरम विवाद पर सोनिया माफी मांगें- शाह; अपनी नाकामियों से भटका रहे गृहमंत्री- कांग्रेस
अमित शाह ने सोनिया गांधी पर स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान 'वंदे मातरम' का अपमान करने का आरोप लगाया है। जवाब में कांग्रेस ने कहा, 'डॉ. आंबेडकर का अपमान करने वाला आदमी अपने साहिब की भारी विफलताओं से ध्यान भटकाने के लिए कांग्रेस से माफी की मांग कर रहा है।'
पश्चिम बंगाल: कांग्रेस नेता और बेटे की हत्या में टीएमसी से जुड़ी महिला पंचायत प्रधान समेत 3 गिरफ्तार
पश्चिम बंगाल: कांग्रेस नेता और बेटे की हत्या में टीएमसी से जुड़ी महिला पंचायत प्रधान समेत 3 गिरफ्तार
राहुल गांधी ने की पुणे में 'छात्रों की गूंज' की घोषणा- 'अब लड़कियां बोलेंगी, देश सुनेगा'
राहुल गांधी ने कहा, 'मुझे हर एक युवा पर गर्व है - खासकर उन लड़कियों पर, जिन्हें बीजेपी के गुंडों की बदसलूकी, गाली-गलौज और हिंसा का सामना करना पड़ा, यहां तक कि उन्हें प्रधानमंत्री से माफी मांगने के लिए मजबूर किया गया। लेकिन अब उनकी आवाज़ दबाई नहीं जा सकेगी।'

