सहारनपुर मस्जिद का मामला एक कानूनी लड़ाई, न्यायालय पर पूरा भरोसा : इमरान मसूद
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फारूक अब्दुल्ला के बयान पर भड़के विवेक बाली, बोले- यह हिंदू अधिकारियों को भी घाटी से निकालने की साजिश
दिल्ली में जुटे Congress के एससी-एसटी सांसद, 3 प्रमुख नेताओं के शामिल न होने से गरमाई राजनीति
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जेएसएससी-सीजीएल मामले में पूर्व डीजीपी की भूमिका संदिग्ध, कार्रवाई से हिचक रही हेमंत सरकार : बाबूलाल मरांडी
ISRO को कमजोर करने की साजिश हो रही या भारत को Space Superpower बनने की रणनीति पर काम चल रहा?
क्या भारत की अंतरिक्ष एजेंसी इसरो को धीरे-धीरे निजी हाथों के हवाले किया जा रहा है, या फिर देश एक ऐसी नई अंतरिक्ष रणनीति की ओर बढ़ रहा है जिसमें इसरो शोध और सामरिक अभियानों का कमांड सेंटर बनेगा और उद्योग उत्पादन की ताकत? यही सवाल पिछले कुछ दिनों से भारतीय अंतरिक्ष जगत के भीतर और बाहर तेज बहस का विषय बना हुआ है। अब इसरो ने स्वयं सामने आकर स्पष्ट किया है कि न तो इसरो का निजीकरण होगा और न ही उसकी भूमिका या महत्व कम किया जाएगा। यह स्पष्टीकरण ऐसे समय आया है जब इसरो के नौ कर्मचारी संगठनों ने 4 सितंबर को इसरो अध्यक्ष वी. नारायणन को पत्र लिखकर अंतरिक्ष क्षेत्र में चल रहे सुधारों, उत्पादन गतिविधियों के निजी कंपनियों और सार्वजनिक उपक्रमों को हस्तांतरण तथा कर्मचारियों के भविष्य पर गंभीर सवाल उठाए थे। उनकी चिंता का केंद्र 21 अगस्त को IN-SPACe के अध्यक्ष पवन गोयनका की वह टिप्पणी थी, जिसमें कहा गया था कि भविष्य में इसरो प्रक्षेपण यानों का निर्माण बंद कर सकता है और उनका उत्पादन उद्योग या पीएसयू संभाल सकते हैं। इसे भी पढ़ें: राष्ट्रीय आत्मविश्वास को मजबूत करता जीएसएलवी-एफ17 का प्रक्षेपण इसरो का जवाब स्पष्ट है कि भूमिका बदल रही है, महत्व नहीं। एजेंसी अब उस दिशा में अपने वैज्ञानिक संसाधन केंद्रित करना चाहती है जहां उसकी विशेषज्ञता सबसे निर्णायक है। यानि फ्रंटियर रिसर्च, उन्नत प्रौद्योगिकी, मानव अंतरिक्ष उड़ान, अगली पीढ़ी के प्रक्षेपण यान, गहरे अंतरिक्ष और ग्रहों के मिशन तथा राष्ट्रीय और सामरिक क्षमताएं। हम आपको बता दें कि संचार, नेविगेशन और पृथ्वी अवलोकन के उन्नत पेलोड, सेंसर, प्रणोदन प्रणालियां और अन्य महत्वपूर्ण तकनीकें इसरो के मूल फोकस में बनी रहेंगी। दूसरी ओर, जिन तकनीकों ने परिपक्वता हासिल कर ली है और जिनका बड़े पैमाने पर नियमित उत्पादन संभव है, उन्हें उद्योग और पीएसयू प्रतिस्पर्धी प्रक्रियाओं के माध्यम से बढ़ा सकते हैं। इसमें परिपक्व लॉन्च व्हीकल, नियमित उपग्रह और स्थापित अंतरिक्ष प्रणालियां शामिल हो सकती हैं। इसरो का तर्क है कि इससे उसके वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों का समय उत्पादन में नहीं, बल्कि भविष्य की जटिल तकनीकों और महत्वाकांक्षी अभियानों में लगेगा। यही इस बदलाव का सबसे बड़ा रणनीतिक अर्थ है। अंतरिक्ष शक्ति बनने के लिए इसरो को “फैक्ट्री” से आगे बढ़कर “टेक्नोलॉजी फ्रंटियर” पर खड़ा होना होगा। भारत ने 2030 तक सालाना 50 प्रक्षेपणों का लक्ष्य रखा है। पवन गोयनका का कहना है कि इतने बड़े पैमाने का लक्ष्य कोई एक संगठन अकेले हासिल नहीं कर सकता। इसके लिए निजी पूंजी, औद्योगिक उत्पादन क्षमता, उद्यमिता और वैश्विक बाजार तक पहुंच जरूरी है। यह पूरी व्यवस्था भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 और एफडीआई नीति के क्रमिक उदारीकरण से जुड़ी है। इसरो इसे निजीकरण नहीं, बल्कि “इकोसिस्टम विस्तार और क्षमता गुणन” बता रहा है। उद्योग, स्टार्ट-अप और अकादमिक संस्थानों को अंतरिक्ष मूल्य श्रृंखला में शामिल कर इसरो की क्षमताओं को प्रतिस्थापित नहीं, बल्कि कई गुना करने की योजना है। नई संरचना में विभागीय भूमिकाएं भी स्पष्ट की गई हैं। डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस नीति दिशा देगा, इसरो उन्नत अनुसंधान, प्रौद्योगिकी विकास और राष्ट्रीय मिशनों का मुख्य केंद्र रहेगा, IN-SPACe गैर-सरकारी संस्थाओं की भागीदारी को सक्षम और अधिकृत करेगा, जबकि NSIL परिपक्व क्षमताओं के व्यावसायीकरण और उद्योग-आधारित उपयोग को आगे बढ़ाएगा। लेकिन इस परिवर्तन पर सवाल खत्म नहीं हुए हैं। कर्मचारी संगठनों ने पूछा है कि नीति का कानूनी और प्रशासनिक आधार क्या है, इसका क्रियान्वयन कब होगा और मौजूदा कर्मचारियों तथा भविष्य की भर्ती पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा। उनका सबसे महत्वपूर्ण तर्क है कि दशकों में विकसित इसरो की तकनीक राष्ट्रीय संपत्ति है, इसलिए उसका हस्तांतरण पारदर्शी, जवाबदेह और सामरिक तथा सुरक्षा हितों के अनुरूप होना चाहिए। विपक्ष ने भी इस मुद्दे को राजनीतिक मोर्चे पर उठा लिया है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि स्टार्ट-अप को बढ़ावा देने के नाम पर इसरो की भूमिका सीमित की जा रही है और उसकी दशकों पुरानी क्षमताएं निजी कंपनियों को सौंपी जा सकती हैं। पार्टी नेता जयराम रमेश ने इसे इसरो के “साराभाई-धवन ढांचे” को कमजोर करने की प्रक्रिया बताया। यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाएं अब असाधारण स्तर पर पहुंच चुकी हैं। 2035 तक भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन, 2040 तक भारतीय मानवयुक्त चंद्र मिशन, पुन: प्रयोज्य और अगली पीढ़ी के लॉन्च सिस्टम तथा सतत चंद्र और ग्रह अन्वेषण, ये लक्ष्य साधारण व्यावसायिक विस्तार से हासिल नहीं होंगे। इसरो का कहना है कि ऐसी क्षमताओं को केवल बाजार की ताकतों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। हम आपको बता दें कि भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था फिलहाल लगभग 8.4 अरब डॉलर आंकी गई है और लक्ष्य 2033 तक इसे 44 अरब डॉलर तक पहुंचाने का है। इसलिए असली चुनौती निजी क्षेत्र बनाम इसरो नहीं, बल्कि इसरो-नेतृत्व वाले राष्ट्रीय अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र की सफलता है। रणनीतिक दृष्टि से यह भारत के लिए निर्णायक मोड़ है। अब सवाल यह है कि क्या भारत उत्पादन का विस्तार करते हुए अपनी संवेदनशील तकनीक, सामरिक स्वायत्तता और वैज्ञानिक नेतृत्व को सुरक्षित रख पाएगा। यदि संतुलन सही बैठा, तो निजी उद्योग इसरो की ताकत बढ़ाएगा; यदि पारदर्शिता और संस्थागत नियंत्रण कमजोर पड़े, तो राष्ट्रीय क्षमताओं के हस्तांतरण पर उठ रहे सवाल और गंभीर होंगे। इसरो ने फिलहाल अपना संदेश साफ कर दिया है कि वह पीछे नहीं हट रहा, बल्कि उत्पादन की जिम्मेदारियों से मुक्त होकर अंतरिक्ष की अगली सीमा पर छलांग लगाने की तैयारी कर रहा है। -नीरज कुमार दुबे
उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनाव सिर्फ वोटों की गिनती से नहीं जीते जाते। यहां जाति, जज्बात, चेहरा और संदेश, इन चारों का सही तालमेल सत्ता तक पहुंचने का रास्ता बनाता है। 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर जरूर है, लेकिन सियासी बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव भी अपनी पुरानी साइकिल में नए राजनीतिक पुर्जे लगाने में जुटे हैं। मकसद सपा को उसकी पुरानी छवि से बाहर निकालना है, जिसे विरोधी लंबे समय से एक खास सामाजिक दायरे और सत्ता में कथित तौर पर आक्रामक राजनीति से जोड़ते रहे हैं। अखिलेश की नई रणनीति में जातीय समीकरण भी है, हिंदू प्रतीक भी हैं, पीडीए का विस्तार भी है और सबसे दिलचस्प बात यह है कि डिंपल यादव के रूप में एक नया और अपेक्षाकृत शांत चेहरा भी है। डिंपल की बढ़ती भूमिका और ‘सॉफ्ट पॉलिटिक्स’ देखा जाये तो अब तक डिंपल यादव की राजनीति अपेक्षाकृत संयमित और सीमित सार्वजनिक दायरे में दिखाई देती रही है। लेकिन हाल के समय में उनकी सक्रियता बढ़ी है। संसद से लेकर राजनीतिक मुद्दों तक उनकी मौजूदगी ज्यादा मुखर हुई है। यही बदलाव महज सामान्य राजनीतिक सक्रियता नहीं, बल्कि सपा की व्यापक रणनीति का एक अहम हिस्सा भी माना जा सकता है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में अक्सर आवाज जितनी ऊंची होती है, राजनीति उतनी ही असरदार दिखाई जाती है। आरोप-प्रत्यारोप, तीखे बयान और मंचीय हमले यहां आम बात हैं। ऐसे माहौल में डिंपल की शैली अलग दिखाई देती है। यानि कम शोर, संयमित भाषा, सहज व्यवहार और टकराव की बजाय संवाद का अंदाज। यही वजह है कि सपा के लिए उनका चेहरा राजनीतिक रूप से उपयोगी हो सकता है। कह सकते हैं कि अखिलेश यादव की राजनीति में धार वही है, लेकिन उसके साथ डिंपल की राजनीति का एक ‘सॉफ्ट टच’ जोड़ा जा रहा है। इसे भी पढ़ें: ‘पराये धन’ को अपना बनाना भाजपा से बेहतर कोई नहीं जानता... ‘पीडीए’ तंज पर अखिलेश यादव का तीखा पलटवार क्या डिंपल यादव हो सकती हैं मुख्यमंत्री पद का चेहरा? यहीं से एक बड़ा सियासी सवाल निकलता है कि क्या 2027 के विधानसभा चुनाव में डिंपल यादव समाजवादी पार्टी की मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार हो सकती हैं? फिलहाल सपा की राजनीति का केंद्रीय चेहरा अब भी अखिलेश यादव ही हैं। लेकिन राजनीति में हर बात की शुरुआत घोषणा से नहीं होती। कई बार किसी नेता की बढ़ती सक्रियता, बदलती भूमिका और सार्वजनिक स्वीकार्यता ही भविष्य के संकेत देने लगती है। डिंपल की कार्यशैली अखिलेश से अलग है। अखिलेश जहां सीधे राजनीतिक हमले करने और भाजपा के खिलाफ आक्रामक विपक्षी राजनीति का चेहरा हैं, वहीं डिंपल अपेक्षाकृत शांत और संतुलित दिखाई देती हैं। उनकी यही अलग पहचान भविष्य में सपा के लिए एक अतिरिक्त राजनीतिक पूंजी बन सकती है। इसके अलावा, उत्तर प्रदेश में अब कोई भी पार्टी महिलाओं को नजरअंदाज करने का जोखिम नहीं लेना चाहती। भाजपा अपनी महिला-केंद्रित योजनाओं और लाभार्थी राजनीति के जरिए महिला वोटरों पर लगातार पकड़ मजबूत करने की कोशिश करती रही है। दूसरी तरफ विपक्ष भी समझ चुका है कि सिर्फ जातीय समीकरणों से चुनावी लड़ाई पूरी नहीं होती। ‘आधी आबादी’ अब सिर्फ नारा नहीं, चुनावी समीकरण का बड़ा हिस्सा है। ऐसे में डिंपल यादव सपा के लिए एक प्रभावी महिला चेहरा बन सकती हैं। उनकी शांत और सहज छवि उन महिला मतदाताओं तक पहुंच बनाने में मदद कर सकती है, जो सपा को अब तक मुख्य रूप से पुरुष नेतृत्व वाली पार्टी के रूप में देखती रही हैं। अगर पार्टी महिलाओं के लिए ठोस राजनीतिक कार्यक्रम और भरोसेमंद संदेश के साथ मैदान में उतरती है, तो डिंपल उस अभियान का स्वाभाविक चेहरा बन सकती हैं। वैसे यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि वह मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार बनेंगी, लेकिन इतना जरूर है कि अगर सपा को 2027 में महिला मतदाताओं के बीच अपनी नई जमीन तैयार करनी है, तो डिंपल की भूमिका केवल एक सांसद या स्टार प्रचारक तक सीमित नहीं रह सकती। यूपी की राजनीति में जो नेता धीरे-धीरे अपनी जगह बनाता है, वह कई बार अचानक बड़े समीकरण का केंद्र बन जाता है। डिंपल के मामले में भी यही संभावना राजनीतिक चर्चा को दिलचस्प बनाती है। 2027 और सपा की नई सोशल इंजीनियरिंग अखिलेश यादव अच्छी तरह जानते हैं कि 2024 में बने राजनीतिक माहौल को 2027 की सत्ता तक पहुंचाने के लिए सिर्फ पुराने समीकरण काफी नहीं होंगे। दलित राजनीति की जमीन में बदलाव आया है, पिछड़ों के भीतर भी कई परतें हैं और सवर्ण मतदाताओं को लेकर नई राजनीतिक संभावनाएं तलाशनी पड़ रही हैं। यहीं से सामने आता है पीडीए का विस्तार। पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी पीडीए सपा की नई राजनीतिक रणनीति का केंद्र रहा है। लेकिन अब अखिलेश ने इस राजनीतिक फार्मूले में एक नया मोड़ दिया है। ‘पी’ की व्याख्या में पंडितों यानी ब्राह्मणों को भी जोड़ने की कोशिश की गई है। उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी भले बहुत बड़ी न हो, लेकिन उनका राजनीतिक प्रभाव हमेशा संख्या से ज्यादा रहा है। गांव की चौपाल हो या शहर की राजनीतिक बैठक, कई इलाकों में ब्राह्मण मतदाता चुनावी माहौल और समीकरण दोनों पर असर डालता है। बसपा ने 2007 में दलित-ब्राह्मण सामाजिक समीकरण को मजबूत करके सत्ता का रास्ता बनाया था। बाद में भाजपा के उभार और नरेंद्र मोदी की राजनीति के साथ बड़ी संख्या में ब्राह्मण मतदाता भाजपा के साथ मजबूती से जुड़ गए। अब अखिलेश उसी राजनीतिक जमीन में संभावनाएं तलाश रहे हैं। त्रिशूल, शिव और समाजवाद का नया प्रयोग अखिलेश यादव की राजनीति का एक और महत्वपूर्ण बदलाव हिंदू प्रतीकों को लेकर दिखाई देता है। वह अब केवल पुराने समाजवादी ढांचे में सिमटकर राजनीति नहीं करना चाहते। उन्हें मालूम है कि 2027 का उत्तर प्रदेश 1990 के दशक का उत्तर प्रदेश नहीं है। इसलिए सपा प्रमुख हिंदू धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों से दूरी बनाने की बजाय उन्हें अपनी राजनीतिक भाषा का हिस्सा बना रहे हैं। सनातन धर्म की चर्चा, हनुमान चालीसा का पाठ, ब्राह्मणों तक पहुंच और धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों में सक्रिय भागीदारी, यह सब एक व्यापक राजनीतिक संदेश का हिस्सा है। जनेश्वर मिश्र की जयंती के मौके पर त्रिशूल और शिव स्तुति के बीच ब्राह्मणों तक पहुंचने का संदेश इसी नई राजनीति की तस्वीर है। इटावा में केदारेश्वर महादेव मंदिर के निर्माण को भी इसी बड़े राजनीतिक संदर्भ में देखा जा सकता है। संदेश साफ है कि सपा सामाजिक न्याय की बात भी करेगी और हिंदू समाज के साथ संवाद भी बनाएगी। वैसे यह भाजपा के हिंदुत्व की सीधी नकल नहीं, बल्कि अपने लिए अलग राजनीतिक जगह बनाने की कोशिश है। लेकिन असली पेंच भी यही है। उत्तर प्रदेश में समीकरण बनाना आसान है मगर उन्हें मतदान केंद्र तक पहुंचाना मुश्किल है। अखिलेश यादव की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि ब्राह्मणों को जोड़ने की कोशिश में पीडीए का मूल आधार कमजोर नहीं हो। दूसरी चुनौती सपा की पुरानी राजनीतिक छवि है। भाजपा लगातार सपा के पिछले शासनकाल को कानून-व्यवस्था और कथित दबंग राजनीति के मुद्दे पर घेरती रही है। ऐसे में डिंपल यादव की बढ़ती भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। उनका संयमित और सहज व्यक्तित्व सपा की छवि को नया आयाम दे सकता है। लेकिन यूपी की राजनीति में सिर्फ मुस्कुराहट से चुनाव नहीं जीते जाते। सवाल यह भी है कि क्या ब्राह्मण मतदाता वास्तव में भाजपा से दूर होंगे? क्या दलितों का बड़ा हिस्सा सपा की तरफ आएगा? क्या पिछड़ों के बीच पीडीए की पकड़ और मजबूत होगी? और क्या महिला मतदाता सपा को एक नए नजरिए से देखेंगे? सवाल यह भी है कि क्या समाजवादी पार्टी अपनी पुरानी पहचान से बाहर निकलकर सचमुच एक व्यापक सामाजिक गठबंधन तैयार कर पाएगी? देखा जाये तो अखिलेश के सामने एक और चुनौती विपक्षी राजनीति के भीतर भी है। अगर सपा एक तरफ सवर्णों को जोड़ने की कोशिश करे और दूसरी तरफ उसके राजनीतिक सहयोगियों की भाषा उसी वर्ग को असहज करे, तो समीकरण बनने से पहले ही बिगड़ सकते हैं। यूपी में राजनीति का यही असली गणित है कि एक जाति को जोड़ो तो दूसरी की नाराजगी का डर, एक वर्ग को साधो तो दूसरे को संदेश देने की चुनौती। फिलहाल इतना साफ है कि अखिलेश यादव 2027 के लिए सिर्फ चुनाव नहीं लड़ रहे, बल्कि समाजवादी पार्टी का नया संस्करण तैयार कर रहे हैं। उसमें पुराना समाजवाद है, नया पीडीए है, ब्राह्मणों के लिए जगह है, हिंदू प्रतीकों की स्वीकार्यता है और महिला मतदाताओं तक पहुंचने के लिए डिंपल यादव जैसा एक अलग चेहरा भी है। यहां सवाल उठता है कि क्या ‘शार्प’ अखिलेश और ‘सॉफ्ट’ डिंपल का यह राजनीतिक संतुलन 2027 में सपा के लिए नई ताकत बनेगा? या फिर उत्तर प्रदेश की जातीय राजनीति के पुराने गड्ढे इस नई साइकिल की रफ्तार रोक देंगे? जवाब 2027 देगा, लेकिन इतना तय है कि इस बार साइकिल सिर्फ चलने नहीं, अपना नया रास्ता बनाने की कोशिश में है। -नीरज कुमार दुबे
पीएम मोदी गुजरात को देंगे 35 हजार करोड़ रुपए की सौगात, मंगलवार को मुंबई में करेंगे ग्लोबल फिनटेक फेस्ट का उद्घाटन
संयुक्त राष्ट्र संघ यानी कि यूनाइटेड नेशंस की जनरल असेंबली में दुनिया का पारंपरिक नक्शा बदलने का प्रस्ताव पारित हो गया है। नक्शे को बदलने के लिए अफ्रीकी देश टोगो की ओर से करेक्ट द मैप मुहिम चलाई गई थी। इसे अफ्रीकन यूनियन यानी कि एयू का समर्थन मिला था। प्रस्ताव में खासतौर पर अफ्रीका का आकार और हिस्सों को ज्यादा सही ढंग से दिखाने की बात कही गई थी। यूएन में इस प्रस्ताव को भारत, फ्रांस और इंग्लैंड समेत 164 देशों का समर्थन मिला है। जबकि एकमात्र अमेरिका ने इसके खिलाफ वोट किया है। इसके अलावा छह देशों स्टोनिया, जॉर्जिया, लिदवानिया, मुलदोवा, सर्बिया और यूक्रेन ने वोटिंग से दूरी बनाकर रखी। यूएन में हुए इस मतदान से दुनिया भर के संस्थानों में इस्तेमाल होने वाले नक्शों में बदलाव आएगा। यह खबर कई सवालों को जन्म देती है। जैसे कि क्या अब दुनिया का नक्शा बदल जाएगा? मरकेटर मैप इक्वल अर्थ मैप में क्या अंतर है? आखिर 450 साल पुराने नक्शे ने दुनिया को इतना अलग क्यों दिखाया और नए नक्शे में अफ्रीका अचानक इतना बड़ा नजर क्यों आया? संयुक्त राष्ट्र महासभा यूएन ने एक नए विश्व मानचित्र को मंजूरी दी है जिसमें महाद्वीपों का आकार एक दूसरे के मुकाबले ज्यादा सही दिखाया गया है। इसे भी पढ़ें: बड़ा दिखेगा अफ्रीका, घटेगा US-यूरोप का आकार...बदल गया दुनिया का 450 साल पुराना नक्शा, UN में पास हुआ ऐसा प्रस्ताव, बौखला गया अमेरिका क्यों लाया गया यह प्रस्ताव? प्रस्ताव में कहा गया कि 16वीं सदी में नौवहन के उद्देश्य से तैयार 'मर्केटर प्रोजेक्शन' उपयोग अब तक धरती पर देशों और महाद्वीपों को दिखाने के लिए किया जाता था। इसमें देशों और महाद्वीपों का आकार उनके असली क्षेत्रफल से बड़ा या छोटा दिखता था। टोगो की पहल और अफ्रीकी देशों की अगुआई में लाए गए इस प्रस्ताव का मकसद खास तौर पर अफ्रीका के आकार को दुनिया के नक्शों में अधिक वास्तविक रूप में दिखाना है। इस फैसले से देशों और महाद्वीपों के क्षेत्रफल पर कोई असर नहीं पड़ेगा। बस आकार में बदलाव हो सकता है। क्योंकि, नया नक्शा सीमाएं नहीं, बल्कि नक्शे पर पृथ्वी को दिखाने का तरीका बदलने वाला है। भारत का नक्शा थोड़ा अलग दिख सकता है, लेकिन बड़ा बदलाव नहीं होगा। मार्केटर क्या चीज है? मान लीजिए आपके हाथ में एक सेब है। सेब एकदम गोल। ठीक हमारी पृथ्वी की तरह। अब अगर आप उस सेब का छिलका उतारकर मेज पर बिल्कुल सपाट रख दें यानी समतल रख दें और फैलाने की कोशिश करेंगे तो वह किनारे से फटेगा या फिर आपको उसे जबरदस्ती खींचना पड़ेगा। यह भी हो सकता है। कुछ ऐसा उदाहरण आप संतरे को भी लेकर देख सकते हैं। जब आप संतरे को छीलते हैं और नीज पर रखते हैं तो शायद वो फैल भी सकता है या टूट भी सकता है। गोल धरती को चौकोर पन्ने पर उतारते वक्त भी बिल्कुल यही परेशानी आती है। करीब 450 साल पहले 1569 में गेराड्स मॉकेटर ने यही नक्शा तैयार किया था। उस दौर में हवाई जहाज नहीं थे। लोग समंदर में जहाजों से महीनों सफर करते। नाविक पानी में भटक ना जाए इसलिए मार्केटर ने नक्शे में रास्तों और दिशाओं को एकदम सीधी रेखाओं में रखा ताकि जहाजों को सही दिशा मिले। दिशाएं सीधी रखने के चक्कर में एक बड़ी भूल हुई। मार्केटर नक्शा समंदर में जहाजों को सही रास्ता दिखाने के लिए तो शानदार था लेकिन उसने दुनिया के देशों का असली आकार खराब कर दिया था। इसे भी पढ़ें: भारत तैयार है...यूक्रेन पहुंचकर जयशंकर ने किया ऐसा धमाका, रूस-अमेरिका दोनों हो जाएंगे हैरान क्या नक्शों को तत्काल मर्केटर से बदलना होगा? यह प्रस्ताव गैर-बाध्यकारी है। मतलब, दुनियाभर में इस्तेमाल होने वाले सभी नक्शों को तत्काल मर्केटर से बदलना अनिवार्य नहीं है। मुख्य उद्देश्य अधिक सटीक और समानुपातिक कार्टोग्राफिक मेथेडोलॉजी को प्रोत्साहित करना है। वोट से पहले UN ने टोगो के विदेश मंत्री रॉबर्ट डूसी के हवाले से कहा, 'मैप दुनिया के बारे में हमारी समझ को आकार देते हैं। वे शिक्षा को गाइड करते है, कल्पना को बढ़ावा देते है और सामूहिक सोच पर असर डालते हैं। द ग्रेट माइग्रेशन धरती पर इंसानी सफर की बुनियाद अफ्रीका की सरजमीं से ही पड़ी, जिसे इतिहास में ‘द ग्रेट माइग्रेशन’ का नाम मिला। वैज्ञानिकों का भी यही मानना है कि इसी महाद्वीप से निकलकर इंसान दुनिया के कोने-कोने में बसे और सभ्यताओं का विस्तार हुआ। मगर वक्त का अजीब फेर देखिए—जिस भूभाग ने पूरी मानव जाति को पहचान दी, वही सदियों तक दुनिया के कागजों पर अपनी सही भौगोलिक पहचान और वास्तविक आकार के लिए संघर्ष करता रहा। अब संयुक्त राष्ट्र महासभा ने एक अहम प्रस्ताव को हरी झंडी दी है, जो दुनिया के सामने देशों और महाद्वीपों का बिल्कुल सटीक और यथार्थवादी खाका पेश करेगा। दरअसल, गोल घूमती धरती को किसी सपाट कागज पर हूबहू उतार पाना कभी आसान नहीं रहा। 16वीं सदी में जब तकनीक बेहद सीमित थी, तब 1569 में भूगोलवेत्ता गेरार्डस मर्केटर ने समुद्री जहाजों के रास्ते आसान करने के लिए एक नक्शा तैयार किया। उस दौर के व्यापार और नौवहन के लिए तो वह पैमाना कारगर रहा, लेकिन उसने भूगोल की सच्चाई को हमेशा के लिए उलझा दिया। ध्रुवों के पास वाले इलाके विशाल दिखने लगे और भूमध्य रेखा के करीब मौजूद अफ्रीका जैसे विशाल महाद्वीप नक्शे पर सिमट कर रह गए। कारोबार की सहूलियत के लिए बना वही खाका धीरे-धीरे देशों के आत्मसम्मान और उनकी अस्मिता की लड़ाई बन गया। अफ्रीकी मुल्क टोगो ने इस गैर-बराबरी को वैश्विक मंच पर मुखरता से उठाया, क्योंकि किसी भी समाज के लिए नक्शा सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि उसकी पहचान का आईना होता है। किसी भी अनजान मुल्क में पैर रखने से पहले इंसान नक्शे की नजर से ही उससे नाता जोड़ता है, और सही पहचान के साथ इस सफर को महसूस करने का अपना एक अलग गौरव है। भारत ने क्या शर्त लगाई भारत ने इस प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया है। लेकिन भारत ने साथ ही साफ किया है कि इसका मतलब किसी एक खास वर्ल्ड मैप को मंजूरी देना नहीं है। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि इस प्रस्ताव का देशों की सीमाओं, विवादित इलाकों या जगहों के नाम से कोई लेना देना नहीं है। भारत ने यह भी साफ़ किया है कि भारत का क्षेत्र जिसमें जम्मू कश्मीर और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश भी शामिल है, उसे भारत के आधिकारिक नक्शे के मुताबिक ही दिखाया जाना चाहिए। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि भारत की सीमा या क्षेत्र को गलत या भ्रामक तरीके से दिखाना भारत को मंज़ूर नहीं है। और भारत ने साफ़ कहा है कि अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को लेकर उसका रुख बिल्कुल स्पष्ट है। इस मुद्दे पर भारत ना तो अपना रुख बदलेगा और ना ही कोई समझौता करेगा। तो बेसिकली भारत ने यूएन के इस प्रस्ताव का समर्थन तो किया है लेकिन अपनी सीमा औरसंप्रभुता को लेकर अपना रुख बिल्कुल साफ और गैर समझौतावादी रखा है।
कर्नाटक में सूखाग्रस्त तालुकों की घोषणा में भेदभाव, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ने राज्य सरकार पर लगाया भेदभाव का आरोप
सागर जहरीली शराब कांड: अस्पताल में 84 बीमार लोगों का इलाज जारी, 30 आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज
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जयपुर में गरजे ओवैसी, मस्जिदों पर कार्रवाई से लेकर बुनियादी मुद्दों तक BJP को घेरा; हनुमान बेनीवाल के साथ दिखी नई जुगलबंदी
दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में इमारत गिरने की घटना पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने गहरा दुख व्यक्त किया है। उन्होंने शोक संतप्त परिवारों के प्रति संवेदना जताई और घायलों के जल्द स्वस्थ होने की कामना की।
शिवसेना प्रवक्ता राजू वाघमारे ने पीएम मोदी के 'नाराज फूफा' वाले बयान का समर्थन करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री की होमियोपैथी वाली टिप्पणी जेन-जी के लिए नहीं, बल्कि विपक्ष के लिए थी। उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी का काम दूसरों के कंधे पर बंदूक रखकर सरकार पर निशाना साधना है और उनकी स्थिति 'मेरी सूरत ही ऐसी है' वाली कहावत जैसी है।
बचपन का सपना हुआ साकार, इंजीनियर आर्यन मलिक बने लेफ्टिनेंट
भारतीय सेना में अधिकारी बनकर आर्यन ने बढ़ाया परिवार, गांव और क्षेत्र का गौरव; बधाई देने के लिए घर पहुंच रहे ग्रामीण
प्रधानमंत्री मोदी करीब 13 साल बाद SRCC पहुंचे। उन्होंने कार्यक्रम स्थल तक पहुंचने के लिए मेट्रो की यात्रा भी की। वर्ष 2013 में वह गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में इसी कॉलेज में आए थे। अपने संबोधन में उन्होंने उस पुराने दौरे को याद करते हुए तब और अब के भारत की आर्थिक स्थिति की तुलना की।
पीएम मोदी के जन्मदिन पर गुजरात में एक महीने तक चलेगा 'सेवा समर्पण' अभियान, रविवार को हुआ कार्यशाला का आयोजन
सोना चार हजार रुपए और चांदी आठ हजार रुपए सस्ती हुई
नई दिल्ली, सोने और चांदी में इस हफ्ते बड़ी गिरावट देखने को मिली, जिससे दोनों कीमती धातुओं का दाम क्रमश: 4,000 रुपए और 8,000 रुपए से अधिक घट गया।
सागर जहरीली शराब कांड: सीएम मोहन यादव ने दिए कार्रवाई के निर्देश, बोले- 'सरकार बर्दाश्त नहीं करेगी ऐसी घटनाएं'
'मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के लिए संकटमोचक थे सुदिव्य सोनू', मंत्री के निधन पर कांग्रेस और झामुमो नेताओं ने जताया दुख
उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन आज से दो दिवसीय असम दौरे पर
उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन रविवार को दो दिवसीय असम दौरे पर जाएंगे, जहां वह एक शैक्षणिक संस्थान के स्वर्ण जयंती समारोह, एक विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह और एक नागरिक अभिनंदन कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे।
हाईकोर्ट में बड़े बदलाव : केंद्र ने 8 राज्यों में नए चीफ जस्टिस नियुक्त किए
केंद्र सरकार ने देश के आठ हाईकोर्ट में नए मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति की है
गुजरात भर के 40 शिक्षकों को 'राज्य के सर्वश्रेष्ठ शिक्षक' पुरस्कार से सम्मानित किया गया
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उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन 6 सितंबर से दो दिवसीय असम दौरे पर, कई कार्यक्रमों में लेंगे हिस्सा
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कांग्रेस ने शनिवार को बड़ा संगठनात्मक बदलाव करते हुए कई राज्यों के लिए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) के नए प्रभारी नियुक्त किए हैं
'दिमागी नक्सल वो होम्योपैथिक गोली जिसने सबको बाहर निकाल दिया, पीएम मोदी का विपक्ष पर तंज
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‘कानून और संविधान का उल्लंघन,' सहारनपुर में मस्जिद गिराए जाने पर विपक्षी दलों ने जताया एतराज
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संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया के नए नक्शे को दी मंजूरी
संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) ने एक ऐसे नए नक्शे को अपनाने के पक्ष में वोट किया है, जो धरती के महाद्वीपों का बिल्कुल सही आकार दिखाता है. इस प्रस्ताव के खिलाफ सिर्फ अमेरिका ने वोट किया
तमिलनाडु : मुख्यमंत्री विजय ने छात्रों के निर्माण और सामाजिक प्रगति में शिक्षकों की भूमिका की सराहना की
उत्तर प्रदेश 2027: चुनावी बिसात और बदलते समीकरण
उत्तर प्रदेश की राजनीति को भारतीय लोकतंत्र का हृदयस्थल माना जाता है। दिल्ली की गद्दी का रास्ता लखनऊ के गलियारों से होकर गुजरता है, यही कारण है कि देश के इस सबसे बड़े सूबे में होने वाली हर छोटी-बड़ी राजनीतिक हलचल का असर राष्ट्रीय फलक पर साफ दिखाई देता है। वर्ष 2026 की समाप्ति के करीब आते ही और 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट के साथ उत्तर प्रदेश में राजनीतिक दलों के बीच शह-मात का खेल पूरी तरह से शुरू हो चुका है। लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजों ने सूबे की राजनीतिक जमीन को जो नई शक्ल दी थी, उसके बाद हर दल अपनी रणनीतियों को धार देने में जुटा है। एक तरफ जहां भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) लगातार तीसरी बार उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज होकर इतिहास रचने की कवायद में जुटी है, वहीं दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी अपने 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के सहारे दस साल के सत्ता के वनवास को खत्म करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। इस बार का चुनाव केवल पारंपरिक नारों या वादों पर आधारित नहीं रहने वाला, बल्कि यह जमीन पर रची जा रही नई सामाजिक और गठबंधन राजनीति की प्रयोगशाला बनने जा रहा है। इस राजनीतिक उठापटक और नए समीकरणों के निर्माण के बीच हाल ही में लखनऊ से एक बेहद महत्वपूर्ण और रणनीतिक खबर सामने आई, जिसने राज्य के सियासी हलकों में नई बहस छेड़ दी है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तथा कॉकरोच जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता आशुतोष रांका के बीच लखनऊ में लगभग 90 मिनट यानी डेढ़ घंटे तक चली बंद कमरे की मैराथन मुलाकात ने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है। इस मुलाकात के मायने केवल एक शिष्टाचार भेंट तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह 2027 के महासमर से पहले उत्तर प्रदेश की युवा और छात्र राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है। आशुतोष रांका और अखिलेश यादव के बीच हुई इस चर्चा के केंद्र में मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के नौजवानों के मुद्दे, लगातार होती परीक्षाओं के पेपर लीक, बेरोजगारी, छात्रों की समस्याएं और उच्च शिक्षा में आ रही गिरावट जैसे विषय शामिल रहे। इसे भी पढ़ें: Uttar Pradesh BJP Regional Team 2027 | यूपी बीजेपी ने सभी छह क्षेत्रों की नई टीमों का किया ऐलान, सामाजिक समीकरण साधने पर जोर | Full List पार्टी के भीतर और बाहर इस मुलाकात को 'प्लान 2027' के एक अहम हिस्से के रूप में देखा जा रहा है। दरअसल, उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया और बेहद जागरूक मतदाता वर्ग तैयार हो चुका है, जिसे राजनीतिक विश्लेषक 'जेन-जी' या पहली बार मतदान करने वाले युवा कहते हैं। यह युवा वर्ग पारंपरिक जातिगत राजनीति से ऊपर उठकर रोजगार, निष्पक्ष परीक्षाओं और आधुनिक अवसरों की मांग कर रहा है। अखिलेश यादव बखूबी जानते हैं कि केवल पारंपरिक मुस्लिम-यादव समीकरण या केवल सामान्य गठबंधनों के बूते भाजपा जैसी विशाल और साधन-संपन्न चुनावी मशीनरी को मात देना असंभव है। यही वजह है कि लोकसभा चुनाव में मिली सफलता के बाद सपा अब छोटे-छोटे वैचारिक समूहों, छात्र संगठनों और युवाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले चेहरों को अपने पाले में लाकर भाजपा के उस युवा वोट बैंक में सेंध लगाना चाहती है, जो कभी भगवा दल की सबसे बड़ी ताकत हुआ करता था। रांका और अखिलेश यादव की यह मुलाकात इस बात की तस्दीक करती है कि विपक्ष इस बार युवाओं के आक्रोश को एक ठोस राजनीतिक वोट बैंक में बदलने की मुकम्मल तैयारी कर चुका है। हालांकि, इस मुलाकात पर भाजपा ने भी फौरन तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। भाजपा प्रवक्ताओं का कहना है कि विपक्ष के पास कोई ठोस नीति या विकास का एजेंडा नहीं है, इसलिए वह केवल भ्रम फैलाने और छोटे-छोटे संगठनों के सहारे अपनी डूबती नैया बचाने का प्रयास कर रहा है। लेकिन राजनीति के जानकार इसे अलग नजरिए से देखते हैं। उनका मानना है कि उत्तर प्रदेश में जब भी कोई बड़ा सत्ता परिवर्तन हुआ है, उसके मूल में युवाओं और छात्रों का आंदोलन या उनका असंतोष ही रहा है। ऐसे में सीजेपी जैसी युवा केंद्रित ताकतों और सपा का करीब आना भविष्य के एक नए और बड़े सामाजिक-राजनैतिक मोर्चे की बुनियाद रख सकता है। यदि हम उत्तर प्रदेश की समूची राजनैतिक बिसात पर नजर डालें, तो इस समय सबसे बड़ा टकराव नैरेटिव यानी विमर्श गढ़ने को लेकर चल रहा है। समाजवादी पार्टी ने इस बार 'आरक्षण' और 'संविधान' को अपनी राजनीति के केंद्र में रख दिया है। 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष को 'संविधान बचाओ' के नारे से जो अप्रत्याशित लाभ मिला था, अखिलेश यादव उसे 2027 तक कायम रखना चाहते हैं। हालिया महीनों में उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरियों में आरक्षण की स्थिति, 69000 शिक्षक भर्ती का विवाद और पिछड़े-दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व को लेकर सपा ने एक आक्रामक रुख अख्तियार किया है। अखिलेश यादव लगातार जनसभाओं और सोशल मीडिया के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास कर रहे हैं कि वर्तमान सत्ताधारी दल दलितों और पिछड़ों के संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करने की साजिश रच रहा है। इस नैरेटिव के जरिए सपा सीधे तौर पर भाजपा के गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित वोट बैंक पर निशाना साध रही है, जिसने पिछले एक दशक से भाजपा की जीत में रीढ़ की हड्डी का काम किया है। सपा की इस रणनीति के जवाब में भारतीय जनता पार्टी भी खामोश नहीं बैठी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा ने अपनी संगठन मशीनरी को पूरी तरह से चुनावी मोड में डाल दिया है। भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका पन्ना प्रमुख और बूथ स्तर का ढांचा माना जाता है। पार्टी ने इस बार कागजी दावों को खारिज करते हुए हर एक बूथ कमेटी का भौतिक सत्यापन शुरू किया है। खासकर उन बूथों पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है, जहां पिछले चुनाव में विपक्ष को बढ़त मिली थी। इसके साथ ही, भाजपा सरकार अपनी कानून-व्यवस्था की सख्त छवि, बुनियादी ढांचे का विकास (जैसे एक्सप्रेसवे और औद्योगिक गलियारे) और केंद्र व राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों के एक बड़े नेटवर्क के भरोसे मैदान में उतर रही है। भाजपा का मानना है कि विकास और सुशासन का उनका यह 'डबल इंजन' मॉडल विपक्ष के जातिगत ध्रुवीकरण के प्रयासों को विफल कर देगा। लेकिन इस बार एनडीए गठबंधन के भीतर की आंतरिक खींचतान भी पूरी तरह सतह पर आ चुकी है। गठबंधन में शामिल छोटे दल जैसे निषाद पार्टी के डॉ. संजय निषाद, अपना दल (सोनेलाल) की अनुप्रिया पटेल और सुभासपा के ओम प्रकाश राजभर अपनी राजनीतिक जमीन बचाने और सीटों के सम्मानजनक बंटवारे के लिए भाजपा पर लगातार दबाव बना रहे हैं। हाल ही में एक सार्वजनिक मंच पर निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद के भावुक होने और आंसुओं के छलकने की घटना ने उत्तर प्रदेश की सियासत में भारी उबाल ला दिया था। जहां संजय निषाद ने इसे अपने समाज को हक न मिल पाने की पीड़ा बताया, वहीं अखिलेश यादव ने तुरंत इस पर तंज कसते हुए इसे भाजपा के साथ जाने का 'पश्चाताप और प्रायश्चित' करार दे दिया। यह घटना दर्शाती है कि निषाद और अन्य अति-पिछड़ी जातियों के वोट बैंक को लेकर दोनों पक्षों में कितनी जबर्दस्त रस्साकशी चल रही है। अखिलेश यादव ने साफ कर दिया है कि निषाद समाज भी उनके 'PDA' का एक अभिन्न हिस्सा है और यदि उनकी सरकार आती है, तो वे जातीय जनगणना कराकर हर समाज को उसका वास्तविक हक देंगे। दूसरी तरफ, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच का 'इंडिया' गठबंधन भी एक नाजुक मोड़ पर खड़ा है। यद्यपि अखिलेश यादव और कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने बार-बार यह दोहराया है कि 2027 का विधानसभा चुनाव दोनों दल मिलकर लड़ेंगे, लेकिन जमीनी स्तर पर सीटों के बंटवारे और प्रादेशिक नेतृत्व को लेकर दोनों दलों के स्थानीय नेताओं के बीच महत्वाकांक्षाओं का टकराव साफ दिखाई देता है। कांग्रेस जहां लोकसभा चुनाव के उत्साह के बाद उत्तर प्रदेश में अपने पुराने गौरव को हासिल करने के लिए अधिक सीटों की मांग कर रही है, वहीं समाजवादी पार्टी खुद को बड़े भाई की भूमिका में रखते हुए कांग्रेस को सीमित सीटों पर समेटने की रणनीति बना रही है। इसके अतिरिक्त, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती की खामोशी और उनकी अंदरूनी बैठकें भी इस त्रिकोणीय मुकाबले को और दिलचस्प बना रही हैं। मायावती अपने खिसकते दलित वोट बैंक को सहेजने के लिए नए सिरे से कैडर कैंप आयोजित कर रही हैं। यदि बसपा अपने पारंपरिक वोट को बचाने में सफल रहती है, तो इसका सीधा नुकसान सपा-कांग्रेस गठबंधन को उठाना पड़ सकता है, जिससे अंततः भाजपा को लाभ होने की संभावना बढ़ जाएगी। सियासत के इस खेल में शह और मात के मोहरे बिछ चुके हैं। जनता शांत है, लेकिन वह हर दल की चालों को बहुत बारीकी से देख रही है। रोजगार की तलाश में भटकता युवा, महंगाई से जूझता आम नागरिक और अपने अधिकारों के प्रति सजग होता जातियों का समूह ही अंततः यह तय करेगा कि 2027 में लखनऊ के सिंहासन पर किसका राजतिलक होगा। फिलहाल, राजनैतिक दलों की यह सरगर्मी और रणनीतिक मुलाकातों का दौर यह बताने के लिए काफी है कि उत्तर प्रदेश का आगामी चुनावी संग्राम बेहद रोमांचक, अप्रत्याशित और भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होने जा रहा है। - अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार
कॅरियर की अंधी दौड़ में हांफती युवा पीढ़ी!
भारत युवाओं का देश है। जाहिर है ऐसे देश की चिंताएं बहुत अलग होती हैं। उसकी ज्यादातर आबादी को शिक्षा, रोजगार और सुंदर जीवन की कामना होती है। उनकी महत्वाकाक्षाएं, अवसरों की होड़ और दौड़। पाने की खुशी और न मिलने का आक्रोश सब साझा होते हैं। करियर में सफल होने, जल्दी और ज्यादा पाने की कामनाएं इस दौर का मूल्य हैं। ऐसे में शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों को गहरी चुनौती है। संकट के बादल गहरे हैं। समाधान के सूत्र न्यूनतम। बदलती कार्य संस्कृति सरकारों में नौकरियों के दरवाजे सिकुड़ रहे हैं। ज्यादातर नौकरियां निजी क्षेत्रों में ही हैं। नौ से पांच बजे की पक्की नौकरियां अब स्वप्न ही हैं। उनकी जगह गिग इकोनामी (फ्री लांस, कांट्रैक्ट वर्क) ने ले ली है। आर्थिक स्वतंत्रता की तो छोड़िए यह माडल भविष्य की अनिश्चितता और वित्तीय अस्थिरता भी ला रहा है, जिसके नाते बढ़ता मानसिक तनाव और अवसाद संकट को गहरा कर रहा है। हिंदुस्तान अलग तरह से चलता रहा है। परिवार इसकी प्राणवायु रहे हैं। परिवार का कोई एक आदमी नौकरी पर रहता था, शेष अपने घर-इलाके-गांव में बैठकर स्थानीय स्तर पर जो कर सकते थे करते थे। परिवार की छाया में सुरक्षा थी, संरक्षण था, बच्चों को संस्कारित करने के पारिवारिक उपक्रम थे। नई व्यवस्था ने एक परिवार में कई परिवार खड़े कर दिए हैं। इससे एक की जगह अब चार परिवार, चार चूल्हे और चार व्यवस्थाएं खड़ी करनी पड़ रही है। आप कितना भी कमा रहे हैं वह कम ही है। इसने नई पीढ़ी को ईएमआई के दुष्चक्र में फंसा कर नई व्यवस्थाओं का गुलाम बना दिया है। परिवार व्यवस्था भारत की संस्कृति का आधार रही है। वह संस्कारशाला भी है। इसे भी पढ़ें: तेजी से बदल रही है भारत की तस्वीर कार्य और जीवन का संतुलन कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने हमारे सामने नई चुनौतियां पेश की हैं। वे बेहतर सहायक से ज्यादा तनाव के वाहक हैं। युवाओं में एआई के कारण नौकरियां जाने और खुद के अप्रासंगिक हो जाने का भय बैठ गया है। वे इस पूरे दृश्य को बहुत चिंता से देख रहे हैं। री-स्किलिंग का दबाव उन्हें गहरे भय में डाल रहा है। इससे मानसिक थकान होना स्वाभाविक ही है। इस समय सबसे बड़ी चिंता कार्य और जीवन संतुलन की है। वर्क फ्राम होम और डिजिटल कनेक्टिविटी ने सारा कुछ बदलकर रख दिया है। काम के घंटे अब प्रायः 24 घंटे ही हैं। देर रात तक ई-मेल, रिर्पोट्स और मैसेज का जवाब देते हुए युवा ‘आलवेज आन’ मोड में रहते हैं। जिससे पारिवारिक जीवन, व्यक्तिगत समय और नींद सब प्रभावित हो रही है। बर्नआउट की बढ़ती दर, काम के अनिश्चित घंटे, स्पर्धा का वातावरण और टारगेट पूरे करने का दबाव साथ चलता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन(डब्लूएचओ) ने बर्नआउट को प्रोफेशनल बीमारी मान लिया है। यह अब भारतीय कारपोरेट जगत में एक अनिवार्य समस्या बन गयी है। सोशल मीडिया से बनती छवियां सोशल मीडिया ने समाज में अलग तरह की स्पर्धा की छवियां प्रस्तुत की हैं। अपने सुखद, आनंद के क्षणों को वायरल करने की बीमारी दूसरे की पीड़ा का कारण बन जाती है। किसी की बड़ी पदस्थापना, उसकी पार्टियां, रील्स, पर्यटन की तस्वीरें, महंगी जीवनशैली का विज्ञापन करना, सफलताओं के हाईलाइट्स देखकर तुलना और स्पर्धा की बातें तेज होती हैं। इससे हीनभावना और तनाव का जन्म भी होता है। परिजन और बच्चे भी अपने पालकों से ऐसी ही जीवन शैली की अपेक्षा करते हैं। ऐसे समय में युवाओं के लिए तनाव प्रबंधन की विधियां समझने और उन्हें जीवन की ठोस सच्चाइयों से जोड़ने की जरूरत है। योग, ध्यान के अनेक अभ्यास जीवन में शांति ला सकते हैं। जिंदगी के हमारे दृष्टिकोण में परिवर्तन ला सकते हैं। रील्स की तुरंतवादी जीवनशैली और जीवन के सतत संघर्ष को समझने की जरुरत है।सोशल मीडिया से प्रक्षेपित हो रही छवियों से प्रभावित होने के बजाए, लोगों के संघर्ष और उससे उपजी सफलताओं के पाठ भी पढ़े जाने चाहिए। उद्यमिता और उसके जोखिम नए समय ने युवाओं को उद्यमिता के गुर दिए हैं। यह पीढ़ी जोखिम उठाने और सफलताओं के नए शिखर छूने वाली पीढ़ी है। इसके मंत्र अलग हैं। वे जल्दी से सफलताओं के नए क्षितिज को छूना चाहते हैं। छू भी रहे हैं। कम आयु में उनकी सफलताएं विस्मित करने वाली हैं। उनके स्टार्टअप धूम मचा रहे हैं। सफलता की बड़ी कहानियां लिख रहे हैं। प्रेरित कर रहे हैं। इसके दूसरे पक्ष का विचार भी जरूरी है। हमें पता है कि 90 प्रतिशत से अधिक स्टार्टअप शुरुआती सालों में ही अन्यान्य कारणों से विफल हो जाते हैं। विफलता का डर, निवेशकों का दबाव, फंडिंग का संकट संस्थापकों और शुरुआती कर्मचारियों में मानसिक तनाव पैदा कर ही देता है। इतने बड़े देश में हर साल लाखों युवा हाथ काम मांगने के लिए खड़े हो जाते हैं। उनके पास डिग्रियां भी होती हैं। किंतु वे कौशल युक्त नहीं होते। वे डिग्रीधारी हैं किंतु किसी काम के नहीं हैं। बाजार की जरूरतें अलग हैं, उनके कौशल अलग हैं। ऐसे में बहुत योग्य लोगों को भी अपेक्षित नौकरी नहीं मिल पाती, अच्छे वेतन की तो जाने ही दीजिए। युवाओं के ज्यादातर संकट वास्तविक हैं। वे जानकारी से भरपूर हैं, उनके पास अवसरों का जनतंत्र है। आकांक्षाओं की बाढ़ है। वे सूचनाओं से लदे-फंदे हैं। यह ज्यादा सूचनाएं भी दुख और भ्रम का कारण बन रही हैं। आकांक्षाओं का बड़ा आकाश उतनी ही गहरी निराशा लेकर लाता है। यह साधारण नहीं है कि आईआईटी के विद्यार्थी आत्महत्या कर रहे हैं। ऐसे प्रतिभाशाली विद्यार्थियों का अवसान उनके परिवार,देश और समाज के लिए भी बड़ी क्षति है । परीक्षाओं में मिलती असफलताएं, लीक होते प्रश्नपत्र, परीक्षाओं की नष्ट होती शुचिता, सरकारी- प्रशासनिक तंत्र की कदाचार रोकने की विफलताओं ने युवाओं को गहरी चिंताएं दी हैं। शिक्षा के निजीकरण और उससे उपजे बाजारीकरण ने हालात बहुत बदल दिए हैं। महंगी शिक्षा के लिए परिवार कर्ज में डूब रहे हैं। प्रतिभा पलायन का संकट तो है ही। समाज में यह बात बहुत गहरे पैठ रही है इस देश में प्रतिभाशाली युवाओं की जगह नहीं बची है। यह तथ्य नहीं किंतु गहराई से फैलती धारणा है। आप बिना जुगाड़ के इस व्यवस्था में सफल नहीं हो सकते। किसी राष्ट्र जीवन में ऐसी धारणाएं ठीक नहीं हैं। हमें समझना होगा कि राष्ट्र से हम सबकी सामूहिक आकांक्षाएं,साझे प्रयासों से ही फलीभूत होंगी। भारत की आजादी के आठ दशक अभूतपूर्व प्रगति, एकत्व और जीवंत लोकतंत्र के प्रमाण हैं। हर राष्ट्र जीवन में चुनौतियां होती हैं, उससे जूझकर हम अपने संकटों का हल खोजते हैं। देश की युवा पीढ़ी भी अपने संकटों के बीच इस राष्ट्र जीवन के समक्ष उपस्थित प्रश्नों के ठोस और वाजिब हल जरुर तलाशेगी। युवा शक्ति की तेजस्विता, नवाचारों और आत्मविश्वास को देखकर यह विश्वास सहज ही होता है। - प्रो. संजय द्विवेदी (लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)
China के सैन्य मॉडल की राह पर Pakistan! 50 साल बाद किए बड़े बदलाव, India के लिए क्या हैं मायने?
अब पाकिस्तान भी चीन के सैन्य मॉडल की राह पर चल पड़ा है। करीब पांच दशकों बाद पाकिस्तान ने अपने सैन्य कमांड ढांचे में बड़ा बदलाव करते हुए सेना, नौसेना और वायुसेना के बीच समन्वित कमान को नई दिशा देने की कोशिश की है। इस पुनर्गठन का सबसे बड़ा फायदा फील्ड मार्शल असीम मुनीर को मिलता दिखाई दे रहा है, जिनके हाथों में पाकिस्तान की सैन्य व्यवस्था की ताकत पहले से कहीं अधिक केंद्रित हो सकती है। यह बदलाव केवल प्रशासनिक फेरबदल नहीं, बल्कि पाकिस्तान की सैन्य शक्ति, रणनीतिक हथियारों और युद्धकालीन फैसलों को अधिक केंद्रीकृत करने की व्यापक कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। हम आपको बता दें कि नए कानूनों और संवैधानिक बदलावों के बाद पाकिस्तान में चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज (CDF) की व्यवस्था को मजबूत किया गया है। असीम मुनीर पहले से सेना प्रमुख हैं और अब तीनों सेनाओं यानि थल सेना, नौसेना और वायुसेना, के बीच समन्वित कमान के केंद्र में भी हैं। पुरानी व्यवस्था में ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी का पद तीनों सेनाओं के बीच समन्वय की भूमिका निभाता था, लेकिन नई व्यवस्था में कमान का केंद्र और अधिक स्पष्ट रूप से एक व्यक्ति के आसपास सिमट गया है। इसे भी पढ़ें: SCO के मंच से चीन और पाकिस्तान को एक साथ धोकर मोदी ने दुनिया की वाहवाही लूट ली यही इस बदलाव का सबसे बड़ा संदेश है कि पाकिस्तान की सत्ता व्यवस्था में सेना अब केवल सबसे ताकतवर संस्था नहीं रहना चाहती, बल्कि अपनी ताकत को कानून और संस्थागत ढांचे के जरिए स्थायी रूप देना चाहती है। रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान ने अपने रणनीतिक सैन्य ढांचे को भी नए सिरे से संगठित करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। नेशनल स्ट्रैटेजिक कमांड जैसी व्यवस्था के जरिए परमाणु हथियारों, मिसाइल क्षमताओं और अन्य रणनीतिक संसाधनों की कमान को अधिक केंद्रीकृत करने की कोशिश की जा रही है। इससे पाकिस्तान के सामरिक निर्णयों में सेना की भूमिका और मजबूत होती दिखाई देती है। हम आपको बता दें कि पाकिस्तान का यह नया मॉडल चीन की सैन्य संरचना से भी प्रभावित माना जा रहा है। सेना, नौसेना, वायुसेना, मिसाइल और रणनीतिक क्षमताओं को एकीकृत कमान के तहत लाने की सोच का उद्देश्य युद्ध या संकट की स्थिति में तेज फैसले और संयुक्त सैन्य कार्रवाई बताया जा रहा है। पाकिस्तान लंबे समय से अपनी सैन्य क्षमताओं के आधुनिकीकरण में चीन के साथ सहयोग बढ़ाता रहा है और नया कमांड मॉडल भी उसी व्यापक रणनीतिक दिशा का हिस्सा माना जा रहा है। लेकिन भारत के लिए सवाल यह है कि क्या असीम मुनीर के हाथों में अधिक शक्ति आने से खतरा बढ़ जाएगा? देखा जाए तो इसका जवाब केवल हां या नहीं में नहीं दिया जा सकता। पाकिस्तान की सैन्य संरचना में केंद्रीकरण निश्चित रूप से भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक घटनाक्रम है। एकीकृत कमान से पाकिस्तान सीमित युद्ध, मिसाइल संचालन और बहु-क्षेत्रीय सैन्य अभियानों में बेहतर समन्वय की कोशिश कर सकता है। खासतौर पर भारत की पश्चिमी सीमा के संदर्भ में पाकिस्तान अपनी सैन्य तैयारी को अधिक संगठित करने का प्रयास करेगा। लेकिन पाकिस्तान को यह भ्रम पालने की जरूरत नहीं है कि कमांड स्ट्रक्चर बदलने से जमीन पर उसकी सामरिक वास्तविकता भी बदल जाएगी। भारत के सामने पाकिस्तान की चुनौती केवल हथियारों या पदों की नहीं है। भारत के पास कहीं अधिक व्यापक सैन्य, आर्थिक और तकनीकी क्षमता है। आधुनिक युद्ध केवल सैनिकों और मिसाइलों की संख्या से तय नहीं होते। अर्थव्यवस्था, रक्षा उत्पादन, तकनीक, खुफिया क्षमता, साइबर शक्ति, अंतरिक्ष क्षमता और राजनीतिक स्थिरता, ये सभी युद्ध शक्ति के महत्वपूर्ण आधार हैं। यहीं पाकिस्तान की सबसे बड़ी कमजोरी सामने आती है। एक तरफ पाकिस्तान सैन्य कमान को मजबूत और केंद्रीकृत कर रहा है, दूसरी तरफ उसकी अर्थव्यवस्था लगातार दबाव में है। देश राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक संकट और आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों से जूझता रहा है। बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा जैसे क्षेत्रों में सुरक्षा समस्याएं अलग हैं। ऐसे में केवल सेना प्रमुख के हाथों में अधिक अधिकार देने से पाकिस्तान की मूल समस्याएं समाप्त नहीं हो जाएंगी। यहां एक सवाल यह भी है कि क्या सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण पाकिस्तान की संस्थाओं को और कमजोर करेगा? देखा जाए तो पाकिस्तान का इतिहास बताता है कि वहां सेना और निर्वाचित सरकार के बीच शक्ति संतुलन हमेशा विवाद का विषय रहा है। अब यदि सैन्य कमान, रणनीतिक हथियारों और तीनों सेनाओं के समन्वय की शक्ति एक ही शीर्ष सैन्य नेतृत्व के इर्द-गिर्द केंद्रित होती है, तो नागरिक नियंत्रण को लेकर सवाल और गहरे होंगे। उधर, भारत को इस घटनाक्रम पर नजर जरूर रखनी होगी, हालांकि चिंता की कोई वजह नहीं है। क्योंकि नई कमान व्यवस्था से पाकिस्तान की सैन्य योजनाओं में तेजी और समन्वय आ सकता है, लेकिन भारत की रणनीतिक तैयारी भी अब पुरानी नहीं रही। नई दिल्ली के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पाकिस्तान की किसी भी सैन्य पुनर्संरचना का जवाब बयानबाजी से नहीं, बल्कि बेहतर तैयारी, मजबूत खुफिया तंत्र, आधुनिक तकनीक और निर्णायक सैन्य क्षमता से दिया जाए। असीम मुनीर के हाथों में ज्यादा ताकत आना पाकिस्तान के लिए शक्ति प्रदर्शन हो सकता है, लेकिन भारत के लिए यह एक स्पष्ट संकेत है कि पड़ोसी देश अपनी सैन्य संरचना को नए सिरे से ढाल रहा है। साथ ही पाकिस्तान को भी यह समझ लेना चाहिए कि पदों की ताकत और वास्तविक राष्ट्रीय शक्ति में बड़ा अंतर होता है। सेना प्रमुख को अधिक अधिकार देने से न अर्थव्यवस्था मजबूत होती है, न राजनीतिक संकट खत्म होता है और न ही सैन्य दुस्साहस की कीमत कम हो जाती है। बहरहाल, नई कमान, नया ढांचा और नए पद पाकिस्तान की सैन्य व्यवस्था को बदल सकते हैं, लेकिन दक्षिण एशिया की सामरिक सच्चाई नहीं बदल सकते। भारत तैयार है, सतर्क है और अपनी सुरक्षा के खिलाफ किसी भी चुनौती का जवाब देने की क्षमता रखता है। नीरज कुमार दुबे
जीवन की राह में ज्ञान का दीप जलाते हैं शिक्षक
विश्वभर में लगभग सभी महापुरूषों ने शिक्षकों को राष्ट्र निर्माता की संज्ञा दी है। गुरू रूपी इन्हीं शिक्षकों को सम्मान देने के लिए प्रतिवर्ष 5 सितम्बर को ‘शिक्षक दिवस’ मनाया जाता है। यह एकमात्र ऐसा दिन है, जब छात्र अपने शिक्षकों अर्थात् गुरुओं को उपहार देते हैं। पहले जहां गुरूकुल परम्परा हुआ करती थी और उस समय जीवन की व्यावहारिक शिक्षाएं इन्हीं गुरूकुल में गुरु दिया करते थे, आज नए जमाने में गुरूओं का वही अहम कार्य शिक्षक पूरा कर रहे हैं, जो छात्रों के सच्चे मार्गदर्शक बनकर उन्हें स्कूल से लेकर कॉलेज तक वह शिक्षा देते हैं, जो उन्हें जीवन में बुलंदियों तक पहुंचाने में सहायक बनती है। आज भले ही शिक्षा प्राप्त करने या ज्ञानोपार्जन के लिए अनेक तकनीकी साधन सुलभ हैं किन्तु एक अच्छे शिक्षक की कमी कोई पूरी नहीं कर सकता। जिस प्रकार एक अच्छा शिल्पकार किसी भी पत्थर को तराशकर उसे खूबसूरत रूप दे सकता है और एक कुम्हार गीली मिट्टी को सही आकार प्रदान कर सही आकार के खूबसूरत बर्तन बनाता है, समाज में वही भूमिका एक शिक्षक अदा करता है, इसीलिए शिक्षक को समाज के असली शिल्पकार का भी दर्जा दिया जाता है। इतिहास ऐसे शिक्षकों के उदाहरणों से भरा पड़ा है, जिन्होंने अपनी शिक्षा से अनेक लोगों के जीवन की दिशा ही बदल दी। भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति एवं द्वितीय राष्ट्रपति डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस के अवसर पर भारत में प्रतिवर्ष 5 सितम्बर को शिक्षकों के प्रति सम्मान प्रकट करने के उद्देश्य से शिक्षक दिवस मनाया जाता है। 13 मई 1962 को राधाकृष्णन देश के राष्ट्रपति बने और उसी वर्ष उनके कुछ छात्र उनका जन्मदिन मनाने के उद्देश्य से उनके पास गए तो उन्होंने उन छात्रों को परामर्श दिया कि उनके जन्मदिन को अध्यापन के प्रति उनके समर्पण के लिए ‘शिक्षक दिवस’ के रूप में मनाया जाए और इस प्रकार 5 सितम्बर 1962 से ही देश में यह दिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। 5 सितम्बर 1888 को एक निर्धन ब्राह्मण परिवार में जन्मे डा. राधाकृष्णन ने अपने जीवनकाल के 40 वर्ष एक आदर्श शिक्षक के रूप में समर्पित कर दिए। मद्रास प्रेसीडेंसी कॉलेज से शिक्षा ग्रहण करने के बाद उन्होंने मैसूर यूनिवर्सिटी, कलकत्ता यूनिवर्सिटी तथा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्यापन किया और लंदन में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में भी दर्शन शास्त्र पढ़ाया। 1931 में किंग जॉर्ज पंचम ने उन्हें नाइटहुड की उपाधि प्रदान की किन्तु उन्होंने देश की आजादी के बाद अपने नाम के साथ ‘सर’ लगाना बंद कर दिया। राधाकृष्णन 1947 से 1949 तक संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य रहे और 1954 में उन्हें ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया। 1962 में ब्रिटिश अकादमी का सदस्य बनने पर उन्हें गोल्डन स्पर, इंग्लैंड के ‘ऑर्डर ऑफ मैरिट’ तथा 1975 में मरणोपरांत अमेरिकी सरकार द्वारा ‘टेम्पलटन पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। डा. राधाकृष्णन एक महान् दार्शनिक और आदर्श शिक्षक होने के साथ-साथ राजनीति में भी प्रवीण थे। इसे भी पढ़ें: Teachers Day 2026: जानिए Teachers Day का इतिहास, महत्व और देश के निर्माण में शिक्षकों का Role दर्शन शास्त्र जैसे गंभीर विषय को भी डा. राधाकृष्णन अपनी अद्भुत शैली से बेहद सरल और रोचक बना देते थे। जिस विषय का वे अध्यापन करते थे, पहले स्वयं उसका गहन अध्ययन करते थे। डा. राधाकृष्णन अपने व्याख्यानों के साथ-साथ विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से छात्रों को उच्च नैतिक मूल्यों को अपने आचरण में समाहित करने के लिए प्रेरित कर उनका बेहतर मार्गदर्शन भी करते थे। उनका कहना था कि हमें अपने शिक्षकों का सम्मान करना चाहिए क्योंकि शिक्षक के बिना इस दुनिया में हम सभी अधूरे हैं। शिक्षक ही हैं, जो देश के भविष्य के वास्तविक आकृतिकार हैं और हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते हैं। राधाकृष्णन का कहना था कि हमें मानवता को उन नैतिक जड़ों तक वापस ले जाना चाहिए, जहां से अनुशासन और स्वतंत्रता दोनों का उद्गम हो। उनका कथन स्पष्ट था कि जब तक शिक्षक शिक्षा के प्रति समर्पित और प्रतिबद्ध नहीं होगा और शिक्षा को एक मिशन के रूप में नहीं अपनाएगा, तब तक अच्छी और उद्देश्यपूर्ण शिक्षा की कल्पना नहीं की जा सकती। आज के दौर में अभिभावकों की सबसे बड़ी चिंता अक्सर यह रहती है कि उनका बच्चा पढ़ाई में अव्वल आए, प्रतिष्ठित संस्थान में प्रवेश पाए और आगे चलकर डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक या प्रशासनिक अधिकारी बने। निसंदेह जीवन में सफलता, उत्कृष्ट शिक्षा और व्यावसायिक उपलब्धियां महत्वपूर्ण हैं लेकिन केवल ऊंचे पद और बड़ी डिग्रियां किसी व्यक्ति को महान नहीं बनाती। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य बच्चे को सफल बनाने के साथ-साथ उसे एक संवेदनशील, विवेकशील, जिम्मेदार और अच्छा इंसान बनाना भी होना चाहिए। यदि ज्ञान के साथ संस्कार, चरित्र और मानवीय मूल्यों का विकास नहीं हुआ तो ऐसी शिक्षा अधूरी ही मानी जाएगी। हर बच्चे को नैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, व्यावहारिक और आध्यात्मिक मूल्यों से जुड़ी शिक्षा मिलनी चाहिए ताकि वह जीवन की कठिन परिस्थितियों में सही और गलत के बीच अंतर कर सके तथा अपने विवेक से बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय लेने में सक्षम बने। शिक्षा ऐसी हो, जो केवल प्रतियोगिता में आगे बढ़ने की क्षमता न दे बल्कि सहयोग, सहानुभूति, अनुशासन, ईमानदारी, सहिष्णुता और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना भी विकसित करे। यही गुण आगे चलकर परिवार, समाज और राष्ट्र को मजबूत बनाते हैं। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का शिक्षा-दर्शन भी इसी व्यापक दृष्टिकोण पर आधारित था। उनका विश्वास था कि सही शिक्षा व्यक्ति के चरित्र का निर्माण कर समाज की अनेक बुराइयों को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इसलिए शिक्षक दिवस केवल शिक्षकों के सम्मान का अवसर नहीं बल्कि शिक्षा के उद्देश्य पर आत्ममंथन का दिन भी है। उनके आदर्शों, शिक्षाओं और जीवन-मूल्यों को अपनाकर ही हम ऐसी पीढ़ी तैयार कर सकते हैं, जो ज्ञानवान होने के साथ संस्कारित, संवेदनशील और शांतिपूर्ण समाज के निर्माण में सक्रिय योगदान दे। - योगेश कुमार गोयल (लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)
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'देश में कानून का राज, अब न्याय मिलेगा,' दिशा सालियान केस पर भाजपा विधायक का बयान
पालघर, 3 सितंबर (आईएएनएस)। महाराष्ट्र की सियासत में दिशा सालियान केस की सीबीआई जांच को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। इस मामले को लेकर वसई-विरार की भाजपा विधायक स्नेहा दुबे पंडित ने कहा कि न्याय व्यवस्था पर उन्हें पूरा भरोसा है और यह फैसला दिशा सालियान को न्याय दिलाने की दिशा में बड़ा कदम है।
संवैधानिक अधिकारियों के इस्तीफे पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र से मांगा जवाब
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प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही: केवल सिंह ढिल्लों
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कश्मीरी पंडितों को धमकी पर शिवसेना सख्त, कहा- सुरक्षा सुनिश्चित करे उमर सरकार
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'मैं इन युवाओं के साथ खड़ा हूं', बिहार छात्र आंदोलन के घायलों से मिले राहुल गांधी
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राम मंदिर ट्रस्ट के सीईओ के तौर पर जितेंद्र मिश्रा की नियुक्ति पर एनडीए नेता बोले-'ऑपरेशन सिंदूर संभाला था, पारदर्शिता लाएंगे'
उत्तरप्रदेश की आध्यात्मिक राजधानी अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण भारतीय राजनीति के सबसे लंबे और निर्णायक अध्यायों में से एक रहा है। इस मंदिर आंदोलन ने भारतीय राजनीति की दिशा बदली, भाजपा को राष्ट्रीय सत्ता के केंद्र तक पहुंचाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई और अंततः 22 जनवरी 2024 को रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा के साथ आंदोलन का सबसे बड़ा प्रतीकात्मक लक्ष्य पूरा हुआ। लेकिन इतिहास का दिलचस्प मोड़ यह है कि मंदिर बनने के बाद असली प्रशासनिक चुनौती शुरू हुई है, जिसके दृष्टिगत 2 सितंबर 2026 को श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने सेवानिवृत्त एयर मार्शल जितेंद्र कुमार मिश्र को अपना पहला पूर्णकालिक CEO नियुक्त किया। इसलिए मिश्र की नियुक्ति के पीछे छिपे महत्वपूर्ण प्रशासनिक व सियासी संदेश को समझना होगा। इसे भी पढ़ें: Operation Sindoor से अयोध्या तक: कौन है राम मंदिर ट्रस्ट के नए CEO एयर मार्शल जीतेंद्र मिश्रा, क्या होगी जिम्मेदारी मसलन, लगभग 5,585 आवेदनों में से बहुस्तरीय चयन प्रक्रिया के बाद तीन नामों के पैनल में से उनका चयन हुआ। मिश्र अप्रैल 2026 में भारतीय वायुसेना के पश्चिमी वायु कमान के प्रमुख पद से सेवानिवृत्त हुए थे और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उनकी भूमिका के कारण राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित रहे। सवाल इसलिए बड़ा है कि राम मंदिर जैसे धार्मिक-सांस्कृतिक संस्थान का CEO एक पूर्व शीर्ष सैन्य कमांडर ही क्यों? और उससे भी बड़ा सवाल यह कि क्या यह सिर्फ प्रशासनिक नियुक्ति है या अयोध्या के लिए तैयार किए जा रहे किसी बड़े संस्थागत मॉडल का संकेत? मेरे अनुभवजन्य आकलन में इसके कम-से-कम सात बड़े प्रशासनिक व सियासी संदेश हैं, जो इसप्रकार हैं:- पहला, राम मंदिर अब ‘आंदोलन’ नहीं, ‘सुव्यवस्थित संस्थान’ है: राम मंदिर आंदोलन के समय सबसे बड़ी आवश्यकता राजनीतिक-सामाजिक लामबंदी की थी, जबकि मंदिर निर्माण के बाद आवश्यकता बदल गई है। अब करोड़ों श्रद्धालुओं की व्यवस्था, दर्शन प्रणाली, सुरक्षा, दान, वित्त, कर्मचारियों, तकनीक, निर्माण, यातायात और अंतरराष्ट्रीय धार्मिक पर्यटन का प्रबंधन करना है। इसलिए CEO की नियुक्ति मूलतः इस बात की घोषणा है कि राम मंदिर अब केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि एक विशाल संस्थागत व्यवस्था है। खासकर यह परिवर्तन भाजपा और संघ परिवार के लिए भी महत्वपूर्ण है। जिस राम मंदिर ने राजनीतिक आंदोलन को ऊर्जा दी, वही मंदिर अब शासन और प्रशासन की क्षमता की परीक्षा का केंद्र बनने जा रहा है। दूसरा, ‘संत-आधारित प्रबंधन’ से ‘प्रोफेशनल मैनेजमेंट’ की ओर अग्रसर है: राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की मूल प्रकृति धार्मिक-सामाजिक है। लेकिन मंदिर के बढ़ते आकार और महत्व के साथ केवल पारंपरिक न्यास व्यवस्था पर्याप्त नहीं रह सकती। शायद CEO का पद बनाना इसी बदलाव का संकेत है। और CEO के लिए पूर्व एयर मार्शल का चयन और भी स्पष्ट संदेश देता है कि- संस्था को अब कॉरपोरेट-जैसी प्रशासनिक दक्षता, सैन्य-जैसी अनुशासनात्मक क्षमता और आधुनिक प्रबंधन की आवश्यकता महसूस हो रही है। मिश्र के चयन की प्रक्रिया भी असाधारण थी—5,585 आवेदन, 1,580 योग्य/उपयुक्त उम्मीदवार, 108 ऑनलाइन इंटरैक्शन, 16 आमने-सामने के उम्मीदवार और अंततः तीन नामों का पैनल। चयन समिति ने नेतृत्व, प्रबंधन अनुभव, ईमानदारी और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय महत्व की संस्था को संचालित करने की दृष्टि जैसे पहलुओं का मूल्यांकन किया। अर्थात संदेश साफ है कि अब राम मंदिर के प्रशासन में ‘कौन है?’ से ज्यादा महत्वपूर्ण ‘क्या कर सकता है?’ होने जा रहा है। तीसरा, ऑपरेशन सिंदूर से अयोध्या तक ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ से ‘राष्ट्रीय संस्कृति’ का सेतु है यह निर्णय: जितेंद्र मिश्र की नियुक्ति का सबसे प्रतीकात्मक पक्ष यही है कि जिस अधिकारी ने पश्चिमी वायु कमान का नेतृत्व किया और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सैन्य अभियानों की कमान से जुड़े रहे, वही अब राम मंदिर के प्रशासन का नेतृत्व करेंगे। उन्हें सर्वोत्तम युद्ध सेवा पदक से भी सम्मानित किया गया है। इसका अर्थ निकालने में सावधानी जरूरी है। यह कहना जल्दबाजी होगी कि सरकार या ट्रस्ट ने जानबूझकर ‘राष्ट्रीय सुरक्षा मॉडल’ को मंदिर प्रशासन में उतारने का निर्णय लिया है। लेकिन प्रतीकात्मक अर्थ को नकारना भी मुश्किल है। सीमा की रक्षा करने वाले सैन्य कमांडर से लेकर देश की सांस्कृतिक अस्मिता के सबसे बड़े प्रतीक के प्रबंधन तक की यात्रा— अपने आप में एक शक्तिशाली राजनीतिक प्रतीक है। यह संदेश भी पढ़ा जा सकता है कि अयोध्या को अब केवल धार्मिक नगर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय महत्व के सांस्कृतिक-सुरक्षा परिसर के रूप में विकसित करने की तैयारी है। चौथा, चढ़ावा विवाद के बाद ‘विश्वास’ की पुनर्स्थापना होगी: इस नियुक्ति के समय को सबसे अधिक गंभीरता से देखना होगा। राम मंदिर के चढ़ावे से जुड़े कथित वित्तीय अनियमितता मामले में गिरफ्तारियां हुईं और ट्रस्ट के प्रशासन पर सवाल उठे। हालिया ट्रस्ट बैठक में चढ़ावे की गिनती में मानवीय हस्तक्षेप घटाने के लिए तकनीक आधारित प्रणाली पर भी विचार किया गया। IIT और बैंकों से प्रस्ताव लिए जाने की खबर है। ऐसे समय में एक अत्यंत वरिष्ठ, गैर-राजनीतिक और अनुशासनप्रिय सैन्य अधिकारी को CEO बनाना एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि अब मंदिर प्रशासन में विश्वास केवल धार्मिक प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि संस्थागत पारदर्शिता से भी अर्जित करना होगा। लेकिन यहां राजनीतिक ईमानदारी जरूरी है। मिश्र की नियुक्ति को सीधे चढ़ावा विवाद का परिणाम कहना उपलब्ध तथ्यों से सिद्ध नहीं है। CEO चयन की प्रक्रिया जुलाई में शुरू हो चुकी थी और लगभग दो महीने चली। फिर भी दोनों घटनाओं का समय एक साथ आने से यह स्पष्ट है कि ट्रस्ट अपने प्रशासनिक ढांचे को अधिक मजबूत और जवाबदेह बनाने की दिशा में बढ़ रहा है। पांचवां, क्या RSS-BJP-VHP की पारंपरिक भूमिका बदल रही है?: यही वह सवाल है जिस पर सबसे ज्यादा राजनीतिक बहस होगी। राम मंदिर आंदोलन की राजनीतिक-सामाजिक धुरी में भाजपा के साथ RSS और विश्व हिंदू परिषद की भूमिका ऐतिहासिक रही है। अब जब मंदिर का संचालन एक पूर्व एयर मार्शल को सौंपा जा रहा है, तो क्या इसका अर्थ है कि पुराने राजनीतिक-सामाजिक नेटवर्क पर भरोसा कम हो रहा है? कांग्रेस नेता भूपेश बघेल ने इसी दिशा में राजनीतिक आरोप लगाया है कि भाजपा-RSS से जुड़े लोगों पर भरोसा कम होने के कारण सेना के अधिकारी को जिम्मेदारी दी गई। लेकिन इस आरोप को तथ्य नहीं, राजनीतिक व्याख्या के रूप में देखना चाहिए। दूसरी व्याख्या ज्यादा व्यावहारिक हो सकती है। वह यह कि RSS और VHP आंदोलन चला सकते हैं, वैचारिक-सामाजिक आधार दे सकते हैं, लेकिन प्रतिदिन लाखों श्रद्धालुओं, हजारों कर्मचारियों, वित्तीय प्रणालियों, तकनीकी ढांचे और सुरक्षा-समन्वय को चलाने के लिए अलग तरह की विशेषज्ञता चाहिए। इसलिए संभव है कि यह RSS/BJP से दूरी नहीं, बल्कि कार्य-विभाजन का नया चरण हो। छठा, मोदी मॉडल के बाद अब ‘अयोध्या मॉडल’ की परीक्षा का वक्त: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक विमर्श में राम मंदिर केवल धार्मिक मुद्दा नहीं रहा; वह सांस्कृतिक पुनर्जागरण, विरासत और विकास की राजनीति से भी जुड़ा रहा है। अब अयोध्या को विश्वस्तरीय धार्मिक-सांस्कृतिक शहर बनाने की चुनौती सामने है। यही वह जगह है जहां ‘अयोध्या मॉडल’ की परीक्षा होगी। क्या अयोध्या विश्वस्तरीय तीर्थ व्यवस्था बना पाएगी? वह करोड़ों श्रद्धालुओं को सुरक्षित दर्शन करा पाएगी? वह दान और वित्तीय व्यवस्था में पारदर्शिता स्थापित करेगी? वह स्थानीय नागरिकों के हितों की रक्षा करेगी? वह धार्मिक पर्यटन से रोजगार पैदा करेगी? वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की सांस्कृतिक छवि मजबूत करेगी? अगर इन सवालों का उत्तर सकारात्मक मिलता है तो राम मंदिर भाजपा के लिए केवल राजनीतिक प्रतीक नहीं रहेगा। वह प्रशासनिक सफलता का मॉडल भी बन सकता है। सातवां, 2027 की उत्तर प्रदेश राजनीति में अयोध्या का नया अर्थ कैसे समझाया जाएगा: यह सबसे बड़ा संदेश है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव सामने है। ऐसे समय में अयोध्या का राजनीतिक महत्व कम नहीं हुआ है, बल्कि उसकी प्रकृति बदल गई है। 2017 और 2022 की राजनीति में राम मंदिर मुख्यतः निर्माण और आस्था के सवाल से जुड़ा था। हालांकि, अब सवाल बदल गया है—वह यह कि राम मंदिर बनने के बाद अयोध्या कैसी बनी? यही प्रश्न 2027 के राजनीतिक विमर्श में महत्वपूर्ण हो सकता है। अगर अयोध्या में विश्वस्तरीय सुविधाएं, रोजगार, पर्यटन, बेहतर परिवहन और सुरक्षित तीर्थ व्यवस्था दिखाई देती है तो भाजपा इसे अपने विकास और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के संयुक्त मॉडल के रूप में प्रस्तुत कर सकती है। लेकिन यदि स्थानीय विस्थापन, महंगाई, यातायात, भीड़, पर्यावरण, प्रशासनिक भ्रष्टाचार या वित्तीय विवाद जैसे मुद्दे उभरते हैं तो विपक्ष को नया राजनीतिक हथियार मिल सकता है। इसलिए CEO की नियुक्ति का अप्रत्यक्ष चुनावी अर्थ भी है। अब राम मंदिर केवल भाजपा की वैचारिक पूंजी नहीं, बल्कि उसका प्रशासनिक प्रदर्शन भी राजनीतिक पूंजी बन सकता है। आठवां, ट्रस्ट का सामूहिक पुनर्गठन: गत 2 सितंबर की बैठक में केवल CEO नियुक्त नहीं किया गया, बल्कि तीन नए ट्रस्टियों—महेश भगचंदका, मदन मोहन पांडेय और निर्मला यादव—की नियुक्ति भी हुई। सबकी प्रमुख जिम्मेदारियों में फेरबदल हुआ और वित्तीय मामलों तथा दान प्रबंधन को लेकर भी महत्वपूर्ण फैसले किए गए। इसलिए इसे किसी एक पद की नियुक्ति कहना उचित नहीं होगा। यह राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के दूसरे चरण के पुनर्गठन जैसा दिखाई देता है। पहला चरण था—मंदिर निर्माण, और दूसरा चरण है—मंदिर संचालन। और तीसरा चरण संभवतः होगा—अयोध्या को वैश्विक धार्मिक-सांस्कृतिक केंद्र बनाना। और जितेंद्र मिश्र इसी दूसरे चरण के प्रमुख प्रशासक बनने जा रहे हैं। नौवां, मोदी, RSS और योगी के लिए इन नियुक्तियों के अलग-अलग अर्थ: देखा जाए तो इन महत्वपूर्ण नियुक्तियों के मोदी, RSS और योगी—तीनों के लिए अलग-अलग अर्थ हैं, जिसके दृष्टिगत इस नियुक्ति को तीन राजनीतिक स्तरों पर पढ़ा जा सकता है। जहां मोदी के लिए यह प्रशासनिक दक्षता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को जोड़ने का अवसर है। वहीं, RSS के लिए यह आंदोलन की वैचारिक सफलता के बाद संस्था को टिकाऊ और पेशेवर बनाने की चुनौती है। वहीं, उत्तर प्रदेश सरकार के लिए यह अयोध्या को केवल धार्मिक नगर नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े पर्यटन और सांस्कृतिक-आर्थिक केंद्रों में बदलने की परीक्षा है। और यहीं पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। दसवां, ट्रस्ट स्वतंत्र धार्मिक न्यास है, उसका CEO सीधे राज्य सरकार का अधिकारी नहीं है: अब भले ही ट्रस्ट स्वतंत्र धार्मिक न्यास है और उसका CEO सीधे राज्य सरकार का अधिकारी नहीं है। इसलिए दोनों के बीच अधिकार-क्षेत्र अलग हैं। लेकिन अयोध्या की सड़क, परिवहन, पुलिस, कानून-व्यवस्था, नगर विकास, पर्यटन और नागरिक सुविधाएं राज्य सरकार से जुड़ी हैं। इसलिए CEO और उत्तर प्रदेश प्रशासन के बीच समन्वय अयोध्या मॉडल की सफलता की निर्णायक शर्त होगा। ग्यारहवां, राम मंदिर आंदोलन व मंदिर निर्माण मुहिम की असली परीक्षा अब हुई शुरू : कहना न होगा कि जिस राम मंदिर आंदोलन ने भारतीय राजनीति को बदल दिया और मंदिर निर्माण ने आंदोलन को ऐतिहासिक उपलब्धि में बदला, उसकी असली परीक्षा अब शुरू हुई है। क्योंकि प्रशासन इस उपलब्धि को संस्थागत स्थायित्व में बदलने की कोशिश कर रहा है। एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र की नियुक्ति इसी परिवर्तन का सबसे बड़ा संकेत है। लेकिन उनकी सैन्य वर्दी की चमक से ज्यादा महत्वपूर्ण होगा उनका प्रशासनिक परिणाम। वह यह कि वे कितनी पारदर्शिता ला पाते हैं? दान व्यवस्था कितनी विश्वसनीय बनती है?श्रद्धालुओं को कितनी बेहतर सुविधाएं मिलती हैं? स्थानीय लोगों को अयोध्या के विकास में कितना हिस्सा मिलता है? ट्रस्ट कितना स्वायत्त और जवाबदेह रहता है? अंततोगत्वा, महत्वपूर्ण संदेश यह कि क्या राम मंदिर की भव्यता के साथ उसकी प्रशासनिक विश्वसनीयता भी उतनी ही भव्य बन पाएगी? यही वह प्रश्न है जो आने वाले वर्षों में राम मंदिर की राजनीतिक विरासत तय करेगा। क्योंकि अब राम मंदिर का सवाल केवल यह नहीं है कि “रामलला का मंदिर कितना भव्य है?” बल्कि मौलिक सवाल यह है कि “रामलला के मंदिर की व्यवस्था कितनी आदर्श है?” और शायद यही कारण है कि एक पूर्व एयर मार्शल को मंदिर का पहला CEO बनाया गया है। राम मंदिर आंदोलन ने सत्ता को बदलने का काम किया था; अब राम मंदिर का प्रशासन यह तय करेगा कि वह भारतीय संस्थागत संस्कृति को कितना बदल पाता है। यहीं से अयोध्या की राजनीति का अगला अध्याय शुरू होता है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
राष्ट्रीय आत्मविश्वास को मजबूत करता जीएसएलवी-एफ17 का प्रक्षेपण
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) जल्द ही जीएसएलवी-एफ 17 लॉन्च करके एक बड़ी उपलब्धि हासिल करने वाला है। यह मिशन अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट ईओएस-05 (जिसे पहले जीआई सैट-1ए कहा जाता था) को अंतरिक्ष में ले जाएगा। ईओएस-05 एक अत्याधुनिक इमेजिंग सैटेलाइट है जिसे आपदाओं के समय तेज़ी से तस्वीरें लेने के लिए बनाया गया है। इसरो ने ही इस स्पेसक्राफ्ट को विकसित किया है और इसका लॉन्च के समय वज़न 2,367 किलोग्राम होगा। ईओएस-05/जीआई सैट-1ए उस कमी को पूरा करेगा जो 2021 में ईओएस-03/जीआई सैट-1 के लॉन्च में आई रुकावट के कारण पैदा हुई थी। जीएसएलवी-एफ 10 मिशन इसके क्रायोजेनिक अपर स्टेज में तकनीकी खराबी के कारण विफल हो गया था। हालांकि लिफ्ट-ऑफ के बाद पहला और दूसरा स्टेज सामान्य रूप से काम कर रहे थे, लेकिन तीसरे स्टेज का क्रायोजेनिक इंजन चालू नहीं हो पाया, जिससे ईओएस-03 सैटेलाइट का नुकसान हो गया। इसरो का नया आत्मविश्वास इसरो के चेयरमैन डॉ. वी. नारायणन के अनुसार, ईओएस-05 सैटेलाइट पृथ्वी से लगभग 36,000 किलोमीटर ऊपर स्थित होकर पूरे देश की लगातार निगरानी करेगा। पीएसएलवी रॉकेट की लगातार दो विफलताओं के बाद, इसरो अपने अगले लॉन्च के लिए तैयार है। यह सैटेलाइट ठीक वैसे ही काम करेगा जैसे कोई पर्यवेक्षक ऊँची जगह से पूरे गाँव पर नज़र रखता है। डॉ. नारायणन ने बताया कि इसरो की योजना मार्च 2027 तक सात रॉकेट लॉन्च करने की है, जिसमें गगनयान मिशन (जीआई मिशन) की पहली बिना क्रू वाली उड़ान भी शामिल है। मौजूदा वित्तीय वर्ष के लिए, इसरो का लक्ष्य 12 सैटेलाइट बनाना और आठ रॉकेट लॉन्च करना है। ये मिशन संचार, नेविगेशन, पृथ्वी की निगरानी और वैज्ञानिक अनुसंधान को बेहतर बनाएंगे, साथ ही भविष्य में मानव अंतरिक्ष उड़ान और खोज के लिए आधार भी तैयार करेंगे। लॉन्च की तैयारियां इसरो, जीएसएलवी-एफ 17 लॉन्च के लिए अंतिम तैयारियां पूरी कर रहा है। यह लॉन्च 4 सितंबर 2026 को सुबह 2:55 बजे सतीश धवन स्पेस सेंटर, श्रीहरिकोटा के दूसरे लॉन्च पैड से निर्धारित है। जीएसएलवी-एफ 17 को 29 अगस्त 2026 को रात लगभग 8 बजे दूसरे लॉन्च पैड (एसएलपी) पर ले जाया गया। यह मिशन एक अहम चरण में पहुँच गया है, क्योंकि रॉकेट को टेक-ऑफ से पहले व्हीकल इंटीग्रेशन सेंटर (वीआईसी) से लॉन्च पैड पर ले जाया गया है। इसे भी पढ़ें: ISRO का धमाका, स्पेस में तैनात होगी भारत की तीसरी आंख EOS-05, कांपे चीन-पाकिस्तान यह मिशन ईओएस-05 GEO इमेजिंग सैटेलाइट (जीआई सैट-1ए) को सब-जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में भेजेगा। इस ऑर्बिट का पेरिगी (पृथ्वी के सबसे करीब का बिंदु) 170 किमी और एपोजी (सबसे दूर का बिंदु) 28,934 किमी होगा। 2025 और 2026 की शुरुआत में लगातार दो पीएसएलवी मिशन फेल होने के बाद, इस मिशन पर बारीकी से नज़र रखी जाएगी और इसके हर पहलू की विस्तार से जांच की जाएगी। इसरो पिछले आठ महीनों में कोई सफल रॉकेट लॉन्च नहीं कर पाया है, लेकिन अब एजेंसी एक बड़ी वापसी के लिए तैयार है। इसरो ने गड़बड़ी के कारणों की जांच के लिए लॉन्च रोक दिए थे, जिससे जीएसएलवी-एफ 17/ईओएस-05 मिशन उसके लॉन्च प्रोग्राम में भरोसा बहाल करने का एक अहम मौका बन गया है। उम्मीद है कि यह सैटेलाइट भारत की पृथ्वी की निगरानी, इमेजिंग और डेटा-आधारित गतिविधियों को बेहतर बनाएगा। यह मिशन भारत की अंतरिक्ष-आधारित पृथ्वी अवलोकन क्षमताओं में एक बड़ी प्रगति है और इससे और भी एडवांस्ड सैटेलाइट सिस्टम के विकास में मदद मिलेगी। ईओएस-05 के उद्देश्य ईओएस-05 एक पृथ्वी अवलोकन सैटेलाइट है जिसे जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट से भारतीय उपमहाद्वीप और आसपास के क्षेत्रों की लगभग रियल-टाइम, हाई-टेम्पोरल-रिज़ॉल्यूशन वाली इमेजिंग करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। ईओएस-05 के मुख्य उद्देश्य साफ मौसम (बिना बादलों के) में बार-बार और बड़े इलाके की निगरानी करने पर केंद्रित हैं। सैटेलाइट की मुख्य क्षमताओं और लक्ष्यों में ये शामिल हैं: ईओएस-05 विज़िबल/नियर-इन्फ्रारेड और शॉर्ट-वेव इन्फ्रारेड बैंड में मल्टीस्पेक्ट्रल और हाइपरस्पेक्ट्रल इमेज लेता है। यह लगभग हर पाँच मिनट में चुनिंदा क्षेत्रों और हर तीस मिनट में पूरे भारतीय भू-भाग की इमेज लेता है, और मल्टीस्पेक्ट्रल मोड में लगभग 42 मीटर का स्थानिक रिज़ॉल्यूशन (स्पेशियल रिज़ॉल्यूशन) हासिल करता है। यह सैटेलाइट पृथ्वी के घूमने के साथ एक निश्चित स्थिति बनाए रखते हुए, लगभग 36,000 किमी की जियोसिंक्रोनस ऊंचाई से लगातार निगरानी करने में सक्षम बनाता है। यह कॉन्फ़िगरेशन एक ही बड़े इलाके को लगातार या लगभग लगातार कवर करता है, जबकि लो-अर्थ-ऑर्बिट इमेजिंग सैटेलाइट्स कुछ खास जगहों के ऊपर से केवल कभी-कभी ही गुज़रते हैं। इन क्षमताओं से जो मुख्य काम किए जा सकते हैं, उनमें ये शामिल हैं: (i) प्राकृतिक आपदाओं और अचानक होने वाली घटनाओं, जैसे चक्रवात, बाढ़, जंगल की आग, बादल फटने और आंधी-तूफान के लिए तेज़ी से निगरानी और समय रहते चेतावनी देना। (ii) मौसम पर नज़र रखना और पर्यावरण की निगरानी करना। (iii) खेती, वानिकी और प्राकृतिक संसाधनों का आकलन, जिसमें फसल की स्थिति, पेड़-पौधों की सेहत और जल निकायों की निगरानी शामिल है। (iv) रणनीतिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए निगरानी, जिसमें राष्ट्रीय सीमाओं जैसे महत्वपूर्ण इलाकों पर लगातार नज़र रखना शामिल है। जीएसएलवी की जानकारी जीएसएलवी-एफ 17 मिशन इसरो का कुल मिलाकर 103वां और 2026 का दूसरा मिशन है। यह जीएसएलवी मार्क I और II के लिए 19वां और साल का पहला मिशन है। जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल एक एक्सपेंडेबल लॉन्च सिस्टम है, जो जीएसएलवी मार्क III से अलग है। जीएसएलवी मार्क-I में रूसी क्रायोजेनिक स्टेज का इस्तेमाल किया गया है, जबकि मार्क-II में भारत में बना अपर स्टेज इस्तेमाल होता है; तीसरे स्टेज को छोड़कर दोनों वर्शन का कॉन्फ़िगरेशन एक जैसा है। यह व्हीकल पीएसएलवी के भरोसेमंद पार्ट्स जैसे S125/S139 सॉलिड रॉकेट बूस्टर और विकास इंजन का इस्तेमाल करता है। 18 लॉन्च में से जीएसएलवी को 12 बार सफलता मिली है, जबकि चार बार पूरी तरह और दो बार आंशिक रूप से असफलता का सामना करना पड़ा है, जिससे इसकी सफलता दर 72.2% रही है। 2010 से ऑपरेशनल जीएसएलवी मार्क-II की लागत $47 मिलियन है। इसकी ऊंचाई 51.7 मीटर है, जो मार्क-I की 49.13 मीटर की ऊंचाई से ज़्यादा है। यह रॉकेट लो अर्थ ऑर्बिट में 5,000 किलोग्राम तक और जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में 2,500 किलोग्राम तक पेलोड ले जाने में सक्षम है, जो इसके पिछले वर्शन की तुलना में लगभग 1,000 किलोग्राम ज़्यादा है। यह 7,887 किलोन्यूटन का थ्रस्ट देता है और तीन स्टेज में काम करता है। निष्कर्ष पीएसएलवी रॉकेट की लगातार दो असफलताओं के बाद, इसरो अपने अगले लॉन्च के लिए तैयार है। तकनीकी उद्देश्यों के अलावा, एक सफल मिशन इसरो टीम का आत्मविश्वास काफी बढ़ाएगा और जनता का भरोसा भी मजबूत करेगा। उम्मीद है कि यह सैटेलाइट कई तरह के कामों में मदद करेगा, जैसे मौसम की जानकारी, आपदा की निगरानी (खासकर बाढ़, चक्रवात और जंगल की आग), खेती, वानिकी, और रणनीतिक व राष्ट्रीय सुरक्षा की निगरानी। - प्रोफ़ेसर (डॉ.) डी.के. पांडे विज़िटिंग सीनियर फ़ेलो, सेंटर फ़ॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज़, एडजंक्ट प्रोफ़ेसर, राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय, सलाहकार, एकेडमिक काउंसिल, फ़ॉरेन पॉलिसी स्कूल और GNOIT, पूर्व एसोसिएट डीन, SoB, गलगोटिया विश्वविद्यालय।
आम आदमी पार्टी के गठन का प्रमुख उद्देश्य भ्रष्टाचार से राजनीति को मुक्त करके उसमें शुचिता लाना था। लेकिन क्या आम आदमी पार्टी इस उद्देश्य में सफल रही। पंजाब सरकार पर काबिज आम आदमी पार्टी के रवैये से तो ऐसा नहीं दिख रहा। बल्कि वह पिछली कांग्रेसी सरकार के भ्रष्टाचार की धारा को ही आगे बढ़ाती दिख रही है। यह कहना है कि राज्य के अनाज आपूर्ति घोटाले के व्हिसल ब्लोअर गुरप्रीत सिंह का। गुरप्रीत सिंह का आरोप है कि इन घोटालों से राज्य को हजारों करोड़ का चूना लगा है। इससे हुई कमाई की बंदरबाट राज्य के मंत्रियों और ताकतवर अफसरों के बीच हुई है। बीते अप्रैल में राज्य के बीजेपी प्रमुख सुनील जाखड़ ने भी पंजाब सरकार पर आरोप लगाया था कि अनाज रखने वाली बोरियों की खरीद में भारी घोटाला किया गया है। उन्होंने आरोप लगाया था कि राज्य में 22 रूपए की दर से बोरी मिल रही थी, लेकिन आम आदमी पार्टी सरकार ने उसे तकरीबन दोगुने यानी 43 रूपए 89 पैसे की दर से खरीदा। इस घोटाले की उन्होंने जांच की मांग की थी। हालांकि बीजेपी अभी चुप है, लेकिन आने वाले दिनों में उसकी चुप्पी टूट सकती है। इसे भी पढ़ें: CJP प्रोटेस्ट क्यों हुआ कैंसिल, CJI ने ऐसा क्या कह दिया, PM मोदी से इसका क्या है कनेक्शन? दिल्ली के शराब घोटाले की तर्ज पर उसकी पंजाब सरकार पर अनाज खरीद घोटाले के आरोप लग रहे हैं। वैसे आरोप पुरानी कांग्रेस सरकार पर लगे थे। राज्य में नई सरकार आने के बाद आम आदमी पार्टी की जिम्मेदारी थी कि इसे रोके और उचित कानूनी उपाय करे। लेकिन जिस तरह से इस मामले की अनदेखी राज्य की मौजूदा सरकार कर रही है, उससे लगता नहीं कि वह इस मामले में ईमानदार है। ह्विसल ब्लोअर गुरप्रीत सिंह का कहना है कि इस सिलसिले में वे अधिकारियों और मंत्रियों से कई बार मिले, लेकिन बात कहीं से आगे बढ़ती नहीं दिख रही। राज्य में विधानसभा के चुनाव की उलटी गिनती शुरू होने में देर है। लेकिन जिस तरह अनाज घोटाले को लेकर पंजाब की सरकार को घेरने की कोशिश हो रही है, उसके संकेत साफ हैं। आने वाले विधानसभा चुनावों में पंजाब की भगवंत मान सरकार के लिए इसका जवाब देना आसान नहीं होगा। फिलहाल इस मुद्दे को राज्य के विपक्षी दल तूल देते हुए नजर नहीं आ रहे हैं। लेकिन इसकी गारंटी नहीं है कि आने वाले दिनों में, जब राज्य के विधानसभा चुनाव सिर पर होंगे, विपक्षी दल इस मामले में चुप बैठेंगे। पांच नदियों के प्रदेश पंजाब की ख्याति खेती-किसानी के लिए रही है। यहां की करीब तीन चौथाई आबादी सीधे या फिर परोक्ष रूप से खेती-किसानी से जुड़ी हुई है। जाहिर है कि यहां के लोगों के लिए खेती-किसानी ना सिर्फ जीवन रेखा है, बल्कि भावनात्मक मुद्दा भी है। इसलिए आने वाले दिनों में अगर अनाज घोटाले की तासीर बढ़ने लगे तो हैरत नहीं होनी चाहिए। पंजाब के कृषि उपज घोटाले के तार पिछली कांग्रेस सरकार से जुड़ते हैं। कांग्रेस की सरकार रहते राज्य के खाद्य और आपूर्ति विभाग से जुड़ी निविदाओं में जमकर धांधली हुई थी। इस मामले के तूल पकड़ने के बाद राज्य के विजिलेंस विभाग ने साल 2022 में लुधियाना में एफआईआर दर्ज की थी। इसकी जांच के दौरान कांग्रेसी सरकार के मंत्री रहे भारत भूषण आशु, ठेकेदार तेलू राम समेत खाद्य और आपूर्ति विभाग के कई अधिकारियों की गिरफ्तारी हुई थी। इसी मामले के एक आरोपी जूनियर अधिकारी राकेश सिंगला भगोड़ा घोषित हो चुका है और उसके लिए सीबीआई ने रेड कार्नर नोटिस जारी कर रखा है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि पंजाब की भगवंत मान सरकार पर अनाज घोटाले का आरोप कैसे चस्पा हो रहा है। राज्य को भ्रष्टाचार और नशा मुक्त करने के नारे के साथ सत्ता में आई पंजाब की भगवंत मान सरकार ने दरअसल इस भगोड़े अधिकारी के खिलाफ अब तक कोई ठोस कार्रवाई करती नजर नहीं आ रही है। अव्वल तो होना चाहिए कि टेंडर घोटाले की जांच करके दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होती, लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा है। बल्कि इसकी कड़ी आगे जुड़ती जा रही है। लुधियाना में दर्ज मामले के व्हिसल ब्लोर गुरप्रीत सिंह हैं। उनका आरोप है कि नई सरकार के आने के बाद कहां तक घोटाला रूकता, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। दरअसल पंजाब में कृषि उपज की खरीद भारत सरकार के खाद्य निगम के लिए पंजाब सरकार करती है। इसके लिए उसे प्रति क्विंटल कमीशन मिलता है। असल गड़बड़ी यहीं हैं। गुरप्रीत सिंह का कहना है कि दरअसल असल खरीद कुछ और हो रही है और कागजों पर कुछ और दिखाया जा रहा है। चूंकि हर साल केंद्र सरकार खरीद के लिए निश्चित रकम राज्य को देती है, लिहाजा उसका हर साल वह हिसाब-किताब भी मांगती है। लेकिन दिलचस्प यह है कि साल 2017 में कांग्रेस के सत्ता में आने से लेकर 2022 में आई मान सरकार ने इस बारे में केंद्र को ठीक से हिसाब नहीं दिया है। इसकी वजह से केंद्र सरकार द्वारा इन वर्षों में राज्य को मिले 31 हजार करोड़ रूपए को केंद्र सरकार ने राज्य को कर्ज घोषित कर दिया है। इस कर्ज के एवज में पंजाब सरकार को इसकी दोगुनी रकम चुकानी पड़ेगी। गुरप्रीत सिंह का आरोप है कि कोविड महामारी के बहाने पड़ोसी राज्यों हरियाणा और उत्तर प्रदेश से अनाज की खरीद की गई। इसके लिए करीब साढ़े छह हजार करोड़ की बोगस बिलिंग की गई। फर्जी खरीद बाद में भी हुई। पंजाब में साल 2025 में भारी बाढ़ आई। इस दौरान राज्य में जितने अनाज की पैदावार नहीं हुई, उसकी तुलना में ज्यादा अनाज की राज्य में खरीद की गई। गुरप्रीत सिंह के मुताबिक, इस बार भी पिछले साल यानी 2024 जितने अनाज की खरीद दिखाई गई। दिलचस्प है कि साल 2022 में आपूर्ति घोटाले का मामला दर्ज होने के बाद इस बारे में राज्य सरकार ने खरीददारी की नई नीतियां बनाईं। राज्य ने लेबर कार्टेज एंड ट्रांसपोर्ट पालिसी बनाई। नई नीति की वजह से इस साल राज्य को करीब दो सौ करोड़ का फायदा हुआ। लेकिन अधिकारियों को यह रास नहीं आया, क्योंकि इसमें उनकी कमाई नहीं रही। फिर उन्होंने मिलीभगत करके इस नीति को साल 2024 में बदलकर तकरीबन पुरानी जैसी ही कर दिया। इसकी वजह से राज्य को अनाज खरीद में सालाना सौ करोड़ की चपत लग रही है। पंजाब की मान सरकार पर आरोप लगा है कि साल 2024 में उसने खरीद के लिए टेंडरों में भी हेरफेर किया। गुरप्रीत का आरोप है कि इसके जरिए कुछ चहेते ठेकेदारों को फायदा पहुंचाया गया और उनसे मिली रकम का दिल्ली के 2025 विधानसभा चुनाव में इस्तेमाल किया गया। गुरप्रीत सिंह ने इन सब घोटालों को लेकर सीबीआई की चंडीगढ़ यूनिट से शिकायत करके जांच की मांग की है। हालांकि सीबीआई के हाथ इस सिलसिले में बंधे हैं। क्योंकि इंडी गठबंधन में शामिल सरकारों ने अपने राज्यों में सीबीआई को जांच करने के अधिकार को वापस ले लिया था। दिलचस्प यह है कि टेंडर घोटाला और आपूर्ति घोटाला सामने आने और उसकी जांच होने के बाद प्रवर्तन निदेशालय ने आरोपी और भगोड़े अधिकारी राकेश सिंगला के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उसकी करीब साढ़े बाइस करोड़ की संपत्तियां सील कर रखी हैं। लेकिन राज्य की ओर से जांच आगे नहीं बढ़ रही है। जब केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों ने आंदोलन किया था, उसमें पंजाब के किसान और उनके संगठन बढ़चढ़कर हिस्सा ले रहे थे। देखना यह होगा कि विधानसभा चुनावों के वक्त ये संगठन सामने आते हैं या नहीं। राज्य के अगले विधानसभा चुनाव को लेकर शिरोमणि अकाली दल और बीजेपी में एक बार फिर गलबहियां होने की संभावना बढ़ गई है। यदि ऐसा होता है तो तय मानिए, विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी के लिए अनाज घोटाला वैसा ही सिरदर्द होगा, जैसा दिल्ली विधानसभा चुनाव में शीश महल और शराब घोटाला बना था। उमेश चतुर्वेदी लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं..
असम में चुनाव से पहले बदला सियासी समीकरण! कांग्रेस ने क्यों बनाई अखिलेश गोगोई से दूरी? जानिए अंदर की कहानी
6,000 लीटर यूरिन प्रतिदिन, इंसानी पेशाब अब हिमालय पिघला रहा है, महाप्रलय का अल्टीमेटम
मई 2023, समुद्र तल से करीब 5300 मीटर की ऊंचाई पर खुंबू ग्लेशियर में हाड़ कंपा देने वाली ठंड, लेकिन वहां का नजारा किसी लग्जरी रिजॉर्ट जैसा था। करीब 1600 टेंट, गरजते हुए जनरेटर, एस्प्रेसो मशीन की खनक, बड़ी स्क्रीन वाले टीवी, गर्म पानी के शावर और कालीन बिछे टेंटों में अंडरफ्लोर हीटिंग। लेकिन चकाचौंध की इस भीड़ में एक शख्स हाथ में नोटबुक लिए चुपचाप घूम रहा था। वो न तो टेंट गिन रहा था और न ही एवरेस्ट फतह करने आए पर्वतारोहियों के चेहरे। वो बस एक अजीब सा हिसाब लगा रहा था कि इस बेस कैंप में लोग दिन भर में कितनी बार पेशाब करने जा रहे हैं। नोटबुक थामे इस शख्स का नाम था किमलाल गौतम, नेपाल के चीफ सर्वे ऑफिसर। उस वक्त शायद लोगों को उनका यह काम अजीब लगा होगा, लेकिन तीन साल बाद, जुलाई 2026 में जब उनकी यह गिनती साइंस जर्नल रीजनल एनवायरमेंटल चेंज में छपी, तो पूरी दुनिया के होश उड़ गए। आंकड़ा कहता है कि 2023 के सिर्फ एक क्लाइंबिंग सीजन में इंसानों की पैदा की गई गर्मी ने खुंबू ग्लेशियर की करीब 2,492 टन बर्फ पिघला दी। गौर कीजिए, यह तबाही सूरज की तपिश या मौसम के बदलाव से नहीं हुई, बल्कि कैंप में धुआं फेंकते जनरेटरों, धधकते चूल्हों और सबसे बढ़कर इंसानी शरीर से निकली गर्मी और पेशाब की वजह से हुई। तो अब सवाल सीधा और सनसनीखेज है-क्या इंसान का पेशाब दुनिया के सबसे ऊंचे ग्लेशियर को पिघला रहा है? आइए समझते हैं इस खौफनाक हकीकत की पूरी कहानी। इसे भी पढ़ें: पाकिस्तान से यारी पड़ी इतनी भारी, पुराना कर्ज चुकाने के लिए सऊदी ले रहा 8 अरब डॉलर का लोन क्या बेस कैंप का टॉयलेट बन चुका है टाइम बम? आप जवाब सुनेंगे तो आप हैरान हो जाएंगे क्योंकि इसका जवाब है हां। दरअसल जिन एवरेस्ट को हम एक दुर्गम और वीरान पहाड़ समझते हैं, उसका बेस कैंप अब सिर्फ कैंप नहीं रह गया है। सीजन में यहां पर करीब 2000 लोग आते हैं। पर्वतारोही होते हैं। गाइड, कुक, पोर्टर और डॉक्टर्स तक होते हैं। यानी कि कुछ महीनों के लिए यहां एक पूरा का पूरा मौसमी कस्बा बस जाता है। 2023 में नेपाल ने एवरेस्ट के लिए 478 परमिट जारी किए थे और उस वक्त यह रिकॉर्ड था। लेकिन 2026 में यह रिकॉर्ड भी टूट गया था क्योंकि संख्या पहुंच गई थी करीब 490 परमिट तक और यह नियम के मुताबिक हर विदेशी पर्वतारोही के साथ कम से कम एक नेपाली गाइड भी ऊपर जा रहा था। यानी कि एवरेस्ट का बेस जैसा कि हमने कहा कि वो एक सिर्फ कैंप नहीं रहा। क्या है ग्लेशियर लेक बर्स्ट फ्लड का खौफनाक सच? अब एक नई स्टडी से पता चला है कि इस गतिविधि की वजह से पिघल रहे खुम्बु ग्लेशियर को कितना नुकसान हो रहा है। रिसर्चर्स का अनुमान है कि हर वसंत में लगभग 30 लाख किलोग्राम ग्लेशियर की बर्फ पिघलकर खत्म हो जाती है, क्योंकि ये सुख-सुविधाएं जुटाने में काफी ऊर्जा खर्च होती है। 2023 में बेस कैंप में लगभग 1,600 टेंट में खाना पकाने, हीटिंग और बिजली के लिए 824 सिलेंडर लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG), 18,935 लीटर केरोसिन और 5,130 लीटर गैसोलीन का इस्तेमाल किया गया। सबसे चौंकाने वाली बातों में से एक यह है कि खुम्बु ग्लेशियर में अनुमानित 154 टन बर्फ के पिघलने के लिए इंसानी पेशाब जिम्मेदार है। जियोस्पेशियल साइंटिस्ट और इस स्टडी के मुख्य लेखक तथा नेपाल के चीफ सर्वे ऑफिसर, खिम लाल गौतम ने कहा अगर आप ज़्यादा पानी पीते हैं, तो आपको उसे शरीर से बाहर निकालना ही पड़ता है। उन्होंने ज़्यादा ऊंचाई पर शरीर को हाइड्रेटेड रखने की ज़रूरत का ज़िक्र करते हुए यह बात कही। हज़ारों पर्वतारोही और गाइड रोज़ाना 6,000 लीटर से ज़्यादा कचरा पैदा करते हैं। इसे भी पढ़ें: Strait of Hormuz में अमेरिका का महा-ऑपरेशन! Iran से भारी तनाव के बीच 40 युद्धपोतों ने 1.8 करोड़ बैरल तेल को दिया सुरक्षा कवच इंसानी गतिविधियों से पिघल रही 30 लाख किलो बर्फ! बेस कैंप में बने पिट-वॉल्ट टॉयलेट लगभग 2,000 लोगों का कचरा इकट्ठा करते हैं, जिसे नीचे लाया जाता है, लेकिन ज़्यादातर लोग ग्लेशियर पर ही पेशाब करते हैं, जो आस-पास के समुदायों के लिए पीने के पानी का स्रोत है। गौतम ने कहा, यह देखने के लिए कि हम हर साल कितनी ज़्यादा बर्फ़ खो रहे हैं, आपको वैज्ञानिक होने की ज़रूरत नहीं है। आप इसे अपनी आँखों से भी देख सकते हैं। गौतम 2011 से अब तक एवरेस्ट पर 365 से ज़्यादा दिन बिता चुके हैं। हालाँकि इंसानी पेशाब का असर चिंताजनक है, लेकिन नेपाल के क्लाइमेट साइंटिस्ट और त्रिभुवन यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ. सुदीप ठाकुरि ने कहा कि ये नतीजे कोई हैरानी की बात नहीं थे और हीटिंग, खाना पकाने और रोशनी के लिए इस्तेमाल होने वाले सभी तरह के ईंधन की तुलना में पेशाब का असर आख़िरकार कम ही होता है। इस स्टडी को करने के लिए गौतम ने बेस कैंप ऑपरेटरों से डेटा इकट्ठा किया। वहीं, लुइसियाना में अपने ऑफिस में, स्टडी की को-ऑथर और U.S. जियोलॉजिकल सर्वे की एमरिटस साइंटिस्ट वर्जीनिया बर्केट ने दशकों के सैटेलाइट डेटा को व्यवस्थित करने में मदद की। इस डेटा से ग्लेशियर पर समय के साथ तापमान में बदलाव का पता चलता था। जब गौतम ग्लेशियर पर हो रहे रियल-टाइम बदलावों की जांच कर रहे थे, तो बर्केट उन्हें ये आंकड़े भेजती रहती थीं। यह आसान नहीं था। लो अर्थ ऑर्बिट सैटेलाइट इन्फ्रारेड रेडिएशन या निकलने वाली गर्मी को मापते हैं, लेकिन अगर बादल छाए हों तो वे रीडिंग नहीं ले पाते—और एवरेस्ट पर बादल छाए रहना आम बात है। इसलिए टीम ने 1991 से 2023 तक की हर उस थर्मल इमेज को देखा जिसमें बादल नहीं थे। रिसर्चर्स ने उस दौरान ज़मीन की सतह के तापमान में आए बदलावों को देखा और बेस कैंप के नतीजों की तुलना ग्लेशियर के बर्फ़ीले हिस्से और ग्लेशियर के पास की एक दूसरी जगह से की। उन्होंने कहा कि यह चौंकाने वाला नतीजा था। हमने पाया कि बर्फ़ से ढके इलाके का तापमान बेस कैंप के मुकाबले सिर्फ़ आधा ही बढ़ा। इसे भी पढ़ें: US-Iran Tension के बीच फिर दहला West Asia, $100 के पार पहुंची Crude Oil की कीमतें ग्लेशियर झीलें’ बना लेता है ग्लेशियर के बाकी हिस्सों की तुलना में बेस कैंप का तापमान लगभग दोगुनी तेज़ी से बढ़ा। गौतम चेतावनी देते हैं कि इंसानों का असर इससे भी बुरा हो सकता है, क्योंकि उन्होंने हेलीकॉप्टर, ट्रेकर्स और याक जैसी गर्मी पैदा करने वाली चीज़ों को इसमें शामिल नहीं किया था। हालांकि हिमालय में बड़े पैमाने पर जलवायु परिवर्तन से बदलाव आ रहे हैं, लेकिन 2009 के बाद से एवरेस्ट के ग्लेशियरों में बर्फ पिघलने की दर लगभग दोगुनी हो गई है। और भले ही शरीर से निकलने वाले अपशिष्ट (मल-मूत्र) बर्फ पिघलने पर खाना पकाने जैसी गतिविधियों जितना असर न डालते हों, लेकिन इससे नेपाल की आर्थिक गतिविधियों खासकर पर्वतारोहण और पीने के पानी के स्रोतों, पनबिजली और सिंचाई के लिए खतरा पैदा होता है। गौतम का कहना है कि ग्लेशियर फटने से खतरनाक बाढ़ का भी खतरा है; शुरुआती रिपोर्टों से पता चलता है कि हाल ही में नेपाल और चीन में आई विनाशकारी बाढ़ की वजह यही थी। ऊंचाई पर शोध करने वाले पीटर हैकेट, जो इस अध्ययन में शामिल नहीं थे, कहते हैं कि बर्फ के इस तरह स्थानीय स्तर पर पिघलने से और अधिक हिमस्खलन हो सकते हैं और खतरनाक चढ़ाई और भी खतरनाक हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसका एक ऐसा असर भी है जिसे मापना मुश्किल है। 1981 में अकेले एवरेस्ट की चोटी पर चढ़ने वाले हैकेट ने कहा कि किसी ऊंचे कैंप में पहुँचने, सूर्यास्त के समय क्षितिज की ओर देखने और दर्जनों जमे हुए मल के ढेर देखने से ज़्यादा बुरा कुछ नहीं हो सकता।
'भाजपा सांसद साबित करें वो इस देश के हैं या नहीं', पंजाब की मतदाता सूची से राघव चड्ढा का नाम कटने पर बोला विपक्ष
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दुश्मनों पर अब आसमान से कहर बरपाने की भारत की ताकत और बढ़ गई है। भारतीय वायुसेना ने स्वदेशी लॉन्ग रेंज ग्लाइड बम ‘खगांतक-243’ का सफल परीक्षण किया है। 140 किलोमीटर से अधिक दूरी तक मार करने में सक्षम यह हथियार भारतीय लड़ाकू विमानों को दुश्मन के ठिकानों पर दूर से ही सटीक और घातक हमला करने की क्षमता देगा। भारतीय वायुसेना ने इस उपलब्धि को “Precision. Power. Pride” बताते हुए कहा है कि परीक्षण ने सभी निर्धारित उद्देश्यों को सफलतापूर्वक पूरा किया है। IAF के मुताबिक, यह भारतीय वायुसेना और भारतीय रक्षा उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है और आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया तथा रक्षा नवाचार के जरिए देश की मारक क्षमता को नई ऊंचाई तक पहुंचाने वाला कदम है। क्या है खगांतक-243, जो दुश्मन के लिए बन सकता है नया खतरा? हम आपको बता दें कि खगांतक-243 एक 300 किलोग्राम श्रेणी का एयरबोर्न लॉन्ग रेंज स्टैंड-ऑफ प्रिसिजन गाइडेड ग्लाइड बम है। इसकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि लड़ाकू विमान को लक्ष्य के ठीक ऊपर पहुंचने की जरूरत नहीं पड़ेगी। विमान सुरक्षित दूरी से इस हथियार को छोड़ सकता है और इसके बाद बम अपने पंखों और नियंत्रण सतहों की मदद से लक्ष्य की ओर ग्लाइड करेगा। यानी युद्ध की स्थिति में भारतीय लड़ाकू विमान दुश्मन के मजबूत एयर डिफेंस क्षेत्र में गहराई तक घुसने के जोखिम को कम करते हुए दूर से हमला कर सकते हैं। यही आधुनिक हवाई युद्ध की सबसे बड़ी जरूरत है। यानि दुश्मन पर हमला करो, लेकिन उसकी जवाबी मार की सीमा से बाहर रहो। इसे भी पढ़ें: SCO के मंच से चीन और पाकिस्तान को एक साथ धोकर मोदी ने दुनिया की वाहवाही लूट ली रिपोर्टों के मुताबिक, करीब 12,000 मीटर की ऊंचाई से छोड़े जाने पर खगांतक-243 की रेंज 140 किलोमीटर से अधिक हो सकती है। इसका डिजाइन भी खास है। इसमें एक बेलनाकार बॉडी, बीच में घूमने वाले ग्लाइड विंग और पीछे पांच नियंत्रण सतहें हैं, जो इसे लक्ष्य की दिशा में नियंत्रित करने में मदद करती हैं। 125 किलो विस्फोटक भराव, दुश्मन के ठिकानों पर सटीक प्रहार खगांतक-243 में Mk 81 जनरल-पर्पज ब्लास्ट-फ्रैगमेंटेशन वारहेड लगाया गया है, जिसमें करीब 125 किलोग्राम विस्फोटक भराव है। यह संयोजन इसे महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों, संरचनाओं और अन्य लक्ष्यों के खिलाफ प्रभावी हथियार बना सकता है। इस हथियार श्रेणी की एक और महत्वपूर्ण विशेषता इसका मॉड्यूलर डिजाइन है। यानी भविष्य में मिशन की जरूरत और ग्राहक की मांग के अनुसार अलग-अलग वारहेड और गाइडेंस कॉन्फिगरेशन विकसित किए जा सकते हैं। यही लचीलापन खगांतक श्रेणी को केवल एक हथियार नहीं, बल्कि भविष्य में विकसित होने वाली एक व्यापक प्रिसिजन स्ट्राइक क्षमता का आधार बना सकता है। BEL और JSR Dynamics की स्वदेशी साझेदारी साथ ही खगांतक-243 भारत के रक्षा उद्योग की साझेदारी का भी उदाहरण है। इसे भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) और JSR Dynamics ने मिलकर विकसित किया है। JSR Dynamics ने बम की बॉडी और नियंत्रण प्रणाली विकसित की है, जबकि BEL ने इलेक्ट्रॉनिक्स और गाइडेंस सबसिस्टम उपलब्ध कराए हैं। भारतीय वायुसेना पहले ही BEL को खगांतक-243 म्यूनिशन के लिए ऑर्डर दे चुकी है, हालांकि ऑर्डर की संख्या और अनुबंध की कीमत सार्वजनिक नहीं की गई है। इसका प्रारंभिक फ्लाइट टेस्ट प्लेटफॉर्म Su-30MKI है और भविष्य में इसे वायुसेना के अन्य विमानों के साथ भी एकीकृत किए जाने की संभावना है। चीन और पाक की तुलना में भारत का हथियार कितना मजबूत? यहां एक सवाल उठता है कि क्या चीन और पाकिस्तान के पास भी ऐसे हथियार हैं? इस सवाल का जवाब हां है लेकिन यह भी उल्लेखनीय है कि चीन और पाकिस्तान के पास मौजूद ऐसे हथियारों की अपेक्षा भारत के हथियार गुणवत्ता और मारक क्षमता में कहीं आगे हैं। हम आपको बता दें कि चीन और पाकिस्तान के पास भी स्टैंड-ऑफ प्रिसिजन गाइडेड ग्लाइड हथियार मौजूद हैं, लेकिन खगांतक-243 भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह देश की अपनी स्वदेशी उत्पादन और तकनीकी क्षमता को मजबूत करता है। चीन के पास लंबे समय से LS सीरीज जैसे प्रिसिजन गाइडेड ग्लाइड बम मौजूद हैं। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी में LS परिवार को ऐसे हथियारों के रूप में वर्णित किया गया है, जिनमें पारंपरिक बमों को गाइडेंस और ग्लाइड किट के जरिए स्टैंड-ऑफ प्रिसिजन हथियार में बदला जा सकता है। चीन इस क्षेत्र में लंबे समय से निवेश कर रहा है। इसके अलावा, पाकिस्तान के पास भी H-2 और H-4 Stand-Off Weapons जैसे हथियार उपलब्ध हैं। H-4 की घोषित रेंज लगभग 120 किलोमीटर बताई गई है, हालांकि इसकी क्षमताओं और कॉन्फिगरेशन से जुड़े कई विवरण अलग-अलग रूप में सामने आते रहे हैं। चीन और पाकिस्तान की अपेक्षा भारत के हथियार की विशेषता देखें तो सामने आता है कि भारत तेजी से अपनी स्वदेशी स्टैंड-ऑफ स्ट्राइक क्षमता को मजबूत कर रहा है। खगांतक-243 की 140 किलोमीटर से अधिक की रिपोर्टेड रेंज इसे पाकिस्तान के सार्वजनिक रूप से ज्ञात H-4 की घोषित 120 किमी रेंज से आगे रखती है। बदल जाएंगे सामरिक समीकरण इसके अलावा, खगांतक-243 का सबसे बड़ा रणनीतिक प्रभाव यह हो सकता है कि भारतीय वायुसेना को दूर से सटीक हमला करने का एक और स्वदेशी विकल्प मिलेगा। सीमा के पास तैनात दुश्मन के एयर डिफेंस, सैन्य ठिकाने, लॉजिस्टिक केंद्र और महत्वपूर्ण संरचनाएं भविष्य के संघर्ष में अधिक खतरे में आ सकती हैं। 140 किलोमीटर से अधिक दूरी तक हमला करने की क्षमता का अर्थ है कि लड़ाकू विमान लक्ष्य के ऊपर मंडराए बिना भी प्रहार कर सकता है। इससे विमान और पायलट का जोखिम कम हो सकता है तथा दुश्मन के लिए जवाबी कार्रवाई की चुनौती बढ़ सकती है। देखा जाये तो खगांतक-243 सिर्फ एक नया बम नहीं है। यह उस दिशा में भारत की तेज रफ्तार का संकेत है, जहां युद्ध के मैदान में विदेशी हथियारों पर निर्भरता कम होगी और भारतीय उद्योग सीधे भारत की मारक शक्ति तैयार करेगा। भारतीय वायुसेना का सफल परीक्षण साफ संदेश देता है कि अब भारत सिर्फ दुश्मन की सीमा तक पहुंचने की तैयारी नहीं कर रहा, बल्कि दूर आसमान से सटीक और घातक प्रहार करने की क्षमता को स्वदेशी ताकत के दम पर मजबूत कर रहा है। आने वाले समय में खगांतक-243 जैसे हथियार भारत की हवाई रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं और चीन से लेकर पाकिस्तान तक, दोनों मोर्चों पर भारत की स्टैंड-ऑफ स्ट्राइक क्षमता को नई धार दे सकते हैं। -नीरज कुमार दुबे
अमेरिका, चीन और इजरायल आगे, लेकिन भारत भी बन सकता है वैश्विक एआई पावर: एलेक्स कार्प
चैपल हिल (नॉर्थ कैरोलिना), 3 सितंबर (आईएएनएस)। अमेरिकी सॉफ्टवेयर और डेटा एनालिटिक्स कंपनी पैलेंटिर टेक्नोलॉजीज के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) एलेक्स कार्प ने कहा है कि भारत एक प्रमुख आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) शक्ति के रूप में उभर सकता है। उन्होंने इसके लिए देश की तकनीकी प्रतिभा, ऊर्जा क्षेत्र में की गई पहल और उन्नत एआई मॉडल विकसित करने की क्षमता को प्रमुख कारण बताया।
नई दिल्ली, 3 सितंबर (आईएएनएस)। महानायक उत्तम कुमार की जन्म-शताब्दी के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें श्रद्धांजलि दी है। पीएम मोदी ने कहा कि महानायक उत्तम कुमार की सदाबहार अदाकारी हर पीढ़ी के लोगों को जोड़ती है।
'कर्नाटक को केंद्रीय फंड में अपना हिस्सा मिलना चाहिए', नीति आयोग के उपाध्यक्ष से बोले सीएम शिवकुमार
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लाचित बरफुकन पुलिस अकादमी राष्ट्रीय स्तर के ट्रेनिंग हब के तौर पर उभर रही है: सरमा
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'चुनिंदा लोगों का धन बढ़ रहा, आम आदमी की जेब खाली', जीडीपी ग्रोथ के दावों पर अधीर रंजन चौधरी
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'सीता का चरित्र राम से भी महान था', सीएम शिवकुमार ने सोनिया गांधी के त्याग का दिया उदाहरण
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'इतिहास और संदर्भ को समझने की जरुरत', स्वरा भास्कर पर शाजिया इल्मी का पलटवार
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राजस्थान निकाय चुनाव: भाजपा ने जारी किया 'संकल्प पत्र', बड़ी जीत का किया दावा
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'सरकार मंदिर में धंधा चलाना चाहती है', राम मंदिर सीईओ की नियुक्ति पर भड़के इमरान मसूद
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'कुछ दिनों तक मछली खाने में सावधानी बरतें', नेपाल में आई त्रासदी के बाद बिहार सरकार की लोगों से अपील
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व्हीलचेयर और ₹25,000 की आर्थिक मदद से रागिनी की राह हुई आसान, जल्द लगेगा कृत्रिम पैर: संजय सिंह
1984 के सिख नरसंहार पर भगवंत मान सरकार राजनीति कर रही है : एचएस फूलका
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केपीसीसी प्रमुख हरिप्रसाद ने राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर की निंदा की, बताया- 'गंभीर अन्याय'
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दुनिया जब बुरे दौर में है तब भारत के आर्थिक उजाले
दुनिया आज जिस दौर से गुजर रही है, वह आर्थिक और सामरिक दोनों दृष्टियों से असाधारण चुनौतियों का दौर है। रूस-यूक्रेन युद्ध के प्रभाव, पश्चिम एशिया में तनाव, अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा, वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता, आपूर्ति शृंखला में व्यवधान और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने दुनिया की बड़ी-बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के सामने कठिन प्रश्न खड़े कर दिए हैं। ऐसे समय में भारत की अर्थव्यवस्था ने जिस मजबूती का परिचय दिया है, वह केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं, बल्कि बदलते भारत की सामर्थ्य का प्रमाण है। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में भारत की 7.8 प्रतिशत वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि ने वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में भारत को ऐसी उम्मीद के रूप में प्रस्तुत किया है, जिसकी ओर दुनिया आश्चर्य और विश्वास दोनों के साथ देख रही है। इस विकास दर ने वैश्विक अनिश्चितताओं के दौर में भारत की आर्थिक शक्ति और आत्मविश्वास को नई ऊंचाई दी है एवं एक उजाला बिखेरा है। यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह वृद्धि ऐसे समय दर्ज हुई है, जब परिस्थितियां सामान्य नहीं थीं। महंगाई, ऊर्जा संकट, भू-राजनीतिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में उतार-चढ़ाव के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास पथ मजबूत बना रहा। पिछले वर्ष इसी तिमाही में विकास दर 6.9 प्रतिशत थी। यानी एक वर्ष में आर्थिक वृद्धि की गति में उल्लेखनीय सुधार दिखाई दिया है। घरेलू मांग की मजबूती, सरकारी पूंजीगत व्यय, विनिर्माण, निर्माण और निर्यात जैसे क्षेत्रों का योगदान इस प्रदर्शन के पीछे महत्वपूर्ण रहा है। आर्थिक विकास का वास्तविक अर्थ तभी समझ में आता है, जब उसे उसके वैश्विक संदर्भ में देखा जाए। आज दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं केवल आर्थिक नीतियों से प्रभावित नहीं हो रहीं, बल्कि युद्ध, कूटनीतिक तनाव, ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक संबंध भी उनकी दिशा तय कर रहे हैं। अमेरिका और चीन के बीच आर्थिक एवं रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है। पश्चिम एशिया का तनाव ऊर्जा बाजार और वैश्विक आपूर्ति तंत्र के लिए चिंता पैदा करता है। इन परिस्थितियों में भारत का अपेक्षाकृत तेज आर्थिक विकास यह संकेत देता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था ने अपने लिए ऐसे मजबूत घरेलू आधार तैयार किए हैं, जो बाहरी झटकों को सहने की क्षमता रखते हैं। यही वह परिवर्तन है जो भारत को केवल एक बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक शक्ति बनने की दिशा में आगे ले जा रहा है। भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका विशाल घरेलू बाजार है। करोड़ों उपभोक्ताओं की मांग, बढ़ता मध्यम वर्ग, डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार, बुनियादी ढांचे पर निवेश और बदलती उपभोग संस्कृति ने अर्थव्यवस्था को आंतरिक गति प्रदान की है। जब वैश्विक बाजार अनिश्चित हों, तब घरेलू मांग अर्थव्यवस्था के लिए सुरक्षा-कवच का काम करती है। इसीलिए वर्तमान विकास दर में घरेलू मांग की मजबूती को विशेष महत्व दिया जाना चाहिए। इसे भी पढ़ें: वित्तीय वर्ष 2026-27 की प्रथम तिमाही में आर्थिक विकास दर ने चौंकाया इस आर्थिक प्रदर्शन की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि वृद्धि केवल एक क्षेत्र के सहारे नहीं टिकी है। विनिर्माण क्षेत्र में 9.2 प्रतिशत की वृद्धि इस बात का संकेत है कि भारत धीरे-धीरे उत्पादन आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। लंबे समय तक भारत की अर्थव्यवस्था को मुख्यतः सेवा क्षेत्र की शक्ति के रूप में देखा जाता रहा, लेकिन अब देश में उत्पादन बढ़ाने, घरेलू उद्योगों को प्रोत्साहन देने और बुनियादी ढांचे के विस्तार की दिशा में किए गए प्रयासों से औद्योगिक क्षेत्र के लिए नई संभावनाएं पैदा हुई हैं। निर्माण क्षेत्र भी रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। सड़कें, रेल, बंदरगाह, हवाई अड्डे, आवास, औद्योगिक गलियारे और डिजिटल बुनियादी ढांचे में निवेश का प्रभाव केवल आर्थिक वृद्धि के आंकड़ों में नहीं दिखाई देता, बल्कि उससे भविष्य की आर्थिक क्षमता भी निर्मित होती है। भारत की वर्तमान आर्थिक यात्रा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अपनाई गई नीतियों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पिछले वर्षों में सरकार ने बुनियादी ढांचे, डिजिटल भुगतान, वित्तीय समावेशन, विनिर्माण, नए उद्यम, आत्मनिर्भरता, ऊर्जा सुरक्षा और औपचारिक अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने पर लगातार जोर दिया है। जनधन खातों से लेकर डिजिटल भुगतान तक और राजमार्गों से लेकर रेलवे के आधुनिकीकरण तक, आर्थिक गतिविधियों का एक व्यापक तंत्र तैयार हुआ है। वस्तु एवं सेवा कर ने देश के बड़े बाजार को अधिक एकीकृत करने में भूमिका निभाई है। दिवाला एवं दिवालियापन संहिता जैसी व्यवस्थाओं ने कारोबारी वातावरण को अधिक व्यवस्थित बनाने का प्रयास किया है। उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाओं ने अनेक क्षेत्रों में घरेलू उत्पादन और निवेश को बढ़ावा दिया है। इन नीतियों का वास्तविक मूल्यांकन केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि उनके परिणामों से होना चाहिए। सकल घरेलू उत्पाद के ताजा आंकड़े इस दिशा में एक सकारात्मक संकेत अवश्य देते हैं। आम नागरिक के लिए आर्थिक विकास का अर्थ तभी सार्थक है, जब उसके जीवन में रोजगार के अवसर बढ़ें, आय में वृद्धि हो, महंगाई नियंत्रित रहे, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर हों तथा जीवन की समग्र गुणवत्ता में सुधार आए। सकल घरेलू उत्पाद हमें अर्थव्यवस्था की गति बताता है, लेकिन यह नहीं बताता कि उस विकास का लाभ समाज के विभिन्न वर्गों तक किस प्रकार पहुंच रहा है। इसलिए भारत की अगली चुनौती तेज विकास से आगे बढ़कर गुणवत्तापूर्ण और समावेशी विकास सुनिश्चित करना है। आर्थिक विकास की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी रोजगार है। विनिर्माण और निर्माण क्षेत्र का विस्तार इसलिए आशाजनक है क्योंकि ये बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करने की क्षमता रखते हैं। लेकिन भविष्य में भारत को ऐसे उद्योगों की आवश्यकता होगी, जो बड़ी संख्या में युवाओं को सम्मानजनक और स्थायी रोजगार दे सकें। भारत की युवा आबादी उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। यदि उसे कौशल, शिक्षा, तकनीक और रोजगार के पर्याप्त अवसर मिलते हैं तो यही युवा शक्ति भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने की सबसे बड़ी ऊर्जा बन सकती है। भारत का लक्ष्य केवल आत्मनिर्भर बनना नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में नेतृत्वकारी भूमिका निभाना होना चाहिए। आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया से अलग होना नहीं, बल्कि अपनी क्षमताओं को इतना मजबूत करना है कि भारत वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सके। आज दुनिया चीन के विकल्प के रूप में विभिन्न उत्पादन केंद्रों की तलाश कर रही है। भारत के पास विशाल बाजार, युवा मानव संसाधन, तकनीकी क्षमता और लोकतांत्रिक व्यवस्था जैसी विशिष्ट ताकतें हैं। यदि भारत विनिर्माण, अर्धचालक, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उत्पादन, नवीकरणीय ऊर्जा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष तकनीक और उच्च गुणवत्ता वाली सेवाओं में अपनी क्षमता बढ़ाता है, तो वह वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में कहीं अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा सकता है। 2047 का विकसित भारत केवल सरकार का संकल्प नहीं, बल्कि देशवासियों की सामूहिक आकांक्षा है। 7.8 प्रतिशत की विकास दर इस यात्रा में एक उत्साहजनक पड़ाव है, मंजिल नहीं। भारत को लगातार उच्च विकास दर, मजबूत वित्तीय व्यवस्था और स्थिर आर्थिक वातावरण के साथ-साथ बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि उत्पादकता, कौशल विकास, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा पर भी समान ध्यान देना होगा। भारत की आर्थिक कहानी अब केवल आंकड़ों की कहानी नहीं रह गई है। यह आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और वैश्विक नेतृत्व की कहानी बन रही है। दुनिया जब युद्ध और आर्थिक अस्थिरता की छाया में अपनी दिशा तलाश रही है, तब भारत का मजबूत आर्थिक प्रदर्शन उसे एक भरोसेमंद और संभावनाशील शक्ति के रूप में स्थापित कर रहा है। 7.8 प्रतिशत की विकास दर निश्चित रूप से भारत के लिए गर्व का विषय है। लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि भारत ने यह संदेश दिया है कि वैश्विक संकटों के बीच भी उसकी आर्थिक बुनियाद मजबूत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चल रही आर्थिक नीतियों और योजनाओं को अब अगले चरण में अधिक रोजगार, अधिक निवेश, अधिक उत्पादन और अधिक समान अवसरों से जोड़ना होगा। भारत के आर्थिक आकाश पर उगता यह उजाला तभी स्थायी प्रकाश बनेगा, जब विकास की रोशनी देश के अंतिम व्यक्ति के जीवन तक पहुंचे। यही 2047 के विकसित भारत की वास्तविक कसौटी होगी और यही आर्थिक शक्ति को जनशक्ति में बदलने का मार्ग भी। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
मध्य प्रदेश: 'जनसेवा कनेक्ट' पहल के तहत शिवपुरी में पोस्ट ऑफिस को डिजिटल अपग्रेड मिला
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'7 लाख घरों को पीएनजी कनेक्शन और शहरों में 24 घंटे बिजली', राजस्थान निकाय चुनाव में भाजपा का वादा
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जीडीपी : वृद्धि दर 2.6 प्रतिशत होने पर केंद्र ने किया खारिज
नई दिल्ली, केंद्र सरकार ने बुधवार को उन दावों को खारिज कर दिया, जिसमें दावा किया गया था कि वित्त वर्ष 27 की पहली तिमाही के आंकड़े को अच्छा दिखाने के लिए पिछले साल की पहली तिमाही की चालू जीडीपी के आंकड़े को संशोधित करके 86 लाख करोड़ रुपए से घटाकर 80 लाख करोड़ रुपए कर दिया गया है। अगर ऐसा नहीं किया गया होता तो चालू कीमतों में जीडीपी की ग्रोथ 2.6 प्रतिशत थी।
केटीआर ने कांग्रेस के 1,000 दिनों के कार्यकाल पर हमला बोला, 'चार्जशीट' जारी की
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बिहार के स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार की युवाओं से अपील, 'सिगरेट, गुटखा और शराब छोड़ें, स्वस्थ जीवन अपनाएं'
जी20 की आम सहमति को चीन ने रोका
एशविले, अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने कहा कि चीन ने जी20 वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक गवर्नरों की बैठक में आम सहमति बनने से रोक दिया।
'छात्रों की जीत': सीजेपी के आशुतोष रांका ने राजस्थान के स्कूल की मरम्मत का स्वागत किया
'छात्रों की जीत': सीजेपी के आशुतोष रांका ने राजस्थान के स्कूल की मरम्मत का स्वागत किया
मनोज झा ने राहुल गांधी के 'वोट चोरी' वाले बयान का किया समर्थन, भाजपा बोली-लगा रहे बेबुनियाद आरोप
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CJP प्रोटेस्ट क्यों हुआ कैंसिल, CJI ने ऐसा क्या कह दिया, PM मोदी से इसका क्या है कनेक्शन?
NEET-UG पेपर लीक के विरोध प्रदर्शनों में शामिल लोगों के खिलाफ दर्ज मामलों को जब सुप्रीम कोर्ट ने अपने विशेष अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए रद्द किया, तब अदालत कक्ष में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के बीच एक-दूसरे की सराहना देखने को मिली। यह पार्टी मुख्य न्यायाधीश की एक टिप्पणी के व्यंग्यात्मक जवाब के रूप में अस्तित्व में आई थी। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने यह फैसला दिल्ली पुलिस और चार राज्य सरकारों द्वारा शीर्ष अदालत से संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली विशेष शक्तियों का उपयोग करने की अपील के बाद सुनाया। केंद्र सरकार पर केस वापस लेने के वादे से मुकरने का आरोप लगाते हुए CJP ने 5 सितंबर को एक मार्च निकालने का ऐलान किया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आने के बाद इस विरोध प्रदर्शन को वापस ले लिया गया। क्यों सीजेपी ऐन मौके पर पीछे हट गई और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिक्चर में आ गए। बीजेपी के पीछे हटने का मतलब यह कि उन्होंने 5 सितंबर का अपना विरोध प्रदर्शन वापस ले लिया है। पर जो वजह बताई जा रही है असली बात वही है या फिर कहानी में कुछ ट्विस्ट भी है। सीजेपी का प्रोग्राम था, तारीख भी तय हो चुकी थी। 5 सितंबर की। पर फिर कहानी में यू टर्न आ गया। केंद्र सरकार पीछे हटी तो कॉकरोच जनता पार्टी वाले भी। सीजेपी वालों ने ऐलान किया 5 सितंबर को अब कोई विरोध प्रदर्शन नहीं होगा। बस इसके कुछ ही देर बाद सीन में एंट्री हुई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की। उन्होंने वर्टिकल में कोई इंस्टा पर रील नहीं डाला है। बच्चों से कोई अपील भी नहीं की है। बीजेपी के अंदर से जो खबर आई है वो यह है कि प्रधानमंत्री जेन जी से संवाद करेंगे। इसे भी पढ़ें: नीट प्रदर्शनकारियों पर दर्ज प्राथमिकी रद्द होने पर कॉजपा ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को बताया बड़ी जीत PM मोदी की Gen Z के साथ प्रस्तावित बातचीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 5 सितंबर यानी शिक्षक दिवस पर दिल्ली के श्री राम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स (SRCC) जाने की संभावना है। यह दौरा इसलिए भी अहम है क्योंकि SRCC अपने 100 साल पूरे कर रहा है। न्यूज़ एजेंसी ANI की रिपोर्ट के मुताबिक, मोदी के कॉलेज के शताब्दी समारोह में शामिल होने और छात्रों से बातचीत करने की उम्मीद है। इस प्रस्तावित दौरे का एक अहम हिस्सा मोदी और Gen Z छात्रों के बीच सीधी बातचीत हो सकती है। इस सेशन से छात्रों को प्रधानमंत्री के साथ अपने विचार, उम्मीदें और चिंताएं साझा करने का मौका मिलने की संभावना है। यह बातचीत ऐसे समय में हो रही है जब BJP 'जेन-Z' (Gen Z) तक पहुँचने की कोशिश कर रही है। पार्टी युवाओं से जुड़ने और वोटरों की अगली पीढ़ी के साथ बातचीत को मज़बूत करने के लिए एक खास रणनीति पर काम कर रही है। बीजेपी ने हाल ही में 'जेन ज़ेड' (Gen Z) तक पहुँचने के अपने कार्यक्रम के लिए एक टीम बनाई है। इसका मकसद सीनियर नेताओं और युवा प्रतिनिधियों को एक साथ लाना है। इस पहल का उद्देश्य युवा भारतीयों की उम्मीदों को समझना और बातचीत व भागीदारी के लिए और मौके बनाना है। उम्मीद है कि पार्टी युवाओं के साथ बातचीत को केवल पारंपरिक राजनीतिक कार्यक्रमों तक सीमित रखने के बजाय, सीधे जुड़ने और बातचीत करने पर ध्यान देगी। बीजेपी का युवाओं तक पहुँचने का प्लान HT की पिछली रिपोर्ट के अनुसार, बीजेपी ने 'जेन ज़ी' (Gen Z) तक पहुँचने के लिए एक खास टीम बनाई है। पार्टी नेताओं ने छोटी सभाओं, कैंपस प्रोग्राम और सीधे बातचीत के ज़रिए युवाओं को जोड़ने के तरीकों पर चर्चा की। अगस्त में, बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन ने लोगों तक पहुँचने की योजना पर एक बैठक की। इसमें नेताओं ने कहा कि युवाओं को जोड़ने का काम लगातार चलना चाहिए, न कि यह सिर्फ़ बड़े राजनीतिक कार्यक्रमों तक ही सीमित रहे। पार्टी की युवा रणनीति पर चर्चा के लिए अहम राज्यों जैसे चुनाव वाले उत्तर प्रदेश, पंजाब और गुजरात के करीब 45 नेताओं को भी शामिल किया गया। पार्टी युवाओं के लिए एक अभियान की भी योजना बना रही है, जिसमें बाइक यात्रा, हैकाथॉन, मैराथन, साइकिलिंग इवेंट और इनोवेशन चैलेंज जैसी गतिविधियाँ शामिल होंगी। बीजेपी की युवा शाखा 17 सितंबर को वडनगर-वाराणसी मोटरसाइकिल यात्रा शुरू करने वाली है। पार्टी के 'सेवा पखवाड़ा' में स्कूली छात्रों, कॉलेज जाने वाले युवाओं, पोस्ट-ग्रेजुएट स्कॉलर्स और युवा इनोवेटर्स के लिए कार्यक्रम शामिल होंगे। इसे भी पढ़ें: CJP ने 5 सितंबर का 'Delhi March' वापस लिया, SC में केंद्र के आश्वासन के बाद बड़ा फैसला BJP के लिए Gen Z क्यों अहम है? पिछले महीने, NEET विवाद को लेकर युवाओं के विरोध-प्रदर्शनों ने सरकार को हिलाकर रख दिया था और आखिरकार धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा। बाद में प्रधान ने कहा कि विरोध-प्रदर्शनों के दौरान Gen Z को गुमराह करने की कोशिशें की गई थीं। इन विरोध-प्रदर्शनों में हज़ारों युवा सड़कों पर उतर आए। छात्रों और युवा संगठनों ने पेपर लीक, छात्रों की आत्महत्या और परीक्षा प्रणाली में गड़बड़ियों को लेकर जवाबदेही की मांग की। विरोध-प्रदर्शनों के दौरान 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) की आवाज़ भी प्रमुखता से सुनाई दी। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा कि इन विरोध-प्रदर्शनों से बीजेपी की छवि को नुकसान पहुंचा है और विपक्षी पार्टियों को यह समझना चाहिए कि युवा CJP जैसे समूहों की ओर क्यों आकर्षित हुए। शिक्षा मंत्रालय छोड़ने के बाद, प्रधान ने अगस्त में कहा था कि NEET विरोध-प्रदर्शनों के दौरान कुछ लोगों ने 'जेन ज़ी' (Gen Z) को गुमराह करने की कोशिश की थी। उन्होंने इस विवाद के चलते अपना इस्तीफ़ा देने के फ़ैसले का भी बचाव किया। सीजेपी ने क्यों वापस लिया प्रोटेस्ट 5 सितंबर से फिर आंदोलन शुरू करने वाली कॉकरोच जनता पार्टी ने अब अपने हाथ पीछे खींच लिए। तो सुप्रीम कोर्ट में एक सुनवाई थी। इस बात पर कि स्टूडेंट प्रदर्शन को लेकर देश भर में दर्ज एफआईआर का क्या होगा? सीजीपी की शुरुआत से यह मांग थी कि एक छात्र के खिलाफ भी कारवाई नहीं होनी चाहिए। मोदी सरकार और बीजेपी के लोगों के बीच जिन कुछ बिंदुओं पर सहमति बनी थी और जंतरमंतर वाला प्रोटेस्ट वापस हुआ था उनमें से एक तो यही था। तो देश की सबसे बड़ी अदालत में जब यह मामला गूंजा तो वहां सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि 20 जुलाई से 25 जुलाई के बीच हुए छात्र प्रदर्शनों के संबंध में किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में दर्ज एफआईआर पर आगे कारवाई या जांच नहीं होगी। इन सभी एफआईआर को हर मकसद के लिए बंद माना जाएगा। इसके बाद 5 सितंबर को होने वाले विरोध मार्च को वापस लेने की बात सीजेपी के प्रवक्ता सौरभ दास ने कह दी कि सितंबर 5 को जो हमारा पीसफुल प्रोटेस्ट मार्च था इंडिया गेट से न्यू पुलिस हेड क्वार्टर्स तक वो हम लोग कॉल ऑफ कर रहे हैं क्योंकि हमारे सारे डिमांड्स सरकार ने मान लिया तीन जजों की बेंच कर रही सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई तीन जजों की बेंच कर रही है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत के अलावा बेंच में जस्टिस जॉय मौल्या बागची और जस्टिस बी मोहना भी शामिल है। भारत सरकार का पक्ष रख रहे हैं सॉललीिसिटर जनरल तुषार मेहता। मेहता ने अदालत में कहा कि सिर्फ दिल्ली पुलिस के मामले में केंद्र सरकार ही ने नहीं बल्कि बिहार, असम, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र की राज्य सरकारों ने स्टूडेंट प्रोटेस्ट को लेकर दर्ज सभी एफआईआर रद्द करने की बात मान ली है। बच्चों के लिए हम कितना सोचते हैं। उनका दुख मेरा दुख है। यह अदालत में भी सरकार बता चुकी थी।
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