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अदालतों के जरिए चुनाव रोकने की कोशिश कर रही है वाईएसआaरसीपी : चंद्रबाबू नायडू

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने वाईएसआर कांग्रेस पार्टी पर आरोप लगाया कि वह अदालतों का दरवाजा खटखटाकर चुनाव और विकास कार्यों को रोकने की कोशिश कर रही है।

देशबन्धु 21 Oct 2026 11:45 pm

आंध्र प्रदेश के साथ नए तनाव के बीच, ओडिशा के मंत्री ने कोटिया सीमा विवाद पर कार्रवाई का आश्वासन दिया

आंध्र प्रदेश के साथ नए तनाव के बीच, ओडिशा के मंत्री ने कोटिया सीमा विवाद पर कार्रवाई का आश्वासन दिया

समाचार नामा 21 Oct 2026 10:36 pm

अदालतों के जरिए चुनाव रोकने की कोशिश कर रही है वाईएसआरसीपी : चंद्रबाबू नायडू

अदालतों के जरिए चुनाव रोकने की कोशिश कर रही है वाईएसआरसीपी : चंद्रबाबू नायडू

समाचार नामा 21 Oct 2026 10:36 pm

'सरकारी मदरसों में भी लागू हो एक जैसी नीति', सीएम धामी के फैसले पर वीएचपी प्रवक्ता विनोद बंसल

'सरकारी मदरसों में भी लागू हो एक जैसी नीति', सीएम धामी के फैसले पर वीएचपी प्रवक्ता विनोद बंसल

समाचार नामा 21 Oct 2026 10:18 pm

नशे के खिलाफ मान सरकार ने नहीं की गंभीरता से कार्रवाई, केंद्र करेगा सख्त कार्रवाई : विजय सांपला

नशे के खिलाफ मान सरकार ने नहीं की गंभीरता से कार्रवाई, केंद्र करेगा सख्त कार्रवाई : विजय सांपला

समाचार नामा 21 Oct 2026 8:22 pm

जम्मू-कश्मीर में मेडिकल इंटर्न्स को बड़ी राहत, मासिक वजीफा बढ़कर 25,000 रुपए हुआ

जम्मू-कश्मीर में मेडिकल इंटर्न्स को बड़ी राहत, मासिक वजीफा बढ़कर 25,000 रुपए हुआ

समाचार नामा 21 Oct 2026 8:19 pm

नक्सलवाद से मुक्त होकर विकास का नया अध्याय लिख रहा है छत्तीसगढ़ : विष्णुदेव साय

नक्सलवाद से मुक्त होकर विकास का नया अध्याय लिख रहा है छत्तीसगढ़ : विष्णुदेव साय

समाचार नामा 21 Oct 2026 4:35 pm

सपा घोषणापत्र जारी करने से पहले जनता के सामने अपना रिपोर्ट कार्ड पेश करे : भाजपा

सपा घोषणापत्र जारी करने से पहले जनता के सामने अपना रिपोर्ट कार्ड पेश करे : भाजपा

समाचार नामा 21 Oct 2026 4:27 pm

बर्नस्टीन : निफ्टी का टारगेट घटाकर 25,000 हुआ

मुंबई, ब्रोकरेज फर्म बर्नस्टीन ने निफ्टी के लिए इस साल के अंत तक का टारगेट प्राइस घटाकर 25,000 कर दिया है, जो कि पहले 26,000 था। इसकी वजह अमेरिका से ट्रेड डील पर अनिश्चितता और भारतीय इक्विटी की आय में सुधार को लेकर चिंताएं बने रहना है।

देशबन्धु 21 Oct 2026 3:56 pm

शेयर बाजार में तेजी के बाद बड़ा उलटफेर, सेंसेक्स 1,400 अंक फिसला; निवेशकों को ₹8.78 लाख करोड़ का झटका

दोपहर करीब 1 बजकर 45 मिनट तक बाजार की तस्वीर पूरी तरह बदल गई थी। दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, सेंसेक्स अपने दिन के उच्चतम स्तर से 1,400.41 अंक फिसलकर 73,281.78 अंक पर आ गया। दूसरी ओर, निफ्टी भी अपने दिन के शिखर से 448.65 अंक नीचे आकर 22,672.25 अंक पर कारोबार करता दिखाई दिया।

देशबन्धु 21 Oct 2026 3:33 pm

दशहरा रैली में उद्धव और शिंदे की ताजा भिड़ंत ने बालासाहेब की विरासत की जंग को और भड़का दिया है

महाराष्ट्र की राजनीति में दशहरा पर्व सियासी शक्ति प्रदर्शन और एक-दूसरे पर हमले का बड़ा मौका भी है। मुंबई में इस बार भी यही नजारा दिखा। दादर के शिवाजी पार्क में उद्धव ठाकरे की हुंकार थी, तो गोरेगांव के नेस्को सेंटर में एकनाथ शिंदे का पलटवार था। दोनों नेता एक-दूसरे पर निशाना साध रहे थे, लेकिन उनकी असली नजर महाराष्ट्र की जनता पर थी, जिसे तय करना है कि बालासाहेब ठाकरे की राजनीतिक विरासत का असली वारिस कौन है। इस बार दोनों रैलियों में ‘रिजीम चेंज’ यानी सत्ता परिवर्तन का मुद्दा भी खास रहा। उद्धव ठाकरे ने केंद्र की भाजपा सरकार को हटाने और सत्ता बदलने की खुली हुंकार भरी। उन्होंने युवाओं के विरोध प्रदर्शनों और वोटर लिस्ट में कथित गड़बड़ियों का हवाला देते हुए सवाल उठाया कि जब लोगों को न्याय नहीं मिलेगा, तो वे सत्ता परिवर्तन की मांग क्यों न करें? जवाब में एकनाथ शिंदे ने तंज कसते हुए कहा कि सत्ता में कौन रहेगा, इसका फैसला जनता करती है। उन्होंने उद्धव को याद दिलाया कि उनकी अपनी पार्टी में भी सत्ता और नेतृत्व का बदलाव हो चुका है। दोनों के इन बयानों का सियासी मतलब यह है कि जहां उद्धव महाराष्ट्र की लड़ाई को केंद्र की भाजपा सरकार के खिलाफ व्यापक विपक्षी अभियान से जोड़ना चाहते हैं, वहीं शिंदे सत्ता परिवर्तन की मांग को जनता के फैसले के खिलाफ विपक्ष की बेचैनी बताकर खारिज करना चाहते हैं। साथ ही उद्धव और शिंदे की दशहरा रैली से जो तस्वीर उभरती है वह साफ बताती है कि यह मुकाबला अब महज दो नेताओं की निजी अदावत नहीं रह गया है। इसके केंद्र में हिंदुत्व की परिभाषा, मराठी अस्मिता, किसानों की बदहाली, चुनावी जनादेश और सत्ता की वैधता जैसे सवाल हैं। दोनों खेमे अपनी-अपनी कहानी सुना रहे हैं, लेकिन असली परीक्षा जनता की अदालत में होनी है। इसे भी पढ़ें: एकनाथ शिंदे का उद्धव ठाकरे पर तीखा हमला: 2019 का गठबंधन ‘जनादेश की डकैती’, ‘इंडिया’ गठबंधन को बताया रावण उद्धव ठाकरे का हमला देखा जाये तो शिवाजी पार्क उद्धव ठाकरे के लिए सिर्फ रैली का मैदान नहीं, राजनीतिक विरासत का प्रतीक है। यही वह जमीन है, जहां बालासाहेब ठाकरे ने शिवसेना की आक्रामक राजनीति को आवाज दी थी। उद्धव इसी विरासत के सहारे अपनी लड़ाई को आगे बढ़ा रहे हैं। उनका संदेश था कि शिवसेना की पहचान किसी चुनाव आयोग के फैसले, किसी सरकारी मुहर या सत्ता के गणित से तय नहीं होगी। उद्धव ने भाजपा के साथ अपने पुराने गठबंधन को बड़ी राजनीतिक भूल बताते हुए कहा कि उसके साथ 25 साल गंवा दिए। उन्होंने कहा कि भाजपा ने बालासाहेब के हिंदुत्व का इस्तेमाल किया और बाद में शिवसेना को ही किनारे कर दिया। यह हमला केवल भाजपा पर नहीं था; इसके जरिए उद्धव ने शिंदे खेमे पर भी सवाल उठाया कि सत्ता की मलाई के लिए शिवसेना की मूल राजनीतिक पहचान से समझौता किसने किया। उद्धव ने मतदाता सूची से कथित रूप से नाम हटाए जाने, संवैधानिक संस्थाओं और केंद्र सरकार की कार्यशैली को लेकर भी सवाल उठाए। युवा प्रदर्शनकारियों को उन्होंने अराजक तत्व नहीं, बल्कि बदलाव की मांग करने वाले क्रांतिकारी बताया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व पर निशाना साधते हुए उन्होंने सत्ता परिवर्तन की जरूरत का संदेश दिया। यानी उद्धव की रणनीति साफ है। शिंदे के पास सरकार हो सकती है, पार्टी का आधिकारिक नाम हो सकता है, विधानसभा में ज्यादा विधायक हो सकते हैं; लेकिन ठाकरे खेमे के पास वह राजनीतिक भावनात्मक पूंजी है, जिसे वह बालासाहेब की विरासत और मराठी अस्मिता के नाम पर भुनाना चाहता है। एकनाथ शिंदे का पलटवार उधर नेस्को सेंटर में एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे को उनके ही पुराने फैसलों के कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की। उनका तर्क था कि 2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के साथ चुनाव लड़कर बाद में कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ सरकार बनाना मतदाताओं के जनादेश के साथ विश्वासघात था। शिंदे ने इसे ही सबसे बड़ी ‘वोट चोरी’ करार दिया। देखा जाये तो यह एकनाथ शिंदे की सियासत का केंद्रीय तर्क है। वह उद्धव को याद दिलाना चाहते हैं कि सत्ता की राजनीति में नैतिकता का सवाल उठाने से पहले अपने पुराने फैसलों का हिसाब भी देना पड़ता है। उनके लिए 2022 में शिवसेना से बगावत करना पार्टी को बचाने की लड़ाई है, जबकि उद्धव के लिए वही घटना पार्टी तोड़ने और जनादेश की अवमानना का उदाहरण है। यानि एक ही घटना, परन्तु दो बिल्कुल उलटी व्याख्याएं! उद्धव कहते हैं कि शिवसेना को तोड़ा गया, शिंदे कहते हैं कि उन्होंने शिवसेना को उसकी मूल विचारधारा की ओर लौटाया। उद्धव के लिए शिंदे सत्ता के सहारे विरासत हथियाने वाले नेता हैं, तो शिंदे के लिए उद्धव कांग्रेस के साथ जाकर बालासाहेब की राजनीति से दूर चले गए नेता हैं। देखा जाये तो यही महाराष्ट्र की इस लड़ाई का सबसे दिलचस्प पहलू है। दोनों बालासाहेब का नाम लेते हैं, दोनों भगवे पर अपना दावा जताते हैं और दोनों अपने प्रतिद्वंद्वी को शिवसेना की मूल आत्मा से भटका हुआ बताते हैं। सवाल यह है कि बालासाहेब की विरासत का फैसला नारों से होगा, संगठन से, चुनावी नतीजों से या जनता के वोटों से? हम आपको यह भी बता दें कि इस बार की दशहरा रैलियों में किसानों का मुद्दा भी खूब उछला। महाराष्ट्र के सूखे और संकटग्रस्त किसानों की दुर्दशा ने दोनों नेताओं को एक-दूसरे पर हमला करने का मौका दिया। शिंदे ने किसानों के बीच जाकर मदद पहुंचाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि यह वक्त आरोप-प्रत्यारोप का नहीं, संकट में फंसे किसानों के साथ खड़े होने का है। उनकी ओर से किसानों के लिए राहत सामग्री पहुंचाने और जरूरतमंद परिवारों की मदद करने की बात भी सामने रखी गयी। उन्होंने उद्धव पर सवाल उठाया कि जब किसान परेशान हैं, तब केवल राजनीतिक प्रदर्शन करने से क्या हासिल होगा? वहीं उद्धव ने सरकार की राहत राशि और किसानों की वास्तविक जरूरतों को लेकर सवाल उठाए। उनके हमले का आशय यह था कि सरकार की घोषणाओं और किसानों के हाथ में पहुंचने वाली मदद के बीच बड़ा अंतर है। उन्होंने शिंदे खेमे पर भी निशाना साधा और राजनीतिक बगावत के लिए कथित तौर पर दिए गए पैसों की तुलना किसानों को मिलने वाली छोटी राहत से की। देखा जाये तो महाराष्ट्र की राजनीति में किसान का सवाल कभी सिर्फ खेत और फसल तक सीमित नहीं रहता। वह सत्ता की साख, ग्रामीण नाराजगी और चुनावी समीकरणों से जुड़ जाता है। इसलिए दोनों नेताओं के लिए किसानों का जिक्र जरूरी था। लेकिन किसानों के लिए असली सवाल यह नहीं है कि किस मंच से ज्यादा जोरदार भाषण हुआ; सवाल यह है कि सूखती फसल, कर्ज और घरेलू खर्च के बीच उन्हें ठोस राहत कितनी मिली। इसमें कोई दो राय नहीं कि संगठन और सत्ता के गणित में शिंदे का पलड़ा भारी है। 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में उनकी शिवसेना ने 57 सीटें जीती थीं, जबकि उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) को 20 सीटें मिली थीं। चुनाव आयोग की मान्यता और सरकार में उनकी भागीदारी भी शिंदे को संस्थागत बढ़त देती है। इसके बावजूद शिवाजी पार्क का ऐतिहासिक मंच उद्धव के पास बना रहना बताता है कि राजनीतिक विरासत और चुनावी ताकत हमेशा एक ही तराजू में नहीं तौली जातीं। महाराष्ट्र की इस लड़ाई में दोनों नेताओं की कमजोरियां भी साफ हैं। जहां उद्धव को साबित करना है कि भावनात्मक समर्थन को चुनावी ताकत में बदला जा सकता है। वहीं शिंदे को साबित करना है कि पार्टी का नाम, विधायक और सत्ता होने के अलावा बालासाहेब की विरासत भी उन्हीं के साथ है। बहरहाल, दशहरा रैली में तीर खूब चले, लेकिन सियासी रावण अभी पूरी तरह गिरा नहीं है। महाराष्ट्र की राजनीति में अगला अध्याय इस बात से तय होगा कि जनता किसकी कहानी पर भरोसा करती है उद्धव की, जिन्होंने पार्टी तोड़े जाने का दर्द अपनी राजनीति का आधार बनाया है, या शिंदे की, जो इसे शिवसेना को उसकी मूल दिशा में लौटाने की लड़ाई बताते हैं। फिलहाल महाराष्ट्र में भगवा एक है, लेकिन उसके दावेदार दो हैं। एक कहता है, शिवसेना हमारी विरासत है; दूसरा कहता है, शिवसेना हमारी असली पहचान है। इसी खींचतान में महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे बड़ा सवाल गूंज रहा है कि बालासाहेब के नाम पर तालियां कौन बटोरेगा और जनता के वोट कौन जीतेगा? -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 21 Oct 2026 2:48 pm

पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान सीपीआईएम का एक और बुक स्टॉल तोड़ा, भाजपा नेता गिरफ्तार

पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान सीपीआईएम का एक और बुक स्टॉल तोड़ा, भाजपा नेता गिरफ्तार

समाचार नामा 21 Oct 2026 2:33 pm

भारत : ऑटोमोबाइल सेक्टर में तीसरी तिमाही में 33 सौदे हुए

नई दिल्ली, भारत के ऑटोमोबाइल सेक्टर में 2026 की तीसरी तिमाही में 1.7 अरब डॉलर के 33 सौदे दर्ज किए गए। यह पिछली तिमाही के 71.7 करोड़ डॉलर के 20 सौदों से काफी अधिक है। इस वृद्धि के पीछे विलय एवं अधिग्रहण (एमएंडए), निजी पूंजी निवेश और सार्वजनिक बाजार से दोबारा धन जुटाने की गतिविधियों में तेजी प्रमुख कारण रहे।

देशबन्धु 21 Oct 2026 2:29 pm

शेयर बाजार में जियो आईपीओ का करिश्मा: लिस्टिंग से पहले तोड़ डाले ये 3 रिकॉर्ड, बना देश का सबसे बड़ा आईपीओ

कंपनी के ₹30,213 करोड़ के सार्वजनिक निर्गम (IPO) को निवेशकों की जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, बुधवार को इश्यू खुलने के महज 100 मिनट के भीतर यह पूरी तरह सब्सक्राइब हो गया। इसके साथ ही जियो प्लेटफॉर्म्स ने इश्यू के आकार, सब्सक्रिप्शन की रफ्तार और एंकर निवेशकों की मांग के मामले में नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं।

देशबन्धु 21 Oct 2026 2:29 pm

शेयर बाजार के मूल्यांकन में 100 अरब डॉलर की बढ़ोतरी

नई दिल्ली, भारत के तेजी से बढ़ते आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) इकोसिस्टम से सूचीबद्ध कंपनियों का मूल्यांकन अगले दो से तीन वर्षों में 50-100 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है।

देशबन्धु 21 Oct 2026 2:22 pm

केंद्र सरकारी बैंकों : एफडीआई 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 49 प्रतिशत करने पर विचार

नई दिल्ली, केंद्र सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की सीमा को मौजूदा 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 49 प्रतिशत करने पर विचार कर रही है। विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस संबंध में वित्त मंत्रालय ने एक प्रारूप कैबिनेट नोट तैयार किया है और प्रस्तावित बदलाव पर अन्य मंत्रालयों से राय मांगी है।

देशबन्धु 21 Oct 2026 1:54 pm

हिंदुत्व त्यागने का पछतावा, इसलिए बार-बार भगवा-भगवा कर रहे उद्धव ठाकरे : राम कदम

हिंदुत्व त्यागने का पछतावा, इसलिए बार-बार भगवा-भगवा कर रहे उद्धव ठाकरे : राम कदम

समाचार नामा 21 Oct 2026 12:37 pm

रोहित पवार ने एकनाथ शिंदे पर साधा निशाना, कहा-मेला समर्पित करने के बजाय किसानों को प्रति हेक्टेयर एक लाख आर्थिक मदद दें

रोहित पवार ने एकनाथ शिंदे पर साधा निशाना, कहा-मेला समर्पित करने के बजाय किसानों को प्रति हेक्टेयर एक लाख आर्थिक मदद दें

समाचार नामा 21 Oct 2026 12:25 pm

पहली छमाही में हुआ 80.7 अरब डॉलर का घाटा: एंथ्रोपिक

नई दिल्ली, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) कंपनी एंथ्रोपिक ने इस वर्ष की पहली छमाही में 80.7 अरब डॉलर का भारी शुद्ध घाटा दर्ज किया है।

देशबन्धु 21 Oct 2026 12:20 pm

बंगाल में बिना हिंसा चुनाव कराना बड़ी सफलता, अब नशे के खिलाफ होगी जंग: अमित शाह

बंगाल में बिना हिंसा चुनाव कराना बड़ी सफलता, अब नशे के खिलाफ होगी जंग: अमित शाह

समाचार नामा 21 Oct 2026 10:40 am

पिथौरागढ़ में आदि कैलाश अल्ट्रा मैराथन 2.0 की तैयारियों का डीएम ने लिया जायजा, 24 से 26 अक्टूबर तक होगा आयोजन

पिथौरागढ़ में आदि कैलाश अल्ट्रा मैराथन 2.0 की तैयारियों का डीएम ने लिया जायजा, 24 से 26 अक्टूबर तक होगा आयोजन

समाचार नामा 21 Oct 2026 10:37 am

सच्चा व्यक्ति बलिदानी महापुरुषों के प्रति किए गए उपकार को कभी नहीं भूलते, पीएम मोदी ने साझा किया सुभाषित

सच्चा व्यक्ति बलिदानी महापुरुषों के प्रति किए गए उपकार को कभी नहीं भूलते, पीएम मोदी ने साझा किया सुभाषित

समाचार नामा 21 Oct 2026 10:30 am

31 मार्च 2026 को देश नक्सलवाद से मुक्त हुआ, 3,600 जवानों के बलिदान से मिली जीतः अमित शाह

31 मार्च 2026 को देश नक्सलवाद से मुक्त हुआ, 3,600 जवानों के बलिदान से मिली जीतः अमित शाह

समाचार नामा 21 Oct 2026 10:24 am

पुलिस स्मृति दिवस पर पीएम मोदी ने शहीद जवानों को दी श्रद्धांजलि, कहा - 'उनका साहस और बलिदान हमेशा रहेगा याद'

पुलिस स्मृति दिवस पर पीएम मोदी ने शहीद जवानों को दी श्रद्धांजलि, कहा - 'उनका साहस और बलिदान हमेशा रहेगा याद'

समाचार नामा 21 Oct 2026 8:22 am

देश में सरकार बदलनी है तो चुनाव से बदलो, बांग्लादेश जैसी घेराबंदी नहीं चलेगी: सीएम सुवेंदु अधिकाaरी

पश्चिम बंगाल में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति को सामान्य करार देते हुए मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने कहा कि कुछ स्थानों पर डॉक्टरों की कमी के बावजूद पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर और मैनपावर के सहयोग से ट्रॉमा, इमरजेंसी, एडमिशन और एंबुलेंस सेवाएं निर्बाध रूप से संचालित हो रही हैं। लोकतंत्र पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि भारत में सरकार बदलनी है तो चुनाव के माध्यम से बदलनी चाहिए, यह बांग्लादेश नहीं है, जहां घेराबंदी कर सत्ता परिवर्तन हो जाए, देश प्रगति के पथ पर है और सभी को देशहित में एकजुट होना चाहिए।

देशबन्धु 21 Oct 2026 7:31 am

टाइगर श्रॉफ पर फायरिंग से दहशत में फिल्म इंडस्ट्री, रेणुका शहाणे बोलीं- सख्त कार्रवाई जरूरी

मुंबई, 20 अक्टूबर (आईएएनएस)। अभिनेता टाइगर श्रॉफ से जुड़े फायरिंग मामले को लेकर फिल्म इंडस्ट्री और राजनीतिक जगत से प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। अभिनेत्री रेणुका शहाणे, कांग्रेस नेता राज बब्बर, शिवसेना (यूबीटी) के एमएलसी अंबादास दानवे और अभिनेता महेश ठाकुर ने घटना पर चिंता जताई। उन्होंने सुरक्षा व्यवस्था, कानून-व्यवस्था और अपराध पर सख्ती से कार्रवाई करने की जरूरत पर जोर दिया।

समाचार नामा 20 Oct 2026 10:41 pm

'2019 में भाजपा के नाम पर वोट लेकर जनादेश से किया धोखा', दशहरा रैली में एकनाथ शिंदे का उद्धव ठाकरे पर बड़ा हमला

'2019 में भाजपा के नाम पर वोट लेकर जनादेश से किया धोखा', दशहरा रैली में एकनाथ शिंदे का उद्धव ठाकरे पर बड़ा हमला

समाचार नामा 20 Oct 2026 10:36 pm

रावण के साथ जला कॉकरोच का पुतला, कपिल मिश्रा बोले- दीमकों को हो रहा दर्द

रावण के साथ जला कॉकरोच का पुतला, कपिल मिश्रा बोले- दीमकों को हो रहा दर्द

समाचार नामा 20 Oct 2026 10:31 pm

दशहरा पर वीएचपी प्रवक्ता विनोद बंसल की अपील, कहा- अराजक तत्वों से मुक्त हो देश

दशहरा पर वीएचपी प्रवक्ता विनोद बंसल की अपील, कहा- अराजक तत्वों से मुक्त हो देश

समाचार नामा 20 Oct 2026 8:27 pm

दुर्ग और मुंबई में विजयादशमी पर पुलिस ने की शस्त्र पूजा, सुरक्षा का संकल्प दोहराया

दुर्ग और मुंबई में विजयादशमी पर पुलिस ने की शस्त्र पूजा, सुरक्षा का संकल्प दोहराया

समाचार नामा 20 Oct 2026 7:06 pm

अखिलेश यादव को भारत नहीं फ्रांस दिख रहा, राहुल गांधी से मिल रही प्रेरणा: दिनेश प्रताप सिंह

अखिलेश यादव को भारत नहीं फ्रांस दिख रहा, राहुल गांधी से मिल रही प्रेरणा: दिनेश प्रताप सिंह

समाचार नामा 20 Oct 2026 6:28 pm

संजय राउत के 'सुप्रीम कोर्ट जलाने' वाले पोस्ट पर सियासी घमासान, भाजपा-शिवसेना ने बताया राष्ट्रविरोधी

संजय राउत के 'सुप्रीम कोर्ट जलाने' वाले पोस्ट पर सियासी घमासान, भाजपा-शिवसेना ने बताया राष्ट्रविरोधी

समाचार नामा 20 Oct 2026 6:25 pm

दिल्ली की रेस कोर्स मस्जिद को छह दिन में खाली करने का नोटिस, मीरवाइज उमर फारूक ने चिंता जताई

दिल्ली की रेस कोर्स मस्जिद को छह दिन में खाली करने का नोटिस, मीरवाइज उमर फारूक ने चिंता जताई

समाचार नामा 20 Oct 2026 4:36 pm

दशहरा : सोने-चांदी में मजबूती

नई दिल्ली, दशहरा के अवसर पर आज घरेलू शेयर बाजारों में कारोबार बंद है, लेकिन निवेशकों और खरीदारों की नजर सोने-चांदी की कीमतों पर बनी हुई है। हाल के उतार-चढ़ाव के बावजूद सोना मजबूत स्तरों पर कारोबार कर रहा है और सोने का भाव 1.47 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम के ऊपर बना हुआ है।

देशबन्धु 20 Oct 2026 3:41 pm

अमित शाह के पंजाब दौरे पर कुलतार सिंह संधवां ने उठाए सवाल, कांग्रेस ने भी घेरा

अमित शाह के पंजाब दौरे पर कुलतार सिंह संधवां ने उठाए सवाल, कांग्रेस ने भी घेरा

समाचार नामा 20 Oct 2026 2:41 pm

'विदेश घूमने गए राहुल गांधी': भाजपा का दावा, वीडियो शेयर कर कसा तंज; कांग्रेस का पलटवार, पीएम पर साधा निशाना

राहुल गांधी की कथित वियतनाम यात्रा को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है। भाजपा इसे कांग्रेस की राजनीतिक प्राथमिकताओं से जोड़ रही है, जबकि कांग्रेस का कहना है कि विदेश यात्राओं को लेकर सवाल उठाना उचित नहीं है।

देशबन्धु 20 Oct 2026 2:06 pm

कर्नाटक: दशहरा पर्व पर भाजपा कार्यालय में की गई आयुध पूजा, बी.वाई. विजयेंद्र ने मां चामुंडेश्वरी से की प्रार्थना

कर्नाटक: दशहरा पर्व पर भाजपा कार्यालय में की गई आयुध पूजा, बी.वाई. विजयेंद्र ने मां चामुंडेश्वरी से की प्रार्थना

समाचार नामा 20 Oct 2026 12:28 pm

शशि थरूर का किरेन रिजिजू को जवाब, बोले- भारत न बांग्लादेश है, न फ्रांस; SIR वापस लेने की मांग

किरेन रिजिजू के आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए थरूर ने कहा कि भारत की परिस्थितियों की तुलना फ्रांस या बांग्लादेश में हुई घटनाओं से नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा, “मेरा मानना है कि भारत बांग्लादेश नहीं है और भारत फ्रांस भी नहीं है। मुझे ये तुलना खास तौर पर प्रासंगिक नहीं लगती।”

देशबन्धु 20 Oct 2026 12:07 pm

'महाराष्ट्र में जंगलराज'... संजय राउत की बड़ी मांग, बोले- अब राष्ट्रपति शासन ही आखिरी रास्ता

शिवसेना (उद्धव ठाकरे) के सांसद संजय राउत ने सोमवार को महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग करते हुए आरोप लगाया कि बॉलीवुड अभिनेता टाइगर श्रॉफ की गाड़ी को निशाना बनाकर की गई हालिया गोलीबारी सहित कई चर्चित आपराधिक घटनाओं के बाद राज्य सरकार कानून-व्यवस्था बनाए रखने में विफल रही है

देशबन्धु 19 Oct 2026 10:46 pm

दिल्ली: नरेला में डीडीए एलआईजी फ्लैटों की ऑनलाइन बुकिंग मंगलवार से शुरू होगी

दिल्ली: नरेला में डीडीए एलआईजी फ्लैटों की ऑनलाइन बुकिंग मंगलवार से शुरू होगी

समाचार नामा 19 Oct 2026 10:37 pm

मानसा में परविंदर सिंह झोटा हत्याकांड को लेकर उबाल, इंसाफ कमेटी ने सरकार से सीएम और डीजीपी का इस्तीफा मांगा

मानसा में परविंदर सिंह झोटा हत्याकांड को लेकर उबाल, इंसाफ कमेटी ने सरकार से सीएम और डीजीपी का इस्तीफा मांगा

समाचार नामा 19 Oct 2026 10:32 pm

केरल में कांग्रेस नेताओं को सार्वजनिक रूप से अपनी शिकायतें जाहिर न करने का निर्देश

केरल में कांग्रेस नेताओं को सार्वजनिक रूप से अपनी शिकायतें जाहिर न करने का निर्देश

समाचार नामा 19 Oct 2026 10:30 pm

सौरव दास और आशुतोष रांका की न्यायिक हिरासत बढ़ी, कोर्ट से नहीं मिली राहत

दिल्ली की एक विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट अदालत ने सोमवार को कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संयोजक सौरव दास और आशुतोष रांका की न्यायिक हिरासत दो दिन के लिए बढ़ा दी

देशबन्धु 19 Oct 2026 10:20 pm

Chai Par Sameeksha: CJP की हवा कैसे निकली? Rahul Gandhi की राजनीति Congress पर क्यों पड़ रही भारी?

प्रभासाक्षी की साप्ताहिक कार्यक्रम चाय पर समीक्षा में हमने इस सप्ताह कॉकरोच जनता पार्टी और कांग्रेस की रणनीति पर चर्चा की। हमेशा की तरह इस कार्यक्रम में मौजूद रहे प्रभासाक्षी के संपादक नीरज कुमार दुबे। कॉकरोच जनता पार्टी पर नीरज कुमार दुबे ने साफ तौर पर कहा कि जुलाई अगस्त के दौरान इन्होंने अच्छे दिन देखे लेकिन कांठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती। उन्होंने कहा कि वह लगातार ब्लैकमेल की रणनीति अपना रहे थे। लेकिन इस बार सरकार पूरी तरीके से तैयार थी और यही कारण है कि यह लोग जो दिल्ली में करना चाहते थे उसमें कामयाब नहीं हुए। उन्होंने कहा कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को ठीक से समझे बिना विदेशी दबाव बनाने की यह राजनीति आखिर क्यों चल रही है? क्या किसी राजनीतिक दल या किसी संगठन के आंदोलन के दौरान लगाये गये आरोपों को ही सच मानकर भारत को कटघरे में खड़ा कर देना इन सांसदों का नया शगल बन गया है? अगर इन्हें वाकई लोकतंत्र और नागरिकों की आजादी की इतनी चिंता है, तो यह चिंता हर देश के मामले में एक जैसी क्यों नहीं दिखती? आखिर भारत के मामले में ही इनका लोकतांत्रिक प्रेम क्यों उमड़ने लगता है? क्या भारत को नसीहत देना और उसके आंतरिक मामलों में दखल देना ही इनकी राजनीति का असली मकसद है? इसे भी पढ़ें: Congress में लौटे Ram Sharan Nautiyal, कुमारी शैलजा ने किया स्वागत, BJP पर साधा निशाना उन्होंने कहा कि जो लोग सत्ता पलटने का ख्वाब देख रहे हैं उन्हें भी समझना होगा कि भारत की ताकत किसी एक सरकार में नहीं, बल्कि उस करोड़ों भारतीयों के जनादेश में है, जिसने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की नींव मजबूत की है। इस देश को न विदेशी मंचों पर बैठकर भाषण देने वाले कुछ नेता चला सकते हैं, न सोशल मीडिया पर शोर मचाकर खुद को लोकतंत्र का सबसे बड़ा रखवाला बताने वाले लोग! भारत की छवि को झूठे आरोपों, आधी-अधूरी जानकारी और राजनीतिक एजेंडे के सहारे चोट पहुंचाने का सपना देखने वालों को समझना होगा कि भारत कोई कमजोर देश नहीं, जिसकी साख चंद बयानों से मिटा दी जाए। भारत पर उंगली उठाने से पहले अपने तथ्यों की जांच करो, आरोप लगाने से पहले सबूत जुटाओ और लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने से पहले यह समझो कि भारत का भविष्य तय करने का अधिकार भारतीय जनता के पास है, किसी विदेशी नेता या सोशल मीडिया के स्वयंभू विशेषज्ञ के पास नहीं! सवाल पूछने हैं तो पूछिए, लेकिन सवालों की आड़ में देश की संस्थाओं को बदनाम करने का ठेका मत लीजिए। क्योंकि भारत की असली ताकत तिरंगे के नीचे खड़े करोड़ों लोगों का विश्वास, स्वाभिमान और अपने देश का फैसला खुद करने का अधिकार है। कांग्रेस की रणनीति को लेकर नीरज दुबे ने साफ तौर पर कहा कि फिलहाल राहुल गांधी कॉकरोच जनता पार्टी को अपना कंपीटीटर मान रहे हैं और कॉकरोच जनता पार्टी की चर्चा ना हो इसलिए वह लगातार मैदान में बैठने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इंडिया ब्लॉक को लगता है कि वोट चोरी हो रही है तो सबसे पहले इंडिया ब्लॉक शासित राज्य सरकारों को इस्तीफा दे देना चाहिए। इसके अलावा नीरज दुबे ने यह भी कहा कि फिलहाल राहुल गांधी किसी ने किसी तरीके से चर्चा के केंद्र में रहना चाहते हैं और यही कारण है कि फिलहाल वह एक जूता दिखाने की कोशिश कर रही है।

प्रभासाक्षी 19 Oct 2026 6:22 pm

Modi Diplomacy Power देखकर दुनिया हैरान, आखिर रातोंरात कैसे बदल गये Donald Trump, Marco Rubio, JD Vance और Elon Musk के तेवर?

विपक्ष अक्सर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अमेरिका के आगे झुकने का आरोप लगाता रहता है लेकिन जो परिदृश्य उभर कर सामने आ रहा है वह दर्शा रहा है कि भारत की ताकत और मोदी की कूटनीति के आगे अमेरिका को झुकना पड़ा है। चाहे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हों, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो हों, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस हों या फिर अमेरिकी उद्योगपति एलन मस्क हों, आप उनके ताजा बयानों को देखेंगे तो पाएंगे कि रातोंरात अचानक उनमें बड़ा परिवर्तन आ गया है। भारत पर रूस से तेल खरीदने को लेकर भारी टैरिफ लगाने की धमकी देने वाले डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को अब अपने कदम पीछे खींचने पड़े हैं। साथ ही अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने खुद माना है कि भारत के साथ होने वाला व्यापार समझौता इस फैसले की एक बड़ी वजह है। उन्होंने यहां तक कह दिया है कि भारत की अपनी जरूरतें हैं और वह एकदम से रूस से तेल खरीदना बंद नहीं कर सकता। रूस से तेल पर अमेरिका की अकड़ ढीली, भारत बना अहम फैक्टर हम आपको बता दें कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर अमेरिकी दबाव के बीच सबसे महत्वपूर्ण संकेत विदेश मंत्री मार्को रुबियो के बयान से आया है। उज्बेकिस्तान में पत्रकारों से बातचीत के दौरान रुबियो ने स्वीकार किया कि रूस के तेल पर प्रतिबंधों में छूट देने के फैसले में भारत के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौते को भी ध्यान में रखा गया है। उन्होंने कहा कि दोनों देश समझौते को अंतिम रूप देने के बेहद करीब हैं। यह बयान ऐसे समय आया है, जब ट्रंप प्रशासन ने रूस से संबंधित प्रतिबंधों के प्रभावों का आकलन करने के लिए 60 दिनों की राहत दी है। रुबियो के मुताबिक, अमेरिका को यह भी देखना होगा कि एक साथ प्रतिबंध और टैरिफ लगाने से वैश्विक अर्थव्यवस्था और खुद अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा? इसे भी पढ़ें: राजनीति नहीं चली तो कूटनीति में हाथ आजमाने चले Rahul Gandhi ! मगर Jaishankar पर हमला करते ही सामने आ गया Salman Khurshid का रिकॉर्ड यानी जिस रूस-तेल मुद्दे को भारत पर दबाव बनाने के हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा था, उसी पर अब वॉशिंगटन को अपने कदमों के परिणामों की चिंता सता रही है। मार्को रुबियो का यह कहना, ''भारत रूस से ऊर्जा आयात को एक झटके में बंद नहीं कर सकता। नई आपूर्ति व्यवस्था विकसित करने में समय लगता है और ऊर्जा की कीमतों में उछाल का सीधा असर आम लोगों तथा उद्योगों पर पड़ता है'', दर्शा रहा है कि मोदी की कूटनीति कितनी कामयाब रही। साथ ही रुबियो ने यह भी स्वीकार किया कि भारत अमेरिका का महत्वपूर्ण साझेदार है और उसकी ऊर्जा जरूरतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अमेरिकी महंगाई का दबाव, ट्रंप प्रशासन की बढ़ी मुश्किलें देखा जाये तो अमेरिका की इस बदली हुई रणनीति के पीछे घरेलू आर्थिक चिंताएं भी हैं। महंगे ईंधन का असर अमेरिकी उपभोक्ताओं पर पड़ रहा है। ऐसे माहौल में भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने से वैश्विक आपूर्ति और कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। आगामी मध्यावधि चुनावों से पहले महंगाई ट्रंप प्रशासन के लिए राजनीतिक चुनौती भी बन सकती है। दूसरी तरफ, भारत भी महंगाई के दबाव से अछूता नहीं है। ऐसे में भारत के लिए सस्ती और भरोसेमंद ऊर्जा आपूर्ति केवल व्यापार का सवाल नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता का भी मुद्दा है। नई दिल्ली का रुख स्पष्ट रहा है कि ऊर्जा आपूर्ति के स्रोत बाजार की परिस्थितियों और राष्ट्रीय जरूरतों के हिसाब से तय होंगे। जेडी वेंस की सफाई, एच-1बी विवाद पर नहीं थमा विवाद इसके साथ ही अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के तेवरों में भी नरमी आई है। एच-1बी वीजा कर्मचारियों को ‘फॉरेन इंडेंटर्ड सर्वेंट्स’ कहने के बाद उनकी टिप्पणी पर विवाद बढ़ा था। भारत के विदेश मंत्रालय ने उनके बयान को अनुचित और गहरा अपमानजनक बताया था। सीबीएस न्यूज के टाउन हॉल कार्यक्रम में वेंस ने कहा कि उनकी आलोचना वीजा कर्मचारियों की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था और कंपनियों की थी, जिनके जरिए विदेशी कर्मचारियों को ऐसी स्थिति में रखा जा सकता है जहां नौकरी जाने का डर उनके अधिकारों को कमजोर कर देता है। उन्होंने माना कि उनकी भाषा बेहतर हो सकती थी, लेकिन उन्होंने अपनी टिप्पणी वापस नहीं ली। उन्होंने अपनी भारतीय ससुराल का जिक्र करते हुए पत्नी उषा वेंस और उनके दक्षिण भारतीय माता-पिता के प्रति सम्मान भी जताया। एलन मस्क भी नरम पड़े, भारतीय नियमों के सामने चुनौती इसी बीच, एलन मस्क की स्टारलिंक और रिलायंस इंडस्ट्रीज के बीच उपग्रह इंटरनेट सेवाओं को लेकर चला विवाद भी नया मोड़ लेता दिखा। हम आपको याद दिला दें कि भारत में स्टारलिंक की संभावित एंट्री के बीच मस्क ने सोशल मीडिया पर भारतीय कारोबारी मुकेश अंबानी और बाजार की प्रतिस्पर्धा से जुड़े आरोप लगाए थे। रिलायंस ने जवाब में कहा कि वह उपग्रह संचार सेवाओं में प्रतिस्पर्धा का स्वागत करती है, लेकिन हर कंपनी को भारतीय कानूनों और नीतियों का पालन करना होगा। कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया कि जियो की अपनी उपग्रह सेवाएं भी मंजूरियों की प्रतीक्षा कर रही हैं। इसके बाद मस्क ने रिलायंस की प्रतिक्रिया पर ‘Much appreciated’ कहकर जवाब दिया। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो भारत के दौरे पर आ रहे हैं। वह मुंबई में भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात के अलावा गुजरात के जामनगर जाकर रिलायंस इंडस्ट्रीज की रिफाइनरी का अवलोकन भी करेंगे। खास बात यह है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज उन्हीं मुकेश अंबानी की है जिन्हें एलन मस्क ने भारत का प्रधानमंत्री बताया था। भारत का संदेश—रिश्ते बराबरी के, फैसले राष्ट्रीय हित में बहरहाल, रुबियो, वेंस और मस्क के ढीले पड़ते तेवर और ट्रंप का बदला रुख दर्शा रहे हैं कि दुनिया में भारत की कूटनीति कुछ भी हासिल कर सकती है। रूस से तेल खरीदने का सवाल हो, अमेरिका के साथ व्यापार समझौता हो, एच-1बी वीजा विवाद हो या स्टारलिंक की भारत में एंट्री का मुद्दा हो, इन सभी घटनाक्रमों के केंद्र में एक चीज स्पष्ट है कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों पर बाहरी दबाव कभी स्वीकार नहीं करेगा। भारत ऐसा साझेदार नहीं है जिसके सामने केवल दबाव बनाकर मनचाहा फैसला हासिल कर लिया जाए। नई दिल्ली का संदेश स्पष्ट है कि रिश्ते मजबूत होंगे, व्यापार भी बढ़ेगा, लेकिन फैसले भारत के राष्ट्रीय हितों के आधार पर ही होंगे। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 19 Oct 2026 5:09 pm

पश्चिम बंगाल में गूंजा 'श्यामा प्रसाद मुखर्जी अमर रहे' का नारा, बालुरघाट में प्रतिमा का अनावरण

पश्चिम बंगाल में गूंजा 'श्यामा प्रसाद मुखर्जी अमर रहे' का नारा, बालुरघाट में प्रतिमा का अनावरण

समाचार नामा 19 Oct 2026 3:37 pm

France और Italy में जो हुआ वो India में नहीं हो, इसके लिए Modi-Shah ने क्या पहले से कोई तैयारी कर रखी है?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस में हिंसा और लूटपाट की घटनाओं के बाद ट्रुथ सोशल पर जो टिप्पणी की है, उसने पूरी दुनिया में एक नई बहस छेड़ दी है। ट्रंप ने लिखा, “फ्रांस जल रहा है!” और चेतावनी दी है कि अलग दुनिया से आए लोगों के आव्रजन ने कभी महान रहे देश को संकट में डाल दिया है। उन्होंने फ्रांस से अपनी सीमाएं बंद करने और बहुत देर होने से पहले हालात पर नियंत्रण हासिल करने की अपील की है। ट्रंप की यह टिप्पणी भले ही राजनीतिक रूप से कठोर हो, लेकिन इसके पीछे उठ रहा बुनियादी सवाल बेहद महत्वपूर्ण है कि आखिर किसी राष्ट्र की सीमाओं, सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी किसकी है? और जब सरकारें इन चुनौतियों से निपटने में विफल होती हैं, तो उसकी कीमत कौन चुकाता है? फ्रांस के हालात से पूरी दुनिया स्तब्ध फ्रांस में 17 अक्टूबर को हुए प्रदर्शनों के दौरान जो तस्वीरें सामने आईं, वे किसी भी राष्ट्र के लिए चिंताजनक हैं। महंगाई, शिक्षा व्यवस्था और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़ी शिकायतों को लेकर सड़कों पर उतरे हजारों लोगों के बीच हिंसक समूहों ने दुकानों में लूटपाट की, वाहनों में आग लगाई और सरकारी इमारतों को निशाना बनाया। लिमोज शहर का ऐतिहासिक टाउन हॉल आगजनी में बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। पेरिस, मार्सेई और लियोन में भी हिंसा और तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आईं। फ्रांसीसी अधिकारियों ने कट्टरपंथी वामपंथी समूहों और उपद्रवियों को हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराया। इसे भी पढ़ें: राजनीति नहीं चली तो कूटनीति में हाथ आजमाने चले Rahul Gandhi ! मगर Jaishankar पर हमला करते ही सामने आ गया Salman Khurshid का रिकॉर्ड फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने राष्ट्र के नाम संबोधन में इस हिंसा पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि शहरों की सड़कों को इस तरह बर्बाद होते देखना असहनीय है। मैक्रों ने सुरक्षा बलों के समर्थन में खड़े होते हुए स्पष्ट किया कि जायज मांगों और हिंसा के बीच अंतर किया जाना चाहिए। उन्होंने प्रशासन को सार्वजनिक इमारतों और कारोबारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने, जरूरत पड़ने पर कुछ प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगाने तथा हिंसा करने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने के निर्देश दिए। उनका संदेश साफ था कि संवाद का अर्थ कमजोरी और लोकतांत्रिक अधिकारों का अर्थ दंड से मुक्ति नहीं है। देखा जाये तो एक बुनियादी बात समझने की जरूरत है। लोकतंत्र में विरोध करना अधिकार है, लेकिन हिंसा करके सरकार को झुकाना, सार्वजनिक संपत्ति नष्ट करना और आम नागरिकों के जीवन को संकट में डालना अधिकार नहीं हो सकता। यदि कोई समूह अपनी राजनीतिक या वैचारिक मांगों के लिए कानून को चुनौती देने लगे, तो सरकार का दायित्व है कि वह निर्णायक कार्रवाई करे। सरकार की लोकप्रियता और उसकी नीतियों पर सवाल उठ सकते हैं, लेकिन देश की कानून-व्यवस्था को बंधक नहीं बनाया जा सकता। इटली में भी बिगड़े हालात दूसरी ओर, यूरोप की यह बेचैनी अब केवल फ्रांस तक सीमित नहीं है। इटली में भी 17 और 18 अक्टूबर को महंगाई, कम वेतन और सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति के विरोध में प्रदर्शन हुए। मिलान में नकाबपोश प्रदर्शनकारियों ने दुकानों के शीशे तोड़े, आगजनी की और पुलिस पर पत्थर फेंके। पुलिस को आंसू गैस और पानी की बौछारों का इस्तेमाल करना पड़ा। बोलोन्या, ब्रेसिया, बर्गामो और ट्यूरिन में भी झड़पों की खबरें आईं। प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने हिंसा की निंदा करते हुए पुलिस के समर्थन में बयान दिया और स्थिति पर चर्चा के लिए सरकारी बैठक बुलाई। इटली की घटनाएं एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने लाती हैं। यूरोप में बढ़ती महंगाई, कम वेतन, महंगे आवास और सार्वजनिक सेवाओं की बदहाली ने लोगों में असंतोष पैदा किया है। इस असंतोष को केवल आव्रजन या किसी एक विचारधारा के खाते में डालना वास्तविक समस्याओं से आंखें मूंदना होगा। लेकिन जब जायज शिकायतों के बीच हिंसक समूह घुस आते हैं और विरोध को लूटपाट में बदल देते हैं, तो आम नागरिकों का नुकसान होता है और लोकतांत्रिक आंदोलन की विश्वसनीयता भी खत्म होने लगती है। फ्रांस और इटली दोनों की घटनाओं से यही सबक मिलता है कि सरकारों को जनता की समस्याओं का समाधान भी करना होगा और अराजकता फैलाने वालों के खिलाफ कठोरता भी दिखानी होगी। फ्रांस, इटली की घटनाओं का भारत के लिए निहितार्थ भारत के लिए इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू अवैध घुसपैठ और राष्ट्रीय सुरक्षा है। बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ तथा म्यांमार से आए रोहिंग्या समुदाय के लोगों की अनधिकृत मौजूदगी लंबे समय से सुरक्षा और प्रशासन से जुड़े सवाल खड़े करती रही है। भारत जैसे विशाल और संवेदनशील सीमाओं वाले देश के लिए यह कोई मामूली विषय नहीं है। सीमा पार से आने वाले प्रत्येक व्यक्ति की पहचान, नागरिकता और कानूनी स्थिति का सत्यापन होना चाहिए। जहां अवैध प्रवेश प्रमाणित हो, वहां कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ अपराध या सुरक्षा संबंधी गतिविधियों के ठोस प्रमाण हों, तो जांच और अभियोजन में कोई ढिलाई नहीं होनी चाहिए। मोदी-शाह ने खतरे को पहले ही भांप लिया था वैसे ट्रंप आज दुनिया को सीमाओं की सुरक्षा और अवैध घुसपैठ पर सख्ती का जो संदेश दे रहे हैं, उसे भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बहुत पहले ही भांप लिया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह इस चुनौती से निपटने के लिए पहले से ही कदम उठा रहे हैं। मोदी सरकार ने अवैध घुसपैठ और उससे जुड़े जनसांख्यिकीय बदलावों की पड़ताल के लिए उच्चस्तरीय समिति गठित की है, जिसकी अध्यक्षता सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति प्रकाश प्रभाकर नाओलेकर कर रहे हैं। गृह मंत्रालय ने 26 मई 2026 को इस समिति का गठन किया और 14 अक्टूबर को इसका आधिकारिक पोर्टल demography.mha.gov.in शुरू किया गया। इस पोर्टल के माध्यम से केंद्र और राज्य सरकारें, संस्थाएं तथा आम नागरिक जनसांख्यिकीय बदलावों, असामान्य बसावट और अवैध घुसपैठ से संबंधित जानकारी दे सकते हैं। समिति का उद्देश्य अवैध प्रवासियों की पहचान, हिरासत और निर्वासन के लिए कानूनी, निष्पक्ष और समयबद्ध व्यवस्था की सिफारिश करना भी है। इसके अलावा, अमित शाह सीमाओं की सुरक्षा के लिए स्मार्ट बॉर्डर परियोजना को आगे बढ़ा रहे हैं। इसके तहत ड्रोन, रडार, निगरानी कैमरे, वॉचटावर और अत्याधुनिक सेंसर जैसी तकनीकों को सीमा सुरक्षा व्यवस्था से जोड़ा जा रहा है। जुलाई 2026 में सिलीगुड़ी के झुमागाछ स्थित सीमा चौकी पर अमित शाह ने फेंसिंग में सेंध का पता लगाने वाली प्रणाली और दुर्गम इलाकों में घुसपैठ की चेतावनी देने वाली तकनीक का निरीक्षण भी किया था। सरकार का लक्ष्य केवल सीमा पार से होने वाली घुसपैठ रोकना नहीं, बल्कि देश के भीतर मौजूद अवैध प्रवासियों की पहचान और उनके मामलों का कानूनी निपटारा करना भी है। भारत में घुसपैठ का मुद्दा तब और गंभीर हो जाता है, जब राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषय को वोट बैंक की राजनीति की भेंट चढ़ा दिया जाता है। अवैध घुसपैठियों की पहचान और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई का विरोध करने वाले राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि सत्ता की लालसा में देश के भविष्य से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। आज फ्रांस और इटली में जो कुछ देखने को मिल रहा है, भारत को उससे सबक लेना है, वैसी परिस्थितियों का इंतजार नहीं करना है। भारत कोई प्रयोगशाला नहीं है, जहां राजनीतिक स्वार्थ के लिए देश की सामाजिक स्थिरता और आंतरिक सुरक्षा को दांव पर लगा दिया जाए। और चिंता तब और बढ़ जाती है, जब बांग्लादेश में हिंसक घटनाओं के बाद हुए सत्ता परिवर्तन से प्रेरणा लेने की बातें सामने आती हैं या खुलेआम यह कहा जाता है कि सत्ता पलटना ही मुख्य मकसद है। सवाल सीधा है कि भारत में सत्ता परिवर्तन का फैसला जनता करेगी या कुछ स्वयंभू नेता और दबाव समूह सड़कों पर शक्ति प्रदर्शन करके सरकार बदलने का रास्ता तय करेंगे? लोकतंत्र में सरकारें चुनाव से बनती और बदलती हैं, न कि हिंसा, अराजकता या किसी विदेशी घटनाक्रम से प्रेरित होकर पैदा किए गए दबाव से। मोदी सरकार और अमित शाह के सामने चुनौती केवल घुसपैठ रोकने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की भी है कि कानून का राज किसी राजनीतिक सौदेबाजी का मोहरा न बने। भारत की सीमाओं से लेकर लोकतांत्रिक संस्थाओं तक, देश की सुरक्षा और संप्रभुता से कोई समझौता नहीं होना चाहिए। बहरहाल, यह सबको स्पष्ट रहना चाहिए कि लोकतंत्र में सरकार बदलने का अधिकार जनता के पास है और इसका सबसे वैध रास्ता चुनाव है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन, सरकार की आलोचना और जवाबदेही की मांग लोकतंत्र का हिस्सा हैं। लेकिन यदि कोई संगठन या दबाव समूह हिंसा, धमकी या गैर-संवैधानिक तरीकों से सत्ता परिवर्तन कराने की कोशिश करता है, तो उसकी मंशा और गतिविधियों की जांच होनी चाहिए। आंदोलन की आड़ में कानून तोड़ने वालों को राजनीतिक संरक्षण कतई नहीं मिलना चाहिए। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 19 Oct 2026 12:54 pm

क्या कभी आत्मदैन्य से मुक्त हो सकेंगे हम?

कोई भी राष्ट्र जिस स्थिति में होता है, उसके लिए वह खुद जिम्मेदार होता है। जापानी जैसे हैं ,उनका देश वैसा ही है। इसी तरह की बात इजरायल, चीन और ईरान या किसी भी देश के बारे में हो सकती है। भारत भी वैसा ही है, जैसे हम हैं! ऐसे में कभी विदेशी आक्रांताओं,कभी मैकाले और कभी अपनी आजादी के बाद सत्ता में आए नायकों को कोसते हुए हम अपने कर्तव्यबोध से मुक्त हो जाते हैं। कोई भी राष्ट्र अपने नागरिकों की सामूहिक चेतना के आधार पर विकसित होता है। उसका इतिहासबोध, संस्कृतिबोध, मित्रबोध और शत्रुबोध मिलकर उसका निर्माण करते हैं। इनसे ही राष्ट्रीय मानस या राष्ट्रीय भाव बनता है। लंबे समय की गुलामी ने हमें आत्मदैन्य और आत्महीनता की ओर ढकेल दिया। भारतीय समाज के अपने पारंपरिक मूल्यों को छोड़कर हम शासक वर्गों द्वारा थोपी जा रही संस्कृति का अनुगमन करने लगे। हमें लगा हमारे अंग्रेज शासक, उनकी भाषा, पहनावा और उनकी संस्कृति-पंथ सबकुछ हमसे बेहतर है। उनके अनुयायी बनकर ही हमारी मुक्ति है। तत्कालीन समाज के श्रेष्ठ जन भी ब्रिटिश शासन में अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त कर भारत लौटते थे और खुद को आधा-अधूरा अंग्रेज साबित करने में जुट जाते थे। ऐसे में शेष समाज अपने श्रेष्ठ वर्ग का आचरण देख वैसा ही बनने का प्रयास करने लगा। देश में तमाम सर, रायबहादुर और साहेब बहादुर हमारे आदर्श बन गए। स्वामी विवेकानंद, लोकमान्य तिलक, महर्षि अरविन्द, महर्षि दयानंद, महात्मा गांधी, भारतेंदु हरिश्चंद्र, जयशंकर प्रसाद, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय,रवीन्द्र नाथ टैगोर के बहुत गहरे भारतबोध की प्रज्ञा ने हमें संभाला ,वरना हमारी दास्तां भी न होती दास्तानों में। हमारी हस्ती मिटने से कोई रोक नहीं सकता था। इसे भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट नहीं बनेगा नेताओं का अखाड़ा औसत भारतीय का आचरण अंग्रेजी शासनकाल में कैसा था, कहने की जरूरत नहीं है। हम कोहिनूर को छोड़कर कांच की ओर दौड़ रहे थे। अंग्रेजी भाषा और संस्कृति श्रेष्ठता की परिचायक बन गई। जब तक अपना कोई व्यक्ति या कार्य पश्चिम में स्थापित न हो जाए, उसे हम श्रेष्ठ मानने को तैयार नहीं थे। अंग्रेजी शासन और उसके बाद के आजादी के साल भी आत्मगौरव के अभाव में गुजरे साल बनकर रह गए। सत्ता के आतंक और सत्ता से जुड़े रहने के आकर्षण से हमने 'अपने जीवन मूल्यों का सनातन सिद्ध राजमार्ग' छोड़कर 'अंग्रेजियत की पगडंडियों' पर चलना प्रारंभ कर दिया, जो हमारा देखा-परखा रास्ता नहीं था। जाहिर है इस मार्ग पर हम नेतृत्वकर्ता नहीं, अनुगामी ही बन सकते थे। हमारे एकत्व को चोटिल करने के सचेतन प्रयास प्रारंभ हुए। भारतीय शिक्षा पद्धति को अंग्रेजी राज में कैसे नष्ट किया गया, इसे धर्मपाल जी को पढ़कर ही समझ में आएगा। 'स्व' के स्थान पर 'परकीय' विचारों की स्थापना के प्रयास खूब चले। हम एक 'राष्ट्र' नहीं हैं, बताया गया। अनेक स्थानीयताओं को राष्ट्रीयता के बरक्स स्थापित करने के अकादमिक प्रयास भी खूब चले, सफल भी हुए। कैसे और कितने विभाजन गढ़े जा सकते हैं, सारा जोर इसी पर था। भारतीय ज्ञान परंपरा पर चल रहे लोगों के आत्मविश्वास को समाप्त कर इस पूरे विचार को ही पोंगापंथ और पिछड़ेपन के रुप में आरोपित किया जाना फैशन बन गया। राजनीतिक परिवर्तन के कारण लंबे समय के बाद भारत फिर से खुद को खोज रहा है। अपनी जड़ों की तरफ वापसी करना चाहता है। जिसे 'विचारों की घर वापसी' कहकर संबोधित किया गया। जरूरी है कि भारत प्रेमी बौद्धिक वर्ग सत्य के सूर्य की स्थापना करने के लिए अध्यवसाय में जुट जाए। सिर्फ भावनात्मक प्रवचनों, कार्यक्रमों से आगे बढ़कर भ्रमों के निवारण का जतन करे। ऐसे कुशल बौद्धिक योद्धा ही अपनी ज्ञान परंपरा को सामने लाकर तथ्य, प्रमाणों के साथ उनकी युगानुकुल व्याख्या करेंगे। इसके लिए हमें लोकसंग्रही और विनम्र बनना पहली शर्त है। परंपरा,जीवन पद्धति और परिवार पर छाए संकटों के बीच ये प्रयत्न ही हमें आत्मशक्ति देंगे। दुनिया भर में चल रहे सभ्यतागत संघर्ष के बीच भारत को अपनी वृहत्तर भूमिका का निर्वहन करना है, क्योंकि हमारे पास दुनिया को देने के लिए समावेशी विचार है। जहां साझापन सौंदर्य की तरह है, विविधता और बहुलता का यहां उत्सव मनाया जाता है। हम पूजा में भी अनेक देवताओं की पूजा करते हैं। बहुलतावादी समाज होने कारण हमने मतभिन्नता का सदैव स्वागत किया। इसका उदाहरण हमारी 'शास्त्रार्थ' परंपरा है। इसलिए एक किताब,एक विचार, एक देवता को मानने और दूसरे विचार को समाप्त करने को आतुर विचार भारत को नहीं समझ सकते। जहां दुनिया के हर पंथ के लोग नैसर्गिक सहजता से सांस ले सकते हैं। यहां कोई श्रेष्ठ और निकृष्ट नहीं है। सब समान रूप से इस धरती मां की संतानें हैं। ऐसे में भारत केंद्रित विमर्श ही विश्व शांति का मार्ग है। 'स्वत्व' ही मार्ग है, जिस पर चलने के लिए हमें महात्मा गांधी, धर्मपाल, सीताराम गोयल, दीनदयाल उपाध्याय, वासुदेव शरण अग्रवाल, निर्मल वर्मा, विद्यानिवास मिश्र का अध्ययन मदद कर सकता है। इससे भारत के मूल विचार को समझने तथा भारत का मौलिक चिंतन स्थापित करने में मदद मिलती है। इससे ही ग़लत बातों का खंडन करते हुए हम सही विमर्श की स्थापना में सफल हो पाएंगे। भारतीय उदात्त जीवन मूल्यों के आधार पर संपूर्ण विश्व के लिए हमें ही वैश्विक बौद्धिक नेतृत्व देना होगा। जिसकी एक झलक हमें स्वामी विवेकानंद में दिखती है। ऐसे में ‘स्वबोध‘ का जागरण ही विकल्प है। पहले हमारे अपने विचार को भारत तो स्वीकार करे। वह आत्मदैन्य से मुक्त होकर 'भारत' को 'भारत' (इंडिया नहीं) की नजर से देखना प्रारंभ करे। वैचारिक साम्राज्यवाद से मुक्ति के लिए कई स्तरों पर कार्य करने की आवश्यकता है। इसे इस तरह से समझिए कि गोरा बनाना और अंग्रेजी सिखाना आज भी हिंदुस्तान में दो सबसे बड़े व्यापार हैं। यही उपनिवेशवादी मानसिकता है। इसके चलते ही हमारे गांव उजड़ते चले गए और संयुक्त परिवार बिखर गए। आज एकल परिवारों के नाते अलग तरह के सामाजिक-सांस्कृतिक संकट हमारे सामने हैं। जाति, भाषा, क्षेत्र,पंथ की लड़ाइयों को छोड़कर भी बहुत सी विभाजनकारी बातें हर दिन आज भी खोजी जाती हैं , फिर आख्यान (नरेटिव) गढ़े जाते हैं। भारत जिसे कभी 'इंडिया' बनाने की कोशिशें हुईं, उसे भारत बनाए रखने के लिए हमें ही आगे आना होगा। क्योंकि भारत का नष्ट होना, उस विचार का मिट जाना होगा, जिसने हमें वसुधैव कुटुम्बकम् का संदेश दिया। जिसने हमें राम, कृष्ण,शिव, बुद्ध, महावीर, गुरु नानक देव जैसे नायक दिए। जिसने सर्वे भवन्तु सुखिन: में अपनी मुक्ति देखी और लोक-मंगल जिसका मूलमंत्र रहा। - प्रो. संजय द्विवेदी (लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)

प्रभासाक्षी 19 Oct 2026 12:38 pm

'भारत को कभी नहीं तोड़ सकतीं विरोधी ताकतें', पाकिस्तानी झंडों के साथ कांग्रेस के झंडे दिखने पर बोले किरेन रिजिजू

'भारत को कभी नहीं तोड़ सकतीं विरोधी ताकतें', पाकिस्तानी झंडों के साथ कांग्रेस के झंडे दिखने पर बोले किरेन रिजिजू

समाचार नामा 19 Oct 2026 12:24 pm

सुप्रीम कोर्ट नहीं बनेगा नेताओं का अखाड़ा

देश के सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि वह राजनीतिक दलों की सत्ता को लेकर चल रही मारामारी के बीच अखाड़ा नहीं बनेगा। सुप्रीम कोर्ट सिर्फ कायदे कानून और संविधान के दायरे में रह कर ही काम करेगा। दरअसल यह संदेश सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस के जरिए तमाम राजनीतिक दलों को दिया, जोकि सुप्रीम कोर्ट के जरिए राजनीतिक फायदा उठाने का प्रयास कर रहे हैं। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट के बारे में कोई गलतफहमी या अफवाह पहले, इससे पहले ही मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने अप्रत्याशित कदम उठाते हुए पत्रकार वार्ता आयोजित की। सीजेआई ने यह कदम इसलिए उठाया कि नेता कहीं बात का बतंगड़ नहीं बना दे और उसमें सुप्रीम कोर्ट को इसमें नहीं घसीट लें। इसे भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट के आवश्यक न्यायिक फैसलों के उजाले लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधान न्यायाधीश को पत्र लिखकर मुलाकात का समय मांगा था कि वे उन्हें एक ज्ञापन सौंपना चाहते थे, जिसमें 'वोट चोरी' रोकने, मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे, मतदाता सूची के एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) को रोकने और पुन: मतपत्र प्रणाली पर लौटने की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने यह मांग यह कहते हुए ठुकरा दी, कि यदि सुनवाई चाहते हो तो रिट याचिका दायर करो। सीजेआई ने राहुल गांधी के आधिकारिक ईमेल के जवाब में कहा कि इस तरह की मुलाकात उचित नहीं होगी, क्योंकि जिन मुद्दों पर चर्चा की मांग की गई है, वे पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं। इसी के साथ सीजेआई ने दूरदर्शिता अपनाते हुए अगले ही दिन प्रेस कांफ्रेंस करके स्थिति स्पष्ट कर दी, ताकि राजनीतिक दल उसकी बातों का गलत मतलब नहीं निकाल पाएं और सुप्रीम कोर्ट को राजनीतिक विवाद में नहीं घसीट सकें। सीजेआई सूर्यकांत ने यह भी स्पष्ट किया कि संवैधानिक व्यवस्था के तहत सुप्रीम कोर्ट, प्रशासनिक स्तर पर सरकार के कामकाज में दखल नहीं दे सकता, हालांकि नेताओं को अपने मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायिक पक्ष में अदालत का दरवाजा खटखटाने की छूट है। सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में एक दो बार ही ऐसा हुआ है, जब सुप्रीम कोर्ट की तरफ से मीडिया के जरिए कोई जानकारी दी गई है, वरना तो मीडिया ही सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और सुनवाई की जानकारी देता है। भारतीय सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में जजों द्वारा मीडिया से सीधे संवाद करने या प्रेस कॉन्फ्रेंस करने का सबसे चर्चित मौका 12 जनवरी 2018 को आया था। सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ न्यायाधीशों—जस्टिस जे. चेलामेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन बी. लोकूर और जस्टिस कुरियन जोसेफ ने एक ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। भारतीय न्यायिक इतिहास में यह पहला अवसर था जब वर्तमान जजों ने इस तरह मीडिया को संबोधित किया था। इन जजों ने तब के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) दीपक मिश्रा के खिलाफ रोस्टर और प्रशासनिक कामकाज को लेकर सार्वजनिक सवाल उठाए थे। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट अपनी अधिकांश जानकारी और फैसले आधिकारिक प्रेस विज्ञप्तियों अपनी वेबसाइट और सुनवाई के जरिए ही साझा करता है। हाल के दौर में अदालत ने न्यायिक कार्यवाही के लाइव-स्ट्रीमिंग और उसके डिजिटल क्लिप्स के कमर्शियल इस्तेमाल को लेकर भी कड़े नियम तय किए हैं। सीजेआई सूर्यकांत ने मीडिया के सामने स्पष्ट किया था कि मुझे कल बैठक के अनुरोध के संबंध में एक पत्र मिला था। मैंने कल रात ही उसका जवाब दे दिया था, जिसमें उन कारणों का उल्लेख किया गया था कि मैं क्यों नहीं मिल पाऊंगा? सीजेाई ने आगे कहा, सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे सभी के लिए खुले हैं। किसी भी आम नागरिक या निर्वाचित निकाय के सदस्य की किसी भी याचिका का स्वागत है। हर भारतीय नागरिक को अदालत का दरवाजा खटखटाने का अधिकार है। हम उनकी चिंताओं को सुनेंगे और कानून के तहत जो भी उचित होगा, वह करेंगे। सुप्रीम कोर्ट से स्थिति स्पष्ट होने के बाद इंडिया गठबंधन के दलों के पास अपनी मांगों को लेकर कानूनी प्रक्रिया अपनाने का एक ही रास्ता बचा था, वह था रिट याचिका के जरिए न्याय का तकाजा। इंडिया गठबंधन के नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट तक पैदल मार्च निकाला और रिट याचिका दायर की। जिसमें राहुल गांधी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव समेत 11 विपक्षी नेता याचिकाकर्ता हैं। इसमें चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पार्टी बनाया गया है। दरअसल इससे पहले सीजेआई से अकेले ही मुलाकात की मांग करके कांग्रेस ने यह साबित करने की कोशिाश की थी, इंडिया गठबंधन का नेतृत्व वही करती है। बाकी सब उसके पीछे हैं, किन्तु सीजेआई द्वारा मिलने से इंकार करने से कांग्रेस को अपने दाव में सफलता नहीं मिल सकी। जब सीजेआई ने मिलने से इंकार कर दिया और कानूनी तरीका अपनाने की सलाह दी, तब गठबंधन के बाकी नेताओं को भी साथ लेकर याचिका दायर की गई। सुप्रीम कोर्ट ने जाहिर कर दिया कि गैर कानूनी और गैर संवैधानिक तरीके से इंडिया गठबंधन के नेताओं के मंसूबे कामयाब नहीं होने देगा। जो भी करेगा संविधान के दायरे में करेगा, अन्यथा सुप्रीम कोर्ट की साख पर भी बट्टा लग सकता है। यह भी निश्चित है कि कांग्रेस और विपक्षी दलों को कोई खास सफलता सुप्रीम कोर्ट से हाथ नहीं लगने वाली, सिवाए एसआईआर में कुछ प्रशासनिक आदेश निर्देश के, क्यों कि ज्ञानेश कुमार को हटाया नहीं जा सकता, उन्हें संविधान का संरक्षण प्राप्त है। केवल संसद में महाभियोग के जरिए ही मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाया जा सकता है, वह इसलिए पूरा नहीं होगा कि संसद में मोदी सरकार का बहुमत है। इससे पहले भी राजनीतिक इरादों को पूरा करने के विपक्षी दलों के मंसूबों पर सुप्रीम कोर्ट पानी फेर चुका है। नवम्बर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने देश में चुनावों में धांधली का आरोप लगाने वाली एक जनहित याचिका को खारिज कर दिया था। पीठ ने कहा था कि जब आप चुनाव जीतते हैं, तो ईवीएम से छेड़छाड़ नहीं होती। जब आप चुनाव हार जाते हैं, तो छेड़छाड़ हो जाती है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर तीखा व्यंग्य करते हुए पूछा कि ये याचिका दायर करने संबंधित आपको शानदार विचार कैसे मिला? इसी तरह सुप्रीम कोर्ट ने अप्रेल 2023 में 14 विपक्षी दलों की सीबीआई और ईडी की कार्रवाई के लिए नेताओं के लिए अलग से गाइडलाइंस बनाने के निर्देश देने से इंकार कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि विपक्षी नेताओं के खिलाफ ईडी और सीबीआई के ज्यादा केस दिखाने वाले आंकड़ों के आधार पर केवल नेताओं के लिए गाइडलाइन की मांग नहीं कर सकते हैं। उन्हें अभियोजन से कोई छूट नहीं मिलती है। कोर्ट ने कहा कि नेता आम नागरिकों के बराबर ही होते हैं। इसके बाद कोर्ट ने याचिका को वापस लेने की अनुमति दे दी। राजनीतिक दलों के मामले में दूरी बनाए रखने के सुप्रीम कोर्ट के नजरिए से साफ है कि इंडिया गठबंधन को अपने राजनीतिक मुद्दों की लड़ाई जनता की अदालत में लड़नी होगी। सत्ता किसे देनी है और किसे नहीं, इसका फैसला मतदाता ही करेंगे। - योगेन्द्र योगी

प्रभासाक्षी 19 Oct 2026 11:42 am

'हे देवेश्वरी! आप भक्तों की संकटों से रक्षा करती हैं', पीएम मोदी ने मां सिद्धिदात्री से की मंगलकामना

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समाचार नामा 19 Oct 2026 8:13 am

गुजरात: सीएम भूपेंद्र पटेल ने महाअष्टमी पर अंबाजी मंदिर का दौरा किया, नवरात्रि की तैयारियों का लिया जायजा

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समाचार नामा 18 Oct 2026 10:47 pm

'आरएसएस को राजनीतिक चश्मे से नहीं, सेवा कार्यों से समझें', 'हंड्रेड ईयर्स यंग' की लेखिका रश्मि सामंत

'आरएसएस को राजनीतिक चश्मे से नहीं, सेवा कार्यों से समझें', 'हंड्रेड ईयर्स यंग' की लेखिका रश्मि सामंत

समाचार नामा 18 Oct 2026 6:33 pm

'जानबूझकर देश का माहौल खराब कर रहे'; अभिजीत दिपके की सशर्त जमानत पर भाजपा

'जानबूझकर देश का माहौल खराब कर रहे'; अभिजीत दिपके की सशर्त जमानत पर भाजपा

समाचार नामा 18 Oct 2026 6:05 pm

वोट चोरी की प्लानिंग मोदी, संचालन अमित शाह और लागू ज्ञानेश कुमार करते हैं: राहुल गांधी

गोवा की 'गोय राखण यात्रा' में राहुल गांधी ने कहा, मेरे ऊपर 45 से ज्यादा अवमानना केस हैं। लेकिन जब मैं कहता हूं- नरेंद्र मोदी 'वोट चोरी' करते हैं, तब मेरे ऊपर कोई केस नहीं करता। अगर ये केस लग गया तो मामला क़ानूनी हो जाएगा, जिसमें ये उलझ जाएंगे।

सत्य हिंदी 18 Oct 2026 2:12 pm

कोलकाता दुर्गा पूजा पंडाल में भगदड़ पर भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन ने जताया दुख, कहा-'बंगाल के लोगों के साथ मजबूती से खड़े'

कोलकाता दुर्गा पूजा पंडाल में भगदड़ पर भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन ने जताया दुख, कहा-'बंगाल के लोगों के साथ मजबूती से खड़े'

समाचार नामा 18 Oct 2026 12:26 pm

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने दी चेतावनी

वाशिंगटन, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की नीति-निर्धारक समिति ने चेतावनी दी है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को युद्धों, व्यापारिक तनावों, ऊर्जा आपूर्ति में बाधाओं और बढ़ते कर्ज से जुड़े जोखिमों का सामना करना पड़ रहा है।

देशबन्धु 18 Oct 2026 11:03 am

अजय राय ने पिंडरा से विधानसभा चुनाव लड़ने का किया ऐलान, बोले- यह मेरा घर और परिवार है

अजय राय ने पिंडरा से विधानसभा चुनाव लड़ने का किया ऐलान, बोले- यह मेरा घर और परिवार है

समाचार नामा 17 Oct 2026 10:38 pm

बजट सत्र में पंजाबी, पहाड़ी और गोजरी को मिलेगी आधिकारिक मान्यता: सुरिंदर चौधरी

बजट सत्र में पंजाबी, पहाड़ी और गोजरी को मिलेगी आधिकारिक मान्यता: सुरिंदर चौधरी

समाचार नामा 17 Oct 2026 10:30 pm

जीतन राम मांझी ने अनंत सिंह के 'नौ हत्याओं' वाले बयान की जांच की मांग की

जीतन राम मांझी ने अनंत सिंह के 'नौ हत्याओं' वाले बयान की जांच की मांग की

समाचार नामा 17 Oct 2026 10:27 pm

पश्चिम बंगाल: मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तारी का डर, इंद्रनील सेन ने सुप्रीम कोर्ट का खटखटाया दरवाजा

पश्चिम बंगाल: मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तारी का डर, इंद्रनील सेन ने सुप्रीम कोर्ट का खटखटाया दरवाजा

समाचार नामा 17 Oct 2026 10:12 pm

उत्तराखंड में महानवमी पर सार्वजनिक अवकाश, धामी सरकार का बड़ा फैसला

उत्तराखंड में महानवमी पर सार्वजनिक अवकाश, धामी सरकार का बड़ा फैसला

समाचार नामा 17 Oct 2026 8:15 pm

जंतर-मंतर हिंसा: सुप्रीम कोर्ट की समिति ने प्रभावित लोगों से शिकायतें मांगीं

जंतर-मंतर हिंसा: सुप्रीम कोर्ट की समिति ने प्रभावित लोगों से शिकायतें मांगीं

समाचार नामा 17 Oct 2026 8:05 pm

Suvendu Adhikari के शासन में Bengal Durga Puja का विराट स्वरूप देखकर हर Hindu खुशी से झूम रहा, पंडालों में भक्तिभाव के साथ राष्ट्रभाव भी झलक रहा

शुभेन्दु अधिकारी के मुख्यमंत्री बनने के बाद पश्चिम बंगाल में इस बार दुर्गा पूजा महोत्सव की छटा कुछ अलग ही नजर आ रही है। भव्य पंडालों, रंग-बिरंगी रोशनी से जगमगाती सड़कों और बंगाल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती अनूठी कलात्मक प्रस्तुतियों ने दुर्गोत्सव को विशेष आकर्षण प्रदान किया है। मां दुर्गा की आराधना के साथ इस बार कई पंडालों में राष्ट्रगीत वंदे मातरम्, उसके रचयिता बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय, जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और भगवान श्रीराम से जुड़े विषय भी प्रमुखता से उभर रहे हैं। इसी उत्सवी माहौल के बीच केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह रविवार, 18 अक्टूबर को बंगाल के दौरे पर पहुंचेंगे। बेलूर मठ में दर्शन-पूजन से शुरू होकर ऐतिहासिक शोभाबाजार राजबाड़ी और कोलकाता के प्रमुख दुर्गा पूजा पंडालों तक उनका कार्यक्रम बंगाल की सांस्कृतिक जड़ों, आध्यात्मिक परंपराओं और दुर्गोत्सव की भव्यता से जुड़ने की पहल के रूप में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अमित शाह का दौरा सुबह 10:45 बजे हावड़ा स्थित बेलूर मठ में दर्शन-पूजन से शुरू होगा। इसके बाद सुबह 11:30 बजे वे बाली के देशबंधु क्लब दुर्गा पूजा पंडाल पहुंचेंगे। दोपहर एक बजे ऐतिहासिक शोभाबाजार राजबाड़ी में मां दुर्गा के दर्शन करेंगे और दोपहर 1:30 बजे दमदम दक्षिण के लेक टाउन स्थित श्रीभूमि दुर्गा पूजा पंडाल का दौरा करेंगे। इस कार्यक्रम में आध्यात्मिक परंपरा, ऐतिहासिक पारिवारिक पूजा और आधुनिक सामुदायिक उत्सवों के विविध स्वरूपों को स्थान दिया गया है। इसे भी पढ़ें: Kolkata के Durga Puja पंडालों में राम मंदिर और Vande Mataram की थीम पर उमड़ी भीड़ बेलूर मठ से राजबाड़ी तक, बंगाल की सांस्कृतिक विरासत पर जोर बेलूर मठ का चयन इस दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि यह स्वामी विवेकानंद की आध्यात्मिक और वैचारिक विरासत से जुड़ा प्रमुख केंद्र है। देखा जाये तो बंगाल की पहचान केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें साहित्य, दर्शन, सामाजिक सुधार और आध्यात्मिक चिंतन की भी गहरी परंपरा रही है। इसके बाद शोभाबाजार राजबाड़ी का अमित शाह का दौरा बंगाल की ऐतिहासिक बोनेदी बाड़ी पूजा यानी प्रतिष्ठित पारिवारिक दुर्गा पूजा की परंपरा से जुड़ने का अवसर देगा। हम आपको बता दें कि बंगाल में दुर्गोत्सव का इतिहास समय के साथ व्यापक सामाजिक भागीदारी की कहानी भी कहता है। कभी संपन्न और प्रभावशाली परिवारों की राजबाड़ियों तक सीमित रहने वाली पूजा धीरे-धीरे बारोवारी और सार्वजनिक पूजा के माध्यम से आम लोगों के बड़े उत्सव में बदल गई। सामुदायिक पंडालों ने दुर्गा पूजा को अधिक व्यापक सामाजिक स्वरूप दिया। आज यही उत्सव बंगाल की सामूहिक चेतना, कलात्मक प्रतिभा और सामाजिक सहभागिता का प्रतीक बन चुका है। वंदे मातरम् से श्यामा प्रसाद मुखर्जी तक, पंडालों में राष्ट्रभाव की झलक हम आपको बता दें कि इस वर्ष कोलकाता के कई प्रमुख पूजा पंडालों में राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर विशेष प्रस्तुतियां देखने को मिल रही हैं। संतोष मित्र स्क्वायर, 66 पल्ली, कालीघाट, कांकुड़गाछी मिलन मेला समिति और सोदपुर के बिजॉयपुर सार्वजनिन जैसे पूजा आयोजनों ने इस विषय को अपने पंडालों की परिकल्पना में शामिल किया है। संतोष मित्र स्क्वायर में इस बार ‘सनातनी चेतनाय वंदे मातरम्’ की थीम के तहत लाल किले की आकृति से प्रेरित पंडाल और रोशनी से सजे भारत के मानचित्र को आकर्षण का केंद्र बनाया गया है। वहीं, न्यू अलीपुर के सुरुचि संघ ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के 125वें जन्मवर्ष के अवसर पर ‘उत्स’ यानी उद्गम विषय के माध्यम से उनके जीवन को प्रदर्शित किया है। प्रतिमाओं, तस्वीरों और समाचार-पत्रों की कतरनों के जरिए उनके जीवन और योगदान को सामने लाने का प्रयास किया गया है। इन प्रस्तुतियों में पूजा समितियों की कलात्मक कल्पनाशीलता के साथ इतिहास और राष्ट्रभाव को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश भी दिखाई देती है। रंगों से सजी सड़कें, आकर्षक पंडाल और उत्सव का नया दृश्य साथ ही दुर्गा पूजा से पहले कोलकाता की सड़कों, पुलों और फ्लाईओवरों को भी रंगीन रूप दिया गया है। गड़ियाहाट और रेड रोड जैसे इलाकों में पीले, नारंगी, गुलाबी, हरे और लाल रंगों की पट्टियों के साथ पारंपरिक बंगाली अल्पना की कलाकृतियां उत्सव का वातावरण बना रही हैं। शहर की सजावट और पंडालों की भव्यता ने दुर्गोत्सव के दृश्यात्मक आकर्षण को और बढ़ाया है। हम आपको बता दें कि पश्चिम बंगाल में ‘नवपत्रिका’ के पारंपरिक स्नान के साथ दुर्गा पूजा की शुरुआत हुई। ‘नवपत्रिका’ का अर्थ नौ पौधों के समूह से है। दुर्गा पूजा आयोजकों ने साड़ी में लिपटी ‘नवपत्रिका’ को धार्मिक रीति-रिवाज के अनुसार स्नान कराने के लिए गंगा और अन्य नदियों तथा जलाशयों के तटों की ओर रुख किया। कोलकाता में सुबह से ही पंडालों में लोगों के आने का सिलसिला शुरू हो गया था। मौसम अनुकूल रहने के कारण बड़ी संख्या में लोग शहर में भव्य रूप से सजाए गए पूजा पंडालों को देखने के लिए निकले। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने इस मौके पर लोगों को शुभकामनाएं दीं, जबकि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य भी शहर के विभिन्न दुर्गा पूजा पंडालों में गये। इस वर्ष महा सप्तमी के अनुष्ठान दो दिन तक चलेंगे। सप्ताहांत होने के कारण त्योहार का उत्साह और बढ़ गया है। राजनीति से आगे, बंगाल की सांस्कृतिक पहचान की चुनौती देखा जाये तो भाजपा के लिए इस बार का दुर्गोत्सव केवल धार्मिक आयोजनों में भागीदारी का अवसर नहीं, बल्कि बंगाल के समाज और उसकी विशिष्ट सांस्कृतिक परंपराओं के साथ जुड़ाव मजबूत करने की भी कसौटी है। अमित शाह का बेलूर मठ और ऐतिहासिक पूजा स्थलों का प्रस्तावित दौरा इसी व्यापक संदर्भ में महत्वपूर्ण है। बंगाल की सांस्कृतिक पहचान बहुलतावादी रही है। यहां दुर्गा पूजा आस्था के साथ कला, साहित्य, सामाजिक सहभागिता और लोकजीवन का उत्सव भी है। फिलहाल, रंगों से सजी सड़कों, भव्य पंडालों, ऐतिहासिक विषयों और राष्ट्रभाव से जुड़ी प्रस्तुतियों के बीच बंगाल का दुर्गोत्सव एक बार फिर अपने विराट स्वरूप में सामने है। भाजपा शासन में आयोजित हो रहा यह पहला दुर्गा पूजा महोत्सव राजनीतिक दृष्टि से भले ही विशेष महत्व रखता हो, लेकिन इसकी सबसे बड़ी पहचान मां दुर्गा के प्रति श्रद्धा, बंगाल की कलात्मक प्रतिभा और जनभागीदारी की जीवंत परंपरा ही है। अमित शाह का दौरा इसी उत्सवी माहौल में सांस्कृतिक जुड़ाव का एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ने जा रहा है। साथ ही इस बार भाजपा सरकार की ओर से मिले सहयोग और समर्थन के चलते पूजा समितियों में भी उत्साह और संतोष का माहौल दिखाई दे रहा है। आयोजकों को उम्मीद है कि सरकारी सहयोग से दुर्गोत्सव और अधिक भव्य एवं व्यवस्थित रूप ले सकेगा। बहरहाल, हर हिंदू बिना किसी डर या बाधा के पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मां दुर्गा की पूजा कर पा रहा है, ऐसा माहौल बनाने में मिली सफलता भाजपा सरकार के लिए एक बड़ी उपलब्धि की तरह है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 17 Oct 2026 6:04 pm

भीड़ और अवधि का ब्योरा जरूरी, तभी मिलती है सेंट्रल पार्क में आयोजन की अनुमति: एनडीएमसी अध्यक्ष

भीड़ और अवधि का ब्योरा जरूरी, तभी मिलती है सेंट्रल पार्क में आयोजन की अनुमति: एनडीएमसी अध्यक्ष

समाचार नामा 17 Oct 2026 4:33 pm

London में Dhruv Rathee और Washington में 6 अमेरिकी सांसदों ने थामी भारत विरोधी अभियान की कमान

भारत के अंदरूनी मामलों में टांग अड़ाने और दुनिया भर में भारत को कटघरे में खड़ा करने का खेल एक बार फिर शुरू हो गया है। अमेरिकी सांसद प्रमिला जयपाल, इल्हान उमर, जिम मैकगवर्न, रशीदा तलाइब, एलेनॉर होम्स नॉर्टन और जीसस गार्सिया ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो को चिट्ठी लिखकर मांग की है कि वे भारत दौरे पर छात्र प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई और कथित हिरासतों का मुद्दा उठाएं। यहां सवाल उठता है कि भारत को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने निकले इन सांसदों को आखिर किसने हक दिया कि वे हमारे देश के आंतरिक मामलों में दखल दें? भारत की समस्याओं पर इतनी चिंता दिखाने वाले इन नेताओं से यह भी पूछा जाना चाहिए कि उनकी यह चिंता चुनिंदा मुद्दों पर ही क्यों जागती है और भारत के मामले में वे हर बार उंगली उठाने के लिए सबसे आगे क्यों खड़े नजर आते हैं? साथ ही सवाल यह भी उठता है कि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र पर उंगली उठाने वाले इन जनप्रतिनिधियों की अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं और अंतरराष्ट्रीय आचरण की पड़ताल कौन करेगा? वैसे यह कोई पहला अवसर नहीं है जब इन अमेरिकी नेताओं ने भारत की नीतियों पर सवाल उठाए हों। प्रमिला जयपाल ने 2019 में भी जम्मू-कश्मीर में संचार प्रतिबंधों और हिरासतों को लेकर भारत से जवाब मांगा था। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने उस समय उनके आकलन को अनुचित बताते हुए उनसे मुलाकात करने तक में रुचि नहीं दिखाई थी। अप्रैल 2022 में इल्हान उमर के पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर के दौरे पर भारत ने कड़ी आपत्ति जताई थी और इसे देश की संप्रभुता से जुड़ा मामला बताया था। इल्हान उमर का तो अक्सर भारत विरोधी रवैया सामने आता ही रहता है। इसे भी पढ़ें: Dhruv Rathee ने 'वोट चोरी' के खिलाफ लंदन में विरोध प्रदर्शन की घोषणा की; कहा- अब 'अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आवाज उठाने' का समय आ गया है सवाल उठता है कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को ठीक से समझे बिना विदेशी दबाव बनाने की यह राजनीति आखिर क्यों चल रही है? क्या किसी राजनीतिक दल या किसी संगठन के आंदोलन के दौरान लगाये गये आरोपों को ही सच मानकर भारत को कटघरे में खड़ा कर देना इन सांसदों का नया शगल बन गया है? अगर इन्हें वाकई लोकतंत्र और नागरिकों की आजादी की इतनी चिंता है, तो यह चिंता हर देश के मामले में एक जैसी क्यों नहीं दिखती? आखिर भारत के मामले में ही इनका लोकतांत्रिक प्रेम क्यों उमड़ने लगता है? क्या भारत को नसीहत देना और उसके आंतरिक मामलों में दखल देना ही इनकी राजनीति का असली मकसद है? अब बात ध्रुव राठी की। जर्मनी में रहने वाले इस यूट्यूबर ने लंदन पहुंचकर पार्लियामेंट चौक में महात्मा गांधी की प्रतिमा के निकट 18 अक्टूबर को प्रदर्शन करने का आह्वान किया है। उन्होंने भारत में कथित ‘वोट चोरी’ के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने की बात कही है और विदेशों में लोगों से इस अभियान में शामिल होने का आग्रह किया है। यहां सवाल उठता है कि अगर ध्रुव राठी के पास वोट चोरी के सबूत थे तो वह उन्होंने अपने भारत दौरे के दौरान पुलिस या कोर्ट को क्यों नहीं दिये? क्यों वह वापस विदेश भाग गये? हर बात पर विदेशों में ढिंढोरा पीटना और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की चुनावी व्यवस्था को बदनाम करने की कोशिश करना आखिर किस बात का संकेत है? चुनावी प्रक्रिया से शिकायत होना अलग बात है, लेकिन अपनी राजनीतिक खुन्नस निकालने के लिए पूरी चुनाव व्यवस्था पर सवाल उठाना और दुनिया भर में भारत के लोकतंत्र की साख पर बट्टा लगाने की कोशिश करना अलग बात है। देखा जाये तो आरोप लगाना आसान है, लेकिन आरोपों को सबूतों के दम पर साबित करना ही असली कसौटी है! सवाल यह भी है कि ध्रुव राठी आखिर विदेशों में बैठकर भारत के खिलाफ इतना बड़ा अभियान किसके दम पर चला रहे हैं? लंदन में प्रदर्शन, विदेशी मंचों पर भारत को घेरने की कोशिश और देश की राजनीति को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने की मुहिम, क्या यह सब महज संयोग है, या इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है? विदेशी फंडिंग के आरोपों को झुठलाने वाले ध्रुव राठी को बताना चाहिए कि इस पूरे अभियान का पैसा कहां से आ रहा है, इसे कौन चला रहा है और इसके पीछे किसके हित जुड़े हैं? आखिर कौन है जो भारत की छवि को विदेशों में नुकसान पहुंचाने वाले ऐसे अभियानों को ताकत दे रहा है? साथ ही लंदन में भारत सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थन में भारतीयों का मैदान में उतरना उन लोगों के लिए करारा जवाब है, जो विदेशों में बैठकर भारत के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश करते हैं। उन्हें समझ लेना चाहिए कि विदेशों में रहने वाले भारतीय कोई उनके इशारे पर चलने वाली भीड़ नहीं हैं। इस देश से प्यार करने वाले लाखों भारतीय दुनिया के किसी भी कोने में हों, तिरंगा उठाना और अपनी सरकार के समर्थन में आवाज बुलंद करना जानते हैं। भारत के खिलाफ नारे लगाने वाले ही लोकतंत्र के ठेकेदार नहीं हैं; भारत के समर्थन में खड़े होने वालों को भी अपनी बात कहने का पूरा हक है। करोड़ों भारतीयों के वोट से बनी सरकार का फैसला विदेशों में बैठे कुछ लोगों के शोर-शराबे से नहीं बदला जा सकता। भारत किस दिशा में आगे बढ़ेगा, यह फैसला भारत की जनता करेगी, कोई विदेशी ताकत नहीं! इसके अलावा, यह भी बड़ी हैरानी की बात है कि संयुक्त राष्ट्र की संस्थाओं को भारत के मामलों में दखल देने की इतनी जल्दी रहती है कि वे किसी भी आरोप पर चिंता जताने से पहले पूरी सच्चाई जानने की जहमत तक नहीं उठातीं! 10 अक्टूबर को दिल्ली में प्रदर्शनों के दौरान हिरासतों की खबरों पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने चिंता जताई, तो भारत ने भी साफ-साफ जवाब दे दिया कि देश के आंतरिक मामलों में इस तरह की दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति में भी भारत ने इन टिप्पणियों पर कड़ा ऐतराज जताते हुए अपने संविधान, स्वतंत्र न्यायपालिका और स्वतंत्र प्रेस का हवाला दिया। सवाल यह है कि मानवाधिकारों की दुहाई देने वाली इन वैश्विक संस्थाओं को दुनिया के हर मामले में एक जैसी तत्परता क्यों नहीं दिखती? भारत के मामले में बिना पूरी तस्वीर समझे बयान देने की जल्दी और दूसरे मामलों में चुप्पी...आखिर यह दोहरा रवैया कब तक चलेगा? जब संस्थाएं चुनिंदा मुद्दों पर ही जागेंगी और अलग-अलग देशों के लिए अलग-अलग तराजू रखेंगी, तो उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठेंगे ही। यही रवैया उनकी विश्वसनीयता को कमजोर करता है और दुनिया भर में लोगों के मन में यह सवाल खड़ा करता है कि क्या ये संस्थाएं सचमुच मानवाधिकारों की रक्षा कर रही हैं या चुनिंदा राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने का जरिया बनती जा रही हैं? उधर, भारत सरकार ने साफ कर दिया है कि भारत के संविधान, लोकतांत्रिक व्यवस्था और संस्थाओं पर बिना पूरी जानकारी के उंगली उठाने वालों को मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा। भारत कोई ऐसा देश नहीं है कि कोई भी विदेशी संस्था या नेता उठे और बिना सोचे-समझे हमें लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने लगे! भारत के अपने कानून हैं, अपनी अदालतें हैं और अपना संवैधानिक ढांचा है। लिहाजा, भारत पर सवाल उठाने वालों को पहले तथ्यों की जांच करनी चाहिए, फिर बयानबाजी करनी चाहिए। भारत को बदनाम करने की कोशिश करने वालों को यह समझना होगा कि हर आरोप पर जवाब मिलेगा और तथ्यों के दम पर मिलेगा। बहरहाल, जो लोग सत्ता पलटने का ख्वाब देख रहे हैं उन्हें भी समझना होगा कि भारत की ताकत किसी एक सरकार में नहीं, बल्कि उस करोड़ों भारतीयों के जनादेश में है, जिसने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की नींव मजबूत की है। इस देश को न विदेशी मंचों पर बैठकर भाषण देने वाले कुछ नेता चला सकते हैं, न सोशल मीडिया पर शोर मचाकर खुद को लोकतंत्र का सबसे बड़ा रखवाला बताने वाले लोग! भारत की छवि को झूठे आरोपों, आधी-अधूरी जानकारी और राजनीतिक एजेंडे के सहारे चोट पहुंचाने का सपना देखने वालों को समझना होगा कि भारत कोई कमजोर देश नहीं, जिसकी साख चंद बयानों से मिटा दी जाए। भारत पर उंगली उठाने से पहले अपने तथ्यों की जांच करो, आरोप लगाने से पहले सबूत जुटाओ और लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने से पहले यह समझो कि भारत का भविष्य तय करने का अधिकार भारतीय जनता के पास है, किसी विदेशी नेता या सोशल मीडिया के स्वयंभू विशेषज्ञ के पास नहीं! सवाल पूछने हैं तो पूछिए, लेकिन सवालों की आड़ में देश की संस्थाओं को बदनाम करने का ठेका मत लीजिए। क्योंकि भारत की असली ताकत तिरंगे के नीचे खड़े करोड़ों लोगों का विश्वास, स्वाभिमान और अपने देश का फैसला खुद करने का अधिकार है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 17 Oct 2026 4:03 pm

प्रधानमंत्री मोदी 25 अक्टूबर को करेंगे वाराणसी का दौरा, नमो घाट पर आयोजित एयर शो में होंगे शामिल

प्रधानमंत्री मोदी 25 अक्टूबर को करेंगे वाराणसी का दौरा, नमो घाट पर आयोजित एयर शो में होंगे शामिल

समाचार नामा 17 Oct 2026 2:42 pm

भारतीय शेयर बाजार में तेजी, एफआईआई फिर बने खरीदार

नई दिल्ली, विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) ने शुक्रवार को भारतीय शेयर बाजार में 1,166 करोड़ रुपए का इक्विटी में निवेश किया। इसकी वजह बाजार में तेजी लौटना था। यह जानकारी एनालिस्ट की ओर से शनिवार को दी गई।

देशबन्धु 17 Oct 2026 1:35 pm

'हिंदुस्तान न बांग्लादेश बन सकता और न पाकिस्तान, यहां अपनी संस्कृति', विपक्ष के प्रदर्शन पर बोले स्वतंत्र देव सिंह

'हिंदुस्तान न बांग्लादेश बन सकता और न पाकिस्तान, यहां अपनी संस्कृति', विपक्ष के प्रदर्शन पर बोले स्वतंत्र देव सिंह

समाचार नामा 17 Oct 2026 12:32 pm

सवालों के घेरे में हैं 'जेएनयू के क्रांतिकारियों' की 'चयनित चुप्पियां'

शिक्षा केंद्रों की कलंक कथाएं अनंत हैं। गुरु-शिष्य परंपरा को लजाते प्रकरण मुंह चिढ़ा रहे हैं। ऐसी खबरें अब बहुत विचलित नहीं करतीं। किंतु बात जब जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय जैसे शिक्षा केंद्र की हो तो मामला साधारण नहीं रह जाता। आरोप किसी साधारण शिक्षक पर नहीं, मणिपुर से लोकसभा के सांसद प्रोफेसर अंगोमचा बिमोल अकोइजम पर हैं। वे जेएनयू के सामाजिक विज्ञान अध्ययन केंद्र में प्राध्यापक थे। जेएनयू प्रशासन ने 11 छात्राओं की शिकायतों की जांच के बाद प्रोफेसर अंगोमचा बिमोल अकोइजम को बर्खास्त कर दिया है। वे अभी सांसद बने हुए हैं। प्रो. बिमोल ने इन आरोपों पर सफाई देते हुए कहा कि उन्हें सरकार विरोधी रवैये के कारण शिकार बनाया जा रहा है। इस सफाई के बहुत मायने नहीं हैं। मुद्दा है शिक्षक की गरिमा का, यदि वह जनप्रतिनिधि हैं तो मामला गंभीर हो जाता है। कटघरों को तोड़कर आगे आती बेटियां- जेएनयू जैसे विश्वविद्यालय में जागरुक विद्यार्थियों की संख्या काफी है। राजनीतिक तौर पर भी उनकी सक्रियता किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में किसी प्राध्यापक का यह रवैया आश्चर्यजनक है। उन छात्राओं के साहस को भी नमन करना चाहिए, जिनके कारण यह प्रकरण प्रकाश में आ सका। हमारी परंपरा में शिक्षक अपने विद्यार्थियों के लिए अभिभावक हैं। इस गरिमा को छोड़कर अपने विद्यार्थियों का किसी भी तरह का शोषण स्वीकार्य नहीं है। यह उस अकादमिक भरोसे की हत्या है, जिस पर शिक्षा की नींव टिकी है। आरोपी प्रोफेसर के बारे में विश्वविद्यालय की आंतरिक शिकायत समिति ने शिकायतों को सही पाया है। नैतिकता के आधार पर उन्हें सांसद पद से इस्तीफा देना चाहिए। उनकी अपनी कांग्रेस पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक बयान अभी तक सामने नहीं आया है। यह बात रेखांकित करती है कि शिक्षा केंद्रों में शिक्षक सुरक्षित माहौल नहीं देगें तो युवा पीढ़ी का मानसिक और शैक्षणिक विकास कैसे होगा? यह भी सुखद है कि जागरुक विद्यार्थी अब किसी तरह के शोषण को सहने को तैयार नहीं हैं। पीड़िताएं अब डरने के बजाए संस्थागत प्रक्रियाओं का दरवाजा खटखटा रही हैं। इसे भी पढ़ें: 11 छात्राओं के आरोप और FIR के बाद Congress MP Bimol Akoijam को Delhi Police का समन स्त्रियों ने इस समय में अपनी शक्ति को पहचान लिया है। वे बेहतर कर रही हैं और आगे आसमां छूने की कोशिशों में हैं। यहां भी पुरुष सत्ता चोटिल होती हुई लगती है। उसके प्रति सम्मान और संवेदनशीलता के बजाए, किस्से बनाने और उसे कमतर साबित करने की कोशिशें हर स्तर हो रही हैं। तेज होते सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों के इस दौर में सिर्फ कानून ही स्त्री के साथ खड़े हैं। कई जगह स्त्रियां भी, स्त्रियों के खिलाफ खड़ी हैं। यह संक्रमण काल है, स्त्री को अपने वजूद को साबित करते हुए निरंतर आगे बढ़ने का समय है। वह जीत रही है और आगे बढ़ रही है। आज की बेटियां अपने सपनों में रंग भर रही हैं। आसान शिकार होने के नाते कुछ शिकारी उसकी घात में हैं, किंतु आज की औरत इससे डरती नहीं। घबराती नहीं। वह बने-बनाए कठघरों को तोड़कर आगे आ रही है। दलगत सीमाओं से ऊपर उठें- कानून से ऊपर कोई नहीं है। आरोपी प्रोफेसर सांसद हैं तो उन्हें कुछ विशेषाधिकार जरुर हासिल हैं। ऐसे में मुद्दा यह भी है कि जब कानून बनाने वाले ही महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचा रहे हैं तो राजनीतिक शुचिता का क्या होगा। दलगत राजनीति और चयनित चुप्पियों के समय में राजनीतक दलों का रवैया दोमुंहा हो जाता है। टीवी डिबेट्स में राजनीतिक दलों की महिला प्रवक्ता भी उक्त प्राध्यापक का बचाव करते नजर आ रहे हैं। यह तर्क भी कितने गलीज हैं कि दूसरे दल के लोगों पर भी आरोप लगे हैं। इससे गहरी राजनीतिक संवेदनहीनता प्रकट होती है। आपको इसलिए छोड़ दिया जाए क्योंकि प्रतिपक्ष पर भी ऐसे आरोप हैं। नैतिकता और महिला सुरक्षा के मुद्दों पर दलीय सीमाओं से ऊपर उठकर स्त्री सम्मान के लिए सभी को खड़ा होना चाहिए। संसद को हम लोकतंत्र का मंदिर मानते हैं। वहां बैठे सांसदों से उच्च नैतिक आचरण की अपेक्षाएं बेमानी नहीं हैं। हालात इतने बदतर हैं कि गंभीर आरोपों से घिरे लोग अकसर संस्थागत जांच की वैधता पर सवालिया निशान लगाकर सहानुभूति हासिल करने का प्रयास करते हैं। इस मामले में भी यही दिख रहा है। वहीं दूसरी ओर जेएनयू प्रशासन का यह दावा कि उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए आंतरिक समिति की रिर्पोट के आधार पर सांसद-प्राध्यापक पर कार्रवाई की गई है। यह साबित करता है कि राजनीतिक पदों की धमक से ऊपर अब संस्थागत नियमों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। लक्ष्मण रेखा खींचने की जरुरत- विश्वविद्यालयों के परिसरों में वैचारिक विमर्श हों। संवाद हों। किंतु वे ताकतवर लोगों के लिए सुरक्षित शरणगाह नहीं बनें। लक्ष्मण रेखा खींचने की जरुरत है। इस पर शिक्षकों को विचार करना होगा। अपने गिरेबां में झांकना होगा। शिक्षा परिसरों में पुलिस डेरा डाल रही है। उनकी स्वायत्तता और सम्मान आज हाशिए पर है। राजनीतिक दलों से जुड़ी अपनी आस्थाओं के कारण अगर शिक्षक अपनी भूमिका से समझौता करेगें, तो उनका सम्मान बच नहीं सकता। विचारधारा और देशद्रोही विचारों के आधार पर चलने वाली शक्तियां परिसर को तो कलंकित करेंगी। शिक्षकों के सम्मान को आहत करेंगी। जेएनयू में कई वर्षों से चल रही भारत विरोधी गतिविधियों को रोकने, संभालने और अपने युवाओं को सही राह दिखाने की कोशिशें होतीं तो यह आज नासूर बनकर न फूटता। सवाल सीधा है कि जेएनयू में हर देशद्रोही को स्पेस क्यों मिल जाता है? कोई भी विचार तभी तक स्वीकार्य है, जब तक हमारी अकादमिक योग्यताओं को निखारने और संवर्धित करने में सहायक हो। जो विचार देश तोड़ने और उसके टुकड़े करने के स्वप्न देखे उसका मिट जाना ही ठीक है। संस्थागत जवाबदेही जरुरी- अब जबकि स्त्रियों के सम्मान का मामला सामने है, तब ‘जेएनयू के क्रांतिकारियों’ की चयनित चुप्पियां सवालों के घेरे में हैं। यह प्रकरण अपने पद का दुरुपयोग करते हुए छात्राओं के उत्पीड़न का है। यह गुरु-शिष्य संबंधों को प्रभावित करता है। छात्राओं को भयभुक्त वातावरण प्रदान करना शासन- विश्वविद्यालय प्रशासन की जिम्मेदारी है। क्यों हम अपने परिसरों को छात्राओं के लिए सुरक्षित स्थान नहीं बना पाए हैं? जेएनयू जैसे जागरुक परिसर में ऐसा हो रहा है तो छोटे स्थान पर क्या हो रहा होगा? किसी छात्रा के लिए सत्ता प्रतिष्ठान से टकराना साधारण नहीं होता। बात जब यौन उत्पीड़न की हो मामला और संवेदनशील हो जाता है। छात्राओं को हिम्मत देना जरूरी है। जेएनयू की प्रथम महिला कुलपति प्रोफेसर शांतिश्री धूलिपुड़ी पंडित ने संवेदना के साथ इस विषय में न्याय किया है। समाज के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया है। स्त्री सुरक्षा से जुड़े मामलों में ऐसी ही कार्रवाई अपेक्षित है। इस मामले के बाद उच्च शिक्षा परिसरों में सुरक्षा, सत्ता के दुरुपयोग और संस्थागत जबावदेही के सवाल उठेंगे। इसलिए इसका परिप्रेक्ष्य व्यापक है। “लड़की हूं लड़ सकती हूं” और “बेटी बचाओ -बेटी पढ़ाओ” के नारों के बीच ऐसी घटनाएं हमें मुंह चिढ़ा रही हैं। इस सिलसिले को रोकने के लिए कौन आएगा ? जीवंत समाज अपने समाज के प्रश्नों के हल खुद खोजता है। वह टीवी बहसों से प्रभावित नहीं होता। क्योंकि ये हमेशा अंतहीन और निष्कर्षहीन ही होती हैं। स्त्री सुरक्षा पर हमने आज ही सोचने और कुछ करने की शुरुआत नहीं की तो कल बहुत देर हो जाएगी। - प्रो. संजय द्विवेदी (लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। भारतीय जनसंचार संस्थान के महानिदेशक रहे हैं। )

प्रभासाक्षी 17 Oct 2026 12:10 pm

राजनीति नहीं चली तो कूटनीति में हाथ आजमाने चले Rahul Gandhi ! मगर Jaishankar पर हमला करते ही सामने आ गया Salman Khurshid का रिकॉर्ड

राहुल गांधी राजनीति सही से नहीं कर पा रहे तो उन्होंने कूटनीति में हाथ आजमाना चाहा लेकिन यहां भी उन्हें लेने के देने पड़ गये। दरअसल विदेश मंत्री एस. जयशंकर की मुंबई में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से प्रस्तावित मुलाकात को लेकर राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा लेकिन जैसा ही कांग्रेस के अतीत का एक वाकया सामने आया वैसे ही विपक्ष के नेता बगलें झांकने लगे। जयशंकर के मुंबई में विदेशी मेहमानों से मिलने पर सवाल उठाने से पहले राहुल गांधी शायद यह भूल गए कि उनकी पार्टी की अगुवाई वाली यूपीए सरकार के दौरान तत्कालीन विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने भी जयपुर में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ की मेजबानी की थी। तब विदेशी मेहमानों से मुलाकात के लिए दिल्ली के बजाय किसी दूसरे शहर को चुनने पर कांग्रेस को कोई असहजता नहीं थी। ऐसे में सवाल उठता है कि जो तरीका कांग्रेस की सरकार में स्वीकार्य था, वही आज मोदी सरकार के समय राजनीतिक हमले का मुद्दा कैसे बन गया? हम आपको बता दें कि भारतीय विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को स्पष्ट किया कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर 19 और 20 अक्टूबर को मुंबई में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के उपप्रधानमंत्री एवं विदेश मंत्री अब्दुल्ला बिन जायद अल नाहयान की मेजबानी करेंगे। इसके बाद 20 अक्टूबर को उनकी अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ वार्ता होगी। जयशंकर अमेरिका की स्वतंत्रता की 250वीं वर्षगांठ के समारोह में भी विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल होंगे। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इन कार्यक्रमों की जानकारी देते हुए साफ किया कि विदेशी प्रतिनिधियों की मेजबानी दिल्ली से बाहर करना कोई नई या असाधारण परंपरा नहीं है। दिल्ली के बाहर कूटनीति पर कांग्रेस का दोहरा रवैया? दरअसल, विवाद तब शुरू हुआ, जब राहुल गांधी ने एक्स पर पोस्ट कर प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधा। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि रुबियो ने अपने कर्मचारी को मुंबई बुलाया है और विदेश मंत्रालय के अधिकारी ही इस मुलाकात को लेकर असमंजस में हैं। राहुल ने प्रधानमंत्री से पूरे मामले पर सफाई देने की मांग की और यहां तक कह दिया कि जरूरत पड़े तो वह खुद भी इसे समझा सकते हैं। इससे पहले अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर के रुबियो और जयशंकर की मुंबई में प्रस्तावित मुलाकात की जानकारी देने पर भी कांग्रेस ने सवाल उठाए थे। इसे भी पढ़ें: दिल्ली के बाहर विदेशी मेहमानों की मेजबानी स्थापित परंपरा, Rahul Gandhi को MEA का जवाब वहीं राहुल गांधी के आरोपों का जवाब देते हुए विदेश मंत्रालय ने साफ किया कि विदेशी नेताओं और मंत्रियों की मेजबानी दिल्ली के बजाय दूसरे शहरों में करना कोई नई बात नहीं है। प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि पिछले कई वर्षों से भारत में यह परंपरा जारी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्पेन के प्रधानमंत्री से वडोदरा और जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज से अहमदाबाद में मुलाकात कर चुके हैं। मॉरीशस के प्रधानमंत्री की मेजबानी वाराणसी में हुई, जबकि विदेश मंत्रियों की बैठक गोवा और ‘हार्ट ऑफ एशिया’ सम्मेलन अमृतसर में आयोजित किया गया। इतना ही नहीं, गुजरात के केवड़िया में बोत्सवाना के विदेश मंत्री का भी स्वागत किया गया था। 2013 में सलमान खुर्शीद ने जयपुर में किया था पाकिस्तानी पीएम का स्वागत देखा जाये तो कांग्रेस के लिए सबसे असहज करने वाला उदाहरण मार्च 2013 का है। उस समय केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार थी और सलमान खुर्शीद विदेश मंत्री थे। नौ मार्च 2013 को उन्होंने जयपुर के रामबाग पैलेस होटल में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ के लिए दोपहर के भोज की मेजबानी की थी। दरअसल, अशरफ भारत की एक दिवसीय निजी यात्रा पर अजमेर शरीफ दरगाह में जियारत करने आए थे। उस समय सरकार ने स्पष्ट किया था कि इस मुलाकात में किसी ठोस द्विपक्षीय मुद्दे पर बातचीत का कार्यक्रम नहीं था। इसे सीमित भागीदारी वाला ‘वर्किंग लंच’ बताया गया था। विदेश मंत्रालय के तत्कालीन प्रवक्ता ने यह भी कहा था कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री एक महत्वपूर्ण पड़ोसी देश के नेता हैं और दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध हैं। यानी, कांग्रेस सरकार के समय भी एक पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की मेजबानी दिल्ली के बजाय जयपुर में हुई थी, भले ही यात्रा निजी धार्मिक उद्देश्य से जुड़ी थी और औपचारिक द्विपक्षीय वार्ता प्रस्तावित नहीं थी। इस ऐतिहासिक तथ्य को नजरअंदाज करके मुंबई में जयशंकर की कूटनीतिक मुलाकात पर सवाल उठाना कांग्रेस के तर्कों को कमजोर करता है। कूटनीति को राजनीति का हथियार बनाने से बचें राहुल देखा जाये तो विदेश नीति जैसे संवेदनशील विषय पर सरकार से सवाल पूछना विपक्ष का अधिकार है। लेकिन सवाल तथ्यों के आधार पर होने चाहिए, न कि हर सरकारी कदम को संदेह के घेरे में खड़ा करने के लिए। किसी विदेशी नेता या मंत्री से दिल्ली के बाहर मुलाकात होना अपने आप में न तो असामान्य है और न ही किसी तरह की कूटनीतिक कमजोरी का प्रमाण। साथ ही राहुल गांधी को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि यदि जयपुर में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की मेजबानी कांग्रेस सरकार के लिए सामान्य राजनयिक व्यवहार था, तो मुंबई में अमेरिकी विदेश मंत्री से बातचीत को लेकर इतना हंगामा क्यों हो रहा है? आखिर कूटनीति का मूल्यांकन मुलाकात के स्थान से होगा या उसके उद्देश्य, एजेंडे और परिणामों से? बहरहाल, राजनीतिक बयानबाजी से सुर्खियां जरूर बटोरी जा सकती हैं, लेकिन विदेश नीति पर गंभीर बहस के लिए तथ्यों और निरंतरता को समझना जरूरी है। राहुल गांधी को जयशंकर पर सवाल उठाने से पहले अपनी ही पार्टी के शासनकाल का रिकॉर्ड देखना चाहिए। राहुल गांधी को समझना होगा कि लोकतंत्र में जवाबदेही सबकी होती है सत्ता पक्ष की भी और विपक्ष की भी। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 17 Oct 2026 11:51 am

झोटा हत्याकांड में सचिन पायलट और गुरजीत औजला ने 'मान सरकार' को घेरा, कानून व्यवस्था पर उठाए सवाल

झोटा हत्याकांड में सचिन पायलट और गुरजीत औजला ने 'मान सरकार' को घेरा, कानून व्यवस्था पर उठाए सवाल

समाचार नामा 17 Oct 2026 10:24 am

'कॉकरोच जनता पार्टी' का दावा- 'लहरा दो तिरंगा' अभियान सफल, संस्थापक अभिजीत दिपके हिरासत में

'कॉकरोच जनता पार्टी' का दावा- 'लहरा दो तिरंगा' अभियान सफल, संस्थापक अभिजीत दिपके हिरासत में

समाचार नामा 16 Oct 2026 11:56 pm

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु 23 अक्टूबर को पहुंचेंगी बस्तर, ऐतिहासिक 'मुरिया दरबार' में होंगी शामिल

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु 23 अक्टूबर को पहुंचेंगी बस्तर, ऐतिहासिक 'मुरिया दरबार' में होंगी शामिल

समाचार नामा 16 Oct 2026 8:33 pm

कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उन्माद और वैश्विक बाजार की चिंता

कृत्रिम बुद्धिमत्ता को इक्कीसवीं सदी की सबसे प्रभावशाली तकनीकी उपलब्धियों में गिना जा रहा है। चिकित्सा, शिक्षा, कृषि, उद्योग, संचार और प्रशासन तक इसका विस्तार नई संभावनाओं के द्वार खोल रहा है। बड़ी कंपनियां इस तकनीक को विकसित करने और अपने कारोबार में शामिल करने के लिए भारी धनराशि खर्च कर रही हैं। लेकिन जब किसी नई तकनीक के प्रति उम्मीदें बहुत तेजी से बढ़ती हैं, तब उसके साथ जुड़े आर्थिक जोखिम भी बढ़ने लगते हैं। 15 अक्टूबर 2026 को वैश्विक शेयर बाजारों में दिखाई दी उथल-पुथल ने इसी प्रश्न को सामने ला दिया है कि क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता में किया जा रहा विशाल निवेश भविष्य में अपेक्षित लाभ दे पाएगा। रॉयटर्स की रिपोर्टों के अनुसार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में गिरावट के बीच निवेशकों ने सरकारी बांड जैसे अपेक्षाकृत सुरक्षित निवेश साधनों की ओर रुख किया। दक्षिण कोरिया का शेयर बाजार विशेष रूप से प्रभावित हुआ। वहां प्रमुख शेयर सूचकांक कोस्पी 7.57 प्रतिशत गिरकर 5,554.22 पर बंद हुआ। कारोबार के दौरान गिरावट इतनी तेज थी कि कुछ समय के लिए व्यापार रोकना पड़ा। सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स और एसके हाइनिक्स जैसी प्रमुख अर्धचालक कंपनियों के शेयरों में भी भारी गिरावट दर्ज की गई। जापान का शेयर बाजार भी इस वैश्विक दबाव से अछूता नहीं रहा। इन घटनाओं ने स्पष्ट कर दिया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़ी कंपनियों में निवेशकों की दिलचस्पी के साथ-साथ उनकी आशंकाएं भी बढ़ रही हैं। इसे भी पढ़ें: OpenAI में जासूसी के खुलासे से हड़कंप! AI ने पकड़ा अपना ही इंजीनियर Abdulrahman Alfozan, Silicon Valley में मचा घमासान इस गिरावट के पीछे केवल शेयरों की कीमतों में पहले आई तेजी नहीं थी। इसके साथ अमेरिका में महंगाई के अपेक्षा से अधिक बने रहने और ब्याज दरों को लेकर बढ़ती अनिश्चितता का भी संबंध था। जब ब्याज दरें ऊंची रहती हैं, तब कंपनियों के लिए कर्ज लेना महंगा हो जाता है। भविष्य में मिलने वाले लाभ का वर्तमान मूल्य भी कम हो सकता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में अनेक कंपनियां ऐसे उपकरणों और प्रतिष्ठानों पर भारी धनराशि खर्च कर रही हैं, जिनसे वास्तविक आय प्राप्त होने में कई वर्ष लग सकते हैं। इसलिए महंगे कर्ज और अनिश्चित लाभ का मेल निवेशकों के लिए चिंता का विषय बन गया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता का आधुनिक ढांचा तैयार करना साधारण काम नहीं है। इसके लिए अत्यंत शक्तिशाली संगणक, उन्नत अर्धचालक चिपें, विशाल आंकड़ा केंद्र, निरंतर बिजली आपूर्ति और प्रभावी शीतलन प्रणालियां चाहिए। इन सबके निर्माण और संचालन में भारी पूंजी लगती है। कंपनियां इस उम्मीद में निवेश कर रही हैं कि आने वाले वर्षों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मांग तेजी से बढ़ेगी और उनके द्वारा तैयार की गई संगणना क्षमता का पर्याप्त उपयोग होगा। लेकिन यदि मांग अनुमान से कम रही या ग्राहकों ने अपेक्षित धनराशि खर्च नहीं की, तो कंपनियों के लिए अपने निवेश से पर्याप्त लाभ कमाना कठिन हो सकता है। अमेरिकी कंपनी कोरवीव का उदाहरण इस चिंता को समझने में मदद करता है। यह कंपनी कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़ी संगणना सेवाएं उपलब्ध कराती है। रॉयटर्स की 15 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी पर लगभग 50 अरब डॉलर का कर्ज है। उसके शेयरों में लगातार गिरावट आई और उसके कुछ बांडों पर मिलने वाला प्रतिफल भी बहुत बढ़ गया। इससे निवेशकों ने कंपनी की वित्तीय क्षमता और कर्ज चुकाने की योग्यता पर सवाल उठाए। दूसरी ओर, कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने कर्मचारियों को भरोसा दिलाया कि उसके पास भविष्य में आय देने वाले अनुबंधों का बड़ा भंडार है। यहां समझने वाली बात यह है कि भविष्य के अनुबंधों का बड़ा मूल्य होना और समय पर पर्याप्त नकदी प्राप्त होना अलग-अलग बातें हैं। किसी कंपनी को कर्मचारियों के वेतन, बिजली, उपकरणों, ब्याज और ऋण की किस्तों का भुगतान लगातार करना पड़ता है। यदि आय आने में देरी होती है, तो अच्छे अनुबंध होने के बावजूद वित्तीय दबाव पैदा हो सकता है। इसके विपरीत, यदि मांग मजबूत रहती है और कंपनी अपने अनुबंधों को वास्तविक आय में बदल पाती है, तो भारी निवेश लाभदायक भी साबित हो सकता है। इसलिए किसी कंपनी के शेयरों में गिरावट को उसके कारोबार के समाप्त होने का प्रमाण मानना उचित नहीं है। इस घटनाक्रम ने सरकारी बांडों की भूमिका को भी फिर चर्चा में ला दिया है। जब निवेशकों को शेयर बाजार में अधिक जोखिम दिखाई देता है, तब वे अपनी पूंजी का कुछ हिस्सा सरकारी प्रतिभूतियों में लगाते हैं। इससे इन बांडों की मांग बढ़ सकती है और उनकी कीमतों में तेजी आ सकती है। सामान्यतः बांड की कीमत और उससे मिलने वाला प्रतिफल विपरीत दिशा में चलते हैं। 15 अक्टूबर को वैश्विक बाजारों में सरकारी बांडों की ओर बढ़ते रुझान को इसी संदर्भ में देखा गया। हालांकि सरकारी बांड भी ब्याज दरों में बदलाव से प्रभावित होते हैं, इसलिए उन्हें हर परिस्थिति में पूरी तरह जोखिममुक्त नहीं माना जा सकता। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता का वर्तमान विस्तार किसी आर्थिक बुलबुले का रूप ले रहा है। आर्थिक बुलबुले की स्थिति तब बन सकती है, जब किसी परिसंपत्ति का बाजार मूल्य उसकी वास्तविक कमाई और दीर्घकालीन संभावनाओं से बहुत आगे निकल जाए। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में कुछ कंपनियों के ऊंचे मूल्यांकन, भारी कर्ज और भविष्य की आय को लेकर अनिश्चितता ने इस आशंका को बढ़ाया है। फिर भी पूरे उद्योग को एक ही दृष्टि से देखना उचित नहीं होगा। कुछ कंपनियों के पास पर्याप्त नकदी, मजबूत ग्राहक आधार और विविध कारोबार हैं, जबकि कुछ कंपनियां विस्तार के लिए लगातार कर्ज पर निर्भर हैं। दोनों की वित्तीय स्थिति और जोखिम अलग-अलग हैं। इसका भारत पर भी प्रभाव पड़ सकता है। वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बढ़ने पर विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से भी पूंजी निकाल सकते हैं। इससे शेयरों की कीमतों और रुपये में उतार-चढ़ाव बढ़ने की आशंका रहती है। दूसरी ओर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विस्तार से भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों के लिए नई संभावनाएं भी पैदा हो सकती हैं। आंकड़ा प्रबंधन, तकनीकी सेवाओं, साइबर सुरक्षा और व्यावसायिक प्रक्रियाओं को अधिक प्रभावी बनाने के क्षेत्र में भारतीय कंपनियां महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। लेकिन इन अवसरों का लाभ उठाने के लिए कौशल विकास, अनुसंधान, बिजली की उपलब्धता और तकनीकी ढांचे में निवेश जरूरी होगा। भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े प्रतिष्ठानों का विस्तार करते समय भी वित्तीय अनुशासन का ध्यान रखना होगा। केवल भविष्य की मांग के अनुमान पर भारी कर्ज लेकर विशाल आंकड़ा केंद्र तैयार करना जोखिमपूर्ण हो सकता है। निवेश का आधार वास्तविक ग्राहक मांग, संभावित आय और दीर्घकालीन आर्थिक उपयोगिता होनी चाहिए। सरकार और उद्योग को यह भी देखना होगा कि इन प्रतिष्ठानों की बिजली तथा पानी की जरूरतें किस प्रकार पूरी की जाएंगी और उनका पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ेगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता में मौजूदा उथल-पुथल तकनीकी विकास के विरुद्ध कोई प्रमाण नहीं है। यह संभव है कि आने वाले वर्षों में यह तकनीक उद्योगों की उत्पादकता बढ़ाए, नई सेवाओं को जन्म दे और आर्थिक गतिविधियों का स्वरूप बदल दे। लेकिन किसी तकनीक की उपयोगिता और उससे जुड़ी कंपनियों के शेयरों का उचित मूल्यांकन दो अलग प्रश्न हैं। तकनीकी प्रगति अपने आप में इस बात की गारंटी नहीं देती कि हर निवेशक को लाभ होगा या प्रत्येक कंपनी सफल रहेगी। अंततः कृत्रिम बुद्धिमत्ता का भविष्य केवल शक्तिशाली संगणकों और अरबों डॉलर के निवेश से तय नहीं होगा। उसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह समाज और अर्थव्यवस्था की वास्तविक समस्याओं का कितना प्रभावी समाधान करती है, उससे कितनी टिकाऊ आय पैदा होती है और कंपनियां अपने खर्च तथा कर्ज का प्रबंधन कितनी जिम्मेदारी से करती हैं। तकनीकी महत्वाकांक्षा आवश्यक है, लेकिन उसके साथ विवेकपूर्ण निवेश और वित्तीय अनुशासन भी उतने ही जरूरी हैं। वैश्विक बाजार की मौजूदा चिंता इसी संतुलन की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

प्रभासाक्षी 16 Oct 2026 6:10 pm

भारतीय शेयर बाजार लगातार दूसरे दिन बढ़त के साथ बंद

मुंबई, भारतीय शेयर बाजार शुक्रवार के कारोबारी सत्र में लगातार दूसरे दिन मजबूती के साथ बंद हुआ। दिन के अंत में सेंसेक्स 413.66 अंक या 0.56 प्रतिशत की तेजी के साथ 74,729.27 और निफ्टी 148.80 अंक या 0.65 प्रतिशत की मजबूती के साथ 23,146.15 पर था।

देशबन्धु 16 Oct 2026 4:46 pm

घने जंगल, जयपुर राजघराना और तिरंगा मार्च: किसके हक की थी वो जमीन जहां आज है CP का सेंट्रल पार्क?

एसआईआर में गड़बड़ी को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग को लेकर लगातार कॉकरोच जनता पार्टी प्रदर्शन कर रही है। इसी क्रम में 16 अक्टूबर की शाम 4:00 बजे दिल्ली के कनोट प्लेस के सेंट्रल पार्क पर कॉकरोच जनता पार्टी लहरा दो तिरंगा मार्च का ऐलान किया। दरअसल कॉकरोच जनता पार्टी ने आवाह्वन किया कि तमाम लोग बड़ी संख्या में यहां इस सेंट्रल पार्क पर इकट्ठा होकर के तिरंगा लहराएं। सौरभ दास और आशुतोष रांका अपने समर्थकों के साथ जंतर-मंतर पहुंचे थे। उन्होंने वहां पर तिरंगा लहराया था और आरोप है कि इसी कारण आशुतोष रांका और जो सौरभ दास थे उनको दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया और पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। इसी को लेकर के सीजेपी ने लहरा दो तिरंगा का आह्वन किया। लेकिन सेंट्रल पार्क दो दिनों के लिए बंद है। दरअसल एनडीएमसी ने 16 अक्टूबर और 17 अक्टूबर को प्रशासनिक कारणों की वजह से इस सेंट्रल पार्क को आम जनता के लिए बंद कर दिया। यानी कि कोई भी शख्स यहां सेंट्रल पार्क में इकट्ठा नहीं हो सकता है। लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी ने आवाह्वन किया है कि बड़ी संख्या में लोग कनोट प्लेस में इस सेंट्रल पार्क पर पहुंचे और तिरंगा लहराएं। इसके अलावा जो लोग दूसरे शहरों में रह रहे हैं वो लोग भी तिरंगा लहराएं। सुरक्षा बढ़ा दी गई है। दिल्ली के कमर्शियल सेंटर की पहचान बनने वाले सफेद खंभों वाले गलियारों और लग्जरी ब्रांड के शोरूमों के आने से बहुत पहले, कनॉट प्लेस और इसका मशहूर सेंट्रल पार्क छोटे-छोटे गांवों से भरा एक ऊबड़-खाबड़ जंगल हुआ करता था। आज, यह जगह अक्सर बड़े सार्वजनिक आयोजनों, राजनीतिक रैलियों और कड़ी सुरक्षा के बीच ट्रैफिक डायवर्जन की वजह से सुर्खियों में रहती है। कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके द्वारा आयोजित तिरंगा मार्च से पहले यह जगह फिर चर्चा में आ गई। बबूल और झाड़ियों से भरा, वन्यजीवों वाला वह इलाका आखिर कैसे लुटियंस दिल्ली के धड़कते केंद्र में बदल गया? इसका जवाब एक सदी तक चले व्यापक शहरी बदलाव में छिपा है। इसे भी पढ़ें: Connaught Place में CJP के मार्च से पहले हलचल, Abhijeet Dipke के घर पहुंची पुलिस कैसे शुरू हुआ पूरा मामला 20 जुलाई 2026 दिल्ली का जंतरमंतर छात्रों और सीजेपी सपोर्टर्स की भीड़ संसद की ओर बढ़ी। चलो संसद का आह्वान था। मांग थी पेपर लीक्स के चलते केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा। एक तरफ प्रदर्शनकारी थे। दूसरी तरफ दल बल के साथ दिल्ली पुलिस। खबर आई कि इंटरनेट बंद कर दिया गया है। फिर जो कुछ हुआ वह पूरे देश ने देखा। पुलिस की बर्बरता प्रदर्शनकारियों पर डंडे के रूप में बरसी। अब तारीख आगे बढ़ाई है। करीब 3 महीने बाद 10 अक्टूबर 2026 एक बार फिर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की तैयारी थी। इस बार सवालों के घेरे में मुख्य चुनाव आयुक्त और इलेक्शन कमीशन रहा। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग पर गंभीर सवाल उठे हैं। जड़ एसआईआर रही सवाल गंभीर थे। सत्तारूढ़ दल पर चुनाव आयोग के डिफेंस में उतरने के आरोप लगे। जबकि चुनाव आयोग एक इंडिपेंडेंट कॉन्स्टिट्यूशनल इंस्टीट्यूशन है। वो खुद पर उठाए जा रहे सवालों के तथ्यात्मक जवाब देने में सक्षम है। मामला हल्के में निपटा दिया गया। विपक्ष समेत सीजेपी ने चीफ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग रख दी। सीजेपी ने 10 अक्टूबर को प्रोटेस्ट भी बुला लिया। लेकिन इस मर्तबा दिल्ली पुलिस की तैयारी इतनी तगड़ी थी कि जंतर-मंतर पर परिंदा भी पर नहीं मार पाया। बीएएनएस की धारा 163 लगा दी। 35,000 से ज्यादा सुरक्षाकर्मी सड़कों पर तैनात थे। ट्रेनें कैंसिल कर दी गई। दिल्ली की लगभग हर पांच में से एक मेट्रो स्टेशन को बंद कर दिया गया। इंटरनेट भी बंद कर दिया गया। सीजेपी की लीडरशिप को प्लेन से ही डिटेन कर लिया गया। जो लोग कनाड प्लेस पहुंचे उन्हें भी पुलिस ने उठा लिया। इसे भी पढ़ें: Supreme Court पहुंची व्यापारियों की याचिका, Dipke का दावा- Peaceful Protest से नहीं रुकता व्यापार सौरव-आशुतोष पर लगे ये आरोप सौरव दास और आशुतोष रांका पर बेल बॉन्ड तोड़ने का आरोप लगा है। 10 अक्टूबर को सौरव दास, आशुतोष रांका और अभिजीत दीपके को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया था। इन तीनों को कोर्ट ने 50-50 हजार मुचकले पर रिहा किया गया था। इसके साथ ही शर्त रखी गई थी। तीनों को एक साल तक शांति बनाए रखनी थी, ऐसा कोई काम नहीं करना था, जिससे शांति भंग हो करने का बॉन्ड साइन करवाया गया था। सौरव और आशुतोष पर ये बॉन्ड तोड़ने का आरोप लगा है। बता दें 10 अक्टूबर को सौरव, आशुतोष और दीपके को दिल्ली पुलिस के हिरासत में लेने के बाद प्रदर्शन को अजिंक्य शिंदे ने लीड किया था। गिरफ्तारी के बाद दोनों को ही 5 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया सभी पांचों गेट बंद राजीव चौक मेट्रो स्टेशन के ठीक ऊपर स्थित सेंट्रल पार्क 41,500 वर्ग मीटर में फैला हुआ है। इसमें चार जलाशय (water bodies), 350 सीटों की क्षमता वाला एक एम्फीथिएटर और 207 फीट ऊंचे पोल पर लगा विशालकाय भारतीय तिरंगा मौजूद है। इस पार्क की देखरेख NDMC का बागवानी विभाग करता है। नाम न छापने की शर्त पर NDMC के एक अधिकारी ने बताया कि नागरिक निकाय को उच्च अधिकारियों से पार्क बंद करने के निर्देश मिले हैं। अधिकारी ने आगे कहा कि पार्क के सभी पांचों गेट बंद रहेंगे। पार्क का एम्फीथिएटर अक्सर सरकारी कार्यक्रमों, सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजनों के लिए बुक रहता है, वहीं इसका हरा-भरा परिसर बड़ी संख्या में लोगों खासकर सप्ताहांतपर को अपनी ओर आकर्षित करता है। अधिकारी ने प्रदर्शन के दौरान लोगों को पार्क में घुसने से रोकने की चुनौतियों का भी जिक्र किया, क्योंकि इसकी चारदीवारी की रेलिंग काफी नीची (लगभग तीन से चार फीट ऊंची) है। अधिकारी ने कहा हमें उच्च अधिकारियों से पार्कों को बंद करने के निर्देश मिले थे। पार्क के पांचों गेट बंद रखे जाएंगे। यह विशाल ध्वज पार्क के कोने पर, इनर-सर्कल रोड से कुछ ही फीट की दूरी पर लगा है। अधिकारी ने बताया कि लोगों को ध्वज के पास जाने से रोकना मुश्किल हो सकता है, और ऐसी स्थिति को संभालना पुलिस की कानून-व्यवस्था से जुड़ी जिम्मेदारी होगी। यह विशाल ध्वज पार्क के कोने पर, इनर-सर्कल रोड से कुछ ही फीट की दूरी पर स्थित है। इसे भी पढ़ें: कार्यकर्ताओं की समस्याएं सीधे सुनेंगे पार्टी नेता, BJP दफ्तर में शुरू हुई जन सुनवाई हाई कोर्ट में सुनवाई 15 अक्टूबर को दिल्ली हाई कोर्ट ने CJP के तिरंगा मार्च पर सुनवाई की थी। इस दौरान अदालत ने मार्च पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पुलिस से कहा था कि गतिविधियों को नियंत्रित और व्यवस्थित बनाए रखने के लिए हरसंभव कदम उठाए जाएं। वहीं, याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया था कि कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क के बीचों-बीच आंदोलन आयोजित किया गया है, जबकि यह जगह प्रदर्शन के लिए नहीं है। इसे देखते हुए व्यापारियों ने अपनी दुकानें बंद करना शुरू कर दिया है। इस वजह से प्रदर्शन पर रोक लगाना बेहद जरूरी है। शिकारगाहों और गांवों से लेकर शाही ज़मीन तक 20वीं सदी की शुरुआत में, आज के कनॉट प्लेस वाला इलाका घनी झाड़ियों से भरा एक ग्रामीण क्षेत्र था, जो तीतरों और जंगली जानवरों का ठिकाना हुआ करता था। इस इलाके में मुख्य रूप से जयसिंहपुरा और राजा का बाज़ार जैसे गांव आते थे। यह ज़मीन जयपुर के शासकों की थी, जो उन्हें मुगल बादशाह मुहम्मद शाह द्वारा सवाई जय सिंह द्वितीय को दिए गए एक अनुदान (जागीर) के रूप में मिली थी। इस इलाके में कुछ प्राचीन और महत्वपूर्ण जगहें थीं, जिनमें ऐतिहासिक हनुमान मंदिर और जंतर-मंतर वेधशाला प्रमुख हैं। पुरानी दिल्ली (शाहजहानाबाद) के निवासी अक्सर मंगलवार के दिन इस जंगली इलाके से होकर गुज़रते थे, जिसका एकमात्र मकसद हनुमान मंदिर के दर्शन करना होता था। अंग्रेजों का विस्तार और कनॉट प्लेस का जन्म जब ब्रिटिश प्रशासन ने 1912 में दिल्ली का विस्तार करने का फैसला किया, तो उन्होंने जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की। इसे पूरा होने में एक दशक से ज्यादा का समय लगा और 1925 तक जाकर यह काम पूरा हुआ। जयसिंहपुरा के निवासियों को करोल बाग और पहाड़गंज की तरफ स्थानांतरित कर दिया गया। इस भव्य कमर्शियल मार्केट का निर्माण 1929 में शुरू हुआ और 1933 में पूरा हुआ। आर्किटेक्ट रॉबर्ट टोर रसेल द्वारा डिज़ाइन किए गए इस मार्केट को दो मंजिला 'जॉर्जियन' आर्किटेक्चर शैली में बनाया गया था, जिसमें दो संकेंद्रित (एक-दूसरे के अंदर बने) वृत्त शामिल थे। इस कॉम्प्लेक्स का नाम 'कनॉट प्लेस' और 'कनॉट सर्कस' रखा गया। यह नाम प्रिंस आर्थर, जो 'ड्यूक ऑफ कनॉट एंड स्ट्रैथर्न' (महारानी विक्टोरिया के तीसरे बेटे) थे, के सम्मान में रखा गया था। शुरुआत में यह जगह अपनी खुली किताबों की दुकानों, फुटपाथ पर सामान बेचने वालों, मशहूर कॉफी हाउसों और 'वेंगर्स जैसे जाने-माने भोजनालयों के लिए मशहूर थी। बाद में, स्थानीय स्तर पर इसे अनौपचारिक रूप से 'राजीव चौक' और 'इंदिरा चौक' कहा जाने लगा। सेंट्रल पार्क की कहानी क्या है कनॉट प्लेस (CP) के बीचों-बीच स्थित सेंट्रल पार्क का इतिहास बेहद दिलचस्प रहा है। आज हम जिस आधुनिक सेंट्रल पार्क को देखते हैं, उसका वर्तमान स्वरूप साल 2006 में तैयार हुआ था, लेकिन एक सार्वजनिक स्थल और पार्क के रूप में इसकी मौजूदगी दशकों पुरानी है। शुरुआती दौर में कनॉट प्लेस के केंद्र में लोगों के बैठने, टहलने और मिलने-जुलने के लिए एक खुला हरा-भरा मैदान हुआ करता था। वहां एक फव्वारा और पास में ही मशहूर कॉफी हाउस मौजूद था। बाद में जब भूमिगत पालिका बाजार का निर्माण हुआ, तब भी पार्क का अस्तित्व ऊपर बना रहा। साल 2001 में दिल्ली मेट्रो के विस्तार और राजीव चौक स्टेशन के निर्माण के लिए यह जमीन DMRC (दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन) को सौंप दी गई। मेट्रो का भूमिगत निर्माण कार्य पूरा होने के बाद DMRC ने इसके ठीक ऊपर लगभग 27,000 वर्ग मीटर के विशाल क्षेत्र में एक नया और खूबसूरत पार्क विकसित किया, जिसे 2006 में आम जनता के लिए खोल दिया गया। इस नए पार्क को हरा-भरा बनाने के लिए लगभग 700 पेड़ और 2,750 झाड़ियां लगाई गईं, जिनमें सफेद चंपा, रॉयल पाम, गुलमोहर, पिंक तबेबुइया, बॉटल ब्रश, इंडियन लॉरेल और अशोक जैसे सदाबहार पेड़ शामिल थे। पार्क के आकर्षण को बढ़ाने के लिए इसमें 4 जल निकाय (water bodies), 21 फव्वारे और एक खूबसूरत वॉटरफॉल तैयार किया गया। इसके अलावा, सांस्कृतिक और कलात्मक कार्यक्रमों के आयोजन के लिए लगभग 500 दर्शकों की क्षमता वाला एक खुला एम्फीथिएटर भी बनाया गया। इस पार्क में कुल 9 प्रवेश द्वार हैं, जिनमें से 2 गेट सीधे राजीव चौक मेट्रो स्टेशन से जुड़ते हैं।

प्रभासाक्षी 16 Oct 2026 2:41 pm

नेहा बोरा ने 'बांग्लादेश की जेनजी क्रांति' को बताया प्रेरणा, भड़के सीएम योगी, मुख्यमंत्री धामी ने भी घेरा

नेहा बोरा ने 'बांग्लादेश की जेनजी क्रांति' को बताया प्रेरणा, भड़के सीएम योगी, मुख्यमंत्री धामी ने भी घेरा

समाचार नामा 16 Oct 2026 2:04 pm

सरकार ने सोने-चांदी के ड्यूटी ड्रॉबैक दरों में की कटौती

नई दिल्ली, केंद्र सरकार ने सोने और चांदी के आभूषणों तथा अन्य कीमती धातु उत्पादों के निर्यात पर मिलने वाली ड्यूटी ड्रॉबैक दरों में कटौती कर दी है।

देशबन्धु 16 Oct 2026 1:38 pm

भोजन की बर्बादी से निपटने की वैश्विक चुनौती?

भोजन मूलभूत आवश्यकताओं के अलावा, प्रत्येक इंसान का बुनियादी अधिकार भी है। भोजन अनमोल है जिसका सम्मान करना सभी का कर्तव्य है। आज ‘विश्व खाद्य दिवस’ है जो सालाना 16 अक्टूबर को पूरे संसार में इस मकसद से मनाया जाता है कि अन्न की बर्बादी को रोकने के लिए जनमानस को जागरूक किया जाए। नवंबर 1979 को संयुक्त राष्ट् के खाद्य एवं कृषि संगठन के 20वें सम्मेलन में खाद्य दिवस को मनाने का निर्णय हुआ जिसका पहली बार आयोजन वर्ष 1981 में हुआ। दुनिया में भूख से बढ़ते कुपोषण पर नियंत्रण को ध्यान में रखकर संयुक्त राष्ट्र ने वैश्विक संघों को चेताया था। ये दिवस इस बात पर ज्यादा जोर देता है कि हमें थाली में उतना ही भोजन परोसना चाहिए, जितने की पेट को जरूरत हो। ज्यादा भोजन लेंगे तो निश्चित रूप से बर्बाद ही होगा। फूड इंडेक्स पर यूएनईपी-2024 की रिपोर्ट के मुताबिक हिंदुस्तान में सालाना करीब 7.8 करोड़ टन भोजन बर्बाद होता है, जिसका औसत लगभग 21.4 करोड़ किलोग्राम प्रतिदिन आंका गया। विश्व खाद दिवस-2025 की थीम थी ‘बेहतर भोजन और बेहतर भविष्य साथ-साथ’ जो एग्रीफूड सिस्टम को बदलने में वैश्विक सहयोग की शक्ति को उजागर करती है। भोजन बर्बादी की समस्या संसार में बड़ी आफत के रूप में उभरी है। ऐसे तमाम मुल्क हैं जहां अन्न का उत्पादन शून्य है और दूसरे देशों के उत्पाद-भोजन पर ही निर्भर हैं, बावजूद इसके बेहताशा भोजन बर्बाद करते हैं। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण की ‘फूडवेस्टाइज इंडेक्स रिपोर्ट-2026’ सामने आई जिसमें दुनिया भर में 1.05 अरब टन भोजन बर्बाद होता बताया गया जिससे नई किस्म की न सिर्फ बीमारियां-वायरस फैले, बल्कि पर्यावरण भी दूषित हुआ। भारत में पिछले 10 वर्षों में अन्न उत्पादन 90 मिलियन मीट्रिक टन पिछले एक दशक से ज्यादा हुआ है। धरती पर मात्र भारत ही एक ऐसा मुल्क है जो करीब 76 देशों को विभिन्न किस्म का अन्न सप्लाई करता है जिसमें चीनी, दालें, चावल, मखाने, सरसों और सब्जियां प्रमुख रूप से शामिल हैं। इसे भी पढ़ें: छात्रः सपनों की उड़ान से सृजन की पहचान तक तमाम ऐसे इस्लामिक देश हैं जो भारत में उत्पादित बासमती चावल ही पसंद करते हैं। ईरान-ईराक में चावल की सप्लाई सिर्फ भारत से ही होती है। अन्न निर्यात के लिहाज से भारत विश्व का बड़ा बाजार बनकर इस समय उभरा है। संसार में भारत दूध और बाजरे के निर्माण में नंबर वन पायदान है। वर्ष 2014 के बाद से हिंदुस्तान शहद, अंडे, मछलियां और फल-सब्जियों के उत्पादन में दूसरे स्थान पर काबिज हुआ है। जबकि, कभी चौथे स्थान पर हुआ करता था। भूखे सोना विकसित संसार के माथे पर कलंक जैसा है। भूख के आंकड़े आज भी डरावने हैं। संसार का एक बड़ा इंसानी हिस्सा अभी भी रात में भूखे पेट सोता है। जबकि, रोजाना जितनी भोजन की बर्बादी होती है, थालियों में खाने को व्यर्थ करके लोग फेंक देते हैं, अगर ऐसा ना किया जाए, तो भूखे सोने वालों के आंकड़ों में कमी लाई जा सकती है। भोजन की बर्बादी से न केवल अन्न और धन का नुकसान होता है, बल्कि पानी, बिजली और अन्नदाताओं की सालाना मेहनत भी बेकार होती है। इससे पर्यावरण पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। भूख से निपटने के लिए वैश्विक स्तर पर सभी देशों को चेताना होगा। भूख और अन्न बर्बादी के नियंत्रण पर भारत जैसी पहल अन्य देशों को भी करनी होगी। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम-2013 से प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना, पीएम पोषण योजना, अंत्योदय अन्न योजना, राइस फोर्टिफिकेशन और प्राइस स्अेबिलाइजेशन फंड जैसी प्रमुख पहले भारत की खाद्य और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता को सुदृढ़ कर रही हैं। भारत में 80 करोड़ लोग मुफत अन्न वितरण योजना के लाभार्थी हैं, इसलिए सरकार का प्रयास है कि कोई भी व्यक्ति भूखे पेट नहीं सोए। लेकिन भोजन की बर्बादी भारत में भी कम नहीं है। आंकड़े इस समस्या के गवाह हैं। विश्व खाद्य दिवस संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन की स्थापना का प्रतीक है जिसे पहली बार औपचारिक रूप से 1981 में ‘भोजन सर्वप्रथम’ विषय वस्तु के साथ मनाया गया था। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1984 में इस दिवस को मान्यता दी जिसके बाद एक साथ 150 देशों का समूह बना, जो सामूहिक प्रयासों से भूख और अन्न बर्बादी से लड़ाई लड़ रहे हैं। हालांकि, सफलता उतनी नहीं मिली, जितनी उम्मीदें लगाई गईं थीं। बहरहाल, आज का दिन खाद्य सुरक्षा, पोषण टिकाउ, कृषि पद्वतियों के विषय में ना सिर्फ जागरूक करता है, बल्कि सुरक्षित, पर्याप्त और पौष्टिक भोजन की उपलब्धता में आने वाली चुनौतियों से लड़ने की सीख भी देता है। भोजन मानव जीवन का आधार है। स्वास्थ्य विकास और कल्याण के लिए अत्यंत आवश्यक भी। हालांकि, दुख तब होता है जब खाद्य उत्पादन में वैश्विक प्रगति के बाद भी असंख्य लोग अभी भी भूख और कुपोषण का सामना कर रहे हैं। भोजन पर सभी का मौलिक अधिकार है, जिसे कोई नहीं छीन सकता। भोजन हीन इंसान को भोजन उपलब्ध करवाना प्रत्येक हुकूमत का पहला कर्तव्य होता है। - डॉ. रमेश ठाकुर सदस्य, राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान (NIPCCD), भारत सरकार!

प्रभासाक्षी 16 Oct 2026 1:20 pm

पंजाब में नशे का तांडवः वर्दी बनी त्रासदी

पंजाब की धरती कभी शौर्य, पराक्रम, मेहनत, उद्यमशीलता और जीवटता के लिए जानी जाती थी। इसी मिट्टी के नौजवानों ने देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दी और खेतों में पसीना बहाकर देश का अन्न भंडार भरा। लेकिन आज उसी पंजाब की पहचान नशे के बढ़ते कारोबार, युवाओं की बर्बादी और ड्रग्स माफिया के बढ़ते प्रभाव से जुड़ती जा रही है। यह केवल एक राज्य की सामाजिक त्रासदी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, शासन-व्यवस्था और राजनीतिक इच्छाशक्ति की गंभीर परीक्षा है। जिस पंजाब के युवाओं के हाथों में कभी तलवार, हल और तिरंगा शोभा देते थे, वहां आज नशे ने अनेक हाथों को बेबस और अनेक परिवारों को बदहवास कर दिया है। विडंबना देखिए कि नशे के कारोबार पर अंकुश लगाने की जिम्मेदारी जिन पुलिसकर्मियों की है, यदि उन्हीं के घर से करोड़ों रुपये की हेरोइन बरामद होने की खबर सामने आती है, तो यह व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है। पंजाब में एक पुलिस कांस्टेबल के घर से कथित तौर पर 40 करोड़ रुपये की हेरोइन बरामद होने का मामला इसी सड़ांध की ओर संकेत करता है। यह घटना महज एक आपराधिक प्रकरण नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न है, जिसमें अपराध रोकने के लिए नियुक्त व्यक्ति ही कथित तौर पर अपराध के संदेह के घेरे में आ जाए। यह तो वही स्थिति हुई कि ‘बाड़ ही खेत को खाने लगे’, तो फसल की रखवाली कौन करेगा? जिस पुलिस के कंधों पर नशा तस्करों को पकड़ने का दायित्व है, यदि उसी व्यवस्था के भीतर ऐसे तत्व पनपने लगें, तो आम नागरिक का भरोसा डगमगाना स्वाभाविक है। इस मामले में निष्पक्ष जांच, दोषियों की पहचान और कठोर कानूनी कार्रवाई जरूरी है। किसी व्यक्ति को केवल आरोप के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन वर्दी की आड़ में अपराध करने वाले किसी भी व्यक्ति को कानून से बचने का अवसर भी नहीं मिलना चाहिए। पंजाब में नशे का कारोबार अब गलियों, गांवों और कस्बों तक अपनी जड़ें फैला चुका है। कभी नशे की समस्या को सीमावर्ती क्षेत्रों या शहरी युवाओं तक सीमित माना जाता था, लेकिन आज सिंथेटिक ड्रग्स सहित विभिन्न मादक पदार्थों की उपलब्धता ने संकट को और व्यापक बना दिया है। युवा पीढ़ी का एक हिस्सा नशे की गिरफ्त में आकर अपना स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और भविष्य गंवा रहा है। कहीं मां की गोद सूनी हो रही है, कहीं वृद्ध पिता के बुढ़ापे का सहारा छिन रहा है और कहीं परिवार का कमाऊ सदस्य नशे की लत के कारण स्वयं अपने परिजनों पर बोझ बन रहा है। ‘घर का चिराग ही घर में अंधेरा कर दे’, इससे बड़ी विडंबना क्या होगी! नशे की लत केवल व्यक्ति को नहीं तोड़ती, बल्कि पूरे परिवार और सामाजिक ताने-बाने को भीतर तक खोखला कर देती है। इस संकट की गंभीरता सरकारी आंकड़ों और पुलिस की कार्रवाइयों से भी समझी जा सकती है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार दस महीनों में पंजाब पुलिस ने 10,524 तस्करों को गिरफ्तार किया, जिनमें 153 बड़े ऑपरेटर शामिल थे। इस दौरान 790 किलोग्राम हेरोइन, 860 किलोग्राम अफीम और अन्य मादक पदार्थों के साथ 13 करोड़ रुपये से अधिक की ड्रग मनी जब्त की गई तथा नशे के कारोबार से जुड़ी 208 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति पर कार्रवाई की गई। ये आंकड़े कार्रवाई के पैमाने को अवश्य दर्शाते हैं, लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठाते हैं कि इतनी बड़ी मात्रा में नशीले पदार्थ आखिर राज्य में पहुंच कैसे रहे हैं? इतनी गिरफ्तारियों और जब्ती के बावजूद यदि नशे की उपलब्धता और लत पर निर्णायक अंकुश नहीं लग रहा, तो स्पष्ट है कि समस्या की जड़ें गहरी हैं। ‘मर्ज बढ़ता गया, ज्यों-ज्यों दवा की’ जैसी स्थिति से बचने के लिए गिरफ्तारियों की संख्या से आगे बढ़कर नशे की आपूर्ति, वित्तीय नेटवर्क और राजनीतिक संरक्षण की पड़ताल करनी होगी। इसे भी पढ़ें: Kejriwal की हरी झंडी के बाद Congress-CJP में हुई दोस्ती! क्या पंजाब चुनाव मिलकर लड़ेंगे कांग्रेस और AAP? पाकिस्तान से लगी पंजाब की लगभग 553 किलोमीटर लंबी सीमा इस चुनौती को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ती है। ड्रोन के माध्यम से नशीले पदार्थों और हथियारों की तस्करी की आशंकाएं सीमा प्रबंधन को और जटिल बनाती हैं। वर्ष 2026 में अब तक पंजाब की सीमा से 183 ड्रोन जब्त किए जाने का उल्लेख इस खतरे की गंभीरता को रेखांकित करता है। सीमा पार से संचालित तस्करी के नेटवर्क पर प्रहार करना आवश्यक है, लेकिन सारी जिम्मेदारी बाहरी ताकतों पर डालकर राज्य के भीतर की कमजोरियों से आंखें नहीं मूंदी जा सकतीं। यदि स्थानीय तस्कर, संगठित गिरोह और भ्रष्ट तंत्र मिलकर काम कर रहे हों, तो सीमा पर कड़ी निगरानी के साथ-साथ भीतर भी कठोर कार्रवाई करनी होगी। ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ करने वाली जांच ही बता सकती है कि इस काले कारोबार में कौन मोहरा है, कौन खिलाड़ी और कौन पर्दे के पीछे बैठा सूत्रधार। आम आदमी पार्टी की पंजाब सरकार ने नशामुक्ति और तस्करों के विरुद्ध कार्रवाई को लेकर अनेक दावे किए हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये दावे जमीन पर उतना परिवर्तन ला पाए हैं, जिसकी अपेक्षा पंजाब की जनता ने की थी? सत्ता में आने से पहले नशे के विरुद्ध निर्णायक लड़ाई के वादे करना आसान है, लेकिन उस लड़ाई को परिणाम तक पहुंचाना राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक ईमानदारी और निरंतर जवाबदेही मांगता है। यदि नशे की उपलब्धता बनी हुई है, युवा लगातार इसकी गिरफ्त में आ रहे हैं और तस्करी के नेटवर्क बार-बार सक्रिय हो जाते हैं, तो सरकार की रणनीति और उसके क्रियान्वयन पर सवाल उठना स्वाभाविक है। केवल छापेमारी, गिरफ्तारी और घोषणाओं से नशामुक्त पंजाब का सपना साकार नहीं होगा। सरकार की सफलता का वास्तविक पैमाना यह होना चाहिए कि नशे की आपूर्ति कितनी घटी, कितने युवा उपचार के बाद सामान्य जीवन में लौटे और बड़े तस्करों तथा उनके संरक्षकों के विरुद्ध कितनी प्रभावी कार्रवाई हुई। नशे के खिलाफ लड़ाई में पुलिस सुधार, आधुनिक तकनीक, सीमा सुरक्षा और वित्तीय जांच के साथ-साथ नशामुक्ति केंद्रों, मनोवैज्ञानिक परामर्श, रोजगार और पुनर्वास पर भी समान ध्यान देना होगा। नशे के शिकार युवाओं को केवल अपराधी मानकर खारिज करना समाधान नहीं है, उन्हें उपचार, सहारा और सम्मानजनक जीवन में लौटने का अवसर देना भी जरूरी है। गांवों में जनभागीदारी, स्कूल-कॉलेजों में जागरूकता और परिवारों की सक्रिय भूमिका इस अभियान को जनांदोलन का स्वरूप दे सकती है। साथ ही, पुलिस और राजनीतिक तंत्र में किसी भी स्तर पर संरक्षण देने वालों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। पंजाब को नशे की गिरफ्त से निकालना केवल सरकार का नहीं, पूरे समाज का दायित्व है, लेकिन नेतृत्व की पहली जवाबदेही सरकार की ही है। जब कानून के रखवाले ही संदेह के घेरे में आने लगें और करोड़ों की हेरोइन की बरामदगी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़े करे, तब आत्ममंथन टालना आत्मघाती होगा। ‘लकीर पीटने’ के बजाय अब निर्णायक परिणाम देने का समय है। पंजाब को खोखले नारों नहीं, कठोर कार्रवाई, पारदर्शी जांच और जवाबदेह शासन की जरूरत है। नशा माफिया की जड़ें उखाड़ने के लिए राजनीतिक संरक्षण की दीवारें तोड़नी होंगी और कानून का भय हर अपराधी तक पहुंचाना होगा। अन्यथा नशे का यह तांडव पंजाब की युवा शक्ति को ही नहीं, देश की सामाजिक और राष्ट्रीय सुरक्षा को भी गंभीर क्षति पहुंचाता रहेगा। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

प्रभासाक्षी 16 Oct 2026 12:13 pm

सैटेलाइट कम्युनिकेशन में प्रतिस्पर्धा का स्वागत है, भारत के कानून सभी पर समान रूप से लागू: रिलायंस

मुंबई, रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल) ने शुक्रवार को कहा कि भारत में सैटेलाइट संचार क्षेत्र के लिए बनाए गए नियम घरेलू और विदेशी सभी कंपनियों पर समान रूप से लागू होते हैं।

देशबन्धु 16 Oct 2026 11:20 am

Delhi CJP Rally:तिरंगा लहराने के लिए जेल जाने को तैयार’, रैली से पहले अभिजीत दीपके का बयान

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समाचार नामा 16 Oct 2026 10:46 am